Wednesday, January 28, 2026
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Aditya Hridaya Stotra PDF – सूर्य आदित्य हृदय स्तोत्रम 2024-25

सूर्य आदित्य हृदय स्तोत्रम (Aditya Hridaya Stotra) हिंदू धर्म में एक अत्यंत प्रभावशाली और पवित्र स्तोत्र है, जिसे विशेष रूप से भगवान सूर्य की आराधना के लिए पाठ किया जाता है। इसका उल्लेख प्रमुख रूप से रामायण के युद्ध कांड में मिलता है, जब भगवान राम रावण के साथ महायुद्ध में संलग्न होते हैं और उन्हें मार्गदर्शन देने के लिए ऋषि अगस्त्य भगवान सूर्य की उपासना का सुझाव देते हैं। यह स्तोत्र भगवान सूर्य को समर्पित है, जो जीवन, ऊर्जा, और प्रकाश के प्रतीक माने जाते हैं। आप हमारी वेबसाइट में हनुमान चालीसा और श्री हनुमान बजरंग बाण भी पढ़ सकते हैं।

‘आदित्य’ भगवान सूर्य का ही एक नाम है, जिसका अर्थ है अदिति का पुत्र। यह स्तोत्र इस तथ्य को उजागर करता है कि भगवान सूर्य न केवल संसार के जीवों को जीवनदायिनी ऊर्जा प्रदान करते हैं, बल्कि उनका हृदय प्रत्येक प्राणी के अंदर निवास करता है। यह प्रार्थना व्यक्ति के मन को स्थिरता, शांति और आत्मबल प्रदान करती है।

सूर्य उपासना का महत्व भारतीय संस्कृति में आदिकाल से रहा है। इसे स्वास्थ्य, शक्ति और सकारात्मकता के स्रोत के रूप में माना जाता है। आदित्य हृदय स्तोत्र का नियमित पाठ मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी माना जाता है। इसे विशेष रूप से तब पढ़ा जाता है जब व्यक्ति जीवन में किसी चुनौती का सामना कर रहा हो या जब आत्मविश्वास की कमी महसूस हो रही हो।

इस स्तोत्र में भगवान सूर्य को त्रैलोक्य के अधिपति, अजेय और समस्त संसार को गति प्रदान करने वाले के रूप में वर्णित किया गया है। इसे सुनने या पढ़ने मात्र से व्यक्ति को आंतरिक शांति, साहस और ऊर्जा की अनुभूति होती है।

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Aditya Hridaya Stotra in Hindi

॥ आदित्य हृदय स्तोत्रम् ॥

(विनियोग)

ॐ अस्य आदित्यह्रदय स्तोत्रस्य
अगस्त्यऋषि: अनुष्टुप्छन्दः आदित्यह्रदयभूतो।
भगवान् ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया
ब्रह्माविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः॥

ततो युद्धपरिश्रान्तंसमरे चिन्तया स्थितम्।
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वायुद्धाय समुपस्थितम्॥1॥

दैवतैश्च समागम्यद्रष्टुमभ्यागतो रणम्।
उपागम्याब्रवीद्राममगस्त्योभगवान् ऋषिः॥2॥

राम राम महाबाहोशृणु गुह्यं सनातनम्।
येन सर्वानरीन् वत्ससमरे विजयिष्यसि॥3॥

आदित्यहृदयं पुण्यंसर्वशत्रुविनाशनम्।
जयावहं जपेन्नित्यम्अक्षय्यं परमं शिवम्॥4॥

सर्वमङ्गलमाङ्गल्यंसर्वपापप्रणाशनम्।
चिन्ताशोकप्रशमनम्आयुर्वर्धनमुत्तमम्॥5॥

रश्मिमंतं समुद्यन्तंदेवासुरनमस्कृतम्।
पूजयस्व विवस्वन्तंभास्करं भुवनेश्वरम्॥6॥

सर्वदेवात्मको ह्येषतेजस्वी रश्मिभावनः।
एष देवासुरगणाँल्लोकान्पाति गभस्तिभिः॥7॥

एष ब्रह्मा च विष्णुश्चशिवः स्कन्दः प्रजापतिः।
महेन्द्रो धनदः कालोयमः सोमो ह्यपां पतिः॥8॥

पितरो वसवः साध्याह्यश्विनौ मरुतो मनुः।
वायुर्वह्निः प्रजाप्राणऋतुकर्ता प्रभाकरः॥9॥

आदित्यः सविता सूर्यःखगः पूषा गभस्तिमान्।
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेतादिवाकरः॥10॥

हरिदश्वः सहस्रार्चिःसप्तसप्तिर्मरीचिमान्।
तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टामार्ताण्ड अंशुमान्॥11॥

हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनोभास्करो रविः।
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रःशङ्खः शिशिरनाशनः॥12॥

व्योमनाथस्तमोभेदीऋग्यजुःसामपारगः।
घनवृष्टिरपां मित्रोविन्ध्यवीथीप्लवङ्गमः॥13॥

आतपी मण्डली मृत्युःपिङ्गलः सर्वतापनः।
कविर्विश्वो महातेजाःरक्तः सर्वभवोद्भवः॥14॥

नक्षत्रग्रहताराणामधिपोविश्वभावनः।
तेजसामपि तेजस्वीद्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते॥15॥

नमः पूर्वाय गिरयेपश्चिमायाद्रये नमः।
ज्योतिर्गणानां पतयेदिनाधिपतये नमः॥16॥

जयाय जयभद्रायहर्यश्वाय नमो नमः।
नमो नमः सहस्रांशोआदित्याय नमो नमः॥17॥

नम उग्राय वीरायसारङ्गाय नमो नमः।
नमः पद्मप्रबोधायमार्ताण्डाय नमो नमः॥18॥

ब्रह्मेशानाच्युतेशायसूर्यायादित्यवर्चसे।
भास्वते सर्वभक्षायरौद्राय वपुषे नमः॥19॥

तमोघ्नाय हिमघ्नायशत्रुघ्नायामितात्मने।
कृतघ्नघ्नाय देवायज्योतिषां पतये नमः॥20॥

तप्तचामीकराभायवह्नये विश्वकर्मणे।
नमस्तमोऽभिनिघ्नायरुचये लोकसाक्षिणे॥21॥

नाशयत्येष वै भूतंतदेव सृजति प्रभुः।
पायत्येष तपत्येषवर्षत्येष गभस्तिभिः॥22॥

एष सुप्तेषु जागर्तिभूतेषु परिनिष्ठितः।
एष एवाग्निहोत्रं चफलं चैवाग्निहोत्रिणाम्॥23॥

वेदाश्च क्रतवश्चैवक्रतूनां फलमेव च।
यानि कृत्यानि लोकेषुसर्व एष रविः प्रभुः॥24॥

एनमापत्सु कृच्छ्रेषुकान्तातेषु भयेषु च।
कीर्तयन् पुरुषःकश्चिन्नावसीदति राघव॥25॥

पूजयस्वैनमेकाग्रोदेवदेवं जगत्पतिम्।
एतत् त्रिगुणितं जप्त्वायुद्धेषु विजयिष्यसि॥26॥

अस्मिन् क्षणे महाबाहोरावणं त्वं वधिष्यसि।
एवमुक्त्वा तदागस्त्योजगाम च यथागतम्॥27॥

एतच्छ्रुत्वा महातेजानष्टशोकोऽभवत्तदा।
धारयामास सुप्रीतोराघवः प्रयतात्मवान्॥28॥

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वातु परं हर्षमवाप्तवान्।
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वाधनुरादाय वीर्यवान्॥29॥

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मायुद्धाय समुपागमत्।
सर्वयत्नेन महता वधेतस्य धृतोऽभवत्॥30॥

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामंमुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः।
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वासुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति॥31॥

॥ इति आदित्यहृदयम् मन्त्रस्य ॥

॥ Aditya Hridaya Stotram in English ॥

(Viniyoga)

Om Asya Adityahradaya Stotrasya
Agastyarishih Anushtupchhandah Aditya-hridayabhuto।
Bhagavan Brahma Devata Nirastasheshavighnataya
Brahmavidyasiddhau Sarvatra Jayasiddhau Cha Viniyogah॥

Tato YuddhaparishrantamSamare Chintaya Sthitam।
Ravanam Chagrato DrishtvaYuddhaya Samupasthitam॥1॥

Daivataishcha SamagamyaDrashtumabhyagato Ranam।
UpagamyabravidramamagastyoBhagavan Rishih॥2॥

Rama Rama MahabahoShrinu Guhyam Sanatanam।
Yena Sarvanarin VatsaSamare Vijayishyasi॥3॥

Adityahridayam PunyamSarvashatruvinashanam।
Jayavaham JapennityamAkshayyam Paramam Shivam॥4॥

SarvamangalamangalyamSarvapapapranashanam।
ChintashokaprashamanamAyurvardhanamuttamam॥5॥

Rashmimantam SamudyantamDevasuranamaskritam।
Pujayasva VivasvantamBhaskaram Bhuvaneshvaram॥6॥

Sarvadevatmako HyeshaTejasvi Rashmibhavanah।
Esha DevasuragananllokanPati Gabhastibhih॥7॥

Esha Brahma Cha VishnushchaShivah Skandah Prajapatih।
Mahendro Dhanadah KaloYamah Somo Hyapam Patih॥8॥

Pitaro Vasavah SadhyaHyashvinau Maruto Manuh।
Vayurvahnih PrajapranaRitukarta Prabhakarah॥9॥

Adityah Savita SuryahKhagah Pusha Gabhastiman।
Suvarnasadrisho BhanurhiranyaretaDivakarah॥10॥

Haridashvah SahasrarchihSaptasaptirmarichiman।
Timironmathanah ShambhustvashtaMartanda Anshuman॥11॥

Hiranyagarbhah ShishirastapanoBhaskaro Ravih।
Agnigarbhoaditeh PutrahShankhah Shishiranashanah॥12॥

VyomanathastamobhediRigyajuhsamaparagah।
Ghanavrishtirapam MitroVindhyavithiplavangamah॥13॥

Atapi Mandali MrityuhPingalah Sarvatapanah।
Kavirvishvo MahatejahRaktah Sarvabhavodbhavah॥14॥

NakshatragrahataranamadhipoVishvabhavanah।
Tejasamapi TejasviDvadashatman Namoastu Te॥15॥

Namah Purvaya GirayePashchimayadraye Namah।
Jyotirgananam PatayeDinadhipataye Namah॥16॥

Jayaya JayabhadrayaHaryashvaya Namo Namah।
Namo Namah SahasranshoAdityaya Namo Namah॥17॥

Nama Ugraya VirayaSarangaya Namo Namah।
Namah PadmaprabodhayaMartandaya Namo Namah॥18॥

BrahmeshanachyuteshayaSuryayadityavarchase।
Bhasvate SarvabhakshayaRaudraya Vapushe Namah॥19॥

Tamoghnaya HimaghnayaShatrughnayamitatmane।
Kritaghnaghnaya DevayaJyotisham Pataye Namah॥20॥

TaptachamikarabhayaVahnaye Vishvakarmane।
NamastamoabhinighnayaRuchaye Lokasakshine॥21॥

Nashayatyesha Vai BhutamTadeva Srijati Prabhuh।
Payatyesha TapatyeshaVarshatyesha Gabhastibhih॥22॥

Esha Supteshu JagartiBhuteshu Parinishthitah।
Esha Evagnihotram ChaPhalam Chaivagnihotrinam॥23॥

Vedashcha KratavashchaivaKratunam Phalameva Cha।
Yani Krityani LokeshuSarva Esha Ravih Prabhuh॥24॥

Enamapatsu KrichchhreshuKantateshu Bhayeshu Cha।
Kirtayan PurushahKashchinnavasidati Raghava॥25॥

PujayasvainamekagroDevadevam Jagatpatim।
Etat Trigunitam JaptvaYuddheshu Vijayishyasi॥26॥

Asmin Kshane MahabahoRavanam Tvam Vadhishyasi।
Evamuktva TadagastyoJagama Cha Yathagatam॥27॥

Etachchhrutva MahatejaNashtashokoabhavattada।
Dharayamasa SupritoRaghavah Prayatatmavan॥28॥

Adityam Prekshya JaptvaTu Param Harshamavaptavan।
Trirachamya ShuchirbhutvaDhanuradaya Viryavan॥29॥

Ravanam Prekshya HrishtatmaYuddhaya Samupagamat।
Sarvayatnena Mahata VadheTasya Dhritoabhavat॥30॥

Atha Raviravadannirikshya RamamMuditamanah Paramam Prahrishyamanah।
Nishicharapatisankshayam ViditvaSuraganamadhyagato Vachastvareti॥31॥

॥ Iti Adityahridayam Mantrasya ॥



सूर्य आदित्य हृदय स्तोत्रम का भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में अत्यधिक महत्व है। यह स्तोत्र भगवान सूर्य की आराधना और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए अत्यंत प्रभावी माना जाता है। इसका महत्व निम्नलिखित कारणों से है:

  1. आध्यात्मिक बल और आत्मविश्वास:
    आदित्य हृदय स्तोत्रम व्यक्ति को मानसिक शांति, आत्मविश्वास और धैर्य प्रदान करता है। यह स्तोत्र भगवान सूर्य की शक्ति को स्वीकारते हुए व्यक्ति को मानसिक रूप से मजबूत और स्थिर बनाता है।
  2. स्वास्थ्य लाभ:
    भगवान सूर्य को स्वास्थ्य और ऊर्जा का स्रोत माना जाता है। नियमित रूप से आदित्य हृदय स्तोत्रम का पाठ करने से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। इसे पढ़ने से थकान, तनाव, और अवसाद जैसे मानसिक विकारों से राहत मिलती है। इसके साथ ही, यह स्तोत्र रोगों से मुक्ति पाने और दीर्घायु प्राप्त करने में भी सहायक है।
  3. बाधाओं का निवारण:
    आदित्य हृदय स्तोत्रम जीवन की कठिनाइयों और चुनौतियों से निपटने के लिए अद्वितीय साधन है। इसे पढ़ने से व्यक्ति को जीवन की बाधाओं, विघ्नों और संकटों से छुटकारा मिलता है। भगवान सूर्य के आशीर्वाद से व्यक्ति के जीवन में आने वाली नकारात्मकता दूर होती है और सकारात्मकता का संचार होता है।
  4. धार्मिक और पौराणिक महत्व:
    इस स्तोत्र का उल्लेख रामायण में भी मिलता है, जब ऋषि अगस्त्य भगवान राम को युद्ध के दौरान इस स्तोत्र का पाठ करने का सुझाव देते हैं। यह बताता है कि भगवान सूर्य की उपासना से अजेय बल और विजय प्राप्त की जा सकती है।
  5. धन, यश, और समृद्धि:
    भगवान सूर्य की आराधना व्यक्ति के जीवन में समृद्धि, यश, और सुख का संचार करती है। आदित्य हृदय स्तोत्रम का नियमित पाठ जीवन में सफलता और उन्नति प्राप्त करने का माध्यम है। इसे पढ़ने से भगवान सूर्य की कृपा से व्यक्ति के कार्य सफल होते हैं और जीवन में तरक्की होती है।
  6. ज्ञान और बुद्धि का विकास:
    सूर्य को ज्ञान और प्रकाश का प्रतीक माना जाता है। आदित्य हृदय स्तोत्रम का पाठ व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता और निर्णय लेने की शक्ति को बढ़ाता है। यह ध्यान और एकाग्रता को भी सुधारता है, जिससे व्यक्ति के कार्यों में दक्षता आती है।

इस प्रकार, आदित्य हृदय स्तोत्रम न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह व्यक्ति के जीवन के हर पहलू में सुधार लाने में सहायक होता है।


1. श्री आदित्य सूर्य मंत्र क्या है?

श्री आदित्य सूर्य मंत्र भगवान सूर्य की उपासना के लिए एक शक्तिशाली मंत्र है। इसका उच्चारण व्यक्ति को ऊर्जा, शक्ति और मानसिक स्थिरता प्रदान करता है। यह मंत्र भगवान सूर्य को प्रसन्न करने और जीवन में सकारात्मकता लाने के उद्देश्य से किया जाता है। इस मंत्र का प्रमुख हिस्सा आदित्य हृदय स्तोत्रम है, जिसमें भगवान सूर्य की महिमा का वर्णन किया गया है।

2. आदित्य हृदय स्तोत्र कब से शुरू करें?

आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ किसी भी शुभ दिन से शुरू किया जा सकता है, लेकिन रविवार, जो कि भगवान सूर्य का दिन है, विशेष रूप से उत्तम माना जाता है। इसे सूर्योदय के समय पढ़ना सबसे प्रभावकारी माना गया है, जब सूर्य की पहली किरणें व्यक्ति पर पड़ती हैं।

3. आदित्य हृदयम का प्रतिदिन जाप करने से क्या लाभ होता है?

आदित्य हृदयम का प्रतिदिन जाप करने से व्यक्ति को मानसिक शांति, आत्मविश्वास, और साहस प्राप्त होता है। यह शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को सुधारने, रोगों से मुक्ति, और ऊर्जा में वृद्धि के लिए अत्यंत लाभकारी माना जाता है। साथ ही, यह व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव और बाधाओं से मुक्ति दिलाता है।

4. आदित्य हृदयम का जप कितनी बार करना चाहिए?

आदित्य हृदयम का पाठ प्रतिदिन कम से कम 3 बार करने की सलाह दी जाती है। यदि समय कम हो तो 1 बार का पाठ भी किया जा सकता है। विशेष इच्छाओं की पूर्ति के लिए 11, 21 या 108 बार पाठ करना भी शुभ माना जाता है।

5. स्तोत्र का पाठ कब करें?

आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ सूर्योदय के समय करना सर्वोत्तम है, जब सूर्य की किरणें नई ऊर्जा प्रदान करती हैं। यदि संभव न हो तो इसे दिन में किसी भी समय किया जा सकता है, लेकिन सूर्योदय और सूर्यास्त के समय इसका विशेष प्रभाव माना जाता है।

6. जप करने के बाद क्या करना चाहिए?

आदित्य हृदयम का जप करने के बाद भगवान सूर्य को जल अर्पण करना चाहिए, जिसे सूर्य अर्घ्य कहा जाता है। इसके बाद मन ही मन भगवान से अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करें और सकारात्मक सोच के साथ अपने कार्यों को आगे बढ़ाएं।


Shri Durga Kavach Lyrics PDF – श्री दुर्गा देवी कवच हिंदी 2024 -25

दुर्गा कवच (Durga Kavach Lyrics) मार्कंडेय पुराण का एक शक्तिशाली भजन है, जिसे देवी दुर्गा के आशीर्वाद और सुरक्षा के लिए पढ़ा जाता है। माना जाता है कि यह पवित्र भजन भक्तों के लिए एक अभेद्य कवच का काम करता है, जो उन्हें नकारात्मक ऊर्जाओं, बाधाओं और प्रतिकूलताओं से बचाता है। दुर्गा कवच का जाप करके, व्यक्ति माँ दुर्गा की दिव्य कृपा प्राप्त करता है, जिन्हें शक्ति, साहस और करुणा के अवतार के रूप में सम्मानित किया जाता है। छंद देवी के विभिन्न रूपों और उनके सुरक्षात्मक पहलुओं का वर्णन करते हैं, जो इसे दुर्गा सप्तशती के पाठ का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाते हैं।

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Durga Kavach in Hindi

॥अथ श्री देव्याः कवचम्॥

ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः,
चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्,
श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।

ॐ नमश्चण्डिकायै।

॥मार्कण्डेय उवाच॥

ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्।
यन्न कस्य चिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥1॥

॥ब्रह्मोवाच॥

अस्ति गुह्यतमं विप्रा सर्वभूतोपकारकम्।
दिव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्वा महामुने॥2॥

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥3॥

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥4॥

नवमं सिद्धिदात्री च नव दुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥5॥

अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥6॥

न तेषां जायते किञ्चिदशुभं रणसङ्कटे।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न ही॥7॥

यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥8॥

प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।
ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना॥9॥

माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना।
लक्ष्मी: पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥10॥

श्वेतरूपधारा देवी ईश्वरी वृषवाहना।
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता॥ 11॥

इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः।
नानाभरणशोभाढया नानारत्नोपशोभिता:॥ 12॥

दृश्यन्ते रथमारूढा देव्याः क्रोधसमाकुला:।
शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥13॥

खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥ 14॥

दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।
धारयन्त्यायुद्धानीथं देवानां च हिताय वै॥ 15॥

नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥16॥

त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्रि आग्नेय्यामग्निदेवता॥ 17॥

दक्षिणेऽवतु वाराही नैऋत्यां खङ्गधारिणी।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥ 18॥

उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणी में रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा॥ 19॥

एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहाना।
जाया मे चाग्रतः पातु: विजया पातु पृष्ठतः॥ 20॥

अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता।
शिखामुद्योतिनि रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥21॥

मालाधारी ललाटे च भ्रुवो रक्षेद् यशस्विनी।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥ 22॥

शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शङ्करी ॥ 23॥

नासिकायां सुगन्‍धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥ 24॥

दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका।
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥ 25॥

कामाक्षी चिबुकं रक्षेद्‍ वाचं मे सर्वमङ्गला।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धारी॥ 26॥

नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी।
स्कन्धयोः खङ्गिनी रक्षेद्‍ बाहू मे वज्रधारिणी॥27॥

हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चान्गुलीषु च।
नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥28॥

स्तनौ रक्षेन्‍महादेवी मनः शोकविनाशिनी।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥ 29॥

नाभौ च कामिनी रक्षेद्‍ गुह्यं गुह्येश्वरी तथा।
पूतना कामिका मेढ्रं गुडे महिषवाहिनी॥30॥

कट्यां भगवतीं रक्षेज्जानूनी विन्ध्यवासिनी।
जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी॥31॥

गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।
पादाङ्गुलीषु श्रीरक्षेत्पादाध:स्तलवासिनी॥32॥

नखान् दंष्ट्रा कराली च केशांशचैवोर्ध्वकेशिनी।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥33॥

रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती।
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥ 34 ॥

पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसन्धिषु॥35 ॥

शुक्रं ब्रह्माणी मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा।
अहङ्कारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥36॥

प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥37॥

रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।
सत्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥38॥

आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥39 ॥

गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।
पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥40॥

पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥ 41 ॥

रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।
तत्सर्वं रक्ष मे देवी जयन्ती पापनाशिनी॥42 ॥

पदमेकं न गच्छेतु यदिच्छेच्छुभमात्मनः।
कवचेनावृतो नित्यं यात्र यत्रैव गच्छति॥43 ॥

तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सर्वकामिकः।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम् ॥44॥

परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्
निर्भयो जायते मर्त्यः सङ्ग्रमेष्वपराजितः।॥45॥

त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्
इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम्। ॥46॥

य: पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः॥47॥

जीवेद् वर्षशतं साग्रामपमृत्युविवर्जितः
नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः॥ 48॥

स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्
अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले॥49॥

भूचराः खेचराशचैव जलजाश्चोपदेशिकाः
सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा। ॥ 50॥

अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबला
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसा:॥ 51॥

ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते। ॥ 52॥

मानोन्नतिर्भावेद्राज्यं तेजोवृद्धिकरं परम्
यशसा वद्धते सोऽपी कीर्तिमण्डितभूतले ॥ 53 ॥

जपेत्सप्तशतीं चणण्डीं कृत्वा तु कवचं पूरा
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्। ॥54॥

तावत्तिष्ठति मेदिनयां सन्ततिः पुत्रपौत्रिकी |
देहान्ते परमं स्थानं यात्सुरैरपि दुर्लभम्। ॥55 ॥

प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः
लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते ॥ॐ॥ ॥ 56॥

।। इति देव्या: कवचं सम्पूर्णम् ।।

Durga Kavach Lyrics in English

Oṃ Namaścaṇḍikāyai

Om Asya Srichandikavachasya Brahma Rishi, Anushtup Chhandah, Chamunda Devta, Anganyasoktamaro Beejam, Digbandhadevatastatvam, Shrijagadambaprityarthe Saptasatipathangatven Jape Viniyoga.

Oṃ Namaścaṇḍikāyai

| Mārkaṇḍeya Uvāca |
Oṃ Yadguhyaṃ Paramaṃ Loke Sarvarakṣākaraṃ Nṛṇām |
Yanna Kasyacidākhyātaṃ Tanme Brūhi Pitāmaha || 1 ||

| Brahmovāca |
Asti Guhyatamaṃ Vipra Sarvabhūtopakārakam |
Devyāstu Kavacaṃ Puṇyaṃ Tacchṛṇuṣva Mahāmune || 2 ||

Prathamaṃ Śailaputrī Ca Dvitīyaṃ Brahmacāriṇī |
Tṛtīyaṃ Candraghaṇṭeti Kūṣmāṇḍeti Caturthakam || 3 ||

Pañcamaṃ Skandamāteti Ṣaṣṭhaṃ Kātyāyanīti Ca |
Saptamaṃ Kālarātrīti Mahāgaurīti Cāṣṭamam || 4 ||

Navamaṃ Siddhidātrī Ca Navadurgāḥ Prakīrtitāḥ |
Uktānyetāni Nāmāni Brahmaṇaiva Mahātmanā || 5 ||

Agninā Dahyamānastu Śatrumadhye Gato Raṇe |
Viṣame Durgame Caiva Bhayārtāḥ Śaraṇaṃ Gatāḥ || 6 ||

Na Teṣāṃ Jāyate Kiñcidaśubhaṃ Raṇasaṅkaṭe |
Nāpadaṃ Tasya Paśyāmi Śokaduḥkhabhayaṃ Na Hi || 7 ||

Yaistu Bhaktyā Smṛtā Nūnaṃ Teṣāṃ Vṛddhiḥ Prajāyate |
Ye Tvāṃ Smaranti Deveśi Rakṣase Tānnasaṃśayaḥ || 8 ||

Pretasaṃsthā Tu Cāmuṇḍā Vārāhī Mahiṣāsanā |
Aindrī Gajasamārūḍhā Vaiṣṇavī Garuḍāsanā || 9 ||

Māheśvarī Vṛṣārūḍhā Kaumārī Śikhivāhanā |
Lakṣmīḥ Padmāsanā Devī Padmahastā Haripriyā || 10 ||

Śvetarūpadharā Devī Īśvarī Vṛṣavāhanā |
Brāhmī Haṃsasamārūḍhā Sarvābharaṇabhūṣitā || 11 ||

Ityetā Mātaraḥ Sarvāḥ Sarvayogasamanvitāḥ |
Nānābharaṇāśobhāḍhyā Nānāratnopaśobhitāḥ || 12 ||

Dṛśyante Rathamārūḍhā Devyaḥ Krodhasamākulāḥ |
Śaṅkhaṃ Cakraṃ Gadāṃ Śaktiṃ Halaṃ Ca Musalāyudham || 13 ||

Kheṭakaṃ Tomaraṃ Caiva Paraśuṃ Pāśameva Ca |
Kuntāyudhaṃ Triśūlaṃ Ca Śārṅgamāyudhamuttamam || 14 ||

Daityānāṃ Dehanāśāya Bhaktānāmabhayāya Ca |
Dhārayantyāyudhānītthaṃ Devānāṃ Ca Hitāya Vai || 15 ||

Namaste‌உstu Mahāraudre Mahāghoraparākrame |
Mahābale Mahotsāhe Mahābhayavināśini || 16 ||

Trāhi Māṃ Devi Duṣprekṣye Śatrūṇāṃ Bhayavardhini |
Prācyāṃ Rakṣatu Māmaindrī Āgneyyāmagnidevatā || 17 ||

Dakṣiṇe‌உvatu Vārāhī Nairṛtyāṃ Khaḍgadhāriṇī |
Pratīcyāṃ Vāruṇī Rakṣedvāyavyāṃ Mṛgavāhinī || 18 ||

Udīcyāṃ Pātu Kaumārī Aiśānyāṃ Śūladhāriṇī |
Ūrdhvaṃ Brahmāṇī Me Rakṣedadhastādvaiṣṇavī Tathā || 19 ||

Evaṃ Daśa Diśo Rakṣeccāmuṇḍā Śavavāhanā |
Jayā Me Cāgrataḥ Pātu Vijayā Pātu Pṛṣṭhataḥ || 20 ||

Ajitā Vāmapārśve Tu Dakṣiṇe Cāparājitā |
Śikhāmudyotinī Rakṣedumā Mūrdhni Vyavasthitā || 21 ||

Mālādharī Lalāṭe Ca Bhruvau Rakṣedyaśasvinī |
Trinetrā Ca Bhruvormadhye Yamaghaṇṭā Ca Nāsike || 22 ||

Śaṅkhinī Cakṣuṣormadhye Śrotrayordvāravāsinī |
Kapolau Kālikā Rakṣetkarṇamūle Tu Śāṅkarī || 23 ||

Nāsikāyāṃ Sugandhā Ca Uttaroṣṭhe Ca Carcikā |
Adhare Cāmṛtakalā Jihvāyāṃ Ca Sarasvatī || 24 ||

Dantān Rakṣatu Kaumārī Kaṇṭhadeśe Tu Caṇḍikā |
Ghaṇṭikāṃ Citraghaṇṭā Ca Mahāmāyā Ca Tāluke || 25 ||

Kāmākṣī Cibukaṃ Rakṣedvācaṃ Me Sarvamaṅgaḷā |
Grīvāyāṃ Bhadrakāḷī Ca Pṛṣṭhavaṃśe Dhanurdharī || 26 ||

Nīlagrīvā Bahiḥ Kaṇṭhe Nalikāṃ Nalakūbarī |
Skandhayoḥ Khaḍginī Rakṣedbāhū Me Vajradhāriṇī || 27 ||

Hastayordaṇḍinī Rakṣedambikā Cāṅgulīṣu Ca |
Nakhāñchūleśvarī Rakṣetkukṣau Rakṣetkuleśvarī || 28 ||

Stanau Rakṣenmahādevī Manaḥśokavināśinī |
Hṛdaye Lalitā Devī Udare Śūladhāriṇī || 29 ||

Nābhau Ca Kāminī Rakṣedguhyaṃ Guhyeśvarī Tathā |
Pūtanā Kāmikā Meḍhraṃ Gude Mahiṣavāhinī || 30 ||

Kaṭyāṃ Bhagavatī Rakṣejjānunī Vindhyavāsinī |
Jaṅghe Mahābalā Rakṣetsarvakāmapradāyinī || 31 ||

Gulphayornārasiṃhī Ca Pādapṛṣṭhe Tu Taijasī |
Pādāṅgulīṣu Śrī Rakṣetpādādhastalavāsinī || 32 ||

Nakhān Daṃṣṭrakarālī Ca Keśāṃścaivordhvakeśinī |
Romakūpeṣu Kauberī Tvacaṃ Vāgīśvarī Tathā || 33 ||

Raktamajjāvasāmāṃsānyasthimedāṃsi Pārvatī |
Antrāṇi Kālarātriśca Pittaṃ Ca Mukuṭeśvarī || 34 ||

Padmāvatī Padmakośe Kaphe Cūḍāmaṇistathā |
Jvālāmukhī Nakhajvālāmabhedyā Sarvasandhiṣu || 35 ||

Śukraṃ Brahmāṇi! Me Rakṣecchāyāṃ Chatreśvarī Tathā |
Ahaṅkāraṃ Mano Buddhiṃ Rakṣenme Dharmadhāriṇī || 36 ||

Prāṇāpānau Tathā Vyānamudānaṃ Ca Samānakam |
Vajrahastā Ca Me Rakṣetprāṇaṃ Kalyāṇaśobhanā || 37 ||

Rase Rūpe Ca Gandhe Ca Śabde Sparśe Ca Yoginī |
Sattvaṃ Rajastamaścaiva Rakṣennārāyaṇī Sadā || 38 ||

Āyū Rakṣatu Vārāhī Dharmaṃ Rakṣatu Vaiṣṇavī |
Yaśaḥ Kīrtiṃ Ca Lakṣmīṃ Ca Dhanaṃ Vidyāṃ Ca Cakriṇī || 39 ||

Gotramindrāṇi! Me Rakṣetpaśūnme Rakṣa Caṇḍike |
Putrān Rakṣenmahālakṣmīrbhāryāṃ Rakṣatu Bhairavī || 40 ||

Panthānaṃ Supathā Rakṣenmārgaṃ Kṣemakarī Tathā |
Rājadvāre Mahālakṣmīrvijayā Sarvataḥ Sthitā || 41 ||

Rakṣāhīnaṃ Tu Yat-Sthānaṃ Varjitaṃ Kavacena Tu |
Tatsarvaṃ Rakṣa Me Devi! Jayantī Pāpanāśinī || 42 ||

Padamekaṃ Na Gacchettu Yadīcchecchubhamātmanaḥ |
Kavacenāvṛto Nityaṃ Yatra Yatraiva Gacchati || 43 ||

Tatra Tatrārthalābhaśca Vijayaḥ Sārvakāmikaḥ |
Yaṃ Yaṃ Cintayate Kāmaṃ Taṃ Taṃ Prāpnoti Niścitam || 44 ||

Paramaiśvaryamatulaṃ Prāpsyate Bhūtale Pumān |
Nirbhayo Jāyate Martyaḥ Saṅgrāmeṣvaparājitaḥ || 45 ||

Trailokye Tu Bhavetpūjyaḥ Kavacenāvṛtaḥ Pumān |
Idaṃ Tu Devyāḥ Kavacaṃ Devānāmapi Durlabham || 46 ||

Yaḥ Paṭhetprayato Nityaṃ Trisandhyaṃ Śraddhayānvitaḥ |
Daivīkalā Bhavettasya Trailokyeṣvaparājitaḥ | 47 ||

Jīvedvarṣaśataṃ Sāgramapamṛtyuvivarjitaḥ |
Naśyanti Vyādhayaḥ Sarve Lūtāvisphoṭakādayaḥ || 48 ||

Sthāvaraṃ Jaṅgamaṃ Caiva Kṛtrimaṃ Caiva Yadviṣam |
Abhicārāṇi Sarvāṇi Mantrayantrāṇi Bhūtale || 49 ||

Bhūcarāḥ Khecarāścaiva Julajāścopadeśikāḥ |
Sahajā Kulajā Mālā Ḍākinī Śākinī Tathā || 50 ||

Antarikṣacarā Ghorā Ḍākinyaśca Mahābalāḥ |
Grahabhūtapiśācāśca Yakṣagandharvarākṣasāḥ || 51 ||

Brahmarākṣasavetālāḥ Kūṣmāṇḍā Bhairavādayaḥ |
Naśyanti Darśanāttasya Kavace Hṛdi Saṃsthite || 52 ||

Mānonnatirbhavedrāṅñastejovṛddhikaraṃ Param |
Yaśasā Vardhate So‌உpi Kīrtimaṇḍitabhūtale || 53 ||

Japetsaptaśatīṃ Caṇḍīṃ Kṛtvā Tu Kavacaṃ Purā |
Yāvadbhūmaṇḍalaṃ Dhatte Saśailavanakānanam || 54 ||

Tāvattiṣṭhati Medinyāṃ Santatiḥ Putrapautrikī |
Dehānte Paramaṃ Sthānaṃ Yatsurairapi Durlabham || 55 ||

Prāpnoti Puruṣo Nityaṃ Mahāmāyāprasādataḥ |
Labhate Paramaṃ Rūpaṃ Śivena Saha Modate || 56 ||

|| Iti Vārāhapurāṇe Hariharabrahma Viracitaṃ Devyāḥ Kavacaṃ Sampūrṇam ||



दुर्गा कवच का महत्व (Importance of Durga Kavach)

मां दुर्गा की कृपा (Blessings of Goddess Durga)
दुर्गा कवच का नियमित रूप से जाप या प्रयोग करने से भक्त मां दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त करते हैं। यह कवच जीवन में आने वाली कठिनाइयों और समस्याओं से बचाव करता है, जिससे व्यक्ति मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ और सुरक्षित महसूस करता है। मां दुर्गा की कृपा से भक्त हर विपत्ति का सामना साहस और धैर्य के साथ करने में सक्षम होते हैं।

भयहीनता
दुर्गा कवच को धारण करने से व्यक्ति के मन से भय दूर होता है। यह कवच नकारात्मक ऊर्जा और बुरी शक्तियों से रक्षा करता है, जिससे व्यक्ति निडर होकर अपने जीवन को जी सकता है। इसका पाठ या जप करने से मानसिक शांति प्राप्त होती है और जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में चुनौतियों का सामना करने की शक्ति मिलती है।

आत्मविश्वास
दुर्गा कवच का नियमित रूप से उच्चारण व्यक्ति के आत्मविश्वास को बढ़ाता है। यह कवच मानसिक शक्ति और साहस प्रदान करता है, जिससे व्यक्ति को अपने कार्यों में सफलता प्राप्त होती है। इसका प्रभाव सकारात्मक सोच और संकल्प को मजबूती देता है, जिससे कठिनाइयों का सामना करना आसान हो जाता है और जीवन के हर क्षेत्र में उन्नति होती है।

दुर्गा कवच का उपयोग (Usage of Durga Kavach)

पूजा और ध्यान
दुर्गा कवच का पाठ या जप पूजा और ध्यान के समय किया जाता है। इसे ध्यान के साथ करने से भक्त की आत्मा शुद्ध होती है और वह मां दुर्गा के दिव्य आशीर्वाद और शक्ति का अनुभव करता है। यह एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है जो भक्त और देवी के बीच एक गहरे संवाद को जन्म देती है, जिससे भक्त को मां दुर्गा की कृपा का अहसास होता है और मन को शांति मिलती है।

सुरक्षा का आभास
दुर्गा कवच का नियमित पाठ व्यक्ति को एक सुरक्षा कवच का आभास कराता है। इसका उच्चारण करने से न केवल बाहरी खतरों से सुरक्षा मिलती है, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक रूप से भी व्यक्ति स्वयं को सुरक्षित महसूस करता है। इस कवच का प्रभाव व्यक्ति के मनोबल को बढ़ाता है और उसे यह विश्वास दिलाता है कि वह हर कठिनाई से सुरक्षित है।

आत्म-विकास
दुर्गा कवच आत्मिक विकास का एक सशक्त साधन है। इसका नियमित उपयोग व्यक्ति की आत्मा को जाग्रत करता है और उसे आध्यात्मिक दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। यह व्यक्ति के अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है, जिससे वह जीवन के हर क्षेत्र में आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर सकता है। साथ ही, यह ध्यान और साधना के माध्यम से व्यक्ति को अपने भीतर की दिव्यता को पहचानने में मदद करता है।

दुर्गा कवच के लाभ (Benefits of Durga Kavach)

मानसिक शांति
दुर्गा कवच का नियमित रूप से पाठ या जप करने से मानसिक शांति मिलती है। यह नकारात्मक विचारों और तनाव को दूर करने में सहायक होता है, जिससे मन को स्थिरता और संतुलन प्राप्त होता है। व्यक्ति के मन में शांति और संतोष का भाव जाग्रत होता है, जिससे उसकी आत्मा को सांत्वना और सुकून मिलता है।

शारीरिक स्वास्थ्य
दुर्गा कवच का पाठ या ध्यान केवल मानसिक लाभ ही नहीं देता, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य में भी सुधार लाता है। इसे नियमित रूप से करने से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जो रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ावा देती है और व्यक्ति को स्वस्थ एवं ऊर्जा से भरपूर बनाती है।

संतान सुख
दुर्गा कवच का प्रयोग संतान प्राप्ति और संतान के कल्याण के लिए भी किया जाता है। इसका पाठ करने से मां दुर्गा की कृपा से संतान सुख की प्राप्ति होती है। जो लोग संतान प्राप्ति की कामना रखते हैं, उनके लिए यह कवच अत्यंत लाभकारी माना जाता है। यह वंश वृद्धि और संतान की सुख-शांति में सहायक होता है।

कैसे प्रयोग करें (How to Use Durga Kavach)

पूजा और ध्यान
दुर्गा कवच का प्रभाव तब और बढ़ जाता है जब इसे पूजा और ध्यान के साथ किया जाता है। इसे अपने दैनिक पूजा अनुष्ठान का हिस्सा बनाने से मन और आत्मा का विकास होता है। पूजा के समय दुर्गा कवच का पाठ करने से मां दुर्गा के साथ एकाग्रता बढ़ती है, और भक्त उनके दिव्य स्वरूप से जुड़ाव महसूस करता है। इससे आंतरिक शांति और आध्यात्मिक उत्थान प्राप्त होता है।

मंत्र जाप
दुर्गा कवच के साथ यदि मंत्रों का जाप किया जाए, तो उसकी शक्ति और प्रभाव में अत्यधिक वृद्धि होती है। दुर्गा कवच के मंत्रों का उच्चारण सही ढंग से और शुद्ध भाव से करने पर मां दुर्गा की कृपा जल्दी प्राप्त होती है। इससे व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं, और हर क्षेत्र में सफलता और समृद्धि प्राप्त होती है।


1. दुर्गा कवच कैसे पढ़ना चाहिए?

दुर्गा कवच का पाठ करने से पहले भक्त को शुद्ध और शांत वातावरण में बैठना चाहिए। सुबह या शाम का समय सबसे उत्तम माना जाता है। पाठ से पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थान पर दीपक जलाएं। मां दुर्गा की मूर्ति या चित्र के सामने आसन लगाकर ध्यान करें। दुर्गा कवच का पाठ करते समय अपने मन और हृदय को मां दुर्गा की कृपा और शक्तियों से जोड़ने का प्रयास करें। उच्चारण स्पष्ट और भावपूर्ण होना चाहिए, जिससे मां दुर्गा की कृपा शीघ्र प्राप्त हो सके। दुर्गा कवच का पाठ कम से कम 9 दिनों तक नियमित रूप से करना चाहिए, विशेष रूप से नवरात्रि के समय इसका महत्व और बढ़ जाता है। पाठ के बाद मां दुर्गा की आरती और प्रार्थना करें, जिससे दिन भर की ऊर्जा और सुरक्षा प्राप्त होती है। नियमित रूप से पाठ करने से मन शांत, आत्मविश्वास बढ़ता है, और जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं।

2. प्रतिदिन दुर्गा माता के कवच का पाठ करने से क्या फायदा होता है?

प्रतिदिन दुर्गा माता के कवच का पाठ करने से भक्त को मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं। यह कवच व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और उसे नकारात्मक शक्तियों और बुराइयों से सुरक्षा प्रदान करता है। इसका नियमित पाठ करने से मन को शांति मिलती है, जिससे तनाव और चिंता दूर होती है। आत्मविश्वास और साहस में वृद्धि होती है, जो व्यक्ति को जीवन की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम बनाता है। इसके अलावा, यह कवच शारीरिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है, जिससे व्यक्ति की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। दुर्गा कवच का नियमित अभ्यास जीवन में सफलता और समृद्धि को भी आकर्षित करता है। मां दुर्गा की कृपा से व्यक्ति का मन और आत्मा दोनों शुद्ध होते हैं, जिससे आध्यात्मिक उन्नति और आंतरिक शांति प्राप्त होती है।

क्या चंडी कवच ​​और दुर्गा कवच एक ही है?

चंडी कवच ​​और दुर्गा कवच दोनों शक्तिशाली मंत्रों का संग्रह हैं, लेकिन ये एक नहीं हैं। चंडी कवच देवी चंडी या मां चामुंडा की स्तुति में है, जो मां दुर्गा के उग्र रूपों में से एक हैं। यह कवच अधिकतर “दुर्गा सप्तशती” के अंग के रूप में आता है और विशेष रूप से चंडी यज्ञ या पूजा में पढ़ा जाता है। चंडी कवच का पाठ विशेष रूप से बुरी शक्तियों, नकारात्मक ऊर्जा और शत्रुओं से रक्षा के लिए किया जाता है। दूसरी ओर, दुर्गा कवच सामान्य रूप से मां दुर्गा के सभी रूपों की स्तुति करता है और दैनिक पूजा या ध्यान के दौरान किया जाता है। यह कवच सुरक्षा, शांति, और आशीर्वाद के लिए किया जाता है। हालांकि दोनों कवच मां दुर्गा की कृपा और शक्ति प्राप्त करने का साधन हैं, उनका उपयोग और उद्देश्य भिन्न होते हैं। भक्त अपनी आवश्यकता और परिस्थिति के अनुसार दोनों में से किसी का भी पाठ कर सकते हैं।

दुर्गा कवच कितना शक्तिशाली है?

दुर्गा कवच को अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है क्योंकि यह भक्त को मां दुर्गा की कृपा और सुरक्षा प्रदान करता है। इसका नियमित रूप से पाठ करने से भक्त मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक सुरक्षा प्राप्त करता है। यह कवच व्यक्ति को नकारात्मक ऊर्जा, बुरी शक्तियों, और जीवन की बाधाओं से बचाने में सहायक होता है। इसका प्रभाव इतना गहरा है कि यह न केवल व्यक्तिगत सुरक्षा बल्कि परिवार और प्रियजनों की भी रक्षा करता है। दुर्गा कवच का पाठ आत्मविश्वास और साहस को बढ़ाता है, जिससे व्यक्ति जीवन की चुनौतियों का सामना निडर होकर कर सकता है। इसके साथ ही, यह कवच भक्त की आंतरिक शांति और मानसिक स्थिरता को बढ़ावा देता है, जिससे तनाव और चिंता दूर होती है। दुर्गा कवच मां दुर्गा के सभी रूपों की स्तुति करता है, इसलिए इसे नवरात्रि के समय विशेष रूप से पाठ करना अत्यधिक फलदायी माना जाता है। यह भक्त को समृद्धि, शांति, और सफलता प्रदान करने में भी सहायक होता है।

5. दुर्गा जी का शक्तिशाली मंत्र कौन सा है?

