Wednesday, January 28, 2026
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Hanuman Chalisa in Hindi (PDF Download) | श्री हनुमान चालीसा हिंदी पाठ

श्री हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa PDF) का अपना एक विशेष महत्व है। यह चालीसा गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित है और इसमें भगवान हनुमान जी के महिमा का विस्तृत वर्णन किया गया है। हनुमान जी को शक्ति, भक्ति और साहस के प्रतीक माना जाता है। उनकी भक्ति से न केवल संकटों का निवारण होता है बल्कि आत्मिक बल और मानसिक शांति भी प्राप्त होती है। आप हमारी वेबसाइट में संकट मोचन हनुमान अष्टक | हनुमान बाहुक और दुर्गा आरती भी पढ़ सकते हैं।

श्री हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa PDF) के पाठ से जीवन में अद्भुत परिवर्तन आ सकते हैं। यह चालीसा 40 चौपाइयों का एक संग्रह है, जिसमें हनुमान जी के जन्म, उनकी अद्भुत शक्तियों, भगवान राम के प्रति उनकी अटूट भक्ति, और उनके द्वारा किए गए महान कार्यों का वर्णन किया गया है। यहां से आप बजरंग बाण भी पढ़ सकते हैं| हनुमान चालीसा पढ़ने के 21 चमत्कारिक फायदे

हनुमान जी की आराधना से सभी प्रकार के भय, संकट, और नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है। यह चालीसा न केवल संकटों का निवारण करती है, बल्कि जीवन में साहस, आत्मविश्वास और विजय की प्राप्ति भी कराती है। हनुमान चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति को मानसिक शांति, शारीरिक बल और आध्यात्मिक संतोष की प्राप्ति होती है। हनुमान जी के आशीर्वाद से सभी बाधाएं दूर होती हैं और व्यक्ति को सुख, शांति, और समृद्धि की प्राप्ति होती है। श्री नारायण कवच | वीर हनुमाना अति बलवाना भजन लिरिक्स | Shri Sai Chalisa Lyrics PDF | Hanuman Chalisa MP3 Download

श्री हनुमान चालीसा हिंदू धर्म के सबसे लोकप्रिय और पवित्र स्तोत्रों में से एक है। इसकी रचना महाकवि तुलसीदास जी ने १६वीं शताब्दी में अवधी भाषा में की थी। ऐसी मान्यता है कि तुलसीदास जी ने यह चालीसा तब लिखी जब वह चित्रकूट में रामभक्ति का प्रचार कर रहे थे। इसमें ४० चौपाइयाँ (इसलिए ‘चालीसा’) और दो दोहे हैं, जो हनुमान जी की महिमा, शक्ति और भगवान राम के प्रति उनकी अटूट भक्ति का वर्णन करते हैं।

हनुमान चालीसा का धार्मिक महत्व अतुलनीय है। इसे केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली मंत्र-विज्ञान माना जाता है। भक्तों का विश्वास है कि नियमित और श्रद्धापूर्वक पाठ करने से जीवन की सभी बाधाएँ दूर होती हैं, नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है, और आत्मविश्वास व साहस की प्राप्ति होती है। यह मन को शांति और एकाग्रता प्रदान करती है।

सांस्कृतिक महत्व की बात करें, तो यह चालीसा भारतीय जन-मानस में अद्भुत रूप से रची-बसी है। लाखों परिवारों में यह नित्य पाठ का हिस्सा है। इसे संकटों से रक्षा, साहस की प्रेरणा और भक्ति के सरल मार्ग के रूप में देखा जाता है। तुलसीदास जी ने इसे इतने सरल और मधुर शब्दों में रचा है कि यह सामान्य जन से लेकर विद्वानों तक सभी की आराधना बन गई है।

निष्कर्षतः, हनुमान चालीसा केवल कागज़ पर शब्द नहीं, बल्कि भक्ति, शक्ति और विजय का एक जीवंत प्रतीक है, जो सदियों से करोड़ों लोगों को आध्यात्मिक सहारा और मार्गदर्शन प्रदान कर रही है।


श्री हनुमान चालीसा का पाठ करने से पहले और उसके दौरान कुछ साधारण लेकिन महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखा जाए, तो इसका पुण्य और लाभ अनेक गुना बढ़ जाता है। यहां कुछ विशेष सुझाव दिए जा रहे हैं:

१. शुद्धता और श्रद्धा: पाठ करने से पहह हाथ-मुंह धोकर, स्वच्छ वस्त्र धारण करें और यदि संभव हो तो स्नान कर लें। मन में श्री हनुमान जी के प्रति गहरी श्रद्धा और एकाग्र भाव रखें। बिना श्रद्धा के मात्र जाप करने का पूरा लाभ नहीं मिल पाता।

२. नियमितता और समय: पाठ का सबसे बड़ा रहस्य नियमितता है। प्रतिदिन एक निश्चित समय पर, खासतौर पर ब्रह्ममुहूर्त (सुबह ४-६ बजे) या सूर्यास्त के समय पाठ करना अत्यंत फलदायी माना गया है। नियम बनाकर पढ़ें।

३. उच्चारण और भाव: हिंदी/अवधी के शब्दों का सही और स्पष्ट उच्चारण करने का प्रयास करें। जल्दबाजी में गलत उच्चारण न करें। प्रत्येक चौपाई का अर्थ समझते हुए और हनुमान जी की छवि मन में रखकर पाठ करें। भाव सबसे महत्वपूर्ण है।

४. पवित्र स्थान: एक शांत और स्वच्छ कोना निश्चित करें, जहाँ आपको विघ्न न हो। यदि संभव हो तो हनुमान जी की एक मूर्ति या चित्र के सामने बैठकर पाठ करें। दीपक और अगरबत्ती जलाने से वातावरण शुद्ध होता है।

५. संख्या और संकल्प: एक माला (१०८ बार) या न्यूनतम १ बार पूरी चालीसा का नियम बनाएं। पाठ शुरू करने से पहले मन ही मन अपना संकल्प बोल लें, जैसे – “हे प्रभु, यह पाठ आपकी भक्ति और कृपा पाने के लिए।”

६. पाठ के बाद: पाठ पूरा करने के बाद कुछ देर शांत बैठकर हनुमान जी का ध्यान करें और अपनी इच्छा मन में रखें। प्रसाद के रूप में मीठा फल या बूंदी का भोग लगाएं और बाद में स्वयं ग्रहण करें।

याद रखें, नियम, श्रद्धा और भावना ही भक्ति का मूल है। श्री हनुमान जी सरल हृदय से की गई भक्ति से शीघ्र प्रसन्न होते हैं और सभी संकटों से रक्षा करते हैं।

जय श्री राम! संकट मोचन हनुमान जी की जय!


Word (in Context)Roman TransliterationMeaning & ExplanationWhy It’s Difficult
चरन सरोज रज (दोहा)charan saroj rajThe dust from the lotus feet (of the guru). A deeply reverential compound metaphor.Poetic, compound phrase; uses symbolic language (raj = dust, saroj = lotus).
बुद्धिहीन तनु जानिके (दोहा)buddhiheen tanu jaanikeKnowing this body to be devoid of wisdom/intellect.Archaic grammar: jaanike (knowing) is an old form; tanu (body) is a Sanskrit tatsam word.
पवन-कुमार (दोहा)pavan-kumarSon of the wind god (Pavan). An epithet for Hanuman.Cultural/religious epithet; requires knowledge of mythology.
अतुलित बल धामा (चौपाई 1)atulit bal dhamaaThe abode of incomparable strength.Atulit = incomparable (Sanskrit); dhama = abode/seat (archaic sense).
बजरंगी (चौपाई 2)bajrangiOne with a body as strong as a thunderbolt (vajra).Compound word (bajra + angi); descriptive title, not common vocabulary.
कुंचित केसा (चौपाई 4)kunchit kesaCurly hair.Kunchit = curled (Sanskrit); kesa = hair (archaic/poetic).
जनेउ (चौपाई 5)janeuThe sacred thread worn by Brahmins.Cultural-specific term; refers to a specific article of religious significance.
मुद्रिका (चौपाई 19)mudrikaRing (specifically, Lord Rama’s signet ring).Can mean “ring,” “seal,” or “symbol”; here, it’s a key story element.

Other Common Difficulties in the Text

  • Archaic Grammar & Pronouns: Words like मोहिं (mohi = to me), तुम्हरो (tumharo = yours), and कीह्ना (keenha = did) use old grammatical forms not common in modern Hindi.
  • Pronunciation Challenges: Words with conjunct consonants (like विक्रम vikramश्रद्धा shraddha) or anusvara ( ) can be tricky. The rhythm of the Chaupai (meter) is key to correct recitation.
  • Cultural & Mythological References: The text is filled with names (e.g., अंजनिकेसरीसुग्रीवबिभीषण), places (लंक), and concepts that are part of the Ramayana epic. Understanding the stories behind these references deepens the meaning.

Disclaimer: This text is cross-referenced with the original Tulsidas Ramcharitmanas versions to ensure 100% accuracy for devotees.

॥Hanuman Chalisa Hindi Lyrics॥
(हनुमान चालीसा पाठ)

Hanuman Chalisa pdf | Hanuman Chalisa Lyrics in Hindi

॥Hanuman Chalisa Lyrics in Hindi ||
|| हनुमान चालीसा लिखित में ||

॥ दोहा॥

श्रीगुरु चरन सरोज रज
निज मनु मुकुरु सुधारि ।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु
जो दायकु फल चारि ॥

बुद्धिहीन तनु जानिके
सुमिरौं पवन-कुमार ।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं
हरहु कलेस बिकार ॥

॥ हनुमान चालीसा चौपाई ॥

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर ।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥

राम दूत अतुलित बल धामा ।
अंजनि पुत्र पवनसुत नामा ॥

महाबीर बिक्रम बजरंगी ।
कुमति निवार सुमति के संगी ॥

कंचन बरन बिराज सुबेसा ।
कानन कुण्डल कुँचित केसा ॥४॥

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै ।
काँधे मूँज जनेउ साजै ॥

शंकर सुवन केसरीनन्दन।
तेज प्रताप महा जग वन्दन॥

बिद्यावान गुनी अति चातुर ।
राम काज करिबे को आतुर ॥

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया ।
राम लखन सीता मन बसिया ॥८॥

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा ।
बिकट रूप धरि लंक जरावा ॥

भीम रूप धरि असुर सँहारे ।
रामचन्द्र के काज सँवारे ॥

लाय सजीवन लखन जियाए ।
श्री रघुबीर हरषि उर लाये ॥

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई ।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥१२॥

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं ।
अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं ॥

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा ।
नारद सारद सहित अहीसा ॥

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते ।
कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ॥

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीह्ना ।
राम मिलाय राज पद दीह्ना ॥१६॥

तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना ।
लंकेश्वर भए सब जग जाना ॥

जुग सहस्त्र जोजन पर भानु ।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं ।
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ॥

दुर्गम काज जगत के जेते ।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥२०॥

राम दुआरे तुम रखवारे ।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥

सब सुख लहै तुम्हारी सरना ।
तुम रक्षक काहू को डरना ॥

आपन तेज सम्हारो आपै ।
तीनों लोक हाँक तै काँपै ॥

भूत पिशाच निकट नहिं आवै ।
महावीर जब नाम सुनावै ॥२४॥

नासै रोग हरै सब पीरा ।
जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥

संकट तै हनुमान छुडावै ।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥

सब पर राम तपस्वी राजा ।
तिनके काज सकल तुम साजा ॥

और मनोरथ जो कोई लावै ।
सोई अमित जीवन फल पावै ॥२८॥

चारों जुग परताप तुम्हारा ।
है परसिद्ध जगत उजियारा ॥

साधु सन्त के तुम रखवारे ।
असुर निकंदन राम दुलारे ॥

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता ।
अस बर दीन जानकी माता ॥

राम रसायन तुम्हरे पासा ।
सदा रहो रघुपति के दासा ॥३२॥

तुम्हरे भजन राम को पावै ।
जनम जनम के दुख बिसरावै ॥

अंतकाल रघुवरपुर जाई ।
जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ॥

और देवता चित्त ना धरई ।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ॥

संकट कटै मिटै सब पीरा ।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥३६॥

जै जै जै हनुमान गोसाईं ।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥

जो सत बार पाठ कर कोई ।
छूटहि बंदि महा सुख होई ॥

जो यह पढ़ै  हनुमान चालीसा ।
होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥

तुलसीदास सदा हरि चेरा ।
कीजै नाथ हृदय मह डेरा ॥४०॥

॥ दोहा ॥
पवन तनय संकट हरन,
मंगल मूरति रूप ।
राम लखन सीता सहित,
हृदय बसहु सुर भूप ॥


|| Hanuman Chalisa in English PDF ||

Hanuman Chalisa Lyrics in Hindi PDF – श्री हनुमान चालीसा

॥ Doha:॥

Shri guru charan saroj raj
Nij manu mukur sudhaari ॥
Baranau Raghubar bimal jasu
Jo dayaku phal chaari ॥

Buddhiheen tanu jaanike
Sumirau pavan-kumaar ॥
Bal buddhi vidya dehu mohi
Harahu kales bikar ॥

॥ Chaupai॥

Jay Hanuman gyan gun sagar
Jay Kapis tihu lok ujaagar ॥

Ram doot atulit bal dhaama
Anjani putra Pavan sut naama ॥

Mahaabir bikram Bajarangi
Kumati nivaar sumati ke sangi ॥

Kanchan baran biraj subesa
Kanan kundal kunchit kesa ॥

Haath bajra aur dhvaja biraajai
Kaandhe moonj janeu saajai ॥

Shankar suvan Kesari Nandan
Tej pratap mahaa jag vandan ॥

Vidyavaan guni ati chaatur
Ram kaj karibe ko aatur ॥

Prabhu charitra sunibe ko rasiya
Ram Lakhan Sita man basiya ॥

Sukshma roop dhari siyahi dikhava,
Bikat roop dhari lanka jarava ॥

Bheem roop dhari asur samhare,
Ramachandra ke kaj samvare ॥

Laayi sajeevan Lakhan jiyaaye,
Shri Raghubir harashi ur laaye ॥

Raghupati keenhi bahut badai,
Tum mam priya Bharatahi sam bhai ॥

Sahas badan tumharo jas gaave,
Asa kahi Shripati kanth lagaave ॥

Sanakadik brahmaadi munisa,
Narad saarad sahit ahisa ॥

Yam Kubera digpala jahaan te,
Kavi kobid kahi sake kahaan te ॥

Tum upakara Sugreevahin keenha,
Ram milaayi raaj pad deenha ॥

Tumharo mantra Bibheeshana maana,
Lankeshwar bhaaye sab jag jaana ॥

Jug sahastra jojan par bhaanu,
Lielyo taahi madhur phal jaanu ॥

Prabhu mudrika meli mukh maahi,
Jaladhi laanghi gaye achraj naahi ॥

Durgam kaaj jagat ke jete,
Sugam anugrah tumhare tete ॥

Ram duare tum rakhware,
Hot na aajnya binu paisare ॥

Sab sukh lahai tumhari sarna,
Tum rakshak kaahu ko darna ॥

Aapan tej samhaaro aapai,
Teenon lok haank te kaapai ॥

Bhoot pishaach nikat nahin aavai,
Mahaveer jab naam sunaavai ॥

Nasai roga harai sab peera,
Japat nirantra Hanumat beera ॥

Sankat tai Hanuman chhudaavai,
Man kram bachan dhyaan jo laavai ॥

Sab par Ram tapasvi raja,
Tinke kaaj sakal tum sajaa ॥

Aur manorath jo koi laavai,
Soi amit jeevan phal paavai ॥

Charon jug paratap tumhaara,
Hai par siddh jagat ujiyaara ॥

Sadhu sant ke tum rakhavaare,
Asur nikandan Ram dulaare ॥

Asht siddhi nau nidhi ke daata,
Asa bar deen Janaki maata ॥

Ram rasaayan tumhare paasaa,
Sada raho Raghupati ke daasaa ॥

Tumhare bhajan Ram ko paavai,
Janam janam ke dukh bisaraavai ॥

Antakaal Raghuvir pur jaai,
Jahaan janma Haribhakta kahaai ॥

Aur devata chitta naa dharai,
Hanumat sei sarva sukh karai ॥

Sankat katai mitai sab peera,
Jo sumirai Hanumat balbeera ॥

Jai jai jai Hanuman Gosai,
Kripa karahu Gurudeva ki naai ॥

Jo sat baar paath kar koi,
Chhutahi bandi maha sukh hoi ॥

Jo yah padhai Hanuman chalisa,
Hoi siddhi sakhi Gaurisa ॥

Tulsidas sada Hari chera,
Keejai naath hrdaya mah dera ॥

॥ Doha॥
Pavan tanay sankat haran,
Mangal moorti roop ॥
Ram Lakhan Sita sahit,
Hriday basahu sur bhoop ॥



Shri Hanuman Chalisa Hindi PDF 2026 cover image – traditional Hanuman Chalisa lyrics in Hindi for devotional reading and daily path.
Shri Hanuman Chalisa Hindi PDF cover image, representing the traditional 40-verse devotional hymn composed by Goswami Tulsidas and widely recited by devotees for daily prayer and spiritual practice.


  • डर और दुश्मनों से बचाव: हनुमान जी की कृपा से भूत-प्रेत, बुरी नजर, नकारात्मकता और हर तरह के डर से रक्षा होती है। मन को सुरक्षा का एहसास मिलता है।
  • हौसला और मजबूती बढ़े: परीक्षा हो, नौकरी का इंटरव्यू हो, कोर्ट-कचहरी का मुकदमा हो या कोई और मुश्किल घड़ी – हनुमान चालीसा पढ़ने से अंदर से हिम्मत और आत्मविश्वास बढ़ता है। डर कम होता है और सामना करने की ताकत मिलती है।
  • दिमाग को शांति मिले: रोजाना पाठ करने से मन की उधेड़बुन, तनाव, चिंता और गुस्सा कम होता है। दिलो-दिमाग को एक अजीब सी शांति और स्थिरता मिलती है।
  • सेहत में सुधार: माना जाता है कि नियमित पाठ से शरीर की रोगों से लड़ने की ताकत (इम्युनिटी) बढ़ती है। मन शांत रहने से शारीरिक स्वास्थ्य भी बेहतर होने में मदद मिलती है।
  • भगवान की कृपा बरसे: हनुमान जी भगवान राम के परम भक्त हैं और शिवजी के अवतार भी माने जाते हैं। उनकी चालीसा का पाठ करने से तीनों – भगवान राम, शिवजी और हनुमान जी – की विशेष कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है।

कहते हैं न भाई, “बजरंगबली की कृपा हो, तो क्या काम मुश्किल हो सकता है?” नियमित और श्रद्धा से पाठ करिए, फायदा जरूर मिलेगा। जय बजरंगबली!

श्री हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa PDF) का पाठ हनुमान जी को प्रसन्न करने का एक शक्तिशाली माध्यम माना जाता है। इसे पढ़ने से पहले श्रद्धालु को शुद्धता और पवित्रता का ध्यान रखना चाहिए। सुबह स्नान कर साफ वस्त्र धारण करने के बाद एक शांत और साफ स्थान पर बैठें। हनुमान जी की मूर्ति या चित्र के सामने दीपक और अगरबत्ती जलाएं और ध्यान केंद्रित करें। मन में पूरी श्रद्धा और विश्वास रखते हुए संकल्प लें कि आप किस उद्देश्य के लिए हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे हैं।

श्री हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa PDF) का पाठ करते समय हर श्लोक को सही उच्चारण के साथ पढ़ें। इसे तीन, सात, या 108 बार तक पढ़ा जा सकता है, खासकर मंगलवार और शनिवार को। मंगलवार और शनिवार को हनुमान जी के विशेष दिन माने जाते हैं और इन दिनों में पाठ करना अधिक प्रभावकारी होता है। पाठ के दौरान ध्यान रखें कि मन शांत और एकाग्र हो, और आपकी भावनाएं सच्ची हों, ताकि हनुमान जी की कृपा आप पर बनी रहे।

पाठ के बाद हनुमान जी को तुलसी के पत्तों का भोग अर्पित करें और हनुमान जी की आरती करें। इसके साथ ही प्रसाद का वितरण करें। हनुमान जी की पूजा में मिष्ठान्न का विशेष महत्व होता है, और अगर संभव हो तो लड्डू का भोग चढ़ाएं। आरती के बाद पुनः हनुमान जी से अपनी प्रार्थना करें और आशीर्वाद प्राप्त करें।

हनुमान चालीसा का नियमित पाठ करने से मानसिक शांति, आत्मबल, और साहस की प्राप्ति होती है। इससे जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, और सभी प्रकार के भय, रोग, और शत्रुता का नाश होता है। यदि सच्ची भक्ति और श्रद्धा से हनुमान जी की आराधना की जाए, तो वे शीघ्र प्रसन्न होकर अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।


श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि।
बरनऊं रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।

अर्थ – श्री गुरु महाराज के चरण कमलों की धूलि से
अपने मन रूपी दर्पण को पवित्र करके
श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूं,
जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला है।

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरो पवन-कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार।

अर्थ – हे पवन कुमार! मैं आपको सुमिरन करता हूं।
आप तो जानते ही हैं कि मेरा शरीर और बुद्धि निर्बल है।
मुझे शारीरिक बल, बुद्धि एवं ज्ञान दीजिए
और मेरे दुखों व दोषों का नाश कर दीजिए।

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीस तिहुं लोक उजागर॥1॥
अर्थ –
 श्री हनुमान जी! आपकी जय हो।
आपका ज्ञान और गुण अथाह है।
हे कपीश्वर! आपकी जय हो!
तीनों लोकों, स्वर्ग लोक, भूलोक और पाताल लोक में आपकी कीर्ति है।

राम दूत अतुलित बलधामा, अंजनी पुत्र पवन सुत नामा॥2॥
अर्थ –
 हे पवनसुत अंजनी नंदन! आपके समान दूसरा बलवान नहीं हैं।

महावीर विक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी॥3॥
अर्थ –
 हे महावीर बजरंग बली! आप विशेष पराक्रम वाले हैं।
आप खराब बुद्धि को दूर करते हैं,
और अच्छी बुद्धि वालों के साथी, सहायक हैं।

कंचन बरन बिराज सुबेसा, कानन कुण्डल कुंचित केसा॥4॥
अर्थ –
 आप सुनहले रंग, सुन्दर वस्त्रों, कानों में कुण्डल
और घुंघराले बालों से सुशोभित हैं।

हाथबज्र और ध्वजा विराजे, कांधे मूंज जनेऊ साजै॥5॥
अर्थ –
 आपके हाथ में बज्र और ध्वजा है
और कन्धे पर मूंज के जनेऊ की शोभा है।

शंकर सुवन केसरी नंदन, तेज प्रताप महा जग वंदन॥6॥
अर्थ-
 शंकर के अवतार! हे केसरी नंदन आपके पराक्रम
और महान यश की संसार भर में वन्दना होती है।

विद्यावान गुणी अति चातुर, राम काज करिबे को आतुर॥7॥
अर्थ-
 आप प्रकान्ड विद्या निधान हैं, गुणवान और अत्यन्त कार्य कुशल होकर
श्री राम के काज करने के लिए आतुर रहते हैं।

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया, राम लखन सीता मन बसिया॥8॥
अर्थ –
 आप श्री राम चरित सुनने में आनन्द रस लेते हैं।
श्री राम, सीता और लखन आपके हृदय में बसे रहते हैं।

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा, बिकट रूप धरि लंक जरावा॥9॥
अर्थ –
 आपने अपना बहुत छोटा रूप धारण करके सीता जी को दिखलाया
और भयंकर रूप करके लंका को जलाया।

भीम रूप धरि असुर संहारे, रामचन्द्र के काज संवारे॥10॥
अर्थ –
 आपने विकराल रूप धारण करके राक्षसों को मारा
और श्री रामचन्द्र जी के उद्देश्यों को सफल कराया।

लाय सजीवन लखन जियाये, श्री रघुवीर हरषि उर लाये॥11॥
अर्थ –
 आपने संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी को जिलाया
जिससे श्री रघुवीर ने हर्षित होकर आपको हृदय से लगा लिया।

रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई, तुम मम प्रिय भरत सम भाई॥12॥
अर्थ –
 श्री रामचन्द्र ने आपकी बहुत प्रशंसा की
और कहा कि तुम मेरे भरत जैसे प्यारे भाई हो।

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥13॥
अर्थ –
 श्री राम ने आपको यह कहकर हृदय से लगा लिया
कि तुम्हारा यश हजार मुख से सराहनीय है।

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा, नारद, सारद सहित अहीसा॥14॥
अर्थ –
 श्री सनक, श्री सनातन, श्री सनन्दन, श्री सनत्कुमार आदि मुनि ब्रह्मा आदि देवता नारद जी,
सरस्वती जी, शेषनाग जी सब आपका गुण गान करते हैं।

जम कुबेर दिगपाल जहां ते, कबि कोबिद कहि सके कहां ते॥15॥
अर्थ –
 यमराज, कुबेर आदि सब दिशाओं के रक्षक, कवि विद्वान, पंडित
या कोई भी आपके यश का पूर्णतः वर्णन नहीं कर सकते।

तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा, राम मिलाय राजपद दीन्हा॥16॥
अर्थ –
 आपने सुग्रीव जी को श्रीराम से मिलाकर उपकार किया, जिसके कारण वे राजा बने।

तुम्हरो मंत्र विभीषण माना, लंकेस्वर भए सब जग जाना॥17॥
अर्थ –
 आपके उपदेश का विभिषण जी ने पालन किया
जिससे वे लंका के राजा बने, इसको सब संसार जानता है।

जुग सहस्त्र जोजन पर भानू, लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥18॥
अर्थ –
 जो सूर्य इतने योजन दूरी पर है कि उस पर पहुंचने के लिए हजार युग लगे।
दो हजार योजन की दूरी पर स्थित सूर्य को आपने एक मीठा फल समझकर निगल लिया।

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहि, जलधि लांघि गये अचरज नाहीं॥19॥
अर्थ –
 आपने श्री रामचन्द्र जी की अंगूठी मुंह में रखकर समुद्र को लांघ लिया,
इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।

दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥20॥
अर्थ –
 संसार में जितने भी कठिन से कठिन काम हो,
वो आपकी कृपा से सहज हो जाते है।

राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिनु पैसा रे॥21॥
अर्थ –
 श्री रामचन्द्र जी के द्वार के आप रखवाले हैं,
जिसमें आपकी आज्ञा बिना किसी को प्रवेश नहीं मिलता
अर्थात् आपकी प्रसन्नता के बिना राम कृपा दुर्लभ है।

सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू को डरना ॥22॥
अर्थ –
 जो भी आपकी शरण में आते हैं, उस सभी को आनन्द प्राप्त होता है,
और जब आप रक्षक हैं, तो फिर किसी का डर नहीं रहता।

आपन तेज सम्हारो आपै, तीनों लोक हांक तें कांपै॥23॥
अर्थ –
 आपके सिवाय आपके वेग को कोई नहीं रोक सकता,
आपकी गर्जना से तीनों लोक कांप जाते हैं।

भूत पिशाच निकट नहिं आवै, महावीर जब नाम सुनावै॥24॥
अर्थ –
 जहां महावीर हनुमान जी का नाम सुनाया जाता है,
वहां भूत, पिशाच पास भी नहीं फटक सकते।

नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥25॥
अर्थ –
 वीर हनुमान जी! आपका निरंतर जप करने से
सब रोग चले जाते हैं और सब पीड़ा मिट जाती है।

संकट तें हनुमान छुड़ावै, मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥26॥
अर्थ –
 हे हनुमान जी! विचार करने में, कर्म करने में और बोलने में,
जिनका ध्यान आपमें रहता है, उनको सब संकटों से आप छुड़ाते हैं।

सब पर राम तपस्वी राजा, तिनके काज सकल तुम साजा॥27॥
अर्थ –
 तपस्वी राजा श्री रामचन्द्र जी सबसे श्रेष्ठ हैं,
उनके सब कार्यों को आपने सहज में कर दिया।

सब पर राम तपस्वी राजा, तिनके काज सकल तुम साजा॥27॥
अर्थ-
 तपस्वी राजा श्री रामचन्द्र जी सबसे श्रेष्ठ हैं,
उनके सब कार्यों को आपने सहज में कर दिया।

और मनोरथ जो कोइ लावै, सोई अमित जीवन फल पावै॥28॥
अर्थ-
 जिस पर आपकी कृपा हो, वह कोई भी अभिलाषा करें
तो उसे ऐसा फल मिलता है जिसकी जीवन में कोई सीमा नहीं होती।

चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा॥29॥
अर्थ-
 चारो युगों सतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग में आपका यश फैला हुआ है,
जगत में आपकी कीर्ति सर्वत्र प्रकाशमान है।

साधु सन्त के तुम रखवारे, असुर निकंदन राम दुलारे॥30॥
अर्थ –
 हे श्री राम के दुलारे! आप सज्जनों की रक्षा करते है
और दुष्टों का नाश करते है।

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता॥31॥
अर्थ –
 आपको माता श्री जानकी से ऐसा वरदान मिला हुआ है,
जिससे आप किसी को भी आठों सिद्धियां और नौ निधियां दे सकते है।

अणिमा – जिससे साधक किसी को दिखाई नहीं पड़ता और कठिन से कठिन पदार्थ में प्रवेश कर जाता है।
महिमा – जिसमें योगी अपने को बहुत बड़ा बना देता है।
गरिमा – जिससे साधक अपने को चाहे जितना भारी बना लेता है।
लघिमा – जिससे जितना चाहे उतना हल्का बन जाता है।
प्राप्ति – जिससे इच्छित पदार्थ की प्राप्ति होती है।
प्राकाम्य – जिससे इच्छा करने पर वह पृथ्वी में समा सकता है, आकाश में उड़ सकता है।
ईशित्व – जिससे सब पर शासन का सामर्थ्य हो जाता है।
वशित्व – जिससे दूसरों को वश में किया जाता है।

राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा॥32॥
अर्थ –
 आप निरंतर श्री रघुनाथ जी की शरण में रहते हैं,
जिससे आपके पास बुढ़ापा और असाध्य रोगों के नाश के लिए राम नाम औषधि है।

तुम्हरे भजन राम को पावै, जनम जनम के दुख बिसरावै॥33॥
अर्थ –
 आपका भजन करने से श्री राम जी प्राप्त होते हैं
और जन्म जन्मांतर के दुख दूर होते हैं।

अन्त काल रघुबर पुर जाई, जहां जन्म हरि भक्त कहाई॥34॥
अर्थ –
 अंत समय श्री रघुनाथ जी के धाम को जाते हैं
और यदि फिर भी जन्म लेंगे तो भक्ति करेंगे और श्री राम भक्त कहलाएंगे।

और देवता चित न धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई॥35॥
अर्थ –
 हे हनुमान जी! आपकी सेवा करने से सब प्रकार के सुख मिलते हैं,
फिर अन्य किसी देवता की आवश्यकता नहीं रहती।

संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥36॥
अर्थ –
 हे वीर हनुमान जी! जो आपका सुमिरन करता रहता है,
उसके सब संकट कट जाते हैं और सब पीड़ा मिट जाती हैं।

जय जय जय हनुमान गोसाईं, कृपा करहु गुरु देव की नाई॥37॥
अर्थ –
 हे स्वामी हनुमान जी! आपकी जय हो, जय हो,
जय हो! आप मुझ पर कृपालु श्री गुरु जी के समान कृपा कीजिए।

जो सत बार पाठ कर कोई, छूटहि बंदि महा सुख होई॥38॥
अर्थ –
 जो कोई इस हनुमान चालीसा का सौ बार पाठ करेगा
वह सब बंधनों से छूट जाएगा और उसे परमानन्द मिलेगा।

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा॥39॥
अर्थ –
 भगवान शंकर ने यह हनुमान चालीसा लिखवाया, इसलिए वे साक्षी हैं,
जो इसे पढ़ेगा उसे निश्चय ही सफलता प्राप्त होगी।

तुलसीदास सदा हरि चेरा, कीजै नाथ हृदय मंह डेरा॥40॥
अर्थ –
 हे नाथ हनुमान जी! तुलसीदास सदा ही श्री राम का दास है।
इसलिए आप उसके हृदय में निवास कीजिए।

पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सूरभूप॥
अर्थ –
 हे संकट मोचन पवन कुमार! आप आनंद मंगलों के स्वरूप हैं।
हे देवराज! आप श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण सहित मेरे हृदय में निवास कीजिए।


श्री हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa PDF) को विवाह संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए एक प्रभावी उपाय माना जाता है। हनुमान जी को भक्ति, शक्ति, और समर्पण का प्रतीक माना जाता है, और उनकी उपासना से मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। हनुमान चालीसा का पाठ विशेषकर उन लोगों के लिए बहुत लाभकारी होता है जो विवाह में आ रही बाधाओं, वैवाहिक जीवन में कलह, या दांपत्य जीवन की अन्य समस्याओं से जूझ रहे होते हैं।

विवाह में बाधाओं को दूर करने के लिए:
हनुमान चालीसा का नियमित पाठ करने से विवाह में आ रही बाधाओं को दूर किया जा सकता है। अगर किसी का विवाह नहीं हो पा रहा है या विवाह में देरी हो रही है, तो हनुमान चालीसा का 108 बार पाठ करना अत्यंत फलदायी माना गया है। इसके साथ ही, मंगलवार और शनिवार को विशेष रूप से हनुमान जी की पूजा करने से भी विवाह में आ रही कठिनाइयों का निवारण होता है।

वैवाहिक जीवन में सुख और समृद्धि:
विवाह हो जाने के बाद भी कई बार दंपत्ति के बीच आपसी समझ, सामंजस्य, और प्रेम में कमी आ जाती है, जिसके कारण वैवाहिक जीवन में समस्याएं उत्पन्न होती हैं। हनुमान चालीसा का पाठ इन समस्याओं के समाधान के लिए भी बहुत प्रभावी होता है। जो भी दंपत्ति अपने वैवाहिक जीवन में शांति और सुख चाहते हैं, उन्हें प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए। इससे मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और आपसी संबंधों में मधुरता आती है।

दांपत्य जीवन में कलह का निवारण:
कई बार वैवाहिक जीवन में कलह और विवाद उत्पन्न हो जाते हैं, जिससे दांपत्य जीवन कष्टदायी हो जाता है। ऐसी स्थिति में, हनुमान चालीसा का नियमित पाठ करने से पति-पत्नी के बीच के तनाव और विवाद दूर होते हैं। यह पाठ न केवल मानसिक शांति प्रदान करता है बल्कि जीवन में स्थिरता और संतुलन भी लाता है।

नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा:
हनुमान चालीसा का पाठ नकारात्मक ऊर्जा और बुरी शक्तियों से सुरक्षा प्रदान करता है। अगर किसी के विवाह या वैवाहिक जीवन पर किसी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा या बुरी दृष्टि का प्रभाव हो रहा हो, तो हनुमान चालीसा का नियमित पाठ करने से इन सब से मुक्ति मिलती है। हनुमान जी की कृपा से जीवन में सकारात्मकता आती है और नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव समाप्त हो जाता है।

अन्य लाभ:
हनुमान चालीसा का पाठ न केवल वैवाहिक समस्याओं का समाधान करता है, बल्कि यह जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी सफलता दिलाने वाला माना गया है। यह पाठ आत्मविश्वास को बढ़ाता है, मानसिक शांति देता है, और जीवन में आने वाली हर तरह की समस्याओं से निपटने की शक्ति प्रदान करता है।

हनुमान चालीसा का पाठ करने के लिए किसी विशेष समय या दिन की आवश्यकता नहीं होती है, लेकिन मंगलवार और शनिवार के दिन इसका विशेष महत्व है। हनुमान जी के भक्तों को चाहिए कि वे पूरे श्रद्धा और भक्ति के साथ हनुमान चालीसा का पाठ करें, जिससे उन्हें हनुमान जी की कृपा प्राप्त हो और उनके जीवन की सभी समस्याएं दूर हों।


श्री हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa PDF) को सिद्ध करने के लिए इन अद्यतन चरणों का पालन करें:

  • पवित्रता और शुद्धता: हनुमान चालीसा का पाठ करते समय, शुद्ध और पवित्र जीवन शैली को अपनाना अत्यावश्यक है। दैनिक जीवन में सात्विक आहार, संयम, और स्वच्छता बनाए रखें। इससे आपकी आध्यात्मिक ऊर्जा में वृद्धि होगी और पाठ का प्रभाव अधिक होगा।
  • 108 बार पाठ: हनुमान चालीसा का 108 बार पाठ करना सिद्धि प्राप्ति के लिए अत्यधिक प्रभावशाली माना जाता है। आप एक माला का उपयोग करके 108 बार जप कर सकते हैं। इससे मन की एकाग्रता और भगवान हनुमान की कृपा प्राप्त होती है।
  • 21 दिन की साधना: 21 दिन तक निरंतर हनुमान चालीसा का पाठ करना एक सिद्ध साधना मानी जाती है। इस अवधि में, प्रतिदिन नियमित रूप से चालीसा का पाठ करें। इस साधना के दौरान किसी भी प्रकार की नकारात्मकता से दूर रहें और अपने मन को शुद्ध और स्थिर रखें।
  • मानसिक ध्यान और एकाग्रता: हनुमान चालीसा का पाठ करते समय मन को शांत और ध्यानमग्न रखना आवश्यक है। मानसिक एकाग्रता से पाठ का प्रभाव गहरा होता है और भगवान हनुमान के साथ एक आध्यात्मिक संबंध स्थापित होता है।
  • भक्ति और श्रद्धा: चालीसा का पाठ गहरी भक्ति और श्रद्धा के साथ करें। आपके मन में भगवान हनुमान के प्रति अटूट विश्वास होना चाहिए। इस भक्ति भाव से ही पाठ का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
  • समय का महत्व: हनुमान चालीसा का पाठ सुबह या सूर्यास्त के समय करना विशेष लाभकारी माना जाता है। यह समय आध्यात्मिक ऊर्जा के प्रवाह के लिए उपयुक्त होता है, जिससे पाठ का प्रभाव अधिक होता है।
  • उचित उच्चारण: हनुमान चालीसा का पाठ करते समय सही उच्चारण का ध्यान रखें। शब्दों के सही उच्चारण से मंत्र की शक्ति बढ़ती है और भगवान हनुमान की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है।

इन सभी चरणों का पालन करके, आप हनुमान चालीसा का सिद्ध पाठ कर सकते हैं और भगवान हनुमान से अपार कृपा प्राप्त कर सकते हैं। नियमित और समर्पित साधना से ही सच्ची सिद्धि प्राप्त होती है।


मनुष्य को इस संसार का श्रेष्ठ प्राणी माना जाता है, और इसके पीछे का कारण उसके विशिष्ट गुण हैं जो उसे अन्य प्राणियों से अलग करते हैं। इन गुणों के कारण ही मनुष्य ने समाज में एक विशेष स्थान प्राप्त किया है और अपने जीवन को सफल बनाया है। जब वह समाज में रहता है, तो एक सामाजिक प्राणी के रूप में उसमें कुछ विशिष्ट गुणों का होना आवश्यक है। इन्हीं गुणों के बल पर वह समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। समाजिक व्यवहार की दृष्टि से, विनम्रता को मानवता का प्रतीक माना गया है, और यही बात श्री हनुमान चालीसा में बार-बार बताई गई है।

मनुष्य, विद्या और ज्ञान से संपन्न होने के साथ-साथ प्रभावशाली भी बन जाता है। ऐसा प्रभावशाली व्यक्ति समाज में सभी का प्रिय होता है, और हर कोई उसकी प्रशंसा और सम्मान करता है। जिन व्यक्तियों में यह गुण नहीं होता, वे समाज में उपेक्षित होते हैं, और लोग उनके साथ निकटता का संबंध बनाने से कतराते हैं।

विनम्रता एक अद्वितीय गुण है, जिसे भारतीय धर्मग्रंथों में विस्तार से वर्णित किया गया है। भगवान विष्णु स्वयं इसके सबसे बड़े प्रमाण हैं। एक बार, भृगु मुनि ने आवेश में आकर भगवान विष्णु की छाती पर पैर मारा। परंतु विष्णु भगवान ने क्रोध नहीं किया, बल्कि उनके पैर पकड़कर विनम्रता से पूछा, “हे ऋषि! क्या आपके पैर में चोट लगी?”

