महावीर प्रभु आरती (Om Jai Mahavir Prabhu Aarti), महावीर स्वामी जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर माने जाते हैं। वे अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह के पाँच प्रमुख व्रतों के पालन का संदेश देते हैं। महावीर स्वामी की आरती जैन समाज में बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है और इसे विशेष उत्सवों, पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान गाया जाता है।
ॐ जय महावीर प्रभु आरती महावीर स्वामी की महिमा और उनके उपदेशों का वर्णन करती है। यह आरती भक्तों को महावीर स्वामी के जीवन और उनकी शिक्षाओं से प्रेरणा प्राप्त करने का अवसर प्रदान करती है। आरती के माध्यम से भक्त अपनी श्रद्धा और भक्ति प्रकट करते हैं और महावीर स्वामी के आशीर्वाद की कामना करते हैं।
महावीर स्वामी का जन्म ईसा पूर्व 599 में बिहार के वैशाली क्षेत्र में हुआ था। उन्होंने राजसी जीवन त्याग कर साधु जीवन अपनाया और 12 वर्षों की कठोर तपस्या के बाद कैवल्य (मोक्ष) प्राप्त किया। महावीर स्वामी ने अपने उपदेशों से समाज में अहिंसा और सत्य का संदेश फैलाया और अपने अनुयायियों को जीवन के सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया।
ॐ जय महावीर प्रभु, स्वामी जय महावीर प्रभु । कुण्डलपुर अवतारी, चांदनपुर अवतारी, त्रिशलानंद विभु ॥
सिध्धारथ घर जन्मे, वैभव था भारी । बाल ब्रह्मचारी व्रत, पाल्यो तप धारी ॥ ॥ॐ जय महावीर प्रभु…॥
आतम ज्ञान विरागी, सम दृष्टि धारी । माया मोह विनाशक, ज्ञान ज्योति जारी ॥ ॥ॐ जय महावीर प्रभु…॥
जग में पाठ अहिंसा, आप ही विस्तारयो । हिंसा पाप मिटा कर, सुधर्म परिचारियो ॥ ॥ॐ जय महावीर प्रभु…॥
अमर चंद को सपना, तुमने परभू दीना । मंदिर तीन शेखर का, निर्मित है कीना ॥ ॥ॐ जय महावीर प्रभु…॥
जयपुर नृप भी तेरे, अतिशय के सेवी । एक ग्राम तिन्ह दीनो, सेवा हित यह भी ॥ ॥ॐ जय महावीर प्रभु…॥
जल में भिन्न कमल जो, घर में बाल यति । राज पाठ सब त्यागे, ममता मोह हती ॥ ॥ॐ जय महावीर प्रभु…॥
भूमंडल चांदनपुर, मंदिर मध्य लसे । शांत जिनिश्वर मूरत, दर्शन पाप लसे ॥ ॥ॐ जय महावीर प्रभु…॥
जो कोई तेरे दर पर, इच्छा कर आवे । धन सुत्त सब कुछ पावे, संकट मिट जावे ॥ ॥ॐ जय महावीर प्रभु…॥
निशदिन प्रभु मंदिर में, जगमग ज्योत जरे । हम सेवक चरणों में, आनंद मूँद भरे ॥ ॥ॐ जय महावीर प्रभु…॥
ॐ जय महावीर प्रभु, स्वामी जय महावीर प्रभु । कुण्डलपुर अवतारी, चांदनपुर अवतारी, त्रिशलानंद विभु ॥
|| Om Jai Mahavir Prabhu Aarti ||
Om Jay Mahavir Prabhu, Swami Jay Mahavir Prabhu. Kundalpur Avatari, Chandanpur Avatari, Trishalanand Vibhu.
Siddharath Ghar Janme, Vaibhav Tha Bhari. Bal Brahmachari Vrat, Palyo Tap Dhari. Om Jay Mahavir Prabhu…
Atam Gyan Viragi, Sam Drishti Dhari. Maya Moh Vinashak, Gyan Jyoti Jaari. Om Jay Mahavir Prabhu…
Jag Mein Path Ahinsa, Aap Hi Vistaryo. Hinsa Paap Mita Kar, Sudharm Parichariyo. Om Jay Mahavir Prabhu…
Amar Chand Ko Sapna, Tumne Prabhu Dina. Mandir Teen Shekhar Ka, Nirmit Hai Keena. Om Jay Mahavir Prabhu…
Jaipur Nrip Bhi Tere, Atishay Ke Sevi. Ek Gram Tinh Dino, Seva Hit Yeh Bhi. Om Jay Mahavir Prabhu…
Jal Mein Bhinn Kamal Jo, Ghar Mein Baal Yati. Raj Path Sab Tyage, Mamta Moh Hati. Om Jay Mahavir Prabhu…
Bhoomandal Chandanpur, Mandir Madhya Lase. Shant Jinishwar Moorti, Darshan Paap Lase. Om Jay Mahavir Prabhu…
Jo Koi Tere Dar Par, Ichha Kar Aave. Dhan Sutt Sab Kuch Paave, Sankat Mit Jaave. Om Jay Mahavir Prabhu…
Nishadin Prabhu Mandir Mein, Jagmag Jyot Jare. Hum Sevak Charanon Mein, Anand Mud Bhare. Om Jay Mahavir Prabhu…
Om Jay Mahavir Prabhu, Swami Jay Mahavir Prabhu. Kundalpur Avatari, Chandanpur Avatari, Trishalanand Vibhu.
Om Jai Mahavir Prabhu Aarti Benefits
ॐ जय महावीर प्रभु आरती के लाभ
ॐ जय महावीर प्रभु आरती (Om Jai Mahavir Prabhu Aarti) एक अत्यंत महत्वपूर्ण और श्रद्धेय आरती है, जो भगवान महावीर स्वामी की आराधना के लिए की जाती है। भगवान महावीर स्वामी जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे और उन्होंने अहिंसा, सत्य, और तपस्या का अद्वितीय आदर्श प्रस्तुत किया। इस आरती का पाठ करने से श्रद्धालुओं को विभिन्न लाभ प्राप्त होते हैं, जिनका वर्णन नीचे विस्तार से किया गया है।
आरती के लाभ और महत्व
आध्यात्मिक उन्नति: भगवान महावीर स्वामी की आरती का पाठ करने से व्यक्ति की आत्मिक उन्नति होती है। यह आरती भक्ति और श्रद्धा के माध्यम से ईश्वर के प्रति लगाव को प्रगाढ़ करती है और आत्मा की शुद्धि में सहायक होती है। नियमित रूप से इस आरती का पाठ करने से व्यक्ति के मन और आत्मा में शांति और संतुलन स्थापित होता है।
अहिंसा और सत्य का पालन: भगवान महावीर स्वामी ने अपने जीवन में अहिंसा और सत्य का पालन किया और इन्हें अपनी शिक्षा का मूल माना। इस आरती का पाठ करने से व्यक्ति को इन आदर्शों को अपनाने की प्रेरणा मिलती है। यह आरती अहिंसा, सत्य, और परिग्रह की उपासना का प्रतीक है, जिससे व्यक्ति अपने जीवन में इन गुणों को आत्मसात कर सकता है।
मनोकामनाओं की पूर्ति: आरती में भगवान महावीर स्वामी से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं प्रस्तुत करते हैं। इस आरती का नियमित पाठ करने से व्यक्ति की इच्छाओं की पूर्ति होती है और उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। यह विश्वास होता है कि भगवान महावीर स्वामी भक्तों की सभी इच्छाओं को पूर्ण करते हैं।
समाज में नैतिकता और शांति: भगवान महावीर स्वामी की शिक्षाएं समाज में नैतिकता और शांति की स्थापना के लिए मार्गदर्शक हैं। आरती का पाठ करने से व्यक्ति में नैतिक मूल्यों के प्रति जागरूकता आती है, जो समाज में शांति और समरसता को बढ़ावा देती है। इससे समाज में विवादों और तनाव की स्थिति कम होती है।
स्वास्थ्य लाभ: नियमित रूप से इस आरती का पाठ करने से मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। भक्ति और ध्यान के माध्यम से मानसिक तनाव कम होता है और शारीरिक स्वास्थ्य भी बेहतर होता है। आरती के समय का ध्यान और एकाग्रता स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होती है।
धार्मिक एकता और सामूहिक भक्ति: इस आरती के आयोजन से धार्मिक एकता और सामूहिक भक्ति को बढ़ावा मिलता है। जब समुदाय मिलकर आरती का आयोजन करता है, तो यह सामाजिक और धार्मिक एकता को प्रगाढ़ करता है। इससे आपसी सहयोग और स्नेह का वातावरण बनता है।
पारिवारिक समृद्धि: भगवान महावीर स्वामी की आरती का पाठ पारिवारिक जीवन में भी सुख और समृद्धि लाता है। जब परिवार के सभी सदस्य मिलकर आरती का आयोजन करते हैं, तो यह परिवार के बीच प्रेम और स्नेह को बढ़ावा देता है। इससे परिवार में एकता और सामंजस्य बना रहता है।
आध्यात्मिक प्रेरणा: इस आरती का पाठ करने से व्यक्ति को आध्यात्मिक प्रेरणा मिलती है। भगवान महावीर स्वामी के जीवन और शिक्षाएं व्यक्ति को सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं। यह आरती आत्मिक विकास के लिए एक महत्वपूर्ण साधन है।
संकटों से मुक्ति: आरती के पाठ से व्यक्ति के जीवन में आने वाले संकटों और समस्याओं का निवारण होता है। भगवान महावीर स्वामी की कृपा से जीवन की कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति मिलती है और व्यक्ति संकटों से उबरने में सक्षम होता है।
सच्ची भक्ति और श्रद्धा: आरती का पाठ करने से व्यक्ति की सच्ची भक्ति और श्रद्धा को प्रकट करने का अवसर मिलता है। यह भक्ति भगवान महावीर स्वामी के प्रति समर्पण और आदर को व्यक्त करती है, जो व्यक्ति के जीवन में स्थिरता और शांति लाती है।
ॐ जय महावीर प्रभु आरती एक दिव्य और महत्वपूर्ण अनुष्ठान है जो भगवान महावीर स्वामी की भक्ति और आराधना का प्रतीक है। इसके पाठ से व्यक्ति को अनेक आध्यात्मिक, मानसिक, और सामाजिक लाभ प्राप्त होते हैं। यह आरती व्यक्ति के जीवन को सकारात्मक दिशा प्रदान करती है और भगवान महावीर स्वामी की शिक्षाओं को जीवन में उतारने में मदद करती है। नियमित रूप से इस आरती का पाठ करने से व्यक्ति की आस्था और भक्ति में वृद्धि होती है और जीवन में शांति और सुख की प्राप्ति होती है।
जैन धर्म में महावीर स्वामी का महत्व
महावीर स्वामी, जिन्हें भगवान महावीर के नाम से भी जाना जाता है, जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर हैं। उनका जीवन और शिक्षाएं जैन धर्म के मूल सिद्धांतों का आधार हैं। महावीर स्वामी का जन्म 599 ईसा पूर्व में बिहार के काशी क्षेत्र में हुआ था। उन्होंने अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह के पांच मूल सिद्धांतों का प्रचार किया, जो जैन धर्म के आचार-विचार में महत्वपूर्ण हैं।
महावीर ने समाज में व्याप्त जातिवाद और भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई और सभी प्राणियों के प्रति करुणा और समानता का संदेश दिया। उन्होंने ध्यान और साधना के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग बताया। उनके जीवन में तप और त्याग का उदाहरण देखने को मिलता है, जो जैन अनुयायियों के लिए प्रेरणा स्रोत है। महावीर स्वामी के अनुयायी उनके उपदेशों का पालन कर स्वयं को शुद्ध और संतुष्ट बनाते हैं। उनकी शिक्षाएं आज भी लोगों के लिए मार्गदर्शन का काम करती हैं, जिससे जैन धर्म को व्यापक रूप से समझा जा सके।
महावीर का संदेश आज के समाज में भी प्रासंगिक है, क्योंकि उन्होंने जिन सिद्धांतों को स्थापित किया, वे न केवल आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक हैं, बल्कि सामाजिक सद्भाव और मानवता की भलाई के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।
महावीर प्रभु की आरती का धार्मिक महत्व
महावीर प्रभु की आरती जैन धर्म में एक महत्वपूर्ण धार्मिक क्रिया है। यह आरती भक्तों द्वारा भगवान महावीर की श्रद्धा और भक्ति के प्रतीक के रूप में गाई जाती है। आरती का उद्देश्य महावीर स्वामी के प्रति सम्मान प्रकट करना और उनके आशीर्वाद की प्राप्ति करना है। आरती के समय दीप जलाने से वातावरण में एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जो भक्तों को मानसिक शांति और आध्यात्मिक विकास की ओर प्रेरित करता है।
महावीर प्रभु की आरती में उनकी दिव्यता, करुणा और ज्ञान का गुणगान किया जाता है। यह भक्तों को उनकी शिक्षाओं और जीवन मूल्यों को अपनाने के लिए प्रेरित करती है। आरती के समय सामूहिक रूप से गाना, सामूहिकता और एकता का प्रतीक है, जो जैन समुदाय की भाईचारे को दर्शाता है।
आरती का धार्मिक महत्व इस तथ्य में निहित है कि यह भक्तों के हृदय में भक्ति और श्रद्धा की भावना को जागृत करती है। आरती के दौरान भक्त अपनी इच्छाओं और प्रार्थनाओं को भगवान के समक्ष प्रस्तुत करते हैं, जिससे उनका मनोबल बढ़ता है। इस प्रकार, महावीर प्रभु की आरती जैन धर्म में न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह आध्यात्मिक समृद्धि और सामाजिक एकता का भी प्रतीक है।
महावीर स्वामी की स्तुति में आरती गाने की परंपरा
महावीर स्वामी की आरती गाने की परंपरा जैन धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह परंपरा भक्तों द्वारा भगवान महावीर के प्रति श्रद्धा, भक्ति और प्रेम व्यक्त करने का एक साधन है। आरती का अर्थ है ‘दीप जलाना’ और इसे अक्सर सामूहिक रूप से गाया जाता है। यह परंपरा न केवल धार्मिक उत्सवों और विशेष अवसरों पर होती है, बल्कि नियमित पूजा के समय भी इसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
आरती के दौरान भक्त भगवान महावीर की दिव्यता, ज्ञान और करुणा का गुणगान करते हैं। यह भक्तों को उनकी शिक्षाओं की याद दिलाने का कार्य करती है और उन्हें जीवन के सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती है। आरती गाते समय भक्त अपने मन में सकारात्मकता और शांति का अनुभव करते हैं, जो उनके आध्यात्मिक विकास में सहायक होता है।
आरती का यह अनुष्ठान सामूहिकता का प्रतीक भी है। जब श्रद्धालु एक साथ मिलकर आरती गाते हैं, तो यह एकता और भाईचारे की भावना को प्रबल करता है। इस प्रकार, महावीर स्वामी की स्तुति में आरती गाने की परंपरा जैन समुदाय के लिए न केवल धार्मिकता का प्रतीक है, बल्कि यह सामाजिक सद्भाव और एकता को भी दर्शाती है।
श्रद्धालुओं द्वारा प्रभु के समक्ष दीपक जलाना
जैन धर्म में श्रद्धालुओं द्वारा प्रभु के समक्ष दीपक जलाना एक महत्वपूर्ण धार्मिक क्रिया है। दीपक जलाना केवल एक भौतिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह एक आध्यात्मिक भावनाओं और श्रद्धा का प्रतीक है। दीपक का प्रकाश अंधकार को दूर करता है, जो प्रतीकात्मक रूप से ज्ञान और आत्मज्ञान की ओर इंगित करता है। जब भक्त भगवान महावीर के समक्ष दीप जलाते हैं, तो वे अपने जीवन में अंधकार को समाप्त करने और सच्चाई, ज्ञान और अहिंसा की ओर बढ़ने की प्रार्थना करते हैं।
दीप जलाने की परंपरा विशेष रूप से पूजा-पाठ और आरती के समय की जाती है। यह धार्मिक अनुष्ठान न केवल एक व्यक्तिगत अनुभव है, बल्कि सामूहिक भक्ति का भी प्रतीक है। जब कई श्रद्धालु मिलकर दीप जलाते हैं, तो यह समुदाय की एकता और सामूहिक आस्था को प्रकट करता है। दीप जलाने के दौरान भक्त अपने मन की सभी इच्छाओं और प्रार्थनाओं को भगवान के समक्ष प्रस्तुत करते हैं, जिससे उनका मनोबल और आत्मविश्वास बढ़ता है।
इस प्रकार, प्रभु के समक्ष दीपक जलाना जैन धर्म में एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है, जो न केवल श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि यह ज्ञान, शांति और सामाजिक एकता को भी बढ़ावा देता है।
महावीर प्रभु की महिमा का वर्णन
महावीर प्रभु जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर हैं, जिनकी महिमा अनंत है। उनका जीवन और शिक्षाएं मानवता के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। महावीर स्वामी ने अपने जीवन में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह के सिद्धांतों का पालन किया। उन्होंने समाज में व्याप्त अंधविश्वास और जातिवाद के खिलाफ आवाज उठाई, जिससे उन्होंने मानवता को एक नया दृष्टिकोण दिया। उनकी शिक्षाएं न केवल जैन धर्म के अनुयायियों के लिए, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए मार्गदर्शक हैं।
महावीर की महिमा इसलिए भी विशेष है क्योंकि उन्होंने आत्मज्ञान और मोक्ष के मार्ग को सरल और सुलभ बनाया। उनके विचारों ने समस्त प्राणियों के प्रति करुणा और प्रेम की भावना को जागृत किया, जो कि आज भी हमारे समाज में अत्यंत प्रासंगिक हैं।
अहिंसा, सत्य, और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा
महावीर स्वामी ने अहिंसा को अपने जीवन का मूल सिद्धांत माना। उनका कहना था कि अहिंसा केवल हिंसा से बचना नहीं, बल्कि सभी प्राणियों के प्रति करुणा और प्रेम का भाव रखना है। उन्होंने सत्य बोलने और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। उनकी शिक्षाओं में सत्य का पालन न केवल व्यक्तिगत जीवन में, बल्कि सामाजिक जीवन में भी आवश्यक बताया गया।
महावीर ने कहा कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे कर्मों और आचार-विचार में भी दिखना चाहिए। वे हमेशा अपने अनुयायियों को सही मार्ग पर चलने और अपने कर्मों के प्रति जागरूक रहने के लिए प्रेरित करते रहे। उनकी शिक्षाएं हमें अपने भीतर की सच्चाई और धर्म के प्रति निष्ठा को पहचानने में मदद करती हैं।
समता, करुणा, और आत्मशुद्धि का संदेश
महावीर स्वामी का संदेश समता और करुणा का था। उन्होंने यह सिखाया कि सभी प्राणियों में समानता है, और हमें किसी भी प्रकार के भेदभाव से बचना चाहिए। उनका कहना था कि सच्चा धर्म वही है, जिसमें करुणा और दया का भाव हो। महावीर ने आत्मशुद्धि को भी बहुत महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने अपने अनुयायियों को ध्यान, साधना, और तप के माध्यम से आत्मा की शुद्धि की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
उनका विश्वास था कि जब हम अपने भीतर की बुराइयों को समाप्त करते हैं, तभी हम सच्चे सुख और शांति को प्राप्त कर सकते हैं। उनके ये सिद्धांत आज भी मानवता के लिए महत्वपूर्ण हैं और हमें एक बेहतर समाज की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।
भक्तों के प्रति उनकी कृपा और आशीर्वाद
महावीर प्रभु ने अपने भक्तों के प्रति अपार कृपा और आशीर्वाद का प्रदर्शन किया। वे हमेशा अपने अनुयायियों को प्रेम और समर्थन प्रदान करते रहे। उनकी शिक्षाएं न केवल भक्ति को बढ़ावा देती हैं, बल्कि अनुयायियों को आत्मा की उन्नति के लिए प्रेरित करती हैं। भक्तों को विश्वास दिलाते हुए महावीर ने कहा कि सच्चे मन से की गई साधना और भक्ति के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति संभव है।
वे अपने भक्तों की प्रार्थनाओं को सुनते हैं और उन्हें सही मार्ग पर चलने के लिए मार्गदर्शन करते हैं। महावीर का आशीर्वाद भक्तों के लिए शक्ति और प्रेरणा का स्रोत है, जो उन्हें जीवन की कठिनाइयों का सामना करने में मदद करता है। उनके प्रति भक्ति से भरा मन हमेशा शांति और संतोष का अनुभव करता है।
महावीर स्वामी की प्रतिमा के सामने दीपक और फूल चढ़ाना
महावीर स्वामी की प्रतिमा के सामने दीपक और फूल चढ़ाना एक पवित्र धार्मिक क्रिया है। यह श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है। दीपक जलाने से यह दिखाया जाता है कि भक्त अपने जीवन में ज्ञान और प्रकाश की प्राप्ति के लिए तत्पर हैं। फूल चढ़ाने का अर्थ है अपने मन की पवित्रता और प्रेम को भगवान के प्रति अर्पित करना। यह अनुष्ठान श्रद्धालुओं के मन में भक्ति का भाव जागृत करता है और उन्हें भगवान से जुड़ने का अनुभव कराता है। जब श्रद्धालु इन क्रियाओं को करते हैं, तो उनका मन प्रसन्नता और संतोष से भर जाता है।
हर्ष और श्रद्धा से भरे मन से आरती गाना
महावीर स्वामी की आरती गाना एक आनंदमय और पवित्र अनुभव है। हर्ष और श्रद्धा से भरे मन से गाई जाने वाली आरती भक्तों को भगवान के प्रति अपनी आस्था को व्यक्त करने का अवसर देती है। यह सामूहिकता का प्रतीक भी है, जिसमें सभी भक्त एक साथ मिलकर भगवान की महिमा का गुणगान करते हैं। आरती के समय भक्त अपने मन की शुभकामनाएं और प्रार्थनाएं भगवान के समक्ष रखते हैं, जिससे उनके हृदय में शांति और प्रसन्नता का अनुभव होता है। इस प्रक्रिया के दौरान, भक्त अपनी आध्यात्मिक यात्रा को और गहराई में ले जाते हैं।
महावीर के गुणों का चिंतन और आत्मनिवेदन
महावीर स्वामी के गुणों का चिंतन करना भक्तों के लिए अत्यंत लाभकारी होता है। उनकी शिक्षाएं, जैसे अहिंसा, करुणा, और सत्य, हमें अपने जीवन में आत्मसात करने के लिए प्रेरित करती हैं। आत्मनिवेदन का अर्थ है अपने मन और विचारों की शुद्धि करना। जब भक्त महावीर के गुणों का चिंतन करते हैं, तो वे अपने भीतर की बुराइयों को पहचानकर उन्हें दूर करने की कोशिश करते हैं। यह प्रक्रिया उन्हें आत्म-विश्लेषण और सुधार की ओर प्रेरित करती है, जिससे उनका जीवन और अधिक सकारात्मक और उन्नत बनता है।
श्रद्धालुओं द्वारा प्रसाद वितरण
महावीर स्वामी की पूजा के बाद प्रसाद का वितरण एक महत्वपूर्ण परंपरा है। श्रद्धालु इसे भक्ति और श्रद्धा के प्रतीक के रूप में देखते हैं। प्रसाद को साझा करने से भाईचारे और सामूहिकता का अनुभव होता है। यह एक ऐसा अवसर है जब भक्त अपने अनुभवों और भावनाओं को एक-दूसरे के साथ बांटते हैं, जिससे समुदाय में एकता और प्रेम का वातावरण बनता है। प्रसाद का सेवन करने से भक्तों को मानसिक और आध्यात्मिक शांति का अनुभव होता है, और यह उन्हें अपनी धार्मिकता को मजबूत करने का अवसर भी देता है।
महावीर स्वामी के उपदेशों पर चर्चा
महावीर स्वामी के उपदेशों पर चर्चा करना भक्तों के लिए प्रेरणादायक होता है। उनकी शिक्षाएं केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक भी हैं। जब भक्त उनके उपदेशों पर चर्चा करते हैं, तो वे एक-दूसरे को सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। यह चर्चा उनके जीवन को बेहतर बनाने, अहिंसा और करुणा के मूल्यों को अपनाने, और आत्म-सुधार की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित करती है। इस प्रकार, महावीर के उपदेशों पर चर्चा करने से समुदाय में ज्ञान और समझ का संचार होता है।
ध्यान और प्रार्थना
महावीर स्वामी की पूजा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ध्यान और प्रार्थना है। ध्यान के माध्यम से भक्त अपने मन को शांत करते हैं और अपने भीतर की सच्चाई को पहचानने का प्रयास करते हैं। प्रार्थना के दौरान वे भगवान से आशीर्वाद और मार्गदर्शन मांगते हैं। यह प्रक्रिया उन्हें आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाती है और उन्हें अपने जीवन में स्थिरता और संतुलन प्राप्त करने में मदद करती है। ध्यान और प्रार्थना के संयोजन से भक्त अपने आत्मिक विकास की दिशा में आगे बढ़ते हैं।
महावीर प्रभु की आरती का सार
महावीर प्रभु की आरती का सार उनके गुणों और शिक्षाओं का संक्षिप्त वर्णन है। यह आरती भक्तों के मन में श्रद्धा, प्रेम और भक्ति की भावना को जागृत करती है। आरती में महावीर के सिद्धांतों, जैसे अहिंसा, सत्य, और करुणा, का बखान होता है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भक्तों को अपने जीवन में इन सिद्धांतों को अपनाने की प्रेरणा भी देती है। इस प्रकार, आरती महावीर स्वामी की महिमा का प्रतीक है और भक्तों के लिए आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम है।
जैन धर्म में आरती का महत्व
जैन धर्म में आरती का विशेष महत्व है। यह न केवल पूजा का एक हिस्सा है, बल्कि भक्तों के लिए अपने आस्था और भक्ति को व्यक्त करने का अवसर है। आरती का उद्देश्य भगवान की महिमा का गुणगान करना और उन्हें श्रद्धा के साथ सम्मानित करना है। इसे सामूहिक रूप से गाने से एकता और भाईचारे की भावना भी बढ़ती है। जैन धर्म में आरती के माध्यम से भक्त अपनी प्रार्थनाएं प्रस्तुत करते हैं, जिससे उन्हें आध्यात्मिक शक्ति और शांति प्राप्त होती है।
अहिंसा और धर्म के पथ पर चलने की प्रेरणा
महावीर स्वामी ने अहिंसा और धर्म के पथ पर चलने की प्रेरणा दी। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि कैसे अहिंसा को अपनाकर हम समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं। उन्होंने यह सिखाया कि सच्चा धर्म वही है, जिसमें प्रेम और करुणा का भाव हो। उनकी शिक्षाएं हमें न केवल व्यक्तिगत जीवन में बल्कि समाज में भी एक बेहतर इंसान बनने के लिए प्रेरित करती हैं। महावीर का संदेश आज भी हमारे लिए मार्गदर्शक है, जिससे हम एक शान्तिपूर्ण और सहिष्णु समाज की दिशा में अग्रसर हो सकें।
FAQs – Om Jai Mahavir Prabhu Aarti
1. भगवान महावीर का प्रथम शिष्य कौन था?
