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Shri Sharda Chalisa PDF- श्री शारदा चालीसा 2026

श्री शारदा चालीसा (Shri Sharda Chalisa PDF) भारतीय धार्मिक ग्रंथों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है, जो माँ शारदा देवी की महिमा और गुणों का वर्णन करता है। शारदा देवी, जिन्हें विद्या, ज्ञान और कला की देवी के रूप में पूजा जाता है, अपने भक्तों को जीवन में ज्ञान, विवेक और मार्गदर्शन प्रदान करती हैं। यह चालीसा विशेष रूप से उन लोगों के लिए अति लाभकारी मानी जाती है जो शिक्षा, संगीत, कला और साहित्य के क्षेत्र में कार्यरत हैं।

इसे श्रद्धा और भक्ति के साथ पढ़ने से न केवल मन को शांति मिलती है, बल्कि आत्मा को भी परम शक्ति से जोड़ने का अवसर मिलता है। इस चालीसा में माँ शारदा की स्तुति के माध्यम से उनकी कृपा प्राप्ति का मार्ग बताया गया है, जिससे व्यक्ति अपने जीवन में आध्यात्मिक और मानसिक विकास की दिशा में अग्रसर हो सकता है।

श्री शारदा चालीसा के माध्यम से हम माँ शारदा की उस महिमा का अनुभव कर सकते हैं जो हर एक व्यक्ति के अंदर विद्यमान अज्ञानता के अंधकार को दूर कर उसे ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित करती है। यह चालीसा न केवल एक धार्मिक स्तुति है, बल्कि एक साधना का माध्यम भी है, जिससे व्यक्ति में सकारात्मकता, मानसिक शांति और आत्मविश्वास का संचार होता है।

भौतिकता की चकाचौंध में खोए हुए मनुष्य को यह चालीसा आध्यात्मिकता की ओर पुनः प्रेरित करती है और उसे यह अहसास दिलाती है कि असली ज्ञान का अर्थ केवल बाहरी विद्या नहीं, बल्कि आत्म-ज्ञान में है। “श्री शारदा चालीसा” का नियमित पाठ करने से जीवन में सुख, शांति और सफलता का आगमन होता है, और व्यक्ति हर कठिनाई का सामना धैर्य और साहस से कर पाता है।

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श्री शारदा चालीसा

॥ दोहा ॥
मूर्ति स्वयंभू शारदा,
मैहर आन विराज।
माला पुस्तक धारिणी,
वीणा कर में साज ।।

॥ चौपाई ॥
जय जय जय शारदा महारानी,
आदि शक्ति तुम जग कल्याणी ।

रूप चतुर्भुज तुम्हरो माता,
तीन लोक महं तुम विख्याता।

दो सहस्त्र वर्षहि अनुमाना,
प्रगट भई शारद जग जाना।

मैहर नगर विश्व विख्याता,
जहां बैठी शारद जग माता।

त्रिकूट पर्वत शारदा वासा,
मैहर नगरी परम प्रकाशा ।

शरद इन्दु सम बदन तुम्हारो,
रूप, चतुर्भुज अतिशय प्यारो ।

कोटि सूर्य सम तन द्युति पावन,
राज हंस तुम्हरो शचि वाहन।

कानन कुण्डल लोल सुहावहि,
उरमणि भाल अनूपम दिखावहिं ।

वीणा पुस्तक अभय धारिणी,
जगत्मातु तुम जग विहारिणी।

ब्रह्म सुता अखंड अनूपा,
शारद गुण गावत सुरभूपा।

हरिहर करहिं शारदा बन्दन,
वरूण कुबेर करहिं अभिनन्दन।

शारद रूप चण्डी अवतारा,
चण्ड मुण्ड असुर संहारा।

महिषासुर वध कीन्हि भवानी,
दुर्गा बन शारद कल्याणी ।

धरा रूप शारद भई चण्डी,
रक्त बीज काटा रण मुण्डी ।

तुलसी सूर्य आदि विद्वाना,
शारद सुयश सदैव बखाना ।

कालिदास भए अति विख्याता,
तुम्हरी दया शारदा माता ।

वाल्मिक नारद मुनि देवा,
पुनि पुनि करहिं शारदा सेवा ।

चरण शरण देवहु जग माया,
सब जग व्यापहिं शारद माया ।

अणु परमाणु में शारदा वासा,
परम शक्तिमय परम प्रकाशा ।

हे शारद तुम ब्रह्म स्वरूपा,
शिव विरंचि पूजहिं नर भूपा ।

ब्रह्म शक्ति नहि एकउ भेदा,
शारद के गुण गावहिं वेदा ।

जय जग बन्दनि विश्व स्वरूपा,
निर्गुण सगुण शारदहिं रूपा ।

सुमिरहु शारद नाम अखंडा,
व्यापइ नहिं कलिकाल प्रचण्डा ।

सूर्य-चन्द्र नभ मण्डल तारे,
शारद कृपा चमकते सारे ।

उद्धव स्थिति प्रलय कारिणी,
बन्दउ शारद जगत तारिणी ।

दुःख दरिद्र सब जाहिं नसाई,
तुम्हारी कृपा शारदा माई।

परम पुनीति जगत अधारा,
मातु शारदा ज्ञान तुम्हारा ।

विद्या बुधि मिलहिं सुखदानी,
जय जय जय शारदा भवानी ।

शारदे पूजन जो जन करहीं,
निश्चय ते भव सागर तरहीं।

शारद कृपा मिलहिं शुचि ज्ञाना,
होई सकल विधि अति कल्याणा।

जग के विषय महा दुःख दाई,
भजहूँ शारदा अति सुख पाई।

परम प्रकाश शारदा तोरा,
दिव्य किरण देवहूँ मम ओरा ।

परमानन्द मगन मन होई,
मातु शारदा सुमिरई जोई।

चित्त शान्त होवहिं जप ध्याना,
भजहूँ शारदा होवहिं ज्ञाना।

रचना रचित शारदा केरी,
पाठ करहिं भव छटई फेरी ।

सत् सत् नमन पढ़ीहे धरिध्याना,
शारद मातु करहिं कल्याणा।

शारद महिमा को जग जाना,
नेति नेति कह वेद बखाना ।

सत् सत् नमन शारदा तोरा,
कृपा दृष्टि कीजै मम ओरा।

जो जन सेवा करहिं तुम्हारी,
तिन कहँ कतहुं नाहि दुःखभारी।

जो यह पाठ करै चालीसा,
मातु शारदा देहुँ आशीषा ।।

॥ दोहा ॥
बन्दुउँ शारद चरण रज,
भक्ति ज्ञान मोहि देहुँ।
सकल अविद्या दूर कर,
सदा बसहु उरगेहुँ ।।

Shri Sharda Chalisa Lyrics English


॥ Doha ॥
Murti Svayambhu Sharada,
Maihara Ana Viraja।
Mala, Pustaka, Dharini,
Vina Kara Mein Saja॥

॥ Chaupai ॥
Jai Jai Jai Sharada Maharani।
Adi Shakti Tuma Jaga Kalyani॥

Rupa Chaturbhuja Tumharo Mata।
Tina Loka Maham Tuma Vikhyata॥

Do Sahasra Barshahi Anumana।
Pragata Bhai Sharada Jaga Jana॥

Maihara Nagara Vishva Vikhyata।
Jahan Baithi Sharada Jaga Mata॥

Trikuta Parvata Sharada Vasa।
Maihara Nagari Parama Prakasha॥

Sharada Indu Sama Badana Tumharo।
Rupa Chaturbhuja Atishaya Pyaro॥

Koti Surya Sama Tana Dyuti Pavana।
Raja Hansa Tumharo Shachi Vahana॥

Kanana Kundala Lola Suhavahi।
Uramani Bhala Anupa Dikhavahin॥

Vina Pustaka Abhaya Dharini।
Jagatmatu Tuma Jaga Viharini॥

Brahma Suta Akhanda Anupa।
Sharada Guna Gavata Surabhupa॥

Harihara Karahin Sharada Bandana।
Baruna Kubera Karahin Abhinandana॥

Sharada Rupa Chandi Avatara।
Chanda-Munda Asurana Sanhara॥

Mahisha Sura Vadha Kinhi Bhavani।
Durga Bana Sharada Kalyani॥

Dhara Rupa Sharada Bhai Chandi।
Rakta Bija Kata Rana Mundi॥

Tulasi Surya Adi Vidvana।
Sharada Suyasha Sadaiva Bakhana॥

Kalidasa Bhae Ati Vikhyata।
Tumhari Daya Sharada Mata॥

Valmika Narada Muni Deva।
Puni Puni Karahin Sharada Seva॥

Charana-Sharana Devahu Jaga Maya।
Saba Jaga Vyapahin Sharada Maya॥

Anu-Paramanu Sharada Vasa।
Parama Shaktimaya Parama Prakasha॥

He Sharada Tuma Brahma Svarupa।
Shiva Viranchi Pujahin Nara Bhupa॥

Brahma Shakti Nahi Ekau Bheda।
Sharada Ke Guna Gavahin Veda॥

Jai Jaga Bandani Vishva Svarupa।
Nirguna-Saguna Sharadahin Rupa॥

Sumirahu Sharada Nama Akhanda।
Vyapai Nahin Kalikala Prachanda॥

Surya Chandra Nabha Mandala Tare।
Sharada Kripa Chamakate Sare॥

Udbhava Sthiti Pralaya Karini।
Bandau Sharada Jagata Tarini॥

Duhkha Daridra Saba Jahin Nasai।
Tumhari Kripa Sharada Mai॥

Parama Puniti Jagata Adhara।
Matu Sharada Gyana Tumhara॥

Vidya Buddhi Milahin Sukhadani।
Jai Jai Jai Sharada Bhavani॥

Sharade Pujana Jo Jana Karahin।
Nishchaya Te Bhava Sagara Tarahin॥

Sharada Kripa Milahin Shuchi Gyana।
Hoi Sakala Vidhi Ati Kalyana॥

Jaga Ke Vishaya Maha Duhkha Dai।
Bhajahun Sharada Ati Sukha Pai॥

Parama Prakasha Sharada Tora।
Divya Kirana Devahun Mama Ora॥

Paramananda Magana Mana Hoi।
Matu Sharada Sumirai Joi॥

Chitta Shanta Hovahin Japa Dhyana।
Bhajahun Sharada Hovahin Gyana॥

Rachana Rachita Sharada Keri।
Patha Karahin Bhava Chhatai Pheri॥

Sat Sat Namana Padhihe Dharidhyana।
Sharada Matu Karahin Kalyana॥

Sharada Mahima Ko Jaga Jana।
Neti-Neti Kaha Veda Bakhana॥

Sat-Sat Namana Sharada Tora।
Kripa Drishti Kijai Mama Ora॥

Jo Jana Seva Karahin Tumhari।
Tina Kahan Katahun Nahi Duhkhabhari॥

Jo Yaha Patha Karai Chalisa।
Matu Sharada Dehun Ashisha॥

॥ Doha ॥
Bandaun Sharada Charana Raja,
Bhakti Gyana Mohi Dehun।
Sakala Avidya Dura Kara,
Sada Basahu Uragehun॥



श्री शारदा चालीसा का भारतीय धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं में विशेष महत्व है। यह चालीसा माँ शारदा देवी की स्तुति का एक प्रभावी स्त्रोत है, जो ज्ञान, विद्या और कला की देवी के रूप में पूजी जाती हैं। माँ शारदा को सरस्वती का स्वरूप माना गया है, और उनके आशीर्वाद से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता, शांति और सफलता का संचार होता है।

शिक्षा, संगीत, साहित्य, कला आदि के क्षेत्र में कार्यरत लोग माँ शारदा के इस चालीसा का नियमित पाठ करके अपनी विद्या और कला में उत्तमता प्राप्त करते हैं। यह चालीसा व्यक्ति के भीतर आत्म-विश्वास और संयम को बढ़ाती है, जिससे उसे सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। श्री शारदा चालीसा के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन में आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर सकता है, और उसकी कृपा से ज्ञान, विवेक और समझ में वृद्धि होती है।

श्री शारदा चालीसा का पाठ करने से अनेक लाभ प्राप्त होते हैं। सबसे प्रमुख लाभ यह है कि यह चालीसा मानसिक शांति और संतुलन प्रदान करती है, जो आज के व्यस्त जीवन में आवश्यक है। इसके नियमित पाठ से व्यक्ति की याददाश्त और एकाग्रता में सुधार होता है, और उसे जीवन की कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति मिलती है।

इसके अलावा, माँ शारदा की कृपा से छात्र परीक्षा में सफलता प्राप्त कर सकते हैं, कलाकार अपनी कला में प्रवीणता हासिल कर सकते हैं, और नौकरीपेशा लोग अपने कार्यक्षेत्र में ऊंचाइयों को प्राप्त कर सकते हैं। इसे पढ़ने से नकारात्मक विचारों से मुक्ति मिलती है, और आत्मा में सद्गुणों का विकास होता है। यह चालीसा जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर कर व्यक्ति को सफलता की ओर अग्रसर करती है।

श्री शारदा चालीसा का पाठ करने के लिए सबसे पहले व्यक्ति को स्वच्छ और शांत स्थान का चयन करना चाहिए। सुबह के समय स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण कर, माँ शारदा की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक जलाकर इस चालीसा का पाठ करना श्रेष्ठ माना गया है। यदि संभव हो तो पाठ के समय सफेद पुष्प अर्पित करें, क्योंकि माँ शारदा को सफेद रंग प्रिय है।

चालीसा पढ़ते समय मन को एकाग्र रखें और माँ शारदा की छवि को ध्यान में रखें। इसे श्रद्धा और विश्वास के साथ पढ़ने से अधिक लाभ होता है। सप्ताह में कम से कम एक बार या प्रतिदिन इसका पाठ करने से माँ शारदा की विशेष कृपा प्राप्त होती है, जिससे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है।


श्री शारदा चालीसा क्या है?

श्री शारदा चालीसा एक धार्मिक स्तुति है जो माँ शारदा देवी की महिमा और उनके आशीर्वाद का गुणगान करती है। इसे पढ़ने से व्यक्ति को ज्ञान, विवेक और शांति प्राप्त होती है।

श्री शारदा चालीसा का महत्व क्या है?

श्री शारदा चालीसा का महत्व इस बात में है कि यह व्यक्ति के जीवन में मानसिक शांति, आत्म-विश्वास और सकारात्मकता लाने में सहायक होती है। यह विद्यार्थियों और कलाकारों के लिए विशेष रूप से लाभकारी मानी जाती है।

श्री शारदा चालीसा का पाठ किस प्रकार के लाभ प्रदान करता है?

इसका पाठ करने से एकाग्रता, स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है। यह नकारात्मक विचारों से मुक्ति और आत्म-ज्ञान की ओर प्रेरित करती है, जिससे जीवन में शांति और सफलता मिलती है।

श्री शारदा चालीसा का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?

सुबह के समय स्नान कर, स्वच्छ वस्त्र पहनकर, शांत मन और श्रद्धा के साथ इसे पढ़ना उत्तम होता है। माँ शारदा की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक जलाकर इसका पाठ करें।

क्या श्री शारदा चालीसा का पाठ किसी भी समय कर सकते हैं?

हाँ, इसे किसी भी समय किया जा सकता है, परंतु सुबह का समय अधिक प्रभावकारी माना गया है क्योंकि यह दिन की सकारात्मक शुरुआत में मदद करता है।

श्री शारदा चालीसा विद्यार्थियों के लिए क्यों लाभकारी है?

यह चालीसा ध्यान, स्मरण शक्ति और आत्मविश्वास में वृद्धि करती है, जो विद्यार्थियों की पढ़ाई और परीक्षा में सफलता पाने में सहायक होती है।

क्या श्री शारदा चालीसा का पाठ करने से करियर में उन्नति मिल सकती है?

जी हाँ, इस चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति का मनोबल और आत्म-विश्वास बढ़ता है, जिससे वह अपने कार्यक्षेत्र में भी सफलता प्राप्त कर सकता है।

क्या श्री शारदा चालीसा का पाठ करने के लिए किसी विशेष पूजा सामग्री की आवश्यकता होती है?

नहीं, विशेष सामग्री की आवश्यकता नहीं होती। परन्तु श्रद्धा के साथ दीपक जलाना और सफेद पुष्प अर्पण करना शुभ माना गया है।

श्री शारदा चालीसा कितनी बार पढ़ना चाहिए?

इसे प्रतिदिन एक बार पढ़ना शुभ होता है, परंतु श्रद्धा और समय के अनुसार व्यक्ति इसे अधिक बार भी पढ़ सकता है। सप्ताह में एक बार तो अवश्य पढ़ें।

क्या श्री शारदा चालीसा का पाठ जीवन की समस्याओं को हल करने में सहायक होता है?

जी हाँ, यह चालीसा मानसिक शांति और सकारात्मकता लाने में सहायक है, जिससे व्यक्ति जीवन की समस्याओं का समाधान शांतिपूर्ण तरीके से कर सकता है।

Shri Sai Chalisa Hindi Lyrics Authentic 2026 Pdf

साईं चालीसा (Sai Chalisa Lyrics Pdf) एक भक्ति गीत है जो शिरडी के साईं बाबा पर आधारित है। यह चालीसा साईं बाबा के अद्भुत जीवन और उनकी अलौकिक शक्तियों का वर्णन करती है, जिसे साईं भक्तों द्वारा अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ गाया जाता है। साईं बाबा को एक ऐसे संत के रूप में माना जाता है जिन्होंने अपने जीवन में सभी धर्मों के लोगों को समान रूप से अपनाया और उन्हें सत्य, प्रेम, और करुणा का मार्ग दिखाया। आप यहां से साईं बाबा आरती भी पढ़ सकते हैं।

साईं चालीसा एक लोकप्रिय प्रार्थना है जो 102 छन्दों से बनी है। इन छन्दों में साईं बाबा के जीवन के विभिन्न पहलुओं का वर्णन किया गया है, जैसे कि उनकी दिव्य शिक्षाएँ, चमत्कारिक घटनाएँ, और उनके भक्तों के प्रति उनकी असीम करुणा। यह चालीसा न केवल साईं बाबा की महिमा का बखान करती है, बल्कि उनके चरणों में शरण लेने का माध्यम भी है।

साईं चालीसा का पाठ साईं भक्तों द्वारा नियमित रूप से किया जाता है, विशेष रूप से गुरुवार के दिन, जो साईं बाबा को समर्पित माना जाता है। इस चालीसा का पाठ करने से भक्तों को मानसिक शांति, जीवन में समृद्धि और साईं बाबा के आशीर्वाद की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि साईं बाबा के करीब आने और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए इस चालीसा का पाठ अत्यंत प्रभावी होता है।

साईं चालीसा में साईं बाबा की जीवन यात्रा और उनके चमत्कारी कार्यों का उल्लेख मिलता है, जो भक्तों के लिए प्रेरणादायक होते हैं। इसमें बाबा के उपदेशों और उनके द्वारा दिए गए जीवन के आदर्शों को सरल और स्पष्ट भाषा में प्रस्तुत किया गया है, जिससे हर उम्र के लोग इसे आसानी से समझ और गा सकते हैं।

इस चालीसा के माध्यम से भक्त साईं बाबा से जुड़ाव महसूस करते हैं और उन्हें अपने जीवन की कठिनाइयों से मुक्ति पाने का मार्ग प्राप्त होता है। साईं चालीसा का पाठ करने से भक्तों के हृदय में श्रद्धा और विश्वास जागृत होता है, और वे साईं बाबा की दिव्यता का अनुभव करते हैं।



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  • English

|| साईं चालीसा ||
Shri Sai Chalisa Lyrics Pdf in Hindi

पहिले साईं के चरणों में,
अपान शीश नामौं मैं।
कैसे शिरडी साईं ऐ,
सारा हाला सुनौं मैं॥

माता कौन है, पिता कौन है,
ये ना किसी ने भी जाना।
कहाँ जन्म साईं ने धरा,
प्रश्न पहेली रहा बाना॥

कोई कहे अयोध्या के,
ये रामचन्द्र भगवान हैं।
कोई कहता साईं बाबा,
पवन पुत्र हनुमान हैं॥

कोई कहता मंगला मूर्ति,
श्री गजानंद हैं साईं।
कोई कहता गोकुल मोहना,
देवकी नंदना हैं साईं॥

शंकर समझे भक्त कै तो,
बाबा को भजते रहते।
कोई कहा अवतार दत्त का,
पूजा साईं की कराटे॥

कुछ भी मानो उनको तुमा,
पर साईं हैं सच्चे भगवाना।
बड़े दयालु दीनबंधु,
कितनोम को दिया जीवन दान॥

कै वर्षा पहेले की घटाना,
तुम्हें सुनूंगा में बता।
किसी भाग्यशाली की,
शिरडी में ऐ थी बाराता॥

आया साथा उसी के था,
बलाका एका बहुत सुंदरा।
अया, अकरा वहिन बसा गया,
पावना शिरडी किया नगारा॥

काई दिनो टका भटकाता,
भिक्षा मंगा उसेने दारा-दारा।
औरा दिखाई ऐसी लीला,
जग में जो हो गई अमारा॥

जैसे-जैसे अमारा उमरा बदी,
बढ़ती ही वैसी गै शाना।
घर-घर होने लगा नगर में,
साईं बाबा का गुणगान॥10॥

दिग-दिगंता में लगा गुंजने,
फिरा तो सैजी का नाम।
दीना-दुखी की रक्षा करना,
यहीं रहेगा बाबा का काम॥

बाबा के चरणो में जाकर,
जो कहता मैं हूं निर्धन।
दया उसी पर होती उनकी,
खुला जाते दुख के बंधना॥

कभी किसी ने मांगी भिक्षा,
दो बाबा मुझको संताना।
एवं अस्तु तब कहाकरा साई,
देते द उसको वरदाना॥

स्वयं दु:खी बाबा हो जाते,
दीना-दु:खी जन का लाखा हला।
अंतःकरण श्री साईं का,
सागर जैसा रहा विशाला॥

भक्त एक मद्रासी आया,
घर का बहुत बड़ा धनावना।
माला खजाना बेहड़ा उसका,
केवल नहीं रही संताना॥

लगा मनने साईनाथ को,
बाबा मुझ पर दया करो।
झांझ से झंकृता नैया को,
तुम्हीं मेरी पारा करो॥

कुलदीपक के बिना अँधेरा,
छाया हुआ घर में मेरे।
इसली अया हुन बाबा,
होकर शरणागत तेरे॥

कुलदीपक के आभा में,
व्यर्थ है दौलत की माया।
आजा भिखारी बनकारा बाबा,
शरण तुम्हारी में आया॥

दे दो मुझको पुत्र-दाना,
मैं रिनी रहूंगा जीवन भार।
औरा किसी की आस ना मुझको,
सिर्फ भरोसा है तुमा पारा॥

अनुनय-विनय बहुत की उसने,
चरणों में धरा के शीश।
तबा प्रसन्न होकर बाबा ने,
दिया भक्त को यहा आशीषा॥20॥

“अल्ला भला करेगा तेरा”,
पुत्र जन्म हो तेरे घर।
कृपा रहेगी तुझ परा उसकी,
आभा तेरे उसका बालक परा॥

अबा तका नहीं किसी ने पाया,
साईं की कृपा का पारा।
पुत्र रत्न दे मद्रासी को,
धन्य किया उसका संसार॥

तन-मन से जो भजे उसी का,
जग में होता है उद्धारा।
सांचा को आंच नहीं है कोई,
सदा जूठा की होती हारा॥

मैं हूं सदा सहारे उसे,
सदा रहूंगा उसका दासा।
साईं जैसा प्रभु मिला है,
इतना ही काम है क्या आसा॥

मेरा भी दिना था एका ऐसा,
मिलती नहीं मुझे रोटी।
ताना पारा कपड़ा दुरा रहा था,
शेष रही नन्हीं सी लंगोटी॥

सरिता सन्मुख होने पर भी,
मैं प्यासा का प्यासा था।
दुर्दिना मेरा मेरे उपरा,
दावाग्नि बरसता था॥

धरती के अतिरिकता जगत में,
मेरा कुछ अवलंब न था।
बना भिखारी मैं दुनिया में,
दारा-दारा ठोकर खाता था॥

ऐसे में एक मित्र मिला जो,
परम भक्त साईं का था।
जंजालों से मुक्ता मगरा,
जगती में वहा भी मुझसा था॥

बाबा के दर्शन की खातिर,
मिला दोनों ने किया विचारा।
साईं जैसी दया मूर्ति के,
दर्शन को हो गए तैयार॥

पावना शिरडी नगर में जाकारा,
देखा मतवली मुराति।
धन्य जन्म हो गया कि हमने,
जबा देखी साईं की सुरति॥30॥

जबा से किये हैं दर्शन हमने,
दुख सारा कफुरा हो गया।
संकटा सारे मिटाई आभा,
विपदाओं का अंत हो गया॥

मन औरा सम्मान मिला,
भिक्षा में हमको बाबा से।
प्रतिबिम्बिता हो उठे जगत में,
हमा साईं की आभा से॥

बाबा ने सम्मान दिया है,
मन दिया ईसा जीवन में।
इसाका ही संभाल ले में,
हंसता जाउंगा जीवन में॥

साईं की लीला का मेरे,
मन पर ऐसा आसरा हुआ।
लगता जगती के काना-काना में,
जैसा हो वहा भरा हुआ॥

“काशीराम” बाबा का भक्त,
शिर्डी में रहता था।
मैं साईं का साईं मेरा,
वाह दुनिया से कहता था॥

सीकर स्वयं वस्त्र बेचत,
ग्राम-नगर बजारो में।
झंकृता उसकी हृदय तंत्री थी,
साईं की झंकारों में॥

स्तब्ध निशा थी, द सोया,
रजनी आंचला में चंदा सितारे।
नहिं सूझता रहा हाथ को,
हठ तिमिरा के मारे॥

वस्त्र बेचाकरा लौटा रहा था,
हया! हटा से काशी।
विचित्र बड़ा संयोग कि उसका दिन,
अता था एककी॥

घेरा रहा में खड़े हो गए,
उपयोग कुटिला अन्याई।
मारो काटो लूटो इसाकी हि,
ध्वनि पदि सुनै॥

लुटा पिटाकरा उसे वहां से,
कुटिला गए चंपता हो।
अघाटों में मरमहता हो,
उसे दी थी संग्या खो॥40॥

बहुत देर तका पड़ा रहा वाहा,
वहिन उसी हालात में।
जेन काबा कुछ होशा हो उठ,
वहहिं उसकी पलक में॥

अनाजाने ही उसके मुँह से,
निकला पड़ा था सै।
जिसकी प्रतिध्वनि शिरडी में,
बाबा को पड़ी सुनाई॥

क्षुब्ध हो उठा मनसा उनाका,
बाबा गए विकल हो।
लगता जैसा घटाना सारी,
घटी उन्हीं के सन्मुख हो॥

उन्मादी से इधर-उधर तबा,
बाबा लेगे भटकने।
सन्मुख चिजें जो भी ऐ,
उनको लगाणे पटाकाने॥

औरा धड़काते अंगारो में,
बाबा ने अपना करा डाला।
हुए शशांकिता सभी वाहा,
लक्खा तांडवनृत्य निराला॥

समझ गए सबा लोगा,
कि कोई भक्त पदा संकटा में।
क्षुबिता खड़े थे सभी वहां,
पर हुए विस्मय में॥

बचने की ही खातिर इस्तेमाल करो,
बाबा आजा विकल है।
उसकी ही पीड़ा से पिरिता,
उनाका अन्तःस्थल है॥

इतने में ही विविधा ने अपनी,
विचित्रता दिखलाई।
लाख करा जिसे जनता की,
श्रद्धा सरिता लहराई॥

लेकरा संग्याहिना भक्त को,
गादी एका वाह आई।
सन्मुखा आपने देखा भक्त को,
साईं की आँखें भरी आई॥

शांता, धीरा, गंभीरा, सिंधु सा,
बाबा का अंतःस्थला।
अजा न जाने क्यों रहा-रहकरा,
हो जाता था चंचला॥50॥

अजा दया की मूर्ति स्वयं था,
बना हुआ उपचारी।
आभा भक्त के लिए आजा था,
देवा बना प्रतिहारी॥

अजा भक्ति की विषम परीक्षा में,
सफल हुआ काशी।
उसके ही दर्शन की खातिर थे,
उमादे नगर-निवासी॥

जबा भी औरा जहां भी कोई,
भक्त पड़े संकट में।
उसकी रक्षा करें बाबा,
अटे हैं पलभरा में॥

युग-युग का है सत्य यहाँ,
नहीं कोई नई कहानी।
अपतग्रस्ता भक्त जबा होता,
जते खुदा अंतर्यामी॥

भेद-भाव से परे पुजारी,
मानवता के थे साई।
जितने प्यारे हिंदू-मुस्लिमा,
उतने ही द सिक्ख इसाई॥

भेदा-भाव मंदिरा-मस्जिदा का,
तोड़ा-फोड़ा बाबा ने डाला।
रह रहीमा सभी उनाके थे,
कृष्ण करीमा अल्लाताला॥

घंटे की प्रतिध्वनि से गूंजा,
मस्जिद का कोना-कोना।
मिले परसपरा हिंदू-मुस्लिमा,
प्यारा बड़ा दीना-दीना दूना॥

चमत्कारा था कितना सुंदरा,
परिचय ईसा काया ने दी।
औरा नीमा कडुवहता में भी,
मिठासा बाबा ने भरा दी॥

सबा को स्नेह दिया साई ने,
सबको संतुला प्यारा किया।
जो कुछ भी चाहा,
बाबा ने उसे वही दिया॥

ऐसे स्नेहशील भजन का,
नाम सदा जो जप करे।
पर्वत जैसा दुःख न क्यों हो,
पलभरा में वहा दुरा तारे॥60॥

साईं जैसा दाता हमा,
अरे नहीं देखा कोई।
जिसे केवल दर्शन से ही,
सारी विपदा दूर गाई॥

तन में साईं, मन में साईं,
साईं साईं भजा करो।
अपने तन की सुधि-बुधि खोकारा,
सुधि उसकी तुम किया करो॥

जबा तू अपनी सुधि तजा,
बाबा की सुधि किया करेगा।
औरा राता-दीना बाबा-बाबा,
हाय तू राता करेगा॥

बाबा को हैं! विवाशा हो,
सुधि तेरी लेनी ही होगी।
तेरी हारा इच्छा बाबा को,
पूरी ही करनी होगी॥

जांगला, जगंला भटका ना पगला,
औरा ढूंढ़ने बाबा को।
एका जगह केवल शिरडी में,
तू पाएगा बाबा को॥

धन्य जगत में प्राणि है वाहा,
जिसने बाबा को पाया।
दुख में, सुख में प्रहार अथा हो,
साईं का ही गुण गया॥

गिरे संकटों के पर्वत,
चाहे बिजली ही टूटा पड़े।
साई का ले नाम सदा तुमा,
सन्मुख सबा के रहो अड़े॥

ईसा बुड्ढे की सुना करामाता,
तुम हो जाओगे हिराना।
दंगा रहा गाए सुनाकरा जिसे,
जेन कितने चतुर सुजाना॥

एका बड़ा शिरडी में साधु,
ढोंगी था कोई आया।
भोली-भाली नगर-निवासी,
जनता को था भरमाया॥

जदी, बुटियां उनकों ढिक्कारा,
करणे लगा वहा भाषाना।
कहने लगा सुनो श्रोतागण,
घर मेरा है वृन्दावन ॥70॥

औषधि मेरे पास एका है,
औरा अजाबा इसमें शक्ति।
इसे सेवन करने से ही,
हो जाति दुख से मुक्ति॥

अगर मुक्ता होना चाहो,
तुमा संकटा से बिमारी से।
तो है मेरा नम्र निवेदन,
हारा नारा से, हारा नारी से॥

लो खरिदा तुमा इसाको,
इसाकी सेवन विधियां हैं न्यारी।
यद्यपि तुच्च वस्तु है यहा,
गुण उसके हैं अति भारी॥

जो है संतति हिना यहां यादी,
मेरी औषधि को खाए।
पुत्र-रत्न हो प्राप्त,
अरे वाहा मुन्हा मंगा फल पाए॥

औषधि मेरी जो न खरीददे,
जीवन भर पछताएगा।
मुझे जैसा प्राण शायद हाय,
अरे यहां आ पाएगा॥

दुनिया दो दिनों का मेला है,
मौज शौक तुम भी करा लो।
अगर इसे मिलाता है, सबा कुछ,
तुम भी इसको ले लो॥

हेरानी बढती जनता की,
लाखा इसाकी करास्तानी।
प्रमुदिता वाह भी मन- हाय-मन था,
लाखा लोगों की नादानी॥

खबर सुनाने बाबा को याहा,
गया दौडाकर सेवक एका।
सुनकारा भृकुटि तानि आभा,
विस्मरण हो गया सभी विवेका॥

हुकमा दिया सेवका को,
सतवारा पकड़ा दुष्टा को लाओ।
या शिरडी की सीमा से,
कपटी को दूर भगाओ॥

