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Shiv Chalisa PDF Download | शिव चालीसा लिखित में | Shiv Chalisa in Hindi With PDF 2026

शिव चालीसा pdf (Shiv Chalisa PDF) भोलेनाथ सभी देवों में सबसे प्रिय देव महादेव हैं। उनकी पूजा करने का एक सरल तरीका है शिव चालीसा का पाठ करना। शिव चालीसा में 40 छंद हैं। इसकी शुरुआत श्री पावर्ती के पुत्र गणेश को याद करके की जाती है और महाकाल भोलेनाथ के कई दिव्य गुणों और लीलाओं का वर्णन किया जाता है। शिव आरती, कुबेर चालीसा और शिव अमृतवाणी भी आप हमारी वेबसाइट से पढ़ सकते हैं|

त्रयोदशी के दिन हवन करके शिव चालीसा का पाठ करने से विशेष लाभ मिलता है। उनका व्रत रखने की भी परंपरा है। ऋण से मुक्ति, पुत्र प्राप्ति, विघ्न बाधाएं दूर होना, मानसिक शांति आदि आसान हो जाते हैं। सुंदरकांड पाठ हिंदी में | Shri Sai Chalisa Lyrics PDF | Hanuman Chalisa MP3 Download | Lingashtakam | Foods to Eat During Sawan Fast


Shiv Chalisa Lyrics in Hindi PDF
Shiv Chalisa in Hindi PDF

|| शिव चालीसा ||

॥ दोहा ॥
जय गणेश गिरिजा सुवन,
मंगल मूल सुजान ।
कहत अयोध्यादास तुम,
देहु अभय वरदान ॥

॥ चौपाई ॥
जय गिरिजा पति दीन दयाला ।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥

भाल चन्द्रमा सोहत नीके ।
कानन कुण्डल नागफनी के ॥

अंग गौर शिर गंग बहाये ।
मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे ।
छवि को देखि नाग मन मोहे ॥ 4॥

मैना मातु की हवे दुलारी ।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी ।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे ।
सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥

कार्तिक श्याम और गणराऊ ।
या छवि को कहि जात न काऊ ॥ 8॥

देवन जबहीं जाय पुकारा ।
तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥

किया उपद्रव तारक भारी ।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥

तुरत षडानन आप पठायउ ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥

आप जलंधर असुर संहारा ।
सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥ 12॥

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई ।
सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥

किया तपहिं भागीरथ भारी ।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं ।
सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥

वेद नाम महिमा तव गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥ 16॥

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला ।
जरत सुरासुर भए विहाला ॥

कीन्ही दया तहं करी सहाई ।
नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा ।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥

सहस कमल में हो रहे धारी ।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥ 20॥

एक कमल प्रभु राखेउ जोई ।
कमल नयन पूजन चहं सोई ॥

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर ।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥

जय जय जय अनन्त अविनाशी ।
करत कृपा सब के घटवासी ॥

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै ।
भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥ 24॥

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो ।
येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो ।
संकट से मोहि आन उबारो ॥

मात-पिता भ्राता सब होई ।
संकट में पूछत नहिं कोई ॥

स्वामी एक है आस तुम्हारी ।
आय हरहु मम संकट भारी ॥ 28॥

धन निर्धन को देत सदा हीं ।
जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥

अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी ।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥

शंकर हो संकट के नाशन ।
मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं ।
शारद नारद शीश नवावैं ॥ 32॥

नमो नमो जय नमः शिवाय ।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥

जो यह पाठ करे मन लाई ।
ता पर होत है शम्भु सहाई ॥

ॠनियां जो कोई हो अधिकारी ।
पाठ करे सो पावन हारी ॥

पुत्र हीन कर इच्छा जोई ।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥ 36॥

पण्डित त्रयोदशी को लावे ।
ध्यान पूर्वक होम करावे ॥

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा ।
ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे ।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥

जन्म जन्म के पाप नसावे ।
अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥ 40॥

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी ।
जानि सकल दुःख हरहु हमारी ॥

॥ दोहा ॥
नित्त नेम कर प्रातः ही,
पाठ करौं चालीसा ।
तुम मेरी मनोकामना,
पूर्ण करो जगदीश ॥

मगसर छठि हेमन्त ॠतु,
संवत चौसठ जान ।
अस्तुति चालीसा शिवहि,
पूर्ण कीन कल्याण ॥


Shiv Chalisa PDF Download | शिव चालीसा लिखित में | Shiv Chalisa in Hindi With PDF 2026
Presenting the Shri Shiv Chalisa on this auspicious occasion. The grace of Bholenath always remains upon those who recite this sacred hymn. Download this holy Chalisa and chant the divine mantras of Lord Shiva with your family.

Shiva Chalisa Lyrics In English
Shiv Chalisa Likhit Mein

॥ Doha ॥
jay ganesh girija suvan,
mangal mool sujaan ॥
kahat ayodaas tum,
dehu abhay bhooshana ॥

॥ Chaupai ॥
jay girija pati deen dayaala ॥
sada karat santan pratipaala ॥

bhaal chandrama sohat neeke ॥
kaanan kundal naagaphanee ke ॥

ang gaur shree ganga bahaye ॥
mundamaal tan kshaaraprasthaan ॥

vastr kal baaghambar sohe ॥
chhavi ko dekhi naag man mohe ॥ 4 ॥

maina maatu kee have dulaaree ॥
baam ang sohat chhavi nyaaree ॥

kar trishool sohat chhavi bhaaree ॥
karat sada shatrun kshayakaaree ॥

nandi ganesh sohai tahan kaise ॥
saagar madhy kamal hain aise ॥

kaartik shyaam aur garaaro ॥
ya chhavi ko kahi jaat na kooo ॥ 8 ॥

devan jabahin jaay bulaay ॥
tab hee duhkh prabhu aap nivaara ॥

achhoota taarak bhaaree ॥
devan sab mili tumahin jauharee ॥

turat shaadaanan aap pathaayau ॥
lavanimesh mahan maari girayau ॥

aap jalandhar asur sanhaara ॥
suyash tumhaar vidit sansaara ॥ 12 ॥

tripuraasur san yuddh machaee ॥
sabahin krpa kar leen bachaee ॥

kiya tapahin bhaageerath bhaaree ॥
poorab pratigya taasu puraari ॥

daanin mahan tum sam kooo nahin ॥
sevak stuti karat sadaahin ॥

ved naam mahima tav gaee ॥
akath anaadi bhed nahin paee ॥ 16 ॥

prakatee udadhi math mein naav ॥
jarat surasur bhaye vihaala ॥

keenhee daya tahan karee sahaee ॥
neelakanth tab naam kahai ॥

vandan raamachandr jab keenha ॥
jeet ke lank vibheeshan deenha ॥

sahas kamal mein ho rahe dhaaree ॥
keenh pareeksha tabahin puraari ॥ 20 ॥

ek kamal prabhu raakheu joee ॥
kamal nayan poojan chahan soi ॥

kathin bhakti darshan prabhu shankar ॥
bhe vishesh aalekh var ॥

jay jay jay anant avinaashee ॥
karat krpa sab ke ghatavaasee ॥

dusht sakal nit mohi sataavai ॥
bhramat rahaun mohi chain na aavai ॥ 24 ॥

traahi traahi main naath pukaaro ॥
yehi avasar mohi an ubaaro ॥

trishool shatru ko maaro ॥
sankat se mohi an ubaro ॥

maata-pita bhraata sab hoee ॥
sankat mein prashnat nahin koee ॥

svaamee ek hain aasa vivaah ॥
ain harahu mam sankat bhaaree ॥ 28 ॥

dhan nirdhan ko det sada heen ॥
jo koee jaanche so phal pae ॥

astuti kehi vidhi karan vivaah ॥
kshamahu naath ab viphal hamaaree ॥

shankar ho sankat ke naashan ॥
mangal kaaran vighn vinaashan ॥

yogee yati muni dhyaanan ॥
sharad naarad chamak navaanvai ॥ 32 ॥

namo namo jay namah shivaay ॥
sur brahmaadik paar na paay ॥

jo yah paath kare man laee ॥
ta par hot hai shambhu sahaay ॥

rniyaan jo koee ho adhikaaree ॥
paath so kare param paavan ॥

putr heen kar ichchha joee ॥
nishchay shiv prasaad tehi hoi ॥ 36 ॥

pandit trayodashee ko laave ॥
dhyaan den hom karaave ॥

trayodashee vrat karai sada ॥
taake tan nahin rahai kalesha ॥

dhoop deep naivedy chadaave ॥
shankar sammukh paath sunaave ॥

janm janm ke paap naasaave ॥
antim dhaam shivapur mein paave ॥ 40 ॥

kahate hain ayodhyaadaas ka vivaah ॥
jaani sakal duhkh harahu hamaaree ॥

॥ Doha ॥
nitt nem kar subah hee,
paath karaun chaaleesa ॥
tum mere man,
poorn karo jagadeesh ॥

magasar chhathi hemant rtu,
sanvat chausath jaan ॥
astuti chaaleesa shivahi,
poorn keen kalyaan ॥


Hindi WordTransliteration / PronunciationSpiritual Meaning (as you noted)Deeper Symbolism & Context
व्याघ्राम्बर
(Vyasghambar)
Vyāghrāmbar
(Vyaagh-raam-bar)
The tiger skin, symbolizing mastery over desire.The tiger represents primal, animalistic energy and desire. Shiva wearing its skin signifies he is not just an ascetic who renounces the world, but the complete master of all its energies. He sits upon the force of desire, rendering it powerless.
मुण्डमाल
(Mundmaal)
Muṇḍamālā
(Mun-da-maa-laa)
The garland of skulls, representing the cycle of time and rebirth.Each skull is a metaphor for a full cycle of creation and destruction (a Kalpa). The garland signifies Shiva as Mahakala (the Lord of Time), who transcends and wears the endless cycles of birth and death as an ornament.
अभय वरदान
(Abhay Varadan)
Abhaya Varadāna
(A-bhaya Va-ra-daa-na)
A divine blessing that removes all fears.“Abhaya” means “without fear.” Granting abhaya (often shown with a raised palm) is a core gesture of Shiva and other deities. It represents the ultimate protection for the devotee: freedom from worldly anxieties, the fear of death, and spiritual ignorance.
गिरिजा सुवन
(Girija Suvan)
Girijā Suvan
(Gi-ri-jaa Su-van)
Refers to Lord Ganesha, the son of Girija (Parvati).This term highlights Ganesha’s lineage. Invoking him first (“जय गणेश गिरिजा सुवन”) follows the sacred tradition of seeking the “Vighnaharta” (remover of obstacles) before any endeavor, ensuring the recitation of the Chalisa proceeds without hindrance.


Shiva Chalisa PDF

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान ॥

अर्थ – हे गिरजा-पुत्र अर्थात पार्वती के नंदन श्री गणेश, आप ही समस्त शुभता और बुद्धि का कारण हो। अतः आपकी जय हो। अयोध्यादास जी प्रार्थना करते हैं कि आप ऐसा वरदान दें कि सभी भय दूर हो जाए।

जय गिरिजा पति दीन दयाला ।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥

अर्थ – हे पार्वती ( गिरिजा) के पति, आप सबसे दयालु हो, आपकी जय हो, आप हमेशा साधु-संतों की रक्षा करते हो।

भाल चन्द्रमा सोहत नीके ।
कानन कुण्डल नागफनी के ॥

अर्थ – आप त्रिशूल रखते हो और मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित हैं, आपने कानो में नागफनी के समान कुण्डल पहन रखे हो।

अंग गौर शिर गंग बहाये ।
मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥

अर्थ – आपका रंग श्वेत हैं, आपकी जटाओं से  गंगा नदी बहती हैं, आपने गले में राक्षसों के सिरो की माला पहन रखी हैं और शरीर पर चिताओं की भस्म लगा रखी है।

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे ।
छवि को देखि नाग मन मोहे ॥

अर्थ – आपने बाघ की खाल को वस्त्र के रूप में पहना हुआ हैं, आपके रूप को देखकर साँपो भी आकर्षित हो जाते हैं।

मैना मातु की हवे दुलारी ।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥

अर्थ –  मैना की दुलारी अर्थात् उनकी पुत्री पार्वती भी आपकी पत्नी के रूप में पूजनीय हैं, उनकी छवि भी मन को सुख देने वाली हैं।

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी ।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥

अर्थ – हाथों में त्रिशूल आपकी छवि को ओर भी शोभायमान बनाता है। क्योंकि उससे सदैव शत्रुओं का विनाश होता हैं।

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे ।
सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥

अर्थ – आपके पास में आपकी सवारी नंदी व पुत्र गणेश इस तरह दिखाई दे रहे है जैसे कि समुंद्र के मध्य में दो कमल खिल रहे हो।

कार्तिक श्याम और गणराऊ ।
या छवि को कहि जात न काऊ ॥

अर्थ – कार्तिकेय और अन्य गणों की उपस्थिति से आपकी छवि ऐसी बनती है कि कोई उनका बखान नहीं कर सकता।

देवन जबहीं जाय पुकारा ।
तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥

अर्थ – जब कभी भी देवताओं ने संकट के समय में आपको पुकारा हैं, आपने सदैव उनके संकटों का निवारण किया हैं।

किया उपद्रव तारक भारी ।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥

अर्थ – जब ताड़कासुर नामक राक्षस ने देवताओं पर अत्यधिक अत्याचार किये तब सभी देवतागण उससे छुटकारा पाने के लिए आपकी शरण में चले आये।

तुरत षडानन आप पठायउ ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥

अर्थ – देवताओं के आग्रह पर आपने तुरंत अपने बड़े पुत्र कार्तिक ( षडानन) को वहां भेजा और उन्होंने बिना देरी किये उस पापी राक्षस का वध कर दिया।

आप जलंधर असुर संहारा ।
सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥

अर्थ – आपने जलंधर नामक राक्षस का संहार किया जिस कारण आपका यश संपूर्ण विश्व में व्याप्त हुआ।

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई ।
सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥

अर्थ – त्रिपुरासुर नामक राक्षस से भी आप ही ने युद्ध कर उसका वध किया और आपकी कृपा से ही देवताओं के मान की रक्षा हुई। 

किया तपहिं भागीरथ भारी ।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥

अर्थ- जब भगीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए कठोर तप किया तब आपने ही अपनी जटाओं से गंगा के प्रवाह को अपनी जटाओं में समाहित कर लिया। 

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं ।
सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥

अर्थ – आपके समान दानदाता इस संसार में कोई नही हैं, भक्तगण हमेशा आपकी स्तुति करते रहते हैं।

वेद नाम महिमा तव गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥

अर्थ – समस्त वेद भी आपकी महिमा का बखान करते हैं लेकिन आप रहस्य हैं, इसलिए आपका भेद कोई भी नही जान पाया हैं।

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला ।
जरत सुरासुर भए विहाला ॥

अर्थ – समुद्र मंथन के दौरान विष का घड़ा निकलने पर देवता और असुर भय से कांपने लगे थे।  

कीन्ही दया तहं करी सहाई ।
नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥

अर्थ – तब आपने सभी पर दया कर उस विष को कंठ में धारण कर लिया, और उसी समय से आपका नाम “नीलकंठ” पड़ गया।

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा ।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥

अर्थ – लंका पर चढ़ाई करने से पूर्व श्रीराम ने  तमिलनाडु के रामेश्वरम में आपकी  पूजा की थी और उसके बाद उन्होंने लंका पर विजय प्राप्त कर विभीषण को वहां का राजा बनाया था।

सहस कमल में हो रहे धारी ।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥

अर्थ – जब श्रीराम आपकी पूजा-अर्चना कर रहे थे और आपको कमल के पुष्प अर्पित कर रहे थे, तब आपने उनकी परीक्षा लेनी चाही।

एक कमल प्रभु राखेउ जोई ।
कमल नयन पूजन चहं सोई ॥

अर्थ – आपने उन कमल पुष्पों में से एक कमल का पुष्प छुपा दिया, तब श्रीराम ने अपने नेत्र रूपी कमल से आपकी पूजा शुरू की।

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर ।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥

अर्थ –  श्रीराम की ऐसी कठोर भक्ति को देखकर आप अत्यधिक प्रसन्न हुए और आपने उन्हें मनचाहा वरदान दिया।

जय जय जय अनन्त अविनाशी ।
करत कृपा सब के घटवासी ॥

अर्थ – हे भोलेनाथ ! आपकी जय हो, जय हो, जय हो, आपका कोई आदि-अंत नही हैं, आपका विनाश नही किया जा सकता हैं, आप सभी के ऊपर अपनी कृपा दृष्टि ऐसे ही बनाये रखो।

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै ।
भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥

अर्थ – बुरे विचार हमेशा मेरे मन को कष्ट पहुंचाते हैं और जिससे मेरा मन हमेशा भ्रमित रहता है और मुझे क्षणमात्र भी चैन नहीं मिलता।

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो ।
येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥

अर्थ – इस संकट की स्थिति में मैं आपका ही नाम पुकारता हूँ, इस संकट के समय आप ही मेरा उद्धार कर सकते हैं।

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो ।
संकट से मोहि आन उबारो ॥

अर्थ – आप अपने त्रिशूल से मेरे शत्रुओं का नाश कर दो और मुझे संकट से बहार निकालो।

मात-पिता भ्राता सब होई ।
संकट में पूछत नहिं कोई ॥

अर्थ – माता, पिता, भाई आदि सभी सुख के ही साथी हैं, लेकिन संकट आने पर हमे कोई नही पूछता।

स्वामी एक है आस तुम्हारी ।
आय हरहु मम संकट भारी ॥

अर्थ – इसलिए हे भोलेनाथ ! मुझे केवल आप से ही आशा हैं कि आप आकर मेरे संकटों का निवारण करेंगे।

धन निर्धन को देत सदा हीं ।
जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥

अर्थ – आप हमेशा निर्धन व्यक्तियों को धन देकर उनकी आर्थिक समस्या को दूर करते हैं, जो कोई आपकी जैसी भक्ति करता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है।

अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी ।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥

अर्थ – आपकी पूजा करने की विधि क्या है, इसके बारे में हमे कम ज्ञान हैं, इसलिए यदि हमसे किसी प्रकार की कोई भूल हो जाये तो कृपया करके हमारी भूल को माफ़ कर दे।

शंकर हो संकट के नाशन ।
मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥

अर्थ – हे भगवान शंकर, आप ही सभी संकटों का नाश करने वाले हो , आप ही सभी का मंगल करने वाले हो, आप ही विघ्नों का नाश करने वाले हो।

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं ।
शारद नारद शीश नवावैं ॥

अर्थ – सभी योगी-मुनि आपका ही ध्यान करते हैं और नारद व माँ सरस्वती आपके सामने अपना शीश नवाते  हैं।

नमो नमो जय नमः शिवाय ।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥

अर्थ – आपका ध्यान करने का मूल मंत्र “ऊं नमः शिवाय“ है। इस मंत्र का जाप करके भी सभी देवता और भगवान ब्रह्मा भी पार नही पा सकते हैं।

जो यह पाठ करे मन लाई ।
ता पर होत है शम्भु सहाई ॥

अर्थ – जो भी भक्त सच्चे मन से इस Shiv Chalisa ka paath (पाठ) कर लेते हैं उन पर भोलेनाथ की कृपा अवश्य होती हैं।

ॠनियां जो कोई हो अधिकारी ।
पाठ करे सो पावन हारी ॥

अर्थ – जो भी भक्त Shiv Chalisa का पाठ करता हैं वह सभी प्रकार के ऋणों से मुक्त हो जाता हैं और वह तनाव मुक्त महसूस करता है। 

पुत्र हीन कर इच्छा जोई ।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥

अर्थ – यदि किसी दम्पति को संतान प्राप्ति नही हो रही हैं, तो निश्चय ही शिव की कृपा से उसे पुत्र की प्राप्ति होगी।

पण्डित त्रयोदशी को लावे ।
ध्यान पूर्वक होम करावे ॥

अर्थ – प्रत्येक माह की त्रयोदशी के दिन अपने घर में पंडित को बुलाकर Shiv Chalisa का पाठ व हवन करवाना चाहिए।

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा ।
ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥

अर्थ – जो भी भक्त त्रयोदशी के दिन आपका व्रत करता हैं, उसका तन हमेशा निरोगी रहता हैं।

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे ।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥

अर्थ – भगवान शिव को पूजा में धूप, दीप व नैवेद्य चढ़ाना चाहिए और उनके सम्मुख बैठकर Shiv Chalisa का पाठ सुनाना चाहिए।

जन्म जन्म के पाप नसावे ।
अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥

अर्थ -Shiv Chalisa का पाठ करके जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे शिव जी के शिवपुर धाम में शरण मिलती हैं।

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी ।
जानि सकल दुःख हरहु हमारी ॥

अर्थ – अयोध्यादास आपके सामने यह आस लगाकर विनती करता हैं कि आप मेरे सभी दुखों का निवारण कर दे।

॥दोहा॥

नित्त नेम कर प्रातः ही,पाठ करौं चालीसा ।
तुम मेरी मनोकामना,पूर्ण करो जगदीश ॥

अर्थ – रोजाना प्रातःकाल Shiv Chalisa का पाठ करना चाहिए। साथ ही भगवान शिव से अपनी सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने की अर्जी लगाना चाहिए।

मगसर छठि हेमन्त ॠतु,संवत चौसठ जान ।
अस्तुति चालीसा शिवहि,पूर्ण कीन कल्याण ॥

अर्थ – माघ मास की छठी तिथि को हेमंत ऋतु में संवत चौसठ में इस Shiv Chalisa के लेखन कार्य पूर्ण हुआ।


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शिव चालीसा को सिद्ध करना एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली आध्यात्मिक प्रक्रिया है, जो शिव भक्तों के लिए अत्यधिक प्रिय है। शिव चालीसा, जो कि भगवान शिव की 40 श्लोकों वाली स्तुति है, को पढ़ने और समझने से भक्तों को आंतरिक शांति, शक्ति और ज्ञान प्राप्त होता है। इसे सिद्ध करने का अर्थ है इसे पूरी तरह से समझना और उसके प्रभाव को अपने जीवन में महसूस करना। इस प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए कुछ विशिष्ट विधियों का पालन करना आवश्यक है।

पहली और सबसे महत्वपूर्ण विधि है सही समय पर शिव चालीसा का पाठ करना। हिन्दू धर्म के अनुसार, शिव की पूजा के लिए सोमवार का दिन विशेष रूप से शुभ माना जाता है। इस दिन भगवान शिव की विशेष पूजा और व्रत रखने से चालीसा के पाठ का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। इसके अलावा, भगवान शिव की पूजा सुबह सूरज उगने से पहले या रात्रि में, शिवरात्रि के समय विशेष रूप से की जाती है। इन समयों पर शिव चालीसा का पाठ करने से इसकी शक्ति और प्रभाव में वृद्धि होती है।

दूसरी विधि है एकाग्रता और श्रद्धा के साथ पाठ करना। शिव चालीसा का पाठ केवल शब्दों की ऊपरी ध्वनि तक सीमित नहीं होना चाहिए; इसे पूरी श्रद्धा, ध्यान और एकाग्रता के साथ पढ़ना चाहिए। जब भक्त मन और आत्मा से पाठ करते हैं, तो उसकी शक्ति और प्रभाव सीधे उनके जीवन में अनुभव किए जा सकते हैं। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि पाठ करते समय सभी बाहरी विचलनों को दूर किया जाए, ताकि पूरा ध्यान भगवान शिव पर केंद्रित हो सके।

तीसरी विधि है नियमितता। किसी भी आध्यात्मिक प्रक्रिया में निरंतरता और नियमितता का होना अत्यंत महत्वपूर्ण है। शिव चालीसा का नियमित पाठ करने से न केवल इसके प्रभाव में वृद्धि होती है, बल्कि यह एक व्यक्ति की जीवनशैली का भी हिस्सा बन जाता है। निरंतर पाठ करने से मन को शांति मिलती है और भक्त की आत्मा को परिष्कृत किया जा सकता है।

चौथी विधि है धार्मिक अनुशासन और स्वच्छता। पूजा और पाठ के दौरान स्वच्छता बनाए रखना और सही धार्मिक अनुशासन का पालन करना भी महत्वपूर्ण है। यह स्वच्छता मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धता को दर्शाती है, जो पाठ के प्रभाव को बढ़ाती है।

अंत में, शिव चालीसा को सिद्ध करने के लिए भक्त को भगवान शिव के प्रति पूर्ण विश्वास और समर्पण होना चाहिए। जब भक्त सच्चे मन से भगवान शिव को समर्पित होते हैं, तब चालीसा का पाठ अधिक प्रभावी होता है और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने में सहायक होता है।

इन विधियों का पालन करके, भक्त शिव चालीसा को सिद्ध कर सकते हैं और भगवान शिव की कृपा और आशीर्वाद को अपने जीवन में अनुभव कर सकते हैं। यह न केवल आध्यात्मिक उन्नति के लिए बल्कि जीवन की विभिन्न कठिनाइयों का सामना करने के लिए भी अत्यंत लाभकारी होता है।


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शिव चालीसा के लाभ | शिव चालीसा पढ़ने के फायदे

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) एक अत्यंत शक्तिशाली और पवित्र ग्रंथ है, जिसमें भगवान शिव की महिमा का गान किया गया है। इसका पाठ शिव भक्तों के लिए असीम लाभकारी माना जाता है। शिव चालीसा के 40 श्लोक भगवान शिव के विभिन्न गुणों, उनके स्वरूप, और उनकी कृपा का वर्णन करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, शिव चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि, और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। आइए जानते हैं कि शिव चालीसा पढ़ने के क्या-क्या फायदे होते हैं:

1. मन की शांति और मानसिक तनाव से मुक्ति

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का नियमित रूप से पाठ करने से मन शांत होता है और मानसिक तनाव कम होता है। शिव चालीसा के श्लोकों में भगवान शिव की स्तुति और उनके पराक्रम का वर्णन किया गया है, जो व्यक्ति के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। जीवन की भागदौड़ और चिंताओं से राहत पाने के लिए शिव चालीसा एक अद्भुत साधन है।

मानसिक तनाव को दूर करने के लिए प्राचीनकाल से ही मंत्रों का जाप और पाठ करने की परंपरा रही है। शिव चालीसा भी उसी दिशा में काम करता है। शिव चालीसा के श्लोक गहरे ध्यान और एकाग्रता को बढ़ावा देते हैं, जो मानसिक शांति की प्राप्ति में मदद करते हैं।

2. शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का नियमित पाठ करने से व्यक्ति का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य भी बेहतर होता है। इसे पढ़ते समय एक सकारात्मक वाइब्रेशन उत्पन्न होता है, जो हमारे मस्तिष्क और शरीर पर सकारात्मक प्रभाव डालता है। भगवान शिव को योग का भगवान माना जाता है, और शिव चालीसा पढ़ने से हम उनकी ध्यान साधना की ऊर्जा को महसूस कर सकते हैं।

यह देखा गया है कि धार्मिक पाठों के उच्चारण से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे नकारात्मक विचार और रोग दूर होते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी यह सिद्ध हुआ है कि धार्मिक ग्रंथों का पाठ करने से तनाव में कमी और मानसिक संतुलन में सुधार होता है।

3. कठिनाइयों से मुक्ति

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का पाठ करने से जीवन की कठिनाइयों और संकटों से मुक्ति मिलती है। भगवान शिव को ‘महादेव’ के रूप में जाना जाता है, जो समस्त ब्रह्मांड के स्वामी हैं। शिव चालीसा पढ़ने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है, और वह भक्त की रक्षा करते हैं। जीवन में आने वाली कठिनाइयों से निपटने में यह चालीसा अत्यधिक सहायक होती है।

कई भक्त यह मानते हैं कि शिव चालीसा के पाठ से उनके जीवन में आने वाली बाधाएं और परेशानियां दूर हो जाती हैं। यह पाठ भगवान शिव की कृपा से जीवन को सरल और सुखमय बनाने में सहायक होता है।

4. नकारात्मक ऊर्जा और भय का नाश

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का नियमित पाठ करने से नकारात्मक ऊर्जा और भय का नाश होता है। भगवान शिव को ‘भूतनाथ’ और ‘कालों के काल महाकाल’ के रूप में जाना जाता है, जो सभी बुरी आत्माओं और नकारात्मक शक्तियों का नाश करते हैं। जब हम शिव चालीसा का पाठ करते हैं, तो भगवान शिव की कृपा से हमारे चारों ओर एक दिव्य सुरक्षा कवच बन जाता है, जो हमें बुरी शक्तियों और नकारात्मक ऊर्जाओं से बचाता है।

इसके साथ ही शिव चालीसा पढ़ने से व्यक्ति के भीतर से भय भी दूर होता है। यह भय चाहे मानसिक हो, शारीरिक हो या फिर किसी अनजान चिंता का हो, शिव चालीसा के पाठ से यह समाप्त हो जाता है।

5. धन, समृद्धि और सुख की प्राप्ति

धार्मिक मान्यता है कि शिव चालीसा का पाठ करने से धन और समृद्धि की प्राप्ति होती है। भगवान शिव ‘भोलेनाथ’ हैं, जो अपने भक्तों पर जल्द ही प्रसन्न हो जाते हैं और उन्हें अपनी कृपा से मालामाल कर देते हैं। शिव चालीसा के नियमित पाठ से भगवान शिव की कृपा से व्यक्ति को धन, सुख, और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

कई लोग यह मानते हैं कि शिव चालीसा के पाठ से उनके व्यवसाय, नौकरी, और आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है। यह पाठ व्यक्ति के जीवन में स्थिरता और समृद्धि लाता है, जिससे उसका परिवार भी सुखी और सम्पन्न रहता है।

6. आध्यात्मिक उन्नति

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का पाठ व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति में भी सहायक होता है। भगवान शिव को ध्यान और योग का प्रतीक माना जाता है, और शिव चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के भीतर एक आध्यात्मिक जागृति होती है। इस पाठ से भगवान शिव के प्रति समर्पण और भक्ति बढ़ती है, जिससे व्यक्ति के जीवन में आध्यात्मिक संतुलन आता है।

आध्यात्मिक दृष्टि से, शिव चालीसा का पाठ व्यक्ति को आत्म-साक्षात्कार की दिशा में ले जाता है। यह पाठ भगवान शिव की कृपा से मन को शांत और केंद्रित करता है, जिससे व्यक्ति अपने जीवन के उद्देश्य और आत्मा की शांति को प्राप्त करता है।

7. कष्टों और रोगों से मुक्ति

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का पाठ करने से कष्टों और रोगों से मुक्ति मिलती है। भगवान शिव को ‘महामृत्युंजय’ कहा जाता है, जो रोगों और मृत्यु के भय से मुक्ति दिलाने वाले देवता हैं। शिव चालीसा के नियमित पाठ से व्यक्ति को गंभीर बीमारियों से भी राहत मिलती है, और उसका स्वास्थ्य सुधरता है।

इसके अलावा, यह भी माना जाता है कि शिव चालीसा के पाठ से भगवान शिव की कृपा से असाध्य रोगों से भी छुटकारा मिलता है। भगवान शिव की कृपा से व्यक्ति के जीवन से सभी प्रकार के शारीरिक और मानसिक कष्ट दूर हो जाते हैं।

8. घर-परिवार में शांति और समृद्धि

शिव चालीसा (Shiva Chalisa pdf) का पाठ करने से घर-परिवार में शांति और समृद्धि बनी रहती है। भगवान शिव की कृपा से परिवार के सदस्यों के बीच आपसी प्रेम और सामंजस्य बना रहता है। शिव चालीसा का पाठ करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है, जो समस्त परिवार के सदस्यों को सुखी और समृद्ध बनाए रखता है।

कई परिवारों में शिव चालीसा का पाठ नियमित रूप से किया जाता है, ताकि घर में शांति और समृद्धि बनी रहे। यह पाठ परिवार के सदस्यों के बीच आपसी मतभेदों को दूर करता है और प्रेमपूर्ण वातावरण का निर्माण करता है।

9. जीवन में सफलताओं की प्राप्ति

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का नियमित पाठ करने से जीवन में सफलताओं की प्राप्ति होती है। भगवान शिव की कृपा से व्यक्ति को जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है, चाहे वह शिक्षा हो, करियर हो, या फिर व्यक्तिगत जीवन हो। शिव चालीसा का पाठ व्यक्ति को उसके लक्ष्यों तक पहुँचने में मदद करता है और उसकी मेहनत को फलीभूत करता है।

धार्मिक मान्यता है कि भगवान शिव अपने भक्तों की प्रार्थनाओं को जल्द सुनते हैं और उनकी सभी इच्छाओं को पूरा करते हैं। शिव चालीसा के पाठ से भगवान शिव की कृपा से व्यक्ति को अपने जीवन में सभी प्रकार की सफलताएं प्राप्त होती हैं।

10. धार्मिक और सामाजिक जीवन में सुधार

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का पाठ व्यक्ति के धार्मिक और सामाजिक जीवन में भी सुधार करता है। इससे व्यक्ति का भगवान शिव के प्रति विश्वास और भक्ति मजबूत होती है, जो उसे धर्म और समाज की सेवा में समर्पित करती है। शिव चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में धार्मिकता और सामाजिकता का समावेश होता है, जिससे वह समाज में एक बेहतर व्यक्ति के रूप में प्रतिष्ठित होता है।

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का पाठ भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का एक सरल और प्रभावी साधन है। इसके नियमित पाठ से व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक, और आध्यात्मिक रूप से अनेकों लाभ प्राप्त होते हैं। चाहे आप जीवन की किसी भी कठिनाई का सामना कर रहे हों, शिव चालीसा का पाठ आपको उन कठिनाइयों से उबारने और आपके जीवन को सफल बनाने में सहायक होगा।


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शिव चालीसा (Shiv Chalisa) एक अत्यंत पवित्र और प्रभावशाली धार्मिक स्तुति है, जिसमें भगवान शिव की महिमा का गुणगान किया गया है। यह 40 चौपाइयों और श्लोकों का एक ऐसा संग्रह है, जिसे पढ़ने से भगवान शिव की असीम कृपा प्राप्त होती है। हिंदू धर्म में भगवान शिव को त्रिदेवों में से एक माना गया है, जो सृजन, पालन, और संहार के देवता हैं। उन्हें “महादेव”, “भोलेनाथ”, और “नीलकंठ” जैसे कई नामों से पुकारा जाता है। शिव चालीसा का नियमित पाठ व्यक्ति के जीवन में शांति, समृद्धि, और आध्यात्मिक उन्नति लाने वाला माना जाता है।

इस लेख में, हम शिव चालीसा की महिमा और इसके महत्व पर विस्तृत चर्चा करेंगे, जिससे आप समझ सकें कि इसे पढ़ने से किन-किन क्षेत्रों में लाभ होता है और कैसे यह हमारे जीवन में सकारात्मक प्रभाव डालता है।

1. शिव चालीसा का आध्यात्मिक महत्व

भगवान शिव को ध्यान और योग के देवता माना जाता है। शिव चालीसा का नियमित रूप से पाठ करने से व्यक्ति के भीतर आध्यात्मिक जागृति उत्पन्न होती है। यह आध्यात्मिक जागृति व्यक्ति को आत्म-ज्ञान की ओर ले जाती है और उसे जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझने में सक्षम बनाती है। शिव चालीसा के श्लोक भगवान शिव के स्वरूप, उनके धैर्य, और उनके अनुग्रह का वर्णन करते हैं, जो व्यक्ति को आध्यात्मिक संतुलन प्रदान करते हैं।

ध्यान और ध्यानात्मक प्रथाओं में शिव चालीसा का पाठ अत्यधिक लाभकारी होता है। यह पाठ मानसिक शांति और ध्यान की गहराई को बढ़ाता है, जिससे साधक अपनी आत्मा के साथ गहरे संबंध स्थापित कर सकता है।

2. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) पढ़ने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इसके श्लोकों में भगवान शिव की असीम शक्ति और उनके गुणों का उल्लेख किया गया है, जो पाठक को सकारात्मक विचारों और भावनाओं की ओर प्रेरित करते हैं। इसके पाठ से व्यक्ति के आस-पास की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और उसके जीवन में सकारात्मकता का प्रवाह बढ़ता है।

सकारात्मक ऊर्जा का संचार जीवन के हर क्षेत्र में अत्यधिक महत्वपूर्ण है, चाहे वह व्यक्तिगत संबंध हो, पेशेवर जीवन हो, या स्वास्थ्य हो। शिव चालीसा के नियमित पाठ से व्यक्ति अपने जीवन के हर पहलू में सफलता और शांति प्राप्त कर सकता है।

3. कठिनाइयों और कष्टों से मुक्ति

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का पाठ करने से व्यक्ति को जीवन की कठिनाइयों और कष्टों से मुक्ति मिलती है। भगवान शिव को “महादेव” कहा जाता है, जो सभी प्रकार की बाधाओं और कष्टों को दूर करने वाले देवता हैं। जीवन में कई बार कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, चाहे वह आर्थिक संकट हो, मानसिक तनाव हो, या फिर पारिवारिक समस्याएं। ऐसे में शिव चालीसा का पाठ अत्यंत प्रभावशाली सिद्ध होता है।

कई भक्त यह मानते हैं कि शिव चालीसा के नियमित पाठ से उनकी जीवन की कठिनाइयां कम हो जाती हैं और उन्हें मानसिक शांति प्राप्त होती है। शिव चालीसा भगवान शिव की अनंत शक्ति को व्यक्त करता है, जो भक्त को हर प्रकार की परेशानियों से निकालने में सक्षम है।

4. नकारात्मक शक्तियों और भय से रक्षा

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का पाठ करने से नकारात्मक शक्तियों और भय से सुरक्षा मिलती है। भगवान शिव को “भूतनाथ” और “महाकाल” कहा जाता है, जो समस्त बुरी शक्तियों और नकारात्मक ऊर्जा का नाश करने वाले हैं। जब व्यक्ति शिव चालीसा का पाठ करता है, तो भगवान शिव की कृपा से उसके चारों ओर एक दिव्य सुरक्षा कवच बन जाता है, जो उसे बुरी शक्तियों और नकारात्मक ऊर्जाओं से सुरक्षित रखता है।

इस पाठ का प्रभाव इतना शक्तिशाली होता है कि यह व्यक्ति के भीतर से भय, चिंता, और असुरक्षा को दूर कर देता है। इससे व्यक्ति के भीतर आत्मविश्वास और साहस का विकास होता है, जो उसे जीवन की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम बनाता है।

5. स्वास्थ्य में सुधार और रोगों से मुक्ति

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का पाठ शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को सुधारने में भी अत्यधिक लाभकारी होता है। भगवान शिव को “महामृत्युंजय” कहा जाता है, जो रोगों और मृत्यु के भय से मुक्त करने वाले देवता हैं। शिव चालीसा के नियमित पाठ से व्यक्ति के शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है, जिससे रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है और शरीर स्वस्थ रहता है।

इसके अलावा, यह भी माना जाता है कि जिन लोगों को गंभीर बीमारियां होती हैं, वे अगर श्रद्धा और विश्वास के साथ शिव चालीसा का पाठ करते हैं, तो उन्हें भगवान शिव की कृपा से रोगों से मुक्ति मिलती है। यह पाठ मानसिक तनाव और चिंता को कम करने में भी सहायक होता है, जो मानसिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है।

6. धन और समृद्धि की प्राप्ति

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का पाठ करने से व्यक्ति को धन और समृद्धि की प्राप्ति होती है। भगवान शिव को “भोलेनाथ” कहा जाता है, जो बहुत ही सरल और कृपालु हैं। वे अपने भक्तों पर शीघ्र प्रसन्न होते हैं और उन्हें धन, सुख, और समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। शिव चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में आर्थिक समृद्धि आती है और उसकी सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं।

कई भक्त यह मानते हैं कि शिव चालीसा का पाठ करने से उनके व्यापार में वृद्धि हुई है, उनके करियर में उन्नति हुई है, और उन्हें आर्थिक रूप से स्थिरता प्राप्त हुई है। यह पाठ भगवान शिव की कृपा से समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है।

7. पारिवारिक शांति और संबंधों में सुधार

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का पाठ करने से परिवार में शांति और सद्भाव बना रहता है। भगवान शिव का परिवार, जिसमें माता पार्वती, भगवान गणेश, और भगवान कार्तिकेय शामिल हैं, आदर्श पारिवारिक जीवन का प्रतीक है। शिव चालीसा के पाठ से परिवार के सदस्यों के बीच आपसी प्रेम और समझ बढ़ती है, जिससे घर में सुख-शांति और सामंजस्य बना रहता है।

इसके अलावा, यह पाठ पारिवारिक मतभेदों को दूर करने में भी सहायक होता है। भगवान शिव की कृपा से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जो सभी प्रकार के कलह और विवादों को समाप्त करता है और परिवार को एकजुट रखता है।

8. आध्यात्मिक उन्नति और आत्म-साक्षात्कार

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का पाठ व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति में भी सहायक होता है। भगवान शिव को योग और ध्यान का प्रतीक माना जाता है, और उनके नाम का जाप करने से व्यक्ति को आत्म-साक्षात्कार की प्राप्ति होती है। शिव चालीसा के श्लोकों में भगवान शिव के ध्यान और उनकी साधना का वर्णन किया गया है, जो व्यक्ति को आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर करता है।

यह पाठ व्यक्ति के भीतर आध्यात्मिक संतुलन और शांति लाता है, जिससे वह संसार के माया-मोह से ऊपर उठकर आत्म-ज्ञान की ओर अग्रसर होता है। शिव चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के भीतर आध्यात्मिक जागृति उत्पन्न होती है, जिससे वह भगवान शिव के निकट पहुँचता है।

9. जीवन में सफलताओं की प्राप्ति

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का पाठ व्यक्ति को जीवन में सफलता प्राप्त करने में भी सहायक होता है। भगवान शिव की कृपा से व्यक्ति को अपने जीवन के हर क्षेत्र में सफलता मिलती है, चाहे वह शिक्षा हो, करियर हो, या व्यक्तिगत जीवन हो। शिव चालीसा का पाठ व्यक्ति को उसके लक्ष्यों तक पहुँचने में मदद करता है और उसकी मेहनत को फलीभूत करता है।

भगवान शिव अपने भक्तों की प्रार्थनाओं को सुनते हैं और उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में सफलता का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। शिव चालीसा का पाठ व्यक्ति के जीवन को सफल और सुखमय बनाता है।

10. कर्मों का शुद्धिकरण

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का पाठ व्यक्ति के कर्मों को शुद्ध करने में भी सहायक होता है। भगवान शिव को “पापों के नाशक” कहा जाता है, जो अपने भक्तों के पापों को नष्ट कर देते हैं और उन्हें शुद्ध करते हैं। शिव चालीसा के पाठ से व्यक्ति के बुरे कर्मों का नाश होता है और उसके अच्छे कर्मों का फल उसे प्राप्त होता है।

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में शुद्धता आती है, जिससे उसका मन और आत्मा शुद्ध हो जाते हैं। यह पाठ व्यक्ति को पापों से मुक्त कर उसके जीवन को शुद्ध और पवित्र बनाता है।

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का पाठ भगवान शिव की असीम कृपा प्राप्त करने का एक शक्तिशाली और प्रभावी माध्यम है। इसके नियमित पाठ से व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक, और आध्यात्मिक रूप से


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Shiv Chalisa Pdf

भगवान शिव की आराधना के लिए शिव चालीसा का विशेष महत्व है। वर्तमान डिजिटल युग में shiv chalisa pdf आसानी से इंटरनेट पर उपलब्ध है, जिसे भक्तगण अपने मोबाइल या कंप्यूटर में सहेज कर कभी भी पाठ कर सकते हैं। यह पीडीएफ प्रारूप अत्यंत सुविधाजनक है, क्योंकि इसे डाउनलोड करने के बाद बिना इंटरनेट के भी देखा जा सकता है। अनेक धार्मिक वेबसाइटों और डिजिटल प्लेटफार्मों पर यह चालीसा निःशुल्क उपलब्ध है, जिससे कोई भी शिव भक्त सहज भाव से इस पावन स्तोत्र का लाभ ले सकता है।

Shiv Chalisa in Hindi Pdf

हिंदी भाषा में उपलब्ध shiv chalisa in hindi pdf का महत्व इसलिए अधिक है, क्योंकि यह सरल एवं सुबोध भाषा में लिखी गई है। शिव चालीसा में ४० चौपाइयां हैं, जो भगवान शिव के गुणों, उनके रहन-सहन, उनके त्याग और उनकी कृपा का विस्तार से वर्णन करती हैं। इस पीडीएफ में मूल हिंदी पाठ को यथावत् रखा गया है, जिससे उच्चारण शुद्ध और प्रभावी बना रहे। नियमित रूप से इस चालीसा का पाठ करने से मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और भगवान शिव की असीम कृपा प्राप्त होती है।

Shiv Chalisa Pdf in Hindi

श्रावण मास, महाशिवरात्रि और सोमवार के दिन shiv chalisa pdf in hindi की मांग अत्यधिक बढ़ जाती है। यह पीडीएफ विशेष रूप से हिंदी भाषी भक्तों के लिए बनाई गई है, जिसमें दोहा, चौपाई और समापन का संपूर्ण पाठ संकलित है। इस चालीसा के पाठ से भक्तों के सभी दुख-दर्द दूर होते हैं और घर-परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है। साथ ही यह नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करने में भी अत्यंत सहायक मानी जाती है।

Shiv ji Chalisa Pdf

भोलेनाथ के अनन्य भक्तों के लिए shiv ji chalisa pdf एक आध्यात्मिक धरोहर के समान है। इस पीडीएफ में शिव जी के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन है- नीलकंठ, त्रिपुरारी, शंकर, शम्भु और महाकाल के रूप में। मान्यता है कि जो व्यक्ति नियमपूर्वक शिव जी की चालीसा का पाठ करता है, उसके पूर्वजन्म के पाप भी नष्ट हो जाते हैं। पर्यावरण की दृष्टि से भी यह पीडीएफ लाभदायक है, क्योंकि इससे कागज की बचत होती है। अतः आज ही shiv ji chalisa pdf डाउनलोड करें और भगवान शिव की कृपा के भागी बनें।

शिव चालीसा कितनी बार पढ़ी जानी चाहिए?

शिव चालीसा को कितनी बार पढ़ा जाए, इसका कोई विशेष नियम नहीं है, यह आपकी भक्ति और श्रद्धा पर निर्भर करता है। कुछ लोग नियमित रूप से दिन में एक बार इसका पाठ करते हैं, जबकि अन्य विशेष अवसरों या सोमवार जैसे पवित्र दिनों पर इसका पाठ करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अगर आप शिव चालीसा को 11 बार या 108 बार पढ़ते हैं, तो इससे शिवजी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इसके अलावा, अगर आप किसी विशेष मनोकामना की पूर्ति के लिए इसका पाठ कर रहे हैं, तो लगातार 40 दिनों तक शिव चालीसा का पाठ करना शुभ माना जाता है। यह चालीसा भगवान शिव की महिमा का गुणगान करती है और उनके आशीर्वाद को प्राप्त करने का एक सरल और प्रभावी माध्यम है। इसे पूरी श्रद्धा और ध्यान के साथ पढ़ने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं।

क्या आप पीरियड्स के दौरान शिव चालीसा सुन सकती हैं?

हिंदू धर्म में पीरियड्स के दौरान पूजा-पाठ को लेकर विभिन्न धारणाएं हैं, लेकिन आधुनिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो शिव चालीसा सुनने में कोई बाधा नहीं है। पीरियड्स को एक स्वाभाविक शारीरिक प्रक्रिया माना जाता है, और इस दौरान भगवान की भक्ति करने में कोई निषेध नहीं है। कई लोग मानते हैं कि भक्ति मन और आत्मा से की जाती है, न कि केवल शारीरिक स्वच्छता से। अगर आप शिव चालीसा का पाठ नहीं करना चाहती हैं, तो इसे सुनना भी एक विकल्प हो सकता है। इससे आपकी भक्ति और भगवान के प्रति आस्था बनी रहती है। आधुनिक समय में यह अधिक व्यक्तिगत मान्यता का सवाल है, और भगवान शिव, जो समस्त सृष्टि के स्वामी हैं, अपने भक्तों की भावनाओं को महत्व देते हैं, न कि किसी बाहरी नियमों को।

शिव चालीसा कौन सी भाषा में है?

शिव चालीसा का मूल रूप हिंदी भाषा में उपलब्ध है, जिसे साधारण और सरल शब्दों में लिखा गया है ताकि आम जन इसे आसानी से पढ़ और समझ सकें। शिव चालीसा के माध्यम से भगवान शिव की महिमा का वर्णन किया गया है, और यह भक्तों के बीच काफी लोकप्रिय है। हालांकि, शिव चालीसा का अनुवाद अन्य भाषाओं में भी किया गया है, ताकि विभिन्न भाषाओं के भक्त इसे अपनी मातृभाषा में भी पढ़ सकें। संस्कृत, तमिल, तेलुगु, बंगाली और अंग्रेजी जैसी कई भाषाओं में भी इसका अनुवाद किया गया है। लेकिन सबसे अधिक प्रचलन हिंदी में ही है। सरल भाषा में लिखे जाने के कारण इसे हर वर्ग और उम्र के लोग आसानी से पढ़ सकते हैं। इसका उद्देश्य भगवान शिव की स्तुति करना और उनकी कृपा प्राप्त करना है।

शिव चालीसा का आविष्कार किसने किया था?

शिव चालीसा का संकलन और रचना तुलसीदास द्वारा की गई थी। तुलसीदास एक महान संत और कवि थे, जिन्होंने भगवान राम और शिव की स्तुति में कई धार्मिक ग्रंथों की रचना की। तुलसीदास ने शिव चालीसा की रचना भगवान शिव की महिमा का गुणगान करने और भक्तों को शिवजी के प्रति भक्ति का मार्ग दिखाने के लिए की। शिव चालीसा एक सरल और प्रभावी माध्यम है जिसके जरिए भक्त भगवान शिव की आराधना कर सकते हैं और उनकी कृपा प्राप्त कर सकते हैं। शिव चालीसा में 40 श्लोक होते हैं, जो भगवान शिव की अद्वितीय शक्तियों, उनके महान गुणों और भक्तों के प्रति उनकी दया को दर्शाते हैं। यह चालीसा भगवान शिव के प्रति श्रद्धा और समर्पण की एक अभिव्यक्ति है, जो भारतीय धार्मिक परंपरा में गहराई से जड़ी हुई है।

क्या मैं रात में शिव चालीसा का पाठ कर सकता हूं?

हां, आप रात में शिव चालीसा का पाठ कर सकते हैं। भगवान शिव को “भोलनाथ” कहा जाता है, जो अपने भक्तों की भक्ति के समय और स्थान को नहीं देखते। शिव चालीसा का पाठ किसी भी समय किया जा सकता है, चाहे वह दिन हो या रात। कुछ लोग मानते हैं कि सुबह के समय पूजा-पाठ करना अधिक शुभ होता है, लेकिन यदि आपकी दिनचर्या के कारण आप दिन में इसका पाठ नहीं कर पाते हैं, तो रात में भी इसे पढ़ना पूरी तरह से स्वीकार्य है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आप इसे पूरे मन और भक्ति के साथ करें। रात का समय शांत और ध्यानमग्न होता है, इसलिए यह शिव चालीसा के पाठ के लिए अनुकूल भी हो सकता है, क्योंकि इससे एकाग्रता और ध्यान बेहतर होता है।

शिव स्तोत्रम की रचना किसने की थी?