मां दुर्गा के कई मंत्र अत्यंत शक्तिशाली माने जाते हैं, लेकिन “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” मंत्र को सबसे प्रभावी माना जाता है। यह मंत्र मां दुर्गा के उग्र और शक्ति से भरे रूप को संबोधित करता है, जिसमें भक्त नकारात्मक शक्तियों, शत्रुओं और बुरी आत्माओं से सुरक्षा के लिए प्रार्थना करते हैं। यह मंत्र न केवल सुरक्षा प्रदान करता है, बल्कि भक्त के अंदर शक्ति, साहस, और आत्मविश्वास को जाग्रत करता है। इस मंत्र का जप भक्त को आध्यात्मिक उत्थान और आंतरिक शांति की ओर अग्रसर करता है। इसे सुबह-शाम श्रद्धा और विश्वास के साथ जपना चाहिए। इसके नियमित जाप से जीवन में सुख-समृद्धि, सफलता, और मां दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है। इस मंत्र का विशेष रूप से नवरात्रि और चंडी पाठ के दौरान जप किया जाता है, जब मां दुर्गा की विशेष कृपा और शक्तियां सक्रिय होती हैं।

श्री गौरीनंदन की आरती – Gouri Nandan Ki Aarti: Om Jai Gauri Nandan 2024-25

श्री गौरीनंदन की आरती (Gouri Nandan Ki Aarti) हिंदू धर्म में गणेश जी की पूजा का विशेष महत्व है। उन्हें विघ्नहर्ता, बुद्धि और समृद्धि के देवता के रूप में पूजा जाता है। गणेश चतुर्थी के समय या किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले गणेश जी की आरती गाना अनिवार्य माना जाता है। ‘श्री गौरीनंदन की आरती‘ गणेश जी की स्तुति में गाई जाने वाली प्रमुख आरतियों में से एक है। इसे गाते समय भक्तों के मन में एक विशेष भक्ति और श्रद्धा उत्पन्न होती है। श्री गणेश चालीसा | संकट मोचन हनुमान अष्टक का पाठ इस लिंक पर देखें|

गणेश जी का जन्म पर्व, जिसे गणेश चतुर्थी कहते हैं, भाद्रपद महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने घरों और मंदिरों में गणेश जी की मूर्तियाँ स्थापित करते हैं और नौ दिनों तक उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। आरती के दौरान भगवान गणेश की मूर्ति के सामने दीप जलाकर उन्हें पुष्प, अक्षत, दूर्वा और मोदक का भोग अर्पित किया जाता है।

श्री गौरीनंदन की आरती‘ का पाठ करते समय मन को एकाग्रचित्त रखना बहुत जरूरी है। इस आरती के शब्द भगवान गणेश की महिमा और उनके अद्वितीय स्वरूप का वर्णन करते हैं। आरती के समय बजाए जाने वाले ढोलक, मंजीरा और शंख की ध्वनि वातावरण को और भी पवित्र बना देती है। भक्तजनों के द्वारा समवेत स्वर में गाई जाने वाली यह आरती वातावरण में एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।

‘ओम जय गौरीनंदन’ की शुरुआत में गणेश जी के विभिन्न नामों का उल्लेख किया गया है। इसमें गणेश जी को गजमुख, एकदंत, लम्बोदर, विकट और विघ्ननाशक के रूप में स्तुति की जाती है। यह आरती यह भी दर्शाती है कि गणेश जी अपने भक्तों के समस्त कष्टों को हरने वाले और उन्हें सफलता और समृद्धि प्रदान करने वाले हैं।

गणेश जी की आरती गाने से मन को शांति मिलती है और जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। भक्तगण इस आरती को गाकर अपने मन की इच्छाओं को गणेश जी के चरणों में अर्पित करते हैं। यह आरती एक साधारण गीत नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना है जो मन, वचन और कर्म को शुद्ध करती है।

कई लोग आरती के दौरान गणेश जी की विभिन्न कथाओं का भी स्मरण करते हैं, जैसे कि उनकी उत्पत्ति, उनके गजमुख बनने की कथा, और उनकी विवाह कथा। यह कथाएँ हमें जीवन के महत्वपूर्ण पाठ सिखाती हैं, जैसे कि विनम्रता, समर्पण और भक्ति।

श्री गौरीनंदन की आरती‘ का महत्व न केवल धार्मिक, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी बहुत बड़ा है। यह आरती हमारी सांस्कृतिक धरोहर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह न केवल हमें गणेश जी की महिमा का बोध कराती है, बल्कि हमारे पारंपरिक और सांस्कृतिक मूल्यों को भी जीवित रखती है।

गणेश चतुर्थी के पर्व पर या किसी भी शुभ अवसर पर ‘श्री गौरीनंदन की आरती’ का गायन हमारे जीवन में खुशियाँ, समृद्धि और शांति लाता है। यह आरती भगवान गणेश की कृपा प्राप्त करने का एक सशक्त माध्यम है। इसलिए, हर भक्त को इस आरती का पाठ नियमित रूप से करना चाहिए और भगवान गणेश की असीम कृपा का अनुभव करना चाहिए।



  • हिंदी / संस्कृत
  • English

|| श्री गौरीनंदन की आरती ||

ओम जय गौरी नन्दन, प्रभु जय गौरी नंदन
गणपति विघ्न निकंदन, मंगल नि:स्पन्दन
ओम जय गौरी नन्दन प्रभु जय गौरी नंदन

ऋषि सिद्धियाँ जिनके, नित ही चवर करे
करिवर मुख सुखकारक, गणपति विध्न हरे
ओम जय गौरी नन्दन प्रभु जय गौरी नंदन

देवगणो मे पहले तव पूजा होती
तव मुख छवि भक्तो के दुख दारिद खोती
ओम जय गौरी नन्दन प्रभु जय गौरी नंदन

गुड का भोग लगत है कर मोदक सोहे
ऋषि सीद्धि सह शोभित, त्रिभुवन मन मोहै
ओम जय गौरी नन्दन प्रभु जय गौरी नंदन

लंबोदर भय हारी, भक्तो के त्राता
मातु भक्त हो तुम्ही, वांछित फल दाता
ओम जय गौरी नन्दन प्रभु जय गौरी नंदन

मूषक वाहन राजत कनक छत्रधारी
ओम जय गौरी नन्दन प्रभु जय गौरी नंदन
विघ्नारन्येदवानल, शुभ मंगलकारी
ओम जय गौरी नन्दन प्रभु जय गौरी नंदन

धरणीधर कृत आरती गणपति की गावे
सुख सम्पत्ति युत होकर वह वांछित पावे
ओम जय गौरी नन्दन प्रभु जय गौरी नंदन

|| Gauri Nandan Ki Aarti ||

Om jai gauri nandan, Prabhu jai gauri nandan
Ganapati vigna nikandan, Mangal nihspandan
Om jai gauri nandan Prabhu jai gauri nandan

Rishi siddhiyan jinke, Nit hi chavar kare
Karivar mukh sukhakarak, Ganapati vidhn hare
Om jai gauri nandan Prabhu jai gauri nandan

Devagano me pahle tava puja hoti
Tava mukh chhavi bhakto ke dukh daridh khoti
Om jai gauri nandan Prabhu jai gauri nandan

Gud ka bhog lagat hai kar modak sohe
Rishi siddhi sah shobhit, Tribhuvan man moh
Om jai gauri nandan Prabhu jai gauri nandan

Lambodar bhay hari, Bhakto ke trarta
Mantu bhakt ho tumhi, Vanchit phal data
Om jai gauri nandan Prabhu jai gauri nandan

Mushak vahan rajat kanak chatradhari
Om jai gauri nandan Prabhu jai gauri nandan
Vighnaranyedavanal, Shubh mangalkari
Om jai gauri nandan Prabhu jai gauri nandan

Dharanidhar krit aarti ganapati ki gave
Sukh sampatti yut hokar vah vanchit pave
Om jai gauri nandan Prabhu jai gauri nandan


श्री गौरीनंदन की आरती के लाभ

हिंदू धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य देवता के रूप में मान्यता प्राप्त है। उनकी पूजा-अर्चना से सभी विघ्न और बाधाओं का नाश होता है और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। गणेश जी की आरती, विशेष रूप से ‘श्री गौरीनंदन की आरती’, न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक लाभ भी प्रदान करती है। इस लेख में, हम श्री गौरीनंदन की आरती के विभिन्न लाभों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

मानसिक शांति और एकाग्रता

श्री गौरीनंदन की आरती का नियमित रूप से गायन करने से मन को शांति मिलती है। आरती के समय भगवान गणेश के दिव्य नामों का उच्चारण और भक्ति भरे गीतों का गायन मन को एकाग्र करता है। यह मानसिक शांति और स्थिरता प्रदान करता है, जिससे दैनिक जीवन की चिंताओं और तनावों से राहत मिलती है।

नकारात्मक ऊर्जा का नाश

श्री गौरीनंदन की आरती गाने से आसपास की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाती है। आरती के समय की जाने वाली ध्वनियाँ, जैसे शंख, घंटी और मंजीरा की ध्वनि, वातावरण को पवित्र और सकारात्मक ऊर्जा से भर देती हैं। यह नकारात्मक शक्तियों को दूर भगाती है और घर में सुख-शांति बनाए रखती है।

आध्यात्मिक उन्नति

आरती गाना एक आध्यात्मिक साधना है। गणेश जी की आरती से आत्मा को शुद्धि मिलती है और आध्यात्मिक जागरूकता बढ़ती है। आरती के दौरान की जाने वाली प्रार्थनाएँ और भक्ति भाव आत्मा को उन्नत करते हैं और भगवान के प्रति समर्पण की भावना को प्रबल करते हैं।

समृद्धि और सफलता

गणेश जी को समृद्धि और बुद्धि के देवता माना जाता है। श्री गौरीनंदन की आरती गाने से जीवन में सफलता और समृद्धि प्राप्त होती है। वे सभी प्रकार के विघ्नों को दूर करते हैं और भक्तों को सफलता की ओर अग्रसर करते हैं। इसलिए, कोई भी नया कार्य आरंभ करने से पहले गणेश जी की आरती गाना शुभ माना जाता है।

परिवार में सुख-शांति

श्री गौरीनंदन की आरती परिवार में सुख-शांति और समृद्धि लाती है। आरती के समय परिवार के सभी सदस्य एकत्रित होकर भक्ति भाव से गणेश जी की पूजा करते हैं, जिससे पारिवारिक संबंध मजबूत होते हैं और परिवार में प्रेम और सद्भावना बढ़ती है।

सकारात्मक सोच

श्री गौरीनंदन की आरती गाने से सकारात्मक सोच का विकास होता है। आरती के भक्ति भाव से मन में सकारात्मक विचार आते हैं और व्यक्ति की सोचने की क्षमता में सुधार होता है। यह जीवन की विभिन्न चुनौतियों का सामना करने में सहायता करता है और व्यक्ति को मानसिक रूप से मजबूत बनाता है।

रोगों से मुक्ति

आरती के दौरान की जाने वाली ध्वनियाँ और मंत्रोच्चारण का स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है कि श्री गौरीनंदन की आरती के समय की जाने वाली ध्वनियाँ शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती हैं और विभिन्न रोगों से मुक्ति दिलाने में सहायता करती हैं।

बुद्धि और विवेक का विकास

गणेश जी को बुद्धि और विवेक का देवता माना जाता है। श्री गौरीनंदन की आरती गाने से बुद्धि का विकास होता है और व्यक्ति के विवेक में सुधार होता है। यह विशेष रूप से विद्यार्थियों के लिए लाभदायक है, जो अपने अध्ययन में एकाग्रता और सफलता प्राप्त करने के लिए गणेश जी की आरती का गायन करते हैं।

आंतरिक शक्ति का विकास

गणेश जी की आरती गाने से आंतरिक शक्ति का विकास होता है। यह आत्मविश्वास और आत्मबल को बढ़ाता है। आरती के दौरान भगवान गणेश की दिव्यता का अनुभव करने से व्यक्ति के भीतर आत्मिक शक्ति और साहस का संचार होता है।

भक्ति और समर्पण की भावना

आरती गाने से भक्ति और समर्पण की भावना प्रबल होती है। गणेश जी की आरती गाने से भक्तों का भगवान के प्रति समर्पण बढ़ता है और भक्ति मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। यह भगवान के प्रति विश्वास और श्रद्धा को और मजबूत करता है।

कर्मों की शुद्धि

आरती गाने से व्यक्ति के कर्म शुद्ध होते हैं। भगवान गणेश की आरती करने से व्यक्ति के बुरे कर्मों का नाश होता है और उसे अच्छे कर्म करने की प्रेरणा मिलती है। यह जीवन को सही दिशा में ले जाने में मदद करता है और व्यक्ति को धार्मिक और नैतिक रूप से उन्नत बनाता है।

समाज में सद्भावना

गणेश जी की आरती का सामूहिक गायन समाज में सद्भावना और एकता को बढ़ावा देता है। जब लोग एक साथ मिलकर आरती गाते हैं, तो उनके बीच प्रेम और सहयोग की भावना विकसित होती है। यह सामाजिक समरसता और सामुदायिक भावना को प्रबल करता है।

जीवन में संतुलन

गणेश जी की आरती गाने से जीवन में संतुलन बनता है। आरती के भक्ति भाव से व्यक्ति के मन, शरीर और आत्मा में संतुलन स्थापित होता है। यह जीवन की विभिन्न चुनौतियों का सामना करने में सहायता करता है और व्यक्ति को मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ बनाता है।

श्रद्धा और विश्वास

गणेश जी की आरती गाने से भगवान के प्रति श्रद्धा और विश्वास बढ़ता है। आरती के दौरान भगवान गणेश की दिव्य महिमा का अनुभव करने से व्यक्ति का विश्वास और श्रद्धा और गहरा होता है। यह जीवन में विश्वास और धर्म की भावना को मजबूत करता है।

आशीर्वाद की प्राप्ति

गणेश जी की आरती गाने से भगवान गणेश का आशीर्वाद प्राप्त होता है। आरती के दौरान भगवान गणेश की पूजा और स्तुति करने से वे अपने भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं और उनके जीवन में सुख-समृद्धि, शांति और सफलता का वरदान देते हैं।

श्री गौरीनंदन की आरती गाने के अनेक लाभ हैं जो हमारे जीवन को सकारात्मक दिशा में ले जाते हैं। यह न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक लाभ भी प्रदान करती है। भगवान गणेश की आरती गाने से हम अपने जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार होते हैं और हमें मानसिक शांति, समृद्धि और सुख-शांति की प्राप्ति होती है। इसलिए, हर भक्त को नियमित रूप से गणेश जी की आरती गाने का प्रयास करना चाहिए और भगवान गणेश की असीम कृपा का अनुभव करना चाहिए।

“गौरी नंदन की आरती” क्या है?

“गौरी नंदन की आरती” एक धार्मिक भजन है जो भगवान गणेश (गौरी नंदन) की पूजा और आराधना के दौरान गाया जाता है। इसमें भगवान गणेश की महिमा, उनके गुण और भक्तों पर उनकी कृपा का वर्णन किया जाता है। यह आरती विशेष रूप से गणेश चतुर्थी और अन्य गणेश उत्सवों के दौरान गाई जाती है।

“गौरी नंदन की आरती” के बोल क्या हैं?

“गौरी नंदन की आरती” के बोल भगवान गणेश की स्तुति और उनकी आराधना के बारे में होते हैं। आरती के बोल सुनने या पढ़ने के लिए आप धार्मिक संगीत वेबसाइट्स, भजन संग्रह, या यूट्यूब पर इसका वीडियो देख सकते हैं। इसके बोल भगवान गणेश की विशेषताओं और भक्तों पर उनकी कृपा का वर्णन करते हैं।

“गौरी नंदन की आरती” को कौन गाता है?

“गौरी नंदन की आरती” को विभिन्न भजन गायक गाते हैं। प्रसिद्ध भजन गायकों की आवाज़ में यह आरती सुनी जा सकती है। भजन के वीडियो विवरण या धार्मिक संगीत एल्बम में गायक का नाम उल्लेखित होता है, जिससे आप विशेष गायक की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

“गौरी नंदन की आरती” का उद्देश्य क्या है?

“गौरी नंदन की आरती” का उद्देश्य भगवान गणेश की पूजा और आराधना करना है। इस आरती के माध्यम से भक्त भगवान गणेश को अपनी श्रद्धा और प्रेम अर्पित करते हैं और उनकी कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं।

इस आरती को गाने का सही समय क्या है?

“गौरी नंदन की आरती” को पूजा, गणेश चतुर्थी, और अन्य गणेश उत्सवों के दौरान गाया जाता है। यह आरती विशेष रूप से सुबह और शाम की पूजा के दौरान गाई जाती है, जब भक्त भगवान गणेश की आराधना करते हैं।

“गौरी नंदन की आरती” की कोई विशेष सांगीतिक या लिरिकल विशेषताएँ क्या हैं?

हाँ, “गौरी नंदन की आरती” की सांगीतिक विशेषताएँ इसकी मधुर धुन और भावपूर्ण लिरिक्स हैं। इस आरती की धुन भक्तों को भगवान गणेश के प्रति गहरी श्रद्धा और भक्ति का अहसास कराती है। इसके लिरिक्स भगवान गणेश की विशेषताओं और उनके भक्तों पर कृपा का वर्णन करते हैं।

क्या “गौरी नंदन की आरती” का कोई लिखित रूप उपलब्ध है?

हाँ, “गौरी नंदन की आरती” का लिखित रूप धार्मिक पुस्तकों, भजन संग्रहों, और विभिन्न वेबसाइट्स पर उपलब्ध हो सकता है। आप इसे भक्ति साहित्य, धार्मिक पुस्तकालय, या ऑनलाइन भजन संग्रह से प्राप्त कर सकते हैं।

Hanuman Bahuk PDF – हनुमान बाहुक हिन्दी लिखित PDF 2024-25

हनुमान बाहुक (Hanuman Bahuk) भगवान हनुमान की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और शक्तिशाली प्रार्थना है, जिसे गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा था। भगवान हनुमान, जिन्हें भगवान राम का सबसे बड़ा भक्त माना जाता है, शास्त्रों के अनुसार देवी सीता के आशीर्वाद से अमर हैं। कहा जाता है कि जब भी हनुमान चालीसा, रामचरित मानस, या रामायण का पाठ किया जाता है, भगवान हनुमान वहां अवश्य उपस्थित होते हैं।

तुलसीदास जी ने हनुमान बाहुक तब लिखा जब वे असहनीय हाथ के दर्द से पीड़ित थे और कोई भी इलाज उन्हें राहत नहीं दे रहा था। तब उन्होंने भगवान हनुमान की प्रार्थना करते हुए इस काव्य की रचना की और उनकी कृपा से उन्हें तुरंत राहत मिली।

हनुमान बाहुक में कुल 44 छंद हैं, और इसे लगातार 40 दिनों तक पढ़ने से माना जाता है कि मानसिक और शारीरिक कष्टों से मुक्ति मिलती है और जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। तुलसीदास जी की कहानी इस बात का प्रमाण है कि भगवान हनुमान अपने भक्तों के हर दुख को हरने में सक्षम हैं, बस शर्त यह है कि भक्त को अपने कर्मों के प्रति ईमानदार रहना चाहिए और किसी भी तरह के बुरे कार्यों से दूर रहना चाहिए।

Chalisa PDF पर पढ़े: संकट मोचन हनुमान अष्टक | श्री हनुमान अमृतवाणी | बजरंग बाण | हनुमान चालीसा पढ़ने के 21 चमत्कारिक फायदे | हनुमान जी की आरती


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Hanuman Bahuk Ka Paath

श्रीगणेशाय नमः
श्रीजानकीवल्लभो विजयते
श्रीमद्-गोस्वामी-तुलसीदास-कृत



छप्पय

सिंधु-तरन, सिय-सोच-हरन, रबि-बाल-बरन तनु ।
भुज बिसाल, मूरति कराल कालहुको काल जनु ।।
गहन-दहन-निरदहन लंक निःसंक, बंक-भुव ।
जातुधान-बलवान-मान-मद-दवन पवनसुव ।।
कह तुलसिदास सेवत सुलभ सेवक हित सन्तत निकट ।
गुन-गनत, नमत, सुमिरत, जपत समन सकल-संकट-विकट ।।१।।

स्वर्न-सैल-संकास कोटि-रबि-तरुन-तेज-घन ।
उर बिसाल भुज-दंड चंड नख-बज्र बज्र-तन ।।
पिंग नयन, भृकुटी कराल रसना दसनानन ।
कपिस केस, करकस लँगूर, खल-दल बल भानन ।।
कह तुलसिदास बस जासु उर मारुतसुत मूरति बिकट ।
संताप पाप तेहि पुरुष पहिं सपनेहुँ नहिं आवत निकट ।।२।।

झूलना

पंचमुख-छमुख-भृगु मुख्य भट असुर सुर, सर्व-सरि-समर समरत्थ सूरो ।
बाँकुरो बीर बिरुदैत बिरुदावली, बेद बंदी बदत पैजपूरो ।।
जासु गुनगाथ रघुनाथ कह, जासुबल, बिपुल-जल-भरित जग-जलधि झूरो ।
दुवन-दल-दमनको कौन तुलसीस है, पवन को पूत रजपूत रुरो ।।३।।

घनाक्षरी

भानुसों पढ़न हनुमान गये भानु मन-अनुमानि सिसु-केलि कियो फेरफार सो ।
पाछिले पगनि गम गगन मगन-मन, क्रम को न भ्रम, कपि बालक बिहार सो ।।
कौतुक बिलोकि लोकपाल हरि हर बिधि, लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खभार सो।
बल कैंधौं बीर-रस धीरज कै, साहस कै, तुलसी सरीर धरे सबनि को सार सो ।।४।।

भारत में पारथ के रथ केथू कपिराज, गाज्यो सुनि कुरुराज दल हल बल भो ।
कह्यो द्रोन भीषम समीर सुत महाबीर, बीर-रस-बारि-निधि जाको बल जल भो ।।
बानर सुभाय बाल केलि भूमि भानु लागि, फलँग फलाँग हूँतें घाटि नभतल भो ।
नाई-नाई माथ जोरि-जोरि हाथ जोधा जोहैं, हनुमान देखे जगजीवन को फल भो ।।५

गो-पद पयोधि करि होलिका ज्यों लाई लंक, निपट निसंक परपुर गलबल भो ।
द्रोन-सो पहार लियो ख्याल ही उखारि कर, कंदुक-ज्यों कपि खेल बेल कैसो फल भो ।।
संकट समाज असमंजस भो रामराज, काज जुग पूगनि को करतल पल भो ।
साहसी समत्थ तुलसी को नाह जाकी बाँह, लोकपाल पालन को फिर थिर थल भो ।।६

कमठ की पीठि जाके गोडनि की गाड़ैं मानो, नाप के भाजन भरि जल निधि जल भो ।
जातुधान-दावन परावन को दुर्ग भयो, महामीन बास तिमि तोमनि को थल भो ।।
कुम्भकरन-रावन पयोद-नाद-ईंधन को, तुलसी प्रताप जाको प्रबल अनल भो ।
भीषम कहत मेरे अनुमान हनुमान, सारिखो त्रिकाल न त्रिलोक महाबल भो ।।७

दूत रामराय को, सपूत पूत पौनको, तू अंजनी को नन्दन प्रताप भूरि भानु सो ।
सीय-सोच-समन, दुरित दोष दमन, सरन आये अवन, लखन प्रिय प्रान सो ।।
दसमुख दुसह दरिद्र दरिबे को भयो, प्रकट तिलोक ओक तुलसी निधान सो ।
ज्ञान गुनवान बलवान सेवा सावधान, साहेब सुजान उर आनु हनुमान सो ।।८

दवन-दुवन-दल भुवन-बिदित बल, बेद जस गावत बिबुध बंदीछोर को ।
पाप-ताप-तिमिर तुहिन-विघटन-पटु, सेवक-सरोरुह सुखद भानु भोर को ।।
लोक-परलोक तें बिसोक सपने न सोक, तुलसी के हिये है भरोसो एक ओर को ।
राम को दुलारो दास बामदेव को निवास, नाम कलि-कामतरु केसरी-किसोर को ।।९।।

महाबल-सीम महाभीम महाबान इत, महाबीर बिदित बरायो रघुबीर को ।
कुलिस-कठोर तनु जोरपरै रोर रन, करुना-कलित मन धारमिक धीर को ।।
दुर्जन को कालसो कराल पाल सज्जन को, सुमिरे हरनहार तुलसी की पीर को ।
सीय-सुख-दायक दुलारो रघुनायक को, सेवक सहायक है साहसी समीर को ।।१०।।

रचिबे को बिधि जैसे, पालिबे को हरि, हर मीच मारिबे को, ज्याईबे को सुधापान भो ।
धरिबे को धरनि, तरनि तम दलिबे को, सोखिबे कृसानु, पोषिबे को हिम-भानु भो ।।
खल-दुःख दोषिबे को, जन-परितोषिबे को, माँगिबो मलीनता को मोदक सुदान भो ।
आरत की आरति निवारिबे को तिहुँ पुर, तुलसी को साहेब हठीलो हनुमान भो ।।११।।

सेवक स्योकाई जानि जानकीस मानै कानि, सानुकूल सूलपानि नवै नाथ नाँक को ।
देवी देव दानव दयावने ह्वै जोरैं हाथ, बापुरे बराक कहा और राजा राँक को ।।
जागत सोवत बैठे बागत बिनोद मोद, ताके जो अनर्थ सो समर्थ एक आँक को ।
सब दिन रुरो परै पूरो जहाँ-तहाँ ताहि, जाके है भरोसो हिये हनुमान हाँक को ।।१२।।

सानुग सगौरि सानुकूल सूलपानि ताहि, लोकपाल सकल लखन राम जानकी ।
लोक परलोक को बिसोक सो तिलोक ताहि, तुलसी तमाइ कहा काहू बीर आनकी ।।
केसरी किसोर बन्दीछोर के नेवाजे सब, कीरति बिमल कपि करुनानिधान की ।
बालक-ज्यों पालिहैं कृपालु मुनि सिद्ध ताको, जाके हिये हुलसति हाँक हनुमान की ।।१३।।

करुनानिधान, बलबुद्धि के निधान मोद-महिमा निधान, गुन-ज्ञान के निधान हौ ।
बामदेव-रुप भूप राम के सनेही, नाम लेत-देत अर्थ धर्म काम निरबान हौ ।।
आपने प्रभाव सीताराम के सुभाव सील, लोक-बेद-बिधि के बिदूष हनुमान हौ ।
मन की बचन की करम की तिहूँ प्रकार, तुलसी तिहारो तुम साहेब सुजान हौ ।।१४।।

मन को अगम, तन सुगम किये कपीस, काज महाराज के समाज साज साजे हैं ।
देव-बंदी छोर रनरोर केसरी किसोर, जुग जुग जग तेरे बिरद बिराजे हैं ।
बीर बरजोर, घटि जोर तुलसी की ओर, सुनि सकुचाने साधु खल गन गाजे हैं ।
बिगरी सँवार अंजनी कुमार कीजे मोहिं, जैसे होत आये हनुमान के निवाजे हैं ।।१५।।

सवैया

जान सिरोमनि हौ हनुमान सदा जन के मन बास तिहारो ।
ढ़ारो बिगारो मैं काको कहा केहि कारन खीझत हौं तो तिहारो ।।
साहेब सेवक नाते तो हातो कियो सो तहाँ तुलसी को न चारो ।
दोष सुनाये तें आगेहुँ को होशियार ह्वैं हों मन तौ हिय हारो ।।१६।।

तेरे थपे उथपै न महेस, थपै थिरको कपि जे घर घाले ।
तेरे निवाजे गरीब निवाज बिराजत बैरिन के उर साले ।।
संकट सोच सबै तुलसी लिये नाम फटै मकरी के से जाले ।
बूढ़ भये, बलि, मेरिहि बार, कि हारि परे बहुतै नत पाले ।।१७।।

सिंधु तरे, बड़े बीर दले खल, जारे हैं लंक से बंक मवा से ।
तैं रनि-केहरि केहरि के बिदले अरि-कुंजर छैल छवा से ।।
तोसों समत्थ सुसाहेब सेई सहै तुलसी दुख दोष दवा से ।
बानर बाज ! बढ़े खल-खेचर, लीजत क्यों न लपेटि लवा-से ।।१८।।

अच्छ-विमर्दन कानन-भानि दसानन आनन भा न निहारो ।
बारिदनाद अकंपन कुंभकरन्न-से कुंजर केहरि-बारो ।।
राम-प्रताप-हुतासन, कच्छ, बिपच्छ, समीर समीर-दुलारो ।
पाप-तें साप-तें ताप तिहूँ-तें सदा तुलसी कहँ सो रखवारो ।।१९।।

घनाक्षरी

जानत जहान हनुमान को निवाज्यौ जन, मन अनुमानि बलि, बोल न बिसारिये ।
सेवा-जोग तुलसी कबहुँ कहा चूक परी, साहेब सुभाव कपि साहिबी सँभारिये ।।
अपराधी जानि कीजै सासति सहस भाँति, मोदक मरै जो ताहि माहुर न मारिये ।
साहसी समीर के दुलारे रघुबीर जू के, बाँह पीर महाबीर बेगि ही निवारिये ।।२०।।

बालक बिलोकि, बलि बारेतें आपनो कियो, दीनबन्धु दया कीन्हीं निरुपाधि न्यारिये ।
रावरो भरोसो तुलसी के, रावरोई बल, आस रावरीयै दास रावरो बिचारिये ।।
बड़ो बिकराल कलि, काको न बिहाल कियो, माथे पगु बलि को, निहारि सो निवारिये ।
केसरी किसोर, रनरोर, बरजोर बीर, बाँहुपीर राहुमातु ज्यौं पछारि मारिये ।।२१।।

उथपे थपनथिर थपे उथपनहार, केसरी कुमार बल आपनो सँभारिये ।
राम के गुलामनि को कामतरु रामदूत, मोसे दीन दूबरे को तकिया तिहारिये ।।
साहेब समर्थ तोसों तुलसी के माथे पर, सोऊ अपराध बिनु बीर, बाँधि मारिये ।
पोखरी बिसाल बाँहु, बलि, बारिचर पीर, मकरी ज्यौं पकरि कै बदन बिदारिये ।।२२।।

राम को सनेह, राम साहस लखन सिय, राम की भगति, सोच संकट निवारिये ।
मुद-मरकट रोग-बारिनिधि हेरि हारे, जीव-जामवंत को भरोसो तेरो भारिये ।।
कूदिये कृपाल तुलसी सुप्रेम-पब्बयतें, सुथल सुबेल भालू बैठि कै बिचारिये ।
महाबीर बाँकुरे बराकी बाँह-पीर क्यों न, लंकिनी ज्यों लात-घात ही मरोरि मारिये ।।२३।।

लोक-परलोकहुँ तिलोक न बिलोकियत, तोसे समरथ चष चारिहूँ निहारिये ।
कर्म, काल, लोकपाल, अग-जग जीवजाल, नाथ हाथ सब निज महिमा बिचारिये ।।
खास दास रावरो, निवास तेरो तासु उर, तुलसी सो देव दुखी देखियत भारिये ।
बात तरुमूल बाँहुसूल कपिकच्छु-बेलि, उपजी सकेलि कपिकेलि ही उखारिये ।।२४।।

करम-कराल-कंस भूमिपाल के भरोसे, बकी बकभगिनी काहू तें कहा डरैगी ।
बड़ी बिकराल बाल घातिनी न जात कहि, बाँहूबल बालक छबीले छोटे छरैगी ।।
आई है बनाइ बेष आप ही बिचारि देख, पाप जाय सबको गुनी के पाले परैगी ।
पूतना पिसाचिनी ज्यौं कपिकान्ह तुलसी की, बाँहपीर महाबीर तेरे मारे मरैगी ।।२५।।

भालकी कि कालकी कि रोष की त्रिदोष की है, बेदन बिषम पाप ताप छल छाँह की ।
करमन कूट की कि जन्त्र मन्त्र बूट की, पराहि जाहि पापिनी मलीन मन माँह की ।।
पैहहि सजाय, नत कहत बजाय तोहि, बाबरी न होहि बानि जानि कपि नाँह की ।
आन हनुमान की दुहाई बलवान की, सपथ महाबीर की जो रहै पीर बाँह की ।।२६।।

सिंहिका सँहारि बल, सुरसा सुधारि छल, लंकिनी पछारि मारि बाटिका उजारी है ।
लंक परजारि मकरी बिदारि बारबार, जातुधान धारि धूरिधानी करि डारी है ।।
तोरि जमकातरि मंदोदरी कढ़ोरि आनी, रावन की रानी मेघनाद महँतारी है ।
भीर बाँह पीर की निपट राखी महाबीर, कौन के सकोच तुलसी के सोच भारी है ।।२७।।

तेरो बालि केलि बीर सुनि सहमत धीर, भूलत सरीर सुधि सक्र-रबि-राहु की ।
तेरी बाँह बसत बिसोक लोकपाल सब, तेरो नाम लेत रहै आरति न काहु की ।।
साम दान भेद बिधि बेदहू लबेद सिधि, हाथ कपिनाथ ही के चोटी चोर साहु की ।
आलस अनख परिहास कै सिखावन है, एते दिन रही पीर तुलसी के बाहु की ।।२८।।

टूकनि को घर-घर डोलत कँगाल बोलि, बाल ज्यों कृपाल नतपाल पालि पोसो है ।
कीन्ही है सँभार सार अँजनी कुमार बीर, आपनो बिसारि हैं न मेरेहू भरोसो है ।।
इतनो परेखो सब भाँति समरथ आजु, कपिराज साँची कहौं को तिलोक तोसो है ।
सासति सहत दास कीजे पेखि परिहास, चीरी को मरन खेल बालकनि को सो है ।।२९।।

आपने ही पाप तें त्रिपात तें कि साप तें, बढ़ी है बाँह बेदन कही न सहि जाति है ।
औषध अनेक जन्त्र मन्त्र टोटकादि किये, बादि भये देवता मनाये अधिकाति है ।।
करतार, भरतार, हरतार, कर्म काल, को है जगजाल जो न मानत इताति है ।
चेरो तेरो तुलसी तू मेरो कह्यो राम दूत, ढील तेरी बीर मोहि पीर तें पिराति है ।।३०।।

दूत राम राय को, सपूत पूत बाय को, समत्व हाथ पाय को सहाय असहाय को ।
बाँकी बिरदावली बिदित बेद गाइयत, रावन सो भट भयो मुठिका के घाय को ।।
एते बड़े साहेब समर्थ को निवाजो आज, सीदत सुसेवक बचन मन काय को ।
थोरी बाँह पीर की बड़ी गलानि तुलसी को, कौन पाप कोप, लोप प्रकट प्रभाय को ।।३१।।

देवी देव दनुज मनुज मुनि सिद्ध नाग, छोटे बड़े जीव जेते चेतन अचेत हैं ।
पूतना पिसाची जातुधानी जातुधान बाम, राम दूत की रजाइ माथे मानि लेत हैं ।।
घोर जन्त्र मन्त्र कूट कपट कुरोग जोग, हनुमान आन सुनि छाड़त निकेत हैं ।
क्रोध कीजे कर्म को प्रबोध कीजे तुलसी को, सोध कीजे तिनको जो दोष दुख देत हैं ।।३२।।

तेरे बल बानर जिताये रन रावन सों, तेरे घाले जातुधान भये घर-घर के ।
तेरे बल रामराज किये सब सुरकाज, सकल समाज साज साजे रघुबर के ।।
तेरो गुनगान सुनि गीरबान पुलकत, सजल बिलोचन बिरंचि हरि हर के ।
तुलसी के माथे पर हाथ फेरो कीसनाथ, देखिये न दास दुखी तोसो कनिगर के ।।३३।।

पालो तेरे टूक को परेहू चूक मूकिये न, कूर कौड़ी दूको हौं आपनी ओर हेरिये ।
भोरानाथ भोरे ही सरोष होत थोरे दोष, पोषि तोषि थापि आपनी न अवडेरिये ।।
अँबु तू हौं अँबुचर, अँबु तू हौं डिंभ सो न, बूझिये बिलंब अवलंब मेरे तेरिये ।
बालक बिकल जानि पाहि प्रेम पहिचानि, तुलसी की बाँह पर लामी लूम फेरिये ।।३४।।

घेरि लियो रोगनि, कुजोगनि, कुलोगनि ज्यौं, बासर जलद घन घटा धुकि धाई है ।
बरसत बारि पीर जारिये जवासे जस, रोष बिनु दोष धूम-मूल मलिनाई है ।।
करुनानिधान हनुमान महा बलवान, हेरि हँसि हाँकि फूँकि फौजैं ते उड़ाई है ।
खाये हुतो तुलसी कुरोग राढ़ राकसनि, केसरी किसोर राखे बीर बरिआई है ।।३५।।

सवैया

राम गुलाम तु ही हनुमान गोसाँई सुसाँई सदा अनुकूलो ।
पाल्यो हौं बाल ज्यों आखर दू पितु मातु सों मंगल मोद समूलो ।।
बाँह की बेदन बाँह पगार पुकारत आरत आनँद भूलो ।
श्री रघुबीर निवारिये पीर रहौं दरबार परो लटि लूलो ।।३६।।

घनाक्षरी

काल की करालता करम कठिनाई कीधौं, पाप के प्रभाव की सुभाय बाय बावरे ।
बेदन कुभाँति सो सही न जाति राति दिन, सोई बाँह गही जो गही समीर डाबरे ।।
लायो तरु तुलसी तिहारो सो निहारि बारि, सींचिये मलीन भो तयो है तिहुँ तावरे ।
भूतनि की आपनी पराये की कृपा निधान, जानियत सबही की रीति राम रावरे ।।३७।।

पाँय पीर पेट पीर बाँह पीर मुँह पीर, जरजर सकल पीर मई है ।
देव भूत पितर करम खल काल ग्रह, मोहि पर दवरि दमानक सी दई है ।।
हौं तो बिनु मोल के बिकानो बलि बारेही तें, ओट राम नाम की ललाट लिखि लई है ।
कुँभज के किंकर बिकल बूढ़े गोखुरनि, हाय राम राय ऐसी हाल कहूँ भई है ।।३८।।

बाहुक-सुबाहु नीच लीचर-मरीच मिलि, मुँहपीर केतुजा कुरोग जातुधान हैं ।
राम नाम जगजाप कियो चहों सानुराग, काल कैसे दूत भूत कहा मेरे मान हैं ।।
सुमिरे सहाय राम लखन आखर दोऊ, जिनके समूह साके जागत जहान हैं ।
तुलसी सँभारि ताड़का सँहारि भारि भट, बेधे बरगद से बनाइ बानवान हैं ।।३९।।

बालपने सूधे मन राम सनमुख भयो, राम नाम लेत माँगि खात टूकटाक हौं ।
परयो लोक-रीति में पुनीत प्रीति राम राय, मोह बस बैठो तोरि तरकि तराक हौं ।।
खोटे-खोटे आचरन आचरत अपनायो, अंजनी कुमार सोध्यो रामपानि पाक हौं ।
तुलसी गुसाँई भयो भोंडे दिन भूल गयो, ताको फल पावत निदान परिपाक हौं ।।४०।।

असन-बसन-हीन बिषम-बिषाद-लीन, देखि दीन दूबरो करै न हाय हाय को ।
तुलसी अनाथ सो सनाथ रघुनाथ कियो, दियो फल सील सिंधु आपने सुभाय को ।।
नीच यहि बीच पति पाइ भरु हाईगो, बिहाइ प्रभु भजन बचन मन काय को ।
ता तें तनु पेषियत घोर बरतोर मिस, फूटि फूटि निकसत लोन राम राय को ।।४१।।

जीओं जग जानकी जीवन को कहाइ जन, मरिबे को बारानसी बारि सुरसरि को ।
तुलसी के दुहूँ हाथ मोदक हैं ऐसे ठाँउ, जाके जिये मुये सोच करिहैं न लरि को ।।
मोको झूटो साँचो लोग राम को कहत सब, मेरे मन मान है न हर को न हरि को ।
भारी पीर दुसह सरीर तें बिहाल होत, सोऊ रघुबीर बिनु सकै दूर करि को ।।४२।।

सीतापति साहेब सहाय हनुमान नित, हित उपदेश को महेस मानो गुरु कै ।
मानस बचन काय सरन तिहारे पाँय, तुम्हरे भरोसे सुर मैं न जाने सुर कै ।।
ब्याधि भूत जनित उपाधि काहु खल की, समाधि कीजे तुलसी को जानि जन फुर कै ।
कपिनाथ रघुनाथ भोलानाथ भूतनाथ, रोग सिंधु क्यों न डारियत गाय खुर कै ।।४३।।

कहों हनुमान सों सुजान राम राय सों, कृपानिधान संकर सों सावधान सुनिये ।
हरष विषाद राग रोष गुन दोष मई, बिरची बिरञ्ची सब देखियत दुनिये ।।
माया जीव काल के करम के सुभाय के, करैया राम बेद कहैं साँची मन गुनिये ।
तुम्ह तें कहा न होय हा हा सो बुझैये मोहि, हौं हूँ रहों मौनही बयो सो जानि लुनिये ।।४४।।

Hanuman Bahuk Paath

Shri Ganeshay Namah
Shri Janakivallabho Vijayate
Shrimad-Goswami-Tulsidas-Krit

Chhappaya

Sindhu-taran,Siya-soch-haran, Rabi-baalbaran-tanu |
Bhujbisaal, moorti karaal, kaalhuko kaal janu ||
Gahan-dahan-nirdahan-lanknihsank, bank-bhuv |
Jaatudhaan-balvaan-maan-mad-davanpavansuv ||
KahTulsidas sevat sulabh, sevak hit santat nikat |
Gunganat,namat, sumirat, japat, saman sakal-sankat-bikat || 1 ||


Svaran-saail-sankaskoti-rabi-tarun-tej-ghan |
Urbisaal, bhujdandh chand nakh bajra bajratan ||
Pingnayan, bhrikutee karaal rasnaa dasnaanan |
Kapiskes, karkas langoor, khal-dal bal bhaanan ||
KahTulsidas bas jaasu ur maarutsut moorti bikat |
Santaappaap tehi purush panhi sapnehun nahin aavat nikat || 2 ||


Jhulna

Panchmukh-chamukh-bhrigumukhyabhat-asur-sur,
Sarv-sari-samarsamratth sooro |
Bankurobeer birudaait birudaavlee,
Baidbandee badat paaijpooro ||
Jaasugungaath Raghunaath kah, jasu bal,
Bipul-jal-bharitjag-jaldhi jhooro |
Duvan-dal-damankokaun Tulsees hai
Pavankopoot Rajpoot rooro || 3 ||


Ghanakshari

Bhanusonparrhan hanuman gaye bhanu man-
anumaanisisukeli kiyo pherphaar so |
Paachhilepagni gam gagan magan-man,
Kramkona bhram, kapi baalak-bihaar so ||
Kautukbiloki lokpaal hari har bidhi
Lochananichakaachaundhee chitni khabhaar so |
Balkaaidhaun beerras, dheeraj kai, sahas kai,
Tulsisareer dhare sabniko saar so || 4 ||


Bharatmeinpaarthke rathketu kapiraaj,
Gaajyosuni kururaaj dal halbal bho |
KahayoDron Bheesham sumeersut Mahaabeer,
Beer-ras-baari-nidhijaako bal jal bho ||
Baanarsubhaay baalkeli bhoomi bhaanu laagi,
Phalangphalaanghoonten ghaati nabhtal bho |
Naai-naaimaath jori-jori haath jodha johain,
Hanumandekhe jagjeevanko phal bho || 5 ||


Gopadpayodhi kari holika jyon layee lank,
Nipatnisank parpur galbal bho |
Dron-sopahaar liyo khyaal hee ukhari kar,
Kanduk-jyonkapikhel bel kaaiso phal bho ||
Sankatsamaajasmanjas bho Ramraaj
Kaajjug-poogniko kartal pal bho |
Saahseesamatth Tulsiko naah jaaki baanh,
Lokpaalpaalanko phir thir thal bho || 6 ||


Kamathkeepeethi jaake gorhnikee gaarhain maano
Naapkebhaajan bhari jalnidhi-jal bho |
Jaatudhaan-daavanparaavanko durge bhayo,
Mahaameenbaastimi tomaniko thal bho ||
Kumbhkaran-Ravan-payodnaad-eedhanko
Tulsiprataap jaako prabal anal bho |
Bheeshamkahat mere anumaan Hanuman-
Saarikhotrikaal na trilok mahaabal bho || 7 ||

DootRamrayko, sapoot poot paunko, too
Anjaneekonandan prataap bhoori bhaanu so |
Seey-soch-saman,durit-dosh-daman,
Saranaaye avan, lakhanpriya praan so ||
Dasmukhdusah daridra daribeko bhayo,
Prataktilok aok Tulsi nidhaan so |
Gyan-gunvaanbalvaan sevaa saavdhaan,
Saahebsujaan ur aanu Hanuman so || 8 ||


Davan-duvan-dalbhuvan-bidit bal,
Baidjas gaavat bibudh bandeechor ko |
Paap-taap-timirtuhin-vightan-patu,
Sevak-saroruhsukhad bhaanu bhorko ||
Lok-parloktenbisok sapne na sok,
Tulsikehiye hai bharoso ek aorko |
Ramkodulaaro daas baamdevko nivaas,
Naamkali-kaamtaru kesri-kisorko || 9 ||


Mahaabal-seem,mahaabheem,mahaabaanit,
Mahabeerbidit barayo Raghubeerko |
Kulis-kathortanujorparai ror ran,
Karuna-kalitman dhaarmik dheerko ||
Durjankokaalso karaal paal sajjanko,
Sumireharanhaar Tulsiki peerko |
Seey-sukhdaayakdulaaro Raghunaayak ko,
Sevaksahaayak hai saahsee sameerko || 10 ||

Rachibekobidhi jaise, paalibeko hari, har
Meechmaaribeko, jyaibeko sudhaapaan bho |
Dharibekodharni, tarni tam dalibeko,
Sokhibekrisaanu, poshibeko him-bhaanu bho ||
Khal-dukh-doshibeko,jan-paritoshibeko,
Maangibomaleentaako modak sudaan bho |
Aaratkeeaarti nivaaribeko tihoon pur,
Tulsikosaheb hatheelo Hanuman bho || 11 ||


Sevaksyokaee jaani jaankees maanai kaani,
Saanukoolsoolpaani navaai naath naankko |
Devidev daanav dayaavane havaai joraain haath,
Baapurebaraak kahaa aur raja raankko ||
Jaagatsovat baithe baagat binod mod,
taakaijo anarth so samarth ek aankko |
sabdin rooro paraai pooro jahan-tahan taahi,
jaakehai bharoso hiye hanuman haankko || 12 ||