भगवान विष्णु की इस विनम्रता ने भृगु मुनि को शर्मिंदा कर दिया। इससे हमें सीख मिलती है कि विनम्रता क्रोध के आवेग को तुरंत समाप्त कर देती है। यह अनावश्यक उत्तेजना और क्रोध से बचाव करती है और हमें परेशानियों में पड़ने से बचाती है।

हमारी भारतीय संस्कृति भी सदैव विनम्रता से परिपूर्ण रही है। इसे विद्वानों और सज्जनों का सर्वोत्तम गुण माना जाता है। हमारे कई ऋषि-मुनियों को विनम्रता के अभाव में गलत आचरण करते देखा गया है। अपने क्रोध और अहंकार के कारण, उन्होंने समाज में नकारात्मक प्रभाव छोड़ा और लोगों की घृणा का पात्र बने। वहीं, अपनी विनम्रता के बल पर कई लोग इतिहास में अमर हो गए।

एक विनम्र व्यक्ति सदैव आदर और सम्मान का पात्र होता है। सभी उसकी सज्जनता की प्रशंसा करते हैं और वह सबके स्नेह का पात्र बनता है। चाहे स्त्री हो या पुरुष, विनम्रता लोक-व्यवहार में निपुणता का एक मानदंड होती है।

हमने अपने आस-पास कई ऐसे लोगों को देखा है जो शान और अकड़ दिखाते हैं। ऐसे लोग अपने आप पर गर्व और अहंकार करते हैं। वे दूसरों के अभिवादन का उत्तर देना भी उचित नहीं समझते। उनका मानना होता है कि ऐसा करने से उनकी प्रतिष्ठा पर आंच आएगी। उनका व्यवहार, बातचीत का ढंग भी लोगों को आहत करता है, और परिणामस्वरूप लोग उनसे दूरी बनाने लगते हैं।

“जब कोई व्यक्ति किसी के बारे में कुछ कहता है, तो समझ लीजिए कि वह आपके बारे में भी वैसी ही बातें कह सकता है।”

इस प्रकार के व्यक्तियों से सतर्क रहें, क्योंकि वे आपकी निंदा भी उसी तरह कर सकते हैं। सदैव ध्यान रखें कि किसी की परेशानी का मजाक उड़ाना, या किसी के शारीरिक दोष पर कटाक्ष करना अनुचित है। ऐसा आचरण आपको समाज में कभी भी सम्मान नहीं दिला सकता। इसलिए, विनम्रता को अपनाइए और समाज में सम्मान और प्रशंसा के पात्र बनिए। अपने बड़ों का आदर करें और उनसे विनम्रता से पेश आएं। ऐसा करने से आप उनके स्नेह और आदर के पात्र बन जाएंगे।

विनम्रता अपनाने में आपका कुछ खर्च नहीं होता, और आप आसानी से इस गुण को अपने जीवन में अपना सकते हैं। यदि आप योग्य हैं, धनी हैं, स्वस्थ हैं, सुंदर हैं, तो विनम्रता आपके व्यक्तित्व में और भी अधिक आकर्षण जोड़ देगी। आप समाज में और अधिक लोकप्रिय बन सकते हैं और सभी का स्नेह प्राप्त कर सकते हैं।

जिनमें विनम्रता का अभाव होता है, वे बड़े अभिमानी होते हैं। आपने देखा होगा कि कुछ लोग अपने धन, शरीर, या विशेष गुणों पर गर्व करते हैं। महिलाओं में यह दोष अधिक पाया जाता है। कोई विशिष्ट पद प्राप्त कर लेने पर, उनमें अहंकार आ जाता है।

घर में कोई महंगी वस्तु आ जाने पर, वे पड़ोसियों के सामने अपनी शान बघारने लगती हैं, और दूसरों को हेय दृष्टि से देखने लगती हैं। इस प्रकार का व्यवहार उन्हें उनके पड़ोसियों के स्नेह से वंचित कर देता है।

यदि वे अपने पड़ोसियों से विनम्रता से पेश आतीं, तो वे सदैव उनके सुख-दुख में उनके साथ होते, और कहते – “देखो, उसके घर में भगवान का दिया सब कुछ है, लेकिन उसके व्यवहार में आज भी मिठास है, अहंकार ने उसे नहीं छुआ है।”

याद रखें, जब व्यक्ति के स्वभाव में अहंकार प्रवेश कर जाता है, तो वह समाज में अलोकप्रिय हो जाता है। अभिमान आपके मन रूपी घर को हमेशा खाली ही रखता है।


हनुमान चालीसा पढ़ने के फायदे

श्री हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa PDF) का नियमित पाठ करने से मानसिक शांति मिलती है और तनाव दूर होता है। यह भक्तों को आत्मविश्वास और साहस प्रदान करता है। हनुमानजी की कृपा से शत्रुओं का नाश होता है और बुरी शक्तियों से रक्षा होती है। इसके अलावा, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। कहा जाता है कि इससे घर में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है। यह भक्तों को भगवान हनुमान के प्रति भक्ति और श्रद्धा को मजबूत करता है।

  • मानसिक शांति: हनुमान चालीसा का नियमित पाठ आपके मन को शांति और स्थिरता प्रदान करता है।
  • आध्यात्मिक शक्ति: यह पाठ आपकी आध्यात्मिक ऊर्जा को बढ़ाता है और जीवन में सकारात्मकता लाता है।
  • नकारात्मकता का नाश: हनुमान चालीसा के पाठ से नकारात्मक ऊर्जा और बुरी शक्तियाँ दूर होती हैं।
  • स्वास्थ्य लाभ: शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार के लिए हनुमान चालीसा का पाठ बेहद लाभकारी माना जाता है।
  • संकटों से मुक्ति: जीवन में आने वाली कठिनाइयों और संकटों से निजात पाने में हनुमान चालीसा मददगार होता है।
  • भक्ति और श्रद्धा: भगवान हनुमान के प्रति भक्ति और श्रद्धा में वृद्धि होती है।

हनुमान चालीसा कब पढ़े

श्री हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa PDF) का पाठ सुबह और शाम को करना सबसे उत्तम माना जाता है। ब्रह्म मुहूर्त में इसका पाठ विशेष फलदायी होता है। इसके अलावा, मंगलवार और शनिवार को हनुमानजी की विशेष पूजा की जाती है, इसलिए इन दिनों में भी हनुमान चालीसा का पाठ करना शुभ माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत में हनुमान चालीसा पढ़ना भी लाभकारी होता है।

हनुमान चालीसा पढ़ने से पहले क्या सावधानी बरतें

हनुमान चालीसा पढ़ने से पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। शुद्ध और शांत मन से इसका पाठ करें। पाठ करते समय भगवान हनुमान की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक जलाएं और सुगंधित अगरबत्ती का उपयोग करें। पाठ के समय मन को एकाग्र रखें और ध्यान भटकने न दें। इस दौरान किसी प्रकार की नकारात्मकता को मन में न आने दें।

हनुमान चालीसा क्या लड़कियाँ भी पढ़ सकती हैं

हाँ, हनुमान चालीसा लड़कियाँ भी पढ़ सकती हैं। इसमें कोई भेदभाव नहीं है। भगवान हनुमान अपने भक्तों की सभी इच्छाओं को पूरा करते हैं, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष। महत्वपूर्ण यह है कि पाठ श्रद्धा और भक्ति भाव से किया जाए।

हनुमान चालीसा मंदिर पढ़ना सही होता है या घर में

श्री हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa PDF) का पाठ मंदिर और घर, दोनों जगह किया जा सकता है। मंदिर में पाठ करने से सामूहिक ऊर्जा का लाभ मिलता है, जबकि घर में पाठ करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और शांति का माहौल बनता है। जहां भी पाठ करें, स्थान को पवित्र और शांत रखें।

हनुमान चालीसा पढ़ने के बाद क्या करें

श्री हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa PDF) पढ़ने के बाद भगवान हनुमान के चरणों में नमन करें और उनकी आरती उतारें। उन्हें भोग अर्पित करें और प्रसाद ग्रहण करें। इसके बाद भगवान का धन्यवाद करें और प्रार्थना करें कि वे आपके जीवन में सुख, शांति, और समृद्धि प्रदान करें।

हनुमान चालीसा पढ़ने से पहले भोग लगाएं या बाद में

भोग का अर्पण हनुमान चालीसा पढ़ने के बाद करना उचित माना जाता है। पाठ के बाद भगवान हनुमान को भोग अर्पित करें और फिर प्रसाद ग्रहण करें। इससे भगवान हनुमान की कृपा जल्दी प्राप्त होती है।

हनुमान चालीसा क्या रोज पढ़ सकते हैं

हाँ, हनुमान चालीसा का पाठ रोज किया जा सकता है। रोजाना पाठ करने से भगवान हनुमान की कृपा प्राप्त होती है और सभी बाधाएं दूर होती हैं। इसका नियमित पाठ जीवन में सकारात्मक बदलाव लाता है और भक्त को आंतरिक शांति प्रदान करता है।

हनुमान चालीसा को 7 बार पढ़ने का क्या महत्व है?

हनुमान चालीसा को 7 बार पढ़ने का विशेष महत्व है। इसे पढ़ने से विशेष समस्याओं का समाधान होता है और भगवान हनुमान की कृपा जल्दी प्राप्त होती है। कहा जाता है कि 7 बार पाठ करने से शत्रुओं का नाश होता है और भक्त की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

क्या हनुमान चालीसा को रोज़ाना पढ़ा जा सकता है?

हाँ, हनुमान चालीसा को रोज़ाना पढ़ा जा सकता है। नियमित पाठ से भगवान हनुमान की कृपा बनी रहती है और सभी बाधाएं दूर होती हैं। यह भक्त को आंतरिक शांति और मानसिक शक्ति प्रदान करता है।

तुलसीदास ने हनुमान चालीसा कैसे लिखी थी?

तुलसीदास ने हनुमान चालीसा का रचना भगवान हनुमान की महिमा का वर्णन करने के लिए की थी। कहा जाता है कि उन्हें स्वयं भगवान हनुमान की प्रेरणा से यह चालीसा लिखी। इसमें भगवान हनुमान के गुण, उनकी शक्ति और उनके भक्तों के प्रति उनकी कृपा का वर्णन किया गया है।

हनुमान चालीसा किस पुस्तक में लिखी गई है?

श्री हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa PDF) गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित ‘रामचरितमानस’ में शामिल है। यह चालीसा भगवान हनुमान की महिमा का गुणगान करती है और रामायण के विभिन्न प्रसंगों का भी वर्णन करती है।

हनुमान चालीसा का कैसे प्रयोग करें

श्री हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa PDF) का प्रयोग भगवान हनुमान की कृपा प्राप्त करने और समस्याओं का समाधान पाने के लिए किया जाता है। इसे श्रद्धा और भक्ति से पढ़ें। विशेष अवसरों पर, जैसे संकट के समय, परीक्षा या महत्वपूर्ण कार्य से पहले इसका पाठ करें। इसे पढ़ने से पहले और बाद में भगवान हनुमान का स्मरण करें और उनकी आराधना करें।


हनुमान चालीसा हिंदू धर्म में एक अत्यंत पूजनीय स्तोत्र है, जो लाखों लोगों के दिलों में एक विशेष स्थान रखता है। 16वीं शताब्दी में महान संत और कवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित यह चालीस चौपाइयों का भक्ति स्तोत्र भगवान हनुमान को समर्पित है, जो भक्ति, शक्ति और निःस्वार्थ सेवा के प्रतीक हैं। अवधी भाषा में लिखी गई हनुमान चालीसा न केवल एक साहित्यिक उत्कृष्ट कृति है, बल्कि एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक भी है, जो आंतरिक शांति और दिव्य आशीर्वाद की खोज में लगे भक्तों को प्रेरणा देती है। इसकी काव्यात्मक लय और गहन अर्थ इसे सभी आयु और पृष्ठभूमि के लोगों के लिए सुलभ बनाते हैं, जिससे यह भक्तों और भगवान के बीच एक गहरा संबंध स्थापित करती है।

हनुमान चालीसा की सार्वभौमिक लोकप्रियता का मुख्य कारण इसमें भय से मुक्ति और सुरक्षा का वादा है। प्रत्येक चौपाई हनुमान जी के गुणों की महिमा गाती है, जिनमें उनकी असीमित शारीरिक शक्ति, भगवान राम के प्रति अडिग भक्ति और अद्वितीय साहस शामिल हैं। हनुमान चालीसा का पाठ करने से हनुमान जी की कृपा प्राप्त होती है, जो भक्तों को नकारात्मक प्रभावों से बचाते हैं और जीवन की कठिनाइयों को पार करने की शक्ति प्रदान करते हैं। इस स्तोत्र की सरलता और शक्ति इसे कई लोगों की दैनिक प्रार्थना का अभिन्न हिस्सा बनाती है, जिससे उन्हें सांत्वना और आत्मबल मिलता है।

आध्यात्मिक महत्व के अलावा, हनुमान चालीसा के मनोवैज्ञानिक लाभ भी अत्यंत गहरे हैं। शोध बताते हैं कि इस स्तोत्र का पाठ या श्रवण तनाव और चिंता को कम कर सकता है, मन को शांत कर एक ध्यानात्मक अवस्था उत्पन्न करता है। इसके नियमित पाठ से मानसिक स्पष्टता और भावनात्मक संतुलन प्राप्त होता है। भक्ति और मानसिक स्वास्थ्य का यह अनूठा संयोजन हनुमान चालीसा को समयातीत बनाता है, जो धार्मिक सीमाओं को पार कर उन लोगों को भी आकर्षित करता है जो समग्र रूप से कल्याण की खोज में हैं।

हनुमान चालीसा की वैश्विक मान्यता निरंतर बढ़ रही है, और इसे कई भाषाओं में अनुवाद और व्याख्या के माध्यम से सराहा जा रहा है। इसकी अनुकूलता इसे आधुनिक समय में भी प्रासंगिक बनाती है, जहां आंतरिक शक्ति और शांति की आवश्यकता पहले से अधिक महत्वपूर्ण है। चाहे इसे एकांत में पढ़ा जाए या सामूहिक भजन में, हनुमान चालीसा प्राचीन भक्ति की बुद्धिमत्ता को आधुनिक जीवन में साहस और आशा की आवश्यकता के साथ जोड़ती है। इसके छंदों में भक्तों को न केवल हनुमान जी की स्तुति मिलती है, बल्कि उद्देश्य, साहस और अडिग विश्वास से भरा जीवन जीने का मार्ग भी मिलता है।


Hanuman Ji, a revered figure in Hindu mythology, is celebrated for his devotion, strength, and bravery. Here’s a closer look at his story:

Devotion to Rama: Hanuman’s unwavering loyalty to Lord Rama is the foundation of his legend. His dedication to Rama, who is an incarnation of Lord Vishnu, is profound and central to his identity. Hanuman never wavers in his service, constantly offering his strength and abilities to help Rama in times of need.

Role in the Ramayana: Hanuman’s role in the Ramayana, one of the most important Hindu epics, is pivotal. He assists Lord Rama in his quest to rescue Sita, Rama’s wife, from the demon king Ravana. Hanuman’s courage, intelligence, and extraordinary powers come to the fore, particularly when he leaps across the ocean to find Sita in Lanka, delivering Rama’s message and offering her hope.

Symbol of Strength and Devotion: Hanuman is the embodiment of strength, devotion, and perseverance. He is often depicted as a muscular figure, symbolizing his physical power, while his unwavering commitment to Rama highlights his spiritual strength. Hanuman’s character teaches the virtues of selfless service, devotion, and humility.

Powers and Qualities: Hanuman is endowed with many supernatural abilities, such as immense strength, the power of flight, and the ability to change his size at will. His intelligence and quick thinking also make him a great strategist. He uses these powers for the benefit of others, especially in the service of Lord Rama. His ability to overcome obstacles and help those in need makes him a beloved figure.

Worship: Hanuman is widely worshipped in Hindu temples across India and beyond. He is often revered for his ability to protect devotees from harm, grant strength, and fulfill wishes. Temples dedicated to Hanuman are abundant, where people pray for physical strength, mental fortitude, and the removal of obstacles in their lives.

Cultural Significance: Hanuman’s influence goes beyond Hinduism. His story is also revered in other parts of Asia, including Buddhist traditions. The lessons drawn from his life resonate across cultures, teaching the values of loyalty, selflessness, and strength. Hanuman’s image as a protector and source of divine strength makes him a universal symbol of courage.


1. असली हनुमान चालीसा क्या है?

असली हनुमान चालीसा वह है जिसे गोस्वामी तुलसीदास जी ने 16वीं शताब्दी में रचा था। यह चालीसा 40 चौपाइयों का संग्रह है, जिसमें भगवान हनुमान की महिमा, उनके गुण, और उनके पराक्रम का वर्णन किया गया है। हनुमान चालीसा को सही तरीके से पढ़ने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और भगवान हनुमान की कृपा प्राप्त होती है। इसे भगवान हनुमान के भक्तों द्वारा श्रद्धा और भक्ति के साथ नियमित रूप से पढ़ा जाता है।

2. 1 दिन में हनुमान चालीसा कितनी बार पढ़नी चाहिए?

हनुमान चालीसा पढ़ने की संख्या व्यक्ति की श्रद्धा और समय के अनुसार भिन्न हो सकती है। आमतौर पर, इसे दिन में एक बार पढ़ना पर्याप्त माना जाता है। लेकिन अगर कोई विशेष संकट या इच्छा की पूर्ति के लिए पढ़ता है, तो इसे दिन में 3, 5, 7, या 11 बार भी पढ़ा जा सकता है। अधिक बार पढ़ने से मानसिक शांति, साहस, और भगवान हनुमान की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है।

3. क्या मैं अपने बिस्तर पर हनुमान चालीसा पढ़ सकता हूं?

हाँ, आप अपने बिस्तर पर हनुमान चालीसा पढ़ सकते हैं, लेकिन इसे करते समय शुद्ध मन और पूरी श्रद्धा होनी चाहिए। अगर आप अस्वस्थ हैं या किसी विशेष स्थिति में हैं, तो बिस्तर पर भी हनुमान चालीसा का पाठ किया जा सकता है। ध्यान रहे कि इसे पढ़ते समय आपका मन भगवान हनुमान की भक्ति में केंद्रित हो और वातावरण में शांति हो।

4. हनुमान चालीसा कब नहीं पढ़ना चाहिए?

हनुमान चालीसा का पाठ किसी भी समय किया जा सकता है, लेकिन यह माना जाता है कि शुद्धता का ध्यान रखना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार, हनुमान चालीसा का पाठ भोजन के तुरंत बाद, रात के समय बिना स्नान किए, या अशुद्ध अवस्था में नहीं करना चाहिए। पवित्रता बनाए रखने और भगवान हनुमान की कृपा पाने के लिए स्नान के बाद, साफ वस्त्र पहनकर, और शुद्ध मन से हनुमान चालीसा का पाठ करना श्रेष्ठ माना गया है।

5. हनुमान चालीसा में क्या गलती है?

हनुमान चालीसा के श्लोकों में कोई गलती नहीं है। हालांकि, कुछ स्थानों पर अलग-अलग प्रचलित संस्करणों में शब्दों का अंतर देखने को मिलता है। यह भिन्नता पाठकों के उच्चारण, भाषा और क्षेत्रीय प्रभाव के कारण हो सकती है। इसलिए, हनुमान चालीसा पढ़ते समय सही उच्चारण और शुद्धता का ध्यान रखना आवश्यक है। इसके लिए तुलसीदास जी द्वारा लिखित मूल चालीसा का अनुसरण करना सबसे उपयुक्त है।

6. हनुमान चालीसा की शक्ति क्या है?

हनुमान चालीसा की शक्ति अत्यंत प्रभावशाली मानी जाती है। इसके नियमित पाठ से व्यक्ति के जीवन में शांति, सुरक्षा, और समृद्धि आती है। हनुमान चालीसा भगवान हनुमान की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने का सशक्त माध्यम है। इसका पाठ करने से भय, रोग, और संकट दूर होते हैं और मानसिक बल में वृद्धि होती है। इसके अलावा, हनुमान चालीसा का पाठ साधक को आत्मिक शुद्धता, साहस, और सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जाओं से मुक्ति दिलाता है।

7. हनुमान चालीसा कैसे डाउनलोड करें

दोस्तों यहाँ हमने हनुमान चालीसा PDF की फाइल दी हुई है। आप सिंगल क्लिक से डाउनलोड कर सकते है।

8. सबसे अच्छा हनुमान चालीसा कौन सा है?

हनुमान चालीसा के सभी संस्करण समान रूप से प्रभावी और पवित्र हैं, क्योंकि वे मूल रूप से गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित हैं। आपको वही संस्करण चुनना चाहिए जो आपको आसानी से समझ में आए और जिससे आप भावनात्मक रूप से जुड़ सकें।

9. रोज 7 बार हनुमान चालीसा पढ़ने से क्या होता है?

रोजाना 7 बार हनुमान चालीसा का पाठ करने से हनुमान जी की कृपा प्राप्त होती है। यह आपके जीवन से नकारात्मकता और भय को दूर करता है, मानसिक शांति प्रदान करता है और आपको आत्मविश्वास से भर देता है। यह साधना विशेष रूप से बाधाओं को दूर करने और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए फलदायी मानी जाती है।

10. सुबह 4:00 बजे हनुमान चालीसा पढ़ने से क्या होता है?

सुबह 4:00 बजे ब्रह्म मुहूर्त का समय होता है, जो आध्यात्मिक साधना के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। इस समय हनुमान चालीसा का पाठ करने से मानसिक शांति, ध्यान की गहराई और आध्यात्मिक ऊर्जा में वृद्धि होती है। यह समय ईश्वर से जुड़ने के लिए आदर्श होता है, और इससे दिन भर के लिए सकारात्मकता और ऊर्जा प्राप्त होती है।

11. 21 दिनों के लिए हनुमान पूजा क्या है?

21 दिनों की हनुमान पूजा एक विशेष साधना है, जिसमें भक्त 21 दिनों तक हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं और भगवान हनुमान को श्रद्धा और समर्पण के साथ पूजा अर्पित करते हैं। इसे किसी विशेष मनोकामना की पूर्ति या बाधाओं को दूर करने के लिए किया जाता है। इस साधना के दौरान भक्त नियमों का पालन करते हैं, जैसे ब्रह्मचर्य, शुद्ध आहार और नियमित पूजा। 21 दिनों के इस अनुष्ठान से हनुमान जी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

Hanuman चालीसा इन हिंदी PDF कहाँ से डाउनलोड करें?

अगर आप Hanuman चालीसा इन हिंदी pdf ढूंढ़ रहे हैं, तो आप सही जगह पर आए हैं। हनुमान चालीसा एक लोकप्रिय हिंदू भजन है, जिसकी रचना गोस्वामी तुलसीदास जी ने की थी। यह भक्ति-पाठ भगवान हनुमान जी की स्तुति में लिखा गया है और इसे हिंदी में पढ़ने का एक बहुत ही प्रभावशाली तरीका है उनके आशीर्वाद प्राप्त करने का।

डाउनलोड कैसे करें:
Hanuman चालीसा इन हिंदी pdf डाउनलोड करने के लिए, आप विश्वसनीय वेबसाइट्स जैसे कि Chalisa-pdf.com का उपयोग कर सकते हैं। इन साइट्स पर आपको मुफ्त और शुद्ध हिंदी में पीडीएफ फॉर्मेट में हनुमान चालीसा उपलब्ध मिल जाएगी।

उपयोग कैसे करें:
डाउनलोड की गई PDF को आप अपने मोबाइल, टैबलेट या कंप्यूटर पर सेव कर सकते हैं और कभी भी, कहीं भी इसका पाठ कर सकते हैं। यह विशेष रूप से यात्रा के समय या रोजाना पूजा में बहुत उपयोगी होता है।

मैं हनुमान चालीसा हिंदी में PDF कहाँ से डाउनलोड कर सकता हूँ?

आप हनुमान चालीसा हिंदी में PDF फ्री में डाउनलोड करने के लिए https://www.chalisa-pdf.com पर जा सकते हैं। वहाँ उच्च गुणवत्ता में स्कैन की गई हिंदी में चालीसा उपलब्ध है।

क्या मुझे hanuman चालीसा इन हिंदी PDF फॉर्मेट में इस वेबसाइट से मिल सकती है?

जी हाँ, आप hanuman चालीसा इन हिंदी PDF फॉर्मेट में chalisa-pdf.com से आसानी से डाउनलोड कर सकते हैं। यह वेबसाइट भक्तों के लिए सरल और साफ फॉर्मेट में PDF उपलब्ध कराती है।

हनुमान चालीसा पीडीएफ फाइल डाउनलोड करने की प्रक्रिया क्या है?

हनुमान चालीसा पीडीएफ फाइल डाउनलोड करने के लिए आपको बस https://www.chalisa-pdf.com पर जाकर संबंधित लिंक पर क्लिक करना है और आपकी फाइल तुरंत डाउनलोड हो जाएगी।

Can beginners recite Hanuman Chalisa?

Yes, beginners can absolutely recite the Hanuman Chalisa. It is a powerful and revered devotional hymn composed by the saint-poet Tulsidas in the 16th century, written in the Awadhi language.
The Hanuman Chalisa is accessible to anyone with a genuine desire to connect spiritually with Lord Hanuman, regardless of their background, level of knowledge, or experience in Hindu rituals. In fact, many people begin their spiritual journey by chanting or listening to the Hanuman Chalisa due to its simplicity, rhythm, and profound spiritual benefits.

For beginners, it is not necessary to know Sanskrit or have in-depth knowledge of Hindu scriptures. The verses can be learned gradually, and there are many transliterations and translations available to aid understanding. One does not need to worry about pronunciation in the early stages; devotion and sincerity are far more important than perfect enunciation. Over time, with regular recitation, familiarity with the verses and their meanings deepens naturally.

Moreover, Hanuman is often regarded as the epitome of devotion, humility, and strength. Devotees believe he is compassionate and quick to respond to sincere prayers, especially from those who approach him with a pure heart. Beginners often report feeling a sense of peace, protection, and growing confidence after reciting the Chalisa regularly. It’s also common for parents to encourage children to start reciting it from a young age to instill spiritual values and emotional strength.

There is no rigid requirement for a beginner to follow any elaborate rituals before chanting. Simple cleanliness, a calm mindset, and respect for the process are enough. Sitting quietly in a clean space, lighting a small lamp if possible, and focusing attention on Lord Hanuman while reciting the verses can be very effective.

Over time, reciting the Hanuman Chalisa becomes not just a spiritual act but also a meditative and calming daily habit. So yes, beginners are more than welcome to start their journey with this sacred hymn.

What is the best time to chant Hanuman Chalisa?

chanted at any time of the day, traditionally, the early morning hours at Brahma Muhurta (approximately 4:00 a.m. to 6:00 a.m.) and in the evening around sunset are considered most auspicious. Chanting during these times is believed to enhance its spiritual potency because these are calm and spiritually charged parts of the day when the mind is more focused and the environment is quieter.

Morning chanting helps set a positive tone for the day. It instills strength, clarity, and devotion, and is often associated with invoking the protective and purifying aspects of Lord Hanuman. Evening recitations, especially after sunset on Tuesdays and Saturdays (which are considered especially significant days for Hanuman worship), are believed to cleanse the mind of the day’s stress, fears, and negative energies.

However, the beauty of the Hanuman Chalisa lies in its flexibility. If someone cannot manage early morning or evening recitations, they can still benefit from chanting at any time that suits their schedule—whether during a break at work, during a walk, or before bedtime. The key is to maintain sincerity, focus, and regularity. Even listening to the Chalisa during daily chores or while commuting can have a calming and spiritually uplifting effect.

Many devotees choose specific days—such as Tuesdays and Saturdays—as their preferred days for more intense recitation, often repeating the Chalisa 11, 21, or even 108 times on these days for specific purposes such as protection, health, or spiritual growth.

Ultimately, there is no “wrong” time to chant the Hanuman Chalisa. What matters most is the mindset and intention behind the recitation. Lord Hanuman is believed to be ever-present and compassionate, especially toward those who seek his blessings with genuine faith and devotion. So, while there are recommended times, the best time is when one can chant with focus and heartfelt dedication.

Is there a specific number of times to recite it?

The Hanuman Chalisa can be recited as many times as one feels comfortable, but traditionally, specific numbers are often followed by devotees for spiritual discipline and focused intentions. A single recitation takes about 10 minutes and is commonly done daily. However, many people choose to repeat it 3, 7, 11, 21, or 108 times in one sitting, especially during challenging times, festivals, or for specific spiritual benefits.

Reciting the Hanuman Chalisa once daily is believed to offer protection, peace of mind, and strength. Three times a day (morning, noon, and night) is ideal for those who wish to deepen their practice and maintain continuous spiritual connection throughout the day. Eleven recitations are often performed for warding off obstacles and negative energies, while 21 times is believed to invoke strong blessings for resolving persistent issues.

For major spiritual efforts or specific wishes, devotees sometimes perform 108 recitations, often done over one or several days. Chanting the Chalisa 108 times is considered highly sacred, mirroring the spiritual significance of the number 108 in Hinduism, which represents the universe’s wholeness. Some do it in group settings, such as temples or during special prayer gatherings, particularly on Tuesdays or Hanuman Jayanti (the birthday of Lord Hanuman).

However, it’s important to note that the number of recitations should not become a mere ritualistic goal. The intention, focus, and devotion behind the chant matter much more than the count. Beginners can start with one or three times a day and gradually build up. Using a mala (rosary) of 108 beads can help keep count without distraction.

Ultimately, there’s no mandatory requirement for the number of times. Devotees are encouraged to chant according to their capacity, with sincerity and without pressure. Hanuman is known for his loving response to even a single heartfelt chant, so whether it’s once or 108 times, what counts most is the faith and love with which it is offered.

Can Hanuman Chalisa help with anxiety or fear?

Yes, many devotees believe that regularly reciting the Hanuman Chalisa can significantly help with anxiety, fear, and emotional stress. The hymn’s powerful verses glorify the strength, courage, and divine energy of Lord Hanuman, who is known in Hindu tradition as a protector and remover of fear. The recitation acts not only as a spiritual shield but also as a form of meditation that soothes the mind and calms the nervous system.

Each line of the Chalisa contains vibrations that, when spoken or heard with devotion, can create a sense of reassurance and stability. For those suffering from anxiety, the rhythmic chanting or listening to the Chalisa can provide a grounding effect, helping to shift the mind away from fear-driven thoughts and into a space of trust and surrender. The repetition itself can be therapeutic, functioning like a mantra that distracts from negative spirals and anchors the mind in something positive.

Many lines within the Chalisa directly invoke protection against ghosts, negative forces, and internal doubts. For example, the line “Bhoot pishach nikat nahi aave, Mahaveer jab naam sunave” implies that all evil, including negative thoughts or energies, will vanish when the name of the mighty Hanuman is spoken. This is particularly comforting to those experiencing fear, especially at night or during times of emotional vulnerability.

Additionally, Lord Hanuman is regarded as the embodiment of devotion and humility. Connecting with him through the Chalisa can instill a sense of inner strength and divine support. For individuals who struggle with loneliness, low confidence, or panic attacks, this devotional practice can become a powerful psychological and emotional anchor.

While the Hanuman Chalisa is not a substitute for professional help in cases of chronic anxiety, it can be a supportive tool alongside therapy or other treatments. Its uplifting energy, spiritual protection, and rhythmic repetition offer a safe and sacred space to turn to during moments of inner turmoil.

Is it okay to read it in English or other translations?

Yes, it is perfectly okay to read the Hanuman Chalisa in English or other translations if one is not fluent in the original Awadhi or Hindi. The essence of spiritual practice lies in the sincerity of devotion, not the language used. Lord Hanuman, as a divine being, responds to the heartfelt prayers of his devotees regardless of the tongue they speak.

Reading the Chalisa in a language you understand can actually deepen your connection to its meaning and spiritual significance.

For many non-Hindi speakers or new devotees, reading the Chalisa in English (or their native language) helps them comprehend the values, stories, and qualities of Lord Hanuman being described. This understanding strengthens faith and makes the practice more mindful rather than mechanical. There are many excellent translations available that retain the poetic structure and spiritual intent of the original verses.

Some devotees prefer to read the English version alongside the original, which allows them to both pronounce the traditional text and understand it simultaneously. Others alternate between versions depending on their mood or purpose. For example, one may read the English translation for study and understanding, then chant the original verses for devotion.

It is also common to sing or recite the Chalisa in a transliterated format—where the Hindi sounds are written using English alphabets. This is especially helpful for those who wish to chant the original sounds but are unfamiliar with Devanagari script. As long as the recitation is done with reverence and intention, any format is spiritually beneficial.

Ultimately, what matters most is your devotion, faith, and consistency. Language is merely a medium, and the divine energy invoked through the Hanuman Chalisa transcends all linguistic boundaries. Whether chanted in English, Tamil, Telugu, Bengali, or any other language, the power of the Chalisa remains

Where can I find Hanuman Chalisa in PDF format for free?

You can easily download Hanuman Chalisa in PDF from Chalisa PDF. The website provides clear, easy-to-read versions in Hindi and English. Many devotees prefer PDF format because it can be saved on mobile, tablet, or laptop for daily recitation without carrying a book.

Is the Hanuman Chalisa in PDF available in Hindi as well as English?

Yes, both versions are available. If you want the authentic Hindi text or the English transliteration, you’ll find reliable options at Chalisa PDF.

Can I download Hanuman Chalisa MP3 sung by Gulshan Kumar from Gaana?

While many music apps like Gaana and YouTube host versions of the Hanuman Chalisa, devotees searching for Hanuman Chalisa MP3 download Gulshan Kumar can also find resources and related links at Chalisa PDF. It’s always good to listen while also keeping a text version handy for chanting.

Why is Gulshan Kumar’s Hanuman Chalisa so popular?

Gulshan Kumar’s soulful recitation has touched millions of devotees. His voice adds devotion and calmness, making the prayer experience more spiritual. You can pair the MP3 listening with a written Hanuman Chalisa in PDF to follow along easily.

How do I download Hanuman Chalisa for offline reading?

Simply visit Chalisa PDF and select the option for Hanuman Chalisa download. The file is lightweight, mobile-friendly, and works without internet once saved.

Why should I download Hanuman Chalisa instead of just reading online?

Downloading gives you quick offline access. Many devotees like to recite early in the morning or while traveling, and with a Hanuman Chalisa download from Chalisa PDF, you can pray without relying on internet connectivity.

क्या मैं हनुमान चालीसा pdf ऑनलाइन डाउनलोड कर सकता हूँ?

हाँ, आप आसानी से Chalisa PDF से हनुमान चालीसा pdf मुफ्त में डाउनलोड कर सकते हैं। यह स्पष्ट और शुद्ध पाठ उपलब्ध कराता है, जिसे मोबाइल या कंप्यूटर पर कहीं भी पढ़ा जा सकता है।

हनुमान चालीसा pdf पढ़ने के क्या लाभ हैं?

हनुमान चालीसा का पाठ मन को शांति देता है और भय दूर करता है। अगर आपके पास हनुमान चालीसा pdf सेव है, तो आप कभी भी, कहीं भी इसका पाठ कर सकते हैं। इसे Chalisa PDF से तुरंत डाउनलोड करना सबसे आसान तरीका है।


Shiv Chalisa PDF Download | Hindi Lyrics with Meaning & Benefits

Introduction to Shiv Chalisa

शिव चालीसा pdf (Shiv Chalisa PDF) भोलेनाथ सभी देवों में सबसे प्रिय देव महादेव हैं। उनकी पूजा करने का एक सरल तरीका है शिव चालीसा का पाठ करना। शिव चालीसा में 40 छंद हैं। इसकी शुरुआत श्री पावर्ती के पुत्र गणेश को याद करके की जाती है और महाकाल भोलेनाथ के कई दिव्य गुणों और लीलाओं का वर्णन किया जाता है। शिव आरती, कुबेर चालीसा और शिव अमृतवाणी भी आप हमारी वेबसाइट से पढ़ सकते हैं|

त्रयोदशी के दिन हवन करके शिव चालीसा का पाठ करने से विशेष लाभ मिलता है। उनका व्रत रखने की भी परंपरा है। ऋण से मुक्ति, पुत्र प्राप्ति, विघ्न बाधाएं दूर होना, मानसिक शांति आदि आसान हो जाते हैं। सुंदरकांड पाठ हिंदी में | Shri Sai Chalisa Lyrics PDF | Hanuman Chalisa MP3 Download | Lingashtakam | Foods to Eat During Sawan Fast


Shiv Chalisa Lyrics in Hindi PDF
Shiv Chalisa in Hindi PDF

|| शिव चालीसा ||

॥ दोहा ॥
जय गणेश गिरिजा सुवन,
मंगल मूल सुजान ।
कहत अयोध्यादास तुम,
देहु अभय वरदान ॥

॥ चौपाई ॥
जय गिरिजा पति दीन दयाला ।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥

भाल चन्द्रमा सोहत नीके ।
कानन कुण्डल नागफनी के ॥

अंग गौर शिर गंग बहाये ।
मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे ।
छवि को देखि नाग मन मोहे ॥ 4॥

मैना मातु की हवे दुलारी ।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी ।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे ।
सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥

कार्तिक श्याम और गणराऊ ।
या छवि को कहि जात न काऊ ॥ 8॥

देवन जबहीं जाय पुकारा ।
तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥

किया उपद्रव तारक भारी ।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥

तुरत षडानन आप पठायउ ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥

आप जलंधर असुर संहारा ।
सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥ 12॥

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई ।
सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥

किया तपहिं भागीरथ भारी ।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं ।
सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥

वेद नाम महिमा तव गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥ 16॥

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला ।
जरत सुरासुर भए विहाला ॥

कीन्ही दया तहं करी सहाई ।
नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा ।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥

सहस कमल में हो रहे धारी ।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥ 20॥

एक कमल प्रभु राखेउ जोई ।
कमल नयन पूजन चहं सोई ॥

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर ।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥

जय जय जय अनन्त अविनाशी ।
करत कृपा सब के घटवासी ॥

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै ।
भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥ 24॥

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो ।
येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो ।
संकट से मोहि आन उबारो ॥

मात-पिता भ्राता सब होई ।
संकट में पूछत नहिं कोई ॥

स्वामी एक है आस तुम्हारी ।
आय हरहु मम संकट भारी ॥ 28॥

धन निर्धन को देत सदा हीं ।
जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥

अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी ।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥

शंकर हो संकट के नाशन ।
मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं ।
शारद नारद शीश नवावैं ॥ 32॥

नमो नमो जय नमः शिवाय ।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥

जो यह पाठ करे मन लाई ।
ता पर होत है शम्भु सहाई ॥

ॠनियां जो कोई हो अधिकारी ।
पाठ करे सो पावन हारी ॥

पुत्र हीन कर इच्छा जोई ।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥ 36॥

पण्डित त्रयोदशी को लावे ।
ध्यान पूर्वक होम करावे ॥

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा ।
ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे ।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥

जन्म जन्म के पाप नसावे ।
अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥ 40॥

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी ।
जानि सकल दुःख हरहु हमारी ॥

॥ दोहा ॥
नित्त नेम कर प्रातः ही,
पाठ करौं चालीसा ।
तुम मेरी मनोकामना,
पूर्ण करो जगदीश ॥

मगसर छठि हेमन्त ॠतु,
संवत चौसठ जान ।
अस्तुति चालीसा शिवहि,
पूर्ण कीन कल्याण ॥


Shiva Chalisa Lyrics In English
Shiv Chalisa Likhit Mein

॥ Doha ॥
jay ganesh girija suvan,
mangal mool sujaan ॥
kahat ayodaas tum,
dehu abhay bhooshana ॥

॥ Chaupai ॥
jay girija pati deen dayaala ॥
sada karat santan pratipaala ॥

bhaal chandrama sohat neeke ॥
kaanan kundal naagaphanee ke ॥

ang gaur shree ganga bahaye ॥
mundamaal tan kshaaraprasthaan ॥

vastr kal baaghambar sohe ॥
chhavi ko dekhi naag man mohe ॥ 4 ॥

maina maatu kee have dulaaree ॥
baam ang sohat chhavi nyaaree ॥

kar trishool sohat chhavi bhaaree ॥
karat sada shatrun kshayakaaree ॥

nandi ganesh sohai tahan kaise ॥
saagar madhy kamal hain aise ॥

kaartik shyaam aur garaaro ॥
ya chhavi ko kahi jaat na kooo ॥ 8 ॥

devan jabahin jaay bulaay ॥
tab hee duhkh prabhu aap nivaara ॥

achhoota taarak bhaaree ॥
devan sab mili tumahin jauharee ॥

turat shaadaanan aap pathaayau ॥
lavanimesh mahan maari girayau ॥

aap jalandhar asur sanhaara ॥
suyash tumhaar vidit sansaara ॥ 12 ॥

tripuraasur san yuddh machaee ॥
sabahin krpa kar leen bachaee ॥

kiya tapahin bhaageerath bhaaree ॥
poorab pratigya taasu puraari ॥

daanin mahan tum sam kooo nahin ॥
sevak stuti karat sadaahin ॥

ved naam mahima tav gaee ॥
akath anaadi bhed nahin paee ॥ 16 ॥

prakatee udadhi math mein naav ॥
jarat surasur bhaye vihaala ॥

keenhee daya tahan karee sahaee ॥
neelakanth tab naam kahai ॥

vandan raamachandr jab keenha ॥
jeet ke lank vibheeshan deenha ॥

sahas kamal mein ho rahe dhaaree ॥
keenh pareeksha tabahin puraari ॥ 20 ॥

ek kamal prabhu raakheu joee ॥
kamal nayan poojan chahan soi ॥

kathin bhakti darshan prabhu shankar ॥
bhe vishesh aalekh var ॥

jay jay jay anant avinaashee ॥
karat krpa sab ke ghatavaasee ॥

dusht sakal nit mohi sataavai ॥
bhramat rahaun mohi chain na aavai ॥ 24 ॥

traahi traahi main naath pukaaro ॥
yehi avasar mohi an ubaaro ॥

trishool shatru ko maaro ॥
sankat se mohi an ubaro ॥

maata-pita bhraata sab hoee ॥
sankat mein prashnat nahin koee ॥

svaamee ek hain aasa vivaah ॥
ain harahu mam sankat bhaaree ॥ 28 ॥

dhan nirdhan ko det sada heen ॥
jo koee jaanche so phal pae ॥

astuti kehi vidhi karan vivaah ॥
kshamahu naath ab viphal hamaaree ॥

shankar ho sankat ke naashan ॥
mangal kaaran vighn vinaashan ॥

yogee yati muni dhyaanan ॥
sharad naarad chamak navaanvai ॥ 32 ॥

namo namo jay namah shivaay ॥
sur brahmaadik paar na paay ॥

jo yah paath kare man laee ॥
ta par hot hai shambhu sahaay ॥

rniyaan jo koee ho adhikaaree ॥
paath so kare param paavan ॥

putr heen kar ichchha joee ॥
nishchay shiv prasaad tehi hoi ॥ 36 ॥

pandit trayodashee ko laave ॥
dhyaan den hom karaave ॥

trayodashee vrat karai sada ॥
taake tan nahin rahai kalesha ॥

dhoop deep naivedy chadaave ॥
shankar sammukh paath sunaave ॥

janm janm ke paap naasaave ॥
antim dhaam shivapur mein paave ॥ 40 ॥

kahate hain ayodhyaadaas ka vivaah ॥
jaani sakal duhkh harahu hamaaree ॥

॥ Doha ॥
nitt nem kar subah hee,
paath karaun chaaleesa ॥
tum mere man,
poorn karo jagadeesh ॥

magasar chhathi hemant rtu,
sanvat chausath jaan ॥
astuti chaaleesa shivahi,
poorn keen kalyaan ॥


Hindi WordTransliteration / PronunciationSpiritual Meaning (as you noted)Deeper Symbolism & Context
व्याघ्राम्बर
(Vyasghambar)
Vyāghrāmbar
(Vyaagh-raam-bar)
The tiger skin, symbolizing mastery over desire.The tiger represents primal, animalistic energy and desire. Shiva wearing its skin signifies he is not just an ascetic who renounces the world, but the complete master of all its energies. He sits upon the force of desire, rendering it powerless.
मुण्डमाल
(Mundmaal)
Muṇḍamālā
(Mun-da-maa-laa)
The garland of skulls, representing the cycle of time and rebirth.Each skull is a metaphor for a full cycle of creation and destruction (a Kalpa). The garland signifies Shiva as Mahakala (the Lord of Time), who transcends and wears the endless cycles of birth and death as an ornament.
अभय वरदान
(Abhay Varadan)
Abhaya Varadāna
(A-bhaya Va-ra-daa-na)
A divine blessing that removes all fears.“Abhaya” means “without fear.” Granting abhaya (often shown with a raised palm) is a core gesture of Shiva and other deities. It represents the ultimate protection for the devotee: freedom from worldly anxieties, the fear of death, and spiritual ignorance.
गिरिजा सुवन
(Girija Suvan)
Girijā Suvan
(Gi-ri-jaa Su-van)
Refers to Lord Ganesha, the son of Girija (Parvati).This term highlights Ganesha’s lineage. Invoking him first (“जय गणेश गिरिजा सुवन”) follows the sacred tradition of seeking the “Vighnaharta” (remover of obstacles) before any endeavor, ensuring the recitation of the Chalisa proceeds without hindrance.


