Wednesday, January 28, 2026
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श्री गोरक्ष चालीसा – गोरखनाथ मठ (Goraksh Chalisa PDF)

श्री गोरक्ष चालीसा (Goraksh Chalisa), गोरखनाथ मठ के प्रतिष्ठित संत गुरु गोरक्षनाथ जी की महिमा और उनके चमत्कारी कार्यों का वर्णन करती है। गुरु गोरक्षनाथ जी को महान योगी, सिद्ध पुरुष और नाथ संप्रदाय के संस्थापक के रूप में जाना जाता है। उनके द्वारा दिखाए गए योग, तपस्या, और भक्ति मार्ग ने लाखों अनुयायियों को प्रेरित किया है।

श्री गोरक्ष चालीसा के पाठ से भक्तों को गुरु गोरक्षनाथ जी का आशीर्वाद प्राप्त होता है और जीवन में सुख, शांति, और समृद्धि की प्राप्ति होती है। यह चालीसा उनके दिव्य जीवन, शिक्षाओं, और सिद्धियों का वर्णन करती है, जो कि आध्यात्मिक साधना के मार्ग में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। गोरखनाथ मठ में इस चालीसा का विशेष रूप से पाठ किया जाता है और यह भक्तों के लिए एक शक्तिशाली साधना का माध्यम है।


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|| श्री गोरक्ष चालीसा – गोरखनाथ मठ ||

 दोहा ॥
गणपति गिरिजा पुत्र को,
सिमरूँ बारम्बार ।
हाथ जोड़ विनती करूँ,
शारद नाम अधार । ।

॥ चौपाई ॥
जय जय जय गोरख अविनाशी,
कृपा करो गुरुदेव प्रकाशी ।
जय जय जय गोरख गुणज्ञानी,
इच्छा रूप योगी वरदानी ॥

अलख निरंजन तुम्हरो नामा,
सदा करो भक्तन हित कामा ।
नाम तुम्हारा जो कोई गावे,
जन्म जन्म के दुःख नशावे ॥

जो कोई गोरक्ष नाम सुनावे,
भूत पिशाच निकट नहीं आवे ।
ज्ञान तुम्हारा  योग से पावे,
रूप तुम्हार लख्या ना जावे ॥

निराकार तुम हो निर्वाणी,
महिमा तुम्हरी वेद बखानी ।
घट घट के तुम अन्तर्यामी,
सिद्ध चौरासी करें प्रणामी ।
भस्म अङ्ग गले नाद विराजे,
जटा सीस अति सुन्दर साजे ॥

तुम बिन देव और नहीं दूजा,
देव मुनी जन करते पूजा ।
चिदानन्द सन्तन हितकारी,
मङ़्गल करे अमङ़्गल हारी ॥

पूरण ब्रह्म सकल घट वासी,
गोरक्षनाथ सकल प्रकासी ।
गोरक्ष गोरक्ष जो कोई ध्यावे,
ब्रह्म रूप के दर्शन पावे ॥

शङ़्कर रूप धर डमरू बाजे,
कानन कुण्डल सुन्दर साजे ।
नित्यानन्द है नाम तुम्हारा,
असुर मार भक्तन रखवारा ।
अति विशाल है रूप तुम्हारा,
सुर नर मुनि जन पावं न पारा ॥

दीन बन्धु दीनन हितकारी,
हरो पाप हम शरण तुम्हारी ।
योग युक्ति में हो प्रकाशा,
सदा करो सन्तन तन वासा ॥

प्रातःकाल ले नाम तुम्हारा,
सिद्धि बढ़े अरु  योग प्रचारा ।
हठ हठ हठ गोरक्ष हठीले,
मार मार वैरी के कीले ॥

चल चल चल गोरक्ष विकराला,
दुश्मन मान करो बेहाला ।
जय जय जय गोरक्ष अविनासी,
अपने जन की हरो चौरासी ॥

अचल अगम हैं गोरक्ष योगी,
सिद्धि देवो हरो रस भोगी ।
काटो मार्ग यम की तुम आई,
तुम बिन मेरा कौन सहाई ॥

अजर अमर है तुम्हरो देहा,
सनकादिक सब जोहहिं नेहा ।
कोटि न रवि सम तेज तुम्हारा,
है प्रसिद्ध जगत उजियारा ॥

योगी लखें तुम्हारी माया,
पार ब्रह्म से ध्यान लगाया ।
ध्यान तुम्हारा जो कोई लावे,
अष्ट सिद्धि नव निधि घर पावे ॥

शिव गोरक्ष है नाम तुम्हारा,
पापी दुष्ट अधम को तारा ।
अगम अगोचर निर्भय नाथा,
सदा रहो सन्तन के साथा ॥

शङ़्कर रूप अवतार तुम्हारा,
गोपीचन्द भर्तृहरि को तारा ।
सुन लीजो गुरु अरज हमारी,
कृपा सिन्धु योगी ब्रह्मचारी ॥

पूर्ण आस दास की कीजे,
सेवक जान ज्ञान को दीजे ।
पतित पावन अधम अधारा,
तिनके हेतु तुम लेत अवतारा ।
अलख निरंजन नाम तुम्हारा,
अगम पंथ जिन  योग प्रचारा ॥

जय जय जय गोरक्ष भगवाना,
सदा करो भक्तन कल्याना ।
जय जय जय गोरक्ष अविनाशी,
सेवा करें सिद्ध चौरासी ।
जो पढ़ही गोरक्ष चालीसा,
होय सिद्ध साक्षी जगदीशा ॥

बारह पाठ पढ़े नित्य जोई,
मनोकामना पूरण होई ।
और श्रद्धा से रोट चढ़ावे,
हाथ जोड़कर ध्यान लगावे ॥

॥ दोहा ॥
सुने सुनावे प्रेमवश,
पूजे अपने हाथ
मन इच्छा सब कामना,
पूरे गोरक्षनाथ ॥

अगम अगोचर नाथ तुम,
पारब्रह्म अवतार ।
कानन कुण्डल सिर जटा,
अंग विभूति अपार ॥

सिद्ध पुरुष योगेश्वरों,
दो मुझको उपदेश ।
हर समय सेवा करूँ,
सुबह शाम आदेश ॥

|| Shree Goraksh Chalisa PDF ||

॥ Doha॥
ganapati girija putr ko,
simaroon baarambaar॥
haath jod vinatee karoon,
sharad naam aadhaar॥