भगवान महावीर का प्रथम शिष्य गौतम गणधर था। वह भगवान महावीर के सबसे प्रिय और नजदीकी शिष्यों में से एक थे।
2. कौन बड़ा है, बुद्ध या महावीर?
बुद्ध और महावीर दोनों ही अपने-अपने धर्मों के महान गुरु हैं। बुद्ध का स्थान बौद्ध धर्म में और महावीर का स्थान जैन धर्म में सर्वोच्च है। दोनों की शिक्षाएँ और विचारधाराएँ अलग-अलग हैं, इसलिए उन्हें तुलना में नहीं रखा जा सकता।
3. भगवान महावीर की मृत्यु कैसे हुई?
भगवान महावीर की मृत्यु निर्वाण के रूप में मानी जाती है। उन्होंने 72 वर्ष की आयु में पावापुरी (बिहार) में अपने शरीर का त्याग किया और मोक्ष प्राप्त किया।
4. जैन धर्म में मुख्य देवता कौन है?
जैन धर्म में मुख्य देवता तीर्थंकर माने जाते हैं। 24 तीर्थंकरों में भगवान महावीर अंतिम तीर्थंकर थे। जैन धर्म में तीर्थंकरों की पूजा की जाती है।
5. महावीर स्वामी का असली नाम क्या था?
भगवान महावीर का असली नाम वर्धमान था। उनका यह नाम उनके जन्म के समय रखा गया था, क्योंकि उनके जन्म के साथ उनके परिवार में समृद्धि और खुशहाली आई थी।
निर्वाण षटकम (Nirvana Shatakam PDF) भारतीय संत परंपरा में आदिगुरु शंकराचार्य का नाम विशेष महत्व रखता है। वे अद्वैत वेदांत के महान आचार्य और भारतीय दर्शन के प्रमुख स्तंभ थे। उनके द्वारा रचित अनेक ग्रंथ और श्लोक संकलन आज भी साधकों के लिए प्रेरणास्रोत बने हुए हैं। इन्हीं महान कृतियों में से एक है निर्वाण षटकम्, जिसे आत्मज्ञान की दिशा में एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक के रूप में देखा जाता है। यह श्लोक संग्रह केवल छह श्लोकों का एक संकलन है, लेकिन इसके गहन अर्थ और प्रभाव को समझने के लिए एक साधक को समर्पण और अभ्यास की आवश्यकता होती है। यहां से आप बजरंग बाण भी पढ़ सकते हैं
निर्वाण षटकम् का अर्थ ही “निर्वाण के लिए छह श्लोक” है। यहां “निर्वाण” का तात्पर्य उस अंतिम स्थिति से है, जिसमें आत्मा को संपूर्ण मुक्ति मिलती है। यह श्लोक हमें यह समझने में मदद करता है कि वास्तविकता क्या है और हम कौन हैं। इसमें आत्मा की शाश्वतता, अद्वितीयता, और उसकी साक्षात अनुभूति को बड़े ही सरल और प्रभावशाली शब्दों में व्यक्त किया गया है। आप हमारी वेबसाइट में शिव चालीसा, शिव आरती और शिव अमृतवाणी भी पढ़ सकते हैं। Hanuman Chalisa MP3 Download
आदिगुरु शंकराचार्य का योगदान और निर्वाण षटकम् का महत्व
आदिगुरु शंकराचार्य ने भारतीय समाज में व्याप्त अज्ञानता, अंधविश्वास और भेदभाव को समाप्त करने के लिए अनेक प्रयास किए। उन्होंने अद्वैत वेदांत के सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार किया और यह बताया कि आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं है। निर्वाण षटकम् उन्हीं के विचारों का साकार रूप है, जिसमें आत्मा के सत्य स्वरूप का बोध कराया गया है। यह श्लोक साधक को अपने असली अस्तित्व को पहचानने और सांसारिक बंधनों से मुक्त होने का मार्ग दिखाता है।
निर्वाण षटकम् के प्रत्येक श्लोक में आत्मा की विशिष्टता और उसकी अनंतता का वर्णन किया गया है। शंकराचार्य ने इन श्लोकों में अपने जीवन के अनुभवों और आत्मसाक्षात्कार को समाहित किया है। उन्होंने बताया है कि आत्मा न तो शरीर है, न इंद्रियाँ, और न ही मन। यह शुद्ध चेतना का रूप है, जो जन्म और मृत्यु से परे है। यह श्लोक हमें यह समझाता है कि हमारी वास्तविक पहचान शरीर या मन नहीं है, बल्कि हम उस शाश्वत चेतना के अंश हैं जो नष्ट नहीं हो सकती।
निर्वाण षटकम् की विशेषता
निर्वाण षटकम् की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे साधक किसी भी समय, किसी भी अवस्था में पढ़ सकता है और इससे आत्मज्ञान की दिशा में प्रगति कर सकता है। इस श्लोक का नियमित पाठ करने से साधक के मन में शांति, स्थिरता और आत्मविश्वास का विकास होता है। यह श्लोक आत्मा की शाश्वतता और उसकी अजेयता को समझने में मदद करता है, जिससे साधक को सांसारिक दुखों से मुक्ति मिलती है।
निर्वाण षटकम् एक ऐसा श्लोक संग्रह है, जो केवल छह श्लोकों में आत्मा के ब्रह्म स्वरूप को प्रकट करता है। यह श्लोक हमें इस भौतिक संसार के पार जाकर आत्मा की वास्तविकता को समझने में मदद करता है। आदिगुरु शंकराचार्य ने इस श्लोक के माध्यम से यह बताया है कि आत्मा शुद्ध, अजर, अमर और अनंत है। इसका अध्ययन और जाप साधक को मानसिक और आत्मिक शांति प्रदान करता है और उसे मोक्ष की दिशा में अग्रसर करता है। निर्वाण षटकम् केवल एक श्लोक संग्रह नहीं, बल्कि एक साधना है, जो आत्मा को उसकी वास्तविकता से परिचित कराती है और उसे मुक्ति की ओर ले जाती है।
निर्वाण का अर्थ है “निराकार”।
निर्वाण षट्कम का संदर्भ इस बात से है कि – आप यह या वह नहीं बनना चाहते। यदि आप वास्तव में यह या वह नहीं बनना चाहते, तो फिर आप क्या बनना चाहते हैं? यह सवाल बहुत गहरा है और आपका मन इसे समझ नहीं सकता क्योंकि आपका मन हमेशा कुछ न कुछ बनना चाहता है, वह हमेशा किसी न किसी आकांक्षा या पहचान की ओर खिंचता है।
अगर मैं कहूं, “मैं यह नहीं बनना चाहता, मैं वह नहीं बनना चाहता,” तो आप सोच सकते हैं, “अरे, यह व्यक्ति तो किसी महान चीज़ के बारे में बात कर रहा है!” लेकिन ऐसा नहीं है, यह किसी महान चीज़ के बारे में नहीं है। फिर आप सोच सकते हैं, “अरे, तो क्या यह रिक्तता की बात हो रही है?” नहीं, यह रिक्तता की बात भी नहीं है। “क्या यह शून्यता की बात है?” नहीं, यह शून्यता की बात भी नहीं है।
मनोबुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहं न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे । न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 1 ।।
न च प्राणसंज्ञो न वै पंचवायुः, न वा सप्तधातुः न वा पञ्चकोशः । न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायु, चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 2 ।।
न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ, मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः । न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः, चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 3 ।।
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं, न मन्त्रो न तीर्थो न वेदा न यज्ञ । अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता, चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 4 ।।
न मे मृत्युशंका न मे जातिभेदः, पिता नैव मे नैव माता न जन्मः । न बन्धुर्न मित्रं गुरूर्नैव शिष्यः, चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 5 ।।
अहं निर्विकल्पो निराकार रूपो, विभुत्वाच सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् । न चासङ्गतं नैव मुक्तिर्न मेयः, चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 6 ।।
Nirvana Shatakam Lyrics in English
|| Nirvana Shatakam Lyrics ||
Mano buddhi ahankara chittani naaham Na cha shrotravjihve na cha ghraana netre Na cha vyoma bhumir na tejo na vaayuhu Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham
Na cha prana sangyo na vai pancha vayuhu Na va sapta dhatur na va pancha koshah Na vak pani-padam na chopastha payu Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham
Na me dvesha ragau na me lobha mohau Na me vai mado naiva matsarya bhavaha Na dharmo na chartho na kamo na mokshaha Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham
Na punyam na papam na saukhyam na duhkham Na mantro na tirtham na veda na yajnah Aham bhojanam naiva bhojyam na bhokta Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham
Na me mrtyu shanka na mejati bhedaha Pita naiva me naiva mataa na janmaha Na bandhur na mitram gurur naiva shishyaha Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham
Aham nirvikalpo nirakara rupo Vibhut vatcha sarvatra sarvendriyanam Na cha sangatham naiva muktir na meyaha Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham
Nirvana Shatakam Meaning in Hindi
मनोबुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहं न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे । न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 1 ।।
मैं मन का कोई भी अंग नहीं हूँ, जैसे बुद्धि, अहंकार या स्मृति, मैं सुनने, चखने, सूंघने या देखने की इन्द्रियाँ नहीं हूँ, मैं न तो आकाश हूँ, न पृथ्वी, न अग्नि, न वायु, मैं तो चेतना और आनन्द का स्वरूप हूँ, शिव हूँ
Mano buddhi ahankara chittani naaham Na cha shrotravjihve na cha ghraana netre Na cha vyoma bhumir na tejo na vaayuhu Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham
I am not any aspect of the mind like the intellect, the ego or the memory, I am not the organs of hearing, tasting, smelling or seeing, I am not the space, nor the earth, nor fire, nor air, I am the form of consciousness and bliss, am Shiva (that which is not)
न च प्राणसंज्ञो न वै पंचवायुः, न वा सप्तधातुः न वा पञ्चकोशः । न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायु, चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 2 ।।
मैं प्राण नहीं हूँ, न ही पाँच प्राण वायु (प्राण की अभिव्यक्तियाँ) हूँ, मैं सात आवश्यक तत्व नहीं हूँ, न ही शरीर के पाँच कोष हूँ, मैं मुख, हाथ, पैर आदि शरीर के अंग भी नहीं हूँ, मैं चेतना और आनन्द का स्वरूप हूँ, मैं शिव हूँ।
Na cha prana sangyo na vai pancha vayuhu Na va sapta dhatur na va pancha koshah Na vak pani-padam na chopastha payu Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham
I am not the Vital Life Energy (Prana), nor the Five Vital Airs (manifestations of Prana), I am not the seven essential ingredients nor the 5 sheaths of the body, I am not any of the body parts, like the mouth, the hands, the feet, etc., I am the form of consciousness and bliss, I am Shiva.
न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ, मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः । न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः, चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 3 ।।
मुझमें न द्वेष है, न राग है, न लोभ है, न मोह है, मुझमें न अभिमान है, न ईर्ष्या है, मैं अपने कर्तव्य, धन, वासना या मोक्ष से तादात्म्य नहीं रखता, मैं चैतन्य और आनंद का स्वरूप हूँ, मैं शिव हूँ।
Na me dvesha ragau na me lobha mohau Na me vai mado naiva matsarya bhavaha Na dharmo na chartho na kamo na mokshaha Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham
There is no hatred nor passion in me, no greed nor delusion, There is no pride, nor jealousy in me, I am not identified with my duty, wealth, lust or liberation, I am the form of consciousness and bliss, I am Shiva.
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं, न मन्त्रो न तीर्थो न वेदा न यज्ञ । अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता, चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 4 ।।
मैं न पुण्य हूँ, न पाप, न सुख हूँ, न दुःख, मुझे न मंत्रों की आवश्यकता है, न तीर्थ, न शास्त्रों की, न अनुष्ठानों की, मैं अनुभव नहीं हूँ, अनुभव की वस्तु नहीं हूँ, यहाँ तक कि अनुभव करने वाला भी नहीं हूँ, मैं चेतना और आनंद का स्वरूप हूँ, मैं शिव हूँ।
Na punyam na papam na saukhyam na duhkham Na mantro na tirtham na veda na yajnah Aham bhojanam naiva bhojyam na bhokta Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham
I am not virtue nor vice, not pleasure or pain, I need no mantras, no pilgrimage, no scriptures or rituals, I am not the experience, not the object of experience, not even the one who experiences, I am the form of consciousness and bliss, I am Shiva.
न मे मृत्युशंका न मे जातिभेदः, पिता नैव मे नैव माता न जन्मः । न बन्धुर्न मित्रं गुरूर्नैव शिष्यः, चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 5 ।।
मैं मृत्यु और उसके भय से बंधा नहीं हूँ, न जाति या पंथ से, मेरा न कोई पिता है, न माता है, न जन्म है, न मैं कोई सगा हूँ, न मित्र, न गुरु हूँ, न शिष्य, मैं चैतन्य और आनंद का स्वरूप हूँ, शिव हूँ।
Na me mrtyu shanka na mejati bhedaha Pita naiva me naiva mataa na janmaha Na bandhur na mitram gurur naiva shishyaha Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham
I am not bound by death and its fear, not by caste or creed, I have no father, nor mother, or even birth, I am not a relative, nor a friend, nor a teacher nor a student, I am the form of consciousness and bliss, am Shiva.
अहं निर्विकल्पो निराकार रूपो, विभुत्वाच सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् । न चासङ्गतं नैव मुक्तिर्न मेयः, चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 6 ।।
मैं द्वैत से रहित हूँ, मेरा स्वरूप निराकार है, मैं सर्वव्यापी हूँ, मैं सर्वत्र विद्यमान हूँ, सभी इन्द्रियों में व्याप्त हूँ, मैं न आसक्त हूँ, न मुक्त हूँ, न सीमित हूँ, मैं चेतना और आनंद का स्वरूप हूँ, मैं शिव हूँ।
Aham nirvikalpo nirakara rupo Vibhut vatcha sarvatra sarvendriyanam Na cha sangatham naiva muktir na meyaha Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham
I am devoid of duality, my form is formlessness, I am omnipresent, I exist everywhere, pervading all senses, I am neither attached, neither free nor limited, I am the form of consciousness and bliss, I am Shiva.
Nirvana Shatakam Benefits
निर्वाण षटकम् आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा रचित एक दिव्य श्लोक संग्रह है, जो आत्मज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह छह श्लोकों का संकलन है, जिसमें आत्मा की शाश्वतता और अद्वितीयता का गूढ़ बोध कराया गया है। इसका नियमित पाठ और अभ्यास साधक को कई महत्वपूर्ण लाभ प्रदान कर सकता है। यहां हम निर्वाण षटकम् के प्रमुख लाभों पर चर्चा करेंगे, जो आपके आत्मिक और मानसिक जीवन को परिवर्तित कर सकते हैं।
आत्मबोध की प्राप्ति
निर्वाण षटकम् का सबसे महत्वपूर्ण लाभ आत्मबोध की प्राप्ति है। यह श्लोक संग्रह साधक को उसके असली स्वरूप की पहचान कराता है। शंकराचार्य के शब्दों में, आत्मा न तो शरीर है, न मन, और न ही इंद्रियाँ। यह शुद्ध चेतना का रूप है जो अजर और अमर है। नियमित रूप से इस श्लोक का पाठ करने से साधक अपने वास्तविक स्वरूप को समझता है और इस पृथ्वी पर भौतिक अस्तित्व से परे जाता है। यह आत्मबोध उसे संसार के तात्कालिक सुख-दुख से परे ले जाता है।
मानसिक शांति और स्थिरता
निर्वाण षटकम् का जाप मानसिक शांति और स्थिरता प्राप्त करने में अत्यंत सहायक है। आज के समय में तनाव और चिंताओं का सामना करने के लिए मन को शांत और स्थिर रखना आवश्यक है। यह श्लोक मानसिक अशांति को दूर करता है और एक स्थिर, शांत मन की स्थिति प्रदान करता है। जब व्यक्ति अपने असली स्वरूप की पहचान कर लेता है, तो बाहरी परिस्थितियों का उसके मन पर प्रभाव कम हो जाता है। इससे वह मानसिक शांति और संतुलन को प्राप्त करता है।
आध्यात्मिक प्रगति और मोक्ष की प्राप्ति
निर्वाण षटकम् का नियमित अभ्यास साधक को आध्यात्मिक प्रगति की दिशा में अग्रसर करता है। यह श्लोक आत्मा की शाश्वतता और अद्वितीयता की सच्चाई को उजागर करता है, जिससे साधक के जीवन में आध्यात्मिक जागरूकता का विकास होता है। जब व्यक्ति अपने आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जान लेता है, तो वह मोक्ष की प्राप्ति की ओर कदम बढ़ाता है। मोक्ष वह स्थिति है जिसमें आत्मा जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाती है और शाश्वत शांति प्राप्त करती है।
आत्मविश्वास और आंतरिक शक्ति
निर्वाण षटकम् का अध्ययन और जाप साधक में आत्मविश्वास और आंतरिक शक्ति का विकास करता है। जब व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप और शक्ति को पहचानता है, तो वह बाहरी चुनौतियों का सामना अधिक साहस और आत्मविश्वास के साथ कर सकता है। यह श्लोक आत्मा की असीम शक्ति और ऊर्जा को उजागर करता है, जिससे व्यक्ति अपने जीवन में अधिक सशक्त और प्रेरित महसूस करता है।
सांसारिक बंधनों से मुक्ति
निर्वाण षटकम् साधक को सांसारिक बंधनों से मुक्त करने में सहायक है। जब व्यक्ति अपने आत्मा की शाश्वतता को समझता है, तो वह सांसारिक संपत्ति, सुख, और दुखों से परे देखना शुरू कर देता है। यह श्लोक साधक को यह सिखाता है कि वह इन भौतिक बंधनों से मुक्त होकर एक अधिक वास्तविक और आध्यात्मिक जीवन जी सकता है।
निर्वाण षटकम् एक अद्वितीय और शक्तिशाली श्लोक संग्रह है, जो आत्मज्ञान, मानसिक शांति, आध्यात्मिक प्रगति, आत्मविश्वास, और सांसारिक बंधनों से मुक्ति के लिए एक अमूल्य साधन है। इसके नियमित जाप और अध्ययन से साधक को जीवन के गहरे रहस्यों को समझने और मोक्ष की दिशा में अग्रसर होने में सहायता मिलती है। यह श्लोक संग्रह जीवन की जटिलताओं को सरलता और स्पष्टता के साथ समझाने में सक्षम है, और इसे अपनाने से जीवन में सच्चे सुख और शांति की प्राप्ति होती है।
Why is Nirvana Shatkam So Important?
निर्वाण षटकम का महत्व क्यों है?
निर्वाण षटकम, जिसे आत्म षटकम् भी कहा जाता है, महान संत आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यह छः श्लोकों का संग्रह आत्मा (आत्मन) की वास्तविकता और ब्रह्मा (परमात्मा) के साथ उसकी एकता को स्पष्ट करता है। यह ग्रंथ अद्वैत वेदांत के दार्शनिक सिद्धांतों को संक्षेप में प्रस्तुत करता है और आत्मा के शाश्वत स्वरूप की पहचान में सहायक होता है। इसके महत्व को समझने के लिए, हमें इसके दार्शनिक, आध्यात्मिक, और व्यावहारिक पहलुओं पर ध्यान देना होगा।
दार्शनिक महत्व
निर्वाण षटकम दार्शनिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह अद्वैत वेदांत के सिद्धांतों को संक्षेप में प्रस्तुत करता है। अद्वैत वेदांत एक ऐसा दर्शन है जो आत्मा और ब्रह्मा के बीच किसी भी भेद को नकारता है और दोनों को एक ही वास्तविकता मानता है। निर्वाण षटकम में आदि शंकराचार्य आत्मा के शाश्वत और अपरिवर्तनशील स्वरूप की पुष्टि करते हैं। श्लोकों में मन, बुद्धि, अहंकार, और इन्द्रियों के परे आत्मा की स्थिति को स्पष्ट किया गया है, जिससे यह सिद्ध होता है कि आत्मा भौतिक तत्वों और मानसिक अवस्थाओं से परे है। यह दार्शनिकता जीवन के तात्त्विक प्रश्नों के उत्तर देने में सहायक होती है और आत्मा की वास्तविकता को समझने में गहराई प्रदान करती है।
आध्यात्मिक महत्व
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, निर्वाण षटकम आत्मा की वास्तविकता की पहचान की ओर एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक है। यह श्लोक साधक को अपने अंदर के वास्तविक स्वभाव की पहचान करने के लिए प्रेरित करते हैं। ये श्लोक मन, बुद्धि, और इन्द्रियों से परे आत्मा की शाश्वतता को व्यक्त करते हैं और ध्यान केंद्रित करने के लिए एक माध्यम प्रदान करते हैं। आत्मा की पहचान करने से साधक भौतिक संसार की माया और भ्रम से मुक्त हो सकता है। निर्वाण षटकम साधक को आत्मा की शाश्वतता, पवित्रता, और पूर्णता की अनुभूति कराने में सहायक होता है, जो आध्यात्मिक उत्थान और आत्मज्ञान की ओर एक कदम बढ़ने में मदद करता है।
व्यावहारिक महत्व
निर्वाण षटकम के व्यावहारिक महत्व को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। इस ग्रंथ की शिक्षाएँ जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रभाव डालती हैं और व्यक्ति को अपने जीवन में शांति और संतोष प्राप्त करने में सहायता करती हैं। यह ग्रंथ आत्मा की शाश्वतता और भौतिक संसार की अस्थिरता को समझने में मदद करता है, जिससे व्यक्ति अपने जीवन में वास्तविक सुख और शांति की खोज में सक्षम हो सकता है। निरvana षटकम् का अध्ययन करने से व्यक्ति को आत्मा की गहराई को समझने और उसकी वास्तविकता को पहचानने में सहायता मिलती है, जिससे वह अपनी जीवन की दिशा और उद्देश्य को स्पष्ट रूप से समझ सकता है।
When to Chant Nirvana Shatakam PDF
निर्वाण षटकम (Nirvana Shatakam) का जाप कब करें?