शिव स्तोत्रम की रचना विभिन्न संतों और ऋषियों ने की थी, लेकिन कुछ प्रमुख स्तोत्रों की रचना आदि शंकराचार्य ने की थी। शिव स्तोत्रम भगवान शिव की स्तुति और उनकी महिमा का वर्णन करने वाले श्लोकों का एक समूह है। इनमें शिव तांडव स्तोत्र, लिंगाष्टकम, महिम्न स्तोत्र और कई अन्य शामिल हैं। आदि शंकराचार्य, जो अद्वैत वेदांत के महान आचार्य थे, ने भगवान शिव की स्तुति में कई प्रसिद्ध स्तोत्रों की रचना की, जिनमें उनके भक्ति और ज्ञान दोनों का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। शिव स्तोत्रम न केवल भगवान शिव की महिमा का वर्णन करते हैं, बल्कि भक्तों के लिए ध्यान, साधना और आत्मशांति का एक मार्ग भी प्रस्तुत करते हैं। इन्हें पढ़ने या सुनने से भक्तों को भगवान शिव की कृपा और आशीर्वाद मिलता है।

Durga Chalisa PDF in Hindi | श्री दुर्गा चालीसा | Sri Durga Chalisa in Hindi PDF 2026

श्री दुर्गा चालीसा लिखित pdf (Durga Chalisa PDF) की महिमा अपरंपार है. आज के समय में उनकी स्तुति करने का एक सरल तरीका है दुर्गा चालीसा का पाठ करना। आप हमारी वेबसाइट में दुर्गा आरती | श्री दुर्गा देवी कवच और दुर्गा अमृतवाणी भी पढ़ सकते हैं। दुर्गा चालीसा में 40 दोहे हैं, जो बहुत ही आसान भाषा में हैं। यह पढ़ने में बहुत रोचक और आनंददायक है। इन दोहों को पढ़ने से मां दुर्गा के भक्तों को आनंद मिलता है।

दुर्गा चालीसा और आरती हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण पूजा विधि है, जिसका उद्देश्य माँ दुर्गा की महिमा का गुणगान करना और उनका आशीर्वाद प्राप्त करना है। यह पाठ विशेष रूप से माँ दुर्गा के भक्तों द्वारा किया जाता है, जो अपने जीवन में सुख, शांति और सफलता प्राप्त करने के लिए इससे शक्ति और प्रेरणा लेते हैं।
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दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa PDF) हिन्दू धर्म में एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जो देवी दुर्गा की महिमा का गुणगान करता है। इसे भक्तगण श्रद्धापूर्वक पाठ करते हैं, ताकि उनके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का संचार हो। दुर्गा चालीसा में माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों और उनकी शक्तियों का उल्लेख है। इसमें 40 दोहों के माध्यम से देवी की कृपा और उनके दिव्य गुणों का वर्णन किया गया है। ऐसा माना जाता है कि दुर्गा चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और उसे माँ का आशीर्वाद प्राप्त होता है। विशेष रूप से नवरात्रि के दिनों में इसका पाठ अत्यधिक शुभ माना जाता है।

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa PDF) का पाठ न केवल आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है, बल्कि यह आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा को भी बढ़ाता है। माँ दुर्गा को शक्ति, साहस और संरक्षण की देवी माना जाता है, और उनका स्मरण करने से व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति मिलती है। दुर्गा चालीसा को सुबह और शाम के समय पढ़ने से मन और मस्तिष्क शांत होते हैं। इसके अलावा, यह परिवार में सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य को बनाए रखने में सहायक होता है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में दुर्गा चालीसा का महत्व अलग-अलग रूपों में देखा जाता है, लेकिन इसका मूल उद्देश्य हर जगह समान है—माँ दुर्गा के प्रति आस्था और श्रद्धा व्यक्त करना।


Shri Durga Chalisa PDF in Hindi Lyrics | श्री दुर्गा चालीसा पाठ | नमो नमो दुर्गे सुख करनी | durga चालीसा इन हिंदी pdf

श्री दुर्गा चालीसा PDF | Shri Durga Chalisa Lyrics in Hindi

नमो नमो दुर्गे सुख करनी ।
नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी ॥
निरंकार है ज्योति तुम्हारी ।
तिहूँ लोक फैली उजियारी ॥
शशि ललाट मुख महाविशाला ।
नेत्र लाल भृकुटि विकराला ॥
रूप मातु को अधिक सुहावे ।
दरश करत जन अति सुख पावे ॥ ४
तुम संसार शक्ति लै कीना ।
पालन हेतु अन्न धन दीना ॥
अन्नपूर्णा हुई जग पाला ।
तुम ही आदि सुन्दरी बाला ॥
प्रलयकाल सब नाशन हारी ।
तुम गौरी शिवशंकर प्यारी ॥
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें ।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ॥ ८
रूप सरस्वती को तुम धारा ।
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा ॥
धरयो रूप नरसिंह को अम्बा ।
परगट भई फाड़कर खम्बा ॥
रक्षा करि प्रह्लाद बचायो ।
हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो ॥
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं ।
श्री नारायण अंग समाहीं ॥ १२
क्षीरसिन्धु में करत विलासा ।
दयासिन्धु दीजै मन आसा ॥
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी ।
महिमा अमित न जात बखानी ॥
मातंगी अरु धूमावति माता ।
भुवनेश्वरी बगला सुख दाता ॥
श्री भैरव तारा जग तारिणी ।
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ॥ १६
केहरि वाहन सोह भवानी ।
लांगुर वीर चलत अगवानी ॥
कर में खप्पर खड्ग विराजै ।
जाको देख काल डर भाजै ॥
सोहै अस्त्र और त्रिशूला ।
जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥
नगरकोट में तुम्हीं विराजत ।
तिहुँलोक में डंका बाजत ॥ २०
शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे ।
रक्तबीज शंखन संहारे ॥
महिषासुर नृप अति अभिमानी ।
जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥
रूप कराल कालिका धारा ।
सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥
परी गाढ़ सन्तन पर जब जब ।
भई सहाय मातु तुम तब तब ॥ २४
अमरपुरी अरु बासव लोका ।
तब महिमा सब रहें अशोका ॥
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी ।
तुम्हें सदा पूजें नरनारी ॥
प्रेम भक्ति से जो यश गावें ।
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें ॥
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई ।
जन्ममरण ताकौ छुटि जाई ॥ २८
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी ।
योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी ॥
शंकर आचारज तप कीनो ।
काम अरु क्रोध जीति सब लीनो ॥
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को ।
काहु काल नहिं सुमिरो तुमको ॥
शक्ति रूप का मरम न पायो ।
शक्ति गई तब मन पछितायो ॥ ३२
शरणागत हुई कीर्ति बखानी ।
जय जय जय जगदम्ब भवानी ॥
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा ।
दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा ॥
मोको मातु कष्ट अति घेरो ।
तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो ॥
आशा तृष्णा निपट सतावें ।
मोह मदादिक सब बिनशावें ॥ ३६
शत्रु नाश कीजै महारानी ।
सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी ॥
करो कृपा हे मातु दयाला ।
ऋद्धिसिद्धि दै करहु निहाला ॥
जब लगि जिऊँ दया फल पाऊँ ।
तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ ॥
श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै ।
सब सुख भोग परमपद पावै ॥ ४०
देवीदास शरण निज जानी ।
करहु कृपा जगदम्ब भवानी ॥
॥दोहा॥
शरणागत रक्षा करे,
भक्त रहे नि:शंक ।
मैं आया तेरी शरण में,
मातु लिजिये अंक ॥

॥ इति श्री दुर्गा चालीसा ॥

॥ Chaupai ॥
Namo Namo Durge Sukha Karani।
Namo Namo Ambe Duhkha Harani॥

Nirakara Hai Jyoti Tumhari।
Tihun Loka Phaili Ujiyari॥

Shashi Lalata Mukha Mahavishala।
Netra Lala Bhrikuti Vikarala॥

Rupa Matu Ko Adhika Suhave।
Darasha Karata Jana Ati Sukha Pave॥

Tuma Sansara Shakti Laya Kina।
Palana Hetu Anna Dhana Dina॥

Annapurna Hui Jaga Pala।
Tuma Hi Adi Sundari Bala॥

Pralayakala Saba Nashana Hari।
Tuma Gauri Shiva Shankara Pyari॥

Shiva Yogi Tumhare Guna Gavein।
Brahma Vishnu Tumhein Nita Dhyavein॥

Rupa Saraswati Ko Tuma Dhara।
De Subuddhi Rishi-Munina Ubara॥

Dhara Rupa Narasinha Ko Amba।
Pragata Bhayin Phadakara Khamba॥

Raksha Kara Prahlada Bachayo।
Hiranyaksha Ko Swarga Pathayo॥

Lakshmi Rupa Dharo Jaga Mahin।
Shri Narayana Anga Samahin॥

Kshirasindhu Mein Karata Vilasa।
Dayasindhu Dijai Mana Asa॥

Hingalaja Mein Tumhin Bhavani।
Mahima Amita Na Jata Bakhani॥

Matangi Aru Dhumawati Mata।
Bhuvaneshwari Bagala Sukha Data॥

Shri Bhairava Tara Jaga Tarini।
Chhinna Bhala Bhava Duhkha Nivarini॥

Kehari Vahana Soha Bhavani।
Langura Vira Chalata Agavani॥

Kara Mein Khappara Khadga Virajai।
Jako Dekha Kala Dara Bhaje॥

Sohai Astra Aura Trishula।
Jate Uthata Shatru Hiya Shula॥

Nagara Koti Mein Tumhin Virajata।
Tihunloka Mein Danka Bajata॥

Shumbha Nishumbha Danava Tuma Mare।
Raktabija Shankhana Sanhare॥

Mahishasura Nripa Ati Abhimani।
Jehi Agha Bhara Mahi Akulani॥

Rupa Karala Kalika Dhara।
Sena Sahita Tuma Tihi Sanhara॥

Pari Gadha Santana Para Jaba Jaba।
Bhayi Sahaya Matu Tuma Taba Taba॥

Amarapuri Aru Basava Loka।
Taba Mahima Saba Rahein Ashoka॥

Jwala Mein Hai Jyoti Tumhari।
Tumhein Sada Pujein Nara Nari॥

Prema Bhakti Se Jo Yasha Gavai।
Duhkha Daridra Nikata Nahin Ave॥

Dhyave Tumhein Jo Nara Mana Lai।
Janma Marana Takau Chhuti Jai॥

Jogi Sura Muni Kahata Pukari।
Yoga Na Ho Bina Shakti Tumhari॥

Shankara Acharaja Tapa Kino।
Kama Aru Krodha Jiti Saba Lino॥

Nishidina Dhyana Dharo Shankara Ko।
Kahu Kala Nahin Sumiro Tumako॥

Shakti Rupa Ko Marama Na Payo।
Shakti Gayi Taba Mana Pachhitayo॥

Sharanagata Huyi Kirti Bakhani।
Jai Jai Jai Jagadamba Bhavani॥

Bhai Prasanna Adi Jagadamba।
Dayi Shakti Nahin Kina Vilamba॥

Moko Matu Kashta Ati Ghero।
Tuma Bina Kauna Harai Duhkha Mero॥

Asha Trishna Nipata Satave।
Moha Madadika Saba Vinashavai॥

Shatru Nasha Kijai Maharani।
Sumiraun Ikachita Tumhein Bhavani॥

Karo Kripa He Matu Dayala।
Riddhi Siddhi De Karahu Nihala॥

Jaba Lagi Jiyaun Daya Phala Paun।
Tumharo Yasha Main Sada Sonaun॥

Durga Chalisa Jo Nita Gavai।
Saba Sukha Bhoga Paramapada Pavai॥

Devidasa Sharana Nija Jani।
Karahu Kripa Jagadamba Bhavani॥

॥Doha ॥
Sharanaagat raksha kare,
Bhakt rahe ni:shank ॥
Main tere sharan mein aaya,
Maatu lijie ank ॥

॥ Iti Shree Durga Chalisa ॥


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दुर्गा चालीसा का पाठ कैसे करें?

प्रातःकाल ही स्नान आदि से निवृत्त होकर साफ और सुथरे वस्त्र पहनें। फिर लकड़ी से बने चौकोर पटरे पर लाल रंग का कपड़ा बिछाकर, उस पर दुर्गा जी की मूर्ति या चित्र को रखें। आप स्वयं कुश या ऊन से बने हुए आसन पर बैठें। फिर सिंदूर, लाल रंग के फूल, दीप-धूप आदि से पूजा करें। यथाशक्ति हलवा, चना या कच्चे दूध और खोये की मिठाई का भोग लगाएं। फिर भगवती की पूजा कर लाल पुष्प हाथ में लेकर यह श्लोक पढ़ें:

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
त्र्यम्ब शरण्ये गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का पाठ एक अत्यंत शुभ और पवित्र क्रिया है जो भक्तों को माता दुर्गा की कृपा प्राप्त करने में सहायता करती है। यह पाठ विशेष रूप से नवरात्रि के दौरान किया जाता है, लेकिन इसे किसी भी समय किया जा सकता है जब व्यक्ति को शक्ति, साहस, और आशीर्वाद की आवश्यकता होती है। दुर्गा चालीसा का पाठ करने के लिए आपको निम्नलिखित विधियों और नियमों का पालन करना चाहिए:

स्थान और समय का चयन

दुर्गा चालीसा का पाठ करने के लिए आपको एक शांत और पवित्र स्थान का चयन करना चाहिए। यह स्थान ऐसा होना चाहिए जहाँ बाहरी शोर-शराबे से आप परेशान न हों। यदि संभव हो, तो आप अपने घर के मंदिर में या किसी पवित्र स्थान पर यह पाठ कर सकते हैं।

पाठ करने के लिए ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4 बजे से 6 बजे के बीच का समय) सबसे अच्छा माना जाता है। यदि ब्रह्म मुहूर्त में संभव न हो तो सुबह का समय (सूर्योदय के समय) भी शुभ होता है। हालांकि, आप अपने सुविधा के अनुसार किसी भी समय दुर्गा चालीसा का पाठ कर सकते हैं।

शुद्धता और स्वच्छता

पाठ करने से पहले आपको स्वयं को शारीरिक और मानसिक रूप से शुद्ध करना चाहिए। इसके लिए आप स्नान कर सकते हैं और स्वच्छ कपड़े पहन सकते हैं। मन को शुद्ध करने के लिए आप थोड़ी देर ध्यान कर सकते हैं, जिससे आपका मन शांत और एकाग्र हो सके।

पूजन सामग्री की तैयारी

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का पाठ करने से पहले आवश्यक पूजन सामग्री तैयार कर लें। इसमें माँ दुर्गा की प्रतिमा या चित्र, लाल चंदन, कुमकुम, अक्षत (चावल), फूल, धूप, दीप, नैवेद्य (प्रसाद) आदि शामिल हैं। आप एक लाल आसन पर बैठकर पूजा कर सकते हैं।

आसन और मुद्रा

दुर्गा चालीसा का पाठ करने के लिए आप जमीन पर एक साफ और पवित्र आसन बिछाएं। लाल या सफेद रंग का कपड़ा इस उद्देश्य के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। ध्यान रखें कि आप पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। यह दिशाएं पूजा के लिए सबसे उत्तम मानी जाती हैं।आपकी मुद्रा सहज और स्थिर होनी चाहिए। आप पद्मासन, सिद्धासन, या सुखासन में बैठ सकते हैं। यह सुनिश्चित करें कि आपकी रीढ़ सीधी हो और आपकी आँखें बंद हों, ताकि आप पूरी तरह से माता दुर्गा की ध्यान में लीन हो सकें।

मां दुर्गा का ध्यान

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का पाठ शुरू करने से पहले, माता दुर्गा का ध्यान करें। आप उनकी मूर्ति या चित्र के सामने अपने हाथ जोड़कर बैठें और उनकी दिव्य शक्ति, सौम्यता और करुणा का स्मरण करें। आप अपने मन में उनके पवित्र स्वरूप का ध्यान कर सकते हैं। इसके लिए आप दुर्गा मंत्र का जाप कर सकते हैं, जैसे:
ॐ दुं दुर्गायै नमः।

दीप प्रज्वलन और धूप अर्पण

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) के पाठ से पहले दीपक जलाएं और धूप अर्पण करें। दीपक जलाने से वातावरण शुद्ध और सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है। धूप अर्पण करते समय आप यह प्रार्थना कर सकते हैं कि माँ दुर्गा आपके घर और मन को अपने दिव्य प्रकाश से आलोकित करें।

दुर्गा चालीसा का पाठ

अब आप दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का पाठ शुरू कर सकते हैं। दुर्गा चालीसा के 40 दोहे और चौपाइयाँ हैं, जिन्हें श्रद्धा और भक्ति के साथ पढ़ना चाहिए। पाठ करते समय मन को एकाग्र रखना चाहिए और माँ दुर्गा के चरणों में समर्पित होना चाहिए। यदि संभव हो, तो दुर्गा चालीसा का पाठ जोर से करें, ताकि उसकी ध्वनि आपके वातावरण में गूंजे और आपकी ऊर्जा को शुद्ध करे।

दुर्गा चालीसा का पाठ करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें:

  1. स्मरण: पाठ करते समय माँ दुर्गा की महिमा, उनकी शक्तियों और गुणों का स्मरण करें।
  2. श्रद्धा: प्रत्येक शब्द को श्रद्धा और भक्ति के साथ उच्चारण करें।
  3. ध्यान: पाठ के दौरान मन को भटकने न दें। यदि मन इधर-उधर जाए तो उसे पुनः माँ दुर्गा के ध्यान में लगाएं।
  4. समर्पण: माँ दुर्गा को अपनी समस्त चिंताओं और समस्याओं का समाधानकर्ता मानें और उनके चरणों में समर्पित हो जाएं।

आरती और प्रसाद

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का पाठ समाप्त करने के बाद, आप माँ दुर्गा की आरती करें। आरती के दौरान घंटी बजाएं और माँ दुर्गा का गुणगान करें। आरती के बाद माँ को प्रसाद अर्पण करें और उसे भक्तों में बाँटें। प्रसाद ग्रहण करते समय माँ के आशीर्वाद के लिए कृतज्ञता प्रकट करें।

शांति पाठ और समापन

पाठ और आरती के बाद, एक शांतिपाठ करें। इसके लिए आप निम्नलिखित शांति मंत्र का उच्चारण कर सकते हैं:

ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत्।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

इसके बाद, माता दुर्गा के चरणों में नमन करें और उनके आशीर्वाद की प्रार्थना करें। अंत में, अपने स्थान को साफ करें और पूजा की सामग्री को उचित स्थान पर रखें।

अनुशासन और निष्ठा

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का पाठ एक नियमित अनुशासन के साथ करने से विशेष फलदायी होता है। यदि आप इसे रोज़ या नियमित अंतराल पर करते हैं, तो यह आपके जीवन में सकारात्मकता और ऊर्जा का संचार करेगा। नवरात्रि के दिनों में इसका पाठ विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है। इस दौरान नौ दिनों तक नित्य दुर्गा चालीसा का पाठ करने से माँ दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है।

दुर्गा चालीसा पाठ के लाभ

दुर्गा चालीसा का पाठ करने से कई आध्यात्मिक और मानसिक लाभ होते हैं:

आध्यात्मिक उन्नति: यह पाठ व्यक्ति की आत्मा को शुद्ध करता है और उसे आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर करता है।

साहस और शक्ति: माँ दुर्गा की कृपा से व्यक्ति को जीवन की कठिनाइयों से लड़ने का साहस और शक्ति प्राप्त होती है।

शांति और संतोष: नियमित पाठ से मन में शांति और संतोष का अनुभव होता है, जिससे तनाव और चिंता कम होती है।

संरक्षण और सुरक्षा: माँ दुर्गा की कृपा से व्यक्ति बुरे प्रभावों और नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षित रहता है।

सुख और समृद्धि: माँ दुर्गा की आराधना से परिवार में सुख, समृद्धि और खुशहाली का वास होता है।


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नवरात्रि का पावन पर्व सिर्फ उत्सव और उपवास तक सीमित नहीं है; यह आत्मशुद्धि, आध्यात्मिक ऊर्जा का संचय और दिव्य शक्ति से जुड़ने का सुनहरा अवसर है। इन नौ पवित्र रात्रियों में मां दुर्गा की आरती और चालीसा का नियमित पाठ एक ऐसी साधना है जो साधक के जीवन से अनेकानेक परेशानियों को दूर करने में अद्भुत सामर्थ्य रखती है। यह केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि एक गहन मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया है।

आरती: प्रकाश, भक्ति और समर्पण का सागर
मां दुर्गा की आरती करना, दीपक की लौ के साथ उनकी स्तुति गाना, एक भावपूर्ण समर्पण है। यह क्रिया कई स्तरों पर काम करती है:

  1. मन की शुद्धि: आरती की पवित्र ध्वनियाँ और दीपक का प्रकाश वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा को तोड़ते हैं। मन की उथल-पुथल शांत होती है, चिंता और तनाव घटने लगते हैं।
  2. भक्ति का जागरण: आरती के मंत्रों में मां के गुणों, पराक्रम और कृपा का वर्णन होता है। इन्हें गाते हुए भक्त का हृदय प्रेम और श्रद्धा से सराबोर हो जाता है, आत्मविश्वास बढ़ता है।
  3. समर्पण की भावना: “तेरी आरती मैं गाऊं मैया…” जैसे पंक्तियों के साथ भक्त स्वयं को पूर्णतः मां के चरणों में समर्पित कर देता है। यह समर्पण ही भारी बोझ को उतार फेंकता है, यह विश्वास दृढ़ करता है कि मां सब संकट हर लेंगी।

चालीसा: शक्ति, संरक्षण और समाधान का मंत्र
दुर्गा चालिषा मां दुर्गा के स्वरूप, महिमा और उनके द्वारा दैत्यों के वध की कथाओं का सार संग्रह है। इसका नियमित पाठ:

  1. शक्ति का संचार: चालीसा के प्रत्येक चौपाई में मां की विजयी शक्ति का बखान है। इसे पढ़ने से साधक के भीतर उसी दिव्य शक्ति का संचार होता है, आंतरिक बल जागृत होता है, जिससे जीवन की चुनौतियों का सामना करने की क्षमता बढ़ती है।
  2. भय का नाश: मां ने महिषासुर, शुम्भ-निशुम्भ जैसे भयानक राक्षसों का वध किया। चालीसा पाठ करते हुए यह स्मरण होता है कि जिस मां ने इतने भयानक शत्रुओं का नाश किया, वह मेरे छोटे-मोटे संकटों को क्षण भर में दूर कर सकती हैं। इससे हर प्रकार के भय (आर्थिक, सामाजिक, स्वास्थ्य) का नाश होता है।
  3. कृपा का वरदान: चालीसा के अंत में वरदान मांगा जाता है – “दुख दारिद्र निवारण… सुख संपत्ति घर आवे…”। नवरात्रि में नियमित पाठ से मां की विशेष कृपा प्राप्त होती है, जो जीवन के कष्टों – रोग, दरिद्रता, कलह, कानूनी उलझनों, मानसिक अशांति – को दूर करने में सहायक बनती है।

नियमितता का महत्व और परिणाम:
नवरात्रि की पवित्र ऊर्जा में रोजाना आरती और चालीसा का पाठ करने का विशेष महत्व है। यह नियमित अभ्यास:

  • मन को स्थिर और एकाग्र करता है, जिससे समस्याओं का समाधान स्पष्ट दिखने लगता है।
  • आत्मिक शक्ति और धैर्य बढ़ाता है, जिससे परेशानियों का सामना डटकर किया जा सकता है।
  • सकारात्मक ऊर्जा का एक सुरक्षा कवच निर्मित करता है, बाहरी नकारात्मक प्रभावों से बचाता है।
  • भक्त और देवी के बीच एक गहन, अटूट संबंध स्थापित करता है, जिससे मां की कृपा सहज ही प्राप्त होती है।

दुर्गा चालीसा के पाठ से जुड़ी कहानियां

हिंदू धर्म में देवी दुर्गा को शक्ति, साहस और संरक्षण की देवी माना जाता है। देवी दुर्गा की पूजा के लिए कई शास्त्र और स्तोत्र हैं, जिनमें से दुर्गा चालीसा विशेष महत्व रखती है। दुर्गा चालीसा एक प्रसिद्ध स्तोत्र है जिसमें देवी दुर्गा की 40 चौपाइयों में स्तुति की जाती है। यह चालीसा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि भक्तों की कठिनाइयों और संकटों से मुक्ति पाने का एक महत्वपूर्ण साधन भी है। इस लेख में हम दुर्गा चालीसा के पाठ से जुड़ी कुछ प्रेरणादायक कहानियों का वर्णन करेंगे, जो इसके महत्व और प्रभाव को स्पष्ट करती हैं।

संकटमोचन महापुराण की कहानी

संकटमोचन महापुराण में एक प्रसिद्ध कहानी है, जो दुर्गा चालीसा के पाठ की शक्ति को दर्शाती है। एक बार, एक छोटे से गांव में एक गरीब ब्राह्मण अपनी पत्नी और बच्चों के साथ कठिन परिस्थितियों में जी रहा था। उसकी आर्थिक स्थिति इतनी दयनीय थी कि उसे रोज की जरूरतों को पूरा करने में भी परेशानी हो रही थी।

एक दिन, ब्राह्मण के पास एक साधू महात्मा आए और उन्होंने ब्राह्मण को दुर्गा चालीसा का पाठ करने का सुझाव दिया। ब्राह्मण ने उनकी सलाह मानी और नियमित रूप से दुर्गा चालीसा का पाठ करना शुरू कर दिया। उन्होंने पूरे मनोयोग से यह पाठ किया और जल्द ही चमत्कारिक बदलाव महसूस किया। उनकी आर्थिक स्थिति सुधरने लगी, और उनके परिवार को सुख-समृद्धि मिलने लगी। इस कहानी से यह सिखने को मिलता है कि सच्चे मन से की गई पूजा और पाठ से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन संभव है।

महाभारत काल की कथा

महाभारत के समय, एक प्रमुख योद्धा और महान भक्त महेश्वरी देवी की पूजा करते थे। एक दिन, दुर्गा के प्रति उनकी भक्ति को परीक्षा में डालने के लिए एक दैत्य ने उन्हें चुनौती दी। दैत्य ने उन्हें एक विशेष युद्ध में हराने के लिए कहा, अन्यथा पूरे राज्य को विनाश के कगार पर लाने की धमकी दी। योद्धा ने देवी दुर्गा की शरण ली और दुर्गा चालीसा का पाठ करने का निर्णय लिया।

हर दिन, उन्होंने पूरी श्रद्धा और भक्ति से दुर्गा चालीसा का पाठ किया। इस पाठ की शक्ति से उनकी मनोबल बढ़ी, और उन्होंने युद्ध में विजय प्राप्त की। इस घटना ने साबित कर दिया कि दुर्गा चालीसा की शक्ति किसी भी संकट को पार करने में सक्षम है। भक्तों के लिए यह एक सिखने वाली कहानी है कि भक्ति और सच्चे मन से की गई पूजा कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी मददगार साबित हो सकती है।

आधुनिक काल की प्रेरणादायक घटना

आधुनिक काल में भी दुर्गा चालीसा के पाठ से जुड़े कई प्रेरणादायक किस्से हैं। एक विशेष घटना का उल्लेख किया जा सकता है, जिसमें एक युवा उद्यमी ने अपने व्यवसाय में लगातार असफलताओं का सामना किया। उसकी आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गई और उसने अपनी सारी उम्मीदें खो दी थीं।

उसने अपनी स्थिति सुधारने के लिए देवी दुर्गा की पूजा और दुर्गा चालीसा के पाठ का सहारा लिया। उन्होंने नियमित रूप से दुर्गा चालीसा का पाठ किया और देवी से सहायता की प्रार्थना की। कुछ ही समय में, उसके व्यवसाय में चमत्कारी सुधार हुआ, और उसे आर्थिक समृद्धि प्राप्त हुई। इस घटना ने साबित किया कि विश्वास और भक्ति के साथ किया गया दुर्गा चालीसा का पाठ साकारात्मक परिणाम ला सकता है।

भक्त की संजीवनी कथा

एक बार, एक भक्त की संजीवनी कथा सामने आई जिसमें एक भक्त की जीवन की कठिनाइयों को दूर करने के लिए दुर्गा चालीसा का पाठ महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह भक्त एक गंभीर बीमारी से पीड़ित था और डॉक्टरों ने उसे इलाज के लिए कोई आशा नहीं दी थी। उसने देवी दुर्गा की भक्ति के प्रति अपनी आस्था बनाए रखी और रोज दुर्गा चालीसा का पाठ करना शुरू किया।

आश्चर्यजनक रूप से, भक्त की स्थिति में सुधार हुआ, और उसकी बीमारी ठीक हो गई। इस कहानी ने यह साबित किया कि सच्चे मन से की गई पूजा और पाठ के द्वारा गंभीर से गंभीर बीमारियों का भी इलाज संभव है। भक्तों के लिए यह एक प्रेरणादायक उदाहरण है कि विश्वास और भक्ति के साथ किए गए प्रयास किसी भी कठिनाई को पार कर सकते हैं।

देवी की कृपा से संकटमोचन

एक गांव में, एक किसान ने अपनी फसल को लेकर गंभीर संकट का सामना किया। लगातार सूखा और प्राकृतिक आपदाओं ने उसकी फसल को बर्बाद कर दिया था। किसान के पास उम्मीद की कोई किरण नहीं बची थी। उसने अपनी कठिनाइयों को दूर करने के लिए देवी दुर्गा से प्रार्थना की और दुर्गा चालीसा का पाठ शुरू किया।

धीरे-धीरे, उसकी स्थिति में सुधार हुआ। बारिश आई और उसकी फसल में वृद्धि हुई। देवी दुर्गा की कृपा से किसान की कठिनाइयों का समाधान हुआ और उसकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ। इस घटना ने साबित किया कि देवी की भक्ति और दुर्गा चालीसा का पाठ संकटों को दूर कर सकता है और जीवन में सुधार ला सकता है।

दुर्गा चालीसा और आस्थावान भक्त की कहानी

एक विशेष कहानी में, एक युवा विद्यार्थी ने अपनी पढ़ाई में लगातार विफलता का सामना किया। उसने कई बार परीक्षा दी, लेकिन हर बार असफल रहा। उसने आस्था और विश्वास के साथ देवी दुर्गा से प्रार्थना करने का निर्णय लिया और दुर्गा चालीसा का पाठ करना शुरू किया।

उसकी भक्ति और श्रद्धा के फलस्वरूप, उसने अपनी पढ़ाई में सुधार किया और परीक्षा में सफलता प्राप्त की। इस कहानी ने यह दिखाया कि दुर्गा चालीसा का पाठ केवल भौतिक समस्याओं को ही नहीं, बल्कि मानसिक और शैक्षणिक समस्याओं को भी हल कर सकता है।


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दुर्गा चालीसा के लाभ

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa), माता दुर्गा की आराधना और उनकी महिमा को व्यक्त करने वाला एक महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथ है। यह चालीसा 40 श्लोकों में माता दुर्गा की स्तुति करती है और उनके अद्वितीय गुणों, शक्तियों, और भक्तों को प्राप्त होने वाले लाभों का वर्णन करती है। दुर्गा चालीसा का नियमित पाठ विशेष रूप से देवी दुर्गा की उपासना और उनके आशीर्वाद की प्राप्ति के लिए किया जाता है। इस लेख में हम दुर्गा चालीसा के विभिन्न लाभों पर विस्तृत रूप से चर्चा करेंगे।

मानसिक शांति और तनाव में कमी

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का नियमित पाठ मानसिक शांति और तनाव में कमी लाने में अत्यंत सहायक होता है। देवी दुर्गा को शक्ति और शांति की देवी माना जाता है। उनके गुणों की स्तुति और उनकी उपासना से मन की एकाग्रता बढ़ती है और मानसिक तनाव कम होता है। यह मानसिक शांति को प्रोत्साहित करता है और व्यक्तित्व को संतुलित बनाता है।

विघ्नों और समस्याओं का समाधान

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का पाठ करने से जीवन में आने वाली विघ्नों और समस्याओं का समाधान संभव होता है। माता दुर्गा को शक्ति और साहस की देवी माना जाता है, और उनकी आराधना से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। यह चालीसा विघ्नों को नष्ट करने और समस्याओं को सुलझाने में सहायक होती है, जिससे जीवन में सुख और समृद्धि बनी रहती है।

स्वास्थ्य में सुधार

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का नियमित पाठ स्वास्थ्य में भी सुधार कर सकता है। देवी दुर्गा की उपासना से मानसिक शांति और तनाव में कमी होती है, जो शारीरिक स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव डालती है। इसके अतिरिक्त, देवी दुर्गा के आशीर्वाद से रोग और बीमारियों से सुरक्षा प्राप्त होती है, और समग्र स्वास्थ्य में सुधार होता है।

पारिवारिक सुख और सामंजस्य

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का पाठ पारिवारिक सुख और सामंजस्य में भी सुधार लाता है। माता दुर्गा की उपासना से परिवार में प्रेम और समझदारी बढ़ती है। यह पारिवारिक विवादों और समस्याओं का समाधान करने में सहायक होती है, और परिवार में सुख-शांति और सामंजस्य बनाए रखती है।

आर्थिक समृद्धि और लाभ

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का पाठ आर्थिक समृद्धि में वृद्धि कर सकता है। देवी दुर्गा को समृद्धि और ऐश्वर्य की देवी माना जाता है। उनकी उपासना से धन और संसाधनों के प्रबंधन में सहायता मिलती है, और आर्थिक समस्याओं का समाधान होता है। यह चालीसा आर्थिक स्थिति को सुधारने और समृद्धि प्राप्त करने में मदद करती है।

मानसिक शक्ति और आत्म-विश्वास

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का पाठ मानसिक शक्ति और आत्म-विश्वास को बढ़ाता है। माता दुर्गा को शक्ति और साहस की देवी माना जाता है, और उनकी आराधना से व्यक्ति में साहस और आत्म-विश्वास की भावना उत्पन्न होती है। यह जीवन की चुनौतियों का सामना करने की क्षमता को मजबूत करता है और आत्म-विश्वास को प्रोत्साहित करता है।

शिक्षा और बुद्धि में वृद्धि

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का पाठ शिक्षा और बुद्धि में वृद्धि करने में भी सहायक होता है। देवी दुर्गा की उपासना से मानसिक क्षमता में सुधार होता है और पढ़ाई में ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलती है। विशेष रूप से छात्रों और शिक्षार्थियों के लिए, यह चालीसा बुद्धि और ज्ञान को बढ़ाने में सहायक हो सकती है।

धार्मिक और आध्यात्मिक उन्नति

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का पाठ धार्मिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी महत्वपूर्ण है। यह व्यक्ति को धार्मिक मान्यताओं और आध्यात्मिक ज्ञान के प्रति जागरूक करता है। देवी दुर्गा की उपासना से व्यक्ति की धार्मिकता और आध्यात्मिकता में वृद्धि होती है और वह ईश्वर के करीब पहुंचता है।

जीवन की दिशा और उद्देश्य

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का पाठ जीवन में दिशा और उद्देश्य प्राप्त करने में भी सहायक होता है। यह व्यक्ति को अपने जीवन के लक्ष्यों को समझने और प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है। देवी दुर्गा की उपासना से जीवन के उद्देश्यों को प्राप्त करने की दिशा स्पष्ट होती है और व्यक्ति को सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है।

नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का पाठ नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा प्रदान करता है। देवी दुर्गा को शक्ति और सुरक्षा की देवी माना जाता है, और उनकी उपासना से बुरी शक्तियों और नकारात्मक प्रभावों से बचाव मिलता है। यह चालीसा व्यक्ति की ऊर्जा को सकारात्मक बनाए रखती है और जीवन में शांति और सुरक्षा प्रदान करती है।

वैवाहिक और संतान सुख

दुर्गा चालीसा का पाठ वैवाहिक जीवन और संतान सुख में भी सुधार लाता है। देवी दुर्गा को वैवाहिक सुख और संतान सुख की देवी माना जाता है। इस चालीसा का नियमित पाठ वैवाहिक समस्याओं का समाधान करता है और संतान की सुख-समृद्धि में भी सहायक होता है। यह परिवार में खुशहाली और समृद्धि बनाए रखने में मदद करती है।

जीवन में सफलता और समृद्धि

दुर्गा चालीसा का पाठ जीवन में सफलता और समृद्धि प्राप्त करने में सहायक होता है। देवी दुर्गा की उपासना से जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है, चाहे वह शिक्षा, व्यवसाय, या व्यक्तिगत जीवन हो। यह चालीसा सफलता के मार्ग को खोलती है और जीवन में सुख और समृद्धि को सुनिश्चित करती है।

आत्म-संयम और अनुशासन

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का नियमित पाठ आत्म-संयम और अनुशासन को बढ़ावा देता है। देवी दुर्गा की उपासना से व्यक्ति में आत्म-नियंत्रण और अनुशासन की भावना उत्पन्न होती है, जो जीवन को व्यवस्थित और प्रबंधित करने में मदद करती है। यह अनुशासन को बनाए रखने और आत्म-संयम को प्रोत्साहित करती है।

जीवन की कठिनाइयों से उबरना

दुर्गा चालीसा का पाठ जीवन की कठिनाइयों से उबरने में भी सहायक होता है। देवी दुर्गा की उपासना से व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति और क्षमता प्राप्त होती है। यह चालीसा जीवन की समस्याओं को सुलझाने में मदद करती है और कठिनाइयों से बाहर निकलने का मार्ग प्रशस्त करती है।

ध्यान और साधना में सहायता

दुर्गा चालीसा का नियमित पाठ ध्यान और साधना में भी सहायक होता है। देवी दुर्गा की उपासना से ध्यान लगाने की क्षमता में वृद्धि होती है और साधना के दौरान एकाग्रता बनी रहती है। यह ध्यान की गहराई को बढ़ाता है और आध्यात्मिक अनुभव को सशक्त करता है।

शुभकामनाओं और आशीर्वाद का प्राप्ति

दुर्गा चालीसा का पाठ शुभकामनाओं और आशीर्वाद की प्राप्ति में भी सहायक होता है। देवी दुर्गा की उपासना से व्यक्ति को ईश्वर से आशीर्वाद प्राप्त होता है, जो जीवन के हर क्षेत्र में सफलता और समृद्धि को सुनिश्चित करता है। यह चालीसा व्यक्ति की इच्छाओं को पूरा करने और उसके सपनों को साकार करने में मदद करती है।

भौतिक और आध्यात्मिक संतुलन

दुर्गा चालीसा का पाठ भौतिक और आध्यात्मिक संतुलन बनाए रखने में भी सहायक होता है। यह व्यक्ति को जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक पहलुओं को संतुलित तरीके से जीने की प्रेरणा देती है, जिससे जीवन में एकरूपता और सामंजस्य बनता है।

मनोबल और दृढ़ता

दुर्गा चालीसा का पाठ व्यक्ति के मनोबल और दृढ़ता को भी बढ़ाता है। देवी दुर्गा की उपासना से व्यक्ति में साहस और हिम्मत आती है, जिससे वह जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना बेहतर तरीके से कर सकता है। यह मनोबल को मजबूत बनाता है और समस्याओं को धैर्यपूर्वक सुलझाने की क्षमता प्रदान करता है।

आत्म-विश्वास में वृद्धि

दुर्गा चालीसा का पाठ आत्म-विश्वास को बढ़ाने में भी सहायक होता है। देवी दुर्गा की उपासना से व्यक्ति के अंदर एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जो आत्म-विश्वास को बढ़ाता है और जीवन में चुनौतियों का सामना करने की क्षमता को मजबूत करता है।

जीवन की दिशा और उद्देश्य

दुर्गा चालीसा का पाठ जीवन की दिशा और उद्देश्य प्राप्त करने में भी सहायक होता है। यह व्यक्ति को अपनी प्राथमिकताओं को समझने और अपने जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है। देवी दुर्गा की उपासना से जीवन के उद्देश्यों को प्राप्त करने की दिशा स्पष्ट होती है।

सुख-समृद्धि और सुखद जीवन

दुर्गा चालीसा का नियमित पाठ सुख-समृद्धि और सुखद जीवन के लिए भी महत्वपूर्ण है। यह व्यक्ति को जीवन में खुशहाली और समृद्धि प्राप्त करने में मदद करता है और जीवन की हर स्थिति में संतोष और खुशी बनाए रखने की प्रेरणा देता है।

जीवन में सकारात्मकता

दुर्गा चालीसा का पाठ जीवन में सकारात्मकता को बढ़ावा देता है। देवी दुर्गा की उपासना से व्यक्ति की सोच सकारात्मक होती है और वह जीवन की कठिनाइयों को सकारात्मक दृष्टिकोण से देखने लगता है। यह मानसिक स्थिति जीवन की चुनौतियों का सामना करने में मदद करती है।

साधना और पूजा की नियमितता

दुर्गा चालीसा का नियमित पाठ पूजा और साधना की नियमितता को बनाए रखने में भी सहायक होता है। यह व्यक्ति को धार्मिक अनुशासन में बनाए रखता है और नियमित पूजा और साधना के अभ्यास को प्रोत्साहित करता है।

दुर्गा चालीसा का पाठ धार्मिक और आध्यात्मिक लाभ प्रदान करने के साथ-साथ जीवन के विभिन्न पहलुओं में सकारात्मक परिवर्तन लाने में भी सहायक होता है। इसके नियमित पाठ से मानसिक शांति, विघ्नों का नाश, स्वास्थ्य में सुधार, पारिवारिक सुख, और आर्थिक समृद्धि जैसी अनेक लाभ प्राप्त होते हैं। देवी दुर्गा की उपासना से व्यक्ति को जीवन की हर स्थिति में खुशी, सफलता, और संतोष प्राप्त होता है।


durga chalisa lyrics

दुर्गा चालीसा आरती PDF एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्तोत्र है जो देवी दुर्गा की पूजा और आराधना में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। दुर्गा चालीसा में देवी दुर्गा की 40 पंक्तियों के माध्यम से उनकी शक्ति, कृपा और महिमा का वर्णन किया गया है। यह चालीसा विशेष रूप से नवरात्रि जैसे पावन अवसरों पर पढ़ी जाती है और इसके पाठ से भक्तों को मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है। इसके साथ ही, दुर्गा आरती की जाती है, जिसमें देवी की स्तुति और उनकी महानता को दर्शाने वाले भजन गाए जाते हैं।

दुर्गा चालीसा और दुर्गा आरती के नियमित पाठ से भक्तों को देवी दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होती है, जो उनके जीवन में सुख, समृद्धि और सुरक्षा का आश्वासन देती है। यह धार्मिक अनुष्ठान न केवल आध्यात्मिक संतुलन को बनाए रखने में मदद करता है बल्कि भक्ति और श्रद्धा को भी प्रगाढ़ करता है। इस प्रकार, दुर्गा चालीसा और आरती का आयोजन न केवल एक धार्मिक कृत्य होता है, बल्कि यह भक्तों के लिए एक गहन आध्यात्मिक अनुभव भी प्रदान करता है।


दुर्गा चालीसा कैसे पढ़ा जाता है? जाने समय और विधि

दुर्गा चालीसा के पाठ का सर्वोत्तम काल ब्रह्म मुहूर्त माना जाता है – प्रातःकाल की वह पावन वेला जब सृष्टि नवीन ऊर्जा से स्पंदित होती है। यह समय, जो सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटे पूर्व, प्रायः प्रातः 4 से 6 बजे के मध्य होता है, आध्यात्मिक साधना के लिए अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है।

तथापि, भक्तगण दिवस के किसी भी क्षण में श्रद्धापूर्वक दुर्गा चालीसा का पाठ कर सकते हैं। परंतु अनेक साधक प्रभात काल को विशेष महत्व देते हैं, क्योंकि यह समय मां दुर्गा के आशीर्वाद और सकारात्मक ऊर्जा से दिन का शुभारंभ करने का अद्वितीय अवसर प्रदान करता है।

पाठ की उत्कृष्ट विधि यह है कि स्नानोपरांत, शुद्ध और पवित्र मन-तन से, देवी दुर्गा की प्रतिमा अथवा चित्र के समक्ष बैठकर चालीसा का पाठ किया जाए। इस प्रकार की साधना से न केवल आध्यात्मिक लाभ की प्राप्ति होती है, अपितु भक्त का दिव्य शक्तियों से तादात्म्य भी स्थापित होता है, जिससे उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं।

स्मरण रहे, दुर्गा चालीसा का पाठ मात्र एक कर्मकांड नहीं, अपितु मां दुर्गा से संवाद का एक माध्यम है। अतः इसे पूर्ण श्रद्धा, समर्पण और एकाग्रता के साथ करना चाहिए। ऐसा करने से भक्त के जीवन में दैवीय कृपा का प्रवाह अवश्यंभावी हो जाता है।

दुर्गा चालीसा पढ़ने से क्या फल मिलता है?

नकारात्मक शक्तियों से रक्षा (Invokes Divine Protection): दुर्गा माता की कृपा से दुर्गा चालीसा का जाप करने वाले व्यक्ति पर नकारात्मक ऊर्जा का कोई असर नहीं होता। यह एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है जो व्यक्ति को बुरी नजर, टोटके और अन्य नकारात्मक शक्तियों से बचाता है।

सकारात्मक ऊर्जा का संचार (Transmitting Positive Energy): दुर्गा चालीसा का जाप करने से मन शांत और प्रसन्न रहता है। यह व्यक्ति के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और उसे जीवन की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति प्रदान करता है।

इच्छाओं की पूर्ति (Fulfills Desires and Removes Obstacles): दुर्गा माता सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाली देवी हैं। दुर्गा चालीसा का जाप करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

आत्मविश्वास और साहस में वृद्धि (Bestows Strength and Courage): दुर्गा माता शक्ति और साहस की देवी हैं। उनके चालीसा का जाप करने से व्यक्ति में आत्मविश्वास और साहस बढ़ता है और वह जीवन में हर कठिन परिस्थिति का सामना करने में सक्षम हो जाता है।

परिवार के लिए आशीर्वाद लाता है (Brings Blessings for Family): दुर्गा चालीसा का पाठ करने से यह विश्वास किया जाता है कि परिवार और प्रियजनों पर देवी का आशीर्वाद बना रहता है और समृद्धि प्राप्त होती है। इसे देवी दुर्गा से अपने परिवार की सुरक्षा और उनके कल्याण के लिए आशीर्वाद प्राप्त करने का एक पवित्र माध्यम माना जाता है।

नकारात्मक भावनाओं को दूर करता है (Removes Negative Emotions): दुर्गा चालीसा के छंदों का जाप करने से माना जाता है कि निराशा, ईर्ष्या और वासना जैसी प्रबल नकारात्मक भावनाओं को दूर किया जाता है। यह मन और आत्मा को शुद्ध करने में मदद करता है।

दुर्गा चालीसा का पाठ कितनी बार करना चाहिए?

दुर्गा चालीसा का पाठ एक अत्यंत गहन और आध्यात्मिक साधना है, जिसकी आवृत्ति भक्तों के अनुसार भिन्न हो सकती है। इस पवित्र पाठ की महत्ता और प्रभावशीलता को समझने के लिए यहाँ कुछ महत्वपूर्ण बिंदु प्रस्तुत हैं:

  1. सामान्यतः यह माना जाता है कि दुर्गा चालीसा का नियमित रूप से, विशेषकर प्रातःकाल या सायंकाल, पाठ करना अत्यधिक लाभकारी होता है। यह दिव्य साधना न केवल देवी दुर्गा के प्रति हमारी आस्था को और प्रगाढ़ करती है, बल्कि उनके आशीर्वाद स्वरूप सुरक्षा, शक्ति और मार्गदर्शन को आकर्षित करने में भी सहायक होती है।
  2. अधिकांश भक्तगण स्नान के उपरांत देवी दुर्गा की प्रतिमा या चित्र के समक्ष चालीसा का पाठ करना शुभ मानते हैं। ऐसा विश्वास किया जाता है कि इस प्रकार का पवित्र वातावरण पाठ की प्रभावशीलता को और बढ़ा देता है।
  3. विशेषकर नवरात्रि के पावन अवसर पर, जब देवी दुर्गा के नौ रूपों की आराधना की जाती है, दुर्गा चालीसा का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। इस समय भक्तगण अपने आध्यात्मिक अभ्यास को और अधिक गहन करने हेतु इसकी आवृत्ति को बढ़ाते हैं, जिससे देवी का आशीर्वाद प्राप्त हो सके।
  1. दुर्गा जी की मां कौन है?

    मां दुर्गा की माता का नाम देवी पार्वती है, जो स्वयं महादेव शिव की पत्नी हैं। देवी पार्वती को सृष्टि की आदि शक्ति और मां दुर्गा का स्वरूप माना जाता है।

मां दुर्गा का असली नाम क्या है?

मां दुर्गा का असली नाम “शक्ति” या “आदि शक्ति” है। उन्हें विभिन्न नामों से पुकारा जाता है, जिनमें दुर्गाकालीपार्वती, और भवानी प्रमुख हैं।

दुर्गा की सच्चाई क्या है?

मां दुर्गा की सच्चाई यह है कि वह सभी बुराइयों और अधर्म का नाश करने वाली शक्ति हैं। वह शक्ति, साहस, और विजय की देवी हैं, जिनका अवतार दुष्ट राक्षसों का संहार करने और धर्म की स्थापना के लिए हुआ था।

दुर्गा का 108 अवतार कौन है?

मां दुर्गा के 108 नाम हैं, जिन्हें “अष्टोत्तर शतनाम” कहा जाता है। इनमें से कुछ प्रसिद्ध नाम हैं – काली, चामुंडा, भवानी, और महिषासुरमर्दिनी। ये सभी नाम और अवतार माता के विभिन्न रूपों और शक्तियों को दर्शाते हैं।

दुर्गा किसकी बेटी थी?

मां दुर्गा को भगवान हिमालय और देवी मैना की बेटी के रूप में भी वर्णित किया जाता है। इसके अलावा, वह देवी पार्वती का भी अवतार मानी जाती हैं।

दुर्गा पहले क्या थी?

मां दुर्गा पहले देवी पार्वती थीं, जिन्हें महादेव शिव की पत्नी के रूप में जाना जाता है। देवी पार्वती ने संसार की रक्षा के लिए अपने अंदर की शक्ति को जागृत कर दुर्गा के रूप में अवतार लिया।

दुर्गा माता किसकी बहन है?

मां दुर्गा को वैदिक ग्रंथों में भगवान विष्णु की बहन के रूप में वर्णित किया गया है। उन्हें लक्ष्मी और सरस्वती की बहन के रूप में भी माना जाता है।

दुर्गा मां की असली कहानी क्या है?

मां दुर्गा की असली कहानी महिषासुर के संहार से जुड़ी है। असुर महिषासुर को वरदान प्राप्त था कि वह केवल एक स्त्री के हाथों मारा जा सकता है। इस असुर को मारने के लिए सभी देवताओं ने अपनी शक्तियों का सम्मिलन किया, जिससे मां दुर्गा का अवतार हुआ। मां दुर्गा ने महिषासुर का वध कर धरती पर शांति और धर्म की स्थापना की।

दुर्गा चालीसा कैसे पढ़ा जाता है?

दुर्गा चालीसा पढ़ने के लिए सबसे पहले शुद्ध और शांत वातावरण का चयन करना चाहिए। सुबह और शाम का समय विशेष रूप से उपयुक्त माना जाता है। दुर्गा माता की मूर्ति या तस्वीर के सामने दीपक जलाएं और अगरबत्ती लगाएं। फिर दुर्गा चालीसा का पाठ स्पष्ट और एकाग्र मन से करें। प्रत्येक श्लोक को ध्यान से पढ़ें और उसका अर्थ समझने की कोशिश करें। यदि आप संस्कृत में सहज नहीं हैं, तो उसका हिंदी अर्थ समझना भी लाभकारी होता है। पाठ के अंत में माता से प्रार्थना करें और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की विनती करें।

दुर्गा चालीसा पढ़ने से क्या फल मिलता है?

दुर्गा चालीसा का नियमित रूप से पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि और शांति आती है। माता दुर्गा की कृपा से जीवन की कठिनाइयाँ कम होती हैं और मानसिक शांति प्राप्त होती है। इस चालीसा का पाठ करने से शत्रुओं से रक्षा होती है और व्यक्ति को साहस एवं आत्मविश्वास मिलता है। इसके अलावा, यह चालीसा नकारात्मक ऊर्जा से बचाव करती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। भक्तों को उनकी इच्छाओं की पूर्ति और जीवन में सफलता प्राप्त होती है।

दुर्गा चालीसा कितनी बार करना चाहिए?

दुर्गा चालीसा का पाठ आप अपनी सुविधा और श्रद्धा के अनुसार कर सकते हैं। सामान्यत: एक बार या तीन बार पढ़ना उचित माना जाता है। नवरात्रि के विशेष अवसर पर नौ दिनों तक रोज़ाना दुर्गा चालीसा का पाठ करना अत्यंत फलदायी होता है। कुछ भक्त इसे 11 बार या 108 बार भी पढ़ते हैं, विशेष रूप से तब जब वे किसी विशेष मनोकामना की पूर्ति के लिए इसे कर रहे हों। नियमित रूप से कम से कम एक बार पढ़ना माता की कृपा प्राप्त करने के लिए पर्याप्त है।

दुर्गा चालीसा के लेखक कौन थे?

दुर्गा चालीसा के लेखक संत तुलसीदास जी माने जाते हैं, जिन्होंने रामचरितमानस जैसी अद्वितीय रचनाएँ कीं। तुलसीदास जी ने दुर्गा चालीसा की रचना माता दुर्गा की स्तुति और उनकी कृपा प्राप्त करने के उद्देश्य से की थी। उनके द्वारा रचित यह चालीसा भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है जो उन्हें माता की अनुकम्पा दिलाने में सहायक है

Durga Chalisa Written

The Durga Chalisa written is a sacred hymn comprising forty verses that are dedicated to praising Goddess Durga. Devotees often seek the written text to recite during prayers and Navratri festivities for spiritual blessings and protection from negative forces. The written form is widely available in Hindi, Sanskrit, and various translated formats to facilitate understanding and devotion.

Durga Chalisa Aarti

The Durga Aarti is a devotional song performed with a lighted lamp after reciting the Chalisa. It is a prayer of deep reverence and gratitude sung to conclude the worship ritual. The Aarti involves waving the lamp in a circular motion in front of the deity’s image, symbolizing the removal of darkness and the invocation of the Goddess’s divine light and blessings into the devotee’s life.

दुर्गा चालीसा आरती Image

दुर्गा चालीसा आरती image typically refers to a visual or pictorial representation that depicts the text of the Aarti. These images are highly sought after by devotees for daily worship, as they provide a convenient and accurate reference for singing the prayer. They are commonly shared on social media and messaging platforms during religious festivals, allowing users to easily read and follow along with the verses.

विंधेश्वरी चालीसा दुर्गा चालीसा PDF

The विंधेश्वरी चालीसा दुर्गा चालीसा PDF is a digital document that contains the hymns for both Goddess Vindhyeshwari, a form of Durga, and the traditional Durga Chalisa. This PDF is a valuable resource for devotees, as it compiles these powerful prayers into a single, portable file that can be stored on smartphones, tablets, or computers for offline reading and printing.

दुर्गा चालीसा डाउनलोडिंग

दुर्गा चालीसा डाउनलोडिंग refers to the process of acquiring a digital copy of the Durga Chalisa text or audio from the chalisa-pdf.com. This enables devotees to access the prayer anytime, anywhere, without requiring an active internet connection.

दुर्गा चालीसा आरती सहित PDF

दुर्गा चालीसा आरती सहित PDF is a comprehensive digital document that includes the full text of both the forty verses of the Durga Chalisa and the concluding Aarti prayer. This all-in-one PDF is extremely popular as it provides a complete script for a full worship session, making it convenient for individuals and groups to perform the entire ritual without switching between different sources.

Anuradha Paudwal Namo Namo Durge Sukh Lyrics

The Anuradha Paudwal Namo Namo Durge Sukh lyrics are from a famous devotional bhajan sung by the renowned artist Anuradha Paudwal. This song is a powerful invocation of Goddess Durge, pleading for happiness and the well-being of all. The lyrics are a heartfelt prayer asking the Mother Goddess to destroy all suffering and bring peace, prosperity, and joy to her devotees.

दुर्गा चालीसा साधना

दुर्गा चालीसा साधना refers to the dedicated spiritual practice and discipline of regularly reciting the Durga Chalisa with specific intentions and rituals. This Sadhana is often undertaken to seek the divine grace of Maa Durga for overcoming immense challenges, destroying enemies, and attaining spiritual power. It is typically performed with purity, devotion, and often following a prescribed set of rules over a period of time to achieve desired results.

For devotees and spiritual seekers exploring Hindu devotional literature, numerous sacred texts and hymns are available to deepen your practice. A Chalisa, a forty-verse hymn of praise, is a central form of devotion for many deities. Among the most revered is the Radha Chalisa, celebrating the divine love of Shri Radha Rani. Other powerful Chalisa texts include the Shiv Chalisa, the Hanuman Chalisa, the Kaali Chalisa, the Vishnu Chalisa, the Ram Chalisa, and the Tulsi Chalisa. You can also find specialized hymns like the Gayatri Chalisa, Santoshi Mata Chalisa, Brihaspati Chalisa, Sai Chalisa, Annapurna Chalisa, Baglamukhi Chalisa, Shri Adinath Chalisa, and the Vindhyeshwari Chalisa. For daily worship rituals, Aarti songs are essential. Key aartis available include the Maa Durga Aarti, Sai Baba Aarti, Saraswati Ji Ki Aarti, the Aarti Kunj Bihari Ki for Lord Krishna, Mata Kalratri Ki Aarti, Shri Surya Dev Aarti, Shri Jankinatha Ji Ki Aarti, and the Om Jai Mahavir Prabhu Aarti. Important Stotrams (hymns of praise) and prayers include the profound Vishnu Sahasranama Stotram (thousand names of Vishnu), the protective Ram Raksha Stotra, the powerful Mahishasura Mardini Stotram for Goddess Durga, the Kanakadhara Stotram, and the Santan Gopal Stotra. The Shri Ganpati Atharvashirsha is a key text for Lord Ganesha worship. For the devotion of Hanuman Ji, resources extend beyond the Chalisa to include lyrical hymns like Gauri Nandana Gajanana, Cham Cham Nache Dekho Veer Hanumana, and Veer Hanumana Ati Balwana. Audio formats are also available, such as Hanuman Chalisa Hindi Audio, Hanuman Chalisa MP3, and for download, Hanuman Chalisa MP3 Download.