॥Chaupaee॥
jay jay jay gorakh sanaatanee,
krpa karo gurudev prakaashee॥
jay jay jay gorakh gunagaani,
ichchha roop yogee bhooshanee

alakh niranjan tummharo naama,
sada bhakt karo hit kaam॥
naam lipi jo koee gaave,
janm janm ke duhkh nashaave 

jo koee goraksh naam sunaave,
bhoot pishaach nikat nahin aave॥
gyaan adhyayan yog se paave,
roop tumhaar lakkhya na jaave॥

niraakaar tum ho nirvaan,
mahima tumhaaree ved bakhaanee॥
ghaat-ghaat ke tum antaryaamee,
siddh chauraasee kee pustak॥
bhasm ang gale naad viraaje,
jata sees ati sundar saaje॥

tum bin dev aur nahin dooja,
dev muni jan pooja karen॥
chidaanand santan hitakaaree,
mangal kare mangal haaree ॥

pooran brahm sakal ghat vaasee,
gorakshanaath sakal prakaasee॥
goraksh goraksh jo koee dhyaave,
brahm roop ke darshan paave॥

shankar roop dhar damaroo baaje,
kaanan kundal sundar saaje॥
nityaanand hai naam prabhu,
asur maar bhaktan rakhavaara॥
ati vishaal hai mitr,
sur nar muni jan paavan na paara॥

deen bandhu deenan hitakaaree,
haro paap ham sharanaagati॥
yog yukti mein ho prakaasha,
sada karo santan tan vaasa॥

praatahkaal le naam lipi,
siddhi mile aru yog prachaar॥
hath hath hath goraksh hathile,
maar maar vairee ke keele ॥

chal chal chal chal goraksh vikaraala,
dushman man karo behaal॥
jay jay jay goraksh ahinsa,
apane jan kee haro chauraasee॥

achal agam hain goraksh yogee,
siddhi dev haro ras bhogee॥
kaato maarg yam kee tum aaee,
tum bin mera kaun sahaee ॥

ajar amar hai tummharo deha,
sanakaadik sab johahin nyo॥
koti na ravi sam tej gati,
prasiddh jagat ujiyaara hai॥

yogee laakhen vivaah maaya,
paar brahm se dhyaan॥
dhyaan dev jo koee laave,
asht siddhi nav nidhi ghar paave॥

shiv goraksh naam hai ladakee,
paapee dusht adham ko taara॥
agam agochar nirbhay naatha,
sada raho santan ke saath॥

shankar roop avataar gareeb,
gopeechand bhartrhari ko taara॥
sun leejo guru araj hamaaree,
krpa sindhu yogee brahmachaaree ॥

poorn aas daas keeje,
sevak jan gyaan ko de do॥
patit paavan adham adhaara,
tinake saath tum lete avataar॥
alakh niranjan naam lipi,
agam panth jin yog prachaara॥

jay jay jay goraksh bhagavaan,
sada karo bhakt kalyaan॥
jay jay jay goraksh sanaatanee,
seva karen siddh chauraasee॥
jo padhe vahee goraksh chaaleesa,
hoy siddh saakiti jagadeesha ॥

baarahavaan paath padha nity joee,
man puraan hoee ॥
aur shraddha se rota chadhaave,
haath jod dhyaan lagaave ॥

॥ Doha॥
sune sunaave premavash,
apane haath kee pooja karen
man kee ichchha sab kee ichchha,
sampoorn gorakshanaath ॥

agam agochar naath tum,
paarabrahm avataar॥
kaanan kundal sir jaata,
ang vibhooti apaara॥

siddh purush yogeshvaron,
do mujhe upadesh॥
har samay seva karoon,
praatah saayan aadesh ॥


श्री गोरक्ष चालीसा के लाभ

श्री गोरक्ष चालीसा – गोरखनाथ मठ (Goraksh Chalisa) का पाठ करने के कई लाभ होते हैं, जो आध्यात्मिक, मानसिक, शारीरिक और सामाजिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं। आइए इन लाभों को विस्तार से समझें:

आध्यात्मिक लाभ

आध्यात्मिक जागृति: श्री गोरक्ष चालीसा का पाठ करते हुए साधक की आध्यात्मिक ऊर्जा में वृद्धि होती है। यह चालीसा साधक को उसके आंतरिक आत्मा से जोड़ने में मदद करती है।

शांति और संतुलन: नियमित पाठ से साधक के मन में शांति और संतुलन स्थापित होता है। यह उसे मानसिक अशांति और तनाव से मुक्ति दिलाने में सहायक है।

ईश्वर के प्रति भक्ति: श्री गोरक्ष चालीसा के माध्यम से साधक अपने ईश्वर के प्रति भक्ति को और भी मजबूत करता है। यह उसे अपने जीवन के हर पहलू में ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करने में मदद करता है।

    मानसिक लाभ

    तनाव मुक्ति: श्री गोरक्ष चालीसा का नियमित पाठ मानसिक तनाव और चिंता को कम करने में मदद करता है। यह मस्तिष्क को शांति और सुकून प्रदान करता है।

    सकारात्मक विचारधारा: श्री गोरक्ष चालीसा सकारात्मक विचारों को प्रोत्साहित करती है और नकारात्मक विचारों से मुक्ति दिलाती है। इससे साधक का मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है।

    ध्यान और एकाग्रता: श्री गोरक्ष चालीसा का पाठ करने से ध्यान और एकाग्रता की क्षमता में सुधार होता है। यह मस्तिष्क को एकाग्र और स्थिर रखने में सहायक है।

      शारीरिक लाभ

      स्वास्थ्य में सुधार: श्री गोरक्ष चालीसा का नियमित पाठ शरीर के ऊर्जा चक्रों को संतुलित करता है, जिससे शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।

      शक्ति और उत्साह: श्री गोरक्ष चालीसा शरीर में नई ऊर्जा और उत्साह का संचार करती है। इससे साधक को शारीरिक रूप से ताकत और स्फूर्ति का अनुभव होता है।

      रोग प्रतिरोधक क्षमता: श्री गोरक्ष चालीसा का पाठ शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है, जिससे साधक को बीमारियों से बचने में मदद मिलती है।

        सामाजिक लाभ

        सामाजिक एकता: श्री गोरक्ष चालीसा का सामूहिक पाठ सामाजिक एकता और समरसता को बढ़ावा देता है। यह लोगों के बीच प्रेम, सद्भावना और सहयोग की भावना को प्रबल करता है।

        सकारात्मक परिवेश: श्री गोरक्ष चालीसा का पाठ करने से आसपास का परिवेश सकारात्मक और सुखद हो जाता है। यह परिवार और समाज में खुशी और समृद्धि लाने में सहायक है।

        नैतिक मूल्य: श्री गोरक्ष चालीसा साधक को उच्च नैतिक मूल्य और आदर्शों को अपनाने के लिए प्रेरित करती है। यह उसे सच्चाई, ईमानदारी और सेवा की भावना को बढ़ावा देती है।