Saanugsagauri saanukool soolpani taahi,
Lokpaalsakal lakhan ram janki |
Lokparlokko bisok so tilok taahi,
Tulsitamai kahaa kaahu beer aankee ||
Kesrikisorbandeechorke nevaaje sab,
Keertibimal kapi karunanidhaankee |
Balak-jyonpaalihain kripaalu muni siddh taako,
jaakehiye hulsati haank hanumanki || 13 ||


Karunanidhaan, balbudhike nidhaan, mod-
mahimanidhaan,gun-gyaanke nidhaan hau |
Baamdev-roop,bhoop Ramke sanehee, naam
lait-daitarth dharm kaam nirbaan hau ||
Aapneprabhav, Sitanathke subhaav seel,
Lok-baid-bidhikebidush Hanuman hau |
Mankee,bachankee, karamkee tihoon prakar,
Tulsitihaaro tum saheb sujaan hau || 14 ||


Mankoagam, tan sugam kiye kapees,
Kaajmahaaraajke samaaj saaj saaje hain |
Dev-bandeechorranror Kesreekisor,
Jug-jugjag tere birad biraaje hain ||
Beerbarjor, ghati jor Tulsiki aur
Sunisakuchaane saadhu, khalgan gaaje hain |
Bigreesanvaar Anjanikumar keeje mohin,
Jaisehot aaye Hanumanke nivaaje hain | 15 ||

Savaiya

Jaansiromanihau Hanuman sadaa janke man baas tihaaro |
Dhaarobigaaro main kaako kahaa kehi kaaran kheejhat haun to tihaaro ||
Saahebsevak naate te haato kiyo so tahaan Tulsiko na chaaro |
Doshsunaaye tain aagehunko hoshiyaar havai hon man tau hiye haaro ||16||


Terethape uthapaai na mahes, thapaai thirko kapi je ghar ghaale |
Terenivaaje gareebnivaaj biraajat baairinke ur saale |
Sankatsoch sabaai Tulsi liye naam phataai makreeke-se jaale |
Boorhbhaye, bali, merihi baar, ki haari pare bahutaai natt paale || 17 ||


Sindhutare, barhe beer dale khal, jaare hain lankse bank mavaa se |
Taainran-kehri kehrike bidle ari-kunjar chaail chavaa se ||
Tosonsamath susaaheb sei sahaai Tulsi dukh dosh davaase |
Baanarbaaj barhe khal-khechar, leejat kyon na lapeti lavaa-se || 18 ||

Achh-vimardankaanan-bhaani dasaanan aanan bhaan nihaaro |
Baaridnaadankpan kumbhkaran-se kunjar kehri-baaro ||
Ram-prataap-hutaasan,kachh,bipachh, sameer sameerdulaaro |
Paapten,saapten, taap tihoonte sadaa Tulsi kahan so rakhvaaro || 19 ||


Ghanakshari

Jaanatjahaan Hanumanko nivaajyau jan,
Mananumaani, bali, bol na bisaariye |
Sevaa-jogTulsi kabhoon kahaa chook paree,
Sahebsubhaav kapi saahibee sanbhaariye ||
Apraadheejaani keejaai saasti sahas bhaanti,
Modakmaraai jo, taahi maahur na maariye |
Saahseesameerke dulaare Raghubeerjooke,
Baanhpeer Mahaabeer begi hee nivaariye || 20 ||


Baalakbiloki, bali baareten aapno kiyo |
Deenbandhudayaa keenheen nirupaadhi nyaariye |
Raavrobharoso Tulsike, Raavroee bal,
Aasraavreeyaai, daas raavro bichaariye ||
Barhobikraal kali, kaako na bihaal kiyo,
Maathepagu baleeko, nihaari so nivaariye |
Kesreekisor,ranror, barjor beer,
Bahunpeerraahumaatu jyaun pachaari maariye || 21 ||


Uthapethapanthir thape uthpanhaar,
Kesreekumarbal aapno sambhariye |
Ramkegulaamniko kaamtaru Ramdoot,
Mosedeen doobareko takiyaa tihaariye ||
Sahebsamarth toson Tulsike maathe par,

Souapraadh binu beer, baandhi maariye |

Pokhreebisaal banhu, bali baarichar peer,

Makreejyaun pakrikaai badan bidaariye || 22||


Ramkosaneh, Ram saahas lakhan siya,
Ramkeebhagti, soch sankat nivaariye |
Mud-markatrog-baarinidhi heri haare,
Jeev-jaamvantkobharoso tero bhaariye ||
Koodiyekripaal Tulsi suprem-pabbyaten,
Suthalsubel bhaalu baaithikaai bichaariye |
Mahabeerbankure baraakee banhpeer kyon na,
Lankineejyon laatghaat hee marori maariye || 23 ||


Lok-parlokhoontilok na bilokiyat,
Tosesamrath chash chaarihoon nihaariye |
Karm,kaal, lokpaal, ag-jag jeevjaal,
Naathhaath sab nij mahimaa bichaariye ||
Khaasdaas raavro, nivaas tero taasu ur,
Tulsiso dev dukhee dekhiyat bhaariye |
Baattarumool banhusool kapikachhu-beli,
Upjeesakeli kapikeli hee ukhaariye || 24 ||


Karam-karaal-kansBhoomipaalke bharose,
Bakeebakbhaginee kaahooten kahaa daraaigee|
Barheebikraal baalghaatinee na jaat kahi,
Baanhubalbaalak chabeele chote charaaigee||
Aaeehaai banaae besh aap hee bichaari dekh,
Paapjaaya sabko guneeke paale paraaigee|
Pootnapisaachinee jyaaun kapikaanh Tulsikee,
Baanhpeermahaabeer, tere maare maraaigee|| 25 ||


Bhaalkeeki kaalkee ki roshkee tridoshkee hai,
Bedanbisham paap-taap chalchaanhkee |
Karmankootkee ki jantramantra bootkee,
Paraahijaahi paapinee maleen manmaanhkee ||
Paaihhisajaay nat kahat bajaay tohi,
Baavreena hohi baani jaani kapinaanhkee |
AanHanumaankee dohaaee balvaankee,
SapathMahaabeerkee jo rahaai peer baanhkee || 26 ||


Sinhikasanhaari bal, sursaa sudhaari chhal,
Lankineepachhaari maari baatika ujaaree hai |
Lankparjaari makree bidaari baarbaar,
Jaatudhaandhaari dhooridhaanee kari daaree haai ||
Torijamkaatari Madodri karhori aanee,
Ravankeeraanee Meghnad Manhtaaree haai ||
Bheerbaanhpeerkee nipat raakhee Mahaabeer,
Kaaunkesakoch Tulsike soch bhaaree haai || 27 ||


Terobaalkeli beer suni sahmat dheer,
Bhoolatsareersudhi sakra-rabi-rahukee ||
Tereebaanh basat bisok lokpaal sab,
Teronaam lait rahaai aarti na kaahukee ||
Saamdaan bhed bidhi baidhoo labed sidhi,
Haathkapinathheeke chotee chor saahukee|
Aalasanakh parihaaskaai sikhaavan haai,
Aitedin rahee peer Tulsike baahukee || 28 ||


Tooknikoghar-ghar dolat kangaal boli,
Baaljyon kripaal natpaal paali poso haai |
Keenheehaai sanbhaar saar Anjaneekumar beer,
Aapnobisaarihaain na merehoo bharoso haai ||
Itnoparekho sab bhaanti samrath aaju,
Kapiraajsaanchee kahaaun ko Tilok toso haai |
Saastisahat daas keeje pekhi parihaas,
Cheereekomaran khel baalkaniko so haai || 29 ||


Aapnehee paaptein tritaapatein ki saaptein,
Barreehaai baanhbedan kahee na sahi jaati haai |
Aaushadhanek jantra-mantra-totkaadi kiye,
Baadibhaye devtaa manaaye adhikaati haai ||
Kartaar,bhartaar, hartaar, karm, kaal,
Kohaai jagjaal jo na maanat itaati haai |
Cherotero Tulsee too mero kahyo Ramdoot,
Dheelteree beer mohi peertein piraati haai || 30 ||


DootRamrayako, sapoot poot baayko,
Samathhhaath paayko sahaay asahaayko |
Baankeebiradaavlee bidit baid gaiyat,
Raavanso bhat bhayo muthikaake ghaayako ||
Aitebarhe saaheb samarthko nivaajo aaj,
Seedatsusevak bachan man kaayako |
Thoreebaanhpeerkee barhi galaani Tulsiko,
Kaunpaap kop, lop pragat prabhaayako || 31 ||


Deveedev danuj manuj muni siddh naag,
Chotebarhe jeev jete chetan achet haain |
Pootnapisaachee jaatudhaanee jaatudhaan baam,
Ramdootkeerajaai maathe maani lait haain ||
Ghorjantra mantra koot kapat kurog jog,
Hanoomaanaan suni chaarhat niket haain |
Krodhkeeje karmko prabodh keeje Tulseeko,
Sodhkeeje tinko jo dosh dukh dait haain || 32 ||


Terebal baanar jitaaye ran Raavanson,
Tereghaale jaatudhaan bhaye ghar-gharke |
Terebal Raamraj kiye sab surkaaj,
Sakalsamaaj saaj saaje Raghubarke ||
Terogungaan suni geerbaan pulkat,
Sajalbilochan biranchi Hari harke |
Tulsikemaathepar haath phero keesnaath,
Dekhiyena daas dukhee tose kanigarke || 33 ||


Paalotere tookko parehoo chook mookiye na,
Koorkaaurhee dooko haaun aapnee aur heriye |
Bhoraanaathbhorehee sarosh hot thore dosh,
Poshitoshi thaapi aapno na avderiye ||
Anbutoo haaun Ambuchar, amb too haaun dimbh, so na,
Boojhiyebilamb avlamb mere teriye |
Baalakbikal jaani paahi prem pahichaani,
Tulseekeebaanh par laameeloom pheriye || 34 ||


Gheriliyo rogni kujogni kulogni jyaaun,
Baasarjalad ghan ghata dhuki dhaaee haai |
Barsatbaari peer jaariye javaase jas,
Roshbinu dosh, dhoom-mool malinaaee haai ||
KarnunaanidhaanHanumaan mahaabalvaan,
Herihansi haanki phoonki phaaujen taain udhaaee haai |
Khaayehuto Tulsee kurog raadh raaksani,
Kesreekisorraakhe beer bariaaee haai || 35 ||


Savaiya

Raamgulaamtuhee Hanuman
Gosaainsusaain sadaa anukoolo |
Paalyohaaun baal jyon aakhar doo
Pitumaatu son mangal mod samoolo ||
Baanhkeebedan baanhpagaar
Pukaarataarat aanand bhoolo |
ShriRaghubeernivaariye peer
Rahaaundarbaar paro lati loolo || 36 ||


Ghanakshari

Kaalkeekaraaltaa karam kathinaaee keedhaaun,
Paapkeprabhaavkee subhaaya baaya baavre |
Bedankubhaanti so sahee na jaati raati din,
Soeebaanh gahee jo gahee sameerdaavre ||
Laayotaru Tulsee tihaaro so nihaari baari,
Seenchiyemaleen bho tayo haai tihoon taavre |
Bhootanikeeaapnee paraayekee kripanidhaan,
Jaaniyatsabheekee reeti Ram Raavre|| 37 ||


Paayanpeerpetpeer baanhpeer munhpeer,
Jarjarsakal sareer peermaee haai |
Devbhoot pitar karam khal kaal grah,
Mohipardavri damaanak see daee haai ||
Haaunto bin molke bikaano bali baarehee tain,
AotRamnaamkee lalaat likhi laee haai |
Kumbhajkekinkar bikal boodhe gookhurani,
HaayRamraay aisee haal kahoon bhaee haai || 38 ||


Baahuk-subaahuneech leechar-mareech mili,
Munhpeer-ketujaakurog jaatudhaan haain|
Ramnaam japjaag kiyo chahon saanuraag,
Kaalkaise doot bhoot kahaa mere maan haain ||
Sumiresahaaya RamLakhan aakhar douu,
Jinkesamooh saake jaagat jahaan haain|
Tulseesanbhaari Tadhka-sanhaari bhaaree bhat,
Bedhebargadse banai baanvaan haain || 39 ||


Baalpanesoodhe man Ram sanmukh bhayo,
Ramnaamleit maangi khaat tooktaak haaun |
Paryolokreetimein puneet preeti Ramraaya,
Mohbasbaaitho tori tarkitraak haaun ||
Khote-khoteaachran aachrat apnaayo,
Anjanikumarsodhyo Rampaani paak haaun
Tulseegosaaen bhayo bhonrhe din bhooli gayo,
Taakophal paavat nidaan paripaak haaun || 40 ||


Asan-basan-heenvisham-vishaad-leen,
Dekhideen doobro karaai na haay-haay ko |
Tulseeanaathso sanaath Raghunaath kiyo,
Diyophal seelsindhu aapne subhaayko ||
Neechyahi beech pati paai bharuhaaigo,
Bihaaiprabhu-bhajan bachan man kaayko |
Taatentanu peshiyat ghor bartor mis,
Phooti-phootiniksat lon Raamraayko || 41 ||


Jiaonjag jaankeejeevanko kahaai jan,
Maribekobaaraansee baari sursariko |
Tulseekeduhoon haath modak haai aise thaun,
Jaakejiye muye soch karihaain na lariko |
Mokojhootho saancho log Ramko kahat sab,
Mereman maan haai na harko na hariko ||
Bhaareepeer dusah sareertain bihaal hot,
SouuRaghubeer binu sakaai door kariko || 42 ||


Sitapatisaaheb sahaay Hanuman nit,
Hitupdesko mahes maano gurukaai,
Maanasbachan kaay saran tihaare paany
Tumharebharose sur maain na jaane surkaai ||
Byaadhibhootjanit upaadhi kaahoo khalkee,
Samaadhikeeje Tulseeko jaani jan phurkaai |
KapinaathRaghunaath bholaanaath Bhootnaath,
Rogsindhukyon na daariyat gaay khurkaai || 43 ||

KahonHanumanson sujaan Raamraayson,
Kripanidhaansankarson saavdhaan suniye |
Harashvishaad raag rosh gun doshmaee,
Bircheebiranchi sab dekhiyat duniye |
Mayajeev kaalke karamke subhaayke,
KaraaiyaRaam baid kahaain saanchee man guniye |
Tumhatenkahaa na hoy haahaa so bujhaaiye mohi,
Haaun hoon rahon maaun hee bayo so jaani luniye || 44 ||



हनुमान बाहुक क्या है?

हनुमान बाहुक एक प्राचीन हिन्दू ग्रंथ है जिसमें भगवान हनुमान को समर्पित 44 छंद हैं। इसे 16वीं शताब्दी के कवि और संत तुलसीदास ने लिखा था, जो भगवान राम के अनन्य भक्त थे। हनुमान बाहुक को एक अत्यंत शक्तिशाली प्रार्थना माना जाता है, जो भक्तों को जीवन की कठिनाइयों, बीमारियों और चुनौतियों से उबरने में सहायता कर सकती है।

यह विशेष रूप से शारीरिक कष्टों को दूर करने में प्रभावी मानी जाती है, और इसे अक्सर वे लोग जपते हैं जो स्वास्थ्य लाभ और सुरक्षा की कामना करते हैं। “बाहुक” शब्द का अर्थ होता है बांह या सहारा, और इस पाठ को यह नाम इसलिए दिया गया है क्योंकि इसे मजबूत बांह की तरह शक्ति और सहारा प्रदान करने वाला माना जाता है।

हिंदू धर्म में हनुमान जी का महत्व

हनुमान जी, जिन्हें अंजनेय के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म के सबसे पूजनीय और प्रिय देवताओं में से एक हैं। वे शक्ति, भक्ति, साहस, और निस्वार्थता का प्रतीक माने जाते हैं, और उनका महत्व करोड़ों हिंदुओं के दिलों में गहराई से बसा हुआ है।

हनुमान जी को भगवान शिव का अवतार माना जाता है, और उनके अद्भुत कारनामे रामायण में वर्णित हैं। रामायण में हनुमान जी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, खासकर जब उन्होंने रावण द्वारा अपहृत सीता माता को बचाने में भगवान राम की सहायता की थी।

उनकी अटूट भक्ति, अपार शक्ति और साहस ने उन्हें भक्ति और निस्वार्थ सेवा का प्रतीक बना दिया है। हनुमान जी की राम जी के प्रति जो समर्पण था, वह हिंदू धर्म में एक मिसाल है, और इसी वजह से वे करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं।

हनुमान जी को हिंदू धर्म में शारीरिक शक्ति, ऊर्जा और साहस का प्रतीक भी माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि हनुमान जी का नाम जपने या उनकी प्रार्थना करने से व्यक्ति शारीरिक और मानसिक बाधाओं को पार कर सकता है और जीवन की चुनौतियों का सामना साहस और धैर्य से कर सकता है।

कुल मिलाकर, हनुमान जी का महत्व कई आयामों में बंटा हुआ है। उनकी राम जी के प्रति भक्ति से लेकर उनके शक्ति और साहस के प्रतीकात्मक रूप तक, वे ऐसे पूजनीय देवता हैं जो आज भी लाखों लोगों को प्रेरित और उत्साहित करते हैं।

हनुमान बाहुक का उद्गम (उत्पत्ति)

हनुमान बाहुक भगवान हनुमान को समर्पित एक स्तोत्र है, जो 16वीं शताब्दी में तुलसीदास जी द्वारा रचित हनुमान चालीसा से प्रेरित है। ऐसा माना जाता है कि इस स्तोत्र में रोगों को दूर करने की शक्ति है, और भक्तजन इसे विभिन्न बीमारियों से मुक्ति पाने और भगवान हनुमान की कृपा प्राप्त करने के लिए पढ़ते हैं।

हनुमान द्वारा संजीवनी बूटी लाने की कथा

हिंदू महाकाव्य रामायण के अनुसार, जब भगवान राम के भाई लक्ष्मण, रावण के पुत्र मेघनाद (जिसे इंद्रजीत भी कहा जाता है) के साथ युद्ध में गंभीर रूप से घायल हो गए, तो भगवान हनुमान को हिमालय से संजीवनी बूटी लाने का कार्य सौंपा गया। यह बूटी किसी भी घाव को ठीक करने की शक्ति रखती है।

हनुमान जी तुरंत हिमालय की ओर उड़ चले और संजीवनी बूटी पहचान न पाने के कारण पूरी पहाड़ी को ही उठाकर युद्धक्षेत्र में वापस ले आए। इस तरह उन्होंने लक्ष्मण का जीवन बचाया। उनका यह वीरतापूर्ण कार्य उनकी अपार शक्ति, भक्ति और निस्वार्थता का प्रतीक है। यह कथा आज भी हिंदू धर्म में गहरे आदर के साथ मनाई और मानी जाती है।

हनुमान बाहुक की रचना

हनुमान बाहुक एक ऐसी प्रार्थना है जिसमें 44 छंद हैं, जो हिंदी के अवधी भाषा में लिखी गई है। इसे 16वीं शताब्दी के महान संत तुलसीदास जी ने रचा था, जिन्होंने रामचरितमानस की भी रचना की थी। यह प्रार्थना भगवान हनुमान की शक्ति, साहस और भगवान राम के प्रति उनकी भक्ति को समर्पित है।

यह माना जाता है कि हनुमान बाहुक का हर छंद विशेष उपचारात्मक शक्ति रखता है और इसे विभिन्न शारीरिक और मानसिक रोगों के उपचार के लिए पढ़ा जाता है। यह प्रार्थना हनुमान जन्मोत्सव और अन्य पवित्र अवसरों पर भक्तों द्वारा विशेष रूप से गाई जाती है।

हनुमान बाहुक का ऐतिहासिक महत्व

हनुमान बाहुक का ऐतिहासिक महत्व इसकी उपचारात्मक शक्तियों में निहित है। प्राचीन भारतीय वैद्य इसे कई बीमारियों के उपचार के लिए प्रयोग करते थे। इसके छंद आज भी शारीरिक और मानसिक कष्टों से राहत पाने के लिए भक्तों द्वारा पढ़े जाते हैं।

यह प्रार्थना हनुमान जी की उपासना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है और इसे हनुमान जन्मोत्सव सहित कई शुभ अवसरों पर पढ़ा जाता है। इसकी लोकप्रियता और व्यापक उपयोग इसके आध्यात्मिक महत्व और शक्ति का प्रमाण है।

हनुमान बाहुक का महत्व

हनुमान बाहुक भगवान हनुमान को समर्पित एक पूजनीय प्रार्थना है, जो उनकी वीरता, शक्ति और भक्ति के लिए प्रसिद्ध हैं। यह व्यापक रूप से माना जाता है कि हनुमान बाहुक का पाठ करने से जीवन की विभिन्न कठिनाइयों और रोगों से मुक्ति मिलती है।

साथ ही, यह प्रार्थना भक्तों को दिव्य आशीर्वाद, मानसिक शक्ति, और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करती है। भक्त इसे भगवान हनुमान की कृपा, सुरक्षा और मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए अपनी भक्ति के रूप में पढ़ते हैं।

हनुमान बाहुक के पाठ के लाभ

हनुमान बाहुक एक अत्यंत शक्तिशाली प्रार्थना है जो भगवान हनुमान को समर्पित है। ऐसा माना जाता है कि जो लोग उनकी शरण में जाते हैं और उनकी प्रार्थना करते हैं, उन्हें भगवान हनुमान का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

हनुमान बाहुक का नियमित पाठ जीवन में आने वाली विभिन्न कठिनाइयों और रोगों से राहत दिला सकता है। कहा जाता है कि यह प्रार्थना बीमारियों को ठीक करने, नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने और बुरी शक्तियों से बचाने में सक्षम है।

इसके अलावा, हनुमान बाहुक के पाठ से कई अन्य आशीर्वाद भी मिलते हैं। इनमें शक्ति, बुद्धिमत्ता और आध्यात्मिक विकास प्रमुख हैं। कई लोग नियमित रूप से इस प्रार्थना का पाठ भगवान हनुमान से सुरक्षा और मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए करते हैं।

यह प्रार्थना विशेष रूप से उन समयों में अत्यधिक प्रभावी मानी जाती है जब व्यक्ति वित्तीय समस्याओं, स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयों या रिश्तों से जुड़ी परेशानियों का सामना कर रहा हो।

आध्यात्मिक लाभों के साथ-साथ, हनुमान बाहुक मानसिक और भावनात्मक रूप से भी शांति प्रदान करता है। कहा जाता है कि इसके पाठ से मन को शांति मिलती है, तनाव और चिंता कम होती है, और आंतरिक संतुलन व सुकून प्राप्त होता है।

हालांकि हनुमान बाहुक का पाठ हनुमान जन्मोत्सव के समय विशेष रूप से किया जाता है, लेकिन इसे सालभर कभी भी पढ़ा जा सकता है।

कुल मिलाकर, हनुमान बाहुक का पाठ भगवान हनुमान का आशीर्वाद और सुरक्षा प्राप्त करने का एक शक्तिशाली और प्रभावी तरीका है, जो जीवन की चुनौतियों और बाधाओं को दूर करने में सहायक होता है।

नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा

भगवान हनुमान को समर्पित हनुमान बाहुक एक अत्यधिक शक्तिशाली प्रार्थना मानी जाती है, जो नकारात्मक ऊर्जाओं से सुरक्षा प्रदान करती है। यहाँ कुछ तरीके हैं जिनसे हनुमान बाहुक को नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा के लिए प्रभावी माना जाता है:

  1. आभा की शुद्धि: यह माना जाता है कि हनुमान बाहुक एक व्यक्ति की आभा या ऊर्जा क्षेत्र को शुद्ध करता है, जिससे नकारात्मक ऊर्जाओं और बुरी आत्माओं को दूर रखने में मदद मिलती है।
  2. सकारात्मकता को बढ़ावा: इस प्रार्थना के माध्यम से सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है, जो नकारात्मक विचारों और ऊर्जाओं को संतुलित और निष्क्रिय करने में मदद करती है।
  3. रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि: हनुमान बाहुक का पाठ शरीर और मन पर हीलिंग प्रभाव डालता है, जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है और नकारात्मक ऊर्जाओं से उत्पन्न बीमारियों से बचाव होता है।
  4. आध्यात्मिक सुरक्षा: यह प्रार्थना एक आध्यात्मिक कवच के रूप में कार्य करती है, जो नकारात्मक ऊर्जा, मानसिक हमलों और काले जादू जैसी बुरी शक्तियों से सुरक्षा प्रदान करती है।
  5. आंतरिक शक्ति का विकास: हनुमान बाहुक व्यक्ति की आंतरिक शक्ति और संकल्प को बढ़ाने में मदद करता है, जिससे भय और अन्य नकारात्मक भावनाओं से उबरने में सहायता मिलती है, जो अक्सर नकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करती हैं।

हनुमान बाहुक का आध्यात्मिक महत्व

हनुमान बाहुक का आध्यात्मिक महत्व इस बात में है कि यह भक्त को भगवान हनुमान के करीब लाता है और उनकी दिव्य उपस्थिति का अनुभव करने में मदद करता है। हनुमान बाहुक के कुछ आध्यात्मिक पहलू इस प्रकार हैं:

  1. भक्ति को बढ़ावा: हनुमान बाहुक का पाठ भगवान हनुमान के प्रति प्रेम और श्रद्धा व्यक्त करने का एक साधन है, जो भक्ति को प्रगाढ़ करता है।
  2. आध्यात्मिक विकास: इस प्रार्थना के माध्यम से भक्त अपनी सीमाओं को पार कर साहस, विनम्रता और विश्वास जैसे गुणों को विकसित कर सकता है, जो उसके आध्यात्मिक विकास में सहायक होते हैं।
  3. सुरक्षा प्रदान करता है: हनुमान बाहुक एक शक्तिशाली आध्यात्मिक कवच माना जाता है, जो भक्त को नकारात्मक ऊर्जाओं, बुरी आत्माओं और अन्य हानिकारक शक्तियों से बचाता है।
  4. आशीर्वाद प्रदान करता है: इस प्रार्थना से भक्त को शक्ति, बुद्धि और समृद्धि जैसे विभिन्न आशीर्वाद प्राप्त होते हैं, और यह भक्त की इच्छाओं को पूरा करने में सहायक मानी जाती है।
  5. स्वयं की पहचान: हनुमान बाहुक का पाठ भक्त को उसके अहंकार से ऊपर उठने और स्वयं एवं परमात्मा की गहरी समझ विकसित करने में मदद करता है।

कुल मिलाकर, यह प्रार्थना अत्यधिक आध्यात्मिक महत्व रखती है और हिंदू परंपरा का एक अभिन्न हिस्सा है। इसे श्रद्धा और भक्ति के साथ पढ़ने से भगवान हनुमान की कृपा और आशीर्वाद की प्राप्ति होती है, और भक्त उनके दिव्य अनुग्रह का अनुभव कर सकता है।

तुलसीदास पर हनुमान जी का आशीर्वाद

तुलसीदास, जो एक प्रसिद्ध हिंदू संत और कवि थे, उन्हें भगवान हनुमान का आशीर्वाद प्राप्त हुआ माना जाता है। हनुमान जी को तुलसीदास का गुरु और मार्गदर्शक माना जाता है, और कहा जाता है कि भगवान हनुमान ने तुलसीदास को दर्शन दिए और उन्हें रामचरितमानस लिखने की प्रेरणा दी। रामचरितमानस भगवान राम को समर्पित एक महत्वपूर्ण भक्ति ग्रंथ है, जिसे तुलसीदास ने हनुमान जी की प्रेरणा से लिखा था।

भगवान हनुमान ने तुलसीदास की आध्यात्मिक चेतना को जागृत किया और उन्हें उनके अहंकार से ऊपर उठने में मदद की, जिससे वे ईश्वर की गहन समझ प्राप्त कर सके। पूरी ज़िंदगी में तुलसीदास को हनुमान जी का संरक्षण और समर्थन मिला, जिससे वे अपनी कठिनाइयों को पार कर सके और अपने आध्यात्मिक उद्देश्य को पूरा किया।

तुलसीदास और भगवान हनुमान के बीच के इस गुरु-शिष्य संबंध ने न केवल तुलसीदास को बल्कि अनगिनत भक्तों को हनुमान जी के आशीर्वाद से लाभान्वित किया। यह संबंध यह सिखाता है कि भक्ति की शक्ति कितनी गहरी होती है और गुरु-शिष्य के रिश्ते में कितनी परिवर्तनकारी शक्ति होती है। तुलसीदास की जिंदगी और उनकी शिक्षाएं आज भी भक्तों को प्रेरित करती हैं और यह याद दिलाती हैं कि हमें ईश्वर के प्रति समर्पण करना चाहिए और गुरु के मार्गदर्शन और आशीर्वाद की तलाश करनी चाहिए।

हनुमान बाहुक की रचना की कथा

कहते हैं, एक बार तुलसीदास जी को अपने हाथों में इतनी तेज दर्द हुआ कि वे अपने हाथ तक नहीं हिला पा रहे थे। दवाएं और मंत्र सब बेअसर हो रहे थे। तब उन्होंने भगवान हनुमान की प्रार्थना की और उनसे मदद मांगी। भगवान हनुमान ने तुलसीदास जी को स्वप्न में दर्शन दिए और उन्हें हनुमान बाहुकलिखने का निर्देश दिया।

तुलसीदास ने जागते ही हनुमान बाहुक की रचना प्रारंभ की, जो 44 छंदों में भगवान हनुमान की महिमा का गुणगान करता है। इसे लिखते समय, जैसे-जैसे तुलसीदास जी छंदों का पाठ करते गए, उनका दर्द कम होता गया। पूरी प्रार्थना पूरी करने के बाद, उन्होंने इसे श्रद्धा और भक्ति के साथ पढ़ा, और उनका दर्द पूरी तरह से समाप्त हो गया।

हनुमान बाहुक का महत्व

तुलसीदास का मानना था कि हनुमान बाहुक भगवान हनुमान की प्रेरणा से लिखी गई और इसमें शारीरिक और मानसिक रोगों को ठीक करने की शक्ति है। उनका यह भी मानना था कि अगर इसे विश्वास और भक्ति के साथ पढ़ा जाए, तो भगवान हनुमान का आशीर्वाद प्राप्त होता है और जीवन की कठिनाइयों को दूर किया जा सकता है।

आज भी हनुमान बाहुक को एक शक्तिशाली प्रार्थना के रूप में देखा जाता है, जिसे भक्त भगवान हनुमान के आशीर्वाद और सुरक्षा के लिए पढ़ते हैं। यह प्रार्थना दुखों से मुक्ति दिलाने और जीवन की बाधाओं को दूर करने में सहायक मानी जाती है।

हनुमान बाहुक का पाठ कैसे करें

हालांकि हनुमान बाहुक के पाठ के लिए कोई सख्त नियम नहीं हैं, फिर भी कुछ सामान्य दिशा-निर्देश हैं, जिनका पालन करने से पाठ अधिक फलदायी हो सकता है:

  1. एक शांत और स्वच्छ स्थान चुनें, जहाँ भगवान हनुमान की तस्वीर या मूर्ति हो।
  2. दीपक और धूप जलाएं, और स्नान या हाथ-पैर धोकर शुद्धता का प्रतीक मानकर पाठ प्रारंभ करें।
  3. पाठ से पहले हनुमान चालीसा या कोई और प्रार्थना करें।
  4. पूरे 44 छंदों का पाठ भक्ति और श्रद्धा के साथ करें।
  5. पाठ पूरा करने के बाद भगवान हनुमान को फूल या फल अर्पित करें।
  6. पाठ को नियमित रूप से 43 दिनों तक करें ताकि इसके पूर्ण लाभ प्राप्त हो सकें।

पाठ के दौरान सावधानियाँ

हनुमान बाहुक एक शक्तिशाली प्रार्थना है, इसलिए इसे गंभीरता और श्रद्धा के साथ करना चाहिए। इसे कभी भी लापरवाही से या मानसिक रूप से विचलित अवस्था में न पढ़ें। और अगर किसी प्रकार की शारीरिक या मानसिक बीमारी है, तो चिकित्सकीय सलाह और उपचार के साथ-साथ इस प्रार्थना को पढ़ें, ताकि ईश्वर की कृपा से आपकी सेहत में शीघ्र सुधार हो।

हनुमान बाहुक का नियमित पाठ भक्तों को मानसिक और शारीरिक समस्याओं से मुक्ति दिलाने, नकारात्मक ऊर्जा से बचाने और जीवन की कठिनाइयों को दूर करने में मदद करता है।

लेख का संक्षेप

हनुमान बाहुक भगवान हनुमान को समर्पित एक प्रार्थना है। इस ब्लॉग में हनुमान बाहुक की उत्पत्ति, रचना, और महत्व पर चर्चा की गई है, साथ ही इसके आशीर्वाद और इसे कैसे पढ़ा जाए, इस पर भी प्रकाश डाला गया है।

हनुमान जी द्वारा संजीवनी बूटी लाने की कथा हनुमान बाहुक की रचना का आधार मानी जाती है। इसे 16वीं शताब्दी में तुलसीदास जी ने लिखा था। इस शक्तिशाली प्रार्थना का नियमित पाठ शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार, नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा, और आध्यात्मिक उन्नति जैसे अनेक लाभ प्रदान करता है।

तुलसीदास जी पर हनुमान जी के आशीर्वाद और हनुमान बाहुक के उनके जीवन पर प्रभाव की चर्चा भी इस लेख में की गई है।


1. हनुमान बाहुक मंत्र क्या है?

हनुमान बाहुक भगवान हनुमान को समर्पित एक प्रार्थना है, जिसे गोस्वामी तुलसीदास ने रचा था। यह 44 छंदों में भगवान हनुमान की महिमा का गुणगान करता है और शारीरिक व मानसिक कष्टों से मुक्ति दिलाने वाली मानी जाती है। इसे विशेष रूप से दर्द और बीमारियों से राहत के लिए पढ़ा जाता है।

2. हनुमान बाहुक कैसे पढ़ा जाता है?

हनुमान बाहुक का पाठ करने के लिए आपको एक शांत और स्वच्छ स्थान पर बैठना चाहिए, जहाँ भगवान हनुमान की मूर्ति या तस्वीर हो। दीपक जलाएं और हाथ-पैर धोकर शुद्धता के साथ पाठ प्रारंभ करें। हनुमान बाहुक के 44 छंदों को श्रद्धा और भक्ति के साथ पढ़ें। 43 दिनों तक नियमित रूप से पाठ करने से अधिक लाभ होता है।

3. हनुमान बाहुक के क्या फायदे हैं?

हनुमान बाहुक के नियमित पाठ से मानसिक और शारीरिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। यह प्रार्थना नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा करती है, आत्मविश्वास बढ़ाती है और जीवन की बाधाओं को दूर करने में मदद करती है। इसे पढ़ने से आध्यात्मिक विकास भी होता है और भगवान हनुमान का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

4. हनुमान बाहुक कितने दिन करना चाहिए?

हनुमान बाहुक का पाठ 43 दिनों तक नियमित रूप से करना चाहिए। इस दौरान श्रद्धा और भक्ति के साथ पाठ करने से भगवान हनुमान की कृपा से शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं।

5. बजरंग बाण रोज बोल सकते हैं क्या?

हाँ, बजरंग बाण का पाठ आप रोज कर सकते हैं। यह एक शक्तिशाली प्रार्थना है जो नकारात्मक ऊर्जा से बचाने और जीवन की कठिनाइयों को दूर करने में सहायक मानी जाती है। हालांकि इसे हमेशा श्रद्धा और भक्ति के साथ पढ़ना चाहिए।

6. डर लगने पर हनुमान जी का कौन सा मंत्र बोलना चाहिए?

डर और भय से मुक्ति पाने के लिए आप “हनुमान चालीसा” या “हनुमान बाहुक” का पाठ कर सकते हैं। इसके अलावा, “ॐ हनुमंते नमः” का जाप भी आपको डर से छुटकारा दिलाने और साहस प्रदान करने में मदद करेगा।

List of 51 Shakti Peetha: 51 शक्तिपीठ जो माँ सती के शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों के हैं प्रतीक

51 Shakti Peetha – माता सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में आत्मदाह कर लिया था, क्योंकि राजा दक्ष ने अपने पिता भगवान शिव को यज्ञ में से मना लिया था और यज्ञ भूमि पर शिव का अपमान किया था। यह अपमान माता सती के लिए असहनीय था। उन्होंने अपना जन निर्णय लिया और यज्ञ अग्नि में कूद पड़े। जब भगवान शिव को इस घटना का पता चला, तो उन्होंने अपने गण वीरभद्र को आदेश दिया कि वह इस अपमान का प्रतिशोध लें।

वीरभद्र ने केवल यज्ञ भूमि को नष्ट नहीं किया, बल्कि राजा दक्ष के सिर ने इसे भगवान शिव के चरण में रख दिया। इसके बाद, भगवान शिव ने माता सती की अर्धजली देह को यज्ञ भूमि से उठाया और सभी दिशाओं में गहन शोक प्रकट किया। इस दौरान जहां-जहां माता सती के अंग की महिमा हुई, वहां-वहां शक्तिपीठ की स्थापना हुई। अंततः माता सती ने पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया।

विभिन्न ग्रंथों में शक्ति पृष्णों का उल्लेख किया गया है। देवी भागवत पुराण में शक्ति पिरों की संख्या 108 है, जबकि कालिकापुराण में 26, शिवचरित्र में 51 और दुर्गा शप्तसती तथा तंत्रचूड़ामणि में यह संख्या 52 बताई गई है। लेकिन सामान्यतः 51 शक्ति पीठों की व्याख्या दी जाती है। तंत्रचूड़ामणि में 52 शक्ति पिरोनो का वर्णन। ये सभी शक्तिपीठ देवी सती की शारीरिक चिकित्सा से जुड़ी हैं और बहुत महत्वपूर्ण हैं।

प्रस्तुत है विभिन्न राज्यों में स्थित 51 शक्ति पीठों की सूची, जो भक्त पूजन के लिए स्थलों पर जाते हैं। प्रत्येक शक्ति पीठ का एक विशिष्ट महत्व है, और भक्तगण यहां देवी मां से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। शक्ति पीठों की यात्रा धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि यह साधक के आध्यात्मिक विकास के लिए आवश्यक है। ये शक्ति पीठ विभिन्न पौराणिक कथाओं से जुड़ी हुई हैं, जो हमारे धर्म और संस्कृति के अमूल्य मसाले हैं। आप यहां से लक्ष्मी चालीसा और धन-समृद्धि की कुंजी: कनकधारा स्तोत्र पढ़ सकते हैं!

List of 51 Shakti Peetha: 51 शक्तिपीठ

1. हिंगलाज

हिंगलाज शक्तिपीठ, जिसे हिंगुला भी कहा जाता है, पाकिस्तान के कराची से लगभग 125 किमी उत्तर-पूर्व दिशा में स्थित है। यह पवित्र स्थान मां सती के एक अंग का मंदिर है, जहाँ उनकी ब्रह्मरंध (सिर) गिरा था। हिंगलाज शक्तिपीठ का विशेष महत्व है और यह हिन्दू धर्म में एक प्रमुख तीर्थ स्थल के रूप में जाना जाता है।

यहां की देवी की शक्ति कोटरी के रूप में जानी जाती है, जिसे भैरवी-कोट्टवीशा कहा जाता है। भक्तों का मानना है कि यहां आने से वे मानसिक और आध्यात्मिक शांति प्राप्त कर सकते हैं। इसके अलावा, यहां का भैरव, जिसे भीमलोचन के नाम से जाना जाता है, की पूजा भी की जाती है।

हिंगलाज शक्तिपीठ एक प्राकृतिक गुफा में स्थित है, जहां श्रद्धालु दूर-दूर से आते हैं। यह स्थान न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि इसकी अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता भी भक्तों को आकर्षित करती है। हिंगलाज शक्तिपीठ में हर साल मेला आयोजित होता है, जिसमें बड़ी संख्या में भक्त भाग लेते हैं। यह स्थान श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है।

2. शर्कररे (करवीर)

शर्कररे शक्तिपीठ पाकिस्तान के कराची के सुक्कर स्टेशन के निकट स्थित है। यह एक प्रमुख धार्मिक स्थल है जहाँ माता की आँख गिरने की मान्यता है। यहाँ की शक्ति महिषासुरमर्दिनी मानी जाती है, जो दुर्गा के रूप में जानी जाती हैं। इस शक्तिपीठ के साथ भैरव को क्रोधिश के नाम से पूजा जाता है। इस स्थान पर श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए आते हैं और यहाँ की शक्ति का आशीर्वाद लेते हैं।

यह शक्तिपीठ उन श्रद्धालुओं के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जो देवी दुर्गा की उपासना करते हैं। यहाँ के भक्त अपनी समस्याओं के समाधान के लिए विशेष रूप से आते हैं और माता की कृपा प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं। इस जगह की धार्मिक महत्वता न केवल स्थानीय लोगों के लिए है बल्कि दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी यह एक विशेष आस्था का केंद्र है। शर्कररे शक्तिपीठ की भक्ति और श्रद्धा में डूबी पवित्रता इस स्थान को और भी दिव्य बनाती है। यहाँ का माहौल भक्ति और आस्था से भरा हुआ है।

3. सुगंधा- सुनंदा

बांग्लादेश के शिकारपुर में बरिसल से लगभग 20 किमी दूर सोंध नदी के किनारे स्थित माँ सुगंधा शक्तिपीठ एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। यहाँ पर माता की नासिका गिरने की मान्यता है, जिसे लेकर भक्तगण यहाँ आते हैं। इस शक्तिपीठ की देवी की शक्ति सुनंदा के रूप में मानी जाती है और भैरव को त्र्यंबक कहा जाता है। यह स्थान भक्तों के लिए अत्यधिक श्रद्धा का केंद्र है, जहाँ वे अपनी समस्याओं का समाधान माँ से प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करते हैं।

माँ सुगंधा का स्थान स्थानीय लोगों के लिए विशेष महत्व रखता है। यहाँ के भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए नियमित रूप से पूजा करते हैं। यह स्थल सिर्फ धार्मिकता का ही प्रतीक नहीं है, बल्कि यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता भी लोगों को आकर्षित करती है। भक्तगण यहाँ आने के बाद अपनी आत्मा की शांति के लिए ध्यान और साधना करते हैं। माँ सुगंधा की पूजा अर्चना में हर प्रकार की भक्ति और श्रद्धा का समावेश होता है, जो इस स्थान को और भी पवित्र बनाता है। यहाँ का माहौल शांत और मनमोहक है, जो भक्तों को एक अलग ही अनुभव प्रदान करता है।

4. कश्मीर- महामाया

भारत के कश्मीर में पहलगाँव के निकट स्थित महामाया शक्तिपीठ एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। यहाँ पर माता का कंठ गिरने की मान्यता है, जो इस स्थान को और भी खास बनाती है। महामाया की शक्ति को भक्तगण अत्यंत श्रद्धा से मानते हैं और भैरव को त्रिसंध्येश्वर कहा जाता है। यह स्थल न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी प्रसिद्ध है, जहाँ श्रद्धालु अपने मन की शांति और सामर्थ्य की प्राप्ति के लिए आते हैं।

महामाया शक्तिपीठ का धार्मिक महत्व बहुत गहरा है। यहाँ की पूजा अर्चना में भक्त अपनी समस्याओं का समाधान माँ से मांगते हैं। माता की कृपा से भक्त अपने जीवन में आने वाली कठिनाइयों को पार कर पाते हैं। इस शक्तिपीठ के आस-पास की वादियाँ और पर्वत दृश्य श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। यहाँ का शांत वातावरण और देवी की उपासना के लिए समर्पित भावनाएँ भक्तों को एक नई ऊर्जा देती हैं। महामाया का स्थान कश्मीर की सांस्कृतिक धरोहर का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणा स्रोत बनता है।

5. ज्वालामुखी- सिद्धिदा (अंबिका)

भारत के हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित ज्वालामुखी शक्तिपीठ एक प्रमुख धार्मिक स्थल है। यहाँ पर माता की जीभ गिरने की मान्यता है, जिससे यह स्थान अत्यधिक महत्वपूर्ण बन जाता है। इस शक्तिपीठ की देवी सिद्धिदा (अंबिका) के रूप में पूजी जाती है और भैरव को उन्मत्त कहा जाता है। ज्वालामुखी का यह स्थान अपनी धार्मिक और आध्यात्मिक विशेषताओं के लिए जाना जाता है, जहाँ भक्त माँ से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए आते हैं।

ज्वालामुखी शक्तिपीठ का महत्व यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं के लिए अद्वितीय है। यहाँ की पूजा और अर्चना से भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की आशा करते हैं। यह स्थान भक्ति और आस्था का केंद्र है, जहाँ भक्तों की भीड़ हर समय रहती है। यहाँ का वातावरण धार्मिकता और साधना से भरा हुआ है, जो भक्तों को प्रेरित करता है। इस शक्तिपीठ की उपासना करने वाले श्रद्धालु अपने जीवन की कठिनाइयों को दूर करने के लिए यहाँ आते हैं और माँ का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। ज्वालामुखी शक्तिपीठ की ऊर्जा और शक्ति भक्तों को नई उम्मीद और साहस प्रदान करती है।

6. जालंधर- त्रिपुरमालिनी

पंजाब के जालंधर जिले में छावनी स्टेशन के निकट स्थित देवी तालाब एक प्रमुख शक्तिपीठ है। यहाँ पर माता का बायाँ वक्ष गिरने की मान्यता है, जिससे यह स्थान भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है। यहाँ की देवी त्रिपुरमालिनी के रूप में जानी जाती हैं और भैरव को भीषण कहा जाता है। यह शक्तिपीठ उन भक्तों के लिए एक पवित्र स्थल है जो देवी माँ की कृपा प्राप्त करने के लिए यहाँ आते हैं।

जालंधर का यह शक्तिपीठ धार्मिक आस्था का एक केंद्र है, जहाँ श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए पूजा अर्चना करते हैं। माता की कृपा से भक्त अपनी जीवन की कठिनाइयों का सामना करने में समर्थ होते हैं। यहाँ का शांत और दिव्य वातावरण भक्तों को ध्यान और साधना के लिए प्रेरित करता है। देवी तालाब के चारों ओर का दृश्य अद्भुत है, जो श्रद्धालुओं को एक नई ऊर्जा और शक्ति प्रदान करता है। त्रिपुरमालिनी शक्तिपीठ की उपासना में भक्तों का अटूट विश्वास और आस्था इस स्थान को और भी खास बनाती है। यहाँ के भक्त अपनी समस्याओं का समाधान माँ से प्राप्त करने की आशा रखते हैं और नियमित रूप से यहाँ आकर पूजा करते हैं।