Shiva Chalisa PDF

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान ॥

अर्थ – हे गिरजा-पुत्र अर्थात पार्वती के नंदन श्री गणेश, आप ही समस्त शुभता और बुद्धि का कारण हो। अतः आपकी जय हो। अयोध्यादास जी प्रार्थना करते हैं कि आप ऐसा वरदान दें कि सभी भय दूर हो जाए।

जय गिरिजा पति दीन दयाला ।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥

अर्थ – हे पार्वती ( गिरिजा) के पति, आप सबसे दयालु हो, आपकी जय हो, आप हमेशा साधु-संतों की रक्षा करते हो।

भाल चन्द्रमा सोहत नीके ।
कानन कुण्डल नागफनी के ॥

अर्थ – आप त्रिशूल रखते हो और मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित हैं, आपने कानो में नागफनी के समान कुण्डल पहन रखे हो।

अंग गौर शिर गंग बहाये ।
मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥

अर्थ – आपका रंग श्वेत हैं, आपकी जटाओं से  गंगा नदी बहती हैं, आपने गले में राक्षसों के सिरो की माला पहन रखी हैं और शरीर पर चिताओं की भस्म लगा रखी है।

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे ।
छवि को देखि नाग मन मोहे ॥

अर्थ – आपने बाघ की खाल को वस्त्र के रूप में पहना हुआ हैं, आपके रूप को देखकर साँपो भी आकर्षित हो जाते हैं।

मैना मातु की हवे दुलारी ।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥

अर्थ –  मैना की दुलारी अर्थात् उनकी पुत्री पार्वती भी आपकी पत्नी के रूप में पूजनीय हैं, उनकी छवि भी मन को सुख देने वाली हैं।

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी ।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥

अर्थ – हाथों में त्रिशूल आपकी छवि को ओर भी शोभायमान बनाता है। क्योंकि उससे सदैव शत्रुओं का विनाश होता हैं।

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे ।
सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥

अर्थ – आपके पास में आपकी सवारी नंदी व पुत्र गणेश इस तरह दिखाई दे रहे है जैसे कि समुंद्र के मध्य में दो कमल खिल रहे हो।

कार्तिक श्याम और गणराऊ ।
या छवि को कहि जात न काऊ ॥

अर्थ – कार्तिकेय और अन्य गणों की उपस्थिति से आपकी छवि ऐसी बनती है कि कोई उनका बखान नहीं कर सकता।

देवन जबहीं जाय पुकारा ।
तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥

अर्थ – जब कभी भी देवताओं ने संकट के समय में आपको पुकारा हैं, आपने सदैव उनके संकटों का निवारण किया हैं।

किया उपद्रव तारक भारी ।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥

अर्थ – जब ताड़कासुर नामक राक्षस ने देवताओं पर अत्यधिक अत्याचार किये तब सभी देवतागण उससे छुटकारा पाने के लिए आपकी शरण में चले आये।

तुरत षडानन आप पठायउ ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥

अर्थ – देवताओं के आग्रह पर आपने तुरंत अपने बड़े पुत्र कार्तिक ( षडानन) को वहां भेजा और उन्होंने बिना देरी किये उस पापी राक्षस का वध कर दिया।

आप जलंधर असुर संहारा ।
सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥

अर्थ – आपने जलंधर नामक राक्षस का संहार किया जिस कारण आपका यश संपूर्ण विश्व में व्याप्त हुआ।

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई ।
सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥

अर्थ – त्रिपुरासुर नामक राक्षस से भी आप ही ने युद्ध कर उसका वध किया और आपकी कृपा से ही देवताओं के मान की रक्षा हुई। 

किया तपहिं भागीरथ भारी ।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥

अर्थ- जब भगीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए कठोर तप किया तब आपने ही अपनी जटाओं से गंगा के प्रवाह को अपनी जटाओं में समाहित कर लिया। 

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं ।
सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥

अर्थ – आपके समान दानदाता इस संसार में कोई नही हैं, भक्तगण हमेशा आपकी स्तुति करते रहते हैं।

वेद नाम महिमा तव गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥

अर्थ – समस्त वेद भी आपकी महिमा का बखान करते हैं लेकिन आप रहस्य हैं, इसलिए आपका भेद कोई भी नही जान पाया हैं।

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला ।
जरत सुरासुर भए विहाला ॥

अर्थ – समुद्र मंथन के दौरान विष का घड़ा निकलने पर देवता और असुर भय से कांपने लगे थे।  

कीन्ही दया तहं करी सहाई ।
नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥

अर्थ – तब आपने सभी पर दया कर उस विष को कंठ में धारण कर लिया, और उसी समय से आपका नाम “नीलकंठ” पड़ गया।

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा ।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥

अर्थ – लंका पर चढ़ाई करने से पूर्व श्रीराम ने  तमिलनाडु के रामेश्वरम में आपकी  पूजा की थी और उसके बाद उन्होंने लंका पर विजय प्राप्त कर विभीषण को वहां का राजा बनाया था।

सहस कमल में हो रहे धारी ।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥

अर्थ – जब श्रीराम आपकी पूजा-अर्चना कर रहे थे और आपको कमल के पुष्प अर्पित कर रहे थे, तब आपने उनकी परीक्षा लेनी चाही।

एक कमल प्रभु राखेउ जोई ।
कमल नयन पूजन चहं सोई ॥

अर्थ – आपने उन कमल पुष्पों में से एक कमल का पुष्प छुपा दिया, तब श्रीराम ने अपने नेत्र रूपी कमल से आपकी पूजा शुरू की।

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर ।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥

अर्थ –  श्रीराम की ऐसी कठोर भक्ति को देखकर आप अत्यधिक प्रसन्न हुए और आपने उन्हें मनचाहा वरदान दिया।

जय जय जय अनन्त अविनाशी ।
करत कृपा सब के घटवासी ॥

अर्थ – हे भोलेनाथ ! आपकी जय हो, जय हो, जय हो, आपका कोई आदि-अंत नही हैं, आपका विनाश नही किया जा सकता हैं, आप सभी के ऊपर अपनी कृपा दृष्टि ऐसे ही बनाये रखो।

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै ।
भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥

अर्थ – बुरे विचार हमेशा मेरे मन को कष्ट पहुंचाते हैं और जिससे मेरा मन हमेशा भ्रमित रहता है और मुझे क्षणमात्र भी चैन नहीं मिलता।

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो ।
येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥

अर्थ – इस संकट की स्थिति में मैं आपका ही नाम पुकारता हूँ, इस संकट के समय आप ही मेरा उद्धार कर सकते हैं।

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो ।
संकट से मोहि आन उबारो ॥

अर्थ – आप अपने त्रिशूल से मेरे शत्रुओं का नाश कर दो और मुझे संकट से बहार निकालो।

मात-पिता भ्राता सब होई ।
संकट में पूछत नहिं कोई ॥

अर्थ – माता, पिता, भाई आदि सभी सुख के ही साथी हैं, लेकिन संकट आने पर हमे कोई नही पूछता।

स्वामी एक है आस तुम्हारी ।
आय हरहु मम संकट भारी ॥

अर्थ – इसलिए हे भोलेनाथ ! मुझे केवल आप से ही आशा हैं कि आप आकर मेरे संकटों का निवारण करेंगे।

धन निर्धन को देत सदा हीं ।
जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥

अर्थ – आप हमेशा निर्धन व्यक्तियों को धन देकर उनकी आर्थिक समस्या को दूर करते हैं, जो कोई आपकी जैसी भक्ति करता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है।

अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी ।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥

अर्थ – आपकी पूजा करने की विधि क्या है, इसके बारे में हमे कम ज्ञान हैं, इसलिए यदि हमसे किसी प्रकार की कोई भूल हो जाये तो कृपया करके हमारी भूल को माफ़ कर दे।

शंकर हो संकट के नाशन ।
मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥

अर्थ – हे भगवान शंकर, आप ही सभी संकटों का नाश करने वाले हो , आप ही सभी का मंगल करने वाले हो, आप ही विघ्नों का नाश करने वाले हो।

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं ।
शारद नारद शीश नवावैं ॥

अर्थ – सभी योगी-मुनि आपका ही ध्यान करते हैं और नारद व माँ सरस्वती आपके सामने अपना शीश नवाते  हैं।

नमो नमो जय नमः शिवाय ।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥

अर्थ – आपका ध्यान करने का मूल मंत्र “ऊं नमः शिवाय“ है। इस मंत्र का जाप करके भी सभी देवता और भगवान ब्रह्मा भी पार नही पा सकते हैं।

जो यह पाठ करे मन लाई ।
ता पर होत है शम्भु सहाई ॥

अर्थ – जो भी भक्त सच्चे मन से इस Shiv Chalisa ka paath (पाठ) कर लेते हैं उन पर भोलेनाथ की कृपा अवश्य होती हैं।

ॠनियां जो कोई हो अधिकारी ।
पाठ करे सो पावन हारी ॥

अर्थ – जो भी भक्त Shiv Chalisa का पाठ करता हैं वह सभी प्रकार के ऋणों से मुक्त हो जाता हैं और वह तनाव मुक्त महसूस करता है। 

पुत्र हीन कर इच्छा जोई ।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥

अर्थ – यदि किसी दम्पति को संतान प्राप्ति नही हो रही हैं, तो निश्चय ही शिव की कृपा से उसे पुत्र की प्राप्ति होगी।

पण्डित त्रयोदशी को लावे ।
ध्यान पूर्वक होम करावे ॥

अर्थ – प्रत्येक माह की त्रयोदशी के दिन अपने घर में पंडित को बुलाकर Shiv Chalisa का पाठ व हवन करवाना चाहिए।

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा ।
ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥

अर्थ – जो भी भक्त त्रयोदशी के दिन आपका व्रत करता हैं, उसका तन हमेशा निरोगी रहता हैं।

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे ।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥

अर्थ – भगवान शिव को पूजा में धूप, दीप व नैवेद्य चढ़ाना चाहिए और उनके सम्मुख बैठकर Shiv Chalisa का पाठ सुनाना चाहिए।

जन्म जन्म के पाप नसावे ।
अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥

अर्थ -Shiv Chalisa का पाठ करके जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे शिव जी के शिवपुर धाम में शरण मिलती हैं।

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी ।
जानि सकल दुःख हरहु हमारी ॥

अर्थ – अयोध्यादास आपके सामने यह आस लगाकर विनती करता हैं कि आप मेरे सभी दुखों का निवारण कर दे।

॥दोहा॥

नित्त नेम कर प्रातः ही,पाठ करौं चालीसा ।
तुम मेरी मनोकामना,पूर्ण करो जगदीश ॥

अर्थ – रोजाना प्रातःकाल Shiv Chalisa का पाठ करना चाहिए। साथ ही भगवान शिव से अपनी सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने की अर्जी लगाना चाहिए।

मगसर छठि हेमन्त ॠतु,संवत चौसठ जान ।
अस्तुति चालीसा शिवहि,पूर्ण कीन कल्याण ॥

अर्थ – माघ मास की छठी तिथि को हेमंत ऋतु में संवत चौसठ में इस Shiv Chalisa के लेखन कार्य पूर्ण हुआ।


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शिव चालीसा को सिद्ध करना एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली आध्यात्मिक प्रक्रिया है, जो शिव भक्तों के लिए अत्यधिक प्रिय है। शिव चालीसा, जो कि भगवान शिव की 40 श्लोकों वाली स्तुति है, को पढ़ने और समझने से भक्तों को आंतरिक शांति, शक्ति और ज्ञान प्राप्त होता है। इसे सिद्ध करने का अर्थ है इसे पूरी तरह से समझना और उसके प्रभाव को अपने जीवन में महसूस करना। इस प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए कुछ विशिष्ट विधियों का पालन करना आवश्यक है।

पहली और सबसे महत्वपूर्ण विधि है सही समय पर शिव चालीसा का पाठ करना। हिन्दू धर्म के अनुसार, शिव की पूजा के लिए सोमवार का दिन विशेष रूप से शुभ माना जाता है। इस दिन भगवान शिव की विशेष पूजा और व्रत रखने से चालीसा के पाठ का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। इसके अलावा, भगवान शिव की पूजा सुबह सूरज उगने से पहले या रात्रि में, शिवरात्रि के समय विशेष रूप से की जाती है। इन समयों पर शिव चालीसा का पाठ करने से इसकी शक्ति और प्रभाव में वृद्धि होती है।

दूसरी विधि है एकाग्रता और श्रद्धा के साथ पाठ करना। शिव चालीसा का पाठ केवल शब्दों की ऊपरी ध्वनि तक सीमित नहीं होना चाहिए; इसे पूरी श्रद्धा, ध्यान और एकाग्रता के साथ पढ़ना चाहिए। जब भक्त मन और आत्मा से पाठ करते हैं, तो उसकी शक्ति और प्रभाव सीधे उनके जीवन में अनुभव किए जा सकते हैं। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि पाठ करते समय सभी बाहरी विचलनों को दूर किया जाए, ताकि पूरा ध्यान भगवान शिव पर केंद्रित हो सके।

तीसरी विधि है नियमितता। किसी भी आध्यात्मिक प्रक्रिया में निरंतरता और नियमितता का होना अत्यंत महत्वपूर्ण है। शिव चालीसा का नियमित पाठ करने से न केवल इसके प्रभाव में वृद्धि होती है, बल्कि यह एक व्यक्ति की जीवनशैली का भी हिस्सा बन जाता है। निरंतर पाठ करने से मन को शांति मिलती है और भक्त की आत्मा को परिष्कृत किया जा सकता है।

चौथी विधि है धार्मिक अनुशासन और स्वच्छता। पूजा और पाठ के दौरान स्वच्छता बनाए रखना और सही धार्मिक अनुशासन का पालन करना भी महत्वपूर्ण है। यह स्वच्छता मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धता को दर्शाती है, जो पाठ के प्रभाव को बढ़ाती है।

अंत में, शिव चालीसा को सिद्ध करने के लिए भक्त को भगवान शिव के प्रति पूर्ण विश्वास और समर्पण होना चाहिए। जब भक्त सच्चे मन से भगवान शिव को समर्पित होते हैं, तब चालीसा का पाठ अधिक प्रभावी होता है और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने में सहायक होता है।

इन विधियों का पालन करके, भक्त शिव चालीसा को सिद्ध कर सकते हैं और भगवान शिव की कृपा और आशीर्वाद को अपने जीवन में अनुभव कर सकते हैं। यह न केवल आध्यात्मिक उन्नति के लिए बल्कि जीवन की विभिन्न कठिनाइयों का सामना करने के लिए भी अत्यंत लाभकारी होता है।


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शिव चालीसा के लाभ | शिव चालीसा पढ़ने के फायदे

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) एक अत्यंत शक्तिशाली और पवित्र ग्रंथ है, जिसमें भगवान शिव की महिमा का गान किया गया है। इसका पाठ शिव भक्तों के लिए असीम लाभकारी माना जाता है। शिव चालीसा के 40 श्लोक भगवान शिव के विभिन्न गुणों, उनके स्वरूप, और उनकी कृपा का वर्णन करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, शिव चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि, और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। आइए जानते हैं कि शिव चालीसा पढ़ने के क्या-क्या फायदे होते हैं:

1. मन की शांति और मानसिक तनाव से मुक्ति

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का नियमित रूप से पाठ करने से मन शांत होता है और मानसिक तनाव कम होता है। शिव चालीसा के श्लोकों में भगवान शिव की स्तुति और उनके पराक्रम का वर्णन किया गया है, जो व्यक्ति के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। जीवन की भागदौड़ और चिंताओं से राहत पाने के लिए शिव चालीसा एक अद्भुत साधन है।

मानसिक तनाव को दूर करने के लिए प्राचीनकाल से ही मंत्रों का जाप और पाठ करने की परंपरा रही है। शिव चालीसा भी उसी दिशा में काम करता है। शिव चालीसा के श्लोक गहरे ध्यान और एकाग्रता को बढ़ावा देते हैं, जो मानसिक शांति की प्राप्ति में मदद करते हैं।

2. शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का नियमित पाठ करने से व्यक्ति का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य भी बेहतर होता है। इसे पढ़ते समय एक सकारात्मक वाइब्रेशन उत्पन्न होता है, जो हमारे मस्तिष्क और शरीर पर सकारात्मक प्रभाव डालता है। भगवान शिव को योग का भगवान माना जाता है, और शिव चालीसा पढ़ने से हम उनकी ध्यान साधना की ऊर्जा को महसूस कर सकते हैं।

यह देखा गया है कि धार्मिक पाठों के उच्चारण से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे नकारात्मक विचार और रोग दूर होते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी यह सिद्ध हुआ है कि धार्मिक ग्रंथों का पाठ करने से तनाव में कमी और मानसिक संतुलन में सुधार होता है।

3. कठिनाइयों से मुक्ति

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का पाठ करने से जीवन की कठिनाइयों और संकटों से मुक्ति मिलती है। भगवान शिव को ‘महादेव’ के रूप में जाना जाता है, जो समस्त ब्रह्मांड के स्वामी हैं। शिव चालीसा पढ़ने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है, और वह भक्त की रक्षा करते हैं। जीवन में आने वाली कठिनाइयों से निपटने में यह चालीसा अत्यधिक सहायक होती है।

कई भक्त यह मानते हैं कि शिव चालीसा के पाठ से उनके जीवन में आने वाली बाधाएं और परेशानियां दूर हो जाती हैं। यह पाठ भगवान शिव की कृपा से जीवन को सरल और सुखमय बनाने में सहायक होता है।

4. नकारात्मक ऊर्जा और भय का नाश

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का नियमित पाठ करने से नकारात्मक ऊर्जा और भय का नाश होता है। भगवान शिव को ‘भूतनाथ’ और ‘कालों के काल महाकाल’ के रूप में जाना जाता है, जो सभी बुरी आत्माओं और नकारात्मक शक्तियों का नाश करते हैं। जब हम शिव चालीसा का पाठ करते हैं, तो भगवान शिव की कृपा से हमारे चारों ओर एक दिव्य सुरक्षा कवच बन जाता है, जो हमें बुरी शक्तियों और नकारात्मक ऊर्जाओं से बचाता है।

इसके साथ ही शिव चालीसा पढ़ने से व्यक्ति के भीतर से भय भी दूर होता है। यह भय चाहे मानसिक हो, शारीरिक हो या फिर किसी अनजान चिंता का हो, शिव चालीसा के पाठ से यह समाप्त हो जाता है।

5. धन, समृद्धि और सुख की प्राप्ति

धार्मिक मान्यता है कि शिव चालीसा का पाठ करने से धन और समृद्धि की प्राप्ति होती है। भगवान शिव ‘भोलेनाथ’ हैं, जो अपने भक्तों पर जल्द ही प्रसन्न हो जाते हैं और उन्हें अपनी कृपा से मालामाल कर देते हैं। शिव चालीसा के नियमित पाठ से भगवान शिव की कृपा से व्यक्ति को धन, सुख, और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

कई लोग यह मानते हैं कि शिव चालीसा के पाठ से उनके व्यवसाय, नौकरी, और आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है। यह पाठ व्यक्ति के जीवन में स्थिरता और समृद्धि लाता है, जिससे उसका परिवार भी सुखी और सम्पन्न रहता है।

6. आध्यात्मिक उन्नति

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का पाठ व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति में भी सहायक होता है। भगवान शिव को ध्यान और योग का प्रतीक माना जाता है, और शिव चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के भीतर एक आध्यात्मिक जागृति होती है। इस पाठ से भगवान शिव के प्रति समर्पण और भक्ति बढ़ती है, जिससे व्यक्ति के जीवन में आध्यात्मिक संतुलन आता है।

आध्यात्मिक दृष्टि से, शिव चालीसा का पाठ व्यक्ति को आत्म-साक्षात्कार की दिशा में ले जाता है। यह पाठ भगवान शिव की कृपा से मन को शांत और केंद्रित करता है, जिससे व्यक्ति अपने जीवन के उद्देश्य और आत्मा की शांति को प्राप्त करता है।

7. कष्टों और रोगों से मुक्ति

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का पाठ करने से कष्टों और रोगों से मुक्ति मिलती है। भगवान शिव को ‘महामृत्युंजय’ कहा जाता है, जो रोगों और मृत्यु के भय से मुक्ति दिलाने वाले देवता हैं। शिव चालीसा के नियमित पाठ से व्यक्ति को गंभीर बीमारियों से भी राहत मिलती है, और उसका स्वास्थ्य सुधरता है।

इसके अलावा, यह भी माना जाता है कि शिव चालीसा के पाठ से भगवान शिव की कृपा से असाध्य रोगों से भी छुटकारा मिलता है। भगवान शिव की कृपा से व्यक्ति के जीवन से सभी प्रकार के शारीरिक और मानसिक कष्ट दूर हो जाते हैं।

8. घर-परिवार में शांति और समृद्धि

शिव चालीसा (Shiva Chalisa pdf) का पाठ करने से घर-परिवार में शांति और समृद्धि बनी रहती है। भगवान शिव की कृपा से परिवार के सदस्यों के बीच आपसी प्रेम और सामंजस्य बना रहता है। शिव चालीसा का पाठ करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है, जो समस्त परिवार के सदस्यों को सुखी और समृद्ध बनाए रखता है।

कई परिवारों में शिव चालीसा का पाठ नियमित रूप से किया जाता है, ताकि घर में शांति और समृद्धि बनी रहे। यह पाठ परिवार के सदस्यों के बीच आपसी मतभेदों को दूर करता है और प्रेमपूर्ण वातावरण का निर्माण करता है।

9. जीवन में सफलताओं की प्राप्ति

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का नियमित पाठ करने से जीवन में सफलताओं की प्राप्ति होती है। भगवान शिव की कृपा से व्यक्ति को जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है, चाहे वह शिक्षा हो, करियर हो, या फिर व्यक्तिगत जीवन हो। शिव चालीसा का पाठ व्यक्ति को उसके लक्ष्यों तक पहुँचने में मदद करता है और उसकी मेहनत को फलीभूत करता है।

धार्मिक मान्यता है कि भगवान शिव अपने भक्तों की प्रार्थनाओं को जल्द सुनते हैं और उनकी सभी इच्छाओं को पूरा करते हैं। शिव चालीसा के पाठ से भगवान शिव की कृपा से व्यक्ति को अपने जीवन में सभी प्रकार की सफलताएं प्राप्त होती हैं।

10. धार्मिक और सामाजिक जीवन में सुधार

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का पाठ व्यक्ति के धार्मिक और सामाजिक जीवन में भी सुधार करता है। इससे व्यक्ति का भगवान शिव के प्रति विश्वास और भक्ति मजबूत होती है, जो उसे धर्म और समाज की सेवा में समर्पित करती है। शिव चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में धार्मिकता और सामाजिकता का समावेश होता है, जिससे वह समाज में एक बेहतर व्यक्ति के रूप में प्रतिष्ठित होता है।

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का पाठ भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का एक सरल और प्रभावी साधन है। इसके नियमित पाठ से व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक, और आध्यात्मिक रूप से अनेकों लाभ प्राप्त होते हैं। चाहे आप जीवन की किसी भी कठिनाई का सामना कर रहे हों, शिव चालीसा का पाठ आपको उन कठिनाइयों से उबारने और आपके जीवन को सफल बनाने में सहायक होगा।


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शिव चालीसा (Shiv Chalisa) एक अत्यंत पवित्र और प्रभावशाली धार्मिक स्तुति है, जिसमें भगवान शिव की महिमा का गुणगान किया गया है। यह 40 चौपाइयों और श्लोकों का एक ऐसा संग्रह है, जिसे पढ़ने से भगवान शिव की असीम कृपा प्राप्त होती है। हिंदू धर्म में भगवान शिव को त्रिदेवों में से एक माना गया है, जो सृजन, पालन, और संहार के देवता हैं। उन्हें “महादेव”, “भोलेनाथ”, और “नीलकंठ” जैसे कई नामों से पुकारा जाता है। शिव चालीसा का नियमित पाठ व्यक्ति के जीवन में शांति, समृद्धि, और आध्यात्मिक उन्नति लाने वाला माना जाता है।

इस लेख में, हम शिव चालीसा की महिमा और इसके महत्व पर विस्तृत चर्चा करेंगे, जिससे आप समझ सकें कि इसे पढ़ने से किन-किन क्षेत्रों में लाभ होता है और कैसे यह हमारे जीवन में सकारात्मक प्रभाव डालता है।

1. शिव चालीसा का आध्यात्मिक महत्व

भगवान शिव को ध्यान और योग के देवता माना जाता है। शिव चालीसा का नियमित रूप से पाठ करने से व्यक्ति के भीतर आध्यात्मिक जागृति उत्पन्न होती है। यह आध्यात्मिक जागृति व्यक्ति को आत्म-ज्ञान की ओर ले जाती है और उसे जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझने में सक्षम बनाती है। शिव चालीसा के श्लोक भगवान शिव के स्वरूप, उनके धैर्य, और उनके अनुग्रह का वर्णन करते हैं, जो व्यक्ति को आध्यात्मिक संतुलन प्रदान करते हैं।

ध्यान और ध्यानात्मक प्रथाओं में शिव चालीसा का पाठ अत्यधिक लाभकारी होता है। यह पाठ मानसिक शांति और ध्यान की गहराई को बढ़ाता है, जिससे साधक अपनी आत्मा के साथ गहरे संबंध स्थापित कर सकता है।

2. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) पढ़ने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इसके श्लोकों में भगवान शिव की असीम शक्ति और उनके गुणों का उल्लेख किया गया है, जो पाठक को सकारात्मक विचारों और भावनाओं की ओर प्रेरित करते हैं। इसके पाठ से व्यक्ति के आस-पास की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और उसके जीवन में सकारात्मकता का प्रवाह बढ़ता है।

सकारात्मक ऊर्जा का संचार जीवन के हर क्षेत्र में अत्यधिक महत्वपूर्ण है, चाहे वह व्यक्तिगत संबंध हो, पेशेवर जीवन हो, या स्वास्थ्य हो। शिव चालीसा के नियमित पाठ से व्यक्ति अपने जीवन के हर पहलू में सफलता और शांति प्राप्त कर सकता है।

3. कठिनाइयों और कष्टों से मुक्ति

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का पाठ करने से व्यक्ति को जीवन की कठिनाइयों और कष्टों से मुक्ति मिलती है। भगवान शिव को “महादेव” कहा जाता है, जो सभी प्रकार की बाधाओं और कष्टों को दूर करने वाले देवता हैं। जीवन में कई बार कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, चाहे वह आर्थिक संकट हो, मानसिक तनाव हो, या फिर पारिवारिक समस्याएं। ऐसे में शिव चालीसा का पाठ अत्यंत प्रभावशाली सिद्ध होता है।

कई भक्त यह मानते हैं कि शिव चालीसा के नियमित पाठ से उनकी जीवन की कठिनाइयां कम हो जाती हैं और उन्हें मानसिक शांति प्राप्त होती है। शिव चालीसा भगवान शिव की अनंत शक्ति को व्यक्त करता है, जो भक्त को हर प्रकार की परेशानियों से निकालने में सक्षम है।

4. नकारात्मक शक्तियों और भय से रक्षा

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का पाठ करने से नकारात्मक शक्तियों और भय से सुरक्षा मिलती है। भगवान शिव को “भूतनाथ” और “महाकाल” कहा जाता है, जो समस्त बुरी शक्तियों और नकारात्मक ऊर्जा का नाश करने वाले हैं। जब व्यक्ति शिव चालीसा का पाठ करता है, तो भगवान शिव की कृपा से उसके चारों ओर एक दिव्य सुरक्षा कवच बन जाता है, जो उसे बुरी शक्तियों और नकारात्मक ऊर्जाओं से सुरक्षित रखता है।

इस पाठ का प्रभाव इतना शक्तिशाली होता है कि यह व्यक्ति के भीतर से भय, चिंता, और असुरक्षा को दूर कर देता है। इससे व्यक्ति के भीतर आत्मविश्वास और साहस का विकास होता है, जो उसे जीवन की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम बनाता है।

5. स्वास्थ्य में सुधार और रोगों से मुक्ति

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का पाठ शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को सुधारने में भी अत्यधिक लाभकारी होता है। भगवान शिव को “महामृत्युंजय” कहा जाता है, जो रोगों और मृत्यु के भय से मुक्त करने वाले देवता हैं। शिव चालीसा के नियमित पाठ से व्यक्ति के शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है, जिससे रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है और शरीर स्वस्थ रहता है।

इसके अलावा, यह भी माना जाता है कि जिन लोगों को गंभीर बीमारियां होती हैं, वे अगर श्रद्धा और विश्वास के साथ शिव चालीसा का पाठ करते हैं, तो उन्हें भगवान शिव की कृपा से रोगों से मुक्ति मिलती है। यह पाठ मानसिक तनाव और चिंता को कम करने में भी सहायक होता है, जो मानसिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है।

6. धन और समृद्धि की प्राप्ति

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का पाठ करने से व्यक्ति को धन और समृद्धि की प्राप्ति होती है। भगवान शिव को “भोलेनाथ” कहा जाता है, जो बहुत ही सरल और कृपालु हैं। वे अपने भक्तों पर शीघ्र प्रसन्न होते हैं और उन्हें धन, सुख, और समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। शिव चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में आर्थिक समृद्धि आती है और उसकी सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं।

कई भक्त यह मानते हैं कि शिव चालीसा का पाठ करने से उनके व्यापार में वृद्धि हुई है, उनके करियर में उन्नति हुई है, और उन्हें आर्थिक रूप से स्थिरता प्राप्त हुई है। यह पाठ भगवान शिव की कृपा से समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है।

7. पारिवारिक शांति और संबंधों में सुधार

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का पाठ करने से परिवार में शांति और सद्भाव बना रहता है। भगवान शिव का परिवार, जिसमें माता पार्वती, भगवान गणेश, और भगवान कार्तिकेय शामिल हैं, आदर्श पारिवारिक जीवन का प्रतीक है। शिव चालीसा के पाठ से परिवार के सदस्यों के बीच आपसी प्रेम और समझ बढ़ती है, जिससे घर में सुख-शांति और सामंजस्य बना रहता है।

इसके अलावा, यह पाठ पारिवारिक मतभेदों को दूर करने में भी सहायक होता है। भगवान शिव की कृपा से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जो सभी प्रकार के कलह और विवादों को समाप्त करता है और परिवार को एकजुट रखता है।

8. आध्यात्मिक उन्नति और आत्म-साक्षात्कार

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का पाठ व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति में भी सहायक होता है। भगवान शिव को योग और ध्यान का प्रतीक माना जाता है, और उनके नाम का जाप करने से व्यक्ति को आत्म-साक्षात्कार की प्राप्ति होती है। शिव चालीसा के श्लोकों में भगवान शिव के ध्यान और उनकी साधना का वर्णन किया गया है, जो व्यक्ति को आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर करता है।

यह पाठ व्यक्ति के भीतर आध्यात्मिक संतुलन और शांति लाता है, जिससे वह संसार के माया-मोह से ऊपर उठकर आत्म-ज्ञान की ओर अग्रसर होता है। शिव चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के भीतर आध्यात्मिक जागृति उत्पन्न होती है, जिससे वह भगवान शिव के निकट पहुँचता है।

9. जीवन में सफलताओं की प्राप्ति

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का पाठ व्यक्ति को जीवन में सफलता प्राप्त करने में भी सहायक होता है। भगवान शिव की कृपा से व्यक्ति को अपने जीवन के हर क्षेत्र में सफलता मिलती है, चाहे वह शिक्षा हो, करियर हो, या व्यक्तिगत जीवन हो। शिव चालीसा का पाठ व्यक्ति को उसके लक्ष्यों तक पहुँचने में मदद करता है और उसकी मेहनत को फलीभूत करता है।

भगवान शिव अपने भक्तों की प्रार्थनाओं को सुनते हैं और उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में सफलता का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। शिव चालीसा का पाठ व्यक्ति के जीवन को सफल और सुखमय बनाता है।

10. कर्मों का शुद्धिकरण

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का पाठ व्यक्ति के कर्मों को शुद्ध करने में भी सहायक होता है। भगवान शिव को “पापों के नाशक” कहा जाता है, जो अपने भक्तों के पापों को नष्ट कर देते हैं और उन्हें शुद्ध करते हैं। शिव चालीसा के पाठ से व्यक्ति के बुरे कर्मों का नाश होता है और उसके अच्छे कर्मों का फल उसे प्राप्त होता है।

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में शुद्धता आती है, जिससे उसका मन और आत्मा शुद्ध हो जाते हैं। यह पाठ व्यक्ति को पापों से मुक्त कर उसके जीवन को शुद्ध और पवित्र बनाता है।

शिव चालीसा (Shiv Chalisa) का पाठ भगवान शिव की असीम कृपा प्राप्त करने का एक शक्तिशाली और प्रभावी माध्यम है। इसके नियमित पाठ से व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक, और आध्यात्मिक रूप से


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शिव चालीसा कितनी बार पढ़ी जानी चाहिए?

शिव चालीसा को कितनी बार पढ़ा जाए, इसका कोई विशेष नियम नहीं है, यह आपकी भक्ति और श्रद्धा पर निर्भर करता है। कुछ लोग नियमित रूप से दिन में एक बार इसका पाठ करते हैं, जबकि अन्य विशेष अवसरों या सोमवार जैसे पवित्र दिनों पर इसका पाठ करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अगर आप शिव चालीसा को 11 बार या 108 बार पढ़ते हैं, तो इससे शिवजी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इसके अलावा, अगर आप किसी विशेष मनोकामना की पूर्ति के लिए इसका पाठ कर रहे हैं, तो लगातार 40 दिनों तक शिव चालीसा का पाठ करना शुभ माना जाता है। यह चालीसा भगवान शिव की महिमा का गुणगान करती है और उनके आशीर्वाद को प्राप्त करने का एक सरल और प्रभावी माध्यम है। इसे पूरी श्रद्धा और ध्यान के साथ पढ़ने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं।

क्या आप पीरियड्स के दौरान शिव चालीसा सुन सकती हैं?

हिंदू धर्म में पीरियड्स के दौरान पूजा-पाठ को लेकर विभिन्न धारणाएं हैं, लेकिन आधुनिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो शिव चालीसा सुनने में कोई बाधा नहीं है। पीरियड्स को एक स्वाभाविक शारीरिक प्रक्रिया माना जाता है, और इस दौरान भगवान की भक्ति करने में कोई निषेध नहीं है। कई लोग मानते हैं कि भक्ति मन और आत्मा से की जाती है, न कि केवल शारीरिक स्वच्छता से। अगर आप शिव चालीसा का पाठ नहीं करना चाहती हैं, तो इसे सुनना भी एक विकल्प हो सकता है। इससे आपकी भक्ति और भगवान के प्रति आस्था बनी रहती है। आधुनिक समय में यह अधिक व्यक्तिगत मान्यता का सवाल है, और भगवान शिव, जो समस्त सृष्टि के स्वामी हैं, अपने भक्तों की भावनाओं को महत्व देते हैं, न कि किसी बाहरी नियमों को।

शिव चालीसा कौन सी भाषा में है?

शिव चालीसा का मूल रूप हिंदी भाषा में उपलब्ध है, जिसे साधारण और सरल शब्दों में लिखा गया है ताकि आम जन इसे आसानी से पढ़ और समझ सकें। शिव चालीसा के माध्यम से भगवान शिव की महिमा का वर्णन किया गया है, और यह भक्तों के बीच काफी लोकप्रिय है। हालांकि, शिव चालीसा का अनुवाद अन्य भाषाओं में भी किया गया है, ताकि विभिन्न भाषाओं के भक्त इसे अपनी मातृभाषा में भी पढ़ सकें। संस्कृत, तमिल, तेलुगु, बंगाली और अंग्रेजी जैसी कई भाषाओं में भी इसका अनुवाद किया गया है। लेकिन सबसे अधिक प्रचलन हिंदी में ही है। सरल भाषा में लिखे जाने के कारण इसे हर वर्ग और उम्र के लोग आसानी से पढ़ सकते हैं। इसका उद्देश्य भगवान शिव की स्तुति करना और उनकी कृपा प्राप्त करना है।

शिव चालीसा का आविष्कार किसने किया था?

शिव चालीसा का संकलन और रचना तुलसीदास द्वारा की गई थी। तुलसीदास एक महान संत और कवि थे, जिन्होंने भगवान राम और शिव की स्तुति में कई धार्मिक ग्रंथों की रचना की। तुलसीदास ने शिव चालीसा की रचना भगवान शिव की महिमा का गुणगान करने और भक्तों को शिवजी के प्रति भक्ति का मार्ग दिखाने के लिए की। शिव चालीसा एक सरल और प्रभावी माध्यम है जिसके जरिए भक्त भगवान शिव की आराधना कर सकते हैं और उनकी कृपा प्राप्त कर सकते हैं। शिव चालीसा में 40 श्लोक होते हैं, जो भगवान शिव की अद्वितीय शक्तियों, उनके महान गुणों और भक्तों के प्रति उनकी दया को दर्शाते हैं। यह चालीसा भगवान शिव के प्रति श्रद्धा और समर्पण की एक अभिव्यक्ति है, जो भारतीय धार्मिक परंपरा में गहराई से जड़ी हुई है।

क्या मैं रात में शिव चालीसा का पाठ कर सकता हूं?

हां, आप रात में शिव चालीसा का पाठ कर सकते हैं। भगवान शिव को “भोलनाथ” कहा जाता है, जो अपने भक्तों की भक्ति के समय और स्थान को नहीं देखते। शिव चालीसा का पाठ किसी भी समय किया जा सकता है, चाहे वह दिन हो या रात। कुछ लोग मानते हैं कि सुबह के समय पूजा-पाठ करना अधिक शुभ होता है, लेकिन यदि आपकी दिनचर्या के कारण आप दिन में इसका पाठ नहीं कर पाते हैं, तो रात में भी इसे पढ़ना पूरी तरह से स्वीकार्य है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आप इसे पूरे मन और भक्ति के साथ करें। रात का समय शांत और ध्यानमग्न होता है, इसलिए यह शिव चालीसा के पाठ के लिए अनुकूल भी हो सकता है, क्योंकि इससे एकाग्रता और ध्यान बेहतर होता है।

शिव स्तोत्रम की रचना किसने की थी?

शिव स्तोत्रम की रचना विभिन्न संतों और ऋषियों ने की थी, लेकिन कुछ प्रमुख स्तोत्रों की रचना आदि शंकराचार्य ने की थी। शिव स्तोत्रम भगवान शिव की स्तुति और उनकी महिमा का वर्णन करने वाले श्लोकों का एक समूह है। इनमें शिव तांडव स्तोत्र, लिंगाष्टकम, महिम्न स्तोत्र और कई अन्य शामिल हैं। आदि शंकराचार्य, जो अद्वैत वेदांत के महान आचार्य थे, ने भगवान शिव की स्तुति में कई प्रसिद्ध स्तोत्रों की रचना की, जिनमें उनके भक्ति और ज्ञान दोनों का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। शिव स्तोत्रम न केवल भगवान शिव की महिमा का वर्णन करते हैं, बल्कि भक्तों के लिए ध्यान, साधना और आत्मशांति का एक मार्ग भी प्रस्तुत करते हैं। इन्हें पढ़ने या सुनने से भक्तों को भगवान शिव की कृपा और आशीर्वाद मिलता है।

Shri Sai Chalisa Hindi Lyrics Authentic 2026 Pdf

साईं चालीसा (Sai Chalisa Lyrics Pdf) एक भक्ति गीत है जो शिरडी के साईं बाबा पर आधारित है। यह चालीसा साईं बाबा के अद्भुत जीवन और उनकी अलौकिक शक्तियों का वर्णन करती है, जिसे साईं भक्तों द्वारा अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ गाया जाता है। साईं बाबा को एक ऐसे संत के रूप में माना जाता है जिन्होंने अपने जीवन में सभी धर्मों के लोगों को समान रूप से अपनाया और उन्हें सत्य, प्रेम, और करुणा का मार्ग दिखाया। आप यहां से साईं बाबा आरती भी पढ़ सकते हैं।

साईं चालीसा एक लोकप्रिय प्रार्थना है जो 102 छन्दों से बनी है। इन छन्दों में साईं बाबा के जीवन के विभिन्न पहलुओं का वर्णन किया गया है, जैसे कि उनकी दिव्य शिक्षाएँ, चमत्कारिक घटनाएँ, और उनके भक्तों के प्रति उनकी असीम करुणा। यह चालीसा न केवल साईं बाबा की महिमा का बखान करती है, बल्कि उनके चरणों में शरण लेने का माध्यम भी है।

साईं चालीसा का पाठ साईं भक्तों द्वारा नियमित रूप से किया जाता है, विशेष रूप से गुरुवार के दिन, जो साईं बाबा को समर्पित माना जाता है। इस चालीसा का पाठ करने से भक्तों को मानसिक शांति, जीवन में समृद्धि और साईं बाबा के आशीर्वाद की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि साईं बाबा के करीब आने और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए इस चालीसा का पाठ अत्यंत प्रभावी होता है।

साईं चालीसा में साईं बाबा की जीवन यात्रा और उनके चमत्कारी कार्यों का उल्लेख मिलता है, जो भक्तों के लिए प्रेरणादायक होते हैं। इसमें बाबा के उपदेशों और उनके द्वारा दिए गए जीवन के आदर्शों को सरल और स्पष्ट भाषा में प्रस्तुत किया गया है, जिससे हर उम्र के लोग इसे आसानी से समझ और गा सकते हैं।

इस चालीसा के माध्यम से भक्त साईं बाबा से जुड़ाव महसूस करते हैं और उन्हें अपने जीवन की कठिनाइयों से मुक्ति पाने का मार्ग प्राप्त होता है। साईं चालीसा का पाठ करने से भक्तों के हृदय में श्रद्धा और विश्वास जागृत होता है, और वे साईं बाबा की दिव्यता का अनुभव करते हैं।



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  • English

|| साईं चालीसा ||
Shri Sai Chalisa Lyrics Pdf in Hindi

पहिले साईं के चरणों में,
अपान शीश नामौं मैं।
कैसे शिरडी साईं ऐ,
सारा हाला सुनौं मैं॥

माता कौन है, पिता कौन है,
ये ना किसी ने भी जाना।
कहाँ जन्म साईं ने धरा,
प्रश्न पहेली रहा बाना॥

कोई कहे अयोध्या के,
ये रामचन्द्र भगवान हैं।
कोई कहता साईं बाबा,
पवन पुत्र हनुमान हैं॥

कोई कहता मंगला मूर्ति,
श्री गजानंद हैं साईं।
कोई कहता गोकुल मोहना,
देवकी नंदना हैं साईं॥

शंकर समझे भक्त कै तो,
बाबा को भजते रहते।
कोई कहा अवतार दत्त का,
पूजा साईं की कराटे॥

कुछ भी मानो उनको तुमा,
पर साईं हैं सच्चे भगवाना।
बड़े दयालु दीनबंधु,
कितनोम को दिया जीवन दान॥

कै वर्षा पहेले की घटाना,
तुम्हें सुनूंगा में बता।
किसी भाग्यशाली की,
शिरडी में ऐ थी बाराता॥

आया साथा उसी के था,
बलाका एका बहुत सुंदरा।
अया, अकरा वहिन बसा गया,
पावना शिरडी किया नगारा॥

काई दिनो टका भटकाता,
भिक्षा मंगा उसेने दारा-दारा।
औरा दिखाई ऐसी लीला,
जग में जो हो गई अमारा॥

जैसे-जैसे अमारा उमरा बदी,
बढ़ती ही वैसी गै शाना।
घर-घर होने लगा नगर में,
साईं बाबा का गुणगान॥10॥

दिग-दिगंता में लगा गुंजने,
फिरा तो सैजी का नाम।
दीना-दुखी की रक्षा करना,
यहीं रहेगा बाबा का काम॥

बाबा के चरणो में जाकर,
जो कहता मैं हूं निर्धन।
दया उसी पर होती उनकी,
खुला जाते दुख के बंधना॥

कभी किसी ने मांगी भिक्षा,
दो बाबा मुझको संताना।
एवं अस्तु तब कहाकरा साई,
देते द उसको वरदाना॥

स्वयं दु:खी बाबा हो जाते,
दीना-दु:खी जन का लाखा हला।
अंतःकरण श्री साईं का,
सागर जैसा रहा विशाला॥

भक्त एक मद्रासी आया,
घर का बहुत बड़ा धनावना।
माला खजाना बेहड़ा उसका,
केवल नहीं रही संताना॥

लगा मनने साईनाथ को,
बाबा मुझ पर दया करो।
झांझ से झंकृता नैया को,
तुम्हीं मेरी पारा करो॥

कुलदीपक के बिना अँधेरा,
छाया हुआ घर में मेरे।
इसली अया हुन बाबा,
होकर शरणागत तेरे॥

कुलदीपक के आभा में,
व्यर्थ है दौलत की माया।
आजा भिखारी बनकारा बाबा,
शरण तुम्हारी में आया॥

दे दो मुझको पुत्र-दाना,
मैं रिनी रहूंगा जीवन भार।
औरा किसी की आस ना मुझको,
सिर्फ भरोसा है तुमा पारा॥

अनुनय-विनय बहुत की उसने,
चरणों में धरा के शीश।
तबा प्रसन्न होकर बाबा ने,
दिया भक्त को यहा आशीषा॥20॥

“अल्ला भला करेगा तेरा”,
पुत्र जन्म हो तेरे घर।
कृपा रहेगी तुझ परा उसकी,
आभा तेरे उसका बालक परा॥

अबा तका नहीं किसी ने पाया,
साईं की कृपा का पारा।
पुत्र रत्न दे मद्रासी को,
धन्य किया उसका संसार॥

तन-मन से जो भजे उसी का,
जग में होता है उद्धारा।
सांचा को आंच नहीं है कोई,
सदा जूठा की होती हारा॥

मैं हूं सदा सहारे उसे,
सदा रहूंगा उसका दासा।
साईं जैसा प्रभु मिला है,
इतना ही काम है क्या आसा॥

मेरा भी दिना था एका ऐसा,
मिलती नहीं मुझे रोटी।
ताना पारा कपड़ा दुरा रहा था,
शेष रही नन्हीं सी लंगोटी॥

सरिता सन्मुख होने पर भी,
मैं प्यासा का प्यासा था।
दुर्दिना मेरा मेरे उपरा,
दावाग्नि बरसता था॥

धरती के अतिरिकता जगत में,
मेरा कुछ अवलंब न था।
बना भिखारी मैं दुनिया में,
दारा-दारा ठोकर खाता था॥

ऐसे में एक मित्र मिला जो,
परम भक्त साईं का था।
जंजालों से मुक्ता मगरा,
जगती में वहा भी मुझसा था॥

बाबा के दर्शन की खातिर,
मिला दोनों ने किया विचारा।
साईं जैसी दया मूर्ति के,
दर्शन को हो गए तैयार॥

पावना शिरडी नगर में जाकारा,
देखा मतवली मुराति।
धन्य जन्म हो गया कि हमने,
जबा देखी साईं की सुरति॥30॥

जबा से किये हैं दर्शन हमने,
दुख सारा कफुरा हो गया।
संकटा सारे मिटाई आभा,
विपदाओं का अंत हो गया॥

मन औरा सम्मान मिला,
भिक्षा में हमको बाबा से।
प्रतिबिम्बिता हो उठे जगत में,
हमा साईं की आभा से॥

बाबा ने सम्मान दिया है,
मन दिया ईसा जीवन में।
इसाका ही संभाल ले में,
हंसता जाउंगा जीवन में॥

साईं की लीला का मेरे,
मन पर ऐसा आसरा हुआ।
लगता जगती के काना-काना में,
जैसा हो वहा भरा हुआ॥

“काशीराम” बाबा का भक्त,
शिर्डी में रहता था।
मैं साईं का साईं मेरा,
वाह दुनिया से कहता था॥

सीकर स्वयं वस्त्र बेचत,
ग्राम-नगर बजारो में।
झंकृता उसकी हृदय तंत्री थी,
साईं की झंकारों में॥

स्तब्ध निशा थी, द सोया,
रजनी आंचला में चंदा सितारे।
नहिं सूझता रहा हाथ को,
हठ तिमिरा के मारे॥

वस्त्र बेचाकरा लौटा रहा था,
हया! हटा से काशी।
विचित्र बड़ा संयोग कि उसका दिन,
अता था एककी॥

घेरा रहा में खड़े हो गए,
उपयोग कुटिला अन्याई।
मारो काटो लूटो इसाकी हि,
ध्वनि पदि सुनै॥

लुटा पिटाकरा उसे वहां से,
कुटिला गए चंपता हो।
अघाटों में मरमहता हो,
उसे दी थी संग्या खो॥40॥