निर्वाण षटकम, जिसे आत्म षटकम् भी कहा जाता है, महान संत आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक दिव्य ग्रंथ है जो आत्मा की शाश्वतता और ब्रह्मा के साथ उसकी अद्वितीयता को स्पष्ट करता है। इस ग्रंथ के छः श्लोक आत्मा के वास्तविक स्वरूप को प्रकट करते हैं और आध्यात्मिक साधना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि, निर्वाण षटकम का जाप करने का सही समय और स्थिति जानना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। आइए जानते हैं कि निर्वाण षटकम का जाप कब और कैसे किया जाना चाहिए।
प्रातः काल (सुबह) के समय
साधना की शुरुआत प्रातः काल से करना सबसे शुभ माना जाता है। सुबह का समय शांति और ताजगी का होता है, जो ध्यान और जाप के लिए आदर्श है। निर्वाण षटकम का जाप प्रातः काल में करने से मन की स्थिति शांत रहती है और आत्मा के वास्तविक स्वरूप की पहचान में सहायता मिलती है। इस समय वातावरण भी स्वच्छ और शांत होता है, जिससे साधना की प्रभावशीलता बढ़ जाती है।
ध्यान और साधना के समय
यदि आप ध्यान और साधना की नियमित दिनचर्या में हैं, तो निर्वाण षटकम का जाप आपके ध्यान सत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है। ध्यान करने से पहले निर्वाण षटकम का जाप करने से मन को स्थिरता मिलती है और ध्यान में गहराई आती है। यह जाप आपकी साधना को एक नई दिशा और ऊर्जा प्रदान करता है, जिससे आत्मा की शाश्वतता की अनुभूति में सहायक होता है।
संकट या मानसिक तनाव के समय
जब आप मानसिक तनाव, चिंता, या जीवन में किसी संकट का सामना कर रहे हों, तब निर्वाण षटकम का जाप विशेष रूप से लाभकारी होता है। यह ग्रंथ आत्मा के शाश्वत स्वरूप की पहचान कराता है और भौतिक समस्याओं से परे देखने की दृष्टि प्रदान करता है। जाप के दौरान आत्मा की शाश्वतता की याद दिलाने से मानसिक शांति और स्थिरता प्राप्त होती है, जो संकट या तनाव को कम करने में मदद कर सकती है।
विशेष धार्मिक अवसरों और त्योहारों पर
धार्मिक अवसरों और त्योहारों पर निर्वाण षटकम का जाप करना भी शुभ माना जाता है। विशेष धार्मिक अवसरों पर जाप करने से आत्मा की शाश्वतता की भावना को और भी मजबूत किया जा सकता है। यह अवसर आपके आत्मिक विकास और आध्यात्मिक उन्नति के लिए एक विशेष अवसर प्रदान करता है।
उपासना और साधना के अंत में
यदि आप कोई विशेष उपासना या साधना कर रहे हैं, तो उसके अंत में निर्वाण षटकम का जाप करना अत्यंत लाभकारी होता है। साधना के अंत में यह जाप आपके प्रयासों की पूर्ति और आत्मा की शाश्वतता की साक्षात्कार में सहायता करता है। यह अंत में एक दिव्य संपूर्णता और संतोष प्रदान करता है।
संध्या काल (शाम) के समय
संध्या काल भी जाप के लिए एक आदर्श समय होता है, जब दिन की हलचल समाप्त हो चुकी होती है और रात की शांति शुरू होती है। इस समय निर्वाण षटकम का जाप करने से मन की स्थिति शांत रहती है और आत्मा की शाश्वतता की अनुभूति होती है। यह समय आपके दिन भर की ऊर्जा को शांत करने और आध्यात्मिक उन्नति के लिए उपयुक्त होता है।
What is the Nirvana Shatakam Mantra?
निर्वाण षटकम मंत्र क्या है?
निर्वाण षटकम (Nirvana Shatakam), जिसे अथर्वशीर्ष और शिव नंदन के नाम से भी जाना जाता है, एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कृत ग्रंथ है जो अद्वैत वेदांत के सिद्धांतों को प्रकट करता है। यह श्लोकों का संग्रह शंकराचार्य द्वारा लिखा गया माना जाता है और इसमें छः प्रमुख श्लोक होते हैं। ये श्लोक आत्मा की वास्तविकता और उसके ब्रह्मा के साथ एकत्व की बात करते हैं।
निर्वाण षटकम में, शंकराचार्य ने आत्मा (आत्मन) की शाश्वतता, निराकारता, और अज्ञेयता को उजागर किया है। इन श्लोकों में आत्मा के तत्व को दर्शाते हुए कहा गया है कि आत्मा न तो जन्म लेती है, न ही मरती है, बल्कि यह सदा के लिए शाश्वत और अपरिवर्तनीय है। इसके अलावा, आत्मा को सभी भौतिक वस्तुओं, भावनाओं और मन की गतिविधियों से परे दिखाया गया है। यह स्पष्ट करता है कि आत्मा और ब्रह्मा (सर्वव्यापक शक्ति) एक ही हैं और इसलिए किसी भी भौतिक परिवर्तन का आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
मंत्र में आत्मा की पहचान की जाती है कि वह न तो किसी वस्त्र के रूप में है, न किसी ध्वनि के रूप में, न किसी इंद्रिय के रूप में, और न ही किसी मन के रूप में। इसके माध्यम से, साधकों को यह सिखाया जाता है कि आत्मा की असली पहचान स्वयं के भीतर है, और उसे बाहरी वस्त्रों या व्यक्तित्व से नहीं जोड़ा जा सकता। यह आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझने के लिए ध्यान और साधना की आवश्यकता पर बल देता है।
यह मंत्र आत्मज्ञान की खोज में एक महत्वपूर्ण साधन है और इसे अक्सर ध्यान और साधना के दौरान पढ़ा जाता है। यह आत्मा के अद्वितीयता और उसकी निराकारता को समझने के लिए एक गहरा दार्शनिक दृष्टिकोण प्रदान करता है, जो साधकों को आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानने में मदद करता है।
What is the Story Behind Nirvana Shatakam?
निर्वाण षटकम के पीछे की कहानी क्या है?
निर्वाण षटकम का निर्माण और इसके पीछे की कहानी एक दिलचस्प और प्रेरणादायक है। यह ग्रंथ भारतीय दर्शन और अद्वैत वेदांत के एक प्रमुख आचार्य शंकराचार्य द्वारा लिखा गया माना जाता है। शंकराचार्य का जीवन और उनके दर्शन ने भारतीय धार्मिक और दार्शनिक विचारधारा पर गहरा प्रभाव डाला।
कहानी के अनुसार, शंकराचार्य ने ध्यान और साधना के माध्यम से अद्वितीयता के अनुभव को प्राप्त किया। उन्होंने देखा कि आत्मा का वास्तविक स्वरूप सदा के लिए अपरिवर्तनीय और शाश्वत है, और यह सभी भौतिक और मानसिक अंशों से परे है। इस अद्वितीय अनुभव को साझा करने और अन्य साधकों को आत्मज्ञान की ओर मार्गदर्शन देने के लिए, शंकराचार्य ने निर्वाण षटकम लिखा।
इन श्लोकों में शंकराचार्य ने आत्मा के तत्व की गहराई से विश्लेषण किया और दर्शाया कि आत्मा न तो किसी वस्त्र के रूप में है, न किसी ध्वनि के रूप में, और न ही किसी इंद्रिय के रूप में। यह स्पष्ट करता है कि आत्मा का वास्तविक स्वरूप उन सभी भौतिक और मानसिक वस्तुओं से परे है, जो अक्सर हमारी पहचान का हिस्सा होती हैं।
शंकराचार्य का यह ग्रंथ साधकों को आत्मा की शाश्वतता और उसकी अद्वितीयता को समझने में मदद करता है। उन्होंने यह भी दिखाया कि मोक्ष प्राप्ति के लिए आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जानना आवश्यक है, और यह केवल ध्यान और साधना के माध्यम से ही संभव है।
निर्वाण षटकम का अध्ययन और पाठ साधकों को आत्मा के गहन अनुभव की ओर प्रेरित करता है और यह आत्मा के अद्वितीयता और शाश्वतता को स्पष्ट करता है। इस प्रकार, यह ग्रंथ न केवल धार्मिक या दार्शनिक महत्व रखता है, बल्कि यह साधना और ध्यान के माध्यम से आत्मज्ञान प्राप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक भी है।
Nirvana Shatakam Lyrics Sanskrit
हिन्दी अर्थ
English Meaning
मनोबुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहं न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे । न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 1 ।।
अर्थ (Meaning): मैं न तो मन हूं, न बुद्धि, न अहंकार, न ही चित्त हूं | मैं न तो कान हूं, न जीभ, न नासिका, न ही नेत्र हूं | मैं न तो आकाश हूं, न धरती, न अग्नि, न ही वायु हूं | मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।
न च प्राणसंज्ञो न वै पंचवायुः, न वा सप्तधातुः न वा पञ्चकोशः । न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायु, चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 2 ।।
अर्थ (Meaning): मैं न प्राण हूं, न ही पंच वायु हूं | मैं न सात धातु हूं, और न ही पांच कोश हूं | मैं न वाणी हूं, न हाथ हूं, न पैर, न ही उत्सर्जन की इन्द्रियां हूं | मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।
न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ, मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः । न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः, चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 3 ।।
अर्थ (Meaning): न मुझे घृणा है, न लगाव है, न मुझे लोभ है, और न मोह | न मुझे अभिमान है, न ईर्ष्या | मैं धर्म, धन, काम एवं मोक्ष से परे हूं | मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं, न मन्त्रो न तीर्थो न वेदा न यज्ञ । अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता, चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 4 ।।
अर्थ (Meaning): मैं पुण्य, पाप, सुख और दुख से विलग हूं | मैं न मंत्र हूं, न तीर्थ, न ज्ञान, न ही यज्ञ | न मैं भोजन(भोगने की वस्तु) हूं, न ही भोग का अनुभव, और न ही भोक्ता हूं | मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।
न मे मृत्युशंका न मे जातिभेदः, पिता नैव मे नैव माता न जन्मः । न बन्धुर्न मित्रं गुरूर्नैव शिष्यः, चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 5 ।।
अर्थ (Meaning): न मुझे मृत्यु का डर है, न जाति का भेदभाव | मेरा न कोई पिता है, न माता, न ही मैं कभी जन्मा था मेरा न कोई भाई है, न मित्र, न गुरू, न शिष्य, | मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।
अहं निर्विकल्पो निराकार रूपो, विभुत्वाच सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् । न चासङ्गतं नैव मुक्तिर्न मेयः, चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।। 6 ।।
अर्थ (Meaning): मैं निर्विकल्प हूं, निराकार हूं | मैं चैतन्य के रूप में सब जगह व्याप्त हूं, सभी इन्द्रियों में हूं | न मुझे किसी चीज में आसक्ति है, न ही मैं उससे मुक्त हूं | मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं |
Mano buddhi ahankara chittani naaham Na cha shrotravjihve na cha ghraana netre Na cha vyoma bhumir na tejo na vaayuhu Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham
I am not any aspect of the mind like the intellect, the ego or the memory, I am not the organs of hearing, tasting, smelling or seeing, I am not the space, nor the earth, nor fire, nor air, I am the form of consciousness and bliss, am Shiva (that which is not)…
Na cha prana sangyo na vai pancha vayuhu Na va sapta dhatur na va pancha koshah Na vak pani-padam na chopastha payu Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham
I am not the Vital Life Energy (Prana), nor the Five Vital Airs (manifestations of Prana), I am not the seven essential ingredients nor the 5 sheaths of the body, I am not any of the body parts, like the mouth, the hands, the feet, etc., I am the form of consciousness and bliss, I am Shiva (that which is not)…
Na me dvesha ragau na me lobha mohau Na me vai mado naiva matsarya bhavaha Na dharmo na chartho na kamo na mokshaha Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham
There is no hatred nor passion in me, no greed nor delusion, There is no pride, nor jealousy in me, I am not identified with my duty, wealth, lust or liberation, I am the form of consciousness and bliss, I am Shiva (that which is not)…
Na punyam na papam na saukhyam na duhkham Na mantro na tirtham na veda na yajnah Aham bhojanam naiva bhojyam na bhokta Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham
I am not virtue nor vice, not pleasure or pain, I need no mantras, no pilgrimage, no scriptures or rituals, I am not the experience, not the object of experience, not even the one who experiences, I am the form of consciousness and bliss, I am Shiva (that which is not)….
Na me mrtyu shanka na mejati bhedaha Pita naiva me naiva mataa na janmaha Na bandhur na mitram gurur naiva shishyaha Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham
I am not bound by death and its fear, not by caste or creed, I have no father, nor mother, or even birth, I am not a relative, nor a friend, nor a teacher nor a student, I am the form of consciousness and bliss, am Shiva (that which is not)…
Aham nirvikalpo nirakara rupo Vibhut vatcha sarvatra sarvendriyanam Na cha sangatham naiva muktir na meyaha Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham
I am devoid of duality, my form is formlessness, I am omnipresent, I exist everywhere, pervading all senses, I am neither attached, neither free nor limited, I am the form of consciousness and bliss, I am Shiva (that which is not)
FAQs – निर्वाण षटकम – Nirvana Shatakam
1. निर्वाण षटकम (Nirvana Shatakam) का जप करने से क्या होता है?
निर्वाण षटकम का जप करने से साधक को कई लाभ मिलते हैं। यह श्लोक आत्मा की शाश्वतता और अद्वितीयता का बोध कराता है, जिससे व्यक्ति अपने असली स्वरूप को पहचानता है। इसके नियमित जाप से मानसिक शांति, स्थिरता, और आंतरिक शक्ति का विकास होता है। यह साधक को सांसारिक बंधनों से मुक्त करता है और आध्यात्मिक प्रगति की दिशा में अग्रसर करता है। इसके अलावा, यह आत्मज्ञान प्राप्त करने और मोक्ष की प्राप्ति में सहायक होता है।
2. क्या मैं निर्वाण षटकम (Nirvana Shatakam) का ध्यान कर सकता हूं?
हाँ, आप निर्वाण षटकम का ध्यान कर सकते हैं। ध्यान करते समय, श्लोक के अर्थ और भावनाओं को ध्यान में रखते हुए मन को शांत और एकाग्र करना महत्वपूर्ण है। निर्वाण षटकम का ध्यान करने से आत्मा की शाश्वतता और अद्वितीयता की समझ में वृद्धि होती है और यह मानसिक शांति और आध्यात्मिक जागरूकता को बढ़ावा देता है। ध्यान के दौरान, आप श्लोक के शब्दों और उनके अर्थ को अपने मन में गहराई से अनुभव कर सकते हैं।
3. निर्वाण षटकम (Nirvana Shatakam) किसने दिया था?
निर्वाण षटकम को आदिगुरु शंकराचार्य ने रचा था। आदिगुरु शंकराचार्य अद्वैत वेदांत के महान आचार्य थे और भारतीय दर्शन में उनका महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने इस श्लोक संग्रह के माध्यम से आत्मा की शाश्वतता और अद्वितीयता को उजागर किया। उनके द्वारा रचित यह श्लोक संग्रह साधकों को आत्मज्ञान प्राप्त करने और मोक्ष की दिशा में अग्रसर होने में मदद करता है।
4. शक्तिशाली स्तोत्रम कौन सा है?
शक्तिशाली स्तोत्रम का चयन व्यक्ति की आध्यात्मिक आवश्यकताओं और रुचियों पर निर्भर करता है। हालांकि, शिव स्तोत्रम और हनुमान चालीसा को शक्तिशाली स्तोत्रों में माना जाता है। ये स्तोत्र साधक को मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करते हैं और जीवन में कठिनाइयों का सामना करने में मदद करते हैं। इन स्तोत्रों के पाठ से आत्मशक्ति, सुरक्षा, और प्रेरणा प्राप्त होती है।
5. मंत्र में सबसे पवित्र ध्वनि कौन सी है?
मंत्रों में सबसे पवित्र ध्वनि “ॐ” (ओं) मानी जाती है। यह ध्वनि ब्रह्मा, विष्णु, और महेश्वर (शिव) के अद्वितीय रूप की प्रतीक है और इसे सृष्टि के सबसे मूल और पवित्र ध्वनि के रूप में देखा जाता है। “ॐ” की ध्वनि सभी ध्वनियों की उत्पत्ति और समापन का संकेत है और यह आध्यात्मिक जागरूकता और शांति प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है।
मुझे अपने ही रंग में रंगले मेरे यार सांवरे (Mujhe apne Hi Rang Mein Rang Le) एक भक्तिमय गीत है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण के प्रति भक्त की असीम भक्ति और समर्पण की अभिव्यक्ति होती है। इस भजन में भक्त भगवान से प्रार्थना करता है कि वे उसे अपने प्रेम और भक्ति के रंग में रंग दें, जिससे उसका मन और आत्मा पूरी तरह से कृष्णमय हो जाए।
मुझे अपने ही रंग में रंगले मेरे यार सांवरे, मेरे यार सांवरे, दिलदार सांवरे….
ऐसा रंग तू रंग दे सांवरिया, जो उतरे ना जनम जनम तक, नाम तू अपना लिख दे कन्हैया, मेरे सारे बदन पर, मुझे अपना बना के देखो इक बार सांवरे, मेरे यार सांवरे, दिलदार सांवरे….
श्याम पिया मोरी रंग दे चुनरिया, बिना रंगाये मैं तो घर नहीं जाउंगी, बीत जाए चाहे सारी उमरिया… लाल ना रंगाऊं मैं तो हरी ना रंगाऊ, अपने ही रंग में रंग दे सांवरिया, ऐसी रंग दे जो रंग ना छूटे धोबिया धोये चाहे सारी उमरिया… जो नाही रंगों तो मोल ही मंगाएदो, ब्रज में खुली है प्रेम बजरिया, या चुनरी को ओड मैं तो यमुना पे जाउंगी, श्याम की मोपे पड़ेगी नजरिया… मेरे जीवन की नैया लेजा उस पास सांवरे, मेरे यार सांवरे, दिलदार सांवरे….
भव सागर में ऐ मनमोहन मांझी बन कर आना, ना भटकूँ इधर उधर हे प्यारे मुरली मधुर बजाना, मेरी जीवन नैया लेजा उस पार सांवरे, मेरे यार सांवरे, दिलदार सांवरे….
रैन चडी रसूल की, रंग मौला के हाथ, तूने जिसकी चुनरी रंगदीनी रे, धन धन उसके भाग… जो तू मांगे रंग की रंगाई, तो मेरा जोबन गिरवी रख ले, पर अपनी पगड़िया मोरी चुनरिया, एक ही रंग में रंग ले… तेरे रंग तेरी आशिकी जरूर कुछ लाएगी, मुझे मार डालेगी या जीना सिखाएगी, दुनिया के रंग मिटा देगी मुझमे से, रंग तेरे प्यार का यह मुझपे चढाएगी… मुझे अपना बना के देखो इक बार सांवरे, मुझे अपने ही रंग में रंगले मेरे यार सांवरे….
प्रीत लगाना प्रीतम ऐसी निभ जाए मरते दम तक, इसके सिवा ना तुझसे माँगा ना कुछ चाहा अब तक, मेरे कान्हा तुम बिन जीना बेकार सांवरे, मेरे यार सांवरे, दिलदार सांवरे….
|| Mujhe apne Hi Rang Mein Rang Le Lyrics ||
Mujhe apane hi rang me rangale mere yaar saanvare Mere yaar saanvare, diladaar saanvare
Aisa rang too rang de saanvariya jo utare na janam janam tak Naam too apana likh de kanhaiya mere saare badan par Mujhe apana bana ke dekho ik baar saanvare
Shyaam piya mori rang de chunariya, Bina rangaaye mainghar nahi jaaungee Bina rangaaye mainto ghar nahi jaaungi, Beet jaae chaahe saari umariyaa Laal na rangaaoon mainto hari na rangaaoo, Apane hi rang me rang de saanvariyaa Aisi rang de jo rang na chhoote dhobiya dhoye chaahe saari umariyaa Jo naahi rangon to mol hi mangaaedo braj me khuli hai prem bajariyaa Ya chunari ko od mainto yamuna pe jaaungi shyaam ki mope padegi najariyaa Mere jeevan ki naiya laga ja us paas saanvare
Bhav saagar me ai manamohan maajhi ban kar aana, Na bhatakoon idhar udhar he pyaare murali mdhur bajaanaa Meri jeevan leja us paar saanvare
Rain chadi rasool ki, rang maula ke haath Toone jisaki chunari rangadeeni re dhan dhan usake bhaag Jo too maange rang ki rangaai to mera joban giravi rkh le Par apani pagadiya mori chunariya ek hi rang me rang le Tere rang teri aashaki jarror rang laaegee Mujhe maar daalegi ya jeena sikhaaegee Duniya ke rang mita degi mujhame se, Rang tere pyaar ka yah mujh pe chdhaaegee Mujhe apana bana ke dekho ek baar saanvare Mujhe apane hi rang me rangale mere yaar saanvare
Preet lagaana preetam aisi nibh jaae marate dam tak Is ke siva na tujh se chaah na kuchh maaga abatak Mere kaahana tujh bin jeena bekaar saanvare Mere yaar saanvare, diladaar saanvare
Mujhe apane hi rang me rangale mere yaar saanvare Mere yaar saanvare, diladaar saanvare
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भजन “मुझे अपने ही रंग में रंगले मेरे यार सांवरे” भारतीय भक्तिमय संगीत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह भजन भक्त के अपने आराध्य से आत्मसमर्पण की प्रार्थना को दर्शाता है, जिसमें भक्त अपने ईश्वर से अनुरोध करता है कि उसे अपने दिव्य रंग में रंग दें। यह भजन मुख्यतः कृष्ण भक्ति पर आधारित है, जिसमें कृष्ण को “सांवरे” के रूप में संबोधित किया गया है।
भक्ति का मार्ग भारतीय संस्कृति और परंपराओं में अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस मार्ग पर चलते हुए, भक्त अपने ईश्वर से आत्मा की शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति की प्रार्थना करता है। “मुझे अपने ही रंग में रंगले” भजन इसी भक्ति मार्ग की एक सजीव अभिव्यक्ति है। इसमें भक्त अपने आराध्य से विनती करता है कि वे उसे अपने रंग में रंग दें, जिसका अर्थ है कि भक्त अपने ईश्वर के गुणों, विचारों और प्रेम में पूरी तरह डूब जाए।
यह भजन एक आत्मीय और आध्यात्मिक अनुभव को दर्शाता है, जिसमें भक्त अपने ईश्वर से व्यक्तिगत और अंतरंग संबंध की प्रार्थना करता है। “सांवरे” शब्द का प्रयोग भगवान कृष्ण के लिए किया गया है, जिनका वर्ण सांवला है। भारतीय भक्तिमय साहित्य में भगवान कृष्ण को सांवरे के रूप में वर्णित किया गया है, और उनके प्रेम में डूबे भक्त उनके इस रूप को अपने दिल से लगाते हैं।
भजन का प्रारंभ “मुझे अपने ही रंग में रंगले” से होता है, जो भक्त के आत्मसमर्पण और प्रेम की उच्चतम अवस्था को दर्शाता है। इसमें भक्त अपने ईश्वर से यह प्रार्थना करता है कि वे उसे अपने दिव्य प्रेम और करुणा में रंग दें। यह भजन सिर्फ एक गीत नहीं है, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा है, जिसमें भक्त अपने ईश्वर के साथ एकाकार होने की लालसा रखता है।
भजन के शब्द सरल और सहज हैं, लेकिन उनके पीछे छिपी भावना अत्यंत गहन और प्रभावशाली है। इसमें भक्त का समर्पण, प्रेम और विश्वास स्पष्ट रूप से प्रकट होता है। यह भजन सुनने वाले के मन में शांति और भक्ति की भावना को जगाता है। इसके माध्यम से, भक्त अपने ईश्वर के प्रति अपनी निष्ठा और प्रेम को व्यक्त करता है।
“मुझे अपने ही रंग में रंगले” भजन के माध्यम से, भक्त अपने जीवन को ईश्वर के प्रेम और करुणा में रंगने की प्रार्थना करता है। यह भजन हमें यह सिखाता है कि जीवन की वास्तविकता और सत्यता ईश्वर के प्रेम में ही निहित है। भक्त का समर्पण और प्रेम ही उसे ईश्वर के निकट ले जाता है, और यही इस भजन का मुख्य संदेश है।
भारतीय भक्तिमय संगीत में इस प्रकार के भजनों का विशेष महत्व है। ये भजन न केवल भक्तों को आध्यात्मिक शांति प्रदान करते हैं, बल्कि उन्हें अपने ईश्वर के साथ एक गहरा संबंध स्थापित करने में भी मदद करते हैं। “मुझे अपने ही रंग में रंगले” भजन भी इसी परंपरा का एक हिस्सा है, जो भक्तों को उनके ईश्वर के प्रेम और करुणा में डूबने का अवसर प्रदान करता है।
इस भजन के माध्यम से, भक्त अपने ईश्वर से प्रार्थना करता है कि वे उसे अपने रंग में रंग लें, ताकि उसका जीवन उनके प्रेम और करुणा से परिपूर्ण हो सके। यह भजन एक आध्यात्मिक अनुभव को दर्शाता है, जिसमें भक्त अपने ईश्वर के प्रति अपनी निष्ठा और प्रेम को प्रकट करता है। इसके माध्यम से, भक्त अपने जीवन को ईश्वर के प्रेम और करुणा में रंगने की प्रार्थना करता है, और यही इस भजन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है।
Mujhe apne Hi Rang Mein Rang Le Bhajan Benefits
भजन ‘मुझे अपने ही रंग में रंगले मेरे यार सांवरे’ के कई लाभ हैं जो शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से व्यक्ति को लाभान्वित करते हैं। निम्नलिखित हैं इस भजन के कुछ प्रमुख लाभ:
आध्यात्मिक शांति: इस भजन को सुनने और गाने से मन में शांति और स्थिरता आती है। यह व्यक्ति को अपने आध्यात्मिक मार्ग पर केंद्रित करता है और उसे भगवान के प्रति समर्पित करता है।
भावनात्मक सुकून: भजन गाने से तनाव और चिंता कम होती है। यह व्यक्ति के मन को सुकून प्रदान करता है और नकारात्मक विचारों से मुक्ति दिलाता है।
भक्ति का विकास: इस भजन के माध्यम से व्यक्ति में भक्ति और प्रेम की भावना बढ़ती है। यह भगवान के प्रति आस्था और विश्वास को मजबूत करता है।
सकारात्मक ऊर्जा: भजन गाने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जो जीवन के हर क्षेत्र में सकारात्मकता और उत्साह भरता है।
सामाजिक जुड़ाव: भजन सामूहिक रूप से गाए जाते हैं, जिससे सामाजिक जुड़ाव और सामूहिकता की भावना का विकास होता है।
ध्यान और एकाग्रता: भजन गाने से ध्यान और एकाग्रता की शक्ति बढ़ती है। यह व्यक्ति को ध्यान की गहराई में ले जाता है और उसकी मानसिक शक्ति को मजबूत करता है।
इस प्रकार, भजन ‘मुझे अपने ही रंग में रंगले मेरे यार सांवरे’ व्यक्ति को संपूर्ण रूप से लाभान्वित करता है और उसे भगवान के करीब लाता है।
Frequently Asked Questions
“मुझे अपने ही रंग में रंगले मेरे यार सांवरे” भजन क्या है?