खाटू श्याम चालीसा | Khatu Shyam Chalisa PDF and Lyrics 2026

खाटू श्याम चालीसा (Khatu Shyam Chalisa PDF) भगवान श्रीकृष्ण के कलियुगी अवतार, बर्बरीक (खाटू श्याम जी) को समर्पित एक अत्यंत प्रभावशाली स्तुति है। “हारे का सहारा” कहे जाने वाले बाबा श्याम की इस चालीसा का नियमित पाठ करने से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। नीचे हमने खाटू श्याम चालीसा के हिंदी और अंग्रेजी बोल, मुफ्त PDF डाउनलोड और पाठ करने के लाभों की विस्तृत जानकारी दी है।

खाटू श्याम चालीसा का पाठ करने से जीवन में सुख-समृद्धि, शांति और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। आइए, हम सभी श्रद्धापूर्वक खाटू श्याम जी की चालीसा का पाठ करें और उनकी असीम कृपा प्राप्त करें।

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|| खाटू श्याम चालीसा ||

॥ दोहा॥
श्री गुरु चरणन ध्यान धर,
सुमीर सच्चिदानंद ।
श्याम चालीसा भजत हूँ,
रच चौपाई छंद ।

॥ चौपाई ॥
श्याम-श्याम भजि बारंबारा ।
सहज ही हो भवसागर पारा ॥

इन सम देव न दूजा कोई ।
दिन दयालु न दाता होई ॥

भीम सुपुत्र अहिलावाती जाया ।
कही भीम का पौत्र कहलाया ॥

यह सब कथा कही कल्पांतर ।
तनिक न मानो इसमें अंतर ॥

बर्बरीक विष्णु अवतारा ।
भक्तन हेतु मनुज तन धारा ॥

बासुदेव देवकी प्यारे ।
जसुमति मैया नंद दुलारे ॥

मधुसूदन गोपाल मुरारी ।
वृजकिशोर गोवर्धन धारी ॥

सियाराम श्री हरि गोबिंदा ।
दिनपाल श्री बाल मुकुंदा ॥

दामोदर रण छोड़ बिहारी ।
नाथ द्वारिकाधीश खरारी ॥

राधाबल्लभ रुक्मणि कंता ।
गोपी बल्लभ कंस हनंता ॥ 10

मनमोहन चित चोर कहाए ।
माखन चोरि-चारि कर खाए ॥

मुरलीधर यदुपति घनश्यामा ।
कृष्ण पतित पावन अभिरामा ॥

मायापति लक्ष्मीपति ईशा ।
पुरुषोत्तम केशव जगदीशा ॥

विश्वपति जय भुवन पसारा ।
दीनबंधु भक्तन रखवारा ॥

प्रभु का भेद न कोई पाया ।
शेष महेश थके मुनिराया ॥

नारद शारद ऋषि योगिंदरर ।
श्याम-श्याम सब रटत निरंतर ॥

कवि कोदी करी कनन गिनंता ।
नाम अपार अथाह अनंता ॥

हर सृष्टी हर सुग में भाई ।
ये अवतार भक्त सुखदाई ॥

ह्रदय माहि करि देखु विचारा ।
श्याम भजे तो हो निस्तारा ॥

कौर पढ़ावत गणिका तारी ।
भीलनी की भक्ति बलिहारी ॥ 20

सती अहिल्या गौतम नारी ।
भई श्रापवश शिला दुलारी ॥

श्याम चरण रज चित लाई ।
पहुंची पति लोक में जाही ॥

अजामिल अरु सदन कसाई ।
नाम प्रताप परम गति पाई ॥

जाके श्याम नाम अधारा ।
सुख लहहि दुःख दूर हो सारा ॥

श्याम सलोवन है अति सुंदर ।
मोर मुकुट सिर तन पीतांबर ॥

गले बैजंती माल सुहाई ।
छवि अनूप भक्तन मान भाई ॥

श्याम-श्याम सुमिरहु दिन-राती ।
श्याम दुपहरि कर परभाती ॥

श्याम सारथी जिस रथ के ।
रोड़े दूर होए उस पथ के ॥

श्याम भक्त न कही पर हारा ।
भीर परि तब श्याम पुकारा ॥

रसना श्याम नाम रस पी ले ।
जी ले श्याम नाम के ही ले ॥ 30

संसारी सुख भोग मिलेगा ।
अंत श्याम सुख योग मिलेगा ॥

श्याम प्रभु हैं तन के काले ।
मन के गोरे भोले-भाले ॥

श्याम संत भक्तन हितकारी ।
रोग-दोष अध नाशे भारी ॥

प्रेम सहित जब नाम पुकारा ।
भक्त लगत श्याम को प्यारा ॥

खाटू में हैं मथुरावासी ।
पारब्रह्म पूर्ण अविनाशी ॥

सुधा तान भरि मुरली बजाई ।
चहु दिशि जहां सुनी पाई ॥

वृद्ध-बाल जेते नारि नर ।
मुग्ध भये सुनि बंशी स्वर ॥

हड़बड़ कर सब पहुंचे जाई ।
खाटू में जहां श्याम कन्हाई ॥

जिसने श्याम स्वरूप निहारा ।
भव भय से पाया छुटकारा ॥

॥ दोहा ॥
श्याम सलोने संवारे,
बर्बरीक तनुधार ।
इच्छा पूर्ण भक्त की,
करो न लाओ बार


॥ इति श्री खाटू श्याम चालीसा ॥


Khatu Shyam Chalisa (खाटू श्याम चालीसा) 2026

|| Khatu Shyam Chalisa PDF ||

॥ Doha ॥
shree guru charan dhyaan dhar,
sumeer sachchidaanand ॥
shyaam chaaleesa bhajat hoon,
raach chaupaee chhand ॥

॥ Chaupaee ॥
shyaam-shyaam bhajee baarambaara ॥
sahaj hee ho bhavasaagar paara ॥

in sam dev na dooja koee ॥
din dayaalu na daata hoee ॥

bheem suputr ahilavatee jay ॥
kahi bheem ka putr kahalaaya ॥

yah sab katha kahee kalpaantar ॥
tanik na maano isamen antar ॥

harabeek vishnu avataar ॥
bhaktan vikaas manuj tan dhaara ॥

baasudev devakee priy ॥
jasumati maiya nand dulaare ॥

madhusoodan gopaal muraaree ॥
vrjakishor govardhan dhaaree ॥

siyaaraam shree hari govinda ॥
dinapaal shree baal mukund ॥

daamodar ran ne bihaaree ko chhod diya ॥
naath dvaarika kharee ॥

raadhaakrshn rukmanee kaanta ॥
gopee varsh kans hananta ॥ 10 ॥

manamohan chit chor kahae ॥
maakhan choree-chaaree kar ॥

muraleedhar yadupatia ॥
krshn patit paavan abhiraama ॥

maayaapati lakshmeepati eesha ॥
sarvottam keshav jagadeesha ॥

vishvapati jay bhuvan pasaara ॥
deenabandhu bhaktan rakhavaara ॥

prabhu ka bhed na paaya ॥
shesh mahesh thake muniraaya ॥

naarad sharad rshi yogindar ॥
shyaam-shyaam sab ratat nirantar ॥

kavi kodi karee kannan ginanta ॥
naam apaar athaah ananta ॥

har srshti har sug mein bhaee ॥
ye avataar bhakt sukhadaee ॥

hari maahi kari dekhu vichaara ॥
shyaam bhaje to ho nistaara ॥

kaur paavat ganika taaree ॥
bheelanee kee bhakti balihaaree ॥20 ॥

satee ahilya gautam naaree ॥
bhee shraapavash shila dulaaree ॥

shyaam charan raj chit lai ॥
avalokan pati lok mein jaahee ॥

ajaamil aru sadan kasaee ॥
naam prataap param gati paee ॥

jaake shyaam naam adhaara ॥
sukh lahahi duhkh door ho saara ॥

shyaam salovan ati sundar hai ॥
mor mukut sir tan peetaambar ॥

gale bajantee maal suhaee ॥
chhavi anupam bhaktan man bhaee ॥

shyaam-shyaam sumirahu din-rati ॥
shyaam dupaharee kar prabhaatee ॥

shyaam saarathee jis rath ke ॥
rode door hoe us path ke ॥

shyaam bhakt na kahi par haara ॥
phir bhee paree tab shyaam pukaara ॥

rasana shyaam naam ras pee le ॥
jee le shyaam naam ke hee le ॥ 30 ॥

sansaaree sukh bhog milega ॥
ant shyaam sukh yog milega ॥

shyaam prabhu hain tan ke kaale ॥
man ke gore bhole-bhaale ॥

shyaam sant bhaktan hitakaaree ॥
rog-dosh adh naashe bhaaree ॥

prem jab naam sahit pukaara ॥
bhakt lagat shyaam ko pyaara ॥

khaatoo mein hain mathuraavaasee ॥
paarabrahm poorn agyaanee ॥

sudha taan bhaaree muralee bajaee ॥
chahu dishi jahaan seeta paee ॥

vrddh-baal jete naaree nar ॥
mugdha bhaye suni banshee svar ॥

hadab kar poore amerika mein ॥
khaatoo mein jahaan shyaam kanhaee ॥

jo shyaam svaroop nihaara ॥
bhav bhay se dhoondha ॥

॥ Doha ॥
shyaam salone saanvare,
harbik tanudhaar ॥
ichchha poorn bhakt kee,
karo na lao baar

॥ iti shree khaatoo shyaam chaaleesa ॥


हारे के सहारे की महिमा का अनुभव करें! यह पारंपरिक Khatu Shyam Chalisa MP3 बाबा श्याम के दिव्य गुणों और उनकी असीम कृपा का सुंदर वर्णन है। प्रतिदिन सुबह इस अमृतवाणी को सुनने से न केवल मन को अपार शांति मिलती है, बल्कि जीवन में सकारात्मकता और समृद्धि का संचार होता है। अपनी आध्यात्मिक यात्रा को शक्ति देने के लिए Khatu Shyam Chalisa MP3 Download करें और श्याम भक्ति के आनंद में सराबोर हो जाएं।


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श्री खाटू श्याम जी की पूजा विधि अत्यंत सरल और भक्तिमय होती है। खाटू श्याम जी को भगवान श्रीकृष्ण का अवतार माना जाता है, और इन्हें प्रेम, भक्ति और श्रद्धा से पूजा जाता है। आइए, उनकी पूजा विधि को विस्तार से समझें:

1. शुद्धिकरण (Purification):

पूजा की शुरुआत शुद्धिकरण से होती है, जो मानसिक और शारीरिक पवित्रता को सुनिश्चित करता है। भक्त को सबसे पहले अपने हाथ-पैर धोने चाहिए और स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। पूजा स्थल की सफाई भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसे गंगाजल से पवित्र किया जाता है। शुद्धिकरण का उद्देश्य यह है कि हम अपने मन, शरीर और वातावरण को पवित्र बनाकर भगवान के सामने उपस्थित हों।

जब हमारा मन और शरीर शुद्ध होता है, तो हम भगवान के प्रति अपनी भक्ति और समर्पण को और भी गहराई से व्यक्त कर सकते हैं। यह प्रक्रिया हमें अज्ञान और पापों से मुक्त करके आत्मिक शांति प्रदान करती है। शुद्धिकरण के बाद ही हम पूजा की अन्य विधियों को पूरे मनोयोग से संपन्न कर पाते हैं, जिससे भगवान की कृपा प्राप्त होती है।

2. पूजा सामग्री (Pooja Materials):

पूजा सामग्री का चयन और तैयारी पूजा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो भक्ति और समर्पण को प्रकट करता है। श्री खाटू श्याम जी की पूजा के लिए विशेष सामग्री की आवश्यकता होती है, जैसे प्रतिमा या तस्वीर, सफेद वस्त्र, चंदन, रोली, पुष्प, धूप, दीप, पंचामृत, तुलसी पत्ता, और प्रसाद। इन सामग्रियों का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व होता है।

उदाहरण के लिए, सफेद वस्त्र श्याम बाबा को विशेष प्रिय होता है और पंचामृत का उपयोग भगवान को स्नान कराने के लिए किया जाता है। हर सामग्री का चयन इस ध्यान से किया जाता है कि वह भगवान के प्रति हमारी भक्ति और श्रद्धा को प्रकट कर सके। यह सामग्री न केवल पूजा की शुद्धता और पवित्रता को बढ़ाती है, बल्कि भगवान के प्रति हमारी आस्था और समर्पण को भी दर्शाती है।

3. आसन ग्रहण करें (Take a Seat):

पूजा करते समय आसन ग्रहण करना बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसे शुद्धता और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। भक्त को साफ और पवित्र आसन पर बैठना चाहिए, जो कि आमतौर पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होता है। दिशा का चयन धार्मिक मान्यताओं के आधार पर किया जाता है, जो भगवान के प्रति भक्त की एकाग्रता और समर्पण को बढ़ाता है।

आसन ग्रहण करने का उद्देश्य यह है कि पूजा के दौरान मन और शरीर स्थिर रहे, जिससे ध्यान में कोई विघ्न न आए। आसन पर बैठकर पूजा करने से भगवान के प्रति हमारे श्रद्धा और भक्ति का संचार होता है, जिससे हमें उनकी कृपा प्राप्त होती है। यह आसन भक्त और भगवान के बीच एक पुल की तरह कार्य करता है, जो हमें भगवान के निकट लाता है।

4. दीप प्रज्वलित करें (Light the Lamp):

दीप प्रज्वलन पूजा का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो अज्ञान के अंधकार को दूर करने और ज्ञान के प्रकाश को फैलाने का प्रतीक है। दीपक का प्रकाश भगवान के प्रति हमारी श्रद्धा और भक्ति को प्रकट करता है। पूजा प्रारंभ करते समय सबसे पहले दीपक जलाया जाता है, जिसे भगवान के समक्ष समर्पित किया जाता है।

यह दीपक भगवान की दिव्य उपस्थिति का प्रतीक है और हमें अपने जीवन में मार्गदर्शन प्राप्त करने में मदद करता है। दीपक जलाने का अर्थ है कि हम अपने मन और आत्मा को भगवान के चरणों में समर्पित कर रहे हैं, ताकि हमारे जीवन में ज्ञान और पवित्रता का प्रकाश फैले। दीप प्रज्वलन के माध्यम से हम भगवान से प्रार्थना करते हैं कि वे हमारे जीवन में सदैव मार्गदर्शक बनकर रहें।

5. आचमन (Achman):

आचमन पूजा की शुरुआत में की जाने वाली एक पवित्र क्रिया है, जिसमें तीन बार जल ग्रहण कर उसे पीया जाता है। इसका उद्देश्य हमारे शरीर और मन को पवित्र करना है, ताकि हम भगवान की पूजा शुद्धता और श्रद्धा के साथ कर सकें। आचमन करते समय मंत्रों का उच्चारण भी किया जाता है, जिससे इस क्रिया की पवित्रता और भी बढ़ जाती है।

यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जो हमें मानसिक और शारीरिक शुद्धि की अनुभूति कराती है, जिससे हम भगवान के समक्ष पवित्र और स्वच्छ होकर उपस्थित होते हैं। आचमन का धार्मिक महत्व भी है, क्योंकि इसे आत्मा और शरीर के शुद्धिकरण का प्रतीक माना जाता है। आचमन के बाद ही पूजा की अन्य विधियों को संपन्न किया जाता है, जिससे भगवान की कृपा प्राप्त होती है।

6. संकल्प (Sankalp):

संकल्प पूजा का एक महत्वपूर्ण चरण है, जिसमें भक्त पूजा की विधि को पूर्ण करने का संकल्प लेता है। यह क्रिया पूजा की दिशा और उद्देश्य को निर्धारित करती है। संकल्प करते समय, भक्त अपने हाथ में चावल, फूल, और जल लेकर भगवान से प्रार्थना करता है कि वह उनकी पूजा को स्वीकार करें और अपनी कृपा प्रदान करें।

संकल्प का उद्देश्य यह है कि पूजा की हर क्रिया भगवान के प्रति समर्पित हो और भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए ईश्वर से आशीर्वाद प्राप्त करे। संकल्प करने से पूजा में एकाग्रता और श्रद्धा बनी रहती है, जिससे भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह चरण हमें भगवान के प्रति अपने समर्पण और भक्ति को प्रकट करने का अवसर देता है।

7. ध्यान (Meditation):

ध्यान पूजा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण चरण है, जिसमें भक्त अपने मन और आत्मा को भगवान के प्रति समर्पित करता है। ध्यान के माध्यम से भक्त भगवान की छवि को अपने मन में बसाता है और उनसे आत्मिक संबंध स्थापित करता है। यह क्रिया मानसिक शांति और आत्मिक शुद्धि प्रदान करती है, जिससे भक्त अपने जीवन में भगवान की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त कर सकता है।

ध्यान के समय भगवान के नाम का स्मरण और मंत्रों का उच्चारण किया जाता है, जो ध्यान को और भी प्रभावी बनाता है। ध्यान के माध्यम से हम भगवान की उपस्थिति का अनुभव कर सकते हैं और उनसे अपने जीवन के मार्गदर्शन के लिए प्रार्थना कर सकते हैं। यह चरण हमें भगवान के साथ आत्मिक स्तर पर जोड़ता है।

8. आवाहन (Invocation):

आवाहन पूजा की एक महत्वपूर्ण विधि है, जिसमें भक्त भगवान को अपनी पूजा में उपस्थित होने का निमंत्रण देता है। यह क्रिया भगवान की कृपा प्राप्त करने और उनकी उपस्थिति का अनुभव करने के लिए की जाती है। आवाहन के समय “ॐ खाटू श्यामाय नमः” का उच्चारण करते हुए भगवान का आह्वान किया जाता है।

यह मंत्र भगवान को हमारी पूजा में साक्षी बनने के लिए आमंत्रित करता है और उनकी कृपा प्राप्त करने का माध्यम बनता है। आवाहन का उद्देश्य यह है कि भगवान हमारे समक्ष उपस्थित होकर हमारी पूजा को स्वीकार करें और हमें आशीर्वाद प्रदान करें। यह विधि भगवान और भक्त के बीच एक आत्मिक संबंध स्थापित करती है, जिससे भगवान की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है।

9. अभिषेक (Abhishek):

अभिषेक पूजा का एक प्रमुख अंग है, जिसमें भगवान को पंचामृत और गंगाजल से स्नान कराया जाता है। पंचामृत, जो दूध, दही, घी, शहद, और शक्कर से बना होता है, का उपयोग भगवान को शुद्धता और पवित्रता का अनुभव कराने के लिए किया जाता है। अभिषेक के बाद गंगाजल से भगवान को स्नान कराकर उन्हें पवित्र किया जाता है।

इस क्रिया का उद्देश्य भगवान की पूजा को शुद्ध और पवित्र बनाना है, जिससे उनकी कृपा प्राप्त हो सके। अभिषेक के दौरान भक्त भगवान के प्रति अपनी भक्ति और समर्पण को प्रकट करता है, जिससे भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह विधि भक्त के मन और आत्मा को भगवान के प्रति समर्पित करती है।

10. वस्त्र और आभूषण (Clothing and Ornaments):

भगवान खाटू श्याम जी की पूजा में उन्हें वस्त्र और आभूषण अर्पित करना भक्त के समर्पण और श्रद्धा का प्रतीक है। सफेद वस्त्र और माला अर्पित करना श्याम बाबा को विशेष प्रिय है, क्योंकि यह रंग उनकी शांति और करुणा का प्रतीक माना जाता है। आभूषणों का अर्पण भगवान की दिव्यता और भव्यता को प्रकट करता है।

यह विधि भगवान को सजाने और उन्हें सम्मानित करने का माध्यम है, जिससे भक्त उनकी कृपा और आशीर्वाद प्राप्त कर सकता है। वस्त्र और आभूषण अर्पित करने का उद्देश्य भगवान को प्रसन्न करना और उनकी दिव्य उपस्थिति का अनुभव करना है। यह क्रिया भगवान के प्रति हमारी भक्ति और समर्पण को और भी गहरा बनाती है।

11. चंदन और रोली (Sandalwood and Vermillion):

चंदन और रोली का तिलक भगवान को अर्पित करना पूजा की एक महत्वपूर्ण विधि है, जो शुद्धता, भक्ति और श्रद्धा का प्रतीक है। तिलक लगाने से भगवान के प्रति भक्त की आस्था और समर्पण प्रकट होता है। चंदन की सुगंध और ठंडक भगवान को प्रसन्न करती है और उन्हें शांति का अनुभव कराती है, जबकि रोली का तिलक भक्त और भगवान के बीच के पवित्र संबंध को दर्शाता है।

यह क्रिया भगवान के प्रति हमारी भक्ति और श्रद्धा को और भी मजबूत बनाती है, जिससे हमें उनकी कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है। तिलक लगाने का उद्देश्य भगवान को सम्मानित करना और उनकी दिव्यता का अनुभव करना है।

12. पुष्प अर्पण (Offering Flowers):

पुष्प अर्पण भगवान के प्रति हमारी भक्ति और समर्पण को प्रकट करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। भगवान खाटू श्याम जी को सफेद, पीले और लाल फूल विशेष प्रिय हैं, जिन्हें अर्पित करके हम उनकी कृपा प्राप्त कर सकते हैं। फूलों की माला और पुष्पों का अर्पण भगवान के चरणों में श्रद्धा और प्रेम के साथ किया जाता है, जो भगवान को प्रसन्न करता है।

पुष्पों का सुगंधित और पवित्र वातावरण भगवान की उपस्थिति को और भी दिव्य बना देता है। यह क्रिया भक्त के मन की पवित्रता और भगवान के प्रति उसकी श्रद्धा को प्रकट करती है, जिससे भगवान की कृपा प्राप्त होती है। पुष्प अर्पण का उद्देश्य भगवान को प्रसन्न करना और उनकी दिव्यता का अनुभव करना है।

13. धूप और दीप (Incense and Lamp):

धूप और दीप भगवान की पूजा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो भक्त के मन और आत्मा को शुद्ध करने और भगवान के प्रति उसकी श्रद्धा को प्रकट करने का माध्यम हैं। धूप जलाने से वातावरण पवित्र होता है और भगवान की उपस्थिति को महसूस किया जा सकता है। दीपक का प्रकाश अज्ञान के अंधकार को दूर करता है और ज्ञान का प्रकाश फैलाता है।

धूप और दीप की सुगंध और प्रकाश भगवान के प्रति हमारी आस्था और समर्पण को बढ़ाते हैं। यह विधि भगवान को सम्मानित करने और उनकी कृपा प्राप्त करने का माध्यम है। धूप और दीप की पूजा के माध्यम से हम भगवान से अपने जीवन में शांति, समृद्धि, और सुख की प्रार्थना करते हैं।

14. प्रसाद अर्पण (Offering Prasad):

प्रसाद अर्पण भगवान के प्रति भक्ति और श्रद्धा का प्रतीक है, जिसे पूजा के बाद भक्तों के बीच बांटा जाता है। भगवान खाटू श्याम जी को विशेष रूप से गुड़ और चूरमा का भोग अर्पित किया जाता है, जो उन्हें प्रिय है। प्रसाद का अर्पण भगवान के प्रति हमारी समर्पण और भक्ति को प्रकट करता है।

प्रसाद में भगवान की कृपा होती है, जिसे ग्रहण करने से भक्त को आशीर्वाद और सुख की प्राप्ति होती है। यह विधि भगवान के प्रति हमारी आस्था और श्रद्धा को और भी मजबूत बनाती है। प्रसाद अर्पण का उद्देश्य भगवान को प्रसन्न करना और उनकी कृपा प्राप्त करना है, जिससे हमारा जीवन सुखमय और समृद्ध बन सके।

15. आरती (Aarti):

आरती पूजा का एक महत्वपूर्ण और हृदयस्पर्शी भाग है, जिसमें दीपक जलाकर भगवान की स्तुति की जाती है। श्री खाटू श्याम जी की आरती “ॐ जय श्री श्याम हरे” जैसे मंत्रों के साथ की जाती है। आरती के समय घंटी बजाना और शंख की ध्वनि करना वातावरण को और भी पवित्र बनाता है।

आरती के माध्यम से हम भगवान से अपने जीवन के हर क्षेत्र में मार्गदर्शन और कृपा की प्रार्थना करते हैं। यह विधि भगवान के प्रति हमारी श्रद्धा और समर्पण को प्रकट करती है और हमें उनकी उपस्थिति का अनुभव कराती है। आरती के समय भक्तगण भी भगवान की स्तुति में शामिल होते हैं, जिससे सामूहिक भक्ति का अनुभव होता है।

16. प्रदक्षिणा (Circumambulation):

प्रदक्षिणा भगवान की प्रतिमा या मंदिर की परिक्रमा करने की एक पवित्र विधि है, जिसे आरती के बाद किया जाता है। इस क्रिया का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है, जो भगवान के प्रति भक्त की श्रद्धा और समर्पण को दर्शाता है। प्रदक्षिणा करते समय भगवान के मंत्रों का उच्चारण किया जाता है और भक्तगण तीन बार परिक्रमा करते हैं।

यह क्रिया भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण और उनकी कृपा प्राप्त करने का प्रतीक है। प्रदक्षिणा से भक्त को आत्मिक शांति, समृद्धि, और भगवान की कृपा प्राप्त होती है। यह विधि भगवान और भक्त के बीच एक पवित्र संबंध स्थापित करती है और भक्त को भगवान के निकट लाती है।

17. प्रार्थना और भजन (Prayer and Bhajan):

प्रार्थना और भजन भगवान के प्रति अपनी भक्ति और श्रद्धा को प्रकट करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। पूजा के दौरान भक्तगण भगवान से अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं और श्याम बाबा के भजनों का गायन करते हैं। भजनों के माध्यम से भक्त अपनी भक्ति को प्रकट करता है और भगवान के साथ आत्मिक संबंध स्थापित करता है। प्रार्थना और भजन के समय भगवान के प्रति हमारी आस्था और समर्पण और भी मजबूत हो जाती है।

यह विधि भक्त को आत्मिक शांति, समृद्धि, और भगवान की कृपा प्राप्त करने में सहायक होती है। प्रार्थना और भजन के माध्यम से भगवान के साथ जुड़ने का अनुभव प्राप्त होता है।

18. श्री श्याम चालीसा का पाठ (Shri Shyam Chalisa):

श्याम बाबा की चालीसा का पाठ पूजा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो भक्त को भगवान के प्रति समर्पण और श्रद्धा का अनुभव कराता है। चालीसा का पाठ भगवान की महिमा और उनकी लीलाओं का वर्णन करता है, जिससे भक्त को आत्मिक शांति और भगवान की कृपा प्राप्त होती है। यह विधि भगवान के प्रति हमारी आस्था और समर्पण को और भी गहरा बनाती है।

श्याम चालीसा का पाठ भक्त को भगवान के साथ आत्मिक संबंध स्थापित करने में सहायक होता है और उनके जीवन में मार्गदर्शन प्रदान करता है। चालीसा का पाठ भगवान के प्रति हमारी श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है, जिससे हमें उनकी कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है।

19. प्रसाद वितरण (Distribution of Prasad):

प्रसाद वितरण पूजा का एक महत्वपूर्ण भाग है, जिसमें भगवान को अर्पित प्रसाद भक्तों में बांटा जाता है। प्रसाद को ग्रहण करने से भक्त को भगवान की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह विधि भगवान के प्रति हमारी श्रद्धा और समर्पण को प्रकट करती है और भक्तों के बीच प्रसाद बांटकर सामूहिक भक्ति का अनुभव प्राप्त होता है। प्रसाद वितरण का उद्देश्य भगवान की कृपा को सभी भक्तों तक पहुंचाना है, जिससे उनका जीवन सुखमय और समृद्ध बन सके। यह क्रिया भक्त के मन में भगवान के प्रति आस्था और श्रद्धा को और भी मजबूत बनाती है।

20. शांतिपाठ (Shantipath):

शांतिपाठ पूजा के अंत में किया जाता है, जिसमें “ॐ शांति: शांति: शांति:” का उच्चारण करके भगवान से संसार में शांति, समृद्धि, और सुख की प्रार्थना की जाती है। यह विधि पूजा के समापन का प्रतीक है और भगवान के प्रति हमारी कृतज्ञता को प्रकट करती है। शांतिपाठ के माध्यम से हम भगवान से अपने जीवन में शांति, समृद्धि, और सुख की कामना करते हैं। यह क्रिया भगवान के प्रति हमारे समर्पण और भक्ति को प्रकट करती है और हमें उनके आशीर्वाद और कृपा की प्राप्ति कराती है। शांतिपाठ का उद्देश्य भगवान से अपने जीवन और संसार में शांति और समृद्धि की प्राप्ति करना है।

21. विसर्जन (Immersion):

पूजा के अंत में भगवान की प्रतिमा या तस्वीर का विसर्जन किया जाता है, जिसमें भगवान को प्रणाम करके उनसे अपने जीवन में सदा बने रहने की प्रार्थना की जाती है। विसर्जन का अर्थ है कि भगवान को पूजा में बुलाने के बाद अब उन्हें विदा किया जा रहा है, लेकिन उनके आशीर्वाद और कृपा की कामना की जाती है कि वे हमेशा हमारे जीवन में मार्गदर्शन करते रहें। यह क्रिया भगवान के प्रति हमारी आस्था और श्रद्धा को प्रकट करती है और हमें आत्मिक शांति और समर्पण का अनुभव कराती है। विसर्जन के समय भगवान को प्रणाम करके उनकी कृपा और आशीर्वाद की कामना की जाती है।

22. नम्रता और कृतज्ञता (Humility and Gratitude):

पूजा समाप्त होने पर भगवान का धन्यवाद करें। भगवान से मिले आशीर्वाद के लिए कृतज्ञता व्यक्त करें और जीवन में उनका मार्गदर्शन स्वीकार करें।

इस प्रकार, श्री खाटू श्याम जी की पूजा विधि पूर्ण होती है। इस पूजा के द्वारा भक्तगण अपने जीवन में सुख, शांति, और समृद्धि प्राप्त करते हैं। श्याम बाबा की कृपा से सारे कष्ट दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

श्याम बाबा को सच्चे दिल से याद करने पर वे हर भक्त की पुकार सुनते हैं और उन्हें अपनी कृपा से नवाजते हैं। उनकी पूजा में सबसे महत्वपूर्ण है श्रद्धा, विश्वास और समर्पण।



खाटू श्याम चालीसा के लाभ

1. आध्यात्मिक शांति और मानसिक स्थिरता

खाटू श्याम चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को आध्यात्मिक शांति मिलती है। इसका नियमित पाठ मानसिक तनाव और चिंता को कम करता है। जब व्यक्ति अपने दिन की शुरुआत श्याम बाबा की आराधना से करता है, तो उसे मानसिक शांति और स्थिरता प्राप्त होती है, जिससे दिनभर की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति मिलती है।

2. धार्मिक विश्वास और आस्था में वृद्धि

खाटू श्याम चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के धार्मिक विश्वास और आस्था में वृद्धि होती है। यह चालीसा भगवान श्याम की महिमा का गुणगान करती है, जिससे भक्त का भगवान के प्रति विश्वास मजबूत होता है। आस्था के इस बढ़ावे से व्यक्ति को अपने जीवन की कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति मिलती है।

3. स्वास्थ्य लाभ

आध्यात्मिक और मानसिक शांति के साथ-साथ खाटू श्याम चालीसा का पाठ स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है। नियमित पाठ से व्यक्ति का मानसिक संतुलन बना रहता है, जिससे तनाव संबंधित बीमारियों का जोखिम कम होता है। इसके अलावा, ध्यान और पूजा से शारीरिक स्वास्थ्य भी सुधरता है।

4. समृद्धि और सुख-शांति

खाटू श्याम चालीसा का पाठ घर में समृद्धि और सुख-शांति लाता है। जब घर के सदस्य नियमित रूप से इस चालीसा का पाठ करते हैं, तो परिवार में आपसी प्रेम और समझ बढ़ती है। भगवान श्याम की कृपा से आर्थिक समस्याओं का समाधान होता है और परिवार में खुशहाली बनी रहती है।

5. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

चालीसा का पाठ करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह व्यक्ति को जीवन के हर पहलू में सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने में मदद करता है। सकारात्मक ऊर्जा से भरे व्यक्ति का आत्मविश्वास बढ़ता है और वह अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में अधिक सक्षम होता है।

6. बाधाओं का निवारण

खाटू श्याम चालीसा का पाठ जीवन की बाधाओं को दूर करने में सहायक होता है। भगवान श्याम की आराधना से व्यक्ति के जीवन में आने वाली समस्याओं और चुनौतियों का समाधान होता है। यह चालीसा भक्त को कठिन परिस्थितियों में साहस और धैर्य प्रदान करती है।

7. भय और अशांति से मुक्ति

इस चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को भय और अशांति से मुक्ति मिलती है। भगवान श्याम की कृपा से मन में व्याप्त सभी प्रकार के भय और अनिश्चितताएँ समाप्त होती हैं। इससे व्यक्ति का जीवन शांतिपूर्ण और सुरक्षित बनता है।

8. सकारात्मक विचारों का विकास

खाटू श्याम चालीसा का नियमित पाठ व्यक्ति के मन में सकारात्मक विचारों का विकास करता है। यह चालीसा व्यक्ति को नैतिक और आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनाती है, जिससे उसके विचारों में शुद्धता और सकारात्मकता आती है। सकारात्मक विचार व्यक्ति को सही निर्णय लेने में मदद करते हैं और उसे जीवन में सही दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।

9. कर्म की प्रेरणा

खाटू श्याम चालीसा का पाठ व्यक्ति को अच्छे कर्म करने की प्रेरणा देता है। यह चालीसा भगवान श्याम के महान कार्यों और उनकी दयालुता का वर्णन करती है, जिससे व्यक्ति को सही मार्ग पर चलने और परोपकार के कार्य करने की प्रेरणा मिलती है। इससे व्यक्ति के जीवन में पुण्य और सद्गुणों का संचार होता है।

10. ध्यान और एकाग्रता में वृद्धि

खाटू श्याम चालीसा का पाठ करने से ध्यान और एकाग्रता में वृद्धि होती है। इसका नियमित पाठ व्यक्ति को ध्यान और ध्यान केंद्रित करने में मदद करता है। इससे व्यक्ति के कार्यक्षमता में सुधार होता है और वह अपने कार्यों को अधिक कुशलता से संपन्न कर पाता है।

11. धार्मिक अनुष्ठानों में सहायता

खाटू श्याम चालीसा धार्मिक अनुष्ठानों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसका पाठ धार्मिक आयोजनों, पूजा-पाठ और त्योहारों के समय किया जाता है, जिससे अनुष्ठान का महत्त्व और बढ़ जाता है। इससे भगवान श्याम की कृपा प्राप्त होती है और अनुष्ठान सफलतापूर्वक संपन्न होते हैं।

12. भक्त और भगवान के बीच संबंध की प्रगाढ़ता

खाटू श्याम चालीसा का पाठ भक्त और भगवान के बीच संबंध को और प्रगाढ़ बनाता है। जब भक्त नियमित रूप से इस चालीसा का पाठ करता है, तो उसे भगवान श्याम के प्रति अधिक निकटता और प्रेम का अनुभव होता है। इससे भक्त का भगवान के साथ आध्यात्मिक संबंध मजबूत होता है।

13. सकारात्मक परिवेश का निर्माण

खाटू श्याम चालीसा का पाठ घर और आसपास के वातावरण को सकारात्मक बनाता है। जब व्यक्ति इस चालीसा का पाठ करता है, तो उसके आसपास की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इससे घर का माहौल सुखद और शांतिपूर्ण बना रहता है।

14. आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति

खाटू श्याम चालीसा का पाठ व्यक्ति को आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति में सहायक होता है। यह चालीसा भगवान श्याम की महिमा और उनके दिव्य गुणों का वर्णन करती है, जिससे व्यक्ति को आध्यात्मिक ज्ञान और समझ प्राप्त होती है। इससे व्यक्ति का जीवन में आध्यात्मिक दृष्टिकोण विकसित होता है।

15. जीवन में संतुलन

खाटू श्याम चालीसा का पाठ व्यक्ति को जीवन में संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। यह चालीसा व्यक्ति को अपने जीवन के हर पहलू में संतुलन और सामंजस्य स्थापित करने की प्रेरणा देती है। इससे व्यक्ति का जीवन सुखमय और संतुलित बनता है।

16. भावनात्मक स्थिरता

इस चालीसा का पाठ व्यक्ति को भावनात्मक स्थिरता प्रदान करता है। भगवान श्याम की आराधना से व्यक्ति के मन में स्थिरता और संतुलन आता है, जिससे वह अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रख पाता है। इससे व्यक्ति का मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य बेहतर होता है।

17. सकारात्मक दृष्टिकोण

खाटू श्याम चालीसा का पाठ व्यक्ति को जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देता है। यह चालीसा व्यक्ति को हर परिस्थिति में सकारात्मक सोचने और चुनौतियों का सामना करने की हिम्मत देती है। सकारात्मक दृष्टिकोण से व्यक्ति का आत्मविश्वास बढ़ता है और वह अपने जीवन के लक्ष्यों को आसानी से प्राप्त कर पाता है।

18. आध्यात्मिक मार्गदर्शन

खाटू श्याम चालीसा का पाठ व्यक्ति को आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त करने में मदद करता है। यह चालीसा व्यक्ति को सही और सच्चे मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। भगवान श्याम की कृपा से व्यक्ति को जीवन में सही निर्णय लेने और सही दिशा में आगे बढ़ने का मार्गदर्शन मिलता है।

19. सामाजिक संबंधों में सुधार

खाटू श्याम चालीसा का पाठ व्यक्ति के सामाजिक संबंधों में सुधार लाता है। जब व्यक्ति इस चालीसा का पाठ करता है, तो उसके मन में प्रेम, करुणा और सहानुभूति का विकास होता है, जिससे उसके सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं। इससे समाज में सामंजस्य और सद्भाव का वातावरण बनता है।

20. आध्यात्मिक साधना में सहायता

खाटू श्याम चालीसा का पाठ आध्यात्मिक साधना में भी सहायक होता है। इसका नियमित पाठ व्यक्ति को ध्यान, ध्यान केंद्रित करने और आध्यात्मिक साधना में मदद करता है। इससे व्यक्ति के साधना में प्रगति होती है और वह अपने आध्यात्मिक लक्ष्यों को प्राप्त कर पाता है।

खाटू श्याम चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं। यह चालीसा व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता, शांति और संतुलन लाने में सहायक होती है। खाटू श्याम की कृपा से व्यक्ति का जीवन सुखमय, स्वस्थ और संतुलित बनता है। इस चालीसा का नियमित पाठ व्यक्ति को भगवान के निकट लाता है और उसे आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।


1. खाटू श्याम का मंत्र कौन सा है?

खाटू श्याम बाबा का सबसे सरल और प्रभावशाली मंत्र “ॐ श्याम देवाय नमः” है। इसके अतिरिक्त, भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार “जय श्री श्याम”, “श्री श्याम शरणम ममः” और “हारे का सहारा, बाबा श्याम हमारा” का जाप भी निरंतर करते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से इन मंत्रों का उच्चारण करने से जीवन के सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है।

2. खाटू श्याम में मन्नत कैसे मांगें?

खाटू श्याम मंदिर में मन्नत मांगने की सबसे प्रचलित विधि बाबा के चरणों में ‘अर्जी’ लगाना है। भक्त एक पत्र (अर्जी) लिखकर बाबा को अपनी समस्या बताते हैं। इसके अलावा, कई श्रद्धालु मंदिर परिसर में नारियल के साथ कलावा (मौली) बांधकर भी अपनी मन्नत मांगते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात बाबा पर अटूट विश्वास रखना है, क्योंकि उन्हें ‘हारे का सहारा’ माना जाता है।

3. खाटू श्याम मंदिर की 13 सीढ़ियों का रहस्य क्या है?

मंदिर की इन 13 सीढ़ियों को बहुत पवित्र माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, ये महाभारत युद्ध के 13 दिनों या मनुष्य के जीवन के प्रमुख विकारों और भक्ति के सोपानों का प्रतीक हैं। कहा जाता है कि इन सीढ़ियों को श्रद्धापूर्वक चढ़ते समय ‘जय श्री श्याम’ का जाप करने से भक्त के अहंकार का नाश होता है और वह सीधे बाबा के दिव्य दर्शन के योग्य बनता है।

4. खाटू श्याम बाबा किसके पुत्र थे?

खाटू श्याम जी, जिन्हें महाभारत काल में बर्बरीक के नाम से जाना जाता था, पांडव पुत्र भीम के पौत्र और घटोत्कच व माता मौर्यवी (कामकटंकटा) के पुत्र थे। वे बचपन से ही बहुत शक्तिशाली थे और उन्होंने अपनी माता से ‘हारे हुए का साथ देने’ का संकल्प लिया था।

5. कलयुग में खाटू श्याम का क्या महत्व है?

भगवान श्री कृष्ण ने बर्बरीक के शीश दान से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया था कि कलयुग में वे उनके अपने नाम ‘श्याम’ से पूजे जाएंगे। आज के समय में उन्हें कलयुग का सबसे जाग्रत देव माना जाता है। वे उन लोगों के रक्षक हैं जिनका दुनिया में कोई सहारा नहीं होता, इसीलिए उन्हें ‘हारे का सहारा’ और ‘लखदातार’ कहा जाता है।

6. बर्बरीक के 3 तीरों की शक्ति क्या है?

बर्बरीक के पास भगवान शिव द्वारा दिए गए तीन विशेष तीर थे, जिनसे वे पूरा महाभारत युद्ध क्षण भर में समाप्त कर सकते थे। पहला तीर उन सभी चीजों को चिन्हित करता था जिन्हें नष्ट करना हो, दूसरा तीर उन चीजों को चिन्हित करता था जिन्हें बचाना हो, और तीसरा तीर केवल चिन्हित लक्ष्यों को पूरी तरह नष्ट कर वापस लौट आता था। इन तीन तीरों की शक्ति के सामने कोई भी सेना टिक नहीं सकती थी।

Nirvana Shatakam PDF Hindi: Lyrics Meaning and Benefits 2026

निर्वाण षटकम (Nirvana Shatakam PDF) भारतीय संत परंपरा में आदिगुरु शंकराचार्य का नाम विशेष महत्व रखता है। वे अद्वैत वेदांत के महान आचार्य और भारतीय दर्शन के प्रमुख स्तंभ थे। उनके द्वारा रचित अनेक ग्रंथ और श्लोक संकलन आज भी साधकों के लिए प्रेरणास्रोत बने हुए हैं। इन्हीं महान कृतियों में से एक है निर्वाण षटकम्, जिसे आत्मज्ञान की दिशा में एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक के रूप में देखा जाता है। यह श्लोक संग्रह केवल छह श्लोकों का एक संकलन है, लेकिन इसके गहन अर्थ और प्रभाव को समझने के लिए एक साधक को समर्पण और अभ्यास की आवश्यकता होती है। यहां से आप बजरंग बाण भी पढ़ सकते हैं

निर्वाण षटकम् का अर्थ ही “निर्वाण के लिए छह श्लोक” है। यहां “निर्वाण” का तात्पर्य उस अंतिम स्थिति से है, जिसमें आत्मा को संपूर्ण मुक्ति मिलती है। यह श्लोक हमें यह समझने में मदद करता है कि वास्तविकता क्या है और हम कौन हैं। इसमें आत्मा की शाश्वतता, अद्वितीयता, और उसकी साक्षात अनुभूति को बड़े ही सरल और प्रभावशाली शब्दों में व्यक्त किया गया है। आप हमारी वेबसाइट में शिव चालीसा, शिव आरती और Shiv Chalisa PDF भी पढ़ सकते हैं। Hanuman Chalisa MP3 Download

आदिगुरु शंकराचार्य का योगदान और निर्वाण षटकम् का महत्व

आदिगुरु शंकराचार्य ने भारतीय समाज में व्याप्त अज्ञानता, अंधविश्वास और भेदभाव को समाप्त करने के लिए अनेक प्रयास किए। उन्होंने अद्वैत वेदांत के सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार किया और यह बताया कि आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं है। निर्वाण षटकम् उन्हीं के विचारों का साकार रूप है, जिसमें आत्मा के सत्य स्वरूप का बोध कराया गया है। यह श्लोक साधक को अपने असली अस्तित्व को पहचानने और सांसारिक बंधनों से मुक्त होने का मार्ग दिखाता है।

निर्वाण षटकम् के प्रत्येक श्लोक में आत्मा की विशिष्टता और उसकी अनंतता का वर्णन किया गया है। शंकराचार्य ने इन श्लोकों में अपने जीवन के अनुभवों और आत्मसाक्षात्कार को समाहित किया है। उन्होंने बताया है कि आत्मा न तो शरीर है, न इंद्रियाँ, और न ही मन। यह शुद्ध चेतना का रूप है, जो जन्म और मृत्यु से परे है। यह श्लोक हमें यह समझाता है कि हमारी वास्तविक पहचान शरीर या मन नहीं है, बल्कि हम उस शाश्वत चेतना के अंश हैं जो नष्ट नहीं हो सकती।

निर्वाण षटकम् की विशेषता

निर्वाण षटकम् की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे साधक किसी भी समय, किसी भी अवस्था में पढ़ सकता है और इससे आत्मज्ञान की दिशा में प्रगति कर सकता है। इस श्लोक का नियमित पाठ करने से साधक के मन में शांति, स्थिरता और आत्मविश्वास का विकास होता है। यह श्लोक आत्मा की शाश्वतता और उसकी अजेयता को समझने में मदद करता है, जिससे साधक को सांसारिक दुखों से मुक्ति मिलती है।

निर्वाण षटकम् एक ऐसा श्लोक संग्रह है, जो केवल छह श्लोकों में आत्मा के ब्रह्म स्वरूप को प्रकट करता है। यह श्लोक हमें इस भौतिक संसार के पार जाकर आत्मा की वास्तविकता को समझने में मदद करता है। आदिगुरु शंकराचार्य ने इस श्लोक के माध्यम से यह बताया है कि आत्मा शुद्ध, अजर, अमर और अनंत है। इसका अध्ययन और जाप साधक को मानसिक और आत्मिक शांति प्रदान करता है और उसे मोक्ष की दिशा में अग्रसर करता है। निर्वाण षटकम् केवल एक श्लोक संग्रह नहीं, बल्कि एक साधना है, जो आत्मा को उसकी वास्तविकता से परिचित कराती है और उसे मुक्ति की ओर ले जाती है।

निर्वाण का अर्थ है “निराकार”।

निर्वाण षट्कम का संदर्भ इस बात से है कि – आप यह या वह नहीं बनना चाहते। यदि आप वास्तव में यह या वह नहीं बनना चाहते, तो फिर आप क्या बनना चाहते हैं? यह सवाल बहुत गहरा है और आपका मन इसे समझ नहीं सकता क्योंकि आपका मन हमेशा कुछ न कुछ बनना चाहता है, वह हमेशा किसी न किसी आकांक्षा या पहचान की ओर खिंचता है।

अगर मैं कहूं, “मैं यह नहीं बनना चाहता, मैं वह नहीं बनना चाहता,” तो आप सोच सकते हैं, “अरे, यह व्यक्ति तो किसी महान चीज़ के बारे में बात कर रहा है!” लेकिन ऐसा नहीं है, यह किसी महान चीज़ के बारे में नहीं है। फिर आप सोच सकते हैं, “अरे, तो क्या यह रिक्तता की बात हो रही है?” नहीं, यह रिक्तता की बात भी नहीं है। “क्या यह शून्यता की बात है?” नहीं, यह शून्यता की बात भी नहीं है।



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Nirvana Shatakam Lyrics Hindi

|| निर्वाण षटकम ||

मनोबुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहं
न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे ।
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 1 ।।

न च प्राणसंज्ञो न वै पंचवायुः,
न वा सप्तधातुः न वा पञ्चकोशः ।
न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायु,
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 2 ।।

न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ,
मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः ।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः,
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 3 ।।

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं,
न मन्त्रो न तीर्थो न वेदा न यज्ञ ।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता,
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 4 ।।

न मे मृत्युशंका न मे जातिभेदः,
पिता नैव मे नैव माता न जन्मः ।
न बन्धुर्न मित्रं गुरूर्नैव शिष्यः,
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 5 ।।

अहं निर्विकल्पो निराकार रूपो,
विभुत्वाच सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् ।
न चासङ्गतं नैव मुक्तिर्न मेयः,
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 6 ।।

|| Nirvana Shatakam Lyrics ||

Mano buddhi ahankara chittani naaham
Na cha shrotravjihve na cha ghraana netre
Na cha vyoma bhumir na tejo na vaayuhu
Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham

Na cha prana sangyo na vai pancha vayuhu
Na va sapta dhatur na va pancha koshah
Na vak pani-padam na chopastha payu
Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham

Na me dvesha ragau na me lobha mohau
Na me vai mado naiva matsarya bhavaha
Na dharmo na chartho na kamo na mokshaha
Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham

Na punyam na papam na saukhyam na duhkham
Na mantro na tirtham na veda na yajnah
Aham bhojanam naiva bhojyam na bhokta
Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham

Na me mrtyu shanka na mejati bhedaha
Pita naiva me naiva mataa na janmaha
Na bandhur na mitram gurur naiva shishyaha
Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham

Aham nirvikalpo nirakara rupo
Vibhut vatcha sarvatra sarvendriyanam
Na cha sangatham naiva muktir na meyaha
Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham


Nirvana Shatakam full lyrics with Chidananda Rupah Shivoham text
Image of Nirvana Shatakam lyrics composed by Adi Shankaracharya, featuring the famous “Chidananda Rupah Shivoham Shivoham” verses in Sanskrit for meditation and spiritual study.

मनोबुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहं
न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे ।
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 1 ।।


मैं मन का कोई भी अंग नहीं हूँ, जैसे बुद्धि, अहंकार या स्मृति,
मैं सुनने, चखने, सूंघने या देखने की इन्द्रियाँ नहीं हूँ, मैं न तो आकाश हूँ,
न पृथ्वी, न अग्नि, न वायु, मैं तो चेतना और आनन्द का स्वरूप हूँ, शिव हूँ 

Mano buddhi ahankara chittani naaham
Na cha shrotravjihve na cha ghraana netre
Na cha vyoma bhumir na tejo na vaayuhu
Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham


I am not any aspect of the mind like the intellect,
the ego or the memory,
I am not the organs of hearing, tasting, smelling or seeing,
I am not the space, nor the earth, nor fire, nor air,
I am the form of consciousness and bliss, am Shiva (that which is not)

न च प्राणसंज्ञो न वै पंचवायुः,
न वा सप्तधातुः न वा पञ्चकोशः ।
न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायु,
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 2 ।।


मैं प्राण नहीं हूँ, न ही पाँच प्राण वायु (प्राण की अभिव्यक्तियाँ) हूँ,
मैं सात आवश्यक तत्व नहीं हूँ, न ही शरीर के पाँच कोष हूँ,
मैं मुख, हाथ, पैर आदि शरीर के अंग भी नहीं हूँ,
मैं चेतना और आनन्द का स्वरूप हूँ, मैं शिव हूँ।

Na cha prana sangyo na vai pancha vayuhu
Na va sapta dhatur na va pancha koshah
Na vak pani-padam na chopastha payu
Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham


I am not the Vital Life Energy (Prana),
nor the Five Vital Airs (manifestations of Prana),
I am not the seven essential ingredients nor the 5 sheaths of the body,
I am not any of the body parts, like the mouth, the hands, the feet, etc.,
I am the form of consciousness and bliss, I am Shiva.

न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ,
मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः ।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः,
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 3 ।।


मुझमें न द्वेष है, न राग है, न लोभ है, न मोह है,
मुझमें न अभिमान है, न ईर्ष्या है, मैं अपने कर्तव्य,
धन, वासना या मोक्ष से तादात्म्य नहीं रखता,
मैं चैतन्य और आनंद का स्वरूप हूँ, मैं शिव हूँ।

Na me dvesha ragau na me lobha mohau
Na me vai mado naiva matsarya bhavaha
Na dharmo na chartho na kamo na mokshaha
Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham


There is no hatred nor passion in me, no greed nor delusion,
There is no pride, nor jealousy in me,
I am not identified with my duty, wealth, lust or liberation,
I am the form of consciousness and bliss, I am Shiva.

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं,
न मन्त्रो न तीर्थो न वेदा न यज्ञ ।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता,
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 4 ।।


मैं न पुण्य हूँ, न पाप, न सुख हूँ, न दुःख, मुझे न मंत्रों की आवश्यकता है,
न तीर्थ, न शास्त्रों की, न अनुष्ठानों की, मैं अनुभव नहीं हूँ, अनुभव की वस्तु नहीं हूँ,
यहाँ तक कि अनुभव करने वाला भी नहीं हूँ, मैं चेतना और आनंद का स्वरूप हूँ, मैं शिव हूँ।

Na punyam na papam na saukhyam na duhkham
Na mantro na tirtham na veda na yajnah
Aham bhojanam naiva bhojyam na bhokta
Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham


I am not virtue nor vice, not pleasure or pain,
I need no mantras, no pilgrimage, no scriptures or rituals,
I am not the experience, not the object of experience,
not even the one who experiences,
I am the form of consciousness and bliss, I am Shiva.

न मे मृत्युशंका न मे जातिभेदः,
पिता नैव मे नैव माता न जन्मः ।
न बन्धुर्न मित्रं गुरूर्नैव शिष्यः,
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 5 ।।


मैं मृत्यु और उसके भय से बंधा नहीं हूँ, न जाति या पंथ से,
मेरा न कोई पिता है, न माता है, न जन्म है,
न मैं कोई सगा हूँ, न मित्र, न गुरु हूँ, न शिष्य,
मैं चैतन्य और आनंद का स्वरूप हूँ, शिव हूँ।

Na me mrtyu shanka na mejati bhedaha
Pita naiva me naiva mataa na janmaha
Na bandhur na mitram gurur naiva shishyaha
Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham


I am not bound by death and its fear, not by caste or creed,
I have no father, nor mother, or even birth,
I am not a relative, nor a friend, nor a teacher nor a student,
I am the form of consciousness and bliss, am Shiva.

अहं निर्विकल्पो निराकार रूपो,
विभुत्वाच सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् ।
न चासङ्गतं नैव मुक्तिर्न मेयः,
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 6 ।।


मैं द्वैत से रहित हूँ, मेरा स्वरूप निराकार है, मैं सर्वव्यापी हूँ,
मैं सर्वत्र विद्यमान हूँ, सभी इन्द्रियों में व्याप्त हूँ, मैं न आसक्त हूँ,
न मुक्त हूँ, न सीमित हूँ, मैं चेतना और आनंद का स्वरूप हूँ, मैं शिव हूँ।

Aham nirvikalpo nirakara rupo
Vibhut vatcha sarvatra sarvendriyanam
Na cha sangatham naiva muktir na meyaha
Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham


I am devoid of duality, my form is formlessness,
I am omnipresent, I exist everywhere, pervading all senses,
I am neither attached, neither free nor limited,
I am the form of consciousness and bliss, I am Shiva.


निर्वाण षटकम् आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा रचित एक दिव्य श्लोक संग्रह है, जो आत्मज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह छह श्लोकों का संकलन है, जिसमें आत्मा की शाश्वतता और अद्वितीयता का गूढ़ बोध कराया गया है। इसका नियमित पाठ और अभ्यास साधक को कई महत्वपूर्ण लाभ प्रदान कर सकता है। यहां हम निर्वाण षटकम् के प्रमुख लाभों पर चर्चा करेंगे, जो आपके आत्मिक और मानसिक जीवन को परिवर्तित कर सकते हैं।

आत्मबोध की प्राप्ति

निर्वाण षटकम् का सबसे महत्वपूर्ण लाभ आत्मबोध की प्राप्ति है। यह श्लोक संग्रह साधक को उसके असली स्वरूप की पहचान कराता है। शंकराचार्य के शब्दों में, आत्मा न तो शरीर है, न मन, और न ही इंद्रियाँ। यह शुद्ध चेतना का रूप है जो अजर और अमर है। नियमित रूप से इस श्लोक का पाठ करने से साधक अपने वास्तविक स्वरूप को समझता है और इस पृथ्वी पर भौतिक अस्तित्व से परे जाता है। यह आत्मबोध उसे संसार के तात्कालिक सुख-दुख से परे ले जाता है।

मानसिक शांति और स्थिरता

निर्वाण षटकम् का जाप मानसिक शांति और स्थिरता प्राप्त करने में अत्यंत सहायक है। आज के समय में तनाव और चिंताओं का सामना करने के लिए मन को शांत और स्थिर रखना आवश्यक है। यह श्लोक मानसिक अशांति को दूर करता है और एक स्थिर, शांत मन की स्थिति प्रदान करता है। जब व्यक्ति अपने असली स्वरूप की पहचान कर लेता है, तो बाहरी परिस्थितियों का उसके मन पर प्रभाव कम हो जाता है। इससे वह मानसिक शांति और संतुलन को प्राप्त करता है।

आध्यात्मिक प्रगति और मोक्ष की प्राप्ति

निर्वाण षटकम् का नियमित अभ्यास साधक को आध्यात्मिक प्रगति की दिशा में अग्रसर करता है। यह श्लोक आत्मा की शाश्वतता और अद्वितीयता की सच्चाई को उजागर करता है, जिससे साधक के जीवन में आध्यात्मिक जागरूकता का विकास होता है। जब व्यक्ति अपने आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जान लेता है, तो वह मोक्ष की प्राप्ति की ओर कदम बढ़ाता है। मोक्ष वह स्थिति है जिसमें आत्मा जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाती है और शाश्वत शांति प्राप्त करती है।

आत्मविश्वास और आंतरिक शक्ति

निर्वाण षटकम् का अध्ययन और जाप साधक में आत्मविश्वास और आंतरिक शक्ति का विकास करता है। जब व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप और शक्ति को पहचानता है, तो वह बाहरी चुनौतियों का सामना अधिक साहस और आत्मविश्वास के साथ कर सकता है। यह श्लोक आत्मा की असीम शक्ति और ऊर्जा को उजागर करता है, जिससे व्यक्ति अपने जीवन में अधिक सशक्त और प्रेरित महसूस करता है।

सांसारिक बंधनों से मुक्ति

निर्वाण षटकम् साधक को सांसारिक बंधनों से मुक्त करने में सहायक है। जब व्यक्ति अपने आत्मा की शाश्वतता को समझता है, तो वह सांसारिक संपत्ति, सुख, और दुखों से परे देखना शुरू कर देता है। यह श्लोक साधक को यह सिखाता है कि वह इन भौतिक बंधनों से मुक्त होकर एक अधिक वास्तविक और आध्यात्मिक जीवन जी सकता है।

निर्वाण षटकम् एक अद्वितीय और शक्तिशाली श्लोक संग्रह है, जो आत्मज्ञान, मानसिक शांति, आध्यात्मिक प्रगति, आत्मविश्वास, और सांसारिक बंधनों से मुक्ति के लिए एक अमूल्य साधन है। इसके नियमित जाप और अध्ययन से साधक को जीवन के गहरे रहस्यों को समझने और मोक्ष की दिशा में अग्रसर होने में सहायता मिलती है। यह श्लोक संग्रह जीवन की जटिलताओं को सरलता और स्पष्टता के साथ समझाने में सक्षम है, और इसे अपनाने से जीवन में सच्चे सुख और शांति की प्राप्ति होती है।


Why is Nirvana Shatkam So Important?

निर्वाण षटकम का महत्व क्यों है?

निर्वाण षटकम, जिसे आत्म षटकम् भी कहा जाता है, महान संत आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यह छः श्लोकों का संग्रह आत्मा (आत्मन) की वास्तविकता और ब्रह्मा (परमात्मा) के साथ उसकी एकता को स्पष्ट करता है। यह ग्रंथ अद्वैत वेदांत के दार्शनिक सिद्धांतों को संक्षेप में प्रस्तुत करता है और आत्मा के शाश्वत स्वरूप की पहचान में सहायक होता है। इसके महत्व को समझने के लिए, हमें इसके दार्शनिक, आध्यात्मिक, और व्यावहारिक पहलुओं पर ध्यान देना होगा।

दार्शनिक महत्व

निर्वाण षटकम दार्शनिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह अद्वैत वेदांत के सिद्धांतों को संक्षेप में प्रस्तुत करता है। अद्वैत वेदांत एक ऐसा दर्शन है जो आत्मा और ब्रह्मा के बीच किसी भी भेद को नकारता है और दोनों को एक ही वास्तविकता मानता है। निर्वाण षटकम में आदि शंकराचार्य आत्मा के शाश्वत और अपरिवर्तनशील स्वरूप की पुष्टि करते हैं। श्लोकों में मन, बुद्धि, अहंकार, और इन्द्रियों के परे आत्मा की स्थिति को स्पष्ट किया गया है, जिससे यह सिद्ध होता है कि आत्मा भौतिक तत्वों और मानसिक अवस्थाओं से परे है। यह दार्शनिकता जीवन के तात्त्विक प्रश्नों के उत्तर देने में सहायक होती है और आत्मा की वास्तविकता को समझने में गहराई प्रदान करती है।

आध्यात्मिक महत्व

आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, निर्वाण षटकम आत्मा की वास्तविकता की पहचान की ओर एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक है। यह श्लोक साधक को अपने अंदर के वास्तविक स्वभाव की पहचान करने के लिए प्रेरित करते हैं। ये श्लोक मन, बुद्धि, और इन्द्रियों से परे आत्मा की शाश्वतता को व्यक्त करते हैं और ध्यान केंद्रित करने के लिए एक माध्यम प्रदान करते हैं। आत्मा की पहचान करने से साधक भौतिक संसार की माया और भ्रम से मुक्त हो सकता है। निर्वाण षटकम साधक को आत्मा की शाश्वतता, पवित्रता, और पूर्णता की अनुभूति कराने में सहायक होता है, जो आध्यात्मिक उत्थान और आत्मज्ञान की ओर एक कदम बढ़ने में मदद करता है।

व्यावहारिक महत्व

निर्वाण षटकम के व्यावहारिक महत्व को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। इस ग्रंथ की शिक्षाएँ जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रभाव डालती हैं और व्यक्ति को अपने जीवन में शांति और संतोष प्राप्त करने में सहायता करती हैं। यह ग्रंथ आत्मा की शाश्वतता और भौतिक संसार की अस्थिरता को समझने में मदद करता है, जिससे व्यक्ति अपने जीवन में वास्तविक सुख और शांति की खोज में सक्षम हो सकता है। निरvana षटकम् का अध्ययन करने से व्यक्ति को आत्मा की गहराई को समझने और उसकी वास्तविकता को पहचानने में सहायता मिलती है, जिससे वह अपनी जीवन की दिशा और उद्देश्य को स्पष्ट रूप से समझ सकता है।


When to Chant Nirvana Shatakam PDF

निर्वाण षटकम (Nirvana Shatakam) का जाप कब करें?