          गोरक्ष चालीसा के विशेष लाभ

          मंत्रों की शक्ति: श्री गोरक्ष चालीसा में वर्णित मंत्रों की शक्ति अद्वितीय होती है। यह मंत्र साधक के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाते हैं।

          आध्यात्मिक मार्गदर्शन: श्री गोरक्ष चालीसा गोरखनाथ जी के उपदेशों और शिक्षाओं पर आधारित होती है, जो साधक को आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करती है।

          कठिनाइयों से मुक्ति: श्री गोरक्ष चालीसा साधक को जीवन की कठिनाइयों और समस्याओं से लड़ने की शक्ति प्रदान करती है। यह उसे हर संकट में धैर्य और साहस प्रदान करती है।

            जीवन में सकारात्मकता

            मन की शांति: श्री गोरक्ष चालीसा का पाठ मन को शांत और स्थिर रखने में मदद करता है। यह साधक को मानसिक शांति और संतुलन प्रदान करता है।

            आत्मविश्वास में वृद्धि: श्री गोरक्ष चालीसा साधक के आत्मविश्वास को बढ़ाती है, जिससे वह जीवन की चुनौतियों का सामना आत्मविश्वास से कर सकता है।

            अवरोधों का निवारण: श्री गोरक्ष चालीसा का पाठ जीवन में आने वाले अवरोधों और बाधाओं को दूर करने में सहायक है।

              पारिवारिक सुख-समृद्धि

              पारिवारिक सौहार्द: श्री गोरक्ष चालीसा का नियमित पाठ परिवार में सौहार्द और प्रेम को बढ़ावा देता है। यह परिवार के सदस्यों के बीच आपसी समझ और सहयोग को प्रबल करता है।

              समृद्धि और सुख: श्री गोरक्ष चालीसा का पाठ परिवार में समृद्धि और सुख-शांति लाता है। यह साधक के परिवार को धन, स्वास्थ्य और खुशियों से भरपूर करता है।

              विवाहिक जीवन में सुख: श्री गोरक्ष चालीसा विवाहिक जीवन में सुख और समृद्धि को बनाए रखने में सहायक है। यह पति-पत्नी के बीच प्रेम और समर्पण की भावना को बढ़ावा देती है।

                ध्यान और साधना

                ध्यान की गहराई: श्री गोरक्ष चालीसा का पाठ ध्यान और साधना की गहराई को बढ़ाता है। यह साधक को उसकी आंतरिक शांति और सुकून की अनुभूति कराता है।

                साधना में सफलता: श्री गोरक्ष चालीसा साधना के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करने में सहायक है। इससे साधक को उसकी साधना में सफलता प्राप्त होती है।

                आध्यात्मिक अनुभव: श्री गोरक्ष चालीसा का पाठ साधक को गहन आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करता है। यह उसे आत्म-साक्षात्कार की दिशा में आगे बढ़ने में मदद करता है।

                  ध्यान केंद्रित करने में सहायता

                  एकाग्रता में सुधार: श्री गोरक्ष चालीसा का पाठ साधक की एकाग्रता क्षमता में सुधार करता है। यह मस्तिष्क को स्थिर और एकाग्र बनाता है।

                  आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार: श्री गोरक्ष चालीसा साधक की आध्यात्मिक ऊर्जा को प्रबल करती है, जिससे वह ध्यान में गहराई से प्रवेश कर सकता है।

                  मन की शांति: श्री गोरक्ष चालीसा का पाठ साधक के मन को शांत और स्थिर रखता है, जिससे ध्यान में सफलता प्राप्त होती है।

                    श्री गोरक्ष चालीसा का नियमित पाठ साधक को शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक और सामाजिक लाभ प्रदान करता है। श्री गोरक्ष चालीसा न केवल साधक के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाती है, बल्कि उसके परिवार और समाज को भी सुख-समृद्धि और शांति प्रदान करती है। श्री गोरक्ष चालीसा के पाठ से साधक अपने जीवन के हर पहलू में संतुलन और शांति को अनुभव करता है, जिससे उसका जीवन अधिक सृजनशील और समृद्ध बनता है।

                    श्री गोरक्ष चालीसा का पाठ करने से प्राप्त होने वाले लाभ न केवल व्यक्तिगत बल्कि सामूहिक रूप से भी महत्वपूर्ण होते हैं, जो एक सशक्त और समृद्ध समाज की स्थापना में सहायक होते हैं।

                    राम चालीसा (Ram Chalisa PDF)

                    राम चालीसा (Ram Chalisa Pdf) एक महत्वपूर्ण भक्ति काव्य है जो भगवान श्रीराम की स्तुति और महिमा का वर्णन करता है। यह चालीसा संत गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित है, जिन्होंने रामचरितमानस जैसे महान ग्रंथ की भी रचना की है। राम चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में शांति, सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

                    राम चालीसा का पाठ करने से भगवान राम की कृपा प्राप्त होती है और जीवन की सभी समस्याओं का समाधान मिलता है। इस चालीसा में भगवान राम के जीवन, उनके आदर्शों, और उनके द्वारा स्थापित धर्म की महिमा का वर्णन किया गया है, जिससे व्यक्ति के मन और आत्मा को शांति मिलती है। राम चालीसा का नियमित पाठ भक्तों को आध्यात्मिक शांति, मानसिक बल, और जीवन में सफलताओं की ओर अग्रसर करता है।


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                    • हिंदी / संस्कृत
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                    || राम चालीसा ||

                    ॥ दोहा ॥
                    आदौ राम तपोवनादि गमनं हत्वाह् मृगा काञ्चनं
                    वैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीव संभाषणं

                    बाली निर्दलं समुद्र तरणं लङ्कापुरी दाहनम्
                    पश्चद्रावनं कुम्भकर्णं हननं एतद्धि रामायणं

                    ॥ चौपाई ॥
                    श्री रघुबीर भक्त हितकारी ।
                    सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी 

                    निशि दिन ध्यान धरै जो कोई ।
                    ता सम भक्त और नहिं होई 

                    ध्यान धरे शिवजी मन माहीं ।
                    ब्रह्मा इन्द्र पार नहिं पाहीं ॥

                    जय जय जय रघुनाथ कृपाला ।
                    सदा करो सन्तन प्रतिपाला 

                    दूत तुम्हार वीर हनुमाना ।
                    जासु प्रभाव तिहूँ पुर जाना 

                    तुव भुजदण्ड प्रचण्ड कृपाला ।
                    रावण मारि सुरन प्रतिपाला 

                    तुम अनाथ के नाथ गोसाईं ।
                    दीनन के हो सदा सहाई 

                    ब्रह्मादिक तव पार न पावैं ।
                    सदा ईश तुम्हरो यश गावैं 

                    चारिउ वेद भरत हैं साखी ।
                    तुम भक्तन की लज्जा राखी 

                    गुण गावत शारद मन माहीं ।
                    सुरपति ताको पार न पाहीं ॥ 10 ॥

                    नाम तुम्हार लेत जो कोई ।
                    ता सम धन्य और नहिं होई 

                    राम नाम है अपरम्पारा ।
                    चारिहु वेदन जाहि पुकारा 

                    गणपति नाम तुम्हारो लीन्हों ।
                    तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हों 