“मुझे अपने ही रंग में रंगले मेरे यार सांवरे” एक भावपूर्ण भजन है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण की आराधना और उनके प्रेम की गहराई को दर्शाया गया है। यह भजन भक्तों के मन में भगवान के प्रति असीम प्रेम और समर्पण की भावना को उजागर करता है।
इस भजन के बोल क्या हैं?
“मुझे अपने ही रंग में रंगले मेरे यार सांवरे” भजन के बोल भगवान श्रीकृष्ण की विशेषताओं और उनके रंग, रूप, और प्रेम का वर्णन करते हैं। इस भजन के बोल पढ़ने या सुनने के लिए आप धार्मिक संगीत प्लेटफार्म, भजन संग्रह, या यूट्यूब पर इसके वीडियो देख सकते हैं।
इस भजन को कौन गाता है?
इस भजन को विभिन्न भजन गायक गाते हैं, जो अपने भावपूर्ण गायन से इसे प्रस्तुत करते हैं। भजन के वीडियो विवरण या धार्मिक संगीत एल्बम में गायक का नाम उल्लेखित होता है, जिससे आप विशिष्ट गायक की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
“मुझे अपने ही रंग में रंगले मेरे यार सांवरे” भजन का वीडियो कहाँ देख सकते हैं?
इस भजन का वीडियो आप यूट्यूब जैसे वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म पर देख सकते हैं। इसके अलावा, धार्मिक संगीत ऐप्स और वेबसाइट्स पर भी इसे उपलब्ध पाया जा सकता है।
इस भजन का उद्देश्य क्या है?
“मुझे अपने ही रंग में रंगले मेरे यार सांवरे” भजन का उद्देश्य भगवान श्रीकृष्ण के प्रति भक्तों के प्रेम और समर्पण को प्रकट करना है। यह भजन भक्तों को भगवान के दिव्य रंग और रूप में रंग जाने की प्रार्थना करता है, और उन्हें आध्यात्मिक रूप से जोड़ता है।
Sai Baba Dhoop Aarti Timings साईं बाबा की धूप आरती का समय: सूर्यास्त की महिमा के साथ
साईं बाबा की पावन धूप आरती एक अत्यंत मंगलमय और भावपूर्ण अनुष्ठान है, जिसका समय शाम की संध्या बेला, विशेषकर सूर्यास्त के ठीक बाद का क्षण, माना जाता है। यह समय निर्धारण केवम एक परंपरा नहीं, बल्कि गहरे आध्यात्मिक और प्राकृतिक महत्व से जुड़ा है।
भावना प्रधान: सबसे महत्वपूर्ण है भावना। यदि किसी कारणवश सटीक समय पर आरती न कर पाएँ, तो भी सायंकाल के समय, श्रद्धा और एकाग्रता के साथ आरती करना ही मुख्य है। साईं बाबा भक्त के शुद्ध हृदय और समर्पित भाव को सर्वोपरि मानते हैं।
संध्या बेला का आध्यात्मिक महत्व: हिंदू धर्म में संध्या काल (सूर्योदय और सूर्यास्त का समय) को बेहद पवित्र माना गया है। यह वह सूक्ष्म क्षण है जब दिन और रात का संधिस्थल होता है, जिसे आत्मचिंतन, ईश्वर-स्मरण और आराधना के लिए सर्वोत्तम समय माना जाता। प्रकाश और अंधकार के इस संगम पर मन शांत और भावना ईश्वर की ओर अधिक आकर्षित होती है।
सूर्यास्त: प्रतीक और शुभारंभ: सूर्यास्त का क्षण दिन के कर्मों के समापन और शांति व विश्राम के आगमन का प्रतीक है। यह संकेत है कि गृहस्थ के दैनिक कर्तव्यों से विराम लेकर अब ईश्वर भक्ति में मन लगाने का समय आ गया है। धूप आरती इसी संक्रमण काल में साईं बाबा के प्रति कृतज्ञता, समर्पण और प्रार्थना व्यक्त करने का साधन है। सूर्यास्त के बाद की गई आरती अंधकार पर प्रकाश की विजय और बाबा की दिव्य ज्योति के स्मरण का भाव जगाती है।
स्थानीय सूर्यास्त समय का महत्व: यहाँ एक महत्वपूर्ण बात ध्यान देने योग्य है: सूर्यास्त का सटीक समय हर स्थान के लिए भिन्न होता है। यह भौगोलिक स्थिति (अक्षांश-देशांतर) और मौसम पर निर्भर करता है। जो समय मुंबई में सूर्यास्त होता है, वह दिल्ली, कोलकाता या चेन्नई में कुछ मिनट पहले या बाद में हो सकता है। इसलिए, यह कहना अधिक उचित है कि धूप आरती आपके स्थानीय सूर्यास्त के समय के आसपास या उसके तुरंत बाद की जानी चाहिए।
व्यावहारिक सुझाव:
स्थानीय समय जानें: अपने शहर या क्षेत्र का सटीक सूर्यास्त समय जानने के लिए मौसम विभाग के ऐप, कैलेंडर या विश्वसनीय ऑनलाइन स्रोतों का उपयोग करें।
समय का पालन: सूर्यास्त के समय से लगभग 10-15 मिनट बाद तक धूप आरती प्रारंभ करने का आदर्श समय माना जाता है। यह वह समय होता है जब प्राकृतिक प्रकाश मद्धिम होने लगता है और शाम की शांति छाने लगती है।
पुसो न सुनबाई त्या, मज न भ्रातृजाया पुसो । पुसो न प्रिय सोयरे, प्रिय सगे न ज्ञाती पुसो ।। पुसो सुहृद ना सखा, स्वजन नाप्तबंधू पुसो । परीन गुरू साई मा मजवरी,कधीहीं रूसो ।।२।।
पुसो न अबला मुले, तरूण वृद्धही ना पुसो । पुसो न गुरूं धाकुटें, मजन थोर साने पुसो ।। पुसो नच भलेबुरे, सुजन साधुही ना पुसो । परी न गुरू साई मा, मजवरी कधीहीं रूसो ।।३।।
शिर्डी साईं बाबा की सबसे बड़ी खासियत उनका सर्वधर्म समभाव का संदेश है। उन्होंने हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई सभी को समान दृष्टि से देखा और “सबका मालिक एक” का उपदेश दिया। उनका जीवन सादगी, निस्वार्थ प्रेम, अटूट श्रद्धा और सबूरी (धैर्य) का प्रतीक है। उनकी शिक्षाएँ सरल भाषा में गहन आध्यात्मिक सत्य बताती हैं।
साई शिर्डी में आरती कितने बजे है?
शिर्डी में साईं बाबा के मंदिर में प्रतिदिन चार आरतियाँ होती हैं:
काकड़ आरती (प्रातः): सुबह लगभग 5:00 बजे (निर्धारित समय मौसम और दिन के अनुसार बदल सकता है)।
मध्याह्न आरती (दोपहर): दोपहर लगभग 12:00 बजे।
धूप आरती (सायं):सूर्यास्त के तुरंत बाद (समय मौसम के अनुसार बदलता रहता है, आमतौर पर शाम लगभग 6:30 बजे से 7:30 बजे के बीच, गर्मियों में देर से और सर्दियों में जल्दी)।
शेज आरती (रात्रि): रात लगभग 10:00 बजे से 10:30 बजे के बीच।
साईं बाबा को कैसे प्रभावित करें?
साईं बाबा को “प्रभावित” करने की आवश्यकता नहीं है। वह सभी भक्तों के हृदय को देखते हैं। उनकी कृपा पाने का सर्वोत्तम तरीका है: श्रद्धा और सबूरी: उनमें अटूट विश्वास (श्रद्धा) रखें और धैर्य (सबूरी) से प्रतीक्षा करें। निस्वार्थ सेवा: बिना किसी अपेक्षा के दूसरों की मदद करें, खासकर जरूरतमंदों की। सदाचार: ईमानदारी, दया और सत्यनिष्ठा से जीवन जिएँ। नियमित स्मरण: उनका नाम जपें, उनके भजन गाएँ या सुनें, उनकी आरती में भाग लें। समर्पण: अपनी सभी चिंताएँ और इच्छाएँ उनके चरणों में समर्पित कर दें (“यद्यपि तेल न्यारे” का भाव)।
साईं बाबा का चमत्कार क्या है?
साईं बाबा के असंख्य चमत्कारों के प्रमाण भक्तों के अनुभवों में मिलते हैं, जैसे: दूर से ही भक्तों की पीड़ा जान लेना और समाधान करना। असंभव लगने वाली समस्याओं का अचानक हल हो जाना। शारीरिक और मानसिक रोगों का चमत्कारिक ढंग से ठीक होना। भक्तों को सपनों में या साक्षात् दर्शन देना और मार्गदर्शन करना। उडी (भभूति) से असाध्य रोगों का निवारण करना।
हालाँकि, बाबा स्वयं कहते थे कि उनका सबसे बड़ा चमत्कार है भक्त के हृदय को बदलना, अंधविश्वास दूर करना और सच्चे धर्म का मार्ग दिखाना।
क्या हम पीरियड्स के दौरान शिर्डी मंदिर जा सकते हैं?
हाँ, बिल्कुल जा सकते हैं। शिर्डी साईं मंदिर में मासिक धर्म (पीरियड्स) के दौरान महिलाओं के प्रवेश पर कोई प्रतिबंध नहीं है। साईं बाबा ने कभी भी किसी भी भक्त को लिंग, जाति या शारीरिक स्थिति के आधार पर भेदभाव नहीं किया। उनका दरबार सभी के लिए खुला है। श्रद्धा और भक्ति भाव से कोई भी भक्त किसी भी समय दर्शन कर सकता है।
यहाँ शिर्डी साईं बाबा मंदिर का पूरा पता हिंदी में दिया गया है:
श्री साईं बाबा समाधि मंदिर, शिर्डी श्री साईबाबा संस्थान ट्रस्ट (शिर्डी) समाधि मंदिर, शिर्डी, तहसील: रहाटा, जिला: अहमदनगर, महाराष्ट्र – ४२३१०९, भारत
बृहस्पति देव चालीसा (Brihaspati Chalisa PDF) बृहस्पति देव, जिन्हें गुरु भी कहा जाता है, हिंदू धर्म में नवग्रहों में से एक माने जाते हैं। वे विद्या, ज्ञान और धर्म के अधिष्ठाता देवता हैं। बृहस्पति देव का संबंध बृहस्पति ग्रह से है, जिसे ज्योतिष शास्त्र में गुरु ग्रह के नाम से जाना जाता है। यह ग्रह व्यक्ति के जीवन में शिक्षा, धन, संतान, और शुभ फल देने वाला माना जाता है। बृहस्पति देव की पूजा से व्यक्ति को ज्ञान, संतान, और वैवाहिक सुख की प्राप्ति होती है, साथ ही यह धन-धान्य में भी वृद्धि करते हैं। ब्रह्मा चालीसा
बृहस्पति देव की पूजा विशेष रूप से गुरुवार के दिन की जाती है, जिसे बृहस्पतिवार या गुरुवार भी कहा जाता है। इस दिन व्रत रखने और बृहस्पति देव की आराधना करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। बृहस्पति देव के भक्त अपने जीवन में आने वाली सभी समस्याओं का समाधान और शुभफल प्राप्त करने के लिए उनकी चालीसा का पाठ करते हैं।
‘बृहस्पति देव चालीसा’ एक शक्तिशाली और प्रभावशाली स्तुति है, जिसमें 40 छंद होते हैं। प्रत्येक छंद में बृहस्पति देव के गुणों और उनकी महिमा का वर्णन किया गया है। इस चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। बृहस्पति देव चालीसा का नियमित पाठ करने से ज्ञान की वृद्धि होती है और संतान सुख की प्राप्ति होती है। साथ ही, जो व्यक्ति अपने जीवन में आर्थिक तंगी, वैवाहिक समस्या, या अन्य किसी भी प्रकार की कठिनाई का सामना कर रहा हो, उसे बृहस्पति देव की चालीसा का पाठ अवश्य करना चाहिए। इससे उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं।
बृहस्पति देव चालीसा का पाठ करने से गुरु ग्रह की शांति होती है। यह चालीसा गुरु ग्रह के अशुभ प्रभाव को दूर करने में सहायक मानी जाती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जब किसी व्यक्ति की कुंडली में गुरु ग्रह कमजोर हो, तो उसके जीवन में कई प्रकार की समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं, जैसे कि शिक्षा में बाधा, आर्थिक तंगी, संतान सुख में कमी, आदि। ऐसे में बृहस्पति देव की चालीसा का पाठ अत्यंत लाभकारी होता है।
इस चालीसा का पाठ किसी भी समय किया जा सकता है, लेकिन विशेष रूप से गुरुवार के दिन इसका पाठ करना अधिक फलदायी माना गया है। भक्तगण इसे प्रातःकाल या संध्या समय बृहस्पति देव की प्रतिमा या चित्र के सामने बैठकर पढ़ सकते हैं। इस दौरान पीले वस्त्र धारण करने और पीले फूलों का उपयोग करने से विशेष लाभ प्राप्त होता है।
बृहस्पति देव चालीसा का PDF प्रारूप आजकल इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध है। इसे डाउनलोड कर के, भक्तगण अपने घर में कभी भी इसका पाठ कर सकते हैं। यह चालीसा PDF प्रारूप में मिलने के कारण इसे अपने मोबाइल या कंप्यूटर पर सेव करना और पाठ करना बहुत ही सरल हो गया है। PDF प्रारूप में चालीसा पढ़ने का एक और लाभ यह है कि इसे आसानी से शेयर भी किया जा सकता है, जिससे अन्य भक्त भी इसका लाभ उठा सकते हैं।
Ashtottar shat path karat jo । Sarv siddhiya pavat jan so ।।
Shri guru charan ki dhara । Siddhashram sadhak parivara ।।
Jay jay jay anand ke swami । Barambar namami namami ।।
Ithi shri brihaspati dev chalisa sampoorn |
Shri Brihaspati Chalisa Benefits
श्री बृहस्पति चालीसा के लाभ
हिंदू धर्म में बृहस्पति देव को नवग्रहों में से एक महत्वपूर्ण ग्रह माना गया है। उन्हें ज्ञान, बुद्धि, शिक्षा और धर्म के अधिष्ठाता देवता के रूप में पूजा जाता है। बृहस्पति देव की कृपा से व्यक्ति को जीवन में ज्ञान, संतान, धन, वैवाहिक सुख, और समृद्धि प्राप्त होती है। बृहस्पति ग्रह का संबंध बृहस्पति देव से है और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, बृहस्पति ग्रह का व्यक्ति के जीवन में गहरा प्रभाव पड़ता है। श्री बृहस्पति चालीसा एक पवित्र स्तुति है, जिसमें बृहस्पति देव के गुणों, महिमा और कृपा का वर्णन किया गया है। इस चालीसा के पाठ से व्यक्ति को अनगिनत लाभ प्राप्त होते हैं, जो उसके जीवन को सुखमय और समृद्ध बनाते हैं।
बृहस्पति देव की कृपा प्राप्ति
श्री बृहस्पति चालीसा का नियमित पाठ करने से बृहस्पति देव की कृपा प्राप्त होती है। यह चालीसा बृहस्पति देव के गुणों और उनकी महिमा का वर्णन करती है, जिससे देवता प्रसन्न होते हैं और भक्तों पर अपनी कृपा बरसाते हैं। उनकी कृपा से व्यक्ति को जीवन में शिक्षा, धन, संतान सुख, और वैवाहिक जीवन में शांति और समृद्धि प्राप्त होती है। बृहस्पति देव की कृपा से व्यक्ति के जीवन में आने वाली सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं और उसका जीवन सुखदायक बनता है।
गुरु ग्रह के अशुभ प्रभावों से मुक्ति
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, बृहस्पति ग्रह को गुरु ग्रह कहा जाता है और यह व्यक्ति के जीवन में शिक्षा, धन, धर्म, और संतान सुख को प्रभावित करता है। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में गुरु ग्रह कमजोर या अशुभ स्थिति में हो, तो उसे जीवन में कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है, जैसे शिक्षा में बाधा, आर्थिक तंगी, संतान सुख में कमी, वैवाहिक जीवन में तनाव, आदि। ऐसे में श्री बृहस्पति चालीसा का पाठ करना अत्यंत लाभकारी होता है। इस चालीसा का पाठ करने से गुरु ग्रह के अशुभ प्रभाव दूर होते हैं और व्यक्ति को जीवन में सफलता प्राप्त होती है।
शिक्षा और ज्ञान की प्राप्ति
बृहस्पति देव को शिक्षा और ज्ञान का देवता माना जाता है। जो व्यक्ति शिक्षा में प्रगति करना चाहता है, उसे नियमित रूप से श्री बृहस्पति चालीसा का पाठ करना चाहिए। इस चालीसा के पाठ से बुद्धि का विकास होता है और व्यक्ति को शिक्षा के क्षेत्र में उन्नति प्राप्त होती है। विद्यार्थियों के लिए यह चालीसा अत्यंत लाभकारी होती है, क्योंकि इससे उनकी अध्ययन में एकाग्रता बढ़ती है और उन्हें परीक्षा में अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं। इसके अलावा, जो लोग किसी विशेष विद्या या कौशल में निपुणता प्राप्त करना चाहते हैं, उनके लिए भी यह चालीसा अत्यंत लाभकारी होती है।
वैवाहिक जीवन में शांति और समृद्धि
श्री बृहस्पति चालीसा का पाठ करने से वैवाहिक जीवन में शांति और समृद्धि प्राप्त होती है। बृहस्पति देव को विवाह और संतान सुख का अधिष्ठाता देवता माना जाता है। यदि किसी दंपत्ति के जीवन में वैवाहिक समस्याएं हैं, तो उन्हें नियमित रूप से इस चालीसा का पाठ करना चाहिए। इससे उनके वैवाहिक जीवन में शांति और समृद्धि का वास होगा और उनके बीच आपसी प्रेम और समझ बढ़ेगी। इसके साथ ही, जो दंपत्ति संतान प्राप्ति की इच्छा रखते हैं, उनके लिए भी यह चालीसा अत्यंत लाभकारी होती है।
आर्थिक तंगी से मुक्ति
श्री बृहस्पति चालीसा का पाठ करने से आर्थिक तंगी से मुक्ति मिलती है। बृहस्पति देव को धन और समृद्धि का देवता माना जाता है। यदि किसी व्यक्ति के जीवन में आर्थिक संकट चल रहा हो, तो उसे इस चालीसा का नियमित पाठ करना चाहिए। इससे उसके जीवन में धन-धान्य की प्राप्ति होगी और उसकी आर्थिक स्थिति में सुधार होगा। इसके अलावा, यदि किसी व्यक्ति को व्यापार या नौकरी में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा हो, तो भी इस चालीसा का पाठ करने से उसे सफलता प्राप्त होती है।
मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति
श्री बृहस्पति चालीसा का पाठ करने से मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। इस चालीसा के माध्यम से व्यक्ति बृहस्पति देव के साथ अपने संबंध को मजबूत कर सकता है और अपनी आत्मा को शुद्ध कर सकता है। नियमित रूप से इस चालीसा का पाठ करने से मन की अशांति और तनाव दूर होते हैं और व्यक्ति को आंतरिक शांति का अनुभव होता है। इसके साथ ही, यह चालीसा व्यक्ति को आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर करती है और उसे आत्मज्ञान प्राप्त करने में सहायता करती है।
समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा की प्राप्ति
श्री बृहस्पति चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। बृहस्पति देव को धर्म और ज्ञान का अधिष्ठाता माना जाता है, और उनकी कृपा से व्यक्ति का समाज में मान-सम्मान बढ़ता है। जो व्यक्ति इस चालीसा का नियमित पाठ करता है, उसे समाज में उच्च स्थान प्राप्त होता है और लोग उसकी प्रशंसा करते हैं। इसके साथ ही, बृहस्पति देव की कृपा से व्यक्ति के कार्यों में सफलता मिलती है और वह समाज में अपनी पहचान बना सकता है।
संतान सुख की प्राप्ति
श्री बृहस्पति चालीसा का पाठ करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है। बृहस्पति देव को संतान प्राप्ति का देवता माना जाता है, और उनकी कृपा से संतानहीन दंपत्ति को संतान सुख की प्राप्ति होती है। जो लोग संतान प्राप्ति की इच्छा रखते हैं, उन्हें इस चालीसा का नियमित रूप से पाठ करना चाहिए। इसके साथ ही, जो लोग अपने बच्चों के भविष्य की चिंता कर रहे हैं, उनके लिए भी यह चालीसा अत्यंत लाभकारी होती है। बृहस्पति देव की कृपा से उनके बच्चों का भविष्य उज्ज्वल होता है और वे जीवन में सफल होते हैं।
स्वास्थ्य में सुधार
श्री बृहस्पति चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के स्वास्थ्य में सुधार होता है। बृहस्पति देव को स्वास्थ्य और दीर्घायु का देवता माना जाता है। जो व्यक्ति किसी गंभीर बीमारी या स्वास्थ्य समस्या से पीड़ित हो, उसे इस चालीसा का पाठ अवश्य करना चाहिए। इस चालीसा के प्रभाव से रोगों का नाश होता है और व्यक्ति को स्वस्थ जीवन प्राप्त होता है। इसके साथ ही, बृहस्पति देव की कृपा से व्यक्ति की आयु में वृद्धि होती है और वह लंबा और स्वस्थ जीवन जी सकता है।
कर्म और धर्म के प्रति जागरूकता
श्री बृहस्पति चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में कर्म और धर्म के प्रति जागरूकता बढ़ती है। बृहस्पति देव को धर्म और न्याय का देवता माना जाता है, और उनकी कृपा से व्यक्ति के जीवन में सत्य, न्याय और धर्म की स्थापना होती है। जो व्यक्ति इस चालीसा का नियमित पाठ करता है, वह अपने कर्मों के प्रति सजग रहता है और धर्म के मार्ग पर चलता है। इसके साथ ही, बृहस्पति देव की कृपा से व्यक्ति को अपने जीवन के उद्देश्यों का बोध होता है और वह अपने जीवन में धर्म और न्याय का पालन करता है।
रिश्तों में मधुरता
श्री बृहस्पति चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के रिश्तों में मधुरता आती है। बृहस्पति देव को स्नेह और प्रेम का प्रतीक माना जाता है। उनकी कृपा से व्यक्ति के परिवार और समाज में प्रेम और आपसी समझ बढ़ती है। यदि किसी के जीवन में पारिवारिक या सामाजिक संबंधों में दरार आ गई हो, तो उसे इस चालीसा का नियमित रूप से पाठ करना चाहिए। इससे उसके रिश्तों में फिर से मिठास आ जाएगी और परिवार में शांति और सौहार्द्र का माहौल बनेगा। इसके साथ ही, बृहस्पति देव की कृपा से व्यक्ति के मित्र और संबंधी उसके प्रति स्नेह और प्रेम का भाव रखते हैं।
जीवन में संतुलन और स्थिरता
श्री बृहस्पति चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में संतुलन और स्थिरता आती है। बृहस्पति देव को संतुलन और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है, और उनकी कृपा से व्यक्ति के जीवन में संतुलन की स्थिति बनती है। जो व्यक्ति इस चालीसा का नियमित रूप से पाठ करता है, वह अपने जीवन में शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक संतुलन प्राप्त करता है। इसके साथ ही, बृहस्पति देव की कृपा से उसके जीवन में स्थिरता आती है और वह अपने जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त करने में सफल होता है।
कर्मफल में सुधार
श्री बृहस्पति चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के कर्मफल में सुधार होता है। बृहस्पति देव को कर्म और फल का अधिष्ठाता माना जाता है, और उनकी कृपा से व्यक्ति के बुरे कर्मों का नाश होता है और उसे अच्छे कर्मों का फल प्राप्त होता है। जो व्यक्ति इस चालीसा का नियमित पाठ करता है, उसके जीवन में उसके पिछले कर्मों का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसके साथ ही, बृहस्पति देव की कृपा से व्यक्ति के भविष्य के कर्म भी सुधार होते हैं, जिससे उसे जीवन में सुख और समृद्धि प्राप्त होती है।
संकल्प और धैर्य की प्राप्ति
श्री बृहस्पति चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के संकल्प और धैर्य में वृद्धि होती है। बृहस्पति देव को संकल्प और धैर्य का प्रतीक माना जाता है, और उनकी कृपा से व्यक्ति को अपने संकल्पों को पूरा करने की शक्ति मिलती है। जो व्यक्ति इस चालीसा का नियमित पाठ करता है, उसके जीवन में धैर्य और संकल्प की भावना जागृत होती है, जिससे वह अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में सफल होता है। इसके साथ ही, बृहस्पति देव की कृपा से व्यक्ति को विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखने की शक्ति मिलती है, जिससे वह जीवन की कठिनाइयों का सामना कर सकता है।
परोपकार की भावना का विकास
श्री बृहस्पति चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में परोपकार की भावना का विकास होता है। बृहस्पति देव को परोपकार और सेवा का प्रतीक माना जाता है, और उनकी कृपा से व्यक्ति के मन में दूसरों की सहायता करने की भावना जागृत होती है। जो व्यक्ति इस चालीसा का नियमित पाठ करता है, वह दूसरों की भलाई के लिए कार्य करता है और समाज में परोपकार के कार्यों में संलग्न रहता है। इसके साथ ही, बृहस्पति देव की कृपा से उसे समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है, जिससे वह अपने जीवन में सफल और सुखी होता है।
FAQs – बृहस्पति देव चालीसा – Brihaspati Chalisa PDF
बृहस्पति को खुश करने के लिए क्या उपाय करें?