निर्वाण षटकम, जिसे आत्म षटकम् भी कहा जाता है, महान संत आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक दिव्य ग्रंथ है जो आत्मा की शाश्वतता और ब्रह्मा के साथ उसकी अद्वितीयता को स्पष्ट करता है। इस ग्रंथ के छः श्लोक आत्मा के वास्तविक स्वरूप को प्रकट करते हैं और आध्यात्मिक साधना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि, निर्वाण षटकम का जाप करने का सही समय और स्थिति जानना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। आइए जानते हैं कि निर्वाण षटकम का जाप कब और कैसे किया जाना चाहिए।

प्रातः काल (सुबह) के समय

साधना की शुरुआत प्रातः काल से करना सबसे शुभ माना जाता है। सुबह का समय शांति और ताजगी का होता है, जो ध्यान और जाप के लिए आदर्श है। निर्वाण षटकम का जाप प्रातः काल में करने से मन की स्थिति शांत रहती है और आत्मा के वास्तविक स्वरूप की पहचान में सहायता मिलती है। इस समय वातावरण भी स्वच्छ और शांत होता है, जिससे साधना की प्रभावशीलता बढ़ जाती है।

ध्यान और साधना के समय

यदि आप ध्यान और साधना की नियमित दिनचर्या में हैं, तो निर्वाण षटकम का जाप आपके ध्यान सत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है। ध्यान करने से पहले निर्वाण षटकम का जाप करने से मन को स्थिरता मिलती है और ध्यान में गहराई आती है। यह जाप आपकी साधना को एक नई दिशा और ऊर्जा प्रदान करता है, जिससे आत्मा की शाश्वतता की अनुभूति में सहायक होता है।

संकट या मानसिक तनाव के समय

जब आप मानसिक तनाव, चिंता, या जीवन में किसी संकट का सामना कर रहे हों, तब निर्वाण षटकम का जाप विशेष रूप से लाभकारी होता है। यह ग्रंथ आत्मा के शाश्वत स्वरूप की पहचान कराता है और भौतिक समस्याओं से परे देखने की दृष्टि प्रदान करता है। जाप के दौरान आत्मा की शाश्वतता की याद दिलाने से मानसिक शांति और स्थिरता प्राप्त होती है, जो संकट या तनाव को कम करने में मदद कर सकती है।

विशेष धार्मिक अवसरों और त्योहारों पर

धार्मिक अवसरों और त्योहारों पर निर्वाण षटकम का जाप करना भी शुभ माना जाता है। विशेष धार्मिक अवसरों पर जाप करने से आत्मा की शाश्वतता की भावना को और भी मजबूत किया जा सकता है। यह अवसर आपके आत्मिक विकास और आध्यात्मिक उन्नति के लिए एक विशेष अवसर प्रदान करता है।

उपासना और साधना के अंत में

यदि आप कोई विशेष उपासना या साधना कर रहे हैं, तो उसके अंत में निर्वाण षटकम का जाप करना अत्यंत लाभकारी होता है। साधना के अंत में यह जाप आपके प्रयासों की पूर्ति और आत्मा की शाश्वतता की साक्षात्कार में सहायता करता है। यह अंत में एक दिव्य संपूर्णता और संतोष प्रदान करता है।

संध्या काल (शाम) के समय

संध्या काल भी जाप के लिए एक आदर्श समय होता है, जब दिन की हलचल समाप्त हो चुकी होती है और रात की शांति शुरू होती है। इस समय निर्वाण षटकम का जाप करने से मन की स्थिति शांत रहती है और आत्मा की शाश्वतता की अनुभूति होती है। यह समय आपके दिन भर की ऊर्जा को शांत करने और आध्यात्मिक उन्नति के लिए उपयुक्त होता है।


What is the Nirvana Shatakam Mantra?

निर्वाण षटकम मंत्र क्या है?

निर्वाण षटकम (Nirvana Shatakam), जिसे अथर्वशीर्ष और शिव नंदन के नाम से भी जाना जाता है, एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कृत ग्रंथ है जो अद्वैत वेदांत के सिद्धांतों को प्रकट करता है। यह श्लोकों का संग्रह शंकराचार्य द्वारा लिखा गया माना जाता है और इसमें छः प्रमुख श्लोक होते हैं। ये श्लोक आत्मा की वास्तविकता और उसके ब्रह्मा के साथ एकत्व की बात करते हैं।

निर्वाण षटकम में, शंकराचार्य ने आत्मा (आत्मन) की शाश्वतता, निराकारता, और अज्ञेयता को उजागर किया है। इन श्लोकों में आत्मा के तत्व को दर्शाते हुए कहा गया है कि आत्मा न तो जन्म लेती है, न ही मरती है, बल्कि यह सदा के लिए शाश्वत और अपरिवर्तनीय है। इसके अलावा, आत्मा को सभी भौतिक वस्तुओं, भावनाओं और मन की गतिविधियों से परे दिखाया गया है। यह स्पष्ट करता है कि आत्मा और ब्रह्मा (सर्वव्यापक शक्ति) एक ही हैं और इसलिए किसी भी भौतिक परिवर्तन का आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

मंत्र में आत्मा की पहचान की जाती है कि वह न तो किसी वस्त्र के रूप में है, न किसी ध्वनि के रूप में, न किसी इंद्रिय के रूप में, और न ही किसी मन के रूप में। इसके माध्यम से, साधकों को यह सिखाया जाता है कि आत्मा की असली पहचान स्वयं के भीतर है, और उसे बाहरी वस्त्रों या व्यक्तित्व से नहीं जोड़ा जा सकता। यह आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझने के लिए ध्यान और साधना की आवश्यकता पर बल देता है।

यह मंत्र आत्मज्ञान की खोज में एक महत्वपूर्ण साधन है और इसे अक्सर ध्यान और साधना के दौरान पढ़ा जाता है। यह आत्मा के अद्वितीयता और उसकी निराकारता को समझने के लिए एक गहरा दार्शनिक दृष्टिकोण प्रदान करता है, जो साधकों को आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानने में मदद करता है।


What is the Story Behind Nirvana Shatakam?

निर्वाण षटकम के पीछे की कहानी क्या है?

निर्वाण षटकम का निर्माण और इसके पीछे की कहानी एक दिलचस्प और प्रेरणादायक है। यह ग्रंथ भारतीय दर्शन और अद्वैत वेदांत के एक प्रमुख आचार्य शंकराचार्य द्वारा लिखा गया माना जाता है। शंकराचार्य का जीवन और उनके दर्शन ने भारतीय धार्मिक और दार्शनिक विचारधारा पर गहरा प्रभाव डाला।

कहानी के अनुसार, शंकराचार्य ने ध्यान और साधना के माध्यम से अद्वितीयता के अनुभव को प्राप्त किया। उन्होंने देखा कि आत्मा का वास्तविक स्वरूप सदा के लिए अपरिवर्तनीय और शाश्वत है, और यह सभी भौतिक और मानसिक अंशों से परे है। इस अद्वितीय अनुभव को साझा करने और अन्य साधकों को आत्मज्ञान की ओर मार्गदर्शन देने के लिए, शंकराचार्य ने निर्वाण षटकम लिखा।

इन श्लोकों में शंकराचार्य ने आत्मा के तत्व की गहराई से विश्लेषण किया और दर्शाया कि आत्मा न तो किसी वस्त्र के रूप में है, न किसी ध्वनि के रूप में, और न ही किसी इंद्रिय के रूप में। यह स्पष्ट करता है कि आत्मा का वास्तविक स्वरूप उन सभी भौतिक और मानसिक वस्तुओं से परे है, जो अक्सर हमारी पहचान का हिस्सा होती हैं।

शंकराचार्य का यह ग्रंथ साधकों को आत्मा की शाश्वतता और उसकी अद्वितीयता को समझने में मदद करता है। उन्होंने यह भी दिखाया कि मोक्ष प्राप्ति के लिए आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जानना आवश्यक है, और यह केवल ध्यान और साधना के माध्यम से ही संभव है।

निर्वाण षटकम का अध्ययन और पाठ साधकों को आत्मा के गहन अनुभव की ओर प्रेरित करता है और यह आत्मा के अद्वितीयता और शाश्वतता को स्पष्ट करता है। इस प्रकार, यह ग्रंथ न केवल धार्मिक या दार्शनिक महत्व रखता है, बल्कि यह साधना और ध्यान के माध्यम से आत्मज्ञान प्राप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक भी है।


  • हिन्दी अर्थ
  • English Meaning

मनोबुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहं
न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे ।
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 1 ।।

अर्थ (Meaning):
मैं न तो मन हूं, न बुद्धि, न अहंकार, न ही चित्त हूं |
मैं न तो कान हूं, न जीभ, न नासिका, न ही नेत्र हूं |
मैं न तो आकाश हूं, न धरती, न अग्नि, न ही वायु हूं |
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।

न च प्राणसंज्ञो न वै पंचवायुः,
न वा सप्तधातुः न वा पञ्चकोशः ।
न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायु,
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 2 ।।

अर्थ (Meaning):
मैं न प्राण हूं, न ही पंच वायु हूं |
मैं न सात धातु हूं, और न ही पांच कोश हूं |
मैं न वाणी हूं, न हाथ हूं, न पैर, न ही उत्‍सर्जन की इन्द्रियां हूं |
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।

न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ,
मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः ।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः,
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 3 ।।

अर्थ (Meaning):
न मुझे घृणा है, न लगाव है, न मुझे लोभ है, और न मोह |
न मुझे अभिमान है, न ईर्ष्या |
मैं धर्म, धन, काम एवं मोक्ष से परे हूं |
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं,
न मन्त्रो न तीर्थो न वेदा न यज्ञ ।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता,
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 4 ।।

अर्थ (Meaning):
मैं पुण्य, पाप, सुख और दुख से विलग हूं |
मैं न मंत्र हूं, न तीर्थ, न ज्ञान, न ही यज्ञ |
न मैं भोजन(भोगने की वस्‍तु) हूं, न ही भोग का अनुभव, और न ही भोक्ता हूं |
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।

न मे मृत्युशंका न मे जातिभेदः,
पिता नैव मे नैव माता न जन्मः ।
न बन्धुर्न मित्रं गुरूर्नैव शिष्यः,
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 5 ।।

अर्थ (Meaning):
न मुझे मृत्यु का डर है, न जाति का भेदभाव |
मेरा न कोई पिता है, न माता, न ही मैं कभी जन्मा था मेरा न कोई भाई है, न मित्र, न गुरू, न शिष्य, |
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।

अहं निर्विकल्पो निराकार रूपो,
विभुत्वाच सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् ।
न चासङ्गतं नैव मुक्तिर्न मेयः,
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 6 ।।

अर्थ (Meaning):
मैं निर्विकल्प हूं, निराकार हूं |
मैं चैतन्‍य के रूप में सब जगह व्‍याप्‍त हूं, सभी इन्द्रियों में हूं |
न मुझे किसी चीज में आसक्ति है, न ही मैं उससे मुक्त हूं |
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि‍, अनंत शिव हूं |

Mano buddhi ahankara chittani naaham
Na cha shrotravjihve na cha ghraana netre
Na cha vyoma bhumir na tejo na vaayuhu
Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham

I am not any aspect of the mind like the intellect, the ego or the memory,
I am not the organs of hearing, tasting, smelling or seeing,
I am not the space, nor the earth, nor fire, nor air,
I am the form of consciousness and bliss, am Shiva (that which is not)…

Na cha prana sangyo na vai pancha vayuhu
Na va sapta dhatur na va pancha koshah
Na vak pani-padam na chopastha payu
Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham

I am not the Vital Life Energy (Prana), nor the Five Vital Airs (manifestations of Prana),
I am not the seven essential ingredients nor the 5 sheaths of the body,
I am not any of the body parts, like the mouth, the hands, the feet, etc.,
I am the form of consciousness and bliss, I am Shiva (that which is not)…

Na me dvesha ragau na me lobha mohau
Na me vai mado naiva matsarya bhavaha
Na dharmo na chartho na kamo na mokshaha
Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham

There is no hatred nor passion in me, no greed nor delusion,
There is no pride, nor jealousy in me,
I am not identified with my duty, wealth, lust or liberation,
I am the form of consciousness and bliss, I am Shiva (that which is not)…

Na punyam na papam na saukhyam na duhkham
Na mantro na tirtham na veda na yajnah
Aham bhojanam naiva bhojyam na bhokta
Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham

I am not virtue nor vice, not pleasure or pain,
I need no mantras, no pilgrimage, no scriptures or rituals,
I am not the experience, not the object of experience, not even the one who experiences,
I am the form of consciousness and bliss, I am Shiva (that which is not)….

Na me mrtyu shanka na mejati bhedaha
Pita naiva me naiva mataa na janmaha
Na bandhur na mitram gurur naiva shishyaha
Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham

I am not bound by death and its fear, not by caste or creed,
I have no father, nor mother, or even birth,
I am not a relative, nor a friend, nor a teacher nor a student,
I am the form of consciousness and bliss, am Shiva (that which is not)…

Aham nirvikalpo nirakara rupo
Vibhut vatcha sarvatra sarvendriyanam
Na cha sangatham naiva muktir na meyaha
Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham

I am devoid of duality, my form is formlessness,
I am omnipresent, I exist everywhere, pervading all senses,
I am neither attached, neither free nor limited,
I am the form of consciousness and bliss, I am Shiva (that which is not)


1. निर्वाण षटकम (Nirvana Shatakam) का जप करने से क्या होता है?

निर्वाण षटकम का जप करने से साधक को कई लाभ मिलते हैं। यह श्लोक आत्मा की शाश्वतता और अद्वितीयता का बोध कराता है, जिससे व्यक्ति अपने असली स्वरूप को पहचानता है। इसके नियमित जाप से मानसिक शांति, स्थिरता, और आंतरिक शक्ति का विकास होता है। यह साधक को सांसारिक बंधनों से मुक्त करता है और आध्यात्मिक प्रगति की दिशा में अग्रसर करता है। इसके अलावा, यह आत्मज्ञान प्राप्त करने और मोक्ष की प्राप्ति में सहायक होता है।

2. क्या मैं निर्वाण षटकम (Nirvana Shatakam) का ध्यान कर सकता हूं?

हाँ, आप निर्वाण षटकम का ध्यान कर सकते हैं। ध्यान करते समय, श्लोक के अर्थ और भावनाओं को ध्यान में रखते हुए मन को शांत और एकाग्र करना महत्वपूर्ण है। निर्वाण षटकम का ध्यान करने से आत्मा की शाश्वतता और अद्वितीयता की समझ में वृद्धि होती है और यह मानसिक शांति और आध्यात्मिक जागरूकता को बढ़ावा देता है। ध्यान के दौरान, आप श्लोक के शब्दों और उनके अर्थ को अपने मन में गहराई से अनुभव कर सकते हैं।

3. निर्वाण षटकम (Nirvana Shatakam) किसने दिया था?

निर्वाण षटकम को आदिगुरु शंकराचार्य ने रचा था। आदिगुरु शंकराचार्य अद्वैत वेदांत के महान आचार्य थे और भारतीय दर्शन में उनका महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने इस श्लोक संग्रह के माध्यम से आत्मा की शाश्वतता और अद्वितीयता को उजागर किया। उनके द्वारा रचित यह श्लोक संग्रह साधकों को आत्मज्ञान प्राप्त करने और मोक्ष की दिशा में अग्रसर होने में मदद करता है।

4. शक्तिशाली स्तोत्रम कौन सा है?

शक्तिशाली स्तोत्रम का चयन व्यक्ति की आध्यात्मिक आवश्यकताओं और रुचियों पर निर्भर करता है। हालांकि, शिव स्तोत्रम और हनुमान चालीसा को शक्तिशाली स्तोत्रों में माना जाता है। ये स्तोत्र साधक को मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करते हैं और जीवन में कठिनाइयों का सामना करने में मदद करते हैं। इन स्तोत्रों के पाठ से आत्मशक्ति, सुरक्षा, और प्रेरणा प्राप्त होती है।

5. मंत्र में सबसे पवित्र ध्वनि कौन सी है?

मंत्रों में सबसे पवित्र ध्वनि “ॐ” (ओं) मानी जाती है। यह ध्वनि ब्रह्मा, विष्णु, और महेश्वर (शिव) के अद्वितीय रूप की प्रतीक है और इसे सृष्टि के सबसे मूल और पवित्र ध्वनि के रूप में देखा जाता है। “ॐ” की ध्वनि सभी ध्वनियों की उत्पत्ति और समापन का संकेत है और यह आध्यात्मिक जागरूकता और शांति प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है।

Shudh Hanuman Chalisa PDF in Hindi – श्री हनुमान चालीसा हिंदी पाठ |Download Lyrics 2026

श्री हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa PDF) का अपना एक विशेष महत्व है। यह चालीसा गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित है और इसमें भगवान हनुमान जी के महिमा का विस्तृत वर्णन किया गया है। हनुमान जी को शक्ति, भक्ति और साहस के प्रतीक माना जाता है। उनकी भक्ति से न केवल संकटों का निवारण होता है बल्कि आत्मिक बल और मानसिक शांति भी प्राप्त होती है। आप हमारी वेबसाइट में संकट मोचन हनुमान अष्टक | हनुमान बाहुक और दुर्गा आरती भी पढ़ सकते हैं।

श्री हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa PDF) के पाठ से जीवन में अद्भुत परिवर्तन आ सकते हैं। यह चालीसा 40 चौपाइयों का एक संग्रह है, जिसमें हनुमान जी के जन्म, उनकी अद्भुत शक्तियों, भगवान राम के प्रति उनकी अटूट भक्ति, और उनके द्वारा किए गए महान कार्यों का वर्णन किया गया है। यहां से आप बजरंग बाण भी पढ़ सकते हैं| हनुमान चालीसा पढ़ने के 21 चमत्कारिक फायदे | Shiv Chalisa PDF

हनुमान जी की आराधना से सभी प्रकार के भय, संकट, और नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है। यह चालीसा न केवल संकटों का निवारण करती है, बल्कि जीवन में साहस, आत्मविश्वास और विजय की प्राप्ति भी कराती है। हनुमान चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति को मानसिक शांति, शारीरिक बल और आध्यात्मिक संतोष की प्राप्ति होती है। हनुमान जी के आशीर्वाद से सभी बाधाएं दूर होती हैं और व्यक्ति को सुख, शांति, और समृद्धि की प्राप्ति होती है। श्री नारायण कवच | वीर हनुमाना अति बलवाना भजन लिरिक्स | Shri Sai Chalisa Lyrics PDF | Hanuman Chalisa MP3 Download

Hanuman Chalisa Pdf in Hindi

श्री हनुमान चालीसा हिंदू धर्म के सबसे लोकप्रिय और पवित्र स्तोत्रों में से एक है। इसकी रचना महाकवि तुलसीदास जी ने १६वीं शताब्दी में अवधी भाषा में की थी। ऐसी मान्यता है कि तुलसीदास जी ने यह चालीसा तब लिखी जब वह चित्रकूट में रामभक्ति का प्रचार कर रहे थे। इसमें ४० चौपाइयाँ (इसलिए ‘चालीसा’) और दो दोहे हैं, जो हनुमान जी की महिमा, शक्ति और भगवान राम के प्रति उनकी अटूट भक्ति का वर्णन करते हैं।

हनुमान चालीसा का धार्मिक महत्व अतुलनीय है। इसे केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली मंत्र-विज्ञान माना जाता है। भक्तों का विश्वास है कि नियमित और श्रद्धापूर्वक पाठ करने से जीवन की सभी बाधाएँ दूर होती हैं, नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है, और आत्मविश्वास व साहस की प्राप्ति होती है। यह मन को शांति और एकाग्रता प्रदान करती है।

सांस्कृतिक महत्व की बात करें, तो यह चालीसा भारतीय जन-मानस में अद्भुत रूप से रची-बसी है। लाखों परिवारों में यह नित्य पाठ का हिस्सा है। इसे संकटों से रक्षा, साहस की प्रेरणा और भक्ति के सरल मार्ग के रूप में देखा जाता है। तुलसीदास जी ने इसे इतने सरल और मधुर शब्दों में रचा है कि यह सामान्य जन से लेकर विद्वानों तक सभी की आराधना बन गई है।

निष्कर्षतः, हनुमान चालीसा केवल कागज़ पर शब्द नहीं, बल्कि भक्ति, शक्ति और विजय का एक जीवंत प्रतीक है, जो सदियों से करोड़ों लोगों को आध्यात्मिक सहारा और मार्गदर्शन प्रदान कर रही है।


शुद्ध हनुमान चालीसा PDF इन हिंदी भक्तों के लिए एक अत्यंत उपयोगी और विश्वसनीय माध्यम है, जिसके द्वारा वे तुलसीदास जी द्वारा रचित मूल हनुमान चालीसा को बिना किसी त्रुटि के पढ़ और पाठ कर सकते हैं। शुद्ध पाठ होने से उच्चारण सही रहता है, जिससे पाठ का आध्यात्मिक प्रभाव बढ़ता है। हिंदी में उपलब्ध PDF स्वरूप मोबाइल, टैबलेट और कंप्यूटर पर आसानी से पढ़ा जा सकता है, जिससे नित्य पाठ, मंगलवार-शनिवार के व्रत या विशेष पूजा में सुविधा मिलती है।

आज के डिजिटल युग में shudh hanuman chalisa pdf in hindi में होने से भक्त कहीं भी और कभी भी इसका पाठ कर सकते हैं। PDF फॉर्मेट में स्पष्ट अक्षर, सुव्यवस्थित चौपाइयाँ और दोहा होने से पढ़ने में सरलता रहती है। जो लोग सही, प्रमाणिक और त्रुटिरहित हनुमान चालीसा की खोज में हैं, उनके लिए यह PDF भक्ति, श्रद्धा और विश्वास के साथ नियमित पाठ करने का सर्वोत्तम साधन है।

श्री हनुमान चालीसा का पाठ करने से पहले और उसके दौरान कुछ साधारण लेकिन महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखा जाए, तो इसका पुण्य और लाभ अनेक गुना बढ़ जाता है। यहां कुछ विशेष सुझाव दिए जा रहे हैं:

१. शुद्धता और श्रद्धा: पाठ करने से पहह हाथ-मुंह धोकर, स्वच्छ वस्त्र धारण करें और यदि संभव हो तो स्नान कर लें। मन में श्री हनुमान जी के प्रति गहरी श्रद्धा और एकाग्र भाव रखें। बिना श्रद्धा के मात्र जाप करने का पूरा लाभ नहीं मिल पाता।

२. नियमितता और समय: पाठ का सबसे बड़ा रहस्य नियमितता है। प्रतिदिन एक निश्चित समय पर, खासतौर पर ब्रह्ममुहूर्त (सुबह ४-६ बजे) या सूर्यास्त के समय पाठ करना अत्यंत फलदायी माना गया है। नियम बनाकर पढ़ें।

३. उच्चारण और भाव: हिंदी/अवधी के शब्दों का सही और स्पष्ट उच्चारण करने का प्रयास करें। जल्दबाजी में गलत उच्चारण न करें। प्रत्येक चौपाई का अर्थ समझते हुए और हनुमान जी की छवि मन में रखकर पाठ करें। भाव सबसे महत्वपूर्ण है।

४. पवित्र स्थान: एक शांत और स्वच्छ कोना निश्चित करें, जहाँ आपको विघ्न न हो। यदि संभव हो तो हनुमान जी की एक मूर्ति या चित्र के सामने बैठकर पाठ करें। दीपक और अगरबत्ती जलाने से वातावरण शुद्ध होता है।

५. संख्या और संकल्प: एक माला (१०८ बार) या न्यूनतम १ बार पूरी चालीसा का नियम बनाएं। पाठ शुरू करने से पहले मन ही मन अपना संकल्प बोल लें, जैसे – “हे प्रभु, यह पाठ आपकी भक्ति और कृपा पाने के लिए।”

६. पाठ के बाद: पाठ पूरा करने के बाद कुछ देर शांत बैठकर हनुमान जी का ध्यान करें और अपनी इच्छा मन में रखें। प्रसाद के रूप में मीठा फल या बूंदी का भोग लगाएं और बाद में स्वयं ग्रहण करें।

याद रखें, नियम, श्रद्धा और भावना ही भक्ति का मूल है। श्री हनुमान जी सरल हृदय से की गई भक्ति से शीघ्र प्रसन्न होते हैं और सभी संकटों से रक्षा करते हैं।

जय श्री राम! संकट मोचन हनुमान जी की जय!


Word (in Context)Roman TransliterationMeaning & ExplanationWhy It’s Difficult
चरन सरोज रज (दोहा)charan saroj rajThe dust from the lotus feet (of the guru). A deeply reverential compound metaphor.Poetic, compound phrase; uses symbolic language (raj = dust, saroj = lotus).
बुद्धिहीन तनु जानिके (दोहा)buddhiheen tanu jaanikeKnowing this body to be devoid of wisdom/intellect.Archaic grammar: jaanike (knowing) is an old form; tanu (body) is a Sanskrit tatsam word.
पवन-कुमार (दोहा)pavan-kumarSon of the wind god (Pavan). An epithet for Hanuman.Cultural/religious epithet; requires knowledge of mythology.
अतुलित बल धामा (चौपाई 1)atulit bal dhamaaThe abode of incomparable strength.Atulit = incomparable (Sanskrit); dhama = abode/seat (archaic sense).
बजरंगी (चौपाई 2)bajrangiOne with a body as strong as a thunderbolt (vajra).Compound word (bajra + angi); descriptive title, not common vocabulary.
कुंचित केसा (चौपाई 4)kunchit kesaCurly hair.Kunchit = curled (Sanskrit); kesa = hair (archaic/poetic).
जनेउ (चौपाई 5)janeuThe sacred thread worn by Brahmins.Cultural-specific term; refers to a specific article of religious significance.
मुद्रिका (चौपाई 19)mudrikaRing (specifically, Lord Rama’s signet ring).Can mean “ring,” “seal,” or “symbol”; here, it’s a key story element.

Other Common Difficulties in the Text

  • Archaic Grammar & Pronouns: Words like मोहिं (mohi = to me), तुम्हरो (tumharo = yours), and कीह्ना (keenha = did) use old grammatical forms not common in modern Hindi.
  • Pronunciation Challenges: Words with conjunct consonants (like विक्रम vikramश्रद्धा shraddha) or anusvara ( ) can be tricky. The rhythm of the Chaupai (meter) is key to correct recitation.
  • Cultural & Mythological References: The text is filled with names (e.g., अंजनिकेसरीसुग्रीवबिभीषण), places (लंक), and concepts that are part of the Ramayana epic. Understanding the stories behind these references deepens the meaning.

Disclaimer: This text is cross-referenced with the original Tulsidas Ramcharitmanas versions to ensure 100% accuracy for devotees.

॥Hanuman Chalisa Hindi Lyrics॥
(हनुमान चालीसा पाठ)

Hanuman Chalisa pdf | Hanuman Chalisa Lyrics in Hindi

॥Hanuman Chalisa Lyrics in Hindi ||
|| हनुमान चालीसा लिखित में ||

॥ दोहा॥

श्रीगुरु चरन सरोज रज
निज मनु मुकुरु सुधारि ।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु
जो दायकु फल चारि ॥

बुद्धिहीन तनु जानिके
सुमिरौं पवन-कुमार ।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं
हरहु कलेस बिकार ॥

॥ हनुमान चालीसा चौपाई ॥

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर ।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥

राम दूत अतुलित बल धामा ।
अंजनि पुत्र पवनसुत नामा ॥

महाबीर बिक्रम बजरंगी ।
कुमति निवार सुमति के संगी ॥

कंचन बरन बिराज सुबेसा ।
कानन कुण्डल कुँचित केसा ॥४॥

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै ।
काँधे मूँज जनेउ साजै ॥

शंकर सुवन केसरीनन्दन।
तेज प्रताप महा जग वन्दन॥

बिद्यावान गुनी अति चातुर ।
राम काज करिबे को आतुर ॥

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया ।
राम लखन सीता मन बसिया ॥८॥

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा ।
बिकट रूप धरि लंक जरावा ॥

भीम रूप धरि असुर सँहारे ।
रामचन्द्र के काज सँवारे ॥

लाय सजीवन लखन जियाए ।
श्री रघुबीर हरषि उर लाये ॥

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई ।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥१२॥

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं ।
अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं ॥

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा ।
नारद सारद सहित अहीसा ॥

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते ।
कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ॥

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीह्ना ।
राम मिलाय राज पद दीह्ना ॥१६॥

तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना ।
लंकेश्वर भए सब जग जाना ॥

जुग सहस्त्र जोजन पर भानु ।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं ।
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ॥

दुर्गम काज जगत के जेते ।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥२०॥

राम दुआरे तुम रखवारे ।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥

सब सुख लहै तुम्हारी सरना ।
तुम रक्षक काहू को डरना ॥

आपन तेज सम्हारो आपै ।
तीनों लोक हाँक तै काँपै ॥

भूत पिशाच निकट नहिं आवै ।
महावीर जब नाम सुनावै ॥२४॥

नासै रोग हरै सब पीरा ।
जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥

संकट तै हनुमान छुडावै ।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥

सब पर राम तपस्वी राजा ।
तिनके काज सकल तुम साजा ॥

और मनोरथ जो कोई लावै ।
सोई अमित जीवन फल पावै ॥२८॥

चारों जुग परताप तुम्हारा ।
है परसिद्ध जगत उजियारा ॥

साधु सन्त के तुम रखवारे ।
असुर निकंदन राम दुलारे ॥

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता ।
अस बर दीन जानकी माता ॥

राम रसायन तुम्हरे पासा ।
सदा रहो रघुपति के दासा ॥३२॥

तुम्हरे भजन राम को पावै ।
जनम जनम के दुख बिसरावै ॥

अंतकाल रघुवरपुर जाई ।
जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ॥

और देवता चित्त ना धरई ।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ॥

संकट कटै मिटै सब पीरा ।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥३६॥

जै जै जै हनुमान गोसाईं ।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥

जो सत बार पाठ कर कोई ।
छूटहि बंदि महा सुख होई ॥

जो यह पढ़ै  हनुमान चालीसा ।
होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥

तुलसीदास सदा हरि चेरा ।
कीजै नाथ हृदय मह डेरा ॥४०॥

॥ दोहा ॥
पवन तनय संकट हरन,
मंगल मूरति रूप ।
राम लखन सीता सहित,
हृदय बसहु सुर भूप ॥


|| Hanuman Chalisa in English PDF ||

Hanuman Chalisa Lyrics in Hindi PDF – श्री हनुमान चालीसा

॥ Doha:॥

Shri guru charan saroj raj
Nij manu mukur sudhaari ॥
Baranau Raghubar bimal jasu
Jo dayaku phal chaari ॥

Buddhiheen tanu jaanike
Sumirau pavan-kumaar ॥
Bal buddhi vidya dehu mohi
Harahu kales bikar ॥

॥ Chaupai॥

Jay Hanuman gyan gun sagar
Jay Kapis tihu lok ujaagar ॥

Ram doot atulit bal dhaama
Anjani putra Pavan sut naama ॥

Mahaabir bikram Bajarangi
Kumati nivaar sumati ke sangi ॥

Kanchan baran biraj subesa
Kanan kundal kunchit kesa ॥

Haath bajra aur dhvaja biraajai
Kaandhe moonj janeu saajai ॥

Shankar suvan Kesari Nandan
Tej pratap mahaa jag vandan ॥

Vidyavaan guni ati chaatur
Ram kaj karibe ko aatur ॥

Prabhu charitra sunibe ko rasiya
Ram Lakhan Sita man basiya ॥

Sukshma roop dhari siyahi dikhava,
Bikat roop dhari lanka jarava ॥

Bheem roop dhari asur samhare,
Ramachandra ke kaj samvare ॥

Laayi sajeevan Lakhan jiyaaye,
Shri Raghubir harashi ur laaye ॥

Raghupati keenhi bahut badai,
Tum mam priya Bharatahi sam bhai ॥

Sahas badan tumharo jas gaave,
Asa kahi Shripati kanth lagaave ॥

Sanakadik brahmaadi munisa,
Narad saarad sahit ahisa ॥

Yam Kubera digpala jahaan te,
Kavi kobid kahi sake kahaan te ॥

Tum upakara Sugreevahin keenha,
Ram milaayi raaj pad deenha ॥

Tumharo mantra Bibheeshana maana,
Lankeshwar bhaaye sab jag jaana ॥

Jug sahastra jojan par bhaanu,
Lielyo taahi madhur phal jaanu ॥

Prabhu mudrika meli mukh maahi,
Jaladhi laanghi gaye achraj naahi ॥

Durgam kaaj jagat ke jete,
Sugam anugrah tumhare tete ॥

Ram duare tum rakhware,
Hot na aajnya binu paisare ॥

Sab sukh lahai tumhari sarna,
Tum rakshak kaahu ko darna ॥

Aapan tej samhaaro aapai,
Teenon lok haank te kaapai ॥

Bhoot pishaach nikat nahin aavai,
Mahaveer jab naam sunaavai ॥

Nasai roga harai sab peera,
Japat nirantra Hanumat beera ॥

Sankat tai Hanuman chhudaavai,
Man kram bachan dhyaan jo laavai ॥

Sab par Ram tapasvi raja,
Tinke kaaj sakal tum sajaa ॥

Aur manorath jo koi laavai,
Soi amit jeevan phal paavai ॥

Charon jug paratap tumhaara,
Hai par siddh jagat ujiyaara ॥

Sadhu sant ke tum rakhavaare,
Asur nikandan Ram dulaare ॥

Asht siddhi nau nidhi ke daata,
Asa bar deen Janaki maata ॥

Ram rasaayan tumhare paasaa,
Sada raho Raghupati ke daasaa ॥

Tumhare bhajan Ram ko paavai,
Janam janam ke dukh bisaraavai ॥

Antakaal Raghuvir pur jaai,
Jahaan janma Haribhakta kahaai ॥

Aur devata chitta naa dharai,
Hanumat sei sarva sukh karai ॥

Sankat katai mitai sab peera,
Jo sumirai Hanumat balbeera ॥

Jai jai jai Hanuman Gosai,
Kripa karahu Gurudeva ki naai ॥

Jo sat baar paath kar koi,
Chhutahi bandi maha sukh hoi ॥

Jo yah padhai Hanuman chalisa,
Hoi siddhi sakhi Gaurisa ॥

Tulsidas sada Hari chera,
Keejai naath hrdaya mah dera ॥

॥ Doha॥
Pavan tanay sankat haran,
Mangal moorti roop ॥
Ram Lakhan Sita sahit,
Hriday basahu sur bhoop ॥


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Shri Hanuman Chalisa Hindi PDF 2026 cover image – traditional Hanuman Chalisa lyrics in Hindi for devotional reading and daily path.
Shri Hanuman Chalisa Hindi PDF cover image, representing the traditional 40-verse devotional hymn composed by Goswami Tulsidas and widely recited by devotees for daily prayer and spiritual practice.

श्री हनुमान चालीसा का एमपी३ डाउनलोड (Hanuman Chalisa Download MP3) आज के डिजिटल युग में भक्तों के लिए एक वरदान के समान है। गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित इस पावन स्तोत्र का नियमित श्रवण आध्यात्मिक लाभों से भरपूर है। हमारी वेबसाइट पर प्रस्तुत ऑडियो को हिंदी व संस्कृत के विद्वान पंडितों द्वारा शुद्ध उच्चारण व भाव के साथ सत्यापित किया गया है, ताकि आपको मूल पाठ की पवित्रता का अनुभव हो। कई भक्त एक उच्च गुणवत्ता वाला, स्पष्ट और भावपूर्ण हनुमान चालीसा एमपी३ डाउनलोड करना चाहते हैं, ताकि वे कहीं भी, कभी भी—चाहे वाहन में यात्रा करते हुए, घर के कार्य करते समय, या विश्राम के क्षणों में—इस पावन पाठ को सुन सकें और अपने मन को शांति व शक्ति दे सकें। एक अच्छे एमपी३ की खोज करते समय ध्वनि की शुद्धता, गायक की भावभीनी वाणी और बिना किसी विज्ञापन के निर्बाध पाठ सबसे महत्वपूर्ण बातें होती हैं।

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हनुमान चालीसा हिंदी में pdf | Shri Hanuman Chalisa
  • डर और दुश्मनों से बचाव: हनुमान जी की कृपा से भूत-प्रेत, बुरी नजर, नकारात्मकता और हर तरह के डर से रक्षा होती है। मन को सुरक्षा का एहसास मिलता है।
  • हौसला और मजबूती बढ़े: परीक्षा हो, नौकरी का इंटरव्यू हो, कोर्ट-कचहरी का मुकदमा हो या कोई और मुश्किल घड़ी – हनुमान चालीसा पढ़ने से अंदर से हिम्मत और आत्मविश्वास बढ़ता है। डर कम होता है और सामना करने की ताकत मिलती है।
  • दिमाग को शांति मिले: रोजाना पाठ करने से मन की उधेड़बुन, तनाव, चिंता और गुस्सा कम होता है। दिलो-दिमाग को एक अजीब सी शांति और स्थिरता मिलती है।
  • सेहत में सुधार: माना जाता है कि नियमित पाठ से शरीर की रोगों से लड़ने की ताकत (इम्युनिटी) बढ़ती है। मन शांत रहने से शारीरिक स्वास्थ्य भी बेहतर होने में मदद मिलती है।
  • भगवान की कृपा बरसे: हनुमान जी भगवान राम के परम भक्त हैं और शिवजी के अवतार भी माने जाते हैं। उनकी चालीसा का पाठ करने से तीनों – भगवान राम, शिवजी और हनुमान जी – की विशेष कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है।

कहते हैं न भाई, “बजरंगबली की कृपा हो, तो क्या काम मुश्किल हो सकता है?” नियमित और श्रद्धा से पाठ करिए, फायदा जरूर मिलेगा। जय बजरंगबली!

श्री हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa PDF) का पाठ हनुमान जी को प्रसन्न करने का एक शक्तिशाली माध्यम माना जाता है। इसे पढ़ने से पहले श्रद्धालु को शुद्धता और पवित्रता का ध्यान रखना चाहिए। सुबह स्नान कर साफ वस्त्र धारण करने के बाद एक शांत और साफ स्थान पर बैठें। हनुमान जी की मूर्ति या चित्र के सामने दीपक और अगरबत्ती जलाएं और ध्यान केंद्रित करें। मन में पूरी श्रद्धा और विश्वास रखते हुए संकल्प लें कि आप किस उद्देश्य के लिए हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे हैं।

श्री हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa PDF) का पाठ करते समय हर श्लोक को सही उच्चारण के साथ पढ़ें। इसे तीन, सात, या 108 बार तक पढ़ा जा सकता है, खासकर मंगलवार और शनिवार को। मंगलवार और शनिवार को हनुमान जी के विशेष दिन माने जाते हैं और इन दिनों में पाठ करना अधिक प्रभावकारी होता है। पाठ के दौरान ध्यान रखें कि मन शांत और एकाग्र हो, और आपकी भावनाएं सच्ची हों, ताकि हनुमान जी की कृपा आप पर बनी रहे।

पाठ के बाद हनुमान जी को तुलसी के पत्तों का भोग अर्पित करें और हनुमान जी की आरती करें। इसके साथ ही प्रसाद का वितरण करें। हनुमान जी की पूजा में मिष्ठान्न का विशेष महत्व होता है, और अगर संभव हो तो लड्डू का भोग चढ़ाएं। आरती के बाद पुनः हनुमान जी से अपनी प्रार्थना करें और आशीर्वाद प्राप्त करें।

हनुमान चालीसा का नियमित पाठ करने से मानसिक शांति, आत्मबल, और साहस की प्राप्ति होती है। इससे जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, और सभी प्रकार के भय, रोग, और शत्रुता का नाश होता है। यदि सच्ची भक्ति और श्रद्धा से हनुमान जी की आराधना की जाए, तो वे शीघ्र प्रसन्न होकर अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।


श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि।
बरनऊं रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।

अर्थ – श्री गुरु महाराज के चरण कमलों की धूलि से
अपने मन रूपी दर्पण को पवित्र करके
श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूं,
जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला है।

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरो पवन-कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार।

अर्थ – हे पवन कुमार! मैं आपको सुमिरन करता हूं।
आप तो जानते ही हैं कि मेरा शरीर और बुद्धि निर्बल है।
मुझे शारीरिक बल, बुद्धि एवं ज्ञान दीजिए
और मेरे दुखों व दोषों का नाश कर दीजिए।

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीस तिहुं लोक उजागर॥1॥
अर्थ –
 श्री हनुमान जी! आपकी जय हो।
आपका ज्ञान और गुण अथाह है।
हे कपीश्वर! आपकी जय हो!
तीनों लोकों, स्वर्ग लोक, भूलोक और पाताल लोक में आपकी कीर्ति है।

राम दूत अतुलित बलधामा, अंजनी पुत्र पवन सुत नामा॥2॥
अर्थ –
 हे पवनसुत अंजनी नंदन! आपके समान दूसरा बलवान नहीं हैं।

महावीर विक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी॥3॥
अर्थ –
 हे महावीर बजरंग बली! आप विशेष पराक्रम वाले हैं।
आप खराब बुद्धि को दूर करते हैं,
और अच्छी बुद्धि वालों के साथी, सहायक हैं।

कंचन बरन बिराज सुबेसा, कानन कुण्डल कुंचित केसा॥4॥
अर्थ –
 आप सुनहले रंग, सुन्दर वस्त्रों, कानों में कुण्डल
और घुंघराले बालों से सुशोभित हैं।

हाथबज्र और ध्वजा विराजे, कांधे मूंज जनेऊ साजै॥5॥
अर्थ –
 आपके हाथ में बज्र और ध्वजा है
और कन्धे पर मूंज के जनेऊ की शोभा है।

शंकर सुवन केसरी नंदन, तेज प्रताप महा जग वंदन॥6॥
अर्थ-
 शंकर के अवतार! हे केसरी नंदन आपके पराक्रम
और महान यश की संसार भर में वन्दना होती है।

विद्यावान गुणी अति चातुर, राम काज करिबे को आतुर॥7॥
अर्थ-
 आप प्रकान्ड विद्या निधान हैं, गुणवान और अत्यन्त कार्य कुशल होकर
श्री राम के काज करने के लिए आतुर रहते हैं।

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया, राम लखन सीता मन बसिया॥8॥
अर्थ –
 आप श्री राम चरित सुनने में आनन्द रस लेते हैं।
श्री राम, सीता और लखन आपके हृदय में बसे रहते हैं।

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा, बिकट रूप धरि लंक जरावा॥9॥
अर्थ –
 आपने अपना बहुत छोटा रूप धारण करके सीता जी को दिखलाया
और भयंकर रूप करके लंका को जलाया।

भीम रूप धरि असुर संहारे, रामचन्द्र के काज संवारे॥10॥
अर्थ –
 आपने विकराल रूप धारण करके राक्षसों को मारा
और श्री रामचन्द्र जी के उद्देश्यों को सफल कराया।

लाय सजीवन लखन जियाये, श्री रघुवीर हरषि उर लाये॥11॥
अर्थ –
 आपने संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी को जिलाया
जिससे श्री रघुवीर ने हर्षित होकर आपको हृदय से लगा लिया।

रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई, तुम मम प्रिय भरत सम भाई॥12॥
अर्थ –
 श्री रामचन्द्र ने आपकी बहुत प्रशंसा की
और कहा कि तुम मेरे भरत जैसे प्यारे भाई हो।

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥13॥
अर्थ –
 श्री राम ने आपको यह कहकर हृदय से लगा लिया
कि तुम्हारा यश हजार मुख से सराहनीय है।

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा, नारद, सारद सहित अहीसा॥14॥
अर्थ –
 श्री सनक, श्री सनातन, श्री सनन्दन, श्री सनत्कुमार आदि मुनि ब्रह्मा आदि देवता नारद जी,
सरस्वती जी, शेषनाग जी सब आपका गुण गान करते हैं।

जम कुबेर दिगपाल जहां ते, कबि कोबिद कहि सके कहां ते॥15॥
अर्थ –
 यमराज, कुबेर आदि सब दिशाओं के रक्षक, कवि विद्वान, पंडित
या कोई भी आपके यश का पूर्णतः वर्णन नहीं कर सकते।

तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा, राम मिलाय राजपद दीन्हा॥16॥
अर्थ –
 आपने सुग्रीव जी को श्रीराम से मिलाकर उपकार किया, जिसके कारण वे राजा बने।

तुम्हरो मंत्र विभीषण माना, लंकेस्वर भए सब जग जाना॥17॥
अर्थ –
 आपके उपदेश का विभिषण जी ने पालन किया
जिससे वे लंका के राजा बने, इसको सब संसार जानता है।

जुग सहस्त्र जोजन पर भानू, लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥18॥
अर्थ –
 जो सूर्य इतने योजन दूरी पर है कि उस पर पहुंचने के लिए हजार युग लगे।
दो हजार योजन की दूरी पर स्थित सूर्य को आपने एक मीठा फल समझकर निगल लिया।

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहि, जलधि लांघि गये अचरज नाहीं॥19॥
अर्थ –
 आपने श्री रामचन्द्र जी की अंगूठी मुंह में रखकर समुद्र को लांघ लिया,
इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।

दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥20॥
अर्थ –
 संसार में जितने भी कठिन से कठिन काम हो,
वो आपकी कृपा से सहज हो जाते है।

राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिनु पैसा रे॥21॥
अर्थ –
 श्री रामचन्द्र जी के द्वार के आप रखवाले हैं,
जिसमें आपकी आज्ञा बिना किसी को प्रवेश नहीं मिलता
अर्थात् आपकी प्रसन्नता के बिना राम कृपा दुर्लभ है।

सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू को डरना ॥22॥
अर्थ –
 जो भी आपकी शरण में आते हैं, उस सभी को आनन्द प्राप्त होता है,
और जब आप रक्षक हैं, तो फिर किसी का डर नहीं रहता।

आपन तेज सम्हारो आपै, तीनों लोक हांक तें कांपै॥23॥
अर्थ –
 आपके सिवाय आपके वेग को कोई नहीं रोक सकता,
आपकी गर्जना से तीनों लोक कांप जाते हैं।

भूत पिशाच निकट नहिं आवै, महावीर जब नाम सुनावै॥24॥
अर्थ –
 जहां महावीर हनुमान जी का नाम सुनाया जाता है,
वहां भूत, पिशाच पास भी नहीं फटक सकते।

नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥25॥
अर्थ –
 वीर हनुमान जी! आपका निरंतर जप करने से
सब रोग चले जाते हैं और सब पीड़ा मिट जाती है।

संकट तें हनुमान छुड़ावै, मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥26॥
अर्थ –
 हे हनुमान जी! विचार करने में, कर्म करने में और बोलने में,
जिनका ध्यान आपमें रहता है, उनको सब संकटों से आप छुड़ाते हैं।

सब पर राम तपस्वी राजा, तिनके काज सकल तुम साजा॥27॥
अर्थ –
 तपस्वी राजा श्री रामचन्द्र जी सबसे श्रेष्ठ हैं,
उनके सब कार्यों को आपने सहज में कर दिया।

सब पर राम तपस्वी राजा, तिनके काज सकल तुम साजा॥27॥
अर्थ-
 तपस्वी राजा श्री रामचन्द्र जी सबसे श्रेष्ठ हैं,
उनके सब कार्यों को आपने सहज में कर दिया।

और मनोरथ जो कोइ लावै, सोई अमित जीवन फल पावै॥28॥
अर्थ-
 जिस पर आपकी कृपा हो, वह कोई भी अभिलाषा करें
तो उसे ऐसा फल मिलता है जिसकी जीवन में कोई सीमा नहीं होती।

चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा॥29॥
अर्थ-
 चारो युगों सतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग में आपका यश फैला हुआ है,
जगत में आपकी कीर्ति सर्वत्र प्रकाशमान है।

साधु सन्त के तुम रखवारे, असुर निकंदन राम दुलारे॥30॥
अर्थ –
 हे श्री राम के दुलारे! आप सज्जनों की रक्षा करते है
और दुष्टों का नाश करते है।

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता॥31॥
अर्थ –
 आपको माता श्री जानकी से ऐसा वरदान मिला हुआ है,
जिससे आप किसी को भी आठों सिद्धियां और नौ निधियां दे सकते है।

अणिमा – जिससे साधक किसी को दिखाई नहीं पड़ता और कठिन से कठिन पदार्थ में प्रवेश कर जाता है।
महिमा – जिसमें योगी अपने को बहुत बड़ा बना देता है।
गरिमा – जिससे साधक अपने को चाहे जितना भारी बना लेता है।
लघिमा – जिससे जितना चाहे उतना हल्का बन जाता है।
प्राप्ति – जिससे इच्छित पदार्थ की प्राप्ति होती है।
प्राकाम्य – जिससे इच्छा करने पर वह पृथ्वी में समा सकता है, आकाश में उड़ सकता है।
ईशित्व – जिससे सब पर शासन का सामर्थ्य हो जाता है।
वशित्व – जिससे दूसरों को वश में किया जाता है।

राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा॥32॥
अर्थ –
 आप निरंतर श्री रघुनाथ जी की शरण में रहते हैं,
जिससे आपके पास बुढ़ापा और असाध्य रोगों के नाश के लिए राम नाम औषधि है।

तुम्हरे भजन राम को पावै, जनम जनम के दुख बिसरावै॥33॥
अर्थ –
 आपका भजन करने से श्री राम जी प्राप्त होते हैं
और जन्म जन्मांतर के दुख दूर होते हैं।

अन्त काल रघुबर पुर जाई, जहां जन्म हरि भक्त कहाई॥34॥
अर्थ –
 अंत समय श्री रघुनाथ जी के धाम को जाते हैं
और यदि फिर भी जन्म लेंगे तो भक्ति करेंगे और श्री राम भक्त कहलाएंगे।

और देवता चित न धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई॥35॥
अर्थ –
 हे हनुमान जी! आपकी सेवा करने से सब प्रकार के सुख मिलते हैं,
फिर अन्य किसी देवता की आवश्यकता नहीं रहती।

संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥36॥
अर्थ –
 हे वीर हनुमान जी! जो आपका सुमिरन करता रहता है,
उसके सब संकट कट जाते हैं और सब पीड़ा मिट जाती हैं।

जय जय जय हनुमान गोसाईं, कृपा करहु गुरु देव की नाई॥37॥
अर्थ –
 हे स्वामी हनुमान जी! आपकी जय हो, जय हो,
जय हो! आप मुझ पर कृपालु श्री गुरु जी के समान कृपा कीजिए।

जो सत बार पाठ कर कोई, छूटहि बंदि महा सुख होई॥38॥
अर्थ –
 जो कोई इस हनुमान चालीसा का सौ बार पाठ करेगा
वह सब बंधनों से छूट जाएगा और उसे परमानन्द मिलेगा।

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा॥39॥
अर्थ –
 भगवान शंकर ने यह हनुमान चालीसा लिखवाया, इसलिए वे साक्षी हैं,
जो इसे पढ़ेगा उसे निश्चय ही सफलता प्राप्त होगी।

तुलसीदास सदा हरि चेरा, कीजै नाथ हृदय मंह डेरा॥40॥
अर्थ –
 हे नाथ हनुमान जी! तुलसीदास सदा ही श्री राम का दास है।
इसलिए आप उसके हृदय में निवास कीजिए।

पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सूरभूप॥
अर्थ –
 हे संकट मोचन पवन कुमार! आप आनंद मंगलों के स्वरूप हैं।
हे देवराज! आप श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण सहित मेरे हृदय में निवास कीजिए।


श्री हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa PDF) को विवाह संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए एक प्रभावी उपाय माना जाता है। हनुमान जी को भक्ति, शक्ति, और समर्पण का प्रतीक माना जाता है, और उनकी उपासना से मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। हनुमान चालीसा का पाठ विशेषकर उन लोगों के लिए बहुत लाभकारी होता है जो विवाह में आ रही बाधाओं, वैवाहिक जीवन में कलह, या दांपत्य जीवन की अन्य समस्याओं से जूझ रहे होते हैं।

विवाह में बाधाओं को दूर करने के लिए:
हनुमान चालीसा का नियमित पाठ करने से विवाह में आ रही बाधाओं को दूर किया जा सकता है। अगर किसी का विवाह नहीं हो पा रहा है या विवाह में देरी हो रही है, तो हनुमान चालीसा का 108 बार पाठ करना अत्यंत फलदायी माना गया है। इसके साथ ही, मंगलवार और शनिवार को विशेष रूप से हनुमान जी की पूजा करने से भी विवाह में आ रही कठिनाइयों का निवारण होता है।

वैवाहिक जीवन में सुख और समृद्धि:
विवाह हो जाने के बाद भी कई बार दंपत्ति के बीच आपसी समझ, सामंजस्य, और प्रेम में कमी आ जाती है, जिसके कारण वैवाहिक जीवन में समस्याएं उत्पन्न होती हैं। हनुमान चालीसा का पाठ इन समस्याओं के समाधान के लिए भी बहुत प्रभावी होता है। जो भी दंपत्ति अपने वैवाहिक जीवन में शांति और सुख चाहते हैं, उन्हें प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए। इससे मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और आपसी संबंधों में मधुरता आती है।

दांपत्य जीवन में कलह का निवारण:
कई बार वैवाहिक जीवन में कलह और विवाद उत्पन्न हो जाते हैं, जिससे दांपत्य जीवन कष्टदायी हो जाता है। ऐसी स्थिति में, हनुमान चालीसा का नियमित पाठ करने से पति-पत्नी के बीच के तनाव और विवाद दूर होते हैं। यह पाठ न केवल मानसिक शांति प्रदान करता है बल्कि जीवन में स्थिरता और संतुलन भी लाता है।

नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा:
हनुमान चालीसा का पाठ नकारात्मक ऊर्जा और बुरी शक्तियों से सुरक्षा प्रदान करता है। अगर किसी के विवाह या वैवाहिक जीवन पर किसी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा या बुरी दृष्टि का प्रभाव हो रहा हो, तो हनुमान चालीसा का नियमित पाठ करने से इन सब से मुक्ति मिलती है। हनुमान जी की कृपा से जीवन में सकारात्मकता आती है और नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव समाप्त हो जाता है।

अन्य लाभ:
हनुमान चालीसा का पाठ न केवल वैवाहिक समस्याओं का समाधान करता है, बल्कि यह जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी सफलता दिलाने वाला माना गया है। यह पाठ आत्मविश्वास को बढ़ाता है, मानसिक शांति देता है, और जीवन में आने वाली हर तरह की समस्याओं से निपटने की शक्ति प्रदान करता है।

हनुमान चालीसा का पाठ करने के लिए किसी विशेष समय या दिन की आवश्यकता नहीं होती है, लेकिन मंगलवार और शनिवार के दिन इसका विशेष महत्व है। हनुमान जी के भक्तों को चाहिए कि वे पूरे श्रद्धा और भक्ति के साथ हनुमान चालीसा का पाठ करें, जिससे उन्हें हनुमान जी की कृपा प्राप्त हो और उनके जीवन की सभी समस्याएं दूर हों।


श्री हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa PDF) को सिद्ध करने के लिए इन अद्यतन चरणों का पालन करें:

  • पवित्रता और शुद्धता: हनुमान चालीसा का पाठ करते समय, शुद्ध और पवित्र जीवन शैली को अपनाना अत्यावश्यक है। दैनिक जीवन में सात्विक आहार, संयम, और स्वच्छता बनाए रखें। इससे आपकी आध्यात्मिक ऊर्जा में वृद्धि होगी और पाठ का प्रभाव अधिक होगा।
  • 108 बार पाठ: हनुमान चालीसा का 108 बार पाठ करना सिद्धि प्राप्ति के लिए अत्यधिक प्रभावशाली माना जाता है। आप एक माला का उपयोग करके 108 बार जप कर सकते हैं। इससे मन की एकाग्रता और भगवान हनुमान की कृपा प्राप्त होती है।
  • 21 दिन की साधना: 21 दिन तक निरंतर हनुमान चालीसा का पाठ करना एक सिद्ध साधना मानी जाती है। इस अवधि में, प्रतिदिन नियमित रूप से चालीसा का पाठ करें। इस साधना के दौरान किसी भी प्रकार की नकारात्मकता से दूर रहें और अपने मन को शुद्ध और स्थिर रखें।
  • मानसिक ध्यान और एकाग्रता: हनुमान चालीसा का पाठ करते समय मन को शांत और ध्यानमग्न रखना आवश्यक है। मानसिक एकाग्रता से पाठ का प्रभाव गहरा होता है और भगवान हनुमान के साथ एक आध्यात्मिक संबंध स्थापित होता है।
  • भक्ति और श्रद्धा: चालीसा का पाठ गहरी भक्ति और श्रद्धा के साथ करें। आपके मन में भगवान हनुमान के प्रति अटूट विश्वास होना चाहिए। इस भक्ति भाव से ही पाठ का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
  • समय का महत्व: हनुमान चालीसा का पाठ सुबह या सूर्यास्त के समय करना विशेष लाभकारी माना जाता है। यह समय आध्यात्मिक ऊर्जा के प्रवाह के लिए उपयुक्त होता है, जिससे पाठ का प्रभाव अधिक होता है।
  • उचित उच्चारण: हनुमान चालीसा का पाठ करते समय सही उच्चारण का ध्यान रखें। शब्दों के सही उच्चारण से मंत्र की शक्ति बढ़ती है और भगवान हनुमान की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है।

इन सभी चरणों का पालन करके, आप हनुमान चालीसा का सिद्ध पाठ कर सकते हैं और भगवान हनुमान से अपार कृपा प्राप्त कर सकते हैं। नियमित और समर्पित साधना से ही सच्ची सिद्धि प्राप्त होती है।


मनुष्य को इस संसार का श्रेष्ठ प्राणी माना जाता है, और इसके पीछे का कारण उसके विशिष्ट गुण हैं जो उसे अन्य प्राणियों से अलग करते हैं। इन गुणों के कारण ही मनुष्य ने समाज में एक विशेष स्थान प्राप्त किया है और अपने जीवन को सफल बनाया है। जब वह समाज में रहता है, तो एक सामाजिक प्राणी के रूप में उसमें कुछ विशिष्ट गुणों का होना आवश्यक है। इन्हीं गुणों के बल पर वह समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। समाजिक व्यवहार की दृष्टि से, विनम्रता को मानवता का प्रतीक माना गया है, और यही बात श्री हनुमान चालीसा में बार-बार बताई गई है।

मनुष्य, विद्या और ज्ञान से संपन्न होने के साथ-साथ प्रभावशाली भी बन जाता है। ऐसा प्रभावशाली व्यक्ति समाज में सभी का प्रिय होता है, और हर कोई उसकी प्रशंसा और सम्मान करता है। जिन व्यक्तियों में यह गुण नहीं होता, वे समाज में उपेक्षित होते हैं, और लोग उनके साथ निकटता का संबंध बनाने से कतराते हैं।

विनम्रता एक अद्वितीय गुण है, जिसे भारतीय धर्मग्रंथों में विस्तार से वर्णित किया गया है। भगवान विष्णु स्वयं इसके सबसे बड़े प्रमाण हैं। एक बार, भृगु मुनि ने आवेश में आकर भगवान विष्णु की छाती पर पैर मारा। परंतु विष्णु भगवान ने क्रोध नहीं किया, बल्कि उनके पैर पकड़कर विनम्रता से पूछा, “हे ऋषि! क्या आपके पैर में चोट लगी?”