                    शेष रटत नित नाम तुम्हारा ।
                    महि को भार शीश पर धारा 

                    फूल समान रहत सो भारा ।
                    पावत कोउ न तुम्हरो पारा 

                    भरत नाम तुम्हरो उर धारो ।
                    तासों कबहुँ न रण में हारो 

                    नाम शत्रुहन हृदय प्रकाशा ।
                    सुमिरत होत शत्रु कर नाशा 

                    लषन तुम्हारे आज्ञाकारी ।
                    सदा करत सन्तन रखवारी 

                    ताते रण जीते नहिं कोई ।
                    युद्ध जुरे यमहूँ किन होई 

                    महा लक्ष्मी धर अवतारा ।
                    सब विधि करत पाप को छारा ॥ 20 ॥

                    सीता राम पुनीता गायो ।
                    भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो 

                    घट सों प्रकट भई सो आई ।
                    जाको देखत चन्द्र लजाई ॥

                    सो तुमरे नित पांव पलोटत ।
                    नवो निद्धि चरणन में लोटत 

                    सिद्धि अठारह मंगल कारी ।
                    सो तुम पर जावै बलिहारी 

                    औरहु जो अनेक प्रभुताई ।
                    सो सीतापति तुमहिं बनाई 

                    इच्छा ते कोटिन संसारा ।
                    रचत न लागत पल की बारा 

                    जो तुम्हरे चरनन चित लावै ।
                    ताको मुक्ति अवसि हो जावै 

                    सुनहु राम तुम तात हमारे ।
                    तुमहिं भरत कुल- पूज्य प्रचारे 

                    तुमहिं देव कुल देव हमारे ।
                    तुम गुरु देव प्राण के प्यारे 

                    जो कुछ हो सो तुमहीं राजा ।
                    जय जय जय प्रभु राखो लाजा ॥ 30 ॥

                    रामा आत्मा पोषण हारे ।
                    जय जय जय दशरथ के प्यारे 

                    जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरूपा ।
                    निगुण ब्रह्म अखण्ड अनूपा 

                    सत्य सत्य जय सत्य- ब्रत स्वामी ।
                    सत्य सनातन अन्तर्यामी 

                    सत्य भजन तुम्हरो जो गावै ।
                    सो निश्चय चारों फल पावै 

                    सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं ।
                    तुमने भक्तहिं सब सिद्धि दीन्हीं 

                    ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरूपा ।
                    नमो नमो जय जापति भूपा 

                    धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा ।
                    नाम तुम्हार हरत संतापा 

                    सत्य शुद्ध देवन मुख गाया ।
                    बजी दुन्दुभी शंख बजाया 

                    सत्य सत्य तुम सत्य सनातन ।
                    तुमहीं हो हमरे तन मन धन 

                    याको पाठ करे जो कोई ।
                    ज्ञान प्रकट ताके उर होई ॥ 40 ॥

                    आवागमन मिटै तिहि केरा ।
                    सत्य वचन माने शिव मेरा 

                    और आस मन में जो ल्यावै ।
                    तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै ॥

                    साग पत्र सो भोग लगावै ।
                    सो नर सकल सिद्धता पावै ॥

                    अन्त समय रघुबर पुर जाई ।
                    जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई ॥

                    श्री हरि दास कहै अरु गावै ।
                    सो वैकुण्ठ धाम को पावै ॥

                    ॥ दोहा ॥
                    सात दिवस जो नेम कर पाठ करे चित लाय ।
                    हरिदास हरिकृपा से अवसि भक्ति को पाय ॥

                    राम चालीसा जो पढ़े रामचरण चित लाय ।
                    जो इच्छा मन में करै सकल सिद्ध हो जाय 

                    || Ram Chalisa PDF ||

                    ॥ Doha॥
                    aadau raam tapovanaadi gamanan hatvaah mrg kaanchanan
                    vaidehee haranan jataayu maranan sugreev sambhaashanan

                    baali nirdalan samudr taranan lankaapuree dahanam
                    pashchadravanan kumbhakarnan hanaanan etaddhi raamaayanan

                    ॥ Chaupaee ॥
                    shree raghubeer bhakt hitakaaree॥
                    suni leejai prabhu araj hamaaree॥

                    nishi din dhyaan dharai jo koee॥
                    ta sam bhakt aur nahin hoi॥

                    dhyaan dhare shivajee man maaheen॥
                    brahma indr paar nahin paahin॥

                    jay jay jay krpaala॥
                    sada karo santan pratipaala ॥

                    doot tumhaara veer hanumaana॥
                    jaasu prabhaav tihoon pur jaana॥

                    tuv bhujadand prachand krpaala॥
                    raavan maari suran pratipaala॥

                    tum anaath ke naath gosaeen॥
                    deen ke ho sada sahaee॥

                    brahmaadik tav paar na paavain॥
                    sada eesh tumharo yash gaavain॥

                    chaariu ved bharat hain saakhee॥
                    tuman bhaktan kee lajja raakhi॥

                    gun gaavat sharad man maaheen॥
                    surapati taako paar na paahin ॥ 10॥

                    naam tumhaara let jo koee॥
                    ta sam dhany aur nahin hoi॥

                    raam naam aparampaar hai॥
                    chaarihu vedan jaahi pukaara ॥

                    ganapati naam tumharo leenhon॥
                    tinako pratham poojy tum kinhon॥

                    shesh ratat nit naam ॥
                    mahi ko bhaar sheesh par dhaara॥

                    phool samaan rahat so bhara॥
                    paavat kou na tummharo paara॥

                    bharat naam tummharo ur dharo॥
                    taason kahahun na ran mein haaro॥

                    naam shatruhan hrday prakaasha॥
                    sumirat hot shatru kar naasha॥

                    lashanaafe izozakaaree॥
                    sada karat santan rakhavaaree॥

                    taate ran jeete nahin koee॥
                    yuddh jure yamahoon kin hoi॥

                    maha lakshmee dhara avataar॥
                    sab vidhi karat paap ko haara ॥ 20॥