बहुत देर तका पड़ा रहा वाहा,
वहिन उसी हालात में।
जेन काबा कुछ होशा हो उठ,
वहहिं उसकी पलक में॥

अनाजाने ही उसके मुँह से,
निकला पड़ा था सै।
जिसकी प्रतिध्वनि शिरडी में,
बाबा को पड़ी सुनाई॥

क्षुब्ध हो उठा मनसा उनाका,
बाबा गए विकल हो।
लगता जैसा घटाना सारी,
घटी उन्हीं के सन्मुख हो॥

उन्मादी से इधर-उधर तबा,
बाबा लेगे भटकने।
सन्मुख चिजें जो भी ऐ,
उनको लगाणे पटाकाने॥

औरा धड़काते अंगारो में,
बाबा ने अपना करा डाला।
हुए शशांकिता सभी वाहा,
लक्खा तांडवनृत्य निराला॥

समझ गए सबा लोगा,
कि कोई भक्त पदा संकटा में।
क्षुबिता खड़े थे सभी वहां,
पर हुए विस्मय में॥

बचने की ही खातिर इस्तेमाल करो,
बाबा आजा विकल है।
उसकी ही पीड़ा से पिरिता,
उनाका अन्तःस्थल है॥

इतने में ही विविधा ने अपनी,
विचित्रता दिखलाई।
लाख करा जिसे जनता की,
श्रद्धा सरिता लहराई॥

लेकरा संग्याहिना भक्त को,
गादी एका वाह आई।
सन्मुखा आपने देखा भक्त को,
साईं की आँखें भरी आई॥

शांता, धीरा, गंभीरा, सिंधु सा,
बाबा का अंतःस्थला।
अजा न जाने क्यों रहा-रहकरा,
हो जाता था चंचला॥50॥

अजा दया की मूर्ति स्वयं था,
बना हुआ उपचारी।
आभा भक्त के लिए आजा था,
देवा बना प्रतिहारी॥

अजा भक्ति की विषम परीक्षा में,
सफल हुआ काशी।
उसके ही दर्शन की खातिर थे,
उमादे नगर-निवासी॥

जबा भी औरा जहां भी कोई,
भक्त पड़े संकट में।
उसकी रक्षा करें बाबा,
अटे हैं पलभरा में॥

युग-युग का है सत्य यहाँ,
नहीं कोई नई कहानी।
अपतग्रस्ता भक्त जबा होता,
जते खुदा अंतर्यामी॥

भेद-भाव से परे पुजारी,
मानवता के थे साई।
जितने प्यारे हिंदू-मुस्लिमा,
उतने ही द सिक्ख इसाई॥

भेदा-भाव मंदिरा-मस्जिदा का,
तोड़ा-फोड़ा बाबा ने डाला।
रह रहीमा सभी उनाके थे,
कृष्ण करीमा अल्लाताला॥

घंटे की प्रतिध्वनि से गूंजा,
मस्जिद का कोना-कोना।
मिले परसपरा हिंदू-मुस्लिमा,
प्यारा बड़ा दीना-दीना दूना॥

चमत्कारा था कितना सुंदरा,
परिचय ईसा काया ने दी।
औरा नीमा कडुवहता में भी,
मिठासा बाबा ने भरा दी॥

सबा को स्नेह दिया साई ने,
सबको संतुला प्यारा किया।
जो कुछ भी चाहा,
बाबा ने उसे वही दिया॥

ऐसे स्नेहशील भजन का,
नाम सदा जो जप करे।
पर्वत जैसा दुःख न क्यों हो,
पलभरा में वहा दुरा तारे॥60॥

साईं जैसा दाता हमा,
अरे नहीं देखा कोई।
जिसे केवल दर्शन से ही,
सारी विपदा दूर गाई॥

तन में साईं, मन में साईं,
साईं साईं भजा करो।
अपने तन की सुधि-बुधि खोकारा,
सुधि उसकी तुम किया करो॥

जबा तू अपनी सुधि तजा,
बाबा की सुधि किया करेगा।
औरा राता-दीना बाबा-बाबा,
हाय तू राता करेगा॥

बाबा को हैं! विवाशा हो,
सुधि तेरी लेनी ही होगी।
तेरी हारा इच्छा बाबा को,
पूरी ही करनी होगी॥

जांगला, जगंला भटका ना पगला,
औरा ढूंढ़ने बाबा को।
एका जगह केवल शिरडी में,
तू पाएगा बाबा को॥

धन्य जगत में प्राणि है वाहा,
जिसने बाबा को पाया।
दुख में, सुख में प्रहार अथा हो,
साईं का ही गुण गया॥

गिरे संकटों के पर्वत,
चाहे बिजली ही टूटा पड़े।
साई का ले नाम सदा तुमा,
सन्मुख सबा के रहो अड़े॥

ईसा बुड्ढे की सुना करामाता,
तुम हो जाओगे हिराना।
दंगा रहा गाए सुनाकरा जिसे,
जेन कितने चतुर सुजाना॥

एका बड़ा शिरडी में साधु,
ढोंगी था कोई आया।
भोली-भाली नगर-निवासी,
जनता को था भरमाया॥

जदी, बुटियां उनकों ढिक्कारा,
करणे लगा वहा भाषाना।
कहने लगा सुनो श्रोतागण,
घर मेरा है वृन्दावन ॥70॥

औषधि मेरे पास एका है,
औरा अजाबा इसमें शक्ति।
इसे सेवन करने से ही,
हो जाति दुख से मुक्ति॥

अगर मुक्ता होना चाहो,
तुमा संकटा से बिमारी से।
तो है मेरा नम्र निवेदन,
हारा नारा से, हारा नारी से॥

लो खरिदा तुमा इसाको,
इसाकी सेवन विधियां हैं न्यारी।
यद्यपि तुच्च वस्तु है यहा,
गुण उसके हैं अति भारी॥

जो है संतति हिना यहां यादी,
मेरी औषधि को खाए।
पुत्र-रत्न हो प्राप्त,
अरे वाहा मुन्हा मंगा फल पाए॥

औषधि मेरी जो न खरीददे,
जीवन भर पछताएगा।
मुझे जैसा प्राण शायद हाय,
अरे यहां आ पाएगा॥

दुनिया दो दिनों का मेला है,
मौज शौक तुम भी करा लो।
अगर इसे मिलाता है, सबा कुछ,
तुम भी इसको ले लो॥

हेरानी बढती जनता की,
लाखा इसाकी करास्तानी।
प्रमुदिता वाह भी मन- हाय-मन था,
लाखा लोगों की नादानी॥

खबर सुनाने बाबा को याहा,
गया दौडाकर सेवक एका।
सुनकारा भृकुटि तानि आभा,
विस्मरण हो गया सभी विवेका॥

हुकमा दिया सेवका को,
सतवारा पकड़ा दुष्टा को लाओ।
या शिरडी की सीमा से,
कपटी को दूर भगाओ॥

मेरे रहते भोली-भाली,
शिरडी की जनता को।
कौन नीचा ऐसा जो,
सहसा करता है छलने को॥80॥

पलभरा में ऐसे ढोंगी,
कपति नीच लुटेरे को।
महानशा के महागर्ता में पहुंचा,
दुन जीवन भर को॥

तनिका मिला आभासा मदारी,
क्रुरा, कुटिला अन्ययी को।
काला नाचता है अबा सिरा पारा,
गुस्सा आया साईं को॥

पलभरा में सबा खेला बंदा कारा,
भागा सिरा पारा राखकरा पैरा।
सोचा रहा था मन ही मन,
भगवान नहीं है अब खैरा॥

सच्चा है साईं जैसा दानी,
मिला न बन सकेगा जग में।
अनशा ईशा का साईं बाबा,
उनको न कुछ भी मुश्किल जगा में॥

स्नेहा, शिला, सौजन्या आदि का,
आभूषण धारण करा।
बढ़ता ईसा दुनिया में जो भी,
मनवा सेवा के पाठ पारा॥

वही जीता लेता है जगती के,
जन जन का अंतःस्थल।
उसकी एका उदासी ही,
जगा को करा देती है विहवला॥

जबा-जबा जगा में भरा पापा का,
बढ़ा-बाधा ही जाता है।
प्रयोग मिटने की ही खातिर,
अवतारी ही आता है॥

पापा औरा अन्य सभी कुछ,
इस जगती का हारा के।
दुरा भागा देता दुनिया के,
दानवा को क्षण भर के॥

स्नेहा सुधा की धरा बरसाने,
लगती है इस दुनिया में।
गले परस्परा मिलाने लगते,
हैं जन जन अपसा में॥

ऐसे अवतारी साई,
मृत्युलोक में अकरा।
समता का यहा पथ पढ़ाय,
सबको अपान आपा मितकारा ॥90॥

नाम द्वारका मस्जिद का,
राखा शिरडी में साईं ने।
दापा, तप, संतपा मिटाया,
जो कुछ आया साईं ने॥

सदा यदा में मस्त राम की,
बैठे रहते थे साईं।
पहरा अथा ही राम नाम को,
भजते रहते थे साई॥

सुखी रुखी तजि बसि,
चाहे या होवे पकावना।
सौदा प्यारा के भूखे साईं की,
ख़तीरा द सभी समाना॥

स्नेहा आभा श्रद्धा से अपनी,
जाना जो कुछ दे जाते थे।
बड़े चावा से उसका भोजन को,
बाबा पावना कराते थे॥

कभी-कभी मन बहलाने को,
बाबा बागा में जाते थे।
प्रमुदिता मन में निरख प्रकृति,
छटा को वे होते थे॥

रंगा-बिरंगे पुष्प बागा के,
मंदा-मंदा हिला-डुला कराके।
बिहड़ा वीराने मन में भी,
स्नेह सलिला भर जाते थे॥

ऐसी समुधुरा बेला में भी,
दुखा अपटा, विपदा के मारे।
अपने मन की व्यथा सुनाने,
जाना रहते बाबा को घेरे॥

सुनकरा जिनकी करुणाकथा को,
नयना कमला भार अटे थे।
दे विभूति हारा व्यथा, शांति,
उनाके उरा में भार देते थे॥

जेन क्या अद्भुत शिक्षा,
उसकी विभूति में होती थी।
जो धारण कराटे मस्तका पारा,
दुख सारा हारा लेती थी॥

धन्य मनुज वे साक्षात् दर्शन,
जो बाबा साई के पाये।
धन्य कमला करा उनको जिनसे,
चरण-कमला वे परासाय॥100॥

कषा निर्भय तुमको भी,
साक्षात साई मिला जाता।
वर्षाें से उजड़ा चमन अपान,
फिरा से आजा खिला जाता॥

गारा पकड़ता में चरणा श्री के,
नहीं छोड़ता उमरभरा।
मन लेता में जरूरा उनको,
गारा रूठते सै मुझ परा॥

|| Sai Baba Chalisa Lyrics ||

Pahale Sai Ke Charanom Mein,
Apana Shisha Namaun Main।
Kaise Shirdi Sai Aye,
Sara Hala Sunaun Main॥

Kauna Hai Mata, Pita Kauna Hai,
Ye Na Kisi Ne Bhi Jana।
Kahan Janma Sai Ne Dhara,
Prashna Paheli Raha Bana॥

Koi Kahe Ayodhya Ke,
Ye Ramachandra Bhagawana Hain।
Koi Kahata Sai Baba,
Pavana Putra Hanumana Hain॥

Koi Kahata Mangala Murti,
Shri Gajananda Hain Sai।
Koi Kahata Gokula Mohana,
Devaki Nandana Hain Sai॥

Shankara Samajhe Bhakta Kai To,
Baba Ko Bhajate Rahate।
Koi Kaha Avatara Datta Ka,
Puja Sai Ki Karate॥

Kuchha Bhi Mano Unako Tuma,

Para Sai Hain Sachche Bhagawana।
Bade Dayalu Dinabandhu,

Kitanom Ko Diya Jivana Dana॥

Kai Varsha Pahale Ki Ghatana,

Tumhein Sunaunga Mein Bata।
Kisi Bhagyashali Ki,

Shirdi Mein Ai Thi Barata॥

Aya Satha Usi Ke Tha,

Balaka Eka Bahuta Sundara।
Aya, Akara Vahin Basa Gaya,

Pavana Shirdi Kiya Nagara॥

Kai Dino Taka Bhatakata,

Bhiksha Manga Usane Dara-Dara।
Aura Dikhai Aisi Lila,

Jaga Mein Jo Ho Gai Amara॥

Jaise-Jaise Amara Umara Badi,

Badhati Hi Vaise Gai Shana।
Ghara-Ghara Hone Laga Nagara Mein,

Sai Baba Ka Gunagana ॥10॥

Dig-Diganta Mein Laga Gunjane,

Phira To Saiji Ka Nama।
Dina-Dukhi Ki Raksha Karana,

Yahi Raha Baba Ka Kama॥

Baba Ke Charano Mein Jakar,

Jo Kahata Mein Hun Nirdhana।
Daya Usi Para Hoti Unaki,

Khula Jate Duhkha Ke Bandhana॥

Kabhi Kisi Ne Mangi Bhiksha,

Do Baba Mujhako Santana।
Evam Astu Taba Kahakara Sai,

Dete The Usako Varadana॥

Swayam Duhkhi Baba Ho Jate,

Dina-Duhkhi Jana Ka Lakha Hala।
Antahkarana Shri Sai Ka,

Sagara Jaisa Raha Vishala॥

Bhakta Eka Madrasi Aya,

Ghara Ka Bahuta Bada Dhanavana।
Mala Khajana Behada Usaka,

Kevala Nahin Rahi Santana॥

Laga Manane Sainatha Ko,

Baba Mujha Para Daya Karo।
Jhanjha Se Jhankrita Naiya Ko,

Tumhin Meri Para Karo॥

Kuladipaka Ke Bina Andhera,

Chhaya Hua Ghara Mein Mere।
Isalie Aya Hun Baba,

Hokara Sharanagata Tere॥

Kuladipaka Ke Abhava Mein,
Vyartha Hai Daulata Ki Maya।
Aja Bhikhari Banakara Baba,

Sharana Tumhari Mein Aya॥

De Do Mujhako Putra-Dana,

Mein Rini Rahunga Jivana Bhara।
Aura Kisi Ki Asa Na Mujako,

Sirpha Bharosa Hai Tuma Para॥

Anunaya-Vinaya Bahuta Ki Usane,

Charanon Mein Dhara Ke Shisha।
Taba Prasanna Hokara Baba Ne,

Diya Bhakta Ko Yaha Ashisha ॥20॥

“Alla Bhala Karega Tera”,

Putra Janma Ho Tere Ghara।
Kripa Rahegi Tujha Para Usaki,

Aura Tere Usa Balaka Para॥

Aba Taka Nahin Kisi Ne Paya,

Sai Ki Kripa Ka Para।
Putra Ratna De Madrasi Ko,

Dhanya Kiya Usaka Sansara॥

Tana-Mana Se Jo Bhaje Usi Ka,

Jaga Mein Hota Hai Uddhara।
Sancha Ko Ancha Nahin Hain Koi,

Sada Jutha Ki Hoti Hara॥

Main Hun Sada Sahare Usake,

Sada Rahunga Usaka Dasa।
Sai Jaisa Prabhu Mila Hai,

Itani Hi Kama Hai Kya Asa॥

Mera Bhi Dina Tha Eka Aisa,

Milati Nahin Mujhe Roti।
Tana Para Kapada Dura Raha Tha,

Shesha Rahi Nanhin Si Langoti॥

Sarita Sanmukha Hone Para Bhi,

Mein Pyasa Ka Pyasa Tha।
Durdina Mera Mere Upara,

Davagni Barasata Tha॥

Dharati Ke Atirikta Jagata Mein,

Mera Kuchha Avalamba Na Tha।
Bana Bhikhari Main Duniya Mein,

Dara-Dara Thokara Khata Tha॥

Aise Mein Eka Mitra Mila Jo,

Parama Bhakta Sai Ka Tha।
Janjalon Se Mukta Magara,

Jagati Mein Vaha Bhi Mujhasa Tha॥

Baba Ke Darshana Ki Khatira,

Mila Donon Ne Kiya Vichara।
Sai Jaise Daya Murti Ke,

Darshana Ko Ho Gaye Taiyara॥

Pavana Shirdi Nagara Mein Jakara,

Dekha Matavali Murati।
Dhanya Janma Ho Gaya Ki Hamane,

Jaba Dekhi Sai Ki Surati ॥30॥

Jaba Se Kiye Hai Darshana Hamane,

Duhkha Sara Kaphura Ho Gaya।
Sankata Sare Mitai Aura,

Vipadaon Ka Anta Ho Gaya॥

Mana Aura Sammana Mila,

Bhiksha Mein Hamako Baba Se।
Pratibimbita Ho Uthe Jagata Mein,

Hama Sai Ki Abha Se॥

Baba Ne Sammana Diya Hai,

Mana Diya Isa Jivana Mein।
Isaka Hi Sambala Le Mein,

Hansata Jaunga Jivana Mein॥

Sai Ki Lila Ka Mere,

Mana Para Aisa Asara Hua।
Lagata Jagati Ke Kana-Kana Mein,

Jaise Ho Vaha Bhara Hua॥

“Kashirama” Baba Ka Bhakta,

Shirdi Mein Rahata Tha।
Main Sai Ka Sai Mera,

Vaha Duniya Se Kahata Tha॥

Sikara Svayam Vastra Bechata,

Grama-Nagara Bajaro Mein।
Jhankrita Usaki Hridaya Tantri Thi,

Sai Ki Jhankaron Mein॥

Stabdha Nisha Thi, The Soya,

Rajani Anchala Men Chanda Sitare।
Nahin Sujhata Raha Hath Ko,

Hatha Timira Ke Mare॥

Vastra Bechakara Lauta Raha Tha,

Haya! Hata Se Kashi।
Vichitra Bada Sanyoga Ki Usa Dina,

Ata Tha Ekaki॥

Ghera Raha Mein Khade Ho Gaye,

Use Kutila Anyayi।
Maro Kato Luto Isaki Hi,

Dhvani Padi Sunai॥

Luta Pitakara Use Vahan Se,

Kutila Gaye Champata Ho।
Aghaton Me Marmahata Ho,

Usane Di Thi Sangya Kho ॥40॥

Bahuta Dera Taka Pada Raha Vaha,

Vahin Usi Halata Mein।
Jane Kaba Kuchha Hosha Ho Utha,

Vahin Usaki Palaka Mein॥

Anajane Hi Usake Muha Se,

Nikala Pada Tha Sai।
Jisaki Pratidhvani Shirdi Mein,

Baba Ko Padi Sunai॥

Kshubdha Ho Utha Manasa Unaka,

Baba Gaye Vikala Ho।
Lagata Jaise Ghatana Sari,

Ghati Unhi Ke Sanmukha Ho॥

Unmadi Se Idhara-Udhara Taba,

Baba Lege Bhatakane।
Sanmukha Chijein Jo Bhi Ai,

Unako Lagane Patakane॥

Aura Dhadhakate Angaro Mein,

Baba Ne Apana Kara Dala।
Huye Sashankita Sabhi Vaha,

Lakha Tandavanritya Nirala॥

Samajha Gaye Saba Loga,

Ki Koi Bhakta Pada Sankata Mein।
Kshubita Khade The Sabhi Vahan,

Para Huye Vismaya Mein॥

Use Bachane Ki Hi Khatira,

Baba Aja Vikala Hai।
Uski Hi Pida Se Pirita,

Unaka Antahasthala Hai॥

Itane Mein Hi Vividha Ne Apani,

Vichitrata Dikhalayi।
Lakha Kara Jisako Janata Ki,

Shraddha Sarita Laharai॥

Lekara Sangyahina Bhakta Ko,

Gadi Eka Vaha Ayi।
Sanmukha Apane Dekha Bhakta Ko,

Sai Ki Ankhein Bhara Ayi॥

Shanta, Dhira, Gambhira, Sindhu Sa,

Baba Ka Antahsthala।
Aja Na Jane Kyon Raha-Rahakara,

Ho Jata Tha Chanchala ॥50॥

Aja Daya Ki Murti Svayam Tha,

Bana Hua Upachari।
Aura Bhakta Ke Liye Aja Tha,

Deva Bana Pratihari॥

Aja Bhakti Ki Vishama Pariksha Mein,

Saphala Hua Tha Kashi।
Usake Hi Darshana Ki Khatira The,

Umade Nagara-Nivasi॥

Jaba Bhi Aura Jahan Bhi Koi,

Bhakta Pade Sankata Mein।
Usaki Raksha Karane Baba,

Ate Hain Palabhara Mein॥

Yuga-Yuga Ka Hai Satya Yaha,

Nahin Koi Nai Kahani।
Apatagrasta Bhakta Jaba Hota,

Jate Khuda Antaryami॥

Bheda-Bhava Se Pare Pujari,

Manavata Ke The Sai।
Jitane Pyare Hindu-Muslima,

Utane Hi The Sikkha Isai॥

Bheda-Bhava Mandira-Masjida Ka,

Toda-Phoda Baba Ne Dala।
Raha Rahima Sabhi Unake The,

Krishna Karima Allatala॥

Ghante Ki Pratidhvani Se Gunja,

Masjida Ka Kona-Kona।
Mile Paraspara Hindu-Muslima,

Pyara Bada Dina-Dina Duna॥

Chamatkara Tha Kitana Sundara,

Parichaya Isa Kaya Ne Di।
Aura Nima Kaduvahata Mein Bhi,

Mithasa Baba Ne Bhara Di॥

Saba Ko Sneha Diya Sai Ne,

Sabako Santula Pyara Kiya।
Jo Kuchha Jisane Bhi Chaha,

Baba Ne Usako Vahi Diya॥

Aise Snehashila Bhajana Ka,

Nama Sada Jo Japa Kare।
Parvata Jaisa Duhkha Na Kyon Ho,

Palabhara Mein Vaha Dura Tare ॥60॥

Sai Jaisa Data Hama,

Are Nahin Dekha Koi।
Jisake Kevala Darshana Se Hi,

Sari Vipada Dura Gai॥

Tana Mein Sai, Mana Mein Sai,

Sai Sai Bhaja Karo।
Apane Tana Ki Sudhi-Budhi Khokara,

Sudhi Usaki Tuma Kiya Karo॥

Jaba Tu Apani Sudhi Taja,

Baba Ki Sudhi Kiya Karega।
Aura Rata-Dina Baba-Baba,

Hi Tu Rata Karega॥

To Baba Ko Are! Vivasha Ho,

Sudhi Teri Leni Hi Hogi।
Teri Hara Ichchha Baba Ko,

Puri Hi Karani Hogi॥

Jangala, Jaganla Bhataka Na Pagala,

Aura Dhundhane Baba Ko।
Eka Jagaha Kevala Shirdi Mein,

Tu Paega Baba Ko॥

Dhanya Jagata Mein Prani Hai Vaha,

Jisane Baba Ko Paya।
Duhkha Mein, Sukha Mein Prahara Atha Ho,

Sai Ka Hi Guna Gaya॥

Gire Sankaton Ke Parvata,

Chahe Bijali Hi Tuta Pade।
Sai Ka Le Nama Sada Tuma,

Sanmukha Saba Ke Raho Ade॥

Isa Budhe Ki Suna Karamata,

Tuma Ho Jaoge Hairana।
Danga Raha Gae Sunakara Jisako,

Jane Kitane Chatura Sujana॥

Eka Bara Shirdi Mein Sadhu,

Dhongi Tha Koi Aya।
Bholi-Bhali Nagara-Nivasi,

Janata Ko Tha Bharamaya॥

Jadi, Butiyan Unhein Dhikhakara,

Karane Laga Vaha Bhashana।
Kahane Laga Suno Shrotagana,

Ghara Mera Hai Vrindavana ॥70॥

Aushadhi Mere Pasa Eka Hai,

Aura Ajaba Isamein Shakti।
Isake Sevana Karane Se Hi,

Ho Jati Duhkha Se Mukti॥

Agara Mukta Hona Chaho,

Tuma Sankata Se Bimari Se।
To Hai Mera Namra Nivedana,

Hara Nara Se, Hara Nari Se॥

Lo Kharida Tuma Isako,

Isaki Sevana Vidhiyan Hain Nyari।
Yadyapi Tuchchha Vastu Hai Yaha,

Guna Usake Hain Ati Bhari॥

Jo Hai Santati Hina Yahan Yadi,

Meri Aushadhi Ko Khae।
Putra-Ratna Ho Prapta,

Are Vaha Munha Manga Phala Pae॥

Aushadhi Meri Jo Na Kharide,

Jivana Bhara Pachhatayega।
Mujha Jaisa Prani Shayada Hi,

Are Yahan Aa Payega॥

Duniya Do Dinon Ka Mela Hai,

Mauja Shauka Tuma Bhi Kara Lo।
Agara Isase Milata Hai,

Saba Kuchha,Tuma Bhi Isako Le Lo॥

Hairani Badhati Janata Ki,

Lakha Isaki Karastani।
Pramudita Vaha Bhi Mana- Hi-Mana Tha,

Lakha Logon Ki Nadani॥

Khabara Sunane Baba Ko Yaha,

Gaya Daudakara Sevaka Eka।
Sunakara Bhrikuti Tani Aura,

Vismarana Ho Gaya Sabhi Viveka॥

Hukma Diya Sevaka Ko,

Satvara Pakada Dushta Ko Lao।
Ya Shirdi Ki Sima Se,

Kapati Ko Dura Bhagao॥

Mere Rahate Bholi-Bhali,

Shirdi Ki Janata Ko।
Kauna Nicha Aisa Jo,

Sahasa Karata Hai Chhalane Ko ॥80॥

Palabhara Mein Aise Dhongi,

Kapati Nicha Lutere Ko।
Mahanasha Ke Mahagarta Mein Pahuncha,

Dun Jivana Bhara Ko॥

Tanika Mila Abhasa Madari,

Krura, Kutila Anyayi Ko।
Kala Nachata Hai Aba Sira Para,

Gussa Aya Sai Ko॥

Palabhara Mein Saba Khela Banda Kara,

Bhaga Sira Para Rakhakara Paira।
Socha Raha Tha Mana Hi Mana,

Bhagawana Nahi Hai Aba Khaira॥

Sacha Hai Sai Jaisa Dani,

Mila Na Sakega Jaga Mein।
Ansha Isha Ka Sai Baba,

Unhein Na Kuchha Bhi Mushkila Jaga Mein॥

Sneha, Shila, Saujanya Adi Ka,

Abhushana Dharana Kara।
Badhata Isa Duniya Mein Jo Bhi,

Manava Seva Ke Patha Para॥

Vahi Jita Leta Hai Jagati Ke,

Jana Jana Ka Antahsthala।
Usaki Eka Udasi Hi,

Jaga Ko Kara Deti Hai Vihvala॥

Jaba-Jaba Jaga Mein Bhara Papa Ka,

Badha-Badha Hi Jata Hai।
Use Mitane Ki Hi Khatira,

Avatari Hi Ata Hai॥

Papa Aura Anyaya Sabhi Kuchha,

Isa Jagati Ka Hara Ke।
Dura Bhaga Deta Duniya Ke,

Danava Ko Kshana Bhara Ke॥

Sneha Sudha Ki Dhara Barasane,

Lagati Hai Isa Duniya Mein।
Gale Paraspara Milane Lagate,

Hain Jana Jana Apasa Mein॥

Aise Avatari Sai,

Mrityuloka Mein Akara।
Samata Ka Yaha Patha Padhaya,

Sabako Apana Apa Mitakara ॥90॥

Nama Dwaraka Masjida Ka,

Rakha Shirdi Mein Sai Ne।
Dapa, Tapa, Santapa Mitaya,

Jo Kuchha Aya Sai Ne॥

Sada Yada Mein Masta Rama Ki,

Baithe Rahate The Sai।
Pahara Atha Hi Rama Nama Ko,

Bhajate Rahate The Sai॥

Sukhi Rukhi Taji Basi,

Chahe Ya Hove Pakavana।
Sauda Pyara Ke Bhukhe Sai Ki,

Khatira The Sabhi Samana॥

Sneha Aura Shraddha Se Apani,

Jana Jo Kuchha De Jate The।
Bade Chava Se Usa Bhojana Ko,

Baba Pavana Karate The॥

Kabhi-Kabhi Mana Bahalane Ko,

Baba Baga Mein Jate The।
Pramudita Mana Mein Nirakha Prakriti,

Chhata Ko Ve Hote The॥

Ranga-Birange Pushpa Baga Ke,

Manda-Manda Hila-Dula Karake।
Bihada Virane Mana Mein Bhi,

Sneha Salila Bhara Jate The॥

Aisi Samudhura Bela Mein Bhi,

Dukha Apata, Vipada Ke Mare।
Apane Mana Ki Vyatha Sunane,

Jana Rahate Baba Ko Ghere॥

Sunakara Jinaki Karunakatha Ko,

Nayana Kamala Bhara Ate The।
De Vibhuti Hara Vyatha, Shanti,

Unake Ura Mein Bhara Dete The॥

Jane Kya Adbhuta Shikta,

Usa Vibhuti Mein Hoti Thi।
Jo Dharana Karate Mastaka Para,

Duhkha Sara Hara Leti Thi॥

Dhanya Manuja Ve Sakshat Darshana,

Jo Baba Sai Ke Paye।
Dhanya Kamala Kara Unake Jinase,

Charana-Kamala Ve Parasaye ॥100॥

Kasha Nirbhaya Tumako Bhi,

Sakshat Sai Mila Jata।
Varshon Se Ujada Chamana Apana,

Phira Se Aja Khila Jata॥

Gara Pakadata Mein Charana Shri Ke,

Nahin Chhodata Umrabhara।
Mana Leta Mein Jarura Unako,

Gara Ruthate Sai Mujha Para॥



साईं बाबा कौन से देवता हैं?

साईं बाबा का संबंध विशेष रूप से हिंदू और मुस्लिम धर्म दोनों से है। उन्हें एक संत और गुरु के रूप में पूजा जाता है। साईं बाबा को एक दिव्य शक्ति और आदर्श साधक के रूप में माना जाता है, जो लोगों को धार्मिक एकता और मानवता का संदेश देते हैं। उनकी शिक्षाएं मानवता, प्रेम और सेवा पर केंद्रित हैं। उनके भक्त उन्हें भगवान के रूप में मानते हैं, जबकि उनकी शिक्षाएं किसी एक धर्म की सीमाओं को पार करती हैं। इस प्रकार, साईं बाबा को विशेष रूप से एक ऐसे संत के रूप में देखा जाता है, जो विभिन्न धार्मिक परंपराओं को एकीकृत करता है और समाज में एकता और भाईचारे का प्रतीक है।

स्वामी साईं बाबा कौन हैं?

स्वामी साईं बाबा, जिनके नाम से भी जाना जाता है, एक प्रमुख भारतीय संत और गुरु हैं जिनका जीवन और शिक्षाएं हिन्दू और मुस्लिम धर्मों में समान रूप से सम्मानित हैं। वे शिर्डी के एक छोटे से गाँव में निवास करते थे और उनकी शिक्षाएं प्रेम, सेवा, और धार्मिक सहिष्णुता पर आधारित थीं। साईं बाबा का जीवन विशेष रूप से दिव्यता, अचंभे और चमत्कारों से भरा हुआ था, जो उनके अनुयायियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने अपने अनुयायियों को सिखाया कि सच्चा धर्म केवल पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे अपने कर्मों और जीवनशैली में भी दिखाया जाना चाहिए।

साईं बाबा का असली नाम कौन है?

साईं बाबा का असली नाम विवादित है और इसके बारे में कई मत हैं। अधिकांश लोग मानते हैं कि उनका जन्म नाम ‘साईनाथ’ था, लेकिन उनका पूरा जन्म विवरण और नाम अस्पष्ट है। उन्होंने अपने जीवन के अधिकांश समय को शिर्डी में बिताया और वहाँ के लोग उन्हें ‘साईं बाबा’ के नाम से जानते हैं। उनके बारे में मौजूद विभिन्न खातों के अनुसार, कुछ लोग मानते हैं कि वे एक मुस्लिम परिवार से थे, जबकि अन्य मानते हैं कि उनका संबंध हिन्दू धर्म से था। इस प्रकार, साईं बाबा का असली नाम और उनका जन्म स्थान भी एक रहस्य बना हुआ है।

साईं बाबा को भगवान क्यों मानते हैं?

साईं बाबा को भगवान मानने का मुख्य कारण उनकी दिव्यता और उनकी शिक्षाओं की व्यापकता है। उन्होंने जीवन के हर पहलू में आदर्शता और समर्पण का उदाहरण प्रस्तुत किया। उनकी शिक्षाएं मानवता, प्रेम, और धार्मिक सहिष्णुता के सिद्धांतों पर आधारित थीं। भक्त उन्हें एक चमत्कारी शक्ति के रूप में मानते हैं जिन्होंने अनेक चमत्कार किए और लोगों की कठिनाइयों को दूर किया। साईं बाबा की भक्ति और उनके अनुयायियों का अटूट विश्वास उन्हें एक दिव्य शक्ति और भगवान के रूप में मानता है, जिन्होंने अपने जीवन के माध्यम से लोगों को सच्चे धर्म और प्रेम का संदेश दिया।

इस्लाम में साईं क्या है?

इस्लाम में ‘साईं’ शब्द का उपयोग आमतौर पर एक धार्मिक या आध्यात्मिक नेता के लिए किया जाता है। ‘साईं’ अरबी भाषा के शब्द ‘सईद’ से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ ‘खुशहाल’ या ‘धन्य’ होता है। इस्लाम में साईं बाबा का स्थान अलग है क्योंकि वे एक हिन्दू-मुस्लिम संत के रूप में प्रसिद्ध हैं। मुस्लिम समुदाय में साईं बाबा को एक सम्मानित धार्मिक व्यक्तित्व के रूप में माना जाता है, जिनकी शिक्षाएं और जीवन अन्य धर्मों के साथ समानता और सहिष्णुता का संदेश देती हैं। उनके अनुयायी उन्हें धार्मिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में मानते हैं।


साई चालीसा पाठ के लाभ

साई चालीसा, साईं बाबा की भक्ति में रचित एक पवित्र स्तोत्र है, जो चालीस चौपाइयों में उनकी महिमा, गुणों और कृपा का वर्णन करता है। इसका नियमित पाठ भक्त के जीवन पर गहरा आध्यात्मिक, मानसिक और भावनात्मक प्रभाव छोड़ता है। इसके कुछ प्रमुख लाभ इस प्रकार हैं:

1. आध्यात्मिक शांति और आंतरिक शक्ति: साई चालीसा का पाठ मन को एकाग्र करके भटकाव रोकता है। इससे मन शांत होता है और आत्मिक शक्ति का विकास होता है। बाबा की करुणामयी छवि पर ध्यान केंद्रित करने से भक्त को आंतरिक साहस और धैर्य की प्राप्ति होती है, जो जीवन की कठिनाइयों का सामना करने में सहायक होती है।

2. मानसिक तनाव से मुक्ति: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव और चिंता आम समस्या हैं। चालीसा का पाठ एक प्रकार की ध्यान-साधना है। यह मन के नकारात्मक विचारों को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है, जिससे मानसिक उलझनें कम होती हैं और तनाव से मुक्ति मिलती है।

3. भक्ति और समर्पण की भावना का विकास: चालीसा की प्रत्येक चौपाई साईं बाबा के प्रति प्रेम और समर्पण से ओत-प्रोत है। इसके नियमित पाठ से हृदय में भक्ति की गहरी भावना जागृत होती है। व्यक्ति स्वार्थी भावनाओं से ऊपर उठकर ईश्वरीय प्रेम और सेवा की ओर अग्रसर होता है।

4. आशीर्वाद और कृपा की प्राप्ति: मान्यता है कि श्रद्धा और सच्चे मन से चालीसा का पाठ करने पर साईं बाबा की विशेष कृपा भक्त पर बनी रहती है। उनकी कृपा से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, संकटों से रक्षा होती है और घर-परिवार में सुख-शांति का वास होता है। बाबा अपने भक्तों को हर संकट से उबारने का आश्वासन देते हैं।

5. नैतिक मूल्यों और चरित्र का सुदृढ़ीकरण: साई चालीसा के माध्यम से बाबा के जीवन दर्शन और उपदेशों से सीख मिलती है। उनके द्वारा प्रतिपादित सत्य, प्रेम, दया, करुणा, शांति और सेवा जैसे मूल्य हृदय में बसते हैं। इससे व्यक्ति के चरित्र का निर्माण होता है और वह एक बेहतर इंसान बनता है।

6. एकाग्रता और संकल्प शक्ति में वृद्धि: चालीसा पाठ करते समय मन, वचन और कर्म से बाबा में लीन होना पड़ता है। इस अभ्यास से एकाग्रता बढ़ती है। दृढ़ संकल्प की शक्ति विकसित होती है, जो किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक सिद्ध होती है।

7. सकारात्मक वातावरण का निर्माण: मंत्रों और स्तुतियों का उच्चारण वातावरण में सकारात्मक कंपन पैदा करता है। घर में नियमित चालीसा पाठ से वहां का वातावरण पवित्र और शांतिमय बनता है, जिसका सकारात्मक प्रभाव परिवार के सभी सदस्यों पर पड़ता है।



साईं बाबा कौन से देवता हैं?

साईं बाबा का संबंध विशेष रूप से हिंदू और मुस्लिम धर्म दोनों से है। उन्हें एक संत और गुरु के रूप में पूजा जाता है। साईं बाबा को एक दिव्य शक्ति और आदर्श साधक के रूप में माना जाता है, जो लोगों को धार्मिक एकता और मानवता का संदेश देते हैं। उनकी शिक्षाएं मानवता, प्रेम और सेवा पर केंद्रित हैं। उनके भक्त उन्हें भगवान के रूप में मानते हैं, जबकि उनकी शिक्षाएं किसी एक धर्म की सीमाओं को पार करती हैं। इस प्रकार, साईं बाबा को विशेष रूप से एक ऐसे संत के रूप में देखा जाता है, जो विभिन्न धार्मिक परंपराओं को एकीकृत करता है और समाज में एकता और भाईचारे का प्रतीक है।

स्वामी साईं बाबा कौन हैं?

स्वामी साईं बाबा, जिनके नाम से भी जाना जाता है, एक प्रमुख भारतीय संत और गुरु हैं जिनका जीवन और शिक्षाएं हिन्दू और मुस्लिम धर्मों में समान रूप से सम्मानित हैं। वे शिर्डी के एक छोटे से गाँव में निवास करते थे और उनकी शिक्षाएं प्रेम, सेवा, और धार्मिक सहिष्णुता पर आधारित थीं। साईं बाबा का जीवन विशेष रूप से दिव्यता, अचंभे और चमत्कारों से भरा हुआ था, जो उनके अनुयायियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने अपने अनुयायियों को सिखाया कि सच्चा धर्म केवल पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे अपने कर्मों और जीवनशैली में भी दिखाया जाना चाहिए।

साईं बाबा का असली नाम कौन है?

साईं बाबा का असली नाम विवादित है और इसके बारे में कई मत हैं। अधिकांश लोग मानते हैं कि उनका जन्म नाम ‘साईनाथ’ था, लेकिन उनका पूरा जन्म विवरण और नाम अस्पष्ट है। उन्होंने अपने जीवन के अधिकांश समय को शिर्डी में बिताया और वहाँ के लोग उन्हें ‘साईं बाबा’ के नाम से जानते हैं। उनके बारे में मौजूद विभिन्न खातों के अनुसार, कुछ लोग मानते हैं कि वे एक मुस्लिम परिवार से थे, जबकि अन्य मानते हैं कि उनका संबंध हिन्दू धर्म से था। इस प्रकार, साईं बाबा का असली नाम और उनका जन्म स्थान भी एक रहस्य बना हुआ है।

साईं बाबा को भगवान क्यों मानते हैं?

साईं बाबा को भगवान मानने का मुख्य कारण उनकी दिव्यता और उनकी शिक्षाओं की व्यापकता है। उन्होंने जीवन के हर पहलू में आदर्शता और समर्पण का उदाहरण प्रस्तुत किया। उनकी शिक्षाएं मानवता, प्रेम, और धार्मिक सहिष्णुता के सिद्धांतों पर आधारित थीं। भक्त उन्हें एक चमत्कारी शक्ति के रूप में मानते हैं जिन्होंने अनेक चमत्कार किए और लोगों की कठिनाइयों को दूर किया। साईं बाबा की भक्ति और उनके अनुयायियों का अटूट विश्वास उन्हें एक दिव्य शक्ति और भगवान के रूप में मानता है, जिन्होंने अपने जीवन के माध्यम से लोगों को सच्चे धर्म और प्रेम का संदेश दिया।

इस्लाम में साईं क्या है?

इस्लाम में ‘साईं’ शब्द का उपयोग आमतौर पर एक धार्मिक या आध्यात्मिक नेता के लिए किया जाता है। ‘साईं’ अरबी भाषा के शब्द ‘सईद’ से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ ‘खुशहाल’ या ‘धन्य’ होता है। इस्लाम में साईं बाबा का स्थान अलग है क्योंकि वे एक हिन्दू-मुस्लिम संत के रूप में प्रसिद्ध हैं। मुस्लिम समुदाय में साईं बाबा को एक सम्मानित धार्मिक व्यक्तित्व के रूप में माना जाता है, जिनकी शिक्षाएं और जीवन अन्य धर्मों के साथ समानता और सहिष्णुता का संदेश देती हैं। उनके अनुयायी उन्हें धार्मिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में मानते हैं।

साईं बाबा की पूजा कौन करता है?