बृहस्पति को खुश करने के लिए गुरुवार का व्रत रखें और पीले वस्त्र धारण करें। पीले भोजन का सेवन करें और केले के पेड़ की पूजा करें। बृहस्पति देव के मंत्र का जाप करें और जरूरतमंदों को दान दें। पीली वस्तुएं, जैसे हल्दी, चने की दाल, और पीले फूलों का दान करना भी बृहस्पति देव को प्रसन्न करने का एक अच्छा उपाय है।
कमजोर बृहस्पति के लक्षण क्या हैं?
कमजोर बृहस्पति के लक्षणों में शिक्षा में बाधा, संतान सुख में कमी, आर्थिक तंगी, विवाह में देरी, और सामाजिक प्रतिष्ठा में कमी शामिल हैं। व्यक्ति के जीवन में नैतिकता और धर्म के प्रति रुचि कम हो जाती है। कमजोर बृहस्पति के कारण व्यक्ति को त्वचा, लीवर, और हड्डियों से संबंधित समस्याएं भी हो सकती हैं।
गुरु बृहस्पति का मंत्र क्या है?
गुरु बृहस्पति का प्रमुख मंत्र है: “ॐ बृं बृहस्पतये नमः।” इस मंत्र का प्रतिदिन 108 बार जाप करने से बृहस्पति देव की कृपा प्राप्त होती है और व्यक्ति के जीवन में शिक्षा, ज्ञान, और समृद्धि का वास होता है।
बृहस्पति ग्रह को खुश करने के लिए क्या करना चाहिए?
बृहस्पति ग्रह को खुश करने के लिए पीले रंग की वस्त्र धारण करें और पीले रंग के भोजन का सेवन करें। गुरुवार के दिन व्रत रखें और बृहस्पति देव की पूजा करें। जरूरतमंदों को पीली वस्तुएं, जैसे चने की दाल, हल्दी, और पीले कपड़े दान करें। गुरु मंत्र का जाप और श्री बृहस्पति चालीसा का पाठ करें।
बृहस्पति को शांत कैसे करें?
बृहस्पति को शांत करने के लिए गुरुवार के दिन बृहस्पति देव की पूजा करें और उन्हें पीले फूल अर्पित करें। गुरु मंत्र का जाप करें और श्री बृहस्पति चालीसा का पाठ करें। पुखराज (पीला पुखराज) रत्न धारण करना भी बृहस्पति को शांत करने में सहायक होता है। इसके अलावा, गुरुवार के दिन पीले भोजन का सेवन और पीली वस्तुओं का दान भी बृहस्पति को शांत करने में सहायक होता है।
बृहस्पति की शक्ति कैसे बढ़ाएं?
बृहस्पति की शक्ति बढ़ाने के लिए पुखराज रत्न धारण करें और नियमित रूप से गुरु मंत्र का जाप करें। गुरुवार के दिन व्रत रखें और बृहस्पति देव की पूजा करें। श्री बृहस्पति चालीसा का पाठ भी बृहस्पति की शक्ति बढ़ाने में सहायक होता है। साथ ही, धार्मिक और नैतिक कार्यों में संलग्न रहें और गुरुजन और बड़े बुजुर्गों का सम्मान करें।
सर्व रोग नाशक मंत्र (Sarv Bhayanak Rog Nashak Mantra) भक्तामर स्तोत्र जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान आदिनाथ, जो पहले तीर्थंकर हैं, की स्तुति में रचित है। भत्तारक मानतुंगाचार्य द्वारा रचित इस स्तोत्र में कुल ४८ श्लोक हैं, जिनमें भगवान आदिनाथ की महिमा, उनकी दिव्य शक्तियों और उनकी कृपा का वर्णन किया गया है। इन श्लोकों में से कुछ विशेष श्लोकों को “सर्व रोग नाशक मंत्र” के रूप में जाना जाता है, जो रोगों से मुक्ति दिलाने और स्वस्थ जीवन की प्राप्ति के लिए उच्चारित किए जाते हैं।
सर्व रोग नाशक मंत्र के रूप में भक्ति और आस्था के साथ उच्चारित किए गए ये श्लोक न केवल शारीरिक रोगों से मुक्ति दिलाते हैं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य को भी सुधारते हैं। इन श्लोकों की नियमित साधना से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और नकारात्मकता का नाश होता है।
भक्तामर स्तोत्र के इन श्लोकों की शक्ति और प्रभाव उनके पवित्र और दिव्य शब्दों में निहित है। जब भक्त इन्हें संपूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ उच्चारित करते हैं, तो ये श्लोक उनके जीवन में अद्वितीय परिवर्तन ला सकते हैं। अनेक लोगों ने इन श्लोकों की साधना से अपने जीवन में चमत्कारिक परिणामों का अनुभव किया है।
सर्व रोग नाशक मंत्र के रूप में भक्तामर स्तोत्र का पाठ विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी होता है जो विभिन्न प्रकार की बीमारियों और स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। यह मंत्र रोगों के नाश के साथ-साथ मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में भी मार्गदर्शन प्रदान करता है।
भक्तामर स्तोत्र का यह सर्व रोग नाशक मंत्र विभिन्न जैन मंदिरों और धार्मिक स्थानों पर नियमित रूप से उच्चारित किया जाता है। इसके उच्चारण से न केवल रोगों का नाश होता है, बल्कि मनुष्य का संपूर्ण जीवन स्वस्थ और समृद्ध बनता है। यह मंत्र जीवन में सकारात्मकता, समृद्धि और सुख-शांति लाने वाला माना जाता है।
भक्तामर स्तोत्र और इसके सर्व रोग नाशक मंत्र का महत्व केवल जैन धर्मावलंबियों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह सभी धर्मों और विश्वासों के लोगों के लिए समान रूप से उपयोगी और प्रभावी है। इसका नियमित और विधिपूर्वक उच्चारण हर व्यक्ति को जीवन के हर क्षेत्र में सफलता और संतोष प्रदान कर सकता है।
इस प्रकार, सर्व रोग नाशक मंत्र – भक्तामर स्तोत्र एक दिव्य और पवित्र साधना है जो न केवल शारीरिक और मानसिक रोगों से मुक्ति दिलाती है, बल्कि जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का संचार भी करती है। इस मंत्र की साधना से जीवन में आने वाले सभी प्रकार के रोगों और परेशानियों का नाश होता है और मनुष्य स्वस्थ, सुखी और संतुष्ट जीवन जी सकता है।
हिंदी / संस्कृत
English
|| भक्तामर स्तोत्र का 45वाँ मंत्र – रोग-उन्मूलन मंत्र ||
भक्तामर स्तोत्र जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली स्तोत्र है, जिसमें भगवान आदिनाथ की महिमा का गुणगान किया गया है। इस स्तोत्र में निहित सर्व रोग नाशक मंत्र को रोगों से मुक्ति और जीवन में स्वास्थ्य, शांति और समृद्धि प्राप्त करने के लिए अत्यंत प्रभावी माना गया है। इन मंत्रों के नियमित उच्चारण से अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं। यहाँ हम भक्तामर स्तोत्र के सर्व रोग नाशक मंत्र के प्रमुख लाभों पर विस्तृत चर्चा करेंगे।
शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार
सर्व रोग नाशक मंत्र का सबसे महत्वपूर्ण लाभ शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार है। जब यह मंत्र श्रद्धा और विश्वास के साथ नियमित रूप से उच्चारित किया जाता है, तो यह शरीर के विभिन्न रोगों और विकारों को दूर करने में मदद करता है। यह मंत्र शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है, जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और विभिन्न बीमारियों से बचाव होता है।
मानसिक शांति और संतुलन
भक्तामर स्तोत्र के सर्व रोग नाशक मंत्र का उच्चारण मानसिक शांति और संतुलन प्रदान करता है। यह मंत्र मन को शांत करता है और तनाव, चिंता और अवसाद जैसी मानसिक समस्याओं को दूर करता है। मानसिक शांति प्राप्त होने से व्यक्ति अधिक केंद्रित और सकारात्मक रहता है, जिससे उसकी निर्णय लेने की क्षमता में भी सुधार होता है।
आध्यात्मिक उन्नति
सर्व रोग नाशक मंत्र न केवल शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार करता है, बल्कि यह आध्यात्मिक उन्नति में भी सहायक होता है। इस मंत्र का उच्चारण आत्मा को शुद्ध करता है और व्यक्ति को ईश्वर के निकट ले जाता है। इससे व्यक्ति की आध्यात्मिक यात्रा में प्रगति होती है और उसे जीवन के उच्चतम लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायता मिलती है।
रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि
नियमित रूप से सर्व रोग नाशक मंत्र का उच्चारण करने से व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है। यह मंत्र शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ाता है, जिससे व्यक्ति को बीमारियों से लड़ने की शक्ति मिलती है। इससे व्यक्ति का स्वास्थ्य मजबूत होता है और वह आसानी से बीमार नहीं पड़ता।
सकारात्मक ऊर्जा का संचार
सर्व रोग नाशक मंत्र का उच्चारण जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। यह मंत्र नकारात्मकता को दूर कर सकारात्मकता को बढ़ावा देता है। इससे व्यक्ति का मनोबल बढ़ता है और वह जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करने में सक्षम होता है।
जीवन में सुख और समृद्धि
भक्तामर स्तोत्र के सर्व रोग नाशक मंत्र का उच्चारण व्यक्ति के जीवन में सुख और समृद्धि लाता है। यह मंत्र व्यक्ति के जीवन में आने वाले विघ्न-बाधाओं को दूर करता है और उसे हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने में सहायता करता है। इससे व्यक्ति का जीवन सुखमय और समृद्ध होता है।
आध्यात्मिक और धार्मिक लाभ
इस मंत्र का उच्चारण धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत लाभकारी होता है। यह मंत्र व्यक्ति के आत्मविश्वास को बढ़ाता है और उसे धार्मिक और आध्यात्मिक कार्यों में संलग्न होने के लिए प्रेरित करता है। इससे व्यक्ति का जीवन धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से समृद्ध होता है।
संपूर्ण परिवार के लिए लाभकारी
सर्व रोग नाशक मंत्र का उच्चारण केवल व्यक्ति विशेष के लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण परिवार के लिए भी लाभकारी होता है। परिवार के सभी सदस्य मिलकर इस मंत्र का उच्चारण करें, तो इससे परिवार में शांति, समृद्धि और स्वास्थ्य का संचार होता है। परिवार में एकता और प्रेम बढ़ता है और सभी सदस्य एक स्वस्थ और सुखी जीवन जीते हैं।
रोगों के उपचार में सहायक
यह मंत्र केवल रोगों से बचाव में ही नहीं, बल्कि रोगों के उपचार में भी सहायक होता है। जिन लोगों को पहले से ही किसी रोग की समस्या है, वे इस मंत्र का उच्चारण करके अपने रोगों का उपचार कर सकते हैं। इस मंत्र की साधना से रोगों का नाश होता है और व्यक्ति पुनः स्वस्थ हो जाता है।
जीवन में सकारात्मक परिवर्तन
सर्व रोग नाशक मंत्र का नियमित उच्चारण व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाता है। इससे व्यक्ति का दृष्टिकोण सकारात्मक होता है और वह जीवन की चुनौतियों का सामना धैर्य और साहस के साथ कर सकता है। इससे जीवन में नई ऊर्जा और उत्साह का संचार होता है।
भक्तामर स्तोत्र के सर्व रोग नाशक मंत्र का महत्व और प्रभाव अद्वितीय है। यह मंत्र शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य को सुधारने में अत्यंत सहायक है। इसके नियमित उच्चारण से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का संचार होता है और व्यक्ति एक स्वस्थ, सुखी और संतुष्ट जीवन जी सकता है। इस मंत्र की साधना से व्यक्ति न केवल अपने रोगों से मुक्ति प्राप्त करता है, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में सफलता और संतोष प्राप्त करता है।
FAQs – रोग-उन्मूलन मंत्र (Sarv Rog Nashak Mantra)
कौन सा मंत्र सभी रोगों को ठीक कर सकता है?
कोई भी एकल मंत्र सभी रोगों को ठीक करने का दावा नहीं कर सकता, लेकिन कई मंत्र स्वास्थ्य और रोगों से मुक्ति के लिए प्रभावी माने जाते हैं। “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” (भगवान कृष्ण का मंत्र): यह मंत्र मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए उपयोग किया जाता है। “ॐ स्वस्थि मानो भैरवाय नमः” (भैरव मंत्र): यह भी स्वास्थ्य और शारीरिक कल्याण के लिए उपयोगी माना जाता है।
शिवजी का रोग नाशक मंत्र कौन सा है?
शिवजी का रोग नाशक मंत्र है: “ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् | उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात् ||” यह मंत्र शिवजी की आराधना के दौरान उपयोग किया जाता है और स्वास्थ्य, दीर्घायु और रोग नाशक प्रभाव के लिए माना जाता है।
स्वास्थ्य के लिए कौन सा मंत्र शक्तिशाली है?
स्वास्थ्य के लिए कई मंत्र प्रभावी हो सकते हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं: “ॐ धन्वंतरये नमः”: यह मंत्र भगवान धन्वंतरि, जो चिकित्सा और स्वास्थ्य के देवता हैं, के लिए है। “ॐ स्वस्थि मानो भैरवाय नमः”: यह भी स्वास्थ्य और रोग नाशक के लिए शक्तिशाली माना जाता है।
हनुमान जी का रोग नाशक मंत्र कौन सा है?
हनुमान जी का रोग नाशक मंत्र है: “ॐ श्री हनुमते नमः” इसके अतिरिक्त, विशेष रूप से हनुमान चालीसा का पाठ भी स्वास्थ्य और रोग नाशक के रूप में किया जाता है।
कौन सा मंत्र सभी रोगों को ठीक कर सकता है?
एक निश्चित मंत्र सभी प्रकार के रोगों को ठीक करने की गारंटी नहीं हो सकती, लेकिन रोगों से राहत पाने के लिए निम्नलिखित मंत्र प्रभावी हो सकते हैं: “ॐ श्री धन्वंतरये नमः”: भगवान धन्वंतरि के लिए यह मंत्र उपयोगी माना जाता है, जो चिकित्सा और स्वास्थ्य के देवता हैं। “ॐ श्री भूतनाथाय नमः”: यह भी स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हो सकता है।
रोगों के देवता कौन हैं?
भारतीय धार्मिक परंपराओं में, रोगों के देवता विभिन्न देवताओं के रूप में माने जाते हैं:
भगवान धन्वंतरि: चिकित्सा और स्वास्थ्य के देवता। भगवान भीमसेन (भैरव): स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए पूजा जाता है। भगवान अश्विनी कुमार: आयुर्वेद के देवता और चिकित्सा के प्रतीक।
इन देवताओं की पूजा और मंत्र जाप से स्वास्थ्य में सुधार और रोगों से राहत मिल सकती है।
श्री महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र हिंदी PDF को आदि शंकराचार्य ने रचा था। इसमें देवी दुर्गा के विभिन्न रूपों, उनके शक्ति, सौंदर्य, और पराक्रम का उल्लेख किया गया है। इस स्तोत्र के पाठ से भक्तों को न केवल आध्यात्मिक बल मिलता है, बल्कि उन्हें जीवन के संघर्षों से निपटने की शक्ति और साहस भी प्राप्त होता है। यह स्तोत्र देवी दुर्गा की असीम करुणा और उनकी अनंत शक्ति को समर्पित है। आप हमारी वेबसाइट में सरस्वती मां की आरती | दुर्गा आरती | दुर्गा चालीसा | दुर्गा अमृतवाणी | Hanuman Chalisa MP3 Download और दुर्गा मंत्र भी पढ़ सकते हैं।
श्री महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र हिंदी PDF (Mahishasura Mardini Stotram PDF) हिंदू धर्म में अत्यधिक महत्वपूर्ण और पूजनीय स्तोत्र है। यह स्तोत्र देवी दुर्गा की महिमा और उनके अद्वितीय रूपों का वर्णन करता है, जिन्होंने महिषासुर नामक असुर का वध कर संसार को उसकी दुष्टताओं से मुक्त किया। इस स्तोत्र को विशेष रूप से नवरात्रि के दिनों में पाठ किया जाता है, जब भक्तगण माँ दुर्गा की उपासना में लीन होते हैं।
इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति की मनोबल और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। यह माना जाता है कि महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र का नियमित रूप से पाठ करने से सभी प्रकार के भय और नकारात्मकता का नाश होता है, और भक्तों को समस्त दुखों से मुक्ति मिलती है। इस स्तोत्र में छुपी शक्ति और ऊर्जा अद्वितीय है, जो व्यक्ति को उसकी आध्यात्मिक यात्रा में आगे बढ़ने में मदद करती है।
यदि आप महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र का हिंदी PDF प्राप्त करना चाहते हैं, तो यह एक उपयोगी साधन हो सकता है। इससे आप इसे आसानी से पढ़ सकते हैं और इसका पाठ कर सकते हैं। यह पीडीएफ फाइल आपके लिए कहीं भी, कभी भी माँ दुर्गा की महिमा का स्मरण करने का सरल और सुलभ तरीका हो सकता है।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥
अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमलय शृङ्गनिजालय मध्यगते । मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥
अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपते रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते । निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥
अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते । दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥
अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे । दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥
अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते । शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥
धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके । कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥
सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते । धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥
जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते । नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥
अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते । सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥
सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते । शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥
अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते । अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥
कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले । अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥
करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते । निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥
कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥
विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते । सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते । जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥
पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् । तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥
कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम् भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् । तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम् जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥
तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते । मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥
अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते । यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २१ ॥
Mahishasura Mardini Stotra
Ayi girinnandinee nanditamedini vishvavinodinee nandinute Girivaravindhyashirodhinivaasinee vishnuvilaasinee jishnunute. Ghagavatee he shitikanthukutumbinee bhoorikutumbinee bhoorikrte Jay jay he mahishaasuramardinee ramyakapardinee shailasute ||1||
Survavarshini durdharshini durmukhamarshini harsharate Tribhuvanaposhini shankaratoshini kilbishamoshini ghosharate Danujniroshini ditisutroshini durmadashoshini sindhusute Jay jay he mahishaasuramardinee ramyakapardinee shailasute ||2||
Ayi jagadamb madamb kadamb vanapriyavaasinee hasarate Sumi shiromani tunghimalay shreenganijalay madhyagate. Madhumadhure madhukaitabhanjinee kaitabhanjinee rasrate Jay jay he mahishaasuramardinee ramyakapardinee shailasute ||3||
Ayi shatakhand vikhanditarund vitunditashund gajadhipate Ripugajagand vicharanachand mayashund mrgaadhipate. Nijabhujadand nipaatitakhand vipaatitamund bhataadhipate Jay jay he mahishaasuramardinee ramyakapardinee shailasute ||4||
Ayi ranadurmad shatruvadhodit durdharanirjar shaktibhrte Chaturvichaar dhureenamahaashiv dootakrt pramathaadhipate. Duritadurih durashayadurmati daanavadut krtaantamate Jay jay he mahishaasuramardinee ramyakapardinee shailasute ||5||
Ayi sharanaagat vairivadhuvar veeraavaraabhay dekare Tribhuvanamastak shulavirodhi shirodhikrtaamal shulakare. Dumidumitaamar dhundubhinaadamahomukhareekrt dinmakare Jay jay he mahishaasuramardinee ramyakapardinee shailasute ||6||
Ayi nijahunkrti maatraaniraakrt dhoomravilochan dhoomrashate Samaravishoshit shonitabeej samudbhavashonit beejalate. Shivashivashumbh nishumbhamahaav tarpitabhoot pishaacharate Jay jay he mahishaasuramardinee ramyakapardinee shailasute ||7||
Dhanuraanushang ranakshanasang parisphurdang natatkatake Kanakapishang prshtakanishng rasadbhatshrang hataabatuke. Krtachaturng balakshitirang ghatadbahurang ratadbatuke Jay jay he mahishaasuramardinee ramyakapardinee shailasute ||8||
Suralalaana tattheyi tatheyi krtaabhinayodar nrtyate Krt kukutah kukutho gaddadiktal kutuhal gaanarte. Dhudukut dhukkut dhinadhimit dhvani dheer mrdang ninaadarate Jay jay he mahishaasuramardinee ramyakapardinee shailasute ||9||
Jay jay japy jayejayashabd prastuti tatparavishvanute Jhaanjhanjhonjomi jhonkrt nupurashinjitamohit bhootapate. Naatit nataardh naati nat naayak naatinaaty sugaanarate Jay jay he mahishaasuramardinee ramyakapardinee shailasute ||10||
Ayi sumanahsumanahsumanah sumanahsumanoharakaantiyute Shreetaarjani rajaneerajanee rajaneerajanee karavaktravrte. Shravanavibhramar bhramarabhramar bhramarabhramaraadhipate Jay jay he mahishaasuramardinee ramyakapardinee shailasute ||11||
Sammilitamahaav mallamaatllik mallitrallak mallaraate Virachitavallik pallikamallik jhillikabhillik vargavrte. Sheetakrtaphull samullaseetaarun tallajapallav salallalite Jay jay he mahishaasuramardinee ramyakapardinee shailasute ||12|| .
Aviralagand galanamadamedur mattamatanag jaraajapate Tribhuvanabhooshan bhootakalaanidhi roopayonidhi raajasute. Ayi sudateejan laalasamaanas mohan manmatharaajasute Jay jay he mahishaasuramardinee ramyakapardinee shailasute ||13||
Kamaladalamal komalakaanti kalaakalitaamal bhalate Sakalavilaas kalaanilayakram kelichalatkal hansakule. Alikulasankul kuvalayamandal maulimildabakulaalikule Jay jay he mahishaasuramardinee ramyakapardinee shailasute ||14||
Karamuralirav vijitakujit lajjitakokil manjumate Militapulind manoharagunjit ranjitashail nikunjagate. Nijaganabhoot mahaashabareegan sadgunasambhrt kelitle Jay jay he mahishaasuramardinee ramyakapardinee shailasute ||15||
Katitatpeet dukoolavichitr mayukhtiraskrt chandraaruche Praanatsuraasur maulimaaneesphur dansulasannakh chandruche Jitakankaachal maulimadorjit abekaantakunjar kumbhakuche Jay jay he mahishaasuramardinee ramyakapardinee shailasute ||16||
Vijitasahasrakaaraik sahasrakaaraik sahasrakaraikanute Krtasurataarak sangarataarak sangarataarak sunusute. Surathasamaadhi samaanasamaadhi samaadhisamaadhi sujaatarate. Jay jay he mahishaasuramardinee ramyakapardinee shailasute ||17||
Padakamalan karunaanilaye varivaasati yonudinan sushive Ayi kamale kamalanilayah sa kathan na bhavet. Tav padamev paramadamityanushilayato mam kin na shive Jay jay he mahishaasuramardinee ramyakapardinee shailasute ||18||
Kanakalasatkalasindhujalairnushinchati tegunaarangabhuvam Bhajati sa kin na shacheekuchakumbhattiparirambhasukhaanubhavam. Tav charanan sharanan karaani nataamaravaani nivaasi shivam Jay jay he mahishaasuramardinee ramyakapardinee shailasute ||19||
Tav vikramendukulan vadanendumalan sakalan nanu koolayate Kimu puruhutapurindu mukhee sumukheebhirasau vimukheekriyate. Mam tu matan shivanaamadhen bhavati krpaya kimut kriyate Jay jay he mahishaasuramardinee ramyakapardinee shailasute ||20||
Mahishasura Mardini Stotram Lyrics in English With Meaning PDF
Mahishasura Mardini Stotra
अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते। भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते।।१॥
हे हिमालायराज की कन्या,विश्व को आनंद देने वाली,नंदी गणों के द्वारा नमस्कृत,गिरिवर विन्ध्याचल के शिरो (शिखर) पर निवास करने वाली,भगवान् विष्णु को प्रसन्न करने वाली,इन्द्रदेव के द्वारा नमस्कृत,भगवान् नीलकंठ की पत्नी,विश्व में विशाल कुटुंब वाली और विश्व को संपन्नता देने वाली है महिषासुर का मर्दन करने वाली भगवती!अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो,जय हो,जय हो ।
Victory and victory to you, Oh darling daughter of the mountain, Who makes the whole earth happy, Who rejoices with this universe, Who is the daughter of Nanda, Who resides on the peak of Vindhyas, Who plays with Lord Vishnu, Who has a glittering mien, Who is praised by other goddesses, Who is the consort of the lord with the blue neck, Who has several families, Who does good to her family. Who has captivating braided hair, Who is the daughter of a mountain. And who is the slayer of Mahishasura.