भगवान विष्णु की इस विनम्रता ने भृगु मुनि को शर्मिंदा कर दिया। इससे हमें सीख मिलती है कि विनम्रता क्रोध के आवेग को तुरंत समाप्त कर देती है। यह अनावश्यक उत्तेजना और क्रोध से बचाव करती है और हमें परेशानियों में पड़ने से बचाती है।

हमारी भारतीय संस्कृति भी सदैव विनम्रता से परिपूर्ण रही है। इसे विद्वानों और सज्जनों का सर्वोत्तम गुण माना जाता है। हमारे कई ऋषि-मुनियों को विनम्रता के अभाव में गलत आचरण करते देखा गया है। अपने क्रोध और अहंकार के कारण, उन्होंने समाज में नकारात्मक प्रभाव छोड़ा और लोगों की घृणा का पात्र बने। वहीं, अपनी विनम्रता के बल पर कई लोग इतिहास में अमर हो गए।

एक विनम्र व्यक्ति सदैव आदर और सम्मान का पात्र होता है। सभी उसकी सज्जनता की प्रशंसा करते हैं और वह सबके स्नेह का पात्र बनता है। चाहे स्त्री हो या पुरुष, विनम्रता लोक-व्यवहार में निपुणता का एक मानदंड होती है।

हमने अपने आस-पास कई ऐसे लोगों को देखा है जो शान और अकड़ दिखाते हैं। ऐसे लोग अपने आप पर गर्व और अहंकार करते हैं। वे दूसरों के अभिवादन का उत्तर देना भी उचित नहीं समझते। उनका मानना होता है कि ऐसा करने से उनकी प्रतिष्ठा पर आंच आएगी। उनका व्यवहार, बातचीत का ढंग भी लोगों को आहत करता है, और परिणामस्वरूप लोग उनसे दूरी बनाने लगते हैं।

“जब कोई व्यक्ति किसी के बारे में कुछ कहता है, तो समझ लीजिए कि वह आपके बारे में भी वैसी ही बातें कह सकता है।”

इस प्रकार के व्यक्तियों से सतर्क रहें, क्योंकि वे आपकी निंदा भी उसी तरह कर सकते हैं। सदैव ध्यान रखें कि किसी की परेशानी का मजाक उड़ाना, या किसी के शारीरिक दोष पर कटाक्ष करना अनुचित है। ऐसा आचरण आपको समाज में कभी भी सम्मान नहीं दिला सकता। इसलिए, विनम्रता को अपनाइए और समाज में सम्मान और प्रशंसा के पात्र बनिए। अपने बड़ों का आदर करें और उनसे विनम्रता से पेश आएं। ऐसा करने से आप उनके स्नेह और आदर के पात्र बन जाएंगे।

विनम्रता अपनाने में आपका कुछ खर्च नहीं होता, और आप आसानी से इस गुण को अपने जीवन में अपना सकते हैं। यदि आप योग्य हैं, धनी हैं, स्वस्थ हैं, सुंदर हैं, तो विनम्रता आपके व्यक्तित्व में और भी अधिक आकर्षण जोड़ देगी। आप समाज में और अधिक लोकप्रिय बन सकते हैं और सभी का स्नेह प्राप्त कर सकते हैं।

जिनमें विनम्रता का अभाव होता है, वे बड़े अभिमानी होते हैं। आपने देखा होगा कि कुछ लोग अपने धन, शरीर, या विशेष गुणों पर गर्व करते हैं। महिलाओं में यह दोष अधिक पाया जाता है। कोई विशिष्ट पद प्राप्त कर लेने पर, उनमें अहंकार आ जाता है।

घर में कोई महंगी वस्तु आ जाने पर, वे पड़ोसियों के सामने अपनी शान बघारने लगती हैं, और दूसरों को हेय दृष्टि से देखने लगती हैं। इस प्रकार का व्यवहार उन्हें उनके पड़ोसियों के स्नेह से वंचित कर देता है।

यदि वे अपने पड़ोसियों से विनम्रता से पेश आतीं, तो वे सदैव उनके सुख-दुख में उनके साथ होते, और कहते – “देखो, उसके घर में भगवान का दिया सब कुछ है, लेकिन उसके व्यवहार में आज भी मिठास है, अहंकार ने उसे नहीं छुआ है।”

याद रखें, जब व्यक्ति के स्वभाव में अहंकार प्रवेश कर जाता है, तो वह समाज में अलोकप्रिय हो जाता है। अभिमान आपके मन रूपी घर को हमेशा खाली ही रखता है।


हनुमान चालीसा पढ़ने के फायदे

श्री हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa PDF) का नियमित पाठ करने से मानसिक शांति मिलती है और तनाव दूर होता है। यह भक्तों को आत्मविश्वास और साहस प्रदान करता है। हनुमानजी की कृपा से शत्रुओं का नाश होता है और बुरी शक्तियों से रक्षा होती है। इसके अलावा, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। कहा जाता है कि इससे घर में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है। यह भक्तों को भगवान हनुमान के प्रति भक्ति और श्रद्धा को मजबूत करता है।

  • मानसिक शांति: हनुमान चालीसा का नियमित पाठ आपके मन को शांति और स्थिरता प्रदान करता है।
  • आध्यात्मिक शक्ति: यह पाठ आपकी आध्यात्मिक ऊर्जा को बढ़ाता है और जीवन में सकारात्मकता लाता है।
  • नकारात्मकता का नाश: हनुमान चालीसा के पाठ से नकारात्मक ऊर्जा और बुरी शक्तियाँ दूर होती हैं।
  • स्वास्थ्य लाभ: शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार के लिए हनुमान चालीसा का पाठ बेहद लाभकारी माना जाता है।
  • संकटों से मुक्ति: जीवन में आने वाली कठिनाइयों और संकटों से निजात पाने में हनुमान चालीसा मददगार होता है।
  • भक्ति और श्रद्धा: भगवान हनुमान के प्रति भक्ति और श्रद्धा में वृद्धि होती है।

हनुमान चालीसा कब पढ़े

श्री हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa PDF) का पाठ सुबह और शाम को करना सबसे उत्तम माना जाता है। ब्रह्म मुहूर्त में इसका पाठ विशेष फलदायी होता है। इसके अलावा, मंगलवार और शनिवार को हनुमानजी की विशेष पूजा की जाती है, इसलिए इन दिनों में भी हनुमान चालीसा का पाठ करना शुभ माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत में हनुमान चालीसा पढ़ना भी लाभकारी होता है।

हनुमान चालीसा पढ़ने से पहले क्या सावधानी बरतें

हनुमान चालीसा पढ़ने से पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। शुद्ध और शांत मन से इसका पाठ करें। पाठ करते समय भगवान हनुमान की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक जलाएं और सुगंधित अगरबत्ती का उपयोग करें। पाठ के समय मन को एकाग्र रखें और ध्यान भटकने न दें। इस दौरान किसी प्रकार की नकारात्मकता को मन में न आने दें।

हनुमान चालीसा क्या लड़कियाँ भी पढ़ सकती हैं

हाँ, हनुमान चालीसा लड़कियाँ भी पढ़ सकती हैं। इसमें कोई भेदभाव नहीं है। भगवान हनुमान अपने भक्तों की सभी इच्छाओं को पूरा करते हैं, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष। महत्वपूर्ण यह है कि पाठ श्रद्धा और भक्ति भाव से किया जाए।

हनुमान चालीसा मंदिर पढ़ना सही होता है या घर में

श्री हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa PDF) का पाठ मंदिर और घर, दोनों जगह किया जा सकता है। मंदिर में पाठ करने से सामूहिक ऊर्जा का लाभ मिलता है, जबकि घर में पाठ करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और शांति का माहौल बनता है। जहां भी पाठ करें, स्थान को पवित्र और शांत रखें।

हनुमान चालीसा पढ़ने के बाद क्या करें

श्री हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa PDF) पढ़ने के बाद भगवान हनुमान के चरणों में नमन करें और उनकी आरती उतारें। उन्हें भोग अर्पित करें और प्रसाद ग्रहण करें। इसके बाद भगवान का धन्यवाद करें और प्रार्थना करें कि वे आपके जीवन में सुख, शांति, और समृद्धि प्रदान करें।

हनुमान चालीसा पढ़ने से पहले भोग लगाएं या बाद में

भोग का अर्पण हनुमान चालीसा पढ़ने के बाद करना उचित माना जाता है। पाठ के बाद भगवान हनुमान को भोग अर्पित करें और फिर प्रसाद ग्रहण करें। इससे भगवान हनुमान की कृपा जल्दी प्राप्त होती है।

हनुमान चालीसा क्या रोज पढ़ सकते हैं

हाँ, हनुमान चालीसा का पाठ रोज किया जा सकता है। रोजाना पाठ करने से भगवान हनुमान की कृपा प्राप्त होती है और सभी बाधाएं दूर होती हैं। इसका नियमित पाठ जीवन में सकारात्मक बदलाव लाता है और भक्त को आंतरिक शांति प्रदान करता है।

हनुमान चालीसा को 7 बार पढ़ने का क्या महत्व है?

हनुमान चालीसा को 7 बार पढ़ने का विशेष महत्व है। इसे पढ़ने से विशेष समस्याओं का समाधान होता है और भगवान हनुमान की कृपा जल्दी प्राप्त होती है। कहा जाता है कि 7 बार पाठ करने से शत्रुओं का नाश होता है और भक्त की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

क्या हनुमान चालीसा को रोज़ाना पढ़ा जा सकता है?

हाँ, हनुमान चालीसा को रोज़ाना पढ़ा जा सकता है। नियमित पाठ से भगवान हनुमान की कृपा बनी रहती है और सभी बाधाएं दूर होती हैं। यह भक्त को आंतरिक शांति और मानसिक शक्ति प्रदान करता है।

तुलसीदास ने हनुमान चालीसा कैसे लिखी थी?

तुलसीदास ने हनुमान चालीसा का रचना भगवान हनुमान की महिमा का वर्णन करने के लिए की थी। कहा जाता है कि उन्हें स्वयं भगवान हनुमान की प्रेरणा से यह चालीसा लिखी। इसमें भगवान हनुमान के गुण, उनकी शक्ति और उनके भक्तों के प्रति उनकी कृपा का वर्णन किया गया है।

हनुमान चालीसा किस पुस्तक में लिखी गई है?

श्री हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa PDF) गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित ‘रामचरितमानस’ में शामिल है। यह चालीसा भगवान हनुमान की महिमा का गुणगान करती है और रामायण के विभिन्न प्रसंगों का भी वर्णन करती है।

हनुमान चालीसा का कैसे प्रयोग करें

श्री हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa PDF) का प्रयोग भगवान हनुमान की कृपा प्राप्त करने और समस्याओं का समाधान पाने के लिए किया जाता है। इसे श्रद्धा और भक्ति से पढ़ें। विशेष अवसरों पर, जैसे संकट के समय, परीक्षा या महत्वपूर्ण कार्य से पहले इसका पाठ करें। इसे पढ़ने से पहले और बाद में भगवान हनुमान का स्मरण करें और उनकी आराधना करें।


हनुमान चालीसा हिंदू धर्म में एक अत्यंत पूजनीय स्तोत्र है, जो लाखों लोगों के दिलों में एक विशेष स्थान रखता है। 16वीं शताब्दी में महान संत और कवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित यह चालीस चौपाइयों का भक्ति स्तोत्र भगवान हनुमान को समर्पित है, जो भक्ति, शक्ति और निःस्वार्थ सेवा के प्रतीक हैं। अवधी भाषा में लिखी गई हनुमान चालीसा न केवल एक साहित्यिक उत्कृष्ट कृति है, बल्कि एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक भी है, जो आंतरिक शांति और दिव्य आशीर्वाद की खोज में लगे भक्तों को प्रेरणा देती है। इसकी काव्यात्मक लय और गहन अर्थ इसे सभी आयु और पृष्ठभूमि के लोगों के लिए सुलभ बनाते हैं, जिससे यह भक्तों और भगवान के बीच एक गहरा संबंध स्थापित करती है।

हनुमान चालीसा की सार्वभौमिक लोकप्रियता का मुख्य कारण इसमें भय से मुक्ति और सुरक्षा का वादा है। प्रत्येक चौपाई हनुमान जी के गुणों की महिमा गाती है, जिनमें उनकी असीमित शारीरिक शक्ति, भगवान राम के प्रति अडिग भक्ति और अद्वितीय साहस शामिल हैं। हनुमान चालीसा का पाठ करने से हनुमान जी की कृपा प्राप्त होती है, जो भक्तों को नकारात्मक प्रभावों से बचाते हैं और जीवन की कठिनाइयों को पार करने की शक्ति प्रदान करते हैं। इस स्तोत्र की सरलता और शक्ति इसे कई लोगों की दैनिक प्रार्थना का अभिन्न हिस्सा बनाती है, जिससे उन्हें सांत्वना और आत्मबल मिलता है।

आध्यात्मिक महत्व के अलावा, हनुमान चालीसा के मनोवैज्ञानिक लाभ भी अत्यंत गहरे हैं। शोध बताते हैं कि इस स्तोत्र का पाठ या श्रवण तनाव और चिंता को कम कर सकता है, मन को शांत कर एक ध्यानात्मक अवस्था उत्पन्न करता है। इसके नियमित पाठ से मानसिक स्पष्टता और भावनात्मक संतुलन प्राप्त होता है। भक्ति और मानसिक स्वास्थ्य का यह अनूठा संयोजन हनुमान चालीसा को समयातीत बनाता है, जो धार्मिक सीमाओं को पार कर उन लोगों को भी आकर्षित करता है जो समग्र रूप से कल्याण की खोज में हैं।

हनुमान चालीसा की वैश्विक मान्यता निरंतर बढ़ रही है, और इसे कई भाषाओं में अनुवाद और व्याख्या के माध्यम से सराहा जा रहा है। इसकी अनुकूलता इसे आधुनिक समय में भी प्रासंगिक बनाती है, जहां आंतरिक शक्ति और शांति की आवश्यकता पहले से अधिक महत्वपूर्ण है। चाहे इसे एकांत में पढ़ा जाए या सामूहिक भजन में, हनुमान चालीसा प्राचीन भक्ति की बुद्धिमत्ता को आधुनिक जीवन में साहस और आशा की आवश्यकता के साथ जोड़ती है। इसके छंदों में भक्तों को न केवल हनुमान जी की स्तुति मिलती है, बल्कि उद्देश्य, साहस और अडिग विश्वास से भरा जीवन जीने का मार्ग भी मिलता है।


Hanuman Ji, a revered figure in Hindu mythology, is celebrated for his devotion, strength, and bravery. Here’s a closer look at his story:

Devotion to Rama: Hanuman’s unwavering loyalty to Lord Rama is the foundation of his legend. His dedication to Rama, who is an incarnation of Lord Vishnu, is profound and central to his identity. Hanuman never wavers in his service, constantly offering his strength and abilities to help Rama in times of need.

Role in the Ramayana: Hanuman’s role in the Ramayana, one of the most important Hindu epics, is pivotal. He assists Lord Rama in his quest to rescue Sita, Rama’s wife, from the demon king Ravana. Hanuman’s courage, intelligence, and extraordinary powers come to the fore, particularly when he leaps across the ocean to find Sita in Lanka, delivering Rama’s message and offering her hope.

Symbol of Strength and Devotion: Hanuman is the embodiment of strength, devotion, and perseverance. He is often depicted as a muscular figure, symbolizing his physical power, while his unwavering commitment to Rama highlights his spiritual strength. Hanuman’s character teaches the virtues of selfless service, devotion, and humility.

Powers and Qualities: Hanuman is endowed with many supernatural abilities, such as immense strength, the power of flight, and the ability to change his size at will. His intelligence and quick thinking also make him a great strategist. He uses these powers for the benefit of others, especially in the service of Lord Rama. His ability to overcome obstacles and help those in need makes him a beloved figure.

Worship: Hanuman is widely worshipped in Hindu temples across India and beyond. He is often revered for his ability to protect devotees from harm, grant strength, and fulfill wishes. Temples dedicated to Hanuman are abundant, where people pray for physical strength, mental fortitude, and the removal of obstacles in their lives.

Cultural Significance: Hanuman’s influence goes beyond Hinduism. His story is also revered in other parts of Asia, including Buddhist traditions. The lessons drawn from his life resonate across cultures, teaching the values of loyalty, selflessness, and strength. Hanuman’s image as a protector and source of divine strength makes him a universal symbol of courage.


1. असली हनुमान चालीसा क्या है?

असली हनुमान चालीसा वह है जिसे गोस्वामी तुलसीदास जी ने 16वीं शताब्दी में रचा था। यह चालीसा 40 चौपाइयों का संग्रह है, जिसमें भगवान हनुमान की महिमा, उनके गुण, और उनके पराक्रम का वर्णन किया गया है। हनुमान चालीसा को सही तरीके से पढ़ने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और भगवान हनुमान की कृपा प्राप्त होती है। इसे भगवान हनुमान के भक्तों द्वारा श्रद्धा और भक्ति के साथ नियमित रूप से पढ़ा जाता है।

2. 1 दिन में हनुमान चालीसा कितनी बार पढ़नी चाहिए?

हनुमान चालीसा पढ़ने की संख्या व्यक्ति की श्रद्धा और समय के अनुसार भिन्न हो सकती है। आमतौर पर, इसे दिन में एक बार पढ़ना पर्याप्त माना जाता है। लेकिन अगर कोई विशेष संकट या इच्छा की पूर्ति के लिए पढ़ता है, तो इसे दिन में 3, 5, 7, या 11 बार भी पढ़ा जा सकता है। अधिक बार पढ़ने से मानसिक शांति, साहस, और भगवान हनुमान की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है।

3. क्या मैं अपने बिस्तर पर हनुमान चालीसा पढ़ सकता हूं?

हाँ, आप अपने बिस्तर पर हनुमान चालीसा पढ़ सकते हैं, लेकिन इसे करते समय शुद्ध मन और पूरी श्रद्धा होनी चाहिए। अगर आप अस्वस्थ हैं या किसी विशेष स्थिति में हैं, तो बिस्तर पर भी हनुमान चालीसा का पाठ किया जा सकता है। ध्यान रहे कि इसे पढ़ते समय आपका मन भगवान हनुमान की भक्ति में केंद्रित हो और वातावरण में शांति हो।

4. हनुमान चालीसा कब नहीं पढ़ना चाहिए?

हनुमान चालीसा का पाठ किसी भी समय किया जा सकता है, लेकिन यह माना जाता है कि शुद्धता का ध्यान रखना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार, हनुमान चालीसा का पाठ भोजन के तुरंत बाद, रात के समय बिना स्नान किए, या अशुद्ध अवस्था में नहीं करना चाहिए। पवित्रता बनाए रखने और भगवान हनुमान की कृपा पाने के लिए स्नान के बाद, साफ वस्त्र पहनकर, और शुद्ध मन से हनुमान चालीसा का पाठ करना श्रेष्ठ माना गया है।

5. हनुमान चालीसा में क्या गलती है?

हनुमान चालीसा के श्लोकों में कोई गलती नहीं है। हालांकि, कुछ स्थानों पर अलग-अलग प्रचलित संस्करणों में शब्दों का अंतर देखने को मिलता है। यह भिन्नता पाठकों के उच्चारण, भाषा और क्षेत्रीय प्रभाव के कारण हो सकती है। इसलिए, हनुमान चालीसा पढ़ते समय सही उच्चारण और शुद्धता का ध्यान रखना आवश्यक है। इसके लिए तुलसीदास जी द्वारा लिखित मूल चालीसा का अनुसरण करना सबसे उपयुक्त है।

6. हनुमान चालीसा की शक्ति क्या है?

हनुमान चालीसा की शक्ति अत्यंत प्रभावशाली मानी जाती है। इसके नियमित पाठ से व्यक्ति के जीवन में शांति, सुरक्षा, और समृद्धि आती है। हनुमान चालीसा भगवान हनुमान की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने का सशक्त माध्यम है। इसका पाठ करने से भय, रोग, और संकट दूर होते हैं और मानसिक बल में वृद्धि होती है। इसके अलावा, हनुमान चालीसा का पाठ साधक को आत्मिक शुद्धता, साहस, और सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जाओं से मुक्ति दिलाता है।

7. हनुमान चालीसा कैसे डाउनलोड करें

दोस्तों यहाँ हमने हनुमान चालीसा PDF की फाइल दी हुई है। आप सिंगल क्लिक से डाउनलोड कर सकते है।

8. सबसे अच्छा हनुमान चालीसा कौन सा है?

हनुमान चालीसा के सभी संस्करण समान रूप से प्रभावी और पवित्र हैं, क्योंकि वे मूल रूप से गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित हैं। आपको वही संस्करण चुनना चाहिए जो आपको आसानी से समझ में आए और जिससे आप भावनात्मक रूप से जुड़ सकें।

9. रोज 7 बार हनुमान चालीसा पढ़ने से क्या होता है?

रोजाना 7 बार हनुमान चालीसा का पाठ करने से हनुमान जी की कृपा प्राप्त होती है। यह आपके जीवन से नकारात्मकता और भय को दूर करता है, मानसिक शांति प्रदान करता है और आपको आत्मविश्वास से भर देता है। यह साधना विशेष रूप से बाधाओं को दूर करने और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए फलदायी मानी जाती है।

10. सुबह 4:00 बजे हनुमान चालीसा पढ़ने से क्या होता है?

सुबह 4:00 बजे ब्रह्म मुहूर्त का समय होता है, जो आध्यात्मिक साधना के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। इस समय हनुमान चालीसा का पाठ करने से मानसिक शांति, ध्यान की गहराई और आध्यात्मिक ऊर्जा में वृद्धि होती है। यह समय ईश्वर से जुड़ने के लिए आदर्श होता है, और इससे दिन भर के लिए सकारात्मकता और ऊर्जा प्राप्त होती है।

11. 21 दिनों के लिए हनुमान पूजा क्या है?

21 दिनों की हनुमान पूजा एक विशेष साधना है, जिसमें भक्त 21 दिनों तक हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं और भगवान हनुमान को श्रद्धा और समर्पण के साथ पूजा अर्पित करते हैं। इसे किसी विशेष मनोकामना की पूर्ति या बाधाओं को दूर करने के लिए किया जाता है। इस साधना के दौरान भक्त नियमों का पालन करते हैं, जैसे ब्रह्मचर्य, शुद्ध आहार और नियमित पूजा। 21 दिनों के इस अनुष्ठान से हनुमान जी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

Hanuman चालीसा इन हिंदी PDF कहाँ से डाउनलोड करें?

अगर आप Hanuman चालीसा इन हिंदी pdf ढूंढ़ रहे हैं, तो आप सही जगह पर आए हैं। हनुमान चालीसा एक लोकप्रिय हिंदू भजन है, जिसकी रचना गोस्वामी तुलसीदास जी ने की थी। यह भक्ति-पाठ भगवान हनुमान जी की स्तुति में लिखा गया है और इसे हिंदी में पढ़ने का एक बहुत ही प्रभावशाली तरीका है उनके आशीर्वाद प्राप्त करने का।

डाउनलोड कैसे करें:
Hanuman चालीसा इन हिंदी pdf डाउनलोड करने के लिए, आप विश्वसनीय वेबसाइट्स जैसे कि Chalisa-pdf.com का उपयोग कर सकते हैं। इन साइट्स पर आपको मुफ्त और शुद्ध हिंदी में पीडीएफ फॉर्मेट में हनुमान चालीसा उपलब्ध मिल जाएगी।

उपयोग कैसे करें:
डाउनलोड की गई PDF को आप अपने मोबाइल, टैबलेट या कंप्यूटर पर सेव कर सकते हैं और कभी भी, कहीं भी इसका पाठ कर सकते हैं। यह विशेष रूप से यात्रा के समय या रोजाना पूजा में बहुत उपयोगी होता है।

मैं हनुमान चालीसा हिंदी में PDF कहाँ से डाउनलोड कर सकता हूँ?

आप हनुमान चालीसा हिंदी में PDF फ्री में डाउनलोड करने के लिए https://www.chalisa-pdf.com पर जा सकते हैं। वहाँ उच्च गुणवत्ता में स्कैन की गई हिंदी में चालीसा उपलब्ध है।

क्या मुझे hanuman चालीसा इन हिंदी PDF फॉर्मेट में इस वेबसाइट से मिल सकती है?

जी हाँ, आप hanuman चालीसा इन हिंदी PDF फॉर्मेट में chalisa-pdf.com से आसानी से डाउनलोड कर सकते हैं। यह वेबसाइट भक्तों के लिए सरल और साफ फॉर्मेट में PDF उपलब्ध कराती है।

हनुमान चालीसा पीडीएफ फाइल डाउनलोड करने की प्रक्रिया क्या है?

हनुमान चालीसा पीडीएफ फाइल डाउनलोड करने के लिए आपको बस https://www.chalisa-pdf.com पर जाकर संबंधित लिंक पर क्लिक करना है और आपकी फाइल तुरंत डाउनलोड हो जाएगी।

Can beginners recite Hanuman Chalisa?

Yes, beginners can absolutely recite the Hanuman Chalisa. It is a powerful and revered devotional hymn composed by the saint-poet Tulsidas in the 16th century, written in the Awadhi language.
The Hanuman Chalisa is accessible to anyone with a genuine desire to connect spiritually with Lord Hanuman, regardless of their background, level of knowledge, or experience in Hindu rituals. In fact, many people begin their spiritual journey by chanting or listening to the Hanuman Chalisa due to its simplicity, rhythm, and profound spiritual benefits.

For beginners, it is not necessary to know Sanskrit or have in-depth knowledge of Hindu scriptures. The verses can be learned gradually, and there are many transliterations and translations available to aid understanding. One does not need to worry about pronunciation in the early stages; devotion and sincerity are far more important than perfect enunciation. Over time, with regular recitation, familiarity with the verses and their meanings deepens naturally.

Moreover, Hanuman is often regarded as the epitome of devotion, humility, and strength. Devotees believe he is compassionate and quick to respond to sincere prayers, especially from those who approach him with a pure heart. Beginners often report feeling a sense of peace, protection, and growing confidence after reciting the Chalisa regularly. It’s also common for parents to encourage children to start reciting it from a young age to instill spiritual values and emotional strength.

There is no rigid requirement for a beginner to follow any elaborate rituals before chanting. Simple cleanliness, a calm mindset, and respect for the process are enough. Sitting quietly in a clean space, lighting a small lamp if possible, and focusing attention on Lord Hanuman while reciting the verses can be very effective.

Over time, reciting the Hanuman Chalisa becomes not just a spiritual act but also a meditative and calming daily habit. So yes, beginners are more than welcome to start their journey with this sacred hymn.

What is the best time to chant Hanuman Chalisa?

chanted at any time of the day, traditionally, the early morning hours at Brahma Muhurta (approximately 4:00 a.m. to 6:00 a.m.) and in the evening around sunset are considered most auspicious. Chanting during these times is believed to enhance its spiritual potency because these are calm and spiritually charged parts of the day when the mind is more focused and the environment is quieter.

Morning chanting helps set a positive tone for the day. It instills strength, clarity, and devotion, and is often associated with invoking the protective and purifying aspects of Lord Hanuman. Evening recitations, especially after sunset on Tuesdays and Saturdays (which are considered especially significant days for Hanuman worship), are believed to cleanse the mind of the day’s stress, fears, and negative energies.

However, the beauty of the Hanuman Chalisa lies in its flexibility. If someone cannot manage early morning or evening recitations, they can still benefit from chanting at any time that suits their schedule—whether during a break at work, during a walk, or before bedtime. The key is to maintain sincerity, focus, and regularity. Even listening to the Chalisa during daily chores or while commuting can have a calming and spiritually uplifting effect.

Many devotees choose specific days—such as Tuesdays and Saturdays—as their preferred days for more intense recitation, often repeating the Chalisa 11, 21, or even 108 times on these days for specific purposes such as protection, health, or spiritual growth.

Ultimately, there is no “wrong” time to chant the Hanuman Chalisa. What matters most is the mindset and intention behind the recitation. Lord Hanuman is believed to be ever-present and compassionate, especially toward those who seek his blessings with genuine faith and devotion. So, while there are recommended times, the best time is when one can chant with focus and heartfelt dedication.

Is there a specific number of times to recite it?

The Hanuman Chalisa can be recited as many times as one feels comfortable, but traditionally, specific numbers are often followed by devotees for spiritual discipline and focused intentions. A single recitation takes about 10 minutes and is commonly done daily. However, many people choose to repeat it 3, 7, 11, 21, or 108 times in one sitting, especially during challenging times, festivals, or for specific spiritual benefits.

Reciting the Hanuman Chalisa once daily is believed to offer protection, peace of mind, and strength. Three times a day (morning, noon, and night) is ideal for those who wish to deepen their practice and maintain continuous spiritual connection throughout the day. Eleven recitations are often performed for warding off obstacles and negative energies, while 21 times is believed to invoke strong blessings for resolving persistent issues.

For major spiritual efforts or specific wishes, devotees sometimes perform 108 recitations, often done over one or several days. Chanting the Chalisa 108 times is considered highly sacred, mirroring the spiritual significance of the number 108 in Hinduism, which represents the universe’s wholeness. Some do it in group settings, such as temples or during special prayer gatherings, particularly on Tuesdays or Hanuman Jayanti (the birthday of Lord Hanuman).

However, it’s important to note that the number of recitations should not become a mere ritualistic goal. The intention, focus, and devotion behind the chant matter much more than the count. Beginners can start with one or three times a day and gradually build up. Using a mala (rosary) of 108 beads can help keep count without distraction.

Ultimately, there’s no mandatory requirement for the number of times. Devotees are encouraged to chant according to their capacity, with sincerity and without pressure. Hanuman is known for his loving response to even a single heartfelt chant, so whether it’s once or 108 times, what counts most is the faith and love with which it is offered.

Can Hanuman Chalisa help with anxiety or fear?

Yes, many devotees believe that regularly reciting the Hanuman Chalisa can significantly help with anxiety, fear, and emotional stress. The hymn’s powerful verses glorify the strength, courage, and divine energy of Lord Hanuman, who is known in Hindu tradition as a protector and remover of fear. The recitation acts not only as a spiritual shield but also as a form of meditation that soothes the mind and calms the nervous system.

Each line of the Chalisa contains vibrations that, when spoken or heard with devotion, can create a sense of reassurance and stability. For those suffering from anxiety, the rhythmic chanting or listening to the Chalisa can provide a grounding effect, helping to shift the mind away from fear-driven thoughts and into a space of trust and surrender. The repetition itself can be therapeutic, functioning like a mantra that distracts from negative spirals and anchors the mind in something positive.

Many lines within the Chalisa directly invoke protection against ghosts, negative forces, and internal doubts. For example, the line “Bhoot pishach nikat nahi aave, Mahaveer jab naam sunave” implies that all evil, including negative thoughts or energies, will vanish when the name of the mighty Hanuman is spoken. This is particularly comforting to those experiencing fear, especially at night or during times of emotional vulnerability.

Additionally, Lord Hanuman is regarded as the embodiment of devotion and humility. Connecting with him through the Chalisa can instill a sense of inner strength and divine support. For individuals who struggle with loneliness, low confidence, or panic attacks, this devotional practice can become a powerful psychological and emotional anchor.

While the Hanuman Chalisa is not a substitute for professional help in cases of chronic anxiety, it can be a supportive tool alongside therapy or other treatments. Its uplifting energy, spiritual protection, and rhythmic repetition offer a safe and sacred space to turn to during moments of inner turmoil.

Is it okay to read it in English or other translations?

Yes, it is perfectly okay to read the Hanuman Chalisa in English or other translations if one is not fluent in the original Awadhi or Hindi. The essence of spiritual practice lies in the sincerity of devotion, not the language used. Lord Hanuman, as a divine being, responds to the heartfelt prayers of his devotees regardless of the tongue they speak.

Reading the Chalisa in a language you understand can actually deepen your connection to its meaning and spiritual significance.

For many non-Hindi speakers or new devotees, reading the Chalisa in English (or their native language) helps them comprehend the values, stories, and qualities of Lord Hanuman being described. This understanding strengthens faith and makes the practice more mindful rather than mechanical. There are many excellent translations available that retain the poetic structure and spiritual intent of the original verses.

Some devotees prefer to read the English version alongside the original, which allows them to both pronounce the traditional text and understand it simultaneously. Others alternate between versions depending on their mood or purpose. For example, one may read the English translation for study and understanding, then chant the original verses for devotion.

It is also common to sing or recite the Chalisa in a transliterated format—where the Hindi sounds are written using English alphabets. This is especially helpful for those who wish to chant the original sounds but are unfamiliar with Devanagari script. As long as the recitation is done with reverence and intention, any format is spiritually beneficial.

Ultimately, what matters most is your devotion, faith, and consistency. Language is merely a medium, and the divine energy invoked through the Hanuman Chalisa transcends all linguistic boundaries. Whether chanted in English, Tamil, Telugu, Bengali, or any other language, the power of the Chalisa remains

Where can I find Hanuman Chalisa in PDF format for free?

You can easily download Hanuman Chalisa in PDF from Chalisa PDF. The website provides clear, easy-to-read versions in Hindi and English. Many devotees prefer PDF format because it can be saved on mobile, tablet, or laptop for daily recitation without carrying a book.

Is the Hanuman Chalisa in PDF available in Hindi as well as English?

Yes, both versions are available. If you want the authentic Hindi text or the English transliteration, you’ll find reliable options at Chalisa PDF.

Can I download Hanuman Chalisa MP3 sung by Gulshan Kumar from Gaana?

While many music apps like Gaana and YouTube host versions of the Hanuman Chalisa, devotees searching for Hanuman Chalisa MP3 download Gulshan Kumar can also find resources and related links at Chalisa PDF. It’s always good to listen while also keeping a text version handy for chanting.

Why is Gulshan Kumar’s Hanuman Chalisa so popular?

Gulshan Kumar’s soulful recitation has touched millions of devotees. His voice adds devotion and calmness, making the prayer experience more spiritual. You can pair the MP3 listening with a written Hanuman Chalisa in PDF to follow along easily.

How do I download Hanuman Chalisa for offline reading?

Simply visit Chalisa PDF and select the option for Hanuman Chalisa download. The file is lightweight, mobile-friendly, and works without internet once saved.

Why should I download Hanuman Chalisa instead of just reading online?

Downloading gives you quick offline access. Many devotees like to recite early in the morning or while traveling, and with a Hanuman Chalisa download from Chalisa PDF, you can pray without relying on internet connectivity.

क्या मैं हनुमान चालीसा pdf ऑनलाइन डाउनलोड कर सकता हूँ?

हाँ, आप आसानी से Chalisa PDF से हनुमान चालीसा pdf मुफ्त में डाउनलोड कर सकते हैं। यह स्पष्ट और शुद्ध पाठ उपलब्ध कराता है, जिसे मोबाइल या कंप्यूटर पर कहीं भी पढ़ा जा सकता है।

हनुमान चालीसा pdf पढ़ने के क्या लाभ हैं?

हनुमान चालीसा का पाठ मन को शांति देता है और भय दूर करता है। अगर आपके पास हनुमान चालीसा pdf सेव है, तो आप कभी भी, कहीं भी इसका पाठ कर सकते हैं। इसे Chalisa PDF से तुरंत डाउनलोड करना सबसे आसान तरीका है।

Hanuman Chalisa डाउनलोड Song

Hanuman chalisa डाउनलोड song करने के लिए आप भरोसेमंद भक्ति वेबसाइट्स या म्यूज़िक प्लेटफॉर्म का उपयोग कर सकते हैं। आजकल कई लोग MP3 या PDF के साथ ऑडियो भजन डाउनलोड करना पसंद करते हैं ताकि वे ऑफलाइन भी पाठ या श्रवण कर सकें। ध्यान रखें कि आप जिस वेबसाइट से डाउनलोड कर रहे हैं, वह सुरक्षित हो और भक्ति सामग्री मुफ्त व सही स्वरूप में दे रही हो। Hanuman Chalisa का नियमित श्रवण मानसिक शांति, साहस और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है, इसलिए हमेशा साफ़ और स्पष्ट ऑडियो वर्ज़न चुनें।

Hanuman Chalisa Download mp3 Pagalworld

hanuman chalisa download mp3 pagalworld जैसे कीवर्ड लोग अक्सर फ्री MP3 खोजने के लिए इस्तेमाल करते हैं। लेकिन Pagalworld जैसी साइट्स पर कॉपीराइट और ऑडियो क्वालिटी को लेकर सावधानी बरतनी चाहिए। कई बार वहां फाइल्स compressed होती हैं या unwanted ads के साथ आती हैं। अगर आप शुद्ध, स्पष्ट और आध्यात्मिक अनुभव चाहते हैं, तो आधिकारिक भक्ति प्लेटफॉर्म Chalisa pdf websites से MP3 डाउनलोड करना ज्यादा बेहतर और सुरक्षित माना जाता है।

Hanuman Chalisa mp3 Download Gaana Gulshan Kumar वर्ज़न क्यों लोकप्रिय है?

Hanuman chalisa mp3 download gaana gulshan kumar इसलिए ज्यादा सर्च किया जाता है क्योंकि Gulshan Kumar द्वारा गाया गया Hanuman Chalisa सबसे प्रसिद्ध और श्रद्धापूर्ण संस्करण माना जाता है। उनकी आवाज़ में भक्ति, श्रद्धा और शुद्ध उच्चारण सुनने वालों के मन को गहराई से छूता है। Gaana जैसे म्यूज़िक ऐप्स पर यह वर्ज़न हाई क्वालिटी में उपलब्ध होता है, जिसे आप डाउनलोड कर ऑफलाइन भी सुन सकते हैं। यह वर्ज़न रोज़ाना पाठ और मंगलवार या शनिवार के व्रत के लिए खास पसंद किया जाता है।

Hanuman Chalisa full hd download किसके लिए उपयोगी है?

Hanuman chalisa full hd download उन भक्तों के लिए उपयोगी है जो वीडियो या इमेज के साथ पाठ करना चाहते हैं। Full HD वर्ज़न में साफ़ टेक्स्ट, सुंदर बैकग्राउंड और स्पष्ट ऑडियो होता है, जिससे मंदिर, घर या सत्संग में सामूहिक पाठ करना आसान हो जाता है। कई लोग इसे TV, मोबाइल या प्रोजेक्टर पर चलाकर आरती या सुंदरकांड के समय उपयोग करते हैं। हमेशा HD फाइल डाउनलोड करते समय फाइल साइज और स्रोत की विश्वसनीयता जरूर जांचें।

1 दिन में कितनी बार हनुमान चालीसा पढ़नी चाहिए?

हनुमान चालीसा को दिन में कम से कम 1-3 बार पढ़ना शुभ माना जाता है। सुबह स्नान के बाद 1 बार, दोपहर में 1 बार, और रात को सोने से पहले 1 बार पढ़ने से मानसिक शांति और सुरक्षा मिलती है। ज्योतिषियों के अनुसार, कोई सख्त नियम नहीं है – श्रद्धा और भक्ति के अनुसार पढ़ें।

सबसे पावरफुल चालीसा कौन सा है?

हनुमान चालीसा को सबसे पावरफुल चालीसा माना जाता है। संकटमोचन हनुमान जी की विशेष कृपा के कारण यह सभी चालिसाओं में सर्वश्रेष्ठ है। रामभक्त हनुमान जी के गुणों का वर्णन करने वाली यह चालीसा हर समस्या का निवारण करती है।

क्या मैं बिस्तर पर हनुमान चालीसा पढ़ सकता हूँ?

हाँ, आप बिस्तर पर भी हनुमान चालीसा पढ़ सकते हैं। शास्त्रों में इसके लिए कोई निषेध नहीं है। मुख्य बात है मन की शुद्धता और भक्ति। हालांकि स्नान करके आसन पर पढ़ना अधिक पुण्यदायी माना जाता है, लेकिन जरूरत पड़ने पर बिस्तर पर भी भक्ति भाव से पढ़ना स्वीकार्य है।

7 बार हनुमान चालीसा पढ़ने के क्या फायदे हैं?

7 बार हनुमान चालीसा पढ़ने के विशेष फायदे:
संकट निवारण: सभी प्रकार के भय, भूत-प्रेत बाधा दूर होती है
आकस्मिक लाभ: नौकरी, व्यापार, परीक्षा में सफलता मिलती है
मानसिक शांति: तनाव, चिंता, डर दूर होता है
शत्रु नाश: शत्रुओं का नाश, न्याय मिलता है
स्वास्थ्य लाभ: पुरानी बीमारियों में राहत मिलती है


For devotees and spiritual seekers exploring Hindu devotional literature, numerous sacred texts and hymns are available to deepen your practice. A Chalisa, a forty-verse hymn of praise, is a central form of devotion for many deities. Among the most revered is the Radha Chalisa, celebrating the divine love of Shri Radha Rani. Other powerful Chalisa texts include the Shiv Chalisa, the Hanuman Chalisa, the Kaali Chalisa, the Vishnu Chalisa, the Ram Chalisa, and the Tulsi Chalisa. You can also find specialized hymns like the Gayatri Chalisa, Santoshi Mata Chalisa, Brihaspati Chalisa, Sai Chalisa, Annapurna Chalisa, Baglamukhi Chalisa, Shri Adinath Chalisa, and the Vindhyeshwari Chalisa. For daily worship rituals, Aarti songs are essential. Key aartis available include the Maa Durga Aarti, Sai Baba Aarti, Saraswati Ji Ki Aarti, the Aarti Kunj Bihari Ki for Lord Krishna, Mata Kalratri Ki Aarti, Shri Surya Dev Aarti, Shri Jankinatha Ji Ki Aarti, and the Om Jai Mahavir Prabhu Aarti. Important Stotrams (hymns of praise) and prayers include the profound Vishnu Sahasranama Stotram (thousand names of Vishnu), the protective Ram Raksha Stotra, the powerful Mahishasura Mardini Stotram for Goddess Durga, the Kanakadhara Stotram, and the Santan Gopal Stotra. The Shri Ganpati Atharvashirsha is a key text for Lord Ganesha worship. For the devotion of Hanuman Ji, resources extend beyond the Chalisa to include lyrical hymns like Gauri Nandana Gajanana, Cham Cham Nache Dekho Veer Hanumana, and Veer Hanumana Ati Balwana. Audio formats are also available, such as Hanuman Chalisa Hindi Audio, Hanuman Chalisa MP3, and for download, Hanuman Chalisa MP3 Download.

Free Hanuman Chalisa MP3 Download | High Quality Audio | 2026

Experience divine peace. Download a free, high-quality Hanuman Chalisa MP3 for 2025. Our soulful, crystal-clear audio rendition is perfect for daily prayers, meditation, and spiritual solace. Authentic lyrics, expert vocals, 100% safe download.

Welcome, seeker of peace and devotion. At Chalisa-Pdf.com, we understand that the Hanuman Chalisa is more than just a prayer; it is a powerful tool for spiritual elevation, inner strength, and divine connection. For years, our team of dedicated devotees and audio experts has been committed to preserving and sharing the sacred sounds of Sanatana Dharma. We don’t just host files; we curate experiences.

This 2026 edition of our Hanuman Chalisa Devotional Audio, Digital Track is the culmination of meticulous effort. It features a renowned, classically trained vocalist, recording in a professional studio environment to ensure every syllable is clear, every note resonates with devotion (Bhakti), and the audio quality is pristine. We offer this to you completely free, as a service (seva), to support your spiritual journey.

The Benefits of Listening to the Hanuman Chalisa MP3

Backed by both scripture and modern psychology, regular listening (or chanting) of the Hanuman Chalisa is known to:

  • Reduce stress and anxiety, promoting mental calmness.
  • Instill courage (Nirbhayta) and overcome fears.
  • Remove negative energies and obstacles (Vighna).
  • Improve focus and discipline.
  • Create a protective, positive aura around the listener.
  • Download: Hanuman Chalisa PDF | Sai Chalisa PDF | Durga Chalisa Pdf

Hanuman Chalisa MP3 Songs Download, hanuman chalisa download - hanuman chalisa mp3 download

In today’s fast-paced world, where stress has become a part of our daily routine, everyone is searching for mental peace and inner strength. In such times, the recitation of the Hanuman Chalisa is a spiritual anchor, providing immense power and profound peace.

But do you always have the time to sit down with a physical book? Probably not. This is why everyone is looking for a reliable way to access a Hanuman Chalisa MP3 download.

In the vast world of the internet, finding a high-quality recording of the Chalisa might seem easy, but are all websites trustworthy? When you try a “Hanuman Chalisa audio download,” could you accidentally download a virus to your phone? Or will a search for a Free Hanuman Chalisa MP3 download lead you to a low-quality, distorted audio file? These are valid concerns we all share.

This blog post will guide you on where to safely download sacred hymns like the Hanuman Chalisa in high quality, completely free of charge. Consider this your complete guide to finding an authentic Hanuman Chalisa MP3 free download. We’ll help you maintain your devotional focus while ensuring your device stays safe. Learn the right way to download the Hanuman Chalisa song and easily integrate spirituality into your daily life.


Audio Quality Specifications

File Size: Approximately 10-15 MB for complete Chalisa

Bit Rate: 192-320 kbps for optimal devotional experience

Sample Rate: 44.1 kHz (CD quality)

Channels: Stereo for spatial depth in musical arrangements

Compatibility Across Devices

The MP3 format ensures playability on:

  • Smartphones (iOS/Android)
  • Digital music players
  • Car audio systems
  • Home entertainment systems
  • Dedicated prayer room setups

आज के डिजिटल युग में, जहाँ हर चीज़ हमारी उंगलियों के इशारे पर चलती है, भक्ति भी इससे अछूती नहीं रही। कल्याणकारी श्री हनुमान चालीसा अब सिर्फ किताबों के पन्नों तक सीमित नहीं है; यह आपके स्मार्टफोन में भी समा चुकी है। चाहे आप यात्रा कर रहे हों, व्यायाम कर रहे हों, या बस अपने दिन की शुरुआत सकारात्मक ऊर्जा के साथ करना चाहते हों, Shree Hanuman Chalisa MP3 Song Play & Download का विकल्प एक वरदान से कम नहीं है।

अब आपके पास यह अद्भुत सुविधा है कि आप किसी भी समय, कहीं भी बस एक क्लिक से अपने प्रभू की भक्ति में लीन हो सकते हैं। Hanuman Chalisa MP3 Download करके आप इसे बिना इंटरनेट के भी सुन सकते हैं, जिससे आपका जप-ध्यान बिना किसी रुकावट के चलता रहे। Hanuman Chalisa song download की यह सुविधा न केवल आपकी भक्ति को निर्बाध बनाती है, बल्कि आधुनिक जीवनशैली के साथ सनातन परंपरा को जोड़ने का एक सुंदर सेतु भी है।

Shree Hanuman Chalisa MP3 free download के माध्यम से अपने डिवाइस में इस पावन आवाज़ को स्थान दें और हनुमान जी की अनुकंपा को अपने जीवन में प्रवाहित होने दें। अपनी भक्ति को डिजिटल स्वरूप देकर इसे और गहरा बनाएं।


आज के समय में जहाँ हर चीज़ की गति तेज़ हो गई है, वहाँ भक्ति के लिए भी समय निकाल पाना एक चुनौती बन गया है। पर क्या आप जानते हैं कि अब आपकी आराधना की गति भी सुपरफास्ट हो सकती है? जी हाँ! Superfast Hanuman Chalisa MP3 Play & Download का option आपके लिए एक वरदान से कम नहीं है।

अगर आप अपने दिन की शुरुआत ताकत और सकारात्मक ऊर्जा के साथ करना चाहते हैं, परन्तु समय की कमी है, तो यह आपके लिए बिल्कुल सही solution है। Superfast Hanuman Chalisa की यह special recording आपको मात्र कुछ ही मिनटों में पूर्ण आध्यात्मिक अनुभव देती है। बस एक क्लिक के साथ Hanuman Chalisa MP3 Download करें और इसे कहीं भी, कभी भी सुनें – चाहे वो आपका morning commute हो, workout session हो, या बस दफ्तर में बीच का एक short break।

यह Superfast version पारंपरिक श्रद्धा और आधुनिक technology का अद्भुत मेल है, जो specially उन भक्तों के लिए तैयार की गई है जो fast-paced life जीते हैं। Play & Download का option आपको instant access देता है, बिना किसी देरी के। तो अब इंतज़ार किस बात का? Download कीजिए और अपने दिन को divine energy से भर दीजिए


क्या आपने कभी सोचा है कि हनुमान चालीसा का पाठ करते समय अगर संगीत सिर्फ आपकी आवाज़ के लिए हो, तो अनुभव कितना विशेष और आनंददायक हो सकता है? आज की डिजिटल दुनिया में भक्ति और तकनीक का यह अद्भुत मेल श्री हनुमान चालीसा कराओके के रूप में सामने आया है। अब आप न सिर्फ हनुमान चालीसा सुन सकते हैं, बल्कि स्वयं गाकर अपनी श्रद्धा को और भी गहरा कर सकते हैं।

Shree Hanuman Chalisa Karaoke Music Play & Download की सुविधा के साथ, आप अपने मोबाइल या कंप्यूटर पर बिना आवाज़ के मधुर संगीत में हनुमान चालीसा का पाठ कर सकते हैं। यह पूरी तरह से आपका अपना, निजी भक्ति सत्र होगा। चाहे आप एक अनुभवी गायक हों या फिर सिर्फ भावना से गाना चाहते हों, यह कराओके संस्करण आपको एक नया जोश और आत्मविश्वास देगा।

इस ब्लॉग में, हम आपको बताएंगे कि हाई-क्वालिटी Hanuman Chalisa Karaoke Track कहाँ से मिलेगी, उसे कैसे Play करें और आसानी से Download करें। तो तैयार हो जाइए, अपनी आवाज़ में भक्ति का रस घोलने और बजरंगबली की अनुकंपा पाने के लिए!


आधुनिक जीवन की तेज़ रफ़्तार में, जहाँ समय की कमी हमेशा बनी रहती है, वहाँ पूजा-पाठ और आरती के लिए भी पल निकाल पाना मुश्किल हो जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अब आपकी भक्ति आपके साथ कहीं भी, कभी भी हो सकती है? जी हाँ, Shree Hanuman Arti MP3 Play & Download के ज़रिए अब आप हनुमान जी की मंगलमयी आरती को अपने मोबाइल में संग्रहित कर सकते हैं और इसे किसी भी वक्त बजा सकते हैं।

चाहे आप सुबह की भागदौड़ में हों, ऑफिस जा रहे हों, या फिर रात को सोने से पहले मन शांत करना चाहते हों, Hanuman Arti MP3 Download करके आप एक पल में भक्ति के माहौल में खो सकते हैं। Shree Hanuman Arti song download करना न केवल आसान है, बल्कि यह आपकी daily routine में spirituality को weave करने का एक शानदार तरीका है। Free Hanuman Arti MP3 download options की मदद से आप बिना किसी खर्च के हनुमान जी की आवाज़ को अपने कानों तक पहुँचा सकते हैं।

यह सुविधा खासकर उन भक्तों के लिए एक वरदान है जो Hanuman Arti audio download करके अपने बच्चों को भी इसकी मधुर ताल और भक्तिमय शब्द सिखाना चाहते हैं। इस blog post में, हम आपको बताएँगे कि Shree Hanuman Arti MP3 play करने और इसे safely download करने के best platforms कौन से हैं, ताकि आपका हर दिन हनुमान जी की divine melodies के साथ शुरू और खत्म हो।


आधुनिक जीवन की तेज़ रफ़्तार और व्यस्तताओं के बीच, पूजा-पाठ और आरती के लिए समय निकाल पाना अक्सर एक चुनौती बन जाता है। ऐसे में, प्रौद्योगिकी ने हमारी भक्ति को एक नया आयाम दिया है। श्री हनुमान जी की आरती जैसे पावन भजन अब हमारे स्मार्टफोन में हमारे साथ चल सकते हैं। चाहे आप ऑफिस जाते हुए हों, घर के काम में व्यस्त हों, या फिर बस मन को शांति की तलाश हो—बस एक क्लिक आपको भक्ति के सागर में डुबो सकती है।

Shree Hanuman Ji Ki Aarti MP3 Play & Download की खोज करना आज के समय की एक स्वाभाविक ज़रूरत बन गई है। यह सुविधा हर उस भक्त के लिए एक वरदान है जो हनुमान जी की मंगलमयी आवाज़ को अपने साथ रखना चाहता है। MP3 फॉर्मेट में आरती डाउनलोड करने से आप इसे बिना इंटरनेट के भी, कभी भी, कहीं भी सुन सकते हैं और अपने दिन की शुरुआत या अंत एक दिव्य अनुभूति के साथ कर सकते हैं।

इस लेख में, हम आपको बताएँगे कि Hanuman Ji Ki Aarti MP3 Download कैसे करें, विश्वसनीय स्रोत कौन-से हैं, और किन बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है ताकि आपका भक्ति भाव बना रहे और आपका डिवाइस भी सुरक्षित रहे। आइए, इस डिजिटल यात्रा को एक पवित्र भक्ति-यात्रा बनाते हैं।


आज के समय में, जहाँ तनाव और चिंता हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन गए हैं, वहाँ मन की शांति और आंतरिक शक्ति की खोज हर किसी के लिए जरूरी है। ऐसे में, मंत्रों का जाप एक शक्तिशाली साधन बनकर उभरा है। और जब बात हनुमान जी के सबसे गूढ़ और शक्तिशाली मंत्र “ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय” की आती है, तो इसकी महत्ता और भी बढ़ जाती है। यह मंत्र हनुमान जी के रुद्र अवतार होने का बोध कराता है और इसे सुनने-जपने से भक्त को अद्भुत साहस, संकटों से मुक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा की प्राप्ति होती है।

पर एक सवाल अक्सर हर भक्त के मन में आता है: “क्या इस मंत्र का १०८ बार सही उच्चारण के साथ जाप कर पाना हमेशा संभव हो पाता है?” जवाब अक्सर ‘नहीं’ में होता है। इसी कठिनाई को दूर करने के लिए डिजिटल युग में Om Namo Hanumate Rudravataraya Mantra 108 Times MP3 Play & Download का विकल्प एक वरदान बनकर आया है। अब आप कहीं भी, कभी भी, इस मंत्र के शुद्ध और निरंतर जाप से अपने आस-पास एक दिव्य atmosphere निर्मित कर सकते हैं।

यह ब्लॉग पोस्ट आपको इसी शक्तिशाली मंत्र के MP3 Download के सुरक्षित और विश्वसनीय स्रोतों से जोड़ेगी। 108 Times Play का option आपको एकाग्रचित्त होकर deep meditation में सहायता करेगा। Free Download करके आप इसे अपने daily routine का हिस्सा बना सकते हैं। आइए, जानते हैं कि कैसे यह मंत्र आपके जीवन में positivity का संचार कर सकता है और इसे आसानी से कहाँ से Download किया जा सकता है।


आज के डिजिटल युग में, जहाँ समय की कमी एक बड़ी चुनौती बन गई है, वहाँ पूरा सुंदरकांड का पाठ सुनना या पढ़ना शायद हर किसी के लिए संभव नहीं हो पाता। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान हनुमान की उस अद्भुत लीला, जो हमें जीवन की हर बाधा से लड़ने की शक्ति देती है, अब आपके स्मार्टफोन में भी समा सकती है? जी हाँ, अब Full Sunderkand MP3 Play & Download की सुविधा के साथ, आप कभी भी, कहीं भी इस पावन कथा के श्रवण का पुण्य लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

सुंदरकांड MP3 download की खोज सिर्फ एक फाइल डाउनलोड करने के बारे में नहीं है; यह अपने जीवन में सकारात्मकता, धैर्य और विजय का मार्ग खोलने के बारे में है। चाहे आप लंबी यात्रा पर हों, घर के काम कर रही हों, या फिर शांति से बैठकर ध्यान लगाना चाहते हों, Sunderkand audio download करके आप अपने आसपास एक दिव्य atmosphere बना सकते हैं।

पर क्या आप Free Sunderkand MP3 download के लिए एक भरोसेमंद स्रोत ढूंढ रहे हैं? क्या आप Download Sunderkand path को लेकर चिंतित हैं कि कहीं आपको खराब quality का audio या unwanted pop-up ads न झेलने पड़ें? यह डर बिल्कुल वाजिब है।

इस ब्लॉग पोस्ट में, हम आपको Sunderkand MP3 free download के सुरक्षित, सुलभ और उच्च-गुणवत्ता वाले स्रोतों से परिचित कराएंगे। Play Sunderkand online या Download Sunderkand song का सबसे आसान और विश्वसनीय तरीका जानिए, ताकि आप बिना किसी चिंता के हनुमान जी की इस महान गाथा का आनंद ले सकें और अपने जीवन में उसकी शक्ति को उतार सकें।


Legal and Ethical Download Considerations

Copyright Awareness

While many traditional renditions exist in public domain, contemporary arrangements may have copyright protections. Always ensure your Hanuman Chalisa MP3 download comes from authorized sources that respect artists’ rights.