7. वैद्यनाथ- जयदुर्गा

झारखंड के देवघर में स्थित वैद्यनाथधाम एक प्रमुख शक्तिपीठ है, जहाँ माता का हृदय गिरने की मान्यता है। यहाँ की देवी जय दुर्गा के रूप में जानी जाती हैं और भैरव को वैद्यनाथ कहा जाता है। यह स्थान धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है और यहाँ आने वाले भक्त माँ से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए विशेष रूप से आते हैं। वैद्यनाथधाम का यह पवित्र स्थल अपने अद्वितीय आकर्षण और भक्ति के लिए प्रसिद्ध है।

वैद्यनाथधाम का धार्मिक महत्व भक्तों के लिए विशेष है। यहाँ पर भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए श्रद्धा और विश्वास के साथ पूजा करते हैं। यह स्थान भक्ति, साधना और आस्था का अद्भुत संगम है। भक्तों का मानना है कि यहाँ आकर माँ की कृपा से वे अपने जीवन में सुख-शांति और समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं। वैद्यनाथधाम की आस्था और भक्ति भक्तों को एक नई ऊर्जा और साहस प्रदान करती है। यहाँ का शांत वातावरण और देवी की उपासना के लिए समर्पित भावनाएँ इस स्थान को और भी पवित्र बनाती हैं। इस शक्तिपीठ का महत्व न केवल स्थानीय लोगों के लिए, बल्कि दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी अत्यधिक है।

8. नेपाल- महामाया

नेपाल में स्थित गुजरेश्वरी मंदिर, पशुपतिनाथ के निकट एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। यहाँ पर माता के दोनों घुटने गिरने की मान्यता है, जिससे यह शक्तिपीठ विशेष महत्व रखता है। यहाँ की देवी महशिरा (महामाया) के रूप में पूजी जाती हैं और भैरव को कपाली कहा जाता है। इस स्थान पर भक्तगण अपनी समस्याओं का समाधान माँ से प्राप्त करने के लिए आते हैं।

महामाया का यह स्थान न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता भी लोगों को आकर्षित करती है। यहाँ के भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए विशेष रूप से यहाँ आते हैं। यह शक्तिपीठ उन लोगों के लिए एक आस्था का केंद्र है जो देवी माँ की उपासना करते हैं। गुजरेश्वरी मंदिर का वातावरण भक्ति और आस्था से भरा हुआ है, जो भक्तों को एक अलग अनुभव प्रदान करता है। इस स्थान की पवित्रता और माँ की शक्ति के प्रति श्रद्धा भक्तों के लिए एक प्रेरणा स्रोत बनती है। यहाँ की पूजा और अर्चना में हर प्रकार की भक्ति और श्रद्धा का समावेश होता है, जो इस स्थान को और भी दिव्य बनाता है।

9. मानस- दाक्षायणी

दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य में स्थित मानस शक्तिपीठ एक प्रमुख धार्मिक स्थल है। यहाँ पर माता का मस्तक गिरने की मान्यता है, जिससे यह स्थान अत्यधिक महत्वपूर्ण बन जाता है। इस शक्तिपीठ की देवी दाक्षायणी के रूप में जानी जाती हैं और भैरव को अघोरेश्वर कहा जाता है। यहाँ भक्त अपनी समस्याओं का समाधान माँ से मांगते हैं और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

मानस शक्तिपीठ का धार्मिक महत्व भक्तों के लिए अद्वितीय है। यहाँ की पूजा और अर्चना से भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की आशा करते हैं। यह स्थान भक्ति और आस्था का केंद्र है, जहाँ भक्तों की भीड़ हर समय रहती है। यहाँ का वातावरण धार्मिकता और साधना से भरा हुआ है, जो भक्तों को प्रेरित करता है। दाक्षायणी की उपासना करने वाले श्रद्धालु अपने जीवन की कठिनाइयों को दूर करने के लिए यहाँ आते हैं और माँ का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। मानस शक्तिपीठ की ऊर्जा और शक्ति भक्तों को नई उम्मीद और साहस प्रदान करती है।

10. विरजा- विरजाक्षेत्र

भारतीय प्रदेश उड़ीसा के उत्कल क्षेत्र में विरज का स्थान एक महत्वपूर्ण शक्तिपीठ है। यहाँ पर मान्यता है कि माता की नाभि यहाँ गिरी थी। इस क्षेत्र की शक्ति को विमला के रूप में जाना जाता है और यहाँ के भैरव को जगन्नाथ कहा जाता है। यह स्थान धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है और यहाँ हर साल हजारों श्रद्धालु माता के दर्शन करने आते हैं। विरज क्षेत्र की महिमा और महत्व को देखते हुए, यहाँ विभिन्न उत्सव और अनुष्ठान भी आयोजित किए जाते हैं।

माता के प्रति श्रद्धा और भक्ति को दर्शाने के लिए लोग यहाँ विशेष रूप से आते हैं। इसे अंचल की शक्ति का प्रतीक माना जाता है और यहां माता के भक्तों का समर्पण देखने को मिलता है।

विरजा क्षेत्र का धार्मिक महत्व और इसकी दिव्यता इसे एक अद्वितीय स्थान बनाते हैं। श्रद्धालु यहाँ विभिन्न प्रकार के अनुष्ठान करते हैं और माता की कृपा प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करते हैं। यहाँ के भक्तजन अपने परिवार और समुदाय की खुशहाली के लिए माता से आशीर्वाद लेते हैं। यह स्थान न केवल एक शक्तिपीठ है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक केंद्र भी है जहाँ परंपराएं और धार्मिक रिवाज आज भी जीवित हैं।

11. गंडक- गंडकी

नेपाल की गंडकी नदी के किनारे स्थित मुक्तिनाथ मंदिर एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। यहाँ पर मान्यता है कि माता का मस्तक, जिसे गंडस्थल भी कहा जाता है, यहाँ गिरा था। इस मंदिर की शक्ति गंडकी चण्डी के रूप में जानी जाती है, जबकि यहाँ के भैरव को भैरव चक्रपाणि कहा जाता है।

यह स्थल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक महत्व के कारण श्रद्धालुओं के बीच प्रसिद्ध है। मुक्तिनाथ में भक्तों की भीड़ लगी रहती है, जो यहाँ आकर माता की कृपा प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त करते हैं।

मुक्तिनाथ मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह स्थान एक अद्वितीय अनुभव प्रदान करता है। यहाँ आने पर लोग न केवल धार्मिक अनुष्ठान करते हैं, बल्कि यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता का भी आनंद लेते हैं। गंडकी नदी की तट पर स्थित इस मंदिर में एक शांत वातावरण है, जो भक्तों को आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराता है। माता की पूजा के साथ-साथ यहाँ पर पर्यटकों को अद्भुत दृश्यावलियों का भी आनंद मिलता है, जिससे यह स्थान और भी आकर्षक बन जाता है।

12. बहुला- बहुला (चंडिका)

भारतीय प्रदेश पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले में स्थित बहुला शक्तिपीठ माता चंडिका के प्रति समर्पित है। यहाँ पर मान्यता है कि माता का बायाँ हाथ इस क्षेत्र में गिरा था। इस स्थल की शक्ति देवी बाहुला के रूप में जानी जाती है, जबकि यहाँ के भैरव को भीरुक कहा जाता है। यह स्थल भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है, जहाँ श्रद्धालु माता की कृपा प्राप्त करने के लिए आते हैं।

बहुला शक्तिपीठ का धार्मिक महत्व इसके आसपास के क्षेत्र में बहुत अधिक है। यहाँ पर नियमित रूप से पूजा-अर्चना और भक्ति अनुष्ठान होते हैं, जो श्रद्धालुओं के बीच गहरी आस्था और विश्वास को दर्शाते हैं। भक्तजन यहाँ अपने परिवार की भलाई और सुख-समृद्धि के लिए माता से आशीर्वाद लेते हैं।

इस शक्तिपीठ का वातावरण भक्तिमय है, जो लोगों को आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करता है। देवी बाहुला के प्रति श्रद्धा और भक्ति यहाँ की परंपरा का हिस्सा हैं, जिससे यह स्थान और भी महत्वपूर्ण बन जाता है।

13. उज्जयिनी- मांगल्य चंडिका

उज्जयिनी का स्थान भारतीय प्रदेश पश्चिम बंगाल में स्थित है, जहाँ माता की दायीं कलाई गिरने की मान्यता है। इस शक्तिपीठ की शक्ति मांगल्य चंडिका के रूप में जानी जाती है, जबकि यहाँ के भैरव को कपिलांबर कहा जाता है। उज्जयिनी का यह स्थल धार्मिक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है और यहाँ श्रद्धालुओं का ताता लगा रहता है। माता की कृपा पाने के लिए लोग यहाँ नियमित रूप से आते हैं और विभिन्न अनुष्ठान करते हैं।

उज्जयिनी में माता की पूजा और अनुष्ठान केवल धार्मिक कार्य नहीं होते, बल्कि यह श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक भी हैं। यहाँ की सुंदरता और शांत वातावरण भक्तों को आकर्षित करते हैं। भक्तजन यहाँ आने पर अपने जीवन में सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

मांगल्य चंडिका का यह स्थान एक विशेष श्रद्धा का केंद्र है, जहाँ भक्तजन अपनी आस्था के साथ माता से जुड़ने का अनुभव करते हैं। यह शक्तिपीठ केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक मेलजोल का भी प्रतीक है।

14. त्रिपुरा- त्रिपुर सुंदरी

भारतीय राज्य त्रिपुरा के उदरपुर के निकट राधाकिशोरपुर गाँव में स्थित माताबाढ़ी पर्वत शिखर पर त्रिपुर सुंदरी का मंदिर है। यहाँ पर मान्यता है कि माता का दायाँ पैर इस क्षेत्र में गिरा था। इस शक्तिपीठ की शक्ति त्रिपुर सुंदरी के रूप में जानी जाती है, और यहाँ के भैरव को त्रिपुरेश कहा जाता है। यह स्थल अपनी अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक माहौल के लिए प्रसिद्ध है, जहाँ भक्तजन अपने मन की इच्छाओं के लिए माता से प्रार्थना करने आते हैं।

त्रिपुर सुंदरी का मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह त्रिपुरा राज्य की सांस्कृतिक धरोहर का भी हिस्सा है। यहाँ पर भक्तजन विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान करते हैं, और यहाँ का वातावरण भक्ति से भरा रहता है। माता की कृपा प्राप्त करने के लिए लोग दूर-दूर से यहाँ आते हैं। इस स्थान पर आने वाले श्रद्धालु केवल पूजा-अर्चना नहीं करते, बल्कि यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता का भी आनंद लेते हैं। त्रिपुरा का यह शक्तिपीठ भक्तों के लिए एक आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करता है, जो उन्हें अपनी आस्था से जोड़ता है।

15. चट्टल- भवानी

बांग्लादेश के चिट्टागौंग जिले के सीताकुंड स्टेशन के निकट चंद्रनाथ पर्वत शिखर पर चट्टल स्थान स्थित है। यहाँ पर मान्यता है कि माता की दायीं भुजा गिर गई थी। इस शक्तिपीठ की शक्ति भवानी के रूप में जानी जाती है, और भैरव को चंद्रशेखर कहा जाता है। चट्टल का यह स्थान एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है, जहाँ भक्तजन माता की कृपा प्राप्त करने के लिए आते हैं।

चट्टल शक्तिपीठ का धार्मिक महत्व इसके आसपास के क्षेत्र में बहुत अधिक है। यहाँ नियमित रूप से पूजा-अर्चना और भक्ति अनुष्ठान होते हैं, जो भक्तों की गहरी आस्था को दर्शाते हैं। लोग यहाँ अपनी मनोकामनाएँ लेकर आते हैं और माता से आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करते हैं।

चट्टल का शांत वातावरण भक्तों को आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराता है, जिससे यह स्थान और भी महत्वपूर्ण बन जाता है। यहाँ पर श्रद्धालुओं का आस्था के साथ आना और माता की कृपा के लिए प्रार्थना करना इसे एक अद्वितीय स्थान बनाता है।

16. त्रिस्रोता- भ्रामरी

भारतीय राज्य पश्चिम बंगाल के जलपाइगुड़ी जिले में बोडा मंडल के सालबाढ़ी ग्राम स्थित त्रिस्रोत शक्तिपीठ है। यहाँ पर माता का बायाँ पैर गिरने की मान्यता है। इस स्थल की शक्ति भ्रामरी के रूप में जानी जाती है, जबकि यहाँ के भैरव को अंबर और भैरवेश्वर कहा जाता है। त्रिस्रोता का यह स्थान भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है, जहाँ माता की कृपा प्राप्त करने के लिए लोग आते हैं।

भ्रामरी माता के प्रति भक्तों की भक्ति इस स्थान को एक अद्वितीय महत्व देती है। यहाँ पर नियमित रूप से पूजा और अनुष्ठान होते हैं, जो श्रद्धालुओं की आस्था को प्रदर्शित करते हैं। भक्तजन यहाँ अपने परिवार की भलाई के लिए माता से प्रार्थना करते हैं।

त्रिस्रोता का शांत वातावरण और आध्यात्मिकता इस स्थान को और भी आकर्षक बनाती है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु माता की कृपा के लिए अपनी इच्छाओं को व्यक्त करते हैं और भक्ति का अनुभव करते हैं।

17. कामगिरि- कामाख्‍या

कामगिरि भारतीय राज्य असम के गुवाहाटी जिले में स्थित नीलांचल पर्वत पर कामाख्या का मंदिर है। यहाँ पर मान्यता है कि माता का योनि भाग गिरा था। इस शक्तिपीठ की शक्ति कामाख्या के रूप में जानी जाती है, जबकि यहाँ के भैरव को उमानंद कहा जाता है। कामगिरि का यह स्थान एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है, जहाँ भक्तजन माता की कृपा प्राप्त करने के लिए आते हैं।

कामगिरि शक्तिपीठ का धार्मिक महत्व इसके आसपास के क्षेत्र में बहुत अधिक है। यहाँ पर विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान और पूजा-पाठ होते हैं, जो भक्तों की गहरी आस्था को दर्शाते हैं। लोग यहाँ अपनी मनोकामनाएँ लेकर आते हैं और माता से आशीर्वाद प्राप्त करने की इच्छा करते हैं।

कामगिरि का यह स्थान न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता भी इसे एक आकर्षक स्थान बनाती है। भक्तजन यहाँ आने पर आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त करते हैं और अपनी श्रद्धा के साथ माता से जुड़े रहते हैं।

18. प्रयाग – ललिता

भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर, जिसे अब प्रयागराज कहा जाता है, के संगम तट पर माता के हाथ की ऊँगली गिरी थी। यह स्थान धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है और यहाँ हर वर्ष लाखों श्रद्धालु स्नान करने आते हैं। यहाँ पर स्थित ललिता देवी का मंदिर भक्तों के लिए आकर्षण का केंद्र है। इसे ललिता और भैरव की शक्ति के रूप में पूजा जाता है। ललिता देवी को शakti और भैरव को भव कहा जाता है।

संगम तट पर होने वाली कुम्भ मेले में भी इस स्थान का महत्वपूर्ण स्थान है। भक्त यहाँ आकर माँ ललिता से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और अपने मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं। यहाँ का वातावरण भक्ति और श्रद्धा से ओतप्रोत रहता है, जिससे श्रद्धालुओं को मानसिक शांति मिलती है। प्रयाग में देवी ललिता की उपासना करने से जीवन के हर क्षेत्र में सफलता और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

19. जयंती – जयंती

बांग्लादेश के सिलहट जिले के जयंतिया परगना के भोरभोग गाँव, कालाजोर के खासी पर्वत पर जयंती मंदिर है, जहाँ माता की बायीं जंघा गिरी थी। जयंती देवी को शक्ति का प्रतीक माना जाता है और यहाँ भैरव को क्रमदीश्वर कहा जाता है। यह स्थान धार्मिक पर्यटन के लिए प्रसिद्ध है और यहाँ भक्तजन माता की कृपा प्राप्त करने के लिए दूर-दूर से आते हैं।

जयंती देवी की पूजा विशेष रूप से नवरात्रि में धूमधाम से की जाती है, जब भक्तजन भव्य उत्सव आयोजित करते हैं। मंदिर के आस-पास का वातावरण भक्ति भाव से भरा होता है, और यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं को देवी की कृपा से मनचाहे फल की प्राप्ति होती है। जयंती देवी की उपासना से जीवन में सकारात्मकता और ऊर्जा का संचार होता है, जो भक्तों को कठिनाइयों का सामना करने में मदद करता है।

20. युगाद्या – भूतधात्री

पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले के खीरग्राम स्थित जुगाड्‍या (युगाद्या) स्थान पर माता के दाएँ पैर का अंगूठा गिरा था। यहाँ भूतधात्री देवी की पूजा की जाती है, जिन्हें शक्तिशाली और संरक्षण प्रदान करने वाली मानी जाती हैं। इस स्थान पर आने वाले भक्त जन भूतधात्री देवी से अपने जीवन में सुख-समृद्धि और सुरक्षा की कामना करते हैं। भैरव को यहाँ क्षीर खंडक कहा जाता है, जो देवी की शक्ति का प्रतीक है।

युगाद्या का क्षेत्र अपनी धार्मिकता और सांस्कृतिक धरोहर के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के मंदिर का महत्व न केवल धार्मिक है, बल्कि यह पर्यटन स्थल के रूप में भी आकर्षक है। भक्तों का मानना है कि माता भूतधात्री की कृपा से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और जीवन में खुशियों का संचार होता है।

21. कालीपीठ – कालिका

कोलकाता के कालीघाट में माता के बाएँ पैर का अंगूठा गिरा था, जो कालीपीठ के रूप में प्रसिद्ध है। यहाँ माता कालिका की उपासना की जाती है, जिन्हें शक्ति और विनाश की देवी माना जाता है। इस स्थान की महत्ता धार्मिक स्थलों में सर्वोच्च मानी जाती है, विशेष रूप से नवरात्रि के दौरान यहाँ भारी भीड़ लगती है। भक्तजन माता कालिका से सुरक्षा और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए यहाँ आते हैं।

भैरव को नकुशील कहा जाता है, जो इस स्थान की शक्ति को और बढ़ाता है। कालीघाट के मंदिर का इतिहास भी बहुत पुराना है और इसे माता के अद्वितीय स्वरूप के लिए जाना जाता है। यहाँ की भक्ति भावना और आध्यात्मिकता भक्तों के मन में गहरी छाप छोड़ती है, जिससे उन्हें मानसिक शांति और संतोष की प्राप्ति होती है।

22. किरीट – विमला (भुवनेशी)

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के लालबाग कोर्ट रोड स्टेशन के पास किरीटकोण ग्राम के निकट माता का मुकुट गिरा था। यहाँ विमला देवी की पूजा की जाती है, जिन्हें भुवनेशी भी कहा जाता है। यह स्थान धार्मिक मान्यता के अनुसार विशेष महत्व रखता है और भक्त यहाँ आकर देवी से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। विमला देवी की शक्ति को समर्पित इस स्थान पर श्रद्धालु विशेष अवसरों पर बड़ी श्रद्धा से पूजा करते हैं।

भैरव को संवर्त्त कहा जाता है, जो देवी की उपासना में सहयोगी बनता है। यहाँ के वातावरण में भक्ति और श्रद्धा का एक अद्भुत संचार होता है। भक्तगण यहाँ आकर अपने मन की इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं और विमला देवी की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

23. वाराणसी – विशालाक्षी

उत्तर प्रदेश के काशी में मणिकर्णिका घाट पर माता के कान के मणिजड़ीत कुंडल गिरे थे। यहाँ विशालाक्षी माता की पूजा की जाती है, जो शक्ति और समृद्धि की देवी मानी जाती हैं। काशी, जिसे भगवान शिव की नगरी माना जाता है, यहाँ के धार्मिक महत्व को और बढ़ाता है। भक्त जन विशालाक्षी देवी से मोक्ष और सुख की प्राप्ति के लिए यहाँ आते हैं। इस स्थान पर भैरव को काल भैरव कहा जाता है, जो यहाँ की विशेष पूजा का हिस्सा है।

मणिकर्णिका घाट का धार्मिक महत्त्व भी अद्वितीय है, जहाँ लोग अपने पितरों के लिए तर्पण करते हैं। यहाँ की भक्ति और आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिलता है, जिससे भक्तों को मानसिक शांति और आनंद की अनुभूति होती है।

24. कन्याश्रम – सर्वाणी

कन्याश्रम में माता का पृष्ठ भाग गिरा था, जहाँ सर्वाणी देवी की उपासना की जाती है। यह स्थान भक्तों के लिए एक प्रमुख तीर्थ स्थल है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु देवी से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए विशेष उत्साह के साथ आते हैं। सर्वाणी देवी को अन्न और सुख की देवी माना जाता है, और भक्तजन यहाँ अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।

भैरव को निमिष कहा जाता है, जो यहाँ की शक्ति और सुरक्षा का प्रतीक है। इस स्थान का वातावरण भक्ति और श्रद्धा से भरा हुआ रहता है, जहाँ लोग अपने मन के विचारों को देवी के सामने व्यक्त करते हैं। कन्याश्रम की भक्ति परंपरा और आस्था भक्तों को मानसिक शांति और ऊर्जा प्रदान करती है।

25. कुरुक्षेत्र – सावित्री

हरियाणा के कुरुक्षेत्र में माता की एड़ी (गुल्फ) गिरी थी, जहाँ सावित्री देवी की पूजा की जाती है। कुरुक्षेत्र को धर्म भूमि माना जाता है और यहाँ का महत्व धार्मिक स्थलों में प्रमुख है। सावित्री देवी को जीवन और सुरक्षा की देवी माना जाता है। यहाँ आने वाले भक्तजन माता से अपने जीवन में सुख और समृद्धि की कामना करते हैं।

भैरव को स्थाणु कहा जाता है, जो देवी की उपासना का एक महत्वपूर्ण भाग है। कुरुक्षेत्र में होने वाले मेलों और धार्मिक समारोहों में इस स्थान की महत्ता और बढ़ जाती है। भक्तजन यहाँ आकर देवी की कृपा से अपने कष्टों का निवारण करने का प्रयास करते हैं, जिससे उन्हें मानसिक शांति मिलती है।

26. मणिदेविक – गायत्री

अजमेर के निकट पुष्कर के मणिबन्ध स्थान के गायत्री पर्वत पर दो मणिबंध गिरे थे। यहाँ गायत्री देवी की पूजा की जाती है, जो ज्ञान और प्रकाश की देवी मानी जाती हैं। मणिदेविक का यह स्थान विशेष रूप से धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। भक्तजन यहाँ आकर गायत्री देवी से अपने ज्ञान में वृद्धि और आत्मिक शांति की कामना करते हैं।

यहाँ का वातावरण भक्ति और साधना से भरा होता है, जिससे श्रद्धालुओं को सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। भैरव को सर्वानंद कहा जाता है, जो इस स्थान की दिव्यता को बढ़ाता है। मणिदेविक की उपासना से भक्तों के मन में संतोष और शांति का अनुभव होता है, जिससे उनका जीवन सुखमय बनता है।

27. श्रीशैल – महालक्ष्मी

बांग्लादेश के सिलहट जिले के उत्तर-पूर्व में जैनपुर गाँव के पास शैल नामक स्थान पर माता का गला (ग्रीवा) गिरा था। यहाँ महालक्ष्मी की पूजा की जाती है, जिन्हें धन, सुख और समृद्धि की देवी माना जाता है। श्रीशैल का यह स्थान भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। महालक्ष्मी की उपासना से भक्त जन धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए यहाँ आते हैं।

भैरव को शम्बरानंद कहा जाता है, जो देवी की शक्ति का प्रतीक है। यहाँ का वातावरण भक्ति और श्रद्धा से भरा रहता है, जहाँ लोग अपनी समस्याओं का समाधान पाने के लिए प्रार्थना करते हैं। इस स्थान पर महालक्ष्मी की कृपा से भक्तों के जीवन में खुशियाँ और समृद्धि आती हैं।

28. कांची – देवगर्भा

पश्चिम बंगाल के बीरभूमी जिला के बोलारपुर स्टेशन के उत्तर-पूर्व स्थित कोपई नदी तट पर कांची नामक स्थान पर माता की अस्थि गिरी थी। यहाँ देवी देवगर्भा की पूजा की जाती है, जिन्हें मातृत्व और संतान सुख की देवी माना जाता है। भक्तजन यहाँ आकर देवी से संतान सुख की प्राप्ति और अपने परिवार के लिए सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

देवी की उपासना विशेष रूप से नवरात्रि के दौरान धूमधाम से की जाती है। भैरव को रुरु कहा जाता है, जो इस स्थान की शक्ति का प्रतीक है। कांची के इस तीर्थ स्थल का धार्मिक महत्त्व भक्तों के लिए अत्यधिक है और यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं को मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।

29. कालमाधव – देवी काली

मध्यप्रदेश के अमरकंटक के कालमाधव स्थित शोन नदी तट के पास माता का बायाँ नितंब गिरा था, जहाँ देवी काली की पूजा की जाती है। काली को शक्ति और विनाश की देवी माना जाता है और यहाँ भक्तजन विशेष रूप से काली माता से अपने जीवन में सुख और सुरक्षा की कामना करते हैं।

इस स्थान की आध्यात्मिकता और भक्ति का माहौल भक्तों को आकर्षित करता है। भैरव को असितांग कहा जाता है, जो इस क्षेत्र की शक्ति को बढ़ाता है। कालमाधव का स्थान धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है और यहाँ आने वाले भक्तजन देवी काली की कृपा से अपने जीवन में सकारात्मकता लाने का प्रयास करते हैं।

30. शोणदेश- नर्मदा (शोणाक्षी)

मध्यप्रदेश के अमरकंटक में नर्मदा नदी के उद्गम स्थल पर शोणदेश नामक स्थान है। यहाँ माता के दाएँ नितंब का गिरना एक महत्वपूर्ण धार्मिक मान्यता है। इसे लेकर कहा जाता है कि यहाँ माता की शक्ति नर्मदा है और भैरव का नाम भद्रसेन है। यह स्थान न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसकी प्राकृतिक सुंदरता भी आकर्षण का केंद्र है। नर्मदा नदी का उद्गम स्थल होने के नाते, यह क्षेत्र यात्रियों और भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है।

यहाँ आकर लोग न केवल माता की पूजा करते हैं, बल्कि नर्मदा नदी की पवित्रता को भी अनुभव करते हैं। श्रद्धालु यहाँ आकर मानसिक शांति प्राप्त करते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं। यह स्थान आस्था और प्रकृति का अनूठा संगम है, जहाँ भक्तों का आना-जाना लगा रहता है। यहाँ की शांति और सौंदर्य भक्तों को अपनी ओर खींचते हैं और इस क्षेत्र को एक दिव्य अनुभव प्रदान करते हैं।

31. रामगिरि- शिवानी

उत्तरप्रदेश के झाँसी-मणिकपुर रेलवे स्टेशन के पास चित्रकूट में स्थित रामगिरि नामक स्थान पर माता का दायाँ वक्ष गिरा था। यहाँ की शक्ति शिवानी है और भैरव का नाम चंड है। इस क्षेत्र की पवित्रता और आस्था भक्तों के लिए विशेष अनुभव प्रदान करती है। रामगिरि का नाम स्थानीय लोगों के बीच एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। यह स्थल माता के प्रति श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है।

श्रद्धालु यहाँ आकर अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं और माता के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हैं। यह क्षेत्र प्राकृतिक सौंदर्य से भरा हुआ है, जहाँ हरियाली और पहाड़ों का संगम भक्तों को एक अद्वितीय अनुभव प्रदान करता है। यहाँ की धार्मिक अनुष्ठान और उत्सव भी भक्तों को आकर्षित करते हैं, जिससे यह स्थल सदा जीवंत रहता है। रामगिरि की इस विशेषता के कारण यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में वृद्धि हो रही है।

32. वृंदावन- उमा

उत्तरप्रदेश के मथुरा के निकट वृंदावन के भूतेश्वर स्थान पर माता के गुच्छ और चूड़ामणि गिरे थे। इस क्षेत्र की शक्ति उमा है और भैरव का नाम भूतेश है। वृंदावन का स्थान भगवान कृष्ण के लीलाओं का स्थल है, जो श्रद्धालुओं के लिए एक विशेष धार्मिक महत्व रखता है। यहाँ आकर भक्त न केवल माता की पूजा करते हैं, बल्कि भगवान कृष्ण की लीलाओं का भी अनुभव करते हैं। इस स्थान की आस्था और भक्ति हर भक्त को एक अद्वितीय अनुभव प्रदान करती है।

वृंदावन की हरियाली, बाग-बगिचे और मंदिरों की भव्यता इसे एक अद्भुत स्थल बनाती है। भक्त यहाँ आकर अपने मन की इच्छाएँ पूरी करने के लिए प्रार्थना करते हैं। यहाँ की पवित्रता और आध्यात्मिकता भक्तों को मानसिक शांति प्रदान करती है। वृंदावन में उपस्थित मठ और मंदिर श्रद्धालुओं के लिए ध्यान और साधना का स्थल भी है, जहाँ भक्त अपने मन की शांति के लिए आते हैं।

33. शुचि- नारायणी

तमिलनाडु के कन्याकुमारी-तिरुवनंतपुरम मार्ग पर स्थित शुचितिर्थम शिव मंदिर एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। यहाँ माता की ऊपरी दंत (ऊर्ध्वदंत) गिरे थे। इस क्षेत्र की शक्ति नारायणी है और भैरव का नाम संहार है। शुचि स्थल की पवित्रता और धार्मिक महत्व भक्तों के लिए आकर्षण का केंद्र बनाती है। यहाँ आकर लोग अपनी इच्छाओं के लिए प्रार्थना करते हैं और माता की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

यह स्थल प्राकृतिक सौंदर्य से भी भरा हुआ है, जहाँ भक्त शांति और सुकून का अनुभव करते हैं। शुचि का यह मंदिर साधकों और भक्तों के लिए ध्यान और साधना का स्थल भी है। यहाँ की शांतिपूर्ण वातावरण और पवित्रता श्रद्धालुओं को आत्मिक शांति प्रदान करती है। हर साल हजारों की संख्या में भक्त यहाँ आते हैं, जो अपनी आस्था और विश्वास के साथ माता की पूजा करते हैं और संतोष का अनुभव करते हैं।

34. पंचसागर- वाराही

पंचसागर, एक अज्ञात स्थान है, जहाँ माता की निचले दंत (अधोदंत) गिरे थे। इस क्षेत्र की शक्ति वराही है और भैरव का नाम महारुद्र है। पंचसागर का यह स्थल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, जहाँ भक्त अपनी आस्था के साथ माता की पूजा करते हैं। यहाँ की पवित्रता और आध्यात्मिकता श्रद्धालुओं को एक अद्भुत अनुभव प्रदान करती है। पंचसागर की प्राकृतिक सुंदरता और शांति भक्तों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करती है।

इस क्षेत्र में धार्मिक अनुष्ठान और त्योहारों का आयोजन होता है, जो भक्तों को एकत्रित करने का कार्य करते हैं। यहाँ का वातावरण और प्राकृतिक सौंदर्य भक्तों को ध्यान और साधना के लिए उपयुक्त स्थान प्रदान करता है। पंचसागर की यह विशेषता इसे एक अनूठा धार्मिक स्थल बनाती है, जहाँ लोग अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।

35. करतोयातट- अपर्णा

बांग्लादेश के शेरपुर बागुरा स्टेशन से 28 किमी दूर भवानीपुर गाँव के पार करतोया तट पर माता की पायल (तल्प) गिरी थी। यहाँ की शक्ति अर्पण है और भैरव का नाम वामन है। करतोयातट एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है, जहाँ भक्त माता की कृपा प्राप्त करने के लिए आते हैं। इस क्षेत्र की पवित्रता और भक्ति श्रद्धालुओं को एक अद्भुत अनुभव प्रदान करती है। करतोयातट का यह स्थान न केवल धार्मिक, बल्कि प्राकृतिक सुंदरता से भी भरा हुआ है।

यहाँ की हरियाली और शांतिपूर्ण वातावरण भक्तों को मानसिक शांति प्रदान करती है। यहाँ आकर लोग अपनी इच्छाओं के लिए प्रार्थना करते हैं और माता की आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। करतोयातट में होने वाले धार्मिक अनुष्ठान और त्योहार भी भक्तों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र होते हैं, जिससे यहाँ की महत्ता और बढ़ जाती है।

36. श्री पर्वत- श्री सुंदरी

कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र के पर्वत पर माता के दाएं पैर की पायल गिरी थी। दूसरी मान्यता अनुसार आंध्रप्रदेश के कुर्नूल जिले के श्रीशैलम स्थान पर दक्षिण गुल्फ अर्थात दाएँ पैर की एड़ी गिरी थी। इस क्षेत्र की शक्ति श्रीसुंदरी है और भैरव का नाम सुंदरानंद है। श्री पर्वत का यह स्थल प्राकृतिक सौंदर्य और धार्मिक महत्व का अद्भुत संयोजन है। यहाँ की ऊँचाइयाँ और शांत वातावरण भक्तों को एक अद्वितीय अनुभव प्रदान करते हैं।

श्रद्धालु यहाँ आकर माता की पूजा करते हैं और मानसिक शांति प्राप्त करते हैं। इस क्षेत्र की पवित्रता और धार्मिक अनुष्ठान श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। श्री पर्वत का यह स्थल ध्यान और साधना के लिए भी उपयुक्त है, जहाँ लोग अपनी आत्मा की शांति के लिए आते हैं। इस क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता भक्तों को मंत्रमुग्ध कर देती है, और यह स्थल सदा जीवंत रहता है।

37. विभाष- कपालिनी

पश्चिम बंगाल के जिला पूर्वी मेदिनीपुर के पास तामलुक स्थित विभाष नामक स्थान पर माता की बायीं एड़ी गिरी थी। इस क्षेत्र की शक्ति कपालिनी (भीमरूप) है और भैरव का नाम शर्वानंद है। विभाष एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है, जहाँ भक्त अपनी आस्था के साथ माता की पूजा करते हैं। यहाँ की पवित्रता और आध्यात्मिकता भक्तों को मानसिक शांति प्रदान करती है।

विभाष का यह स्थल प्राकृतिक सौंदर्य से भरा हुआ है, जहाँ हरियाली और शांत वातावरण भक्तों को आकर्षित करते हैं। यहाँ आकर लोग अपनी इच्छाओं के लिए प्रार्थना करते हैं और माता की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। विभाष में होने वाले धार्मिक अनुष्ठान और त्योहार भी भक्तों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। इस क्षेत्र की धार्मिकता और प्राकृतिक सुंदरता भक्तों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करती है।

38. प्रभास- चंद्रभागा

गुजरात के जूनागढ़ जिले में स्थित सोमनाथ मंदिर के निकट वेरावल स्टेशन से 4 किमी प्रभास क्षेत्र में माता का उदर गिरा था। इस क्षेत्र की शक्ति चंद्रभागा है और भैरव का नाम वक्रतुंड है। प्रभास का यह स्थल धार्मिक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है, जहाँ भक्त माता की पूजा करते हैं। यहाँ की पवित्रता और धार्मिक अनुष्ठान भक्तों को एक अद्भुत अनुभव प्रदान करते हैं।

प्रभास का यह स्थान प्राकृतिक सुंदरता से भी भरा हुआ है, जहाँ समुद्र की लहरें और शांत वातावरण भक्तों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।श्रद्धालु यहाँ आकर अपने मन की इच्छाएँ पूरी करने के लिए प्रार्थना करते हैं और माता की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। इस क्षेत्र में होने वाले धार्मिक उत्सव और अनुष्ठान भी भक्तों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनते हैं, जिससे यहाँ की महत्ता और बढ़ जाती है।

39. भैरवपर्वत- अवंती

मध्यप्रदेश के उज्जैन नगर में शिप्रा नदी के तट के पास भैरव पर्वत पर माता के ओष्ठ गिरे थे। इस क्षेत्र की शक्ति अवंति है और भैरव का नाम लम्बकर्ण है। भैरवपर्वत का यह स्थल धार्मिक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यहाँ पर श्रद्धालु माता की पूजा करते हैं और अपने जीवन में सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। इस क्षेत्र की पवित्रता और धार्मिक अनुष्ठान भक्तों को एक अद्भुत अनुभव प्रदान करते हैं।

भैरवपर्वत का यह स्थान प्राकृतिक सुंदरता से भरा हुआ है, जहाँ भक्तों का आना-जाना लगा रहता है। यहाँ के वातावरण में भक्ति और आस्था की गूंज सुनाई देती है। यहाँ की हरियाली और पर्वतीय क्षेत्र भक्तों को शांति और सुकून प्रदान करते हैं। भैरवपर्वत में होने वाले धार्मिक उत्सव और अनुष्ठान भी भक्तों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनते हैं।

40. जनस्थान- भ्रामरी

महाराष्ट्र के नासिक नगर स्थित गोदावरी नदी घाटी में जनस्थान नामक स्थान पर माता की ठोड़ी गिरी थी। इस क्षेत्र की शक्ति भ्रामरी है और भैरव का नाम विकृताक्ष है। जनस्थान का यह स्थल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, जहाँ भक्त माता की पूजा करते हैं। यहाँ की पवित्रता और आस्था भक्तों को एक अद्वितीय अनुभव प्रदान करती है। जनस्थान की प्राकृतिक सुंदरता और हरियाली भक्तों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करती है।

यहाँ आकर लोग अपने मन की इच्छाएँ पूरी करने के लिए प्रार्थना करते हैं और माता की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। जनस्थान में होने वाले धार्मिक अनुष्ठान और त्योहार भी भक्तों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। यहाँ का वातावरण और धार्मिकता भक्तों को ध्यान और साधना के लिए उपयुक्त स्थान प्रदान करता है।

41. सर्वशैल स्थान

आंध्रप्रदेश के राजामुंद्री क्षेत्र में गोदावरी नदी के तट पर कोटिलिंगेश्वर मंदिर के पास सर्वशैल स्थान है, जहाँ माता के वाम गंड (गाल) गिरे थे। यहाँ की शक्ति राकिनी है और भैरव का नाम वत्सनाभम है। सर्वशैल स्थान का यह स्थल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, जहाँ भक्त अपनी आस्था के साथ माता की पूजा करते हैं। यहाँ की पवित्रता और आध्यात्मिकता भक्तों को मानसिक शांति प्रदान करती है।

सर्वशैल का यह स्थल प्राकृतिक सुंदरता से भी भरा हुआ है, जहाँ हरियाली और शांत वातावरण भक्तों को आकर्षित करते हैं। यहाँ आकर लोग अपनी इच्छाओं के लिए प्रार्थना करते हैं और माता की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। सर्वशैल में होने वाले धार्मिक अनुष्ठान और त्योहार भी भक्तों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। यहाँ की धार्मिकता और प्राकृतिक सौंदर्य भक्तों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करती है।

42. गोदावरीतीर

यहाँ माता के दक्षिण गंड गिरे थे। इसकी शक्ति विश्वेश्वरी है और भैरव का नाम दंडपाणि है। गोदावरीतीर का यह स्थल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, जहाँ भक्त माता की पूजा करते हैं। यहाँ की पवित्रता और आस्था भक्तों को एक अद्भुत अनुभव प्रदान करती है। गोदावरीतीर की प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण भक्तों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करते हैं।

यहाँ आकर लोग अपनी इच्छाओं के लिए प्रार्थना करते हैं और माता की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। गोदावरीतीर में होने वाले धार्मिक अनुष्ठान और त्योहार भी भक्तों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। इस क्षेत्र की धार्मिकता और प्राकृतिक सौंदर्य भक्तों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करती है।

43. रत्नावली- कुमारी

बंगाल के हुगली जिले के खानाकुल-कृष्णानगर मार्ग पर रत्नावली स्थित रत्नाकर नदी के तट पर माता का दायाँ स्कंध गिरा था। इसकी शक्ति कुमारी है और भैरव का नाम शिव है। रत्नावली का यह स्थल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, जहाँ भक्त माता की पूजा करते हैं। यहाँ की पवित्रता और आस्था भक्तों को एक अद्वितीय अनुभव प्रदान करती है। रत्नावली की प्राकृतिक सुंदरता और हरियाली भक्तों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करती है।

यहाँ आकर लोग अपनी इच्छाओं के लिए प्रार्थना करते हैं और माता की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। रत्नावली में होने वाले धार्मिक अनुष्ठान और त्योहार भी भक्तों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। यहाँ की धार्मिकता और प्राकृतिक सौंदर्य भक्तों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करती है।

44. मिथिला- उमा (महादेवी)

भारत-नेपाल सीमा पर जनकपुर रेलवे स्टेशन के निकट मिथिला में माता का बायां स्कंध गिरा था। इसकी शक्ति उमा है और भैरव का नाम महोदर है। मिथिला का यह स्थल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, जहाँ भक्त माता की पूजा करते हैं। यहाँ की पवित्रता और आस्था भक्तों को एक अद्वितीय अनुभव प्रदान करती है। मिथिला की प्राकृतिक सुंदरता और हरियाली भक्तों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करती है।

यहाँ आकर लोग अपनी इच्छाओं के लिए प्रार्थना करते हैं और माता की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। मिथिला में होने वाले धार्मिक अनुष्ठान और त्योहार भी भक्तों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। यहाँ की धार्मिकता और प्राकृतिक सौंदर्य भक्तों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करती है।

45. नलहाटी- कालिका तारापीठ

पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के नलहाटि स्टेशन के निकट नलहाटी में माता के पैर की हड्डी गिरी थी। इसकी शक्ति कालिका देवी है और भैरव का नाम योगेश है। नलहाटी का यह स्थल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, जहाँ भक्त माता की पूजा करते हैं। यहाँ की पवित्रता और आस्था भक्तों को एक अद्वितीय अनुभव प्रदान करती है। नलहाटी की प्राकृतिक सुंदरता और हरियाली भक्तों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करती है।

यहाँ आकर लोग अपनी इच्छाओं के लिए प्रार्थना करते हैं और माता की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। नलहाटी में होने वाले धार्मिक अनुष्ठान और त्योहार भी भक्तों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। यहाँ की धार्मिकता और प्राकृतिक सौंदर्य भक्तों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करती है।

46. कर्णाट- जयदुर्गा

कर्नाट (अज्ञात स्थान) में माता के दोनों कान गिरे थे। इसकी शक्ति जयदुर्गा है और भैरव का नाम अभिरु है। कर्णाट का यह स्थल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, जहाँ भक्त माता की पूजा करते हैं। यहाँ की पवित्रता और आस्था भक्तों को एक अद्वितीय अनुभव प्रदान करती है। कर्णाट की प्राकृतिक सुंदरता और हरियाली भक्तों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करती है।

यहाँ आकर लोग अपनी इच्छाओं के लिए प्रार्थना करते हैं और माता की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। कर्णाट में होने वाले धार्मिक अनुष्ठान और त्योहार भी भक्तों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। यहाँ की धार्मिकता और प्राकृतिक सौंदर्य भक्तों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करती है।

47. वक्रेश्वर- महिषमर्दिनी

पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के दुबराजपुर स्टेशन से सात किमी दूर वक्रेश्वर में पापहर नदी के तट पर माता का भ्रूमध्य (मन:) गिरा था। इसकी शक्ति महिषमर्दिनी है और भैरव का नाम वक्रनाथ है। वक्रेश्वर का यह स्थल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, जहाँ भक्त माता की पूजा करते हैं। यहाँ की पवित्रता और आस्था भक्तों को एक अद्वितीय अनुभव प्रदान करती है।

वक्रेश्वर की प्राकृतिक सुंदरता और हरियाली भक्तों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करती है। यहाँ आकर लोग अपनी इच्छाओं के लिए प्रार्थना करते हैं और माता की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। वक्रेश्वर में होने वाले धार्मिक अनुष्ठान और त्योहार भी भक्तों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। यहाँ की धार्मिकता और प्राकृतिक सौंदर्य भक्तों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करती है।

48. यशोर- यशोरेश्वरी

बांग्लादेश के खुलना जिला के ईश्वरीपुर के यशोर स्थान पर माता के हाथ और पैर गिरे (पाणिपद्म) थे। इसकी शक्ति यशोरेश्वरी है और भैरव का नाम चण्ड है। यशोर का यह स्थल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, जहाँ भक्त माता की पूजा करते हैं। यहाँ की पवित्रता और आस्था भक्तों को एक अद्वितीय अनुभव प्रदान करती है। यशोर की प्राकृतिक सुंदरता और हरियाली भक्तों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करती है।

यहाँ आकर लोग अपनी इच्छाओं के लिए प्रार्थना करते हैं और माता की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। यशोर में होने वाले धार्मिक अनुष्ठान और त्योहार भी भक्तों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। यहाँ की धार्मिकता और प्राकृतिक सौंदर्य भक्तों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करती है।

49. अट्टाहास- फुल्लरा

पश्चिम बंगाल के लाभपुर स्टेशन से दो किमी दूर अट्टहास स्थान पर माता के ओष्ठ गिरे थे। इसकी शक्ति फुल्लरा है और भैरव का नाम विश्वेश है। अट्टाहास का यह स्थल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, जहाँ भक्त माता की पूजा करते हैं। यहाँ की पवित्रता और आस्था भक्तों को एक अद्वितीय अनुभव प्रदान करती है। अट्टाहास की प्राकृतिक सुंदरता और हरियाली भक्तों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करती है।

यहाँ आकर लोग अपनी इच्छाओं के लिए प्रार्थना करते हैं और माता की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। अट्टाहास में होने वाले धार्मिक अनुष्ठान और त्योहार भी भक्तों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। यहाँ की धार्मिकता और प्राकृतिक सौंदर्य भक्तों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करती है।

50. नंदीपूर- नंदिनी

पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के सैंथिया रेलवे स्टेशन नंदीपुर स्थित चारदीवारी में बरगद के वृक्ष के समीप माता का गले का हार गिरा था। इसकी शक्ति नंदिनी है और भैरव का नाम नंदिकेश्वर है। नंदीपूर का यह स्थल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, जहाँ भक्त माता की पूजा करते हैं। यहाँ की पवित्रता और आस्था भक्तों को एक अद्वितीय अनुभव प्रदान करती है। नंदीपूर की प्राकृतिक सुंदरता और हरियाली भक्तों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करती है।

यहाँ आकर लोग अपनी इच्छाओं के लिए प्रार्थना करते हैं और माता की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। नंदीपूर में होने वाले धार्मिक अनुष्ठान और त्योहार भी भक्तों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। यहाँ की धार्मिकता और प्राकृतिक सौंदर्य भक्तों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करती है।

51. लंका- इंद्राक्षी

श्रीलंका में संभवत: त्रिंकोमाली में माता की पायल गिरी थी (त्रिंकोमाली में प्रसिद्ध त्रिकोणेश्वर मंदिर के निकट)। इसकी शक्ति इंद्राक्षी है और भैरव का नाम राक्षसेश्वर है। लंका का यह स्थल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, जहाँ भक्त माता की पूजा करते हैं। यहाँ की पवित्रता और आस्था भक्तों को एक अद्वितीय अनुभव प्रदान करती है।

लंका की प्राकृतिक सुंदरता और हरियाली भक्तों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करती है। यहाँ आकर लोग अपनी इच्छाओं के लिए प्रार्थना करते हैं और माता की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। लंका में होने वाले धार्मिक अनुष्ठान और त्योहार भी भक्तों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। यहाँ की धार्मिकता और प्राकृतिक सौंदर्य भक्तों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करती है।

52. विराट- अंबिका

विराट (अज्ञात स्थान) में पैर की अँगुली गिरी थी। इसकी शक्ति अंबिका है और भैरव का नाम अमृत है। विराट का यह स्थल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, जहाँ भक्त माता की पूजा करते हैं। यहाँ की पवित्रता और आस्था भक्तों को एक अद्वितीय अनुभव प्रदान करती है। विराट की प्राकृतिक सुंदरता और हरियाली भक्तों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करती है।

यहाँ आकर लोग अपनी इच्छाओं के लिए प्रार्थना करते हैं और माता की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। विराट में होने वाले धार्मिक अनुष्ठान और त्योहार भी भक्तों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। यहाँ की धार्मिकता और प्राकृतिक सौंदर्य भक्तों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करती है।

नोट : इसके अलावा पटना-गया के इलाके में कहीं मगध शक्तिपीठ माना जाता है।

53. मगध- सर्वानन्दकरी

मगध में दाएँ पैर की जंघा गिरी थी। इसकी शक्ति सर्वानंदकरी है और भैरव का नाम व्योम केश है। मगध का यह स्थल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, जहाँ भक्त माता की पूजा करते हैं। यहाँ की पवित्रता और आस्था भक्तों को एक अद्वितीय अनुभव प्रदान करती है।

मगध की प्राकृतिक सुंदरता और हरियाली भक्तों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करती है। यहाँ आकर लोग अपनी इच्छाओं के लिए प्रार्थना करते हैं और माता की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। मगध में होने वाले धार्मिक अनुष्ठान और त्योहार भी भक्तों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। यहाँ की धार्मिकता और प्राकृतिक सौंदर्य भक्तों को यहाँ आने के लिए प्रेरित करती है।

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Merry Christmas Wishes

The holiday season is upon us, and with it comes the warmth, joy, and magic of Christmas. It’s the perfect time to spread love, kindness, and cheer to the special people in our lives. Whether you’re sending heartfelt messages to family, friends, or colleagues, sharing thoughtful Merry Christmas wishes is a wonderful way to express your gratitude and happiness during this festive season. From traditional greetings to fun and playful sentiments, there’s no better way to capture the spirit of Christmas than with a message that brings smiles and joy to those who receive it. Dussehra Wishes | Durga Puja


Funny Christmas Wishes

Funny Christmas Wishes

  • Don we now our ugly sweaters… Let’s party! Happy Holidays!
  • Christmas is the only time of year when you can sit in front of a dead tree and eat candy out of socks. Enjoy!
  • Wishing you a white Christmas! (And when you run out of white, just open a bottle of red).
  • You’re a gift in my life—not the kind I’d return for store credit. Merry Christmas!
  • A Christmas reminder: Don’t try to borrow money from elves; they’re always a little short. Have a Merry Christmas!
  • Wishing you hope, peace, and lots of Christmas cookies this holiday season!
  • They say the best Christmas gifts come from the heart, but cash and gift cards work wonders too! Happy Holidays!
  • Remember, Santa is watching. Everything. Yes, even that. Anyway, Merry Christmas!
  • Merry Christmas! May your happiness be large and your bills be small.
  • This holiday season, let’s cherish what’s truly important in our lives: cookies.
  • I told Santa you were good this year and sent him a link to your Pinterest board. Merry Christmas to you!
  • This Christmas, may your family be functional and all your batteries be included.
  • Merry Christmas! I put so much thought into your gift that it’s now too late to get it.
  • Please note: Christmas is canceled. Apparently, you told Santa you’ve been good this year… he died laughing.
  • Is it just me, or does Santa look younger every year?
  • Christmas is mostly for children, but we adults can enjoy it too—until the credit card bills arrive.