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥
अर्थ-देवों को वरदान देने वाली,दुर्धर और दुर्मुख असुरों को मारने वाली और स्वयं में ही हर्षित (प्रसन्न) रहने वाली,तीनों लोकों का पोषण करने वाली,शंकर को संतुष्ट करने वाली,पापों को हरने वाली और घोर गर्जना करने वाली,दानवों पर क्रोध करने वाली, अहंकारियों के घमंड को सुखा देने वाली,समुद्र की पुत्री हे महिषासुर का मर्दन करने वाली,अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो,जय हो,जय हो ।
Victory and victory to you, Oh darling daughter of the mountain, Oh goddess who showers boons on devas, Who punishes those who are undisciplined. Who tolerates ugly faced ogres, Who enjoys in being happy, Who looks after the three worlds, Who pleases lord Shiva, Who removes effect of sins, Who rejoices with the holy sound, Who is angry on the progenies of Dhanu, Who is angry with the children of Dithi, Who discourages those with pride, Who is the daughter of the Ocean, Who has captivating braided hair, Who is the daughter of a mountain. And who is the slayer of Mahishasura.
अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमालय शृङ्गनिजालय मध्यगते। मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥३ ॥
अर्थ-हे जगतमाता,मेरी माँ,प्रेम से कदम्ब के वन में वास करने वाली,हास्य भाव में रहने वाली, हिमालय के शिखर पर स्थित अपने भवन में विराजित,मधु (शहद) की तरह मधुर, मधु-कैटभ का मद नष्ट करने वाली,महिष को विदीर्ण करने वाली,सदा युद्ध में लिप्त रहने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो,जय हो, जय हो।
Victory and victory to you, Oh darling daughter of the mountain, Oh , mother of the entire world, Who loves to live in the forest of Kadambha trees, Who enjoys to smile, Who lives in the top peak of the great Himalayas Who is sweeter than honey, Who keeps the treasures of Madhu and Kaidabha, Who is the slayer of Kaidabha, Who enjoys her dancing, Who has captivating braided hair, Who is the daughter of a mountain. And who is the slayer of Mahishasura.
अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपते रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते। निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥४ ॥
अर्थ-शत्रुओं के हाथियों की सूंड काटने वाली और उनके सौ टुकड़े करने वाली,जिनका सिंह शत्रुओं के हाथियों के सर अलग अलग टुकड़े कर देता है, अपनी भुजाओं के अस्त्रों से चण्ड और मुंड के शीश काटने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो,जय हो,जय हो ।
Victory and victory to you, Oh darling daughter of the mountain, Oh Goddess who breaks the heads of ogres, In to hundreds of pieces, Who cuts the trunks of elephants in battle, Who rides on the valorous lion, Which tears the heads of elephants to pieces, Who severs the heads of the generals of the enemy, With her own arms, Who has captivating braided hair, Who is the daughter of a mountain. And who is the slayer of Mahishasura.
अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते। दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥
अर्थ-रण में मदोंमत शत्रुओं का वध करने वाली, अजर अविनाशी शक्तियां धारण करने वाली, प्रमथनाथ(शिव) की चतुराई जानकार उन्हें अपना दूत बनाने वाली,दुर्मति और बुरे विचार वाले दानव के दूत के प्रस्ताव का अंत करने वाली,हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो,जय हो,जय हो।
Victory and victory to you, Oh darling daughter of the mountain, Oh Goddess who has the strength which never diminishes, To gain victory over enemies in the battle field, Who made Pramatha, the attendant of Lord Shiva, Known for his tricky strategy, as her assistant, Who took the decision to destroy the asuras, Who are bad people, with evil thoughts and mind, Oh Goddess who has captivating braided hair, Who is the daughter of a mountain. And who is the slayer of Mahishasura.
अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे। दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥६ ॥
अर्थ-शरणागत शत्रुओं की पत्नियों के आग्रह पर उन्हें अभयदान देने वाली,तीनों लोकों को पीड़ित करने वाले दैत्यों पर प्रहार करने योग्य त्रिशूल धारण करने वाली,देवताओं की दुन्दुभी से ‘दुमि दुमि’ की ध्वनि को सभी दिशाओं में व्याप्त करने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो,जय हो,जय हो।
Victory and victory to you, Oh darling daughter of the mountain, Oh Goddess who forgives and gives refuge, To the heroic soldiers of the enemy rank, Whose wives come seeking refuge for them, Oh Goddess who is armed with trident, Ready to throw on the heads of those, Who cause great pain to the three worlds, Oh Goddess who shines likes the hot sun, And who is aroused by sound of “Dhumi, Dhumi,” Produced by the beating of drums by the devas, Oh Goddess who has captivating braided hair, Who is the daughter of a mountain. And who is the slayer of Mahishasura.
अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते। शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥
अर्थ-मात्र अपनी हुंकार से धूम्रलोचन राक्षस को धूम्र (धुएं) के सामान भस्म करने वाली,युद्ध में कुपित रक्तबीज के रक्त से उत्पन्न अन्य रक्तबीजों का रक्त पीने वाली,शुम्भ और निशुम्भ दैत्यों की बली से शिव और भूत- प्रेतों को तृप्त करने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो,जय हो,जय हो।
Victory and victory to you, Oh darling daughter of the mountain, Oh, Goddess who blew away hundreds of ogres, Who had smoking eyes, With her mere sound of “Hum” Oh Goddess who is the blood red creeper, Emanating from the seeds of blood, Which fell in the battle field, Oh Goddess who delights in the company of Lord Shiva, And the ogres Shumbha and Nishumbha, Who were sacrificed in the battle field, Oh Goddess who has captivating braided hair, Who is the daughter of a mountain. And who is the slayer of Mahishasura.
धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके। कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥८ ॥
अर्थ-युद्ध भूमि में जिनके हाथों के कंगन धनुष के साथ चमकते हैं,जिनके सोने के तीर शत्रुओं को विदीर्ण करके लाल हो जाते हैं और उनकी चीख निकालते हैं,चारों प्रकार की सेनाओं [हाथी, घोडा,पैदल,रथ] का संहार करने वाली अनेक प्रकार की ध्वनि करने वाले बटुकों को उत्पन्न करने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो,जय हो,जय हो ।
Victory and victory to you, Oh darling daughter of the mountain, Oh Goddess who decks herself with ornaments, On her throbbing limbs in the field of battle, When she gets her bow ready to fight, Oh Goddess , who killed her enemies, In the field of battle with a shining sword, And the shaking of her golden brown spots, Oh Goddess , who made the battle ground of the four fold army, In to a stage of drama with screaming little soldiers, Oh Goddess who has captivating braided hair, Who is the daughter of a mountain. And who is the slayer of Mahishasura.
सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते। धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥९॥
अर्थ-देवांगनाओं के तत-था थेयि-थेयि आदि शब्दों से युक्त भावमय नृत्य में मग्न रहने वाली, कु-कुथ अड्डी विभिन्न प्रकार की मात्राओं वाले ताल वाले स्वर्गीय गीतों को सुनने में लीन, मृदंग की धू- धुकुट,धिमि-धिमि आदि गंभीर ध्वनि सुनने में लिप्त रहने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो,जय हो,जय हो।
You who’s praises are sung by people ever eager to praise You with charming words like ‘victory to You’, who captivate even Siva, the Lord of all beings with the clinging sound of Your anklets, who are fond of dancing with Siva in the sport in which He dances as Ardhanareeswara, You who have charming locks of hair, O Daughter of the Mountain, hail unto You, hail unto You.
जय जय जप्य जये जय शब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते। नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१०॥
अर्थ-जय जयकार करने और स्तुति करने वाले समस्त विश्व के द्वारा नमस्कृत,अपने नूपुर के झण-झण और झिम्झिम शब्दों से भूतपति महादेव को मोहित करने वाली,नटी-नटों के नायक अर्धनारीश्वर के नृत्य से सुशोभित नाट्य में तल्लीन रहने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो,जय हो,जय हो।
Victory and victory to you, Oh darling daughter of the mountain, Oh Goddess , whose victory is sung, By the whole universe, Which is interested in singing her victory, Oh Goddess who attracts the attention of Lord Shiva, By the twinkling sound made by her anklets, While she is engaged in dancing, Oh Goddess who gets delighted , By the dance and drama by versatile actors, Even while she is half of Lord Shiva’s body, Oh Goddess who has captivating braided hair, Who is the daughter of a mountain. And who is the slayer of Mahishasura.
अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते। सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥११॥
अर्थ-आकर्षक कान्ति के साथ अति सुन्दर मन से युक्त और रात्रि के आश्रय अर्थात चंद्र देव की आभा को अपने चेहरे की सुन्दरता से फीका करने वाली, काले भंवरों के सामान सुन्दर नेत्रों वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो,जय हो,जय हो।
Victory and victory to you, Oh darling daughter of the mountain, Oh Goddess of the people with good mind, Who is greatly gracious to such people, Oh Goddess who appears very pretty to the good minded, Oh Goddess with moon like face, Who is as cool as the moon ,to those in the dark, Oh Goddess whose face shines in the moon light, Oh Goddess whose very pretty flower like eyes attracts the bees , Oh Goddess who attracts devotees ,like a flower which attracts bees, Oh Goddess who attracts her lord like a bee, Oh Goddess who has captivating braided hair, Who is the daughter of a mountain. And who is the slayer of Mahishasura.
सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते। शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२॥
अर्थ-महायोद्धाओं से युद्ध में चमेली के पुष्पों की भाँति कोमल स्त्रियों के साथ रहने वाली तथा चमेली की लताओं की भाँति कोमल भील स्त्रियों से जो झींगुरों के झुण्ड की भाँती घिरी हुई हैं,चेहरे पर उल्लास(खुशी) से उत्पन्न,उषाकाल के सूर्य और खिले हए लाल फूल के समान मुस्कान वाली,हे महिषासुर का मर्दन करने वाली,अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो,जय हो,जय हो।
Victory and victory to you, Oh darling daughter of the mountain, Oh Goddess who becomes happy, In the sport of battle, assisted by warriors, Oh Goddess who is surrounded by hunters, Whose hut is surrounded by creepers, And the tribes of Mallikas, Jillakas and Bhillakas, Oh Goddess who is as pretty as The famous fully opened flower, Oh Goddess , who is as pretty as the creeper, Full of red tender leaves, Oh Goddess who has captivating braided hair, Who is the daughter of a mountain. And who is the slayer of Mahishasura.
अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते । अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥
अर्थ-जिसके कानों से अविरल(लगातार) मद बहता रहता है उस हाथी के समान उत्तेजित हे गजेश्वरी,तीनों लोकों के आभूषण रूप-सौंदर्य,शक्ति और कलाओं से सुशोभित हे राजपुत्री,सुंदर मुस्कान वाली स्त्रियों को पाने के लिए मन में मोह उत्पन्न करने वाली मन्मथ(कामदेव) की पुत्री के समान,हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो,जय हो,जय हो।
Avirala ganda kalatha mada medura, Matha matanga rajapathe, Tribhuvana bhooshana bhootha kalanidhi, Roopa payonidhi raja suthe, Ayi suda thijjana lalasa manasa , Mohana manmatha raja suthe, Jaya Jaya hey Mahishasura mardini , Ramya kapardini, shaila Suthe. ||13||
Victory and victory to you, Oh darling daughter of the mountain, Oh Goddess , who walks like a royal elephant in rut, In Whose face there is a copious flow of ichors, Oh Goddess , who is the daughter of the ocean of milk, From where the pretty moon also took his birth, Oh Goddess who is the ornament of the three worlds, Oh Goddess who is worshipped by the God of love, Who fills the minds of pretty ladies with desire, Oh Goddess who has captivating braided hair, Who is the daughter of a mountain. And who is the slayer of Mahishasura.
कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले । अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥
अर्थ-जिनका कमल दल (पखुड़ी) के समान कोमल,स्वच्छ और कांति (चमक) से युक्त मस्तक है,हंसों के समान जिनकी चाल है,जिनसे सभी कलाओं का उद्भव हुआ है,जिनके बालों में भंवरों से घिरे कुमुदनी के फूल और बकुल पुष्प सुशोभित हैं उन महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री की जय हो,जय हो,जय हो।
Kamala dalaamala komala kanthi, Kala kalithaamala bala lathe, Sakala vilasa Kala nilayakrama, Keli chalathkala hamsa kule, Alikula sankula kuvalaya mandala , Mauli miladh bhakulalikule, Jaya Jaya hey Mahishasura mardini , Ramya kapardini, shaila Suthe. ||14||
Victory and victory to you, Oh darling daughter of the mountain, Oh Goddess , whose spotless forehead, Which is of delicate prettiness, Is like pure and tender lotus leaf, Oh Goddess who moves like the spotlessly pretty swans, Which Move with delicate steps, And which is the epitome of arts,, Oh Goddess ,Whose tress is surrounded By bees from bakula trees, Which normally crowd the tops of lotus flowers, Oh Goddess who has captivating braided hair, Who is the daughter of a mountain. And who is the slayer of Mahishasura.
करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते । निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥
अर्थ-जिनके हाथों की मुरली से बहने वाली ध्वनि से कोयल की आवाज भी लज्जित हो जाती है,जो खिले हुए फूलों से रंगीन पर्वतों से विचरती हुयी, पुलिंद जनजाति की स्त्रियों के साथ मनोहर गीत जाती हैं,जो सद्गुणों से सम्पान शबरी जाति की स्त्रियों के साथ खेलती हैं उन महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री की जय हो,जय हो,जय हो।
Victory and victory to you, Oh darling daughter of the mountain, Oh Goddess with sweet tender thoughts, Whose sweet enchanting music, Made through the flute in her hands, Put the sweet voiced nightingale to shame, Oh Goddess who stays in pleasant mountain groves, Which resound with the voice of tribal folks, Oh Goddess, whose playful stadium, Is filled with flocks of tribal women, Who have many qualities similar to her, Oh Goddess who has captivating braided hair, Who is the daughter of a mountain. And who is the slayer of Mahishasura.
कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥
अर्थ-जिनकी चमक से चन्द्रमा की रौशनी फीकी पड़ जाए ऐसे सुन्दर रेशम के वस्त्रों से जिनकी कमर सुशोभित है,देवताओं और असुरों के सर झुकने पर उनके मुकुट की मणियों से जिनके पैरों के नाखून चंद्रमा की भाति दमकते हैं और जैसे सोने के पर्वतों पर विजय पाकर कोई हाथी मदोन्मत होता है वैसे ही देवी के वक्ष स्थल कलश की भाँति प्रतीत होते हैं ऐसी हे महिषासुर का मर्दन करने वाली अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो,जय हो,जय हो।
Victory and victory to you, Oh darling daughter of the mountain, Oh goddess, who wears yellow silks on her waist, Which has peculiar brilliance,That puts the moon to shame, Oh goddess, whose toe nails shine like the moon, Because of the reflection of the light, From the crowns of Gods and asuras who bow at her feet, Oh Goddess whose breasts which challenge,The forehead of elephants and the peaks of golden mountains, Oh Goddess who has captivating braided hair, Who is the daughter of a mountain. And who is the slayer of Mahishasura.
विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते । सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते । जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥
अर्थ-सहस्रों(हजारों) दैत्यों के सहस्रों हाथों से सहस्रों युद्ध जीतने वाली और सहस्रों हाथों से पूजित, सुरतारक(देवताओं को बचाने वाला) उत्पन्न करने वाली,उसका तारकासुर के साथ युद्ध कराने वाली,राजा सुरथ और समाधि नामक वैश्य की भक्ति से समान रूप से संतुष्ट होने वाली हे महिषासुर का मर्दन करने वाली बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो,जय हो,जय हो।
Victory and victory to you, Oh darling daughter of the mountain, Oh Goddess , whose splendour , Defeats the Sun with his thousand rays Oh Goddess , who is saluted by the Sun, Who has thousands of rays, Oh Goddess who was praised, By Tharakasura after his defeat, In the war between him and your son, Oh Goddess who was pleased with King Suratha, And the rich merchant called Samadhi, Who entered in to Samadhi, And who prayed for endless Samadhi, Oh Goddess who has captivating braided hair, Who is the daughter of a mountain. And who is the slayer of Mahishasura.
पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् । तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥
अर्थ-जो भी तुम्हारे दयामय पद कमलों की सेवा करता है,हे कमला!(लक्ष्मी) वह व्यक्ति कमलानिवास (धनी) कैसे न बने? हे शिवे! तुम्हारे पदकमल ही परमपद हैं उनका ध्यान करने पर भी परम पद कैसे नहीं पाऊंगा? हे महिषासुर का मर्दन करने वाली बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो,जय हो,जय हो।
Padakamalam karuna nilaye varivasyathi, yo anudhinam sa shive, Ayi kamale kamala nilaye kamala nilaya, Sa katham na bhaveth, Thava padameva param ithi, Anusheelayatho mama kim na shive, Jaya Jaya hey Mahishasura mardini , Ramya kapardini, shaila Suthe. ||18||
Victory and victory to you, Oh darling daughter of the mountain, Oh Goddess, in whom mercy lives, And who is auspiciousness itself, He who worships thine lotus feet, Daily without fail, Would for sure be endowed with wealth, By that Goddess who lives on lotus, And if I consider thine feet as only refuge, Is there anything that I will not get, Oh Goddess who has captivating braided hair, Who is the daughter of a mountain. And who is the slayer of Mahishasura.
कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम् भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् । तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम् जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥
अर्थ-सोने के समान चमकते हुए नदी के जल से जो तुम्हे रंग भवन में छिड़काव करेगा वो शची (इंद्राणी) के वक्ष से आलिंगित होने वाले इंद्र के समान सुखानुभूति क्यों न पायेगा? हे वाणी! (महासरस्वती) तुममे मांगल्य का निवास है,मैं तुम्हारे चरण में शरण लेता हूँ,हे महिषासुर का मर्दन करने वाली बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो,जय हो,जय हो ।
Kanakala sathkala sindhu jalairanu, Sinjinuthe guna ranga bhuvam, Bhajathi sa kim na Shachi kucha kumbha, Thati pari rambha sukhanubhavam, Thava charanam saranam kara vani, Nataamaravaaninivasi shivam, Jaya Jaya hey Mahishasura mardini , Ramya kapardini, shaila Suthe. ||19||
Victory and victory to you, Oh darling daughter of the mountain, He who sprinkles the water of the ocean, Taken in a golden pot , on your play ground, Oh Goddess will get the same pleasure , Like the Indra in heaven, when he fondles, The pot like breasts of his wife Suchi, So I take refuge in thine feet Oh Goddess, Which is also place where Shiva resides, Oh Goddess who has captivating braided hair, Who is the daughter of a mountain. And who is the slayer of Mahishasura.
तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते । मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥
अर्थ-तुम्हारा निर्मल चन्द्र समान मुख चन्द्रमा का निवास है जो सभी अशुद्धियों को दूर कर देता है, नहीं तो क्यों मेरा मन इंद्रपूरी की सुन्दर स्त्रियों से विमुख हो गया है? मेरे मत के अनुसार तुम्हारी कृपा के बिना शिव नाम के धन की प्राप्ति कैसे संभव हो सकती है? हे महिषासुर का मर्दन करने वाली बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो,जय हो,जय हो।
Victory and victory to you, Oh darling daughter of the mountain, He who keeps thine face adorned by moon, In his thought would never face rejection, By the bevy of pretty beauties with moon like face, In the celestial Indra’s court, And so oh Goddess who is held in esteem by Shiva, I am sure you would not reject my wishes, Oh Goddess who has captivating braided hair, Who is the daughter of a mountain. And who is the slayer of Mahishasura.
अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते । यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २१ ॥
अर्थ-हे दीनों पर दया करने वाली उमा। मुझ पर भी दया कर ही दो, हे जगत जननी! जैसे तुम दया की वर्ष करती हो वैसे ही तीरों की वर्ष भी करती हो,इसलिए इस समय जैसा तुम्हें उचित लगे वैसा करो मेरे पाप और ताप दूर करो,हे महिषासुर का मर्दन करने वाली बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री तुम्हारी जय हो,जय हो,जय हो।।
Victory and victory to you, Oh darling daughter of the mountain, Please shower some mercy on me, As you are most merciful on the oppressed. Oh mother of the universe ,be pleased, To give me the independence , To consider you as my mother And do not reject my prayer even if it is improper, But be pleased to drive away all my sorrows, Oh Goddess who has captivating braided hair, Who is the daughter of a mountain. And who is the slayer of Mahishasura.