मेरे रहते भोली-भाली,
शिरडी की जनता को।
कौन नीचा ऐसा जो,
सहसा करता है छलने को॥80॥

पलभरा में ऐसे ढोंगी,
कपति नीच लुटेरे को।
महानशा के महागर्ता में पहुंचा,
दुन जीवन भर को॥

तनिका मिला आभासा मदारी,
क्रुरा, कुटिला अन्ययी को।
काला नाचता है अबा सिरा पारा,
गुस्सा आया साईं को॥

पलभरा में सबा खेला बंदा कारा,
भागा सिरा पारा राखकरा पैरा।
सोचा रहा था मन ही मन,
भगवान नहीं है अब खैरा॥

सच्चा है साईं जैसा दानी,
मिला न बन सकेगा जग में।
अनशा ईशा का साईं बाबा,
उनको न कुछ भी मुश्किल जगा में॥

स्नेहा, शिला, सौजन्या आदि का,
आभूषण धारण करा।
बढ़ता ईसा दुनिया में जो भी,
मनवा सेवा के पाठ पारा॥

वही जीता लेता है जगती के,
जन जन का अंतःस्थल।
उसकी एका उदासी ही,
जगा को करा देती है विहवला॥

जबा-जबा जगा में भरा पापा का,
बढ़ा-बाधा ही जाता है।
प्रयोग मिटने की ही खातिर,
अवतारी ही आता है॥

पापा औरा अन्य सभी कुछ,
इस जगती का हारा के।
दुरा भागा देता दुनिया के,
दानवा को क्षण भर के॥

स्नेहा सुधा की धरा बरसाने,
लगती है इस दुनिया में।
गले परस्परा मिलाने लगते,
हैं जन जन अपसा में॥

ऐसे अवतारी साई,
मृत्युलोक में अकरा।
समता का यहा पथ पढ़ाय,
सबको अपान आपा मितकारा ॥90॥

नाम द्वारका मस्जिद का,
राखा शिरडी में साईं ने।
दापा, तप, संतपा मिटाया,
जो कुछ आया साईं ने॥

सदा यदा में मस्त राम की,
बैठे रहते थे साईं।
पहरा अथा ही राम नाम को,
भजते रहते थे साई॥

सुखी रुखी तजि बसि,
चाहे या होवे पकावना।
सौदा प्यारा के भूखे साईं की,
ख़तीरा द सभी समाना॥

स्नेहा आभा श्रद्धा से अपनी,
जाना जो कुछ दे जाते थे।
बड़े चावा से उसका भोजन को,
बाबा पावना कराते थे॥

कभी-कभी मन बहलाने को,
बाबा बागा में जाते थे।
प्रमुदिता मन में निरख प्रकृति,
छटा को वे होते थे॥

रंगा-बिरंगे पुष्प बागा के,
मंदा-मंदा हिला-डुला कराके।
बिहड़ा वीराने मन में भी,
स्नेह सलिला भर जाते थे॥

ऐसी समुधुरा बेला में भी,
दुखा अपटा, विपदा के मारे।
अपने मन की व्यथा सुनाने,
जाना रहते बाबा को घेरे॥

सुनकरा जिनकी करुणाकथा को,
नयना कमला भार अटे थे।
दे विभूति हारा व्यथा, शांति,
उनाके उरा में भार देते थे॥

जेन क्या अद्भुत शिक्षा,
उसकी विभूति में होती थी।
जो धारण कराटे मस्तका पारा,
दुख सारा हारा लेती थी॥

धन्य मनुज वे साक्षात् दर्शन,
जो बाबा साई के पाये।
धन्य कमला करा उनको जिनसे,
चरण-कमला वे परासाय॥100॥

कषा निर्भय तुमको भी,
साक्षात साई मिला जाता।
वर्षाें से उजड़ा चमन अपान,
फिरा से आजा खिला जाता॥

गारा पकड़ता में चरणा श्री के,
नहीं छोड़ता उमरभरा।
मन लेता में जरूरा उनको,
गारा रूठते सै मुझ परा॥

|| Sai Baba Chalisa Lyrics ||

Pahale Sai Ke Charanom Mein,
Apana Shisha Namaun Main।
Kaise Shirdi Sai Aye,
Sara Hala Sunaun Main॥

Kauna Hai Mata, Pita Kauna Hai,
Ye Na Kisi Ne Bhi Jana।
Kahan Janma Sai Ne Dhara,
Prashna Paheli Raha Bana॥

Koi Kahe Ayodhya Ke,
Ye Ramachandra Bhagawana Hain।
Koi Kahata Sai Baba,
Pavana Putra Hanumana Hain॥

Koi Kahata Mangala Murti,
Shri Gajananda Hain Sai।
Koi Kahata Gokula Mohana,
Devaki Nandana Hain Sai॥

Shankara Samajhe Bhakta Kai To,
Baba Ko Bhajate Rahate।
Koi Kaha Avatara Datta Ka,
Puja Sai Ki Karate॥

Kuchha Bhi Mano Unako Tuma,

Para Sai Hain Sachche Bhagawana।
Bade Dayalu Dinabandhu,

Kitanom Ko Diya Jivana Dana॥

Kai Varsha Pahale Ki Ghatana,

Tumhein Sunaunga Mein Bata।
Kisi Bhagyashali Ki,

Shirdi Mein Ai Thi Barata॥

Aya Satha Usi Ke Tha,

Balaka Eka Bahuta Sundara।
Aya, Akara Vahin Basa Gaya,

Pavana Shirdi Kiya Nagara॥

Kai Dino Taka Bhatakata,

Bhiksha Manga Usane Dara-Dara।
Aura Dikhai Aisi Lila,

Jaga Mein Jo Ho Gai Amara॥

Jaise-Jaise Amara Umara Badi,

Badhati Hi Vaise Gai Shana।
Ghara-Ghara Hone Laga Nagara Mein,

Sai Baba Ka Gunagana ॥10॥

Dig-Diganta Mein Laga Gunjane,

Phira To Saiji Ka Nama।
Dina-Dukhi Ki Raksha Karana,

Yahi Raha Baba Ka Kama॥

Baba Ke Charano Mein Jakar,

Jo Kahata Mein Hun Nirdhana।
Daya Usi Para Hoti Unaki,

Khula Jate Duhkha Ke Bandhana॥

Kabhi Kisi Ne Mangi Bhiksha,

Do Baba Mujhako Santana।
Evam Astu Taba Kahakara Sai,

Dete The Usako Varadana॥

Swayam Duhkhi Baba Ho Jate,

Dina-Duhkhi Jana Ka Lakha Hala।
Antahkarana Shri Sai Ka,

Sagara Jaisa Raha Vishala॥

Bhakta Eka Madrasi Aya,

Ghara Ka Bahuta Bada Dhanavana।
Mala Khajana Behada Usaka,

Kevala Nahin Rahi Santana॥

Laga Manane Sainatha Ko,

Baba Mujha Para Daya Karo।
Jhanjha Se Jhankrita Naiya Ko,

Tumhin Meri Para Karo॥

Kuladipaka Ke Bina Andhera,

Chhaya Hua Ghara Mein Mere।
Isalie Aya Hun Baba,

Hokara Sharanagata Tere॥

Kuladipaka Ke Abhava Mein,
Vyartha Hai Daulata Ki Maya।
Aja Bhikhari Banakara Baba,

Sharana Tumhari Mein Aya॥

De Do Mujhako Putra-Dana,

Mein Rini Rahunga Jivana Bhara।
Aura Kisi Ki Asa Na Mujako,

Sirpha Bharosa Hai Tuma Para॥

Anunaya-Vinaya Bahuta Ki Usane,

Charanon Mein Dhara Ke Shisha।
Taba Prasanna Hokara Baba Ne,

Diya Bhakta Ko Yaha Ashisha ॥20॥

“Alla Bhala Karega Tera”,

Putra Janma Ho Tere Ghara।
Kripa Rahegi Tujha Para Usaki,

Aura Tere Usa Balaka Para॥

Aba Taka Nahin Kisi Ne Paya,

Sai Ki Kripa Ka Para।
Putra Ratna De Madrasi Ko,

Dhanya Kiya Usaka Sansara॥

Tana-Mana Se Jo Bhaje Usi Ka,

Jaga Mein Hota Hai Uddhara।
Sancha Ko Ancha Nahin Hain Koi,

Sada Jutha Ki Hoti Hara॥

Main Hun Sada Sahare Usake,

Sada Rahunga Usaka Dasa।
Sai Jaisa Prabhu Mila Hai,

Itani Hi Kama Hai Kya Asa॥

Mera Bhi Dina Tha Eka Aisa,

Milati Nahin Mujhe Roti।
Tana Para Kapada Dura Raha Tha,

Shesha Rahi Nanhin Si Langoti॥

Sarita Sanmukha Hone Para Bhi,

Mein Pyasa Ka Pyasa Tha।
Durdina Mera Mere Upara,

Davagni Barasata Tha॥

Dharati Ke Atirikta Jagata Mein,

Mera Kuchha Avalamba Na Tha।
Bana Bhikhari Main Duniya Mein,

Dara-Dara Thokara Khata Tha॥

Aise Mein Eka Mitra Mila Jo,

Parama Bhakta Sai Ka Tha।
Janjalon Se Mukta Magara,

Jagati Mein Vaha Bhi Mujhasa Tha॥

Baba Ke Darshana Ki Khatira,

Mila Donon Ne Kiya Vichara।
Sai Jaise Daya Murti Ke,

Darshana Ko Ho Gaye Taiyara॥

Pavana Shirdi Nagara Mein Jakara,

Dekha Matavali Murati।
Dhanya Janma Ho Gaya Ki Hamane,

Jaba Dekhi Sai Ki Surati ॥30॥

Jaba Se Kiye Hai Darshana Hamane,

Duhkha Sara Kaphura Ho Gaya।
Sankata Sare Mitai Aura,

Vipadaon Ka Anta Ho Gaya॥

Mana Aura Sammana Mila,

Bhiksha Mein Hamako Baba Se।
Pratibimbita Ho Uthe Jagata Mein,

Hama Sai Ki Abha Se॥

Baba Ne Sammana Diya Hai,

Mana Diya Isa Jivana Mein।
Isaka Hi Sambala Le Mein,

Hansata Jaunga Jivana Mein॥

Sai Ki Lila Ka Mere,

Mana Para Aisa Asara Hua।
Lagata Jagati Ke Kana-Kana Mein,

Jaise Ho Vaha Bhara Hua॥

“Kashirama” Baba Ka Bhakta,

Shirdi Mein Rahata Tha।
Main Sai Ka Sai Mera,

Vaha Duniya Se Kahata Tha॥

Sikara Svayam Vastra Bechata,

Grama-Nagara Bajaro Mein।
Jhankrita Usaki Hridaya Tantri Thi,

Sai Ki Jhankaron Mein॥

Stabdha Nisha Thi, The Soya,

Rajani Anchala Men Chanda Sitare।
Nahin Sujhata Raha Hath Ko,

Hatha Timira Ke Mare॥

Vastra Bechakara Lauta Raha Tha,

Haya! Hata Se Kashi।
Vichitra Bada Sanyoga Ki Usa Dina,

Ata Tha Ekaki॥

Ghera Raha Mein Khade Ho Gaye,

Use Kutila Anyayi।
Maro Kato Luto Isaki Hi,

Dhvani Padi Sunai॥

Luta Pitakara Use Vahan Se,

Kutila Gaye Champata Ho।
Aghaton Me Marmahata Ho,

Usane Di Thi Sangya Kho ॥40॥

Bahuta Dera Taka Pada Raha Vaha,

Vahin Usi Halata Mein।
Jane Kaba Kuchha Hosha Ho Utha,

Vahin Usaki Palaka Mein॥

Anajane Hi Usake Muha Se,

Nikala Pada Tha Sai।
Jisaki Pratidhvani Shirdi Mein,

Baba Ko Padi Sunai॥

Kshubdha Ho Utha Manasa Unaka,

Baba Gaye Vikala Ho।
Lagata Jaise Ghatana Sari,

Ghati Unhi Ke Sanmukha Ho॥

Unmadi Se Idhara-Udhara Taba,

Baba Lege Bhatakane।
Sanmukha Chijein Jo Bhi Ai,

Unako Lagane Patakane॥

Aura Dhadhakate Angaro Mein,

Baba Ne Apana Kara Dala।
Huye Sashankita Sabhi Vaha,

Lakha Tandavanritya Nirala॥

Samajha Gaye Saba Loga,

Ki Koi Bhakta Pada Sankata Mein।
Kshubita Khade The Sabhi Vahan,

Para Huye Vismaya Mein॥

Use Bachane Ki Hi Khatira,

Baba Aja Vikala Hai।
Uski Hi Pida Se Pirita,

Unaka Antahasthala Hai॥

Itane Mein Hi Vividha Ne Apani,

Vichitrata Dikhalayi।
Lakha Kara Jisako Janata Ki,

Shraddha Sarita Laharai॥

Lekara Sangyahina Bhakta Ko,

Gadi Eka Vaha Ayi।
Sanmukha Apane Dekha Bhakta Ko,

Sai Ki Ankhein Bhara Ayi॥

Shanta, Dhira, Gambhira, Sindhu Sa,

Baba Ka Antahsthala।
Aja Na Jane Kyon Raha-Rahakara,

Ho Jata Tha Chanchala ॥50॥

Aja Daya Ki Murti Svayam Tha,

Bana Hua Upachari।
Aura Bhakta Ke Liye Aja Tha,

Deva Bana Pratihari॥

Aja Bhakti Ki Vishama Pariksha Mein,

Saphala Hua Tha Kashi।
Usake Hi Darshana Ki Khatira The,

Umade Nagara-Nivasi॥

Jaba Bhi Aura Jahan Bhi Koi,

Bhakta Pade Sankata Mein।
Usaki Raksha Karane Baba,

Ate Hain Palabhara Mein॥

Yuga-Yuga Ka Hai Satya Yaha,

Nahin Koi Nai Kahani।
Apatagrasta Bhakta Jaba Hota,

Jate Khuda Antaryami॥

Bheda-Bhava Se Pare Pujari,

Manavata Ke The Sai।
Jitane Pyare Hindu-Muslima,

Utane Hi The Sikkha Isai॥

Bheda-Bhava Mandira-Masjida Ka,

Toda-Phoda Baba Ne Dala।
Raha Rahima Sabhi Unake The,

Krishna Karima Allatala॥

Ghante Ki Pratidhvani Se Gunja,

Masjida Ka Kona-Kona।
Mile Paraspara Hindu-Muslima,

Pyara Bada Dina-Dina Duna॥

Chamatkara Tha Kitana Sundara,

Parichaya Isa Kaya Ne Di।
Aura Nima Kaduvahata Mein Bhi,

Mithasa Baba Ne Bhara Di॥

Saba Ko Sneha Diya Sai Ne,

Sabako Santula Pyara Kiya।
Jo Kuchha Jisane Bhi Chaha,

Baba Ne Usako Vahi Diya॥

Aise Snehashila Bhajana Ka,

Nama Sada Jo Japa Kare।
Parvata Jaisa Duhkha Na Kyon Ho,

Palabhara Mein Vaha Dura Tare ॥60॥

Sai Jaisa Data Hama,

Are Nahin Dekha Koi।
Jisake Kevala Darshana Se Hi,

Sari Vipada Dura Gai॥

Tana Mein Sai, Mana Mein Sai,

Sai Sai Bhaja Karo।
Apane Tana Ki Sudhi-Budhi Khokara,

Sudhi Usaki Tuma Kiya Karo॥

Jaba Tu Apani Sudhi Taja,

Baba Ki Sudhi Kiya Karega।
Aura Rata-Dina Baba-Baba,

Hi Tu Rata Karega॥

To Baba Ko Are! Vivasha Ho,

Sudhi Teri Leni Hi Hogi।
Teri Hara Ichchha Baba Ko,

Puri Hi Karani Hogi॥

Jangala, Jaganla Bhataka Na Pagala,

Aura Dhundhane Baba Ko।
Eka Jagaha Kevala Shirdi Mein,

Tu Paega Baba Ko॥

Dhanya Jagata Mein Prani Hai Vaha,

Jisane Baba Ko Paya।
Duhkha Mein, Sukha Mein Prahara Atha Ho,

Sai Ka Hi Guna Gaya॥

Gire Sankaton Ke Parvata,

Chahe Bijali Hi Tuta Pade।
Sai Ka Le Nama Sada Tuma,

Sanmukha Saba Ke Raho Ade॥

Isa Budhe Ki Suna Karamata,

Tuma Ho Jaoge Hairana।
Danga Raha Gae Sunakara Jisako,

Jane Kitane Chatura Sujana॥

Eka Bara Shirdi Mein Sadhu,

Dhongi Tha Koi Aya।
Bholi-Bhali Nagara-Nivasi,

Janata Ko Tha Bharamaya॥

Jadi, Butiyan Unhein Dhikhakara,

Karane Laga Vaha Bhashana।
Kahane Laga Suno Shrotagana,

Ghara Mera Hai Vrindavana ॥70॥

Aushadhi Mere Pasa Eka Hai,

Aura Ajaba Isamein Shakti।
Isake Sevana Karane Se Hi,

Ho Jati Duhkha Se Mukti॥

Agara Mukta Hona Chaho,

Tuma Sankata Se Bimari Se।
To Hai Mera Namra Nivedana,

Hara Nara Se, Hara Nari Se॥

Lo Kharida Tuma Isako,

Isaki Sevana Vidhiyan Hain Nyari।
Yadyapi Tuchchha Vastu Hai Yaha,

Guna Usake Hain Ati Bhari॥

Jo Hai Santati Hina Yahan Yadi,

Meri Aushadhi Ko Khae।
Putra-Ratna Ho Prapta,

Are Vaha Munha Manga Phala Pae॥

Aushadhi Meri Jo Na Kharide,

Jivana Bhara Pachhatayega।
Mujha Jaisa Prani Shayada Hi,

Are Yahan Aa Payega॥

Duniya Do Dinon Ka Mela Hai,

Mauja Shauka Tuma Bhi Kara Lo।
Agara Isase Milata Hai,

Saba Kuchha,Tuma Bhi Isako Le Lo॥

Hairani Badhati Janata Ki,

Lakha Isaki Karastani।
Pramudita Vaha Bhi Mana- Hi-Mana Tha,

Lakha Logon Ki Nadani॥

Khabara Sunane Baba Ko Yaha,

Gaya Daudakara Sevaka Eka।
Sunakara Bhrikuti Tani Aura,

Vismarana Ho Gaya Sabhi Viveka॥

Hukma Diya Sevaka Ko,

Satvara Pakada Dushta Ko Lao।
Ya Shirdi Ki Sima Se,

Kapati Ko Dura Bhagao॥

Mere Rahate Bholi-Bhali,

Shirdi Ki Janata Ko।
Kauna Nicha Aisa Jo,

Sahasa Karata Hai Chhalane Ko ॥80॥

Palabhara Mein Aise Dhongi,

Kapati Nicha Lutere Ko।
Mahanasha Ke Mahagarta Mein Pahuncha,

Dun Jivana Bhara Ko॥

Tanika Mila Abhasa Madari,

Krura, Kutila Anyayi Ko।
Kala Nachata Hai Aba Sira Para,

Gussa Aya Sai Ko॥

Palabhara Mein Saba Khela Banda Kara,

Bhaga Sira Para Rakhakara Paira।
Socha Raha Tha Mana Hi Mana,

Bhagawana Nahi Hai Aba Khaira॥

Sacha Hai Sai Jaisa Dani,

Mila Na Sakega Jaga Mein।
Ansha Isha Ka Sai Baba,

Unhein Na Kuchha Bhi Mushkila Jaga Mein॥

Sneha, Shila, Saujanya Adi Ka,

Abhushana Dharana Kara।
Badhata Isa Duniya Mein Jo Bhi,

Manava Seva Ke Patha Para॥

Vahi Jita Leta Hai Jagati Ke,

Jana Jana Ka Antahsthala।
Usaki Eka Udasi Hi,

Jaga Ko Kara Deti Hai Vihvala॥

Jaba-Jaba Jaga Mein Bhara Papa Ka,

Badha-Badha Hi Jata Hai।
Use Mitane Ki Hi Khatira,

Avatari Hi Ata Hai॥

Papa Aura Anyaya Sabhi Kuchha,

Isa Jagati Ka Hara Ke।
Dura Bhaga Deta Duniya Ke,

Danava Ko Kshana Bhara Ke॥

Sneha Sudha Ki Dhara Barasane,

Lagati Hai Isa Duniya Mein।
Gale Paraspara Milane Lagate,

Hain Jana Jana Apasa Mein॥

Aise Avatari Sai,

Mrityuloka Mein Akara।
Samata Ka Yaha Patha Padhaya,

Sabako Apana Apa Mitakara ॥90॥

Nama Dwaraka Masjida Ka,

Rakha Shirdi Mein Sai Ne।
Dapa, Tapa, Santapa Mitaya,

Jo Kuchha Aya Sai Ne॥

Sada Yada Mein Masta Rama Ki,

Baithe Rahate The Sai।
Pahara Atha Hi Rama Nama Ko,

Bhajate Rahate The Sai॥

Sukhi Rukhi Taji Basi,

Chahe Ya Hove Pakavana।
Sauda Pyara Ke Bhukhe Sai Ki,

Khatira The Sabhi Samana॥

Sneha Aura Shraddha Se Apani,

Jana Jo Kuchha De Jate The।
Bade Chava Se Usa Bhojana Ko,

Baba Pavana Karate The॥

Kabhi-Kabhi Mana Bahalane Ko,

Baba Baga Mein Jate The।
Pramudita Mana Mein Nirakha Prakriti,

Chhata Ko Ve Hote The॥

Ranga-Birange Pushpa Baga Ke,

Manda-Manda Hila-Dula Karake।
Bihada Virane Mana Mein Bhi,

Sneha Salila Bhara Jate The॥

Aisi Samudhura Bela Mein Bhi,

Dukha Apata, Vipada Ke Mare।
Apane Mana Ki Vyatha Sunane,

Jana Rahate Baba Ko Ghere॥

Sunakara Jinaki Karunakatha Ko,

Nayana Kamala Bhara Ate The।
De Vibhuti Hara Vyatha, Shanti,

Unake Ura Mein Bhara Dete The॥

Jane Kya Adbhuta Shikta,

Usa Vibhuti Mein Hoti Thi।
Jo Dharana Karate Mastaka Para,

Duhkha Sara Hara Leti Thi॥

Dhanya Manuja Ve Sakshat Darshana,

Jo Baba Sai Ke Paye।
Dhanya Kamala Kara Unake Jinase,

Charana-Kamala Ve Parasaye ॥100॥

Kasha Nirbhaya Tumako Bhi,

Sakshat Sai Mila Jata।
Varshon Se Ujada Chamana Apana,

Phira Se Aja Khila Jata॥

Gara Pakadata Mein Charana Shri Ke,

Nahin Chhodata Umrabhara।
Mana Leta Mein Jarura Unako,

Gara Ruthate Sai Mujha Para॥



साईं बाबा कौन से देवता हैं?

साईं बाबा का संबंध विशेष रूप से हिंदू और मुस्लिम धर्म दोनों से है। उन्हें एक संत और गुरु के रूप में पूजा जाता है। साईं बाबा को एक दिव्य शक्ति और आदर्श साधक के रूप में माना जाता है, जो लोगों को धार्मिक एकता और मानवता का संदेश देते हैं। उनकी शिक्षाएं मानवता, प्रेम और सेवा पर केंद्रित हैं। उनके भक्त उन्हें भगवान के रूप में मानते हैं, जबकि उनकी शिक्षाएं किसी एक धर्म की सीमाओं को पार करती हैं। इस प्रकार, साईं बाबा को विशेष रूप से एक ऐसे संत के रूप में देखा जाता है, जो विभिन्न धार्मिक परंपराओं को एकीकृत करता है और समाज में एकता और भाईचारे का प्रतीक है।

स्वामी साईं बाबा कौन हैं?

स्वामी साईं बाबा, जिनके नाम से भी जाना जाता है, एक प्रमुख भारतीय संत और गुरु हैं जिनका जीवन और शिक्षाएं हिन्दू और मुस्लिम धर्मों में समान रूप से सम्मानित हैं। वे शिर्डी के एक छोटे से गाँव में निवास करते थे और उनकी शिक्षाएं प्रेम, सेवा, और धार्मिक सहिष्णुता पर आधारित थीं। साईं बाबा का जीवन विशेष रूप से दिव्यता, अचंभे और चमत्कारों से भरा हुआ था, जो उनके अनुयायियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने अपने अनुयायियों को सिखाया कि सच्चा धर्म केवल पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे अपने कर्मों और जीवनशैली में भी दिखाया जाना चाहिए।

साईं बाबा का असली नाम कौन है?

साईं बाबा का असली नाम विवादित है और इसके बारे में कई मत हैं। अधिकांश लोग मानते हैं कि उनका जन्म नाम ‘साईनाथ’ था, लेकिन उनका पूरा जन्म विवरण और नाम अस्पष्ट है। उन्होंने अपने जीवन के अधिकांश समय को शिर्डी में बिताया और वहाँ के लोग उन्हें ‘साईं बाबा’ के नाम से जानते हैं। उनके बारे में मौजूद विभिन्न खातों के अनुसार, कुछ लोग मानते हैं कि वे एक मुस्लिम परिवार से थे, जबकि अन्य मानते हैं कि उनका संबंध हिन्दू धर्म से था। इस प्रकार, साईं बाबा का असली नाम और उनका जन्म स्थान भी एक रहस्य बना हुआ है।

साईं बाबा को भगवान क्यों मानते हैं?

साईं बाबा को भगवान मानने का मुख्य कारण उनकी दिव्यता और उनकी शिक्षाओं की व्यापकता है। उन्होंने जीवन के हर पहलू में आदर्शता और समर्पण का उदाहरण प्रस्तुत किया। उनकी शिक्षाएं मानवता, प्रेम, और धार्मिक सहिष्णुता के सिद्धांतों पर आधारित थीं। भक्त उन्हें एक चमत्कारी शक्ति के रूप में मानते हैं जिन्होंने अनेक चमत्कार किए और लोगों की कठिनाइयों को दूर किया। साईं बाबा की भक्ति और उनके अनुयायियों का अटूट विश्वास उन्हें एक दिव्य शक्ति और भगवान के रूप में मानता है, जिन्होंने अपने जीवन के माध्यम से लोगों को सच्चे धर्म और प्रेम का संदेश दिया।

इस्लाम में साईं क्या है?

इस्लाम में ‘साईं’ शब्द का उपयोग आमतौर पर एक धार्मिक या आध्यात्मिक नेता के लिए किया जाता है। ‘साईं’ अरबी भाषा के शब्द ‘सईद’ से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ ‘खुशहाल’ या ‘धन्य’ होता है। इस्लाम में साईं बाबा का स्थान अलग है क्योंकि वे एक हिन्दू-मुस्लिम संत के रूप में प्रसिद्ध हैं। मुस्लिम समुदाय में साईं बाबा को एक सम्मानित धार्मिक व्यक्तित्व के रूप में माना जाता है, जिनकी शिक्षाएं और जीवन अन्य धर्मों के साथ समानता और सहिष्णुता का संदेश देती हैं। उनके अनुयायी उन्हें धार्मिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में मानते हैं।


साई चालीसा पाठ के लाभ

साई चालीसा, साईं बाबा की भक्ति में रचित एक पवित्र स्तोत्र है, जो चालीस चौपाइयों में उनकी महिमा, गुणों और कृपा का वर्णन करता है। इसका नियमित पाठ भक्त के जीवन पर गहरा आध्यात्मिक, मानसिक और भावनात्मक प्रभाव छोड़ता है। इसके कुछ प्रमुख लाभ इस प्रकार हैं:

1. आध्यात्मिक शांति और आंतरिक शक्ति: साई चालीसा का पाठ मन को एकाग्र करके भटकाव रोकता है। इससे मन शांत होता है और आत्मिक शक्ति का विकास होता है। बाबा की करुणामयी छवि पर ध्यान केंद्रित करने से भक्त को आंतरिक साहस और धैर्य की प्राप्ति होती है, जो जीवन की कठिनाइयों का सामना करने में सहायक होती है।

2. मानसिक तनाव से मुक्ति: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव और चिंता आम समस्या हैं। चालीसा का पाठ एक प्रकार की ध्यान-साधना है। यह मन के नकारात्मक विचारों को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है, जिससे मानसिक उलझनें कम होती हैं और तनाव से मुक्ति मिलती है।

3. भक्ति और समर्पण की भावना का विकास: चालीसा की प्रत्येक चौपाई साईं बाबा के प्रति प्रेम और समर्पण से ओत-प्रोत है। इसके नियमित पाठ से हृदय में भक्ति की गहरी भावना जागृत होती है। व्यक्ति स्वार्थी भावनाओं से ऊपर उठकर ईश्वरीय प्रेम और सेवा की ओर अग्रसर होता है।

4. आशीर्वाद और कृपा की प्राप्ति: मान्यता है कि श्रद्धा और सच्चे मन से चालीसा का पाठ करने पर साईं बाबा की विशेष कृपा भक्त पर बनी रहती है। उनकी कृपा से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, संकटों से रक्षा होती है और घर-परिवार में सुख-शांति का वास होता है। बाबा अपने भक्तों को हर संकट से उबारने का आश्वासन देते हैं।

5. नैतिक मूल्यों और चरित्र का सुदृढ़ीकरण: साई चालीसा के माध्यम से बाबा के जीवन दर्शन और उपदेशों से सीख मिलती है। उनके द्वारा प्रतिपादित सत्य, प्रेम, दया, करुणा, शांति और सेवा जैसे मूल्य हृदय में बसते हैं। इससे व्यक्ति के चरित्र का निर्माण होता है और वह एक बेहतर इंसान बनता है।

6. एकाग्रता और संकल्प शक्ति में वृद्धि: चालीसा पाठ करते समय मन, वचन और कर्म से बाबा में लीन होना पड़ता है। इस अभ्यास से एकाग्रता बढ़ती है। दृढ़ संकल्प की शक्ति विकसित होती है, जो किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक सिद्ध होती है।

7. सकारात्मक वातावरण का निर्माण: मंत्रों और स्तुतियों का उच्चारण वातावरण में सकारात्मक कंपन पैदा करता है। घर में नियमित चालीसा पाठ से वहां का वातावरण पवित्र और शांतिमय बनता है, जिसका सकारात्मक प्रभाव परिवार के सभी सदस्यों पर पड़ता है।



साईं बाबा कौन से देवता हैं?

साईं बाबा का संबंध विशेष रूप से हिंदू और मुस्लिम धर्म दोनों से है। उन्हें एक संत और गुरु के रूप में पूजा जाता है। साईं बाबा को एक दिव्य शक्ति और आदर्श साधक के रूप में माना जाता है, जो लोगों को धार्मिक एकता और मानवता का संदेश देते हैं। उनकी शिक्षाएं मानवता, प्रेम और सेवा पर केंद्रित हैं। उनके भक्त उन्हें भगवान के रूप में मानते हैं, जबकि उनकी शिक्षाएं किसी एक धर्म की सीमाओं को पार करती हैं। इस प्रकार, साईं बाबा को विशेष रूप से एक ऐसे संत के रूप में देखा जाता है, जो विभिन्न धार्मिक परंपराओं को एकीकृत करता है और समाज में एकता और भाईचारे का प्रतीक है।

स्वामी साईं बाबा कौन हैं?

स्वामी साईं बाबा, जिनके नाम से भी जाना जाता है, एक प्रमुख भारतीय संत और गुरु हैं जिनका जीवन और शिक्षाएं हिन्दू और मुस्लिम धर्मों में समान रूप से सम्मानित हैं। वे शिर्डी के एक छोटे से गाँव में निवास करते थे और उनकी शिक्षाएं प्रेम, सेवा, और धार्मिक सहिष्णुता पर आधारित थीं। साईं बाबा का जीवन विशेष रूप से दिव्यता, अचंभे और चमत्कारों से भरा हुआ था, जो उनके अनुयायियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने अपने अनुयायियों को सिखाया कि सच्चा धर्म केवल पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे अपने कर्मों और जीवनशैली में भी दिखाया जाना चाहिए।

साईं बाबा का असली नाम कौन है?

साईं बाबा का असली नाम विवादित है और इसके बारे में कई मत हैं। अधिकांश लोग मानते हैं कि उनका जन्म नाम ‘साईनाथ’ था, लेकिन उनका पूरा जन्म विवरण और नाम अस्पष्ट है। उन्होंने अपने जीवन के अधिकांश समय को शिर्डी में बिताया और वहाँ के लोग उन्हें ‘साईं बाबा’ के नाम से जानते हैं। उनके बारे में मौजूद विभिन्न खातों के अनुसार, कुछ लोग मानते हैं कि वे एक मुस्लिम परिवार से थे, जबकि अन्य मानते हैं कि उनका संबंध हिन्दू धर्म से था। इस प्रकार, साईं बाबा का असली नाम और उनका जन्म स्थान भी एक रहस्य बना हुआ है।

साईं बाबा को भगवान क्यों मानते हैं?