Supporting Devotional Artists

Consider purchasing official versions when possible, supporting the ecosystem of devotional music creation and preservation.

Advanced Applications of Hanuman Chalisa MP3

Therapeutic Use

  • Sound Healing: Integrating into meditation and yoga practices
  • Sleep Aid: Calming versions for insomnia relief
  • Anxiety Management: During stressful situations or panic episodes

Ritual Integration

  • During Puja: As background for personal worship
  • Yagnas and Havans: Amplifying ceremonial vibrations
  • Group Satsangs: Creating collective devotional energy

Comparative Analysis: MP3 vs Other Formats

MP3 Advantages

  • Universal compatibility
  • Balanced quality and file size
  • Easy to organize in playlists
  • Offline accessibility

Alternative Formats

  • FLAC: Superior quality but larger files
  • Streaming: Convenient but dependent on connectivity
  • CD: Traditional but less portable

Creating Your Personal Hanuman Chalisa Practice

Customized Listening Schedule

  1. Daily Practice: Morning and evening 15-minute sessions
  2. Weekly Deep Dive: Extended listening on Tuesdays
  3. Monthly Immersion: Full day listening on Hanuman Jayanti

Combining Modalities

  • Listen while reading lyrics for deeper understanding
  • Chant along once familiar with verses
  • Meditate in silence after listening for internalization

I’m looking for a simple hanuman chalisa download. Where can I get a reliable and high-quality version?

For a straightforward and secure download, we recommend visiting our dedicated resource page. We offer a high-fidelity version in multiple formats: Hanuman Chalisa Download – Secure & HD Quality

What is the best source for a hanuman chalisa mp3 file?

The best sources are official music streaming apps like Gaana, Wynk, or Spotify. However, for a direct hanuman chalisa download mp3 without a subscription, you can find a trusted link on our website, ensuring no malware or poor audio quality.

I’ve seen searches for hanuman chalisa hindi audio mp3 download jattmate and hanuman chalisa mp3 download jattmate. Is this site safe?

We always advise caution with third-party download sites like JattMate. While they may offer Complimentary downloads, they often come with intrusive ads, pop-ups, and a risk of malware. For a guaranteed safe experience, it’s better to use our ad-free platform or official apps.

Is hanuman chalisa my mp3 song download pagalworld a good option?

Similar to JattMate, PagalWorld is not an official distributor. Downloading copyrighted content from such sites may be illegal and often compromises your device’s security. We provide a 100% legal and safe alternative for your hanuman chalisa free download.

I’m more comfortable searching in Hindi. Where can I do a hanuman चालीसा download?

आप बिल्कुल सही जगह पर हैं! हमारी वेबसाइट हिंदी भाषियों के लिए पूरी तरह अनुकूल है। आप आसानी से hanuman chalisa डाउनलोड कर सकते हैं: यहाँ क्लिक करके हनुमान चालीसा डाउनलोड करें

I want the popular version by Gulshan Kumar. How can I get a hanuman chalisa mp3 download gaana gulshan kumar?

The Gulshan Kumar version is a classic! While you can stream it on Gaana with a subscription, we also offer a high-quality hanuman chalisa mp3 download gaana style version directly on our site for free, so you can enjoy it offline anytime.

What’s the difference between a shree hanuman chalisa download and a hanuman chalisa download song?

These terms are generally used interchangeably by devotees looking for the audio file. Whether you search for shree hanuman chalisa download or hanuman chalisa download song, you will find the same sacred hymn on our platform, ready for you to play or download.

I just want to listen online first. Can I hanuman chalisa audio download later if I like it?

Absolutely! Our player allows you to stream the audio clearly online. If you wish to save it for offline listening—like during travel or when you have no internet—the hanuman chalisa audio download option is right there for you.

Is it really free? I need a hanuman chalisa download free of cost.

Yes, absolutely. We believe in making this divine content accessible to all. Our hanuman chalisa free download service is completely free of charge. There are no hidden fees or subscriptions required.

Sawan: The Foods to Eat and Avoid During Your Sacred Fast

Shri Sharda Chalisa PDF- श्री शारदा चालीसा 2026

श्री शारदा चालीसा (Shri Sharda Chalisa PDF) भारतीय धार्मिक ग्रंथों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है, जो माँ शारदा देवी की महिमा और गुणों का वर्णन करता है। शारदा देवी, जिन्हें विद्या, ज्ञान और कला की देवी के रूप में पूजा जाता है, अपने भक्तों को जीवन में ज्ञान, विवेक और मार्गदर्शन प्रदान करती हैं। यह चालीसा विशेष रूप से उन लोगों के लिए अति लाभकारी मानी जाती है जो शिक्षा, संगीत, कला और साहित्य के क्षेत्र में कार्यरत हैं।

इसे श्रद्धा और भक्ति के साथ पढ़ने से न केवल मन को शांति मिलती है, बल्कि आत्मा को भी परम शक्ति से जोड़ने का अवसर मिलता है। इस चालीसा में माँ शारदा की स्तुति के माध्यम से उनकी कृपा प्राप्ति का मार्ग बताया गया है, जिससे व्यक्ति अपने जीवन में आध्यात्मिक और मानसिक विकास की दिशा में अग्रसर हो सकता है।

श्री शारदा चालीसा के माध्यम से हम माँ शारदा की उस महिमा का अनुभव कर सकते हैं जो हर एक व्यक्ति के अंदर विद्यमान अज्ञानता के अंधकार को दूर कर उसे ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित करती है। यह चालीसा न केवल एक धार्मिक स्तुति है, बल्कि एक साधना का माध्यम भी है, जिससे व्यक्ति में सकारात्मकता, मानसिक शांति और आत्मविश्वास का संचार होता है।

भौतिकता की चकाचौंध में खोए हुए मनुष्य को यह चालीसा आध्यात्मिकता की ओर पुनः प्रेरित करती है और उसे यह अहसास दिलाती है कि असली ज्ञान का अर्थ केवल बाहरी विद्या नहीं, बल्कि आत्म-ज्ञान में है। “श्री शारदा चालीसा” का नियमित पाठ करने से जीवन में सुख, शांति और सफलता का आगमन होता है, और व्यक्ति हर कठिनाई का सामना धैर्य और साहस से कर पाता है।

श्री लक्ष्मी जी की आरती | श्री गणेश आरती | श्री शनिदेव आरती | श्री राम आरती | श्री जगन्नाथ संध्या आरती श्री सीता आरती | चन्द्र देव की आरती | माँ महाकाली आरती | श्री जानकीनाथ जी की आरती | मुंडेश्वरी मंदिर | तनोट माता मंदिर


  • हिंदी
  • English

श्री शारदा चालीसा

॥ दोहा ॥
मूर्ति स्वयंभू शारदा,
मैहर आन विराज।
माला पुस्तक धारिणी,
वीणा कर में साज ।।

॥ चौपाई ॥
जय जय जय शारदा महारानी,
आदि शक्ति तुम जग कल्याणी ।

रूप चतुर्भुज तुम्हरो माता,
तीन लोक महं तुम विख्याता।

दो सहस्त्र वर्षहि अनुमाना,
प्रगट भई शारद जग जाना।

मैहर नगर विश्व विख्याता,
जहां बैठी शारद जग माता।

त्रिकूट पर्वत शारदा वासा,
मैहर नगरी परम प्रकाशा ।

शरद इन्दु सम बदन तुम्हारो,
रूप, चतुर्भुज अतिशय प्यारो ।

कोटि सूर्य सम तन द्युति पावन,
राज हंस तुम्हरो शचि वाहन।

कानन कुण्डल लोल सुहावहि,
उरमणि भाल अनूपम दिखावहिं ।

वीणा पुस्तक अभय धारिणी,
जगत्मातु तुम जग विहारिणी।

ब्रह्म सुता अखंड अनूपा,
शारद गुण गावत सुरभूपा।

हरिहर करहिं शारदा बन्दन,
वरूण कुबेर करहिं अभिनन्दन।

शारद रूप चण्डी अवतारा,
चण्ड मुण्ड असुर संहारा।

महिषासुर वध कीन्हि भवानी,
दुर्गा बन शारद कल्याणी ।

धरा रूप शारद भई चण्डी,
रक्त बीज काटा रण मुण्डी ।

तुलसी सूर्य आदि विद्वाना,
शारद सुयश सदैव बखाना ।

कालिदास भए अति विख्याता,
तुम्हरी दया शारदा माता ।

वाल्मिक नारद मुनि देवा,
पुनि पुनि करहिं शारदा सेवा ।

चरण शरण देवहु जग माया,
सब जग व्यापहिं शारद माया ।

अणु परमाणु में शारदा वासा,
परम शक्तिमय परम प्रकाशा ।

हे शारद तुम ब्रह्म स्वरूपा,
शिव विरंचि पूजहिं नर भूपा ।

ब्रह्म शक्ति नहि एकउ भेदा,
शारद के गुण गावहिं वेदा ।

जय जग बन्दनि विश्व स्वरूपा,
निर्गुण सगुण शारदहिं रूपा ।

सुमिरहु शारद नाम अखंडा,
व्यापइ नहिं कलिकाल प्रचण्डा ।

सूर्य-चन्द्र नभ मण्डल तारे,
शारद कृपा चमकते सारे ।

उद्धव स्थिति प्रलय कारिणी,
बन्दउ शारद जगत तारिणी ।

दुःख दरिद्र सब जाहिं नसाई,
तुम्हारी कृपा शारदा माई।

परम पुनीति जगत अधारा,
मातु शारदा ज्ञान तुम्हारा ।

विद्या बुधि मिलहिं सुखदानी,
जय जय जय शारदा भवानी ।

शारदे पूजन जो जन करहीं,
निश्चय ते भव सागर तरहीं।

शारद कृपा मिलहिं शुचि ज्ञाना,
होई सकल विधि अति कल्याणा।

जग के विषय महा दुःख दाई,
भजहूँ शारदा अति सुख पाई।

परम प्रकाश शारदा तोरा,
दिव्य किरण देवहूँ मम ओरा ।

परमानन्द मगन मन होई,
मातु शारदा सुमिरई जोई।

चित्त शान्त होवहिं जप ध्याना,
भजहूँ शारदा होवहिं ज्ञाना।

रचना रचित शारदा केरी,
पाठ करहिं भव छटई फेरी ।

सत् सत् नमन पढ़ीहे धरिध्याना,
शारद मातु करहिं कल्याणा।

शारद महिमा को जग जाना,
नेति नेति कह वेद बखाना ।

सत् सत् नमन शारदा तोरा,
कृपा दृष्टि कीजै मम ओरा।

जो जन सेवा करहिं तुम्हारी,
तिन कहँ कतहुं नाहि दुःखभारी।

जो यह पाठ करै चालीसा,
मातु शारदा देहुँ आशीषा ।।

॥ दोहा ॥
बन्दुउँ शारद चरण रज,
भक्ति ज्ञान मोहि देहुँ।
सकल अविद्या दूर कर,
सदा बसहु उरगेहुँ ।।

Shri Sharda Chalisa Lyrics English


॥ Doha ॥
Murti Svayambhu Sharada,
Maihara Ana Viraja।
Mala, Pustaka, Dharini,
Vina Kara Mein Saja॥

॥ Chaupai ॥
Jai Jai Jai Sharada Maharani।
Adi Shakti Tuma Jaga Kalyani॥

Rupa Chaturbhuja Tumharo Mata।
Tina Loka Maham Tuma Vikhyata॥

Do Sahasra Barshahi Anumana।
Pragata Bhai Sharada Jaga Jana॥

Maihara Nagara Vishva Vikhyata।
Jahan Baithi Sharada Jaga Mata॥

Trikuta Parvata Sharada Vasa।
Maihara Nagari Parama Prakasha॥

Sharada Indu Sama Badana Tumharo।
Rupa Chaturbhuja Atishaya Pyaro॥

Koti Surya Sama Tana Dyuti Pavana।
Raja Hansa Tumharo Shachi Vahana॥

Kanana Kundala Lola Suhavahi।
Uramani Bhala Anupa Dikhavahin॥

Vina Pustaka Abhaya Dharini।
Jagatmatu Tuma Jaga Viharini॥

Brahma Suta Akhanda Anupa।
Sharada Guna Gavata Surabhupa॥

Harihara Karahin Sharada Bandana।
Baruna Kubera Karahin Abhinandana॥

Sharada Rupa Chandi Avatara।
Chanda-Munda Asurana Sanhara॥

Mahisha Sura Vadha Kinhi Bhavani।
Durga Bana Sharada Kalyani॥

Dhara Rupa Sharada Bhai Chandi।
Rakta Bija Kata Rana Mundi॥

Tulasi Surya Adi Vidvana।
Sharada Suyasha Sadaiva Bakhana॥

Kalidasa Bhae Ati Vikhyata।
Tumhari Daya Sharada Mata॥

Valmika Narada Muni Deva।
Puni Puni Karahin Sharada Seva॥

Charana-Sharana Devahu Jaga Maya।
Saba Jaga Vyapahin Sharada Maya॥

Anu-Paramanu Sharada Vasa।
Parama Shaktimaya Parama Prakasha॥

He Sharada Tuma Brahma Svarupa।
Shiva Viranchi Pujahin Nara Bhupa॥

Brahma Shakti Nahi Ekau Bheda।
Sharada Ke Guna Gavahin Veda॥

Jai Jaga Bandani Vishva Svarupa।
Nirguna-Saguna Sharadahin Rupa॥

Sumirahu Sharada Nama Akhanda।
Vyapai Nahin Kalikala Prachanda॥

Surya Chandra Nabha Mandala Tare।
Sharada Kripa Chamakate Sare॥

Udbhava Sthiti Pralaya Karini।
Bandau Sharada Jagata Tarini॥

Duhkha Daridra Saba Jahin Nasai।
Tumhari Kripa Sharada Mai॥

Parama Puniti Jagata Adhara।
Matu Sharada Gyana Tumhara॥

Vidya Buddhi Milahin Sukhadani।
Jai Jai Jai Sharada Bhavani॥

Sharade Pujana Jo Jana Karahin।
Nishchaya Te Bhava Sagara Tarahin॥

Sharada Kripa Milahin Shuchi Gyana।
Hoi Sakala Vidhi Ati Kalyana॥

Jaga Ke Vishaya Maha Duhkha Dai।
Bhajahun Sharada Ati Sukha Pai॥

Parama Prakasha Sharada Tora।
Divya Kirana Devahun Mama Ora॥

Paramananda Magana Mana Hoi।
Matu Sharada Sumirai Joi॥

Chitta Shanta Hovahin Japa Dhyana।
Bhajahun Sharada Hovahin Gyana॥

Rachana Rachita Sharada Keri।
Patha Karahin Bhava Chhatai Pheri॥

Sat Sat Namana Padhihe Dharidhyana।
Sharada Matu Karahin Kalyana॥

Sharada Mahima Ko Jaga Jana।
Neti-Neti Kaha Veda Bakhana॥

Sat-Sat Namana Sharada Tora।
Kripa Drishti Kijai Mama Ora॥

Jo Jana Seva Karahin Tumhari।
Tina Kahan Katahun Nahi Duhkhabhari॥

Jo Yaha Patha Karai Chalisa।
Matu Sharada Dehun Ashisha॥

॥ Doha ॥
Bandaun Sharada Charana Raja,
Bhakti Gyana Mohi Dehun।
Sakala Avidya Dura Kara,
Sada Basahu Uragehun॥



श्री शारदा चालीसा का भारतीय धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं में विशेष महत्व है। यह चालीसा माँ शारदा देवी की स्तुति का एक प्रभावी स्त्रोत है, जो ज्ञान, विद्या और कला की देवी के रूप में पूजी जाती हैं। माँ शारदा को सरस्वती का स्वरूप माना गया है, और उनके आशीर्वाद से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता, शांति और सफलता का संचार होता है।

शिक्षा, संगीत, साहित्य, कला आदि के क्षेत्र में कार्यरत लोग माँ शारदा के इस चालीसा का नियमित पाठ करके अपनी विद्या और कला में उत्तमता प्राप्त करते हैं। यह चालीसा व्यक्ति के भीतर आत्म-विश्वास और संयम को बढ़ाती है, जिससे उसे सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। श्री शारदा चालीसा के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन में आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर सकता है, और उसकी कृपा से ज्ञान, विवेक और समझ में वृद्धि होती है।

श्री शारदा चालीसा का पाठ करने से अनेक लाभ प्राप्त होते हैं। सबसे प्रमुख लाभ यह है कि यह चालीसा मानसिक शांति और संतुलन प्रदान करती है, जो आज के व्यस्त जीवन में आवश्यक है। इसके नियमित पाठ से व्यक्ति की याददाश्त और एकाग्रता में सुधार होता है, और उसे जीवन की कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति मिलती है।

इसके अलावा, माँ शारदा की कृपा से छात्र परीक्षा में सफलता प्राप्त कर सकते हैं, कलाकार अपनी कला में प्रवीणता हासिल कर सकते हैं, और नौकरीपेशा लोग अपने कार्यक्षेत्र में ऊंचाइयों को प्राप्त कर सकते हैं। इसे पढ़ने से नकारात्मक विचारों से मुक्ति मिलती है, और आत्मा में सद्गुणों का विकास होता है। यह चालीसा जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर कर व्यक्ति को सफलता की ओर अग्रसर करती है।

श्री शारदा चालीसा का पाठ करने के लिए सबसे पहले व्यक्ति को स्वच्छ और शांत स्थान का चयन करना चाहिए। सुबह के समय स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण कर, माँ शारदा की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक जलाकर इस चालीसा का पाठ करना श्रेष्ठ माना गया है। यदि संभव हो तो पाठ के समय सफेद पुष्प अर्पित करें, क्योंकि माँ शारदा को सफेद रंग प्रिय है।

चालीसा पढ़ते समय मन को एकाग्र रखें और माँ शारदा की छवि को ध्यान में रखें। इसे श्रद्धा और विश्वास के साथ पढ़ने से अधिक लाभ होता है। सप्ताह में कम से कम एक बार या प्रतिदिन इसका पाठ करने से माँ शारदा की विशेष कृपा प्राप्त होती है, जिससे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है।


श्री शारदा चालीसा क्या है?

श्री शारदा चालीसा एक धार्मिक स्तुति है जो माँ शारदा देवी की महिमा और उनके आशीर्वाद का गुणगान करती है। इसे पढ़ने से व्यक्ति को ज्ञान, विवेक और शांति प्राप्त होती है।

श्री शारदा चालीसा का महत्व क्या है?

श्री शारदा चालीसा का महत्व इस बात में है कि यह व्यक्ति के जीवन में मानसिक शांति, आत्म-विश्वास और सकारात्मकता लाने में सहायक होती है। यह विद्यार्थियों और कलाकारों के लिए विशेष रूप से लाभकारी मानी जाती है।

श्री शारदा चालीसा का पाठ किस प्रकार के लाभ प्रदान करता है?

इसका पाठ करने से एकाग्रता, स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है। यह नकारात्मक विचारों से मुक्ति और आत्म-ज्ञान की ओर प्रेरित करती है, जिससे जीवन में शांति और सफलता मिलती है।

श्री शारदा चालीसा का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?

सुबह के समय स्नान कर, स्वच्छ वस्त्र पहनकर, शांत मन और श्रद्धा के साथ इसे पढ़ना उत्तम होता है। माँ शारदा की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक जलाकर इसका पाठ करें।

क्या श्री शारदा चालीसा का पाठ किसी भी समय कर सकते हैं?

हाँ, इसे किसी भी समय किया जा सकता है, परंतु सुबह का समय अधिक प्रभावकारी माना गया है क्योंकि यह दिन की सकारात्मक शुरुआत में मदद करता है।

श्री शारदा चालीसा विद्यार्थियों के लिए क्यों लाभकारी है?

यह चालीसा ध्यान, स्मरण शक्ति और आत्मविश्वास में वृद्धि करती है, जो विद्यार्थियों की पढ़ाई और परीक्षा में सफलता पाने में सहायक होती है।

क्या श्री शारदा चालीसा का पाठ करने से करियर में उन्नति मिल सकती है?

जी हाँ, इस चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति का मनोबल और आत्म-विश्वास बढ़ता है, जिससे वह अपने कार्यक्षेत्र में भी सफलता प्राप्त कर सकता है।

क्या श्री शारदा चालीसा का पाठ करने के लिए किसी विशेष पूजा सामग्री की आवश्यकता होती है?

नहीं, विशेष सामग्री की आवश्यकता नहीं होती। परन्तु श्रद्धा के साथ दीपक जलाना और सफेद पुष्प अर्पण करना शुभ माना गया है।

श्री शारदा चालीसा कितनी बार पढ़ना चाहिए?

इसे प्रतिदिन एक बार पढ़ना शुभ होता है, परंतु श्रद्धा और समय के अनुसार व्यक्ति इसे अधिक बार भी पढ़ सकता है। सप्ताह में एक बार तो अवश्य पढ़ें।

क्या श्री शारदा चालीसा का पाठ जीवन की समस्याओं को हल करने में सहायक होता है?

जी हाँ, यह चालीसा मानसिक शांति और सकारात्मकता लाने में सहायक है, जिससे व्यक्ति जीवन की समस्याओं का समाधान शांतिपूर्ण तरीके से कर सकता है।

Sunderkand Ka Path Hindi PDF – सुंदरकांड पाठ हिंदी में PDF (Revised 2026)

सुंदरकांड: श्रीराम के संग भक्ति की यात्रा

सुंदरकांड पाठ (Sunderkand Path Hindi PDF), रामायण के पांचवें कांड का एक अभिन्न हिस्सा है, जो भगवान हनुमान जी की भक्ति, वीरता और समर्पण को दर्शाता है। यह पाठ भारतीय संस्कृति में अत्यधिक श्रद्धा और भक्ति के साथ पढ़ा और सुना जाता है। सुंदरकांड का मुख्य उद्देश्य हनुमान जी की भक्ति और उनके साहसी कार्यों का वर्णन करना है, जिसमें वे माता सीता की खोज के लिए लंका की यात्रा करते हैं। हनुमान चालीसा हिंदी में!

सुंदरकांड का पाठ केवल धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसे आध्यात्मिक और मानसिक शांति का एक साधन भी माना जाता है। भक्तजन इसे नियमित रूप से पढ़कर भगवान हनुमान का आशीर्वाद प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। मानसिक तनाव, भय, या जीवन की कठिनाइयों का सामना कर रहे लोगों के लिए यह पाठ विशेष रूप से लाभकारी है।

सुंदरकांड में वर्णित घटनाओं की गहराई और हनुमान जी के अद्भुत चरित्र में निहित है। उनका साहस, शक्ति, और बुद्धिमत्ता इस पाठ को विशेष बनाते हैं। जब हनुमान जी माता सीता का पता लगाने के लिए लंका जाते हैं, तब उनकी वीरता और त्याग का उदाहरण प्रस्तुत होता है। भक्तों के लिए, हनुमान जी का चरित्र प्रेरणा का स्रोत है।

Chalisa PDF पर पढ़े: संकट मोचन हनुमान अष्टक | श्री हनुमान अमृतवाणी | बजरंग बाण | हनुमान चालीसा पढ़ने के 21 चमत्कारिक फायदे |


|| सुंदरकांड पाठ हिंदी में pdf ||

।।आसन।।

कथा प्रारम्भ होत है। सुनहुँ वीर हनुमान।।
आसान लीजो प्रेम से। करहुँ सदा कल्याण।।

|| श्लोक ||

शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं,
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्,
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं,
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़ामणिम्।।1।।

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च।।2।।

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।।3।।

जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए।।
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई।।
जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी।।
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा।।
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर।।
बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी।।
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता।।
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना।।
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी।।
दो0- हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।।1।।

जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा।।
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता।।
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा।।
राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं।।
तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई।।

कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना।।
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा।।
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ।।
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा।।
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।।
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा।।
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा।।
दो0-राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान।।2।।

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई।।
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं।।
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई।।
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा।।
ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा।।

तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा।।
नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए।।
सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें।।
उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई।।
गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी।।
अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा।।
छं=कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना।।
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै।।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै।।1।।

बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं।।
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं।।2।।
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं।।
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही।।3।।

दो0-पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार।।3।।

मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।।
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी।।
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा।।
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी।।
पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका।।
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।।
बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे।।
तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता।।
दो0-तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।4।।

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा।।
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।
गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही।।
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना।।
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा।।
गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं।।
सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही।।
भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा।।
दो0-रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ।।5।।

लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा।।
मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा।।
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा।।
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी।।
बिप्र रुप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए।।
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई।।
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई।।
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी।।
दो0-तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम।।6।।

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी।।
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा।।
तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं।।
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।
जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा।।
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती।।
कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।।
प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।।
दो0-अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर।।7।।

जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।।
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा।।
पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही।।
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता।।
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई।।
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ।।
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा।।
कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी।।
दो0-निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन।।8।।

तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई।।
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा।।
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा।।
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी।।
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा।।
तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही।।
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा।।
अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की।।
सठ सूने हरि आनेहि मोहि। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही।।
दो0- आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन।।9।।

सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना।।
नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी।।
स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर।।
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा।।
चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं।।
सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा।।
सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा।।
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई।।
मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना।।
दो0-भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद।।10।।

त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका।।
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना।।
सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी।।
खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा।।
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई।।
नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई।।
यह सपना में कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी।।
तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं।।
दो0-जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच।।11।।

त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी।।
तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई।।
आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई।।
सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी।।
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि।।
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी।।
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि न पावक मिटिहि न सूला।।

देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा।।
पावकमय ससि स्त्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी।।
सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका।।
नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना।।
देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता।।
सो0-कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब।
जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ।।12।।

तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर।।
चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी।।
जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई।।
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना।।
रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा।।

लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई।।
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कहि सो प्रगट होति किन भाई।।
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैंठीं मन बिसमय भयऊ।।
राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की।।
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी।।
नर बानरहि संग कहु कैसें। कहि कथा भइ संगति जैसें।।
दो0-कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।।
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास।।13।।

हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी।।
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयउ तात मों कहुँ जलजाना।।
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी।।
कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई।।
सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक।।
कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहि निरखि स्याम मृदु गाता।।

बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी।।
देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता।।
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता।।
जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना।।
दो0-रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।
अस कहि कपि गद गद भयउ भरे बिलोचन नीर।।14।।

कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता।।
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू।।
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा।।
जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा।।
कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई।।

तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा।।
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं।।
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही।।
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता।।
उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई।।
दो0-निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु।।15।।

जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई।।
रामबान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की।।
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई।।
कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं।।

हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना।।
मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा।।
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा।।
सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ।।
दो0-सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल।।16।।

मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी।।
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना।।
अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू।।
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना।।
बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा।।

अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता।।
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा।।
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी।।
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं।।
दो0-देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु।।17।।

चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा।।
रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे।।
नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी।।
खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे।।
सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना।।

सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे।।
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा।।
आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा।।
दो0-कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि।।18।।

सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना।।
मारसि जनि सुत बांधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही।।
चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा।।
कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा।।
अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा।।

रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा।।
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा।
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई।।
उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया।।
दो0-ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार।।19।।

ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा।।
तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ।।
जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी।।
तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा।।

कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए।।
दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई।।
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता।।
देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका।।
दो0-कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद।।20।।

कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहिं के बल घालेहि बन खीसा।।
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही।।
मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा।।
सुन रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचित माया।।

जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा।
जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन।।
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह ते सठन्ह सिखावनु दाता।
हर कोदंड कठिन जेहि भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा।।
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली।।
दो0-जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि।।21।।

जानउँ मैं तुम्हरि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई।।
समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा।।
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा।।
सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी।।
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउ तनयँ तुम्हारे।।

मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा।।
बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन।।
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी।।
जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई।।
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै।।
दो0-प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि।।22।।

राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राज तुम्ह करहू।।
रिषि पुलिस्त जसु बिमल मंयका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका।।
राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा।।
बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषण भूषित बर नारी।।

राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई।।
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गए पुनि तबहिं सुखाहीं।।
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी।।
संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही।।
दो0-मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान।।23।।

जदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी।।
बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी।।
मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही।।
उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना।।
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना।।

सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए।
नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता।।
आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई।।
सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर।।
दो-कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ।।24।।

पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि।।
जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़ाई। देखेउँûमैं तिन्ह कै प्रभुताई।।
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना।।
जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना।।
रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला।।

कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी।।
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी।।
पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघु रुप तुरंता।।
निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भई सभीत निसाचर नारीं।।
दो0-हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास।।25।।

देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई।।
जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला।।
तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहि अवसर को हमहि उबारा।।
हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई।।

साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा।।
जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं।।
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा।।
उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी।।
दो0-पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।
जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि।।26।।

मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा।।
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ।।
कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा।।
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।।

तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु।।
मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा।।
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना।।
तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती।।
दो0-जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह।।27।।

चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी।।
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा।।
हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना।।
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचन्द्र कर काजा।।
मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी।।

चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा।।
तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए।।
रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे।।
दो0-जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।
सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज।।28।।

जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई।।
एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा।।
आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा।।
पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी।।
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना।।

सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ।
राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा।।
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई।।
दो0-प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।
पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज।।29।।

जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया।।
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर।।
सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर।।
प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू।।
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी।।

पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए।।
सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए।।
कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की।।
दो0-नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट।।30।।

चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही।।
नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी।।
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना।।
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी।।
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना।।

नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा।।
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा।।
नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी।
सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला।।
दो0-निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।
बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति।।31।।

सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना।।
बचन काँय मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही।।
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई।।
केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी।।
सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी।।

प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा।।
सुनु सुत उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं।।
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता।।
दो0-सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत।।32।।

बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा।।
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा।।
सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर।।
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा।।
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका।।
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना।।

साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई।।
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।
सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।।
दो0- ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल।
तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल।।33।।

नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी।।
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी।।
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना।।
यह संवाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा।।
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा।।
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा।।
अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे।।
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी।।
दो0-कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ।।34।।

प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा।।
देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना।।
राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा।।
हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना।।
जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती।।
प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं।।

जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई।।
चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहि बानर भालु अपारा।।
नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी।।
केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं।।
छं0-चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे।।
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।

जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं।।
सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई।।
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।

जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी।।
दो0-एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर।।35।।

उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब ते जारि गयउ कपि लंका।।
निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा।।
जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई।।
दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी।।
रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी।।

कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहु।।
समुझत जासु दूत कइ करनी। स्त्रवहीं गर्भ रजनीचर धरनी।।
तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई।।
तब कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई।।
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें।।
दो0–राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक।।36।।

श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी।।
सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा।।
जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई।।
कंपहिं लोकप जाकी त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा।।
अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई।।

मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता।।
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई।।
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू।।
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माही।।
दो0-सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।37।।

सोइ रावन कहुँ बनि सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई।।
अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा।।
पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन।।
जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरुप कहउँ हित ताता।।

जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना।।
सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाई।।
चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई।।
गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ।।
दो0- काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत।।38।।

तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला।।
ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता।।
गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपासिंधु मानुष तनुधारी।।
जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता।।
ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा।।

देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही।।
सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा।।
जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन।।
दो0-बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।
परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस।।39(क)।।
मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।
तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात।।39(ख)।।

माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना।।
तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन।।
रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ।।
माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी।।

सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं।।
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना।।
तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता।।
कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी।।
दो0-तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।
सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार।।40।।

बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी।।
सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मुत्यु अब आई।।
जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा।।
कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाही।।
मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती।।

अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा।।
उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई।।
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा।।
सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ।।
दो0=रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।
मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि।।41।।

अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं।।
साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी।।
रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा।।
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं।।

देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता।।
जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी।।
जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए।।
हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मै देखिहउँ तेई।।
दो0= जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ।।42।।

एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा।।
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा।।
ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए।।
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई।।

कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा।।
जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया।।
भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा।।
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी।।
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना।।
दो0=सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि।।43।।

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू।।
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।
पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ।।
जौं पै दुष्टहदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई।।
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।
भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा।।
जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते।।
जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहउँ ताहि प्रान की नाई।।
दो0=उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।
जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत।।44।।

सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर।।
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता।।
बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी।।
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन।।
सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा।।
नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता।।
नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता।।
सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा।।
दो0-श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर।।45।।

अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा।।
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा।।
अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी।।
कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा।।
खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती।।
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती।।
बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता।।
अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया।।
दो0-तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।
जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम।।46।।

तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना।।
जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा।।
ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी।।
तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं।।

अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे।।
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला।।
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ।।
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा।।
दो0–अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।
देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज।।47।।

सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ।।
जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही।।
तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना।।
जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा।।
सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।।
समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं।।
अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें।।
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें।।
दो0- सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम।।48।।

सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें।।
राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा।।
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी।।
पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा।।
सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी।।
उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही।।

अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी।।
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा।।
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं।।
अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा।।
दो0-रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड।।49(क)।।
जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ।।49(ख)।।

अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना।।
निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा।।
पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी।।
बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक।।

सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा।।
संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती।।
कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक।।
जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई।।
दो0-प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि।
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि।।50।।

सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई।।
मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा।।
नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा।।
कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।।
सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा।।

अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई।।
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई।।
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए।।
दो0-सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह।।51।।

प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ।।
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने।।
कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर।।
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए।।
बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे।।

जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना।।
सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोडाए।।
रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती।।
दो0-कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।
सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार।।52।।

तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा।।
कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए।।
बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता।।
पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी।।
करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी।।

पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई।।
जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा।।
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी।।
दो0–की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर।।53।।

नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें।।
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा।।
रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना।।
श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे।।
पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई।।

नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी।।
जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा।।
अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला।।
दो0-द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि।।54।।

ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना।।
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीं।।
अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर।।
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं।।
परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा।।

सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहीं न त भरि कुधर बिसाला।।
मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा।।
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका।।
दो0–सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।
रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं संग्राम।।55।।

राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई।।
सक सर एक सोषि सत सागर। तव भ्रातहि पूँछेउ नय नागर।।
तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं।।
सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा।।
सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई।।
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई।।

सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें।।
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी।।
रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती।।
बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन।।
दो0–बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस।।56(क)।।
की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।
होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग।।56(ख)।।

सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई।।
भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा।।
कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी।।
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा।।
अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ।।
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही।।

जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे।
जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही।।
नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ।।
करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई।।
रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी।।
बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा।।
दो0-बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।।57।।

लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू।।
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती।।
ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी।।
क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा।।
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा।।

संघानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।।
मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने।।
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना।।
दो0-काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच।।58।।

सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।।
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।।
तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।।
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई।।
प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।।

ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई।।
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई।।
दो0-सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ।।59।।

नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई।।
तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे।।
मैं पुनि उर धरि प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई।।
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ।।
एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी।।

सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा।।
देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी।।
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा।।
छं0-निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।
यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ।।
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।।
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना।।

सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान।।60।।

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने
पञ्चमः सोपानः समाप्तः।
सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड पाठ,

(इति सुन्दरकाण्ड समाप्त)

|| सुन्दरकाण्ड समापन दोहा ||

कथा विसर्जन होत है,
सुनहु वीर हनुमान।
जो जन जहाँ से आत है,
जह तह करो प्रयाण।।
राम लखन सिया जानकी,
सदा करहूँ कल्याण।
रामायण वैकुण्ठ की,
विदा होत हनुमान।।
सियावर रामचंद्र की जय।
पवनसुत हनुमान की जय।


||Sunderkand Path Lyrics in English||

|| Shalok ||

Shaantan shaashvatamaprameyamanaghan nirvaanashaantipradan.
Brahmaashambhuphaneendrasevyamanishan vedaantavedyan vibhum.
Raamaakhyan jagadeeshvaran suragurun maayaamanushyan harin.
Vandehan karunaakaran raghuvaran bhoopaalachoodaamanim ||1||
 
Naanya sprha raghupate hrdayesmadeeye.
Satyan vadaami ch bhavaanakhilaantaraatma.
Bhaktin prayachchh raghupungav nirbharaan me.
Kaamaadidosharahitan kuru maanasan ch ||2||
 
Atulitabaladhaaman hemashailaabhadehan.
Danujavanakrshaanun gyaaninaamagraganyam.
Sakalagunanidhaanan vaanaraanaamadheeshan.

|| Chopai ||
Jaamavant ke bachan suhae. suni hanumant hrday ati bhae.
Tab lagi mohi parikhehu tumh bhaee. sahi dukh kand mool phal khaee.
Jab lagi aavaun seetahi dekhee. hoihi kaaju mohi harash biseshee.
Yah kahi nai sabanhi kahun maatha. chaleu harashi hiyan dhari raghunaatha.
Sindhu teer ek bhoodhar sundar. kautuk koodi chadheu ta oopar.
Baar-baar raghubeer sanbhaaree. tarakeu pavanatanay bal bhaaree.
Jehin giri charan dei hanumanta. chaleu so ga paataal turanta.
Jimi amogh raghupati kar baana. ehee bhaanti chaleu hanumaana.
Jalanidhi raghupati doot bichaaree. tain mainaak hohi shram haaree.
 
|| Doha – 1 ||
Hanumaan tehi parasa kar puni keenh pranaam |
Raam kaaju keenhe binu mohi kahaa bishraam ||

||Chopai||
Jaat pavansut devanh dekha | Jaanai kahu bal buddhi bisesha ||
Surasa naam ahinh kai maata | Pathainhi aai kahi tehi baata ||
Aaju suranh mohi deenh ahaara | Sunat bachan kah pavankumaara ||
Raam kaaju kari phiri mai aavau | Sita kai sudhi prabhuhi sunaavau ||
Tab tav badan paithihau aai | Satya kahau mohi jaan de maai ||
Kavanehu jatan dei nahi jaana | Grasai na mohi kaheu Hanumaana||
Jojan bhari tehi badanu pasaara | Kapi tanu keenh dugun Bistaaraa||
Sorah jojan mukh tehi thayau | Turat pavan sut battis bhayau ||
Jas jas surasa badanu badhaava | Taasu doon kapi roop dekhaava ||
Sat jojan tehi aanan keenha | Ati laghu roop pavanasut leenha ||
Badan paithi puni baaher aava | Maaga bida taahi siru naava ||
Mohi suranh jehi laagi pathaava | Buddhi bal maramu tor mai paava||

|| Doha – 2 ||
Raam kaaju sabu karihahu tumh bal buddhi nidhaan|
Aasish dei gai so harashi chaleu Hanumaan ||

||Chopai||
Nisichari ek sindhu mahu rahai |Kari maaya nabhu ke khag gahai||
Jeev jantu je gagan udaahi |Jal biloki tinh kai parichhahi ||
Gahai chhah sak so na udaai |Ehi bidhi sada gaganchar khaai ||
Soi chhal Hanumaan kah keenha|Taasu kapatu kapi turatahi cheena||
Taahi maari maarut sut beera|Baaridhi paar gayau matidheera||
Taha jaai dekhi ban sobha|Gunjat chanchareek madhu lobha||
Naana taru phal phool suhaae|Khag mrug brund dekhi man bhaae||
Sail bisaal dekhi ek aage | Taa par dhaai chadheu bhay tyaage ||
Uma na kachhu kapi kai adhikaai | Prabhu prataap jo kaalahi khaai ||
Giri par chadhi Lanka tehi dekhi| Kahi na jaai ati durg biseshi ||
Ati utang jalanidhi chahu paasa|
Kanak kot kar param prakaasa||


 
|| Chhand ||
Kanak kot bichitra mani | Krut sundaraayatana Ghana||
Chauhatt hatt subatt beethee Chaaru pur bahu bidhi bana||
Gaj baaji khachchar nikar Padchar rath baroothanhi ko ganai|
Bahuroop nisichar jooth atibal Sen baranat nahin banai ||1||
Ban bag ujpaban baatika| Sar koop baapee sohahi||
Nar naag sur gandharb kanya| Roop muni man mohahee||
Kahu maal deh bisaal sai l Samaan atibal garjahi||
Naana akhaarenh bhirhi bahubidhi Ek ekanh tarjahee || 2||
Kari jatan bhat kotinh bikat Tan nagar chahu disi rachchhahee||
Kahu mahish maanush dhenu khar Ajakhal nishaachar bhachchhahi||
Ehi laagi Tulasidaas inh kee Katha kachhu ek hai kahee |
Raghubeer sar teerath sareeranhi Tyaagi gati paihahi sahee||
 
|| Doha – 3 ||
Pur rakhavaare dekhi bahu kapi man keenh bichaar|
Ati laghu roop dharau nisi nagar karau paisaar ||

||Chopai||
Masak samaan roop kapi charee | Lankahi chaleu sumiri naraharee||
Naam Lankinee ek nisicharee | So kah chalesi mohi nindaree ||
Jaanehi nahee maramu sath mora| Mor ahar jahaa lagi chora ||
Muthika ek maha kapi hanee | Rudhir bamat dharanee dhanamanee ||
Puni sambhari uthee so Lanka | Jori paani kar binay sasanka ||
Jab Ravanahi brahm bar deenha | Chalat biranchi kaha mohi cheenha ||
Bikal hosi tai kapi ke mare | Tab jaanesu nisichar sanghare ||
Taat mor ati punya bahoota | Dekheu nayan Raam kar doota ||
 
|| Doha – 4 ||
Taat swarg apabarg sukh dharia tula ek ang |
Tool na taahi sakal mili jo such lav satsang ||

||Chopai||
Prabisi nagar keeje sab kaaja | Hriday rakhi kosalapur raja ||
Garal sudha ripu karahi mitaai | Gopad sindhu anal sitalaai ||
Garud sumeru renu sam taahi | Raam krupa kari chitava jaahi ||
Ati laghu roop dhareu Hamumaana | Paitha ngar sumiri bhagawana ||
Mandir mandir prati kari sodha | Dekhe jah tah aganit jodha ||
Gayau dasaanan mandir maahee | Ati bichitra kahi jaat so naahee ||
Sayan kie dekha kapi tehee | Mandir mahu na deekhi baidehee ||
Bhavan ek puni deekh suhaava | Hari mandir tah bhinna banaava ||
 
|| Doha – 5 ||
Raamaayudh ankit gruh sobha barani na jaai |
Nav tulsika brund tah dekhi harash kapiraai||

||Chopai||
Lanka nisichar nikar nivaasa | Iha kaha sajjan kar baasa ||
Man mahu tarak karai kapi laaga | Tehi samay |Bibheeshanu jaaga ||
Raam raam tehi sumiran keenha | Hriday harash kapi sajjan cheenha ||
Ehi san hathi karihau pahichaanee | Saadhu te hoi na kaaraj haanee ||
Bipra roop dhari bachan sunaae | Sunat Bibheeshan uthi tah aae ||
Kari pranaam poonchee kusalaai | Bipra kahahu nij katha buzaai ||
Kee tumh hari daasanh mah koi | More hriday preeti ati hoi ||
Kee tumh raamu deen anuraagee | Aayahu mohi karan badbhaagee ||
 
|| Doha – 6 ||
Tab Hanumant kahee sab Raam katha nij naam |
Sunat jugal tan pulak man magan sumiri gun graam||

||Chopai||
Sunahu pavansut rahani hamaaree | Jimi dasananhi mahu jeebh bichaaree ||
Taat kabahu mohi jaani anaatha | Karihahi krupa bhaanukul naatha ||
Taamas tanu kachu saadhan naahee | Preeti na pad saroj man maahee ||
Ab mohi bha bharos Hanumanta | Binu harikrupa milahi nahi santa ||
Jau Rabhubeer anugrah keenha | Tau tumh mohi darasu hathi deenha ||
Sunahu Bibheeshan prabhu kai reetee | Karahi sada sevak par preetee ||
Kahahu kavan mai param kuleena | Kapi chanchal sabahee bidhi heena ||
Praat lei jo naam hamaara | Tehi din taahi na milai ahaara ||
 
|| Doha – 7 ||
As mai adham sakha sunu mohu par Rabhubeer |
Keenhee krupa sumiri gun bhare bilochan neer ||

||Chopai||
Jaanatahoo as swami bisaaree | Phirhi te kaahe na hohi dukharee ||
Ehi bidhi kahat Raam gun graama | Paava anirbachya bishraama ||
Puni sab katha Bibheeshan kahi | Jehi bidhi Janakasuta tah rahee ||
Tab Hanumant kaha sunu bhraata | Dekhi chahau Jaanaki Maata ||
Juguti Bibheeshan sakal sunaai | Chaleu pavansut bida karaai ||
Kari soi roop gayau puni tahava | Ban Asok Sita rah jahava ||
Dekhi manahi mahu keenh pranaama | Baithehi beeti jaat nisi jaama ||
Krus tanu sees jata ek benee | Japati hraday Raghupati gun shrenee ||
 
|| Doha – 8 ||
Nij pad nayan die man Raam pad kamal leen |
Param dukhee bha pavansut dekhi Jaanakee deen ||

||Chopai||
Taru pallav mahu rahaa lukaai | Karai bichaar karau kaa bhai ||
Tehi avasar Raavanu tah aava | Sang naari bahu kie banaava ||
Bahu bidhi khal Sitahi samuzaava | Saam daam bhay bhed dekhaava ||
Kah Ravanu sunu sumukhi sayaanee | Mandodari aadi sab raanee ||
Tav anucharee karau pan mora | Ek baar bilku mam ora ||
Trun dhari ot kahati baidehee | Sumiri avadhapati param sanehe ||
Sunu dasamukh khadyot prakasa | Kabahu ki nalinee karai bikaasa ||
As man samuzu kahati Jaanakee | Khal sudhi nahi Rabhubeer baan kee ||
Sath soone hari aanehi mohee | Adham nilajj laaj nahi tohee ||
 
|| Doha – 9 ||
Aapuhi suni khadyot sam Ramahi bhaanu samaan |
Parush bachan suni kaadhi asi bola ati khisiaan ||

||Chopai||
Sita tai mam krut apamaanaa | Katihau tav sir kathin krupaanaa ||
Naahi ta sapadi maanu mam baanee | Sumukhi hoti na ta jeevan haanee ||
Syaam saroj daam sam sundar | Prabhu bhuj kari kar sam dasakandhar ||
So bhuj kanth ki tav asi ghora | Sunu sath as pravaan pan mora ||
Chandrahaas haru mam paritaapam | Rathupati birah anal sanjaatam ||
Sital nisit bahasi bar dhaara | Kah Sita haru mam dukh bhaara ||
Sunat bachan puni maaran dhaava | Mayatanaya kahi neeti buzaava ||
Kahsi sakal nisicharanhi bolaai | Sitahi bahu bidhi traasahu jaai ||
Maas divas mahu kahaa na maana | Tau mai maarabi kaadhi krupaana ||
 
|| Doha – 10 ||
Bhavan gayau daskandhar iha pisaachini brund |
Sitahi traas dekhaavahi dharahi roop bahu mand||


||Chopai||
Trijata naam rachchhasi eka| Raam charan rati nipun bibeka||
Sabanhau boli sunaaesi sapana | Sitahi sei karahu hit apana ||
Sapane baanar Lanka jaari | Jaatudhaan sena sab maaree||
Khar aarudh nagan dasaseesa| Mundit sir khandit bhuj beesa||
Ehi bidhi so dachchhin disi jaai| Lanka manahu Bibheeshan paai||
Nagar phiri Rabhubeer dohaai| Tab prabhu Sita boli pathaai||
Yah sapana mai kahau pukaaree| Hoihi satya gae din chaaree||
Taasu bachan suni te sab daree| Janaksuta ke charananhi paree||
 
|| Doha – 11 ||
Jah tah gai sakal tab Sita kar man soch|
Maas divas beete mohi maarihi nisichar poch||

||Chopai||
Trijata san bolee kar joree | Maatu bipati sangini tai more ||
Tajau deh karu begi upaai| Dusah birahu ab nahi sahi jaai||
Aani kaath rachu chita banaai | Maatu anal puni dehi lagaai||
Satya karahi mam preeti sayaanee | Sunai ko Shravan sool sam baanee ||
Sunat bachan pad gahi samuzaaesi| Prabhu prataap bal sujasu sunaaesi||
Nisi na anal mil sunu sukumaaree| As kah so nij bhavan sidhaaree||
Kah Sita bidhi bha pratikula| Milihi na paavak mitihi na soola||
Dekhiat pragat gagan angaara| Avani na aavat ekau taara||
Paavakmay sasi sravat na aagee| Maanahu mohi jaani hatabhaagee||
Sunahi binay mam bitap asoka| Satya naam karu haru mam soka||
Nootan kisalay anal samaana| Dehi agini jani karahi nidaana||
Dekhi param birahaakul sita| So chhan kapihi kalap sam beeta||
 
|| Doha – 12 ||
Kapi kari hriday bichaar deenhi mudrika daari tab|
Janu asok angaar deenh harashi uthi kar gaheu||

||Chopai||
Tab dekhee mudrika manohar | Raam naam ankit ati sundar ||
Chakit chitav mudaree pahichanee | Harash bishaad hriday akulaanee||
Jeeti ko sakai ajay Raghuraai | Maaya te asi rachi nahi jaai||
Sita man bichaar kar nana | Madhur bachan boleu Hanumaana||
Raamchandra gun baranai laaga| Sunatahi Sita kar bukh bhaaga||
Laagee sunai shravan man laai| Aadihu te sab katha sunaai||
Shravanaamrut jehi katha suhaai| Kahi so pragat hoti kin bhaai||
Tab Hunamant nikat chali gayau| Phiri baithee man bisamay bhayau||
Raam doot mai maatu Jaanakee| Satya sapath karunaanidhaan kee ||
Yah mudrika maatu mai aanee| Deenhi Raam tumh kah sahidaanee||
Nar baanarahi sang kahu kaise| Kahi katha bhai sangati jaise||
 
|| Doha – 13 ||
Kapi ke bachan saprem suni upaja man biswaas|
Jaana man kram bachan yah krupaasindhu kar daas||

||Chopai||
Harijan jaani preeti ati gaadhee | Sajal nayan pulakaavali baadhee||
Budat birah jaladhi Hanumaana | Bhayahu taat mo kahu jalajaana||
Ab kahu kusal jaau balihaaree | Anuj sahit such bhavan kharaaree||
Komalchit krupaal Raghuraai| Kapi kehi hetu dharee nithuraai||
Sahaj baani sevak sukhdaayak| Kabahuk surati karat Raghunaayak||
Kabahu nayan mam Sital taata| Hoihahi nirakhi syaam mrudu gaata||
Bachanu na aav nayan bhare baaree| Ahah naath hau nipat bisaree||
Dekhi param birahaakul Sita| Bola kapi mrudu bachan bineeta||
Maatu kusal prabhu anuj sameta| Tav dukh dukhi sukrupa niketa||
Jani jananee maanahu jiy oona| Tumh te premu raam ke doona||
 
|| Doha – 14 ||
Raghupati kar sandesu ab sunu jananee dhari dheer|
As kahi kapi gadagad bhayau bhare bilochan neer||

||Chopai||
Kaheu Raam biyog tav Sita| Mo kahu sakal bhae bipareeta||
Nav taru kisalay manahu krusaanu| Kaalanisa sam nisi sasi bhaanoo||
Kubalay bipin kunt ban sarisa| Baarid tapat tel janu barisa||
Je hit rahe karat tei peera| Urag swaas sam tribidh sameera||
Kahehoo te kachoo dukh ghati hoi| Kaahi kahau yah jaan na koi||
Tatva prem kar mam aru tora| Jaant priya eku manu mora||
So manu sada rahat tohi paahee| Jaanu preeti rasu etanehi maahee||
Prabhu sandesu sunat baidehee| Magan prem tan sudhi nahi tehee||
Kah kapi hriday dheer dharu maata| Sumiru Raam sevak sukhdaata||
Ur aanahu Raghupati prabhutaai| Sun imam bachan tajahu kadaraai||

||Doha – 15 ||
Nisichar nikar patang sam Raghupati baan krusanu|
Jananee hriday dheer dharu jare nisaachar jaanu||

||Chopai||
Jau Raghubeer hoti sudhi paai| Karate nahi bilambu Raghuraai||
Raam baan rabi ue Jaanakee| Tam barooth kah jaatudhaan kee||
Abahi maatu mai jaau lavaai| Prabhu aayasu nahi Raam dohaai||
Kachhuk divas jananee dharu dheera| Kapinh sahit aihahi Rabhubeera||
Nisichar maari tohi lai jaihahi| Tihu pur Naaradaadi jasu gaihahi||
Hai sut kapi sab tumhahi samaana| Jatudhaan ati bhat balawaana||
More hriday param sandeha| Suni kapi pragat keenhi nij deha||
Kanak bhudharaakaar sareera| Samar bhayankar atibal beera||
Sita man bharos tab bhayaoo| Puni laghu roop pavanasut layaoo||

 
|| Doha – 16 ||
Sunu maata saakhaamrug nahi bal buddhi bisaal|
Prabhu prataap te garudahi khaai param laghu byaal||