श्री महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र हिंदी PDF के लाभ
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली स्तोत्र है, जो माँ दुर्गा की महाशक्ति और उनके महाकाल स्वरूप का स्तवन करता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से जीवन में अनगिनत लाभ प्राप्त होते हैं, जो न केवल आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं, बल्कि मानसिक और शारीरिक रूप से भी व्यक्ति को लाभान्वित करते हैं। इस स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक में देवी दुर्गा की शक्ति, साहस, करुणा, और दुष्टों के नाश करने की क्षमता का वर्णन किया गया है। आइए, इस स्तोत्र के पाठ से होने वाले लाभों पर विस्तृत रूप से चर्चा करते हैं:
1. मानसिक शांति और संतुलन:
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम का नियमित पाठ करने से मानसिक शांति और संतुलन प्राप्त होता है। जीवन में आने वाली कठिनाइयाँ और विपत्तियाँ व्यक्ति के मन को अशांत और अस्थिर बना देती हैं। इस स्तोत्र का पाठ करने से मन में शांति का अनुभव होता है, जो व्यक्ति को उसकी समस्याओं का सामना करने के लिए सक्षम बनाता है। यह स्तोत्र व्यक्ति के मनोबल और आत्मविश्वास को बढ़ाता है, जिससे वह जीवन की चुनौतियों का सामना धैर्य और साहस के साथ कर सकता है।
2. नकारात्मकता और भय का नाश:
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम का पाठ करने से सभी प्रकार की नकारात्मकता और भय का नाश होता है। यह स्तोत्र देवी दुर्गा की उस शक्ति का स्तवन करता है, जिसने महिषासुर जैसे अत्याचारी असुर का वध किया। इसी प्रकार, इस स्तोत्र के पाठ से व्यक्ति के जीवन से सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा और भय समाप्त हो जाते हैं। यह स्तोत्र व्यक्ति को उसके भय, शत्रु और अन्य नकारात्मक तत्वों से सुरक्षा प्रदान करता है, जिससे उसका जीवन सुखमय और शांतिपूर्ण बनता है।
3. आध्यात्मिक उन्नति:
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम का पाठ व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होता है। इस स्तोत्र के माध्यम से देवी दुर्गा की महाशक्ति का आवाहन किया जाता है, जिससे व्यक्ति के भीतर आध्यात्मिक शक्ति का संचार होता है। यह स्तोत्र व्यक्ति को उसकी आध्यात्मिक यात्रा में आगे बढ़ने में मदद करता है और उसे आत्मज्ञान की ओर ले जाता है। इसके अलावा, यह स्तोत्र व्यक्ति के भीतर देवी दुर्गा के प्रति श्रद्धा और भक्ति की भावना को भी प्रबल बनाता है, जिससे वह अपने जीवन में शांति और संतोष का अनुभव करता है।
4. शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार:
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम का पाठ शारीरिक स्वास्थ्य में भी सुधार करता है। इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जो उसे विभिन्न बीमारियों और शारीरिक कष्टों से मुक्त करता है। यह स्तोत्र व्यक्ति के शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करता है, जिससे वह स्वस्थ और निरोगी बना रहता है। इसके अलावा, इस स्तोत्र का पाठ करने से शरीर में स्फूर्ति और ऊर्जा का अनुभव होता है, जिससे व्यक्ति दिनभर सक्रिय और ऊर्जावान बना रहता है।
5. विपत्तियों और संकटों से रक्षा:
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम का पाठ करने से व्यक्ति को जीवन की सभी प्रकार की विपत्तियों और संकटों से सुरक्षा मिलती है। यह स्तोत्र देवी दुर्गा की उस शक्ति का वर्णन करता है, जिसने महिषासुर जैसे दुष्ट असुर का वध कर संसार को उसकी बुराइयों से मुक्त किया। इस प्रकार, इस स्तोत्र के पाठ से व्यक्ति के जीवन में आने वाली सभी प्रकार की विपत्तियों और संकटों का नाश होता है। यह स्तोत्र व्यक्ति को कठिनाइयों का सामना करने के लिए साहस और शक्ति प्रदान करता है, जिससे वह अपने जीवन में शांति और सफलता प्राप्त कर सकता है।
6. धन और समृद्धि का आगमन:
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में धन और समृद्धि का आगमन होता है। यह स्तोत्र देवी दुर्गा की असीम कृपा का वर्णन करता है, जिससे व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति, और समृद्धि का वास होता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति के सभी आर्थिक संकटों का निवारण होता है और उसके जीवन में धन और समृद्धि की प्राप्ति होती है। इसके अलावा, यह स्तोत्र व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण करता है, जिससे वह अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में सफल होता है।
7. परिवार और संबंधों में शांति:
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम का पाठ परिवार और संबंधों में शांति और सामंजस्य स्थापित करने में सहायक होता है। इस स्तोत्र के पाठ से व्यक्ति के परिवार में सुख, शांति, और प्रेम का वातावरण बनता है। यह स्तोत्र परिवार के सभी सदस्यों के बीच आपसी प्रेम और सहयोग की भावना को प्रबल करता है, जिससे परिवार में किसी भी प्रकार के मतभेद या विवाद की स्थिति उत्पन्न नहीं होती। इसके अलावा, यह स्तोत्र व्यक्ति के सभी संबंधों में सामंजस्य और संतुलन बनाए रखने में मदद करता है, जिससे उसका जीवन सुखमय और संतोषजनक बनता है।
8. विद्या और ज्ञान की प्राप्ति:
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम का पाठ करने से विद्या और ज्ञान की प्राप्ति होती है। यह स्तोत्र देवी दुर्गा के सरस्वती रूप का भी स्तवन करता है, जो विद्या और ज्ञान की देवी मानी जाती हैं। इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति के बुद्धि और विवेक में वृद्धि होती है, जिससे वह जीवन में सही निर्णय लेने में सक्षम होता है। इसके अलावा, यह स्तोत्र विद्यार्थियों के लिए अत्यधिक फलदायी माना जाता है, क्योंकि इसका पाठ करने से उनकी अध्ययन में एकाग्रता बढ़ती है और उन्हें सफलता प्राप्त होती है।
9. साहस और आत्मविश्वास में वृद्धि:
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम का पाठ करने से व्यक्ति के साहस और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। इस स्तोत्र में देवी दुर्गा के उस महाशक्ति रूप का वर्णन किया गया है, जिसने महिषासुर जैसे दुष्ट असुर का वध किया। इस प्रकार, इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति के भीतर साहस और आत्मविश्वास का संचार होता है, जिससे वह जीवन की सभी चुनौतियों का सामना करने में सक्षम होता है। यह स्तोत्र व्यक्ति को उसके लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रेरित करता है और उसे हर प्रकार की बाधा को पार करने की शक्ति प्रदान करता है।
10. शत्रुओं और बाधाओं का नाश:
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम का पाठ करने से व्यक्ति के शत्रुओं और जीवन में आने वाली सभी प्रकार की बाधाओं का नाश होता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से देवी दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है, जो व्यक्ति के जीवन में आने वाली सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों और शत्रुओं का विनाश करती है। यह स्तोत्र व्यक्ति को उसके शत्रुओं से सुरक्षा प्रदान करता है और उसे जीवन में सफल होने के लिए आवश्यक शक्ति और साहस प्रदान करता है। इसके अलावा, यह स्तोत्र व्यक्ति के जीवन में आने वाली सभी प्रकार की बाधाओं और कठिनाइयों को दूर करता है, जिससे वह अपने लक्ष्य की प्राप्ति में सफल होता है।
11. प्राकृतिक आपदाओं और असामान्य घटनाओं से सुरक्षा:
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम का पाठ करने से व्यक्ति को प्राकृतिक आपदाओं और असामान्य घटनाओं से सुरक्षा मिलती है। इस स्तोत्र का पाठ करने से देवी दुर्गा की कृपा से व्यक्ति के जीवन में आने वाली सभी प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं, जैसे भूकंप, बाढ़, आग, आदि से रक्षा होती है। इसके अलावा, यह स्तोत्र व्यक्ति को असामान्य घटनाओं, जैसे दुर्घटनाओं, चोरियों, आदि से भी सुरक्षा प्रदान करता है। यह स्तोत्र व्यक्ति के जीवन में सुरक्षा और स्थिरता का अनुभव कराता है, जिससे वह अपने जीवन में शांति और संतोष का अनुभव करता है।
12. भविष्य की अनिश्चितताओं से सुरक्षा:
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम का पाठ करने से व्यक्ति को भविष्य की अनिश्चितताओं से सुरक्षा मिलती है। यह स्तोत्र व्यक्ति के जीवन में आने वाली सभी प्रकार की अनिश्चितताओं और अस्थिरताओं को समाप्त करता है। इसके पाठ से व्यक्ति के जीवन में स्थिरता और सुरक्षा का अनुभव होता है, जिससे वह अपने भविष्य के बारे में चिंतित नहीं होता। यह स्तोत्र व्यक्ति को भविष्य की अनिश्चितताओं से निपटने के लिए आवश्यक शक्ति और साहस प्रदान करता है, जिससे वह अपने जीवन में सफलता प्राप्त कर सकता है।
13. आध्यात्मिक ऊर्जा और चेतना में वृद्धि:
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम का पाठ करने से व्यक्ति की आध्यात्मिक ऊर्जा और चेतना में वृद्धि होती है। यह स्तोत्र देवी दुर्गा की महाशक्ति का स्तवन करता है, जिससे व्यक्ति के भीतर आध्यात्मिक ऊर्जा और चेतना का संचार होता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति के भीतर दिव्य ऊर्जा का अनुभव होता है, जो उसे उसके जीवन के उद्देश्य को प्राप्त करने में मदद करती है। इसके अलावा, यह स्तोत्र व्यक्ति के भीतर आत्मज्ञान और आध्यात्मिक जागृति का अनुभव कराता है, जिससे वह अपने जीवन में शांति और संतोष का अनुभव करता है।
14. प्रेम और करुणा की भावना में वृद्धि:
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम का पाठ करने से व्यक्ति के भीतर प्रेम और करुणा की भावना में वृद्धि होती है। इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति के हृदय में सभी जीवों के प्रति प्रेम और करुणा की भावना का विकास होता है। यह स्तोत्र व्यक्ति को दूसरों के प्रति सहानुभूति और सहायता की भावना से प्रेरित करता है, जिससे वह अपने जीवन में प्रेम और सद्भाव का अनुभव करता है। इसके अलावा, यह स्तोत्र व्यक्ति के भीतर शांति और संतोष की भावना का विकास करता है, जिससे वह अपने जीवन में सभी के साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करता है।
15. जीवन में अनुशासन और आत्मसंयम:
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम का पाठ व्यक्ति के जीवन में अनुशासन और आत्मसंयम का विकास करता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति के भीतर अनुशासन और आत्मसंयम की भावना का विकास होता है, जिससे वह अपने जीवन में सभी कार्यों को समय पर और सही तरीके से पूरा करता है। यह स्तोत्र व्यक्ति के जीवन में संयम और संतुलन का अनुभव कराता है, जिससे वह अपने जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करता है। इसके अलावा, यह स्तोत्र व्यक्ति के जीवन में आत्मसंयम और अनुशासन का मार्ग प्रशस्त करता है, जिससे वह अपने जीवन में शांति और संतोष का अनुभव करता है।
16. भयमुक्त और निराशा से रहित जीवन:
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम का पाठ करने से व्यक्ति का जीवन भयमुक्त और निराशा से रहित होता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति के भीतर साहस और आत्मविश्वास का संचार होता है, जिससे वह अपने जीवन में आने वाली सभी चुनौतियों का सामना धैर्य और साहस के साथ कर सकता है। यह स्तोत्र व्यक्ति के जीवन से सभी प्रकार की निराशा और भय को समाप्त करता है, जिससे वह अपने जीवन में सफलता और समृद्धि प्राप्त करता है। इसके अलावा, यह स्तोत्र व्यक्ति के जीवन में शांति और संतोष का अनुभव कराता है, जिससे वह अपने जीवन को भयमुक्त और निराशा से रहित बनाता है।
17. सकारात्मकता और उत्साह का संचार:
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम का पाठ व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता और उत्साह का संचार करता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति के भीतर सकारात्मक ऊर्जा और उत्साह का संचार होता है, जिससे वह अपने जीवन के सभी कार्यों में सफलता प्राप्त करता है। यह स्तोत्र व्यक्ति के जीवन में आने वाली सभी प्रकार की नकारात्मकता और निराशा को समाप्त करता है, जिससे उसका जीवन सुखमय और संतोषजनक बनता है। इसके अलावा, यह स्तोत्र व्यक्ति के भीतर उत्साह और जोश का संचार करता है, जिससे वह अपने जीवन के सभी कार्यों में पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ जुटता है।
18. आध्यात्मिक ध्यान और साधना में सफलता:
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम का पाठ व्यक्ति के आध्यात्मिक ध्यान और साधना में सफलता प्राप्त करने में सहायक होता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति के भीतर एकाग्रता और ध्यान की शक्ति का विकास होता है, जिससे वह अपनी साधना में सफलता प्राप्त करता है। यह स्तोत्र व्यक्ति के मन को शांत और स्थिर बनाता है, जिससे वह अपने ध्यान और साधना में गहराई प्राप्त कर सकता है। इसके अलावा, यह स्तोत्र व्यक्ति के भीतर आध्यात्मिक जागृति का अनुभव कराता है, जिससे वह अपने जीवन में आत्मज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति के लिए प्रेरित होता है।
19. आध्यात्मिक और धार्मिक अनुष्ठानों में सफलता:
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम का पाठ व्यक्ति को उसके आध्यात्मिक और धार्मिक अनुष्ठानों में सफलता प्राप्त करने में मदद करता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति के सभी धार्मिक अनुष्ठान सफल होते हैं और उसे देवी दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है। यह स्तोत्र व्यक्ति को उसके धार्मिक कार्यों में सफलता प्राप्त करने के लिए आवश्यक शक्ति और साहस प्रदान करता है। इसके अलावा, यह स्तोत्र व्यक्ति के धार्मिक अनुष्ठानों में शांति और समृद्धि का अनुभव कराता है, जिससे वह अपने जीवन में धार्मिक और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करता है।
20. आध्यात्मिक यात्रा में मार्गदर्शन:
महिषासur मर्दिनी स्तोत्रम का पाठ व्यक्ति की आध्यात्मिक यात्रा में मार्गदर्शन करता है। यह स्तोत्र देवी दुर्गा की महाशक्ति का स्तवन करता है, जिससे व्यक्ति के भीतर आध्यात्मिक जागृति और चेतना का अनुभव होता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति को उसकी आध्यात्मिक यात्रा में मार्गदर्शन प्राप्त होता है, जिससे वह अपने जीवन के उद्देश्य की प्राप्ति में सफल होता है। यह स्तोत्र व्यक्ति को उसके आध्यात्मिक पथ पर आगे बढ़ने में मदद करता है और उसे आत्मज्ञान और मोक्ष की ओर प्रेरित करता है।
21. परिवार में सुख और शांति का अनुभव:
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम का पाठ व्यक्ति के परिवार में सुख और शांति का अनुभव कराता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से परिवार के सभी सदस्य एक-दूसरे के प्रति प्रेम और सहयोग की भावना से प्रेरित होते हैं। यह स्तोत्र व्यक्ति के परिवार में आपसी समझ और सामंजस्य का विकास करता है, जिससे परिवार के सभी सदस्य सुखी और संतुष्ट रहते हैं। इसके अलावा, यह स्तोत्र परिवार के सभी सदस्यों को देवी दुर्गा की कृपा प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है, जिससे उनका जीवन सुखमय और शांतिपूर्ण बनता है।
22. व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन में सफलता:
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम का पाठ करने से व्यक्ति को उसके व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन में सफलता प्राप्त होती है। इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में सभी प्रकार की बाधाएँ समाप्त होती हैं और वह अपने लक्ष्यों की प्राप्ति में सफल होता है। यह स्तोत्र व्यक्ति को उसके पेशेवर जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए आवश्यक शक्ति और साहस प्रदान करता है। इसके अलावा, यह स्तोत्र व्यक्ति के व्यक्तिगत जीवन में शांति और संतोष का अनुभव कराता है, जिससे वह अपने जीवन में खुशहाल और संतुष्ट रहता है।
23. जीवन में नई शुरुआत और सकारात्मक बदलाव:
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम का पाठ व्यक्ति के जीवन में नई शुरुआत और सकारात्मक बदलाव का अनुभव कराता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में सभी प्रकार की नकारात्मकता और बाधाएँ समाप्त होती हैं और वह अपने जीवन में नई शुरुआत कर सकता है। यह स्तोत्र व्यक्ति को उसके जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए प्रेरित करता है, जिससे वह अपने जीवन में शांति, सुख, और सफलता प्राप्त करता है। इसके अलावा, यह स्तोत्र व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है, जिससे वह अपने जीवन के सभी क्षेत्रों में सफल होता है।
24. आध्यात्मिक साधना में सिद्धि की प्राप्ति:
महिषासur मर्दिनी स्तोत्रम का पाठ व्यक्ति को उसकी आध्यात्मिक साधना में सिद्धि प्राप्त करने में मदद करता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति के भीतर दिव्य शक्ति और ऊर्जा का अनुभव होता है, जिससे वह अपनी साधना में सफलता प्राप्त करता है। यह स्तोत्र व्यक्ति के भीतर ध्यान और साधना की शक्ति का विकास करता है, जिससे वह अपनी साधना में गहराई प्राप्त कर सकता है। इसके अलावा, यह स्तोत्र व्यक्ति को उसकी साधना में सिद्धि प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है, जिससे वह अपने जीवन में आत्मज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है।
25. जीवन में स्थिरता और संतुलन का अनुभव:
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम का पाठ व्यक्ति के जीवन में स्थिरता और संतुलन का अनुभव कराता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में स्थिरता और संतुलन का विकास होता है, जिससे वह अपने जीवन में शांति और संतोष का अनुभव करता है। यह स्तोत्र व्यक्ति को उसके जीवन में स्थिरता और संतुलन बनाए रखने में मदद करता है, जिससे वह अपने जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करता है। इसके अलावा, यह स्तोत्र व्यक्ति के जीवन में स्थिरता और संतुलन का मार्ग प्रशस्त करता है, जिससे वह अपने जीवन में शांति और संतोष का अनुभव करता है।
FAQs – महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र हिंदी PDF Mahishasura Mardini Stotra PDF
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम कितना शक्तिशाली है?
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम एक अत्यधिक शक्तिशाली स्तोत्र है, जो देवी दुर्गा के महाशक्ति रूप की महिमा का वर्णन करता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को मानसिक और आध्यात्मिक शांति मिलती है। यह माना जाता है कि जो व्यक्ति नियमित रूप से महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र का पाठ करता है, उसे जीवन के सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति मिलती है। इस स्तोत्र में देवी की असीम शक्ति का वर्णन किया गया है, जिसने महिषासुर जैसे दुष्ट असुर का वध किया और संसार को उसकी बुराइयों से मुक्त किया।
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम का पाठ करने से नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता का संचार होता है। इस स्तोत्र में निहित मंत्रों की शक्ति इतनी प्रबल है कि यह व्यक्ति को उसके सभी भय, शत्रु और विपत्तियों से सुरक्षा प्रदान करता है। इस प्रकार, महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम न केवल एक साधना का मार्ग है, बल्कि यह एक साधक को उसके जीवन की चुनौतियों से लड़ने के लिए साहस और शक्ति प्रदान करता है।
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र किसने लिखा और क्यों?
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र का रचना आदि शंकराचार्य द्वारा की गई थी। आदि शंकराचार्य ने इस स्तोत्र को माँ दुर्गा की महिमा और उनके महाशक्ति रूप को सम्मानित करने के लिए लिखा था। इस स्तोत्र का मुख्य उद्देश्य महिषासुर जैसे दुष्ट असुर के वध का वर्णन करना था, जिसे देवी दुर्गा ने अपनी अद्वितीय शक्ति और साहस से समाप्त किया। इस स्तोत्र के माध्यम से आदि शंकराचार्य ने देवी दुर्गा की असीम शक्ति, करुणा, और उनकी विजयगाथा को व्यक्त किया है।
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र का पाठ भक्तों को आध्यात्मिक बल प्रदान करता है और उन्हें जीवन के संकटों से लड़ने की शक्ति देता है। इस स्तोत्र का उद्देश्य देवी दुर्गा के प्रति श्रद्धा और भक्ति को बढ़ावा देना है, जिससे भक्तगण उनकी कृपा प्राप्त कर सकें और अपने जीवन में शांति और समृद्धि ला सकें। इस प्रकार, महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र का सृजन आदि शंकराचार्य ने देवी दुर्गा की महिमा को गाने और भक्तों को उनके आशीर्वाद से संपन्न करने के लिए किया था।
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र में कितने श्लोक हैं?
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र में कुल 21 श्लोक हैं। इन श्लोकों में देवी दुर्गा के विभिन्न रूपों, उनकी शक्ति और उनके द्वारा किए गए अद्वितीय कार्यों का वर्णन किया गया है। प्रत्येक श्लोक में देवी दुर्गा के महाशक्ति स्वरूप को सम्मानित किया गया है और उनकी विजयगाथा का गुणगान किया गया है। यह श्लोक उस समय की महिमा का वर्णन करते हैं जब देवी दुर्गा ने महिषासुर जैसे दुष्ट असुर का वध कर संसार को उसकी बुराइयों से मुक्त किया।
इस स्तोत्र के श्लोकों का पाठ करना भक्तों के लिए अत्यधिक फलदायी माना जाता है, क्योंकि इससे उन्हें देवी की कृपा प्राप्त होती है और उनके जीवन में आने वाली सभी कठिनाइयों का समाधान मिलता है। महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र का हर श्लोक भक्तों के मनोबल और आत्मविश्वास को बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें मानसिक शांति प्रदान करता है। इस प्रकार, 21 श्लोकों वाला यह स्तोत्र भक्तों के लिए आध्यात्मिक उन्नति का एक साधन है।
क्या हम ऐगिरी नंदिनी रोज पढ़ सकते हैं?
हाँ, ऐगिरी नंदिनी का रोज पाठ करना अत्यधिक शुभ और फलदायी माना जाता है। यह स्तोत्र देवी दुर्गा की महाशक्ति और उनकी विजय की महिमा का वर्णन करता है। इसका नियमित पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता और शांति का संचार होता है। ऐगिरी नंदिनी स्तोत्र का रोजाना पाठ करना व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी होता है। यह न केवल नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है, बल्कि व्यक्ति के आत्मविश्वास और साहस में भी वृद्धि करता है।
रोजाना इस स्तोत्र का पाठ करने से देवी दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है और सभी प्रकार की विपत्तियों और शत्रुओं से सुरक्षा मिलती है। इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में समृद्धि, शांति और सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है। इसलिए, ऐगिरी नंदिनी का रोज पाठ करना न केवल आध्यात्मिक दृष्टिकोण से बल्कि मानसिक और शारीरिक दृष्टिकोण से भी अत्यधिक लाभकारी है।
महिषासुर इतना शक्तिशाली क्यों था?
महिषासुर एक अत्यंत शक्तिशाली असुर था, जिसे ब्रह्मा जी से अमरता का वरदान प्राप्त था। इस वरदान के कारण, उसे किसी भी देवता, मानव या असुर द्वारा मारा नहीं जा सकता था, जिससे उसकी शक्ति और घमंड में अत्यधिक वृद्धि हो गई थी। महिषासुर का यह वरदान ही उसकी शक्ति का मुख्य स्रोत था, जिसने उसे देवी-देवताओं के लिए भी अजेय बना दिया था।
उसकी शक्ति का दूसरा कारण उसकी तपस्या और कठोर साधना थी, जिसके फलस्वरूप उसे इतने शक्तिशाली वरदान प्राप्त हुए थे। महिषासुर के पास अपनी सेना थी, जो उसकी सहायता करती थी, और वह अपने बल और शक्ति के बल पर स्वर्ग पर अधिकार करने का प्रयास करता था। उसकी शक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण यह था कि उसे हराने के लिए स्वयं देवी दुर्गा को अवतरित होना पड़ा, जिन्होंने अपनी अद्वितीय शक्ति से उसका वध किया। महिषासुर की यह शक्ति और उसका घमंड ही उसके विनाश का कारण बना, जब देवी दुर्गा ने उसे समाप्त कर दिया।
कौन सा दुर्गा मंत्र शक्तिशाली है?
“ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” यह दुर्गा मंत्र सबसे शक्तिशाली माना जाता है। इस मंत्र का उच्चारण करने से देवी दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है और व्यक्ति के जीवन में आने वाली सभी प्रकार की बाधाओं का नाश होता है। इस मंत्र के माध्यम से देवी दुर्गा की महाशक्ति का आवाहन किया जाता है, जिससे व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक बल मिलता है। यह मंत्र विशेष रूप से नवरात्रि के समय पाठ करने के लिए अत्यधिक फलदायी माना जाता है।
इसके अलावा, यह मंत्र व्यक्ति के भय, शत्रु, और अन्य नकारात्मक तत्वों को समाप्त करने के लिए भी अत्यंत प्रभावी है। “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” मंत्र का नियमित पाठ करने से व्यक्ति को देवी दुर्गा की असीम शक्ति और करुणा का अनुभव होता है, जो उसे जीवन की सभी चुनौतियों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है। यह मंत्र न केवल आध्यात्मिक उन्नति का साधन है, बल्कि यह व्यक्ति के जीवन में शांति, समृद्धि और सफलता का मार्ग भी प्रशस्त करता है।
ऐगिरी नंदिनी पढ़ने के क्या फायदे हैं?