Meaningful Christmas Wishes

Meaningful Merry Christmas Wishes

  • Wishing you and your family a Christmas season filled with happiness and joy.
  • May you be blessed with the gifts of love, peace, and happiness this Christmas.
  • Wishing you and your family a season full of light, laughter, and warmth.
  • Sending best wishes for a joyous Christmas filled with love, happiness, and prosperity!
  • May everything beautiful, meaningful, and joyful be yours this holiday season and in the year ahead.
  • Merry Christmas! Wishing you all the happiness this holiday can bring!
  • May your holidays shine with joy and laughter.
  • May the magic of Christmas fill your heart and home with joy, now and always.
  • From our family to yours, wishing you love, joy, and peace—today, tomorrow, and always.
  • May your family enjoy a holiday season filled with surprises, treats, and endless laughter.
  • Merry Christmas! Wishing you all the best this festive season!
  • Here’s wishing you a Christmas that’s merry and bright!
  • We hope your holiday season is safe, joyful, and filled with relaxation.
  • May your holiday season be peaceful, joyful, and full of happiness.
  • Merry Christmas, with lots of love.
  • May your Christmas be filled with joy and cheer this year!
  • Happy Holidays! Wishing all your Christmas dreams come true.

Religious Christmas Wishes

Religious Christmas Wishes

  • May your heart be filled with gratitude this Christmas as we celebrate the precious gift of Jesus and the joy He brings into our lives. Merry Christmas! May God bless you abundantly throughout the year.
  • Remember, Jesus is the reason for the season. Wishing you a Merry Christmas!
  • May God shower you with prosperity and joy this Christmas and always! Merry Christmas!
  • Sending heartfelt prayers and warm Christmas greetings to you. May you be blessed with God’s special blessings this holiday season!
  • May the gift of faith, the blessing of hope, and the peace of His love be yours at Christmas and throughout the year.
  • Merry Christmas! I pray that the coming year brings you one blessing after another.
  • May the Lord fill your heart and home with peace, joy, and goodwill.
  • Wishing you a Christmas season that glows with the light of God’s love.
  • May you experience the fullness of God’s blessings this Christmas.
  • May the wonder of the first Christmas, the joy of God’s abundant blessings, and the peace of Jesus’ presence be with you always.
  • May the true spirit of Christmas shine brightly in your heart and guide your way.
  • Wishing you and your loved ones a Christmas filled with God’s grace and blessings.
  • May God watch over you and keep you in His care this holiday season and throughout the year.
  • May God’s love and joy fill your life this Christmas.
  • Merry Christmas! May the love of God be with you always.
  • May the spirit of Christmas stay with you all year long.

Romantic Christmas Wishes

Romantic Christmas Wishes

  • You’re the most enchanting part of the most wonderful season of the year.
  • Your love is the greatest Christmas gift I could ever ask for. Merry Christmas, my love!
  • You’re the perfect match to my holiday spirit, just like a partridge to a pear tree.
  • Christmas feels even more magical now that you’re by my side!
  • Merry Christmas to someone who’s sweeter than a candy cane, warmer than a cup of hot cocoa, and fills my heart with more joy than the biggest gift under the tree!
  • The only thing I love more than Christmas is being with you.
  • It’s not about what’s under the tree, but who’s around it, and I’m forever grateful to have you there.
  • You bring the merry to my Christmas.
  • Even though we’re apart, you’re always in my heart this Christmas.
  • Who needs mistletoe? You can kiss me anytime you want.
  • All I want for Christmas is you.
  • I feel so lucky to be spending another Christmas with you!
  • Merry Christmas! You’re the best gift I could ever receive.
  • Holidays like Christmas remind me how grateful I am to share my life with you.
  • Christmas is truly magical because we’re together.

Christmas Wishes for Long-Distance Friends

Christmas Wishes for Long-Distance Friends

  • Even though we’re miles apart, I’m sending you a special wish, a holiday hug, and a mistletoe kiss!
  • We may be far apart this holiday, but we’re totally together in our hearts and thoughts. Merry Christmas!
  • Sending smiles across the distance for a wonderful Christmas!
  • I may not be close by, but you’re always in my thoughts and heart this holiday season. Merry Christmas!
  • Missing you even more during this festive time of year.
  • We may not wake up together on Christmas morning, but you’re always in my heart.
  • I wish we could be together this holiday, but I’m sending warm wishes your way.
  • I’ll miss celebrating with you this Christmas—make sure to eat a few extra cookies for me!
  • We may not be able to rock around the Christmas tree together, but I’ll deck the halls in your honor.
  • Even though we’re apart, our hearts are still connected.
  • Let’s have a Christmas video call—I’ll bring the cocoa!
  • Christmas just won’t be the same without you here.
  • Though we’re apart, I hope you have a joyful holiday.
  • Consider this card a raincheck for a Christmas hug when we’re together again.

Christmas Wishes During a Hard Time

Christmas Wishes During a Hard Time

  • May the magic of the Christmas season fill your home with peace and joy. Sending love and warm wishes to your family.
  • You’ve faced more challenges than most this year. Wishing you peace, hope, and brighter days in the new year.
  • Sending you strength, love, and peace this holiday season.
  • My heart is with you during this Christmas season, along with the hope it brings for better days ahead.
  • May the new year open the door to new possibilities for you.
  • Wishing you love, light, and comfort in this challenging time.
  • I know this year has been hard for you and your family. I truly hope the New Year brings brighter, happier days.
  • Our hearts are with you and your loved ones, now and always.
  • Sending you hugs this Christmas. Remember to take time for yourself and find moments of peace.
  • We understand this has been a tough year for you. Wishing you strength, comfort, and peace in these difficult times.
  • The holidays can sometimes remind us of what we’ve lost. Just know that I’m always here for you.
  • I hope the holidays offer you some time to rest, recharge, and find peace.
  • May God’s love lift you up and carry you through this difficult season.
  • We’re always here to lend a helping hand. Reach out anytime this holiday season.
  • Sending warmest wishes that you may find peace and comfort, even in these darker times.

Christmas Wishes Inspired by Quotes

Christmas Wishes Inspired by Quotes

  • May this season find you surrounded by loved ones, sharing in the beauty of both generosity and gratitude. —Oprah Winfrey
  • Christmas is the day that ties all time together. —Alexander Smith
  • I wish we could bottle up the spirit of Christmas and open a jar of it each month. —Harlan Miller
  • Christmas will always last as long as we stand together, heart to heart and hand in hand. —Dr. Seuss
  • One of the most delightful messes is the chaos in the living room on Christmas Day. Don’t be in a rush to clean it up. —Andy Rooney
  • Christmas isn’t just a season; it’s a feeling. —Edna Ferber
  • Christmas is like a thunderstorm—compulsory and experienced together. —Garrison Keillor
  • Christmas isn’t just a day, it’s a state of mind. —Valentine Davies, Miracle on 34th Street
  • Christmas Eve was a night filled with song that wrapped around you like a warm shawl. It didn’t just warm your body but filled your heart with a melody that would last forever. —Bess Streeter Aldrich
  • Christmas isn’t just an event—it’s a piece of home you carry in your heart. —Freya Stark
  • I like the retro charm of spending Christmas the way Joseph and Mary did—traveling back to your birthplace with no promise of a bed when you get there. —Tina Fey
  • I’m still not entirely sure what a sugarplum is, but every year, I find myself dreaming of them anyway. —Jane Green
  • The best gift under any Christmas tree is the presence of a joyful family, all wrapped up in one another. —Burton Hills
  • Christmas is a time not only for celebration but also for reflection. —Winston Churchill
  • Whether it’s old-fashioned or modern, my idea of Christmas is simple: loving others. —Bob Hope
  • Peace on Earth will come when we live the spirit of Christmas every day. —Helen Steiner Rice

Sunderkand Ka Path Hindi PDF – सुंदरकांड पाठ हिंदी में PDF 2024-25

सुंदरकांड: श्रीराम के संग भक्ति की यात्रा

सुंदरकांड पाठ (Sunderkand Path Hindi PDF), रामायण के पांचवें कांड का एक अभिन्न हिस्सा है, जो भगवान हनुमान जी की भक्ति, वीरता और समर्पण को दर्शाता है। यह पाठ भारतीय संस्कृति में अत्यधिक श्रद्धा और भक्ति के साथ पढ़ा और सुना जाता है। सुंदरकांड का मुख्य उद्देश्य हनुमान जी की भक्ति और उनके साहसी कार्यों का वर्णन करना है, जिसमें वे माता सीता की खोज के लिए लंका की यात्रा करते हैं। हनुमान चालीसा हिंदी में!

सुंदरकांड का पाठ केवल धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसे आध्यात्मिक और मानसिक शांति का एक साधन भी माना जाता है। भक्तजन इसे नियमित रूप से पढ़कर भगवान हनुमान का आशीर्वाद प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। मानसिक तनाव, भय, या जीवन की कठिनाइयों का सामना कर रहे लोगों के लिए यह पाठ विशेष रूप से लाभकारी है।

सुंदरकांड में वर्णित घटनाओं की गहराई और हनुमान जी के अद्भुत चरित्र में निहित है। उनका साहस, शक्ति, और बुद्धिमत्ता इस पाठ को विशेष बनाते हैं। जब हनुमान जी माता सीता का पता लगाने के लिए लंका जाते हैं, तब उनकी वीरता और त्याग का उदाहरण प्रस्तुत होता है। भक्तों के लिए, हनुमान जी का चरित्र प्रेरणा का स्रोत है।

Chalisa PDF पर पढ़े: संकट मोचन हनुमान अष्टक | श्री हनुमान अमृतवाणी | बजरंग बाण | हनुमान चालीसा पढ़ने के 21 चमत्कारिक फायदे |


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|| सुंदरकांड पाठ हिंदी में PDF ||

।।आसन।।

कथा प्रारम्भ होत है। सुनहुँ वीर हनुमान।।
आसान लीजो प्रेम से। करहुँ सदा कल्याण।।

|| श्लोक ||

शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं,
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्,
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं,
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़ामणिम्।।1।।

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च।।2।।

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।।3।।

जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए।।
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई।।
जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी।।
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा।।
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर।।
बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी।।
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता।।
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना।।
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी।।
दो0- हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।।1।।

जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा।।
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता।।
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा।।
राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं।।
तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई।।

कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना।।
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा।।
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ।।
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा।।
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।।
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा।।
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा।।
दो0-राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान।।2।।

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई।।
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं।।
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई।।
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा।।
ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा।।

तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा।।
नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए।।
सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें।।
उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई।।
गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी।।
अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा।।
छं=कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना।।
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै।।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै।।1।।

बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं।।
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं।।2।।
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं।।
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही।।3।।

दो0-पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार।।3।।

मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।।
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी।।
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा।।
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी।।
पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका।।
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।।
बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे।।
तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता।।
दो0-तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।4।।

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा।।
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।
गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही।।
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना।।
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा।।
गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं।।
सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही।।
भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा।।
दो0-रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ।।5।।

लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा।।
मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा।।
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा।।
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी।।
बिप्र रुप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए।।
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई।।
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई।।
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी।।
दो0-तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम।।6।।

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी।।
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा।।
तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं।।
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।
जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा।।
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती।।
कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।।
प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।।
दो0-अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर।।7।।

जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।।
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा।।
पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही।।
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता।।
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई।।
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ।।
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा।।
कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी।।
दो0-निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन।।8।।

तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई।।
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा।।
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा।।
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी।।
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा।।
तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही।।
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा।।
अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की।।
सठ सूने हरि आनेहि मोहि। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही।।
दो0- आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन।।9।।

सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना।।
नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी।।
स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर।।
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा।।
चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं।।
सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा।।
सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा।।
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई।।
मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना।।
दो0-भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद।।10।।

त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका।।
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना।।
सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी।।
खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा।।
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई।।
नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई।।
यह सपना में कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी।।
तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं।।
दो0-जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच।।11।।

त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी।।
तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई।।
आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई।।
सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी।।
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि।।
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी।।
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि न पावक मिटिहि न सूला।।

देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा।।
पावकमय ससि स्त्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी।।
सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका।।
नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना।।
देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता।।
सो0-कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब।
जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ।।12।।

तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर।।
चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी।।
जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई।।
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना।।
रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा।।

लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई।।
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कहि सो प्रगट होति किन भाई।।
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैंठीं मन बिसमय भयऊ।।
राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की।।
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी।।
नर बानरहि संग कहु कैसें। कहि कथा भइ संगति जैसें।।
दो0-कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।।
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास।।13।।

हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी।।
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयउ तात मों कहुँ जलजाना।।
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी।।
कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई।।
सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक।।
कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहि निरखि स्याम मृदु गाता।।

बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी।।
देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता।।
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता।।
जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना।।
दो0-रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।
अस कहि कपि गद गद भयउ भरे बिलोचन नीर।।14।।

कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता।।
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू।।
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा।।
जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा।।
कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई।।

तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा।।
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं।।
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही।।
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता।।
उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई।।
दो0-निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु।।15।।

जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई।।
रामबान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की।।
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई।।
कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं।।

हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना।।
मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा।।
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा।।
सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ।।
दो0-सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल।।16।।

मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी।।
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना।।
अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू।।
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना।।
बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा।।

अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता।।
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा।।
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी।।
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं।।
दो0-देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु।।17।।

चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा।।
रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे।।
नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी।।
खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे।।
सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना।।

सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे।।
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा।।
आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा।।
दो0-कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि।।18।।

सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना।।
मारसि जनि सुत बांधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही।।
चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा।।
कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा।।
अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा।।

रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा।।
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा।
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई।।
उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया।।
दो0-ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार।।19।।

ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा।।
तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ।।
जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी।।
तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा।।

कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए।।
दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई।।
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता।।
देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका।।
दो0-कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद।।20।।

कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहिं के बल घालेहि बन खीसा।।
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही।।
मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा।।
सुन रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचित माया।।

जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा।
जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन।।
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह ते सठन्ह सिखावनु दाता।
हर कोदंड कठिन जेहि भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा।।
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली।।
दो0-जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि।।21।।

जानउँ मैं तुम्हरि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई।।
समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा।।
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा।।
सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी।।
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउ तनयँ तुम्हारे।।

मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा।।
बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन।।
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी।।
जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई।।
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै।।
दो0-प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि।।22।।

राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राज तुम्ह करहू।।
रिषि पुलिस्त जसु बिमल मंयका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका।।
राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा।।
बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषण भूषित बर नारी।।

राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई।।
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गए पुनि तबहिं सुखाहीं।।
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी।।
संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही।।
दो0-मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान।।23।।

जदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी।।
बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी।।
मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही।।
उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना।।
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना।।

सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए।
नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता।।
आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई।।
सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर।।
दो-कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ।।24।।

पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि।।
जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़ाई। देखेउँûमैं तिन्ह कै प्रभुताई।।
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना।।
जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना।।
रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला।।

कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी।।
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी।।
पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघु रुप तुरंता।।
निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भई सभीत निसाचर नारीं।।
दो0-हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास।।25।।

देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई।।
जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला।।
तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहि अवसर को हमहि उबारा।।
हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई।।

साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा।।
जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं।।
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा।।
उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी।।
दो0-पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।
जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि।।26।।

मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा।।
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ।।
कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा।।
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।।

तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु।।
मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा।।
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना।।
तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती।।
दो0-जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह।।27।।

चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी।।
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा।।
हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना।।
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचन्द्र कर काजा।।
मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी।।

चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा।।
तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए।।
रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे।।
दो0-जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।
सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज।।28।।

जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई।।
एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा।।
आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा।।
पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी।।
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना।।

सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ।
राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा।।
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई।।
दो0-प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।
पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज।।29।।

जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया।।
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर।।
सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर।।
प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू।।
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी।।

पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए।।
सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए।।
कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की।।
दो0-नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट।।30।।

चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही।।
नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी।।
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना।।
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी।।
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना।।

नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा।।
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा।।
नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी।
सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला।।
दो0-निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।
बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति।।31।।

सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना।।
बचन काँय मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही।।
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई।।
केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी।।
सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी।।

प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा।।
सुनु सुत उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं।।
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता।।
दो0-सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत।।32।।

बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा।।
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा।।
सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर।।
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा।।
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका।।
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना।।

साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई।।
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।
सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।।
दो0- ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल।
तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल।।33।।

नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी।।
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी।।
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना।।
यह संवाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा।।
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा।।
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा।।
अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे।।
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी।।
दो0-कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ।।34।।

प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा।।
देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना।।
राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा।।
हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना।।
जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती।।
प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं।।

जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई।।
चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहि बानर भालु अपारा।।
नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी।।
केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं।।
छं0-चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे।।
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।

जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं।।
सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई।।
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।

जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी।।
दो0-एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर।।35।।

उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब ते जारि गयउ कपि लंका।।
निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा।।
जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई।।
दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी।।
रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी।।

कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहु।।
समुझत जासु दूत कइ करनी। स्त्रवहीं गर्भ रजनीचर धरनी।।
तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई।।
तब कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई।।
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें।।
दो0–राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक।।36।।

श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी।।
सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा।।
जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई।।
कंपहिं लोकप जाकी त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा।।
अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई।।

मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता।।
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई।।
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू।।
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माही।।
दो0-सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।37।।

सोइ रावन कहुँ बनि सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई।।
अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा।।
पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन।।
जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरुप कहउँ हित ताता।।

जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना।।
सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाई।।
चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई।।
गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ।।
दो0- काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत।।38।।

तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला।।
ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता।।
गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपासिंधु मानुष तनुधारी।।
जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता।।
ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा।।

देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही।।
सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा।।
जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन।।
दो0-बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।
परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस।।39(क)।।
मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।
तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात।।39(ख)।।

माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना।।
तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन।।
रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ।।
माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी।।

सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं।।
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना।।
तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता।।
कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी।।
दो0-तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।
सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार।।40।।

बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी।।
सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मुत्यु अब आई।।
जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा।।
कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाही।।
मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती।।

अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा।।
उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई।।
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा।।
सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ।।
दो0=रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।
मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि।।41।।

अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं।।
साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी।।
रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा।।
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं।।

देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता।।
जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी।।
जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए।।
हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मै देखिहउँ तेई।।
दो0= जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ।।42।।

एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा।।
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा।।
ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए।।
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई।।

कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा।।
जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया।।
भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा।।
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी।।
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना।।
दो0=सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि।।43।।

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू।।
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।
पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ।।
जौं पै दुष्टहदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई।।
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।
भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा।।
जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते।।
जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहउँ ताहि प्रान की नाई।।
दो0=उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।
जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत।।44।।

सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर।।
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता।।
बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी।।
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन।।
सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा।।
नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता।।
नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता।।
सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा।।
दो0-श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर।।45।।

अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा।।
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा।।
अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी।।
कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा।।
खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती।।
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती।।
बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता।।
अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया।।
दो0-तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।
जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम।।46।।

तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना।।
जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा।।
ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी।।
तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं।।

अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे।।
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला।।
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ।।
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा।।
दो0–अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।
देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज।।47।।

सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ।।
जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही।।
तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना।।
जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा।।
सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।।
समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं।।
अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें।।
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें।।
दो0- सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम।।48।।

सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें।।
राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा।।
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी।।
पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा।।
सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी।।
उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही।।

अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी।।
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा।।
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं।।
अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा।।
दो0-रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड।।49(क)।।
जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ।।49(ख)।।

अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना।।
निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा।।
पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी।।
बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक।।

सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा।।
संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती।।
कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक।।
जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई।।
दो0-प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि।
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि।।50।।

सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई।।
मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा।।
नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा।।
कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।।
सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा।।

अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई।।
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई।।
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए।।
दो0-सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह।।51।।

प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ।।
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने।।
कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर।।
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए।।
बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे।।

जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना।।
सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोडाए।।
रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती।।
दो0-कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।
सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार।।52।।

तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा।।
कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए।।
बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता।।
पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी।।
करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी।।

पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई।।
जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा।।
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी।।
दो0–की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर।।53।।

नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें।।
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा।।
रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना।।
श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे।।
पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई।।

नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी।।
जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा।।
अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला।।
दो0-द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि।।54।।

ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना।।
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीं।।
अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर।।
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं।।
परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा।।

सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहीं न त भरि कुधर बिसाला।।
मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा।।
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका।।
दो0–सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।
रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं संग्राम।।55।।

राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई।।
सक सर एक सोषि सत सागर। तव भ्रातहि पूँछेउ नय नागर।।
तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं।।
सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा।।
सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई।।
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई।।

सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें।।
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी।।
रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती।।
बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन।।
दो0–बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस।।56(क)।।
की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।
होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग।।56(ख)।।

सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई।।
भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा।।
कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी।।
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा।।
अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ।।
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही।।

जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे।
जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही।।
नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ।।
करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई।।
रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी।।
बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा।।
दो0-बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।।57।।

लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू।।
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती।।
ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी।।
क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा।।
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा।।

संघानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।।
मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने।।
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना।।
दो0-काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच।।58।।

सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।।
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।।
तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।।
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई।।
प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।।

ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई।।
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई।।
दो0-सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ।।59।।

नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई।।
तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे।।
मैं पुनि उर धरि प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई।।
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ।।
एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी।।

सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा।।
देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी।।
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा।।
छं0-निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।
यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ।।
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।।
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना।।

सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान।।60।।

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने
पञ्चमः सोपानः समाप्तः।
सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड पाठ,

(इति सुन्दरकाण्ड समाप्त)

|| सुन्दरकाण्ड समापन दोहा ||

कथा विसर्जन होत है,
सुनहु वीर हनुमान।
जो जन जहाँ से आत है,
जह तह करो प्रयाण।।
राम लखन सिया जानकी,
सदा करहूँ कल्याण।
रामायण वैकुण्ठ की,
विदा होत हनुमान।।
सियावर रामचंद्र की जय।
पवनसुत हनुमान की जय।

||Sunderkand Path Lyrics in English||

|| Shalok ||

Shaantan shaashvatamaprameyamanaghan nirvaanashaantipradan.
Brahmaashambhuphaneendrasevyamanishan vedaantavedyan vibhum.
Raamaakhyan jagadeeshvaran suragurun maayaamanushyan harin.
Vandehan karunaakaran raghuvaran bhoopaalachoodaamanim ||1||
 
Naanya sprha raghupate hrdayesmadeeye.
Satyan vadaami ch bhavaanakhilaantaraatma.
Bhaktin prayachchh raghupungav nirbharaan me.
Kaamaadidosharahitan kuru maanasan ch ||2||
 
Atulitabaladhaaman hemashailaabhadehan.
Danujavanakrshaanun gyaaninaamagraganyam.
Sakalagunanidhaanan vaanaraanaamadheeshan.

|| Chopai ||
Jaamavant ke bachan suhae. suni hanumant hrday ati bhae.
Tab lagi mohi parikhehu tumh bhaee. sahi dukh kand mool phal khaee.
Jab lagi aavaun seetahi dekhee. hoihi kaaju mohi harash biseshee.
Yah kahi nai sabanhi kahun maatha. chaleu harashi hiyan dhari raghunaatha.
Sindhu teer ek bhoodhar sundar. kautuk koodi chadheu ta oopar.
Baar-baar raghubeer sanbhaaree. tarakeu pavanatanay bal bhaaree.
Jehin giri charan dei hanumanta. chaleu so ga paataal turanta.
Jimi amogh raghupati kar baana. ehee bhaanti chaleu hanumaana.
Jalanidhi raghupati doot bichaaree. tain mainaak hohi shram haaree.
 
|| Doha – 1 ||
Hanumaan tehi parasa kar puni keenh pranaam |
Raam kaaju keenhe binu mohi kahaa bishraam ||

||Chopai||
Jaat pavansut devanh dekha | Jaanai kahu bal buddhi bisesha ||
Surasa naam ahinh kai maata | Pathainhi aai kahi tehi baata ||
Aaju suranh mohi deenh ahaara | Sunat bachan kah pavankumaara ||
Raam kaaju kari phiri mai aavau | Sita kai sudhi prabhuhi sunaavau ||
Tab tav badan paithihau aai | Satya kahau mohi jaan de maai ||
Kavanehu jatan dei nahi jaana | Grasai na mohi kaheu Hanumaana||
Jojan bhari tehi badanu pasaara | Kapi tanu keenh dugun Bistaaraa||
Sorah jojan mukh tehi thayau | Turat pavan sut battis bhayau ||
Jas jas surasa badanu badhaava | Taasu doon kapi roop dekhaava ||
Sat jojan tehi aanan keenha | Ati laghu roop pavanasut leenha ||
Badan paithi puni baaher aava | Maaga bida taahi siru naava ||
Mohi suranh jehi laagi pathaava | Buddhi bal maramu tor mai paava||

|| Doha – 2 ||
Raam kaaju sabu karihahu tumh bal buddhi nidhaan|
Aasish dei gai so harashi chaleu Hanumaan ||

||Chopai||
Nisichari ek sindhu mahu rahai |Kari maaya nabhu ke khag gahai||
Jeev jantu je gagan udaahi |Jal biloki tinh kai parichhahi ||
Gahai chhah sak so na udaai |Ehi bidhi sada gaganchar khaai ||
Soi chhal Hanumaan kah keenha|Taasu kapatu kapi turatahi cheena||
Taahi maari maarut sut beera|Baaridhi paar gayau matidheera||
Taha jaai dekhi ban sobha|Gunjat chanchareek madhu lobha||
Naana taru phal phool suhaae|Khag mrug brund dekhi man bhaae||
Sail bisaal dekhi ek aage | Taa par dhaai chadheu bhay tyaage ||
Uma na kachhu kapi kai adhikaai | Prabhu prataap jo kaalahi khaai ||
Giri par chadhi Lanka tehi dekhi| Kahi na jaai ati durg biseshi ||
Ati utang jalanidhi chahu paasa|
Kanak kot kar param prakaasa||


 
|| Chhand ||
Kanak kot bichitra mani | Krut sundaraayatana Ghana||
Chauhatt hatt subatt beethee Chaaru pur bahu bidhi bana||
Gaj baaji khachchar nikar Padchar rath baroothanhi ko ganai|
Bahuroop nisichar jooth atibal Sen baranat nahin banai ||1||
Ban bag ujpaban baatika| Sar koop baapee sohahi||
Nar naag sur gandharb kanya| Roop muni man mohahee||
Kahu maal deh bisaal sai l Samaan atibal garjahi||
Naana akhaarenh bhirhi bahubidhi Ek ekanh tarjahee || 2||
Kari jatan bhat kotinh bikat Tan nagar chahu disi rachchhahee||
Kahu mahish maanush dhenu khar Ajakhal nishaachar bhachchhahi||
Ehi laagi Tulasidaas inh kee Katha kachhu ek hai kahee |
Raghubeer sar teerath sareeranhi Tyaagi gati paihahi sahee||
 
|| Doha – 3 ||
Pur rakhavaare dekhi bahu kapi man keenh bichaar|
Ati laghu roop dharau nisi nagar karau paisaar ||

||Chopai||
Masak samaan roop kapi charee | Lankahi chaleu sumiri naraharee||
Naam Lankinee ek nisicharee | So kah chalesi mohi nindaree ||
Jaanehi nahee maramu sath mora| Mor ahar jahaa lagi chora ||
Muthika ek maha kapi hanee | Rudhir bamat dharanee dhanamanee ||
Puni sambhari uthee so Lanka | Jori paani kar binay sasanka ||
Jab Ravanahi brahm bar deenha | Chalat biranchi kaha mohi cheenha ||
Bikal hosi tai kapi ke mare | Tab jaanesu nisichar sanghare ||
Taat mor ati punya bahoota | Dekheu nayan Raam kar doota ||
 
|| Doha – 4 ||
Taat swarg apabarg sukh dharia tula ek ang |
Tool na taahi sakal mili jo such lav satsang ||

||Chopai||
Prabisi nagar keeje sab kaaja | Hriday rakhi kosalapur raja ||
Garal sudha ripu karahi mitaai | Gopad sindhu anal sitalaai ||
Garud sumeru renu sam taahi | Raam krupa kari chitava jaahi ||
Ati laghu roop dhareu Hamumaana | Paitha ngar sumiri bhagawana ||
Mandir mandir prati kari sodha | Dekhe jah tah aganit jodha ||
Gayau dasaanan mandir maahee | Ati bichitra kahi jaat so naahee ||
Sayan kie dekha kapi tehee | Mandir mahu na deekhi baidehee ||
Bhavan ek puni deekh suhaava | Hari mandir tah bhinna banaava ||
 
|| Doha – 5 ||
Raamaayudh ankit gruh sobha barani na jaai |
Nav tulsika brund tah dekhi harash kapiraai||

||Chopai||
Lanka nisichar nikar nivaasa | Iha kaha sajjan kar baasa ||
Man mahu tarak karai kapi laaga | Tehi samay |Bibheeshanu jaaga ||
Raam raam tehi sumiran keenha | Hriday harash kapi sajjan cheenha ||
Ehi san hathi karihau pahichaanee | Saadhu te hoi na kaaraj haanee ||
Bipra roop dhari bachan sunaae | Sunat Bibheeshan uthi tah aae ||
Kari pranaam poonchee kusalaai | Bipra kahahu nij katha buzaai ||
Kee tumh hari daasanh mah koi | More hriday preeti ati hoi ||
Kee tumh raamu deen anuraagee | Aayahu mohi karan badbhaagee ||
 
|| Doha – 6 ||
Tab Hanumant kahee sab Raam katha nij naam |
Sunat jugal tan pulak man magan sumiri gun graam||

||Chopai||
Sunahu pavansut rahani hamaaree | Jimi dasananhi mahu jeebh bichaaree ||
Taat kabahu mohi jaani anaatha | Karihahi krupa bhaanukul naatha ||
Taamas tanu kachu saadhan naahee | Preeti na pad saroj man maahee ||
Ab mohi bha bharos Hanumanta | Binu harikrupa milahi nahi santa ||
Jau Rabhubeer anugrah keenha | Tau tumh mohi darasu hathi deenha ||
Sunahu Bibheeshan prabhu kai reetee | Karahi sada sevak par preetee ||
Kahahu kavan mai param kuleena | Kapi chanchal sabahee bidhi heena ||
Praat lei jo naam hamaara | Tehi din taahi na milai ahaara ||
 
|| Doha – 7 ||
As mai adham sakha sunu mohu par Rabhubeer |
Keenhee krupa sumiri gun bhare bilochan neer ||

||Chopai||
Jaanatahoo as swami bisaaree | Phirhi te kaahe na hohi dukharee ||
Ehi bidhi kahat Raam gun graama | Paava anirbachya bishraama ||
Puni sab katha Bibheeshan kahi | Jehi bidhi Janakasuta tah rahee ||
Tab Hanumant kaha sunu bhraata | Dekhi chahau Jaanaki Maata ||
Juguti Bibheeshan sakal sunaai | Chaleu pavansut bida karaai ||
Kari soi roop gayau puni tahava | Ban Asok Sita rah jahava ||
Dekhi manahi mahu keenh pranaama | Baithehi beeti jaat nisi jaama ||
Krus tanu sees jata ek benee | Japati hraday Raghupati gun shrenee ||
 
|| Doha – 8 ||
Nij pad nayan die man Raam pad kamal leen |
Param dukhee bha pavansut dekhi Jaanakee deen ||

||Chopai||
Taru pallav mahu rahaa lukaai | Karai bichaar karau kaa bhai ||
Tehi avasar Raavanu tah aava | Sang naari bahu kie banaava ||
Bahu bidhi khal Sitahi samuzaava | Saam daam bhay bhed dekhaava ||
Kah Ravanu sunu sumukhi sayaanee | Mandodari aadi sab raanee ||
Tav anucharee karau pan mora | Ek baar bilku mam ora ||
Trun dhari ot kahati baidehee | Sumiri avadhapati param sanehe ||
Sunu dasamukh khadyot prakasa | Kabahu ki nalinee karai bikaasa ||
As man samuzu kahati Jaanakee | Khal sudhi nahi Rabhubeer baan kee ||
Sath soone hari aanehi mohee | Adham nilajj laaj nahi tohee ||
 
|| Doha – 9 ||
Aapuhi suni khadyot sam Ramahi bhaanu samaan |
Parush bachan suni kaadhi asi bola ati khisiaan ||

||Chopai||
Sita tai mam krut apamaanaa | Katihau tav sir kathin krupaanaa ||
Naahi ta sapadi maanu mam baanee | Sumukhi hoti na ta jeevan haanee ||
Syaam saroj daam sam sundar | Prabhu bhuj kari kar sam dasakandhar ||
So bhuj kanth ki tav asi ghora | Sunu sath as pravaan pan mora ||
Chandrahaas haru mam paritaapam | Rathupati birah anal sanjaatam ||
Sital nisit bahasi bar dhaara | Kah Sita haru mam dukh bhaara ||
Sunat bachan puni maaran dhaava | Mayatanaya kahi neeti buzaava ||
Kahsi sakal nisicharanhi bolaai | Sitahi bahu bidhi traasahu jaai ||
Maas divas mahu kahaa na maana | Tau mai maarabi kaadhi krupaana ||
 
|| Doha – 10 ||
Bhavan gayau daskandhar iha pisaachini brund |
Sitahi traas dekhaavahi dharahi roop bahu mand||


||Chopai||
Trijata naam rachchhasi eka| Raam charan rati nipun bibeka||
Sabanhau boli sunaaesi sapana | Sitahi sei karahu hit apana ||
Sapane baanar Lanka jaari | Jaatudhaan sena sab maaree||
Khar aarudh nagan dasaseesa| Mundit sir khandit bhuj beesa||
Ehi bidhi so dachchhin disi jaai| Lanka manahu Bibheeshan paai||
Nagar phiri Rabhubeer dohaai| Tab prabhu Sita boli pathaai||
Yah sapana mai kahau pukaaree| Hoihi satya gae din chaaree||
Taasu bachan suni te sab daree| Janaksuta ke charananhi paree||
 
|| Doha – 11 ||
Jah tah gai sakal tab Sita kar man soch|
Maas divas beete mohi maarihi nisichar poch||

||Chopai||
Trijata san bolee kar joree | Maatu bipati sangini tai more ||
Tajau deh karu begi upaai| Dusah birahu ab nahi sahi jaai||
Aani kaath rachu chita banaai | Maatu anal puni dehi lagaai||
Satya karahi mam preeti sayaanee | Sunai ko Shravan sool sam baanee ||
Sunat bachan pad gahi samuzaaesi| Prabhu prataap bal sujasu sunaaesi||
Nisi na anal mil sunu sukumaaree| As kah so nij bhavan sidhaaree||
Kah Sita bidhi bha pratikula| Milihi na paavak mitihi na soola||
Dekhiat pragat gagan angaara| Avani na aavat ekau taara||
Paavakmay sasi sravat na aagee| Maanahu mohi jaani hatabhaagee||
Sunahi binay mam bitap asoka| Satya naam karu haru mam soka||
Nootan kisalay anal samaana| Dehi agini jani karahi nidaana||
Dekhi param birahaakul sita| So chhan kapihi kalap sam beeta||
 
|| Doha – 12 ||
Kapi kari hriday bichaar deenhi mudrika daari tab|
Janu asok angaar deenh harashi uthi kar gaheu||

||Chopai||
Tab dekhee mudrika manohar | Raam naam ankit ati sundar ||
Chakit chitav mudaree pahichanee | Harash bishaad hriday akulaanee||
Jeeti ko sakai ajay Raghuraai | Maaya te asi rachi nahi jaai||
Sita man bichaar kar nana | Madhur bachan boleu Hanumaana||
Raamchandra gun baranai laaga| Sunatahi Sita kar bukh bhaaga||
Laagee sunai shravan man laai| Aadihu te sab katha sunaai||
Shravanaamrut jehi katha suhaai| Kahi so pragat hoti kin bhaai||
Tab Hunamant nikat chali gayau| Phiri baithee man bisamay bhayau||
Raam doot mai maatu Jaanakee| Satya sapath karunaanidhaan kee ||
Yah mudrika maatu mai aanee| Deenhi Raam tumh kah sahidaanee||
Nar baanarahi sang kahu kaise| Kahi katha bhai sangati jaise||
 
|| Doha – 13 ||
Kapi ke bachan saprem suni upaja man biswaas|
Jaana man kram bachan yah krupaasindhu kar daas||

||Chopai||
Harijan jaani preeti ati gaadhee | Sajal nayan pulakaavali baadhee||
Budat birah jaladhi Hanumaana | Bhayahu taat mo kahu jalajaana||
Ab kahu kusal jaau balihaaree | Anuj sahit such bhavan kharaaree||
Komalchit krupaal Raghuraai| Kapi kehi hetu dharee nithuraai||
Sahaj baani sevak sukhdaayak| Kabahuk surati karat Raghunaayak||
Kabahu nayan mam Sital taata| Hoihahi nirakhi syaam mrudu gaata||
Bachanu na aav nayan bhare baaree| Ahah naath hau nipat bisaree||
Dekhi param birahaakul Sita| Bola kapi mrudu bachan bineeta||
Maatu kusal prabhu anuj sameta| Tav dukh dukhi sukrupa niketa||
Jani jananee maanahu jiy oona| Tumh te premu raam ke doona||
 
|| Doha – 14 ||
Raghupati kar sandesu ab sunu jananee dhari dheer|
As kahi kapi gadagad bhayau bhare bilochan neer||

||Chopai||
Kaheu Raam biyog tav Sita| Mo kahu sakal bhae bipareeta||
Nav taru kisalay manahu krusaanu| Kaalanisa sam nisi sasi bhaanoo||
Kubalay bipin kunt ban sarisa| Baarid tapat tel janu barisa||
Je hit rahe karat tei peera| Urag swaas sam tribidh sameera||
Kahehoo te kachoo dukh ghati hoi| Kaahi kahau yah jaan na koi||
Tatva prem kar mam aru tora| Jaant priya eku manu mora||
So manu sada rahat tohi paahee| Jaanu preeti rasu etanehi maahee||
Prabhu sandesu sunat baidehee| Magan prem tan sudhi nahi tehee||
Kah kapi hriday dheer dharu maata| Sumiru Raam sevak sukhdaata||
Ur aanahu Raghupati prabhutaai| Sun imam bachan tajahu kadaraai||

||Doha – 15 ||
Nisichar nikar patang sam Raghupati baan krusanu|
Jananee hriday dheer dharu jare nisaachar jaanu||

||Chopai||
Jau Raghubeer hoti sudhi paai| Karate nahi bilambu Raghuraai||
Raam baan rabi ue Jaanakee| Tam barooth kah jaatudhaan kee||
Abahi maatu mai jaau lavaai| Prabhu aayasu nahi Raam dohaai||
Kachhuk divas jananee dharu dheera| Kapinh sahit aihahi Rabhubeera||
Nisichar maari tohi lai jaihahi| Tihu pur Naaradaadi jasu gaihahi||
Hai sut kapi sab tumhahi samaana| Jatudhaan ati bhat balawaana||
More hriday param sandeha| Suni kapi pragat keenhi nij deha||
Kanak bhudharaakaar sareera| Samar bhayankar atibal beera||
Sita man bharos tab bhayaoo| Puni laghu roop pavanasut layaoo||

 
|| Doha – 16 ||
Sunu maata saakhaamrug nahi bal buddhi bisaal|
Prabhu prataap te garudahi khaai param laghu byaal||


||Chopai||
Man santosh sunat kapi baanee| Bhagati prataap tej bal saanee||
Aashish deenhi raampriy jaana| Hohu taat bal seel nidhaana||
Ajar amar gunanidhi sut hohu| Karahu bahut Raghunaayak chhohoo||
Karahu krupa prabhu as suni kaana| Nirbhar prem magan Hanumaana||
Baar baar naaesi pad seesa| Bola bachan jori kar keesa||
Ab krutkrutya bhayau mai maata| Aasish tav amogh bikhyaata||
Sunahu maatu mohi atisay bhookha| Laagi dekhi sundar phal rookha||
Sunu sut karahi bipin rakhawaaree| Param subhat rajaneechar bhaaree||
Tinh kar bhay maata mohi naahee| Jau tumh such maanahu man maahee||
 