साईं बाबा की पूजा विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग करते हैं। उनकी शिक्षाएं हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्मों में समान रूप से स्वीकार की जाती हैं, इसलिए उनके भक्तों की विविधता भी बहुत बड़ी है। साईं बाबा के अनुयायी उन्हें एक दिव्य शक्ति और मार्गदर्शक मानते हैं और उनकी पूजा विभिन्न तरीकों से की जाती है, जैसे कि आरती, भजन, और पूजा अर्चना। उनकी पूजा न केवल भारत में बल्कि विश्व भर में की जाती है, जहां लोग उनकी शिक्षाओं और चमत्कारों से प्रेरित होकर उन्हें श्रद्धा और भक्ति से पूजते हैं।

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श्री गोपाल चालीसा pdf (Shri Gopal Chalisa Pdf) एक प्रसिद्ध भक्ति रचना है जो भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित है। यह चालीसा उनके अनेक भक्तों द्वारा उनकी महिमा और लीलाओं का गुणगान करने के लिए गायी जाती है। भगवान श्रीकृष्ण को ‘गोपाल’ के नाम से भी जाना जाता है, जो ग्वालों के पालक और गायों के रक्षक हैं। श्री गोपाल चालीसा का पाठ करने से भक्तों को भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त होती है और उनके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है।

श्री गोपाल चालीसा का मुख्य उद्देश्य भगवान श्रीकृष्ण की महिमा का वर्णन करना और उनकी लीलाओं का स्मरण करना है। इस चालीसा में 40 छंद होते हैं, जो श्रीकृष्ण के विभिन्न रूपों, लीलाओं और गुणों का वर्णन करते हैं। प्रत्येक छंद में श्रीकृष्ण के विभिन्न नामों और उनके कार्यों का गुणगान किया गया है।

श्रीकृष्ण का जीवन और उनकी लीलाएँ भारतीय संस्कृति और धर्म में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। वे योगेश्वर, गोविंद, मुरलीधर, कान्हा, नंदलाल, आदि अनेक नामों से प्रसिद्ध हैं। उनकी बाल लीलाओं से लेकर गीता का उपदेश देने तक, हर रूप में श्रीकृष्ण ने अपने भक्तों को जीवन के सत्य और धर्म का मार्ग दिखाया है। श्री गोपाल चालीसा में इन्हीं लीलाओं और गुणों का सुंदर वर्णन किया गया है, जो भक्तों को श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम और भक्ति से भर देता है।

श्री गोपाल चालीसा का पाठ नियमित रूप से करने से मन को शांति मिलती है और जीवन में सकारात्मकता का संचार होता है। यह चालीसा विशेष रूप से उन भक्तों के लिए लाभकारी है जो अपने जीवन में कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं या मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं। भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पण और उनकी महिमा का गान करने से हर कठिनाई दूर हो जाती है और भक्त को भगवान की अनंत कृपा प्राप्त होती है।

श्री गोपाल चालीसा को किसी भी समय और किसी भी स्थान पर पढ़ा जा सकता है। इसे पढ़ने के लिए किसी विशेष विधि या नियम का पालन करने की आवश्यकता नहीं है। भक्तजन अपनी श्रद्धा और विश्वास के अनुसार इसका पाठ कर सकते हैं और श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त कर सकते हैं।

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Complete Lyrics in Hindi

|| श्री गोपाल चालीसा PDF ||

।। दोहा ।।

श्री राधापद कमल रज, सिर धरि यमुना कूल।
वरणो चालीसा सरस, सकल सुमंगल मूल।।

।। चौपाई ।।

जय जय पूरण ब्रह्म बिहारी, दुष्ट दलन लीला अवतारी।
जो कोई तुम्हरी लीला गावै, बिन श्रम सकल पदारथ पावै।

श्री वसुदेव देवकी माता, प्रकट भये संग हलधर भ्राता।
मथुरा सों प्रभु गोकुल आये, नन्द भवन मे बजत बधाये।

जो विष देन पूतना आई, सो मुक्ति दै धाम पठाई।
तृणावर्त राक्षस संहारयौ, पग बढ़ाय सकटासुर मार्यौ।

खेल खेल में माटी खाई, मुख मे सब जग दियो दिखाई।
गोपिन घर घर माखन खायो, जसुमति बाल केलि सुख पायो।

ऊखल सों निज अंग बँधाई, यमलार्जुन जड़ योनि छुड़ाई।
बका असुर की चोंच विदारी, विकट अघासुर दियो सँहारी।

ब्रह्मा बालक वत्स चुराये, मोहन को मोहन हित आये।
बाल वत्स सब बने मुरारी, ब्रह्मा विनय करी तब भारी।

काली नाग नाथि भगवाना, दावानल को कीन्हों पाना।
सखन संग खेलत सुख पायो, श्रीदामा निज कन्ध चढ़ायो।

चीर हरन करि सीख सिखाई, नख पर गिरवर लियो उठाई।
दरश यज्ञ पत्निन को दीन्हों, राधा प्रेम सुधा सुख लीन्हों।

नन्दहिं वरुण लोक सों लाये, ग्वालन को निज लोक दिखाये।
शरद चन्द्र लखि वेणु बजाई, अति सुख दीन्हों रास रचाई।

अजगर सों पितु चरण छुड़ायो, शंखचूड़ को मूड़ गिरायो।
हने अरिष्टा सुर अरु केशी, व्योमासुर मार्यो छल वेषी।

व्याकुल ब्रज तजि मथुरा आये, मारि कंस यदुवंश बसाये।
मात पिता की बन्दि छुड़ाई, सान्दीपन गृह विघा पाई।

पुनि पठयौ ब्रज ऊधौ ज्ञानी, पे्रम देखि सुधि सकल भुलानी।
कीन्हीं कुबरी सुन्दर नारी, हरि लाये रुक्मिणि सुकुमारी।

भौमासुर हनि भक्त छुड़ाये, सुरन जीति सुरतरु महि लाये।
दन्तवक्र शिशुपाल संहारे, खग मृग नृग अरु बधिक उधारे।

दीन सुदामा धनपति कीन्हों, पाराि रथ सारथि यश लीन्हों।
गीता ज्ञान सिखावन हारे, अर्जुन मोह मिटावन हारे।

केला भक्त बिदुर घर पायो, युद्ध महाभारत रचवायो।
द्रुपद सुता को चीर बढ़ायो, गर्भ परीक्षित जरत बचायो।

कच्छ मच्छ वाराह अहीशा, बावन कल्की बुद्धि मुनीशा।
ह्वै नृसिंह प्रह्लाद उबार्यो, राम रुप धरि रावण मार्यो।

जय मधु कैटभ दैत्य हनैया, अम्बरीय प्रिय चक्र धरैया।
ब्याध अजामिल दीन्हें तारी, शबरी अरु गणिका सी नारी।

गरुड़ासन गज फन्द निकन्दन, देहु दरश धु्रव नयनानन्दन।
देहु शुद्ध सन्तन कर सग्ड़ा, बाढ़ै प्रेम भक्ति रस रग्ड़ा।

देहु दिव्य वृन्दावन बासा, छूटै मृग तृष्णा जग आशा।
तुम्हरो ध्यान धरत शिव नारद, शुक सनकादिक ब्रह्म विशारद।

जय जय राधारमण कृपाला, हरण सकल संकट भ्रम जाला।
बिनसैं बिघन रोग दुःख भारी, जो सुमरैं जगपति गिरधारी।

जो सत बार पढ़ै चालीसा, देहि सकल बाँछित फल शीशा।

।। छन्द ।।

गोपाल चालीसा पढ़ै नित, नेम सों चित्त लावई।
सो दिव्य तन धरि अन्त महँ, गोलोक धाम सिधावई।।

संसार सुख सम्पत्ति सकल, जो भक्तजन सन महँ चहैं।
ट्टजयरामदेव’ सदैव सो, गुरुदेव दाया सों लहैं।।

।। दोहा ।।

प्रणत पाल अशरण शरण, करुणा—सिन्धु ब्रजेश।
चालीसा के संग मोहि, अपनावहु प्राणेश।।

|| Shri Gopal Chalisa PDF in Hindi Lyrics ||

॥ Doha ॥

Shri Radhapada Kamala Raja,Shri Yamuna Kula।
Varano Chalisa Sarasa,Sakala Sumangala Mula॥

॥ Chaupai ॥

Jai Jai Purana Brahma Bihari।Dushta Dalana Lila Avatari॥
Jo Koi Tumhari Lila Gave।Bina Shrama Sakala Padaratha Pave॥

Shri Vasudeva Devaki Mata।Prakata Bhaye Sanga Haladhara Bhrata॥
Mathura Son Prabhu Gokula Aye।Nanda Bhavana Mein Bajata Badhaye॥

Jo Visha Dena Putana Ayi।So Mukti Dai Dhama Pathai॥
Trinavarta Rakshasa Samharyau।Paga Badhaya Sakatasura Maryau॥

Khela Khela Mein Mati Khai।Mukha Mein Saba Jaga Diyo Dikhai॥
Gopina Ghara Ghara Makhana Khayo।Jasumati Bala Keli Sukha Payo॥

Ukhala Son Nija Anga Bandhai।Yamalarjuna Jada Yoni Chhudai॥
Baka Asura Ki Choncha Vidari।Vikata Aghasura Diyo Sanhari॥

Brahma Balaka Vatsa Churaye।Mohana Ko Mohana Hita Aye॥
Bala Vatsa Saba Bane Murari।Brahma Vinaya Kari Taba Bhari॥

Kali Naga Nathi Bhagawana।Davanala Ko Kinhon Pana॥
Sakhana Sanga Khelata Sukha Payo।Shridama Nija Kandha Chadhayo॥

Chira Harana Kari Sikha Sikhayi।Nakha Para Giravara Liyo Uthayi॥
Darasha Yajna Patnina Ko Dinhon।Radha Prema Sudha Sukha Linhon॥

Nandahin Varuna Loka So Laye।Gwalana Ko Nija Loka Dikhaye॥
Sharada Chandra Lakhi Venu Bajayi।Ati Sukha Dinhon Rasa Rachayi॥

Ajagara So Pitu Charana Chudayo।Shankhachuda Ko Muda Girayo॥
Hane Arishta Sura Aru Keshi।Vyomasura Maryo Chala Veshi॥

Vyakula Braja Taji Mathura Aye।Mari Kansa Yaduvansha Basaye॥
Mata Pita Ki Bandi Chudayi।Sandipana Griha Vigha Payi॥

Puni Pathayau Braja Udhau Gyani।Prema Dekhi Sudhi Sakala Bhulani॥
Kinhin Kubari Sundara Nari।Hari Laye Rukmini Sukumari॥

Bhaumasura Hani Bhakta Chhudaye।Surana Jiti Surataru Mahi Laye॥
Dantavakra Shishupala Sanhare।Khaga Mriga Nriga Aru Badhika Udhare॥

Dina Sudama Dhanapati Kinhon।Paratha Ratha Sarathi Yasha Linhon॥
Gita Gyana Sikhavana Hare।Arjuna Moha Mitawana Hare॥

Kela Bhakta Bidura Ghara Payo।Yuddha Mahabharata Rachavayo॥
Drupada Suta Ko Chira Badhayo।Garbha Parikshita Jarata Bachayo॥

Kachchha Machchha Varaha Ahisha।Bavana Kalki Buddhi Munisha॥
Hwai Nrisimha Prahlada Ubaryo।Rama Rupa Dhari Ravana Maryo॥

Jai Madhu Kaitabha Daitya Hanaiya।Ambariya Priya Chakra Dharaiya॥
Byadha Ajamila Dinhen Tari।Shabri Aru Ganika Si Nari॥

Garudasana Gaja Phanda Nikandana।Dehu Darasha Dhruva Nayananandana॥
Dehu Shuddha Santana Kara Sanga।Badhai Prema Bhakti Rasa Ranga॥

Dehu Divya Vrindavana Basa।Chhute Mriga Trishna Jaga Asha॥
Tumharo Dhyana Dharata Shiva Narada।Shuka Sanakadika Brahmana Visharada॥

Jai Jai Radharamana Kripala।Harana Sakala Sankata Bhrama Jala॥
Binasain Bighana Roga Duhkha Bhari।Jo Sumare Jagapati Giradhari॥

Jo Sata Bara Padhai Chalisa।Dehi Sakala Banchhita Phala Shisha॥

॥ Chhanda ॥
Gopala Chalisa Padhai Nita,Nema Son Chitta Lavai।
So Divya Tana Dhari Anta Mahana,Goloka Dhama Sidhavai॥

Sansara Sukha Sampatti Sakala,Jo Bhaktajana Sana Mahan Chahain।
Jayaramadeva’ Sadaiva So,Gurudeva Daya Son Lahain॥

॥ Doha ॥
Pranata Pala Asharana Sharana,Karuna-Sindhu Brajesha।
Chalisa Ke Sanga Mohi,Apanavahu Pranesha॥


पुत्र प्राप्ति के लिए गोपाल चालीसा pdf - Shri Gopal Chalisa PDF

पुत्र प्राप्ति के लिए गोपाल चालीसा PDF एक महत्वपूर्ण साधन है जो भारतीय धार्मिक परंपराओं में संतान सुख की इच्छा रखने वाले दंपतियों के लिए उपयोगी मानी जाती है। गोपाल चालीसा भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप की स्तुति है, जिसमें उनकी लीला, गुण और कृपा का वर्णन किया गया है। इसे नियमित रूप से पढ़ने से भक्तों को मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और इच्छित फल की प्राप्ति होती है।

पुत्र प्राप्ति के लिए गोपाल चालीसा का पाठ विशेष रूप से श्रावण मास, जन्माष्टमी, या किसी शुभ दिन पर प्रारंभ करना शुभ माना जाता है। इसे सुबह स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर, भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति के सामने दीप जलाकर पढ़ना चाहिए। गोपाल चालीसा PDF को डाउनलोड करके मोबाइल या प्रिंटेड फॉर्म में भी रखा जा सकता है ताकि इसे आसानी से पढ़ा जा सके।

इस चालीसा में 40 चौपाइयां होती हैं, जो श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं और उनकी दयालुता का गुणगान करती हैं। ऐसी मान्यता है कि यदि इसे श्रद्धा और विश्वास के साथ पढ़ा जाए, तो भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों की मनोकामना अवश्य पूर्ण करते हैं।

ध्यान रखें कि किसी भी धार्मिक पाठ या अनुष्ठान का प्रभाव व्यक्ति की श्रद्धा, भक्ति और सकारात्मक कर्मों पर निर्भर करता है। इसलिए गोपाल चालीसा का पाठ करते समय भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण और सच्ची भक्ति रखना अत्यंत आवश्यक है।


Shri Laddu Gopal Chalisa pdf: भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप को लड्डू गोपाल कहा जाता है। हर घर में उनके इस स्वरूप की पूजा की जाती है। हिंदू धर्म को मानने वाले लोग लड्डू गोपाल को घर में परिवार के सदस्य के रूप में लाते हैं और पूरी श्रद्धा भाव से उनकी सेवा करते हैं। शास्त्रों के अनुसार, नियमित पूजा पाठ के अलावा जो भी व्यक्ति श्रद्धा भाव से लड्डू गोपाल की चालीसा का पाठ नियमित करता है, उसकी सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। यहां हम आपके लिए लेकर आए हैं श्री गोपाल चालीसा लिरिक्स, जिसकी मदद से आप रोजाना इसका पाठ कर सकते हैं….



श्री गोपाल चालीसा पढ़ने की विधि

श्री गोपाल चालीसा का पाठ करने के लिए किसी विशेष विधि का पालन करना अनिवार्य नहीं है, लेकिन यदि आप सही तरीके से इसका पाठ करना चाहते हैं तो कुछ महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना आवश्यक है। नीचे श्री गोपाल चालीसा पढ़ने की विधि दी गई है:

स्वच्छता और पवित्रता: श्री गोपाल चालीसा का पाठ करते समय सबसे पहले स्वच्छता और पवित्रता का ध्यान रखें। स्नान कर लें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पाठ करने का स्थान भी साफ और पवित्र होना चाहिए।

पूजा स्थल की तैयारी: जिस स्थान पर आप श्री गोपाल चालीसा का पाठ करेंगे, उसे साफ कर लें। वहाँ एक छोटा सा मंदिर या पूजा स्थल बना सकते हैं। श्रीकृष्ण की प्रतिमा या तस्वीर को वहां स्थापित करें।

दीप जलाएं: श्रीकृष्ण की प्रतिमा या तस्वीर के सामने एक दीपक जलाएं। यह दीपक घी या तेल का हो सकता है। इसके साथ ही अगरबत्ती या धूपबत्ती भी जला सकते हैं।

पुष्प और माला: श्रीकृष्ण की प्रतिमा या तस्वीर को पुष्प और माला अर्पित करें। तुलसी के पत्ते विशेष रूप से श्रीकृष्ण को अर्पित किए जाते हैं, इसलिए तुलसी के पत्ते भी अर्पित करें।

श्रीकृष्ण का ध्यान: चालीसा पाठ करने से पहले श्रीकृष्ण का ध्यान करें। उनकी बाल लीलाओं, गीता के उपदेश और उनके अद्भुत रूप का ध्यान करते हुए मन को शांति और स्थिरता प्रदान करें।

श्री गोपाल चालीसा का पाठ: अब श्री गोपाल चालीसा का पाठ शुरू करें। शांत और स्पष्ट स्वर में पाठ करें। यदि आप पहली बार पढ़ रहे हैं तो धीरे-धीरे और स्पष्ट उच्चारण के साथ पढ़ें।

आरती और प्रसाद: चालीसा पाठ के बाद श्रीकृष्ण की आरती करें। आरती के बाद भगवान को भोग लगाएं और फिर प्रसाद ग्रहण करें। प्रसाद को परिवार और अन्य भक्तों के साथ बांटें।

श्री गोपाल चालीसा का महत्त्व

श्री गोपाल चालीसा का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्त्व अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका पाठ भक्तों को अनेक प्रकार के लाभ प्रदान करता है और उनकी जीवन यात्रा में सकारात्मक ऊर्जा और शांति का संचार करता है। श्री गोपाल चालीसा का महत्त्व निम्नलिखित प्रकार से समझा जा सकता है:

भक्ति और समर्पण का प्रतीक: श्री गोपाल चालीसा भगवान श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति और समर्पण का एक अद्वितीय प्रतीक है। इसके पाठ से भक्त अपने मन को भगवान की लीलाओं और गुणों में लीन कर पाते हैं, जिससे उनकी भक्ति और बढ़ती है।

शांति और मानसिक संतुलन: श्री गोपाल चालीसा का नियमित पाठ करने से मन को शांति और मानसिक संतुलन प्राप्त होता है। भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप का ध्यान करने से मन की अशांति दूर होती है और ध्यान की गहराई बढ़ती है।

आध्यात्मिक उन्नति: यह चालीसा आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर ले जाती है। इसके पाठ से आत्मा को शुद्धि मिलती है और व्यक्ति का आत्मबल बढ़ता है। श्रीकृष्ण की लीलाओं का स्मरण करने से आत्मा को शांति और संतुष्टि प्राप्त होती है।

भगवान की कृपा और आशीर्वाद: श्री गोपाल चालीसा का पाठ करने से भगवान श्रीकृष्ण की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है। भक्त की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं और जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है।

कठिनाइयों का निवारण: जीवन की कठिनाइयों और समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए श्री गोपाल चालीसा का पाठ अत्यंत प्रभावी होता है। इसके पाठ से भक्त को भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है, जिससे सभी बाधाएँ और समस्याएँ दूर हो जाती हैं।

संस्कारों का निर्माण: श्री गोपाल चालीसा का नियमित पाठ परिवार में सकारात्मक संस्कारों का निर्माण करता है। बच्चों में धार्मिक और आध्यात्मिक मूल्यों का विकास होता है और परिवार के सभी सदस्य एक साथ मिलकर भक्ति करते हैं।

श्री गोपाल चालीसा के लाभ

श्री गोपाल चालीसा के अनेक लाभ हैं जो भक्तों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाते हैं। इसके पाठ से शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं। श्री गोपाल चालीसा के लाभ निम्नलिखित प्रकार से हैं:

शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार: श्री गोपाल चालीसा का नियमित पाठ करने से शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से अनेक प्रकार की बीमारियाँ और शारीरिक कष्ट दूर हो जाते हैं।

मानसिक शांति और संतुलन: इस चालीसा का पाठ करने से मानसिक शांति और संतुलन प्राप्त होता है। तनाव, चिंता और अवसाद जैसी मानसिक समस्याओं से मुक्ति मिलती है और मन को शांति और स्थिरता प्राप्त होती है।

आध्यात्मिक जागृति: श्री गोपाल चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति में आध्यात्मिक जागृति होती है। भगवान श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम और भक्ति बढ़ती है और आत्मा को शुद्धि और संतुष्टि प्राप्त होती है।

सकारात्मक ऊर्जा का संचार: श्री गोपाल चालीसा के पाठ से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इसके पाठ से वातावरण शुद्ध और पवित्र होता है और नकारात्मक शक्तियाँ दूर होती हैं।

जीवन में सुख और समृद्धि: श्री गोपाल चालीसा का पाठ करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है। भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं और जीवन में सफलता प्राप्त होती है।

कठिनाइयों और बाधाओं का निवारण: जीवन की कठिनाइयों और बाधाओं से मुक्ति पाने के लिए श्री गोपाल चालीसा का पाठ अत्यंत प्रभावी होता है। इसके पाठ से भक्त को भगवान की कृपा प्राप्त होती है और सभी समस्याएँ दूर हो जाती हैं।

धार्मिक और आध्यात्मिक मूल्य: श्री गोपाल चालीसा का नियमित पाठ करने से धार्मिक और आध्यात्मिक मूल्यों का विकास होता है। बच्चों और युवाओं में धार्मिक संस्कारों का निर्माण होता है और वे भगवान श्रीकृष्ण की महिमा को समझते हैं।

भक्ति और समर्पण का विकास: श्री गोपाल चालीसा का पाठ करने से भगवान श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति और समर्पण का विकास होता है। भक्त अपने मन को भगवान की लीलाओं और गुणों में लीन कर पाते हैं, जिससे उनकी भक्ति और बढ़ती है।

इस प्रकार, श्री गोपाल चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं। यह चालीसा भगवान श्रीकृष्ण की महिमा का गुणगान करती है और भक्तों को उनकी कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने में सहायक होती है। श्री गोपाल चालीसा का नियमित पाठ करने से जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और सफलता प्राप्त होती है और व्यक्ति का आध्यात्मिक उत्थान होता है।

गोपाल चालीसा भगवान श्री कृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल की अराधना का एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है। श्री गोपाल चालीसा में चालीस चौपाइयों के माध्यम से भगवान की लीलाओं, महिमा और कृपा का वर्णन है। गोपाल चालीसा लिरिक्स भक्ति रस से परिपूर्ण हैं और इनका नियमित पाठ करने से आध्यात्मिक शांति मिलती है। विशेष रूप से संतान गोपाल चालीसा का पाठ संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले भक्तों द्वारा किया जाता है। गोपाल चालीसा इन हिंदी में सरल और भावपूर्ण भाषा में उपलब्ध है, जिससे हर कोई इसका लाभ उठा सकता है।

आज के डिजिटल युग में, गोपाल चालीसा पीडीएफ के रूप में आसानी से उपलब्ध है। भक्त इंटरनेट से गोपाल चालीसा डाउनलोड करके कभी भी, कहीं भी इसका पाठ कर सकते हैं। गोपाल चालीसा लिरिक्स इन हिंदी को स्मार्टफोन या टैबलेट में सहेजकर, दैनिक भजन-पाठ में शामिल किया जा सकता है। इस प्रकार, गोपाल चालीसा का सुलभ डिजिटल प्रारूप हर भक्त तक इसकी पहुँच को सुनिश्चित करता है, जिससे लड्डू गोपाल की कृपा सभी पर बनी रहे।


पुत्र प्राप्ति के लिए गोपाल चालीसा क्या है?

पुत्र प्राप्ति के लिए गोपाल चालीसा एक विशेष पूजा विधान है जिसमें गोपाल चालीसा का पाठ किया जाता है। यह चालीसा भगवान कृष्ण के बाल रूप गोपाल को समर्पित है, और इसे पुत्र प्राप्ति की मनोकामना पूरी करने के लिए पढ़ा जाता है।

Gopal Chalisa PDF कैसे प्राप्त करें?

गोपाल चालीसा का PDF प्राप्त करने के लिए आप ChalisaPDF पर खोज सकते हैं।

गोपाल चालीसा के क्या लाभ हैं?

Gopal Chalisa के लाभ में विशेष रूप से संतान सुख, मनोवांछित संतान की प्राप्ति, और जीवन में सुख-समृद्धि शामिल हैं। इसके नियमित पाठ से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक शांति भी प्राप्त होती है।

गोपाल चालीसा का पाठ किस समय करना चाहिए?

Gopal Chalisa का पाठ सुबह के समय या विशेष धार्मिक अवसरों पर किया जाता है। रविवार को इस चालीसा का पाठ विशेष महत्व रखता है।

श्री संतान गोपाल चालीसा क्या है?

श्री संतान गोपाल चालीसा एक विशेष प्रकार की गोपाल चालीसा है जिसे संतान सुख की प्राप्ति के लिए पूजा और पाठ में उपयोग किया जाता है। इसमें भगवान कृष्ण के संतान देने की क्षमता का वर्णन होता है।

Gopal Chalisa PDF कहां से डाउनलोड करें?

Gopal Chalisa PDF को आप chalisa-pdf.com से डाउनलोड कर सकते हैं। यहां आपको PDF फॉर्मेट में गोपाल चालीसा उपलब्ध है।

Gopal Chalisa PDF in Hindi कहां मिलेगा?

Gopal Chalisa PDF in Hindi को आप chalisa-pdf.com पर आसानी से पा सकते हैं। यह पूरी तरह से हिंदी में उपलब्ध है।

पुत्र प्राप्ति के लिए गोपाल चालीसा PDF कहां उपलब्ध है?

पुत्र प्राप्ति के लिए Gopal Chalisa PDF chalisa-pdf.com पर उपलब्ध है। इसे नियमित रूप से पढ़ने से लाभ हो सकता है।

Gopal Chalisa PDF Download कैसे करें?

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Santan Gopal Chalisa PDF कहां से मिलेगी?

Santan Gopal Chalisa PDF chalisa-pdf.com पर आसानी से डाउनलोड के लिए उपलब्ध है।

गोपाल चालीसा डाउनलोड कैसे करें?

गोपाल चालीसा डाउनलोड करने के लिए chalisa-pdf.com पर जाएं और डाउनलोड विकल्प का उपयोग करें।

Laddu Gopal Chalisa PDF in Hindi कहां से प्राप्त करें?

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श्री गोपाल तेल कितने दिन लगाना चाहिए?

श्री गोपाल तेल का उपयोग नियमित रूप से 21 दिनों तक करें। इसका सही तरीका chalisa-pdf.com पर बताया गया है।

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Gopal Chalisa in Hindi PDF Download कैसे करें?

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संतान गोपाल स्तोत्र कब पढ़ना चाहिए?

संतान गोपाल स्तोत्र विशेष रूप से संतान प्राप्ति या संतान की सुरक्षा के लिए पढ़ा जाता है। इसे प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर, शुद्ध होकर और श्रद्धापूर्वक पढ़ना चाहिए। गुरुवार का दिन और कृष्ण पक्ष की अष्टमी इसके पाठ के लिए अत्यंत शुभ माने जाते हैं। नित्य नियम से इसका पाठ करने पर मनोवांछित फल प्राप्त होता है।

गोपाल चालीसा के क्या लाभ हैं?

गोपाल चालीसा के नित्य जाप से भक्त का मन शांत और एकाग्र होता है, तनाव दूर होता है और आध्यात्मिक उन्नति होती है। मान्यता है कि इससे भक्त को भगवान कृष्ण की विशेष कृपा प्राप्त होती है, जिससे सांसारिक कष्ट दूर होते हैं, मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और अंततः आत्मिक आनंद की प्राप्ति होती है। संतानहीन दंपत्ति को संतान सुख की प्राप्ति भी इसके माध्यम से हो सकती है।

संतान गोपाल मंत्र क्या है?

संतान गोपाल मंत्र एक महत्वपूर्ण वैदिक मंत्र है। प्रमुख मंत्र “ॐ देवकीसुत गोविंद वासुदेव जगत्पते, देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः:” है। इसके अलावा “ॐ श्रीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविंद वासुदेव जगत्पते, देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः:” मंत्र का जाप भी प्रचलित है। इन मंत्रों का नियमित और शुद्ध उच्चारण करना चाहिए।

लड्डू गोपाल जी की पूजा कैसे करें?

लड्डू गोपाल जी की पूजा प्रातः स्नान के बाद शुद्ध आसन पर बैठकर करनी चाहिए। सर्वप्रथम गंगाजल से उनका अभिषेक करें, फिर पंचामृत से स्नान कराएं और स्वच्छ वस्त्र से पोंछकर चन्दन का तिलक लगाएं। उन्हें तुलसी दल, माखन, मिश्री और लड्डू का भोग लगाएं। धूप-दीप दिखाकर “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र से आरती करें और भक्तिभाव से चालीसा या स्तोत्र का पाठ करें।

गर्भ ठहरने का मंत्र क्या है?

गर्भ ठहरने के लिए श्री कृष्ण से जुड़े मंत्रों के साथ-साथ देवी माता के मंत्र भी फलदायी हैं। एक प्रभावी मंत्र है – “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे, ऐं क्लीं सौं: ऐं ह्रीं क्लीं कामाख्यै देव्यै स्वाहा”। इस मंत्र का जाप शुद्धता पूर्वक नियमित करना चाहिए, किंतु किसी योग्य गुरु या विद्वान से दीक्षा लेकर ही इन मंत्रों का साधन करना उचित रहता है।

पुत्र प्राप्ति के लिए कौन सा मंत्र जाप करना चाहिए?

पुत्र प्राप्ति के लिए प्राचीन ग्रंथों में कई मंत्र बताए गए हैं। एक शक्तिशाली मंत्र है – “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविंद वासुदेव जगत्पते, देहि मे पुत्रं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः:”। इसके अतिरिक्त महर्षि वशिष्ठ द्वारा बताया गया “ॐ भूर्भुवः स्वः पुत्रमिच्छामि स्वाहा” मंत्र भी प्रसिद्ध है। किसी भी मंत्र साधना के पूर्व विधिवत संकल्प और गुरु मार्गदर्शन आवश्यक है।

Durga Chalisa PDF Download & Hindi Lyrics (2026 Updated)

श्री दुर्गा चालीसा लिखित pdf (Durga Chalisa PDF) की महिमा अपरंपार है. आज के समय में उनकी स्तुति करने का एक सरल तरीका है दुर्गा चालीसा का पाठ करना। आप हमारी वेबसाइट में दुर्गा आरती | श्री दुर्गा देवी कवच और दुर्गा अमृतवाणी भी पढ़ सकते हैं। दुर्गा चालीसा में 40 दोहे हैं, जो बहुत ही आसान भाषा में हैं। यह पढ़ने में बहुत रोचक और आनंददायक है। इन दोहों को पढ़ने से मां दुर्गा के भक्तों को आनंद मिलता है।

दुर्गा चालीसा और आरती हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण पूजा विधि है, जिसका उद्देश्य माँ दुर्गा की महिमा का गुणगान करना और उनका आशीर्वाद प्राप्त करना है। यह पाठ विशेष रूप से माँ दुर्गा के भक्तों द्वारा किया जाता है, जो अपने जीवन में सुख, शांति और सफलता प्राप्त करने के लिए इससे शक्ति और प्रेरणा लेते हैं।
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दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa PDF) हिन्दू धर्म में एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जो देवी दुर्गा की महिमा का गुणगान करता है। इसे भक्तगण श्रद्धापूर्वक पाठ करते हैं, ताकि उनके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का संचार हो। दुर्गा चालीसा में माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों और उनकी शक्तियों का उल्लेख है। इसमें 40 दोहों के माध्यम से देवी की कृपा और उनके दिव्य गुणों का वर्णन किया गया है। ऐसा माना जाता है कि दुर्गा चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और उसे माँ का आशीर्वाद प्राप्त होता है। विशेष रूप से नवरात्रि के दिनों में इसका पाठ अत्यधिक शुभ माना जाता है।

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa PDF) का पाठ न केवल आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है, बल्कि यह आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा को भी बढ़ाता है। माँ दुर्गा को शक्ति, साहस और संरक्षण की देवी माना जाता है, और उनका स्मरण करने से व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति मिलती है। दुर्गा चालीसा को सुबह और शाम के समय पढ़ने से मन और मस्तिष्क शांत होते हैं। इसके अलावा, यह परिवार में सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य को बनाए रखने में सहायक होता है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में दुर्गा चालीसा का महत्व अलग-अलग रूपों में देखा जाता है, लेकिन इसका मूल उद्देश्य हर जगह समान है—माँ दुर्गा के प्रति आस्था और श्रद्धा व्यक्त करना।


Shri Durga Chalisa PDF in Hindi Lyrics | श्री दुर्गा चालीसा पाठ | नमो नमो दुर्गे सुख करनी

Durga Chalisa Lyrics in Hindi

नमो नमो दुर्गे सुख करनी ।
नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी ॥
निरंकार है ज्योति तुम्हारी ।
तिहूँ लोक फैली उजियारी ॥
शशि ललाट मुख महाविशाला ।
नेत्र लाल भृकुटि विकराला ॥
रूप मातु को अधिक सुहावे ।
दरश करत जन अति सुख पावे ॥ ४
तुम संसार शक्ति लै कीना ।
पालन हेतु अन्न धन दीना ॥
अन्नपूर्णा हुई जग पाला ।
तुम ही आदि सुन्दरी बाला ॥
प्रलयकाल सब नाशन हारी ।
तुम गौरी शिवशंकर प्यारी ॥
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें ।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ॥ ८
रूप सरस्वती को तुम धारा ।
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा ॥
धरयो रूप नरसिंह को अम्बा ।
परगट भई फाड़कर खम्बा ॥
रक्षा करि प्रह्लाद बचायो ।
हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो ॥
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं ।
श्री नारायण अंग समाहीं ॥ १२
क्षीरसिन्धु में करत विलासा ।
दयासिन्धु दीजै मन आसा ॥
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी ।
महिमा अमित न जात बखानी ॥
मातंगी अरु धूमावति माता ।
भुवनेश्वरी बगला सुख दाता ॥
श्री भैरव तारा जग तारिणी ।
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ॥ १६
केहरि वाहन सोह भवानी ।
लांगुर वीर चलत अगवानी ॥
कर में खप्पर खड्ग विराजै ।
जाको देख काल डर भाजै ॥
सोहै अस्त्र और त्रिशूला ।
जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥
नगरकोट में तुम्हीं विराजत ।
तिहुँलोक में डंका बाजत ॥ २०
शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे ।
रक्तबीज शंखन संहारे ॥
महिषासुर नृप अति अभिमानी ।
जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥
रूप कराल कालिका धारा ।
सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥
परी गाढ़ सन्तन पर जब जब ।
भई सहाय मातु तुम तब तब ॥ २४
अमरपुरी अरु बासव लोका ।
तब महिमा सब रहें अशोका ॥
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी ।
तुम्हें सदा पूजें नरनारी ॥
प्रेम भक्ति से जो यश गावें ।
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें ॥
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई ।
जन्ममरण ताकौ छुटि जाई ॥ २८
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी ।
योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी ॥
शंकर आचारज तप कीनो ।
काम अरु क्रोध जीति सब लीनो ॥
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को ।
काहु काल नहिं सुमिरो तुमको ॥
शक्ति रूप का मरम न पायो ।
शक्ति गई तब मन पछितायो ॥ ३२
शरणागत हुई कीर्ति बखानी ।
जय जय जय जगदम्ब भवानी ॥
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा ।
दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा ॥
मोको मातु कष्ट अति घेरो ।
तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो ॥
आशा तृष्णा निपट सतावें ।
मोह मदादिक सब बिनशावें ॥ ३६
शत्रु नाश कीजै महारानी ।
सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी ॥
करो कृपा हे मातु दयाला ।
ऋद्धिसिद्धि दै करहु निहाला ॥
जब लगि जिऊँ दया फल पाऊँ ।
तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ ॥
श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै ।
सब सुख भोग परमपद पावै ॥ ४०
देवीदास शरण निज जानी ।
करहु कृपा जगदम्ब भवानी ॥
॥दोहा॥
शरणागत रक्षा करे,
भक्त रहे नि:शंक ।
मैं आया तेरी शरण में,
मातु लिजिये अंक ॥

॥ इति श्री दुर्गा चालीसा ॥

॥ Chaupai ॥
Namo Namo Durge Sukha Karani।
Namo Namo Ambe Duhkha Harani॥

Nirakara Hai Jyoti Tumhari।
Tihun Loka Phaili Ujiyari॥

Shashi Lalata Mukha Mahavishala।
Netra Lala Bhrikuti Vikarala॥

Rupa Matu Ko Adhika Suhave।
Darasha Karata Jana Ati Sukha Pave॥

Tuma Sansara Shakti Laya Kina।
Palana Hetu Anna Dhana Dina॥

Annapurna Hui Jaga Pala।
Tuma Hi Adi Sundari Bala॥

Pralayakala Saba Nashana Hari।
Tuma Gauri Shiva Shankara Pyari॥

Shiva Yogi Tumhare Guna Gavein।
Brahma Vishnu Tumhein Nita Dhyavein॥

Rupa Saraswati Ko Tuma Dhara।
De Subuddhi Rishi-Munina Ubara॥

Dhara Rupa Narasinha Ko Amba।
Pragata Bhayin Phadakara Khamba॥

Raksha Kara Prahlada Bachayo।
Hiranyaksha Ko Swarga Pathayo॥

Lakshmi Rupa Dharo Jaga Mahin।
Shri Narayana Anga Samahin॥

Kshirasindhu Mein Karata Vilasa।
Dayasindhu Dijai Mana Asa॥

Hingalaja Mein Tumhin Bhavani।
Mahima Amita Na Jata Bakhani॥

Matangi Aru Dhumawati Mata।
Bhuvaneshwari Bagala Sukha Data॥

Shri Bhairava Tara Jaga Tarini।
Chhinna Bhala Bhava Duhkha Nivarini॥

Kehari Vahana Soha Bhavani।
Langura Vira Chalata Agavani॥

Kara Mein Khappara Khadga Virajai।
Jako Dekha Kala Dara Bhaje॥

Sohai Astra Aura Trishula।
Jate Uthata Shatru Hiya Shula॥

Nagara Koti Mein Tumhin Virajata।
Tihunloka Mein Danka Bajata॥

Shumbha Nishumbha Danava Tuma Mare।
Raktabija Shankhana Sanhare॥

Mahishasura Nripa Ati Abhimani।
Jehi Agha Bhara Mahi Akulani॥

Rupa Karala Kalika Dhara।
Sena Sahita Tuma Tihi Sanhara॥

Pari Gadha Santana Para Jaba Jaba।
Bhayi Sahaya Matu Tuma Taba Taba॥

Amarapuri Aru Basava Loka।
Taba Mahima Saba Rahein Ashoka॥

Jwala Mein Hai Jyoti Tumhari।
Tumhein Sada Pujein Nara Nari॥

Prema Bhakti Se Jo Yasha Gavai।
Duhkha Daridra Nikata Nahin Ave॥

Dhyave Tumhein Jo Nara Mana Lai।
Janma Marana Takau Chhuti Jai॥

Jogi Sura Muni Kahata Pukari।
Yoga Na Ho Bina Shakti Tumhari॥

Shankara Acharaja Tapa Kino।
Kama Aru Krodha Jiti Saba Lino॥

Nishidina Dhyana Dharo Shankara Ko।
Kahu Kala Nahin Sumiro Tumako॥

Shakti Rupa Ko Marama Na Payo।
Shakti Gayi Taba Mana Pachhitayo॥

Sharanagata Huyi Kirti Bakhani।
Jai Jai Jai Jagadamba Bhavani॥

Bhai Prasanna Adi Jagadamba।
Dayi Shakti Nahin Kina Vilamba॥

Moko Matu Kashta Ati Ghero।
Tuma Bina Kauna Harai Duhkha Mero॥

Asha Trishna Nipata Satave।
Moha Madadika Saba Vinashavai॥

Shatru Nasha Kijai Maharani।
Sumiraun Ikachita Tumhein Bhavani॥

Karo Kripa He Matu Dayala।
Riddhi Siddhi De Karahu Nihala॥

Jaba Lagi Jiyaun Daya Phala Paun।
Tumharo Yasha Main Sada Sonaun॥

Durga Chalisa Jo Nita Gavai।
Saba Sukha Bhoga Paramapada Pavai॥

Devidasa Sharana Nija Jani।
Karahu Kripa Jagadamba Bhavani॥

॥Doha ॥
Sharanaagat raksha kare,
Bhakt rahe ni:shank ॥
Main tere sharan mein aaya,
Maatu lijie ank ॥

॥ Iti Shree Durga Chalisa ॥


दुर्गा चालीसा | Durga Chalisa in Hindi, Durga Chalisa Lyrics, Durga Chalisa PDF, New Images, Video, PDF 2025

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दुर्गा चालीसा का पाठ कैसे करें?

प्रातःकाल ही स्नान आदि से निवृत्त होकर साफ और सुथरे वस्त्र पहनें। फिर लकड़ी से बने चौकोर पटरे पर लाल रंग का कपड़ा बिछाकर, उस पर दुर्गा जी की मूर्ति या चित्र को रखें। आप स्वयं कुश या ऊन से बने हुए आसन पर बैठें। फिर सिंदूर, लाल रंग के फूल, दीप-धूप आदि से पूजा करें। यथाशक्ति हलवा, चना या कच्चे दूध और खोये की मिठाई का भोग लगाएं। फिर भगवती की पूजा कर लाल पुष्प हाथ में लेकर यह श्लोक पढ़ें:

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
त्र्यम्ब शरण्ये गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का पाठ एक अत्यंत शुभ और पवित्र क्रिया है जो भक्तों को माता दुर्गा की कृपा प्राप्त करने में सहायता करती है। यह पाठ विशेष रूप से नवरात्रि के दौरान किया जाता है, लेकिन इसे किसी भी समय किया जा सकता है जब व्यक्ति को शक्ति, साहस, और आशीर्वाद की आवश्यकता होती है। दुर्गा चालीसा का पाठ करने के लिए आपको निम्नलिखित विधियों और नियमों का पालन करना चाहिए:

स्थान और समय का चयन

दुर्गा चालीसा का पाठ करने के लिए आपको एक शांत और पवित्र स्थान का चयन करना चाहिए। यह स्थान ऐसा होना चाहिए जहाँ बाहरी शोर-शराबे से आप परेशान न हों। यदि संभव हो, तो आप अपने घर के मंदिर में या किसी पवित्र स्थान पर यह पाठ कर सकते हैं।

पाठ करने के लिए ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4 बजे से 6 बजे के बीच का समय) सबसे अच्छा माना जाता है। यदि ब्रह्म मुहूर्त में संभव न हो तो सुबह का समय (सूर्योदय के समय) भी शुभ होता है। हालांकि, आप अपने सुविधा के अनुसार किसी भी समय दुर्गा चालीसा का पाठ कर सकते हैं।

शुद्धता और स्वच्छता

पाठ करने से पहले आपको स्वयं को शारीरिक और मानसिक रूप से शुद्ध करना चाहिए। इसके लिए आप स्नान कर सकते हैं और स्वच्छ कपड़े पहन सकते हैं। मन को शुद्ध करने के लिए आप थोड़ी देर ध्यान कर सकते हैं, जिससे आपका मन शांत और एकाग्र हो सके।

पूजन सामग्री की तैयारी

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का पाठ करने से पहले आवश्यक पूजन सामग्री तैयार कर लें। इसमें माँ दुर्गा की प्रतिमा या चित्र, लाल चंदन, कुमकुम, अक्षत (चावल), फूल, धूप, दीप, नैवेद्य (प्रसाद) आदि शामिल हैं। आप एक लाल आसन पर बैठकर पूजा कर सकते हैं।

आसन और मुद्रा

दुर्गा चालीसा का पाठ करने के लिए आप जमीन पर एक साफ और पवित्र आसन बिछाएं। लाल या सफेद रंग का कपड़ा इस उद्देश्य के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। ध्यान रखें कि आप पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। यह दिशाएं पूजा के लिए सबसे उत्तम मानी जाती हैं।आपकी मुद्रा सहज और स्थिर होनी चाहिए। आप पद्मासन, सिद्धासन, या सुखासन में बैठ सकते हैं। यह सुनिश्चित करें कि आपकी रीढ़ सीधी हो और आपकी आँखें बंद हों, ताकि आप पूरी तरह से माता दुर्गा की ध्यान में लीन हो सकें।

मां दुर्गा का ध्यान

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का पाठ शुरू करने से पहले, माता दुर्गा का ध्यान करें। आप उनकी मूर्ति या चित्र के सामने अपने हाथ जोड़कर बैठें और उनकी दिव्य शक्ति, सौम्यता और करुणा का स्मरण करें। आप अपने मन में उनके पवित्र स्वरूप का ध्यान कर सकते हैं। इसके लिए आप दुर्गा मंत्र का जाप कर सकते हैं, जैसे:
ॐ दुं दुर्गायै नमः।

दीप प्रज्वलन और धूप अर्पण

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) के पाठ से पहले दीपक जलाएं और धूप अर्पण करें। दीपक जलाने से वातावरण शुद्ध और सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है। धूप अर्पण करते समय आप यह प्रार्थना कर सकते हैं कि माँ दुर्गा आपके घर और मन को अपने दिव्य प्रकाश से आलोकित करें।

दुर्गा चालीसा का पाठ

अब आप दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का पाठ शुरू कर सकते हैं। दुर्गा चालीसा के 40 दोहे और चौपाइयाँ हैं, जिन्हें श्रद्धा और भक्ति के साथ पढ़ना चाहिए। पाठ करते समय मन को एकाग्र रखना चाहिए और माँ दुर्गा के चरणों में समर्पित होना चाहिए। यदि संभव हो, तो दुर्गा चालीसा का पाठ जोर से करें, ताकि उसकी ध्वनि आपके वातावरण में गूंजे और आपकी ऊर्जा को शुद्ध करे।

दुर्गा चालीसा का पाठ करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें:

  1. स्मरण: पाठ करते समय माँ दुर्गा की महिमा, उनकी शक्तियों और गुणों का स्मरण करें।
  2. श्रद्धा: प्रत्येक शब्द को श्रद्धा और भक्ति के साथ उच्चारण करें।
  3. ध्यान: पाठ के दौरान मन को भटकने न दें। यदि मन इधर-उधर जाए तो उसे पुनः माँ दुर्गा के ध्यान में लगाएं।
  4. समर्पण: माँ दुर्गा को अपनी समस्त चिंताओं और समस्याओं का समाधानकर्ता मानें और उनके चरणों में समर्पित हो जाएं।

आरती और प्रसाद

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का पाठ समाप्त करने के बाद, आप माँ दुर्गा की आरती करें। आरती के दौरान घंटी बजाएं और माँ दुर्गा का गुणगान करें। आरती के बाद माँ को प्रसाद अर्पण करें और उसे भक्तों में बाँटें। प्रसाद ग्रहण करते समय माँ के आशीर्वाद के लिए कृतज्ञता प्रकट करें।

शांति पाठ और समापन

पाठ और आरती के बाद, एक शांतिपाठ करें। इसके लिए आप निम्नलिखित शांति मंत्र का उच्चारण कर सकते हैं:

ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत्।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

इसके बाद, माता दुर्गा के चरणों में नमन करें और उनके आशीर्वाद की प्रार्थना करें। अंत में, अपने स्थान को साफ करें और पूजा की सामग्री को उचित स्थान पर रखें।

अनुशासन और निष्ठा

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का पाठ एक नियमित अनुशासन के साथ करने से विशेष फलदायी होता है। यदि आप इसे रोज़ या नियमित अंतराल पर करते हैं, तो यह आपके जीवन में सकारात्मकता और ऊर्जा का संचार करेगा। नवरात्रि के दिनों में इसका पाठ विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है। इस दौरान नौ दिनों तक नित्य दुर्गा चालीसा का पाठ करने से माँ दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है।