                    seeta raam puniya gaayo॥
                    babeeree prabhaavo ॥

                    ghat son prakat bhee so aaee॥
                    jaako dekhat chandr laajai॥

                    so tumare nit palot॥
                    navo nidhi charanon mein lotat ॥

                    siddhi terah mangal kaaree॥
                    so tum par jaavai balihaaree॥

                    aurahu jo anek prabhutaee॥
                    so seetaapati tumahin nirmit॥

                    ichchha te kotin sansaara॥
                    rachat na laagat pal kee baara ॥

                    jo tumhaare charanan chit laavai॥
                    taako mukti avasi ho jaavai॥

                    sunahu raam tum taat hamaare॥
                    tumahin bharat kul-poojy prachaare॥

                    tumahin dev kul dev hamaare॥
                    tum guru dev praan ke pyaare॥

                    jo kuchh ho so tumheen raaja॥
                    jay jay jay prabhu raakho laaja ॥ 30॥

                    raama aatma poshan haare॥
                    jay jay jayamishaal ke pyaare ॥

                    jay jay jay prabhu jyoti svaroopa॥
                    nigun brahm akhand anupama ॥

                    saty saty jay saty – brat svaamee॥
                    saty sanaatan antaryaamee॥

                    saty bhajan tummharo jo gaavai॥
                    so saaye chaaron or phal paavai॥

                    saty shapath gaureepati keenheen॥
                    ho bhaktahin sab siddhi deenheen॥

                    gyaan hrday do gyaan svaroopa॥
                    namo namo jay japati bhoopa॥

                    dhany dhany tum dhany prataapa॥
                    naam tumhaara harat santaapa॥

                    saty shuddh devan mukh gaya॥
                    baji dundubhi shankh bajaaya ॥

                    saty saty tum saty sanaatan॥
                    tumheen ho hamaare tan man dhan॥

                    yaako paath kare jo koee॥
                    gyaan prakat taake ur hoee ॥ 40॥

                    siddhaant mitai tihi kera॥
                    saty vachan maane shiv mera ॥

                    aur aas man mein jo lyaavai॥
                    tulasee aru phool chadhaavai॥

                    saaga patr so bhog lagaavai॥
                    so nar sakal siddhata paavai॥

                    ant samay raghubar pur jaee॥
                    jahaan janm hari bhakt kahaee॥

                    shree hari daas kahai aru gaavai॥
                    so vaikunth dhaam ko paavai॥

                    ॥ Doha॥
                    saat din jo nem kar paath kare chit laay॥
                    haridaas harikrpa se avasi bhakti ko paay॥

                    raam chaaleesa jo padhe raamacharan chit laay॥
                    jo chaah man mein karai sakal siddh ho jaay॥


                    राम चालीसा के लाभ

                    राम चालीसा (Ram Chalisa) हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है जो भगवान राम की आराधना और भक्ति को समर्पित है। यह 40 श्लोकों (चालीसा) का एक संग्रह है, जिसे तुलसीदास जी ने लिखा है। राम चालीसा का पाठ करने के कई लाभ होते हैं जो धार्मिक, मानसिक, और सामाजिक पहलुओं पर प्रभाव डालते हैं। नीचे हम इसके लाभों को विस्तार से समझेंगे।

                    राम चालीसा के लाभ:

                    भक्ति और श्रद्धा की वृद्धि:

                    राम चालीसा का पाठ व्यक्ति के दिल में भगवान राम के प्रति असीम श्रद्धा और भक्ति को उत्पन्न करता है। जब लोग नियमित रूप से राम चालीसा का पाठ करते हैं, तो वे भगवान राम की दिव्यता और उनके आदर्शों से प्रेरित होते हैं। इससे व्यक्ति की धार्मिक भावना और आध्यात्मिकता में वृद्धि होती है।

                    आध्यात्मिक शांति और मानसिक संतुलन:

                    राम चालीसा के नियमित पाठ से मानसिक शांति मिलती है। जब व्यक्ति भगवान राम के गुणों का ध्यान करता है, तो उसकी चिंताओं और मानसिक तनाव में कमी होती है। यह मानसिक शांति और संतुलन को बढ़ावा देता है, जिससे व्यक्ति अधिक खुशहाल और संतुष्ट महसूस करता है।

                    आध्यात्मिक सुरक्षा और सुकून:

                    राम चालीसा में भगवान राम के विभिन्न गुण और उनकी रक्षा की शक्ति का वर्णन है। इसे पढ़ने से व्यक्ति को मानसिक और आत्मिक सुरक्षा का अनुभव होता है। यह विश्वास उत्पन्न करता है कि भगवान राम उसके साथ हैं और उसे हर कठिनाई से उबारने की शक्ति रखते हैं।

                    सकारात्मक ऊर्जा का संचार:

                    राम चालीसा का पाठ करते समय व्यक्ति के आसपास सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इसके मंत्रों और श्लोकों के उच्चारण से वातावरण में सकारात्मकता फैलती है, जो व्यक्ति की आत्मिक उन्नति के लिए लाभकारी है।

                    भय और चिंता से मुक्ति:

                    राम चालीसा का पाठ व्यक्ति के मन से भय और चिंता को दूर करने में सहायक होता है। भगवान राम की शक्ति और उनकी सुरक्षा के प्रति विश्वास रखने से व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में भी साहस और धैर्य मिलता है।

                    जीवन में सफलता और समृद्धि:

                    राम चालीसा का नियमित पाठ करने से जीवन में सफलता और समृद्धि की प्राप्ति होती है। भगवान राम की कृपा से व्यक्ति को अपने कर्मों में सफलता प्राप्त होती है और जीवन के लक्ष्यों को हासिल करने में मदद मिलती है।

                    सकारात्मक सोच और आत्म-विश्वास में वृद्धि:

                    राम चालीसा के पाठ से व्यक्ति की सोच सकारात्मक होती है और आत्म-विश्वास बढ़ता है। भगवान राम के आदर्शों और उनके जीवन से प्रेरित होकर व्यक्ति अपनी समस्याओं का सामना बेहतर तरीके से कर सकता है।

                    धार्मिक अनुष्ठान और पूजा में सहायक:

                    राम चालीसा को पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों में विशेष महत्व दिया जाता है। इसे पढ़ने से पूजा का प्रभाव बढ़ता है और भगवान राम की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह धार्मिक अनुष्ठानों को सफल और प्रभावशाली बनाता है।

                    परिवार में शांति और सौहार्द:

                    राम चालीसा का पाठ परिवार के सभी सदस्य मिलकर करें, तो इससे घर में शांति और सौहार्द बना रहता है। यह पारिवारिक संबंधों को सुदृढ़ करता है और घर में सुख-शांति की भावना को बढ़ाता है।

                    आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष की प्राप्ति:

                    राम चालीसा का पाठ व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होता है। भगवान राम की भक्ति से मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग सरल होता है। यह व्यक्ति को आत्मज्ञान की ओर प्रेरित करता है और उसके जीवन की अंतिम यात्रा को सरल बनाता है।

                    संपत्ति और धन-वैभव में वृद्धि:

                    राम चालीसा का पाठ आर्थिक स्थिति में सुधार लाने में भी सहायक हो सकता है। भगवान राम की कृपा से व्यक्ति को धन, संपत्ति, और वैभव की प्राप्ति होती है। यह व्यक्ति की आर्थिक समृद्धि को बढ़ावा देता है और उसके जीवन में प्रचुरता लाता है।

                    स्वास्थ्य और दीर्घायु:

                    राम चालीसा का पाठ स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाता है। भगवान राम की कृपा से व्यक्ति स्वस्थ और दीर्घायु होता है। यह मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करता है और जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाता है।

                    नैतिक और चारित्रिक सुधार:

                    राम चालीसा का पाठ व्यक्ति के नैतिक और चारित्रिक गुणों में सुधार लाता है। भगवान राम के आदर्श और उनके जीवन के उदाहरणों से व्यक्ति में ईमानदारी, सत्यता, और नैतिकता की भावना विकसित होती है।

                    कर्मों के फल को सुधारना:

                    राम चालीसा के नियमित पाठ से व्यक्ति के बुरे कर्मों का प्रभाव कम हो जाता है और अच्छे कर्मों का फल अधिक मिलता है। यह व्यक्ति को अच्छे कर्मों की ओर प्रेरित करता है और उसके जीवन को सकारात्मक दिशा में ले जाता है।

                    सामाजिक संबंधों में सुधार:

                    राम चालीसा का पाठ सामाजिक संबंधों में भी सुधार लाता है। व्यक्ति में विनम्रता, सहानुभूति, और समझदारी की भावना बढ़ती है, जिससे उसके सामाजिक रिश्ते मजबूत होते हैं और समाज में सम्मान प्राप्त होता है।

                    परिवार के लिए आशिर्वाद:

                    राम चालीसा का पाठ परिवार के सभी सदस्य मिलकर करें, तो इससे परिवार के लिए विशेष आशिर्वाद प्राप्त होते हैं। यह परिवार में सुख, समृद्धि, और खुशहाली लाने में सहायक होता है।

                    धार्मिक अडिगता और अनुशासन:

                    राम चालीसा का नियमित पाठ व्यक्ति में धार्मिक अडिगता और अनुशासन को बढ़ावा देता है। यह व्यक्ति को नियमित पूजा-पाठ की आदत डालता है और धार्मिक अनुशासन को बनाए रखता है।

                    संकटों का समाधान:

                    राम चालीसा का पाठ संकटों और कठिनाइयों से उबरने में मदद करता है। भगवान राम की कृपा से व्यक्ति की समस्याओं का समाधान होता है और वह जीवन की चुनौतियों का सामना बेहतर तरीके से कर पाता है।

                    आध्यात्मिक यात्रा में मार्गदर्शन:

                    राम चालीसा व्यक्ति की आध्यात्मिक यात्रा में मार्गदर्शन करता है। यह उसे सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है और उसके आध्यात्मिक उद्देश्य को प्राप्त करने में सहायता करता है।

                    प्रेरणा और उत्साह:

                    राम चालीसा का पाठ व्यक्ति को जीवन में प्रेरणा और उत्साह प्रदान करता है। भगवान राम के आदर्शों और उनकी शक्ति से प्रेरित होकर व्यक्ति अपने जीवन को सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ाता है।

                    राम चालीसा का नियमित पाठ व्यक्ति के जीवन को एक नई दिशा और अर्थ प्रदान करता है। यह न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है बल्कि मानसिक, सामाजिक, और भौतिक लाभ भी प्रदान करता है। इसके माध्यम से व्यक्ति भगवान राम की भक्ति और कृपा का अनुभव करता है और अपने जीवन को सुधारने के प्रयास में लगा रहता है।

                    विश्वकर्मा चालीसा – Vishwakarma Chalisa PDF 2024-25

                    विश्वकर्मा चालीसा (Vishwakarma Chalisa Pdf) एक पवित्र ग्रंथ है जो भगवान विश्वकर्मा की महिमा और उनके दिव्य कार्यों का वर्णन करता है। भगवान विश्वकर्मा को संसार का प्रथम इंजीनियर और वास्तुकार माना जाता है। वह निर्माण और सृजन के देवता हैं, और उनकी पूजा विशेष रूप से शिल्पकारों, इंजीनियरों, और निर्माण कार्य से जुड़े लोगों द्वारा की जाती है।

                    विश्वकर्मा चालीसा में भगवान विश्वकर्मा के गुण, उनके द्वारा किए गए महान कार्यों और उनके आशीर्वाद के महत्व का विस्तृत वर्णन होता है। इस चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को अपने कार्यों में सफलता, समृद्धि और शांति की प्राप्ति होती है। यह माना जाता है कि विश्वकर्मा चालीसा के नियमित पाठ से कार्यों में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

                    विश्वकर्मा चालीसा का पाठ विशेष रूप से विश्वकर्मा जयंती के अवसर पर किया जाता है, जो हर वर्ष भारतीय पंचांग के अनुसार कन्या संक्रांति के दिन मनाई जाती है। इस दिन शिल्पकार और निर्माण कार्य से जुड़े लोग अपने उपकरणों और कार्यस्थलों की पूजा करते हैं और भगवान विश्वकर्मा से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

                    विश्वकर्मा चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और हर कार्य में सफलता प्राप्त होती है।



                    • हिंदी / संस्कृत
                    • English

                    || विश्वकर्मा चालीसा ||

                    ॥ दोहा ॥
                    श्री विश्वकर्म प्रभु वन्दऊं,
                    चरणकमल धरिध्यान ।
                    श्री, शुभ, बल अरु शिल्पगुण,
                    दीजै दया निधान ॥

                    ॥ चौपाई ॥
                    जय श्री विश्वकर्म भगवाना ।
                    जय विश्वेश्वर कृपा निधाना ॥

                    शिल्पाचार्य परम उपकारी ।
                    भुवना-पुत्र नाम छविकारी ॥

                    अष्टमबसु प्रभास-सुत नागर ।
                    शिल्पज्ञान जग कियउ उजागर ॥

                    अद्भुत सकल सृष्टि के कर्ता ।
                    सत्य ज्ञान श्रुति जग हित धर्ता ॥ ४ ॥