||Chopai||
Man santosh sunat kapi baanee| Bhagati prataap tej bal saanee||
Aashish deenhi raampriy jaana| Hohu taat bal seel nidhaana||
Ajar amar gunanidhi sut hohu| Karahu bahut Raghunaayak chhohoo||
Karahu krupa prabhu as suni kaana| Nirbhar prem magan Hanumaana||
Baar baar naaesi pad seesa| Bola bachan jori kar keesa||
Ab krutkrutya bhayau mai maata| Aasish tav amogh bikhyaata||
Sunahu maatu mohi atisay bhookha| Laagi dekhi sundar phal rookha||
Sunu sut karahi bipin rakhawaaree| Param subhat rajaneechar bhaaree||
Tinh kar bhay maata mohi naahee| Jau tumh such maanahu man maahee||
 
|| Doha – 17 ||
Dekhi buddhi bal nipun kapi kaheu Jaankee jaahu|
Raghupati charan hriday dhari taat madhur phal khaahu||

||Chopai||
Chaleu naai siru paitheu baaga| Phal khaaesi taru torai laaga||
Rahe taha bahu bhat rakhawaare| Kachhu maaresi kachhu jaai pukaare||
Naath ek aava kapi bhaaree | Tehi Asok baatika ujaaree||
Khaaesi phal aru bitap upaare| Rachchhak mardi mardi mahi dare||
Suni Raavan pathae bhat nana| Tinhahi dekhi garjeu Hanumaana||
Sab rajanichar kapi sanghaare| Gae pukaarat kachhu adhamaare||
Puni pathayau tehi achchhakumaara| Chala sang lai subhat apaara||
Aavat dekhi bitap gahi tarja| Taahi nipaati mahaadhuni garja||
 
|| Doha – 18 ||
Kachhu maaresi kachhu mardesi kachhu milaesi dhari dhoori|
Kachu puni jaai pukaare prabhu markat bal bhori||

||Chopai||
Suni sutabadh Lankes risaana| Pathaesi Meghanaad balawaana||
Maarasi jani sut baandhesu taahee| Dekhia kapihi kahaa kar aahee||
Chala Indrajit atulit jodha| Bandhu nidhan suni upaja krodha||
Kapi dekha daarun bhat aava| Katakataai garja aru dhaava||
Ati bisaal taru ek upaara| Birath keenh Lankes kumara||
Rahe mahaabhat taake sanga| Gahi gahi kapi mardai nij anga||
Tinhahi nipaati taahi san baaja| Bhire jugal maanahu gajaraaja||
Muthika maari chadha taru jaai| Taahi ek chhan muruchha aai||
Uthi bahori keenhisi bahu maaya| Jeeti na jaai prabhanjan jaaya||
 
|| Doha – 19 ||
Brahm astra tehi saandha kapi man keenh bichaar|
Jau na brahmasar maanau mahima mitai apaar||

||Chopai||
Brahmabaan kapi kahu tehi maara| Paratihu baar kataku sanghaara||
Tehi dekha kapi muruchhit bhayau| Naagpaas baandhesi lai gayau||
Jaasu naam japi sunahu bhavaanee| Bhav bandhan kaatahi nar gyaanee||
Taasu doot ki bandh taru aava| Prabhu kaaraj lagi kapihi bandhava||
Kapibandhan suni nisichar dhaae| Kautuk laagi sabha sab aae||
Dasamukh sabha deekhi kapi jaai| Kahi na jaai kachhu ati prabhutaai||
Kar jore sur disip bineeta| Bhrukuti bilokat sakal sabheeta||
Dekhi prataap na kapi man sanka| Jimi ahigan mahu garud asanka||
 
|| Doha – 20 ||
Kapihi biloki dasaanan bihasa kahi durbaad|
Sutabadh surati keenhi puni upaja hriday bishaad||

||Chopai||
Kah Lankes kavan tai keesa| Kehi ke bal ghalehi ban kheesa||
Kee dhau Shravan sunehi nahi mohee| Dekhau ati asank sath tohee||
Maare nisichar kehi aparaadha| Kahu sath tohi na praan kai baadha||
Sunu Raavan brahmaand nikaaya| Paai jaasu bal birachati maaya||
Jaake bal biranchi hari isa| Paalat srujat harat dasaseesa||
Jaa bal sees dharat sahasaanan| Andakos samet giri kaanan||
Dharat jo bibidh deh suratraata| Tumh se sathanh sikhaavanu data||
Har kodand kathin jehi bhanja| Tehi samet nrup dal mad ganja||
Khar dushan trisira aru baalee| Badhe sakal atulit balasaalee||
 
|| Doha – 21 ||
Jaake bal lavales te jitehu charaachar zaari|
Taasu doot mai jaa kari hari aanehu priy naari||

||Chopai||
Kah Lankes kavan tai keesa|Kehi ke bal ghalehi ban kheesa||
Kee dhau Shravan sunehi nahi mohee| Dekhau ati asank sath tohee||
Maare nisichar kehi aparaadha| Kahu sath tohi na praan kai baadha||
Sunu Raavan brahmaand nikaaya| Paai jaasu bal birachati maaya||
Jaake bal biranchi hari isa| Paalat srujat harat dasaseesa||
Jaa bal sees dharat sahasaanan| Andakos samet giri kaanan||
Dharat jo bibidh deh suratraata| Tumh se sathanh sikhaavanu data||
Har kodand kathin jehi bhanja| Tehi samet nrup dal mad ganja||
Khar dushan trisira aru baalee| Badhe sakal atulit balasaalee||

 
|| Doha – 22 ||
Pranatapaal Raghunaayak karuna Sindhu kharaari|
Gae saran prabhu raakhihai tav aparaadh bisaari||

||Chopai||
Raam charan Pankaj ur dharahoo| Lanka achal raaju tumh karahoo||
Rishi pulasti jasu bimal mayanka| Tehi sasi mahu jani hohu kalanka||
Raam naam binu gira na soha| Dekhu bichari tyagi mad moha||
Basan heen nahi soh suraree| Sab bhushan bhushit bar naaree||
Raam bimukh sampati prabhutaai | Jaai rahi paai binu paai ||
Sajal mool jinh saritanh nahi | Barashi gae puni tabahi sukhahee ||
Sunu dasakanth kahau pan ropee | Bimukh Raam traata nahi kopee ||
Sankar sahas bishnu aj tohee | Sakahi na raakhi raam kar drohee ||
 
|| Doha – 23 ||
Mohmool bahu sool prad tyagahu tam abhimaan|
Bhajahu Raam Raghunaayak krupa sindhu Bhagawaan ||


||Chopai||
Jadapi kahee kapi ati hit baanee| Bhagati bibek birati nay saanee ||
Bola bihasi maha abhimaanee| Mila hahahi kapi gur bad gyanee||
Mrutyu nikat aai khal tohee| Laagesi adham sikhaavan mohee||
Ulata hoihi kah Hanumaana| Matibhram tor pragat mai jaana||
Suni kapi bachan bahut khisiaana| Begi na harahu moodh kar praana||
Sunat nisaachar maaran dhaae| Sachivanh sahit Bibheeshanu aae||
Naai sees kari binay bahoota| Neeti birodh na maaria doota||
Aan dand kachhu karia gosaai| Sabahee kahaa mantra bhal bhai||
Sunat bihasi bola daskandhar | Ang bhang kari pathaia Bandar ||
 
|| Doha – 24 ||
kapi ke mamata poonch par sabahi kahau samuzaai|
Tel bori pat baandhi puni paavak dehu lagaai ||

||Chopai||
Poonchh-heen baanar tah jaaehi| Tab sath nij naathhi lai aaihi ||
Jinh kai keenhisi bahut badaai| Dekhu mai tinh kai prabhutaai ||
Bachan sunat kapi man musukaana| Bhai sahaay saarad mai jaana ||
Jaatudhaan suni Raavan bachana| Laage rachai moodh soi rachana||
Raha na nagar basan ghrut tela| Baadhee poonch keenh kapi khela||
Kautik kah aae purbaasee| Maarahi charan karahi bahu haasee||
Baajahi dhol dehi sab taaree | Nagar pheri puni poonch prajaaree||
Paavak jaat dekhi Hanumanta| Bhayau param lafghuroop turanta||
Nibuki chadheu kapi kanak ataaree | Bhai sabheet nisaachar naaree ||
 
|| Doha – 25 ||
Hari prerit tehi avasar chale marut unachaas|
Attahaas kari garja kapi badhi laag akaas||

||Chopai||
Deh bisaal param haruaai| Mandir te mandir chadh dhaai||
Jarai nagar bha log bihaala| Zapat lapat bahu koti karaala||
Taat maatu haa sunia pukaara| Ehi avasar ko hamahi ubaara||
Ham jo kaha yah kapi nahi hoi| Baanar roop dhare sur koi ||
Saadhu avagya kar phalu aisa| Jarai nagar anaath kar jaisa||
Jaara nagaru nimish ek maahee| Ek Bibheeshan kar bruh naahee ||
Taa kar doot anal jehi sirija | Jaraa na so tehi kaaran girija ||
Ulati palati Lanka sab Jaaree | Koodi para puni sindhu mazaaree ||


|| Doha – 26 ||
Poonch buzaai khoi shram dhari laghu roop bahori|
Janaksuta ke aage thaadh bhayau kar jori ||

||Chopai||
Maatu mohi deeje kachhu cheenha | Jaise Raghunaayak mohi deenha ||
Choodamani utaari tab dayaoo | Harash samet pavanasut layaoo ||
Kahehu taat as mor pranaama| Sab prakaar prabhu pooranakaama||
Deen dayaal biridu sambhaaree| Harahu naath mam sankat bhaaree||
Taat sakrasut katha sunaaehu| Baan prataap prabhuhi samuzaehu||
Maas divas mahu naath na aava| Tau puni mohi jiat nahi paava||
Kahu kapi kehi bidhi rakhau praana|Tumhahoo Taat kahat ab jaana||
Tohi dekhi seetali bhai chhatee| Puni mo kahu soi dinu so raatee||
 
|| Doha – 27 ||
Janakasutahi samuzaai kari bahu bidhi dheeraju deenh|
Charan kamal siru naai kapi gavanu Raam pahi keenh ||

||Chopai||
Chalat mahaadhuni garjesi bhaaree | Garbh stravahi suni nisichar naaree ||
Naaghi sindhu ehi paarahi aava | Sabad kilikila kapinh sunaava ||
Harashe sab biloki Hanumaana | Nutan janm kapinh tab jaana ||
Mukh prasanna tan tej biraaja | Keenhesi raamachandra kar kaaja ||
Mile sakal ati bhae sukhaaree | Talafat meen paav jimi baaree ||
Chale harashi Raghunaayak paasa | Poonchhat kahat naval itihaasa ||
Tab madhuban bheetar sab aae| Angad sammat madhu phal khaae||
Rakhawaare jab barajan laage| Mushti prahaar hanta sab bhaage ||
 
|| Doha – 28 ||
Jaai pukaare te sab ban ujaar jubaraaj |
Suni Sugreev harash kapi kari aae prabhu kaaj ||

||Chopai||
Jau na hoti sita sudhi paai | Madhuban ke fal sakahi ki khaai ||
Ehi bidhi man bichaar kar raja | Aai gae kapi sahit samaaja ||
Aai sabanhi naava pad seesa | Mileu sabanhi ati prem kapeesa||
Poonchhee kusal kusal pad dekhee| Raam krupa bhaa kaaju biseshee ||
Naath kaaju keenheu Hanumaana | Raakhe sakal kapinh ke praana ||
Suni Sugreev bahuri tehi mileu | Kapinh sahit Raghupati pahi chaleoo||
Raam kapinh jab aavat dekha | Kie kaaju man harash bisesha ||
Fatik sila baithe dwau bhaai | Pare sakal kapi charanhi jaai ||
 
|| Doha – 29 ||

Preeti sahit sab bhete Raghupati karuna punj|
Poonchhee kusal naath ab kusal dekhi pad kanj||

||Chopai||
Jaamvant kah sunu Raghuraaya | Jaa par naath karahu tumh daaya ||
Taahi sada subh kusal nirantar | Sur nar muni prasannata upar ||
Soi bijai binai gun saagar | Taasu sujasu trailok ujaagar ||
Prabhu kee krupa bhayau sabu kaaju | Janma hamaar safal bhaa aaju ||
Naath pavansut keenhi jo karanee | Sahasahu much na jaai so baranee ||
Pavantanay ke charit suhaae | Jaamavant Raghupatihi sunaae ||
Sunat krupaanidhi man ati bhaae | Puni Hanumaan harashi hiy laae ||
Kahahu taat kehi bhaanti Jaanakee | Rahati karati rachchha swapraan kee ||

 
|| Doha – 30 ||
Naam paaharu divas nisi dhyaan tumhaar kapaat|
Lochan nij pad jantrit jaahi praan kehi baat ||

||Chopai||
Chalat mohi choodaamani deenhee | Raghupati hriday laai soi leenhee ||
Naath jugal lochan bhari baree | Bachan kahe kachhu Janakkumari||
Anuj samet gahehu prabhu charana | Deen bandhu pranataarati harana ||
Man kram bachan charan anuraagee | Kehi aparaadh naath hau tyaagee ||
Avagun ek mor mai maana | Bichhurat praan na keenh payaana ||
Naath so nayananhi ko aparaadha | Nisarat praan karahi hathi baadha ||
Birah agini tanu tool sameera | Swaas jarai chhan maahi sareera ||
Nayan stravahi jalu nij hit laagee | Jarai na paav deh birahaagee ||
Sita kai ati bipati bisaala | Binahi kahe bhali deendayaala ||
 
|| Doha – 31 ||
Ninish nimish karunaanidhi jaahi kalap sam beeti|
Begi chalia prabhu aania bhuj bal khal dal jeeti ||


||Chopai||
Suni Sita dookh prabhu sukh ayana| Bhari aae jal raajiv nayana ||
Bachan kaay man mam gati jaahee | Sapanehu boozia bipati ki taahee ||
Kah Hanumant bipati prabhu soi| Jab tav sumiran bhajan na hoi ||
Ketik baat prabu jaatudhaan kee | Ripuhi jeeti aanibee jaankee ||
Sunu kapi tohi samaan upakaaree | Nahi kou sur nar muni tanudhaaree ||
Prati upakaar karau kaa tora| Sanmukh hoi na sakat man mora ||
Sunu sut tohi urin mai naahee | Dekheu kari bichaar man maahee ||
Puni puni kapihi chitav surtraata | Lochan neer pulak ati gaata ||

 
|| Doha – 32 ||
Suni prabhu bachan biloki mukh gaat harashi Hanumant|
Charan pareu premaakul traahi traahi bhagavant ||


||Chopai||
Baar baar prabhu chahai uthaava | Prem magan tehi uthab na bhaava ||
Prabhu kar pankaj kapi ke seesa | Sumiri so dasa magan gaureesa ||
Saavadhaan man kari puni sankar | Laage kahan katha ati sundar ||
Kapi uthaai prabhu hriday lagaava | Kar gahi param nikat baithaava ||
Kahu kapi Raavan paalit Lanka | Kehi bidhi daheu durg a ti banka ||
Prabhu prasanna jaana Hanumaana | Bola bachan bigat abhimaana ||
Saakhaamrug kai badi manusaai | Saakha te saakha par jaai ||
Naaghi sindhu haatkapur jaara | Nisichar gan badhi bipin ujaara ||
So sab tav prataap Raghuraai | Naath na kachoo mori prabhutaai ||
 
|| Doha – 33 ||
Taa kahu prabhu kachhu agam nahi jaa par tumh anukool|
Tav prabhaav badavaanalahi jaari sakai khalu tool||

||Chopai||
Naath bhagati ati sukhadaayanee | Dehu krupa kari anapaayanee ||
Suni prabhu param saral kapi baanee | Evamastu tab kaheu bhavaanee ||
Uma Raam subhaau jehi jaana | Taahi bhajanu taji bhaav na aana ||
Yah sambaad jaasu ur aava | Raghupati charan bhagati soi paava ||
Suni prabhu bachan kahahi kapibrunda | Jay Jay Jay krupaal sukhkanda ||
Tab Raghupati kapipatihi bolaava | Kaha chalai kar karahu banaava ||
Ab bilambu kehi kaaran keeje | Turat kapinh kahu aayasu deeje ||
Kautuk dekhi suman bahu barashi | Nabh te bhavan chale sur harashee ||
 
|| Doha – 34 ||
Kapipati begi bolaae aae juthap jooth |
Naana baran atul bal baanar bhaalu barooth ||


||Chopai||
Prabhu pad pankaj naavahi seesa | Garjahi bhaalu mahaabal keesa ||
Dekhi Raam sakal kapi sena | Chitai krupa kari Raajiv naina ||
Raam krupa bal paai kapinda | Bhae pachchhajut manahu girinda ||
Harashi Raam tab keenh payaana | Sagun bhae sundar subh nana ||
Jaasu sakal mangalamay keetee | Taasu payaan sagun yah neetee ||
Prabhu payaan jaana baidehee | Faraki baam ang janu kahi dehee ||
Joi joi sagun jaanakihi hoi | Asagun bhayau Raavanahi soi ||
Chala kataku ko baranai paara | Garjahi baanar bhaalu apaara ||
Nakh aayudh giri paadapadhaaree | Chale gagan mahi ichchhachaaree ||
Ke harinaad bhaalu kapi karahee | Dagamagaahi diggaj chikkarahee ||
 
|| Chhand ||
Chikkarahi diggaj dol Mahi giri lol saagar kharabhare |
Man harash sabh gandharb sur Muni naag kinnar dukh tare ||
Katakatahi markat bikat bhat Bahu koti kotinh dhaavahee |
Jay Raam prabal prataap Kosalnaath gun gan gaavahee ||1||
Sahi sak na bhaar udaar Ahipati baar baarhi mohai ||
Gah dasan puni puni Kamath Prushth kathor so kimi sohai ||
Rabhubeer ruchir prayaan prasthiti Jaani param suhaavanee |
Janu kamath kharpar sarparaaj so Likhat abichal paavanee ||2||
 
|| Doha – 35 ||
Ehi bidhi jaai krupaanidhi utare saagar teer|
Jah tah laage khaan fal bhaalu bipul kapi beer||

||Chopai||
Uhaa nisaachar rahahi sasanka| Jab te jaari gayau kapi Lanka ||
Nij nij gruh sab karahi bichaara | Nahi nisichar kul ker ubaara ||
Jaasu doot bal barani na jaai | Tehi aae pur kavan bhalaai ||
Dutinh san suni purajan baanee | Mandodaree adhik akulaanee ||
Rahasi jori kar pati pag laagee | Boli bachan neeti ras paagee ||
Kant karash hari san pariharahoo | Mor kahaa ati hit hiy dharahoo ||
Samuzat jaasu doot kai karanee | Stravahi garbh rajaneechar gharanee ||
Taasu naari nij sachiv bolaai | Pathavahu kant jo chahahu bhalaai ||
Tav kul kamal bipin dukhadaai | Sita Sit nisa sam aai ||
Sunahu naath sita binu deenhe | Hit na tumhaar sambhu aj keenhe ||
 

|| Doha – 36 ||
Raam baan ahi gan saris nikar nisaachar bheka |
Jab lagi grasat na tab lagi jatanu karahu taji tek ||

||Chopai||
Shravan sunee sath taa kari baanee | Bihasa jagat bidit abhimanee ||
Sabhay Subhaau naari kar saacha | Mangal mahu bhay man ati kaacha ||
Jau aavai markat katakaai | Jiahi bichaare nisichar khaai ||
Kampahi lokap jaakee traasa| Taasu naari sabheet badi haasa||
As kahi bihasi taahi ur laai | Chaleu sabha mamata adhikaai||
Mandodari hriday kar chinta | Bhayau kant par bidhi bipareeta ||
Baitheu sabha khabari asi paai | Sindhu paar sena sab aai ||
Buzesi sachiv uchit mat kahahoo | Te sab hanse masht kari rahahoo ||
Jitehu suraasur tab shram naahee | Nar Baanar kehi lekhe maahee ||
 
|| Doha – 37 ||
Sachib baid gur teeni jau priy bolahi bhay aas |
Raaj dharm tan teeni kar hoi begihee naas ||

||Chopai||
Soi Raavan kahu bane sahaai | Astuti karahi sunaai sunaai ||
Avasar jaani Bibheeshanu aava | Bhrata charan seesu tehi naava ||
Puni siru naai baith nij aasan | Bola bachan paai anusaasan ||
Jo krupaal poonchhihu mohi baata | Mati anuroop kahau hit taata ||
Jo aapan chaahai kalyaana | Sujasu sumati subh gati such nana ||
So parnaari lilaar gosaai | Tajau chauthi ke chand ki naai ||
Chaudah bhuvan ek pati hoi | Bhootadroh tishtai nahi soi ||
Gun saagar naagar nar jou | Alap lobh bhal kahai na kou ||
 
|| Doha – 38 ||
Kaam krodh mad lobh sab nath narak ke panth |
Sab parihari Raghubeerahi bhajahu bhajau jehi sant||

||Chopai||
Taat Raam nahi nar bhoopaala | Bhuvaneshwar kaalahu kar kaala ||
Brahm anaamay aj bhagavanta | Byapak ajit anaadi ananta ||
Go dwij dhenu dev hitakaaree | Krupa sindhu manush tanudhaaree ||
Jan ranjan bhanjan khal braata | Bed dharm rachchhak sunu bhrata ||
Tohi bayaru taji naaia maatha | Pranataarati bhanjan Raghunaatha ||
Dehu naath prabhu kahu baidehee | Bhajahu Raam binu hetu sanehee ||
Saran gae prabhu taahu na tyaaga | Biswa droh krut agh jehi laaga ||
Jaasu naam tray taap nasavan | Soi prabhu pragat samuzu jiy Raavan||
 
|| Doha –39 ||
Baar baar pad laagau binay karau dasasees |
Parihari maan moh mad bhajahu kosalaadhees ||
Muni pulasti nij sisya san kahi pathai yah baat |
Turat so mai prabhu san kahee paai suavasaru taat||

||Chopai||
Malyavant ati sachiv sayaana | Taasu bachan suni ati such maana ||
Taat anuj tav neeti Bibheeshan | So ur dharahu jo kahat Bibheeshan ||
Ripu utakarash kahat sath dou | Doori na karahu iha hai kou ||
Malyavant gruh gayau bahoree | Kahai Bibheeshan puni kar joree ||
Sumati kumati sab ke ur rahahee | Naath puran nigam as kahahee ||
Jaha sumati tah sampati nana | Jaha kumati tah bipati nidaana ||
Tav ur kumati basi bipareeta | Hit anahit maanahu ripu preeta ||
Kaalraati nisichar kul keree | Tehi Sita par preeti ghaneree ||
 
|| Doha – 40 ||
Taat charan gahi maagau raakhahu mor dulaar|
Sita dehu Raam kahu ahit na hoi tumhaar ||


||Chopai||
Budh puraan shruti sammat baanee | Kahi Bibheeshan neeti bakhanee ||
Sunat dasaanan utha risaai | Khal tohi nikat mrutyu ab aai ||
Jiasi sada sath mor jiaava | Ripu kar pachchha moodh tohi bhaava ||
Kahasi na khal as ko jag maahee | Bhuj bal jaahi jita mai naahee ||
Mam pur basi tapasinh par preetee | Sath milu jaai tinhahi kahu neetee ||
As kahi keenhesi charan prahaara | Anuj gahe pad baarahi baara ||
Uma sant kai ihai badaai | Mand karat jo karai bhalaai ||
Tumh pit saris bhalehi mohi maara | Raamu bhaje hit naath tumhaara ||
Sachiv sang lai nabh path gayhaoo | Sabahi sunaai kahat as bhayaoo ||
 
|| Doha – 41 ||
Raam satyasankalp prabhu sabha kaalbas tori |
Mai Raghubeer saran ab jaau dehu jani khori ||

||Chopai||
As kahi chala Bibheeshan jabahee | Aayuheen bhae sab tabahee ||
Saadhu avagya turat bhavaanee | Kar kalyaan akhil kai haanee ||
Raavan jabahi Bibheeshan tyaaga | Bhayau bibhav binu tabahi abhaaga ||
Chaleu harashi Raghunaayak paahee | Karat manorath bahu man maahee ||
Dekhihau jaai charan jalajaata | Arun mrudul sevak sukhadaata ||
Je pad parasi taree rishinaaree | Dandak Kaanan paavanakaaree ||
Je pad Janakasuta ur laae | Kapat kurang sang dhar dhaae ||
Har ur sar saroj pad jei | Ahobhagya mai dekhihau tei ||
 
|| Doha – 42 ||
Jinh paayanh ke paadukanhi bharatu rahe man laai|
Te pad aaju bilokihau inh nayananhi ab jaai ||

||Chopai||
Ehi bidhi karat saprem bichaara| Aayau sapadi sindhu ehi paara ||
Kapinh Bibheeshan aavat dekha | Jaana kou ripu doot bisesha ||
Taahi raakhi kapees pahi aae | Samaachaar sab taahi sunaae ||
Kah Sugreev sunahu Raghuraai | Aava Milan dasaanan bhaai ||
Kah prabhu sakha booziai kaaha | Kahai kapees sunahu naranaaha ||
Jaani na jaai nisaachar maaya | Kaamroop kehi kaaran aaya ||
Bhed Hamaar len sath aava | Raakhia bandhi mohi as bhaava ||
Sakha neeti tumh neeki bichaaree | Mam pan saranaagat bhayahaaree ||
Suni prabhu bachan harash Hanumaana | Saranaagat bachchhal bhagawaana ||

|| Doha – 43 ||
Saranaagat kahu je tajahi nij anahit anumaanee |
Te nar paavar paapamay tinhahee bilokat haanee ||

||Chopai||
Koti bipra badh laagahi jaahoo | Aae saran tajau nahi taahoo ||
Sanamukh hoi jeev mohi jabahee | Janm koti agh naasahi tabahee ||
Paapavant kar sahaj subhaoo | Bhajanu mor tehi bhaav na kaaoo ||
Jau pai dusht hriday soi hoi | More sanamukh aav ki soi ||
Nirmal man jan so mohi paava | Mohi kapat chhal chhidra na bhaava ||
Bhed len pathava dasaseesa | Tabahu na kachu bhay haani kapeesa ||
Jag mahu sakha nisaachar jet e | Lachhimanu hanai nimish mahu te te||
Jau sabheet aava saranaai | Rakhihau taahi praan kee naai ||
 
|| Doha – 44 ||
Ubhay bhaanti tehi aanahu hasi kah krupaaniket |
Jay krupaal kahi kapi chale angad Hanoo samet ||

||Chopai||
Saadar tehi aage kari baanar | Chale jaha Raghupati karunaakar ||
Doorihi te dekhe dwau bhraata | Nayanaanand daan ke data ||
Bhuj pralamb kanjaarun lochan | Syaamal gaat pranat bhay mochan ||
Singh kandh aayat ur soha | Aanan amit madan man moha ||
Nayan neer pulakit ati gaata | Man dhari dheer kahee mrudu baata ||
Naath dasaanan kar mai bhraata |Nisichar bans janam suratraata ||
Sahaj paapapriy taamas deha | Jatha ulukahi tam par neha ||
 
|| Doha – 45 ||
Shravan sujasu suni aayau prabhu bhanjan bhav bheer|
Traahi traahi aarati haran saran sukhad Rabhubeer ||

||Chopai||
As kahi karat dandavat dekha | Turat uthe prabhu harash bisesha ||
Deen bachan suni prabhu man bhaava | Bhuj bisaal gahi hriday lagaava ||
Anuj sahit mili dhig baithaaree| Bole bachan bhagat bhayaharree ||
Kahu Lankes sahit parivaara | Kusal kuthaahar baas tumhaara ||
Khal mandalee basahu dinu raatee | Sakha dharam nibahai kehi bhaantee ||
Mai jaanau tumhaari sab reetee | Ati nay nipun na bhaav aneetee ||
Baru bhal baas narak kar taata | Dusht sang jani dei bidhaata ||
Ab pad dekhi kusal Raghuraaya | Jau tumh keenhi jaani jan daaya ||
 
|| Doha – 46 ||
Tab lagi kusal na jeev kahu sapane hu man bishraam|
Jab lagi bhajat na Raam kahu sok dhaam taji kaam ||

||Chopai||
Tab lagi hriday basat khal nana | Lobh moh machchhar mad maana ||
Jab lagi ur na basat Raghunaatha| Dhare chaap saayak kati bhaatha ||
Mamata tarun tamee adhiaaree | Raag dvesh ulook sukhakaaree ||
Tab lagi basati jeev man maahee | Jab lagi prabhu prataap rabi naahee ||
Ab mai kusal mite bhay bhaare | Dekhi Raam pad kamal tumhaare ||
Tumh krupaal jaa par anukoola | Taahi na byaap tribidh bhav soola ||
Mai nisichar ati adham subhaaoo | Subh aacharanu keenh nahi kaaoo ||
Jaasu roop muni dhyaan na aava | Tehi prabhu harashi hriday mohi lava||
 
|| Doha – 47 ||
Ahobhagya mama amita ati rama krpa sukha punja|
Dekhe’um nayana biranci siva sebya jugala pada kanja||

||Chopai||
Sunahu sakha nija kaha’um subha’u | Jana bhusundi sambhu girija’u||
Jaum nara ho’i caracara drohi | Avai sabhaya sarana taki mohi||
Taji mada moha kapata chala nana | Kara’um sadya tehi sadhu samana||
Janani janaka bandhu suta dara | Tanu dhanu bhavana suhrda parivara||
Saba kai mamata taga batori | Mama pada manahi bamdha bari dori||
Samadarasi iccha kachu nahim | Harasa soka bhaya nahim mana mahim||
Asa sajjana mama ura basa kaisem | Lobhi hrdayam basa’i dhanu jaisem||
Tumha sarikhe santa priya morem | Dhara’um deha nahim ana nihorem||

|| Doha – 48 ||
Sagun upaasak parahit nirat neeti dradh nem|
Te nar praan samaan mam jinh ke dvij pad prem||

||Chopai||
Sunu Lankesh sakal gun tore | Taate tumh atisay priy more ||
Raam bachan suni baanar jootha | Sakal kahahi jay krupa barootha ||
Sunat Bibheeshanu prabhu kai baanee | Nahi aghaat shravanaamrut jaanee ||
Pad Ambuj gahi baarahi baara | Hriday samaat na premu apaara ||
Sunahu dev sacharaachar swamee | Pranatapaal ur antarajaamee ||
Ur kachhu pratham baasana rahee | Prabhu pad preeti sarit so bahee ||
Ab krupaal nij bhagat paavanee | Dehu sada siv man bhaavanee ||
Evamastu kahi prabhu ranadheera | Maaga turat sindhu kar neera ||
Jadapi sakha tav ichchha naahee | Mor darasu amogh jag maahee ||
As kahi Raam tilak tehi saara | Suman brushti nabh bhai apaara ||
 
|| Doha – 49 ||
Raavan krodh anal nij svaas sameer prachand |
Jarat Bibheeshan raakheu  deenheu raaju akhand ||
Jo sampati siv ravanahi deenhi die das math |
Soi sampada Bibheeshanhi sakuchi deenhi Raghunaath ||

||Chopai||
As prabhu chhadi bhajahi je aana | Te nar pasu binu poonch bishaata ||
Nij jan jaani taahi apanaava | Prabhu subhaav kapi kul man bhaava ||
Puni sarbagya sarb ur baasee | Sarbaroop sab rahit udaasee ||
Bole bachan neeti pratipaalak | Kaaran manuj danuj kul ghaalk ||
Sunu kapees Lankaapati bera | Kehi bidhi taria jaladhi gambheera ||
Sankul maker urag zash jaatee | Ati agaadh duster sab bhaantee ||
Kah Lankesh sunahu Raghunaayak | Koti sindhu soshak tav saayak ||
Jadyapi tadapi neeti asi gaai | Binay karia saagar san jaai ||
 
|| Doha – 50 ||
Prabhu tumhaar kulagur jaladhi kahihi upaay bichaari|
Binu prayaas saagar tarihi sakal bhaalu kapi dhaari ||

||Chopai||
Sakha kahee tumh neeki upaai | Karia daiv jau hoi sahaai ||
Mantra na yah lachhiman man bhaava | Raam bachan suni ati dookh paava ||
Naath daiv kar kavan bharosa | Soshia sindhu karia man rosa ||
Kaadar man kahu ek adhara | Daiv daiv aalasee pukaara ||
Sunat bihasi bole raghubeera | Aisehi karab dharahu man dheera ||
As kahi prabhu anujahi samuzaai | Sindhu sameep gae Raghuraai ||
Pratham pranaam keenh siru naai | Baithe puni tat darbh dasaai ||
Jabahi bibheeshan prabhu pahi aae | Paachhe raavan doot pathaae ||
 
|| Doha – 51 ||
Sakal charit tinh dekhe dhare kapat kapi deh |
Prabhu gun hriday saraahahi sarnaagat par neh||

||Chopai||
Pragat bakhaanahi Raam subhaaoo| Ati saprem gaa bisari duraaoo ||
Ripu ke doot kapinh tab jaane | Sakal baandhi kapees pahi aane ||
Kah Sugreev sunahu sab baanar | Ang bhang kari pathavahu nisichar||
Suni Sugreev bachan kapi dhaae | Deen pukaarat tadapi na tyaage ||
Jo hamaar har naasa kaana | Tehi kosalaadhees kai aana ||
Suni lachhiman sab nikat bolaae | Daya laagi hasi turat chhodaae ||
Raavan kar deejahu yah paatee | Lachhiman bachan baachu kulaghaatee||
 
|| Doha – 52 ||
kahehu mukhaagar moodh san mam sandesu udaar |
Sita dei milahu na ta aava kaalu tumhaar ||


||Chopai||
Turat naai lachhiman pad maatha | Chale doot baranat gun gaatha ||
Kahat Raam jasu Lanka aae | Raavan charan sees tinh naae ||
Bihasi dasaanan poonchhee baata | Kahasi na suk aapani kusalaata ||
Puni kahu khabari Bibheeshan keree| Jaahi mryutu aai ati neree ||
Karat raaj Lanka sath tyaagee | Hoihi jav kar keet abhaagee ||
Puni kahu bhaalu kees katakaai | Kathin kaal prerit chali aai ||
Jinh ke jeevan kar rakhavaara | Bhayau mrudul chit sindhu bichaara ||
Kahu tapasinh kai baat bahoree | Jinh ke hriday traas ati moree ||
 
|| Doha – 53 ||
Kee bhai bhet ki firi gae shravan sujasu suni mor |
Kahasi na ripu dal tej bal bahut chakit chit tor ||


||Chopai||
Naath krupa kari poonchhehu jaise | Maanahu kahaa krodh taji taise ||
Mila jaai jab anuj tumhaara | Jaatahi raam tilak tehi saara ||
Raavan doot hamahi suni kaana | Kapinh baandhi deenhe dukh nana ||
Shravan naasika kaatai laage | Raam sapath deenhe ham tyaage ||
Poonchhehu naath Raam katakaai | Badan koti sat barani na jaai ||
Naana baran bhaalu kapi dhaaree | Bikataanan bisaal bhayakaaree ||
Jehi pur daheu hateu sut tora | Sakal kapinh mah tehi balu thora||
Amit naam bhat kathin karaala | Amit naag bal bipul bisaala ||
 
|| Doha – 54 ||
Dwibid mayank neel nal angad gad bikataasi |
Dadhi mukh kehari nisath sat jaamavant balaraasi ||

||Chopai||
E kapi sab Sugreev samaana | Inh sam kotinh ganai ko nana ||
Raam krupa atulit bal tinhahee | Trun samaan trailokahi ganahee ||
As mai suna shravan dasakandhar | Padum atharah juthap Bandar ||
Naath katak mah so kapi naahee | Jo na tumhahi jetai ran maahee ||
Param krodh meejahi sab haatha | Aayasu pain a dehi raghunaatha ||
Soshahi sindhu sahit zash byaala | Poorahi na ta bhari kudhar bisaala ||
Mardi gard milavahi dasaseesa | Aisei bachan kahahi sab keesa ||
Garjahi tarjahi sahaj asanka | Maanahu grasan chahat hahi Lanka ||
 
|| Doha – 55 ||
Sahaj soor kapi bhaalu sab puni sir par prabhu Raam |
Raavan kaal koti kahu jeeti sakahi sangraam ||

||Chopai||
Raam tej bal budhi bipulaai | Sesh sahas sat sakahi na gaai ||
Sak sar ek soshi sat saagar | Tav bhraatahi poonchheu nay naagar ||
Taasu bachan sni saagar paahee | Maagat panth krupa man maahee ||
Sunat bachan bihasa dasaseesa | Jau asi mati sahaay krut keesa ||
Sahaj bheeru kar bachan dhradhaai| Saagar san thaanee machalaai ||
Moodh mrusha kaa karasi badai | Ripu bal buddhi thaah mai paai ||
Sachiv sabheet Bibheeshan jaake | Bijay bibhooti kahaa jag take ||
Suni khal bachan doot ris baadhee | Samay bichaari patrika kaadhee ||
Raamaanuj deenhee yah paatee | Nath bachaai judaavahu chhatee ||
Bihasi baam kar leenhee Raavan | Sachiv boli sath laag bachaavan ||
 
|| Doha – 56 ||
Baatanh manahi rizaai sath jani ghaalasi kul khees |
Raam birodh na ubarasi saran bishnu aj is ||
Kee taji maan anuj iv prabhu pad pankaj bhrung |
Hohi ki Raam saraanal khal kul sahit patang ||

||Chopai||
Sunat sabhay man much musukaai | Kahat dasaanan sabahi sunaai ||
Bhoomi para kar gahat akaasa | Laghu taapas kr bag bilaasa ||
Kah suk naath satya sb baanee | Samuzahu chhadi prakruti abhimaanee ||
Sunau bachan mam parihari krodha | Naath Raam san tajahu birodha ||
Ati komal Raghubeer subhaaoo | Jadhyapi akhil lok kar raaoo ||
Milat krupa tumh par prabhu karihee | Ur aparaadh na ekau dharihee ||
Janaksuta Raghenaathhi deeje | Etana kaha mor prabhu keeje ||
Jab tehi kahaa den baidehee | Charan prahaar keenh sath tejee ||
Naai charan siru chala so tahaa| Krujpasindhu Raghunaayak jahaa ||
Kari pranaam nij katha sunaai | Raam krupa aapani gati paai ||
Rishi agasti kee saap bhavaanee | Raachhas bhayau raha muni gyaanee ||
Bandi Raam pad baarahi baara | Muni nij aashram kahu pagu dhaara ||
 
|| Doha – 57 ||
Binay na maanat jaladhi jad gae teeni din beeti |
Bole Raam sakop tab bhay binu hoi na preeti ||


||Chopai||
Lachhiman baan saraasan aanu | Soshau baaridhi bisikh krusaanoo ||
Sath san binay kutil san preetee | Sahaj krupan san sundar neetee ||
Mamata rat san gyaan kahaanee | Ati lobhee san birati bakhaanee ||
Krodhihi sam kaamihi harikatha | Oosar beej bae fal jatha ||
As kahi Raghupati chhap chadhaava | Yah mat lachhiman ke man bhaava ||
Sandhaaneu prabhu bisikh karaala | Uthi udadhi ur antar jwaala ||
Makar urag zash gan akulaane | Jarat jantu jalanidhi jab jaane ||
Kanak thaar bhari mani gan nana | Bipra roop aayau taji maana ||
 
|| Doha – 58 ||
Kaatehin Pai Kadaree Phari Koti Jatan Kou Seench|
Binay Na Maan Khages Sunu Daatehin Pai Nav Neech||

||Chopai||
Sabhay Sindhu Gahi Pad Prabhu Kere | Chhamahu Naath Sab Avagun Mere||
Gagan Sameer Anal Jal Dharanee | Inh Kai Naath Sahaj Jad Karanee||
Tav Prerit Maayaan Upajae | Srshti Hetu Sab Granthani Gae||
Prabhu Aayasu Jehi Kahan Jas Ahee | So Tehi Bhaanti Rahen Sukh Lahee||
Prabhu Bhal Keenh Mohi Sikh Deenheen | Marajaada Puni Tumharee Keenheen||
Dhol Gavaanr Soodr Pasu Naaree | Sakal Taadana Ke Adhikaaree||
Prabhu Prataap Main Jaab Sukhaee | Utarihi Kataku Na Mori Badaee||
Prabhu Agya Apel Shruti Gaee | Karaun So Begi Jo Tumhahi Sohaee||
 
|| Doha – 59 ||
Sunat Bineet Bachan Ati Kah Krpaal Musukai|
Jehi Bidhi Utarai Kapi Kataku Taat So Kahahu Upai||

||Chopai||
Naath Neel Nal Kapi Dvau Bhaee | Larikaeen Rishi Aasish Paee||
Tinh Ken Paras Kien Giri Bhaare | Tarihahin Jaladhi Prataap Tumhaare||
Main Puni Ur Dhari Prabhu Prabhutaee. Karihun Bal Anumaan Sahaee||
Ehi Bidhi Naath Payodhi Bandhai | Jehin Yah Sujasu Lok Tihun Gai||
Ehi Sar Mam Uttar Tat Baasee | Hatahu Naath Khal Nar Agh Raasee||
Suni Krpaal Saagar Man Peera | Turatahin Haree Raam Ranadheera||
Dekhi Raam Bal Paurush Bhaaree | Harashi Payonidhi Bhayu Sukhaaree||
Sakal Charit Kahi Prabhuhi Sunaava | Charan Bandi Paathodhi Sidhaava||
 
|| Chhand ||
Nij Bhavan Gavaneu Sindhu Shreeraghupatihi Yah Mat Bhaayoo|
Yah Charit Kali Mal Har Jathaamati Daas Tulasee Gaayoo||
Sukh Bhavan Sansay Saman | Davan Bishaad Raghupati Gun Gana|
Taji Sakal Aas Bharos Gaavahi Sunahi Santat Sath Mana||

|| Doha – 60 ||
Sakal sumangal daayak Raghunaayak gun gaan |
Saadar sunahi te tarahi bhav sindhu bina jalajaan ||



Sunderkand ka Path Hindi PDF

सुन्दरकाण्ड भारतीय महाकाव्य रामायण का एक महत्वपूर्ण एवं विशिष्ट खण्ड है। यह अध्याय हनुमान जी की वीरता, निष्ठा और अद्वितीय भक्ति पर केंद्रित है। सुंदरकांड को उसके काव्य सौंदर्य, उसकी गहरी दार्शनिक शिक्षाओं, उसके साहस और उसकी निष्ठा के लिए पूजनीय माना जाता है। हनुमान जी से आध्यात्मिक शक्ति, सुरक्षा और आशीर्वाद पाने के लिए भक्त इसका नियमित पाठ करते हैं। “सुंदरकांड” नाम संस्कृत के शब्द “सुंदर” (सुंदर) और “कांड” (अध्याय) से लिया गया है, जो इस खंड की प्रेरक और सौंदर्यपूर्ण प्रकृति पर विशेष जोर देता है।

सुंदरकांड का महत्व इस बात में है कि इसमें हनुमान जी की लंका यात्रा, माता सीता से उनकी मुलाकात और राम का सीता को संदेश जैसी महत्वपूर्ण घटनाओं का वर्णन है। यह भाग न केवल रामायण का भावनात्मक हिस्सा है, बल्कि यह एक गहरा आध्यात्मिक संदेश और जीवन के प्रति सही दृष्टिकोण भी सिखाता है।

सुंदरकांड का पाठ कैसे करें?

सुंदरकांड का पाठ करने से पहले कुछ विशेष तैयारी जरूरी है। इसका पाठ मंगलवार या शनिवार के दिन करना विशेष लाभकारी माना जाता है, क्योंकि मंगलवार हनुमान जी का दिन होता है और शनिवार के दिन भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व होता है। इन दिनों में सुंदरकांड का पाठ करने से भक्तों को अधिक आध्यात्मिक लाभ मिलता है।

सुंदरकांड का पाठ सुबह ब्रह्म मुहूर्त (4 बजे से 6 बजे) में करना सबसे शुभ माना जाता है। इस समय वातावरण शुद्ध होता है और ध्यान लगाकर जप करना आसान होता है। पाठ करने से पहले स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। पूजा स्थान पर हनुमान जी और श्री राम जी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। आप गणेश जी, शिव जी और लक्ष्मण जी की मूर्ति या तस्वीर भी रख सकते हैं। फूल, धूप, दीप, फल, प्रसाद आदि रखें। बोली सामग्री के बीच.

पाठ करते समय हनुमान जी और श्री राम जी की मूर्ति या तस्वीर के सामने बैठें और तय करें कि आप यह पाठ किस उद्देश्य से कर रहे हैं। बीच में किसी भी प्रकार के व्यवधान से बचते हुए पूरे पाठ को ध्यानपूर्वक और एकाग्रता से पढ़ें। पाठ समाप्त होने के बाद हनुमान जी और श्री राम जी की आरती करें और उपस्थित लोगों को प्रसाद वितरित करें।

सुंदरकांड पाठ कितने दिन करना चाहिए?

सुंदरकांड का पाठ कितने दिन तक करना चाहिए, यह भक्त की इच्छा और उसकी सुविधानुसार होता है। भक्त इसे एक दिन, तीन दिन, सात दिन, 11 दिन, 21 दिन या 41 दिन तक कर सकते हैं। सामान्य रूप से, 11 दिनों तक सुंदरकांड का पाठ करना शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह समय हनुमान जी को प्रसन्न करने और उनके आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पर्याप्त होता है।

यदि कोई विशेष मनोकामना की पूर्ति के लिए सुंदरकांड का पाठ कर रहा हो, तो 21 या 41 दिनों तक पाठ करने की सलाह दी जाती है। ऐसा माना जाता है कि इतने दिन तक पाठ करने से मनोकामना अवश्य पूरी होती है। सुंदरकांड पाठ करने से पहले किसी विद्वान ब्राह्मण या अनुभवी व्यक्ति से सलाह ली जा सकती है ताकि सही मार्गदर्शन मिल सके।

21 दिनों तक सुंदरकांड पढ़ने के क्या लाभ हैं?

21 दिनों तक सुंदरकांड का पाठ करने से मानसिक, आध्यात्मिक और शारीरिक लाभ मिलता है। इस पाठ से न केवल श्री राम के प्रति भक्ति और प्रेम बढ़ता है बल्कि हनुमान जी की महिमा को समझने और उनके चमत्कारों से प्रेरणा लेने में भी मदद मिलती है। माना जाता है कि 21 दिनों तक पाठ करने से समस्याएं दूर होती हैं, मन शांत होता है और जीवन में धैर्य, साहस और सकारात्मक ऊर्जा आती है। सुंदरकांड हनुमान जी की अद्वितीय भक्ति और समर्पण को दर्शाता है, जो भक्तों को अपने जीवन में दृढ़ संकल्प और साहस अपनाने के लिए प्रेरित करता है।

महिलाओं के लिए सुंदरकांड का पाठ

महिलाओं को सुंदरकांड का पाठ करने के अधिकार पर भी कई धारणाएं हैं। कुछ लोगों का मानना है कि महिलाओं को सुंदरकांड का पाठ नहीं करना चाहिए क्योंकि हनुमान जी ब्रह्मचारी हैं, लेकिन यह विचारधारा पूरी तरह से व्यक्तिगत धारणाओं पर आधारित है। असल में, सुंदरकांड एक धार्मिक ग्रंथ है, और इसे कोई भी व्यक्ति, चाहे वह महिला हो या पुरुष, श्रद्धा और विश्वास के साथ पढ़ सकता है। हनुमान जी की भक्ति और समर्पण की कहानी सभी के लिए प्रेरणादायक है और इससे मिलने वाला आध्यात्मिक लाभ सभी को समान रूप से प्राप्त होता है।

यदि कोई महिला हनुमान जी की भक्ति में विश्वास करती है और सुंदरकांड का पाठ करना चाहती है, तो उसे ऐसा करने से कोई नहीं रोक सकता।


सुंदरकांड में क्या लिखा है?

सुंदरकांड रामायण का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जिसमें हनुमान जी की वीरता, भक्ति और साहस का वर्णन किया गया है। इसमें मुख्य रूप से हनुमान जी की लंका यात्रा, माता सीता से मिलन, और राम का संदेश पहुंचाने की कथा है। यह हनुमान जी की राम के प्रति निष्ठा और समर्पण को दर्शाता है।

सुंदरकांड पाठ कैसे करें?

सुंदरकांड का पाठ करने से पहले भक्त को शुद्धता और ध्यान का पालन करना चाहिए। मंगलवार या शनिवार को, सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। हनुमान जी और श्रीराम जी की मूर्ति या तस्वीर के सामने बैठकर पाठ करें। पाठ के दौरान एकाग्रचित्त रहें और ध्यान को भटकने न दें। पाठ के बाद आरती करें और प्रसाद वितरित करें।

सुंदरकांड को ऐसा क्यों कहा जाता है?

सुंदरकांड का नाम संस्कृत के शब्दों “सुंदर” (अर्थात सुंदर) और “कांड” (अर्थात अध्याय) से लिया गया है। इस अध्याय में हनुमान जी के अद्भुत साहस, भक्तिपूर्ण कार्य और प्रेरणादायक घटनाओं का वर्णन है, जो इसे अत्यंत सुंदर और प्रेरणादायक बनाते हैं। इसलिए इसे “सुंदरकांड” कहा जाता है।

सुंदरकांड कब तक है?

सुंदरकांड पाठ का समय व्यक्तिगत गति पर निर्भर करता है। औसतन, सुंदरकांड के पाठ को पूरा करने में 45 मिनट से 1 घंटा लग सकता है। कुछ लोग इसे धीमी गति से ध्यानपूर्वक पढ़ते हैं, जिसमें समय थोड़ा अधिक लग सकता है।

सुंदरकांड पढ़ना कब शुरू करें?

सुंदरकांड का पाठ किसी भी शुभ दिन जैसे मंगलवार या शनिवार को शुरू किया जा सकता है, क्योंकि ये दिन हनुमान जी के लिए विशेष माने जाते हैं। सुबह के ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4 बजे से 6 बजे के बीच) में पाठ करना विशेष शुभ माना जाता है। हालाँकि, किसी भी समय श्रद्धा और भक्ति के साथ इसे पढ़ा जा सकता है।

सुंदरकांड के नियम क्या हैं?

सुंदरकांड का पाठ करते समय कुछ नियमों का पालन करना चाहिए। पाठ से पहले स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। हनुमान जी और श्रीराम जी की मूर्ति या तस्वीर के सामने बैठकर पाठ करें। पाठ को पूरा ध्यान और समर्पण के साथ करें। पाठ के दौरान किसी प्रकार की बाधा न आने दें और पूरा पाठ एक ही सत्र में समाप्त करें।

गंगा स्तुति: जय जय भगीरथ नन्दिनि – Ganga Stuti: Jai Jai Bhagirath Nandini 2026

गंगा स्तुति: जय जय भगीरथ नन्दिनि (Ganga Stuti) नामक इस स्तुति में गंगा माँ की महिमा और उनके द्वारा हमारे जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन किया गया है। गंगा माँ को भगीरथ की पुत्री माना जाता है, जिन्होंने अपने कठोर तप से गंगा को धरती पर अवतरित किया। गंगा का पवित्र जल सदियों से न केवल धार्मिक अनुष्ठानों में, बल्कि हमारे जीवन के अनेक पहलुओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आ रहा है। श्री गायत्री चालीसा के नियमित पाठ से साधक का मन शांत होता है|

गंगा स्तुति एक अद्वितीय और शक्तिशाली भक्ति गीत है जो गंगा माँ की महिमा का गान करता है और उनके प्रति श्रद्धा और भक्ति को अभिव्यक्त करता है। इस स्तुति का पाठ करने से न केवल मन को शांति मिलती है, बल्कि आत्मा को भी एक विशेष प्रकार की संतुष्टि और ऊर्जा का अनुभव होता है।

गंगा माँ के प्रति श्रद्धा और प्रेम को और भी प्रबल बनाने के लिए इस गंगा स्तुति को जरूर पढ़ें और गाएं। जय गंगे!

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  • हिंदी / संस्कृत
  • English

|| गंगा स्तुति: जय जय भगीरथ नन्दिनि ||

जय जय भगीरथ नन्दिनि, मुनि-चय चकोर-चन्दनि,
नर-नाग-बिबुध-बन्दिनि जय जहनु बालिका ।
बिस्नु-पद-सरोजजासि, ईस-सीसपर बिभासि,
त्रिपथ गासि, पुन्रूरासि, पाप-छालिका ॥

बिमल बिपुल बहसि बारि, सीतल त्रयताप-हारि,
भँवर बर, बिभंगतर तरंग-मालिका ।
पुरजन पूजोपहार, सोभित ससि धवलधार,
भंजन भव-भार, भक्ति-कल्पथालिका ॥

थ्नज तटबासी बिहंग, जल-थल-चर पसु-पतंग,
कीट,जटिल तापस सब सरिस पालिका ।
तुलसी तव तीर तीर सुमिरत रघुवंस-बीर,
बिचरत मति देहि मोह-महिष-कालिका ॥

|| Ganga Stuti – Jai Jai Bhagirath Nandini ||

Jay Jay Bhagirath Nandini, Muni-Chay Chakor-Chandani,
Nar-Nag-Bibudh-Bandini Jay Jahanu Balika.
Visnu-Pad-Saroja-Jaasi, Ees-Sispar Bibhasi,
Tripath Gaasi, Punroorasi, Paap-Chaalika.

Bimal Bipul Bahasi Baari, Seetal Traya-Taap-Haari,
Bhanvar Bar, Bibhangtar Tarang-Maalika.
Purjan Pujopahaar, Sobhit Sasi Dhavaladhaari,
Bhanjan Bhav-Bhaar, Bhakti-Kalpathaalika.

Thanaj Tatabaasi Bihang, Jal-Thal-Char Pasu-Patang,
Keet Jatil Tapas Sab Saris Palika.
Tulsi Tav Teer Teer Sumirat RaghuVansh-Veer,
Bicharat Mati Dehi Moh-Mahish-Kaalika.


हे भगीरथ-नंदिनी गंगे, तुम्हारी जय हो, जय हो! तुम मुनिरूपी चकोरों के लिए शीतल चंद्रिका स्वरूप हो। मनुष्य, नाग और देवतागण सभी तुम्हारी वंदना करते हैं। हे जाह्नवी, तुम्हारी जय हो!

तुम भगवान विष्णु के चरण-कमलों से प्रकट हुई और शिवजी के जटाजूट पर विराजित हुई हो। स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल—इन त्रिलोकी में तुम तीन धाराओं के रूप में अविरल बहती हो। तुम पुण्यराशि हो और समस्त पापों का प्रक्षालन करने वाली हो।

तुम्हारी धारा अगाध, निर्मल और शीतल है, जो तीनों तापों (दैहिक, दैविक, भौतिक) का शमन करती है। तुम सुंदर भंवरों और चंचल तरंगों की माला से सुशोभित हो। नगरवासियों द्वारा अर्पित पूजा-उपहारों से, चंद्रमा के समान तुम्हारी धवल धारा और भी दिव्य प्रकाशित हो रही है। यह धारा संसार के जन्म-मरण रूपी भार को हरने वाली तथा भक्तिरूपी कल्पवृक्ष की रक्षा करने वाली पावन थाली है।

तुम अपने तट पर निवास करने वाले पक्षी, जलचर, पशु, पतंग, कीट और जटाधारी तपस्वियों का समभाव से पालन करती हो। हे मोहरूपी महिषासुर का विनाश करने वाली कालिका-स्वरूपिणी गंगे! इस तुलसीदास को ऐसी बुद्धि प्रदान करो कि मैं श्री रघुनाथजी का स्मरण करता हुआ, सदैव आपके पावन तट पर ही विचरण करूं।

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गंगा स्तुति के लाभ

गंगा स्तुति (Ganga Stuti) एक धार्मिक और आध्यात्मिक गीत है जो हिन्दू धर्म में गंगा नदी की पूजा और स्तुति को व्यक्त करता है। यह स्तुति गंगा नदी की पवित्रता, महत्व, और उसकी दिव्यता की सराहना करती है। गंगा नदी को हिन्दू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है और इसे देवी माना जाता है।

गंगा स्तुति के मुख्य लाभ और महत्व को समझने के लिए, निम्नलिखित बिंदुओं पर चर्चा की जा सकती है:

गंगा का आध्यात्मिक महत्व

गंगा नदी को हिन्दू धर्म में सबसे पवित्र नदी माना जाता है। इसे देवी गंगा का रूप माना जाता है और इसे धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ और तीर्थयात्रा में अत्यधिक महत्व दिया जाता है। गंगा स्तुति में गंगा माता की पूजा और उनके दिव्य गुणों का वर्णन किया गया है, जो भक्तों को आध्यात्मिक शांति और परम सुख प्राप्त करने में सहायता करती है।

गंगा की पवित्रता और शुद्धता

गंगा नदी को शुद्धता और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। गंगा स्तुति में गंगा नदी की शुद्धता की सराहना की जाती है और इसे जीवनदायिनी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह भक्तों को आत्मिक शुद्धता प्राप्त करने और उनके जीवन को पवित्र बनाने के लिए प्रेरित करती है।

भक्तों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन

गंगा स्तुति को नियमित रूप से गाने और सुनने से भक्तों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आ सकते हैं। यह स्तुति मानसिक शांति, आत्म-संतोष, और भावनात्मक संतुलन प्रदान करने में सहायक होती है। गंगा स्तुति के माध्यम से भक्त अपने दुखों और समस्याओं से उबर सकते हैं और आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

गंगा स्तुति सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। यह भारतीय संस्कृति और धार्मिकता की पहचान को मजबूत करती है और समाज में एकता और अखंडता को बढ़ावा देती है। गंगा स्तुति के माध्यम से लोग अपने धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों को सहेज सकते हैं और उन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचा सकते हैं।

स्वास्थ्य लाभ

गंगा नदी के पानी को शुद्ध और औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है। स्तुति सुनने और गाने से मानसिक तनाव कम हो सकता है, जिससे शारीरिक स्वास्थ्य भी बेहतर हो सकता है। भक्तों को गंगा नदी में स्नान करने से शारीरिक और मानसिक शुद्धि प्राप्त होती है, जो उनके समग्र स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है।

धार्मिक और आध्यात्मिक जागरूकता

गंगा स्तुति धार्मिक और आध्यात्मिक जागरूकता को बढ़ावा देती है। यह भक्तों को गंगा नदी के महत्व और उसकी दिव्यता के बारे में जानने में मदद करती है। इसके माध्यम से लोग धार्मिकता और आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर हो सकते हैं और अपने जीवन में आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर सकते हैं।

सुख और समृद्धि की प्राप्ति

गंगा स्तुति करने से भक्तों को सुख और समृद्धि की प्राप्ति हो सकती है। यह स्तुति देवी गंगा की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने का एक तरीका है, जो जीवन में सुख, समृद्धि, और सफलता लाने में सहायक हो सकती है। भक्त इस स्तुति के माध्यम से गंगा माता की कृपा को अपने जीवन में महसूस कर सकते हैं और अपने जीवन की समस्याओं को दूर कर सकते हैं।

धार्मिक अनुष्ठानों में उपयोग

गंगा स्तुति धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा-पाठ में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसे विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ, और व्रतों में गाया जाता है, जो धार्मिक अनुष्ठानों की सफलता और प्रभावशीलता को बढ़ाते हैं। स्तुति को पूजा में शामिल करने से अनुष्ठान की दिव्यता और प्रभावशीलता बढ़ जाती है।

परंपरा और संस्कारों का संरक्षण

गंगा स्तुति भारतीय परंपरा और संस्कारों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसे गाकर और सुनकर लोग अपनी परंपराओं और संस्कारों को जीवित रखते हैं और उन्हें आगामी पीढ़ियों तक पहुंचाते हैं। स्तुति के माध्यम से धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण और संवर्धन होता है।

प्रेरणा और मानसिक शक्ति

गंगा स्तुति सुनने और गाने से मानसिक प्रेरणा और शक्ति प्राप्त होती है। यह भक्तों को आत्म-विश्वास, धैर्य, और सकारात्मकता के साथ जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रेरित करती है। स्तुति के माध्यम से लोग आत्म-समर्पण और दृढ़ता की भावना को जागृत कर सकते हैं।

स्तुति की धार्मिक और आध्यात्मिक लाभों की समझ से भक्त अपने जीवन को अधिक समृद्ध, पवित्र, और संतुलित बना सकते हैं। इस स्तुति के माध्यम से वे गंगा माता की कृपा प्राप्त कर सकते हैं और अपने जीवन को सही दिशा में मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं।


कौन सी गंगा आरती सबसे प्रसिद्ध है?