दुर्गा चालीसा पाठ के लाभ

दुर्गा चालीसा का पाठ करने से कई आध्यात्मिक और मानसिक लाभ होते हैं:

आध्यात्मिक उन्नति: यह पाठ व्यक्ति की आत्मा को शुद्ध करता है और उसे आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर करता है।

साहस और शक्ति: माँ दुर्गा की कृपा से व्यक्ति को जीवन की कठिनाइयों से लड़ने का साहस और शक्ति प्राप्त होती है।

शांति और संतोष: नियमित पाठ से मन में शांति और संतोष का अनुभव होता है, जिससे तनाव और चिंता कम होती है।

संरक्षण और सुरक्षा: माँ दुर्गा की कृपा से व्यक्ति बुरे प्रभावों और नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षित रहता है।

सुख और समृद्धि: माँ दुर्गा की आराधना से परिवार में सुख, समृद्धि और खुशहाली का वास होता है।


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नवरात्रि का पावन पर्व सिर्फ उत्सव और उपवास तक सीमित नहीं है; यह आत्मशुद्धि, आध्यात्मिक ऊर्जा का संचय और दिव्य शक्ति से जुड़ने का सुनहरा अवसर है। इन नौ पवित्र रात्रियों में मां दुर्गा की आरती और चालीसा का नियमित पाठ एक ऐसी साधना है जो साधक के जीवन से अनेकानेक परेशानियों को दूर करने में अद्भुत सामर्थ्य रखती है। यह केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि एक गहन मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया है।

आरती: प्रकाश, भक्ति और समर्पण का सागर
मां दुर्गा की आरती करना, दीपक की लौ के साथ उनकी स्तुति गाना, एक भावपूर्ण समर्पण है। यह क्रिया कई स्तरों पर काम करती है:

  1. मन की शुद्धि: आरती की पवित्र ध्वनियाँ और दीपक का प्रकाश वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा को तोड़ते हैं। मन की उथल-पुथल शांत होती है, चिंता और तनाव घटने लगते हैं।
  2. भक्ति का जागरण: आरती के मंत्रों में मां के गुणों, पराक्रम और कृपा का वर्णन होता है। इन्हें गाते हुए भक्त का हृदय प्रेम और श्रद्धा से सराबोर हो जाता है, आत्मविश्वास बढ़ता है।
  3. समर्पण की भावना: “तेरी आरती मैं गाऊं मैया…” जैसे पंक्तियों के साथ भक्त स्वयं को पूर्णतः मां के चरणों में समर्पित कर देता है। यह समर्पण ही भारी बोझ को उतार फेंकता है, यह विश्वास दृढ़ करता है कि मां सब संकट हर लेंगी।

चालीसा: शक्ति, संरक्षण और समाधान का मंत्र
दुर्गा चालिषा मां दुर्गा के स्वरूप, महिमा और उनके द्वारा दैत्यों के वध की कथाओं का सार संग्रह है। इसका नियमित पाठ:

  1. शक्ति का संचार: चालीसा के प्रत्येक चौपाई में मां की विजयी शक्ति का बखान है। इसे पढ़ने से साधक के भीतर उसी दिव्य शक्ति का संचार होता है, आंतरिक बल जागृत होता है, जिससे जीवन की चुनौतियों का सामना करने की क्षमता बढ़ती है।
  2. भय का नाश: मां ने महिषासुर, शुम्भ-निशुम्भ जैसे भयानक राक्षसों का वध किया। चालीसा पाठ करते हुए यह स्मरण होता है कि जिस मां ने इतने भयानक शत्रुओं का नाश किया, वह मेरे छोटे-मोटे संकटों को क्षण भर में दूर कर सकती हैं। इससे हर प्रकार के भय (आर्थिक, सामाजिक, स्वास्थ्य) का नाश होता है।
  3. कृपा का वरदान: चालीसा के अंत में वरदान मांगा जाता है – “दुख दारिद्र निवारण… सुख संपत्ति घर आवे…”। नवरात्रि में नियमित पाठ से मां की विशेष कृपा प्राप्त होती है, जो जीवन के कष्टों – रोग, दरिद्रता, कलह, कानूनी उलझनों, मानसिक अशांति – को दूर करने में सहायक बनती है।

नियमितता का महत्व और परिणाम:
नवरात्रि की पवित्र ऊर्जा में रोजाना आरती और चालीसा का पाठ करने का विशेष महत्व है। यह नियमित अभ्यास:

  • मन को स्थिर और एकाग्र करता है, जिससे समस्याओं का समाधान स्पष्ट दिखने लगता है।
  • आत्मिक शक्ति और धैर्य बढ़ाता है, जिससे परेशानियों का सामना डटकर किया जा सकता है।
  • सकारात्मक ऊर्जा का एक सुरक्षा कवच निर्मित करता है, बाहरी नकारात्मक प्रभावों से बचाता है।
  • भक्त और देवी के बीच एक गहन, अटूट संबंध स्थापित करता है, जिससे मां की कृपा सहज ही प्राप्त होती है।

दुर्गा चालीसा के पाठ से जुड़ी कहानियां

हिंदू धर्म में देवी दुर्गा को शक्ति, साहस और संरक्षण की देवी माना जाता है। देवी दुर्गा की पूजा के लिए कई शास्त्र और स्तोत्र हैं, जिनमें से दुर्गा चालीसा विशेष महत्व रखती है। दुर्गा चालीसा एक प्रसिद्ध स्तोत्र है जिसमें देवी दुर्गा की 40 चौपाइयों में स्तुति की जाती है। यह चालीसा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि भक्तों की कठिनाइयों और संकटों से मुक्ति पाने का एक महत्वपूर्ण साधन भी है। इस लेख में हम दुर्गा चालीसा के पाठ से जुड़ी कुछ प्रेरणादायक कहानियों का वर्णन करेंगे, जो इसके महत्व और प्रभाव को स्पष्ट करती हैं।

संकटमोचन महापुराण की कहानी

संकटमोचन महापुराण में एक प्रसिद्ध कहानी है, जो दुर्गा चालीसा के पाठ की शक्ति को दर्शाती है। एक बार, एक छोटे से गांव में एक गरीब ब्राह्मण अपनी पत्नी और बच्चों के साथ कठिन परिस्थितियों में जी रहा था। उसकी आर्थिक स्थिति इतनी दयनीय थी कि उसे रोज की जरूरतों को पूरा करने में भी परेशानी हो रही थी।

एक दिन, ब्राह्मण के पास एक साधू महात्मा आए और उन्होंने ब्राह्मण को दुर्गा चालीसा का पाठ करने का सुझाव दिया। ब्राह्मण ने उनकी सलाह मानी और नियमित रूप से दुर्गा चालीसा का पाठ करना शुरू कर दिया। उन्होंने पूरे मनोयोग से यह पाठ किया और जल्द ही चमत्कारिक बदलाव महसूस किया। उनकी आर्थिक स्थिति सुधरने लगी, और उनके परिवार को सुख-समृद्धि मिलने लगी। इस कहानी से यह सिखने को मिलता है कि सच्चे मन से की गई पूजा और पाठ से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन संभव है।

महाभारत काल की कथा

महाभारत के समय, एक प्रमुख योद्धा और महान भक्त महेश्वरी देवी की पूजा करते थे। एक दिन, दुर्गा के प्रति उनकी भक्ति को परीक्षा में डालने के लिए एक दैत्य ने उन्हें चुनौती दी। दैत्य ने उन्हें एक विशेष युद्ध में हराने के लिए कहा, अन्यथा पूरे राज्य को विनाश के कगार पर लाने की धमकी दी। योद्धा ने देवी दुर्गा की शरण ली और दुर्गा चालीसा का पाठ करने का निर्णय लिया।

हर दिन, उन्होंने पूरी श्रद्धा और भक्ति से दुर्गा चालीसा का पाठ किया। इस पाठ की शक्ति से उनकी मनोबल बढ़ी, और उन्होंने युद्ध में विजय प्राप्त की। इस घटना ने साबित कर दिया कि दुर्गा चालीसा की शक्ति किसी भी संकट को पार करने में सक्षम है। भक्तों के लिए यह एक सिखने वाली कहानी है कि भक्ति और सच्चे मन से की गई पूजा कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी मददगार साबित हो सकती है।

आधुनिक काल की प्रेरणादायक घटना

आधुनिक काल में भी दुर्गा चालीसा के पाठ से जुड़े कई प्रेरणादायक किस्से हैं। एक विशेष घटना का उल्लेख किया जा सकता है, जिसमें एक युवा उद्यमी ने अपने व्यवसाय में लगातार असफलताओं का सामना किया। उसकी आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गई और उसने अपनी सारी उम्मीदें खो दी थीं।

उसने अपनी स्थिति सुधारने के लिए देवी दुर्गा की पूजा और दुर्गा चालीसा के पाठ का सहारा लिया। उन्होंने नियमित रूप से दुर्गा चालीसा का पाठ किया और देवी से सहायता की प्रार्थना की। कुछ ही समय में, उसके व्यवसाय में चमत्कारी सुधार हुआ, और उसे आर्थिक समृद्धि प्राप्त हुई। इस घटना ने साबित किया कि विश्वास और भक्ति के साथ किया गया दुर्गा चालीसा का पाठ साकारात्मक परिणाम ला सकता है।

भक्त की संजीवनी कथा

एक बार, एक भक्त की संजीवनी कथा सामने आई जिसमें एक भक्त की जीवन की कठिनाइयों को दूर करने के लिए दुर्गा चालीसा का पाठ महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह भक्त एक गंभीर बीमारी से पीड़ित था और डॉक्टरों ने उसे इलाज के लिए कोई आशा नहीं दी थी। उसने देवी दुर्गा की भक्ति के प्रति अपनी आस्था बनाए रखी और रोज दुर्गा चालीसा का पाठ करना शुरू किया।

आश्चर्यजनक रूप से, भक्त की स्थिति में सुधार हुआ, और उसकी बीमारी ठीक हो गई। इस कहानी ने यह साबित किया कि सच्चे मन से की गई पूजा और पाठ के द्वारा गंभीर से गंभीर बीमारियों का भी इलाज संभव है। भक्तों के लिए यह एक प्रेरणादायक उदाहरण है कि विश्वास और भक्ति के साथ किए गए प्रयास किसी भी कठिनाई को पार कर सकते हैं।

देवी की कृपा से संकटमोचन

एक गांव में, एक किसान ने अपनी फसल को लेकर गंभीर संकट का सामना किया। लगातार सूखा और प्राकृतिक आपदाओं ने उसकी फसल को बर्बाद कर दिया था। किसान के पास उम्मीद की कोई किरण नहीं बची थी। उसने अपनी कठिनाइयों को दूर करने के लिए देवी दुर्गा से प्रार्थना की और दुर्गा चालीसा का पाठ शुरू किया।

धीरे-धीरे, उसकी स्थिति में सुधार हुआ। बारिश आई और उसकी फसल में वृद्धि हुई। देवी दुर्गा की कृपा से किसान की कठिनाइयों का समाधान हुआ और उसकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ। इस घटना ने साबित किया कि देवी की भक्ति और दुर्गा चालीसा का पाठ संकटों को दूर कर सकता है और जीवन में सुधार ला सकता है।

दुर्गा चालीसा और आस्थावान भक्त की कहानी

एक विशेष कहानी में, एक युवा विद्यार्थी ने अपनी पढ़ाई में लगातार विफलता का सामना किया। उसने कई बार परीक्षा दी, लेकिन हर बार असफल रहा। उसने आस्था और विश्वास के साथ देवी दुर्गा से प्रार्थना करने का निर्णय लिया और दुर्गा चालीसा का पाठ करना शुरू किया।

उसकी भक्ति और श्रद्धा के फलस्वरूप, उसने अपनी पढ़ाई में सुधार किया और परीक्षा में सफलता प्राप्त की। इस कहानी ने यह दिखाया कि दुर्गा चालीसा का पाठ केवल भौतिक समस्याओं को ही नहीं, बल्कि मानसिक और शैक्षणिक समस्याओं को भी हल कर सकता है।


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दुर्गा चालीसा के लाभ

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa), माता दुर्गा की आराधना और उनकी महिमा को व्यक्त करने वाला एक महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथ है। यह चालीसा 40 श्लोकों में माता दुर्गा की स्तुति करती है और उनके अद्वितीय गुणों, शक्तियों, और भक्तों को प्राप्त होने वाले लाभों का वर्णन करती है। दुर्गा चालीसा का नियमित पाठ विशेष रूप से देवी दुर्गा की उपासना और उनके आशीर्वाद की प्राप्ति के लिए किया जाता है। इस लेख में हम दुर्गा चालीसा के विभिन्न लाभों पर विस्तृत रूप से चर्चा करेंगे।

मानसिक शांति और तनाव में कमी

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का नियमित पाठ मानसिक शांति और तनाव में कमी लाने में अत्यंत सहायक होता है। देवी दुर्गा को शक्ति और शांति की देवी माना जाता है। उनके गुणों की स्तुति और उनकी उपासना से मन की एकाग्रता बढ़ती है और मानसिक तनाव कम होता है। यह मानसिक शांति को प्रोत्साहित करता है और व्यक्तित्व को संतुलित बनाता है।

विघ्नों और समस्याओं का समाधान

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का पाठ करने से जीवन में आने वाली विघ्नों और समस्याओं का समाधान संभव होता है। माता दुर्गा को शक्ति और साहस की देवी माना जाता है, और उनकी आराधना से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। यह चालीसा विघ्नों को नष्ट करने और समस्याओं को सुलझाने में सहायक होती है, जिससे जीवन में सुख और समृद्धि बनी रहती है।

स्वास्थ्य में सुधार

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का नियमित पाठ स्वास्थ्य में भी सुधार कर सकता है। देवी दुर्गा की उपासना से मानसिक शांति और तनाव में कमी होती है, जो शारीरिक स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव डालती है। इसके अतिरिक्त, देवी दुर्गा के आशीर्वाद से रोग और बीमारियों से सुरक्षा प्राप्त होती है, और समग्र स्वास्थ्य में सुधार होता है।

पारिवारिक सुख और सामंजस्य

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का पाठ पारिवारिक सुख और सामंजस्य में भी सुधार लाता है। माता दुर्गा की उपासना से परिवार में प्रेम और समझदारी बढ़ती है। यह पारिवारिक विवादों और समस्याओं का समाधान करने में सहायक होती है, और परिवार में सुख-शांति और सामंजस्य बनाए रखती है।

आर्थिक समृद्धि और लाभ

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का पाठ आर्थिक समृद्धि में वृद्धि कर सकता है। देवी दुर्गा को समृद्धि और ऐश्वर्य की देवी माना जाता है। उनकी उपासना से धन और संसाधनों के प्रबंधन में सहायता मिलती है, और आर्थिक समस्याओं का समाधान होता है। यह चालीसा आर्थिक स्थिति को सुधारने और समृद्धि प्राप्त करने में मदद करती है।

मानसिक शक्ति और आत्म-विश्वास

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का पाठ मानसिक शक्ति और आत्म-विश्वास को बढ़ाता है। माता दुर्गा को शक्ति और साहस की देवी माना जाता है, और उनकी आराधना से व्यक्ति में साहस और आत्म-विश्वास की भावना उत्पन्न होती है। यह जीवन की चुनौतियों का सामना करने की क्षमता को मजबूत करता है और आत्म-विश्वास को प्रोत्साहित करता है।

शिक्षा और बुद्धि में वृद्धि

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का पाठ शिक्षा और बुद्धि में वृद्धि करने में भी सहायक होता है। देवी दुर्गा की उपासना से मानसिक क्षमता में सुधार होता है और पढ़ाई में ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलती है। विशेष रूप से छात्रों और शिक्षार्थियों के लिए, यह चालीसा बुद्धि और ज्ञान को बढ़ाने में सहायक हो सकती है।

धार्मिक और आध्यात्मिक उन्नति

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का पाठ धार्मिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी महत्वपूर्ण है। यह व्यक्ति को धार्मिक मान्यताओं और आध्यात्मिक ज्ञान के प्रति जागरूक करता है। देवी दुर्गा की उपासना से व्यक्ति की धार्मिकता और आध्यात्मिकता में वृद्धि होती है और वह ईश्वर के करीब पहुंचता है।

जीवन की दिशा और उद्देश्य

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का पाठ जीवन में दिशा और उद्देश्य प्राप्त करने में भी सहायक होता है। यह व्यक्ति को अपने जीवन के लक्ष्यों को समझने और प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है। देवी दुर्गा की उपासना से जीवन के उद्देश्यों को प्राप्त करने की दिशा स्पष्ट होती है और व्यक्ति को सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है।

नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का पाठ नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा प्रदान करता है। देवी दुर्गा को शक्ति और सुरक्षा की देवी माना जाता है, और उनकी उपासना से बुरी शक्तियों और नकारात्मक प्रभावों से बचाव मिलता है। यह चालीसा व्यक्ति की ऊर्जा को सकारात्मक बनाए रखती है और जीवन में शांति और सुरक्षा प्रदान करती है।

वैवाहिक और संतान सुख

दुर्गा चालीसा का पाठ वैवाहिक जीवन और संतान सुख में भी सुधार लाता है। देवी दुर्गा को वैवाहिक सुख और संतान सुख की देवी माना जाता है। इस चालीसा का नियमित पाठ वैवाहिक समस्याओं का समाधान करता है और संतान की सुख-समृद्धि में भी सहायक होता है। यह परिवार में खुशहाली और समृद्धि बनाए रखने में मदद करती है।

जीवन में सफलता और समृद्धि

दुर्गा चालीसा का पाठ जीवन में सफलता और समृद्धि प्राप्त करने में सहायक होता है। देवी दुर्गा की उपासना से जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है, चाहे वह शिक्षा, व्यवसाय, या व्यक्तिगत जीवन हो। यह चालीसा सफलता के मार्ग को खोलती है और जीवन में सुख और समृद्धि को सुनिश्चित करती है।

आत्म-संयम और अनुशासन

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) का नियमित पाठ आत्म-संयम और अनुशासन को बढ़ावा देता है। देवी दुर्गा की उपासना से व्यक्ति में आत्म-नियंत्रण और अनुशासन की भावना उत्पन्न होती है, जो जीवन को व्यवस्थित और प्रबंधित करने में मदद करती है। यह अनुशासन को बनाए रखने और आत्म-संयम को प्रोत्साहित करती है।

जीवन की कठिनाइयों से उबरना

दुर्गा चालीसा का पाठ जीवन की कठिनाइयों से उबरने में भी सहायक होता है। देवी दुर्गा की उपासना से व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति और क्षमता प्राप्त होती है। यह चालीसा जीवन की समस्याओं को सुलझाने में मदद करती है और कठिनाइयों से बाहर निकलने का मार्ग प्रशस्त करती है।

ध्यान और साधना में सहायता

दुर्गा चालीसा का नियमित पाठ ध्यान और साधना में भी सहायक होता है। देवी दुर्गा की उपासना से ध्यान लगाने की क्षमता में वृद्धि होती है और साधना के दौरान एकाग्रता बनी रहती है। यह ध्यान की गहराई को बढ़ाता है और आध्यात्मिक अनुभव को सशक्त करता है।

शुभकामनाओं और आशीर्वाद का प्राप्ति

दुर्गा चालीसा का पाठ शुभकामनाओं और आशीर्वाद की प्राप्ति में भी सहायक होता है। देवी दुर्गा की उपासना से व्यक्ति को ईश्वर से आशीर्वाद प्राप्त होता है, जो जीवन के हर क्षेत्र में सफलता और समृद्धि को सुनिश्चित करता है। यह चालीसा व्यक्ति की इच्छाओं को पूरा करने और उसके सपनों को साकार करने में मदद करती है।

भौतिक और आध्यात्मिक संतुलन

दुर्गा चालीसा का पाठ भौतिक और आध्यात्मिक संतुलन बनाए रखने में भी सहायक होता है। यह व्यक्ति को जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक पहलुओं को संतुलित तरीके से जीने की प्रेरणा देती है, जिससे जीवन में एकरूपता और सामंजस्य बनता है।

मनोबल और दृढ़ता

दुर्गा चालीसा का पाठ व्यक्ति के मनोबल और दृढ़ता को भी बढ़ाता है। देवी दुर्गा की उपासना से व्यक्ति में साहस और हिम्मत आती है, जिससे वह जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना बेहतर तरीके से कर सकता है। यह मनोबल को मजबूत बनाता है और समस्याओं को धैर्यपूर्वक सुलझाने की क्षमता प्रदान करता है।

आत्म-विश्वास में वृद्धि

दुर्गा चालीसा का पाठ आत्म-विश्वास को बढ़ाने में भी सहायक होता है। देवी दुर्गा की उपासना से व्यक्ति के अंदर एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जो आत्म-विश्वास को बढ़ाता है और जीवन में चुनौतियों का सामना करने की क्षमता को मजबूत करता है।

जीवन की दिशा और उद्देश्य

दुर्गा चालीसा का पाठ जीवन की दिशा और उद्देश्य प्राप्त करने में भी सहायक होता है। यह व्यक्ति को अपनी प्राथमिकताओं को समझने और अपने जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है। देवी दुर्गा की उपासना से जीवन के उद्देश्यों को प्राप्त करने की दिशा स्पष्ट होती है।

सुख-समृद्धि और सुखद जीवन

दुर्गा चालीसा का नियमित पाठ सुख-समृद्धि और सुखद जीवन के लिए भी महत्वपूर्ण है। यह व्यक्ति को जीवन में खुशहाली और समृद्धि प्राप्त करने में मदद करता है और जीवन की हर स्थिति में संतोष और खुशी बनाए रखने की प्रेरणा देता है।

जीवन में सकारात्मकता

दुर्गा चालीसा का पाठ जीवन में सकारात्मकता को बढ़ावा देता है। देवी दुर्गा की उपासना से व्यक्ति की सोच सकारात्मक होती है और वह जीवन की कठिनाइयों को सकारात्मक दृष्टिकोण से देखने लगता है। यह मानसिक स्थिति जीवन की चुनौतियों का सामना करने में मदद करती है।

साधना और पूजा की नियमितता

दुर्गा चालीसा का नियमित पाठ पूजा और साधना की नियमितता को बनाए रखने में भी सहायक होता है। यह व्यक्ति को धार्मिक अनुशासन में बनाए रखता है और नियमित पूजा और साधना के अभ्यास को प्रोत्साहित करता है।

दुर्गा चालीसा का पाठ धार्मिक और आध्यात्मिक लाभ प्रदान करने के साथ-साथ जीवन के विभिन्न पहलुओं में सकारात्मक परिवर्तन लाने में भी सहायक होता है। इसके नियमित पाठ से मानसिक शांति, विघ्नों का नाश, स्वास्थ्य में सुधार, पारिवारिक सुख, और आर्थिक समृद्धि जैसी अनेक लाभ प्राप्त होते हैं। देवी दुर्गा की उपासना से व्यक्ति को जीवन की हर स्थिति में खुशी, सफलता, और संतोष प्राप्त होता है।


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दुर्गा चालीसा आरती PDF एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्तोत्र है जो देवी दुर्गा की पूजा और आराधना में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। दुर्गा चालीसा में देवी दुर्गा की 40 पंक्तियों के माध्यम से उनकी शक्ति, कृपा और महिमा का वर्णन किया गया है। यह चालीसा विशेष रूप से नवरात्रि जैसे पावन अवसरों पर पढ़ी जाती है और इसके पाठ से भक्तों को मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है। इसके साथ ही, दुर्गा आरती की जाती है, जिसमें देवी की स्तुति और उनकी महानता को दर्शाने वाले भजन गाए जाते हैं।

दुर्गा चालीसा और दुर्गा आरती के नियमित पाठ से भक्तों को देवी दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होती है, जो उनके जीवन में सुख, समृद्धि और सुरक्षा का आश्वासन देती है। यह धार्मिक अनुष्ठान न केवल आध्यात्मिक संतुलन को बनाए रखने में मदद करता है बल्कि भक्ति और श्रद्धा को भी प्रगाढ़ करता है। इस प्रकार, दुर्गा चालीसा और आरती का आयोजन न केवल एक धार्मिक कृत्य होता है, बल्कि यह भक्तों के लिए एक गहन आध्यात्मिक अनुभव भी प्रदान करता है।


दुर्गा चालीसा कैसे पढ़ा जाता है? जाने समय और विधि

दुर्गा चालीसा के पाठ का सर्वोत्तम काल ब्रह्म मुहूर्त माना जाता है – प्रातःकाल की वह पावन वेला जब सृष्टि नवीन ऊर्जा से स्पंदित होती है। यह समय, जो सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटे पूर्व, प्रायः प्रातः 4 से 6 बजे के मध्य होता है, आध्यात्मिक साधना के लिए अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है।

तथापि, भक्तगण दिवस के किसी भी क्षण में श्रद्धापूर्वक दुर्गा चालीसा का पाठ कर सकते हैं। परंतु अनेक साधक प्रभात काल को विशेष महत्व देते हैं, क्योंकि यह समय मां दुर्गा के आशीर्वाद और सकारात्मक ऊर्जा से दिन का शुभारंभ करने का अद्वितीय अवसर प्रदान करता है।

पाठ की उत्कृष्ट विधि यह है कि स्नानोपरांत, शुद्ध और पवित्र मन-तन से, देवी दुर्गा की प्रतिमा अथवा चित्र के समक्ष बैठकर चालीसा का पाठ किया जाए। इस प्रकार की साधना से न केवल आध्यात्मिक लाभ की प्राप्ति होती है, अपितु भक्त का दिव्य शक्तियों से तादात्म्य भी स्थापित होता है, जिससे उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं।

स्मरण रहे, दुर्गा चालीसा का पाठ मात्र एक कर्मकांड नहीं, अपितु मां दुर्गा से संवाद का एक माध्यम है। अतः इसे पूर्ण श्रद्धा, समर्पण और एकाग्रता के साथ करना चाहिए। ऐसा करने से भक्त के जीवन में दैवीय कृपा का प्रवाह अवश्यंभावी हो जाता है।

दुर्गा चालीसा पढ़ने से क्या फल मिलता है?

नकारात्मक शक्तियों से रक्षा (Invokes Divine Protection): दुर्गा माता की कृपा से दुर्गा चालीसा का जाप करने वाले व्यक्ति पर नकारात्मक ऊर्जा का कोई असर नहीं होता। यह एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है जो व्यक्ति को बुरी नजर, टोटके और अन्य नकारात्मक शक्तियों से बचाता है।

सकारात्मक ऊर्जा का संचार (Transmitting Positive Energy): दुर्गा चालीसा का जाप करने से मन शांत और प्रसन्न रहता है। यह व्यक्ति के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और उसे जीवन की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति प्रदान करता है।

इच्छाओं की पूर्ति (Fulfills Desires and Removes Obstacles): दुर्गा माता सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाली देवी हैं। दुर्गा चालीसा का जाप करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

आत्मविश्वास और साहस में वृद्धि (Bestows Strength and Courage): दुर्गा माता शक्ति और साहस की देवी हैं। उनके चालीसा का जाप करने से व्यक्ति में आत्मविश्वास और साहस बढ़ता है और वह जीवन में हर कठिन परिस्थिति का सामना करने में सक्षम हो जाता है।

परिवार के लिए आशीर्वाद लाता है (Brings Blessings for Family): दुर्गा चालीसा का पाठ करने से यह विश्वास किया जाता है कि परिवार और प्रियजनों पर देवी का आशीर्वाद बना रहता है और समृद्धि प्राप्त होती है। इसे देवी दुर्गा से अपने परिवार की सुरक्षा और उनके कल्याण के लिए आशीर्वाद प्राप्त करने का एक पवित्र माध्यम माना जाता है।

नकारात्मक भावनाओं को दूर करता है (Removes Negative Emotions): दुर्गा चालीसा के छंदों का जाप करने से माना जाता है कि निराशा, ईर्ष्या और वासना जैसी प्रबल नकारात्मक भावनाओं को दूर किया जाता है। यह मन और आत्मा को शुद्ध करने में मदद करता है।

दुर्गा चालीसा का पाठ कितनी बार करना चाहिए?

दुर्गा चालीसा का पाठ एक अत्यंत गहन और आध्यात्मिक साधना है, जिसकी आवृत्ति भक्तों के अनुसार भिन्न हो सकती है। इस पवित्र पाठ की महत्ता और प्रभावशीलता को समझने के लिए यहाँ कुछ महत्वपूर्ण बिंदु प्रस्तुत हैं:

  1. सामान्यतः यह माना जाता है कि दुर्गा चालीसा का नियमित रूप से, विशेषकर प्रातःकाल या सायंकाल, पाठ करना अत्यधिक लाभकारी होता है। यह दिव्य साधना न केवल देवी दुर्गा के प्रति हमारी आस्था को और प्रगाढ़ करती है, बल्कि उनके आशीर्वाद स्वरूप सुरक्षा, शक्ति और मार्गदर्शन को आकर्षित करने में भी सहायक होती है।
  2. अधिकांश भक्तगण स्नान के उपरांत देवी दुर्गा की प्रतिमा या चित्र के समक्ष चालीसा का पाठ करना शुभ मानते हैं। ऐसा विश्वास किया जाता है कि इस प्रकार का पवित्र वातावरण पाठ की प्रभावशीलता को और बढ़ा देता है।
  3. विशेषकर नवरात्रि के पावन अवसर पर, जब देवी दुर्गा के नौ रूपों की आराधना की जाती है, दुर्गा चालीसा का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। इस समय भक्तगण अपने आध्यात्मिक अभ्यास को और अधिक गहन करने हेतु इसकी आवृत्ति को बढ़ाते हैं, जिससे देवी का आशीर्वाद प्राप्त हो सके।
  1. दुर्गा जी की मां कौन है?

    मां दुर्गा की माता का नाम देवी पार्वती है, जो स्वयं महादेव शिव की पत्नी हैं। देवी पार्वती को सृष्टि की आदि शक्ति और मां दुर्गा का स्वरूप माना जाता है।

मां दुर्गा का असली नाम क्या है?

मां दुर्गा का असली नाम “शक्ति” या “आदि शक्ति” है। उन्हें विभिन्न नामों से पुकारा जाता है, जिनमें दुर्गाकालीपार्वती, और भवानी प्रमुख हैं।

दुर्गा की सच्चाई क्या है?

मां दुर्गा की सच्चाई यह है कि वह सभी बुराइयों और अधर्म का नाश करने वाली शक्ति हैं। वह शक्ति, साहस, और विजय की देवी हैं, जिनका अवतार दुष्ट राक्षसों का संहार करने और धर्म की स्थापना के लिए हुआ था।

दुर्गा का 108 अवतार कौन है?

मां दुर्गा के 108 नाम हैं, जिन्हें “अष्टोत्तर शतनाम” कहा जाता है। इनमें से कुछ प्रसिद्ध नाम हैं – काली, चामुंडा, भवानी, और महिषासुरमर्दिनी। ये सभी नाम और अवतार माता के विभिन्न रूपों और शक्तियों को दर्शाते हैं।

दुर्गा किसकी बेटी थी?

मां दुर्गा को भगवान हिमालय और देवी मैना की बेटी के रूप में भी वर्णित किया जाता है। इसके अलावा, वह देवी पार्वती का भी अवतार मानी जाती हैं।

दुर्गा पहले क्या थी?

मां दुर्गा पहले देवी पार्वती थीं, जिन्हें महादेव शिव की पत्नी के रूप में जाना जाता है। देवी पार्वती ने संसार की रक्षा के लिए अपने अंदर की शक्ति को जागृत कर दुर्गा के रूप में अवतार लिया।

दुर्गा माता किसकी बहन है?

मां दुर्गा को वैदिक ग्रंथों में भगवान विष्णु की बहन के रूप में वर्णित किया गया है। उन्हें लक्ष्मी और सरस्वती की बहन के रूप में भी माना जाता है।

दुर्गा मां की असली कहानी क्या है?

मां दुर्गा की असली कहानी महिषासुर के संहार से जुड़ी है। असुर महिषासुर को वरदान प्राप्त था कि वह केवल एक स्त्री के हाथों मारा जा सकता है। इस असुर को मारने के लिए सभी देवताओं ने अपनी शक्तियों का सम्मिलन किया, जिससे मां दुर्गा का अवतार हुआ। मां दुर्गा ने महिषासुर का वध कर धरती पर शांति और धर्म की स्थापना की।

दुर्गा चालीसा कैसे पढ़ा जाता है?

दुर्गा चालीसा पढ़ने के लिए सबसे पहले शुद्ध और शांत वातावरण का चयन करना चाहिए। सुबह और शाम का समय विशेष रूप से उपयुक्त माना जाता है। दुर्गा माता की मूर्ति या तस्वीर के सामने दीपक जलाएं और अगरबत्ती लगाएं। फिर दुर्गा चालीसा का पाठ स्पष्ट और एकाग्र मन से करें। प्रत्येक श्लोक को ध्यान से पढ़ें और उसका अर्थ समझने की कोशिश करें। यदि आप संस्कृत में सहज नहीं हैं, तो उसका हिंदी अर्थ समझना भी लाभकारी होता है। पाठ के अंत में माता से प्रार्थना करें और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की विनती करें।

दुर्गा चालीसा पढ़ने से क्या फल मिलता है?

दुर्गा चालीसा का नियमित रूप से पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि और शांति आती है। माता दुर्गा की कृपा से जीवन की कठिनाइयाँ कम होती हैं और मानसिक शांति प्राप्त होती है। इस चालीसा का पाठ करने से शत्रुओं से रक्षा होती है और व्यक्ति को साहस एवं आत्मविश्वास मिलता है। इसके अलावा, यह चालीसा नकारात्मक ऊर्जा से बचाव करती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। भक्तों को उनकी इच्छाओं की पूर्ति और जीवन में सफलता प्राप्त होती है।

दुर्गा चालीसा कितनी बार करना चाहिए?

दुर्गा चालीसा का पाठ आप अपनी सुविधा और श्रद्धा के अनुसार कर सकते हैं। सामान्यत: एक बार या तीन बार पढ़ना उचित माना जाता है। नवरात्रि के विशेष अवसर पर नौ दिनों तक रोज़ाना दुर्गा चालीसा का पाठ करना अत्यंत फलदायी होता है। कुछ भक्त इसे 11 बार या 108 बार भी पढ़ते हैं, विशेष रूप से तब जब वे किसी विशेष मनोकामना की पूर्ति के लिए इसे कर रहे हों। नियमित रूप से कम से कम एक बार पढ़ना माता की कृपा प्राप्त करने के लिए पर्याप्त है।

दुर्गा चालीसा के लेखक कौन थे?

दुर्गा चालीसा के लेखक संत तुलसीदास जी माने जाते हैं, जिन्होंने रामचरितमानस जैसी अद्वितीय रचनाएँ कीं। तुलसीदास जी ने दुर्गा चालीसा की रचना माता दुर्गा की स्तुति और उनकी कृपा प्राप्त करने के उद्देश्य से की थी। उनके द्वारा रचित यह चालीसा भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है जो उन्हें माता की अनुकम्पा दिलाने में सहायक है

Durga Chalisa Written

The Durga Chalisa written is a sacred hymn comprising forty verses that are dedicated to praising Goddess Durga. Devotees often seek the written text to recite during prayers and Navratri festivities for spiritual blessings and protection from negative forces. The written form is widely available in Hindi, Sanskrit, and various translated formats to facilitate understanding and devotion.

Durga Chalisa Aarti

The Durga Aarti is a devotional song performed with a lighted lamp after reciting the Chalisa. It is a prayer of deep reverence and gratitude sung to conclude the worship ritual. The Aarti involves waving the lamp in a circular motion in front of the deity’s image, symbolizing the removal of darkness and the invocation of the Goddess’s divine light and blessings into the devotee’s life.

दुर्गा चालीसा आरती Image

दुर्गा चालीसा आरती image typically refers to a visual or pictorial representation that depicts the text of the Aarti. These images are highly sought after by devotees for daily worship, as they provide a convenient and accurate reference for singing the prayer. They are commonly shared on social media and messaging platforms during religious festivals, allowing users to easily read and follow along with the verses.

विंधेश्वरी चालीसा दुर्गा चालीसा PDF

The विंधेश्वरी चालीसा दुर्गा चालीसा PDF is a digital document that contains the hymns for both Goddess Vindhyeshwari, a form of Durga, and the traditional Durga Chalisa. This PDF is a valuable resource for devotees, as it compiles these powerful prayers into a single, portable file that can be stored on smartphones, tablets, or computers for offline reading and printing.

दुर्गा चालीसा डाउनलोडिंग

दुर्गा चालीसा डाउनलोडिंग refers to the process of acquiring a digital copy of the Durga Chalisa text or audio from the chalisa-pdf.com. This enables devotees to access the prayer anytime, anywhere, without requiring an active internet connection.

दुर्गा चालीसा आरती सहित PDF

दुर्गा चालीसा आरती सहित PDF is a comprehensive digital document that includes the full text of both the forty verses of the Durga Chalisa and the concluding Aarti prayer. This all-in-one PDF is extremely popular as it provides a complete script for a full worship session, making it convenient for individuals and groups to perform the entire ritual without switching between different sources.

Anuradha Paudwal Namo Namo Durge Sukh Lyrics

The Anuradha Paudwal Namo Namo Durge Sukh lyrics are from a famous devotional bhajan sung by the renowned artist Anuradha Paudwal. This song is a powerful invocation of Goddess Durge, pleading for happiness and the well-being of all. The lyrics are a heartfelt prayer asking the Mother Goddess to destroy all suffering and bring peace, prosperity, and joy to her devotees.

दुर्गा चालीसा साधना

दुर्गा चालीसा साधना refers to the dedicated spiritual practice and discipline of regularly reciting the Durga Chalisa with specific intentions and rituals. This Sadhana is often undertaken to seek the divine grace of Maa Durga for overcoming immense challenges, destroying enemies, and attaining spiritual power. It is typically performed with purity, devotion, and often following a prescribed set of rules over a period of time to achieve desired results.

कबीर अमृतवाणी – Kabir Amritwani PDF 2025

कबीर अमृतवाणी (Kabir Amritwani PDF) एक अद्वितीय और महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है जो संत कबीर के विचारों, उपदेशों और जीवन दर्शन का संग्रह है। कबीर, 15वीं सदी के महान संत और समाज सुधारक, अपने दोहों और साखियों के माध्यम से समाज में व्याप्त अंधविश्वासों, कुरीतियों और जातिवाद के खिलाफ आवाज उठाते थे। उनकी वाणी में सरलता, सच्चाई और जनसामान्य की समस्याओं का समाधान मिलता है।

कबीर अमृतवाणी के माध्यम से पाठक कबीर के गहरे विचारों को समझ सकते हैं और उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं से प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं। यह ग्रंथ उन सभी के लिए अमूल्य धरोहर है जो मानवता, प्रेम, और समरसता के मार्ग पर चलना चाहते हैं। संत कबीर के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके समय में थे, और कबीर अमृतवाणी हमें उनके मार्गदर्शन का सजीव प्रमाण प्रदान करती है।
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सद्गुरु के परताप तैं मिटि गया सब दुःख दर्द।
कह कबीर दुविधा मिटी, गुरु मिलिया रामानंद ॥

गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय |
बलिहारी गुरू अपने गोविन्द दियो बताय ||

ऐसी वाणी बोलिए, मुन का आपा खोए |
अपना तन शीतल करे, औरां को सुख होए ||

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर |
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर ||

निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, |
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय ||

दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय |
जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय ||

माटी कहै कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय।
इक दिन ऐसो होयगो, मैं रौंदूंगी तोय ॥

कस्तूरी कुंडली बसै, मृग ढूंढे बन मांहि
ऐसे घटि घटि राम हैं, दुनिया देखै नांहि ॥

बहुत दिनन की जोवती, बाट तुम्हारी राम।
जिव तरसै तुझ मिलन कूँ, मनि नाहीं विश्राम

जहाँ दया तहँ धर्म है, जहाँ लोभ तहँ पाप।
जहाँ क्रोध तहँ काल है, जहाँ छिमा तहँ आप

काल करै सो आज कर, आज करै सो अब्ब।
पल में परलै होयगा, बहुरि करैगा कब्ब ||

दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे होय ॥

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान ।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान ॥


kabir amritwani lyrics

kabir amritwani pdf 2026

कबीर अमृतवाणी, संत कबीर के गहन और प्रेरणादायक उपदेशों का संग्रह है, जो मानव जीवन को सही दिशा देने और आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करने में सहायक है। संत कबीर के दोहे और भजनों में छिपा ज्ञान न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से बल्कि व्यावहारिक जीवन में भी अत्यंत उपयोगी है।

कबीर अमृतवाणी PDF एक ऐसा माध्यम है जो उनके उपदेशों को सरलता से समझने और अपने जीवन में अपनाने में मदद करता है। यह PDF खासतौर पर उन लोगों के लिए उपयोगी है जो आध्यात्मिक अध्ययन के प्रति रुचि रखते हैं। इसमें कबीर के अमूल्य विचार, भजनों की व्याख्या और उनके गूढ़ संदेशों को विस्तार से समझाया गया है।

कबीर अमृतवाणी पढ़ने से आपको आत्मा की शुद्धता, सत्य और ईश्वर के प्रति प्रेम का अनुभव होगा। इसके माध्यम से आप “मन के मैल” को साफ कर अपने जीवन में शांति और स्थिरता ला सकते हैं।

इस PDF को आप आसानी से डाउनलोड कर सकते हैं और नियमित रूप से इसका अध्ययन कर सकते हैं। यह खासतौर पर उन भक्तों के लिए उपयुक्त है जो संत कबीर के जीवन-दर्शन को गहराई से समझना चाहते हैं।


कबीर के अमृत से सिंचित मन की बात…

“कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर।
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।”

इन पंक्तियों से कौन परिचित नहीं? कबीर दास… एक नाम जो सदियों से भारतीय चेतना में अमृत की तरह बहता आ रहा है। उनकी ‘अमृतवानी’ – उनके दोहे, साखियाँ, पद और शब्द – सिर्फ काव्य नहीं, जीवन जीने का सूत्र हैं। पर क्या आप जानते हैं कि इस अथाह सागर के भीतर कितने अनदेखे मोती छिपे हैं? कबीर के बारे में जो कुछ हम जानते हैं, उसकी तुलना में जो हम नहीं जानते, वह शायद कहीं ज्यादा रोचक और चौंकाने वाला है। आइए, आज डूबते हैं कबीर अमृतवानी के उन्हीं गहरे, कम चर्चित, पर अद्भुत पहलुओं में।

1. “कबीर” क्या सिर्फ एक नाम था? शायद एक खिताब था!

  • हम सब जानते हैं कि उनका जन्म एक विधवा ब्राह्मणी के घर हुआ और लहरतारा तालाब के किनारे नीरु और नीमा नामक जुलाहे दंपत्ति ने उन्हें पाला। पर क्या आप जानते हैं कि ‘कबीर’ शब्द की उत्पत्ति के बारे में एक दिलचस्प सिद्धांत है?
  • अरबी मूल का रहस्य: कुछ विद्वान मानते हैं कि ‘कबीर’ अरबी शब्द ‘अल-कबीर’ (अल्लाह का एक नाम, जिसका अर्थ है ‘महान’ या ‘विशाल’) से लिया गया है। यह इस्लामी सूफी परंपरा में भी प्रचलित है। क्या यह संभव है कि कबीर के गुरु रामानंद ने या किसी सूफी संत ने उन्हें उनकी विलक्षणता के कारण यह उपाधि दी हो? क्या ‘कबीर’ उनका जन्म का नाम नहीं, बल्कि एक सम्मानसूचक खिताब था जो उनकी पहचान बन गया? यह विचार उनकी व्यापक, सर्वसमावेशक आध्यात्मिक दृष्टि को और भी सार्थक बनाता है।

2. रचनाओं का विशाल भंडार: क्या सब कुछ सचमुच उनका है?

  • कबीर ग्रंथावली में हजारों पद, साखियाँ और शब्द हैं। परंतु, यहां एक बड़ा प्रश्न उठता है:
  • सामूहिक चेतना का प्रवाह: कबीर की परंपरा में ‘कबीर पंथ’ का गहरा योगदान रहा है। यह माना जाता है कि कबीर के बाद, उनके प्रमुख शिष्यों (जैसे धर्मदास) और पंथ के अन्य विचारवंत संतों ने भी कबीर की शैली और विचारधारा में रचनाएँ कीं। इन्हें बाद में ‘कबीर वाणी’ में ही शामिल कर लिया गया। क्या हम जो ‘कबीर अमृतवानी’ पढ़ते हैं, वह पूर्णतः एक व्यक्ति की रचना है, या एक पूरी आध्यात्मिक परंपरा का सामूहिक प्रस्फुटन है? यह जानना मुश्किल है, पर यह तथ्य कबीर के विचारों की व्यापकता और उनके प्रभाव की गहराई को दर्शाता है।

3. लिखित नहीं, मौखिक था मूल खजाना: शिष्यों की याददाश्त का चमत्कार!