|| Doha – 17 ||
Dekhi buddhi bal nipun kapi kaheu Jaankee jaahu|
Raghupati charan hriday dhari taat madhur phal khaahu||

||Chopai||
Chaleu naai siru paitheu baaga| Phal khaaesi taru torai laaga||
Rahe taha bahu bhat rakhawaare| Kachhu maaresi kachhu jaai pukaare||
Naath ek aava kapi bhaaree | Tehi Asok baatika ujaaree||
Khaaesi phal aru bitap upaare| Rachchhak mardi mardi mahi dare||
Suni Raavan pathae bhat nana| Tinhahi dekhi garjeu Hanumaana||
Sab rajanichar kapi sanghaare| Gae pukaarat kachhu adhamaare||
Puni pathayau tehi achchhakumaara| Chala sang lai subhat apaara||
Aavat dekhi bitap gahi tarja| Taahi nipaati mahaadhuni garja||
 
|| Doha – 18 ||
Kachhu maaresi kachhu mardesi kachhu milaesi dhari dhoori|
Kachu puni jaai pukaare prabhu markat bal bhori||

||Chopai||
Suni sutabadh Lankes risaana| Pathaesi Meghanaad balawaana||
Maarasi jani sut baandhesu taahee| Dekhia kapihi kahaa kar aahee||
Chala Indrajit atulit jodha| Bandhu nidhan suni upaja krodha||
Kapi dekha daarun bhat aava| Katakataai garja aru dhaava||
Ati bisaal taru ek upaara| Birath keenh Lankes kumara||
Rahe mahaabhat taake sanga| Gahi gahi kapi mardai nij anga||
Tinhahi nipaati taahi san baaja| Bhire jugal maanahu gajaraaja||
Muthika maari chadha taru jaai| Taahi ek chhan muruchha aai||
Uthi bahori keenhisi bahu maaya| Jeeti na jaai prabhanjan jaaya||
 
|| Doha – 19 ||
Brahm astra tehi saandha kapi man keenh bichaar|
Jau na brahmasar maanau mahima mitai apaar||

||Chopai||
Brahmabaan kapi kahu tehi maara| Paratihu baar kataku sanghaara||
Tehi dekha kapi muruchhit bhayau| Naagpaas baandhesi lai gayau||
Jaasu naam japi sunahu bhavaanee| Bhav bandhan kaatahi nar gyaanee||
Taasu doot ki bandh taru aava| Prabhu kaaraj lagi kapihi bandhava||
Kapibandhan suni nisichar dhaae| Kautuk laagi sabha sab aae||
Dasamukh sabha deekhi kapi jaai| Kahi na jaai kachhu ati prabhutaai||
Kar jore sur disip bineeta| Bhrukuti bilokat sakal sabheeta||
Dekhi prataap na kapi man sanka| Jimi ahigan mahu garud asanka||
 
|| Doha – 20 ||
Kapihi biloki dasaanan bihasa kahi durbaad|
Sutabadh surati keenhi puni upaja hriday bishaad||

||Chopai||
Kah Lankes kavan tai keesa| Kehi ke bal ghalehi ban kheesa||
Kee dhau Shravan sunehi nahi mohee| Dekhau ati asank sath tohee||
Maare nisichar kehi aparaadha| Kahu sath tohi na praan kai baadha||
Sunu Raavan brahmaand nikaaya| Paai jaasu bal birachati maaya||
Jaake bal biranchi hari isa| Paalat srujat harat dasaseesa||
Jaa bal sees dharat sahasaanan| Andakos samet giri kaanan||
Dharat jo bibidh deh suratraata| Tumh se sathanh sikhaavanu data||
Har kodand kathin jehi bhanja| Tehi samet nrup dal mad ganja||
Khar dushan trisira aru baalee| Badhe sakal atulit balasaalee||
 
|| Doha – 21 ||
Jaake bal lavales te jitehu charaachar zaari|
Taasu doot mai jaa kari hari aanehu priy naari||

||Chopai||
Kah Lankes kavan tai keesa|Kehi ke bal ghalehi ban kheesa||
Kee dhau Shravan sunehi nahi mohee| Dekhau ati asank sath tohee||
Maare nisichar kehi aparaadha| Kahu sath tohi na praan kai baadha||
Sunu Raavan brahmaand nikaaya| Paai jaasu bal birachati maaya||
Jaake bal biranchi hari isa| Paalat srujat harat dasaseesa||
Jaa bal sees dharat sahasaanan| Andakos samet giri kaanan||
Dharat jo bibidh deh suratraata| Tumh se sathanh sikhaavanu data||
Har kodand kathin jehi bhanja| Tehi samet nrup dal mad ganja||
Khar dushan trisira aru baalee| Badhe sakal atulit balasaalee||

 
|| Doha – 22 ||
Pranatapaal Raghunaayak karuna Sindhu kharaari|
Gae saran prabhu raakhihai tav aparaadh bisaari||

||Chopai||
Raam charan Pankaj ur dharahoo| Lanka achal raaju tumh karahoo||
Rishi pulasti jasu bimal mayanka| Tehi sasi mahu jani hohu kalanka||
Raam naam binu gira na soha| Dekhu bichari tyagi mad moha||
Basan heen nahi soh suraree| Sab bhushan bhushit bar naaree||
Raam bimukh sampati prabhutaai | Jaai rahi paai binu paai ||
Sajal mool jinh saritanh nahi | Barashi gae puni tabahi sukhahee ||
Sunu dasakanth kahau pan ropee | Bimukh Raam traata nahi kopee ||
Sankar sahas bishnu aj tohee | Sakahi na raakhi raam kar drohee ||
 
|| Doha – 23 ||
Mohmool bahu sool prad tyagahu tam abhimaan|
Bhajahu Raam Raghunaayak krupa sindhu Bhagawaan ||


||Chopai||
Jadapi kahee kapi ati hit baanee| Bhagati bibek birati nay saanee ||
Bola bihasi maha abhimaanee| Mila hahahi kapi gur bad gyanee||
Mrutyu nikat aai khal tohee| Laagesi adham sikhaavan mohee||
Ulata hoihi kah Hanumaana| Matibhram tor pragat mai jaana||
Suni kapi bachan bahut khisiaana| Begi na harahu moodh kar praana||
Sunat nisaachar maaran dhaae| Sachivanh sahit Bibheeshanu aae||
Naai sees kari binay bahoota| Neeti birodh na maaria doota||
Aan dand kachhu karia gosaai| Sabahee kahaa mantra bhal bhai||
Sunat bihasi bola daskandhar | Ang bhang kari pathaia Bandar ||
 
|| Doha – 24 ||
kapi ke mamata poonch par sabahi kahau samuzaai|
Tel bori pat baandhi puni paavak dehu lagaai ||

||Chopai||
Poonchh-heen baanar tah jaaehi| Tab sath nij naathhi lai aaihi ||
Jinh kai keenhisi bahut badaai| Dekhu mai tinh kai prabhutaai ||
Bachan sunat kapi man musukaana| Bhai sahaay saarad mai jaana ||
Jaatudhaan suni Raavan bachana| Laage rachai moodh soi rachana||
Raha na nagar basan ghrut tela| Baadhee poonch keenh kapi khela||
Kautik kah aae purbaasee| Maarahi charan karahi bahu haasee||
Baajahi dhol dehi sab taaree | Nagar pheri puni poonch prajaaree||
Paavak jaat dekhi Hanumanta| Bhayau param lafghuroop turanta||
Nibuki chadheu kapi kanak ataaree | Bhai sabheet nisaachar naaree ||
 
|| Doha – 25 ||
Hari prerit tehi avasar chale marut unachaas|
Attahaas kari garja kapi badhi laag akaas||

||Chopai||
Deh bisaal param haruaai| Mandir te mandir chadh dhaai||
Jarai nagar bha log bihaala| Zapat lapat bahu koti karaala||
Taat maatu haa sunia pukaara| Ehi avasar ko hamahi ubaara||
Ham jo kaha yah kapi nahi hoi| Baanar roop dhare sur koi ||
Saadhu avagya kar phalu aisa| Jarai nagar anaath kar jaisa||
Jaara nagaru nimish ek maahee| Ek Bibheeshan kar bruh naahee ||
Taa kar doot anal jehi sirija | Jaraa na so tehi kaaran girija ||
Ulati palati Lanka sab Jaaree | Koodi para puni sindhu mazaaree ||


|| Doha – 26 ||
Poonch buzaai khoi shram dhari laghu roop bahori|
Janaksuta ke aage thaadh bhayau kar jori ||

||Chopai||
Maatu mohi deeje kachhu cheenha | Jaise Raghunaayak mohi deenha ||
Choodamani utaari tab dayaoo | Harash samet pavanasut layaoo ||
Kahehu taat as mor pranaama| Sab prakaar prabhu pooranakaama||
Deen dayaal biridu sambhaaree| Harahu naath mam sankat bhaaree||
Taat sakrasut katha sunaaehu| Baan prataap prabhuhi samuzaehu||
Maas divas mahu naath na aava| Tau puni mohi jiat nahi paava||
Kahu kapi kehi bidhi rakhau praana|Tumhahoo Taat kahat ab jaana||
Tohi dekhi seetali bhai chhatee| Puni mo kahu soi dinu so raatee||
 
|| Doha – 27 ||
Janakasutahi samuzaai kari bahu bidhi dheeraju deenh|
Charan kamal siru naai kapi gavanu Raam pahi keenh ||

||Chopai||
Chalat mahaadhuni garjesi bhaaree | Garbh stravahi suni nisichar naaree ||
Naaghi sindhu ehi paarahi aava | Sabad kilikila kapinh sunaava ||
Harashe sab biloki Hanumaana | Nutan janm kapinh tab jaana ||
Mukh prasanna tan tej biraaja | Keenhesi raamachandra kar kaaja ||
Mile sakal ati bhae sukhaaree | Talafat meen paav jimi baaree ||
Chale harashi Raghunaayak paasa | Poonchhat kahat naval itihaasa ||
Tab madhuban bheetar sab aae| Angad sammat madhu phal khaae||
Rakhawaare jab barajan laage| Mushti prahaar hanta sab bhaage ||
 
|| Doha – 28 ||
Jaai pukaare te sab ban ujaar jubaraaj |
Suni Sugreev harash kapi kari aae prabhu kaaj ||

||Chopai||
Jau na hoti sita sudhi paai | Madhuban ke fal sakahi ki khaai ||
Ehi bidhi man bichaar kar raja | Aai gae kapi sahit samaaja ||
Aai sabanhi naava pad seesa | Mileu sabanhi ati prem kapeesa||
Poonchhee kusal kusal pad dekhee| Raam krupa bhaa kaaju biseshee ||
Naath kaaju keenheu Hanumaana | Raakhe sakal kapinh ke praana ||
Suni Sugreev bahuri tehi mileu | Kapinh sahit Raghupati pahi chaleoo||
Raam kapinh jab aavat dekha | Kie kaaju man harash bisesha ||
Fatik sila baithe dwau bhaai | Pare sakal kapi charanhi jaai ||
 
|| Doha – 29 ||

Preeti sahit sab bhete Raghupati karuna punj|
Poonchhee kusal naath ab kusal dekhi pad kanj||

||Chopai||
Jaamvant kah sunu Raghuraaya | Jaa par naath karahu tumh daaya ||
Taahi sada subh kusal nirantar | Sur nar muni prasannata upar ||
Soi bijai binai gun saagar | Taasu sujasu trailok ujaagar ||
Prabhu kee krupa bhayau sabu kaaju | Janma hamaar safal bhaa aaju ||
Naath pavansut keenhi jo karanee | Sahasahu much na jaai so baranee ||
Pavantanay ke charit suhaae | Jaamavant Raghupatihi sunaae ||
Sunat krupaanidhi man ati bhaae | Puni Hanumaan harashi hiy laae ||
Kahahu taat kehi bhaanti Jaanakee | Rahati karati rachchha swapraan kee ||

 
|| Doha – 30 ||
Naam paaharu divas nisi dhyaan tumhaar kapaat|
Lochan nij pad jantrit jaahi praan kehi baat ||

||Chopai||
Chalat mohi choodaamani deenhee | Raghupati hriday laai soi leenhee ||
Naath jugal lochan bhari baree | Bachan kahe kachhu Janakkumari||
Anuj samet gahehu prabhu charana | Deen bandhu pranataarati harana ||
Man kram bachan charan anuraagee | Kehi aparaadh naath hau tyaagee ||
Avagun ek mor mai maana | Bichhurat praan na keenh payaana ||
Naath so nayananhi ko aparaadha | Nisarat praan karahi hathi baadha ||
Birah agini tanu tool sameera | Swaas jarai chhan maahi sareera ||
Nayan stravahi jalu nij hit laagee | Jarai na paav deh birahaagee ||
Sita kai ati bipati bisaala | Binahi kahe bhali deendayaala ||
 
|| Doha – 31 ||
Ninish nimish karunaanidhi jaahi kalap sam beeti|
Begi chalia prabhu aania bhuj bal khal dal jeeti ||


||Chopai||
Suni Sita dookh prabhu sukh ayana| Bhari aae jal raajiv nayana ||
Bachan kaay man mam gati jaahee | Sapanehu boozia bipati ki taahee ||
Kah Hanumant bipati prabhu soi| Jab tav sumiran bhajan na hoi ||
Ketik baat prabu jaatudhaan kee | Ripuhi jeeti aanibee jaankee ||
Sunu kapi tohi samaan upakaaree | Nahi kou sur nar muni tanudhaaree ||
Prati upakaar karau kaa tora| Sanmukh hoi na sakat man mora ||
Sunu sut tohi urin mai naahee | Dekheu kari bichaar man maahee ||
Puni puni kapihi chitav surtraata | Lochan neer pulak ati gaata ||

 
|| Doha – 32 ||
Suni prabhu bachan biloki mukh gaat harashi Hanumant|
Charan pareu premaakul traahi traahi bhagavant ||


||Chopai||
Baar baar prabhu chahai uthaava | Prem magan tehi uthab na bhaava ||
Prabhu kar pankaj kapi ke seesa | Sumiri so dasa magan gaureesa ||
Saavadhaan man kari puni sankar | Laage kahan katha ati sundar ||
Kapi uthaai prabhu hriday lagaava | Kar gahi param nikat baithaava ||
Kahu kapi Raavan paalit Lanka | Kehi bidhi daheu durg a ti banka ||
Prabhu prasanna jaana Hanumaana | Bola bachan bigat abhimaana ||
Saakhaamrug kai badi manusaai | Saakha te saakha par jaai ||
Naaghi sindhu haatkapur jaara | Nisichar gan badhi bipin ujaara ||
So sab tav prataap Raghuraai | Naath na kachoo mori prabhutaai ||
 
|| Doha – 33 ||
Taa kahu prabhu kachhu agam nahi jaa par tumh anukool|
Tav prabhaav badavaanalahi jaari sakai khalu tool||

||Chopai||
Naath bhagati ati sukhadaayanee | Dehu krupa kari anapaayanee ||
Suni prabhu param saral kapi baanee | Evamastu tab kaheu bhavaanee ||
Uma Raam subhaau jehi jaana | Taahi bhajanu taji bhaav na aana ||
Yah sambaad jaasu ur aava | Raghupati charan bhagati soi paava ||
Suni prabhu bachan kahahi kapibrunda | Jay Jay Jay krupaal sukhkanda ||
Tab Raghupati kapipatihi bolaava | Kaha chalai kar karahu banaava ||
Ab bilambu kehi kaaran keeje | Turat kapinh kahu aayasu deeje ||
Kautuk dekhi suman bahu barashi | Nabh te bhavan chale sur harashee ||
 
|| Doha – 34 ||
Kapipati begi bolaae aae juthap jooth |
Naana baran atul bal baanar bhaalu barooth ||


||Chopai||
Prabhu pad pankaj naavahi seesa | Garjahi bhaalu mahaabal keesa ||
Dekhi Raam sakal kapi sena | Chitai krupa kari Raajiv naina ||
Raam krupa bal paai kapinda | Bhae pachchhajut manahu girinda ||
Harashi Raam tab keenh payaana | Sagun bhae sundar subh nana ||
Jaasu sakal mangalamay keetee | Taasu payaan sagun yah neetee ||
Prabhu payaan jaana baidehee | Faraki baam ang janu kahi dehee ||
Joi joi sagun jaanakihi hoi | Asagun bhayau Raavanahi soi ||
Chala kataku ko baranai paara | Garjahi baanar bhaalu apaara ||
Nakh aayudh giri paadapadhaaree | Chale gagan mahi ichchhachaaree ||
Ke harinaad bhaalu kapi karahee | Dagamagaahi diggaj chikkarahee ||
 
|| Chhand ||
Chikkarahi diggaj dol Mahi giri lol saagar kharabhare |
Man harash sabh gandharb sur Muni naag kinnar dukh tare ||
Katakatahi markat bikat bhat Bahu koti kotinh dhaavahee |
Jay Raam prabal prataap Kosalnaath gun gan gaavahee ||1||
Sahi sak na bhaar udaar Ahipati baar baarhi mohai ||
Gah dasan puni puni Kamath Prushth kathor so kimi sohai ||
Rabhubeer ruchir prayaan prasthiti Jaani param suhaavanee |
Janu kamath kharpar sarparaaj so Likhat abichal paavanee ||2||
 
|| Doha – 35 ||
Ehi bidhi jaai krupaanidhi utare saagar teer|
Jah tah laage khaan fal bhaalu bipul kapi beer||

||Chopai||
Uhaa nisaachar rahahi sasanka| Jab te jaari gayau kapi Lanka ||
Nij nij gruh sab karahi bichaara | Nahi nisichar kul ker ubaara ||
Jaasu doot bal barani na jaai | Tehi aae pur kavan bhalaai ||
Dutinh san suni purajan baanee | Mandodaree adhik akulaanee ||
Rahasi jori kar pati pag laagee | Boli bachan neeti ras paagee ||
Kant karash hari san pariharahoo | Mor kahaa ati hit hiy dharahoo ||
Samuzat jaasu doot kai karanee | Stravahi garbh rajaneechar gharanee ||
Taasu naari nij sachiv bolaai | Pathavahu kant jo chahahu bhalaai ||
Tav kul kamal bipin dukhadaai | Sita Sit nisa sam aai ||
Sunahu naath sita binu deenhe | Hit na tumhaar sambhu aj keenhe ||
 

|| Doha – 36 ||
Raam baan ahi gan saris nikar nisaachar bheka |
Jab lagi grasat na tab lagi jatanu karahu taji tek ||

||Chopai||
Shravan sunee sath taa kari baanee | Bihasa jagat bidit abhimanee ||
Sabhay Subhaau naari kar saacha | Mangal mahu bhay man ati kaacha ||
Jau aavai markat katakaai | Jiahi bichaare nisichar khaai ||
Kampahi lokap jaakee traasa| Taasu naari sabheet badi haasa||
As kahi bihasi taahi ur laai | Chaleu sabha mamata adhikaai||
Mandodari hriday kar chinta | Bhayau kant par bidhi bipareeta ||
Baitheu sabha khabari asi paai | Sindhu paar sena sab aai ||
Buzesi sachiv uchit mat kahahoo | Te sab hanse masht kari rahahoo ||
Jitehu suraasur tab shram naahee | Nar Baanar kehi lekhe maahee ||
 
|| Doha – 37 ||
Sachib baid gur teeni jau priy bolahi bhay aas |
Raaj dharm tan teeni kar hoi begihee naas ||

||Chopai||
Soi Raavan kahu bane sahaai | Astuti karahi sunaai sunaai ||
Avasar jaani Bibheeshanu aava | Bhrata charan seesu tehi naava ||
Puni siru naai baith nij aasan | Bola bachan paai anusaasan ||
Jo krupaal poonchhihu mohi baata | Mati anuroop kahau hit taata ||
Jo aapan chaahai kalyaana | Sujasu sumati subh gati such nana ||
So parnaari lilaar gosaai | Tajau chauthi ke chand ki naai ||
Chaudah bhuvan ek pati hoi | Bhootadroh tishtai nahi soi ||
Gun saagar naagar nar jou | Alap lobh bhal kahai na kou ||
 
|| Doha – 38 ||
Kaam krodh mad lobh sab nath narak ke panth |
Sab parihari Raghubeerahi bhajahu bhajau jehi sant||

||Chopai||
Taat Raam nahi nar bhoopaala | Bhuvaneshwar kaalahu kar kaala ||
Brahm anaamay aj bhagavanta | Byapak ajit anaadi ananta ||
Go dwij dhenu dev hitakaaree | Krupa sindhu manush tanudhaaree ||
Jan ranjan bhanjan khal braata | Bed dharm rachchhak sunu bhrata ||
Tohi bayaru taji naaia maatha | Pranataarati bhanjan Raghunaatha ||
Dehu naath prabhu kahu baidehee | Bhajahu Raam binu hetu sanehee ||
Saran gae prabhu taahu na tyaaga | Biswa droh krut agh jehi laaga ||
Jaasu naam tray taap nasavan | Soi prabhu pragat samuzu jiy Raavan||
 
|| Doha –39 ||
Baar baar pad laagau binay karau dasasees |
Parihari maan moh mad bhajahu kosalaadhees ||
Muni pulasti nij sisya san kahi pathai yah baat |
Turat so mai prabhu san kahee paai suavasaru taat||

||Chopai||
Malyavant ati sachiv sayaana | Taasu bachan suni ati such maana ||
Taat anuj tav neeti Bibheeshan | So ur dharahu jo kahat Bibheeshan ||
Ripu utakarash kahat sath dou | Doori na karahu iha hai kou ||
Malyavant gruh gayau bahoree | Kahai Bibheeshan puni kar joree ||
Sumati kumati sab ke ur rahahee | Naath puran nigam as kahahee ||
Jaha sumati tah sampati nana | Jaha kumati tah bipati nidaana ||
Tav ur kumati basi bipareeta | Hit anahit maanahu ripu preeta ||
Kaalraati nisichar kul keree | Tehi Sita par preeti ghaneree ||
 
|| Doha – 40 ||
Taat charan gahi maagau raakhahu mor dulaar|
Sita dehu Raam kahu ahit na hoi tumhaar ||


||Chopai||
Budh puraan shruti sammat baanee | Kahi Bibheeshan neeti bakhanee ||
Sunat dasaanan utha risaai | Khal tohi nikat mrutyu ab aai ||
Jiasi sada sath mor jiaava | Ripu kar pachchha moodh tohi bhaava ||
Kahasi na khal as ko jag maahee | Bhuj bal jaahi jita mai naahee ||
Mam pur basi tapasinh par preetee | Sath milu jaai tinhahi kahu neetee ||
As kahi keenhesi charan prahaara | Anuj gahe pad baarahi baara ||
Uma sant kai ihai badaai | Mand karat jo karai bhalaai ||
Tumh pit saris bhalehi mohi maara | Raamu bhaje hit naath tumhaara ||
Sachiv sang lai nabh path gayhaoo | Sabahi sunaai kahat as bhayaoo ||
 
|| Doha – 41 ||
Raam satyasankalp prabhu sabha kaalbas tori |
Mai Raghubeer saran ab jaau dehu jani khori ||

||Chopai||
As kahi chala Bibheeshan jabahee | Aayuheen bhae sab tabahee ||
Saadhu avagya turat bhavaanee | Kar kalyaan akhil kai haanee ||
Raavan jabahi Bibheeshan tyaaga | Bhayau bibhav binu tabahi abhaaga ||
Chaleu harashi Raghunaayak paahee | Karat manorath bahu man maahee ||
Dekhihau jaai charan jalajaata | Arun mrudul sevak sukhadaata ||
Je pad parasi taree rishinaaree | Dandak Kaanan paavanakaaree ||
Je pad Janakasuta ur laae | Kapat kurang sang dhar dhaae ||
Har ur sar saroj pad jei | Ahobhagya mai dekhihau tei ||
 
|| Doha – 42 ||
Jinh paayanh ke paadukanhi bharatu rahe man laai|
Te pad aaju bilokihau inh nayananhi ab jaai ||

||Chopai||
Ehi bidhi karat saprem bichaara| Aayau sapadi sindhu ehi paara ||
Kapinh Bibheeshan aavat dekha | Jaana kou ripu doot bisesha ||
Taahi raakhi kapees pahi aae | Samaachaar sab taahi sunaae ||
Kah Sugreev sunahu Raghuraai | Aava Milan dasaanan bhaai ||
Kah prabhu sakha booziai kaaha | Kahai kapees sunahu naranaaha ||
Jaani na jaai nisaachar maaya | Kaamroop kehi kaaran aaya ||
Bhed Hamaar len sath aava | Raakhia bandhi mohi as bhaava ||
Sakha neeti tumh neeki bichaaree | Mam pan saranaagat bhayahaaree ||
Suni prabhu bachan harash Hanumaana | Saranaagat bachchhal bhagawaana ||

|| Doha – 43 ||
Saranaagat kahu je tajahi nij anahit anumaanee |
Te nar paavar paapamay tinhahee bilokat haanee ||

||Chopai||
Koti bipra badh laagahi jaahoo | Aae saran tajau nahi taahoo ||
Sanamukh hoi jeev mohi jabahee | Janm koti agh naasahi tabahee ||
Paapavant kar sahaj subhaoo | Bhajanu mor tehi bhaav na kaaoo ||
Jau pai dusht hriday soi hoi | More sanamukh aav ki soi ||
Nirmal man jan so mohi paava | Mohi kapat chhal chhidra na bhaava ||
Bhed len pathava dasaseesa | Tabahu na kachu bhay haani kapeesa ||
Jag mahu sakha nisaachar jet e | Lachhimanu hanai nimish mahu te te||
Jau sabheet aava saranaai | Rakhihau taahi praan kee naai ||
 
|| Doha – 44 ||
Ubhay bhaanti tehi aanahu hasi kah krupaaniket |
Jay krupaal kahi kapi chale angad Hanoo samet ||

||Chopai||
Saadar tehi aage kari baanar | Chale jaha Raghupati karunaakar ||
Doorihi te dekhe dwau bhraata | Nayanaanand daan ke data ||
Bhuj pralamb kanjaarun lochan | Syaamal gaat pranat bhay mochan ||
Singh kandh aayat ur soha | Aanan amit madan man moha ||
Nayan neer pulakit ati gaata | Man dhari dheer kahee mrudu baata ||
Naath dasaanan kar mai bhraata |Nisichar bans janam suratraata ||
Sahaj paapapriy taamas deha | Jatha ulukahi tam par neha ||
 
|| Doha – 45 ||
Shravan sujasu suni aayau prabhu bhanjan bhav bheer|
Traahi traahi aarati haran saran sukhad Rabhubeer ||

||Chopai||
As kahi karat dandavat dekha | Turat uthe prabhu harash bisesha ||
Deen bachan suni prabhu man bhaava | Bhuj bisaal gahi hriday lagaava ||
Anuj sahit mili dhig baithaaree| Bole bachan bhagat bhayaharree ||
Kahu Lankes sahit parivaara | Kusal kuthaahar baas tumhaara ||
Khal mandalee basahu dinu raatee | Sakha dharam nibahai kehi bhaantee ||
Mai jaanau tumhaari sab reetee | Ati nay nipun na bhaav aneetee ||
Baru bhal baas narak kar taata | Dusht sang jani dei bidhaata ||
Ab pad dekhi kusal Raghuraaya | Jau tumh keenhi jaani jan daaya ||
 
|| Doha – 46 ||
Tab lagi kusal na jeev kahu sapane hu man bishraam|
Jab lagi bhajat na Raam kahu sok dhaam taji kaam ||

||Chopai||
Tab lagi hriday basat khal nana | Lobh moh machchhar mad maana ||
Jab lagi ur na basat Raghunaatha| Dhare chaap saayak kati bhaatha ||
Mamata tarun tamee adhiaaree | Raag dvesh ulook sukhakaaree ||
Tab lagi basati jeev man maahee | Jab lagi prabhu prataap rabi naahee ||
Ab mai kusal mite bhay bhaare | Dekhi Raam pad kamal tumhaare ||
Tumh krupaal jaa par anukoola | Taahi na byaap tribidh bhav soola ||
Mai nisichar ati adham subhaaoo | Subh aacharanu keenh nahi kaaoo ||
Jaasu roop muni dhyaan na aava | Tehi prabhu harashi hriday mohi lava||
 
|| Doha – 47 ||
Ahobhagya mama amita ati rama krpa sukha punja|
Dekhe’um nayana biranci siva sebya jugala pada kanja||

||Chopai||
Sunahu sakha nija kaha’um subha’u | Jana bhusundi sambhu girija’u||
Jaum nara ho’i caracara drohi | Avai sabhaya sarana taki mohi||
Taji mada moha kapata chala nana | Kara’um sadya tehi sadhu samana||
Janani janaka bandhu suta dara | Tanu dhanu bhavana suhrda parivara||
Saba kai mamata taga batori | Mama pada manahi bamdha bari dori||
Samadarasi iccha kachu nahim | Harasa soka bhaya nahim mana mahim||
Asa sajjana mama ura basa kaisem | Lobhi hrdayam basa’i dhanu jaisem||
Tumha sarikhe santa priya morem | Dhara’um deha nahim ana nihorem||

|| Doha – 48 ||
Sagun upaasak parahit nirat neeti dradh nem|
Te nar praan samaan mam jinh ke dvij pad prem||

||Chopai||
Sunu Lankesh sakal gun tore | Taate tumh atisay priy more ||
Raam bachan suni baanar jootha | Sakal kahahi jay krupa barootha ||
Sunat Bibheeshanu prabhu kai baanee | Nahi aghaat shravanaamrut jaanee ||
Pad Ambuj gahi baarahi baara | Hriday samaat na premu apaara ||
Sunahu dev sacharaachar swamee | Pranatapaal ur antarajaamee ||
Ur kachhu pratham baasana rahee | Prabhu pad preeti sarit so bahee ||
Ab krupaal nij bhagat paavanee | Dehu sada siv man bhaavanee ||
Evamastu kahi prabhu ranadheera | Maaga turat sindhu kar neera ||
Jadapi sakha tav ichchha naahee | Mor darasu amogh jag maahee ||
As kahi Raam tilak tehi saara | Suman brushti nabh bhai apaara ||
 
|| Doha – 49 ||
Raavan krodh anal nij svaas sameer prachand |
Jarat Bibheeshan raakheu  deenheu raaju akhand ||
Jo sampati siv ravanahi deenhi die das math |
Soi sampada Bibheeshanhi sakuchi deenhi Raghunaath ||

||Chopai||
As prabhu chhadi bhajahi je aana | Te nar pasu binu poonch bishaata ||
Nij jan jaani taahi apanaava | Prabhu subhaav kapi kul man bhaava ||
Puni sarbagya sarb ur baasee | Sarbaroop sab rahit udaasee ||
Bole bachan neeti pratipaalak | Kaaran manuj danuj kul ghaalk ||
Sunu kapees Lankaapati bera | Kehi bidhi taria jaladhi gambheera ||
Sankul maker urag zash jaatee | Ati agaadh duster sab bhaantee ||
Kah Lankesh sunahu Raghunaayak | Koti sindhu soshak tav saayak ||
Jadyapi tadapi neeti asi gaai | Binay karia saagar san jaai ||
 
|| Doha – 50 ||
Prabhu tumhaar kulagur jaladhi kahihi upaay bichaari|
Binu prayaas saagar tarihi sakal bhaalu kapi dhaari ||

||Chopai||
Sakha kahee tumh neeki upaai | Karia daiv jau hoi sahaai ||
Mantra na yah lachhiman man bhaava | Raam bachan suni ati dookh paava ||
Naath daiv kar kavan bharosa | Soshia sindhu karia man rosa ||
Kaadar man kahu ek adhara | Daiv daiv aalasee pukaara ||
Sunat bihasi bole raghubeera | Aisehi karab dharahu man dheera ||
As kahi prabhu anujahi samuzaai | Sindhu sameep gae Raghuraai ||
Pratham pranaam keenh siru naai | Baithe puni tat darbh dasaai ||
Jabahi bibheeshan prabhu pahi aae | Paachhe raavan doot pathaae ||
 
|| Doha – 51 ||
Sakal charit tinh dekhe dhare kapat kapi deh |
Prabhu gun hriday saraahahi sarnaagat par neh||

||Chopai||
Pragat bakhaanahi Raam subhaaoo| Ati saprem gaa bisari duraaoo ||
Ripu ke doot kapinh tab jaane | Sakal baandhi kapees pahi aane ||
Kah Sugreev sunahu sab baanar | Ang bhang kari pathavahu nisichar||
Suni Sugreev bachan kapi dhaae | Deen pukaarat tadapi na tyaage ||
Jo hamaar har naasa kaana | Tehi kosalaadhees kai aana ||
Suni lachhiman sab nikat bolaae | Daya laagi hasi turat chhodaae ||
Raavan kar deejahu yah paatee | Lachhiman bachan baachu kulaghaatee||
 
|| Doha – 52 ||
kahehu mukhaagar moodh san mam sandesu udaar |
Sita dei milahu na ta aava kaalu tumhaar ||


||Chopai||
Turat naai lachhiman pad maatha | Chale doot baranat gun gaatha ||
Kahat Raam jasu Lanka aae | Raavan charan sees tinh naae ||
Bihasi dasaanan poonchhee baata | Kahasi na suk aapani kusalaata ||
Puni kahu khabari Bibheeshan keree| Jaahi mryutu aai ati neree ||
Karat raaj Lanka sath tyaagee | Hoihi jav kar keet abhaagee ||
Puni kahu bhaalu kees katakaai | Kathin kaal prerit chali aai ||
Jinh ke jeevan kar rakhavaara | Bhayau mrudul chit sindhu bichaara ||
Kahu tapasinh kai baat bahoree | Jinh ke hriday traas ati moree ||
 
|| Doha – 53 ||
Kee bhai bhet ki firi gae shravan sujasu suni mor |
Kahasi na ripu dal tej bal bahut chakit chit tor ||


||Chopai||
Naath krupa kari poonchhehu jaise | Maanahu kahaa krodh taji taise ||
Mila jaai jab anuj tumhaara | Jaatahi raam tilak tehi saara ||
Raavan doot hamahi suni kaana | Kapinh baandhi deenhe dukh nana ||
Shravan naasika kaatai laage | Raam sapath deenhe ham tyaage ||
Poonchhehu naath Raam katakaai | Badan koti sat barani na jaai ||
Naana baran bhaalu kapi dhaaree | Bikataanan bisaal bhayakaaree ||
Jehi pur daheu hateu sut tora | Sakal kapinh mah tehi balu thora||
Amit naam bhat kathin karaala | Amit naag bal bipul bisaala ||
 
|| Doha – 54 ||
Dwibid mayank neel nal angad gad bikataasi |
Dadhi mukh kehari nisath sat jaamavant balaraasi ||

||Chopai||
E kapi sab Sugreev samaana | Inh sam kotinh ganai ko nana ||
Raam krupa atulit bal tinhahee | Trun samaan trailokahi ganahee ||
As mai suna shravan dasakandhar | Padum atharah juthap Bandar ||
Naath katak mah so kapi naahee | Jo na tumhahi jetai ran maahee ||
Param krodh meejahi sab haatha | Aayasu pain a dehi raghunaatha ||
Soshahi sindhu sahit zash byaala | Poorahi na ta bhari kudhar bisaala ||
Mardi gard milavahi dasaseesa | Aisei bachan kahahi sab keesa ||
Garjahi tarjahi sahaj asanka | Maanahu grasan chahat hahi Lanka ||
 
|| Doha – 55 ||
Sahaj soor kapi bhaalu sab puni sir par prabhu Raam |
Raavan kaal koti kahu jeeti sakahi sangraam ||

||Chopai||
Raam tej bal budhi bipulaai | Sesh sahas sat sakahi na gaai ||
Sak sar ek soshi sat saagar | Tav bhraatahi poonchheu nay naagar ||
Taasu bachan sni saagar paahee | Maagat panth krupa man maahee ||
Sunat bachan bihasa dasaseesa | Jau asi mati sahaay krut keesa ||
Sahaj bheeru kar bachan dhradhaai| Saagar san thaanee machalaai ||
Moodh mrusha kaa karasi badai | Ripu bal buddhi thaah mai paai ||
Sachiv sabheet Bibheeshan jaake | Bijay bibhooti kahaa jag take ||
Suni khal bachan doot ris baadhee | Samay bichaari patrika kaadhee ||
Raamaanuj deenhee yah paatee | Nath bachaai judaavahu chhatee ||
Bihasi baam kar leenhee Raavan | Sachiv boli sath laag bachaavan ||
 
|| Doha – 56 ||
Baatanh manahi rizaai sath jani ghaalasi kul khees |
Raam birodh na ubarasi saran bishnu aj is ||
Kee taji maan anuj iv prabhu pad pankaj bhrung |
Hohi ki Raam saraanal khal kul sahit patang ||

||Chopai||
Sunat sabhay man much musukaai | Kahat dasaanan sabahi sunaai ||
Bhoomi para kar gahat akaasa | Laghu taapas kr bag bilaasa ||
Kah suk naath satya sb baanee | Samuzahu chhadi prakruti abhimaanee ||
Sunau bachan mam parihari krodha | Naath Raam san tajahu birodha ||
Ati komal Raghubeer subhaaoo | Jadhyapi akhil lok kar raaoo ||
Milat krupa tumh par prabhu karihee | Ur aparaadh na ekau dharihee ||
Janaksuta Raghenaathhi deeje | Etana kaha mor prabhu keeje ||
Jab tehi kahaa den baidehee | Charan prahaar keenh sath tejee ||
Naai charan siru chala so tahaa| Krujpasindhu Raghunaayak jahaa ||
Kari pranaam nij katha sunaai | Raam krupa aapani gati paai ||
Rishi agasti kee saap bhavaanee | Raachhas bhayau raha muni gyaanee ||
Bandi Raam pad baarahi baara | Muni nij aashram kahu pagu dhaara ||
 
|| Doha – 57 ||
Binay na maanat jaladhi jad gae teeni din beeti |
Bole Raam sakop tab bhay binu hoi na preeti ||


||Chopai||
Lachhiman baan saraasan aanu | Soshau baaridhi bisikh krusaanoo ||
Sath san binay kutil san preetee | Sahaj krupan san sundar neetee ||
Mamata rat san gyaan kahaanee | Ati lobhee san birati bakhaanee ||
Krodhihi sam kaamihi harikatha | Oosar beej bae fal jatha ||
As kahi Raghupati chhap chadhaava | Yah mat lachhiman ke man bhaava ||
Sandhaaneu prabhu bisikh karaala | Uthi udadhi ur antar jwaala ||
Makar urag zash gan akulaane | Jarat jantu jalanidhi jab jaane ||
Kanak thaar bhari mani gan nana | Bipra roop aayau taji maana ||
 
|| Doha – 58 ||
Kaatehin Pai Kadaree Phari Koti Jatan Kou Seench|
Binay Na Maan Khages Sunu Daatehin Pai Nav Neech||

||Chopai||
Sabhay Sindhu Gahi Pad Prabhu Kere | Chhamahu Naath Sab Avagun Mere||
Gagan Sameer Anal Jal Dharanee | Inh Kai Naath Sahaj Jad Karanee||
Tav Prerit Maayaan Upajae | Srshti Hetu Sab Granthani Gae||
Prabhu Aayasu Jehi Kahan Jas Ahee | So Tehi Bhaanti Rahen Sukh Lahee||
Prabhu Bhal Keenh Mohi Sikh Deenheen | Marajaada Puni Tumharee Keenheen||
Dhol Gavaanr Soodr Pasu Naaree | Sakal Taadana Ke Adhikaaree||
Prabhu Prataap Main Jaab Sukhaee | Utarihi Kataku Na Mori Badaee||
Prabhu Agya Apel Shruti Gaee | Karaun So Begi Jo Tumhahi Sohaee||
 
|| Doha – 59 ||
Sunat Bineet Bachan Ati Kah Krpaal Musukai|
Jehi Bidhi Utarai Kapi Kataku Taat So Kahahu Upai||

||Chopai||
Naath Neel Nal Kapi Dvau Bhaee | Larikaeen Rishi Aasish Paee||
Tinh Ken Paras Kien Giri Bhaare | Tarihahin Jaladhi Prataap Tumhaare||
Main Puni Ur Dhari Prabhu Prabhutaee. Karihun Bal Anumaan Sahaee||
Ehi Bidhi Naath Payodhi Bandhai | Jehin Yah Sujasu Lok Tihun Gai||
Ehi Sar Mam Uttar Tat Baasee | Hatahu Naath Khal Nar Agh Raasee||
Suni Krpaal Saagar Man Peera | Turatahin Haree Raam Ranadheera||
Dekhi Raam Bal Paurush Bhaaree | Harashi Payonidhi Bhayu Sukhaaree||
Sakal Charit Kahi Prabhuhi Sunaava | Charan Bandi Paathodhi Sidhaava||
 
|| Chhand ||
Nij Bhavan Gavaneu Sindhu Shreeraghupatihi Yah Mat Bhaayoo|
Yah Charit Kali Mal Har Jathaamati Daas Tulasee Gaayoo||
Sukh Bhavan Sansay Saman | Davan Bishaad Raghupati Gun Gana|
Taji Sakal Aas Bharos Gaavahi Sunahi Santat Sath Mana||

|| Doha – 60 ||
Sakal sumangal daayak Raghunaayak gun gaan |
Saadar sunahi te tarahi bhav sindhu bina jalajaan ||



Sunderkand ka Path Hindi PDF

सुन्दरकाण्ड भारतीय महाकाव्य रामायण का एक महत्वपूर्ण एवं विशिष्ट खण्ड है। यह अध्याय हनुमान जी की वीरता, निष्ठा और अद्वितीय भक्ति पर केंद्रित है। सुंदरकांड को उसके काव्य सौंदर्य, उसकी गहरी दार्शनिक शिक्षाओं, उसके साहस और उसकी निष्ठा के लिए पूजनीय माना जाता है। हनुमान जी से आध्यात्मिक शक्ति, सुरक्षा और आशीर्वाद पाने के लिए भक्त इसका नियमित पाठ करते हैं। “सुंदरकांड” नाम संस्कृत के शब्द “सुंदर” (सुंदर) और “कांड” (अध्याय) से लिया गया है, जो इस खंड की प्रेरक और सौंदर्यपूर्ण प्रकृति पर विशेष जोर देता है।

सुंदरकांड का महत्व इस बात में है कि इसमें हनुमान जी की लंका यात्रा, माता सीता से उनकी मुलाकात और राम का सीता को संदेश जैसी महत्वपूर्ण घटनाओं का वर्णन है। यह भाग न केवल रामायण का भावनात्मक हिस्सा है, बल्कि यह एक गहरा आध्यात्मिक संदेश और जीवन के प्रति सही दृष्टिकोण भी सिखाता है।

सुंदरकांड का पाठ कैसे करें?

सुंदरकांड का पाठ करने से पहले कुछ विशेष तैयारी जरूरी है। इसका पाठ मंगलवार या शनिवार के दिन करना विशेष लाभकारी माना जाता है, क्योंकि मंगलवार हनुमान जी का दिन होता है और शनिवार के दिन भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व होता है। इन दिनों में सुंदरकांड का पाठ करने से भक्तों को अधिक आध्यात्मिक लाभ मिलता है।

सुंदरकांड का पाठ सुबह ब्रह्म मुहूर्त (4 बजे से 6 बजे) में करना सबसे शुभ माना जाता है। इस समय वातावरण शुद्ध होता है और ध्यान लगाकर जप करना आसान होता है। पाठ करने से पहले स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। पूजा स्थान पर हनुमान जी और श्री राम जी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। आप गणेश जी, शिव जी और लक्ष्मण जी की मूर्ति या तस्वीर भी रख सकते हैं। फूल, धूप, दीप, फल, प्रसाद आदि रखें। बोली सामग्री के बीच.

पाठ करते समय हनुमान जी और श्री राम जी की मूर्ति या तस्वीर के सामने बैठें और तय करें कि आप यह पाठ किस उद्देश्य से कर रहे हैं। बीच में किसी भी प्रकार के व्यवधान से बचते हुए पूरे पाठ को ध्यानपूर्वक और एकाग्रता से पढ़ें। पाठ समाप्त होने के बाद हनुमान जी और श्री राम जी की आरती करें और उपस्थित लोगों को प्रसाद वितरित करें।

सुंदरकांड पाठ कितने दिन करना चाहिए?

सुंदरकांड का पाठ कितने दिन तक करना चाहिए, यह भक्त की इच्छा और उसकी सुविधानुसार होता है। भक्त इसे एक दिन, तीन दिन, सात दिन, 11 दिन, 21 दिन या 41 दिन तक कर सकते हैं। सामान्य रूप से, 11 दिनों तक सुंदरकांड का पाठ करना शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह समय हनुमान जी को प्रसन्न करने और उनके आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पर्याप्त होता है।

यदि कोई विशेष मनोकामना की पूर्ति के लिए सुंदरकांड का पाठ कर रहा हो, तो 21 या 41 दिनों तक पाठ करने की सलाह दी जाती है। ऐसा माना जाता है कि इतने दिन तक पाठ करने से मनोकामना अवश्य पूरी होती है। सुंदरकांड पाठ करने से पहले किसी विद्वान ब्राह्मण या अनुभवी व्यक्ति से सलाह ली जा सकती है ताकि सही मार्गदर्शन मिल सके।

21 दिनों तक सुंदरकांड पढ़ने के क्या लाभ हैं?

21 दिनों तक सुंदरकांड का पाठ करने से मानसिक, आध्यात्मिक और शारीरिक लाभ मिलता है। इस पाठ से न केवल श्री राम के प्रति भक्ति और प्रेम बढ़ता है बल्कि हनुमान जी की महिमा को समझने और उनके चमत्कारों से प्रेरणा लेने में भी मदद मिलती है। माना जाता है कि 21 दिनों तक पाठ करने से समस्याएं दूर होती हैं, मन शांत होता है और जीवन में धैर्य, साहस और सकारात्मक ऊर्जा आती है। सुंदरकांड हनुमान जी की अद्वितीय भक्ति और समर्पण को दर्शाता है, जो भक्तों को अपने जीवन में दृढ़ संकल्प और साहस अपनाने के लिए प्रेरित करता है।

महिलाओं के लिए सुंदरकांड का पाठ

महिलाओं को सुंदरकांड का पाठ करने के अधिकार पर भी कई धारणाएं हैं। कुछ लोगों का मानना है कि महिलाओं को सुंदरकांड का पाठ नहीं करना चाहिए क्योंकि हनुमान जी ब्रह्मचारी हैं, लेकिन यह विचारधारा पूरी तरह से व्यक्तिगत धारणाओं पर आधारित है। असल में, सुंदरकांड एक धार्मिक ग्रंथ है, और इसे कोई भी व्यक्ति, चाहे वह महिला हो या पुरुष, श्रद्धा और विश्वास के साथ पढ़ सकता है। हनुमान जी की भक्ति और समर्पण की कहानी सभी के लिए प्रेरणादायक है और इससे मिलने वाला आध्यात्मिक लाभ सभी को समान रूप से प्राप्त होता है।

यदि कोई महिला हनुमान जी की भक्ति में विश्वास करती है और सुंदरकांड का पाठ करना चाहती है, तो उसे ऐसा करने से कोई नहीं रोक सकता।


सुंदरकांड में क्या लिखा है?