                    अतुल तेज तुम्हतो जग माहीं ।
                    कोई विश्व मंह जानत नाही ॥

                    विश्व सृष्टि-कर्ता विश्वेशा ।
                    अद्भुत वरण विराज सुवेशा ॥

                    एकानन पंचानन राजे ।
                    द्विभुज चतुर्भुज दशभुज साजे ॥

                    चक्र सुदर्शन धारण कीन्हे ।
                    वारि कमण्डल वर कर लीन्हे ॥ ८ ॥

                    शिल्पशास्त्र अरु शंख अनूपा ।
                    सोहत सूत्र माप अनुरूपा ॥

                    धनुष बाण अरु त्रिशूल सोहे ।
                    नौवें हाथ कमल मन मोहे ॥

                    दसवां हस्त बरद जग हेतु ।
                    अति भव सिंधु मांहि वर सेतु ॥

                    सूरज तेज हरण तुम कियऊ ।
                    अस्त्र शस्त्र जिससे निरमयऊ ॥ १२ ॥

                    चक्र शक्ति अरू त्रिशूल एका ।
                    दण्ड पालकी शस्त्र अनेका ॥

                    विष्णुहिं चक्र शूल शंकरहीं ।
                    अजहिं शक्ति दण्ड यमराजहीं ॥

                    इंद्रहिं वज्र व वरूणहिं पाशा ।
                    तुम सबकी पूरण की आशा ॥

                    भांति-भांति के अस्त्र रचाए ।
                    सतपथ को प्रभु सदा बचाए ॥ १६ ॥

                    अमृत घट के तुम निर्माता ।
                    साधु संत भक्तन सुर त्राता ॥

                    लौह काष्ट ताम्र पाषाणा ।
                    स्वर्ण शिल्प के परम सजाना ॥

                    विद्युत अग्नि पवन भू वारी ।
                    इनसे अद्भुत काज सवारी ॥

                    खान-पान हित भाजन नाना ।
                    भवन विभिषत विविध विधाना ॥ २० ॥

                    विविध व्सत हित यत्रं अपारा ।
                    विरचेहु तुम समस्त संसारा ॥

                    द्रव्य सुगंधित सुमन अनेका ।
                    विविध महा औषधि सविवेका ॥

                    शंभु विरंचि विष्णु सुरपाला ।
                    वरुण कुबेर अग्नि यमकाला ॥

                    तुम्हरे ढिग सब मिलकर गयऊ ।
                    करि प्रमाण पुनि अस्तुति ठयऊ ॥ २४ ॥

                    भे आतुर प्रभु लखि सुर-शोका ।
                    कियउ काज सब भये अशोका ॥

                    अद्भुत रचे यान मनहारी ।
                    जल-थल-गगन मांहि-समचारी ॥

                    शिव अरु विश्वकर्म प्रभु मांही ।
                    विज्ञान कह अंतर नाही ॥

                    बरनै कौन स्वरूप तुम्हारा ।
                    सकल सृष्टि है तव विस्तारा ॥ २८ ॥

                    रचेत विश्व हित त्रिविध शरीरा ।
                    तुम बिन हरै कौन भव हारी ॥

                    मंगल-मूल भगत भय हारी ।
                    शोक रहित त्रैलोक विहारी ॥

                    चारो युग परताप तुम्हारा ।
                    अहै प्रसिद्ध विश्व उजियारा ॥

                    ऋद्धि सिद्धि के तुम वर दाता ।
                    वर विज्ञान वेद के ज्ञाता ॥ ३२ ॥

                    मनु मय त्वष्टा शिल्पी तक्षा ।
                    सबकी नित करतें हैं रक्षा ॥

                    पंच पुत्र नित जग हित धर्मा ।
                    हवै निष्काम करै निज कर्मा ॥

                    प्रभु तुम सम कृपाल नहिं कोई ।
                    विपदा हरै जगत मंह जोई ॥

                    जै जै जै भौवन विश्वकर्मा ।
                    करहु कृपा गुरुदेव सुधर्मा ॥ ३६ ॥

                    इक सौ आठ जाप कर जोई ।
                    छीजै विपत्ति महासुख होई ॥

                    पढाहि जो विश्वकर्म-चालीसा ।
                    होय सिद्ध साक्षी गौरीशा ॥

                    विश्व विश्वकर्मा प्रभु मेरे ।
                    हो प्रसन्न हम बालक तेरे ॥

                    मैं हूं सदा उमापति चेरा ।
                    सदा करो प्रभु मन मंह डेरा ॥ ४० ॥

                    ॥ दोहा ॥
                    करहु कृपा शंकर सरिस,
                    विश्वकर्मा शिवरूप ।
                    श्री शुभदा रचना सहित,
                    ह्रदय बसहु सूर भूप ॥

                    || Vishwakarma Chalisa PDF ||

                    ॥ Doha ॥
                    shree vishvakarm prabhu vandan,
                    charanakamal hrdayadhyaan ॥
                    shree, shubh, bal aru shilpagun,
                    deejai daya nidhaan ॥

                    ॥ Chaupaee ॥
                    jay shree vishvakarm bhagavaana ॥
                    jay vishveshvar krpa nidhaan ॥

                    shilpaachaary param upakaaree ॥
                    bhuvana-putr naamakaran chhavi ॥

                    ashtamabasu prabhaas-sut naaga ॥
                    shilpagyaan jag kiyau sampark ॥

                    adbhut sakal srshti ke karta ॥
                    saty gyaan shruti jag hit dharata ॥ 4 ॥

                    atul tej tumhato jag maaheen ॥
                    koee vishv manh jaanat nahin ॥

                    vishv rachana-karta vishvesha ॥
                    adbhut varan viraj suvesha ॥

                    ekaanan panchaanan raaje ॥
                    dvibhuj chaturbhuj dashabhuj saaje ॥

                    chakr sudarshan dhaaran keenhe ॥
                    vaari kamandal var kar leenhe ॥ 8 ॥

                    shilpashaastr aru shankh anoopa ॥
                    sohat sootr sootr ॥

                    dhanuraashi baan aru trishool sohe ॥
                    nauven haath kamal man mohe ॥

                    dasavaan hast barad jag thai ॥
                    ati bhav sindhu maanhi var setu ॥

                    sooraj tej haran tum kiyau ॥
                    astr shastr nirmit nirmayau ॥ 12 ॥

                    chakr shakti aroo trishool eka ॥
                    dand paalakee shastr aneka ॥

                    vishnuhin chakr shul shankarahin ॥
                    ajahin shakti dand yamaraajahin ॥

                    indrahin vajr va varunahin paasha ॥
                    sanstha tum pooran kee aasha ॥

                    parivaar-bhakti ke astr rachae ॥
                    satapath ko prabhu sada bachae ॥ 16 ॥