  • यह बात अक्सर अनकही रह जाती है:
  • अनपढ़ कबीर, लिखित ग्रंथ कैसे? कबीर स्वयं पढ़े-लिखे नहीं थे। उनकी सारी वाणी मौखिक थी – सत्संग में बोली गई, गाई गई। उनके शिष्यों ने इन बातों को कंठस्थ किया, याद रखा और फिर आगे प्रचारित किया। उनकी अमर वाणी का संरक्षण और प्रसार पूरी तरह उनके शिष्यों की स्मरण शक्ति और भक्ति पर निर्भर था! यह अपने आप में एक आश्चर्यजनक तथ्य है। लिखित रूप तो बहुत बाद में, उनके निधन के कई दशकों बाद आया।

4. “बीजक”: कबीर पंथ का ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ – पर अलग!

  • कबीर की रचनाओं का सबसे प्रामाणिक और पुराना संकलन ‘बीजक’ है। पर यह क्या है?
  • धर्मदास की भूमिका: ‘बीजक’ को संकलित करने का श्रेय मुख्यतः कबीर के शिष्य धर्मदास को जाता है। यह कबीर पंथ के लिए वही मौलिक ग्रंथ है जो सिखों के लिए गुरु ग्रंथ साहिब है।
  • विवादित स्वरूप: दिलचस्प बात यह है कि ‘बीजक’ के कई संस्करण हैं और इनमें काफी भिन्नता है। कौन सा संस्करण सबसे प्रामाणिक है, यह विद्वानों में विवाद का विषय रहा है। यह विविधता भी कबीर वाणी के मौखिक और बाद में लिखित होने की प्रक्रिया को दर्शाती है।
  • सिख परंपरा का अलग संकलन: गुरु ग्रंथ साहिब में कबीर के 500 से अधिक पद शामिल हैं। यह संकलन ‘बीजक’ से काफी अलग है और कबीर पंथ के लोग अक्सर ‘बीजक’ को ही प्रामाणिक मानते हैं। यह दोहरा संकलन कबीर की सार्वभौमिक स्वीकृति का प्रमाण है।

5. “राम” कबीर के यहाँ कौन? भक्ति का अनोखा ताना-बाना!

  • कबीर अक्सर ‘राम’ का जाप करते दिखाई देते हैं। पर क्या यह भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम हैं?
  • निर्गुण का नाम: कबीर के ‘राम’ सगुण (मूर्त रूप वाले) नहीं हैं। उनके लिए ‘राम’ एक सांकेतिक नाम है निराकार, निर्गुण परमब्रह्म के लिए। वे कहते हैं – “राम रमैया राम है, नाम बड़ा अधार।” यहाँ राम का अर्थ है वह परम तत्व जो सर्वत्र व्याप्त है।
  • सूफी प्रभाव का स्पर्श: कुछ विद्वान मानते हैं कि ‘राम’ शब्द का यह निर्गुण प्रयोग इस्लामी सूफी परंपरा के ‘इश्क’ (प्रेम) और ‘हक़’ (सत्य) की अवधारणा से प्रभावित हो सकता है। कबीर ने भक्ति की भाषा को एक अद्वितीय सार्वभौमिक आयाम दिया।

6. क्रांतिकारी नारीवादी? जाति के साथ लिंगभेद पर भी प्रहार!

  • कबीर को जाति व्यवस्था के कट्टर आलोचक के रूप में जाना जाता है। पर उनकी नजर में नारी की स्थिति क्या थी?
  • स्त्री को ‘नारी’ नहीं, ‘शक्ति’ की दृष्टि: कबीर ने स्त्री को केवल भोग्या या माया के रूप में देखने वाली सामाजिक मानसिकता को ध्वस्त किया। उन्होंने स्त्री को भी उसी आत्मा का रूप बताया जो पुरुष में है:
    • “स्त्री पुरुष एक ही जानि, दोनों एक ही रूप।”
    • “नारी तो हम भी जानिये, पीव की प्यारी जान।” (यहाँ ‘पीव’ प्रभु/परमात्मा है)।
  • पर्दा प्रथा पर तीखा व्यंग्य: उन्होंने सती प्रथा, बाल विवाह और पर्दा प्रथा जैसी कुरीतियों पर भी करारी चोट की:
    • “घूंघट में मुंह छिपावै, क्या चेरी क्या रान?
      जब आई दुनिया में, भेष नारी की जान।” (घूंघट में मुंह छिपाना क्या चेरी और क्या रानी का काम? जब दुनिया में आई, तो नारी का भेष ही जाना गया – मतलब, नारी होना ही उसकी पहचान है, छिपाने की क्या बात?)

7. विज्ञान के आश्चर्यजनक सूत्र? आधुनिक भौतिकी से मिलते-जुलते विचार!

  • कबीर की वाणी में कई ऐसी बातें हैं जो आधुनिक वैज्ञानिक खोजों से अद्भुत समानता रखती हैं:
  • सापेक्षता का संकेत? “काल करै सो आज हो, आज करै सो अब।” (कल जो करना है वह आज करो, आज जो करना है वह अभी करो) – यह समय की सापेक्षता और वर्तमान क्षण के महत्व को दर्शाता है, जो आधुनिक भौतिकी की एक मूलभूत अवधारणा है।
  • ऊर्जा संरक्षण का आभास? “जल में कुंभ, कुंभ में जल है, बाहर भीतर पानी। फूटा कुंभ जल जलहिं समाना, यह तथ कथौ गियानी।” (जल में घड़ा और घड़े में जल है, बाहर भीतर पानी। घड़ा फूटा तो जल जल में मिल गया, यही तत्वज्ञानी जानते हैं।) यह आत्मा (जल) और शरीर (घड़ा) के संबंध को दर्शाने के साथ ही ऊर्जा के संरक्षण और विश्व की एकात्मकता का भी बोध कराता है – कुछ-कुछ E=mc² की भावना।
  • क्वांटम अनिश्चितता का संकेत? उनकी पूरी दृष्टि ही निश्चितता के बजाय प्रश्न करने, संदेह करने और अनुभव पर जोर देने की है, जो वैज्ञानिक पद्धति का आधार है।

8. संगीत से परे: वो राग जो खो गए या बदल गए?

  • कबीर के पद विभिन्न रागों में गाए जाते हैं। पर एक रोचक बात:
  • मूल धुनों का रहस्य: यह माना जाता है कि कबीर ने अपने पदों को गाने के लिए कुछ विशिष्ट, शायद स्थानीय या स्वतः स्फूर्त धुनों (रागों या रागिनियों) का प्रयोग किया होगा। समय के साथ, जैसे-जैसे उनके पद शास्त्रीय संगीत की मुख्यधारा में शामिल हुए, उन्हें मौजूदा रागों (जैसे भैरवी, यमन, बिलावल, सोरठ) में ढाला गया। कबीर की मूल संगीतात्मक अभिव्यक्ति क्या थी? क्या कुछ ऐसे ‘कबीरी राग’ थे जो अब विलुप्त हो गए या बदल गए? यह संगीत इतिहास का एक अनसुलझा प्रश्न बना हुआ है।

9. कबीर की मृत्यु: एक नहीं, अनेक किंवदंतियाँ!

  • कबीर के जीवन की तरह उनकी मृत्यु भी रहस्यों से घिरी है और उस पर अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं:
  • मगहर का विवाद: सबसे प्रसिद्ध कथा है कि उन्होंने अपनी मृत्यु मगहर में होने की इच्छा जताई, क्योंकि उस समय यह मान्यता थी कि मगहर में मरने वाला नरक जाता है, जबकि काशी में मरने वाला स्वर्ग। कबीर ने इस अंधविश्वास को तोड़ने के लिए ऐसा किया।
  • फूलों का चमत्कार: कहा जाता है कि उनकी मृत्यु के बाद हिंदू और मुसलमान अनुयायियों के बीच उनके शरीर के अंतिम संस्कार को लेकर विवाद हुआ। जब चादर हटाई गई तो वहाँ सिर्फ फूल मिले! हिंदुओं ने उन फूलों का दाह संस्कार किया और मुसलमानों ने उन्हें दफनाया। इस प्रकार मगहर में कबीर की समाधि और मज़ार दोनों बनाए गए। यह कथा उनकी सर्वसमावेशकता और दोनों समुदायों में उनकी समान स्वीकृति का प्रतीक है।
  • क्या वास्तव में ऐसा हुआ? ऐतिहासिक प्रमाणों की कमी है। ये कथाएँ कबीर की पौराणिक छवि और उनके द्वारा किए गए सामाजिक विद्रोह को दर्शाती हैं।

10. कबीर का सच्चा जन्मस्थान: काशी या अन्यत्र?

  • काशी (वाराणसी) को कबीर का जन्मस्थान माना जाता है। पर कुछ शोधकर्ता इस पर भी सवाल उठाते हैं:
  • वैकल्पिक सिद्धांत: कुछ इतिहासकारों और पंथियों का मानना है कि उनका जन्म स्थान वाराणसी नहीं, बल्कि आधुनिक उत्तर प्रदेश के कुछ अन्य स्थान (जैसे बेलहरापट्टी, जिला सुल्तानपुर) या यहाँ तक कि दक्षिण भारत का कोई स्थान भी हो सकता है। इन दावों के पीछे स्थानीय मौखिक परंपराएँ और कुछ ऐतिहासिक संदर्भ हैं।
  • असली स्थान क्या मायने रखता है? तथ्य यह है कि कबीर ने स्वयं कभी अपने जन्मस्थान को महत्व नहीं दिया। उनके लिए तो पूरा ब्रह्मांड ही उनका घर था। यह बहस उनकी विरासत की व्यापकता को ही दर्शाती है।

11. कबीर अमृतवानी की असली शक्ति: सामान्य जन की भाषा में असाधारण बात!

  • कबीर की सबसे बड़ी विशेषता, जो अक्सर उनकी रहस्यमयता में छिप जाती है:
  • लोकभाषा का जादू: कबीर ने संस्कृत या फारसी की जटिलता का सहारा नहीं लिया। उन्होंने आम जनता की बोलचाल की भाषा – सधुक्कड़ी (हिंदी, अवधी, ब्रज, राजस्थानी और फारसी/अरबी शब्दों का मिश्रण) में अपनी बात कही। उनकी भाषा कठोर, सीधी, व्यंग्यपूर्ण और अत्यंत प्रभावशाली थी।
  • किस्सों और मुहावरों का प्रयोग: उन्होंने दैनिक जीवन के उदाहरणों (जुलाहे का करघा, बाजार, बर्तन), लोककथाओं और मुहावरों का खूब प्रयोग किया। इससे उनकी गहन आध्यात्मिक बातें एकदम स्पष्ट और हृदयंगम हो गईं। यही कारण है कि आज भी, सैकड़ों साल बाद, एक सामान्य किसान या मजदूर भी कबीर के दोहे को समझ सकता है और उससे प्रेरणा ले सकता है। यह उनकी अमृतवानी की सर्वकालिक सफलता का राज है।

12. कबीर के दोहे: शांति के हथियार, दंगों को रोकने की ताकत!

  • कबीर की वाणी सिर्फ आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का शक्तिशाली हथियार भी रही है। इतिहास में ऐसे प्रसंग हैं जहाँ उनके दोहों ने हिंसा को रोका:
  • दंगे रोकने की शक्ति: यह किंवदंती प्रसिद्ध है कि किसी सांप्रदायिक दंगे के दौरान, जब हिंसा चरम पर थी, किसी संत ने कबीर का दोहा गाना शुरू किया: “माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर। कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर।” (माला फेरते-फेरते युग बीत गया, पर मन का भ्रम नहीं गया। हाथ की माला छोड़ो और मन के भ्रम को दूर करो)। कहते हैं यह सुनकर दंगाई अपने हथियार डालकर बैठ गए। यह कबीर के शब्दों की अद्भुत शक्ति और उनके सार्वभौमिक शांति संदेश का जीवंत उदाहरण है।

अमृतवानी का अनंत स्रोत

कबीर कोई स्थिर ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं हैं। वे एक जीवंत परंपरा हैं, एक चलायमान विचार हैं, एक ऐसा स्रोत हैं जिसमें से हर युग अपनी प्यास बुझाता है। उनकी अमृतवानी के ये अनसुने, अनछुए पहलू हमें याद दिलाते हैं कि कबीर को समझने का मतलब केवल उनके दोहे रटना नहीं, बल्कि उनकी विद्रोही चेतना, उनकी तीखी दृष्टि और उनकी अथाह मानवीयता को आत्मसात करना है।

उनकी वाणी में जीवन के हर संघर्ष, हर प्रश्न, हर अंधविश्वास और हर आशा का समाधान मौजूद है – बस गहराई से देखने और सुनने की जरूरत है। वे कहते हैं:

“बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।”

(बड़ा होना ही काफी नहीं, जैसे खजूर का पेड़ बड़ा तो होता है पर न तो राहगीर को छाया दे पाता है, न उसके फल आसानी से मिलते हैं।)

कबीर खजूर के पेड़ नहीं हैं। वे एक विशाल बरगद हैं, जिसकी छाया में सब आ सकते हैं और जिसके मीठे फल (ज्ञान-अमृत) हर कोई तोड़ सकता है। उनकी अमृतवानी कोई पुरानी किताब नहीं, बल्कि हमारे अंदर बहने वाली वह जीवनदायिनी धारा है जो हमें सच्चा, निर्भीक और प्रेमपूर्ण जीवन जीने की राह दिखाती है। इन अनजाने तथ्यों को जानकर हम इस धारा को और भी नजदीक से महसूस कर सकते हैं।

कबीरा यह गति की हरि की, गाइ न जाइ खरी खोट।
जैसे पानी में पांवड़ा, दुख लागे ना छोट।

(कबीर कहते हैं, भगवान की इस लीला को गाना आसान नहीं, यह कच्चे-पक्के का भेद नहीं जानती। जैसे पानी में पैर रखने पर कोई छोटा-बड़ा नहीं होता, सब एक समान भीगते हैं।)

इसी एकरसता, इसी सार्वभौमिकता में छिपा है कबीर अमृतवानी का सच्चा रहस्य!


कबीर अमृतवाणी (Kabir Amritwani PDF)

कबीर दास जी के 10 प्रसिद्ध दोहे?

माला फेरत जुग भया, गया न मन का फेर।
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।

दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होय।

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोय।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदूगी तोय।

पानी में मीन पियासी, मोहे सुन-सुन आवै हांसी।
ज्यों घट भीतर आत्मा, बिरला बुझे कोई।

कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर।
न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर।

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहिं।
प्रेम गली अति सांकरी, तामें दो न समाहिं।

निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय।
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।

ज्यों तिल माहि तेल है, ज्यों चकमक में आग।
तेरा साईं तुझ में है, जाग सके तो जाग।

नहाये धोये क्या हुआ जो मन मैल न जाए मीन सदा जल में रहे धोये बास न जाए?

यह कबीर का प्रसिद्ध दोहा नहीं है, बल्कि एक लोकप्रिय भजन का अंश है। इस भजन में कबीर का संदेश है कि बाहरी स्वच्छता का कोई महत्व नहीं यदि मन में मैल और बुराई है। मछली हमेशा पानी में रहती है फिर भी उसकी गंध नहीं जाती, उसी प्रकार बाहरी सफाई से कुछ नहीं होता अगर मन की सफाई नहीं होती।

कबीर की उलटबांसी अर्थ सहित?

कबीर की उलटबांसी उनके रहस्यमय और गूढ़ उपदेश होते हैं, जिन्हें उलटबांसी कहा जाता है। एक उदाहरण देखें:

सिर पर बोझ रखे फिरै, ज्यूं गदहा बिन काम।
उलटबांसी कह कबीर, समझे ब्रह्म ग्यानी नाम।

अर्थ: जो व्यक्ति बिना समझे, केवल दिखावे के लिए धर्म का बोझ उठाए फिरता है, वह गधे के समान है। कबीर कहते हैं कि इस उलटबांसी को वही समझ सकता है जो ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर चुका हो।

कबीर दास जी के प्रेम के दोहे?

कबिरा तेरी झोपड़ी, गल कटीयन के पास।
जो करैंगे सो भरेंगे, तू क्यों भया उदास।

प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा परजा जेहि रूचि, सीस देई ले जाय।

कबिरा सोई प्रेम रस, जो ऊसर में होय।
सींचे सींचे प्रेम रस, तब हरियाली होय।

प्रीतम गली अति सांकरी, तामें दो न समाहिं।
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहिं।

कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहाँ उड़ि जाइ।
जो जैसी संगति करै, सो तैसा ही फल पाइ।

रहीम के कौन से दोहे अधिक प्रसिद्ध हैं?

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर न जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय।

रहिमन देख बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहां काम आवे सुई, कहा करै तलवारि।

बड़ बड़े को छोटो कहा, रहीमन हसि हाँसि।
गिरा ऊंच पर ओछा होय, सके तो पकड़ि रस्सासि।

तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपत्ति सहे सुजान।

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चन्दन विष व्यापे नहीं, लिपटे रहत भुजंग।

शिव पंचाक्षर स्तोत्र – Shiv Panchakshar Stotra Chalisa 2025

शिव पंचाक्षर स्तोत्र – (Shiv Panchakshar Stotra Chalisa) भगवान शिव की आराधना के अनेक मार्गों में से शिव पंचाक्षर स्तोत्र एक अत्यंत प्रभावशाली और पावन स्तुति है। इसकी रचना आदि शंकराचार्य ने की थी। यह स्तोत्र भगवान शिव के सर्वाधिक प्रसिद्ध ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र पर आधारित है, जिसके पाँच अक्षर – ‘न’, ‘म’, ‘शि’, ‘वा’, ‘य’ – इसके पाँच श्लोकों का आधार बनते हैं।

इस स्तोत्र का नियमित पाठ भक्त के जीवन में शांति, आत्मबल और आध्यात्मिक जागृति लाता है। यह एक सरल किंतु शक्तिशाली साधना है जो साधक को शिव के करीब ले जाती है। श्री नारायण कवच | वीर हनुमाना अति बलवाना भजन लिरिक्स | Shri Sai Chalisa Lyrics PDF | Hanuman Chalisa MP3 Download | Pitru Stotra PDF

यह स्तोत्र एक अनोखी संरचना पर आधारित है, जहाँ प्रत्येक श्लोक पंचाक्षर मंत्र के एक अक्षर से प्रारंभ होता है और उस अक्षर के माध्यम से शिव के विभिन्न गुणों, रूपों एवं महिमा का वर्णन किया जाता है। यह हमें शिव के संहारक एवं कल्याणकारी, भयानक एवं सौम्य – दोनों ही स्वरूपों का स्मरण कराता है।

उदाहरण के लिए:

‘शि’ अक्षर वाले श्लोक में वे गौरी के मुख-कमल के सूर्य, दक्ष के यज्ञ का नाश करने वाले और नीलकंठ कहलाते हैं।
‘न’ अक्षर से प्रारंभ श्लोक में शिव को नागों की माला धारण करने वाले, त्रिनेत्रधारी और कैलाशवासी बताया गया है।


  • हिंदी 
  • English

॥Shiv Panchakshar Stotra PDF ||
|| शिव पंचाक्षर स्तोत ||

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै न काराय नमः शिवाय॥

मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय।
मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै म काराय नमः शिवाय॥

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्दसूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै शि काराय नमः शिवाय॥

वशिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्यमूनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै व काराय नमः शिवाय॥

यज्ञस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै य काराय नमः शिवाय॥

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसंनिधौ ।
शिवलोकमावाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥


|| Shiva Panchakshar Stotra PDF in English ||

Aum namah shivaya shivaya namah aum
Aum namah shivaya shivaya namah aum

nagendraharaya trilochanaya
bhasmangaragaya mahesvaraya
nityaya suddhaya digambaraya
tasmai na karaya namah shivaya

mandakini salila chandana charchitaya
nandisvara pramathanatha mahesvaraya
mandara pushpa bahupushpa supujitaya
tasmai ma karaya namah shivaya

shivaya gauri vadanabja brnda
suryaya dakshadhvara nashakaya
sri nilakanthaya Vrshadhvajaya
tasmai shi karaya namah shivaya

vashistha kumbhodbhava gautamarya
munindra devarchita shekharaya
chandrarka vaishvanara lochanaya
tasmai va karaya namah shivaya

yagna svarupaya jatadharaya
pinaka hastaya sanatanaya
divyaya devaya digambaraya
tasmai ya karaya namah shivaya

panchaksharamidam punyam yah pathechchiva
sannidhau shivalokamavapnoti sivena saha modate


shiv panchakshar stotra lyrics

शिव पंचाक्षर स्तोत्र भगवान शिव के पावन “ॐ नमः शिवाय” मंत्र पर आधारित है। इस मंत्र के पाँच अक्षर – न, म, शि, वा, य – पाँच श्लोकों में शिव के विभिन्न स्वरूपों और गुणों का वर्णन करते हैं। प्रत्येक श्लोक एक अक्षर से शुरू होता है और उस अक्षर से जुड़े शिव के गुणों की व्याख्या करता है।

ॐ श्लोकों का शब्दार्थ और भावार्थ

पहला श्लोक: ‘न’ अक्षर

संस्कृत:
नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै न काराय नमः शिवाय॥

शब्दार्थ:

  • नागेन्द्रहाराय: नागराज (शेषनाग) की माला धारण करने वाले
  • त्रिलोचनाय: तीन नेत्रों वाले
  • भस्माङ्गरागाय: शरीर पर भस्म लगाने वाले
  • महेश्वराय: सर्वोच्च ईश्वर
  • नित्याय: सनातन/अविनाशी
  • शुद्धाय: पवित्र
  • दिगम्बराय: आकाश रूपी वस्त्र धारण करने वाले (या नग्न रहने वाले)
  • तस्मै न काराय: उस ‘न’ अक्षर के स्वामी को
  • नमः शिवाय: शिव को नमस्कार

भावार्थ:
इस श्लोक में शिव को नागों के राजा की माला पहनने वाले, तीन नेत्रों वाले, भस्म में लिपटे, सर्वोच्च ईश्वर के रूप में वर्णित किया गया है। वे सनातन, पवित्र और दिगम्बर (आकाश रूपी वस्त्रधारी) हैं। ‘न’ अक्षर के अधिपति इन शिव को मेरा नमस्कार है।

दूसरा श्लोक: ‘म’ अक्षर

संस्कृत:
मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय।
मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै म काराय नमः शिवाय॥

भावार्थ:
इस श्लोक में शिव की मन्दाकिनी (गंगा) के जल और चंदन से पूजा की गई है। वे नन्दी और प्रमथगणों (शिव की सेना) के स्वामी हैं तथा मंदार और अनेक पुष्पों से सुशोभित हैं। ‘म’ अक्षर के अधिपति इन शिव को नमस्कार।

तीसरा श्लोक: ‘शि’ अक्षर

संस्कृत:
शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्दसूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै शि काराय नमः शिवाय॥

भावार्थ:
यहाँ शिव कल्याणकारी (शिव) हैं जो गौरी (पार्वती) के मुखरूपी कमल के सूर्य के समान हैं। वे दक्ष के यज्ञ का नाश करने वाले, नीलकंठ (विष पीने के कारण नीला कंठ) और वृषभ (बैल) को ध्वज के रूप में धारण करने वाले हैं। ‘शि’ अक्षर के अधिपति इन शिव को नमस्कार।

चौथा श्लोक: ‘व’ अक्षर

संस्कृत:
वशिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्यमूनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै व काराय नमः शिवाय॥

भावार्थ:
इस श्लोक में शिव की वशिष्ठ, अगस्त्य (कुम्भोद्भव), गौतम आदि मुनियों द्वारा पूजा का वर्णन है। उनके मस्तक पर चन्द्र, सूर्य और अग्नि (वैश्वानर) रूपी तीन नेत्र हैं। ‘व’ अक्षर के अधिपति इन शिव को नमस्कार।

पाँचवा श्लोक: ‘य’ अक्षर

संस्कृत:
यज्ञस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै य काराय नमः शिवाय॥

भावार्थ:
अंतिम श्लोक में शिव यज्ञस्वरूप, जटाधारी, पिनाक धनुष धारण करने वाले हैं। वे सनातन, दिव्य, देव और दिगम्बर हैं। ‘य’ अक्षर के अधिपति इन शिव को नमस्कार।


इस स्तोत्र का पाठ करने के लिए आप इस सरल विधि का पालन कर सकते हैं:

  1. स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. शिवलिंग या शिव प्रतिमा के समक्ष बैठकर दीप जलाएं
  3. मन को शांत कर ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का स्मरण करें।
  4. शांत चित्त से शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ करें।

विशेष समय: सोमवार, प्रदोष, महाशिवरात्रि जैसे दिन इसका पाठ अधिक फलदायी माना गया है, किंतु इसे किसी भी दिन नियमित रूप से पढ़ा जा सकता है।

शिव पंचाक्षर स्तोत्र का महत्व: पाँच अक्षरों में समाई सम्पूर्ण साधना

आध्यात्मिक महत्व: मोक्ष का सीधा मार्ग

शिव पंचाक्षर स्तोत्र केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि एक सम्पूर्ण साधना पद्धति है। आदि शंकराचार्य द्वारा रचित यह स्तोत्र “नमः शिवाय” मंत्र के गहन तत्वज्ञान को सरल श्लोकों में समेटता है।

मंत्र विज्ञान की दृष्टि से:

  • पंचाक्षर मंत्र (न-म-शि-वा-य) पंचतत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) और पंचकोश (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनंदमय) का प्रतीक है।
  • यह स्तोत्र पंचाक्षर के प्रत्येक अक्षर को समर्पित है, जिससे साधक को अक्षर के मूल भाव तक पहुँचने में सहायता मिलती है।

तीन प्रमुख स्तरों पर महत्व

1. आध्यात्मिक उन्नति के लिए:

  • आत्मशुद्धि: नियमित पाठ से चित्त की मलिनता दूर होती है।
  • ध्यान में गहराई: श्लोकों का भावार्थ मन को एकाग्र करने में सहायक है।
  • मोक्ष का मार्ग: अंतिम श्लोक स्पष्ट कहता है कि यह स्तोत्र शिवलोक की प्राप्ति का साधन है।

2. मानसिक शांति एवं संतुलन के लिए:

  • तनाव निवारण: शिव की महिमा का चिंतन मन से चिंताओं को हटाता है।
  • भय से मुक्ति: शिव के संहारक एवं रक्षक रूप का स्मरण भय दूर करता है।
  • मनोबल वृद्धि: शिव के विभिन्न गुणों का स्मरण आत्मविश्वास जगाता है।

3. दैनिक जीवन में व्यावहारिक लाभ:

  • सकारात्मक वातावरण: घर में नियमित पाठ से शांति और पवित्रता बनी रहती है।
  • कठिनाइयों का समाधान: जीवन की बाधाओं को दूर करने में सहायक माना गया है।
  • पारिवारिक सद्भाव: परिवार के सदस्यों में आपसी प्रेम और समर्पण बढ़ता है।

विशेष अवसरों पर अतिरिक्त महत्व

कुछ विशेष दिनों में इस स्तोत्र का पाठ विशेष फलदायी माना गया है:

  • सोमवार: शिव का दिन, जहाँ पाठ से विशेष कृपा प्राप्त होती है।
  • प्रदोष व्रत: इस समय किया गया पाठ तीव्र फल देता है।
  • महाशिवरात्रि: वर्ष का सबसे पुण्य दिन, जहाँ पाठ से जीवन परिवर्तन हो सकता है।
  • श्रावण मास: इस पूरे मास में नित्य पाठ अत्यंत शुभ माना गया है।

विभिन्न साधकों के लिए महत्व

साधारण भक्त के लिए:

  • सरल शब्दों में शिव भक्ति का मार्ग
  • दैनिक जीवन में आध्यात्मिकता का समावेश
  • मंत्र जप की शुरुआत के लिए उत्तम साधन

गृहस्थ के लिए:

  • पारिवारिक शांति और समृद्धि का साधन
  • संतान की सुरक्षा और कल्याण हेतु
  • घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

साधना में गहराई चाहने वाले के लिए:

  • पंचाक्षर मंत्र के गूढ़ रहस्यों को समझने का मार्ग
  • ध्यान की गहरी अवस्था प्राप्त करने में सहायक
  • आत्म-साक्षात्कार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से महत्व

आधुनिक शोधों के अनुसार:

  • मंत्र जप से मस्तिष्क की तरंगें शांत होती हैं
  • नियमित स्तोत्र पाठ से तनाव हार्मोन कम होते हैं
  • शब्दों की ध्वनि सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है

Shiv Panchakshar Stotra Chalisa PDF

शिव पंचाक्षर स्तोत्र और चालीसा अलग-अलग रचनाएँ हैं। पंचाक्षर स्तोत्र में पाँच श्लोक हैं जबकि चालीसा में चालीस छंद होते हैं। शिव पंचाक्षर स्तोत्र चालिसा PDF के रूप में आमतौर पर दोनों का संयुक्त संस्करण उपलब्ध होता है। यह PDF Chalifs-pdf.com से आप इसे नि:शुल्क डाउनलोड कर सकते हैं। कुछ PDF में हिंदी अनुवाद और टिप्पणियाँ भी सम्मिलित होती हैं।

Shiv Panchakshar Stotra Chalisa pdf Download

Shiv panchakshar stotra chalisa PDF download करने के लिए आप विश्वसनीय धार्मिक chalisa-pdf.com वेबसाइटों पर जा सकते हैं। अधिकांश PDFs मुफ्त में उपलब्ध हैं और उन्हें डाउनलोड करने के लिए किसी पंजीकरण की आवश्यकता नहीं होती। डाउनलोड करने के बाद आप इसे अपने मोबाइल या कंप्यूटर में सुरक्षित रख सकते हैं और कभी भी पाठ कर सकते हैं।

Shiv Panchakshar Stotra Chalisa Meaning

Shiv panchakshar stotra chalisa meaning को समझने के लिए आपको दोनों रचनाओं के अर्थ अलग-अलग जानने होंगे। पंचाक्षर स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक का अर्थ ‘नमः शिवाय’ मंत्र के एक अक्षर पर आधारित है, जो शिव के विभिन्न गुणों को दर्शाता है। वहीं, चालीसा के छंदों में शिव की महिमा, उनकी लीलाओं और भक्तों पर कृपा के किस्सों का वर्णन होता है। संपूर्ण अर्थ जानने के लिए आप हिंदी या अंग्रेजी में उपलब्ध भावार्थ सहित संस्करणों का अध्ययन कर सकते हैं, जो ऑनलाइन या पुस्तकों के रूप में आसानी से मिल जाते हैं।

शिव पंचाक्षर स्तोत्र PDF

शिव पंचाक्षर स्तोत्र PDF विभिन्न प्रारूपों में ऑनलाइन उपलब्ध है। कुछ PDF में केवल संस्कृत श्लोक होते हैं, जबकि कुछ में हिंदी अनुवाद, संदर्भ और उच्चारण मार्गदर्शन भी सम्मिलित होते हैं। यह PDF आपको स्तोत्र का सही उच्चारण और पाठ विधि सीखने में मदद करता है। इसके अलावा, कुछ PDF फाइलें ऑडियो लिंक के साथ भी उपलब्ध हैं, जिससे आप सही स्वर में पाठ करना सीख सकते हैं। इन्हें आप धार्मिक ऐप्स या वेबसाइट्स से डाउनलोड कर सकते हैं।

शिव पंचाक्षर स्तोत्र Lyrics

शिव पंचाक्षर स्तोत्र Lyrics में मूल संस्कृत के पाँच श्लोक और एक फलश्रुति श्लोक सम्मिलित हैं। प्रत्येक श्लोक ‘नमः शिवाय’ मंत्र के एक अक्षर से प्रारंभ होता है। लिरिक्स आमतौर पर देवनागरी लिपि में उपलब्ध हैं और इनमें अनुवाद भी दिया जाता है। आप इन्हें धार्मिक पुस्तकों, ऑनलाइन ब्लॉग्स या यूट्यूब वीडियो के विवरण में देख सकते हैं। कई वेबसाइट्स पर लिरिक्स के साथ-साथ शब्दार्थ और पाठ की विधि भी बताई जाती है, जो नए पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है।

शिव पंचाक्षर स्तोत्र के फायदे

शिव पंचाक्षर स्तोत्र के फायदे अनेक हैं, जिनमें आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्रमुख हैं। नियमित पाठ से मन शांत होता है, एकाग्रता बढ़ती है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह स्तोत्र आत्मशुद्धि करता है, पाप कर्मों के प्रभाव को कम करता है और मोक्ष की दिशा में अग्रसर करता है। व्यावहारिक लाभों में जीवन की बाधाओं का निवारण, मानसिक शक्ति में वृद्धि और सकारात्मक वातावरण का निर्माण शामिल है। विशेष शुभ दिनों में पाठ करने से अतिरिक्त लाभ प्राप्त होते हैं।

शिव पंचाक्षर स्तोत्र अर्थ सहित PDF Download

शिव पंचाक्षर स्तोत्र अर्थ सहित PDF Download करने के लिए आप कई विश्वसनीय हिंदी धार्मिक संसाधन वेबसाइट्स पर जा सकते हैं। यह PDF आमतौर पर दो भागों में होता है: पहले भाग में मूल संस्कृत श्लोक और दूसरे भाग में हिंदी में शब्दार्थ एवं भावार्थ। इस प्रकार की PDF फाइलें स्तोत्र को गहराई से समझने में विशेष सहायक होती हैं। कुछ साइट्स इन्हें बिना किसी शुल्क के डाउनलोड के लिए प्रदान करती हैं, तो कुछ पर आपको ईमेल पंजीकरण करना पड़ सकता है। डाउनलोड करने से पहले फाइल के गुणवत्ता और स्पष्टता की जाँच अवश्य कर लें।


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पितृ स्तोत्र – Pitru Stotra PDF 2025

पितृ स्तोत्र (Pitru Stotra PDF) एक पवित्र वैदिक स्तुति है जो पितरों को समर्पित है। यह हमारे पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा का एक सशक्त माध्यम है। पितृ पक्ष या अमावस्या जैसे विशिष्ट समय पर इसके पाठ और जल-तर्पण का विधान है। इस स्तोत्र का मूल उद्देश्य पितृ ऋण से मुक्ति पाना तथा उनकी कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करना है, जिससे परिवार में शांति, समृद्धि और सुख-सौभाग्य बना रहे।

आधुनिक संदर्भ में, पितृ स्तोत्र केवल एक रीति नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक निरंतरता और पहचान का प्रतीक है। यह हमें हमारे मूल से जोड़ते हुए, विरासत के प्रति सम्मान और जिम्मेदारी का भाव जगाता है। इसका पाठ एक आध्यात्मिक सेतु का काम करता है, जो पीढ़ियों के बीच प्रेम और आशीर्वाद का अटूट संबंध बनाए रखता है। श्री नारायण कवच | वीर हनुमाना अति बलवाना भजन लिरिक्स | Shri Sai Chalisa Lyrics PDF | Hanuman Chalisa MP3 Download


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॥Pitru Stotra PDF ||
|| पितृ स्तोत्र ||

॥Pitra Stotra in Hindi Lyrics॥
(पितृ स्तोत्र पाठ)

अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम् ।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम् ॥

इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा ।
सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान् ॥

मन्वादीनां मुनीन्द्राणां सूर्याचन्द्रमसोस्तथा ।
तान् नमस्याम्यहं सर्वान् पितृनप्सूदधावपि ॥

नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।
द्यावापृथिवोव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलि: ॥

देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान् ।
अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येsहं कृताञ्जलि: ॥

प्रजापते: कश्यपाय सोमाय वरुणाय च ।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलि: ॥

नमो गणेभ्य: सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु ।
स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे ॥

सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा ।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम् ॥

अग्रिरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम् ।
अग्नीषोममयं विश्वं यत एतदशेषत: ॥

ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तय:।
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिण: ॥

तेभ्योsखिलेभ्यो योगिभ्य: पितृभ्यो यतमानस:।
नमो नमो नमस्ते मे प्रसीदन्तु स्वधाभुज: ॥
॥ इति पितृ स्त्रोत समाप्त ॥


|| Pitru Stotra in English PDF ||

Architanammurtanam Pitrunam Dipttejasam ।
Namasyami Sada Tesham Dhyaninam Divyachakshusham ॥

Indradinan Cha Leadero Dakshmarichiyostatha ।
Saptarishinam and Nyeshaam Tan Namasyami Kamdan ॥

Manvadinam Cha Netar: Suryachandamasostatha ।
Tan Namasyamah Sarvan Pitrunapyuddhavapi ॥

Nakshatranam Grahanam Cha Vayvagnyornbhastha ।
Dyvaprithivovyoscha and Namasyami Kritanjali ॥

Devarshinam Janitrishcha Sarvalokanamskritan ।
Akshayyasya Sada Datrun Namasyeham Kritanjali ॥

Prajapate: Kaspay Somay Varunaya Ch ।
Yogeshwarebhyascha Always Namasyami Kritanjali ॥

Namo Ganebhya: Saptabhyastatha Lokeshu Saptsu ।
Swayambhuve Namasyami Brahmane Yogachakshuse ॥

Somadharan Pitruganan Yogamurtidharanstatha ।
Namasyami and Soma Pitaram Jagtamham ॥

Agrirupanasthaivanyan Namasyami Pitrunaham ।
Agrishommay Vishwavyat Etdeshet ॥

Ye Tu Tejasi Ye Chaite Somasuryagrimurtaya ।
Jagatswarupinashchaiva and Brahmaswaroopina ॥

Tebhyokhilebhyo Yogibhya: Pitrubhyo Yatamanasah ।
Namo Namo Namastustu Prasidantu Swadhabhuj ॥

Pitru Stotra PDF

आध्यात्मिक एवं पैतृक लाभ:

  1. पितृ ऋण से मुक्ति: हिंदू धर्म के तीन मूल ऋणों में से एक पितृ ऋण को चुकाने का एक श्रेष्ठ साधन माना जाता है।
  2. पितरों की प्रसन्नता व आशीर्वाद: ऐसी मान्यता है कि इसके पाठ से पूर्वज प्रसन्न होते हैं और परिवार पर अपना आशीर्वाद-संरक्षण बनाए रखते हैं।
  3. पितृ दोष शांति: ज्योतिष में माने जाने वाले पितृ दोष (पूर्वजों की असंतुष्टि) को शांत करने में सहायक माना गया है, जिससे जीवन के अवरोध दूर हो सकते हैं।
  4. पूर्वजों की आत्मा की शांति: इससे पूर्वजों की आत्मा को शांति व उच्च लोक प्राप्त करने में सहायता मिलती है, जिससे वे सद्गति को प्राप्त होते हैं।

सांसारिक एवं व्यक्तिगत लाभ:

  1. कुल परंपरा की रक्षा: पारिवारिक उन्नति, समृद्धि और वंश की निरंतरता में सहायक माना जाता है।
  2. जीवन में सुख-शांति: पारिवारिक कलह दूर होती है, घर में सुख-शांति और सद्भाव का वातावरण बनता है।
  3. मानसिक शांति व आत्मिक संतुष्टि: पूर्वजों के प्रति कर्तव्य पूरा करने से व्यक्ति को गहरी मानसिक शांति और आत्मिक संतुष्टि प्राप्त होती है।
  4. विघ्नों का निवारण: जीवन में आने वाली अनावश्यक बाधाओं, रुकावटों और असफलताओं के निवारण में सहायक माना गया है।
  5. गृहस्थ जीवन में स्थिरता: संतान सुख, आरोग्य, धन-धान्य की प्राप्ति और गृहस्थ जीवन को सुचारु व स्थिर बनाए रखने में इसे लाभकारी माना जाता है।

1- अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम्।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।।

हिन्दी अर्थ – जो सबके द्वारा पूजा किये जाने योग्य, अमूर्त, अत्यन्त तेजस्वी, ध्यानी तथा दिव्यदृष्टि से पूर्ण रूप से सम्पन्न है। उन पितरों को मैं सदा प्रणाम करता हूं।

2- इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा।
सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान्।।

हिन्दी अर्थ– जो इन्द्र आदि समस्त देवताओं, दक्ष, मारीच, सप्तर्षियों तथा दूसरों के भी नेता है, हर मनोकामना की पूर्ति करने वाले उन पितरो को मैं प्रणाम करता हूं।

3- मन्वादीनां च नेतार: सूर्याचन्दमसोस्तथा।
तान् नमस्यामहं सर्वान् पितृनप्युदधावपि।।

हिन्दी अर्थ– जो मनु आदि राजर्षियों, मुनिश्वरों तथा सूर्य देव और चन्द्र देव के भी नायक है। उन समस्त पितरों को मैं जल और समुद्र में भी प्रणाम करता हूं।

4- नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।
द्यावापृथिवोव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलि:।।

हिन्दी अर्थ– नक्षत्रों, ग्रहों, वायु, अग्नि, आकाश और द्युलोक तथा पृथ्वी के भी जो नेता हैं, उन पितरों को मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूं। सदैव उनका आशीर्वाद मुझ पर बना रहे।

5- देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान्।
अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येहं कृताञ्जलि:।।

हिन्दी अर्थ– जो देवर्षियों के जन्मदाता, समस्त लोकों द्वारा वन्दित तथा सदा अक्षय फल को देने वाले हैं, उन पितरों को मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूं।

6- प्रजापते: कश्पाय सोमाय वरुणाय च।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलि:।।

हिन्दी अर्थ– प्रजापति, कश्यप, सोम, वरूण तथा योगेश्वरों के रूप में स्थित पितरों को सदा हाथ जोड़कर सदैव प्रणाम करता हूं।

7- नमो गणेभ्य: सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु।
स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे।।

हिन्दी अर्थ– सातों लोकों में स्थित सात पितृगणों को प्रणाम है। मैं योगदृष्टिसम्पन्न स्वयम्भू जगतपिता ब्रह्माजी को प्रणाम करता हूं। सदैव आपका आशीर्वाद मुझ पर बना रहे।

8- सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम्।।

हिन्दी अर्थ– चन्द्र देव के आधार पर प्रतिष्ठित तथा योगमूर्तिधारी पितृगणों को मैं प्रणाम करता हूं। साथ ही सम्पूर्ण जगत् के पिता सोम को प्रणाम करता हूं। सदैव उनका आशीर्वाद मुझ पर बना रहे।

9- अग्रिरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम्।
अग्रीषोममयं विश्वं यत एतदशेषत:।।

हिन्दी अर्थ– अग्निस्वरूप अन्य पितरों को मैं प्रणाम करता हूं, क्योंकि श्री पितर जी यह सम्पूर्ण जगत् अग्नि और सोममय है।उनका आशीर्वाद सदैव बना रहे।

10- ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्रिमूर्तय:।
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिण:।।

तेभ्योखिलेभ्यो योगिभ्य: पितृभ्यो यतामनस:।
नमो नमो नमस्तेस्तु प्रसीदन्तु स्वधाभुज।।

हिन्दी अर्थ– जो पितर तेज में स्थित हैं, जो ये चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं तथा जो जगत्स्वरूप एवं ब्रह्मस्वरूप हैं, उन सम्पूर्ण योगी पितरो को मैं एकाग्रचित्त होकर हर बार प्रणाम करता हूं। उन्हें बारम्बार प्रणाम है। वे स्वधाभोजी पितर मुझपर प्रसन्न हो उनका आशीर्वाद सदैव मुझ पर बना रहे।


1. पितृ स्त्रोत क्या है?

“पितृ स्त्रोत” शब्द “पितृ स्तोत्र” की एक सामान्य वर्तनी भूल है। स्त्रोत का अर्थ है ‘धारा’ या ‘प्रवाह’ (जैसे जल-स्त्रोत)। अतः पितृ स्त्रोत का शाब्दिक अर्थ “पितरों की धारा या वंश-प्रवाह” होगा। लेकिन प्रायः लोग पितृ स्तोत्र (पितरों की स्तुति) ही कहना चाहते हैं। यदि आपका आशय किसी विशिष्ट ग्रंथ या प्रवाह से है, तो स्पष्टता के लिए पितृ स्तोत्र शब्द का प्रयोग सही रहेगा।

2. पितरों के लिए कौन सा पाठ करना चाहिए?

पितरों के लिए सबसे प्रसिद्ध और प्रामाणिक पाठ है:
गरुड़ पुराण में वर्णित “पितृ स्तोत्र” – यह संपूर्ण स्तोत्र पितरों की शांति, तृप्ति और आशीर्वाद प्राप्ति के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।

अन्य विकल्प:
महालय पक्ष में “महालया तर्पण” के मंत्र।
श्राद्ध कर्म में वैदिक मंत्रों के साथ ब्रह्माण्ड पुराण के श्लोक।
सरल उपाय के रूप में “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” के साथ पितरों का स्मरण और जल अर्पण।

3. पितृ पीड़ा निवारण के लिए कौन सा स्तोत्र है?