साईं बाबा को भगवान मानने का मुख्य कारण उनकी दिव्यता और उनकी शिक्षाओं की व्यापकता है। उन्होंने जीवन के हर पहलू में आदर्शता और समर्पण का उदाहरण प्रस्तुत किया। उनकी शिक्षाएं मानवता, प्रेम, और धार्मिक सहिष्णुता के सिद्धांतों पर आधारित थीं। भक्त उन्हें एक चमत्कारी शक्ति के रूप में मानते हैं जिन्होंने अनेक चमत्कार किए और लोगों की कठिनाइयों को दूर किया। साईं बाबा की भक्ति और उनके अनुयायियों का अटूट विश्वास उन्हें एक दिव्य शक्ति और भगवान के रूप में मानता है, जिन्होंने अपने जीवन के माध्यम से लोगों को सच्चे धर्म और प्रेम का संदेश दिया।

इस्लाम में साईं क्या है?

इस्लाम में ‘साईं’ शब्द का उपयोग आमतौर पर एक धार्मिक या आध्यात्मिक नेता के लिए किया जाता है। ‘साईं’ अरबी भाषा के शब्द ‘सईद’ से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ ‘खुशहाल’ या ‘धन्य’ होता है। इस्लाम में साईं बाबा का स्थान अलग है क्योंकि वे एक हिन्दू-मुस्लिम संत के रूप में प्रसिद्ध हैं। मुस्लिम समुदाय में साईं बाबा को एक सम्मानित धार्मिक व्यक्तित्व के रूप में माना जाता है, जिनकी शिक्षाएं और जीवन अन्य धर्मों के साथ समानता और सहिष्णुता का संदेश देती हैं। उनके अनुयायी उन्हें धार्मिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में मानते हैं।

साईं बाबा की पूजा कौन करता है?

साईं बाबा की पूजा विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग करते हैं। उनकी शिक्षाएं हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्मों में समान रूप से स्वीकार की जाती हैं, इसलिए उनके भक्तों की विविधता भी बहुत बड़ी है। साईं बाबा के अनुयायी उन्हें एक दिव्य शक्ति और मार्गदर्शक मानते हैं और उनकी पूजा विभिन्न तरीकों से की जाती है, जैसे कि आरती, भजन, और पूजा अर्चना। उनकी पूजा न केवल भारत में बल्कि विश्व भर में की जाती है, जहां लोग उनकी शिक्षाओं और चमत्कारों से प्रेरित होकर उन्हें श्रद्धा और भक्ति से पूजते हैं।

Hanuman Chalisa Telugu PDF Download- హనుమాన్ చాలీసా 2026

Explore the profound verses of the Hanuman Chalisa with our downloadable Chalisa PDF. The Hanuman Chalisa Telugu pdf, composed by Goswami Tulsidas, is a devotional hymn dedicated to Lord Hanuman.

It comprises 40 verses praising Hanuman’s strength, courage, and devotion to Lord Rama. Available in Telugu script, our PDF allows you to delve into the sacred text, seeking blessings and spiritual upliftment.

Download now to deepen your connection with this timeless prayer and experience the divine presence of Hanumanji.


|| Hanuman Chalisa PDF Telugu ||

॥ దోహా- ॥

శ్రీగురు చరన సరోజ రజ నిజ మను ముకుర సుధార ।
బరణౌం రఘువర విమల యశ జో దాయకు ఫలచార ॥

బుద్ధిహీన తను జానికే సుమిరౌం పవనకుమార ।
బల బుద్ధి విద్యా దేహు మోహిఁ హరహు కలేస వికార ॥

॥ చౌపాయీ- ॥

జయ హనుమాన జ్ఞాన గుణ సాగర ।
జయ కపీశ తిహుం లోక ఉజాగర ॥౧॥

రామ దూత అతులిత బల ధామా ।
అంజనిపుత్ర పవనసుత నామా ॥౨॥

మహావీర విక్రమ బజరంగీ ।
కుమతి నివార సుమతి కే సంగీ ॥౩॥

కంచన బరన విరాజ సువేసా ।
కానన కుండల కుంచిత కేశా ॥౪॥

హాథ వజ్ర ఔ ధ్వజా విరాజై ।
కాంధే మూంజ జనేఊ సాజై ॥౫॥

సంకర సువన కేసరీనందన ।
తేజ ప్రతాప మహా జగ వందన ॥౬॥

విద్యావాన గుణీ అతిచాతుర ।
రామ కాజ కరిబే కో ఆతుర ॥౭॥

ప్రభు చరిత్ర సునిబే కో రసియా ।
రామ లఖన సీతా మన బసియా ॥౮॥

సూక్ష్మ రూప ధరి సియహిఁ దిఖావా ।
వికట రూప ధరి లంక జరావా ॥౯॥

భీమ రూప ధరి అసుర సంహారే ।
రామచంద్ర కే కాజ సంవారే ॥౧౦॥

లాయ సజీవన లఖన జియాయే ।
శ్రీరఘువీర హరషి ఉర లాయే ॥౧౧॥

రఘుపతి కీన్హీ బహుత బడాయీ ।
తుమ మమ ప్రియ భరత సమ భాయీ ॥౧౨॥

సహస వదన తుమ్హరో యస గావైఁ ।
అస కహి శ్రీపతి కంఠ లగావైఁ ॥౧౩॥

సనకాదిక బ్రహ్మాది మునీశా ।
నారద శారద సహిత అహీశా ॥౧౪॥

యమ కుబేర దిక్పాల జహాం తే ।
కవి కోవిద కహి సకే కహాం తే ॥౧౫॥

తుమ ఉపకార సుగ్రీవహిం కీన్హా ।
రామ మిలాయ రాజ పద దీన్హా ॥౧౬॥

తుమ్హరో మంత్ర విభీషన మానా ।
లంకేశ్వర భయే సబ జగ జానా॥౧౭॥

యుగ సహస్ర యోజన పర భానూ ।
లీల్యో తాహి మధుర ఫల జానూ ॥౧౮॥

ప్రభు ముద్రికా మేలి ముఖ మాహీఁ ।
జలధి లాంఘి గయే అచరజ నాహీఁ ॥౧౯॥

దుర్గమ కాజ జగత కే జేతే ।
సుగమ అనుగ్రహ తుమ్హరే తేతే ॥౨౦॥

రామ దుఆరే తుమ రఖవారే ।
హోత న ఆజ్ఞా బిను పైసారే ॥౨౧॥

సబ సుఖ లహై తుమ్హారీ సరనా ।
తుమ రక్షక కాహూ కో డర నా ॥౨౨॥

ఆపన తేజ సంహారో ఆపై ।
తీనోఁ లోక హాంక తేఁ కాంపై ॥౨౩॥

భూత పిశాచ నికట నహిఁ ఆవై ।
మహావీర జబ నామ సునావై ॥౨౪॥

నాశై రోగ హరై సబ పీరా ।
జపత నిరంతర హనుమత వీరా ॥౨౫॥

సంకటసే హనుమాన ఛుడావై ।
మన క్రమ వచన ధ్యాన జో లావై ॥౨౬॥

సబ పర రామ తపస్వీ రాజా ।
తిన కే కాజ సకల తుమ సాజా ॥౨౭॥

ఔర మనోరథ జో కోయీ లావై ।
తాసు అమిత జీవన ఫల పావై ॥౨౮॥

చారోఁ యుగ ప్రతాప తుమ్హారా ।
హై ప్రసిద్ధ జగత ఉజియారా ॥౨౯॥

సాధు సంత కే తుమ రఖవారే ।
అసుర నికందన రామ దులారే ॥౩౦॥

అష్ట సిద్ధి నవ నిధి కే దాతా ।
అస బర దీన జానకీ మాతా ॥౩౧॥

రామ రసాయన తుమ్హరే పాసా ।
సదా రహో రఘుపతి కే దాసా ॥౩౨॥

తుమ్హరే భజన రామ కో పావై ।
జన్మ జన్మ కే దుఖ బిసరావై ॥౩౩॥

అంత కాల రఘుపతి పుర జాయీ ।
జహాఁ జన్మి హరిభక్త కహాయీ ॥౩౪॥

ఔర దేవతా చిత్త న ధరయీ ।
హనుమత సేయి సర్వ సుఖ కరయీ ॥౩౫॥

సంకట కటై మిటై సబ పీరా ।
జో సుమిరై హనుమత బలవీరా ॥౩౬॥

జై జై జై హనుమాన గోసాయీఁ ।
కృపా కరహు గురు దేవ కీ నాయీఁ ॥౩౭॥

యహ శత బార పాఠ కర కోయీ ।
ఛూటహి బంది మహా సుఖ హోయీ ॥౩౮॥

జో యహ పఢై హనుమాన చలీసా ।
హోయ సిద్ధి సాఖీ గౌరీసా ॥౩౯॥

తులసీదాస సదా హరి చేరా ।
కీజై నాథ హృదయ మహ డేరా ॥౪౦॥

॥ దోహా- ॥పవనతనయ సంకట హరణ ।
మంగల మూరతి రూప ॥
రామ లఖన సీతా సహిత ।
హృదయ బసహు సుర భూప ॥



హనుమాన్ చాలీసా పారాయణానికి ముందు మరియు పారాయణం చేస్తున్నప్పుడు కొన్ని సరళమైన కానీ ముఖ్యమైన విషయాలను పాటిస్తే, దాని ప్రయోజనాలు అనేక రెట్లు పెరుగుతాయి. ఇక్కడ కొన్ని ప్రత్యేక చిట్కాలు ఉన్నాయి:

  1. స్వచ్ఛత మరియు భక్తి: పారాయణం చేసే ముందు, మీ చేతులు మరియు ముఖం కడుక్కోండి, శుభ్రమైన బట్టలు ధరించండి మరియు వీలైతే, స్నానం చేయండి. హనుమంతుడి పట్ల లోతైన భక్తి మరియు ఏకాగ్రతను కొనసాగించండి. భక్తి లేకుండా, కేవలం జపించడం వల్ల పూర్తి ప్రయోజనాలు లభించవు.
  2. క్రమబద్ధత మరియు సమయం: పారాయణం చేయడానికి కీలకం క్రమబద్ధత. ప్రతిరోజూ ఒక నిర్దిష్ట సమయంలో, ప్రాధాన్యంగా బ్రహ్మముహూర్తంలో (ఉదయం 4-6 గంటలకు) లేదా సూర్యాస్తమయం సమయంలో పారాయణం చేయడం అత్యంత ఫలవంతమైనదిగా పరిగణించబడుతుంది. క్రమశిక్షణతో చదవండి.
  3. ఉచ్చారణ మరియు స్వరం: హిందీ/అవధి పదాలను సరిగ్గా మరియు స్పష్టంగా ఉచ్చరించడానికి ప్రయత్నించండి. తొందరపాటు కారణంగా తప్పు ఉచ్చారణను నివారించండి. ప్రతి ద్విపదను దాని అర్థాన్ని అర్థం చేసుకుని మరియు హనుమంతుడి చిత్రాన్ని దృష్టిలో ఉంచుకుని పఠించండి. స్వరం అత్యంత ముఖ్యమైనది.
  4. పవిత్ర స్థలం: మిమ్మల్ని ఎవరూ ఇబ్బంది పెట్టని ప్రశాంతమైన మరియు శుభ్రమైన మూలను ఎంచుకోండి. వీలైతే, హనుమంతుడి విగ్రహం లేదా చిత్రం ముందు కూర్చుని పారాయణం చేయండి. దీపం వెలిగించి ధూపం కర్రలు వేయడం వల్ల వాతావరణం శుద్ధి అవుతుంది.
  5. సంఖ్య మరియు సంకల్పం: ఒక జపమాల (108 సార్లు) లేదా కనీసం ఒక పూర్తి చాలీసా పఠించడం ఒక అలవాటుగా చేసుకోండి. పారాయణం ప్రారంభించే ముందు, “ఓ ప్రభూ, ఈ పారాయణం మీ భక్తి మరియు ఆశీర్వాదాల కోసమే” వంటి మీ సంకల్పాన్ని మానసికంగా తెలియజేయండి.
  6. పారాయణం తర్వాత: పారాయణం పూర్తయిన తర్వాత, కొద్దిసేపు నిశ్శబ్దంగా కూర్చుని, హనుమంతుడిని ధ్యానించి, మీ కోరికను మనస్సులో ఉంచుకోండి. తీపి పండు లేదా బూందీని ప్రసాదంగా అందించి, తరువాత తినండి.

గుర్తుంచుకోండి, క్రమశిక్షణ, విశ్వాసం మరియు భావోద్వేగం భక్తికి పునాది. శ్రీ హనుమంతుడు స్వచ్ఛమైన హృదయంతో సమర్పించిన భక్తికి త్వరగా సంతోషిస్తాడు మరియు అన్ని ఇబ్బందుల నుండి మనల్ని రక్షిస్తాడు.

జై శ్రీ రామ్! జై హనుమాన్, అన్ని కష్టాలను తొలగించేవాడు!


శ్రీ గురు మహారాజ్ యొక్క కమల పాద ధూళితో,
నా మనస్సు అనే దర్పణాన్ని శుద్ధి చేస్తూ,
ధర్మం, అర్థ, కామ మరియు మోక్షం అనే నాలుగు ఫలాలను ప్రసాదించే శ్రీ రఘువీర్ యొక్క స్వచ్ఛమైన మహిమను నేను వర్ణిస్తాను.

నా శరీరం జ్ఞానం లేనిదని తెలుసుకుని, గాలి కుమారుడా, నిన్ను ప్రార్థిస్తున్నాను.
నాకు బలం, తెలివి మరియు జ్ఞానాన్ని ప్రసాదించు, మరియు నా కష్టాలు మరియు దుర్గుణాలను తొలగించు.

అర్థం – ఓ గాలి కుమారుడా! నేను నిన్ను ప్రార్థిస్తున్నాను.
నా శరీరం మరియు మనస్సు బలహీనంగా ఉన్నాయని నీకు తెలుసు.

నాకు శారీరక బలం, తెలివి మరియు జ్ఞానాన్ని ప్రసాదించు,
మరియు నా దుఃఖాలు మరియు దోషాలను నాశనం చేయు.

జై హనుమాన్, జ్ఞానం మరియు సద్గుణాల సముద్రం, జై కపిస్, మూడు లోకాలను ప్రకాశింపజేసేవాడు.

అర్థం – శ్రీ హనుమాన్! నీకు విజయం.

నీ జ్ఞానం మరియు ధర్మాలు అనంతమైనవి.

ఓ కపీశ్వరా! నీకు విజయం!

నీ కీర్తి మూడు లోకాలలోనూ వ్యాపించింది: స్వర్గం, భూమి మరియు పాతాళం.

రామ దూత, సాటిలేని బలం కలిగినవాడు, అంజని కుమారుడు, వాయు పుత్రుడు.
2
అర్థం – ఓ వాయు పుత్రుడా, అంజని పుత్రుడా! నీ అంత బలవంతుడు ఎవడూ లేడు.

మహావీర్ విక్రమ్ బజరంగీ, చెడు ఆలోచనలను తొలగించేవాడు మరియు మంచి ఆలోచనలకు సహచరుడు.
3
అర్థం – ఓ మహావీర్ బజరంగబలి! నీవు అసాధారణమైన పరాక్రమవంతుడివి.

నీవు చెడు ఆలోచనలను తొలగిస్తావు మరియు మంచి ఆలోచనలు ఉన్నవారికి సహచరుడు మరియు సహాయకుడు.

నీకు బంగారు రంగు, అందమైన బట్టలు, చెవులలో చెవిపోగులు మరియు గిరజాల జుట్టు ఉన్నాయి.

నీవు నీ చేతిలో పిడుగు మరియు జెండాను పట్టుకున్నావు మరియు ముంజ్ పవిత్ర దారం నీ భుజాన్ని అలంకరించింది.
5
అర్థం – నీవు నీ చేతిలో పిడుగు మరియు జెండాను పట్టుకున్నావు,
మరియు నీ భుజాన్ని ముంజ్ అనే పవిత్ర దారంతో అలంకరించావు.

శంకరుని కుమారుడు, కేసరి పుత్రుడు, నీ తేజస్సు మరియు కీర్తి ప్రపంచం ద్వారా ఎంతో గౌరవించబడుతున్నాయి.
6.
అర్థం – శంకరుని అవతారం! ఓ కేసరి పుత్రుడా, నీ పరాక్రమం
మరియు గొప్ప కీర్తి ప్రపంచమంతటా ప్రశంసించబడుతుంది.

నిజంగా జ్ఞానవంతుడు, సద్గుణవంతుడు, మరియు అత్యంత తెలివైనవాడు, శ్రీరాముని కార్యాన్ని నెరవేర్చడానికి ఆత్రుతగా ఉన్నాడు.
7.

అర్థం – నీవు అపారమైన జ్ఞాన భాండాగారం, సద్గుణవంతుడు మరియు అత్యంత సమర్థవంతమైనవాడు,
నువ్వు ఎల్లప్పుడూ రాముని కార్యాన్ని నెరవేర్చడానికి ఆత్రంగా ఉంటావు.

నీవు భగవంతుని కథలను వినడానికి ఇష్టపడతావు, రాముడు, లక్ష్మణుడు మరియు సీత నీ హృదయంలో నివసిస్తావు.
8.

అర్థం – నీవు శ్రీరాముని కథలను వినడంలో ఆనందిస్తావు.

శ్రీరాముడు, సీత, లక్ష్మణుడు నీ హృదయంలో నివసిస్తావు.

సూక్ష్మ రూపాన్ని ధరించి, సీతకు నిన్ను నువ్వు చూపించుకున్నావు, మరియు ఉగ్ర రూపాన్ని ధరించి, లంకను తగలబెట్టావు.
9.
అర్థం – నీవు చాలా చిన్న రూపాన్ని ధరించి సీతకు చూపించావు,
మరియు, భయంకరమైన రూపాన్ని ధరించి, లంకను తగలబెట్టావు.

భీముని రూపాన్ని ధరించి, రాక్షసులను చంపి, రాముని కార్యాలను నెరవేర్చావు.
10.

అర్థం – నీవు భయంకరమైన రూపాన్ని ధరించి రాక్షసులను సంహరించావు
మరియు శ్రీరాముని లక్ష్యాలను సాధించావు.

నీవు సంజీవని మూలికను తెచ్చి లక్ష్మణుడిని బ్రతికించావు, మరియు రఘువీరుడు సంతోషించి నిన్ను ఆలింగనం చేసుకున్నాడు.
11.
అర్థం – నీవు సంజీవని మూలికను తెచ్చి లక్ష్మణుడిని బ్రతికించావు,

ఇది రఘువీరుడు ఆనందించి నిన్ను ఆలింగనం చేసుకున్నాడు.

రఘుపతి నిన్ను ఎంతో స్తుతించాడు, “నువ్వు భరతుడిలాగే నా ప్రియమైన సోదరుడువి” అని అన్నాడు.
12.
అర్థం – రాముడు నిన్ను ఎంతో స్తుతించాడు, “నువ్వు భరతుడిలాగే నా ప్రియమైన సోదరుడు” అని అన్నాడు.

వేలాది మంది నిన్ను స్తుతించారు. ఇలా చెబుతూ, రాముడు నిన్ను ఆలింగనం చేసుకున్నాడు.
13.
అర్థం – శ్రీరాముడు నిన్ను ఆలింగనం చేసుకున్నాడు, ఇలా అన్నాడు,

నీ కీర్తి వెయ్యి నోటితో స్తుతించదగినది.

సనక, శ్రీ సనాతన, శ్రీ సనందన, శ్రీ సనత్కుమార, బ్రహ్మ, నారద, సరస్వతి, శేషనాగ్ వంటి దేవతలు అందరూ నిన్ను స్తుతించారు.

యమ, కుబేరుడు, అన్ని దిశల సంరక్షకులు, కవులు, పండితులు, పండితులు లేదా మరెవరైనా మీ కీర్తిని పూర్తిగా వర్ణించలేరు.

శ్రీరాముడికి పరిచయం చేయడం ద్వారా మీరు సుగ్రీవునికి ఒక ఉపకారం చేసారు, దాని కారణంగా అతను రాజు అయ్యాడు.

విభీషణుడు మీ సలహాను పాటించి, అందరికీ తెలిసిన లంక రాజు అయ్యాడు.

అర్థం – విభీషణుడు మీ సలహాను పాటించి, అతన్ని లంక రాజుగా చేసాడు.

వెయ్యి యుగాలు పట్టేంత దూరంలో ఉన్న సూర్యుడు అందరికీ తెలిసినవాడు.

అర్థం – వెయ్యి యుగాలు పట్టేంత దూరంలో ఉన్న సూర్యుడు,

మీరు రెండు వేల యోజనాల దూరంలో ఉన్న సూర్యుడిని తీపి పండు అని భావించి మింగేశారు.

మీ నోటిలో ప్రభువు ఉంగరాన్ని పెట్టుకుని, మీరు సముద్రాన్ని దాటారు, ఇందులో ఆశ్చర్యం లేదు.

ఇందులో ఆశ్చర్యం లేదు.

ప్రపంచంలోని అన్ని కష్టమైన పనులు నీ కృప వల్ల సులభతరం అవుతాయి.
20.

అర్థం – ప్రపంచంలో ఎంత కష్టమైన పనులు ఉన్నా,
నీ కృప వల్ల అవి సులువు అవుతాయి.

రాముడి ద్వారానికి నువ్వే సంరక్షకుడివి; నీ అనుమతి లేకుండా ఎవరూ లోపలికి రాకూడదు.
21.

అర్థం – శ్రీ రామచంద్రుడి ద్వారానికి నువ్వే సంరక్షకుడివి,

నీ అనుమతి లేకుండా ఎవరూ ప్రవేశించడానికి అనుమతించబడరు.

నీ ఆనందం లేకుండా, రాముడి కృప అరుదు.

నీ ఆశ్రయంలో అన్ని ఆనందాలు కనిపిస్తాయి; నువ్వే రక్షకుడివి; ఎవరైనా నీకు ఎందుకు భయపడాలి?
22.

అర్థం – నీ ఆశ్రయం కోరుకునే వారందరూ ఆనందాన్ని పొందుతారు,
మరియు నీవు రక్షకుడివి అయినప్పుడు, ఎవరూ భయపడరు.

నీవే నీ స్వంత తేజస్సు; నీ గర్జనకు మూడు లోకాలు వణుకుతాయి.
23.

అర్థం – నీ వేగాన్ని నువ్వు తప్ప మరెవరూ ఆపలేరు;
నీ గర్జనకు మూడు లోకాలు వణుకుతాయి.

మహావీర్ నామం ఉచ్ఛరించినప్పుడు దయ్యాలు మరియు రాక్షసులు దగ్గరకు రావు.
24.

అర్థం – మహావీర్ హనుమంతుడి నామం ఉచ్ఛరించిన చోట, దెయ్యాలు మరియు రాక్షసులు కూడా దగ్గరకు రాలేరు.

హనుమంతుని నామాన్ని నిరంతరం జపించడం ద్వారా వ్యాధులు నయమవుతాయి మరియు అన్ని బాధలు తొలగిపోతాయి. 25.
అర్థం – ధైర్యవంతుడైన హనుమంతుడు! నిరంతరం నీ నామాన్ని జపించడం ద్వారా,
అన్ని వ్యాధులు నయమవుతాయి మరియు అన్ని బాధలు తొలగిపోతాయి.

హనుమంతుడు తన మనస్సు, చర్యలు, మాటలపై దృష్టి కేంద్రీకరించే వ్యక్తిని ఇబ్బందుల నుండి విముక్తి చేస్తాడు. 26.
అర్థం – ఓ హనుమాన్! ఆలోచించడం, చేయడం మరియు మాట్లాడటంలో,
నీపై దృష్టిని ఉంచే వారిని అన్ని ఇబ్బందుల నుండి నీవు విముక్తి చేస్తావు.

రాముడు అన్నింటికంటే సన్యాసి రాజు, నీవు అతని అన్ని పనులను సాధించావు. 27.
అర్థం – సన్యాసి రాజు శ్రీ రామచంద్ర జీ ఉత్తముడు,
నీవు అతని అన్ని పనులను సులభంగా సాధించావు.

రాముడు అన్నింటికంటే సన్యాసి రాజు, నీవు అతని అన్ని పనులను సులభంగా సాధించావు. 27.
అర్థం – సన్యాసి రాజు శ్రీ రామచంద్ర జీ ఉత్తముడు,
నీవు అతని అన్ని పనులను సులభంగా సాధించావు.

ఎవరైతే కోరిక కోరుకుంటారో, వారు జీవితంలో అనంతమైన ప్రతిఫలాలను పొందుతారు. 28.

అర్థం – మీచే ఆశీర్వదించబడిన వారు, వారు ఏమి కోరుకున్నా,
జీవితంలో అపరిమితమైన ప్రతిఫలాన్ని పొందుతారు.

మీ కీర్తి నాలుగు యుగాలలో ప్రసిద్ధి చెందింది మరియు ప్రపంచ కాంతి ప్రసిద్ధి చెందింది. 29.
అర్థం – మీ కీర్తి నాలుగు యుగాలలో – సత్యయుగం, త్రేతాయుగం, ద్వాపరయుగం మరియు కలియుగం అంతటా వ్యాపించింది.

మీ కీర్తి ప్రపంచంలోని ప్రతిచోటా ప్రకాశిస్తుంది.

మీరు సాధువులు మరియు ఋషుల రక్షకుడని, మరియు రాక్షసులను నాశనం చేసే శ్రీరామునికి ప్రియమైనవారని. 30.
అర్థం – ఓ శ్రీరాముని ప్రియుడా! మీరు మంచివారిని రక్షించి దుష్టులను నాశనం చేస్తారు.

మీరు ఎనిమిది సిద్ధులు మరియు తొమ్మిది నిధిలను ఇచ్చేవారని, అటువంటి వరం జానకి తల్లి మీకు ఇచ్చింది. 31.
అర్థం – మీరు తల్లి జానకి నుండి ఒక వరం పొందారు,
ఇది మీరు ఎవరికైనా ఎనిమిది సిద్ధులు మరియు తొమ్మిది నిధిలను ప్రసాదించేలా చేస్తుంది.

అణిమ – దీని ద్వారా సాధకుడు ఎవరికీ కనిపించకుండా ఉంటాడు మరియు అత్యంత కఠినమైన వస్తువులలోకి కూడా చొచ్చుకుపోగలడు.

మహిమ – దీని ద్వారా యోగి తనను తాను చాలా పెద్దవాడిగా చేసుకుంటాడు.

గరిమ – దీని ద్వారా సాధకుడు తనను తాను కోరుకున్నంత బరువుగా మార్చుకోగలడు.

లఘిమ – దీని ద్వారా ఒకరు కోరుకున్నంత తేలికగా మారగలడు.

ప్రాప్తి – దీని ద్వారా ఒకరు కోరుకున్న వస్తువును పొందగలడు.

ప్రకామ్య – దీని ద్వారా ఒకరు భూమిలోకి ప్రవేశించవచ్చు లేదా ఇష్టానుసారంగా ఆకాశంలో ఎగరవచ్చు.

ఇషిత్వా – దీని ద్వారా ఒకరు అందరినీ పాలించే శక్తిని పొందుతారు.

వశిత్వా – దీని ద్వారా ఒకరు ఇతరులను నియంత్రించగలరు.

రామ రసాయన తుమ్హ్రే పాస, సదా రహో రఘుపతి కే దాస.
32

అర్థం – మీరు నిరంతరం భగవంతుడు రఘునాథుని ఆశ్రయంలో ఉంటారు,
అందుకే వృద్ధాప్యాన్ని మరియు నయం చేయలేని వ్యాధులను నాశనం చేయడానికి మీకు రామ నామం అనే ఔషధం ఉంది.

నిన్ను పూజించడం ద్వారా, ఒకరు రాముడిని పొందుతారు మరియు అనేక జన్మల దుఃఖాలు మరచిపోతాయి. 33.
అర్థం – నిన్ను పూజించడం ద్వారా, ఒక వ్యక్తి శ్రీరాముడిని పొందుతాడు మరియు అనేక జన్మల బాధలు తొలగిపోతాయి.

జీవిత చివరలో, ఒకరు రఘునాథుని నివాసానికి వెళతారు, అక్కడ ఒకరు హరి భక్తుడిగా జన్మిస్తారు. 34.
అర్థం – జీవిత చివరలో, ఒకరు రఘునాథుని నివాసానికి వెళతారు.
మరియు ఒకరు మళ్ళీ జన్మిస్తే, అతను భక్తిని ఆచరిస్తాడు మరియు రాముని భక్తుడు అని పిలువబడతాడు.

ఇతర దేవుళ్లను పరిగణించవద్దు; హనుమంతుడు మాత్రమే అన్ని ఆనందాలను ఇస్తాడు. 35.
అర్థం – ఓ హనుమాన్! నిన్ను సేవించడం ద్వారా, ఒక వ్యక్తి అన్ని రకాల ఆనందాలను పొందుతాడు;
అప్పుడు వేరే ఏ దేవత అవసరం లేదు.

బలవంతుడైన హనుమంతుడిని స్మరించడం ద్వారా అన్ని కష్టాలు మరియు బాధలు తొలగిపోతాయి. 36.
అర్థం – ఓ ధైర్యవంతుడైన హనుమాన్! నిరంతరం నిన్ను స్మరించేవాడు,
అతని అన్ని కష్టాలు తొలగిపోతాయి మరియు అతని అన్ని బాధలు తొలగిపోతాయి.

జై జై జై హనుమాన్ గోసైన్, దయచేసి నన్ను గురుదేవుడిలా దీవించండి. 37.
అర్థం – ఓ హనుమాన్! నీకు విజయం, నీకు విజయం, నీకు విజయం! దయగల శ్రీ గురు జీ లాగా నాపై మీ ఆశీస్సులు కురిపించండి.

ఈ హనుమాన్ చాలీసాను వందసార్లు పఠించేవాడు,
అన్ని బంధనాల నుండి విముక్తి పొంది అత్యున్నత ఆనందాన్ని పొందుతాడు.

ఈ హనుమాన్ చాలీసాను వందసార్లు పఠించేవాడు,
విజయాన్ని పొందుతాడు, దేవత గౌరీ సాఖి. 39.

అర్థం – శంకర్ ఈ హనుమాన్ చాలీసాను వ్రాసాడు, అందుకే అతను సాక్షి,
దీనిని పఠించేవాడు ఖచ్చితంగా విజయం సాధిస్తాడు.

తులసీదాస్ ఎల్లప్పుడూ హరి సేవకుడు, దయచేసి అతని హృదయంలో నివసించు. 40.

అర్థం – ఓ హనుమాన్! తులసీదాస్ ఎల్లప్పుడూ శ్రీరాముని సేవకుడు.

కాబట్టి, దయచేసి అతని హృదయంలో నివసించు.

వాయు పుత్రుడు, కష్టాలను తొలగించువాడు, శుభ రూపం. ఓ దేవతల ప్రభువా, శ్రీరాముడు, లక్ష్మణుడు మరియు సీతతో పాటు నా హృదయంలో నివసించు.

అర్థం: ఓ గాలి పుత్రుడు, కష్టాలను రక్షించేవాడు! నీవు ఆనందం మరియు శుభానికి స్వరూపుడివి.

ఓ దేవతల రాజా! శ్రీరాముడు, సీత, లక్ష్మణులతో పాటు నా హృదయంలో నివసించు.