सुंदरकांड रामायण का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जिसमें हनुमान जी की वीरता, भक्ति और साहस का वर्णन किया गया है। इसमें मुख्य रूप से हनुमान जी की लंका यात्रा, माता सीता से मिलन, और राम का संदेश पहुंचाने की कथा है। यह हनुमान जी की राम के प्रति निष्ठा और समर्पण को दर्शाता है।

सुंदरकांड पाठ कैसे करें?

सुंदरकांड का पाठ करने से पहले भक्त को शुद्धता और ध्यान का पालन करना चाहिए। मंगलवार या शनिवार को, सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। हनुमान जी और श्रीराम जी की मूर्ति या तस्वीर के सामने बैठकर पाठ करें। पाठ के दौरान एकाग्रचित्त रहें और ध्यान को भटकने न दें। पाठ के बाद आरती करें और प्रसाद वितरित करें।

सुंदरकांड को ऐसा क्यों कहा जाता है?

सुंदरकांड का नाम संस्कृत के शब्दों “सुंदर” (अर्थात सुंदर) और “कांड” (अर्थात अध्याय) से लिया गया है। इस अध्याय में हनुमान जी के अद्भुत साहस, भक्तिपूर्ण कार्य और प्रेरणादायक घटनाओं का वर्णन है, जो इसे अत्यंत सुंदर और प्रेरणादायक बनाते हैं। इसलिए इसे “सुंदरकांड” कहा जाता है।

सुंदरकांड कब तक है?

सुंदरकांड पाठ का समय व्यक्तिगत गति पर निर्भर करता है। औसतन, सुंदरकांड के पाठ को पूरा करने में 45 मिनट से 1 घंटा लग सकता है। कुछ लोग इसे धीमी गति से ध्यानपूर्वक पढ़ते हैं, जिसमें समय थोड़ा अधिक लग सकता है।

सुंदरकांड पढ़ना कब शुरू करें?

सुंदरकांड का पाठ किसी भी शुभ दिन जैसे मंगलवार या शनिवार को शुरू किया जा सकता है, क्योंकि ये दिन हनुमान जी के लिए विशेष माने जाते हैं। सुबह के ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4 बजे से 6 बजे के बीच) में पाठ करना विशेष शुभ माना जाता है। हालाँकि, किसी भी समय श्रद्धा और भक्ति के साथ इसे पढ़ा जा सकता है।

सुंदरकांड के नियम क्या हैं?

सुंदरकांड का पाठ करते समय कुछ नियमों का पालन करना चाहिए। पाठ से पहले स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। हनुमान जी और श्रीराम जी की मूर्ति या तस्वीर के सामने बैठकर पाठ करें। पाठ को पूरा ध्यान और समर्पण के साथ करें। पाठ के दौरान किसी प्रकार की बाधा न आने दें और पूरा पाठ एक ही सत्र में समाप्त करें।

Shree Yantra – श्री यंत्र: धन, समृद्धि और शांति का प्रतीक 2024-25

श्री यंत्र (Shree Yantra) एक प्राचीन और दिव्य ज्यामितीय संरचना है, जिसे देवी लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। इसे “यंत्रराज” यानी यंत्रों का राजा भी कहा जाता है। श्री यंत्र का उद्भव वेदों और उपनिषदों में मिलता है, और इसे सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिरता और विनाश का प्रतीक माना जाता है। श्री यंत्र में नौ त्रिकोण होते हैं, जिनमें चार ऊपर की ओर और पाँच नीचे की ओर होते हैं। इन त्रिकोणों की संरचना से एक सितारे के आकार का यंत्र बनता है, जो देवी लक्ष्मी की शक्ति का प्रतीक है। श्री यंत्र को धन, समृद्धि, सुख और शांति की देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए पूजा जाता है।

श्री यंत्र का उपयोग ध्यान, तांत्रिक साधना, वास्तु शास्त्र, और विभिन्न पूजा विधियों में किया जाता है। इसकी विशेष संरचना मानव जीवन में सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करती है और सभी प्रकार की नकारात्मकता को दूर करती है। इसे घर या कार्यस्थल पर स्थापित करने से जीवन में धन, समृद्धि और शांति आती है। यह यंत्र न केवल भौतिक समृद्धि के लिए, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

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श्री यंत्र के कई लाभ होते हैं जो इसे एक महत्वपूर्ण धार्मिक और आध्यात्मिक उपकरण बनाते हैं। इसकी स्थापना और पूजा करने से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • धन और समृद्धि: श्री यंत्र को देवी लक्ष्मी का रूप माना जाता है, जो धन और समृद्धि की देवी हैं। इस यंत्र की स्थापना से घर में धन की वृद्धि होती है और आर्थिक स्थिति में सुधार आता है।
  • नकारात्मकता से मुक्ति: श्री यंत्र का नियमित पूजन करने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है। यह घर में शांति और सुख का वातावरण बनाता है।
  • स्वास्थ्य में सुधार: श्री यंत्र के प्रभाव से मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। यह तनाव, चिंता और मानसिक अस्थिरता को कम करता है।
  • आध्यात्मिक उन्नति: श्री यंत्र का ध्यान और पूजन करने से साधक की आध्यात्मिक उन्नति होती है। यह ध्यान में एकाग्रता और मानसिक शांति प्रदान करता है।
  • वास्तु दोष निवारण: श्री यंत्र वास्तु दोषों को दूर करने में मदद करता है। इसे घर में सही स्थान पर स्थापित करने से वास्तु दोषों का निवारण होता है और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

श्री यंत्र की पूजा के दौरान एक विशेष मंत्र का उच्चारण किया जाता है, जो इसकी ऊर्जा को सक्रिय करता है। इस मंत्र का सही उच्चारण करने से मनोकामनाएँ पूरी होती हैं और देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। श्री यंत्र के मंत्र को सिद्ध करने के लिए निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण किया जाता है:

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः।

इस मंत्र का नियमित जाप करने से धन और समृद्धि की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। इस मंत्र को सुबह या शाम के समय, शुद्ध मन से उच्चारण करना चाहिए।

घर में श्री यंत्र स्थापित करने के लिए यह ध्यान देना आवश्यक है कि कौन सा श्री यंत्र आपके घर के लिए उपयुक्त होगा। विभिन्न प्रकार के श्री यंत्र होते हैं, लेकिन निम्नलिखित यंत्र घर में स्थापना के लिए सबसे उत्तम माने जाते हैं:

  • स्फटिक श्री यंत्र: स्फटिक (क्रिस्टल) से बना श्री यंत्र सबसे प्रभावी और शक्तिशाली माना जाता है। यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है और घर में शांति और समृद्धि लाता है। स्फटिक की शुद्ध और दिव्य ऊर्जा घर में सकारात्मकता को बढ़ाती है।
  • तांबे का श्री यंत्र: तांबे से बना श्री यंत्र भी काफी प्रभावी होता है। इसे घर या कार्यस्थल में स्थापित करने से आर्थिक स्थिति में सुधार आता है और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
  • चांदी का श्री यंत्र: चांदी से बना श्री यंत्र स्थायी समृद्धि और सुख-शांति के लिए उत्तम माना जाता है। यह आर्थिक समृद्धि के साथ-साथ मानसिक शांति भी प्रदान करता है।

श्री यंत्र की छवि देखने पर यह एक जटिल और सुंदर ज्यामितीय संरचना के रूप में दिखाई देता है। इसमें नौ त्रिकोण होते हैं, जो एक साथ मिलकर एक केंद्रीय बिंदु (बिंदु) बनाते हैं। इस बिंदु को “बिन्दु” कहा जाता है, जो सृष्टि का प्रतीक है। त्रिकोणों का यह समूह देवी लक्ष्मी की शक्तियों और उनके आशीर्वादों का प्रतीक है। इसके चारों ओर एक वृताकार रेखा होती है, जिसे “भूपुर” कहा जाता है, जो भौतिक और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक है। श्री यंत्र की छवि को ध्यान करते समय ध्यान केंद्रित करने के लिए उपयोग किया जाता है, और इसे घर में रखने से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है।


1. कौन सा श्री यंत्र रखना चाहिए?

श्री यंत्र को रखने से पहले यह जानना आवश्यक है कि आपके लिए कौन सा श्री यंत्र उपयुक्त होगा। घर में सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि बढ़ाने के लिए स्फटिक (क्रिस्टल) से बना श्री यंत्र सबसे उत्तम माना जाता है। स्फटिक की शुद्ध और शक्तिशाली ऊर्जा नकारात्मकता को दूर करती है और घर में शांति, सुख और समृद्धि का संचार करती है। इसके अलावा, तांबे या चांदी का श्री यंत्र भी अच्छे परिणाम दे सकता है। तांबे से बना यंत्र आर्थिक स्थिति में सुधार और समृद्धि प्रदान करता है, जबकि चांदी का यंत्र स्थायी शांति और सुख का प्रतीक है।

यदि आप श्री यंत्र को कार्यस्थल पर रखना चाहते हैं, तो स्फटिक या तांबे का श्री यंत्र सबसे बेहतर विकल्प हो सकता है। यह ध्यान देना आवश्यक है कि जिस यंत्र को आप घर या कार्यस्थल पर रख रहे हैं, वह शुद्ध और दोषमुक्त हो। इसके अलावा, यंत्र को नियमित रूप से पूजा और मंत्र जाप से सक्रिय रखना भी आवश्यक होता है ताकि इसकी ऊर्जा बनी रहे और आपको इसका पूर्ण लाभ मिले।

2. श्री यंत्र कितने प्रकार के होते हैं?

श्री यंत्र मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते हैं, जो सामग्री और ऊर्जा के आधार पर अलग-अलग प्रभाव डालते हैं।

स्फटिक श्री यंत्र: यह क्रिस्टल से बना होता है और सबसे शुद्ध और शक्तिशाली माना जाता है। यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है और घर में सकारात्मकता लाता है। स्फटिक श्री यंत्र मानसिक शांति और ध्यान केंद्रित करने में मदद करता है।
तांबे का श्री यंत्र: तांबे से बने श्री यंत्र को आर्थिक उन्नति के लिए बहुत प्रभावी माना जाता है। इसे घर या कार्यस्थल पर स्थापित करने से समृद्धि, सफलता और शांति आती है।
चांदी का श्री यंत्र: चांदी से बना श्री यंत्र स्थायी समृद्धि और शांति के लिए जाना जाता है।

इसका उपयोग घर में दीर्घकालिक शांति और सुख की प्राप्ति के लिए किया जाता है।
इनके अलावा, श्री यंत्र विभिन्न आकार और धातुओं में भी उपलब्ध होते हैं, जैसे सोना, पीतल आदि। कौन सा यंत्र आपके लिए उचित है, यह आपकी आवश्यकताओं और व्यक्तिगत ऊर्जा के अनुसार निर्धारित किया जा सकता है।

3. श्री यंत्र कब खरीदना चाहिए?

श्री यंत्र खरीदने के लिए विशेष दिनों को शुभ माना जाता है। यह यंत्र देवी लक्ष्मी और धन, समृद्धि की प्रतीक है, इसलिए इसे विशेष पर्वों और तिथियों पर खरीदना ज्यादा लाभकारी माना जाता है। सबसे अच्छा समय है दीपावली, अक्षय तृतीया, धनतेरस, और नवरात्रि। इन दिनों में देवी लक्ष्मी की पूजा विशेष रूप से की जाती है और श्री यंत्र खरीदना विशेष लाभकारी माना जाता है।

इसके अलावा, किसी भी शुक्ल पक्ष की पंचमी, अष्टमी, या पूर्णिमा के दिन श्री यंत्र खरीदना शुभ होता है। इन दिनों में खरीदने से यंत्र की ऊर्जा और प्रभाव बढ़ जाता है।

खरीदने के समय ध्यान रखें कि श्री यंत्र शुद्ध धातु या स्फटिक से बना हो। यदि आप श्री यंत्र को ऑनलाइन या किसी दुकान से खरीद रहे हैं, तो सुनिश्चित करें कि वह त्रुटिहीन और सटीक हो। यंत्र को खरीदने के बाद तुरंत उसकी पूजा करके उसे सक्रिय करना चाहिए। यह सुनिश्चित करता है कि यंत्र आपके घर में सकारात्मक ऊर्जा लाने में सक्षम हो।

4. श्री यंत्र का ध्यान कैसे करें?

श्री यंत्र का ध्यान करने से मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। इसके लिए सबसे पहले एक शांत और स्वच्छ स्थान चुनें। ध्यान करने से पहले शरीर और मन को शुद्ध करने के लिए स्नान कर लें। यंत्र को किसी साफ कपड़े या चौकी पर रखें, ताकि आप आसानी से इसे देख सकें।

ध्यान के लिए सबसे पहले श्री यंत्र पर ध्यान केंद्रित करें। श्री यंत्र की ज्यामितीय संरचना को ध्यान से देखें और उसकी हर रेखा और बिंदु पर ध्यान केंद्रित करें। यह ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को बढ़ाता है। इसके बाद, आप श्री यंत्र के मंत्र का जाप कर सकते हैं, जैसे:

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः।

इस मंत्र का उच्चारण करते हुए श्री यंत्र के बिंदु (बिन्दु) पर ध्यान केंद्रित करें। मन को शांत और स्थिर रखें, और श्री यंत्र की ऊर्जा को अनुभव करें। ध्यान के समय नकारात्मक विचारों को दूर रखें और अपने मन में सकारात्मक विचारों को स्थान दें। नियमित रूप से श्री यंत्र का ध्यान करने से मानसिक शांति, ध्यान की एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।

5. घर के मंदिर में कौन सा यंत्र रखना चाहिए?

घर के मंदिर में श्री यंत्र रखना अत्यंत शुभ और लाभकारी माना जाता है। मंदिर में रखने के लिए स्फटिक श्री यंत्र सबसे उत्तम विकल्प है, क्योंकि यह शुद्धता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। इसके अलावा, आप तांबे या चांदी से बने श्री यंत्र को भी मंदिर में स्थापित कर सकते हैं, जो घर में शांति और समृद्धि का संचार करता है।

मंदिर में श्री यंत्र को स्थापित करते समय ध्यान रखें कि यह सही दिशा में रखा हो। इसे पूजा स्थल के उत्तर-पूर्वी कोने में रखना शुभ होता है।

हनुमान चालीसा पढ़ने के 21 चमत्कारिक फायदे (Hanuman Chalisa Padhne Ke 21 Fayde)

हनुमान चालीसा के 21 चमत्कारिक फायदों (hanuman chalisa padhne ke 21 fayde) का विस्तार से वर्णन करना एक विस्तृत कार्य है। इसे पूरा करने के लिए, मैं प्रत्येक बिंदु पर गहराई से चर्चा करुँगी , हनुमान जी के गुणों, उनके चरित्र और उनके भक्तों को दी गई सहायता का संदर्भ लाऊंगी।

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1. भयमुक्त जीवन

हनुमान चालीसा का पाठ करने से मनुष्य को जीवन के विभिन्न प्रकार के भय से मुक्ति मिलती है। हनुमान जी को रामभक्त हनुमान कहा जाता है, जो साहस, शक्ति और भक्ति के प्रतीक हैं। उनका चरित्र अद्वितीय साहस से भरा हुआ है, चाहे वह समुद्र को पार करने की बात हो या रावण के खिलाफ युद्ध। जब हम हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, तो हम उनके इसी साहस को अपने भीतर महसूस करते हैं। इससे व्यक्ति के मन से सभी प्रकार के भय और चिंता समाप्त हो जाते हैं।

चाहे वह भय किसी बीमारी का हो, भविष्य की चिंता हो, या कोई अन्य अनजाना डर हो, हनुमान चालीसा का नियमित पाठ इन सभी से मुक्ति दिलाने में सहायक होता है। हनुमान जी की भक्ति का सबसे बड़ा उदाहरण रामायण में तब देखा जाता है जब उन्होंने सीता जी की खोज के लिए लंका की यात्रा की। उनके मन में न तो समुद्र की गहराई का भय था और न ही रावण की शक्ति का। यही गुण हनुमान चालीसा का पाठ करने वाले भक्त में भी आता है। वह व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी निर्भीक होकर अपने कर्तव्यों का पालन करता है।

2. नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा

हनुमान चालीसा नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाने का एक शक्तिशाली माध्यम है। नकारात्मक ऊर्जा हमारे जीवन में कई रूपों में प्रवेश कर सकती है – यह घर के माहौल से संबंधित हो सकती है, हमारे मन के विचारों से, या बाहरी परिस्थितियों से। हनुमान जी की कृपा से यह नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाती है। हनुमान चालीसा में भगवान हनुमान के गुणों का गान किया जाता है, जो नकारात्मकता को नष्ट करने की शक्ति रखते हैं।

जब हम हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, तो यह एक सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करता है जो हमारे आसपास की नकारात्मकता को समाप्त कर देती है। यह पाठ एक ढाल की तरह कार्य करता है, जो हमारे घर, परिवार और स्वयं को किसी भी प्रकार की बुरी दृष्टि या नकारात्मक ऊर्जा से बचाता है। हनुमान जी को संकटमोचक कहा जाता है, और उनका नाम ही हमारे जीवन में आने वाले सभी संकटों को दूर करने के लिए पर्याप्त है।

3. स्वास्थ्य में सुधार

हनुमान चालीसा का पाठ न केवल मानसिक बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य में भी सुधार करता है। हनुमान जी को अष्टसिद्धि और नव निधि के स्वामी कहा गया है, जो विभिन्न प्रकार की शक्तियों के साथ-साथ उपचार शक्ति का भी प्रतीक है। नियमित रूप से हनुमान चालीसा का पाठ करने से शारीरिक बीमारियाँ दूर होती हैं और व्यक्ति स्वस्थ जीवन जी सकता है।

हनुमान जी का चरित्र ही उनके अपार शक्ति और स्वास्थ्य का प्रमाण है। जब वे संजीवनी बूटी लाने के लिए हिमालय पर्वत पर गए थे, तब उनकी शारीरिक शक्ति और स्वास्थ्य की कोई सीमा नहीं थी। उसी तरह, उनके भक्तों को भी यह शक्ति प्राप्त होती है। यह माना जाता है कि हनुमान चालीसा का पाठ करने से रक्तचाप नियंत्रित रहता है, हृदय स्वस्थ रहता है और अन्य शारीरिक बीमारियाँ दूर रहती हैं। इसके अलावा, यह मानसिक तनाव को भी कम करता है, जो शारीरिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है।

4. आत्मविश्वास में वृद्धि

हनुमान चालीसा का पाठ आत्मविश्वास को बढ़ाने में अत्यंत सहायक है। आत्मविश्वास व्यक्ति के जीवन में सफलता का मूल आधार है, और जब व्यक्ति हनुमान जी के गुणों को अपने जीवन में अपनाता है, तो उसका आत्मविश्वास स्वाभाविक रूप से बढ़ता है। हनुमान जी की भक्ति और उनके कार्यों में आत्मविश्वास का अद्वितीय उदाहरण मिलता है।

हनुमान जी ने अपने जीवन में कभी भी किसी कार्य के लिए स्वयं को अयोग्य नहीं समझा। चाहे वह समुद्र को पार करने की बात हो, लंका में सीता जी की खोज हो, या संजीवनी बूटी लाने की जिम्मेदारी हो – हनुमान जी ने हर कार्य में अपने आत्मविश्वास को बनाए रखा। जब हम हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, तो यह हमें हनुमान जी के उस आत्मविश्वास की अनुभूति कराता है, जिससे हम अपने जीवन के हर कार्य में सफलता प्राप्त कर सकते हैं।

यह आत्मविश्वास न केवल कार्यक्षेत्र में बल्कि व्यक्तिगत जीवन में भी महत्वपूर्ण होता है। जब व्यक्ति के मन में आत्मविश्वास होता है, तो वह किसी भी स्थिति में बेहतर निर्णय ले सकता है, जिससे उसका जीवन अधिक सफल और संतोषपूर्ण बनता है।

5. दुश्मनों पर विजय

हनुमान चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को अपने दुश्मनों पर विजय प्राप्त होती है। हनुमान जी को रामायण में राक्षसों के विनाशक के रूप में जाना जाता है। उनके द्वारा लंका में रावण के खिलाफ किए गए कार्यों में यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि वे किसी भी प्रकार के शत्रु को पराजित करने में सक्षम हैं।

जब हम हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, तो यह हमें मानसिक और शारीरिक शक्ति प्रदान करता है, जिससे हम अपने जीवन के शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। शत्रु केवल बाहरी नहीं होते; वे हमारे भीतर के भी हो सकते हैं, जैसे आलस्य, अज्ञानता, या नकारात्मक विचार। हनुमान चालीसा का पाठ हमें इन आंतरिक और बाहरी शत्रुओं को पराजित करने की शक्ति प्रदान करता है।

हनुमान जी के आशीर्वाद से व्यक्ति अपने जीवन में आने वाली सभी बाधाओं और चुनौतियों का सामना कर सकता है और अंततः उन पर विजय प्राप्त कर सकता है। हनुमान जी की कृपा से व्यक्ति को शत्रुओं से किसी भी प्रकार का डर नहीं होता और वह निर्भय होकर अपने जीवन के लक्ष्यों की ओर बढ़ सकता है।

6. मानसिक शांति

हनुमान चालीसा का पाठ मानसिक शांति प्रदान करता है, जो आज के जीवन में अत्यंत आवश्यक है। आधुनिक जीवन में तनाव और चिंता बहुत आम हो गए हैं, और इनसे मुक्ति पाने के लिए हनुमान चालीसा का पाठ एक अत्यंत प्रभावी उपाय है। हनुमान जी की भक्ति से मन शांत होता है और व्यक्ति को आंतरिक शांति प्राप्त होती है।

हनुमान जी की कथा में यह देखा जा सकता है कि उन्होंने कभी भी किसी परिस्थिति में अपना धैर्य नहीं खोया। चाहे वह समुद्र को पार करने की कठिनाई हो, या रावण की लंका में सीता जी की खोज हो, हनुमान जी ने हर परिस्थिति में अपने मन को शांत रखा और अपने कार्यों को सफलता पूर्वक पूरा किया।

जब हम हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, तो यह हमें भी उसी प्रकार की मानसिक शांति प्रदान करता है। इससे हमारे मन में चल रही उलझनों और विचारों का अंत होता है, जिससे हम अपने जीवन को अधिक शांतिपूर्ण और संतुलित ढंग से जी सकते हैं। मानसिक शांति से व्यक्ति का जीवन सुखमय और संतुलित बनता है, जिससे वह हर स्थिति में सही निर्णय ले सकता है।

7. दुर्घटनाओं से सुरक्षा

हनुमान चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को अनहोनी घटनाओं और दुर्घटनाओं से सुरक्षा मिलती है। हनुमान जी को संकटमोचक कहा जाता है, और उनकी कृपा से किसी भी प्रकार की दुर्घटना या अनहोनी घटना से बचाव होता है।

हनुमान जी के आशीर्वाद से व्यक्ति का जीवन सुरक्षित रहता है। चाहे वह यात्रा हो, कार्यस्थल हो या घर में रहने की बात हो, हनुमान चालीसा का पाठ व्यक्ति को हर स्थिति में सुरक्षा प्रदान करता है। जब हम हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, तो यह एक ढाल की तरह कार्य करता है, जो हमें हर प्रकार की अनहोनी से बचाता है।

रामायण में हनुमान जी का जीवन हमें यह सिखाता है कि संकट के समय में भी उनका आत्मविश्वास और धैर्य उन्हें सुरक्षित रखता था। उसी प्रकार, हनुमान चालीसा का पाठ करने से हम भी किसी भी प्रकार की दुर्घटना से सुरक्षित रहते हैं और हमारे जीवन में किसी भी प्रकार की अनहोनी नहीं होती।

8. विध्नों का नाश

हनुमान चालीसा का पाठ करने से जीवन में आने वाली सभी प्रकार की बाधाएं और विध्न दूर हो जाते हैं। हनुमान जी का आशीर्वाद व्यक्ति को सभी प्रकार की बाधाओं से मुक्ति दिलाता है और उसे अपने लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायक होता है।

हनुमान जी का जीवन हमें यह सिखाता है कि यदि हम धैर्य और साहस के साथ अपने कार्यों को करते हैं, तो किसी भी प्रकार की बाधा हमारे मार्ग में नहीं आ सकती। जब हम हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, तो यह हमें हनुमान जी की उस शक्ति का एहसास कराता है, जो किसी भी प्रकार की बाधा को नष्ट कर सकती है।

चाहे वह शारीरिक, मानसिक, या आध्यात्मिक बाधाएं हों, हनुमान चालीसा का पाठ उन्हें समाप्त कर देता है और व्यक्ति को उसके लक्ष्य की ओर अग्रसर करता है। यह पाठ व्यक्ति के जीवन में समृद्धि और सफलता लाता है, जिससे वह अपने सभी कार्यों में सफलता प्राप्त करता है।

9. धार्मिकता में वृद्धि

हनुमान चालीसा का पाठ व्यक्ति की धार्मिकता और आध्यात्मिकता को बढ़ाता है। हनुमान जी को भगवान राम के परम भक्त के रूप में जाना जाता है, और उनका जीवन भक्ति और सेवा का प्रतीक है।

जब हम हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, तो यह हमारे भीतर भक्ति, समर्पण और ईश्वर के प्रति विश्वास की भावना को जागृत करता है। यह पाठ हमें भगवान की भक्ति की ओर अग्रसर करता है और हमारे जीवन में धार्मिकता को बढ़ाता है। हनुमान जी का चरित्र हमें यह सिखाता है कि भगवान की भक्ति और सेवा से हमारा जीवन सफल और संतोषपूर्ण बनता है।

धार्मिकता का मतलब केवल मंदिर जाना या पूजा करना नहीं है, बल्कि यह हमारे विचारों, कर्मों, और जीवन के हर पहलू में ईश्वर के प्रति समर्पण को दर्शाता है। हनुमान चालीसा का पाठ हमें इस समर्पण की भावना को और मजबूत करता है, जिससे हमारे जीवन में धार्मिकता का प्रवाह होता है।

10. सकारात्मक दृष्टिकोण

हनुमान चालीसा का पाठ व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण लाता है। हनुमान जी का चरित्र सकारात्मकता से भरा हुआ है, और जब हम उनके गुणों का गान करते हैं, तो यह हमारे जीवन में भी सकारात्मकता लाता है।

सकारात्मक दृष्टिकोण किसी भी स्थिति में सफलता प्राप्त करने का मूलमंत्र है। हनुमान जी के जीवन से हमें यह सिखने को मिलता है कि उन्होंने हर परिस्थिति में सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखा, चाहे वह कितना भी कठिन क्यों न हो।

हनुमान चालीसा का पाठ करने से हम भी इस सकारात्मक दृष्टिकोण को अपने जीवन में अपनाते हैं। इससे हमारे विचार सकारात्मक होते हैं, और हम हर परिस्थिति में अपने लक्ष्यों की ओर बढ़ने में सक्षम होते हैं। सकारात्मक दृष्टिकोण से व्यक्ति की सोचने की क्षमता बढ़ती है, जिससे वह कठिनाइयों का सामना करने में सफल होता है।

11. कठिन परिस्थितियों से उबरना

हनुमान चालीसा का पाठ व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों से उबरने में मदद करता है। हनुमान जी का जीवन ही इस बात का प्रमाण है कि कोई भी परिस्थिति कितनी भी कठिन क्यों न हो, यदि हमारे पास साहस, धैर्य, और ईश्वर का आशीर्वाद हो, तो हम उससे बाहर निकल सकते हैं।

रामायण में हनुमान जी ने अनेक कठिन परिस्थितियों का सामना किया, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। चाहे वह लंका की यात्रा हो, या संजीवनी बूटी लाने की चुनौती, उन्होंने हर कठिनाई का साहसपूर्वक सामना किया।

हनुमान चालीसा का पाठ हमें हनुमान जी के इसी साहस और धैर्य का आशीर्वाद देता है। जब हम इस पाठ को नियमित रूप से करते हैं, तो यह हमें कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और साहस बनाए रखने की शक्ति प्रदान करता है। इससे हम हर समस्या का समाधान ढूंढ़ने में सक्षम होते हैं और अंततः उससे बाहर निकलते हैं।

12. परिवार में सुख-शांति

हनुमान चालीसा का पाठ घर में सुख-शांति और सामंजस्य बनाए रखने में अत्यंत सहायक है। हनुमान जी के आशीर्वाद से परिवार में प्रेम, एकता, और समझदारी बनी रहती है, जिससे घर का माहौल सुखमय और शांतिपूर्ण होता है।

हनुमान जी का चरित्र उनके समर्पण और सेवा का प्रतीक है। जब हम हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, तो यह हमें भी उसी प्रकार की सेवा और समर्पण की भावना का अनुभव कराता है, जिससे हम अपने परिवार के सदस्यों के प्रति अधिक प्रेम और समझदारी से पेश आते हैं।

परिवार में शांति और सामंजस्य बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि सभी सदस्य एक-दूसरे के प्रति प्रेम और सम्मान की भावना रखें। हनुमान चालीसा का पाठ हमें इस भावना को और मजबूत करता है, जिससे परिवार में सभी प्रकार की विवाद और अशांति समाप्त हो जाती है।

13. धन की प्राप्ति

हनुमान चालीसा का पाठ करने से आर्थिक समस्याओं का समाधान होता है और धन की प्राप्ति होती है। हनुमान जी को अष्टसिद्धि और नव निधि के स्वामी कहा गया है, जिसका अर्थ है कि उनके पास असीमित धन और संपत्ति का आशीर्वाद है।

जब हम हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, तो यह हमें भी उसी प्रकार की संपत्ति और धन की प्राप्ति में सहायक होता है। यह पाठ हमारी आर्थिक समस्याओं को दूर करता है और हमारे जीवन में समृद्धि लाता है।

धन केवल भौतिक संपत्ति नहीं है, बल्कि यह मानसिक संतुष्टि, सुख-शांति, और संतुलन का प्रतीक भी है। हनुमान चालीसा का पाठ हमें इन सभी प्रकार के धन की प्राप्ति में सहायक होता है, जिससे हमारा जीवन संतुलित और सुखमय बनता है।

14. बाधाओं का अंत

हनुमान चालीसा का पाठ करने से जीवन में आने वाली सभी प्रकार की बाधाएं और विध्न समाप्त हो जाते हैं। हनुमान जी के आशीर्वाद से व्यक्ति को किसी भी प्रकार की बाधा या कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता और वह अपने लक्ष्यों की प्राप्ति में सफल होता है।

हनुमान जी के जीवन से हमें यह सीख मिलती है कि अगर हमारे पास धैर्य, साहस, और ईश्वर का आशीर्वाद हो, तो कोई भी बाधा हमें रोक नहीं सकती। जब हम हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, तो यह हमें हनुमान जी के उस शक्ति का अनुभव कराता है, जो किसी भी प्रकार की बाधा को समाप्त कर सकती है।

चाहे वह शारीरिक, मानसिक, या आध्यात्मिक बाधाएं हों, हनुमान चालीसा का पाठ उन्हें समाप्त कर देता है और व्यक्ति को उसके लक्ष्य की ओर अग्रसर करता है। यह पाठ व्यक्ति के जीवन में समृद्धि और सफलता लाता है, जिससे वह अपने सभी कार्यों में सफलता प्राप्त करता है।

15. भूत-प्रेतों से सुरक्षा

हनुमान चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को भूत-प्रेत और अन्य बुरी आत्माओं से सुरक्षा मिलती है। हनुमान जी को रामायण में राक्षसों के विनाशक के रूप में जाना जाता है, और उनकी कृपा से कोई भी बुरी आत्मा या नकारात्मक शक्ति व्यक्ति को हानि नहीं पहुंचा सकती।

हनुमान जी का नाम ही भूत-प्रेतों और नकारात्मक शक्तियों को दूर करने के लिए पर्याप्त है। जब हम हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, तो यह हमें उन सभी नकारात्मक शक्तियों से बचाता है जो हमारे जीवन में विघ्न डाल सकती हैं।

भूत-प्रेत और बुरी आत्माएँ केवल भौतिक नहीं होतीं; वे हमारे भीतर की नकारात्मकता और बुरे विचारों के रूप में भी हो सकती हैं। हनुमान चालीसा का पाठ इन्हें समाप्त कर देता है और व्यक्ति के जीवन में शांति और सुरक्षा लाता है।

16. सभी इच्छाओं की पूर्ति

हनुमान चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। हनुमान जी को अपने भक्तों की हर प्रकार की इच्छाओं को पूर्ण करने वाला देवता माना जाता है।

हनुमान जी के आशीर्वाद से व्यक्ति की सभी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं, चाहे वे भौतिक हों, मानसिक हों, या आध्यात्मिक। हनुमान चालीसा का पाठ व्यक्ति को उसकी इच्छाओं की प्राप्ति में सहायक होता है और उसे सफलता प्राप्त करने में सहायता करता है।

जब हम हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, तो यह हमें हनुमान जी के उस शक्ति का अनुभव कराता है, जो हमारी सभी इच्छाओं को पूर्ण करने में सक्षम है। इससे व्यक्ति का जीवन संतुलित और सुखमय बनता है, जिससे वह अपने लक्ष्यों को आसानी से प्राप्त कर सकता है।

17. ज्ञान और बुद्धि में वृद्धि

हनुमान चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के ज्ञान और बुद्धि में वृद्धि होती है। हनुमान जी को ज्ञान और विद्या का प्रतीक माना जाता है, और उनका आशीर्वाद व्यक्ति को हर प्रकार की शिक्षा और ज्ञान प्राप्त करने में सहायक होता है।

हनुमान जी का जीवन हमें यह सिखाता है कि शिक्षा और ज्ञान केवल पुस्तकों से नहीं प्राप्त होते, बल्कि यह हमारे भीतर की बुद्धि और समझ से भी संबंधित है। जब हम हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, तो यह हमारी बुद्धि को तेज करता है और हमें हर परिस्थिति में सही निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करता है।

18. संकटों का नाश

हनुमान चालीसा का पाठ संकटों और समस्याओं के नाश में सहायक होता है। हनुमान जी को संकटमोचक कहा जाता है, और उनके आशीर्वाद से व्यक्ति की जिंदगी से सभी संकट समाप्त हो जाते हैं।

हनुमान जी का जीवन हमें यह सिखाता है कि संकट चाहे कितने भी बड़े क्यों न हों, अगर हम ईश्वर की भक्ति और समर्पण के साथ उनका सामना करें, तो वे दूर हो सकते हैं। जब हम हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, तो यह हमें संकटों और समस्याओं से मुक्त करता है।

संकटों का नाश केवल बाहरी समस्याओं से नहीं होता, बल्कि यह आंतरिक संकटों और मानसिक परेशानियों से भी संबंधित है। हनुमान चालीसा का पाठ हमें इन सभी संकटों से मुक्ति दिलाने में सहायक होता है।

19. सुख-समृद्धि का आगमन

हनुमान चालीसा का पाठ सुख-समृद्धि और धन की प्राप्ति में सहायक होता है। हनुमान जी के आशीर्वाद से व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है और आर्थिक समस्याओं का समाधान होता है।

हनुमान जी को अष्टसिद्धि और नव निधि के स्वामी माना जाता है, और उनका आशीर्वाद व्यक्ति को हर प्रकार की समृद्धि प्राप्त करने में सहायक होता है। जब हम हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, तो यह हमें भी वही सुख-समृद्धि प्राप्त करने में मदद करता है।

सुख-समृद्धि का मतलब केवल धन और भौतिक संपत्ति से नहीं है, बल्कि यह मानसिक शांति, संतुलन, और खुशी को भी दर्शाता है। हनुमान चालीसा का पाठ हमें इस समृद्धि को प्राप्त करने में सहायक होता है, जिससे हमारा जीवन अधिक खुशहाल और संतोषपूर्ण बनता है।

20. जीवन में सकारात्मक बदलाव

हनुमान चालीसा का पाठ जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने में मदद करता है। हनुमान जी के आशीर्वाद से व्यक्ति की जीवन परिस्थितियों में सकारात्मक परिवर्तन होते हैं और वह अपने लक्ष्यों की ओर अग्रसर होता है।

हनुमान जी के गुण और उनकी भक्ति का गान करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। जब हम हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, तो यह हमें सकारात्मक बदलाव की दिशा में अग्रसर करता है और हमें अपने जीवन में सुधार करने की प्रेरणा देता है।

सकारात्मक बदलाव का मतलब केवल बाहरी सुधार से नहीं है, बल्कि यह आंतरिक परिवर्तन और मानसिक दृष्टिकोण के सुधार को भी दर्शाता है। हनुमान चालीसा का पाठ हमें इस सकारात्मक बदलाव को प्राप्त करने में सहायक होता है।

21. कर्मों में सुधार

हनुमान चालीसा का पाठ व्यक्ति के कर्मों में सुधार लाने में सहायक होता है। हनुमान जी का जीवन उनके अच्छे कर्मों और ईश्वर के प्रति समर्पण का आदर्श उदाहरण है।

जब हम हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, तो यह हमें भी सही और अच्छे कर्मों की ओर प्रेरित करता है। हनुमान जी के आशीर्वाद से व्यक्ति अपने कर्मों में सुधार करता है और एक सच्चे और ईमानदार जीवन की ओर बढ़ता है।

कर्मों में सुधार का मतलब केवल बाहरी कार्यों का सुधार नहीं है, बल्कि यह मानसिक और आंतरिक सुधार को भी दर्शाता है। हनुमान चालीसा का पाठ हमें इस सुधार को प्राप्त करने में मदद करता है, जिससे हमारा जीवन अधिक सफल और संतोषपूर्ण बनता है।

21 बार हनुमान चालीसा पढ़ने से क्या होता है?

हनुमान चालीसा का 21 बार पाठ करने से जीवन में कठिनाइयाँ और समस्याएँ दूर होती हैं। इसे विशेष रूप से संकट या किसी महत्वपूर्ण कार्य से पहले किया जाता है। यह विश्वास है कि हनुमान जी की कृपा से व्यक्ति की मानसिक शांति और आत्म-बल में वृद्धि होती है। इसके अलावा, इस जाप से नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति मिलती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

40 दिन हनुमान चालीसा पढ़ने से क्या होता है?

40 दिन तक हनुमान चालीसा पढ़ने से जीवन में स्थिरता और सुधार आ सकता है। यह प्रक्रिया मानसिक तनाव को कम करने, आत्मविश्वास बढ़ाने और जीवन में सुख-समृद्धि लाने में सहायक होती है। नियमित पाठ से हनुमान जी की विशेष कृपा प्राप्त होती है, जिससे जीवन में सकारात्मक बदलाव और स्वास्थ्य लाभ मिलता है। यह अभ्यास आदतों में स्थिरता और आत्म-अनुशासन भी लाता है।

प्रतिदिन हनुमान चालीसा पढ़ने से क्या लाभ होता है?

हर दिन हनुमान चालीसा पढ़ने से मानसिक शांति, आत्म-बल और सुरक्षा की भावना प्राप्त होती है। यह नकारात्मकता को दूर करता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। नियमित पाठ से समर्पण और श्रद्धा में वृद्धि होती है, जो जीवन में सुख और समृद्धि को बढ़ावा देती है। यह विश्वास भी होता है कि हनुमान जी की कृपा से संकटों का नाश होता है और जीवन में सहजता आती है।

11 बार हनुमान चालीसा का पाठ करने से क्या होता है?

11 बार हनुमान चालीसा का पाठ विशेष रूप से संकट या बड़े कार्यों से पहले किया जाता है। इससे हनुमान जी की कृपा प्राप्त होती है और कठिन परिस्थितियों में सहायता मिलती है। यह मानसिक शांति और आत्म-बल में वृद्धि करता है, जिससे व्यक्ति अपने समस्याओं का सामना साहसपूर्वक कर सकता है। इस पाठ से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और जीवन में सकारात्मक बदलाव आता है।

7 बार हनुमान चालीसा का पाठ करने से क्या होता है?

7 बार हनुमान चालीसा का पाठ करने से जीवन में तुरंत सुधार और समस्या समाधान की उम्मीद की जाती है। यह विशेष रूप से छोटी-मोटी समस्याओं और चुनौतियों को दूर करने के लिए किया जाता है। हनुमान जी की कृपा से मानसिक शांति और आत्म-संयम प्राप्त होता है। यह पाठ नकारात्मकता को समाप्त करता है और सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह करता है।

1 दिन में कितनी बार हनुमान चालीसा पढ़ना चाहिए?

1 दिन में हनुमान चालीसा का पाठ कितनी बार करना चाहिए, इसका कोई निश्चित नियम नहीं है। हालांकि, आमतौर पर एक बार या दो बार पढ़ना पर्याप्त माना जाता है। कुछ भक्त विशेष परिस्थितियों में या विशेष पूजा के दौरान अधिक बार पाठ करते हैं। नियमित और श्रद्धा पूर्वक पाठ से मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। आपकी सुविधा और श्रद्धा के अनुसार पाठ की संख्या तय कर सकते हैं।

हनुमान चालीसा के फायदे क्या हैं? (Hanuman Chalisa ke Fayde)

हनुमान चालीसा के फायदे (Hanuman Chalisa ke Fayde) बहुत हैं। यह मानसिक शांति, आत्मविश्वास में वृद्धि, और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने में मदद करता है। नियमित रूप से हनुमान चालीसा का पाठ करने से जीवन में सुख-शांति मिलती है और शारीरिक व मानसिक शक्ति बढ़ती है।

हनुमान चालीसा पढ़ने के फायदे PDF (Hanuman Chalisa padhne ke fayde PDF) में कैसे मिल सकते हैं?

हनुमान चालीसा पढ़ने के फायदे PDF (hanuman chalisa padhne ke fayde pdf) में कई वेबसाइट्स से डाउनलोड किए जा सकते हैं। इन PDF में हनुमान चालीसा के लाभ, उसका सही तरीका, और पाठ के समय से जुड़ी जानकारी उपलब्ध होती है।

हनुमान चालीसा पढ़ने के फायदे क्या हैं? (Hanuman chalisa padhne ke fayde)

हनुमान चालीसा पढ़ने के फायदे (Hanuman chalisa padhne ke fayde) मानसिक शांति, आत्मविश्वास में वृद्धि, और आध्यात्मिक उन्नति हैं। यह पाठ न केवल शारीरिक ताकत बढ़ाता है, बल्कि मानसिक शांति भी प्रदान करता है।

3 बार हनुमान चालीसा पढ़ने के फायदे क्या हैं? (3 बार हनुमान चालीसा पढ़ने के फायदे)

3 बार हनुमान चालीसा पढ़ने के फायदे (3 बार हनुमान चालीसा पढ़ने के फायदे) में मानसिक शांति, तनाव कम करना, और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। यह उपाय खासतौर पर उन लोगों के लिए फायदेमंद है जो किसी कठिन स्थिति में हैं या मानसिक तनाव का सामना कर रहे हैं।

7 बार हनुमान चालीसा पढ़ने के फायदे क्या हैं? (7 बार हनुमान चालीसा पढ़ने के फायदे)

7 बार हनुमान चालीसा पढ़ने के फायदे (7 बार हनुमान चालीसा पढ़ने के फायदे) में जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति, शारीरिक और मानसिक शक्ति का वर्धन, और जीवन की समस्याओं से उबरने की क्षमता में वृद्धि होती है। यह उपाय विशेष रूप से शनि और मंगल दोष के प्रभाव को कम करने के लिए किया जाता है।

21 बार हनुमान चालीसा पढ़ने के फायदे क्या हैं? (21 बार हनुमान चालीसा पढ़ने के फायदे)

21 बार हनुमान चालीसा पढ़ने के फायदे (21 बार हनुमान चालीसा पढ़ने के फायदे) में विशेष रूप से संकटों से मुक्ति मिलती है, शत्रुओं से सुरक्षा और मानसिक शांति का अनुभव होता है। यह उपाय गंभीर समस्याओं का समाधान करने और जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए प्रभावी है।

हनुमान चालीसा 7 बार पाठ के फायदा क्या है?

हनुमान चालीसा 7 बार पाठ के फायदा में शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति में वृद्धि होती है। यह उपाय विशेष रूप से शनि के दोषों और जीवन में आ रही कठिनाइयों को दूर करने के लिए लाभकारी है।

108 बार हनुमान चालीसा के फायदे क्या हैं?