भारत में सबसे प्रसिद्ध गंगा आरती वाराणसी (बनारस) में दशाश्वमेध घाट पर होने वाली शाम की आरती है। यह आरती एक अत्यंत भव्य, नियमित और दर्शनीय अनुष्ठान है जिसमें पंडितों द्वारा विशेष मंत्रोच्चार, घंटियों, शंखों, धूप-दीप और अग्नि के साथ माँ गंगा की पूजा की जाती है। हरिद्वार की हर की पौड़ी घाट पर होने वाली आरती भी अत्यंत प्रसिद्ध और भव्य है। इन दोनों का अपना-अपना विशिष्ट आकर्षण और महत्व है।

वाराणसी में कौन सी घाट की आरती प्रसिद्ध है?

वाराणसी में दशाश्वमेध घाट पर होने वाली शाम की गंगा आरती सबसे प्रसिद्ध और भव्य मानी जाती है। यह प्रतिदिन सूर्यास्त के समय आयोजित होती है और इसमें विधि-विधान से की जाने वाली पूजा, समूह में किए जाने वाले मंत्रोच्चार, अग्नि के पंजे (आरती थाल) और घंटियों की ध्वनि एक मनमोहक और आध्यात्मिक वातावरण बनाती है, जो हजारों श्रद्धालुओं और पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है।

क्या कोई लड़की गंगा आरती कर सकती है?

हाँ, कोई भी लड़की या महिला गंगा आरती में भाग ले सकती है और आरती कर सकती है। गंगा आरती सभी भक्तों के लिए खुली है और इसमें कोई लैंगिक प्रतिबंध नहीं है। आमतौर पर मुख्य रूप से पुरुष पुजारी ही संस्थागत रूप से आयोजित बड़ी आरती का संचालन करते देखे जाते हैं, लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर या छोटे समूहों में घाट पर कोई भी महिला या लड़की गंगा माँ की आरती कर सकती है। भक्ति और श्रद्धा सर्वोपरि हैं।

गंगा की 7 धाराएं कौन सी हैं?

पौराणिक मान्यता के अनुसार, गंगा नदी की सात पवित्र धाराओं (सप्त-धाराओं) के नाम इस प्रकार हैं: ह्लादिनी, पावनी, नलिनी, सीता, सुचक्षु, सिन्धु और अम्बुघा। एक अन्य प्रचलित सूची के अनुसार इन्हें नालिनी, ह्लादिनी, पावनी, कपिला, सीता, सिन्धु और अम्बुजा के नाम से भी जाना जाता है। ये धाराएं आकाशीय गंगा (स्वर्ग की मंदाकिनी) की प्रतिनिधि मानी जाती हैं और इनका उल्लेख गंगा के विश्वव्यापी और शुद्धिकरण करने वाले स्वरूप को दर्शाने के लिए किया गया है।

Shri Sai Chalisa Hindi Lyrics Authentic 2026 Pdf

साईं चालीसा (Sai Chalisa Lyrics Pdf) एक भक्ति गीत है जो शिरडी के साईं बाबा पर आधारित है। यह चालीसा साईं बाबा के अद्भुत जीवन और उनकी अलौकिक शक्तियों का वर्णन करती है, जिसे साईं भक्तों द्वारा अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ गाया जाता है। साईं बाबा को एक ऐसे संत के रूप में माना जाता है जिन्होंने अपने जीवन में सभी धर्मों के लोगों को समान रूप से अपनाया और उन्हें सत्य, प्रेम, और करुणा का मार्ग दिखाया। आप यहां से साईं बाबा आरती भी पढ़ सकते हैं।

साईं चालीसा एक लोकप्रिय प्रार्थना है जो 102 छन्दों से बनी है। इन छन्दों में साईं बाबा के जीवन के विभिन्न पहलुओं का वर्णन किया गया है, जैसे कि उनकी दिव्य शिक्षाएँ, चमत्कारिक घटनाएँ, और उनके भक्तों के प्रति उनकी असीम करुणा। यह चालीसा न केवल साईं बाबा की महिमा का बखान करती है, बल्कि उनके चरणों में शरण लेने का माध्यम भी है।

साईं चालीसा का पाठ साईं भक्तों द्वारा नियमित रूप से किया जाता है, विशेष रूप से गुरुवार के दिन, जो साईं बाबा को समर्पित माना जाता है। इस चालीसा का पाठ करने से भक्तों को मानसिक शांति, जीवन में समृद्धि और साईं बाबा के आशीर्वाद की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि साईं बाबा के करीब आने और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए इस चालीसा का पाठ अत्यंत प्रभावी होता है।

साईं चालीसा में साईं बाबा की जीवन यात्रा और उनके चमत्कारी कार्यों का उल्लेख मिलता है, जो भक्तों के लिए प्रेरणादायक होते हैं। इसमें बाबा के उपदेशों और उनके द्वारा दिए गए जीवन के आदर्शों को सरल और स्पष्ट भाषा में प्रस्तुत किया गया है, जिससे हर उम्र के लोग इसे आसानी से समझ और गा सकते हैं।

इस चालीसा के माध्यम से भक्त साईं बाबा से जुड़ाव महसूस करते हैं और उन्हें अपने जीवन की कठिनाइयों से मुक्ति पाने का मार्ग प्राप्त होता है। साईं चालीसा का पाठ करने से भक्तों के हृदय में श्रद्धा और विश्वास जागृत होता है, और वे साईं बाबा की दिव्यता का अनुभव करते हैं।



  • हिन्दी
  • English

|| साईं चालीसा ||
Shri Sai Chalisa Lyrics Pdf in Hindi

पहिले साईं के चरणों में,
अपान शीश नामौं मैं।
कैसे शिरडी साईं ऐ,
सारा हाला सुनौं मैं॥

माता कौन है, पिता कौन है,
ये ना किसी ने भी जाना।
कहाँ जन्म साईं ने धरा,
प्रश्न पहेली रहा बाना॥

कोई कहे अयोध्या के,
ये रामचन्द्र भगवान हैं।
कोई कहता साईं बाबा,
पवन पुत्र हनुमान हैं॥

कोई कहता मंगला मूर्ति,
श्री गजानंद हैं साईं।
कोई कहता गोकुल मोहना,
देवकी नंदना हैं साईं॥

शंकर समझे भक्त कै तो,
बाबा को भजते रहते।
कोई कहा अवतार दत्त का,
पूजा साईं की कराटे॥

कुछ भी मानो उनको तुमा,
पर साईं हैं सच्चे भगवाना।
बड़े दयालु दीनबंधु,
कितनोम को दिया जीवन दान॥

कै वर्षा पहेले की घटाना,
तुम्हें सुनूंगा में बता।
किसी भाग्यशाली की,
शिरडी में ऐ थी बाराता॥

आया साथा उसी के था,
बलाका एका बहुत सुंदरा।
अया, अकरा वहिन बसा गया,
पावना शिरडी किया नगारा॥

काई दिनो टका भटकाता,
भिक्षा मंगा उसेने दारा-दारा।
औरा दिखाई ऐसी लीला,
जग में जो हो गई अमारा॥

जैसे-जैसे अमारा उमरा बदी,
बढ़ती ही वैसी गै शाना।
घर-घर होने लगा नगर में,
साईं बाबा का गुणगान॥10॥

दिग-दिगंता में लगा गुंजने,
फिरा तो सैजी का नाम।
दीना-दुखी की रक्षा करना,
यहीं रहेगा बाबा का काम॥

बाबा के चरणो में जाकर,
जो कहता मैं हूं निर्धन।
दया उसी पर होती उनकी,
खुला जाते दुख के बंधना॥

कभी किसी ने मांगी भिक्षा,
दो बाबा मुझको संताना।
एवं अस्तु तब कहाकरा साई,
देते द उसको वरदाना॥

स्वयं दु:खी बाबा हो जाते,
दीना-दु:खी जन का लाखा हला।
अंतःकरण श्री साईं का,
सागर जैसा रहा विशाला॥

भक्त एक मद्रासी आया,
घर का बहुत बड़ा धनावना।
माला खजाना बेहड़ा उसका,
केवल नहीं रही संताना॥

लगा मनने साईनाथ को,
बाबा मुझ पर दया करो।
झांझ से झंकृता नैया को,
तुम्हीं मेरी पारा करो॥

कुलदीपक के बिना अँधेरा,
छाया हुआ घर में मेरे।
इसली अया हुन बाबा,
होकर शरणागत तेरे॥

कुलदीपक के आभा में,
व्यर्थ है दौलत की माया।
आजा भिखारी बनकारा बाबा,
शरण तुम्हारी में आया॥

दे दो मुझको पुत्र-दाना,
मैं रिनी रहूंगा जीवन भार।
औरा किसी की आस ना मुझको,
सिर्फ भरोसा है तुमा पारा॥

अनुनय-विनय बहुत की उसने,
चरणों में धरा के शीश।
तबा प्रसन्न होकर बाबा ने,
दिया भक्त को यहा आशीषा॥20॥

“अल्ला भला करेगा तेरा”,
पुत्र जन्म हो तेरे घर।
कृपा रहेगी तुझ परा उसकी,
आभा तेरे उसका बालक परा॥

अबा तका नहीं किसी ने पाया,
साईं की कृपा का पारा।
पुत्र रत्न दे मद्रासी को,
धन्य किया उसका संसार॥

तन-मन से जो भजे उसी का,
जग में होता है उद्धारा।
सांचा को आंच नहीं है कोई,
सदा जूठा की होती हारा॥

मैं हूं सदा सहारे उसे,
सदा रहूंगा उसका दासा।
साईं जैसा प्रभु मिला है,
इतना ही काम है क्या आसा॥

मेरा भी दिना था एका ऐसा,
मिलती नहीं मुझे रोटी।
ताना पारा कपड़ा दुरा रहा था,
शेष रही नन्हीं सी लंगोटी॥

सरिता सन्मुख होने पर भी,
मैं प्यासा का प्यासा था।
दुर्दिना मेरा मेरे उपरा,
दावाग्नि बरसता था॥

धरती के अतिरिकता जगत में,
मेरा कुछ अवलंब न था।
बना भिखारी मैं दुनिया में,
दारा-दारा ठोकर खाता था॥

ऐसे में एक मित्र मिला जो,
परम भक्त साईं का था।
जंजालों से मुक्ता मगरा,
जगती में वहा भी मुझसा था॥

बाबा के दर्शन की खातिर,
मिला दोनों ने किया विचारा।
साईं जैसी दया मूर्ति के,
दर्शन को हो गए तैयार॥

पावना शिरडी नगर में जाकारा,
देखा मतवली मुराति।
धन्य जन्म हो गया कि हमने,
जबा देखी साईं की सुरति॥30॥

जबा से किये हैं दर्शन हमने,
दुख सारा कफुरा हो गया।
संकटा सारे मिटाई आभा,
विपदाओं का अंत हो गया॥

मन औरा सम्मान मिला,
भिक्षा में हमको बाबा से।
प्रतिबिम्बिता हो उठे जगत में,
हमा साईं की आभा से॥

बाबा ने सम्मान दिया है,
मन दिया ईसा जीवन में।
इसाका ही संभाल ले में,
हंसता जाउंगा जीवन में॥

साईं की लीला का मेरे,
मन पर ऐसा आसरा हुआ।
लगता जगती के काना-काना में,
जैसा हो वहा भरा हुआ॥

“काशीराम” बाबा का भक्त,
शिर्डी में रहता था।
मैं साईं का साईं मेरा,
वाह दुनिया से कहता था॥

सीकर स्वयं वस्त्र बेचत,
ग्राम-नगर बजारो में।
झंकृता उसकी हृदय तंत्री थी,
साईं की झंकारों में॥

स्तब्ध निशा थी, द सोया,
रजनी आंचला में चंदा सितारे।
नहिं सूझता रहा हाथ को,
हठ तिमिरा के मारे॥

वस्त्र बेचाकरा लौटा रहा था,
हया! हटा से काशी।
विचित्र बड़ा संयोग कि उसका दिन,
अता था एककी॥

घेरा रहा में खड़े हो गए,
उपयोग कुटिला अन्याई।
मारो काटो लूटो इसाकी हि,
ध्वनि पदि सुनै॥

लुटा पिटाकरा उसे वहां से,
कुटिला गए चंपता हो।
अघाटों में मरमहता हो,
उसे दी थी संग्या खो॥40॥

बहुत देर तका पड़ा रहा वाहा,
वहिन उसी हालात में।
जेन काबा कुछ होशा हो उठ,
वहहिं उसकी पलक में॥

अनाजाने ही उसके मुँह से,
निकला पड़ा था सै।
जिसकी प्रतिध्वनि शिरडी में,
बाबा को पड़ी सुनाई॥

क्षुब्ध हो उठा मनसा उनाका,
बाबा गए विकल हो।
लगता जैसा घटाना सारी,
घटी उन्हीं के सन्मुख हो॥

उन्मादी से इधर-उधर तबा,
बाबा लेगे भटकने।
सन्मुख चिजें जो भी ऐ,
उनको लगाणे पटाकाने॥

औरा धड़काते अंगारो में,
बाबा ने अपना करा डाला।
हुए शशांकिता सभी वाहा,
लक्खा तांडवनृत्य निराला॥

समझ गए सबा लोगा,
कि कोई भक्त पदा संकटा में।
क्षुबिता खड़े थे सभी वहां,
पर हुए विस्मय में॥

बचने की ही खातिर इस्तेमाल करो,
बाबा आजा विकल है।
उसकी ही पीड़ा से पिरिता,
उनाका अन्तःस्थल है॥

इतने में ही विविधा ने अपनी,
विचित्रता दिखलाई।
लाख करा जिसे जनता की,
श्रद्धा सरिता लहराई॥

लेकरा संग्याहिना भक्त को,
गादी एका वाह आई।
सन्मुखा आपने देखा भक्त को,
साईं की आँखें भरी आई॥

शांता, धीरा, गंभीरा, सिंधु सा,
बाबा का अंतःस्थला।
अजा न जाने क्यों रहा-रहकरा,
हो जाता था चंचला॥50॥

अजा दया की मूर्ति स्वयं था,
बना हुआ उपचारी।
आभा भक्त के लिए आजा था,
देवा बना प्रतिहारी॥

अजा भक्ति की विषम परीक्षा में,
सफल हुआ काशी।
उसके ही दर्शन की खातिर थे,
उमादे नगर-निवासी॥

जबा भी औरा जहां भी कोई,
भक्त पड़े संकट में।
उसकी रक्षा करें बाबा,
अटे हैं पलभरा में॥

युग-युग का है सत्य यहाँ,
नहीं कोई नई कहानी।
अपतग्रस्ता भक्त जबा होता,
जते खुदा अंतर्यामी॥

भेद-भाव से परे पुजारी,
मानवता के थे साई।
जितने प्यारे हिंदू-मुस्लिमा,
उतने ही द सिक्ख इसाई॥

भेदा-भाव मंदिरा-मस्जिदा का,
तोड़ा-फोड़ा बाबा ने डाला।
रह रहीमा सभी उनाके थे,
कृष्ण करीमा अल्लाताला॥

घंटे की प्रतिध्वनि से गूंजा,
मस्जिद का कोना-कोना।
मिले परसपरा हिंदू-मुस्लिमा,
प्यारा बड़ा दीना-दीना दूना॥

चमत्कारा था कितना सुंदरा,
परिचय ईसा काया ने दी।
औरा नीमा कडुवहता में भी,
मिठासा बाबा ने भरा दी॥

सबा को स्नेह दिया साई ने,
सबको संतुला प्यारा किया।
जो कुछ भी चाहा,
बाबा ने उसे वही दिया॥

ऐसे स्नेहशील भजन का,
नाम सदा जो जप करे।
पर्वत जैसा दुःख न क्यों हो,
पलभरा में वहा दुरा तारे॥60॥

साईं जैसा दाता हमा,
अरे नहीं देखा कोई।
जिसे केवल दर्शन से ही,
सारी विपदा दूर गाई॥

तन में साईं, मन में साईं,
साईं साईं भजा करो।
अपने तन की सुधि-बुधि खोकारा,
सुधि उसकी तुम किया करो॥

जबा तू अपनी सुधि तजा,
बाबा की सुधि किया करेगा।
औरा राता-दीना बाबा-बाबा,
हाय तू राता करेगा॥

बाबा को हैं! विवाशा हो,
सुधि तेरी लेनी ही होगी।
तेरी हारा इच्छा बाबा को,
पूरी ही करनी होगी॥

जांगला, जगंला भटका ना पगला,
औरा ढूंढ़ने बाबा को।
एका जगह केवल शिरडी में,
तू पाएगा बाबा को॥

धन्य जगत में प्राणि है वाहा,
जिसने बाबा को पाया।
दुख में, सुख में प्रहार अथा हो,
साईं का ही गुण गया॥

गिरे संकटों के पर्वत,
चाहे बिजली ही टूटा पड़े।
साई का ले नाम सदा तुमा,
सन्मुख सबा के रहो अड़े॥

ईसा बुड्ढे की सुना करामाता,
तुम हो जाओगे हिराना।
दंगा रहा गाए सुनाकरा जिसे,
जेन कितने चतुर सुजाना॥

एका बड़ा शिरडी में साधु,
ढोंगी था कोई आया।
भोली-भाली नगर-निवासी,
जनता को था भरमाया॥

जदी, बुटियां उनकों ढिक्कारा,
करणे लगा वहा भाषाना।
कहने लगा सुनो श्रोतागण,
घर मेरा है वृन्दावन ॥70॥

औषधि मेरे पास एका है,
औरा अजाबा इसमें शक्ति।
इसे सेवन करने से ही,
हो जाति दुख से मुक्ति॥

अगर मुक्ता होना चाहो,
तुमा संकटा से बिमारी से।
तो है मेरा नम्र निवेदन,
हारा नारा से, हारा नारी से॥

लो खरिदा तुमा इसाको,
इसाकी सेवन विधियां हैं न्यारी।
यद्यपि तुच्च वस्तु है यहा,
गुण उसके हैं अति भारी॥

जो है संतति हिना यहां यादी,
मेरी औषधि को खाए।
पुत्र-रत्न हो प्राप्त,
अरे वाहा मुन्हा मंगा फल पाए॥

औषधि मेरी जो न खरीददे,
जीवन भर पछताएगा।
मुझे जैसा प्राण शायद हाय,
अरे यहां आ पाएगा॥

दुनिया दो दिनों का मेला है,
मौज शौक तुम भी करा लो।
अगर इसे मिलाता है, सबा कुछ,
तुम भी इसको ले लो॥

हेरानी बढती जनता की,
लाखा इसाकी करास्तानी।
प्रमुदिता वाह भी मन- हाय-मन था,
लाखा लोगों की नादानी॥

खबर सुनाने बाबा को याहा,
गया दौडाकर सेवक एका।
सुनकारा भृकुटि तानि आभा,
विस्मरण हो गया सभी विवेका॥

हुकमा दिया सेवका को,
सतवारा पकड़ा दुष्टा को लाओ।
या शिरडी की सीमा से,
कपटी को दूर भगाओ॥

मेरे रहते भोली-भाली,
शिरडी की जनता को।
कौन नीचा ऐसा जो,
सहसा करता है छलने को॥80॥

पलभरा में ऐसे ढोंगी,
कपति नीच लुटेरे को।
महानशा के महागर्ता में पहुंचा,
दुन जीवन भर को॥

तनिका मिला आभासा मदारी,
क्रुरा, कुटिला अन्ययी को।
काला नाचता है अबा सिरा पारा,
गुस्सा आया साईं को॥

पलभरा में सबा खेला बंदा कारा,
भागा सिरा पारा राखकरा पैरा।
सोचा रहा था मन ही मन,
भगवान नहीं है अब खैरा॥

सच्चा है साईं जैसा दानी,
मिला न बन सकेगा जग में।
अनशा ईशा का साईं बाबा,
उनको न कुछ भी मुश्किल जगा में॥

स्नेहा, शिला, सौजन्या आदि का,
आभूषण धारण करा।
बढ़ता ईसा दुनिया में जो भी,
मनवा सेवा के पाठ पारा॥

वही जीता लेता है जगती के,
जन जन का अंतःस्थल।
उसकी एका उदासी ही,
जगा को करा देती है विहवला॥

जबा-जबा जगा में भरा पापा का,
बढ़ा-बाधा ही जाता है।
प्रयोग मिटने की ही खातिर,
अवतारी ही आता है॥

पापा औरा अन्य सभी कुछ,
इस जगती का हारा के।
दुरा भागा देता दुनिया के,
दानवा को क्षण भर के॥

स्नेहा सुधा की धरा बरसाने,
लगती है इस दुनिया में।
गले परस्परा मिलाने लगते,
हैं जन जन अपसा में॥

ऐसे अवतारी साई,
मृत्युलोक में अकरा।
समता का यहा पथ पढ़ाय,
सबको अपान आपा मितकारा ॥90॥

नाम द्वारका मस्जिद का,
राखा शिरडी में साईं ने।
दापा, तप, संतपा मिटाया,
जो कुछ आया साईं ने॥

सदा यदा में मस्त राम की,
बैठे रहते थे साईं।
पहरा अथा ही राम नाम को,
भजते रहते थे साई॥

सुखी रुखी तजि बसि,
चाहे या होवे पकावना।
सौदा प्यारा के भूखे साईं की,
ख़तीरा द सभी समाना॥

स्नेहा आभा श्रद्धा से अपनी,
जाना जो कुछ दे जाते थे।
बड़े चावा से उसका भोजन को,
बाबा पावना कराते थे॥

कभी-कभी मन बहलाने को,
बाबा बागा में जाते थे।
प्रमुदिता मन में निरख प्रकृति,
छटा को वे होते थे॥

रंगा-बिरंगे पुष्प बागा के,
मंदा-मंदा हिला-डुला कराके।
बिहड़ा वीराने मन में भी,
स्नेह सलिला भर जाते थे॥

ऐसी समुधुरा बेला में भी,
दुखा अपटा, विपदा के मारे।
अपने मन की व्यथा सुनाने,
जाना रहते बाबा को घेरे॥

सुनकरा जिनकी करुणाकथा को,
नयना कमला भार अटे थे।
दे विभूति हारा व्यथा, शांति,
उनाके उरा में भार देते थे॥

जेन क्या अद्भुत शिक्षा,
उसकी विभूति में होती थी।
जो धारण कराटे मस्तका पारा,
दुख सारा हारा लेती थी॥

धन्य मनुज वे साक्षात् दर्शन,
जो बाबा साई के पाये।
धन्य कमला करा उनको जिनसे,
चरण-कमला वे परासाय॥100॥

कषा निर्भय तुमको भी,
साक्षात साई मिला जाता।
वर्षाें से उजड़ा चमन अपान,
फिरा से आजा खिला जाता॥

गारा पकड़ता में चरणा श्री के,
नहीं छोड़ता उमरभरा।
मन लेता में जरूरा उनको,
गारा रूठते सै मुझ परा॥

|| Sai Baba Chalisa Lyrics ||

Pahale Sai Ke Charanom Mein,
Apana Shisha Namaun Main।
Kaise Shirdi Sai Aye,
Sara Hala Sunaun Main॥

Kauna Hai Mata, Pita Kauna Hai,
Ye Na Kisi Ne Bhi Jana।
Kahan Janma Sai Ne Dhara,
Prashna Paheli Raha Bana॥

Koi Kahe Ayodhya Ke,
Ye Ramachandra Bhagawana Hain।
Koi Kahata Sai Baba,
Pavana Putra Hanumana Hain॥

Koi Kahata Mangala Murti,
Shri Gajananda Hain Sai।
Koi Kahata Gokula Mohana,
Devaki Nandana Hain Sai॥

Shankara Samajhe Bhakta Kai To,
Baba Ko Bhajate Rahate।
Koi Kaha Avatara Datta Ka,
Puja Sai Ki Karate॥

Kuchha Bhi Mano Unako Tuma,

Para Sai Hain Sachche Bhagawana।
Bade Dayalu Dinabandhu,

Kitanom Ko Diya Jivana Dana॥

Kai Varsha Pahale Ki Ghatana,

Tumhein Sunaunga Mein Bata।
Kisi Bhagyashali Ki,

Shirdi Mein Ai Thi Barata॥

Aya Satha Usi Ke Tha,

Balaka Eka Bahuta Sundara।
Aya, Akara Vahin Basa Gaya,

Pavana Shirdi Kiya Nagara॥

Kai Dino Taka Bhatakata,

Bhiksha Manga Usane Dara-Dara।
Aura Dikhai Aisi Lila,

Jaga Mein Jo Ho Gai Amara॥

Jaise-Jaise Amara Umara Badi,

Badhati Hi Vaise Gai Shana।
Ghara-Ghara Hone Laga Nagara Mein,

Sai Baba Ka Gunagana ॥10॥

Dig-Diganta Mein Laga Gunjane,

Phira To Saiji Ka Nama।
Dina-Dukhi Ki Raksha Karana,

Yahi Raha Baba Ka Kama॥

Baba Ke Charano Mein Jakar,

Jo Kahata Mein Hun Nirdhana।
Daya Usi Para Hoti Unaki,

Khula Jate Duhkha Ke Bandhana॥

Kabhi Kisi Ne Mangi Bhiksha,

Do Baba Mujhako Santana।
Evam Astu Taba Kahakara Sai,

Dete The Usako Varadana॥

Swayam Duhkhi Baba Ho Jate,

Dina-Duhkhi Jana Ka Lakha Hala।
Antahkarana Shri Sai Ka,

Sagara Jaisa Raha Vishala॥

Bhakta Eka Madrasi Aya,

Ghara Ka Bahuta Bada Dhanavana।
Mala Khajana Behada Usaka,

Kevala Nahin Rahi Santana॥

Laga Manane Sainatha Ko,

Baba Mujha Para Daya Karo।
Jhanjha Se Jhankrita Naiya Ko,

Tumhin Meri Para Karo॥

Kuladipaka Ke Bina Andhera,

Chhaya Hua Ghara Mein Mere।
Isalie Aya Hun Baba,

Hokara Sharanagata Tere॥

Kuladipaka Ke Abhava Mein,
Vyartha Hai Daulata Ki Maya।
Aja Bhikhari Banakara Baba,

Sharana Tumhari Mein Aya॥

De Do Mujhako Putra-Dana,

Mein Rini Rahunga Jivana Bhara।
Aura Kisi Ki Asa Na Mujako,

Sirpha Bharosa Hai Tuma Para॥

Anunaya-Vinaya Bahuta Ki Usane,

Charanon Mein Dhara Ke Shisha।
Taba Prasanna Hokara Baba Ne,

Diya Bhakta Ko Yaha Ashisha ॥20॥

“Alla Bhala Karega Tera”,

Putra Janma Ho Tere Ghara।
Kripa Rahegi Tujha Para Usaki,

Aura Tere Usa Balaka Para॥

Aba Taka Nahin Kisi Ne Paya,

Sai Ki Kripa Ka Para।
Putra Ratna De Madrasi Ko,

Dhanya Kiya Usaka Sansara॥

Tana-Mana Se Jo Bhaje Usi Ka,

Jaga Mein Hota Hai Uddhara।
Sancha Ko Ancha Nahin Hain Koi,

Sada Jutha Ki Hoti Hara॥

Main Hun Sada Sahare Usake,

Sada Rahunga Usaka Dasa।
Sai Jaisa Prabhu Mila Hai,

Itani Hi Kama Hai Kya Asa॥

Mera Bhi Dina Tha Eka Aisa,

Milati Nahin Mujhe Roti।
Tana Para Kapada Dura Raha Tha,

Shesha Rahi Nanhin Si Langoti॥

Sarita Sanmukha Hone Para Bhi,

Mein Pyasa Ka Pyasa Tha।
Durdina Mera Mere Upara,

Davagni Barasata Tha॥

Dharati Ke Atirikta Jagata Mein,

Mera Kuchha Avalamba Na Tha।
Bana Bhikhari Main Duniya Mein,

Dara-Dara Thokara Khata Tha॥

Aise Mein Eka Mitra Mila Jo,

Parama Bhakta Sai Ka Tha।
Janjalon Se Mukta Magara,

Jagati Mein Vaha Bhi Mujhasa Tha॥

Baba Ke Darshana Ki Khatira,

Mila Donon Ne Kiya Vichara।
Sai Jaise Daya Murti Ke,

Darshana Ko Ho Gaye Taiyara॥

Pavana Shirdi Nagara Mein Jakara,

Dekha Matavali Murati।
Dhanya Janma Ho Gaya Ki Hamane,

Jaba Dekhi Sai Ki Surati ॥30॥

Jaba Se Kiye Hai Darshana Hamane,

Duhkha Sara Kaphura Ho Gaya।
Sankata Sare Mitai Aura,

Vipadaon Ka Anta Ho Gaya॥

Mana Aura Sammana Mila,

Bhiksha Mein Hamako Baba Se।
Pratibimbita Ho Uthe Jagata Mein,

Hama Sai Ki Abha Se॥

Baba Ne Sammana Diya Hai,

Mana Diya Isa Jivana Mein।
Isaka Hi Sambala Le Mein,

Hansata Jaunga Jivana Mein॥

Sai Ki Lila Ka Mere,

Mana Para Aisa Asara Hua।
Lagata Jagati Ke Kana-Kana Mein,

Jaise Ho Vaha Bhara Hua॥

“Kashirama” Baba Ka Bhakta,

Shirdi Mein Rahata Tha।
Main Sai Ka Sai Mera,

Vaha Duniya Se Kahata Tha॥

Sikara Svayam Vastra Bechata,

Grama-Nagara Bajaro Mein।
Jhankrita Usaki Hridaya Tantri Thi,

Sai Ki Jhankaron Mein॥

Stabdha Nisha Thi, The Soya,

Rajani Anchala Men Chanda Sitare।
Nahin Sujhata Raha Hath Ko,

Hatha Timira Ke Mare॥

Vastra Bechakara Lauta Raha Tha,

Haya! Hata Se Kashi।
Vichitra Bada Sanyoga Ki Usa Dina,

Ata Tha Ekaki॥

Ghera Raha Mein Khade Ho Gaye,

Use Kutila Anyayi।
Maro Kato Luto Isaki Hi,

Dhvani Padi Sunai॥

Luta Pitakara Use Vahan Se,

Kutila Gaye Champata Ho।
Aghaton Me Marmahata Ho,

Usane Di Thi Sangya Kho ॥40॥

Bahuta Dera Taka Pada Raha Vaha,

Vahin Usi Halata Mein।
Jane Kaba Kuchha Hosha Ho Utha,

Vahin Usaki Palaka Mein॥

Anajane Hi Usake Muha Se,

Nikala Pada Tha Sai।
Jisaki Pratidhvani Shirdi Mein,

Baba Ko Padi Sunai॥

Kshubdha Ho Utha Manasa Unaka,

Baba Gaye Vikala Ho।
Lagata Jaise Ghatana Sari,

Ghati Unhi Ke Sanmukha Ho॥

Unmadi Se Idhara-Udhara Taba,

Baba Lege Bhatakane।
Sanmukha Chijein Jo Bhi Ai,

Unako Lagane Patakane॥

Aura Dhadhakate Angaro Mein,

Baba Ne Apana Kara Dala।
Huye Sashankita Sabhi Vaha,

Lakha Tandavanritya Nirala॥

Samajha Gaye Saba Loga,

Ki Koi Bhakta Pada Sankata Mein।
Kshubita Khade The Sabhi Vahan,

Para Huye Vismaya Mein॥

Use Bachane Ki Hi Khatira,

Baba Aja Vikala Hai।
Uski Hi Pida Se Pirita,

Unaka Antahasthala Hai॥

Itane Mein Hi Vividha Ne Apani,

Vichitrata Dikhalayi।
Lakha Kara Jisako Janata Ki,

Shraddha Sarita Laharai॥

Lekara Sangyahina Bhakta Ko,

Gadi Eka Vaha Ayi।
Sanmukha Apane Dekha Bhakta Ko,

Sai Ki Ankhein Bhara Ayi॥

Shanta, Dhira, Gambhira, Sindhu Sa,

Baba Ka Antahsthala।
Aja Na Jane Kyon Raha-Rahakara,

Ho Jata Tha Chanchala ॥50॥

Aja Daya Ki Murti Svayam Tha,

Bana Hua Upachari।
Aura Bhakta Ke Liye Aja Tha,

Deva Bana Pratihari॥

Aja Bhakti Ki Vishama Pariksha Mein,

Saphala Hua Tha Kashi।
Usake Hi Darshana Ki Khatira The,

Umade Nagara-Nivasi॥

Jaba Bhi Aura Jahan Bhi Koi,

Bhakta Pade Sankata Mein।
Usaki Raksha Karane Baba,

Ate Hain Palabhara Mein॥

Yuga-Yuga Ka Hai Satya Yaha,

Nahin Koi Nai Kahani।
Apatagrasta Bhakta Jaba Hota,

Jate Khuda Antaryami॥

Bheda-Bhava Se Pare Pujari,

Manavata Ke The Sai।
Jitane Pyare Hindu-Muslima,

Utane Hi The Sikkha Isai॥

Bheda-Bhava Mandira-Masjida Ka,

Toda-Phoda Baba Ne Dala।
Raha Rahima Sabhi Unake The,

Krishna Karima Allatala॥

Ghante Ki Pratidhvani Se Gunja,

Masjida Ka Kona-Kona।
Mile Paraspara Hindu-Muslima,

Pyara Bada Dina-Dina Duna॥

Chamatkara Tha Kitana Sundara,

Parichaya Isa Kaya Ne Di।
Aura Nima Kaduvahata Mein Bhi,

Mithasa Baba Ne Bhara Di॥

Saba Ko Sneha Diya Sai Ne,

Sabako Santula Pyara Kiya।
Jo Kuchha Jisane Bhi Chaha,

Baba Ne Usako Vahi Diya॥

Aise Snehashila Bhajana Ka,

Nama Sada Jo Japa Kare।
Parvata Jaisa Duhkha Na Kyon Ho,

Palabhara Mein Vaha Dura Tare ॥60॥

Sai Jaisa Data Hama,

Are Nahin Dekha Koi।
Jisake Kevala Darshana Se Hi,

Sari Vipada Dura Gai॥

Tana Mein Sai, Mana Mein Sai,

Sai Sai Bhaja Karo।
Apane Tana Ki Sudhi-Budhi Khokara,

Sudhi Usaki Tuma Kiya Karo॥

Jaba Tu Apani Sudhi Taja,

Baba Ki Sudhi Kiya Karega।
Aura Rata-Dina Baba-Baba,

Hi Tu Rata Karega॥

To Baba Ko Are! Vivasha Ho,

Sudhi Teri Leni Hi Hogi।
Teri Hara Ichchha Baba Ko,

Puri Hi Karani Hogi॥

Jangala, Jaganla Bhataka Na Pagala,

Aura Dhundhane Baba Ko।
Eka Jagaha Kevala Shirdi Mein,

Tu Paega Baba Ko॥

Dhanya Jagata Mein Prani Hai Vaha,

Jisane Baba Ko Paya।
Duhkha Mein, Sukha Mein Prahara Atha Ho,

Sai Ka Hi Guna Gaya॥

Gire Sankaton Ke Parvata,

Chahe Bijali Hi Tuta Pade।
Sai Ka Le Nama Sada Tuma,

Sanmukha Saba Ke Raho Ade॥

Isa Budhe Ki Suna Karamata,

Tuma Ho Jaoge Hairana।
Danga Raha Gae Sunakara Jisako,

Jane Kitane Chatura Sujana॥

Eka Bara Shirdi Mein Sadhu,

Dhongi Tha Koi Aya।
Bholi-Bhali Nagara-Nivasi,

Janata Ko Tha Bharamaya॥

Jadi, Butiyan Unhein Dhikhakara,

Karane Laga Vaha Bhashana।
Kahane Laga Suno Shrotagana,

Ghara Mera Hai Vrindavana ॥70॥

Aushadhi Mere Pasa Eka Hai,

Aura Ajaba Isamein Shakti।
Isake Sevana Karane Se Hi,

Ho Jati Duhkha Se Mukti॥

Agara Mukta Hona Chaho,

Tuma Sankata Se Bimari Se।
To Hai Mera Namra Nivedana,

Hara Nara Se, Hara Nari Se॥

Lo Kharida Tuma Isako,

Isaki Sevana Vidhiyan Hain Nyari।
Yadyapi Tuchchha Vastu Hai Yaha,

Guna Usake Hain Ati Bhari॥

Jo Hai Santati Hina Yahan Yadi,

Meri Aushadhi Ko Khae।
Putra-Ratna Ho Prapta,

Are Vaha Munha Manga Phala Pae॥

Aushadhi Meri Jo Na Kharide,

Jivana Bhara Pachhatayega।
Mujha Jaisa Prani Shayada Hi,

Are Yahan Aa Payega॥

Duniya Do Dinon Ka Mela Hai,

Mauja Shauka Tuma Bhi Kara Lo।
Agara Isase Milata Hai,

Saba Kuchha,Tuma Bhi Isako Le Lo॥

Hairani Badhati Janata Ki,

Lakha Isaki Karastani।
Pramudita Vaha Bhi Mana- Hi-Mana Tha,

Lakha Logon Ki Nadani॥

Khabara Sunane Baba Ko Yaha,

Gaya Daudakara Sevaka Eka।
Sunakara Bhrikuti Tani Aura,

Vismarana Ho Gaya Sabhi Viveka॥

Hukma Diya Sevaka Ko,

Satvara Pakada Dushta Ko Lao।
Ya Shirdi Ki Sima Se,

Kapati Ko Dura Bhagao॥

Mere Rahate Bholi-Bhali,

Shirdi Ki Janata Ko।
Kauna Nicha Aisa Jo,

Sahasa Karata Hai Chhalane Ko ॥80॥

Palabhara Mein Aise Dhongi,

Kapati Nicha Lutere Ko।
Mahanasha Ke Mahagarta Mein Pahuncha,

Dun Jivana Bhara Ko॥

Tanika Mila Abhasa Madari,

Krura, Kutila Anyayi Ko।
Kala Nachata Hai Aba Sira Para,

Gussa Aya Sai Ko॥

Palabhara Mein Saba Khela Banda Kara,

Bhaga Sira Para Rakhakara Paira।
Socha Raha Tha Mana Hi Mana,

Bhagawana Nahi Hai Aba Khaira॥

Sacha Hai Sai Jaisa Dani,

Mila Na Sakega Jaga Mein।
Ansha Isha Ka Sai Baba,

Unhein Na Kuchha Bhi Mushkila Jaga Mein॥

Sneha, Shila, Saujanya Adi Ka,

Abhushana Dharana Kara।
Badhata Isa Duniya Mein Jo Bhi,

Manava Seva Ke Patha Para॥

Vahi Jita Leta Hai Jagati Ke,

Jana Jana Ka Antahsthala।
Usaki Eka Udasi Hi,

Jaga Ko Kara Deti Hai Vihvala॥

Jaba-Jaba Jaga Mein Bhara Papa Ka,

Badha-Badha Hi Jata Hai।
Use Mitane Ki Hi Khatira,

Avatari Hi Ata Hai॥

Papa Aura Anyaya Sabhi Kuchha,

Isa Jagati Ka Hara Ke।
Dura Bhaga Deta Duniya Ke,

Danava Ko Kshana Bhara Ke॥

Sneha Sudha Ki Dhara Barasane,

Lagati Hai Isa Duniya Mein।
Gale Paraspara Milane Lagate,

Hain Jana Jana Apasa Mein॥

Aise Avatari Sai,

Mrityuloka Mein Akara।
Samata Ka Yaha Patha Padhaya,

Sabako Apana Apa Mitakara ॥90॥

Nama Dwaraka Masjida Ka,

Rakha Shirdi Mein Sai Ne।
Dapa, Tapa, Santapa Mitaya,

Jo Kuchha Aya Sai Ne॥

Sada Yada Mein Masta Rama Ki,

Baithe Rahate The Sai।
Pahara Atha Hi Rama Nama Ko,

Bhajate Rahate The Sai॥

Sukhi Rukhi Taji Basi,

Chahe Ya Hove Pakavana।
Sauda Pyara Ke Bhukhe Sai Ki,

Khatira The Sabhi Samana॥

Sneha Aura Shraddha Se Apani,

Jana Jo Kuchha De Jate The।
Bade Chava Se Usa Bhojana Ko,

Baba Pavana Karate The॥

Kabhi-Kabhi Mana Bahalane Ko,

Baba Baga Mein Jate The।
Pramudita Mana Mein Nirakha Prakriti,

Chhata Ko Ve Hote The॥

Ranga-Birange Pushpa Baga Ke,

Manda-Manda Hila-Dula Karake।
Bihada Virane Mana Mein Bhi,

Sneha Salila Bhara Jate The॥

Aisi Samudhura Bela Mein Bhi,

Dukha Apata, Vipada Ke Mare।
Apane Mana Ki Vyatha Sunane,

Jana Rahate Baba Ko Ghere॥

Sunakara Jinaki Karunakatha Ko,

Nayana Kamala Bhara Ate The।
De Vibhuti Hara Vyatha, Shanti,

Unake Ura Mein Bhara Dete The॥

Jane Kya Adbhuta Shikta,

Usa Vibhuti Mein Hoti Thi।
Jo Dharana Karate Mastaka Para,

Duhkha Sara Hara Leti Thi॥

Dhanya Manuja Ve Sakshat Darshana,

Jo Baba Sai Ke Paye।
Dhanya Kamala Kara Unake Jinase,

Charana-Kamala Ve Parasaye ॥100॥

Kasha Nirbhaya Tumako Bhi,

Sakshat Sai Mila Jata।
Varshon Se Ujada Chamana Apana,

Phira Se Aja Khila Jata॥

Gara Pakadata Mein Charana Shri Ke,

Nahin Chhodata Umrabhara।
Mana Leta Mein Jarura Unako,

Gara Ruthate Sai Mujha Para॥



साईं बाबा कौन से देवता हैं?

साईं बाबा का संबंध विशेष रूप से हिंदू और मुस्लिम धर्म दोनों से है। उन्हें एक संत और गुरु के रूप में पूजा जाता है। साईं बाबा को एक दिव्य शक्ति और आदर्श साधक के रूप में माना जाता है, जो लोगों को धार्मिक एकता और मानवता का संदेश देते हैं। उनकी शिक्षाएं मानवता, प्रेम और सेवा पर केंद्रित हैं। उनके भक्त उन्हें भगवान के रूप में मानते हैं, जबकि उनकी शिक्षाएं किसी एक धर्म की सीमाओं को पार करती हैं। इस प्रकार, साईं बाबा को विशेष रूप से एक ऐसे संत के रूप में देखा जाता है, जो विभिन्न धार्मिक परंपराओं को एकीकृत करता है और समाज में एकता और भाईचारे का प्रतीक है।

स्वामी साईं बाबा कौन हैं?

स्वामी साईं बाबा, जिनके नाम से भी जाना जाता है, एक प्रमुख भारतीय संत और गुरु हैं जिनका जीवन और शिक्षाएं हिन्दू और मुस्लिम धर्मों में समान रूप से सम्मानित हैं। वे शिर्डी के एक छोटे से गाँव में निवास करते थे और उनकी शिक्षाएं प्रेम, सेवा, और धार्मिक सहिष्णुता पर आधारित थीं। साईं बाबा का जीवन विशेष रूप से दिव्यता, अचंभे और चमत्कारों से भरा हुआ था, जो उनके अनुयायियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने अपने अनुयायियों को सिखाया कि सच्चा धर्म केवल पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे अपने कर्मों और जीवनशैली में भी दिखाया जाना चाहिए।

साईं बाबा का असली नाम कौन है?

साईं बाबा का असली नाम विवादित है और इसके बारे में कई मत हैं। अधिकांश लोग मानते हैं कि उनका जन्म नाम ‘साईनाथ’ था, लेकिन उनका पूरा जन्म विवरण और नाम अस्पष्ट है। उन्होंने अपने जीवन के अधिकांश समय को शिर्डी में बिताया और वहाँ के लोग उन्हें ‘साईं बाबा’ के नाम से जानते हैं। उनके बारे में मौजूद विभिन्न खातों के अनुसार, कुछ लोग मानते हैं कि वे एक मुस्लिम परिवार से थे, जबकि अन्य मानते हैं कि उनका संबंध हिन्दू धर्म से था। इस प्रकार, साईं बाबा का असली नाम और उनका जन्म स्थान भी एक रहस्य बना हुआ है।

साईं बाबा को भगवान क्यों मानते हैं?

साईं बाबा को भगवान मानने का मुख्य कारण उनकी दिव्यता और उनकी शिक्षाओं की व्यापकता है। उन्होंने जीवन के हर पहलू में आदर्शता और समर्पण का उदाहरण प्रस्तुत किया। उनकी शिक्षाएं मानवता, प्रेम, और धार्मिक सहिष्णुता के सिद्धांतों पर आधारित थीं। भक्त उन्हें एक चमत्कारी शक्ति के रूप में मानते हैं जिन्होंने अनेक चमत्कार किए और लोगों की कठिनाइयों को दूर किया। साईं बाबा की भक्ति और उनके अनुयायियों का अटूट विश्वास उन्हें एक दिव्य शक्ति और भगवान के रूप में मानता है, जिन्होंने अपने जीवन के माध्यम से लोगों को सच्चे धर्म और प्रेम का संदेश दिया।

इस्लाम में साईं क्या है?

इस्लाम में ‘साईं’ शब्द का उपयोग आमतौर पर एक धार्मिक या आध्यात्मिक नेता के लिए किया जाता है। ‘साईं’ अरबी भाषा के शब्द ‘सईद’ से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ ‘खुशहाल’ या ‘धन्य’ होता है। इस्लाम में साईं बाबा का स्थान अलग है क्योंकि वे एक हिन्दू-मुस्लिम संत के रूप में प्रसिद्ध हैं। मुस्लिम समुदाय में साईं बाबा को एक सम्मानित धार्मिक व्यक्तित्व के रूप में माना जाता है, जिनकी शिक्षाएं और जीवन अन्य धर्मों के साथ समानता और सहिष्णुता का संदेश देती हैं। उनके अनुयायी उन्हें धार्मिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में मानते हैं।


साई चालीसा पाठ के लाभ

साई चालीसा, साईं बाबा की भक्ति में रचित एक पवित्र स्तोत्र है, जो चालीस चौपाइयों में उनकी महिमा, गुणों और कृपा का वर्णन करता है। इसका नियमित पाठ भक्त के जीवन पर गहरा आध्यात्मिक, मानसिक और भावनात्मक प्रभाव छोड़ता है। इसके कुछ प्रमुख लाभ इस प्रकार हैं:

1. आध्यात्मिक शांति और आंतरिक शक्ति: साई चालीसा का पाठ मन को एकाग्र करके भटकाव रोकता है। इससे मन शांत होता है और आत्मिक शक्ति का विकास होता है। बाबा की करुणामयी छवि पर ध्यान केंद्रित करने से भक्त को आंतरिक साहस और धैर्य की प्राप्ति होती है, जो जीवन की कठिनाइयों का सामना करने में सहायक होती है।

2. मानसिक तनाव से मुक्ति: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव और चिंता आम समस्या हैं। चालीसा का पाठ एक प्रकार की ध्यान-साधना है। यह मन के नकारात्मक विचारों को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है, जिससे मानसिक उलझनें कम होती हैं और तनाव से मुक्ति मिलती है।

3. भक्ति और समर्पण की भावना का विकास: चालीसा की प्रत्येक चौपाई साईं बाबा के प्रति प्रेम और समर्पण से ओत-प्रोत है। इसके नियमित पाठ से हृदय में भक्ति की गहरी भावना जागृत होती है। व्यक्ति स्वार्थी भावनाओं से ऊपर उठकर ईश्वरीय प्रेम और सेवा की ओर अग्रसर होता है।

4. आशीर्वाद और कृपा की प्राप्ति: मान्यता है कि श्रद्धा और सच्चे मन से चालीसा का पाठ करने पर साईं बाबा की विशेष कृपा भक्त पर बनी रहती है। उनकी कृपा से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, संकटों से रक्षा होती है और घर-परिवार में सुख-शांति का वास होता है। बाबा अपने भक्तों को हर संकट से उबारने का आश्वासन देते हैं।

5. नैतिक मूल्यों और चरित्र का सुदृढ़ीकरण: साई चालीसा के माध्यम से बाबा के जीवन दर्शन और उपदेशों से सीख मिलती है। उनके द्वारा प्रतिपादित सत्य, प्रेम, दया, करुणा, शांति और सेवा जैसे मूल्य हृदय में बसते हैं। इससे व्यक्ति के चरित्र का निर्माण होता है और वह एक बेहतर इंसान बनता है।

6. एकाग्रता और संकल्प शक्ति में वृद्धि: चालीसा पाठ करते समय मन, वचन और कर्म से बाबा में लीन होना पड़ता है। इस अभ्यास से एकाग्रता बढ़ती है। दृढ़ संकल्प की शक्ति विकसित होती है, जो किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक सिद्ध होती है।

7. सकारात्मक वातावरण का निर्माण: मंत्रों और स्तुतियों का उच्चारण वातावरण में सकारात्मक कंपन पैदा करता है। घर में नियमित चालीसा पाठ से वहां का वातावरण पवित्र और शांतिमय बनता है, जिसका सकारात्मक प्रभाव परिवार के सभी सदस्यों पर पड़ता है।



साईं बाबा कौन से देवता हैं?

साईं बाबा का संबंध विशेष रूप से हिंदू और मुस्लिम धर्म दोनों से है। उन्हें एक संत और गुरु के रूप में पूजा जाता है। साईं बाबा को एक दिव्य शक्ति और आदर्श साधक के रूप में माना जाता है, जो लोगों को धार्मिक एकता और मानवता का संदेश देते हैं। उनकी शिक्षाएं मानवता, प्रेम और सेवा पर केंद्रित हैं। उनके भक्त उन्हें भगवान के रूप में मानते हैं, जबकि उनकी शिक्षाएं किसी एक धर्म की सीमाओं को पार करती हैं। इस प्रकार, साईं बाबा को विशेष रूप से एक ऐसे संत के रूप में देखा जाता है, जो विभिन्न धार्मिक परंपराओं को एकीकृत करता है और समाज में एकता और भाईचारे का प्रतीक है।

स्वामी साईं बाबा कौन हैं?

स्वामी साईं बाबा, जिनके नाम से भी जाना जाता है, एक प्रमुख भारतीय संत और गुरु हैं जिनका जीवन और शिक्षाएं हिन्दू और मुस्लिम धर्मों में समान रूप से सम्मानित हैं। वे शिर्डी के एक छोटे से गाँव में निवास करते थे और उनकी शिक्षाएं प्रेम, सेवा, और धार्मिक सहिष्णुता पर आधारित थीं। साईं बाबा का जीवन विशेष रूप से दिव्यता, अचंभे और चमत्कारों से भरा हुआ था, जो उनके अनुयायियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने अपने अनुयायियों को सिखाया कि सच्चा धर्म केवल पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे अपने कर्मों और जीवनशैली में भी दिखाया जाना चाहिए।

साईं बाबा का असली नाम कौन है?

साईं बाबा का असली नाम विवादित है और इसके बारे में कई मत हैं। अधिकांश लोग मानते हैं कि उनका जन्म नाम ‘साईनाथ’ था, लेकिन उनका पूरा जन्म विवरण और नाम अस्पष्ट है। उन्होंने अपने जीवन के अधिकांश समय को शिर्डी में बिताया और वहाँ के लोग उन्हें ‘साईं बाबा’ के नाम से जानते हैं। उनके बारे में मौजूद विभिन्न खातों के अनुसार, कुछ लोग मानते हैं कि वे एक मुस्लिम परिवार से थे, जबकि अन्य मानते हैं कि उनका संबंध हिन्दू धर्म से था। इस प्रकार, साईं बाबा का असली नाम और उनका जन्म स्थान भी एक रहस्य बना हुआ है।

साईं बाबा को भगवान क्यों मानते हैं?

साईं बाबा को भगवान मानने का मुख्य कारण उनकी दिव्यता और उनकी शिक्षाओं की व्यापकता है। उन्होंने जीवन के हर पहलू में आदर्शता और समर्पण का उदाहरण प्रस्तुत किया। उनकी शिक्षाएं मानवता, प्रेम, और धार्मिक सहिष्णुता के सिद्धांतों पर आधारित थीं। भक्त उन्हें एक चमत्कारी शक्ति के रूप में मानते हैं जिन्होंने अनेक चमत्कार किए और लोगों की कठिनाइयों को दूर किया। साईं बाबा की भक्ति और उनके अनुयायियों का अटूट विश्वास उन्हें एक दिव्य शक्ति और भगवान के रूप में मानता है, जिन्होंने अपने जीवन के माध्यम से लोगों को सच्चे धर्म और प्रेम का संदेश दिया।

इस्लाम में साईं क्या है?

इस्लाम में ‘साईं’ शब्द का उपयोग आमतौर पर एक धार्मिक या आध्यात्मिक नेता के लिए किया जाता है। ‘साईं’ अरबी भाषा के शब्द ‘सईद’ से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ ‘खुशहाल’ या ‘धन्य’ होता है। इस्लाम में साईं बाबा का स्थान अलग है क्योंकि वे एक हिन्दू-मुस्लिम संत के रूप में प्रसिद्ध हैं। मुस्लिम समुदाय में साईं बाबा को एक सम्मानित धार्मिक व्यक्तित्व के रूप में माना जाता है, जिनकी शिक्षाएं और जीवन अन्य धर्मों के साथ समानता और सहिष्णुता का संदेश देती हैं। उनके अनुयायी उन्हें धार्मिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में मानते हैं।

साईं बाबा की पूजा कौन करता है?

साईं बाबा की पूजा विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग करते हैं। उनकी शिक्षाएं हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्मों में समान रूप से स्वीकार की जाती हैं, इसलिए उनके भक्तों की विविधता भी बहुत बड़ी है। साईं बाबा के अनुयायी उन्हें एक दिव्य शक्ति और मार्गदर्शक मानते हैं और उनकी पूजा विभिन्न तरीकों से की जाती है, जैसे कि आरती, भजन, और पूजा अर्चना। उनकी पूजा न केवल भारत में बल्कि विश्व भर में की जाती है, जहां लोग उनकी शिक्षाओं और चमत्कारों से प्रेरित होकर उन्हें श्रद्धा और भक्ति से पूजते हैं।