कबीर अमृतवाणी – Kabir Amritwani PDF 2026

कबीर अमृतवाणी (Kabir Amritwani PDF) एक अद्वितीय और महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है जो संत कबीर के विचारों, उपदेशों और जीवन दर्शन का संग्रह है। कबीर, 15वीं सदी के महान संत और समाज सुधारक, अपने दोहों और साखियों के माध्यम से समाज में व्याप्त अंधविश्वासों, कुरीतियों और जातिवाद के खिलाफ आवाज उठाते थे। उनकी वाणी में सरलता, सच्चाई और जनसामान्य की समस्याओं का समाधान मिलता है।

कबीर अमृतवाणी के माध्यम से पाठक कबीर के गहरे विचारों को समझ सकते हैं और उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं से प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं। यह ग्रंथ उन सभी के लिए अमूल्य धरोहर है जो मानवता, प्रेम, और समरसता के मार्ग पर चलना चाहते हैं। संत कबीर के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके समय में थे, और कबीर अमृतवाणी हमें उनके मार्गदर्शन का सजीव प्रमाण प्रदान करती है।
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kabir amritwani lyrics in hindi

सद्गुरु के परताप तैं मिटि गया सब दुःख दर्द।
कह कबीर दुविधा मिटी, गुरु मिलिया रामानंद ॥

गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय |
बलिहारी गुरू अपने गोविन्द दियो बताय ||

ऐसी वाणी बोलिए, मुन का आपा खोए |
अपना तन शीतल करे, औरां को सुख होए ||

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर |
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर ||

निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, |
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय ||

दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय |
जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय ||

माटी कहै कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय।
इक दिन ऐसो होयगो, मैं रौंदूंगी तोय ॥

कस्तूरी कुंडली बसै, मृग ढूंढे बन मांहि
ऐसे घटि घटि राम हैं, दुनिया देखै नांहि ॥

बहुत दिनन की जोवती, बाट तुम्हारी राम।
जिव तरसै तुझ मिलन कूँ, मनि नाहीं विश्राम

जहाँ दया तहँ धर्म है, जहाँ लोभ तहँ पाप।
जहाँ क्रोध तहँ काल है, जहाँ छिमा तहँ आप

काल करै सो आज कर, आज करै सो अब्ब।
पल में परलै होयगा, बहुरि करैगा कब्ब ||

दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे होय ॥

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान ।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान ॥


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kabir amritwani pdf 2026

कबीर अमृतवाणी, संत कबीर के गहन और प्रेरणादायक उपदेशों का संग्रह है, जो मानव जीवन को सही दिशा देने और आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करने में सहायक है। संत कबीर के दोहे और भजनों में छिपा ज्ञान न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से बल्कि व्यावहारिक जीवन में भी अत्यंत उपयोगी है।

कबीर अमृतवाणी PDF एक ऐसा माध्यम है जो उनके उपदेशों को सरलता से समझने और अपने जीवन में अपनाने में मदद करता है। यह PDF खासतौर पर उन लोगों के लिए उपयोगी है जो आध्यात्मिक अध्ययन के प्रति रुचि रखते हैं। इसमें कबीर के अमूल्य विचार, भजनों की व्याख्या और उनके गूढ़ संदेशों को विस्तार से समझाया गया है।

कबीर अमृतवाणी पढ़ने से आपको आत्मा की शुद्धता, सत्य और ईश्वर के प्रति प्रेम का अनुभव होगा। इसके माध्यम से आप “मन के मैल” को साफ कर अपने जीवन में शांति और स्थिरता ला सकते हैं।

इस PDF को आप आसानी से डाउनलोड कर सकते हैं और नियमित रूप से इसका अध्ययन कर सकते हैं। यह खासतौर पर उन भक्तों के लिए उपयुक्त है जो संत कबीर के जीवन-दर्शन को गहराई से समझना चाहते हैं।


कबीर के अमृत से सिंचित मन की बात…

“कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर।
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।”

इन पंक्तियों से कौन परिचित नहीं? कबीर दास… एक नाम जो सदियों से भारतीय चेतना में अमृत की तरह बहता आ रहा है। उनकी ‘अमृतवानी’ – उनके दोहे, साखियाँ, पद और शब्द – सिर्फ काव्य नहीं, जीवन जीने का सूत्र हैं। पर क्या आप जानते हैं कि इस अथाह सागर के भीतर कितने अनदेखे मोती छिपे हैं? कबीर के बारे में जो कुछ हम जानते हैं, उसकी तुलना में जो हम नहीं जानते, वह शायद कहीं ज्यादा रोचक और चौंकाने वाला है। आइए, आज डूबते हैं कबीर अमृतवानी के उन्हीं गहरे, कम चर्चित, पर अद्भुत पहलुओं में।

1. “कबीर” क्या सिर्फ एक नाम था? शायद एक खिताब था!

  • हम सब जानते हैं कि उनका जन्म एक विधवा ब्राह्मणी के घर हुआ और लहरतारा तालाब के किनारे नीरु और नीमा नामक जुलाहे दंपत्ति ने उन्हें पाला। पर क्या आप जानते हैं कि ‘कबीर’ शब्द की उत्पत्ति के बारे में एक दिलचस्प सिद्धांत है?
  • अरबी मूल का रहस्य: कुछ विद्वान मानते हैं कि ‘कबीर’ अरबी शब्द ‘अल-कबीर’ (अल्लाह का एक नाम, जिसका अर्थ है ‘महान’ या ‘विशाल’) से लिया गया है। यह इस्लामी सूफी परंपरा में भी प्रचलित है। क्या यह संभव है कि कबीर के गुरु रामानंद ने या किसी सूफी संत ने उन्हें उनकी विलक्षणता के कारण यह उपाधि दी हो? क्या ‘कबीर’ उनका जन्म का नाम नहीं, बल्कि एक सम्मानसूचक खिताब था जो उनकी पहचान बन गया? यह विचार उनकी व्यापक, सर्वसमावेशक आध्यात्मिक दृष्टि को और भी सार्थक बनाता है।

2. रचनाओं का विशाल भंडार: क्या सब कुछ सचमुच उनका है?

  • कबीर ग्रंथावली में हजारों पद, साखियाँ और शब्द हैं। परंतु, यहां एक बड़ा प्रश्न उठता है:
  • सामूहिक चेतना का प्रवाह: कबीर की परंपरा में ‘कबीर पंथ’ का गहरा योगदान रहा है। यह माना जाता है कि कबीर के बाद, उनके प्रमुख शिष्यों (जैसे धर्मदास) और पंथ के अन्य विचारवंत संतों ने भी कबीर की शैली और विचारधारा में रचनाएँ कीं। इन्हें बाद में ‘कबीर वाणी’ में ही शामिल कर लिया गया। क्या हम जो ‘कबीर अमृतवानी’ पढ़ते हैं, वह पूर्णतः एक व्यक्ति की रचना है, या एक पूरी आध्यात्मिक परंपरा का सामूहिक प्रस्फुटन है? यह जानना मुश्किल है, पर यह तथ्य कबीर के विचारों की व्यापकता और उनके प्रभाव की गहराई को दर्शाता है।

3. लिखित नहीं, मौखिक था मूल खजाना: शिष्यों की याददाश्त का चमत्कार!

  • यह बात अक्सर अनकही रह जाती है:
  • अनपढ़ कबीर, लिखित ग्रंथ कैसे? कबीर स्वयं पढ़े-लिखे नहीं थे। उनकी सारी वाणी मौखिक थी – सत्संग में बोली गई, गाई गई। उनके शिष्यों ने इन बातों को कंठस्थ किया, याद रखा और फिर आगे प्रचारित किया। उनकी अमर वाणी का संरक्षण और प्रसार पूरी तरह उनके शिष्यों की स्मरण शक्ति और भक्ति पर निर्भर था! यह अपने आप में एक आश्चर्यजनक तथ्य है। लिखित रूप तो बहुत बाद में, उनके निधन के कई दशकों बाद आया।

4. “बीजक”: कबीर पंथ का ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ – पर अलग!

  • कबीर की रचनाओं का सबसे प्रामाणिक और पुराना संकलन ‘बीजक’ है। पर यह क्या है?
  • धर्मदास की भूमिका: ‘बीजक’ को संकलित करने का श्रेय मुख्यतः कबीर के शिष्य धर्मदास को जाता है। यह कबीर पंथ के लिए वही मौलिक ग्रंथ है जो सिखों के लिए गुरु ग्रंथ साहिब है।
  • विवादित स्वरूप: दिलचस्प बात यह है कि ‘बीजक’ के कई संस्करण हैं और इनमें काफी भिन्नता है। कौन सा संस्करण सबसे प्रामाणिक है, यह विद्वानों में विवाद का विषय रहा है। यह विविधता भी कबीर वाणी के मौखिक और बाद में लिखित होने की प्रक्रिया को दर्शाती है।
  • सिख परंपरा का अलग संकलन: गुरु ग्रंथ साहिब में कबीर के 500 से अधिक पद शामिल हैं। यह संकलन ‘बीजक’ से काफी अलग है और कबीर पंथ के लोग अक्सर ‘बीजक’ को ही प्रामाणिक मानते हैं। यह दोहरा संकलन कबीर की सार्वभौमिक स्वीकृति का प्रमाण है।

5. “राम” कबीर के यहाँ कौन? भक्ति का अनोखा ताना-बाना!

  • कबीर अक्सर ‘राम’ का जाप करते दिखाई देते हैं। पर क्या यह भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम हैं?
  • निर्गुण का नाम: कबीर के ‘राम’ सगुण (मूर्त रूप वाले) नहीं हैं। उनके लिए ‘राम’ एक सांकेतिक नाम है निराकार, निर्गुण परमब्रह्म के लिए। वे कहते हैं – “राम रमैया राम है, नाम बड़ा अधार।” यहाँ राम का अर्थ है वह परम तत्व जो सर्वत्र व्याप्त है।
  • सूफी प्रभाव का स्पर्श: कुछ विद्वान मानते हैं कि ‘राम’ शब्द का यह निर्गुण प्रयोग इस्लामी सूफी परंपरा के ‘इश्क’ (प्रेम) और ‘हक़’ (सत्य) की अवधारणा से प्रभावित हो सकता है। कबीर ने भक्ति की भाषा को एक अद्वितीय सार्वभौमिक आयाम दिया।

6. क्रांतिकारी नारीवादी? जाति के साथ लिंगभेद पर भी प्रहार!

  • कबीर को जाति व्यवस्था के कट्टर आलोचक के रूप में जाना जाता है। पर उनकी नजर में नारी की स्थिति क्या थी?
  • स्त्री को ‘नारी’ नहीं, ‘शक्ति’ की दृष्टि: कबीर ने स्त्री को केवल भोग्या या माया के रूप में देखने वाली सामाजिक मानसिकता को ध्वस्त किया। उन्होंने स्त्री को भी उसी आत्मा का रूप बताया जो पुरुष में है:
    • “स्त्री पुरुष एक ही जानि, दोनों एक ही रूप।”
    • “नारी तो हम भी जानिये, पीव की प्यारी जान।” (यहाँ ‘पीव’ प्रभु/परमात्मा है)।
  • पर्दा प्रथा पर तीखा व्यंग्य: उन्होंने सती प्रथा, बाल विवाह और पर्दा प्रथा जैसी कुरीतियों पर भी करारी चोट की:
    • “घूंघट में मुंह छिपावै, क्या चेरी क्या रान?
      जब आई दुनिया में, भेष नारी की जान।” (घूंघट में मुंह छिपाना क्या चेरी और क्या रानी का काम? जब दुनिया में आई, तो नारी का भेष ही जाना गया – मतलब, नारी होना ही उसकी पहचान है, छिपाने की क्या बात?)

7. विज्ञान के आश्चर्यजनक सूत्र? आधुनिक भौतिकी से मिलते-जुलते विचार!

  • कबीर की वाणी में कई ऐसी बातें हैं जो आधुनिक वैज्ञानिक खोजों से अद्भुत समानता रखती हैं:
  • सापेक्षता का संकेत? “काल करै सो आज हो, आज करै सो अब।” (कल जो करना है वह आज करो, आज जो करना है वह अभी करो) – यह समय की सापेक्षता और वर्तमान क्षण के महत्व को दर्शाता है, जो आधुनिक भौतिकी की एक मूलभूत अवधारणा है।
  • ऊर्जा संरक्षण का आभास? “जल में कुंभ, कुंभ में जल है, बाहर भीतर पानी। फूटा कुंभ जल जलहिं समाना, यह तथ कथौ गियानी।” (जल में घड़ा और घड़े में जल है, बाहर भीतर पानी। घड़ा फूटा तो जल जल में मिल गया, यही तत्वज्ञानी जानते हैं।) यह आत्मा (जल) और शरीर (घड़ा) के संबंध को दर्शाने के साथ ही ऊर्जा के संरक्षण और विश्व की एकात्मकता का भी बोध कराता है – कुछ-कुछ E=mc² की भावना।
  • क्वांटम अनिश्चितता का संकेत? उनकी पूरी दृष्टि ही निश्चितता के बजाय प्रश्न करने, संदेह करने और अनुभव पर जोर देने की है, जो वैज्ञानिक पद्धति का आधार है।

8. संगीत से परे: वो राग जो खो गए या बदल गए?

  • कबीर के पद विभिन्न रागों में गाए जाते हैं। पर एक रोचक बात:
  • मूल धुनों का रहस्य: यह माना जाता है कि कबीर ने अपने पदों को गाने के लिए कुछ विशिष्ट, शायद स्थानीय या स्वतः स्फूर्त धुनों (रागों या रागिनियों) का प्रयोग किया होगा। समय के साथ, जैसे-जैसे उनके पद शास्त्रीय संगीत की मुख्यधारा में शामिल हुए, उन्हें मौजूदा रागों (जैसे भैरवी, यमन, बिलावल, सोरठ) में ढाला गया। कबीर की मूल संगीतात्मक अभिव्यक्ति क्या थी? क्या कुछ ऐसे ‘कबीरी राग’ थे जो अब विलुप्त हो गए या बदल गए? यह संगीत इतिहास का एक अनसुलझा प्रश्न बना हुआ है।

9. कबीर की मृत्यु: एक नहीं, अनेक किंवदंतियाँ!

  • कबीर के जीवन की तरह उनकी मृत्यु भी रहस्यों से घिरी है और उस पर अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं:
  • मगहर का विवाद: सबसे प्रसिद्ध कथा है कि उन्होंने अपनी मृत्यु मगहर में होने की इच्छा जताई, क्योंकि उस समय यह मान्यता थी कि मगहर में मरने वाला नरक जाता है, जबकि काशी में मरने वाला स्वर्ग। कबीर ने इस अंधविश्वास को तोड़ने के लिए ऐसा किया।
  • फूलों का चमत्कार: कहा जाता है कि उनकी मृत्यु के बाद हिंदू और मुसलमान अनुयायियों के बीच उनके शरीर के अंतिम संस्कार को लेकर विवाद हुआ। जब चादर हटाई गई तो वहाँ सिर्फ फूल मिले! हिंदुओं ने उन फूलों का दाह संस्कार किया और मुसलमानों ने उन्हें दफनाया। इस प्रकार मगहर में कबीर की समाधि और मज़ार दोनों बनाए गए। यह कथा उनकी सर्वसमावेशकता और दोनों समुदायों में उनकी समान स्वीकृति का प्रतीक है।
  • क्या वास्तव में ऐसा हुआ? ऐतिहासिक प्रमाणों की कमी है। ये कथाएँ कबीर की पौराणिक छवि और उनके द्वारा किए गए सामाजिक विद्रोह को दर्शाती हैं।

10. कबीर का सच्चा जन्मस्थान: काशी या अन्यत्र?

  • काशी (वाराणसी) को कबीर का जन्मस्थान माना जाता है। पर कुछ शोधकर्ता इस पर भी सवाल उठाते हैं:
  • वैकल्पिक सिद्धांत: कुछ इतिहासकारों और पंथियों का मानना है कि उनका जन्म स्थान वाराणसी नहीं, बल्कि आधुनिक उत्तर प्रदेश के कुछ अन्य स्थान (जैसे बेलहरापट्टी, जिला सुल्तानपुर) या यहाँ तक कि दक्षिण भारत का कोई स्थान भी हो सकता है। इन दावों के पीछे स्थानीय मौखिक परंपराएँ और कुछ ऐतिहासिक संदर्भ हैं।
  • असली स्थान क्या मायने रखता है? तथ्य यह है कि कबीर ने स्वयं कभी अपने जन्मस्थान को महत्व नहीं दिया। उनके लिए तो पूरा ब्रह्मांड ही उनका घर था। यह बहस उनकी विरासत की व्यापकता को ही दर्शाती है।

11. कबीर अमृतवानी की असली शक्ति: सामान्य जन की भाषा में असाधारण बात!

  • कबीर की सबसे बड़ी विशेषता, जो अक्सर उनकी रहस्यमयता में छिप जाती है:
  • लोकभाषा का जादू: कबीर ने संस्कृत या फारसी की जटिलता का सहारा नहीं लिया। उन्होंने आम जनता की बोलचाल की भाषा – सधुक्कड़ी (हिंदी, अवधी, ब्रज, राजस्थानी और फारसी/अरबी शब्दों का मिश्रण) में अपनी बात कही। उनकी भाषा कठोर, सीधी, व्यंग्यपूर्ण और अत्यंत प्रभावशाली थी।
  • किस्सों और मुहावरों का प्रयोग: उन्होंने दैनिक जीवन के उदाहरणों (जुलाहे का करघा, बाजार, बर्तन), लोककथाओं और मुहावरों का खूब प्रयोग किया। इससे उनकी गहन आध्यात्मिक बातें एकदम स्पष्ट और हृदयंगम हो गईं। यही कारण है कि आज भी, सैकड़ों साल बाद, एक सामान्य किसान या मजदूर भी कबीर के दोहे को समझ सकता है और उससे प्रेरणा ले सकता है। यह उनकी अमृतवानी की सर्वकालिक सफलता का राज है।

12. कबीर के दोहे: शांति के हथियार, दंगों को रोकने की ताकत!

  • कबीर की वाणी सिर्फ आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का शक्तिशाली हथियार भी रही है। इतिहास में ऐसे प्रसंग हैं जहाँ उनके दोहों ने हिंसा को रोका:
  • दंगे रोकने की शक्ति: यह किंवदंती प्रसिद्ध है कि किसी सांप्रदायिक दंगे के दौरान, जब हिंसा चरम पर थी, किसी संत ने कबीर का दोहा गाना शुरू किया: “माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर। कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर।” (माला फेरते-फेरते युग बीत गया, पर मन का भ्रम नहीं गया। हाथ की माला छोड़ो और मन के भ्रम को दूर करो)। कहते हैं यह सुनकर दंगाई अपने हथियार डालकर बैठ गए। यह कबीर के शब्दों की अद्भुत शक्ति और उनके सार्वभौमिक शांति संदेश का जीवंत उदाहरण है।

अमृतवानी का अनंत स्रोत

कबीर कोई स्थिर ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं हैं। वे एक जीवंत परंपरा हैं, एक चलायमान विचार हैं, एक ऐसा स्रोत हैं जिसमें से हर युग अपनी प्यास बुझाता है। उनकी अमृतवानी के ये अनसुने, अनछुए पहलू हमें याद दिलाते हैं कि कबीर को समझने का मतलब केवल उनके दोहे रटना नहीं, बल्कि उनकी विद्रोही चेतना, उनकी तीखी दृष्टि और उनकी अथाह मानवीयता को आत्मसात करना है।

उनकी वाणी में जीवन के हर संघर्ष, हर प्रश्न, हर अंधविश्वास और हर आशा का समाधान मौजूद है – बस गहराई से देखने और सुनने की जरूरत है। वे कहते हैं:

“बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।”

(बड़ा होना ही काफी नहीं, जैसे खजूर का पेड़ बड़ा तो होता है पर न तो राहगीर को छाया दे पाता है, न उसके फल आसानी से मिलते हैं।)

कबीर खजूर के पेड़ नहीं हैं। वे एक विशाल बरगद हैं, जिसकी छाया में सब आ सकते हैं और जिसके मीठे फल (ज्ञान-अमृत) हर कोई तोड़ सकता है। उनकी अमृतवानी कोई पुरानी किताब नहीं, बल्कि हमारे अंदर बहने वाली वह जीवनदायिनी धारा है जो हमें सच्चा, निर्भीक और प्रेमपूर्ण जीवन जीने की राह दिखाती है। इन अनजाने तथ्यों को जानकर हम इस धारा को और भी नजदीक से महसूस कर सकते हैं।

कबीरा यह गति की हरि की, गाइ न जाइ खरी खोट।
जैसे पानी में पांवड़ा, दुख लागे ना छोट।

(कबीर कहते हैं, भगवान की इस लीला को गाना आसान नहीं, यह कच्चे-पक्के का भेद नहीं जानती। जैसे पानी में पैर रखने पर कोई छोटा-बड़ा नहीं होता, सब एक समान भीगते हैं।)

इसी एकरसता, इसी सार्वभौमिकता में छिपा है कबीर अमृतवानी का सच्चा रहस्य!


कबीर अमृतवाणी (Kabir Amritwani PDF)

कबीर दास जी के 10 प्रसिद्ध दोहे?

माला फेरत जुग भया, गया न मन का फेर।
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।

दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होय।

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोय।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदूगी तोय।

पानी में मीन पियासी, मोहे सुन-सुन आवै हांसी।
ज्यों घट भीतर आत्मा, बिरला बुझे कोई।

कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर।
न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर।

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहिं।
प्रेम गली अति सांकरी, तामें दो न समाहिं।

निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय।
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।

ज्यों तिल माहि तेल है, ज्यों चकमक में आग।
तेरा साईं तुझ में है, जाग सके तो जाग।

नहाये धोये क्या हुआ जो मन मैल न जाए मीन सदा जल में रहे धोये बास न जाए?

यह कबीर का प्रसिद्ध दोहा नहीं है, बल्कि एक लोकप्रिय भजन का अंश है। इस भजन में कबीर का संदेश है कि बाहरी स्वच्छता का कोई महत्व नहीं यदि मन में मैल और बुराई है। मछली हमेशा पानी में रहती है फिर भी उसकी गंध नहीं जाती, उसी प्रकार बाहरी सफाई से कुछ नहीं होता अगर मन की सफाई नहीं होती।

कबीर की उलटबांसी अर्थ सहित?

कबीर की उलटबांसी उनके रहस्यमय और गूढ़ उपदेश होते हैं, जिन्हें उलटबांसी कहा जाता है। एक उदाहरण देखें:

सिर पर बोझ रखे फिरै, ज्यूं गदहा बिन काम।
उलटबांसी कह कबीर, समझे ब्रह्म ग्यानी नाम।

अर्थ: जो व्यक्ति बिना समझे, केवल दिखावे के लिए धर्म का बोझ उठाए फिरता है, वह गधे के समान है। कबीर कहते हैं कि इस उलटबांसी को वही समझ सकता है जो ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर चुका हो।

कबीर दास जी के प्रेम के दोहे?

कबिरा तेरी झोपड़ी, गल कटीयन के पास।
जो करैंगे सो भरेंगे, तू क्यों भया उदास।

प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा परजा जेहि रूचि, सीस देई ले जाय।

कबिरा सोई प्रेम रस, जो ऊसर में होय।
सींचे सींचे प्रेम रस, तब हरियाली होय।

प्रीतम गली अति सांकरी, तामें दो न समाहिं।
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहिं।

कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहाँ उड़ि जाइ।
जो जैसी संगति करै, सो तैसा ही फल पाइ।

रहीम के कौन से दोहे अधिक प्रसिद्ध हैं?

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर न जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय।

रहिमन देख बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहां काम आवे सुई, कहा करै तलवारि।

बड़ बड़े को छोटो कहा, रहीमन हसि हाँसि।
गिरा ऊंच पर ओछा होय, सके तो पकड़ि रस्सासि।

तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपत्ति सहे सुजान।

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चन्दन विष व्यापे नहीं, लिपटे रहत भुजंग।

Radhe Radhe Japo Chale Aayenge Bihari Lyrics PDF – राधे राधे जपो चले आएँगे बिहारी

राधे राधे जपो चले आएंगे बिहारी (Radhe Radhe Japo Chale Aayenge Bihari) एक गहरा आध्यात्मिक और मधुर गीत है जो श्रोताओं को भगवान कृष्ण की भक्ति में डूबने के लिए आमंत्रित करता है। गीत दिव्य नामों के जाप की शक्ति पर जोर देते हैं, विशेष रूप से ‘राधे राधे’ पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जो कृष्ण की प्रिय राधा का सम्मान करने वाला एक पवित्र मंत्र है। गीत बताता है कि राधा के नाम का लगातार आह्वान करने से, भक्त अपने जीवन में कृष्ण के दूसरे नाम बिहारी की दिव्य उपस्थिति महसूस करेंगे।

यह गीत हिंदू समुदाय में व्यापक रूप से पसंद किया जाता है और अक्सर धार्मिक समारोहों, त्योहारों और भक्ति सभाओं के दौरान बजाया जाता है। इसका मधुर राग और दोहराव वाला मंत्र शांति और भक्ति का माहौल बनाता है, जो श्रोताओं को भक्ति या भक्ति पूजा में संलग्न होने के लिए प्रोत्साहित करता है।

गीतों का सार उनकी सादगी और उनके द्वारा दिए गए गहन संदेश में निहित है। वे भक्तों को भक्ति के महत्व और ईश्वर के प्रति समर्पण से मिलने वाले आनंद की याद दिलाते हैं। यह गीत भक्ति आंदोलन के सार को दर्शाता है, जो ईश्वर के प्रति व्यक्तिगत भक्ति पर जोर देता है।

राधे राधे जपो चले आएंगे बिहारी (Radhe Radhe Japo Chale Aayenge Bihari) के बोलों में एक कालातीत गुण है, जो सभी उम्र और पृष्ठभूमि के लोगों के साथ गूंजता है। वे समय और स्थान की सीमाओं को पार करते हुए एकता और आध्यात्मिक संबंध की भावना पैदा करते हैं। चाहे कोई आजीवन भक्त हो या अभ्यास में नया हो, यह गीत जप के सरल लेकिन शक्तिशाली कार्य के माध्यम से आंतरिक शांति और आध्यात्मिक पूर्ति का मार्ग प्रदान करता है।

इसलिए, जब आप इस दिव्य भजन को सुनते हैं, तो अपने आप को आध्यात्मिक शांति के क्षेत्र में ले जाने की अनुमति दें, जहाँ राधा और कृष्ण के नाम आपके दिल में गूंजते हैं, जो सांत्वना और आनंद लाते हैं। इस खूबसूरत गीत से मिलने वाली शांति का आनंद लें! 🙏🏼🎶


  • HINDI
  • ENGLISH

राधे राधे जपो चले आएँगे बिहारी Lyrics

राधे राधे जपो चले आएँगे बिहारी,
राधे राधे रटो चले आएँगे बिहारी,
आएँगे बिहारी चले आएँगे बिहारी,
राधे राधे जपो चले आएँगे बिहारी ॥

राधा मेरी चंदा,
चकोर है बिहारी,
राधा मेरी चंदा,
चकोर है बिहारी,
राधे राधे जपो चले आएँगे बिहारी ॥

राधा रानी मिश्री,
तो स्वाद है बिहारी,
राधा रानी मिश्री,
तो स्वाद है बिहारी,
राधे राधे जपो चले आएँगे बिहारी ॥

राधा रानी गंगा,
तो धार है बिहारी,
राधा रानी गंगा,
तो धार है बिहारी,
राधे राधे जपो चले आएँगे बिहारी ॥

राधा रानी तन है तो,
प्राण है बिहारी,
राधा रानी तन है तो,
प्राण है बिहारी,
राधे राधे जपो चले आएँगे बिहारी ॥

राधा रानी सागर,
तरंग है बिहारी,
राधा रानी सागर,
तरंग है बिहारी,
राधे राधे जपो चले आएँगे बिहारी ॥

राधा रानी मोहनी,
तो मोहन बिहारी,
राधा रानी मोहनी,
तो मोहन है बिहारी,
राधे राधे जपो चले आएँगे बिहारी ॥

राधा मेरी गोरी तो,
साँवरे बिहारी,
राधा मेरी गोरी तो,
साँवरे बिहारी,
राधे राधे जपो चले आएँगे बिहारी ॥

राधा रानी भोली भाली ,
चंचल बिहारी,
राधा रानी भोली भाली ,
चंचल बिहारी,
राधे राधे जपो चले आएँगे बिहारी ॥

राधा रानी नथनी,
तो कंगन बिहारी,
राधा रानी नथनी,
तो कंगन बिहारी,
राधे राधे जपो चले आएँगे बिहारी ॥

राधा रानी मुरली,
तो तान है बिहारी,
राधा रानी मुरली,
तो तान है बिहारी,
राधे राधे जपो चले आएँगे बिहारी ॥

राधे राधे जपो चले आएँगे बिहारी,
राधे राधे रटो चले आएँगे बिहारी,
आएँगे बिहारी चले आएँगे बिहारी,
राधे राधे जपो चले आएँगे बिहारी ॥

Radhe Radhe Japo Chale Aayenge Bihari Lyrics English

Radhe radhe japo chale ayenge bihari,
Radhe radhe rato chale ayenge bihari,
Ayenge bihari chale ayenge bihari,
Radhe radhe japo chale ayenge bihari ॥

Radha meri chanda,
Chakor hai bihari,
Radha meri chanda,
Chakor hai bihari,
Radhe radhe japo chale ayenge bihari ॥

Radha rani mishri,
To swad hai bihari,
Radha rani mishri,
To swad hai bihari,
Radhe radhe japo chale ayenge bihari ॥

Radha rani ganga,
To dhaar hai bihari,
Radha rani ganga,
To dhaar hai bihari,
Radhe radhe japo chale ayenge bihari ॥

Radha rani tan hai to,
Pran hai bihari,
Radha rani tan hai to,
Pran hai bihari,
Radhe radhe japo chale ayenge bihari ॥

Radha rani sagar,
Tarang hai bihari,
Radha rani sagar,
Tarang hai bihari,
Radhe radhe japo chale ayenge bihari ॥

Radha rani mohani,
To mohan bihari,
Radha rani mohani,
To mohan hai bihari,
Radhe radhe japo chale ayenge bihari ॥

Radha meri gori to,
Sanware bihari,
Radha meri gori to,
Sanware bihari,
Radhe radhe japo chale ayenge bihari ॥

Radha rani bholi bhali ,
Chanchal bihari,
Radha rani bholi bhali ,
Chanchal bihari,
Radhe radhe japo chale ayenge bihari ॥

Radha rani nathni,
To kangan bihari,
Radha rani nathni,
To kangan bihari,
Radhe radhe japo chale ayenge bihari ॥

Radha rani murali,
To tan hai bihari,
Radha rani murali,
To tan hai bihari,
Radhe radhe japo chale ayenge bihari ॥

Radhe radhe japo chale ayenge bihari,
Radhe radhe rato chale ayenge bihari,
Ayenge bihari chale ayenge bihari,
Radhe radhe japo chale ayenge bihari ॥



हिंदी में राधे राधे कैसे लिखें?

हिंदी में “राधे राधे” लिखने के लिए आप देवनागरी लिपि का प्रयोग करें। इसे ऐसे लिखें: “राधे राधे”।

राधे राधे का जाप कैसे करें?

राधे राधे का जाप करने के लिए आप एक शांत और पवित्र स्थान चुनें। आराम से बैठें और आंखें बंद कर लें। “राधे राधे” मंत्र का उच्चारण धीमी गति से और भावना से करें। आप इसे किसी माला का उपयोग कर भी गिन सकते हैं।

राधे राधे का क्या महत्व है?

“राधे राधे” का जाप भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह मंत्र भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी की भक्ति को प्रकट करता है और भक्त के मन में शांति, प्रेम और भक्ति की भावना को उत्पन्न करता है।

लोग राधे राधे का जाप क्यों करते हैं?

लोग “राधे राधे” का जाप इसलिए करते हैं क्योंकि यह भगवान कृष्ण और राधा की भक्ति का प्रतीक है। इस जाप से आत्मा को शांति मिलती है और मन को एकाग्रता प्राप्त होती है। इसे करते हुए भक्त भगवान की कृपा का अनुभव करते हैं।

लोग राधा का जाप क्यों करते हैं?

राधा का जाप इसलिए किया जाता है क्योंकि राधा भगवान कृष्ण की अनन्य भक्त हैं। उनके नाम का जाप करने से भक्त भगवान कृष्ण के प्रति अपनी भक्ति को और गहरा करते हैं और राधा-कृष्ण की कृपा प्राप्त करते हैं।

दो बार राधे राधे कहने से क्या होता है?

दो बार “राधे राधे” कहने का अर्थ है भगवान कृष्ण और राधा रानी दोनों की आराधना करना। इससे भक्त को दैवीय शांति और आध्यात्मिक आनन्द की प्राप्ति होती है। यह एक प्रकार से भक्त की प्रार्थना को दोगुना प्रभावी बनाता है।

Shri Mahalakshmi Ashtakam PDF – श्री महालक्ष्मी अष्टकम | Download Lyrics 2026

श्री महालक्ष्मी अष्टक (Shri Mahalakshmi Ashtakam), माता महालक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए, स्वर्ग के राजा इंद्र ने अत्यंत भक्ति और श्रद्धा के साथ माता लक्ष्मी की प्रार्थना की। इन प्रार्थनाओं में माता लक्ष्मी को सर्वज्ञ, सब पर दया करने वाली और दुष्टों को कष्ट देने वाली देवी के रूप में वर्णित किया गया है। माता लक्ष्मी, जो धन, समृद्धि और वैभव की देवी मानी जाती हैं, उनकी कृपा से जीवन में सुख, शांति और संपन्नता आती है। श्री लक्ष्मी जी की आरती पढ़े!

यह भी माना जाता है कि जो व्यक्ति इस प्रार्थना का रोजाना एक बार पाठ करता है, उसके बड़े से बड़े पाप समाप्त हो जाते हैं। यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन सुबह और शाम इसे दो बार पढ़ता है, तो उसके घर में धन-धान्य की कभी कमी नहीं रहती, और समृद्धि बनी रहती है। इसके अतिरिक्त, जो व्यक्ति दिन में तीन बार इस प्रार्थना का पाठ करता है, उसके सभी शत्रु नष्ट हो जाते हैं और जीवन में शांति और स्थिरता का वास होता है। यहाँ श्री लक्ष्मी चालीसा के लिए क्लिक करें!

महालक्ष्मी का आशीर्वाद पाने के लिए श्रद्धा और भक्ति का होना अनिवार्य है। माता लक्ष्मी की उपासना से न केवल भौतिक सुख-समृद्धि प्राप्त होती है, बल्कि मानसिक शांति और संतुलन भी प्राप्त होता है। लक्ष्मी माता की कृपा से व्यक्ति के जीवन में आर्थिक उन्नति होती है और सभी प्रकार के संकट दूर होते हैं। माता महालक्ष्मी की महिमा अपार है, और उनके आशीर्वाद से जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है। महालक्ष्मी माता की जय!