ऐगिरी नंदिनी स्तोत्र का पाठ करने के कई लाभ होते हैं। यह स्तोत्र देवी दुर्गा की महाशक्ति का वर्णन करता है, और इसका नियमित पाठ करने से व्यक्ति को मानसिक शांति और आध्यात्मिक बल मिलता है। ऐगिरी नंदिनी का पाठ करने से व्यक्ति के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जो उसे जीवन की कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से नकारात्मकता, भय, और शत्रुओं का नाश होता है, और व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का प्रवेश होता है।
इसके अलावा, ऐगिरी नंदिनी स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति के मनोबल और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। यह स्तोत्र देवी दुर्गा की कृपा प्राप्त करने का एक माध्यम है, जिससे व्यक्ति के जीवन में आने वाली सभी प्रकार की विपत्तियों का नाश होता है। इस प्रकार, ऐगिरी नंदिनी स्तोत्र का पाठ करना न केवल आध्यात्मिक दृष्टिकोण से बल्कि मानसिक और शारीरिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत लाभकारी होता है।
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विष्णु चालीसा(Vishnu Chalisa Pdf) भगवान विष्णु को समर्पित एक भक्तिपूर्ण स्तोत्र है, जिसे हिंदू धर्म में महत्वपूर्ण माना जाता है। यह चालीसा भगवान विष्णु के गुणों, लीलाओं और महिमा का वर्णन करती है और उनके भक्तों द्वारा श्रद्धा और भक्ति के साथ गाई जाती है।
विष्णु चालीसा की शुरुआत में भगवान विष्णु का ध्यान किया जाता है, फिर उनके विभिन्न रूपों और अवतारों का वर्णन होता है, जैसे कि राम और कृष्ण। यह चालीसा न केवल भक्तों को आध्यात्मिक शांति और संतोष प्रदान करती है, बल्कि उन्हें भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने में भी मदद करती है।
विष्णु चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति की सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान होता है और उन्हें सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त होती है। इसे भक्तों द्वारा सुबह और शाम दोनों समय गाया जा सकता है, विशेष रूप से विष्णुजी के विशेष त्योहारों और पूजाओं के अवसर पर।
karahun aapaka kis vidhi poojan ॥ kumati vilok hot duhkh bheeshan ॥
karahun pranaam kaun vidhi sumiran ॥ kaun ladakee main karahu daan ॥
sur muni karat sada sevakaee ॥ harshit rahat param gati paee ॥36 ॥
deen duhkhin par sada sahaee ॥ nij jan jan lev apanai ॥
paap dosh santaap nashao ॥ bhav-bandhan se mukt karao ॥
sukh sampatti de sukh upajao ॥ nij charanan ka daas banao ॥
nigam sada ye vinay sunaavai ॥ padhai sunai so jan sukh paavai ॥40 ॥
Vishnu Chalisa PDF Vishnu Chalisa Benefits
विष्णु चालीसा के लाभ
विष्णु चालीसा भगवान विष्णु की स्तुति में रचित एक लोकप्रिय धार्मिक ग्रंथ है। इसमें कुल 40 छंद होते हैं जिनमें भगवान विष्णु के विभिन्न स्वरूपों, लीलाओं और उनकी महिमा का वर्णन किया गया है। विष्णु चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति को अनेक प्रकार के लाभ मिलते हैं। इस लेख में हम विष्णु चालीसा के लाभों का विस्तार से वर्णन करेंगे।
1. मानसिक शांति
विष्णु चालीसा का पाठ करने से मन को शांति मिलती है। इसके मधुर शब्द और भक्ति भाव से भरे छंद व्यक्ति के मानसिक तनाव को कम करते हैं। नियमित पाठ करने से मानसिक संतुलन बना रहता है और व्यक्ति अवसाद और चिंता से दूर रहता है।
2. आध्यात्मिक उन्नति
विष्णु चालीसा का पाठ करने से आध्यात्मिक उन्नति होती है। भगवान विष्णु की कृपा से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह व्यक्ति को आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर करता है और उसे ईश्वर की ओर आकर्षित करता है।
3. पारिवारिक सुख-शांति
विष्णु चालीसा का नियमित पाठ करने से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। भगवान विष्णु की कृपा से घर में प्रेम, सद्भाव और सहयोग की भावना बढ़ती है। परिवार के सदस्यों के बीच में आपसी समझ और विश्वास बढ़ता है।
4. स्वास्थ्य लाभ
विष्णु चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति का स्वास्थ्य भी बेहतर होता है। इसके नियमित पाठ से मानसिक तनाव कम होता है जिससे कई शारीरिक बीमारियाँ दूर होती हैं। साथ ही, भगवान विष्णु की कृपा से व्यक्ति का शरीर स्वस्थ रहता है और उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
5. आर्थिक समृद्धि
विष्णु चालीसा का पाठ करने से आर्थिक समृद्धि भी प्राप्त होती है। भगवान विष्णु धन के देवता हैं और उनकी कृपा से व्यक्ति के जीवन में धन-धान्य की कमी नहीं होती। व्यापार में वृद्धि होती है और आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।
6. संकटों से रक्षा
विष्णु चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में आने वाले संकटों से रक्षा होती है। भगवान विष्णु की कृपा से व्यक्ति के जीवन में आने वाली कठिनाइयाँ और विपत्तियाँ दूर होती हैं। विष्णु चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को जीवन के हर क्षेत्र में सफलता मिलती है।
7. विद्या और ज्ञान की प्राप्ति
विष्णु चालीसा का पाठ करने से विद्या और ज्ञान की प्राप्ति होती है। भगवान विष्णु विद्या और ज्ञान के देवता हैं। उनकी कृपा से विद्यार्थी पढ़ाई में सफलता प्राप्त करते हैं और उनकी बुद्धि का विकास होता है।
8. धर्म और मोक्ष की प्राप्ति
विष्णु चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को धर्म और मोक्ष की प्राप्ति होती है। भगवान विष्णु की आराधना करने से व्यक्ति के पाप कर्मों का नाश होता है और उसे ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है। इससे व्यक्ति का जीवन धर्ममय हो जाता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
9. भक्ति भाव में वृद्धि
विष्णु चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के भक्ति भाव में वृद्धि होती है। भगवान विष्णु के प्रति व्यक्ति की श्रद्धा और भक्ति बढ़ती है। इससे व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं और वह धर्म और ईश्वर की ओर आकर्षित होता है।
10. व्यक्तिगत विकास
विष्णु चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति का व्यक्तिगत विकास होता है। इससे व्यक्ति के चरित्र में सुधार होता है और उसमें अच्छे गुणों का विकास होता है। विष्णु चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति में धैर्य, सहनशीलता, और आत्मविश्वास की वृद्धि होती है।
11. सकारात्मक सोच
विष्णु चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति की सोच सकारात्मक होती है। इसके छंदों में भगवान विष्णु की महिमा और उनकी कृपा का वर्णन किया गया है जिससे व्यक्ति के मन में सकारात्मक विचार आते हैं। इससे व्यक्ति के जीवन में उत्साह और ऊर्जा का संचार होता है।
12. सामाजिक मान-सम्मान
विष्णु चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को समाज में मान-सम्मान मिलता है। भगवान विष्णु की कृपा से व्यक्ति के कार्यों में सफलता मिलती है जिससे वह समाज में सम्मान प्राप्त करता है। इससे उसकी सामाजिक स्थिति मजबूत होती है और लोग उसे आदर और सम्मान से देखते हैं।
13. दुष्टों का नाश
विष्णु चालीसा का पाठ करने से दुष्टों का नाश होता है। भगवान विष्णु दुष्टों का संहार करने वाले देवता हैं। उनकी आराधना से व्यक्ति के जीवन में आने वाले दुष्ट और अशुभ तत्व दूर होते हैं। इससे व्यक्ति का जीवन सुरक्षित और सुखमय बनता है।
14. जीवन में स्थिरता
विष्णु चालीसा का पाठ करने से जीवन में स्थिरता आती है। भगवान विष्णु की कृपा से व्यक्ति के जीवन में संतुलन बना रहता है। इससे व्यक्ति के जीवन में स्थिरता और स्थायित्व आता है और उसे अपने लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायता मिलती है।
15. आत्मविश्वास में वृद्धि
विष्णु चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति का आत्मविश्वास बढ़ता है। भगवान विष्णु की आराधना से व्यक्ति को आत्मबल और साहस मिलता है। इससे वह जीवन की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम होता है और अपने उद्देश्यों की प्राप्ति में सफलता प्राप्त करता है।
16. आध्यात्मिक जागरूकता
विष्णु चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति की आध्यात्मिक जागरूकता बढ़ती है। इसके माध्यम से व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानता है और उसे आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति होती है। इससे व्यक्ति के जीवन में आध्यात्मिक समृद्धि आती है।
विष्णु चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक, आर्थिक और आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं। भगवान विष्णु की कृपा से व्यक्ति का जीवन सुखमय, स्वस्थ और समृद्ध बनता है। विष्णु चालीसा के पाठ से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं और वह धर्म और आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर होता है। इस प्रकार, विष्णु चालीसा का पाठ व्यक्ति के जीवन में अनेक प्रकार के लाभ प्रदान करता है और उसे एक सफल और संतुलित जीवन जीने में सहायता करता है।
श्री सूर्य देव – ऊँ जय कश्यप नन्दन (Shri Surya Dev Aarti) श्री सूर्य देव, जिन्हें सूर्य भगवान या आदित्य के नाम से भी जाना जाता है, हिन्दू धर्म में विशेष महत्व रखते हैं। वे सर्वशक्तिमान और सृष्टि के पालनकर्ता हैं, जो ब्रह्मा, विष्णु, और महेश के साथ सृष्टि के संपूर्ण चक्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। सूर्य देव को जीवन और ऊर्जा का स्रोत माना जाता है, जिनके बिना ब्रह्मांड की किसी भी जीवंतता की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
ऊँ जय कश्यप नन्दन के अर्चना गीत में सूर्य देव की पूजा और उनकी महिमा का वर्णन किया गया है। यह आर्ति विशेष रूप से सूर्य देव की आराधना के समय गाई जाती है, जो उनके प्रति भक्ति और सम्मान प्रकट करती है। “जय कश्यप नन्दन” का अर्थ है “कश्यप मुनि के पुत्र की जय”, जो सूर्य देव के पिता कश्यप मुनि की संतान होने का प्रमाण है। यह स्तुति सूर्य देव की शक्ति, शौर्य, और उनके दिव्य गुणों की सराहना करती है, और भक्तों को सूर्य देव के आशीर्वाद के लिए प्रार्थना करती है।
सूर्य देव की पूजा से न केवल आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है, बल्कि इससे शरीर और मन को भी ऊर्जा और शक्ति मिलती है। यह आर्ति भगवान सूर्य की आराधना में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और भक्तों को उनके जीवन में स्वास्थ्य, समृद्धि, और सौभाग्य की प्राप्ति के लिए प्रेरित करती है।
इस प्रकार, ऊँ जय कश्यप नन्दन सूर्य देव की आराधना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो भक्तों को उनके आशीर्वाद और कृपा प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है। इस आर्ति के माध्यम से भक्त सूर्य देव की महिमा को सराहते हैं और उनके जीवन को दिव्य ऊर्जा से भरपूर करने की कामना करते हैं।
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सकल सुकर्म प्रसविता, सविता शुभकारी। विश्व विलोचन मोचन, भव-बंधन भारी॥ ॥ ऊँ जय कश्यप…॥
कमल समूह विकासक, नाशक त्रय तापा। सेवत सहज हरत अति, मनसिज संतापा॥ ॥ ऊँ जय कश्यप…॥
नेत्र व्याधि हर सुरवर, भू-पीड़ा हारी। वृष्टि विमोचन संतत, परहित व्रतधारी॥ ॥ ऊँ जय कश्यप…॥
सूर्यदेव करुणाकर, अब करुणा कीजै। हर अज्ञान मोह सब, तत्वज्ञान दीजै॥
ऊँ जय कश्यप नन्दन, प्रभु जय अदिति नन्दन। त्रिभुवन तिमिर निकंदन, भक्त हृदय चन्दन॥
|| Shri Surya Dev Aart: Jai Kashyapa Nandana ||
Om, Jay Kashyap Nandan, Prabhu Jay Aditi Nandan. Tribhuvan Timir Nikandan, Bhakt Hriday Chandan. || Om Jay Kashyap… ||
Sapt Ashwarath Rajit, Ek Chakradhari. Dukhahari, Sukhakari, Manas Malhari. || Om Jay Kashyap… ||
Sur Muni Bhoosur Vandit, Vimal Vibhavashali. Agh Dal Dalan Divakar, Divya Kiran Mali. || Om Jay Kashyap… ||
Sakal Sukarm Prasvita, Savita Shubhakari. Vishwa Vilochan Mochan, Bhav Bandhan Bhari. || Om Jay Kashyap… ||
Kamal Samuh Vikasak, Nashak Tray Tapaa. Sevat Sahaj Harat Ati, Manasij Santapaa. || Om Jay Kashyap… ||
Netra Vyadhi Har Survar, Bhu Pida Haari. Vrishti Vimochan Santat, Parhit Vratadhari. || Om Jay Kashyap… ||
Surya Dev Karunakar, Ab Karuna Keejai. Har Agnyaan Moh Sab, Tatv Gyaan Deeje.
Om Jay Kashyap Nandan, Prabhu Jay Aditi Nandan. Tribhuvan Timir Nikandan, Bhakt Hriday Chandan.
Shri Surya Dev Aarti Lyrics Shri Surya Dev Aarti Benefits
श्री सूर्य देव – ऊँ जय कश्यप नन्दन के लाभ
श्री सूर्य देव की आरती, “ऊँ जय कश्यप नन्दन” एक महत्वपूर्ण हिन्दू पूजा और भक्ति गीत है जो सूर्य देवता की पूजा के समय गाया जाता है। सूर्य देवता को अटल शक्ति, प्रकाश और जीवन के स्रोत के रूप में पूजा जाता है। इस आरती का पाठ करने से विभिन्न लाभ होते हैं, जो शारीरिक, मानसिक, और आध्यात्मिक स्तर पर अनुभव किए जा सकते हैं।
इस लेख में हम “ऊँ जय कश्यप नन्दन” की आरती के लाभों को विस्तार से समझेंगे।
शारीरिक स्वास्थ्य
सूर्य देवता की आरती का नियमित पाठ शारीरिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी है। सूर्य देवता सूर्य की किरणों के माध्यम से ऊर्जा प्रदान करते हैं, जो हमारे शरीर को कई तरीके से लाभ पहुँचाती है:
विटामिन डी की प्राप्ति: सूर्य की किरणें विटामिन डी का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। यह विटामिन हड्डियों की मजबूती और इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाने में मदद करता है। आरती के समय सूर्य की आराधना से मानसिक और शारीरिक स्तर पर सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।
ह्रदय स्वास्थ्य: सूर्य देवता की पूजा से रक्त संचार में सुधार होता है। यह ह्रदय के लिए लाभकारी होता है और ह्रदय संबंधी बीमारियों के जोखिम को कम करता है।
स्वस्थ त्वचा: सूर्य की किरणों से त्वचा को आवश्यक विटामिन मिलता है, जो त्वचा की चमक और स्वास्थ्य को बनाए रखने में सहायक होता है। सूर्य देवता की पूजा से मन में सकारात्मकता और आत्म-संतोष की भावना आती है, जो त्वचा की सुंदरता को बढ़ावा देती है।
मानसिक शांति और तंत्रिका तंत्र
सूर्य देवता की आरती मानसिक शांति और तंत्रिका तंत्र के संतुलन के लिए अत्यंत फायदेमंद होती है:
मानसिक स्पष्टता: सूर्य की किरणें मानसिक स्पष्टता और जागरूकता को बढ़ावा देती हैं। आरती के माध्यम से सूर्य देवता की पूजा करने से मस्तिष्क की सक्रियता बढ़ती है, जिससे व्यक्ति के निर्णय लेने की क्षमता में सुधार होता है।
तनाव और चिंता में कमी: सूर्य देवता की आरती से मन की शांति प्राप्त होती है, जो तनाव और चिंता को कम करने में मदद करती है। आरती के समय ध्यान और मंत्र जाप से मानसिक स्थिति में सुधार होता है।
उत्साह और ऊर्जा: सूर्य देवता के पूजन से मानसिक ऊर्जा और उत्साह में वृद्धि होती है। यह व्यक्ति को सक्रिय और उत्साही बनाए रखता है, जो कार्यक्षमता को बढ़ाता है।
आध्यात्मिक लाभ
सूर्य देवता की आरती का आध्यात्मिक लाभ भी बहुत महत्वपूर्ण होता है:
आध्यात्मिक उन्नति: सूर्य देवता की आराधना से आध्यात्मिक उन्नति होती है। यह पूजा आत्मा को शुद्ध करती है और आत्मिक ज्ञान को प्राप्त करने में सहायता करती है।
कर्मों की शुद्धि: सूर्य देवता की पूजा से व्यक्ति के कर्मों की शुद्धि होती है। इससे व्यक्ति के पापों का नाश होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है।
सकारात्मक ऊर्जा का संचार: सूर्य देवता की आरती से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह ऊर्जा व्यक्ति के जीवन को सुखद और समृद्ध बनाती है।
सामाजिक और पारिवारिक लाभ
सूर्य देवता की आरती सामाजिक और पारिवारिक जीवन में भी कई लाभ प्रदान करती है:
परिवार में सामंजस्य: सूर्य देवता की पूजा से परिवार में सामंजस्य और स्नेह बढ़ता है। यह पारिवारिक संबंधों को मजबूत बनाता है और पारिवारिक विवादों को कम करता है।
समाज में सम्मान: सूर्य देवता की आरती से समाज में व्यक्ति की प्रतिष्ठा और सम्मान बढ़ता है। यह समाज में सकारात्मक छवि बनाने में मदद करता है।
सामाजिक समस्याओं का समाधान: सूर्य देवता की पूजा से समाज में उत्पन्न होने वाली समस्याओं का समाधान होता है। यह सामाजिक समरसता को बढ़ावा देती है और समाज के उत्थान में योगदान करती है।
धार्मिक और संस्कृतिक महत्व
सूर्य देवता की आरती का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी अत्यधिक होता है:
धार्मिक परंपरा की अनुपालना: सूर्य देवता की पूजा हिन्दू धर्म की महत्वपूर्ण परंपरा है। इस आरती के माध्यम से धार्मिक परंपराओं का पालन होता है और धार्मिक संस्कारों को बनाए रखा जाता है।
सांस्कृतिक धरोहर: सूर्य देवता की पूजा भारतीय सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है। इस आरती के द्वारा भारतीय संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखा जाता है।
धार्मिक उत्सवों में योगदान: सूर्य देवता की आरती धार्मिक उत्सवों और पर्वों के दौरान विशेष महत्व रखती है। यह उत्सवों के आध्यात्मिक अनुभव को बढ़ाती है और धार्मिक माहौल को सजाती है।
ऊँ जय कश्यप नन्दन आरती सूर्य देवता की पूजा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके माध्यम से शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, और सांस्कृतिक लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं। सूर्य देवता की आराधना से जीवन में सुख, शांति, और समृद्धि की प्राप्ति होती है। इस प्रकार, सूर्य देवता की आरती न केवल धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा है, बल्कि यह जीवन के विभिन्न पहलुओं में सकारात्मक प्रभाव डालती है।
श्री जानकीनाथ जी की आरती (Shri Jankinatha Ji Ki Aarti) एक भक्तिमय आरती है जो भगवान श्री राम और माता सीता के प्रति श्रद्धा और भक्ति को प्रकट करती है। इस आरती के माध्यम से भक्तजन भगवान श्री राम के अद्वितीय प्रेम और उनकी दिव्य लीलाओं का गुणगान करते हैं। “ॐ जय जानकीनाथ” आरती की शुरुआत करते हुए, यह आरती पूरे हृदय से की जाती है और इससे भक्तों को आत्मिक शांति और आनंद की अनुभूति होती है।
श्री जानकीनाथ जी की आरती के बोल संगीतमय और भावपूर्ण हैं, जो भगवान राम और माता सीता की महिमा का वर्णन करते हैं। यह आरती विशेष रूप से रामनवमी, दशहरा, और अन्य धार्मिक अवसरों पर गाई जाती है। इस आरती को गाने से भक्तगण भगवान श्री राम और माता सीता की कृपा प्राप्त करते हैं और अपने जीवन में सुख, शांति, और समृद्धि की कामना करते हैं।
अगर आप श्री जानकीनाथ जी की आरती के सम्पूर्ण बोल जानना चाहते हैं, तो आप सही स्थान पर आए हैं। यहाँ पर आपको इस अद्भुत आरती के सारे बोल मिलेंगे, जिससे आप अपने धार्मिक अनुष्ठानों को और भी भक्तिपूर्ण बना सकते हैं।
श्री जानकीनाथ जी की आरती को नियमित रूप से गाने से भगवान श्री राम और माता सीता की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होते हैं, जो हमारे जीवन को सफल और सार्थक बनाते हैं। इस आरती के माध्यम से हम अपने आराध्य देवता श्री राम और माता सीता को प्रसन्न कर सकते हैं और उनके दिव्य आशीर्वाद से अपने जीवन को संवार सकते हैं।
ॐ जय जानकीनाथा, जय श्री रघुनाथा । दोउ कर जोरें बिनवौं, प्रभु! सुनिये बाता ॥ ॐ जय..॥
तुम रघुनाथ हमारे, प्राण पिता माता । तुम ही सज्जन-संगी, भक्ति मुक्ति दाता ॥ ॐ जय..॥
लख चौरासी काटो, मेटो यम त्रासा । निशदिन प्रभु मोहि रखिये, अपने ही पासा ॥ ॐ जय..॥
राम भरत लछिमन, सँग शत्रुहन भैया । जगमग ज्योति विराजै, शोभा अति लहिया ॥ ॐ जय..॥
हनुमत नाद बजावत, नेवर झमकाता । स्वर्णथाल कर आरती, करत कौशल्या माता ॥ ॐ जय..॥
सुभग मुकुट सिर, धनु सर, कर शोभा भारी । मनीराम दर्शन करि, पल-पल बलिहारी ॥ ॐ जय..॥
जय जानकिनाथा, हो प्रभु जय श्री रघुनाथा । हो प्रभु जय सीता माता, हो प्रभु जय लक्ष्मण भ्राता ॥ ॐ जय..॥
हो प्रभु जय चारौं भ्राता, हो प्रभु जय हनुमत दासा । दोउ कर जोड़े विनवौं, प्रभु मेरी सुनो बाता ॥ ॐ जय..॥
|| Shri Jankinatha Ji Ki Aarti ||
Om Jay Janakinatha, Jay Shri Raghunatha. Dou kar joren binavon, Prabhu! Suniye bata. Om Jay..
Tum Raghunath hamare, Pran pita mata. Tum hi sajjan-sangi, Bhakti mukti data. Om Jay..
Lakh chaurasi kato, Meto Yam trasa. Nishadin Prabhu mohi rakhiye, Apne hi pasa. Om Jay..
Ram Bharat Lachhiman, Sang shatruhan bhaiya. Jagmag jyoti viraje, Shobha ati lahiya. Om Jay..
Hanumat nad bajavat, Nevr jhamkata. Swarnathal kar aarti, Karat Kaushalya mata. Om Jay..
Subhag mukut sir, dhanu sar, Kar shobha bhari. Maniram darshan kari, Pal-pal balihari. Om Jay..
Jay Janakinatha, Ho Prabhu jay Shri Raghunatha. Ho Prabhu jay Sita mata, Ho Prabhu jay Laxman bhrata. Om Jay..
Ho Prabhu jay charon bhrata, Ho Prabhu jay Hanumat dasa. Dou kar jode vinavon, Prabhu meri suno bata. Om Jay..
Shri Jankinatha Ji Ki Aarti Benefits
श्री जानकीनाथ जी की आरती के लाभ
श्री जानकीनाथ जी की आरती हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है जो भक्तों द्वारा भगवान श्रीराम और माता सीता की पूजा के लिए की जाती है। इस आरती का मुख्य उद्देश्य भगवान को समर्पित भाव से पूजा करना और उनके आशीर्वाद प्राप्त करना है। इस लेख में, हम श्री जानकीनाथ जी की आरती के लाभों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
आध्यात्मिक उन्नति और आत्मिक शांति
आरती के माध्यम से भक्त भगवान के प्रति अपनी भक्ति और समर्पण प्रकट करते हैं। यह ध्यान और ध्यान की एक विधि है जो भक्तों को आंतरिक शांति और संतुलन प्रदान करती है। श्री जानकीनाथ जी की आरती से भक्तों को आत्मिक उन्नति का अनुभव होता है, और वे अपने जीवन के उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से समझ पाते हैं।
भक्तिवृद्धि और धार्मिकता में वृद्धि
आरती के दौरान भगवान की स्तुति करना और उनकी महिमा गाना भक्तों की भक्ति को बढ़ाता है। यह उन्हें धार्मिकता के मार्ग पर बनाए रखता है और उनकी आत्मा को शुद्ध करता है। इस प्रकार, आरती करने से व्यक्ति की भक्ति और धार्मिकता में वृद्धि होती है।
सकारात्मक ऊर्जा और मानसिक शांति
आरती करने से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। जब भक्त एक साथ मिलकर आरती करते हैं, तो उनका सामूहिक ध्यान और भक्ति मिलकर एक सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण करती है। यह मानसिक शांति और संतुलन को बनाए रखने में मदद करता है, और तनाव को कम करता है।
सौहार्द और सामुदायिक भावना
आरती अक्सर सामूहिक रूप से की जाती है, जो समुदाय के सदस्यों के बीच सौहार्द और सामुदायिक भावना को प्रबल करती है। यह एक सामाजिक समारोह होता है जिसमें सभी लोग एक साथ मिलकर भगवान की पूजा करते हैं और आपसी संबंधों को मजबूत करते हैं।
स्वास्थ्य लाभ
आरती के दौरान बजाए जाने वाले घंटे और अन्य धार्मिक वाद्ययंत्रों की ध्वनि शारीरिक स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव डालती है। इन ध्वनियों से मानसिक तनाव कम होता है और शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।
समय की पाबंदी और अनुशासन
आरती के नियमित समय से करना भक्तों को समय की पाबंदी और अनुशासन का महत्व सिखाता है। यह दैनिक जीवन में अनुशासन बनाए रखने और समय प्रबंधन में सहायक होता है।
जीवन में सफलता और समृद्धि
भगवान श्रीराम और माता सीता की आरती से आशीर्वाद प्राप्त करना जीवन में सफलता और समृद्धि की ओर एक महत्वपूर्ण कदम होता है। भक्तों की इच्छाओं और आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए आरती को एक शक्तिशाली माध्यम माना जाता है।
कर्मों की शुद्धता और पापों का नाश
आरती के माध्यम से भक्त अपने पापों का प्रायश्चित करते हैं और अपने कर्मों की शुद्धता प्राप्त करते हैं। यह ईश्वर की कृपा प्राप्त करने का एक तरीका है, जो जीवन को पवित्र और शुद्ध बनाता है।
सकारात्मक सोच और मानसिक दृष्टिकोण
आरती करते समय भगवान की महिमा का गान और उनके प्रति समर्पण भक्तों के मानसिक दृष्टिकोण को सकारात्मक बनाता है। यह उन्हें जीवन की कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति और धैर्य प्रदान करता है।
सर्वभौम जीवन के लिए मार्गदर्शन
आरती करते समय भगवान से मार्गदर्शन प्राप्त करने की भावना होती है। यह भक्तों को जीवन के विभिन्न पहलुओं में सही निर्णय लेने में मदद करती है और उन्हें जीवन की दिशा और उद्देश्य को स्पष्ट करने में सहायक होती है।
श्री जानकीनाथ जी की आरती के लाभ विविध हैं और यह भक्तों के जीवन में सकारात्मक प्रभाव डालती है। यह आध्यात्मिक उन्नति, धार्मिकता में वृद्धि, मानसिक शांति, और सामुदायिक भावना को प्रबल करती है। इसके साथ ही, यह स्वास्थ्य लाभ, अनुशासन, सफलता, और पापों की शुद्धता में भी योगदान करती है। आरती का नियमित आयोजन और इस पर विश्वास भक्तों के जीवन को समृद्ध और सुखमय बना सकता है।