पितृ पीड़ा (जैसे कुंडली में पितृ दोष, बार-बार बाधाएं, वंश संबंधी कठिनाइयाँ) के निवारण के लिए ये स्तोत्र विशेष रूप से प्रभावशाली माने गए हैं:
गरुड़ पुराण का पितृ स्तोत्र (विशेषतः अध्याय 11-12 के श्लोक)।
“नारायणबली” या “पितृबली” विधि में प्रयुक्त मंत्र।
भगवद्गीता के अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग) का पाठ।
साथ ही आवश्यक कर्म: केवल स्तोत्र पाठ के साथ-साथ नियमित तर्पण (जल अर्पण), पिंडदानब्राह्मण भोजन और कौओं को भोजन देना चाहिए।

4. पितृ तृप्ति के लिए कौन सा मंत्र है?

सर्वसाधारण मंत्र:
ॐ अस्य श्री विष्णोर्महापुरुषस्य श्री अच्युतानन्तगोविन्द नाम्नः।
अमुकगोत्राणां अमुकनाम्नां पितृभ्यः स्वधा नमः।
(अमुक के स्थान पर अपना गोत्र और पितर का नाम लें)

संक्षिप्त और अत्यंत प्रभावी मंत्र:
ॐ पितृभ्यः स्वधाभ्यः स्वधा नमः।
(सभी पितरों के लिए स्वधा- अर्पण, नमस्कार है।)

गायत्री मंत्र का पितृ रूप:
ॐ पितृगणाय विद्महे
जगतधारिणे धीमहि
तन्नः पितृः प्रचोदयात्।


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Sankat Mochan Hanuman Ashtak PDF – संकट मोचन हनुमान अष्टक 2024-25

हनुमान अष्टक (Hanuman Ashtak PDF) भगवान हनुमान की स्तुति में रचित एक अत्यंत प्रभावशाली और लोकप्रिय प्रार्थना है। इसे गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचा गया माना जाता है, जो रामचरितमानस के रचयिता भी हैं। हनुमान अष्टक में भगवान हनुमान की महिमा, उनकी शक्ति, और उनके अद्वितीय गुणों का वर्णन किया गया है। यह अष्टक भक्तों के लिए विशेष रूप से संकटों और विपत्तियों से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है। हनुमान चालीसा | श्री हनुमान अमृतवाणी | श्री बजरंग बाण

हनुमान जी को “संकटमोचन” कहा जाता है, क्योंकि वह अपने भक्तों के सभी संकटों को दूर करने में सक्षम हैं। हनुमान अष्टक में उनके गुणों की प्रशंसा करते हुए बताया गया है कि कैसे वह भगवान राम के अनन्य भक्त हैं और हर समय उनकी सेवा में लगे रहते हैं। इस अष्टक के पाठ से न केवल भक्ति और शक्ति प्राप्त होती है, बल्कि आत्मविश्वास और साहस में भी वृद्धि होती है। सुंदरकांड पाठ हिंदी में

हनुमान अष्टक (Hanuman Ashtak) को नियमित रूप से पाठ करने से मानसिक शांति, शारीरिक बल और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। हनुमान जी की कृपा से साधक के सभी दुख, भय और बाधाएं समाप्त हो जाती हैं। यह अष्टक व्यक्ति को नकारात्मक शक्तियों से भी सुरक्षा प्रदान करता है।

विशेष रूप से, हनुमान अष्टक का पाठ मंगलवार और शनिवार को किया जाता है, क्योंकि ये दिन हनुमान जी के पूजन के लिए अत्यधिक शुभ माने जाते हैं।


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  • English

|| संकटमोचन हनुमान अष्टक ||
Hanuman Ashtak Lyrics


॥ हनुमानाष्टक ॥
बाल समय रवि भक्षी लियो तब,
तीनहुं लोक भयो अंधियारों ।
ताहि सों त्रास भयो जग को,
यह संकट काहु सों जात न टारो ।
देवन आनि करी बिनती तब,
छाड़ी दियो रवि कष्ट निवारो ।
को नहीं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो (२)

बालि की त्रास कपीस बसैं गिरि,
जात महाप्रभु पंथ निहारो ।
चौंकि महामुनि श्राप दियो तब,
चाहिए कौन बिचार बिचारो ।
कैद्विज रूप लिवाय महाप्रभु,
सो तुम दास के सोक निवारो
को नहीं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो (२)

अंगद के संग लेन गए सिय,
खोज कपीस यह बैन उचारो ।
जीवत ना बचिहौ हम सो जु,
बिना सुधि लाये इहाँ पगु धारो ।
हेरी थके तट सिन्धु सबै तब,
लाए सिया-सुधि प्राण उबारो
को नहीं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो (२)

रावण त्रास दई सिय को सब,
राक्षसी सों कही शोक निवारो ।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु,
जाए महा रजनीचर मारो ।
चाहत सीय असोक सों आगि सु,
दै प्रभु-मुद्रिका शोक निवारो
को नहीं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो (२)

बान लग्यो उर लछिमन के तब,
प्राण तजे सुत रावन मारो ।
लै गृह बैद्य सुषेन समेत,
तबै गिरि द्रोण सु बीर उपारो ।
आनि सजीवन हाथ दई तब,
लछिमन के तुम प्रान उबारो
को नहीं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो (२)

रावन युद्ध अजान कियो तब,
नाग कि फाँस सबै सिर डारो ।
श्रीरघुनाथ समेत सबै दल,
मोह भयो यह संकट भारो |
आनि खगेस तबै हनुमान जु,
बंधन काटि सुत्रास निवारो
को नहीं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो (२)

बंधु समेत जबै अहिरावन,
लै रघुनाथ पताल सिधारो ।
देबिहिं पूजि भलि विधि सों बलि,
देउ सबै मिलि मन्त्र विचारो ।
जाय सहाय भयो तब ही,
अहिरावन सैन्य समेत संहारो
को नहीं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो (२)

काज किये बड़ देवन के तुम,
बीर महाप्रभु देखि बिचारो ।
कौन सो संकट मोर गरीब को,
जो तुमसे नहिं जात है टारो ।
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु,
जो कछु संकट होय हमारो
को नहीं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो (२)

॥ दोहा ॥
लाल देह लाली लसे,
अरु धरि लाल लंगूर ।
वज्र देह दानव दलन,
जय जय जय कपि सूर ॥

॥ Sankata Mochana Hanumanashtaka ॥

Bala Samaya Ravi Bhakshi Liyo
Taba Tinahun Loka Bhayo Andhiyaro।
Tahi Som Trasa Bhayo Jaga Ko
Yaha Sankata Kahu Som Jata Na Taro।
Devana Ani Kari Binati
Taba Chhandi Diyo Rabi Kashta Nivaro।
Ko Nahim Janata Hai Jaga Mein
Kapi Sankatamochana Nama Tiharo॥1॥

Bali Ki Trasa Kapisa Basai
Giri Jata Mahaprabhu Pantha Niharo।
Chaunki Maha Muni Sapa Diyo
Taba Chahiya Kauna Bichara Bicharo।
Kai Dvija Rupa Livaya Mahaprabhu
So Tuma Dasa Ke Soka Nivaro।
Ko Nahim Janata Hai Jaga Mein
Kapi Sankatamochana Nama Tiharo॥2॥

Angada Ke Sanga Lena Gaye Siya
Khoja Kapisa Yaha Baina Ucharo।
Jivata Na Bachihau Hama So Ju
Bina Sudhi Laye Ihan Pagu Dharo।
Heri Thake Tata Sindhu Sabai
Taba Laya Siya-Sudhi Prana Ubaro।
Ko Nahim Janata Hai Jaga Mein
Kapi Sankatamochana Nama Tiharo॥3॥

Ravana Trasa Dai Siya Ko
Saba Rakshasi Som Kahi Soka Nivaro।
Tahi Samaya Hanumana Mahaprabhu
Jaya Maha Rajanichara Maro।
Chahata Siya Asoka Som Agi Su
Dai Prabhu Mudrika Soka Nivaro
Ko Nahim Janata Hai Jaga Mein
Kapi Sankatamochana Nama Tiharo॥4॥

Bana Lagyo Ura Lachhimana Ke
Taba Prana Taje Suta Ravana Maro।
Lai Griha Baidya Sushena Sameta Tabai
Giri Drona Su Bira Uparo।
Ani Sajivana Hatha Dai
Taba Lachhimana Ke Tuma Prana Ubaro।
Ko Nahim Janata Hai Jaga Mein
Kapi Sankatamochana Nama Tiharo॥5॥

Ravana Juddha Ajana Kiyo Taba
Naga Ki Phansa Sabai Sira Daro।
Shriraghunatha Sameta Sabai Dala
Moha Bhayo Yaha Sankata Bharo।
Ani Khagesa Tabai Hanumana Ju
Bandhana Kati Sutrasa Nivaro।
Ko Nahim Janata Hai Jaga Mein
Kapi Sankatamochana Nama Tiharo॥6॥

Bandhu Sameta Jabai Ahiravana
Lai Raghunatha Patala Sidharo।
Debihim Puji Bhali Bidhi Som
Bali Deu Sabai Mili Mantra Bicharo।
Jaya Sahaya Bhayo Taba Hi
Ahiravana Sainya Sameta Samharo।
Ko Nahim Janata Hai Jaga Mein
Kapi Sankatamochana Nama Tiharo॥7॥

Kaja Kiyo Bada Devana Ke Tuma
Bira Mahaprabhu Dekhi Bicharo।
Kauna So Sankata Mora Gariba Ko
Jo Tumasom Nahim Jata Hai Taro।
Begi Haro Hanumana Mahaprabhu
Jo Kuchha Sankata Hoya Hamaro।
Ko Nahim Janata Hai Jaga Mein
Kapi Sankatamochana Nama Tiharo॥8॥

॥ Doha ॥
Lala Deha Lali Lase,
Aru Dhari Lala Langura।
Bajra Deha Danava Dalana,
Jaya Jaya Kapi Sura॥


संकटमोचन हनुमान अष्टक | Hanuman Ashtak in Hindi WIth PDF | Hanuman Ashtak PDF 2025
संकटमोचन हनुमान अष्टक | Hanuman Ashtak in Hindi WIth PDF | Hanuman Ashtak PDF 2025


संकटमोचन हनुमान अष्टक भगवान हनुमान की स्तुति में की गई एक प्रार्थना है, जो विशेष रूप से संकटों और विपत्तियों से मुक्ति पाने के लिए की जाती है। यह अष्टक गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचा गया है और इसमें भगवान हनुमान के अद्वितीय गुणों, शक्तियों और उनकी भक्तवत्सलता का वर्णन किया गया है।

हनुमान अष्टक का महत्व और कारण:

संकटों से मुक्ति: हनुमान जी को “संकटमोचन” कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि वह अपने भक्तों के सभी संकटों को दूर करते हैं। इस अष्टक के नियमित पाठ से व्यक्ति अपने जीवन में आने वाली बाधाओं और कष्टों से मुक्ति पा सकता है।

आध्यात्मिक और मानसिक शांति: हनुमान अष्टक का पाठ करने से भक्त को मानसिक शांति, आत्मविश्वास और साहस मिलता है। यह प्रार्थना व्यक्ति की नकारात्मक भावनाओं को दूर करके उसे सकारात्मकता से भर देती है।

शारीरिक और मानसिक बल: हनुमान जी को शक्ति और बल का प्रतीक माना जाता है। उनके अष्टक का पाठ करने से व्यक्ति को शारीरिक और मानसिक बल मिलता है, जिससे वह कठिन परिस्थितियों का सामना कर सकता है।

भय और बाधाओं से रक्षा: हनुमान अष्टक का पाठ नकारात्मक शक्तियों, बुरी नजर और भय से बचाव के लिए भी किया जाता है। भक्तों को विश्वास होता है कि हनुमान जी की कृपा से वे हर प्रकार की विपत्तियों से सुरक्षित रहते हैं।

इसलिए, संकटमोचन हनुमान अष्टक का पाठ कठिन समय में बल, साहस, और शांति पाने के लिए किया जाता है।

हनुमान अष्टक के पढ़ने के लाभ

हनुमान अष्टक (Hanuman Ashtak) का नियमित पाठ करने से सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि व्यक्ति अपने जीवन के संकटों और समस्याओं से राहत प्राप्त करता है। हनुमान जी को संकटमोचन कहा जाता है, इसलिए उनकी स्तुति में किया गया यह पाठ कठिन परिस्थितियों और बाधाओं से मुक्ति दिलाने में सहायक होता है। संकटों के समय में इस अष्टक का पाठ करके व्यक्ति मानसिक और भावनात्मक समर्थन प्राप्त कर सकता है।

इस अष्टक के पाठ से मानसिक शांति और आत्म-संयम में भी वृद्धि होती है। हनुमान जी की शक्ति और भक्ति की महिमा से प्रेरित होकर व्यक्ति अपने जीवन की समस्याओं को बेहतर ढंग से समझ सकता है और उनका सामना कर सकता है। इससे तनाव और चिंता कम होती है, जिससे मन को सुकून मिलता है और मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है।

हनुमान अष्टक (Hanuman Ashtak) का पाठ व्यक्ति को शारीरिक और मानसिक शक्ति भी प्रदान करता है। हनुमान जी को शक्ति और बल का प्रतीक माना जाता है, और उनकी स्तुति से भक्तों को साहस और आत्म-विश्वास मिलता है। यह पाठ शरीर को ताजगी और ऊर्जा प्रदान करता है, जिससे व्यक्ति अधिक प्रभावी ढंग से अपने कार्यों को कर सकता है और जीवन की चुनौतियों का सामना कर सकता है।

आध्यात्मिक उन्नति और सुरक्षा का लाभ भी हनुमान अष्टक के पाठ से प्राप्त होता है। यह अष्टक नकारात्मक ऊर्जा और बुरी नजर से बचाव करने में मदद करता है। भक्तों को विश्वास होता है कि हनुमान जी की कृपा से वे हर प्रकार की बुरी शक्तियों से सुरक्षित रहते हैं और आध्यात्मिक विकास की ओर बढ़ते हैं।

hanuman ashtak pdf

संकटमोचन हनुमान अष्टक का पाठ: समय और विधि

पाठ का समय:

  1. सप्ताह के विशिष्ट दिन: हनुमान अष्टक का पाठ मुख्य रूप से मंगलवार और शनिवार को किया जाता है। ये दिन भगवान हनुमान को समर्पित होते हैं और विशेष रूप से उनके पूजन के लिए शुभ माने जाते हैं।
  2. सुबह और शाम: पाठ को सुबह जल्दी उठकर या शाम के समय किया जा सकता है। सुबह का समय विशेष रूप से पवित्र और शांत होता है, जो ध्यान और प्रार्थना के लिए आदर्श माना जाता है।

पाठ की विधि:

  1. स्थान और तैयारी: एक स्वच्छ और शांत स्थान चुनें। एक छोटे से आसन या चटाई पर बैठें। आप एक सुंदर हनुमान प्रतिमा या चित्र के सामने भी बैठ सकते हैं।
  2. स्नान और स्वच्छता: पाठ से पहले स्नान कर स्वच्छता बनाए रखें। हाथों और चेहरे को धो लें और अच्छे से साफ कपड़े पहनें।
  3. आचमन और ध्यान: पाठ शुरू करने से पहले आचमन (पानी का छींटा) करें और भगवान हनुमान की पूजा के लिए ध्यान लगाएँ। एक दीपक और अगरबत्ती जलाएँ और भगवान हनुमान के प्रति श्रद्धा प्रकट करें।
  4. पाठ: हनुमान अष्टक का नियमित पाठ करें। आप इसे पूर्ण अष्टक के साथ या फिर उसकी प्रतिदिन की सच्चाई का पालन कर सकते हैं। पाठ करते समय भक्ति और श्रद्धा का भाव बनाए रखें।
  5. अर्चना और प्रार्थना: पाठ के बाद भगवान हनुमान से अपनी समस्याओं और इच्छाओं के लिए प्रार्थना करें। किसी भी विशेष परेशानी का समाधान या आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करें।
  6. अन्न और प्रसाद: पाठ के बाद भगवान को नैवेद्य (प्रसाद) अर्पित करें और फिर उसे स्वयं भी ग्रहण करें। यह एक अच्छे पुण्य की प्राप्ति का संकेत होता है।

इस विधि से संकटमोचन हनुमान अष्टक का नियमित पाठ करने से शांति, बल और संकटों से मुक्ति की प्राप्ति होती है।


हनुमान अष्टक पढ़ने से क्या लाभ होता है?

हनुमान अष्टक का पाठ करने से कई लाभ प्राप्त होते हैं। सबसे प्रमुख लाभ यह है कि यह संकटों और विपत्तियों से मुक्ति दिलाने में सहायक होता है। यह मानसिक शांति, आत्मविश्वास और साहस को बढ़ावा देता है। नियमित पाठ से भगवान हनुमान की कृपा प्राप्त होती है, जिससे शारीरिक और मानसिक बल में वृद्धि होती है। इसके अलावा, यह नकारात्मक ऊर्जा और बुरी नजर से भी सुरक्षा प्रदान करता है। इस प्रकार, हनुमान अष्टक का पाठ भक्ति, बल और शांति का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन सकता है।

संकट मोचन का पाठ कब करना चाहिए?

संकट मोचन का पाठ विशेष रूप से मंगलवार और शनिवार को करना शुभ माना जाता है, क्योंकि ये दिन भगवान हनुमान को समर्पित होते हैं। इसके अलावा, आप किसी भी संकट या परेशानी के समय इस पाठ को कर सकते हैं। सुबह जल्दी उठकर या शाम के समय, जब वातावरण शांत होता है, पाठ करने से अधिक लाभ होता है। पाठ के समय शांति और ध्यान बनाए रखना चाहिए, ताकि प्रार्थना का प्रभाव अधिक गहरा हो। संकट मोचन का पाठ नियमित रूप से करने से जीवन में स्थिरता और राहत प्राप्त होती है।

संकट में हनुमान जी का कौन सा मंत्र बोलना चाहिए?

संकट के समय हनुमान जी का विशेष मंत्र “हनुमान चालीसा” का पाठ किया जा सकता है, जो संकटमोचन हनुमान अष्टक का भी एक हिस्सा है। इसके अलावा, “ॐ हुम हनुमते नमः” और “संकट हरण हनुमान” जैसे मंत्र भी संकट के समय बोले जा सकते हैं। इन मंत्रों का जाप करने से भगवान हनुमान की विशेष कृपा प्राप्त होती है और संकटों से मुक्ति मिलती है। मंत्रों का जाप नियमित और विश्वासपूर्वक करने से विशेष फल प्राप्त होते हैं और समस्याओं का समाधान होता है।

हनुमान जी का असली मंत्र कौन सा है?

हनुमान जी का असली मंत्र या मुख्य मंत्र “ॐ हनुमते नमः” है। यह मंत्र भगवान हनुमान की शक्ति, साहस और भक्ति को व्यक्त करता है। इसके अलावा, “ॐ श्री हनुमते नमः” और “राम दूत अतुलित बल धामा” जैसे मंत्र भी अत्यंत प्रभावशाली माने जाते हैं। इन मंत्रों के जाप से हनुमान जी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और भक्त के जीवन में समृद्धि और शांति आती है। मंत्रों का जाप सच्चे मन और श्रद्धा से करना चाहिए ताकि लाभकारी परिणाम प्राप्त हों।

हनुमान अष्टक कैसे सिद्ध करें?

हनुमान अष्टक को सिद्ध करने के लिए नियमित रूप से और पूरी श्रद्धा के साथ उसका पाठ करना चाहिए। पाठ करते समय ध्यान और भक्ति बनाए रखना आवश्यक है। इसके अलावा, पाठ से पहले और बाद में भगवान हनुमान की पूजा और अर्चना करनी चाहिए। संपूर्ण अष्टक का पाठ विधिपूर्वक करने से इसे सिद्ध माना जाता है। यदि कोई विशेष मन्नत या प्रार्थना है, तो उसे भी ध्यान में रखते हुए पाठ करें। सिद्धि प्राप्त करने के लिए पूर्ण निष्ठा और विश्वास आवश्यक है।

हनुमान जी का प्रिय अंक कौन सा है?

हनुमान जी का प्रिय अंक 5 है। यह अंक भगवान हनुमान के पांच महान गुणों को दर्शाता है: बल, बुद्धि, विद्या, शक्ति और भक्ति। हनुमान जी के प्रतीकात्मक रूप में पाँच मुख्य गुण होते हैं, जो इस अंक को विशेष महत्व देते हैं। इस अंक का पूजन या ध्यान करने से भगवान हनुमान की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में संतुलन और शक्ति मिलती है। इस प्रकार, 5 अंक को हनुमान जी की विशेष भक्ति और शक्ति का प्रतीक माना जाता है।

हनुमान जी प्रसन्न होने पर क्या संकेत देते हैं?

हनुमान जी प्रसन्न होने पर भक्तों को विभिन्न संकेत प्राप्त हो सकते हैं। आमतौर पर, भक्तों को मन की शांति, मानसिक स्पष्टता और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है। हनुमान जी की कृपा से अचानक समस्याओं का समाधान हो सकता है और जीवन में सुधार हो सकता है। कुछ भक्तों को हनुमान जी के सपने में दर्शन या उनके द्वारा दिए गए संकेत मिलते हैं। इसके अलावा, किसी भी संकट या कठिनाई के समय अनुकूल परिस्थितियाँ और सहयोग भी हनुमान जी की प्रसन्नता का संकेत हो सकते हैं।

Durga Puja 2025 Date: Navratri 2025

Durga Puja 2025 – धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां दुर्गा ने नौ दिनों तक राक्षस महिषासुर से घोर युद्ध किया और अंततः आश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी को उसका वध कर उसे पराजित किया। यह कथा न केवल शक्ति और साहस का प्रतीक है, बल्कि यह राक्षसों और अधर्म पर धर्म की विजय का भी प्रतीक है।

हिंदू धर्म में दुर्गा पूजा का आयोजन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जिसमें नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ विभिन्न रूपों की पूजा की जाती है। इन नौ दिनों को “नवरात्रि” के नाम से जाना जाता है, और इस दौरान भक्तजन विभिन्न अनुष्ठान और उपवास रखते हैं। प्रत्येक दिन एक विशेष देवी की पूजा की जाती है, जो शक्ति, ज्ञान, और समृद्धि का प्रतीक है।

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दशमी, जिसे विजयादशमी के नाम से भी जाना जाता है, इस पर्व का अंतिम दिन होता है। इस दिन भक्तजन मां दुर्गा की मूर्तियों का विसर्जन करते हैं, जो उनकी धरती पर आगमन और फिर वापस कैलाश की यात्रा का प्रतीक है। विजयादशमी के दिन बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाया जाता है, और लोग एक-दूसरे को बधाई देते हैं। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था को दर्शाता है, बल्कि समाज में एकता और भाईचारे की भावना को भी बढ़ावा देता है।

इस प्रकार, दुर्गा पूजा केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह शक्ति, विश्वास, और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो हर साल करोड़ों भक्तों के दिलों में उल्लास और श्रद्धा का संचार करता है।

हिंदू धर्म में दुर्गा पूजा एक अत्यंत भव्य और महत्वपूर्ण त्योहार है, जिसे बड़े धूमधाम और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है, जिसमें मां दुर्गा की नौ अलग-अलग रूपों में पूजा की जाती है। इस अवसर पर भक्तजन न केवल मां के प्रति अपनी भक्ति प्रकट करते हैं, बल्कि अपने समाज की एकता और भाईचारे का भी जश्न मनाते हैं।

दुर्गा पूजा का उत्सव महालय से आरंभ होता है, जब भक्तजन मां दुर्गा का आह्वान करते हैं। महालय के दिन, श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा को शांति देने के लिए तर्पण करते हैं, और इसी दिन से नवरात्रि का पर्व प्रारंभ होता है। इसके बाद, दुर्गा पूजा का जश्न विजयादशमी तक जारी रहता है, जब भक्तजन मां दुर्गा की मूर्तियों का विसर्जन करते हैं, जो उनकी धरती पर आगमन और फिर कैलाश की यात्रा का प्रतीक है।

आइए जानते हैं कि इस वर्ष दुर्गा पूजा कब होगी। साथ ही, महालय से लेकर विजयादशमी तक की महत्वपूर्ण तिथियों के साथ-साथ उनके महत्व के बारे में विस्तार से जानते हैं। इन तिथियों का धार्मिक, सांस्कृतिक, और सामाजिक महत्व है, जो इस पर्व को और भी खास बनाता है। दुर्गा पूजा के दौरान विभिन्न अनुष्ठान, उपवास, और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिससे भक्तजन अपनी श्रद्धा और भक्ति का प्रदर्शन करते हैं।

इस प्रकार, दुर्गा पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह एक सामूहिक उत्सव है, जो समाज के हर वर्ग को जोड़ता है और हर किसी के दिल में श्रद्धा और उल्लास का संचार करता है।

Durga Puja 2024

दुर्गा पूजा का पर्व हर साल भारतीय पंचांग के अनुसार आश्विन माह में प्रतिपदा तिथि से लेकर शुक्ल दशमी तिथि तक मनाया जाता है। यह पर्व आमतौर पर सितंबर से अक्टूबर के बीच आता है, और इस दौरान भक्तजन मां दुर्गा की आराधना और पूजा करते हैं।

इस वर्ष, महालय 21 सितम्बर 2025 को मनाया जाएगा। महालय के दिन मां दुर्गा का आह्वान किया जाता है, जो इस पर्व की शुरुआत का प्रतीक है। इसके बाद, दुर्गा पूजा की शुरुआत 28 सितम्बर से होगी, जो भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण और उल्लासमय समय होगा। इस दौरान, विशेष रूप से षष्ठी से दशमी तक की तिथियों को विशेष महत्व दिया जाता है।

षष्ठी के दिन मां दुर्गा की मूर्ति का पंडाल में स्थापित किया जाता है, और इस दिन से पूजा का विधिवत आरंभ होता है। इसके बाद, सप्तमी, अष्टमी और नवमी के दिन विभिन्न अनुष्ठान किए जाते हैं, culminating in दशमी, जब भक्तजन मां दुर्गा की मूर्तियों का विसर्जन करते हैं।

इस प्रकार, दुर्गा पूजा केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह समर्पण, श्रद्धा, और शक्ति का प्रतीक है, जो भक्तों के बीच एकता और सांस्कृतिक पहचान को भी बढ़ावा देता है। इस पर्व के दौरान की जाने वाली सभी रस्में और अनुष्ठान इस पर्व को और भी खास बनाते हैं, जिससे हर साल लोग इसे बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं।

महालय का पर्व भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व रखता है। ऐसा माना जाता है कि महालय के दिन ही मां दुर्गा धरती पर आती हैं, जिससे भक्तजन अपनी आस्था और भक्ति को प्रकट करते हैं। यह दिन पितृ पक्ष के 15 दिनों के अंत का भी प्रतीक है, जो हमारे पूर्वजों की याद में समर्पित होता है।

इस दिन को सर्व पितृ अमावस्या या महालया अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन लोग अपने पूर्वजों की आत्मा को शांति देने के लिए तर्पण और विशेष अनुष्ठान करते हैं, और यह मां दुर्गा के आगमन की तैयारी का भी समय होता है।

दुर्गा पूजा के दौरान विभिन्न महत्वपूर्ण तिथियाँ हैं, जो इस पर्व के उत्सव का आनंद लेने के लिए भक्तों के लिए महत्वपूर्ण होती हैं। यहां दुर्गा पूजा 2025 के लिए महत्वपूर्ण तिथियाँ प्रस्तुत की गई हैं:

Maha Panchami Saturday27st September 2025
Maha Shashthi Sunday28th September 2025
Maha SaptamiMonday29th September 2025
Maha AshtamiTuesday30th September 2025
Maha Navami Wednesday1st October 2025
Vijaya DashamiThursday2nd October 2025

इस प्रकार, महालय और दुर्गा पूजा के ये महत्वपूर्ण दिन भारतीय संस्कृति के समृद्ध त्योहारों का हिस्सा हैं, जो भक्ति, प्रेम, और एकता का प्रतीक बनाते हैं।

दुर्गा पूजा 2024

दुर्गा पूजा एक ऐसा पर्व है, जिसे लेकर कई कहानियाँ, मान्यताएँ और धार्मिक पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं। भारतीय संस्कृति में यह त्योहार अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक पौराणिक कथाओं के अनुसार, दुर्गा पूजा के दौरान देवी दुर्गा अपने मायके, अर्थात अपने पिता हिमवान और माता मैनावती के घर आती हैं। यह अवसर केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह नारी शक्ति, आध्यात्मिकता, और समाज में एकता का प्रतीक भी है।

दुर्गा पूजा का महत्व अन्याय पर धर्म की विजय को दर्शाता है। यह पर्व न केवल मां दुर्गा की शक्ति और साहस का प्रतीक है, बल्कि यह सभी के लिए प्रेरणा स्रोत भी है। धार्मिक मान्यताएँ कहती हैं कि मां दुर्गा ने नौ दिनों तक राक्षस महिषासुर के साथ भयंकर युद्ध किया, जिसमें उन्होंने अपनी शक्ति और साहस का प्रदर्शन किया। अंततः, आश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी को उन्होंने महिषासुर का वध कर बुराई पर अच्छाई की जीत सुनिश्चित की।

हिंदू धर्म में दुर्गा पूजा के इस अवसर पर नौ दिनों तक नौ देवियों दुर्गा की आराधना की जाती है। प्रत्येक दिन विशेष रूप से एक देवी का पूजन किया जाता है, जो विभिन्न शक्तियों का प्रतीक होती हैं। दसवें दिन, जिसे विजयादशमी के नाम से जाना जाता है, इस पर्व का समापन होता है, जब भक्तजन मां दुर्गा की मूर्तियों का विसर्जन करते हैं। यह दिन समाज में एकता, प्रेम, और भाईचारे का संदेश भी फैलाता है, जो हमें यह याद दिलाता है कि बुराई का अंत हमेशा अच्छाई से होता है।

इस प्रकार, दुर्गा पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति की समृद्धता, नारी शक्ति, और सामूहिक एकता का भी प्रतीक है।

माँ की पूजा भारतीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। माँ दुर्गा की पूजा विशेष रूप से नवरात्रि और दुर्गा पूजा के दौरान होती है, जिसमें भक्तजन विभिन्न विधियों से माँ का पूजन करते हैं।

माँ की पूजा के महत्व

  1. आस्था और भक्ति: माँ की पूजा श्रद्धा और भक्ति का प्रदर्शन है। भक्तजन अपने हृदय से माँ को आह्वान करते हैं और उनकी कृपा के लिए प्रार्थना करते हैं।
  2. शक्ति का प्रतीक: माँ दुर्गा को शक्ति, साहस, और पराक्रम का प्रतीक माना जाता है। उनकी पूजा करने से भक्तों में आत्मविश्वास और साहस का संचार होता है।
  3. संस्कार और संस्कृति: माँ की पूजा भारतीय परंपराओं और संस्कारों का अभिन्न हिस्सा है। यह युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े रखती है।

माँ की पूजा के अनुष्ठान

माँ की पूजा के दौरान भक्तजन निम्नलिखित अनुष्ठान करते हैं:

  1. स्नान और स्वच्छता: पूजा से पहले स्नान कर स्वच्छता का ध्यान रखा जाता है। यह मान्यता है कि स्वच्छता से माँ प्रसन्न होती हैं।
  2. माँ का आमंत्रण: पूजा स्थल पर माँ की मूर्ति या तस्वीर स्थापित कर उन्हें आमंत्रित किया जाता है। इस समय “माँ की जय” के नारे लगाए जाते हैं।
  3. आरती और भोग: माँ की पूजा के दौरान भोग अर्पित किया जाता है, जिसमें फल, मिठाई, और अन्य खाद्य पदार्थ शामिल होते हैं। इसके बाद आरती की जाती है।
  4. नवमी का महत्व: नवरात्रि के अंतिम दिन नवमी पर विशेष पूजा होती है। इस दिन कुमारी पूजन किया जाता है, जिसमें युवा कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती है।
  5. अभिषेक और मंत्रोच्चारण: भक्तजन माँ के प्रति अपनी भक्ति प्रकट करने के लिए अभिषेक करते हैं और विभिन्न मंत्रों का जाप करते हैं।

माँ की पूजा करने से भक्तों को मानसिक शांति, समृद्धि, और सुरक्षा की प्राप्ति होती है। माँ की कृपा से कठिनाइयों का सामना करना आसान हो जाता है, और जीवन में सकारात्मकता का संचार होता है।

माँ की पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण और आस्था का प्रतीक है। यह हमें सिखाती है कि शक्ति, साहस और प्रेम के साथ जीवन में आगे बढ़ना चाहिए। माँ की पूजा में समर्पण और विश्वास के साथ भाग लेना चाहिए, जिससे हमें जीवन में सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त हो सके।

2024 durga puja date

पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा: एक सांस्कृतिक महापर्व

दुर्गा पूजा पश्चिम बंगाल का सबसे प्रमुख और भव्य त्योहार है, जिसे हर साल बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। यह न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि एक सामाजिक और सांस्कृतिक समारोह भी है, जिसमें लोग एकत्र होकर अपनी परंपराओं और संस्कृति का जश्न मनाते हैं।

इतिहास और महत्व

दुर्गा पूजा का पर्व मां दुर्गा की शक्ति और विजय का प्रतीक है, जो महिषासुर नामक राक्षस पर विजय प्राप्त करती हैं। पश्चिम बंगाल में यह त्योहार विशेष रूप से समाज के हर वर्ग के लोगों को एक साथ लाता है।

यह त्यौहार नवरात्रि के दौरान मनाया जाता है, लेकिन पश्चिम बंगाल में इसकी भव्यता और धूमधाम अद्वितीय होती है। यहाँ यह त्योहार न केवल धार्मिक बल्कि सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक है।

दुर्गा पूजा की तैयारी

दुर्गा पूजा की तैयारियाँ कई महीने पहले से शुरू होती हैं। पंडालों की सजावट, मूर्तियों का निर्माण और विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक कार्यक्रमों की योजना बनाई जाती है।

  1. मूर्तियों का निर्माण: कुशल कारीगरों द्वारा मां दुर्गा की अद्भुत और कलात्मक मूर्तियाँ बनाई जाती हैं। हर साल, मूर्तियों में नवीनता और रचनात्मकता देखने को मिलती है।
  2. पंडाल सजावट: पंडालों को विभिन्न थीम्स पर सजाया जाता है, जो एक विशेष आकर्षण का केंद्र होते हैं। कुछ पंडाल तो पूरी तरह से कला के अद्वितीय नमूने होते हैं।
  3. सांस्कृतिक कार्यक्रम: दुर्गा पूजा के दौरान विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जिसमें नृत्य, संगीत, नाटक और लोक कला शामिल होती है।

दुर्गा पूजा के प्रमुख दिन

दुर्गा पूजा का पर्व मुख्यतः पांच दिनों तक मनाया जाता है, जिसमें निम्नलिखित दिन महत्वपूर्ण हैं:

  1. महालयाः इस दिन माँ दुर्गा का स्वागत किया जाता है। इसे दुर्गा पूजा की शुरुआत माना जाता है, जिसमें श्रद्धालु अपने पूर्वजों को याद करते हैं।
  2. सप्तमी: इस दिन माँ दुर्गा की मूर्ति का पंडाल में प्राण प्रतिष्ठा की जाती है।
  3. अष्टमी: यह दिन पूजा का मुख्य दिन होता है, जब कुमारी पूजन और विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं।
  4. नवमी: इस दिन माँ की पूजा के साथ-साथ विजय का जश्न मनाया जाता है।
  5. दशमी: इसे विजयादशमी कहते हैं, जब माँ दुर्गा की मूर्तियों का विसर्जन किया जाता है। यह दिन मां के धरती पर आने और वापस लौटने का प्रतीक है।
When is Durga Puja, Durga Pooja Date and Calendar

दुर्गा पूजा (Durga Puja 2025) का सामाजिक पहलू

दुर्गा पूजा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस दौरान लोग एक-दूसरे के साथ मिलकर पूजा करते हैं, मिठाइयाँ बाँटते हैं और खुशियों का आदान-प्रदान करते हैं।

पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा एक जीवंत और सांस्कृतिक उत्सव है, जो लोगों के दिलों में श्रद्धा और भक्ति का संचार करता है। यह पर्व न केवल मां दुर्गा के प्रति समर्पण और आस्था का प्रतीक है, बल्कि समाज को एकजुट करने वाला भी है। यहाँ की जीवंतता, रंग-बिरंगे पंडाल, और भक्ति से भरे मन इस पर्व को और भी खास बनाते हैं।

नवरात्रि और दुर्गा पूजा का संबंध

नवरात्रि और दुर्गा पूजा भारतीय संस्कृति में महत्वपूर्ण पर्व हैं, जो शक्ति और भक्ति के प्रतीक हैं। दोनों का उद्देश्य मां दुर्गा की आराधना करना है, लेकिन ये पर्व अपनी विशेषताओं और रीति-रिवाजों में भिन्न हैं। आइए समझते हैं कि नवरात्रि और दुर्गा पूजा का आपस में क्या संबंध है।

नवरात्रि का महत्व

नवरात्रि, जिसे “नवदुर्गा” के नाम से भी जाना जाता है, एक नौ रातों का त्योहार है जो देवी दुर्गा की आराधना के लिए मनाया जाता है। यह पर्व आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शुरू होता है और दशमी तक चलता है। नवरात्रि का अर्थ है ‘नौ रातें’, जिनमें भक्तजन देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा करते हैं। प्रत्येक रात एक विशेष देवी की आराधना की जाती है, जो विभिन्न शक्तियों और गुणों का प्रतीक होती हैं।

नवरात्रि का यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का ही प्रतीक नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति और उसके अधिकारों का भी प्रतिनिधित्व करता है। इस दौरान, भक्तजन उपवासी रहकर साधना करते हैं, माता की भक्ति में लीन रहते हैं, और विभिन्न अनुष्ठान करते हैं।

दुर्गा पूजा का महत्व

दुर्गा पूजा नवरात्रि का एक महत्वपूर्ण उत्सव है, जो मुख्यतः पश्चिम बंगाल और भारत के अन्य भागों में धूमधाम से मनाया जाता है। यह पर्व मां दुर्गा के धरती पर आगमन और उनके द्वारा राक्षस महिषासुर के वध की कथा के साथ जुड़ा हुआ है। दुर्गा पूजा का आयोजन नवरात्रि के समय ही होता है, लेकिन इसकी भव्यता और धार्मिकता इसे अलग बनाती है।

दुर्गा पूजा के दौरान, मां दुर्गा की प्रतिमाएँ स्थापित की जाती हैं, और भक्तजन पूजा-अर्चना करते हैं। यह पर्व विशेष रूप से दशमी के दिन समाप्त होता है, जब मां दुर्गा की मूर्तियों का विसर्जन किया जाता है। इस दिन को विजयादशमी के नाम से जाना जाता है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।

नवरात्रि और दुर्गा पूजा का संबंध

नवरात्रि और दुर्गा पूजा के बीच का संबंध गहरा है। नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा की आराधना की जाती है, जो दुर्गा पूजा का आधार है। नवरात्रि का पहला दिन महालया से शुरू होता है, जब भक्तजन अपने पूर्वजों की आत्मा को तर्पण देते हैं और मां दुर्गा का आह्वान करते हैं।

नवरात्रि के दौरान की गई पूजा और अनुष्ठान दुर्गा पूजा की तैयारियों का हिस्सा होते हैं। भक्तजन न केवल मां दुर्गा की मूर्तियों की स्थापना करते हैं, बल्कि इस दौरान विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों और उत्सवों का आयोजन भी किया जाता है।

दुर्गा पूजा की भव्यता और रौनक नवरात्रि के उपवास, अनुष्ठान और भक्ति का फल होती है। भक्तजन इन नौ दिनों में अपनी आस्था को और गहरा करते हैं, जिससे दुर्गा पूजा के समय मां दुर्गा की उपस्थिति का अनुभव और भी दिव्य महसूस होता है।

समाज में नवरात्रि और दुर्गा पूजा का प्रभाव

नवरात्रि और दुर्गा पूजा का पर्व समाज में एकता और भाईचारे का प्रतीक बनकर उभरता है। यह पर्व न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक संबंधों को भी मजबूत करता है। इस दौरान लोग एकत्र होकर पूजा करते हैं, एक-दूसरे के साथ उत्सव मनाते हैं और आपसी संबंधों को और भी मधुर बनाते हैं।

समाज में नारी शक्ति का स्थान बढ़ाने के लिए नवरात्रि और दुर्गा पूजा महत्वपूर्ण हैं। इन पर्वों के माध्यम से लोग नारी की शक्ति, साहस और दृढ़ता को पहचानते हैं और सम्मानित करते हैं।

इस प्रकार, नवरात्रि और दुर्गा पूजा का संबंध गहरा और अर्थपूर्ण है। यह दोनों पर्व मां दुर्गा की शक्ति, भक्ति, और समाज में एकता का प्रतीक हैं। हर साल, ये पर्व लोगों को एकत्रित करते हैं, उनके दिलों में श्रद्धा और प्रेम का संचार करते हैं, और नारी शक्ति को एक नया आयाम प्रदान करते हैं।


शरद नवरात्रि, हिंदू पंचांग के अनुसार अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारंभ होकर दशमी तिथि तक चलने वाला एक महत्वपूर्ण नौ-दिवसीय उत्सव है। यह पर्व माँ दुर्गा के नौ रूपों की आराधना को समर्पित है और विशेष रूप से उत्तरी एवं पूर्वी भारत में अत्यधिक उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है। इन नौ दिनों में भक्त व्रत, पूजा-अर्चना और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों का पालन करते हैं।

नवरात्रि का समापन दशमी तिथि को होता है, जिसे विजयादशमी या दशहरा के नाम से जाना जाता है। यह दिन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। शरद ऋतु में मनाए जाने के कारण इसे शरद नवरात्रि कहते हैं, और यह सर्दियों के आगमन का संकेत भी देता है।

सन 2025 में, शरद नवरात्रि का यह पावन पर्व सोमवार, 22 सितंबर से प्रारंभ होकर गुरुवार, 2 अक्टूबर को विजयादशमी मनाने के साथ समाप्त होगा। यह अवधि आध्यात्मिक साधना, आंतरिक शक्ति का संचय और समृद्धि की कामना करने का एक पवित्र समय है।

September 22, 2025, Monday

Navratri color of the day – White

White symbolizes purity and innocence. Wearing white on Monday is believed to invite the blessings of the Goddess and bring a sense of calm and inner peace.

September 23, 2025, Tuesday

Navratri color of the day – Red

Wear red on Tuesday to celebrate Navratri. Red represents passion, love, and energy—and it’s also the most commonly offered color of Chunri to the Goddess. This vibrant shade is believed to fill you with strength, vitality, and enthusiasm.

September 24, 2025, Wednesday

Navratri color of the day – Royal Blue

Wear royal blue on Wednesday to celebrate Navratri with grace and style. This rich, vibrant shade of blue symbolizes elegance, depth, and tranquility, adding a touch of sophistication to your festive spirit.

September 25, 2025, Thursday

Navratri color of the day – Yellow

Wear yellow on Thursday to celebrate Navratri with bright optimism and joy. This warm, uplifting color is known to boost your mood and keep you feeling cheerful throughout the day.

September 26, 2025, Friday

Navratri color of the day – Green

Green symbolizes nature, growth, and harmony—it brings a sense of peace, fertility, and serenity. Wear green on Friday to invite the blessings of the Goddess and embrace a fresh start filled with calm and balance.

September 27, 2025, Saturday

Navratri color of the day – Grey

Grey symbolizes emotional balance and a grounded nature. It’s a great choice for those who want to celebrate Navratri with understated elegance, making a subtle yet stylish statement with this muted shade.

September 28, 2025, Sunday

Navratri color of the day – Orange

Wearing orange on Sunday while worshipping Goddess Navdurga is believed to bring warmth, enthusiasm, and positivity. This vibrant color radiates energy and helps keep your spirits high throughout the day.

September 29, 2025, Monday

Navratri color of the day – Peacock Green

Peacock green represents individuality and a unique sense of style. Celebrate this day of Navratri by standing out in this stunning blend of blue and green. The color reflects qualities like compassion, freshness, and a vibrant spirit.

September 30, 2025, Tuesday

Navratri color of the day – Pink

Wear pink for your Navratri celebrations to embrace love, affection, and harmony. This charming and inviting color not only makes you more approachable but also adds a graceful, radiant touch to your personality.