  • हिन्दी
  • English

महा लक्ष्म्यष्टकम्
इंद्र उवाच –

नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते ।
शंखचक्र गदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ 1 ॥

नमस्ते गरुडारूढे कोलासुर भयंकरि ।
सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ 2 ॥

सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्व दुष्ट भयंकरि ।
सर्वदुःख हरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ 3 ॥

सिद्धि बुद्धि प्रदे देवि भुक्ति मुक्ति प्रदायिनि ।
मंत्र मूर्ते सदा देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ 4 ॥

आद्यंत रहिते देवि आदिशक्ति महेश्वरि ।
योगज्ञे योग संभूते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ 5 ॥

स्थूल सूक्ष्म महारौद्रे महाशक्ति महोदरे ।
महा पाप हरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ 6 ॥

पद्मासन स्थिते देवि परब्रह्म स्वरूपिणि ।
परमेशि जगन्मातः महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ 7 ॥

श्वेतांबरधरे देवि नानालंकार भूषिते ।
जगस्थिते जगन्मातः महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ 8 ॥

महालक्ष्मष्टकं स्तोत्रं यः पठेद् भक्तिमान् नरः ।
सर्व सिद्धि मवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा ॥ 9 ॥

एककाले पठेन्नित्यं महापाप विनाशनम् ।
द्विकालं यः पठेन्नित्यं धन धान्य समन्वितः ॥ 10 ॥

त्रिकालं यः पठेन्नित्यं महाशत्रु विनाशनम् ।
महालक्ष्मी र्भवेन्-नित्यं प्रसन्ना वरदा शुभा ॥ 11 ॥

॥ इतिंद्रकृत श्रीमहालक्ष्म्यष्टकस्तवः संपूर्णः ॥

|| Shri Mahalakshmi Ashtakam in English ||

Maha Lakshmi Ashtakam
Indra Uvācha –

Namastē’stu Mahāmāyē Śrīpīṭhē Surapūjitē ।
Śaṅkhachakra Gadāhastē Mahālakṣmi Namō’stu Tē ॥ 1 ॥

Namastē Garuḍārūḍhē Kōlāsura Bhayaṅkari ।
Sarvapāpaharē Dēvi Mahālakṣmi Namō’stu Tē ॥ 2 ॥

Sarvajñē Sarvavaradē Sarva Duṣṭa Bhayaṅkari ।
Sarvaduḥkha Harē Dēvi Mahālakṣmi Namō’stu Tē ॥ 3 ॥

Siddhi Buddhi Pradē Dēvi Bhukti Mukti Pradāyini ।
Mantra Mūrtē Sadā Dēvi Mahālakṣmi Namō’stu Tē ॥ 4 ॥

Ādyanta Rahitē Dēvi Ādiśakti Mahēśvari ।
Yōgajñē Yōga Sambhūtē Mahālakṣmi Namō’stu Tē ॥ 5 ॥

Sthūla Sūkṣma Mahāraudrē Mahāśakti Mahōdarē ।
Mahā Pāpa Harē Dēvi Mahālakṣmi Namō’stu Tē ॥ 6 ॥

Padmāsana Sthitē Dēvi Parabrahma Svarūpiṇi ।
Paramēśi Jaganmātaḥ Mahālakṣmi Namō’stu Tē ॥ 7 ॥

Śvētāmbaradharē Dēvi Nānālaṅkāra Bhūṣitē ।
Jagasthitē Jaganmātaḥ Mahālakṣmi Namō’stu Tē ॥ 8 ॥

Mahālakṣmaṣṭakaṃ Stōtraṃ Yaḥ Paṭhēd Bhaktimān Naraḥ ।
Sarva Siddhi Mavāpnōti Rājyaṃ Prāpnōti Sarvadā ॥ 9 ॥

Ēkakālē Paṭhēnnityaṃ Mahāpāpa Vināśanam ।
Dvikālṃ Yaḥ Paṭhēnnityaṃ Dhana Dhānya Samanvitaḥ ॥ 10 ॥

Trikālaṃ Yaḥ Paṭhēnnityaṃ Mahāśatru Vināśanam ।
Mahālakṣmī Rbhavēn-Nityaṃ Prasannā Varadā Śubhā ॥ 11 ॥

[Intyakṛta Śrī Mahālakṣmyaṣṭaka Stōtraṃ Sampūrṇam].



महालक्ष्मी अष्टक स्तोत्र के लाभ

महालक्ष्मी अष्टक स्तोत्र का पाठ करने से कई आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं। यह स्तोत्र देवी लक्ष्मी की स्तुति में रचा गया है, जो धन, समृद्धि और वैभव की देवी मानी जाती हैं। इसके नियमित पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

धन और समृद्धि की प्राप्ति: महालक्ष्मी अष्टक स्तोत्र का नियमित पाठ व्यक्ति के जीवन में धन और समृद्धि लाता है। इसके प्रभाव से घर में आर्थिक स्थिरता आती है और धन-धान्य की कभी कमी नहीं होती।

सभी प्रकार की परेशानियों का नाश: यह स्तोत्र व्यक्ति के जीवन में आने वाली बाधाओं और कठिनाइयों को दूर करता है। इसके प्रभाव से आर्थिक समस्याएं, कर्ज, और गरीबी जैसे संकट समाप्त हो जाते हैं।

सुख-शांति और मानसिक संतुलन: महालक्ष्मी अष्टक का पाठ करने से मानसिक शांति प्राप्त होती है। यह व्यक्ति के मन को शांति और संतुलन प्रदान करता है, जिससे तनाव और चिंता से मुक्ति मिलती है।

शत्रुओं पर विजय: महालक्ष्मी अष्टक स्तोत्र के पाठ से व्यक्ति अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है। इसके प्रभाव से शत्रु की बुरी योजनाएं विफल होती हैं और उसके जीवन में कोई हानि नहीं होती।

पापों का क्षय: इस स्तोत्र का नियमित पाठ व्यक्ति के पूर्वजन्म के पापों का नाश करता है। इसके द्वारा व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और उसे ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है।

वैभव और ऐश्वर्य की प्राप्ति: महालक्ष्मी अष्टक स्तोत्र का पाठ व्यक्ति के जीवन में ऐश्वर्य और वैभव लाता है। इसके प्रभाव से व्यक्ति को मान-सम्मान, प्रसिद्धि और सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।

व्यापार और नौकरी में सफलता: महालक्ष्मी अष्टक का पाठ व्यापार, करियर और नौकरी में सफलता दिलाने में सहायक होता है। इसके प्रभाव से व्यक्ति की मेहनत सफल होती है और उसे अपनी कार्यक्षेत्र में उन्नति मिलती है।

परिवारिक सुख: यह स्तोत्र परिवार में सुख-शांति और प्रेम का संचार करता है। इसके प्रभाव से परिवार के सदस्यों के बीच आपसी तालमेल और समर्पण बढ़ता है, जिससे घर में सदैव खुशी और शांति बनी रहती है।

महालक्ष्मी अष्टक का नियमित और भक्तिपूर्वक पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में धन, समृद्धि, शांति, और सुख-समृद्धि का आगमन होता है।


अक्षय तृतीया एक बेहद शुभ और पवित्र दिन माना जाता है, जिसे हिंदू धर्म में बहुत महत्व दिया जाता है। इस दिन को भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष कृपा का समय माना जाता है। अक्षय तृतीया के दिन यदि भक्त महालक्ष्मी अष्टक स्तोत्र का पाठ करते हैं, तो उन्हें असीमित धन, समृद्धि और सुख-शांति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। मान्यता है कि इस दिन किए गए पुण्य कर्मों और धार्मिक अनुष्ठानों का फल अक्षय यानी अविनाशी होता है, इसलिए इस दिन महालक्ष्मी का स्तोत्र विशेष रूप से फलदायी माना जाता है।

महालक्ष्मी अष्टक स्तोत्र देवी लक्ष्मी की महिमा का गुणगान करता है और उनके आशीर्वाद को प्राप्त करने का एक सरल और प्रभावी साधन है। अक्षय तृतीया के दिन इस स्तोत्र का पाठ करने से घर में इतना धन-धान्य आता है कि उसे संभालना भी कठिन हो जाता है। इस दिन महालक्ष्मी की उपासना से आर्थिक संकटों से मुक्ति मिलती है, और व्यक्ति के जीवन में अपार धन-संपत्ति की प्राप्ति होती है। यह स्तोत्र देवी लक्ष्मी की करुणा और कृपा को प्राप्त करने का उत्तम माध्यम है, जिससे व्यक्ति के जीवन में समृद्धि का वास होता है।

इसके साथ ही, महालक्ष्मी अष्टक स्तोत्र का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में स्थायी समृद्धि आती है। अक्षय तृतीया पर इसका पाठ करने से न केवल धन, बल्कि शांति, संतुलन और मानसिक स्थिरता भी प्राप्त होती है। इसके प्रभाव से जीवन में आर्थिक उन्नति होती है और समस्त बाधाओं का नाश होता है। देवी लक्ष्मी की कृपा से व्यक्ति के सभी शत्रु समाप्त हो जाते हैं, और वह जीवन में सफलता की ऊंचाइयों को प्राप्त करता है।

इस पावन अवसर पर श्रद्धा और भक्ति के साथ महालक्ष्मी अष्टक का पाठ करने से देवी लक्ष्मी अपने भक्तों पर असीम कृपा बरसाती हैं। अक्षय तृतीया पर इस स्तोत्र का पाठ न केवल तत्कालिक लाभ देता है, बल्कि इसके प्रभाव से आने वाले वर्षों तक जीवन में धन और समृद्धि का प्रवाह बना रहता है। माता लक्ष्मी की कृपा से ऐसा धन और ऐश्वर्य मिलता है, जिसे व्यक्ति संभाल पाना भी मुश्किल समझता है।


महालक्ष्मी अष्टक स्तोत्र का पाठ आर्थिक तंगी और धन की कमी से छुटकारा पाने के लिए एक अत्यंत प्रभावी उपाय माना जाता है। यह स्तोत्र देवी लक्ष्मी की स्तुति में रचा गया है, जो धन, समृद्धि और ऐश्वर्य की देवी हैं। महालक्ष्मी अष्टक का नियमित और श्रद्धा से किया गया पाठ व्यक्ति के जीवन में आर्थिक समस्याओं को समाप्त कर सकता है और उसे धन-धान्य से संपन्न कर सकता है।

यदि आप आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं या कर्ज़ में डूबे हुए हैं, तो महालक्ष्मी अष्टक का नियमित पाठ करने से देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। मान्यता है कि इस स्तोत्र का पाठ करने से देवी लक्ष्मी व्यक्ति के जीवन में स्थायी समृद्धि और वित्तीय स्थिरता का आशीर्वाद देती हैं। यह स्तोत्र न केवल धन की प्राप्ति में सहायक होता है, बल्कि व्यापार, नौकरी और जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है।

इसके अलावा, महालक्ष्मी अष्टक का पाठ आपके घर और परिवार में शांति और खुशहाली लाता है। देवी लक्ष्मी की कृपा से न केवल आर्थिक कठिनाइयों से छुटकारा मिलता है, बल्कि मानसिक तनाव और चिंता से भी मुक्ति मिलती है। इससे व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता और आत्मविश्वास का संचार होता है, जिससे वह अपने लक्ष्यों को आसानी से प्राप्त कर सकता है।

यदि आप अपने जीवन में आर्थिक उन्नति और समृद्धि की कामना करते हैं, तो महालक्ष्मी अष्टक स्तोत्र का पाठ निश्चित रूप से आपके लिए लाभकारी होगा। इसका नियमित पाठ करने से देवी लक्ष्मी आपके घर में स्थायी रूप से निवास करती हैं और आपको हर प्रकार की आर्थिक तंगी और संकट से मुक्ति दिलाती हैं।


लक्ष्मी अष्टकम पढ़ने से क्या होता है?

लक्ष्मी अष्टकम का पाठ करने से व्यक्ति को देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है, जो धन, समृद्धि और वैभव की देवी मानी जाती हैं। इस स्तोत्र का नियमित रूप से पाठ करने से घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है, और आर्थिक समस्याओं से छुटकारा मिलता है। इसके प्रभाव से जीवन में स्थिरता, सुख-शांति और संतोष प्राप्त होता है। लक्ष्मी अष्टकम का पाठ व्यक्ति के मन को शांत करता है और उसे मानसिक शांति प्रदान करता है। साथ ही, यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर करके सकारात्मकता और समृद्धि का वातावरण बनाता है। इसके प्रभाव से व्यापार और करियर में भी उन्नति होती है।

महालक्ष्मी मंत्र का जाप कितनी बार करना चाहिए?

महालक्ष्मी मंत्र का जाप करने के लिए किसी विशेष संख्या का उल्लेख नहीं किया गया है, लेकिन धार्मिक दृष्टिकोण से 108 बार जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है। यह संख्या आध्यात्मिक और धार्मिक अनुष्ठानों में अत्यंत पवित्र मानी जाती है। यदि आप विशेष फल प्राप्त करना चाहते हैं, तो आप 1,008 बार भी जाप कर सकते हैं। नियमित रूप से प्रतिदिन इस मंत्र का जाप करने से देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है, और जीवन में धन, समृद्धि और शांति आती है। जाप के दौरान ध्यान और एकाग्रता बनाए रखना भी आवश्यक है, जिससे देवी लक्ष्मी का आशीर्वाद पूर्ण रूप से प्राप्त हो सके।

लक्ष्मी जी का शुभ अंक कौन सा है?

लक्ष्मी जी का शुभ अंक “8” माना जाता है। यह अंक समृद्धि, धन और स्थायित्व का प्रतीक है। हिंदू शास्त्रों में 8 अंक को देवी लक्ष्मी से संबंधित माना गया है, क्योंकि वे आठ रूपों में पूजी जाती हैं, जिन्हें “अष्टलक्ष्मी” के नाम से जाना जाता है। अष्टलक्ष्मी देवी के आठ रूप धन, धान्य, संतान, सौभाग्य, ऐश्वर्य, वीरता, ज्ञान और विजय की प्रतीक हैं। इसलिए, यदि आप अपने जीवन में लक्ष्मी जी की कृपा चाहते हैं, तो 8 अंक से जुड़े कार्यों और प्रतीकों को अपने जीवन में शामिल करना शुभ हो सकता है।

सुबह उठकर क्या करना चाहिए जिससे लक्ष्मी आए?

सुबह उठते ही सबसे पहले धरती माता को प्रणाम करें, और फिर अपने दोनों हाथों की हथेलियों को देखिए। शास्त्रों में कहा गया है कि हथेलियों के अग्रभाग में लक्ष्मी जी का वास होता है, मध्य में सरस्वती जी, और मूल में भगवान विष्णु का निवास होता है। इस दृष्टि से अपनी हथेलियों का दर्शन करके दिन की शुरुआत करना बहुत शुभ माना जाता है। इसके अलावा, सुबह जल्दी उठकर स्नान करना, घर में तुलसी के पौधे की पूजा करना, और देवी लक्ष्मी का ध्यान करके दीपक जलाने से लक्ष्मी जी का आशीर्वाद मिलता है। स्वच्छता और पूजा से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे धन और समृद्धि का आगमन होता है।

पर्स में क्या रखने से लक्ष्मी आती है?

पर्स में कुछ विशेष वस्तुएं रखने से माना जाता है कि धन की देवी लक्ष्मी का आशीर्वाद मिलता है और पर्स में कभी धन की कमी नहीं होती। जैसे कि आप अपने पर्स में चांदी का सिक्का, कमल का बीज, श्री यंत्र, लक्ष्मी की तस्वीर, या हल्दी की गांठ रख सकते हैं। चांदी का सिक्का विशेष रूप से शुभ माना जाता है, क्योंकि चांदी को लक्ष्मी जी का धातु माना गया है। इसके अलावा, पर्स में तुलसी के पत्ते या लाल रंग का कपड़ा रखना भी शुभ माना जाता है। यह सभी वस्तुएं लक्ष्मी जी को आकर्षित करती हैं और धन की वृद्धि में सहायक होती हैं।

महालक्ष्मी अष्टक PDF कैसे डाउनलोड करें?

आप महालक्ष्मी अष्टक PDF डाउनलोड करने के लिए इस लिंक पर जाएं। यहां आपको उच्च गुणवत्ता और सरल स्वरूप में PDF उपलब्ध होगी। यह स्तोत्र मां लक्ष्मी को समर्पित है और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना गया है।

महालक्ष्मी अष्टक स्तोत्र मराठी PDF कहां से प्राप्त करें?

यदि आप महालक्ष्मी अष्टक स्तोत्र मराठी PDF चाहते हैं, तो इस लिंक पर जाकर डाउनलोड करें। यह मराठी भाषा में लक्ष्मी स्तुति करने के लिए एक अद्वितीय स्त्रोत है।

महालक्ष्मी स्तोत्र पाठ PDF कैसे प्राप्त करें?

महालक्ष्मी स्तोत्र पाठ PDF डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें। यह PDF महालक्ष्मी स्तुति के लिए उपयोगी है और इसे पढ़ने से धन-वैभव और सुख-शांति की प्राप्ति होती है।

Mahalaxmi Ashtakam PDF in Hindi डाउनलोड कैसे करें?

आप Mahalaxmi Ashtakam PDF in Hindi डाउनलोड करने के लिए यह लिंक पर जाएं। यह PDF हिंदी में उपलब्ध है और मां लक्ष्मी की आराधना के लिए सरल और प्रभावी है।

महालक्ष्मी अष्टक स्तोत्र PDF कहां मिलेगा?

महालक्ष्मी अष्टक स्तोत्र PDF को यहां से डाउनलोड करें। यह PDF मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है।

Mahalaxmi Stotra PDF कैसे डाउनलोड करें?

आप Mahalaxmi Stotra PDF डाउनलोड करने के लिए इस लिंक का उपयोग कर सकते हैं। यह PDF मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए दैनिक पाठ हेतु उपयुक्त है।

Mahalaxmi Stotram PDF कहां से डाउनलोड करें?

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Sri Suktam Path and Puja | श्री सूक्तं स्तोत्र पाठ इन हिंदी PDF 2026

श्री सूक्त पाठ (Sri Suktam Path), देवी लक्ष्मी की महिमा का गुणगान करने वाला एक पवित्र वैदिक मंत्र है, जो धन, समृद्धि, और सुख-समृद्धि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस पाठ का उल्लेख प्राचीन वेदों में मिलता है और इसे देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्ति के लिए सबसे प्रभावी माना गया है। जो भी व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास के साथ इस पाठ का नियमित पाठ करता है, उसे जीवन में धन-धान्य की प्राप्ति होती है और सभी प्रकार की आर्थिक समस्याओं का समाधान होता है। आप यहाँ से श्री लक्ष्मी चालीसा का पाठ कर सकते हैं।

श्री सूक्त पाठ में देवी लक्ष्मी के विभिन्न रूपों और उनके गुणों का वर्णन किया गया है। इस पाठ को सुनने और गाने से न केवल मन की शांति प्राप्त होती है, बल्कि घर में सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का वास भी होता है। यही कारण है कि भारत में अनेक घरों में इस पाठ का नियमित रूप से उच्चारण किया जाता है, विशेषकर दीपावली और शुक्रवार के दिन।

यदि आप भी श्री सूक्त पाठ का महत्व समझते हैं और इसे अपने जीवन में अपनाना चाहते हैं, तो हम आपके लिए “श्री सूक्त पाठ इन हिंदी [PDF]” लाए हैं। इस पीडीएफ में आप इस मंत्र को हिंदी भाषा में आसानी से पढ़ सकते हैं और नियमित रूप से इसका पाठ कर सकते हैं। यह पीडीएफ उन सभी के लिए एक महत्वपूर्ण साधन है जो देवी लक्ष्मी की कृपा और आशीर्वाद की प्राप्ति चाहते हैं।


  • हिन्दी/ संस्कृत
  • English

हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥१॥

तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्॥२॥

अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम्।
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम्॥३॥

कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्॥४॥

चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्।
तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे॥५॥

आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसानुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः॥६॥

उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे॥७॥

क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात्॥८॥

गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरींग् सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्॥९॥

मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः॥१०॥

कर्दमेन प्रजाभूता मयि सम्भव कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्॥११॥

आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले॥१२॥

आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥१३॥

आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥१४॥

तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पूरुषानहम्॥१५॥

यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्।
सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत्॥१६॥

पद्मानने पद्म ऊरु पद्माक्षी पद्मासम्भवे।
त्वं मां भजस्व पद्माक्षी येन सौख्यं लभाम्यहम्॥१७॥

अश्वदायि गोदायि धनदायि महाधने।
धनं मे जुषतां देवि सर्वकामांश्च देहि मे॥१८॥

पुत्रपौत्र धनं धान्यं हस्त्यश्वादिगवे रथम्।
प्रजानां भवसि माता आयुष्मन्तं करोतु माम्॥१९॥

धनमग्निर्धनं वायुर्धनं सूर्यो धनं वसुः।
धनमिन्द्रो बृहस्पतिर्वरुणं धनमश्नुते॥२०॥

वैनतेय सोमं पिब सोमं पिबतु वृत्रहा।
सोमं धनस्य सोमिनो मह्यं ददातु सोमिनः॥२१॥

न क्रोधो न च मात्सर्य न लोभो नाशुभा मतिः।
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां श्रीसूक्तं जपेत्सदा॥२२॥

वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः।
रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्म द्विषो जहि॥२३॥

पद्मप्रिये पद्मिनि पद्महस्ते पद्मालये पद्मदलायताक्षि।
विश्वप्रिये विष्णु मनोऽनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व॥२४॥

या सा पद्मासनस्था विपुलकटितटी पद्मपत्रायताक्षी।
गम्भीरा वर्तनाभिः स्तनभर नमिता शुभ्र वस्त्रोत्तरीया॥२५॥

लक्ष्मीर्दिव्यैर्गजेन्द्रैर्मणिगणखचितैस्स्नापिता हेमकुम्भैः।
नित्यं सा पद्महस्ता मम वसतु गृहे सर्वमाङ्गल्ययुक्ता॥२६॥

लक्ष्मीं क्षीरसमुद्र राजतनयां श्रीरङ्गधामेश्वरीम्।
दासीभूतसमस्त देव वनितां लोकैक दीपांकुराम्॥२७॥

श्रीमन्मन्दकटाक्षलब्ध विभव ब्रह्मेन्द्रगङ्गाधराम्।
त्वां त्रैलोक्य कुटुम्बिनीं सरसिजां वन्दे मुकुन्दप्रियाम्॥२८॥

सिद्धलक्ष्मीर्मोक्षलक्ष्मीर्जयलक्ष्मीस्सरस्वती।
श्रीलक्ष्मीर्वरलक्ष्मीश्च प्रसन्ना मम सर्वदा॥२९॥

वरांकुशौ पाशमभीतिमुद्रां करैर्वहन्तीं कमलासनस्थाम्।
बालार्क कोटि प्रतिभां त्रिणेत्रां भजेहमाद्यां जगदीस्वरीं त्वाम्॥३०॥

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
नारायणि नमोऽस्तु ते॥ नारायणि नमोऽस्तु ते॥३१॥

सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरांशुक गन्धमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्॥३२॥

विष्णुपत्नीं क्षमां देवीं माधवीं माधवप्रियाम्।
विष्णोः प्रियसखीं देवीं नमाम्यच्युतवल्लभाम्॥३३॥

महालक्ष्मी च विद्महे विष्णुपत्नी च धीमहि।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्॥३४॥

श्रीवर्चस्यमायुष्यमारोग्यमाविधात् पवमानं महियते।
धनं धान्यं पशुं बहुपुत्रलाभं शतसंवत्सरं दीर्घमायुः॥३५॥

ऋणरोगादिदारिद्र्यपापक्षुदपमृत्यवः।
भयशोकमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा॥३६॥

य एवं वेद।ॐ महादेव्यै च विद्महे विष्णुपत्नी च धीमहि।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥३७॥

॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

Hiraṇyavarṇāṃ Hariṇīṃ Suvarṇarajatasrajām।
Candrāṃ Hiraṇmayīṃ Lakṣmīṃ Jātavedo Ma Āvaha॥1॥

Tāṃ Ma Āvaha Jātavedo Lakṣmīmanapagāminīm।
Yasyāṃ Hiraṇyaṃ Vindeyaṃ Gāmaśvaṃ Puruṣānaham॥2॥

Aśvapūrvāṃ Rathamadhyāṃ Hastinādaprabodhinīm।
Sriyaṃ Devīmupahvaye Śrīrmā Devī Juṣatām॥3॥

Kāṃ Sosmitāṃ Hiraṇyaprākārāmārdrāṃ Jvalantīṃ Tṛptāṃ Tarpayantīm।
Padme Sthitāṃ Padmavarṇāṃ Tāmihopahvaye Śriyam॥4॥

Candrāṃ Prabhāsāṃ Yaśasā Jvalantīṃ Śriyaṃ Loke Devajuṣṭāmudārām।
Tāṃ Padminīmīṃ Śaraṇamahaṃ Prapadye’lakṣmīrme Naśyatāṃ Tvāṃ Vṛṇe॥5॥

Adityavarṇe Tapaso’dhijāto Vanaspatistava Vṛkṣo’tha Bilvaḥ।
Tasya Phalāni Tapasānudantu Māyāntarāyāśca Bāhyā Alakṣmīḥ॥6॥

Upaitu Māṃ Devasakhaḥ Kīrtiśca Maṇinā Saha।
Prādurbhūto’smi Rāṣṭre’smin Kīrtimṛddhiṃ Dadātu Me॥7॥

Kṣutpipāsāmalāṃ Jyeṣṭhāmalakṣmīṃ Nāśayāmyaham।
Abhūtimasamṛddhiṃ Ca Sarvāṃ Nirṇuda Me Gṛhāt॥8॥

Gandhadvārāṃ Durādharṣāṃ Nityapuṣṭāṃ Karīṣiṇīm।
Iśvarīṃg Sarvabhūtānāṃ Tāmihopahvaye Śriyam॥9॥

Manasaḥ Kāmamākūtiṃ Vācaḥ Satyamaśīmahi।
Paśūnāṃ Rūpamannasya Mayi Śrīḥ Śrayatāṃ Yaśaḥ॥10॥

Kardamena Prajābhūtā Mayi Sambhava Kardama।
Śriyaṃ Vāsaya Me Kule Mātaraṃ Padmamālinīm॥11॥

Āpaḥ Sṛjantu Snigdhāni Ciklīta Vasa Me Gṛhe।
Ni Ca Devīṃ Mātaraṃ Śriyaṃ Vāsaya Me Kule॥12॥

Ārdrāṃ Puṣkariṇīṃ Puṣṭiṃ Piṅgalāṃ Padmamālinīm।
Candrāṃ Hiraṇmayīṃ Lakṣmīṃ Jātavedo Ma Āvaha॥13॥

Ārdrāṃ Yaḥ Kariṇīṃ Yaṣṭiṃ Suvarṇāṃ Hemamālinīm।
Sūryāṃ Hiraṇmayīṃ Lakṣmīṃ Jātavedo Ma Āvaha॥14॥

Tāṃ Ma Āvaha Jātavedo Lakṣmīmanapagāminīm।
Yasyāṃ Hiraṇyaṃ Prabhūtaṃ Gāvo Dāsyo’śvān Vindeyaṃ Pūruṣānaham॥15॥

Yaḥ Śuciḥ Prayato Bhūtvā Juhuyādājyamanvaham।
Sūktaṃ Pañcadaśarcaṃ Ca Śrīkāmaḥ Satataṃ Japet॥16॥

Padmānane Padma Ūru Padmākṣī Padmāsambhave।
Tvaṃ Māṃ Bhajasva Padmākṣī Yena Saukhyaṃ Labhāmyaham॥17॥

Aśvadāyi Godāyi Dhanadāyi Mahādhane।
Dhanaṃ Me Juṣatāṃ Devi Sarvakāmāṃśca Dehi Me॥18॥

Putrapautra Dhanaṃ Dhānyaṃ Hastyaśvādigave Ratham।
Prajānāṃ Bhavasi Mātā Āyuṣmantaṃ Karotu Mām॥19॥

Dhanamagnirdhanaṃ Vāyurdhanaṃ Sūryo Dhanaṃ Vasuḥ।
Dhanamindro Bṛhaspatirvaruṇaṃ Dhanamaśnute॥20॥

Vainateya Somaṃ Piba Somaṃ Pibatu Vṛtrahā।
Somaṃ Dhanasya Somino Mahyaṃ Dadātu Sominaḥ॥21॥

Na Krodho Na Ca Mātsarya Na Lobho Nāśubhā Matiḥ।
Bhavanti Kṛtapuṇyānāṃ Bhaktānāṃ Śrīsūktaṃ Japetsadā॥22॥

Varṣantu Te Vibhāvari Divo Abhrasya Vidyutaḥ।
Rohantu Sarvabījānyava Brahma Dviṣo Jahi॥23॥

Padmapriye Padmini Padmahaste Padmālaye Padmadalāyatākṣi।
Viśvapriye Viṣṇu Mano’nukūle Tvatpādapadmaṃ Mayi Sannidhatsva॥24॥

Yā Sā Padmāsanasthā Vipulakaṭitaṭī Padmapatrāyatākṣī।
Gambhīrā Vartanābhiḥ Stanabhara Namitā Śubhra Vastrottarīyā॥25॥

Akṣmīrdivyairgajendrairmaṇigaṇakhacitaissnāpitā Hemakumbhaiḥ।
Nityaṃ Sā Padmahastā Mama Vasatu Gṛhe Sarvamāṅgalyayuktā॥26॥

Lakṣmīṃ Kṣīrasamudra Rājatanayāṃ Śrīraṅgadhāmeśvarīm।
Dāsībhūtasamasta Deva Vanitāṃ Lokaika Dīpāṃkurām॥27॥

Śrīmanmandakaṭākṣalabdha Vibhava Brahmendragaṅgādharām।
Tvāṃ Trailokya Kuṭumbinīṃ Sarasijāṃ Vande Mukundapriyām॥28॥

Siddhalakṣmīrmokṣalakṣmīrjayalakṣmīssarasvatī।
Śrīlakṣmīrvaralakṣmīśca Prasannā Mama Sarvadā॥29॥

Varāṃkuśau Pāśamabhītimudrāṃ Karairvahantīṃ Kamalāsanasthām।
Bālārka Koṭi Pratibhāṃ Triṇetrāṃ Bhajehamādyāṃ Jagadīsvarīṃ Tvām॥30॥

Sarvamaṅgalamāṅgalye Śive Sarvārtha Sādhike।
Śaraṇye Tryambake Devi Nārāyaṇi Namo’stu Te॥
Nārāyaṇi Namo’stu Te॥ Nārāyaṇi Namo’stu Te॥31॥

Sarasijanilaye Sarojahaste Dhavalatarāṃśuka Gandhamālyaśobhe।
Bhagavati Harivallabhe Manojñe Tribhuvanabhūtikari Prasīda Mahyam॥32॥

Viṣṇupatnīṃ Kṣamāṃ Devīṃ Mādhavīṃ Mādhavapriyām।
Viṣṇoḥ Priyasakhīṃ Devīṃ Namāmyacyutavallabhām॥33॥

Mahālakṣmī Ca Vidmahe Viṣṇupatnī Ca Dhīmahi।
Tanno Lakṣmīḥ Pracodayāt॥34॥

Śrīvarcasyamāyuṣyamārogyamāvidhāt Pavamānaṃ Mahiyate।
Dhanaṃ Dhānyaṃ Paśuṃ Bahuputralābhaṃ Śatasaṃvatsaraṃ Dīrghamāyuḥ॥35॥

Ṛṇarogādidāridryapāpakṣudapamṛtyavaḥ।
Bhayaśokamanastāpā Naśyantu Mama Sarvadā॥36॥

Ya Evaṃ Veda।
Oṃ Mahādevyai Ca Vidmahe Viṣṇupatnī Ca Dhīmahi।
Tanno Lakṣmīḥ Pracodayāt
Oṃ Śāntiḥ Śāntiḥ Śāntiḥ॥37॥




हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥१॥

hiraṇyavarṇāṃ hariṇīṃ suvarṇarajatasrajām।
candrāṃ hiraṇmayīṃ lakṣmīṃ jātavedo ma āvaha॥1॥

हे जातवेदो, मेरे लिए उस लक्ष्मी का आह्वान करो जो सुनहरे रंग की, सुंदर और सोने और चांदी की मालाओं से सुशोभित हैं। (सोना सूर्य या तप की अग्नि का प्रतिनिधित्व करता है; चांदी चंद्रमा या शुद्ध सत्त्व के आनंद और सौंदर्य का प्रतिनिधित्व करती है।) जो एक सुनहरी आभा वाले चंद्रमा की तरह है, जो लक्ष्मी है, जो श्री का अवतार है;

O Jatavedo, invoke for me that Lakshmi who is of golden complexion, beautiful and adorned with gold and silver garlands. (Gold represents sun or the fire of tapas; silver represents moon or the bliss and beauty of pure sattva.) who is like the moon with a golden aura, who is Lakshmi, the embodiment of Sri;

तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्॥२॥

tāṃ ma āvaha jātavedo lakṣmīmanapagāminīm।
yasyāṃ hiraṇyaṃ vindeyaṃ gāmaśvaṃ puruṣānaham॥2॥



हे जातवेदो, मेरे लिए आह्वान करें कि लक्ष्मी, जो दूर नहीं जाती है, (श्री अचल, सर्वव्यापी और सभी सुंदरता का अंतर्निहित सार है। श्री के अवतार के रूप में देवी लक्ष्मी इस प्रकार अपने आवश्यक स्वभाव में गतिहीन हैं।) जिनके स्वर्ण स्पर्श से मुझे पशु, घोड़े, सन्तति और दास प्राप्त होंगे। स्वर्ण स्पर्श तप की अग्नि का प्रतिनिधित्व करता है जो देवी की कृपा से प्रयास की ऊर्जा के रूप में हमारे भीतर प्रकट होती है। मवेशी, घोड़े आदि प्रयास के बाद श्री के बाहरी रूप हैं।

O Jatavedo, invoke for me that Lakshmi, who does not go away, (Sri is non-moving, all-pervasive and the underlying essence of all beauty. Devi Lakshmi as the embodiment of Sri is thus non-moving in her essential nature.) By whose golden touch, I will obtain cattle, horses, progeny and servants. Golden touch represents the fire of tapas which manifests in us as the energy of effort by the grace of the Devi. Cattle, horses etc are external manifestations of Sri following the effort.

अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम्।
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम्॥३॥

aśvapūrvāṃ rathamadhyāṃ hastinādaprabodhinīm।
śriyaṃ devīmupahvaye śrīrmā devī juṣatām॥3॥


हे जातवेदो, मेरे लिए उस लक्ष्मी का आह्वान करें जो श्री के रथ में विराजमान हैं, जो सामने घोड़ों द्वारा संचालित है और जिनकी उपस्थिति हाथियों की तुरही से सुनाई देती है, (रथ श्री के निवास का प्रतिनिधित्व करता है और घोड़े प्रयास की ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करते हैं। हाथियों की तुरही ज्ञान के जागरण का प्रतिनिधित्व करती है)। उस देवी को बुलाओ जो श्री का अवतार है, ताकि समृद्धि की देवी मुझ पर प्रसन्न हो जाए। समृद्धि श्री की बाहरी अभिव्यक्ति है और इसलिए जब श्री का आह्वान किया जाता है तो प्रसन्नता होती है।


O Jatavedo, invoke for me that Lakshmi who is abiding in the chariot of Sri which is driven by horses in front and whose appearance is heralded by the trumpet of elephants, (chariot represents the abode of Sri and horses represents the energy of effort. The trumpet of elephants represents the awakening of wisdom). Invoke the devi who is the embodiment of Sri nearer so that the devi of prosperity becomes pleased with me. Prosperity is the external manifestation of Sri and is therefore pleased when Sri is invoked.

कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्॥४॥

kāṃ sosmitāṃ hiraṇyaprākārāmārdrāṃ jvalantīṃ tṛptāṃ tarpayantīm।
padme sthitāṃ padmavarṇāṃ tāmihopahvaye śriyam॥4॥


हे जातवेदो, मेरे लिए उस लक्ष्मी का आह्वान करो जो एक सुंदर मुस्कान है और जो एक नरम सुनहरी चमक से घिरी हुई है; जो सदा संतुष्ट है और उन सभी को संतुष्ट करती है जिन पर वह स्वयं को प्रकट करती है, (सुंदर मुस्कान श्री की दिव्य सुंदरता का प्रतिनिधित्व करती है जो तप की अग्नि की सुनहरी चमक से घिरी हुई है)। जो कमल में रहता है और कमल का रंग है; कमल कुंडलिनी के कमल का प्रतिनिधित्व करता है।

O Jatavedo, invoke for me that Lakshmi who is having a beautiful smile and who is enclosed by a soft golden glow; who is eternally satisfied and satisfies all those to whom she reveals herself, (beautiful smile represents the trancendental beauty of Sri who is enclosed by the golden glow of the fire of tapas). Who abides in the lotus and has the colour of the lotus; Lotus represents the lotus of kundalini.

चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्।
तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे॥५॥

candrāṃ prabhāsāṃ yaśasā jvalantīṃ śriyaṃ loke devajuṣṭāmudārām।
tāṃ padminīmīṃ śaraṇamahaṃ prapadye’lakṣmīrme naśyatāṃ tvāṃ vṛṇe॥5॥



हे जातवेदो, मेरे लिए उस लक्ष्मी का आह्वान करें जो श्री के अवतार हैं और जिनकी महिमा सभी लोकों में चंद्रमा के तेज की तरह चमकती है; जो कुलीन है और जिसकी देवताओं द्वारा पूजा की जाती है। मैं उनके चरणों में शरण लेता हूं, जो कमल में निवास करते हैं; उसकी कृपा से, भीतर और बाहर अलक्ष्मी (बुराई, संकट और गरीबी के रूप में) को नष्ट कर दें। कमल कुंडलिनी के कमल का प्रतिनिधित्व करता है।

O Jatavedo, invoke for me that Lakshmi who is the embodiment of Sri and whose glory shines like the splendour of the moon in all the worlds; who is noble and who is worshipped by the devas. I take refuge at her feet, who abides in the lotus; by her grace, let the alakshmi (in the form of evil, distress and poverty) within and without be destroyed. Lotus represents the lotus of kundalini.

आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसानुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः॥६॥

ādityavarṇe tapaso’dhijāto vanaspatistava vṛkṣo’tha bilvaḥ।
tasya phalāni tapasānudantu māyāntarāyāśca bāhyā alakṣmīḥ॥6॥


हे जातवेदो, मेरे लिए उस लक्ष्मी का आह्वान करो जो सूर्य के रंग की है और तप से पैदा हुई है; तपस जो एक विशाल पवित्र बिल्व वृक्ष के समान है। सूर्य का सुनहरा रंग तप की अग्नि का प्रतिनिधित्व करता है। तप के उस वृक्ष का फल भीतर के मोह और अज्ञान को और बाहर की अलक्ष्मी (बुराई, संकट और दरिद्रता के रूप में) को दूर भगा दे।


O Jatavedo, invoke for me that Lakshmi who is of the colour of the sun and born of tapas; the tapas which is like a huge sacred bilva tree. The golden colour of the sun represents the fire of tapas. Let the fruit of that tree of tapas drive away the delusion and ignorance within and the alakshmi (in the form of evil, distress and poverty) outside.

उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे॥७॥

upaitu māṃ devasakhaḥ kīrtiśca maṇinā saha।
prādurbhūto’smi rāṣṭre’smin kīrtimṛddhiṃ dadātu me॥7॥


हे जातवेदो, मेरे लिए आह्वान करें कि लक्ष्मी जिनकी उपस्थिति से देवों के साथी महिमा (आंतरिक समृद्धि) और विभिन्न रत्नों (बाहरी समृद्धि) के साथ मेरे पास आएंगे, और मैं श्री के दायरे में पुनर्जन्म होगा (आंतरिक परिवर्तन का प्रतीक) पवित्रता) जो मुझे आंतरिक महिमा और बाहरी समृद्धि प्रदान करेगी।

O Jatavedo, invoke for me that Lakshmi by whose presence will come near me the companions of the devas along with glory (inner prosperity) and various jewels (outer prosperity), and I will be reborn in the realm of Sri (signifying inner transformation towards purity) which will grant me inner glory and outer prosperity.

क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात्॥८॥

kṣutpipāsāmalāṃ jyeṣṭhāmalakṣmīṃ nāśayāmyaham।
abhūtimasamṛddhiṃ ca sarvāṃ nirṇuda me gṛhāt॥8॥



हे जातवेदो, मेरे लिए उस लक्ष्मी का आह्वान करें जिनकी उपस्थिति उनकी बड़ी बहन अलक्ष्मी से जुड़ी भूख, प्यास और अशुद्धता को नष्ट कर देगी, और मेरे घर से दुर्भाग्य और दुर्भाग्य को दूर कर देगी।

O Jatavedo, invoke for me that Lakshmi whose presence will destroy hunger, thirst and impurity associated with her elder sister alakshmi, and drive away the wretchedness and ill-fortune from my house.

गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरींग् सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्॥९॥

gandhadvārāṃ durādharṣāṃ nityapuṣṭāṃ karīṣiṇīm।
īśvarīṃg sarvabhūtānāṃ tāmihopahvaye śriyam॥9॥


हे जातवेदो, मेरे लिए आह्वान करें कि लक्ष्मी जो सभी सुगंधों की स्रोत हैं, जिनके पास जाना मुश्किल है, जो हमेशा बहुतायत से भरी रहती हैं और जहां भी वह खुद को प्रकट करती हैं, वहां बहुतायत का अवशेष छोड़ देती हैं। सभी प्राणियों में शासन करने वाली शक्ति कौन है; कृपया उसे यहाँ आमंत्रित करें, जो श्री का अवतार है।

O Jatavedo, invoke for me that Lakshmi who is the source of all fragrances, who is difficult to approach, who is always filled with abundance and leaves a residue of abundance wherever she reveals herself. Who is the ruling power in all beings; Please invoke her here, who is the embodiment of Sri.

मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः॥१०॥

manasaḥ kāmamākūtiṃ vācaḥ satyamaśīmahi।
paśūnāṃ rūpamannasya mayi śrīḥ śrayatāṃ yaśaḥ॥10॥



हे जातवेदो, मेरे लिए उस लक्ष्मी का आह्वान करो जिसके लिए मेरा हृदय वास्तव में तरसता है और जिस तक मेरी वाणी वास्तव में पहुँचने का प्रयास करती है, जिसकी उपस्थिति से मेरे जीवन में (बाहरी) समृद्धि के रूप में पशु, सौंदर्य और भोजन आएगा और कौन निवास करेगा (अर्थात प्रकट) मुझ में (आंतरिक) श्री की महिमा के रूप में।

O Jatavedo, invoke for me that Lakshmi for whom my heart truly yearns and to whom my speech truly tries to reach, by whose presence will come cattle, beauty and food in my life as (external) prosperity and who will reside (i.e. reveal) in me as (inner) glory of Sri.

कर्दमेन प्रजाभूता मयि सम्भव कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्॥११॥

kardamena prajābhūtā mayi sambhava kardama।
śriyaṃ vāsaya me kule mātaraṃ padmamālinīm॥11॥


हे कर्दम, मेरे लिए अपनी माता का आह्वान करो। जैसा कि कर्दम (मिट्टी द्वारा दर्शाई गई पृथ्वी का उल्लेख करते हुए) मानव जाति के अस्तित्व के लिए आधार के रूप में कार्य करता है। इसी तरह हे कर्दम (अब देवी लक्ष्मी के पुत्र कर्दम ऋषि का जिक्र करते हुए आप मेरे साथ रहें, और अपक्की माता को मेरे घराने में रहने का कारण हो; आपकी माँ जो श्री के अवतार हैं और कमल से घिरी हुई हैं।


O Kardama, invoke for me your mother. As Kardama (referring to earth represented by mud) acts as the substratum for the existence of mankind. Similarly O Kardama (now referring to sage Kardama, the son of devi Lakshmi you stay with me, and be the cause to bring your mother to dwell in my family; your mother who is the embodiment of Sri and encircled by lotuses.

आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले॥१२॥

āpaḥ sṛjantu snigdhāni ciklīta vasa me gṛhe।
ni ca devīṃ mātaraṃ śriyaṃ vāsaya me kule॥12॥

हे चिक्लिता, मुझे अपनी माँ के लिए बुलाओ। जैसे चिक्लिता (पानी द्वारा दर्शाई गई नमी का जिक्र करते हुए) अपनी उपस्थिति से सभी चीजों में सुंदरता पैदा करती है। इसी तरह हे चिक्लिता (अब चिक्लिता का जिक्र करते हुए, देवी लक्ष्मी के पुत्र, आप मेरे साथ रहें, और अपनी उपस्थिति से अपनी माँ, देवी को मेरे परिवार में रहने के लिए ले आओ, जो श्री (और सभी सुंदरता का सार) का अवतार हैं।

O Chiklita, invoke for me your mother. As Chiklita (referring to moisture represented by water) creates loveliness in all things by its presence. Similarly O Chiklita (now referring to Chiklita, the son of devi Lakshmi you stay with me, and by your presence bring your mother, the devi who is the embodiment of Sri (and essence of all loveliness) to dwell in my family.

आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥१३॥

ārdrāṃ puṣkariṇīṃ puṣṭiṃ piṅgalāṃ padmamālinīm।
candrāṃ hiraṇmayīṃ lakṣmīṃ jātavedo ma āvaha॥13॥



हे जातवेदो, मेरे लिए उस लक्ष्मी का आह्वान करो जो कमल के तालाब की नमी की तरह है जो एक आत्मा को पोषण देती है (उसकी सुखदायक सुंदरता के साथ); और जो हल्के पीले कमल से घिरा हुआ है, जो सोने की आभा वाले चंद्रमा के समान है; हे जाटवेदो, कृपया मेरे लिए उस लक्ष्मी का आह्वान करें। चंद्रमा के रूप में देवी लक्ष्मी श्री के दिव्य आनंद और सुंदरता का प्रतिनिधित्व करती हैं। इस सुखदायक सुंदरता की तुलना कमल के तालाब की नमी से की जाती है जो आत्मा को पोषण देता है।

O Jatavedo, invoke for me that Lakshmi who is like the moisture of a lotus pond which nourishes a soul (with her soothing loveliness); and who is encircled by light yellow lotuses, who is like a moon with a golden aura; O Jatavedo, please invoke that Lakshmi for me. Devi Lakshmi in the form of a moon represents the transcendental bliss and beauty of Sri. This soothing loveliness is compared with the moisture of a lotus pond which nourishes a soul.

आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥१४॥

ārdrāṃ yaḥ kariṇīṃ yaṣṭiṃ suvarṇāṃ hemamālinīm।
sūryāṃ hiraṇmayīṃ lakṣmīṃ jātavedo ma āvaha॥14॥


हे जातवेदो, मेरे लिए उस लक्ष्मी का आह्वान करें जो नमी की तरह है (लाक्षणिक रूप से ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करती है) जो गतिविधियों के प्रदर्शन का समर्थन करती है; और जो सोने से घिरा हुआ है (तप की आग की चमक), जो सोने की आभा वाले सूर्य के समान है; हे जाटवेदो, कृपया मेरे लिए उस लक्ष्मी का आह्वान करें। सूर्य के रूप में देवी लक्ष्मी तप की अग्नि का प्रतिनिधित्व करती हैं। इस आग की तुलना गतिविधियों के भीतर नमी से की जाती है, नमी आलंकारिक रूप से ऊर्जा को दर्शाती है। तप की अग्नि गतिविधियों की ऊर्जा के रूप में प्रकट होती है।


O Jatavedo, invoke for me that Lakshmi who is like the moisture (figuratively representing energy) which supports the performance of activities; and who is encircled by gold (glow of the fire of tapas), who is like a sun with a golden aura; O Jatavedo, please invoke that Lakshmi for me. Devi Lakshmi in the form of a sun represents the fire of tapas. This fire is compared with the moisture within activities, the moisture figuratively signifying energy. The fire of tapas manifests as the energy of activities.

तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पूरुषानहम्॥१५॥

tāṃ ma āvaha jātavedo lakṣmīmanapagāminīm।
yasyāṃ hiraṇyaṃ prabhūtaṃ gāvo dāsyo’śvān vindeyaṃ pūruṣānaham॥15॥


हे जातवेदो, मेरे लिए उस लक्ष्मी का आह्वान करो, जो दूर नहीं जाती। श्री अचल, सर्वव्यापी और सभी सौंदर्य का अंतर्निहित सार है। श्री के अवतार के रूप में देवी लक्ष्मी इस प्रकार अपने आवश्यक स्वभाव में गतिहीन हैं। जिसके सुनहरे स्पर्श से मैं (अर्थात् श्री प्रकट होगा) प्रचुर मात्रा में पशु, सेवक, घोड़े और संतान प्राप्त करूंगा। स्वर्ण स्पर्श तप की अग्नि का प्रतिनिधित्व करता है जो देवी की कृपा से प्रयास की ऊर्जा के रूप में हमारे भीतर प्रकट होती है। मवेशी, घोड़े आदि प्रयास के बाद श्री के बाहरी रूप हैं।

O Jatavedo, invoke for me that Lakshmi, who does not go away. Sri is non-moving, all-pervasive and the underlying essence of all beauty. Devi Lakshmi as the embodiment of Sri is thus non-moving in her essential nature. By whose golden touch I will obtain (i.e. Sri will be manifested as) abundant cattle, servants, horses and progeny. Golden touch represents the fire of tapas which manifests in us as the energy of effort by the grace of the devi. cattle, horses etc are external manifestations of Sri following the effort.

यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्।
सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत्॥१६॥

yaḥ śuciḥ prayato bhūtvā juhuyādājyamanvaham।
sūktaṃ pañcadaśarcaṃ ca śrīkāmaḥ satataṃ japet॥16॥


जो लोग शारीरिक रूप से शुद्ध और भक्तिभाव से निवृत्त होकर प्रतिदिन मक्खन से यज्ञ करते हैं, वे श्री सूक्त के पन्द्रह श्लोकों का निरंतर पाठ करते हुए देवी लक्ष्मी की कृपा से श्री की कामना पूरी करते हैं।

Those who after becoming bodily clean and devotionally disposed perform sacrificial offering with butter day after day, by constantly reciting the fifteen verses of Sri suktam will have their longing for Sri fulfilled by the grace of devi Lakshmi.

पद्मानने पद्म ऊरु पद्माक्षी पद्मासम्भवे।
त्वं मां भजस्व पद्माक्षी येन सौख्यं लभाम्यहम्॥१७॥

padmānane padma ūru padmākṣī padmāsambhave।
tvaṃ māṃ bhajasva padmākṣī yena saukhyaṃ labhāmyaham॥17॥


माँ लक्ष्मी को नमस्कार जिनका मुख कमल का है, जो कमल द्वारा समर्थित (जांघ द्वारा इंगित) हैं, जिनकी आँखें कमल की हैं और जो कमल से उत्पन्न हुई हैं। कमल कुंडलिनी को इंगित करता है। चेहरा व्यक्ति की प्रकृति को इंगित करता है, जांघें समर्थन को इंगित करती हैं और आंखें आध्यात्मिक दृष्टि को इंगित करती हैं। यह श्लोक मां लक्ष्मी के दिव्य स्वरूप का वर्णन करता है। वह योग से पैदा हुई है, योग से जुड़ी हुई है और एक भक्त को उसकी आध्यात्मिक दृष्टि से प्रकट करती है। हे माँ, आप मुझमें तीव्र भक्ति से उत्पन्न आध्यात्मिक दृष्टि (कमल की आँखों से संकेतित) में प्रकट होती हैं, जिससे मैं दिव्य आनंद से भर जाता हूँ (अर्थात प्राप्त करता हूँ)।

Salutations to mother Lakshmi whose face is of lotus, who is supported (indicated by thigh) by lotus, whose eyes are of lotus and who is born of lotus. Lotus indicates kundalini. Face indicates the nature of a person, thighs indicate support and eyes indicate the spiritual vision. This verse describes the transcendental nature of mother Lakshmi. she is born of yoga, united with yoga and revealed to a devotee in his spiritual vision. O mother, you manifest in me in the spiritual vision (indicated by lotus eyes ) born of intense devotion by which I am filled with (i.e. obtain) divine bliss.

अश्वदायि गोदायि धनदायि महाधने।
धनं मे जुषतां देवि सर्वकामांश्च देहि मे॥१८॥

aśvadāyi godāyi dhanadāyi mahādhane।
dhanaṃ me juṣatāṃ devi sarvakāmāṃśca dehi me॥18॥


सभी को घोड़े, गाय और धन की दाता माँ लक्ष्मी को नमस्कार; और जो इस संसार में बड़ी बहुतायत का स्रोत है। हे देवी, कृपया मुझे धन (आंतरिक और बाहरी दोनों) प्रदान करने और मेरी सभी आकांक्षाओं को पूरा करने की कृपा करें।

Salutations to mother Lakshmi who is the giver of horses, cows and wealth to all; and who is the source of the great abundance in this world. O devi, please be gracious to grant wealth (both inner and outer) to me and fulfil all my aspirations.

पुत्रपौत्र धनं धान्यं हस्त्यश्वादिगवे रथम्।
प्रजानां भवसि माता आयुष्मन्तं करोतु माम्॥१९॥

putrapautra dhanaṃ dhānyaṃ hastyaśvādigave ratham।
prajānāṃ bhavasi mātā āyuṣmantaṃ karotu mām॥19॥


माता लक्ष्मी को प्रणाम। हे माता, हमें अपने वंश को जारी रखने के लिए बच्चों और पोते-पोतियों के साथ प्रदान करें; और धन, अनाज, हाथी, घोड़े, गाय और हमारे दैनिक उपयोग के लिए गाड़ियां। हे माता, हम तेरी सन्तान हैं; कृपया हमारे जीवन को लंबा और जोश से भरा बनाएं।

Salutations to mother Lakshmi. O mother, bestow us with children and grandchildren to continue our lineage; and wealth, grains, elephants, horses, cows and carriages for our daily use. We are your children, O mother; please make our lives long and full of vigour.

धनमग्निर्धनं वायुर्धनं सूर्यो धनं वसुः।
धनमिन्द्रो बृहस्पतिर्वरुणं धनमश्नुते॥२०॥

dhanamagnirdhanaṃ vāyurdhanaṃ sūryo dhanaṃ vasuḥ।
dhanamindro bṛhaspatirvaruṇaṃ dhanamaśnute॥20॥


माता लक्ष्मी को प्रणाम। हे माँ, आप (धनम द्वारा इंगित) अग्नि (अग्नि के देवता) के पीछे की शक्ति हैं, आप वायु (हवा के देवता) के पीछे की शक्ति हैं, आप सूर्य (सूर्य के देवता) के पीछे की शक्ति हैं, आप हैं वसु (आकाशीय प्राणी) के पीछे की शक्ति। आप इंद्र, बृहस्पति और वरुण (जल के देवता) के पीछे की शक्ति हैं; आप हर चीज के पीछे सर्वव्यापी सार हैं।

Salutations to mother Lakshmi. O mother, you (indicated by dhanam) are the power behind agni (the god of fire), you are the power behind vayu (the god of wind), you are the power behind surya (the god of sun), you are the power behind the vasus (celestial beings). You are the power behind indra, vrhaspati and varuna (the god of water); you are the all-pervading essence behind everything.

वैनतेय सोमं पिब सोमं पिबतु वृत्रहा।
सोमं धनस्य सोमिनो मह्यं ददातु सोमिनः॥२१॥

vainateya somaṃ piba somaṃ pibatu vṛtrahā।
somaṃ dhanasya somino mahyaṃ dadātu sominaḥ॥21॥

माँ लक्ष्मी को नमस्कार जो श्री विष्णु को अपने हृदय में धारण करते हैं (जैसे विनता के पुत्र गरुड़ उन्हें अपनी पीठ पर बिठाते हैं) हमेशा सोम (भीतर दिव्य आनंद) पीते हैं; सभी अपनी इच्छाओं के आंतरिक शत्रुओं का नाश करके उस सोम को पी लें (इस प्रकार श्री विष्णु के निकट हो जाते हैं)। वह सोम श्री से उत्पन्न होता है जो सोम (दिव्य आनंद) का अवतार है; हे माँ, कृपया मुझे भी वह सोम दे दो, तुम जो उस सोम के स्वामी हो।

Salutations to mother Lakshmi those who carry Sri Vishnu in their heart (like Garuda, the son of Vinata carries him on his back) always drink soma (the divine bliss within); let all drink that soma by destroying their inner enemies of desires (thus gaining nearness to Sri Vishnu). That soma originates from Sri who is the embodiment of soma (the divine bliss); O mother, please give that soma to me too, you who are the possessor of that soma.

न क्रोधो न च मात्सर्य न लोभो नाशुभा मतिः।
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां श्रीसूक्तं जपेत्सदा॥२२॥

na krodho na ca mātsarya na lobho nāśubhā matiḥ।
bhavanti kṛtapuṇyānāṃ bhaktānāṃ śrīsūktaṃ japetsadā॥22॥


माँ लक्ष्मी को प्रणाम, न तो क्रोध और न ही ईर्ष्या, न लालच और न ही बुरे उद्देश्य उन भक्तों में आ सकते हैं जिन्होंने हमेशा भक्ति के साथ महान श्री सूक्तम का पाठ किया है।

Salutations to mother Lakshmi neither anger nor jealousy, neither greed nor evil intentions can exist in the devotees who have acquired merit by always reciting with devotion the great Sri Suktam.

वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः।
रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्म द्विषो जहि॥२३॥

varṣantu te vibhāvari divo abhrasya vidyutaḥ।
rohantu sarvabījānyava brahma dviṣo jahi॥23॥


माता लक्ष्मी को प्रणाम। हे माँ, कृपया अपनी कृपा के प्रकाश को बिजली की तरह गरज-बादल से भरे आकाश में बरसाएँ और भेदभाव के सभी बीजों को एक उच्च आध्यात्मिक स्तर पर चढ़ाएँ; हे माता, आप ब्रह्म स्वरूप की और समस्त द्वेष का नाश करने वाली हैं।

Salutations to mother Lakshmi. O mother, please shower your light of grace like lightning in a sky filled with thunder-cloud and ascend all the seeds of differentiation to a higher spiritual plane; O mother, you are of the nature of brahman and destroyer of all hatred.

पद्मप्रिये पद्मिनि पद्महस्ते पद्मालये पद्मदलायताक्षि।
विश्वप्रिये विष्णु मनोऽनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व॥२४॥

padmapriye padmini padmahaste padmālaye padmadalāyatākṣi।
viśvapriye viṣṇu mano’nukūle tvatpādapadmaṃ mayi sannidhatsva॥24॥


कमल को प्रिय, कमल को धारण करने वाली, हाथों में कमल धारण करने वाली, कमल के धाम में वास करने वाली और कमल की पंखुडियों के समान नेत्रों वाली लक्ष्मी जी को प्रणाम (अर्थात सहमत) श्री विष्णु (अर्थात धर्म के मार्ग का अनुसरण करता है); हे माता, मुझे आशीर्वाद दो कि मैं अपने भीतर आपके चरणकमलों के समीप आ जाऊं। कमल कुंडलिनी को इंगित करता है।

Salutations to mother Lakshmi. O mother, please shower your light of grace like lightning in a sky filled with thunder-cloud and ascend all the seeds of differentiation to a higher spiritual plane; O mother, you are of the nature of brahman and destroyer of all hatred.

या सा पद्मासनस्था विपुलकटितटी पद्मपत्रायताक्षी।
गम्भीरा वर्तनाभिः स्तनभर नमिता शुभ्र वस्त्रोत्तरीया॥२५॥

yā sā padmāsanasthā vipulakaṭitaṭī padmapatrāyatākṣī।
gambhīrā vartanābhiḥ stanabhara namitā śubhra vastrottarīyā॥25॥


कमल के पत्ते की तरह चौड़े कूल्हे और आंखों के साथ अपने सुंदर रूप के साथ कमल पर खड़ी मां लक्ष्मी को नमस्कार। उसकी गहरी नाभि (चरित्र की गहराई का संकेत) अंदर की ओर मुड़ी हुई है, और अपनी पूरी छाती (बहुतायत और करुणा का संकेत) के साथ वह (भक्तों की ओर) थोड़ी झुकी हुई है; और वह शुद्ध श्वेत वस्त्र पहिने हुए है।

Salutations to mother Lakshmi who stands on lotus with her beautiful form, with wide hip and eyes like the lotus leaf. Her deep navel (indicating depth of character) is bent inwards, and with her full bosom (indicating abundance and compassion) she is slightly bent down (towards the devotees); and she is dressed in pure white garments.

लक्ष्मीर्दिव्यैर्गजेन्द्रैर्मणिगणखचितैस्स्नापिता हेमकुम्भैः।
नित्यं सा पद्महस्ता मम वसतु गृहे सर्वमाङ्गल्ययुक्ता॥२६॥

lakṣmīrdivyairgajendrairmaṇigaṇakhacitaissnāpitā hemakumbhaiḥ।
nityaṃ sā padmahastā mama vasatu gṛhe sarvamāṅgalyayuktā॥26॥


विभिन्न रत्नों से जड़े हुए सर्वश्रेष्ठ आकाशीय हाथियों, जो हाथों में कमल के साथ अनन्त हैं, द्वारा सोने के घड़े के पानी से स्नान करने वाली माँ लक्ष्मी को नमस्कार; जो सभी शुभ गुणों से युक्त है; हे माता, मेरे घर में निवास करो और अपनी उपस्थिति से इसे शुभ बनाओ।

Salutations to mother Lakshmi who is bathed with water from golden pitcher by the best of celestial elephants who are studded with various gems, who is eternal with lotus in her hands; who is united with all the auspicious attributes; O mother, please reside in my house and make it auspicious by your presence.

लक्ष्मीं क्षीरसमुद्र राजतनयां श्रीरङ्गधामेश्वरीम्।
दासीभूतसमस्त देव वनितां लोकैक दीपांकुराम्॥२७॥

lakṣmīṃ kṣīrasamudra rājatanayāṃ śrīraṅgadhāmeśvarīm।
dāsībhūtasamasta deva vanitāṃ lokaika dīpāṃkurām॥27॥


सागर के राजा की पुत्री माँ लक्ष्मी को नमस्कार; जो श्री विष्णु के निवास क्षीर समुद्र (शाब्दिक रूप से दूधिया सागर) में रहने वाली महान देवी हैं। जिनकी सेवा देवता अपने सेवकों के साथ करते हैं, और जो सभी लोकों में एक प्रकाश है जो हर प्रकट के पीछे उगता है।

Salutations to mother Lakshmi who is the daughter of the king of ocean; who is the great goddess residing in kseera samudra (literally milky ocean), the abode of Sri Vishnu. Who is served by the devas along with their servants, and who is the one light in all the worlds which sprouts behind every manifestation.

श्रीमन्मन्दकटाक्षलब्ध विभव ब्रह्मेन्द्रगङ्गाधराम्।
त्वां त्रैलोक्य कुटुम्बिनीं सरसिजां वन्दे मुकुन्दप्रियाम्॥२८॥

śrīmanmandakaṭākṣalabdha vibhava brahmendragaṅgādharām।
tvāṃ trailokya kuṭumbinīṃ sarasijāṃ vande mukundapriyām॥28॥


माँ लक्ष्मी को प्रणाम, जिनकी कृपा से उनकी सुंदर कोमल दृष्टि से भगवान ब्रह्मा, इंद्र और गंगाधर (शिव) महान हो जाते हैं। हे माँ, आप तीनों लोकों में कमल की तरह विशाल परिवार की माँ के रूप में खिलती हैं; आप सभी के द्वारा प्रशंसा की जाती है और आप मुकुंद के प्रिय हैं।

Salutations to mother Lakshmi by obtaining whose grace through her beautiful soft glance, lord Brahma, Indra and Gangadhara (Shiva) become great. O mother, you blossom in the three worlds like a lotus as the mother of the vast family; you are praised by all and you are the beloved of Mukunda.

सिद्धलक्ष्मीर्मोक्षलक्ष्मीर्जयलक्ष्मीस्सरस्वती।
श्रीलक्ष्मीर्वरलक्ष्मीश्च प्रसन्ना मम सर्वदा॥२९॥

siddhalakṣmīrmokṣalakṣmīrjayalakṣmīssarasvatī।
śrīlakṣmīrvaralakṣmīśca prasannā mama sarvadā॥29॥


माता लक्ष्मी को प्रणाम। हे माँ, आपके विभिन्न रूप – सिद्ध लक्ष्मी, मोक्ष लक्ष्मी, जय लक्ष्मी, सरस्वती, श्री लक्ष्मी और वर लक्ष्मी हमेशा मुझ पर कृपा करें।

Salutations to mother Lakshmi. O mother, may your different forms – Siddha Lakshmi, Moksha Lakshmi, Jaya Lakshmi, Saraswati, Sri Lakshmi and Vara Lakshmi always be gracious to me.