108 बार हनुमान चालीसा के फायदे में शरीर में ऊर्जा का संचार, शांति और सुरक्षा मिलती है। यह पाठ विशेष रूप से मानसिक और शारीरिक परेशानियों से राहत पाने के लिए किया जाता है और हनुमान जी की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए होता है।

Shri Ganpati Atharvashirsha PDF – श्री गणपति अथर्वशीर्ष पाठ 2024-25

गणेश जी बुद्धि और विद्या के दाता हैं, जिन्हें परमात्मा का विघ्ननाशक स्वरूप माना जाता है। उनके भक्त विभिन्न तरीकों से उनकी आराधना करते हैं, जैसे श्लोक, स्तोत्र, और जाप। इनमें से एक प्रमुख पाठ है श्री गणपति अथर्वशीर्ष (Ganpati Atharvashirsha), जो अत्यंत मंगलकारी माना जाता है।

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गणेश जी की कृपा प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन प्रात:काल इस पाठ का शुद्ध मन से करना आवश्यक है। ऐसा करने से भक्तों को उनके आशीर्वाद की प्राप्ति होती है। गणेश जी की आराधना केवल धार्मिक कृत्य नहीं है, बल्कि यह ज्ञान, समृद्धि और सफलता की प्राप्ति का एक महत्वपूर्ण साधन है। श्री गणपति अथर्वशीर्ष की महिमा अत्यधिक है, और इसका पाठ न केवल मन को शांति और संतोष प्रदान करता है, बल्कि व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी करता है।

इस स्तोत्र में भगवान गणेश के विभिन्न गुणों और उनकी शक्तियों का वर्णन किया गया है। हम यहां अर्थ सहित श्री गणपति अथर्वशीर्ष स्तोत्र को प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे भक्त इस महत्वपूर्ण पाठ को सही रूप से समझ सकें और अपनी आराधना को और भी प्रभावशाली बना सकें। गणेश जी का ध्यान करने से सभी विघ्न दूर होते हैं, और जीवन में सुख-शांति का संचार होता है।

श्री गणपति अथर्वशीर्ष पाठ की विधि

श्री गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ एक महत्वपूर्ण धार्मिक क्रिया है, जिसे श्रद्धा और शुद्धता के साथ करना चाहिए। पाठ शुरू करने से पहले, एक स्वच्छ स्थान पर आसन लगाना चाहिए। सभी धार्मिक सामग्रियाँ जैसे दीपक, अगरबत्ती, फूल, और फल इत्यादि का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। पाठ के आरंभ में गणेश जी की पूजा करके उनके चित्र या मूर्ति के समक्ष बैठकर ध्यान करना चाहिए।

इसके बाद, पाठ प्रारंभ किया जाता है। यह पाठ सामूहिक या व्यक्तिगत रूप से किया जा सकता है, लेकिन ध्यान रहे कि पाठ करते समय मन को एकाग्र रखना चाहिए। पाठ के दौरान विभिन्न श्लोकों का उच्चारण ध्यानपूर्वक करना चाहिए, ताकि उनका अर्थ और प्रभाव सही ढंग से समझा जा सके। पाठ के समाप्ति के बाद, भगवान गणेश को प्रणाम करके उनका आभार व्यक्त करना चाहिए और प्रसाद वितरण करना चाहिए।

इस विधि का पालन करने से न केवल पाठ की शुद्धता बनी रहती है, बल्कि भक्तों को गणेश जी की कृपा भी शीघ्र मिलती है। नियमित रूप से इस पाठ का अभ्यास करने से जीवन में आने वाले विघ्न दूर होते हैं, और सुख-समृद्धि का संचार होता है।

ganpati atharvashirsha in hindi

श्री गणपति अथर्वशीर्ष पाठ से लाभ

श्री गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ अनेक लाभ प्रदान करता है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह भगवान गणेश की कृपा को आकर्षित करता है। गणेश जी बुद्धि, समृद्धि और भाग्य के देवता हैं, और उनके नाम का उच्चारण करने से भक्त के सभी विघ्न और बाधाएँ दूर होती हैं।

इस पाठ से मानसिक शांति और एकाग्रता में वृद्धि होती है, जिससे व्यक्ति अपने कार्यों में सफल होता है। जो लोग इस पाठ का नियमित रूप से करते हैं, उन्हें जीवन में सकारात्मकता का अनुभव होता है। यह पाठ न केवल व्यक्ति को आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनाता है, बल्कि यह शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक कल्याण में भी सहायक होता है।

आर्थिक संकट में भी यह पाठ बहुत लाभकारी सिद्ध होता है, क्योंकि यह धन और समृद्धि को आकर्षित करता है। इसे करने से घर में सुख-शांति का माहौल बना रहता है। कुल मिलाकर, श्री गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ जीवन में खुशहाली, समृद्धि और सफलता का प्रतीक है।


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श्री गणपति अथर्वशीर्ष स्तोत्र एवं अर्थ

शांति पाठ
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।।
स्थिरैरंगैस्तुष्टुवां सस्तनूभिः।
व्यशेम देवहितं यदायुः।।

अर्थ:
हे देववृंद, हम अपने कानों से कल्याणमय वचन सुनें। जो याज्ञिक अनुष्ठानों के योग्य हैं ऐसे हे देव, हम अपनी आंखों से मंगलमय कार्यों को होते देखें निरोग इंद्रियों एवं स्वस्थ देह के माध्यम से आपकी स्तुति करते हुए हम प्रजापति ब्रह्मा द्वारा हमारे हितार्थ सौ वर्ष अथवा उससे भी अधिक जो आयु नियत कर रखी है उसे प्राप्त करें। तात्पर्य है कि हमारे शरीर के सभी अंग और इंद्रियां स्वस्थ एवं क्रियाशील बने रहें और हम सौ या उससे अधिक लंबी आयु पावें।

ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः॥
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
ॐ शांतिः॥ शांतिः॥ शांतिः॥

अर्थ:
महान कीर्तिमान, ऐश्वर्यवान इन्द्र हमारा कल्याण करें, विश्व के ज्ञान स्वरूप, सर्वज्ञ, सबके पोषणकर्ता पूषा अर्थात सूर्य हमारा कल्याण करें, जिनके चक्रीय गति को कोई रोक नहीं सकता वे गरुड़ देव हमारा कल्याण करें, अरिष्टनेमि जो प्रजापति हैं वे सभी दुरितों को दूर करने वाले हैं वे हमारा कल्याण करें, वेद वाणी के स्वामी, सतत वर्धनशील बृहस्पति हमारा कल्याण करें। ॐ सर्वत्र शांति स्थापित हो।

ॐ नमस्ते गणपतये।।
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि। त्वमेव केवलं कर्ताऽसि।
त्वमेव केवलं धर्ताऽसि। त्वमेव केवलं हर्ताऽसि।
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि।
त्वं साक्षादात्माऽसि नित्यम् ।।1।।

अर्थ:
ॐकार पति भगवान गणपति को नमस्कार है। हे गणेश तुम्हीं प्रत्यक्ष तत्व हो। तुम्हीं केवल कर्ता हो। तुम्हीं केवल धर्ता हो। तुम्हीं केवल हर्ता हो। निश्चयपूर्वक तुम्हीं इन सब रूपों में विराजमान ब्रह्म हो। तुम साक्षात नित्य आत्मस्वरूप हो।

ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि।। 2 ।।

अर्थ:
मैं यथार्थ कहता हूं। सत्य कहता हूं।

अव त्वं माम् । अव वक्तारम्। अव श्रोतारम्।
अव दातारम्। अव धातारम्।
अवानूचानमव शिष्यम्।
अव पश्चात्तात्। अव पुरस्त्तात्।
अवोत्तरात्तात् । अव दक्षिणात्तात्।
अव चोर्ध्वात्तात्। अवाधरात्तात्।
सर्वतो मां पाहि पाहि समंतात् ॥3॥

अर्थ:
हे पार्वती नंदन आप मेरी, मुझ शिष्य की रक्षा करो। वक्ता आचार्य की रक्षा करो। श्रोता की रक्षा करो। दाता की रक्षा करो। धाता की रक्षा करो। व्याख्या करने वाले आचार्य की रक्षा करो। शिष्य की रक्षा करो। पश्चिम से रक्षा। पूर्व से रक्षा करो। उत्तर से रक्षा करो। दक्षिण से रक्षा करो। ऊपर से रक्षा करो। नीचे से रक्षा करो। सब ओर से मेरी रक्षा करो। चारों ओर से मेरी रक्षा करो।

त्वं वाङ्‍मयस्त्वं चिन्मय:।
त्वमानंदमयस्त्वं ब्रह्ममय:।
त्वं सच्चिदानंदा द्वितीयोऽसि।
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि ॥4॥

अर्थ:
आप वाङ्मय हो, चिन्मय हो। तुम आनंदमय हो। तुम ब्रह्ममय हो। तुम सच्चिदानंद अद्वितीय हो। तुम प्रत्यक्ष ब्रह्म हो। तुम दानमय विज्ञानमय हो।

सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते॥
सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति॥
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति॥
सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति॥
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः॥
त्वं चत्वारि वाक्पदानि ॥5॥

अर्थ:
यह जगत तुमसे उत्पन्न होता है। यह सारा जगत तुममें विलय को प्राप्त होगा। इस सारे जगत की तुममें प्रतीति हो रही है। तुम भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश हो। परा, पश्चंती, बैखरी और मध्यमा वाणी के ये भाग तुम्हीं हो।

त्वं गुणत्रयातीतः त्वमवस्थात्रयातीतः॥
त्वं देहत्रयातीतः ॥ त्वं कालत्रयातीतः॥
त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम्॥
त्वं शक्तित्रयात्मकः॥
त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यं॥
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वं
इन्द्रस्त्वं अग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं
ब्रह्मभूर्भुवःस्वरोम्॥6॥

अर्थ:
सत्व, रज और तम तीनों गुणों से परे हो। तुम जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं से परे हो। तुम स्थूल, सूक्ष्म और वर्तमान तीनों देहों से परे हो। तुम भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों से परे हो। तुम मूलाधार चक्र में नित्य स्थित रहते हो। इच्छा, क्रिया और ज्ञान तीन प्रकार की शक्तियाँ तुम्हीं हो। तुम्हारा योगीजन नित्य ध्यान करते हैं। तुम ब्रह्मा हो, तुम विष्णु हो, तुम रुद्र हो, तुम इन्द्र हो, तुम अग्नि हो, तुम वायु हो, तुम सूर्य हो, तुम चंद्रमा हो, तुम ब्रह्म हो, भू:, र्भूव:, स्व: ये तीनों लोक तथा ॐकार वाच्य पर ब्रह्म भी तुम हो।

गणादि पूर्वमुच्चार्य वर्णादि तदनंतरम्॥
अनुस्वारः परतरः ॥ अर्धेन्दुलसितम् ॥ तारेण ऋद्धम्॥
एतत्तव मनुस्वरूपम् ॥ गकारः पूर्वरूपम्॥
अकारो मध्यमरूपम् ॥ अनुस्वारश्चान्त्यरूपम्॥
बिन्दुरुत्तररूपम् ॥ नादः संधानम्॥
संहितासंधिः ॥ सैषा गणेशविद्या॥
गणकऋषिः ॥ निचृद्गायत्रीच्छंदः॥
गणपतिर्देवता ॥ ॐ गं गणपतये नमः॥7॥

अर्थ:
गण के आदि अर्थात ‘ग्’ कर पहले उच्चारण करें। उसके बाद वर्णों के आदि अर्थात ‘अ’ उच्चारण करें। उसके बाद अनुस्वार उच्चारित होता है। इस प्रकार अर्धचंद्र से सुशोभित ‘गं’ ॐकार से अवरुद्ध होने पर तुम्हारे बीज मंत्र का स्वरूप (ॐ गं) है। गकार इसका पूर्वरूप है।बिन्दु उत्तर रूप है। नाद संधान है। संहिता संविध है। ऐसी यह गणेश विद्या है। इस महामंत्र के गणक ऋषि हैं। निचृंग्दाय छंद है श्री मद्महागणपति देवता हैं। वह महामंत्र है- ॐ गं गणपतये नमः।

एकदंताय विद्महे । वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥8॥

अर्थ:
एक दंत को हम जानते हैं। वक्रतुण्ड का हम ध्यान करते हैं। वह दन्ती (गजानन) हमें प्रेरणा प्रदान करें। यह गणेश गायत्री है।

एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम्।
रदं च वरदं हस्तैर्ब्रिभ्राणं मूषकध्वजम्।
रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्।
रक्तगंधानुलिप्तांगं रक्तपुष्पै: सुपुजितम्।
भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्।
आविर्भूतं च सृष्टयादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम्।
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वर:॥9॥

अर्थ:
एकदंत चतुर्भुज चारों हाथों में पाक्ष, अंकुश, अभय और वरदान की मुद्रा धारण किए तथा मूषक चिह्न की ध्वजा लिए हुए, रक्तवर्ण लंबोदर वाले सूप जैसे बड़े-बड़े कानों वाले रक्त वस्त्रधारी शरीर पर रक्त चंदन का लेप किए हुए रक्तपुष्पों से भलीभांति पूजित। भक्त पर अनुकम्पा करने वाले देवता, जगत के कारण अच्युत, सृष्टि के आदि में आविर्भूत प्रकृति और पुरुष से परे श्री गणेश जी का जो नित्य ध्यान करता है, वह योगी सब योगियों में श्रेष्ठ है।

नमो व्रातपतये। नमो गणपतये। नम: प्रमथपतये।
नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदंताय।
विघ्ननाशिने शिवसुताय।
श्री वरदमूर्तये नमो नमः॥10॥

अर्थ:
व्रात अर्थात देव समूह के नायक को नमस्कार। गणपति को नमस्कार। प्रथम पति अर्थात शिवजी के गणों के अधिनायक, के लिए नमस्कार। लंबोदर को, एकदंत को, शिवजी के पुत्र को तथा श्री वरदमूर्ति को नमस्कार-नमस्कार।

॥ फल श्रुति ॥

एतदथर्वशीर्षं योऽधीते। स ब्रह्मभूयाय कल्पते।
स सर्वतः सुखमेधते । स सर्वविघ्नैर्नबाध्यते।
स पञ्चमहापापातप्रमुच्यते ॥11॥

अर्थ:
यह अथर्वशीर्ष (अथर्ववेद का उपनिषद) है। इसका पाठ जो करता है, ब्रह्म को प्राप्त करने का अधिकारी हो जाता है। सब प्रकार के विघ्न उसके लिए बाधक नहीं होते। वह सब जगह सुख पाता है। वह पांचों प्रकार के महान पातकों तथा उपपातकों से मुक्त हो जाता है।

सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति।
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति।
सायंप्रातः प्रयुञ्जानो अपापो भवति।
सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति।
धर्मार्थकाममोक्षं च विन्दति ॥12॥

अर्थ:
सायंकाल पाठ करने वाला दिन के पापों का नाश करता है। प्रात:काल पाठ करने वाला रात्रि के पापों का नाश करता है। जो प्रातः, सायं दोनों समय इसका पाठ करता है वह निष्पाप हो जाता है। वह सर्वत्र विघ्नों का नाश कर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त करता है।

इदम् अथर्वशीर्षमऽशिष्याय न देयम्।
यो यदि मोहाद्दास्यति स पापीयान् भवति।
सहस्रावर्तनात् यं यं काममधीते।
तं तमनेन साधयेत्॥13॥

अर्थ:
इस अथर्वशीर्ष को जो शिष्य न हो उसे नहीं देना चाहिए। जो मोह के कारण देता है वह पातकी हो जाता है। सहस्र (हज़ार) बार पाठ करने से जिन-जिन कामों-कामनाओं का उच्चारण करता है, उनकी सिद्धि इसके द्वारा ही मनुष्य कर सकता है।

अनेन गणपतिमभिषिञ्चति स वाग्मी भवति।
चतुर्थ्यामनश्नञ्जपति स विद्यावान् भवति।
इत्यथर्वण वाक्यं।
ब्रह्माद्यावरणं विद्यात्। न बिभेति कदाचनेति ॥14॥

अर्थ:
इसके द्वारा जो गणपति को स्नान कराता है, वह वक्ता बन जाता है। जो चतुर्थी तिथि को उपवास करके जपता है वह विद्यावान हो जाता है, यह अथर्व वाक्य है जो इस मंत्र के द्वारा तपश्चरण करना जानता है वह कदापि भय को प्राप्त नहीं होता।

यो दूर्वाङ्कुरैर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति।
यो लाजैर्यजति स यशोवान् भवति।
स मेधावान् भवति।
यो मोदकसहस्रेण यजति।
स वाञ्छितफलमवाप्नोति।
यः साज्यसमिद्भिर्यजति।
स सर्वं लभते स सर्वं लभते ॥15॥

अर्थ:
जो दूर्वांकुर के द्वारा भगवान गणपति का यजन करता है वह कुबेर के समान हो जाता है। जो लाजो (धानी-लाई) के द्वारा यजन करता है वह यशस्वी होता है, मेधावी होता है। जो सहस्र (हजार) लड्डुओं (मोदकों) द्वारा यजन करता है, वह वांछित फल को प्राप्त करता है। जो घृत के सहित समिधा से यजन करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है।

अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा
सूर्यवर्चस्वी भवति।
सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासंनिधौ
वा जप्त्वा सिद्धमंत्रो भवति।
महाविघ्नात्प्रमुच्यते। महादोषात्प्रमुच्यते।
महापापात् प्रमुच्यते।
स सर्वविद्भवति स सर्वविद्भवति।
य एवं वेद इत्युपनिषत् ॥ 16॥

अर्थ:
आठ ब्राह्मणों को सम्यक रीति से भोजन कराने पर दाता सूर्य के समान तेजस्वी होता है। सूर्य ग्रहण में महानदी में या प्रतिमा के समीप जपने से मंत्र सिद्धि होती है। वह महाविघ्न से मुक्त हो जाता है। जो इस प्रकार जानता है, वह सर्वज्ञ हो जाता है वह सर्वज्ञ हो जाता है।

॥ अथर्ववेदीय गणपति उपनिषद समाप्त ॥

॥ शान्ति मंत्र ॥

ॐ सहनाववतु । सहनौभुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥

अर्थ:
भगवान, हम गुरु और शिष्य की एक साथ रक्षा करे। हमारा साथ-साथ पालन करें। हम दोनों को साथ-साथ पराक्रमी बनाएं। हम दोनों का जो पढ़ा हुआ शास्त्र है, वो तेजस्वी हो। हम गुरु और शिष्य एक दूसरे से द्वेष न करें।

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः॥
स्थिरैरंगैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः।
व्यशेम देवहितं यदायुः॥

अर्थ:
हे देववृंद, हम अपने कानों से कल्याणमय वचन सुनें। जो याज्ञिक अनुष्ठानों के योग्य हैं ऐसे हे देव, हम अपनी आंखों से मंगलमय कार्यों को होते देखें निरोग इंद्रियों एवं स्वस्थ देह के माध्यम से आपकी स्तुति करते हुए हम प्रजापति ब्रह्मा द्वारा हमारे हितार्थ सौ वर्ष अथवा उससे भी अधिक जो आयु नियत कर रखी है उसे प्राप्त करें। तात्पर्य है कि हमारे शरीर के सभी अंग और इंद्रियां स्वस्थ एवं क्रियाशील बने रहें और हम सौ या उससे अधिक लंबी आयु पावें।

ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः॥
स्वस्तिनस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

अर्थ:
महान कीर्तिमान, ऐश्वर्यवान इन्द्र हमारा कल्याण करें, विश्व के ज्ञान स्वरूप, सर्वज्ञ,सबके पोषणकर्ता पूषा अर्थात सूर्य हमारा कल्याण करें, जिनके चक्रीय गति को कोई रोक नहीं सकता वे गरुड़ देव हमारा कल्याण करें, अरिष्टनेमि जो प्रजापति हैं वे सभी दुरितों को दूर करने वाले हैं वे हमारा कल्याण करें, वेद वाणी के स्वामी, सतत वर्धनशील बृहस्पति हमारा कल्याण करें।

ॐ शांतिः॥ शांतिः॥ शांतिः॥ अर्थ:
ॐ सर्वत्र शांति स्थापित हो।

॥ इति श्री गणपति अथर्वशीर्ष स्तोत्रम् ॥

Ganpati Atharvashirsha English

॥ Shaanti Paat’ha ॥
om bhadram karnebhih’ shri’nuyaama devaa ।
bhadram pashyemaakshabhiryajatraah’ ॥
sthirairangaistusht’uvaamsastanoobhih’ ।
vyashema devahitam yadaayuh’ ॥
om svasti na indro vri’ddhashravaah’ ।
svasti nah’ pooshaa vishvavedaah’ ॥
svastinastaarkshyo arisht’anemih’ ।
svasti no bri’haspatirdadhaatu ॥
om tanmaamavatu
tad vaktaaramavatu
avatu maam
avatu vaktaaram
om shaantih’ । shaantih’ ॥ shaantih’॥।
॥ upanishat ॥

harih’ om namaste ganapataye ॥
tvameva pratyaksham tattvamasi ॥ tvameva kevalam kartaa’si ॥
tvameva kevalam dhartaa’si ॥ tvameva kevalam hartaa’si ॥
tvameva sarvam khalvidam brahmaasi ॥
tvam saakshaadaatmaa’si nityam ॥ 1 ॥

॥ svaroopa tattva ॥
Ri’tam vachmi (vadishyaami) ॥
satyam vachmi (vadishyaami) ॥ 2 ॥

ava tvam maam ॥ ava vaktaaram ॥ ava shrotaaram ॥
ava daataaram ॥ ava dhaataaram ॥
avaanoochaanamava shishyam ॥
ava pashchaattaat ॥ ava purastaat ॥
avottaraattaat ॥ ava dakshinaattaat ॥
ava chordhvaattaat ॥ avaadharaattaat ॥
sarvato maam paahi paahi samantaat ॥ 3 ॥

tvam vaangmayastvam chinmayah’ ॥
tvamaanandamayastvam brahmamayah’ ॥
tvam sachchidaanandaadviteeyo’si ॥
tvam pratyaksham brahmaasi ॥
tvam jnyaanamayo vijnyaanamayo’si ॥ 4 ॥

sarvam jagadidam tvatto jaayate ॥
sarvam jagadidam tvattastisht’hati ॥
sarvam jagadidam tvayi layameshyati ॥
sarvam jagadidam tvayi pratyeti ॥
tvam chatvaari vaakpadaani ॥ 5 ॥

tvam gunatrayaateetah’ tvamavasthaatrayaateetah’ ॥
tvam dehatrayaateetah’ ॥ tvam kaalatrayaateetah’ ॥
tvam moolaadhaarasthito’si nityam ॥
tvam shaktitrayaatmakah’ ॥
tvaam yogino dhyaayanti nityam ॥
tvam brahmaa tvam vishnustvam rudrastvam
indrastvam agnistvam vaayustvam sooryastvam chandramaastvam
brahmabhoorbhuvah’svarom ॥ 6 ॥

॥ Ganesha Mantra ॥
ganaadim poorvamuchchaarya varnaadim tadanantaram ॥
anusvaarah’ paratarah’ ॥ ardhendulasitam ॥ taarena ri’ddham ॥
etattava manusvaroopam ॥ gakaarah’ poorvaroopam ॥
akaaro madhyamaroopam ॥ anusvaarashchaantyaroopam ॥
binduruttararoopam ॥ naadah’ sandhaanam ॥
samhitaasandhih’ ॥ saishaa ganeshavidyaa ॥
ganakari’shih’ ॥ nichri’dgaayatreechchhandah’ ॥
ganapatirdevataa ॥ om gam ganapataye namah’ ॥ 7 ॥

॥ Ganesha Gaayatree ॥
ekadantaaya vidmahe । vakratund’aaya dheemahi ॥
tanno dantih’ prachodayaat ॥ 8॥

॥ Ganesha Roopa ॥
ekadantam chaturhastam paashamankushadhaarinam ॥
radam cha varadam hastairbibhraanam mooshakadhvajam ॥
raktam lambodaram shoorpakarnakam raktavaasasam ॥
raktagandhaanuliptaangam raktapushpaih’ supoojitam ॥
bhaktaanukampinam devam jagatkaaranamachyutam ॥
aavirbhootam cha sri’sht’yaadau prakri’teh’ purushaatparam ॥
evam dhyaayati yo nityam sa yogee yoginaam varah’ ॥ 9 ॥

॥ Asht’a Naama Ganapati ॥
namo vraatapataye । namo ganapataye । namah’ pramathapataye ।
namaste’stu lambodaraayaikadantaaya ।
vighnanaashine shivasutaaya । shreevaradamoortaye namo namah’ ॥ 10 ॥

॥ Phalashruti ॥
etadatharvasheersham yo’dheete ॥ sa brahmabhooyaaya kalpate ॥
sa sarvatah’ sukhamedhate ॥ sa sarva vighnairnabaadhyate ॥
sa panchamahaapaapaatpramuchyate ॥
saayamadheeyaano divasakri’tam paapam naashayati ॥
praataradheeyaano raatrikri’tam paapam naashayati ॥

saayampraatah’ prayunjaano apaapo bhavati ॥
sarvatraadheeyaano’pavighno bhavati ॥
dharmaarthakaamamoksham cha vindati ॥
idamatharvasheershamashishyaaya na deyam ॥
yo yadi mohaaddaasyati sa paapeeyaan bhavati
sahasraavartanaat yam yam kaamamadheete
tam tamanena saadhayet ॥ 11 ॥

anena ganapatimabhishinchati sa vaagmee bhavati ॥
chaturthyaamanashnan japati sa vidyaavaan bhavati ।
sa yashovaan bhavati ॥
ityatharvanavaakyam ॥ brahmaadyaavaranam vidyaat
na bibheti kadaachaneti ॥ 12 ॥

yo doorvaankurairyajati sa vaishravanopamo bhavati ॥
yo laajairyajati sa yashovaan bhavati ॥
sa medhaavaan bhavati ॥
yo modakasahasrena yajati
sa vaanchhitaphalamavaapnoti ॥
yah’ saajyasamidbhiryajati
sa sarvam labhate sa sarvam labhate ॥ 13 ॥

asht’au braahmanaan samyaggraahayitvaa
sooryavarchasvee bhavati ॥
sooryagrahe mahaanadyaam pratimaasamnidhau
vaa japtvaa siddhamantro bhavati ॥
mahaavighnaatpramuchyate ॥ mahaadoshaatpramuchyate ॥
mahaapaapaat pramuchyate ॥
sa sarvavidbhavati sa sarvavidbhavati ॥
ya evam veda ityupanishat ॥ 14 ॥

॥ Shaanti Mantra ॥
om sahanaavavatu ॥ sahanaubhunaktu ॥
saha veeryam karavaavahai ॥
tejasvinaavadheetamastu maa vidvishaavahai ॥
om bhadram karnebhih’ shri’nuyaama devaa ।
bhadram pashyemaakshabhiryajatraah’ ॥
sthirairangaistusht’uvaamsastanoobhih’ ।
vyashema devahitam yadaayuh’ ॥
om svasti na indro vri’ddhashravaah’ ।
svasti nah’ pooshaa vishvavedaah’ ॥
svastinastaarkshyo arisht’anemih’ ।
svasti no bri’haspatirdadhaatu ॥

om shaantih’ । shaantih’ ॥ shaantih’ ॥।
॥ iti shreeganapatyatharvasheersham samaaptam ॥



Om, O Devas, May we Hear with our Ears what is Auspicious,
May we See with our Eyes what is Auspicious and Adorable,
May we be Prayerful with Steadiness in our Bodies (and Minds),
May we Offer our Lifespan allotted by the Devas,

May Indra of great Wisdom and Glory grant us Well-Being,
May Pushan (The Sun God, The Nourisher) of great knowledge grant us Well-Being,
May Tarksya (a mythical bird) of great protective power grant us well-being,
(And) May Brihaspati (The Guru of the Devas) grant us well-being,
Om, Peace, Peace, Peace,

Om, Salutations to You, O Ganapati,

(O Ganapati) You indeed are the visible Tattvam,
(O Ganapati) You indeed are the only Creator,
(O Ganapati) You indeed are the only Sustainer,
(O Ganapati) You indeed are the only Destroyer,
(O Ganapati) You indeed are all this (The Universe); You verily are the Brahman,
(O Ganapati) You are the visible Atman, the Eternal,

I declare the Ritam (Divine Law); I declare the Satyam (Absolute Reality),

(Now) Protect me (O Ganapati) (Protect the Truth I declared),
Protect the Speaker (O Ganapati) (Protect the Teacher who declares this Truth),
Protect the Listener (O Ganapati) (Protect the Student who listens to this Truth),
Protect the Giver (O Ganapati) (Protect the Giver of knowledge who transmits this Truth),
Protect the Sustainer (O Ganapati) (Protect the Sustainer who retains this Truth in Memory),
Protect the Disciple (O Ganapati) (Protect the Disciple who repeats this Truth following the Teacher),

Protect this Truth from the East (O Ganapati),
Protect this Truth from the South (O Ganapati),
Protect this Truth from the West (O Ganapati),
Protect this Truth from the North (O Ganapati),
Protect this Truth from the Top (O Ganapati),
Protect this Truth from the Bottom (O Ganapati),
(Now) Please Protect me (O Ganapati) (Protect this Truth I declared) from all sides,

You are of the nature of Words (Vangmaya), and You are of the nature of Consciousness (Chinmaya),
You are of the nature of Bliss, and You are of the nature of Brahman (which is the source of all Bliss) (Therefore, O Ganapati, the Absolute Truth I have spoken will give Bliss to all who realize it),
You are Sacchidananda, and You are the One without a second,
You are the visible Brahman,
You are of the nature of Gyana, and You are Vigyana,

The Entire Universe has Manifested from You,
The Entire Universe is Sustained by Your Power,
The Entire Universe will Dissolve in You,
The Entire Universe will thus finally Return to You,

You have manifested as Bhumi (Earth),
You have manifested as Apas (Water),
You have manifested as Anala (Fire),
You have manifested as Anila (Wind),
and You have manifested as Nabha (Sky or Space),
You are the Four Types of Speech (Para, Pashyanti, Madhyama and Vaikhari),

You are beyond the Three Gunas (Sattva, Rajas and Tamas)
You are beyond the Three States (Waking, Dreaming and Deep Sleep),
You are beyond the Three Bodies (Gross Body, Subtle Body and Causal Body),
You are beyond the Three Times (Past, Present and Future),

You always abide in the Muladhara,
You are the source of the Three Shaktis (Iccha Shakti, Kriya Shakti and Gyana Shakti) (Will Power, Power of Action and the Power of Knowledge),
The Yogis always meditate on You,

(O Ganapati) You are Brahma, You are Vishnu, You are …
Rudra, You are Indra, You are Agni, You are …
Vayu, You are Surya, You are Chandrama, You are …
Brahman, You pervade the Bhur-Bhuvah-Suvar Lokas; You are the Om Itself.

(The Mantra Swarupa of Ganapati is as follows) The first syllable of the word Gana (i.e. “G”) is to be pronounced first; then the first varna (i.e. “A”) should immediately follow (thus making “Ga”),
The Anuswara should follow next (thus making “Gam”),
Then it should be made to shine with the Half-Moon (i.e. the Nasal Sound of Chandrabindu, thus making “Gang”),
This should be Augmented by Tara,
This is Your Mantra Swarupa (O Ganapati),

G-kara is the first form, …
… A-kara is the middle form, …
… And Anuswara is the last form,
Bindu is the form on the top,
This is joined with Nada,
All the forms combine together,

This is the Ganesha Vidya,
The Rishi who realized this Vidya is Ganaka Rishi,
The Chhanda (Meter) is Nicrdgayatri,
The Devata worshipped is Ganapati,
Om Gang Ganapataye Namah (My Reverential Salutations to Ganapati),

(The Ganapati Gayatri) (Let our mind go) to the Ekadanta (the One with a Single Tusk) to know (His Conscious Form deeply); (And then) Meditate on that Vakratunda (the One with a Curved Trunk) (to get absorbed in His Conscious Form),
May that Danti (One with a Tusk) awaken (our Consciousness),

(The visible Form of Ganapati is as follows) His Face has a single Tusk; He has Four Hands; with two of His Hands, he is holding Noose and Goad,
With His third Hand, He is holding a Tusk, and with His fourth Hand He is showing the gesture of Boon-Giving; His Flag is having the Emblem of a Rat,
His Form is having a Beautiful Reddish Glow, with a Large Belly and with Large Ears like Fans; He is wearing Red Garments,
His Form is anointed with Red Fragrant Paste, and He is worshipped with Red Flowers,

The Heart of this Lord throbs with the Devotees (with empathy, He being the in-dweller); And He has descended for the Cause of the World; He is Imperishable,
He manifested during the beginning of Creation within the manifested Nature, (He manifested) from the Supreme Purusha,
He who meditates on Him in this way every day is the best Yogi among the Yogis,

(Ganapati Mala Mantra) Salutations to the Lord of all Human Beings,
Salutations to the Lord of all Ganas,
Salutations to the Lord of all Pramathas,
Salutations to You, the One with a Large Belly and a Single Tusk,
Salutations to the One Who is the Remover of all Obstacles, Who is the Son of Lord Shiva and is a personification of Boon-Giving,

He who studies this Atharvashirsha (with Shraddha), will become fit to realize Brahman,
He will not be tied down by any obstacles,
Happiness will increase within his consciousness, wherever he is,
He will get freed from the five grave Sins,

Studying this in the evening will destroy the sins committed during the day,
Studying this in the morning will destroy the sins committed during the night,
Joining both in the evening and morning, will make a sinful person sinless,
Studying everywhere will remove the obstacles, …
The Devotee will obtain Dharma, Artha, Kama (right desires fulfilled) and Moksha,

This Atharvasirsha is not to be given to undeserving Persons,
If anyone gives this out of attachment to someone (despite knowing the person to be undeserving), he becomes a sinner,
When thousand Parayana of this Atharva Shirsha is done by deep study (and Contemplation), then by this, Siddhi (spiritual attainments) will be attained,

He who anoints Ganapati with this Upanishad (i.e. worships Ganapati as Brahman-Consciousness) becomes a fluent Speaker (Vagmi),
He who fasts on Chaturdasi and recites this Upanishad becomes filled with Knowledge (becomes Vidyavan),
This is the word of the Atharvana Rishi,
He gains the Knowledge of the envelope of Brahman (understands Brahma Vidya), and thereafter does not have any fear anytime,

He who worships (Ganapati) with tender Durva grass will become prosperous like Kubera,
He who worships (Ganapati) with parched rice will become glorious,
He will (also) become Medhavan (filled with Medha or retentive capacity of the mind),
He who worships (Ganapati) with thousand Modakas (a sweet), he will obtain his Desires,
He who worships (Ganapati) with twigs dipped in ghee, he obtains everything, he obtains everything,

He who makes eight Brahmins receive this Upanishad (i.e. either teaches this Upanishad to eight Brahmins or recites this in the company of eight Brahmins in the Satsang of pure-souled persons) becomes filled with the splendor of the Sun,

He who recites this during Solar Eclipse on the bank of a great river or in front of the image of Ganapati, becomes Mantra-Siddha,
He becomes free from great obstacles,
He becomes free from great vices,

He becomes free from sins or situations which as if drowns the life in a river,
He becomes All-Knowing, He becomes All-Knowing,
This indeed is the Veda (the ultimate Knowledge),
Thus ends the Upanishad
Om, Shanti, Shanti, Shanti (May this bring Peace to all at all the three levels – Adhibhautika, Adhidaivika and Adhyatmika)



श्री गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करने से भक्त को विशेष फल प्राप्त होता है। यह पाठ उन लोगों के लिए अत्यंत लाभकारी है, जो अपने जीवन में विभिन्न समस्याओं या विघ्नों का सामना कर रहे हैं। भक्त अपने सामर्थ्य के अनुसार इसे 108 या 1008 बार पढ़ने का संकल्प ले सकते हैं। इस संकल्प के दौरान जातक को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वह जिस प्रयोजन के लिए गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करना चाहता है, उसका स्पष्ट उल्लेख संकल्प में करे। इससे उनकी मनोकामनाएँ पूरी होने में अधिक सहायता मिलती है।

अथर्ववेद के अनुसार, जो भक्त अपने मन को शांत करके, आंखें बंद कर, किसी भी समय भगवान गणेश को अपने समक्ष उपस्थित मानते हुए इस स्तोत्र का जाप करते हैं, उन्हें सभी प्रकार के विघ्नों से मुक्ति मिलती है। इस प्रक्रिया में ध्यान और श्रद्धा का विशेष महत्व है। गणेश जी की उपासना करने से भक्त अपने सभी दुखों और बाधाओं को दूर कर सकते हैं, और अंततः मोक्ष की प्राप्ति करते हैं।

श्री गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह एक गहरी आध्यात्मिक साधना है, जो व्यक्ति को मानसिक और आत्मिक रूप से मजबूत बनाती है। इस पाठ के माध्यम से भक्त अपने मन में सकारात्मकता और शांति का अनुभव करते हैं, जिससे उनका जीवन और भी सार्थक और सुखद हो जाता है।

इसलिए, गणपति अथर्वशीर्ष का नियमित पाठ न केवल जीवन में बाधाओं को दूर करता है, बल्कि यह व्यक्ति को उच्चतम आध्यात्मिक लक्ष्यों की ओर भी अग्रसर करता है। इसके द्वारा प्राप्त फल सिर्फ भौतिक ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक भी होते हैं, जो जीवन के विभिन्न पहलुओं को संतुलित और समृद्ध बनाते हैं। इस प्रकार, गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करना एक महत्वपूर्ण साधना है, जो भक्तों को हर क्षेत्र में सफलता और समृद्धि की ओर ले जाता है।


1. गणेश अथर्वशीर्ष पाठ कैसे करें?

गणेश अथर्वशीर्ष पाठ करने के लिए कुछ विशेष विधियों का पालन करना आवश्यक होता है। सबसे पहले, एक स्वच्छ और शांत स्थान का चयन करें, जहाँ बैठकर पाठ किया जा सके। पाठ से पहले स्नान करके स्वयं को शुद्ध कर लें और गणेश जी की मूर्ति या चित्र के सामने बैठें। एक साफ आसन पर बैठकर दीपक, अगरबत्ती और फूल आदि की व्यवस्था करें, जिससे पूजा की विधि पूरी हो सके।

पाठ शुरू करने से पहले भगवान गणेश का ध्यान करें और संकल्प लें कि आप किस उद्देश्य के लिए यह पाठ कर रहे हैं। गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ धीमी और स्पष्ट ध्वनि में करना चाहिए, ताकि आप प्रत्येक शब्द का सही उच्चारण कर सकें। पाठ के दौरान मानसिक एकाग्रता बनाए रखें और गणेश जी की कृपा का अनुभव करें।

अगर संभव हो तो इस पाठ को प्रतिदिन सुबह के समय करना शुभ माना जाता है, क्योंकि सुबह का समय शांति और सकारात्मक ऊर्जा का होता है। गणेश अथर्वशीर्ष का नियमित पाठ व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि, मानसिक शांति और विघ्नों से मुक्ति प्रदान करता है। इस पाठ को सामर्थ्य के अनुसार 108 या 1008 बार भी किया जा सकता है, जिससे गणेश जी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। अंत में, भगवान गणेश को प्रणाम करें और प्रसाद वितरण करें। इस पाठ का अभ्यास करने से भक्त को सकारात्मक परिणाम मिलते हैं।

2. अथर्वशीर्ष का अर्थ क्या होता है?

अथर्वशीर्ष” का अर्थ है अथर्ववेद का वह हिस्सा, जो किसी विशेष देवता को समर्पित होता है। “अथर्व” शब्द का संबंध अथर्ववेद से है, जो चार प्रमुख वेदों में से एक है, और “शीर्ष” का अर्थ है शीर्ष स्थान या उच्चतम ज्ञान। इस प्रकार, “अथर्वशीर्ष” उस ज्ञान या स्तुति को संदर्भित करता है, जो किसी विशेष देवता के प्रति सर्वोच्च श्रद्धा और भक्ति के साथ की जाती है। गणेश अथर्वशीर्ष विशेष रूप से भगवान गणेश की महिमा का वर्णन करता है।

गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ भगवान गणेश के गुणों, शक्तियों, और उनके महत्व का वर्णन करता है। इस स्तोत्र में गणेश जी को सर्वोच्च ब्रह्म के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो संसार के सभी कार्यों को संचालित करते हैं। यह स्तोत्र गणेश जी के रूप, कार्य, और उनके प्रभाव को समझने का एक माध्यम है। इसके प्रत्येक श्लोक में गणेश जी की शक्ति और उनकी कृपा का वर्णन होता है, जिससे व्यक्ति को विघ्नों से मुक्ति और सफलता प्राप्त होती है।

गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ भक्त को मानसिक शांति, एकाग्रता और आध्यात्मिक बल प्रदान करता है। इस पाठ को नियमित रूप से करने से भगवान गणेश की कृपा प्राप्त होती है, और जीवन में आने वाले सभी प्रकार के विघ्नों का नाश होता है। इसका उद्देश्य केवल गणेश जी की पूजा नहीं, बल्कि उनकी अद्वितीय महिमा का अनुभव करना और उनके प्रति गहन श्रद्धा का भाव प्रकट करना है।

3. अथर्वशीर्ष हवन क्या है?

अथर्वशीर्ष हवन एक विशेष प्रकार की यज्ञ क्रिया है, जिसमें गणेश अथर्वशीर्ष के मंत्रों का जाप करके हवन किया जाता है। यह हवन भगवान गणेश की कृपा प्राप्त करने और विघ्नों से मुक्ति पाने के लिए किया जाता है। हवन में अग्नि को देवताओं का प्रतीक माना जाता है, और उसमें आहुति देकर भक्त अपने मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए भगवान गणेश से आशीर्वाद मांगते हैं।

अथर्वशीर्ष हवन में सबसे पहले हवन कुंड की स्थापना की जाती है और उसमें अग्नि प्रज्वलित की जाती है। हवन के दौरान गणेश अथर्वशीर्ष के श्लोकों का उच्चारण किया जाता है। प्रत्येक श्लोक के बाद अग्नि में समिधा या हवन सामग्री की आहुति दी जाती है। यह प्रक्रिया भक्त की मानसिक शांति और समृद्धि के लिए की जाती है।

हवन में विशेष प्रकार की सामग्री जैसे गाय का घी, चावल, तिल, और अन्य हवन सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है। हवन की समाप्ति पर भगवान गणेश की आरती की जाती है और प्रसाद वितरण किया जाता है। अथर्वशीर्ष हवन व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता और समृद्धि लाता है और उसकी मनोकामनाओं को पूर्ण करने में सहायक होता है। नियमित रूप से इस हवन को करने से गणेश जी की कृपा प्राप्त होती है और विघ्नों का नाश होता है।

4. गणपति का पूरा नाम क्या है?

गणपति का पूरा नाम “गजानन गणपति” है। “गणपति” का अर्थ है गणों के अधिपति या स्वामी। “गण” का तात्पर्य देवताओं, मनुष्यों, और अन्य जीवों के समूह से होता है, और “पति” का अर्थ स्वामी होता है। इस प्रकार, गणपति वह देवता हैं, जो सभी गणों के अधिपति हैं और उनकी रक्षा और मार्गदर्शन करते हैं।

गणपति को “विघ्नहर्ता” के रूप में भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है वह जो सभी विघ्नों और बाधाओं को दूर करते हैं। उनका दूसरा नाम “गजानन” है, जिसमें “गज” का अर्थ हाथी और “आनन” का अर्थ मुख होता है। इस नाम के पीछे की कथा यह है कि गणेश जी का मुख हाथी जैसा है, जो उनकी विशेष पहचान है।

गणपति के अन्य प्रसिद्ध नामों में विनायक, एकदंत, लंबोदर, और विघ्नराज शामिल हैं। इन सभी नामों का उल्लेख विभिन्न शास्त्रों और पुराणों में किया गया है, जो गणेश जी के विभिन्न गुणों और शक्तियों का प्रतीक हैं। भक्त गणेश जी को उनके विभिन्न नामों से पुकारते हैं, और प्रत्येक नाम के पीछे उनकी कोई विशेष कथा और महत्व छिपा होता है। गणपति का स्मरण करने से जीवन में आने वाले सभी विघ्नों का नाश होता है, और व्यक्ति को सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।

हवन में कितनी आहुति देनी चाहिए?

हवन में आहुति देने की संख्या हवन की विधि, उद्देश्य और संकल्प पर निर्भर करती है। सामान्यत: हवन में आहुति की संख्या 108 मानी जाती है, जो एक पवित्र और शुभ संख्या मानी जाती है। यह संख्या 108 के महत्व से जुड़ी है, जो हिन्दू धर्म में विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसके अलावा, कुछ विशेष हवनों में आहुति की संख्या 1008 तक भी जा सकती है, जो अधिक शक्ति और फल देने वाला माना जाता है।

हर आहुति के साथ “स्वाहा” मंत्र का उच्चारण किया जाता है, और आहुति अग्नि में दी जाती है। आहुति देने का उद्देश्य भगवान को समर्पित करना होता है, और इसके माध्यम से भक्त अपने मनोकामनाओं की पूर्ति की कामना करता है।

हवन के दौरान आहुति देते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि सामग्री शुद्ध और पवित्र हो। सामान्यतः हवन सामग्री में गाय का घी, तिल, चावल, गुड़, और विशेष प्रकार की जड़ी-बूटियाँ होती हैं, जिन्हें अग्नि में समर्पित किया जाता है। आहुति देने का तरीका भी महत्वपूर्ण होता है। दाहिने हाथ से समिधा या सामग्री लेकर अग्नि में डालनी चाहिए और मंत्रों का जाप करना चाहिए।

आहुति की सही संख्या और विधि का पालन करने से हवन का प्रभाव अधिक होता है, और भक्त को अपने प्रयासों का शुभ फल मिलता है। आहुति देने का मुख्य उद्देश्य भगवान से आशीर्वाद प्राप्त करना और मन की शुद्धि करना होता है।

हवन में कौन सा मंत्र बोलते हैं?

हवन के दौरान बोले जाने वाले मंत्रों का चयन हवन के उद्देश्य और देवता के आधार पर किया जाता है। यदि हवन गणपति जी के लिए किया जा रहा है, तो “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का उच्चारण प्रमुख होता है। इस मंत्र के साथ “स्वाहा” जोड़कर आहुति दी जाती है। यह मंत्र भगवान गणेश की स्तुति के लिए है और हवन के दौरान उनकी कृपा प्राप्त करने का माध्यम बनता है।

इसके अलावा, “सर्वदेवता हवन” में विविध देवताओं के नाम से संबंधित मंत्र बोले जाते हैं। हवन के दौरान बोले जाने वाले अन्य सामान्य मंत्रों में “ॐ स्वाहा” शामिल होता है, जो हवन में आहुति देने का विशेष मंत्र है। यह मंत्र अग्नि देवता को समर्पित होता है, और आहुति के साथ उनका आह्वान किया जाता है।

हवन के दौरान मंत्रों का सही उच्चारण बहुत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह हवन की शुद्धता और उसकी प्रभावशीलता को निर्धारित करता है। मंत्रों के साथ दी गई आहुति भक्त के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और शांति का संचार करती है।

हवन के अंत में “शांति पाठ” किया जाता है, जिसमें “ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः” का उच्चारण होता है। यह पाठ विश्व में शांति, सुख, और समृद्धि की कामना के साथ किया जाता