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पितृ स्तोत्र – Pitru Stotra PDF 2026

By Dr. Hemlata | Reviewed by Vedic Scholar | Last Updated: January 2026 - This devotional text has been carefully verified against widely accepted traditional sources to preserve correct wording, pronunciation, and spiritual intent for daily recitation.
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पितृ स्तोत्र (Pitru Stotra PDF) एक पवित्र वैदिक स्तुति है जो पितरों को समर्पित है। यह हमारे पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा का एक सशक्त माध्यम है। पितृ पक्ष या अमावस्या जैसे विशिष्ट समय पर इसके पाठ और जल-तर्पण का विधान है। इस स्तोत्र का मूल उद्देश्य पितृ ऋण से मुक्ति पाना तथा उनकी कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करना है, जिससे परिवार में शांति, समृद्धि और सुख-सौभाग्य बना रहे।

आधुनिक संदर्भ में, पितृ स्तोत्र केवल एक रीति नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक निरंतरता और पहचान का प्रतीक है। यह हमें हमारे मूल से जोड़ते हुए, विरासत के प्रति सम्मान और जिम्मेदारी का भाव जगाता है। इसका पाठ एक आध्यात्मिक सेतु का काम करता है, जो पीढ़ियों के बीच प्रेम और आशीर्वाद का अटूट संबंध बनाए रखता है। श्री नारायण कवच | वीर हनुमाना अति बलवाना भजन लिरिक्स | Shri Sai Chalisa Lyrics PDF | Hanuman Chalisa MP3 Download


  • हिंदी 
  • English

॥Pitru Stotra PDF ||
|| पितृ स्तोत्र ||

॥Pitra Stotra in Hindi Lyrics॥
(पितृ स्तोत्र पाठ)

अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम् ।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम् ॥

इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा ।
सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान् ॥

मन्वादीनां मुनीन्द्राणां सूर्याचन्द्रमसोस्तथा ।
तान् नमस्याम्यहं सर्वान् पितृनप्सूदधावपि ॥

नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।
द्यावापृथिवोव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलि: ॥

देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान् ।
अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येsहं कृताञ्जलि: ॥

प्रजापते: कश्यपाय सोमाय वरुणाय च ।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलि: ॥

नमो गणेभ्य: सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु ।
स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे ॥

सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा ।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम् ॥

अग्रिरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम् ।
अग्नीषोममयं विश्वं यत एतदशेषत: ॥

ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तय:।
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिण: ॥

तेभ्योsखिलेभ्यो योगिभ्य: पितृभ्यो यतमानस:।
नमो नमो नमस्ते मे प्रसीदन्तु स्वधाभुज: ॥
॥ इति पितृ स्त्रोत समाप्त ॥


|| Pitru Stotra in English PDF ||

Architanammurtanam Pitrunam Dipttejasam ।
Namasyami Sada Tesham Dhyaninam Divyachakshusham ॥

Indradinan Cha Leadero Dakshmarichiyostatha ।
Saptarishinam and Nyeshaam Tan Namasyami Kamdan ॥

Manvadinam Cha Netar: Suryachandamasostatha ।
Tan Namasyamah Sarvan Pitrunapyuddhavapi ॥

Nakshatranam Grahanam Cha Vayvagnyornbhastha ।
Dyvaprithivovyoscha and Namasyami Kritanjali ॥

Devarshinam Janitrishcha Sarvalokanamskritan ।
Akshayyasya Sada Datrun Namasyeham Kritanjali ॥

Prajapate: Kaspay Somay Varunaya Ch ।
Yogeshwarebhyascha Always Namasyami Kritanjali ॥

Namo Ganebhya: Saptabhyastatha Lokeshu Saptsu ।
Swayambhuve Namasyami Brahmane Yogachakshuse ॥

Somadharan Pitruganan Yogamurtidharanstatha ।
Namasyami and Soma Pitaram Jagtamham ॥

Agrirupanasthaivanyan Namasyami Pitrunaham ।
Agrishommay Vishwavyat Etdeshet ॥

Ye Tu Tejasi Ye Chaite Somasuryagrimurtaya ।
Jagatswarupinashchaiva and Brahmaswaroopina ॥

Tebhyokhilebhyo Yogibhya: Pitrubhyo Yatamanasah ।
Namo Namo Namastustu Prasidantu Swadhabhuj ॥

Pitru Stotra PDF

आध्यात्मिक एवं पैतृक लाभ:

  1. पितृ ऋण से मुक्ति: हिंदू धर्म के तीन मूल ऋणों में से एक पितृ ऋण को चुकाने का एक श्रेष्ठ साधन माना जाता है।
  2. पितरों की प्रसन्नता व आशीर्वाद: ऐसी मान्यता है कि इसके पाठ से पूर्वज प्रसन्न होते हैं और परिवार पर अपना आशीर्वाद-संरक्षण बनाए रखते हैं।
  3. पितृ दोष शांति: ज्योतिष में माने जाने वाले पितृ दोष (पूर्वजों की असंतुष्टि) को शांत करने में सहायक माना गया है, जिससे जीवन के अवरोध दूर हो सकते हैं।
  4. पूर्वजों की आत्मा की शांति: इससे पूर्वजों की आत्मा को शांति व उच्च लोक प्राप्त करने में सहायता मिलती है, जिससे वे सद्गति को प्राप्त होते हैं।

सांसारिक एवं व्यक्तिगत लाभ:

  1. कुल परंपरा की रक्षा: पारिवारिक उन्नति, समृद्धि और वंश की निरंतरता में सहायक माना जाता है।
  2. जीवन में सुख-शांति: पारिवारिक कलह दूर होती है, घर में सुख-शांति और सद्भाव का वातावरण बनता है।
  3. मानसिक शांति व आत्मिक संतुष्टि: पूर्वजों के प्रति कर्तव्य पूरा करने से व्यक्ति को गहरी मानसिक शांति और आत्मिक संतुष्टि प्राप्त होती है।
  4. विघ्नों का निवारण: जीवन में आने वाली अनावश्यक बाधाओं, रुकावटों और असफलताओं के निवारण में सहायक माना गया है।
  5. गृहस्थ जीवन में स्थिरता: संतान सुख, आरोग्य, धन-धान्य की प्राप्ति और गृहस्थ जीवन को सुचारु व स्थिर बनाए रखने में इसे लाभकारी माना जाता है।

1- अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम्।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।।

हिन्दी अर्थ – जो सबके द्वारा पूजा किये जाने योग्य, अमूर्त, अत्यन्त तेजस्वी, ध्यानी तथा दिव्यदृष्टि से पूर्ण रूप से सम्पन्न है। उन पितरों को मैं सदा प्रणाम करता हूं।

2- इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा।
सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान्।।

हिन्दी अर्थ– जो इन्द्र आदि समस्त देवताओं, दक्ष, मारीच, सप्तर्षियों तथा दूसरों के भी नेता है, हर मनोकामना की पूर्ति करने वाले उन पितरो को मैं प्रणाम करता हूं।

3- मन्वादीनां च नेतार: सूर्याचन्दमसोस्तथा।
तान् नमस्यामहं सर्वान् पितृनप्युदधावपि।।

हिन्दी अर्थ– जो मनु आदि राजर्षियों, मुनिश्वरों तथा सूर्य देव और चन्द्र देव के भी नायक है। उन समस्त पितरों को मैं जल और समुद्र में भी प्रणाम करता हूं।

4- नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।
द्यावापृथिवोव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलि:।।

हिन्दी अर्थ– नक्षत्रों, ग्रहों, वायु, अग्नि, आकाश और द्युलोक तथा पृथ्वी के भी जो नेता हैं, उन पितरों को मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूं। सदैव उनका आशीर्वाद मुझ पर बना रहे।

5- देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान्।
अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येहं कृताञ्जलि:।।

हिन्दी अर्थ– जो देवर्षियों के जन्मदाता, समस्त लोकों द्वारा वन्दित तथा सदा अक्षय फल को देने वाले हैं, उन पितरों को मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूं।

6- प्रजापते: कश्पाय सोमाय वरुणाय च।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलि:।।

हिन्दी अर्थ– प्रजापति, कश्यप, सोम, वरूण तथा योगेश्वरों के रूप में स्थित पितरों को सदा हाथ जोड़कर सदैव प्रणाम करता हूं।

7- नमो गणेभ्य: सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु।
स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे।।

हिन्दी अर्थ– सातों लोकों में स्थित सात पितृगणों को प्रणाम है। मैं योगदृष्टिसम्पन्न स्वयम्भू जगतपिता ब्रह्माजी को प्रणाम करता हूं। सदैव आपका आशीर्वाद मुझ पर बना रहे।

8- सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम्।।

हिन्दी अर्थ– चन्द्र देव के आधार पर प्रतिष्ठित तथा योगमूर्तिधारी पितृगणों को मैं प्रणाम करता हूं। साथ ही सम्पूर्ण जगत् के पिता सोम को प्रणाम करता हूं। सदैव उनका आशीर्वाद मुझ पर बना रहे।

9- अग्रिरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम्।
अग्रीषोममयं विश्वं यत एतदशेषत:।।

हिन्दी अर्थ– अग्निस्वरूप अन्य पितरों को मैं प्रणाम करता हूं, क्योंकि श्री पितर जी यह सम्पूर्ण जगत् अग्नि और सोममय है।उनका आशीर्वाद सदैव बना रहे।

10- ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्रिमूर्तय:।
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिण:।।

तेभ्योखिलेभ्यो योगिभ्य: पितृभ्यो यतामनस:।
नमो नमो नमस्तेस्तु प्रसीदन्तु स्वधाभुज।।

हिन्दी अर्थ– जो पितर तेज में स्थित हैं, जो ये चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं तथा जो जगत्स्वरूप एवं ब्रह्मस्वरूप हैं, उन सम्पूर्ण योगी पितरो को मैं एकाग्रचित्त होकर हर बार प्रणाम करता हूं। उन्हें बारम्बार प्रणाम है। वे स्वधाभोजी पितर मुझपर प्रसन्न हो उनका आशीर्वाद सदैव मुझ पर बना रहे।


1. पितृ स्त्रोत क्या है?

“पितृ स्त्रोत” शब्द “पितृ स्तोत्र” की एक सामान्य वर्तनी भूल है। स्त्रोत का अर्थ है ‘धारा’ या ‘प्रवाह’ (जैसे जल-स्त्रोत)। अतः पितृ स्त्रोत का शाब्दिक अर्थ “पितरों की धारा या वंश-प्रवाह” होगा। लेकिन प्रायः लोग पितृ स्तोत्र (पितरों की स्तुति) ही कहना चाहते हैं। यदि आपका आशय किसी विशिष्ट ग्रंथ या प्रवाह से है, तो स्पष्टता के लिए पितृ स्तोत्र शब्द का प्रयोग सही रहेगा।

2. पितरों के लिए कौन सा पाठ करना चाहिए?

पितरों के लिए सबसे प्रसिद्ध और प्रामाणिक पाठ है:
गरुड़ पुराण में वर्णित “पितृ स्तोत्र” – यह संपूर्ण स्तोत्र पितरों की शांति, तृप्ति और आशीर्वाद प्राप्ति के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।

अन्य विकल्प:
महालय पक्ष में “महालया तर्पण” के मंत्र।
श्राद्ध कर्म में वैदिक मंत्रों के साथ ब्रह्माण्ड पुराण के श्लोक।
सरल उपाय के रूप में “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” के साथ पितरों का स्मरण और जल अर्पण।

3. पितृ पीड़ा निवारण के लिए कौन सा स्तोत्र है?

पितृ पीड़ा (जैसे कुंडली में पितृ दोष, बार-बार बाधाएं, वंश संबंधी कठिनाइयाँ) के निवारण के लिए ये स्तोत्र विशेष रूप से प्रभावशाली माने गए हैं:
गरुड़ पुराण का पितृ स्तोत्र (विशेषतः अध्याय 11-12 के श्लोक)।
“नारायणबली” या “पितृबली” विधि में प्रयुक्त मंत्र।
भगवद्गीता के अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग) का पाठ।
साथ ही आवश्यक कर्म: केवल स्तोत्र पाठ के साथ-साथ नियमित तर्पण (जल अर्पण), पिंडदानब्राह्मण भोजन और कौओं को भोजन देना चाहिए।

4. पितृ तृप्ति के लिए कौन सा मंत्र है?

सर्वसाधारण मंत्र:
ॐ अस्य श्री विष्णोर्महापुरुषस्य श्री अच्युतानन्तगोविन्द नाम्नः।
अमुकगोत्राणां अमुकनाम्नां पितृभ्यः स्वधा नमः।
(अमुक के स्थान पर अपना गोत्र और पितर का नाम लें)

संक्षिप्त और अत्यंत प्रभावी मंत्र:
ॐ पितृभ्यः स्वधाभ्यः स्वधा नमः।
(सभी पितरों के लिए स्वधा- अर्पण, नमस्कार है।)

गायत्री मंत्र का पितृ रूप:
ॐ पितृगणाय विद्महे
जगतधारिणे धीमहि
तन्नः पितृः प्रचोदयात्।


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