वरांकुशौ पाशमभीतिमुद्रां करैर्वहन्तीं कमलासनस्थाम्।
बालार्क कोटि प्रतिभां त्रिणेत्रां भजेहमाद्यां जगदीस्वरीं त्वाम्॥३०॥

varāṃkuśau pāśamabhītimudrāṃ karairvahantīṃ kamalāsanasthām।
bālārka koṭi pratibhāṃ triṇetrāṃ bhajehamādyāṃ jagadīsvarīṃ tvām॥30॥


आपके चार हाथों से माँ लक्ष्मी को नमस्कार – पहला वर मुद्रा (वरदान देने का इशारा), दूसरा अंगकुश (हुक), तीसरा पाशा (फंदा) और चौथा अभिति मुद्रा (निर्भयता का इशारा) में – वरदान, आश्वासन विघ्नों में सहायता, बंधनों को तोड़ने का आश्वासन और निर्भयता; जैसे आप कमल पर खड़े होते हैं (भक्तों पर कृपा बरसाने के लिए)। मैं आपकी पूजा करता हूं, ब्रह्मांड की आदि देवी, जिनकी तीन आंखों से लाखों नए उगते सूरज (यानी अलग-अलग दुनिया) प्रकट होते हैं।

Salutations to mother Lakshmi from your four hands – first in vara mudra (gesture of boon-giving), second holding angkusha (hook), third holding a pasha (noose) and fourth in abhiti mudra (gesture of fearlessness) – flows boons, assurance of help during obstacles, assurance of breaking our bondages and fearlessness; as you stand on the lotus (to shower grace on the devotees). I worship you, O primordial goddess of the universe, from whose three eyes appear millions of newly risen suns (i.e. different worlds).

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
नारायणि नमोऽस्तु ते॥ नारायणि नमोऽस्तु ते॥३१॥

sarvamaṅgalamāṅgalye śive sarvārtha sādhike।
śaraṇye tryambake devi nārāyaṇi namo’stu te॥
nārāyaṇi namo’stu te॥ nārāyaṇi namo’stu te॥31॥


माँ लक्ष्मी को नमस्कार, जो सभी शुभ में शुभ हैं, स्वयं शुभ हैं, सभी शुभ गुणों से परिपूर्ण हैं, और जो भक्तों के सभी उद्देश्यों (पुरुषार्थों – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) को पूरा करती हैं। हे नारायणी, जो शरण दाता और तीन नेत्रों वाली हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे नारायणी, मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ; हे नारायणी, मैं आपको प्रणाम करता हूँ।

Salutations to mother Lakshmi who is the auspiciousness in all the auspicious, auspiciousness herself, complete with all the auspicious attributes, and who fulfills all the objectives of the devotees (purusharthas – dharma, artha, kama and moksha). I salute you O Narayani, the devi who is the giver of refuge and with three eyes. I salute you O Narayani; I salute you O Narayani.

सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरांशुक गन्धमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्॥३२॥

sarasijanilaye sarojahaste dhavalatarāṃśuka gandhamālyaśobhe।
bhagavati harivallabhe manojñe tribhuvanabhūtikari prasīda mahyam॥32॥


कमल में निवास करने वाली और हाथों में कमल धारण करने वाली माँ लक्ष्मी को नमस्कार; चमकदार सफेद वस्त्र पहने और सबसे सुगंधित माला से सजाए गए, वह एक दिव्य आभा बिखेरती है। हे देवी, आप हरि के सबसे प्यारे और सबसे मनोरम हैं; आप तीनों लोकों के कल्याण और समृद्धि के स्रोत हैं; हे माता, मुझ पर कृपा करें।

Salutations to mother Lakshmi who abides in lotus and holds lotus in her hands; dressed in dazzling white garments and decorated with the most fragrant garlands, she radiates a divine aura. O goddess, you are dearer than the dearest of Hari and the most captivating; you are the source of wellbeing and prosperity of all the three worlds; O mother, please be gracious to me.

विष्णुपत्नीं क्षमां देवीं माधवीं माधवप्रियाम्।
विष्णोः प्रियसखीं देवीं नमाम्यच्युतवल्लभाम्॥३३॥

viṣṇupatnīṃ kṣamāṃ devīṃ mādhavīṃ mādhavapriyām।
viṣṇoḥ priyasakhīṃ devīṃ namāmyacyutavallabhām॥33॥


माता लक्ष्मी को प्रणाम। हे देवी, आप श्री विष्णु की पत्नी और सहनशीलता का अवतार हैं; आप माधव (संक्षेप में) के साथ एक हैं और उन्हें बेहद प्रिय हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूं, हे देवी जो श्री विष्णु की प्रिय साथी हैं और अच्युत की अत्यंत प्रिय हैं (श्री विष्णु का दूसरा नाम जिसका शाब्दिक अर्थ अचूक है)।

Salutations to mother Lakshmi. O devi, you are the consort of Sri Vishnu and the embodiment of forbearance; you are one with Madhava (in essence) and extremely dear to him. I salute you O devi who is the dear companion of Sri Vishnu and extremely beloved of Acyuta (another name of Sri Vishnu literally meaning infallible).

महालक्ष्मी च विद्महे विष्णुपत्नी च धीमहि।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्॥३४॥

mahālakṣmī ca vidmahe viṣṇupatnī ca dhīmahi।
tanno lakṣmīḥ pracodayāt॥34॥


माँ लक्ष्मी को नमस्कार हम उनका ध्यान करके महालक्ष्मी के दिव्य सार को जान सकते हैं, जो श्री विष्णु की पत्नी हैं, लक्ष्मी के उस दिव्य सार को हमारी आध्यात्मिक चेतना को जगाने दें।

Salutations to mother Lakshmi may we know the divine essence of Mahalakshmi by meditating on her, who is the consort of Sri Vishnu, let that divine essence of Lakshmi awaken our spiritual consciousness.

श्रीवर्चस्यमायुष्यमारोग्यमाविधात् पवमानं महियते।
धनं धान्यं पशुं बहुपुत्रलाभं शतसंवत्सरं दीर्घमायुः॥३५॥

śrīvarcasyamāyuṣyamārogyamāvidhāt pavamānaṃ mahiyate।
dhanaṃ dhānyaṃ paśuṃ bahuputralābhaṃ śatasaṃvatsaraṃ dīrghamāyuḥ॥35॥


माता लक्ष्मी को प्रणाम। हे माँ, हमारे जीवन में आपकी शुभता को जीवन शक्ति के रूप में प्रवाहित करें, हमारे जीवन को लंबा और स्वस्थ और आनंद से भर दें। और धन, अन्न, पशु, और सौ वर्ष तक सुखी रहनेवाले बहुत से वंशों के रूप में तेरा कल्याण प्रकट हो; जो अपने लंबे जीवन में खुशी से रहते हैं।

Salutations to mother Lakshmi. O mother, let your auspiciousness flow in our lives as the vital power, making our lives long and healthy, and filled with joy. And let your auspiciousness manifest around as wealth, grains, cattle and many offsprings who live happily for hundred years; who live happily throughout their long lives.

ऋणरोगादिदारिद्र्यपापक्षुदपमृत्यवः।
भयशोकमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा॥३६॥

ṛṇarogādidāridryapāpakṣudapamṛtyavaḥ।
bhayaśokamanastāpā naśyantu mama sarvadā॥36॥


माता लक्ष्मी को प्रणाम। हे माँ, (कृपया मेरे) ऋण, बीमारी, गरीबी, पाप, भूख और आकस्मिक मृत्यु की संभावना को दूर करें और मेरे भय, दुःख और मानसिक पीड़ा को भी दूर करें; हे माँ, कृपया उन्हें हमेशा हटा दें।

Salutations to mother Lakshmi. O mother, (please remove my) debts, illness, poverty, sins, hunger and the possibility of accidental death and also remove my fear, sorrow and mental anguish; O mother, please remove them always.

य एवं वेद।
ॐ महादेव्यै च विद्महे विष्णुपत्नी च धीमहि।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥३७॥

ya evaṃ veda।
oṃ mahādevyai ca vidmahe viṣṇupatnī ca dhīmahi।
tanno lakṣmīḥ pracodayāt
oṃ śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ॥37॥


यह (महालक्ष्मी का सार वास्तव में वेद (परम ज्ञान) है। हम महान देवी के दिव्य सार को उनका ध्यान करके जान सकते हैं, जो श्री विष्णु की पत्नी हैं, लक्ष्मी के उस दिव्य सार को हमारी आध्यात्मिक चेतना को जागृत करें। ओम शांति शांति शांति।

This (the essence of mahaLakshmi indeed is veda (the ultimate knowledge). May we know the divine essence of the great devi by meditating


श्री सूक्त पाठ का भारतीय संस्कृति में विशेष स्थान है और इसे नियमित रूप से पढ़ने के कई लाभ बताए गए हैं। सबसे महत्वपूर्ण लाभ यह है कि इस पाठ से देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। देवी लक्ष्मी को धन, समृद्धि, और सुख-शांति की देवी माना जाता है, और उनके आशीर्वाद से जीवन में आर्थिक स्थिरता और समृद्धि का वास होता है। नियमित रूप से श्री सूक्त पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में धन-धान्य की कमी नहीं रहती और आर्थिक संकट दूर होते हैं।

दूसरा लाभ यह है कि श्री सूक्त पाठ से मन और आत्मा को शांति मिलती है। यह पाठ मानसिक तनाव और चिंता को कम करता है, जिससे व्यक्ति अधिक सकारात्मक और उर्जावान महसूस करता है। इसके उच्चारण से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जो नकारात्मक विचारों और भावनाओं को दूर करने में मदद करता है। इस प्रकार, श्री सूक्त पाठ न केवल आर्थिक समृद्धि लाता है, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक शांति भी प्रदान करता है।

श्री सूक्त पाठ का एक और महत्वपूर्ण लाभ है कि यह घर और परिवार में सुख-शांति और सौहार्द्र का माहौल बनाता है। इस पाठ को करने से घर में सुख-शांति बनी रहती है और पारिवारिक संबंध मजबूत होते हैं। देवी लक्ष्मी की कृपा से घर में सदस्यों के बीच प्रेम और सामंजस्य बढ़ता है, जिससे सभी कार्य सफलतापूर्वक संपन्न होते हैं।

अंत में, श्री सूक्त पाठ का नियमित अभ्यास करने से व्यक्ति की आंतरिक शक्ति और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। यह पाठ व्यक्ति को जीवन के सभी पहलुओं में सफल होने की प्रेरणा और शक्ति प्रदान करता है। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी व्यक्ति धैर्य और साहस से सामना कर सकता है। इस प्रकार, श्री सूक्त पाठ जीवन को संपूर्ण रूप से समृद्ध और सुखमय बनाने में सहायक होता है।

श्री सूक्त पाठ करने के लिए कुछ विशेष नियमों का पालन करना महत्वपूर्ण होता है ताकि इस पवित्र मंत्र का अधिकतम लाभ प्राप्त किया जा सके। सबसे पहला नियम यह है कि पाठ करते समय मन को एकाग्र और शुद्ध रखना चाहिए। पाठ शुरू करने से पहले स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करना चाहिए और पाठ के स्थान को भी स्वच्छ रखना चाहिए। यह भी ध्यान रखें कि पाठ के दौरान किसी प्रकार का मानसिक या शारीरिक विक्षेप न हो, जिससे देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त हो सके।

दूसरा नियम यह है कि श्री सूक्त पाठ को सविधि और सही उच्चारण के साथ करना चाहिए। मंत्र का उच्चारण शुद्ध और स्पष्ट होना चाहिए ताकि उसकी ऊर्जा और शक्ति को पूरी तरह से महसूस किया जा सके। अगर आप संस्कृत में पाठ नहीं कर सकते हैं, तो आप इसे हिंदी में भी पढ़ सकते हैं, लेकिन मंत्रों के उच्चारण में त्रुटि नहीं होनी चाहिए। अगर संभव हो, तो ब्राह्मणों या योग्य विद्वानों से सही उच्चारण और विधि का ज्ञान प्राप्त करें।

तीसरा नियम यह है कि श्री सूक्त पाठ को नियमित रूप से किया जाना चाहिए। यदि आप इस पाठ से अधिकतम लाभ प्राप्त करना चाहते हैं, तो इसे नियमित रूप से करना अत्यंत आवश्यक है। इसे रोज़ाना करना सबसे अच्छा होता है, विशेषकर शुक्रवार के दिन, क्योंकि यह दिन देवी लक्ष्मी को समर्पित माना जाता है। यदि रोज़ाना संभव न हो, तो कम से कम सप्ताह में एक बार इसे जरूर करना चाहिए।

अंत में, श्री सूक्त पाठ करते समय श्रद्धा और विश्वास का होना सबसे महत्वपूर्ण है। इस पाठ को करते समय देवी लक्ष्मी के प्रति सच्ची भक्ति और समर्पण का भाव होना चाहिए। पाठ के अंत में देवी लक्ष्मी से अपनी इच्छाओं और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करें। यह विश्वास रखें कि देवी लक्ष्मी आपकी प्रार्थना सुनेंगी और आपको अपने आशीर्वाद से समृद्ध करेंगी। पाठ के बाद किसी भी प्रकार का अन्न या धन का दान करना भी शुभ माना जाता है, जिससे देवी लक्ष्मी की कृपा और अधिक प्राप्त होती है।

श्री सूक्तम का पाठ करने के लिए सबसे शुभ दिन शुक्रवार माना जाता है। शुक्रवार का दिन देवी लक्ष्मी को समर्पित होता है, और इस दिन श्री सूक्तम का पाठ करने से देवी लक्ष्मी की कृपा जल्दी प्राप्त होती है। इसके अलावा, शुभ मुहूर्त या विशेष तिथियों जैसे अक्षय तृतीया, दीपावली, पूर्णिमा के दिन भी श्री सूक्तम का पाठ करना अत्यंत फलदायी होता है।

हालांकि, अगर संभव हो तो श्री सूक्तम का पाठ रोज़ाना करना उत्तम माना जाता है। नियमित रूप से पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में धन, सुख-समृद्धि और शांति का वास होता है। यदि रोज़ाना पाठ करना संभव न हो, तो कम से कम शुक्रवार को इसे अवश्य करें।

श्री सूक्त का पाठ कौन सा है?

श्री सूक्त एक प्राचीन वैदिक स्तोत्र है जो देवी लक्ष्मी की आराधना के लिए विशेष रूप से रचा गया है। इसमें 16 मंत्रों का समूह होता है, जिसमें देवी लक्ष्मी की विभिन्न रूपों में स्तुति की गई है। श्री सूक्त का पाठ मुख्य रूप से ऋग्वेद से लिया गया है और इसे धन, समृद्धि, और सुख-शांति के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है।

यह पाठ न केवल धन और वैभव की देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए है, बल्कि जीवन में आर्थिक स्थिरता और सुख-समृद्धि की प्राप्ति के लिए भी इसे अत्यंत शुभ माना जाता है। श्री सूक्त का पाठ करने से देवी लक्ष्मी की कृपा से व्यक्ति के जीवन में हर प्रकार की समृद्धि और सुख की प्राप्ति होती है।

श्री लक्ष्मी सूक्त का पाठ कैसे करें?

श्री लक्ष्मी सूक्त का पाठ करने के लिए आपको पहले शारीरिक और मानसिक शुद्धि का ध्यान रखना चाहिए। पाठ से पहले स्नान करें और साफ वस्त्र पहनें। पूजा स्थल को साफ करें और वहाँ देवी लक्ष्मी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। घी का दीपक जलाएं और धूप-दीप से देवी की आरती करें। इसके बाद श्री लक्ष्मी सूक्त का पाठ शुरू करें।

मंत्रों का उच्चारण स्पष्ट और शुद्ध होना चाहिए, ताकि मंत्रों की शक्ति का पूर्ण प्रभाव हो सके। पाठ के अंत में देवी लक्ष्मी से अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करें। इसे नित्य करें, विशेष रूप से शुक्रवार के दिन, क्योंकि यह दिन देवी लक्ष्मी को समर्पित होता है।

श्री सूक्त का पाठ कितने दिन करना चाहिए?

श्री सूक्त का पाठ आप जितने अधिक दिनों तक करेंगे, उतना ही अधिक लाभ मिलेगा, लेकिन इसे कम से कम 11 दिन तक करना बहुत प्रभावशाली माना जाता है। 11 दिन तक नियमित रूप से श्री सूक्त का पाठ करने से देवी लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि का संचार होता है।

यदि 11 दिन संभव न हो तो इसे 21 या 40 दिन तक भी किया जा सकता है। कुछ लोग इसे पूरे साल भी करते हैं, विशेषकर शुक्रवार को, ताकि देवी लक्ष्मी का आशीर्वाद निरंतर प्राप्त होता रहे। नियमित पाठ से देवी लक्ष्मी की कृपा से जीवन में धन, सुख, और शांति का वास होता है।

कनकधारा स्त्रोत और श्री सूक्त में क्या अंतर है?

कनकधारा स्तोत्र और श्री सूक्त दोनों ही देवी लक्ष्मी की स्तुति के लिए रचित हैं, लेकिन इनका स्वरूप और उद्देश्य भिन्न है। कनकधारा स्तोत्र की रचना आदि शंकराचार्य ने की थी, जिसमें 21 श्लोक हैं। इसे विशेष रूप से धन और समृद्धि प्राप्त करने के लिए गाया जाता है। यह स्तोत्र एक कहानी से प्रेरित है जिसमें आदि शंकराचार्य ने एक गरीब महिला को धन्य किया था।

दूसरी ओर, श्री सूक्त एक वैदिक मंत्र है, जिसमें 16 मंत्रों का समूह होता है और यह ऋग्वेद का हिस्सा है। श्री सूक्त मुख्य रूप से देवी लक्ष्मी की आराधना और उनके आशीर्वाद की प्राप्ति के लिए किया जाता है। दोनों स्तोत्रों का उद्देश्य देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करना है, लेकिन उनकी रचना, संदर्भ, और विधि अलग-अलग हैं।

श्री सूक्त में कितने मंत्र हैं?

श्री सूक्त में कुल 16 मंत्र होते हैं। ये मंत्र देवी लक्ष्मी की स्तुति में रचे गए हैं और इन्हें ऋग्वेद से लिया गया है। श्री सूक्त के प्रत्येक मंत्र में देवी लक्ष्मी के विभिन्न स्वरूपों और गुणों का वर्णन किया गया है। यह मंत्र धन, समृद्धि, और सौभाग्य की देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए अत्यंत प्रभावशाली माने जाते हैं।

इन मंत्रों का नियमित पाठ करने से न केवल आर्थिक समृद्धि मिलती है, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक शांति भी प्राप्त होती है। श्री सूक्त का पाठ वैदिक अनुष्ठानों में विशेष महत्व रखता है और इसे सुख-समृद्धि और समृद्ध जीवन के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।

पुरुष सूक्त का पाठ कब करना चाहिए?

पुरुष सूक्त एक महत्वपूर्ण वैदिक मंत्र है जो भगवान विष्णु की महिमा का वर्णन करता है। इसे विशेष रूप से सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार के रूप में भगवान विष्णु की सर्वव्यापकता का प्रतीक माना जाता है। पुरुष सूक्त का पाठ सुबह के समय करना सबसे शुभ माना जाता है, जब वातावरण शुद्ध और सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर होता है।

इसके अलावा, इसे विशेष धार्मिक अवसरों, व्रत, या विष्णु पूजा के समय भी किया जा सकता है। इस सूक्त का पाठ करने से व्यक्ति को आध्यात्मिक शक्ति मिलती है और जीवन में शांति, संतुलन, और सुकून की प्राप्ति होती है। यह सूक्त परिवार और समाज में सौहार्द और समृद्धि लाने में सहायक होता है।

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कोई जाये जो वृन्दावन मेरा पैगाम ले जाना – Koi Jaye Jo Vrindavan Mera Paigaam Le Jana Bhajan Hindi 2026

भजन “जाये जो वृंदावन मेरा पैगाम ले जाना” (Koi Jaye Jo Vrindavan) एक ऐसा भक्ति गीत है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम और समर्पण को सुंदरता से व्यक्त किया गया है। यह भजन उन भक्तों के हृदय से निकली सच्ची भावनाओं का प्रतीक है, जो अपने आराध्य भगवान श्रीकृष्ण के प्रेम में निमग्न रहते हैं और उनसे अपने मन की बात साझा करना चाहते हैं।

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  • English Lyrics

|| कोई जाये जो वृन्दावन मेरा पैगाम ले जाना ||

कोई जाये जो वृन्दावन,
मेरा पैगाम ले जाना,
मैं खुद तो जा नहीं पाऊँ,
मेरा प्रणाम ले जाना ||

ये कहना मुरली वाले से,
मुझे तुम कब बुलाओगे,
पड़े जो जाल माया के,
उन्हे तुम कब छुडाओगे,
मुझे इस घोर दल दल से,
मेरे भगवान ले जाना,
कोई जाये जो वृंदावन,
मेरा पैगाम ले जाना ||

जब उनके सामने जाओ,
तो उनको देखते रहना,
मेरा जो हाल पूछें तो,
जुबाँ से कुछ नहीं कहना,
बहा देना कुछ एक आँसू,
मेरी पहचान ले जाना,
कोई जाये जो वृंदावन,
मेरा पैगाम ले जाना ||

जो रातें जाग कर देखें,
मेरे सब ख्वाब ले जाना,
मेरे आँसू तड़प मेरी,
मेरे सब भाव ले जाना,
न ले जाओ अगर मुझको,
मेरा सामान ले जाना,
कोई जाये जो वृंदावन,
मेरा पैगाम ले जाना ||

मैं भटकूँ दर-ब-दर प्यारे,
जो तेरे मन में आये कर,
मेरी जो साँसे अंतिम हो,
वो निकलें तेरी चौखट पर,
हरिदासी हूँ मैं तेरी,
मुझे बिन दाम ले जाना,
कोई जाये जो वृंदावन,
मेरा पैगाम ले जाना ||

कोई जाये जो वृन्दावन,
मेरा पैगाम ले जाना,
मैं खुद तो जा नहीं पाऊँ,
मेरा प्रणाम ले जाना ||

|| Koi Jaye Jo Vrindavan ||

Koi jaye jo Vrindavan, Mera paigaam le jana,
Main khud to ja nahi paun, Mera pranam le jana ||

Ye kehna murli wale se, Mujhe tum kab bulaoge,
Pade jo jaal maya ke, Unhe tum kab chhudaoge,
Mujhe is ghor dal dal se, Mere bhagwan le jana,
Koi jaye jo Vrindavan, Mera paigaam le jana ||

Jab unke samne jao, To unko dekhte rehna,
Mera jo haal poochein to, Zuban se kuch nahi kehna,
Baha dena kuch ek aansu, Meri pehchaan le jana,
Koi jaye jo Vrindavan, Mera paigaam le jana ||

Jo raatein jaag kar dekhein, Mere sab khwaab le jana,
Mere aansu tadap meri, Mere sab bhaav le jana,
Na le jao agar mujhko, Mera samaan le jana,
Koi jaye jo Vrindavan, Mera paigaam le jana ||

Main bhatku dar-ba-dar pyaare, Jo tere mann mein aaye kar,
Meri jo saansein antim ho, Wo niklein teri chaukhat par,
Haridaasi hoon main teri, Mujhe bin daam le jana,
Koi jaye jo Vrindavan, Mera paigaam le jana ||

Koi jaye jo Vrindavan, Mera paigaam le jana,
Main khud to ja nahi paun, Mera pranam le jana ||



भजन “जाये जो वृंदावन मेरा पैगाम ले जाना” (Koi Jaye Jo Vrindavan Mera Paigaam Le Jana) एक ऐसा भक्ति गीत है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम और समर्पण को सुंदरता से व्यक्त किया गया है। यह भजन उन भक्तों के हृदय से निकली सच्ची भावनाओं का प्रतीक है, जो अपने आराध्य भगवान श्रीकृष्ण के प्रेम में निमग्न रहते हैं और उनसे अपने मन की बात साझा करना चाहते हैं।

इस भजन में भक्त भगवान श्रीकृष्ण से निवेदन करता है कि जब भी कोई वृंदावन जाए, तो वह उसके संदेश को भगवान तक पहुँचा दे। यह संदेश प्रेम, श्रद्धा और भक्ति से भरा होता है। वृंदावन, जो भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का प्रमुख स्थान है, हर भक्त के लिए अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण है। वहां की भूमि, वहां की हवा, सब कुछ भगवान की उपस्थिति का अहसास कराते हैं।

भजन का हर शब्द, हर पंक्ति, भगवान के प्रति अद्वितीय प्रेम को दर्शाता है। भक्त कहता है कि उसकी भावनाएं, उसकी अरदास, उसकी प्रार्थनाएं भगवान तक पहुंचे और भगवान उसकी विनती को स्वीकार करें। इस भजन के माध्यम से भक्त अपने जीवन की समस्याओं, दुखों और चिंताओं को भगवान के सामने रखता है और उनसे समाधान की प्रार्थना करता है।

भजन में वृंदावन की महिमा का वर्णन भी किया गया है। यह स्थान भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का साक्षी है। वहां की गलियाँ, कुंज गलियाँ, यमुना का किनारा, सब कुछ भगवान की दिव्यता का आभास कराता है। भक्त जब भी वृंदावन जाता है, उसे ऐसा महसूस होता है जैसे वह भगवान के सान्निध्य में है। इसलिए वह चाहता है कि उसका संदेश भी भगवान तक पहुँच जाए, ताकि उसकी भक्ति और भी प्रगाढ़ हो सके।

इस भजन का गायन करते समय भक्त भाव-विभोर हो जाता है और उसे लगता है कि वह सीधे भगवान से संवाद कर रहा है। यह भजन भगवान के प्रति उसकी अनन्य भक्ति को और भी गहरा बनाता है। इसमें भगवान के प्रति अपार प्रेम और श्रद्धा की भावना व्यक्त की गई है। यह भजन न केवल एक गीत है, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभव है जो भक्त को भगवान के करीब ले जाता है।

वृंदावन का नाम सुनते ही मन में भगवान श्रीकृष्ण की मोहक छवि उभर आती है। उनके बाल लीलाओं की यादें ताजा हो जाती हैं और भक्त के मन में एक अद्भुत प्रेम और श्रद्धा की भावना जागृत होती है। भजन “जाये जो वृंदावन मेरा पैगाम ले जाना” इसी भावना को व्यक्त करने का एक प्रयास है।

इस भजन के माध्यम से भक्तजन अपने जीवन में भगवान के प्रति अपनी भक्ति और प्रेम को और भी मजबूत बना सकते हैं। यह भजन उनकी आत्मा को शांति और सुख प्रदान करता है और उन्हें भगवान के प्रति समर्पित होने की प्रेरणा देता है। भजन का यह भावपूर्ण संदेश हर भक्त के हृदय को छू जाता है और उन्हें भगवान के और भी निकट ले जाता है।

आध्यात्मिक शांति: इस भजन के माध्यम से व्यक्ति को आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती है। वृन्दावन भगवान श्रीकृष्ण की लीला भूमि है और इस भजन का गान करते हुए उनके दिव्य प्रेम और उनकी लीला का स्मरण होता है।

भावनात्मक संतुलन: भजन का गान मन को शांत करता है और भावनाओं को संतुलित करता है। जब हम भगवान की महिमा का गुणगान करते हैं, तो मन में सकारात्मक भावनाएँ उत्पन्न होती हैं।

धार्मिक विश्वास: इस भजन के माध्यम से धार्मिक विश्वास और आस्था में वृद्धि होती है। भगवान श्रीकृष्ण के प्रति समर्पण और उनके लीला स्थलों की महत्ता का बोध होता है।

सकारात्मक ऊर्जा: भजन का गान सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। यह नकारात्मक विचारों को दूर करता है और जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है।

ध्यान और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता: भजन का नियमित गान ध्यान और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को बढ़ाता है। जब हम भजन गाते हैं, तो हमारा ध्यान भगवान पर केंद्रित होता है और यह मानसिक एकाग्रता में सहायक होता है।

सामाजिक एकता: भजन का सामूहिक गान सामाजिक एकता और भाईचारे को बढ़ावा देता है। धार्मिक समारोहों और कीर्तन में सामूहिक रूप से भजन गाने से समाज में एकता और सद्भावना का माहौल बनता है।

मानसिक शांति और संतोष: भजन गाने से मानसिक शांति और संतोष की प्राप्ति होती है। यह मन को तनाव और चिंता से मुक्त करता है और जीवन में संतोष का अनुभव कराता है।

भक्ति और समर्पण: इस भजन का गान भगवान श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति और समर्पण को बढ़ाता है। यह भक्तों को भगवान के प्रति अपनी निष्ठा और प्रेम को प्रकट करने का एक माध्यम है।

अध्यात्मिक ज्ञान: भजन के माध्यम से आध्यात्मिक ज्ञान और प्रबोधन की प्राप्ति होती है। भगवान की लीलाओं और उनके उपदेशों का स्मरण हमें जीवन के सच्चे अर्थ और उद्देश्यों का बोध कराता है।

आत्मिक अनुभव: भजन गाने के दौरान आत्मिक अनुभव की प्राप्ति होती है। यह हमें भगवान के निकटता का अनुभव कराता है और आत्मा को शुद्ध और पवित्र बनाता है।

स्वास्थ्य लाभ: भजन गाने से मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में भी सुधार होता है। यह मन को शांत करने और तनाव को कम करने में मदद करता है, जिससे शारीरिक स्वास्थ्य भी बेहतर होता है।

संस्कार और संस्कृति: भजन गाने से हमारी संस्कृति और संस्कारों का संरक्षण होता है। यह हमें हमारी धरोहर और धार्मिक परंपराओं से जोड़ता है।

सकारात्मक परिवर्तनों की प्रेरणा: भजन गाने से जीवन में सकारात्मक परिवर्तनों की प्रेरणा मिलती है। यह हमें आध्यात्मिक पथ पर आगे बढ़ने और नैतिक मूल्यों को अपनाने के लिए प्रेरित करता है।

संतुष्टि और आनंद: भजन गाने से अंतर्मन में संतुष्टि और आनंद का अनुभव होता है। यह आत्मा को प्रसन्न और उल्लासित करता है।

भक्ति रस का अनुभव: भजन का गान भक्ति रस का अनुभव कराता है। यह भक्तों को भगवान के प्रेम में डूब जाने का अनुभव कराता है।

ध्यान और समाधि की अवस्था: भजन गाने से ध्यान और समाधि की अवस्था में प्रवेश करने में मदद मिलती है। यह आत्मा को भगवान के सानिध्य का अनुभव कराता है।

आध्यात्मिक उन्नति: भजन का गान आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होता है। यह भक्त को भगवान के निकट लाने और आत्मा को शुद्ध करने में मदद करता है।

धर्म और दर्शन: भजन के माध्यम से धर्म और दर्शन की गहरी समझ विकसित होती है। यह हमें जीवन के उच्चतम सत्य और उद्देश्यों की खोज करने में मदद करता है।

अंतर्मन की शुद्धि: भजन गाने से अंतर्मन की शुद्धि होती है। यह हमारे विचारों और भावनाओं को पवित्र और निर्मल बनाता है।

समाज में शांति और सद्भावना: भजन गाने से समाज में शांति और सद्भावना का माहौल बनता है। यह धार्मिक और सामाजिक एकता को बढ़ावा देता है।

इस प्रकार, कोई जाये जो वृन्दावन मेरा पैगाम ले जाना भजन का गान अनेक लाभ प्रदान करता है। यह न केवल भक्तों के मन को शांत और संतुष्ट करता है, बल्कि समाज में भी शांति और सद्भावना का संचार करता है। भजन का गान हमें भगवान के निकट लाने और आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर होने में सहायता करता है।

“कोई जाये जो वृन्दावन मेरा पैगाम ले जाना” भजन क्या है?

“कोई जाये जो वृन्दावन मेरा पैगाम ले जाना” एक भावपूर्ण भजन है जिसमें भक्त भगवान श्रीकृष्ण की आराधना और उनकी भक्ति की भावना को व्यक्त करते हैं। इस भजन में भक्त वृन्दावन की पवित्र भूमि की ओर भगवान श्रीकृष्ण के संदेश को पहुँचाने की प्रार्थना करते हैं।

इस भजन के बोल क्या हैं?

“कोई जाये जो वृन्दावन मेरा पैगाम ले जाना” भजन के बोल भगवान श्रीकृष्ण के प्रति श्रद्धा और प्रेम की गहराई को दर्शाते हैं। भजन के बोल को पढ़ने या सुनने के लिए आप धार्मिक संगीत प्लेटफार्म्स, भजन संग्रह, या यूट्यूब पर भजन के वीडियो देख सकते हैं।

इस भजन को कौन गाता है?

इस भजन को विभिन्न भजन गायक गाते हैं। भजन के वीडियो विवरण या धार्मिक संगीत एल्बम में गायक का नाम उल्लेखित होता है। आप प्रमुख धार्मिक गायकों की आवाज़ में इसे सुन सकते हैं।

“कोई जाये जो वृन्दावन मेरा पैगाम ले जाना” भजन का वीडियो कहाँ देख सकते हैं?

इस भजन का वीडियो आप यूट्यूब जैसे वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म पर देख सकते हैं। इसके अतिरिक्त, धार्मिक संगीत ऐप्स और वेबसाइट्स पर भी यह भजन उपलब्ध हो सकता है।

इस भजन का उद्देश्य क्या है?

“कोई जाये जो वृन्दावन मेरा पैगाम ले जाना” भजन का उद्देश्य भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और प्रेम को प्रकट करना है। भजन भक्तों को श्रीकृष्ण के संदेश और उनके दिव्य प्रेम को फैलाने की प्रेरणा देता है।

इस भजन को गाने का सही समय क्या है?

इस भजन को आमतौर पर पूजा, भजन संध्या, या श्रीकृष्ण जन्माष्टमी जैसे धार्मिक अवसरों पर गाया जाता है। इसे विशेष रूप से रात के समय या भक्ति के अवसरों पर गाने की परंपरा होती है।

इस भजन की कोई विशेष सांगीतिक या लिरिकल विशेषताएँ क्या हैं?

हाँ, “कोई जाये जो वृन्दावन मेरा पैगाम ले जाना” भजन की सांगीतिक विशेषताएँ इसकी मधुर धुन और भावपूर्ण लिरिक्स हैं। भजन का संगीत और स्वर भक्तों को भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में डूब जाने का अहसास कराते हैं।

क्या इस भजन का कोई लिखित रूप उपलब्ध है?

हाँ, “कोई जाये जो वृन्दावन मेरा पैगाम ले जाना” भजन का लिखित रूप धार्मिक पुस्तकों, भजन संग्रहों, और विभिन्न वेबसाइट्स पर उपलब्ध हो सकता है। आप इसे भक्ति साहित्य, धार्मिक पुस्तकालय, या ऑनलाइन भजन संग्रह से प्राप्त कर सकते हैं।

Vindhyeshwari Stotram PDF – श्री विन्ध्येश्वरी स्तोत्रम् | Download Lyrics 2026

विन्ध्येश्वरी स्तोत्रम् (Vindhyeshwari Stotram) हिन्दू धर्म के प्रमुख देवी स्तोत्रों में से एक है, जो देवी विन्ध्येश्वरी की महिमा का गुणगान करता है। विन्ध्येश्वरी माता का उल्लेख पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में प्रमुखता से किया गया है। ये स्तोत्र भगवान श्री विन्ध्येश्वरी देवी की स्तुति और उपासना के लिए समर्पित है, जो समस्त संसार की संरक्षक और उद्धारक मानी जाती हैं।

विन्ध्येश्वरी देवी का निवास स्थान विंध्य पर्वत माना जाता है, जो भारत के मध्य प्रदेश राज्य में स्थित है। इस पर्वत के नाम पर ही देवी को ‘विन्ध्येश्वरी’ कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, विंध्य पर्वत पर देवी विन्ध्येश्वरी का प्राकट्य हुआ था और यहीं उन्होंने महिषासुर जैसे दैत्यों का वध करके धर्म की रक्षा की थी।

विन्ध्येश्वरी स्तोत्रम् की रचना प्राचीन काल में ऋषियों और मुनियों द्वारा की गई थी। इस स्तोत्र के माध्यम से भक्त देवी की महिमा, उनकी कृपा और उनके अद्भुत रूप का वर्णन करते हैं। यह स्तोत्र न केवल भक्तों को आस्था और श्रद्धा से भर देता है, बल्कि उनके जीवन में शांति, समृद्धि और सुख-समृद्धि भी लाता है।

विन्ध्येश्वरी स्तोत्रम् में देवी को विभिन्न रूपों में पूजित किया गया है, जैसे महिषासुर मर्दिनी, दुर्गा, काली, लक्ष्मी आदि। इन सभी रूपों में देवी विन्ध्येश्वरी की महिमा, उनकी शक्तियाँ और उनकी उपासना के महत्व को दर्शाया गया है। यह स्तोत्र भक्तों को आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में प्रेरित करता है और उन्हें जीवन के कठिनाइयों से उबरने में सहायता करता है।

इस स्तोत्र के पाठ का विशेष महत्व है। इसे नित्यप्रति पाठ करने से व्यक्ति के सभी कष्ट दूर होते हैं, जीवन में सुख-समृद्धि आती है और भगवान की कृपा प्राप्त होती है। विशेष रूप से नवरात्रि के दिनों में इस स्तोत्र का पाठ अत्यधिक फलदायी माना गया है। यह स्तोत्र साधकों को देवी के समीप ले जाता है और उन्हें आत्मिक शांति प्रदान करता है।

विन्ध्येश्वरी स्तोत्रम् का अध्ययन और पाठ भक्तों को एक आध्यात्मिक अनुभव देता है। यह स्तोत्र व्यक्ति के मन में न केवल श्रद्धा और भक्ति उत्पन्न करता है, बल्कि उसे आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में भी अग्रसर करता है। विन्ध्येश्वरी माता की कृपा से जीवन में आने वाली सभी बाधाएँ दूर होती हैं और भक्त को अपनी साधना में सिद्धि प्राप्त होती है।

इस प्रकार, विन्ध्येश्वरी स्तोत्रम् एक महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथ है, जो भक्तों को देवी विन्ध्येश्वरी की उपासना के माध्यम से आध्यात्मिक उन्नति और जीवन में सुख-समृद्धि प्रदान करता है।



  • हिंदी / संस्कृत
  • English

|| श्री विन्ध्येश्वरी स्तोत्रम् ||

निशुम्भ शुम्भ गर्जनी,
प्रचण्ड मुण्ड खण्डिनी ।
बनेरणे प्रकाशिनी,
भजामि विन्ध्यवासिनी ॥

त्रिशूल मुण्ड धारिणी,
धरा विघात हारिणी ।
गृहे-गृहे निवासिनी,
भजामि विन्ध्यवासिनी ॥

दरिद्र दुःख हारिणी,
सदा विभूति कारिणी ।
वियोग शोक हारिणी,
भजामि विन्ध्यवासिनी ॥

लसत्सुलोल लोचनं,
लतासनं वरप्रदं ।
कपाल-शूल धारिणी,
भजामि विन्ध्यवासिनी ॥

कराब्जदानदाधरां,
शिवाशिवां प्रदायिनी ।
वरा-वराननां शुभां,
भजामि विन्ध्यवासिनी ॥

कपीन्द्न जामिनीप्रदां,
त्रिधा स्वरूप धारिणी ।
जले-थले निवासिनी,
भजामि विन्ध्यवासिनी ॥

विशिष्ट शिष्ट कारिणी,
विशाल रूप धारिणी ।
महोदरे विलासिनी,
भजामि विन्ध्यवासिनी ॥

पुंरदरादि सेवितां,
पुरादिवंशखण्डितम्‌ ।
विशुद्ध बुद्धिकारिणीं,
भजामि विन्ध्यवासिनीं ॥

|| Vindhyeshwari Stotram ||

Nishumbh shumbh garjanee,
prachand mund khandinee॥
banerane prakaashinee,
bhajaami vindhyavaasinee॥

trishool mund dhaarinee,
dhara vighaat haarinee॥
ghare-grhe nivaasinee,
bhajaami vindhyavaasinee॥

daridr duhkh haarinee,
sada vibhooti kaarinee॥
viyog shok haarinee,
bhajaami vindhyavaasinee॥

lasusolool lochanan,
lataasanan varapradan॥
kapaal-shool dhaarinee,
bhajaami vindhyavaasinee॥

karabjadanaadharaan,
shivashivaan pradaayinee॥
vara-varaanaan shubhaan,
bhajaami vindhyavaasinee॥

kapindn jaaminipradaan,
tridha svaroop dhaarinee॥
jale-thale nivaasinee,
bhajaami vindhyavaasinee॥

vishisht susanskrt kaarinee,
vishaal roop dhaarinee॥
mahodare vilaasinee,
bhajaami vindhyavaasinee॥

punradaaraadi sevitaan,
puraadivanshakhanditam॥
antim buddhikaarineen,
bhajaami vindhyavaasineen ॥


विन्ध्येश्वरी स्तोत्रम् के लाभ

विन्ध्येश्वरी स्तोत्रम् का पाठ करने से अनेक प्रकार के लाभ होते हैं, जो भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही प्रकार के होते हैं। यह स्तोत्र देवी विन्ध्येश्वरी की स्तुति में रचा गया है, जो शक्ति और सामर्थ्य की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं। उनके अनुग्रह से भक्तों के जीवन में सुख, समृद्धि और शांति का आगमन होता है। निम्नलिखित में विन्ध्येश्वरी स्तोत्रम् के पाठ से प्राप्त होने वाले प्रमुख लाभों का वर्णन किया गया है:

आध्यात्मिक उन्नति: विन्ध्येश्वरी स्तोत्रम् का नियमित पाठ व्यक्ति को आध्यात्मिक रूप से उन्नत बनाता है। यह स्तोत्र ध्यान और साधना में मन को स्थिरता प्रदान करता है और आत्मा की शुद्धि में सहायक होता है। इसके पाठ से व्यक्ति के भीतर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

मानसिक शांति: विन्ध्येश्वरी स्तोत्रम् का पाठ करने से मानसिक शांति प्राप्त होती है। यह व्यक्ति के मन से तनाव, चिंता और अवसाद को दूर करता है और उसे मानसिक रूप से स्वस्थ और सशक्त बनाता है। इसके नियमित पाठ से व्यक्ति के मन में स्थिरता और संतुलन आता है।

आर्थिक समृद्धि: इस स्तोत्र के पाठ से देवी की कृपा प्राप्त होती है, जिससे आर्थिक समस्याओं का निवारण होता है। विन्ध्येश्वरी माता की कृपा से भक्त के जीवन में धन और संपत्ति की वृद्धि होती है। यह स्तोत्र विशेष रूप से उन लोगों के लिए फलदायी है, जो आर्थिक संकटों से जूझ रहे हैं।

स्वास्थ्य लाभ: विन्ध्येश्वरी स्तोत्रम् का पाठ स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभकारी है। इसके पाठ से शारीरिक रोगों और व्याधियों से मुक्ति मिलती है। देवी की कृपा से व्यक्ति के शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जो उसे स्वस्थ और निरोगी बनाता है।

संवेदनात्मक संतुलन: इस स्तोत्र के नियमित पाठ से व्यक्ति के भावनात्मक जीवन में संतुलन आता है। यह स्तोत्र क्रोध, ईर्ष्या, घृणा और अन्य नकारात्मक भावनाओं को दूर करता है और व्यक्ति के मन में प्रेम, करुणा और सहानुभूति का संचार करता है।

परिवारिक सुख: विन्ध्येश्वरी स्तोत्रम् का पाठ परिवार में सुख और शांति की स्थापना करता है। इससे पारिवारिक कलह और विवाद समाप्त होते हैं और परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम और सामंजस्य बढ़ता है। देवी की कृपा से परिवार में खुशहाली और समृद्धि का वास होता है।

विवाह और संतान सुख: इस स्तोत्र के पाठ से विवाह में आने वाली अड़चनों का निवारण होता है और संतान सुख प्राप्त होता है। जिन दंपतियों को संतान प्राप्ति में समस्या हो रही हो, उन्हें इस स्तोत्र का नियमित पाठ करना चाहिए। देवी की कृपा से उन्हें संतान सुख की प्राप्ति होती है।

जीवन की कठिनाइयों से मुक्ति: विन्ध्येश्वरी स्तोत्रम् का पाठ जीवन में आने वाली सभी कठिनाइयों और बाधाओं को दूर करता है। देवी की कृपा से व्यक्ति के सभी संकट समाप्त होते हैं और वह सफलता की ओर अग्रसर होता है। इस स्तोत्र के पाठ से व्यक्ति के जीवन में आने वाली सभी बाधाएँ समाप्त होती हैं।

धार्मिक और आध्यात्मिक समर्पण: विन्ध्येश्वरी स्तोत्रम् का पाठ व्यक्ति के धार्मिक और आध्यात्मिक जीवन में समर्पण की भावना को बढ़ाता है। यह स्तोत्र व्यक्ति को भगवान के प्रति श्रद्धा और भक्ति से परिपूर्ण करता है और उसे धार्मिक क्रियाओं में अधिक सक्रिय बनाता है।

विवेक और बुद्धिमत्ता: विन्ध्येश्वरी स्तोत्रम् का पाठ व्यक्ति की बुद्धि और विवेक को तीव्र करता है। इसके पाठ से व्यक्ति के मस्तिष्क की कार्यक्षमता बढ़ती है और वह जीवन के महत्वपूर्ण निर्णयों को सही तरीके से ले पाता है। यह स्तोत्र विद्यार्थियों के लिए भी अत्यंत लाभकारी है, क्योंकि इससे उनकी स्मरण शक्ति और ज्ञान में वृद्धि होती है।

सकारात्मकता और आत्मविश्वास: इस स्तोत्र का नियमित पाठ व्यक्ति के भीतर सकारात्मकता और आत्मविश्वास का संचार करता है। इसके माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त करने में सक्षम होता है और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ता है।

दुर्गुणों से मुक्ति: विन्ध्येश्वरी स्तोत्रम् का पाठ व्यक्ति को उसके दुर्गुणों से मुक्ति दिलाता है। यह स्तोत्र व्यक्ति के भीतर की बुरी आदतों को समाप्त करता है और उसे एक बेहतर इंसान बनाता है। देवी की कृपा से व्यक्ति अपने जीवन में सन्मार्ग पर चलता है और पुण्य कर्म करता है।

भूत-प्रेत बाधाओं से रक्षा: इस स्तोत्र का पाठ व्यक्ति को भूत-प्रेत बाधाओं से भी रक्षा करता है। इसके पाठ से देवी की कृपा प्राप्त होती है, जो व्यक्ति को सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षित रखती है।

इस प्रकार, विन्ध्येश्वरी स्तोत्रम् का पाठ व्यक्ति के जीवन में अनेक प्रकार के लाभ प्रदान करता है। यह स्तोत्र देवी विन्ध्येश्वरी की कृपा प्राप्त करने का एक सशक्त माध्यम है, जो भक्त को जीवन के हर क्षेत्र में सफलता, सुख और समृद्धि प्रदान करता है। इसके नियमित पाठ से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं और वह एक सफल, सुखी और संतुलित जीवन जीता है।

विंध्यवासिनी स्तोत्र पढ़ने से क्या होता है?

विंध्यवासिनी स्तोत्र पढ़ने से भक्तों को कई लाभ प्राप्त होते हैं:

धार्मिक शांति: यह स्तोत्र पढ़ने से मानसिक शांति और आध्यात्मिक संतोष प्राप्त होता है।

संकट से मुक्ति: विंध्यवासिनी देवी की आराधना और स्तोत्र के पाठ से जीवन में आने वाले संकटों और बाधाओं से मुक्ति मिल सकती है।

आशीर्वाद प्राप्ति: नियमित रूप से विंध्यवासिनी स्तोत्र पढ़ने से देवी की कृपा प्राप्त होती है, जिससे सुख-समृद्धि और समर्पण बढ़ता है।

ध्यान और एकाग्रता: यह स्तोत्र ध्यान केंद्रित करने में सहायता करता है और भक्तों को आध्यात्मिक मार्ग पर स्थिरता प्रदान करता है।

मां विंध्यवासिनी का मंत्र कौन सा है?

मां विंध्यवासिनी का प्रमुख मंत्र है:
“ॐ विंध्यवासिन्यै नमः”
यह मंत्र मां विंध्यवासिनी की पूजा और आराधना के दौरान बोला जाता है, जिससे उनकी कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होते हैं।

विंध्याचल माता किसकी कुलदेवी है?

विंध्याचल माता को विशेष रूप से उन भक्तों की कुलदेवी माना जाता है जो विंध्याचल क्षेत्र में निवास करते हैं या जिनकी धार्मिक परंपराएँ इस क्षेत्र से जुड़ी हैं। विंध्याचल माता की पूजा और आराधना वे लोग करते हैं जो इस क्षेत्र की आध्यात्मिक परंपराओं को मानते हैं।

विंध्याचल में कौन सा शक्तिपीठ है?

विंध्याचल में प्रमुख शक्तिपीठ “विंध्यवासिनी शक्तिपीठ” है। यह शक्तिपीठ देवी विंध्यवासिनी की पूजा और आराधना का स्थल है, और यहाँ श्रद्धालु देवी के दर्शन और पूजा करने के लिए आते हैं।

विंध्यवासिनी किसकी पुत्री थी?

विंध्यवासिनी देवी को अक्सर देवी पार्वती की पुत्री के रूप में पूजा जाता है। कुछ धार्मिक कथाओं के अनुसार, वे हिमालय पर्वत के विंध्याचल क्षेत्र में निवास करती हैं और उन्हें देवी पार्वती की एक रूप माना जाता है।

विंध्याचल में मां का कौन सा अंग गिरा था?

विंध्याचल में मां सती का बायाँ अंग गिरा था। यह घटना देवी सती के शरीर के 51 अंगों के धरती पर गिरने से संबंधित है, और विंध्याचल क्षेत्र में सती के बायाँ अंग गिरने का स्थान विशेष रूप से पूजा जाता है।

देवी का बीज मंत्र कौन सा है?

देवी विंध्यवासिनी का बीज मंत्र है:
“ॐ श्रीं ह्लीं क्लीं विंध्यवासिन्यै नमः”
यह बीज मंत्र देवी की शक्ति और ऊर्जा को आकर्षित करने के लिए प्रयोग किया जाता है और आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्रभावशाली माना जाता है।

विंध्यवासिनी स्तोत्र PDF कैसे डाउनलोड करें?

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विन्ध्येश्वरी स्तोत्र PDF कहां से प्राप्त करें?

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Vindhyavasini Stotram PDF कहां उपलब्ध है?

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विंध्यवासिनी स्तोत्र अर्थ सहित PDF डाउनलोड कहां से करें?

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Vindheshwari Stotra PDF कहां मिलेगा?

Vindheshwari Stotra PDF डाउनलोड करने के लिए, “https://www.chalisa-pdf.com” वेबसाइट पर जाएं। यहां यह स्तोत्र सरल भाषा में उपलब्ध है।

Vindhyawasini Stotra PDF कहां से डाउनलोड करें?

Vindhyawasini Stotra PDF “https://www.chalisa-pdf.com” वेबसाइट पर उपलब्ध है। यह साइट मुफ्त और भरोसेमंद स्रोत है।

Vindhyeshwari Stotram के लाभ क्या हैं?

Vindhyeshwari Stotram के नियमित पाठ से जीवन में शांति, समृद्धि और नकारात्मक ऊर्जाओं से सुरक्षा मिलती है। PDF डाउनलोड करने के लिए “https://www.chalisa-pdf.com” पर जाएं।

Vindhyeshwari Stotram PDF कहां उपलब्ध है?

Vindhyeshwari Stotram PDF “https://www.chalisa-pdf.com” पर उपलब्ध है। इसे डाउनलोड करने के लिए वेबसाइट पर जाएं और संबंधित लिंक पर क्लिक करें।

Vindheshwari Stotram PDF कैसे डाउनलोड करें?

Vindheshwari Stotram PDF डाउनलोड करने के लिए “https://www.chalisa-pdf.com” पर जाएं और दिए गए डाउनलोड लिंक का उपयोग करें।

Nishumbh Shumbh Mardini PDF कहां से प्राप्त करें?

Nishumbh Shumbh Mardini PDF “https://www.chalisa-pdf.com” वेबसाइट पर उपलब्ध है। यह स्तोत्र देवी दुर्गा की महिमा का वर्णन करता है।

णमोकार महामंत्र – Namokar Maha Mantra Pdf in Hindi 2026

णमोकार महामंत्र (Namokar Maha Mantra) जैन धर्म का एक प्रमुख और पवित्र मंत्र है। इसे नवकार मंत्र या णमोकार मंत्र भी कहा जाता है। यह मंत्र जैन धर्म के साधकों द्वारा प्रतिदिन प्रातःकाल और सायंकाल में जाप किया जाता है। णमोकार महामंत्र का महत्व जैन धर्म में अत्यधिक है क्योंकि यह सभी तीर्थंकरों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों और साधुओं को प्रणाम करता है।

णमोकार महामंत्र की रचना प्राचीन काल में हुई थी और इसे जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर द्वारा प्रतिष्ठित किया गया। इस मंत्र का उच्चारण न केवल आध्यात्मिक उन्नति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है, बल्कि यह साधक के मन और आत्मा को शांति और पवित्रता प्रदान करता है।

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इस मंत्र का उच्चारण करते समय साधक पांच प्रमुख वंदनाएँ करता है:

  1. णमो अरिहंताणं – अरिहंतों को प्रणाम, जिन्होंने समस्त मोह और कर्मों का नाश किया है।
  2. णमो सिद्धाणं – सिद्धों को प्रणाम, जिन्होंने मोक्ष प्राप्त किया है।
  3. णमो आयरियाणं – आचार्यों को प्रणाम, जो धर्म का आचरण और प्रचार करते हैं।
  4. णमो उवज्झायाणं – उपाध्यायों को प्रणाम, जो जैन आगमों का अध्ययन और शिक्षा देते हैं।
  5. णमो लोए सव्वसाहूणं – सभी साधुओं को प्रणाम, जो संयम और तपस्या का पालन करते हैं।

णमोकार महामंत्र में कुल 68 अक्षर होते हैं और यह पाँच पंक्तियों में विभाजित होता है। इसका जाप करने से मनुष्य के मन में शांति, संतोष और आध्यात्मिक जागृति होती है। इस मंत्र का उच्चारण व्यक्ति को आत्मज्ञान की ओर ले जाता है और उसे जीवन के सच्चे मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

जैन धर्म के अनुसार, णमोकार महामंत्र का जाप करने से व्यक्ति के सभी पाप धुल जाते हैं और उसे मोक्ष प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर होने की शक्ति मिलती है। यह मंत्र सभी प्रकार के भय, तनाव और दुःखों को समाप्त करने में सहायक माना जाता है।

णमोकार महामंत्र का उच्चारण जैन साधकों के लिए एक नियमित और आवश्यक क्रिया है। यह उनके जीवन में आध्यात्मिकता और धार्मिकता का समावेश करता है। इसके माध्यम से साधक अपने अंदर की नेगेटिव ऊर्जा को समाप्त कर, पॉजिटिव ऊर्जा को प्राप्त करता है।

अतः णमोकार महामंत्र जैन धर्म के साधकों के लिए न केवल एक प्रार्थना है, बल्कि यह उनके आध्यात्मिक और धार्मिक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। इसका नियमित जाप व्यक्ति को आत्मज्ञान की प्राप्ति की दिशा में अग्रसर करता है और उसे मोक्ष के मार्ग पर ले जाता है।


  • हिंदी / संस्कृत
  • English

|| णमोकार महामंत्र ||

णमोकार मंत्र है न्यारा, इसने लाखों को तारा।
इस महा मंत्र का जाप करो, भव जल से मिले किनारा।

णमो अरिहंताणं,
णमो सिद्धाणं,
णमो आयरियाणं,
णमो उवज्झायाणं,
णमो लोए सव्व साहूणं ।
एसोपंचणमोक्कारो, सव्वपावप्पणासणो ।
मंगला णं च सव्वेसिं, पडमम हवई मंगलं ।

Namokar Maha Mantra in English

Ṇamōkāra mantra hai nyārā, isnē lākhōṁ kō tārā।
Is mahā mantra kā jāp karō, bhav jal sē mile kinārā।

Ṇamō arihaṁtāṇaṁ,
Ṇamō siddhāṇaṁ,
Ṇamō āyariyāṇaṁ,
Ṇamō uvajjhāyāṇaṁ,
Ṇamō loē savva sāhūṇaṁ।
Ēsōpaṁcaṇamōkkārō, savvapāvappaṇāsaṇō।
Maṅgalā ṇaṁ ca savvēsiṁ, paḍamam havai maṅgalaṁ।


णमोकार महामंत्र के लाभ

णमोकार महामंत्र, जिसे नवकार मंत्र भी कहा जाता है, जैन धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र मंत्र है। इस मंत्र के जाप से साधक को अनेक प्रकार के आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक लाभ प्राप्त होते हैं। णमोकार महामंत्र के लाभों को विस्तृत रूप में समझना आवश्यक है ताकि इसका महत्त्व और प्रभावपूर्णता स्पष्ट हो सके।

आध्यात्मिक लाभ

आत्मज्ञान की प्राप्ति: णमोकार महामंत्र का नियमित जाप साधक को आत्मज्ञान की ओर ले जाता है। यह मंत्र साधक को आत्मा की वास्तविकता और उसकी शुद्धता के प्रति जागरूक करता है।

मोक्ष की प्राप्ति: जैन धर्म के अनुसार, णमोकार महामंत्र का जाप करने से साधक के समस्त पाप धुल जाते हैं और उसे मोक्ष प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर होने की शक्ति मिलती है।

धार्मिकता और पुण्य: इस मंत्र का उच्चारण धार्मिकता और पुण्य की प्राप्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह साधक को धार्मिक गतिविधियों में संलग्न रहने और सत्य, अहिंसा, और संयम के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है।

शांति और संतोष: इस मंत्र का जाप मन और आत्मा को शांति और संतोष प्रदान करता है। साधक के जीवन में शांति और संतुलन की स्थिति आती है।

मानसिक लाभ

मन की शुद्धता: णमोकार महामंत्र का जाप मन को शुद्ध और पवित्र बनाता है। इससे नकारात्मक विचारों और भावनाओं का नाश होता है।

सकारात्मक ऊर्जा: इस मंत्र का उच्चारण सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ावा देता है और साधक के जीवन में सकारात्मकता का संचार करता है।

एकाग्रता और ध्यान: णमोकार महामंत्र का जाप ध्यान और एकाग्रता को बढ़ावा देता है। इससे साधक का मन एकाग्र होता है और उसकी ध्यान की क्षमता में वृद्धि होती है।

तनाव और चिंता में कमी: इस मंत्र का नियमित जाप तनाव और चिंता को कम करने में सहायक होता है। यह मानसिक शांति और स्थिरता प्रदान करता है।

शारीरिक लाभ

स्वास्थ्य में सुधार: णमोकार महामंत्र का जाप शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी होता है। इससे साधक का शारीरिक स्वास्थ्य सुधरता है और उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है।

श्वसन प्रणाली पर प्रभाव: इस मंत्र का उच्चारण श्वसन प्रणाली पर सकारात्मक प्रभाव डालता है। इससे साधक की श्वसन क्रिया में सुधार होता है और उसकी श्वसन संबंधी समस्याएं कम होती हैं।

शारीरिक ऊर्जा: णमोकार महामंत्र का जाप शारीरिक ऊर्जा को बढ़ाता है और साधक को स्फूर्ति और ताजगी प्रदान करता है।

रक्त संचार में सुधार: इस मंत्र का उच्चारण रक्त संचार में सुधार लाता है और शरीर के विभिन्न अंगों में सही मात्रा में ऑक्सीजन पहुंचाता है।

सामाजिक लाभ

सामाजिक सद्भाव: णमोकार महामंत्र का उच्चारण साधक के सामाजिक जीवन में सद्भाव और समरसता लाता है। इससे सामाजिक रिश्ते मजबूत होते हैं और समाज में शांति और सौहार्द की स्थिति बनती है।

नैतिकता और आदर्श: इस मंत्र का जाप नैतिकता और आदर्शों की स्थापना में सहायक होता है। साधक के जीवन में नैतिक मूल्यों और आदर्शों का समावेश होता है।

समाजसेवा: णमोकार महामंत्र का उच्चारण साधक को समाजसेवा की ओर प्रेरित करता है। इससे साधक समाज के कल्याण के लिए कार्य करने की प्रेरणा प्राप्त करता है।

सहयोग और सहयोगिता: इस मंत्र का जाप सहयोग और सहयोगिता की भावना को बढ़ावा देता है। इससे समाज में सहयोग और सहयोगिता की भावना का विकास होता है।

धार्मिक और आध्यात्मिक अनुष्ठान

पूजा और आराधना: णमोकार महामंत्र का उच्चारण जैन धर्म की पूजा और आराधना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इससे साधक की पूजा और आराधना की प्रक्रिया पूर्ण होती है।

ध्यान और साधना: इस मंत्र का जाप ध्यान और साधना की प्रक्रिया को सशक्त बनाता है। साधक की ध्यान और साधना की क्षमता में वृद्धि होती है।

व्रत और तपस्या: णमोकार महामंत्र का उच्चारण व्रत और तपस्या की प्रक्रिया को समर्थ बनाता है। इससे साधक के व्रत और तपस्या की प्रभावशीलता बढ़ती है।

अध्यात्मिक जागृति: इस मंत्र का जाप साधक के जीवन में अध्यात्मिक जागृति लाता है। इससे साधक के जीवन में आध्यात्मिकता का समावेश होता है।

णमोकार महामंत्र का नियमित जाप साधक के जीवन में अनेक प्रकार के लाभ लाता है। यह मंत्र साधक को आत्मज्ञान, मोक्ष, शांति, संतोष, सकारात्मक ऊर्जा, स्वास्थ्य, सामाजिक सद्भाव, नैतिकता, समाजसेवा, और आध्यात्मिक जागृति की ओर ले जाता है। इसके उच्चारण से साधक के जीवन में संतुलन, समरसता, और पूर्णता की स्थिति आती है। अतः णमोकार महामंत्र जैन धर्म के साधकों के लिए न केवल एक प्रार्थना है, बल्कि यह उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण और अविभाज्य हिस्सा है।

णमोकार मंत्र कैसे बोला जाता है?

णमोकार मंत्र को इस प्रकार बोला जाता है:
“ॐ नमो अरिहंताणं | ॐ नमो सिद्धाणं | ॐ नमो आयरियाणं | ॐ नमो उवज्जायाणं | ॐ नमो लोए सव्व साहीणं |”

इस मंत्र में निम्नलिखित पंच पदों में नमस्कार किया जाता है:
अरिहंताणं: जो तत्त्वज्ञानी हैं और जिन्होंने संसार से मोक्ष प्राप्त किया है।
सिद्धाणं: जिन्होंने पूर्णता प्राप्त कर ली है और मोक्ष की स्थिति में हैं।
आयरियाणं: जो आचार्य और धार्मिक शिक्षक हैं।
उवज्जायाणं: जो उपाध्याय और शिक्षकों के मार्गदर्शक हैं।
लोए सव्व साहीणं: संसार के सभी साधुओं और संतों को नमस्कार।

जैन धर्म का महामंत्र कौन सा है?

जैन धर्म का महामंत्र “णमोकार मंत्र” (नवकार मंत्र) है। यह मंत्र जैन धर्म के अनुयायियों द्वारा भगवान अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, और साधुओं को सम्मान देने के लिए उपयोग किया जाता है।

णमोकार मंत्र में कितनी बार नमस्कार किया है?

णमोकार मंत्र में कुल 5 बार नमस्कार किया गया है। ये नमस्कार निम्नलिखित रूप में होते हैं:
अरिहंताणं (अरिहंतों को)
सिद्धाणं (सिद्धों को)
आयरियाणं (आचार्यों को)
उवज्जायाणं (उपाध्यायों को)
लोए सव्व साहीणं (संसार के सभी साधुओं और संतों को)

मंत्र कैसे बोला जाता है?

मंत्र को बोलते समय विशेष ध्यान और श्रद्धा रखना चाहिए। मंत्र को शुद्ध उच्चारण के साथ, एकाग्रता और श्रद्धा के साथ बोला जाता है। मंत्र का जाप नियमित रूप से और विशेष अवसरों पर किया जाता है। जैन धर्म में, मंत्र की सही वर्तनी और उच्चारण का महत्व होता है।

जैन धर्म का मूल मंत्र क्या है?

जैन धर्म का मूल मंत्र “णमोकार मंत्र” है। यह मंत्र जैन धर्म के सभी अनुयायियों के लिए पवित्र और महत्वपूर्ण होता है और इसमें भगवान अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, और साधुओं के प्रति सम्मान और नमस्कार व्यक्त किया जाता है।

सबसे शक्तिशाली जैन मंत्र कौन सा है?

जैन धर्म में सबसे शक्तिशाली मंत्र के रूप में णमोकार मंत्र को माना जाता है। इसे नवकार मंत्र या पंच परमेष्ठी मंत्र भी कहा जाता है। इस मंत्र का महत्व इसकी सार्वभौमिकता, शुद्धता और आत्मिक ऊर्जा से है।

मंत्र का सार:
णमोकार मंत्र किसी विशेष व्यक्ति, देवता या शक्ति की आराधना नहीं करता। यह अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और सभी साधुओं को प्रणाम करता है, जो मोक्ष और ज्ञान के प्रतीक हैं।

क्यों सबसे शक्तिशाली है?
यह मंत्र आत्मा की शुद्धि के लिए सर्वोत्तम है।
इसका कोई विशेष धर्म, जाति, या भाषा से बंधन नहीं है।
यह क्रोध, मोह, और लोभ जैसे दोषों को दूर करने में सहायक है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण:
मंत्र के उच्चारण से उत्पन्न ध्वनि तरंगें सकारात्मक ऊर्जा फैलाती हैं। यह मानसिक शांति और ध्यान केंद्रित करने में मदद करती हैं।

आध्यात्मिक प्रभाव:
यह मंत्र सभी प्रकार के पापों और नकारात्मकता को समाप्त करने में सक्षम है। इसे जपने से आत्मा मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होती है।

व्यवहारिक उपयोग:
इसे दैनिक जीवन में सकारात्मकता बनाए रखने के लिए जप सकते हैं।
कठिन परिस्थितियों में यह मानसिक शक्ति और आत्मविश्वास प्रदान करता है।
संक्षेप में, णमोकार मंत्र जैन धर्म में न केवल शक्तिशाली मंत्र है, बल्कि इसे सार्वभौमिकता और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक माना गया है।