                    amrt ​​ghaat ke tum nirmaata ॥
                    saadhu sant bhaktan sur traata ॥

                    loh kaasht taamr paashaan: ॥
                    svarn shilp ke param alankaran ॥

                    vidyut agni pavan bhoo vaaree ॥
                    jeens adbhut kaaj savaaree ॥

                    khaan-paan hit bhajan naana ॥
                    bhavan vividh vibhakti ॥ 20 ॥

                    vividh vasat hit yaatraan apaara ॥
                    virachehu tum sab sansaara ॥

                    dravy rasaayan suman anya ॥
                    vividh mahaaushadhi saviveka ॥

                    shambhu viranchi vishnu surapaala ॥
                    varun kuber agni yamakaala ॥

                    tumhare dhig sab milakar gayau ॥
                    kari pramaan puni astuti thayau ॥ 24 ॥

                    bhe aatur prabhu lakhi sur-shoka ॥
                    kiyau kaaj sab bhaye ashoka ॥

                    adbhut raache yaan manahaaree ॥
                    jal-thal-gagan maanhi-samaachaaree ॥

                    shiv aru vishvakarm prabhu maanhee ॥
                    kah vigyaan antar nahin ॥

                    baranai kaun svaroop lipi ॥
                    sakal srshti tav vistaara ॥ 28 ॥

                    rachet vishv hit trividh shareera ॥
                    tum bin harai kaun bhav haaree ॥

                    mangal- mool bhaagy bhay haaree ॥
                    shok anupayogeetrailok vihaaree ॥

                    chaaro yug prataapee gareeb ॥
                    ahai prasiddh vishv ujiyaara ॥

                    rddhi siddhi ke tum var daata ॥
                    var vigyaan ved ke gyaata ॥ 32 ॥

                    manu may tvashta shilpee taksha ॥
                    bhagavaan nit karate hain raksha ॥

                    panch putr nit jag hit dharma ॥
                    havai nishkaam karai nij karm ॥

                    prabhu tum sam krpaal nahin koee ॥
                    vipada harai jagat manh joee ॥

                    jay jay jay bhavan nirmaanakarta ॥
                    karahu krpa gurudev suraamama ॥ 36॥

                    ik sau aath jap kar joee ॥
                    chhinai vipatti mahaasukh hoi ॥

                    padhaahi jo vishvakarm-chaaleesa ॥
                    hoy siddh saakshee gaureesha ॥

                    vishv vaastushilp prabhu mere ॥
                    ho manoranjak ham baalak tere ॥

                    main hoon sada umaapati chera ॥
                    sada karo prabhu man manh ॥ 40 ॥

                    ॥ Doha ॥
                    karahu krpa shankar saris,
                    shivaroop ॥
                    shree shubhada rachana sahit,
                    hari basahu soor bhoop ॥


                    विश्वकर्मा चालीसा के लाभ

                    विश्वकर्मा चालीसा एक धार्मिक स्तोत्र है, जिसे भगवान विश्वकर्मा की पूजा के दौरान पढ़ा जाता है। भगवान विश्वकर्मा को वास्तु, निर्माण और कला के देवता के रूप में पूजा जाता है। यह चालीसा भगवान विश्वकर्मा की आराधना और उनके आशीर्वाद की प्राप्ति के लिए पढ़ी जाती है। इस लेख में हम विश्वकर्मा चालीसा के लाभों को विस्तार से समझेंगे और इसके महत्व को जानेंगे।

                    1. मानसिक शांति और संतुलन: विश्वकर्मा चालीसा का नियमित पाठ मानसिक शांति और संतुलन प्रदान करता है। यह चालीसा भगवान विश्वकर्मा की भक्ति में एक साधना का रूप है, जो व्यक्ति की चिंताओं और तनाव को दूर करने में सहायक होती है। जब व्यक्ति चालीसा का पाठ करता है, तो उसका ध्यान ईश्वर की ओर केन्द्रित होता है, जिससे मानसिक स्थिति स्थिर होती है।

                    2. जीवन में सफलता और समृद्धि: भगवान विश्वकर्मा को निर्माण और वास्तुकला का देवता माना जाता है। उनकी चालीसा का पाठ करने से जीवन में समृद्धि और सफलता प्राप्त होती है। यह विशेष रूप से उन लोगों के लिए फायदेमंद है जो किसी निर्माण कार्य, व्यवसाय या कला के क्षेत्र में सफल होना चाहते हैं। भगवान विश्वकर्मा की कृपा से कार्य में विघ्न नहीं आता और सफलता मिलती है।

                    3. व्यवसाय और कामकाज में वृद्धि: विश्वकर्मा चालीसा का पाठ व्यवसाय और कामकाज में वृद्धि के लिए भी लाभकारी होता है। जो लोग व्यापार या किसी अन्य पेशेवर क्षेत्र में हैं, वे इस चालीसा का पाठ करके अपने व्यवसाय में वृद्धि और प्रगति की कामना कर सकते हैं। भगवान विश्वकर्मा की कृपा से उनके व्यापार में बाधाएं कम होती हैं और सफलता प्राप्त होती है।

                    4. निर्माण और वास्तु संबंधी समस्याओं का समाधान: भगवान विश्वकर्मा को निर्माण और वास्तु के देवता माना जाता है। इसलिए, जिन लोगों के घर या व्यवसायिक स्थलों पर निर्माण या वास्तु संबंधी समस्याएं हैं, वे विश्वकर्मा चालीसा का पाठ करके इन समस्याओं का समाधान प्राप्त कर सकते हैं। यह चालीसा स्थान की सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाती है और निर्माण कार्य में सुधार करती है।

                    5. भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति: विश्वकर्मा चालीसा का नियमित पाठ व्यक्ति की भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होता है। यह चालीसा न केवल व्यक्ति के जीवन में भौतिक समृद्धि लाती है, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति में भी योगदान करती है। यह व्यक्ति को ईश्वर के प्रति श्रद्धा और भक्ति का अहसास कराती है और उसकी आत्मा को शांति प्रदान करती है।

                    6. समस्याओं और संकटों का निवारण: विश्वकर्मा चालीसा का पाठ संकट और समस्याओं का निवारण करने में भी सहायक होता है। जब व्यक्ति के जीवन में कोई बड़ा संकट या समस्या उत्पन्न होती है, तो इस चालीसा का पाठ करके वह भगवान विश्वकर्मा की कृपा प्राप्त कर सकता है। यह चालीसा कठिन समय में आशा और समर्थन प्रदान करती है।

                    7. सकारात्मक ऊर्जा का संचार: विश्वकर्मा चालीसा का पाठ घर या कार्यस्थल पर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। यह चालीसा घर के वातावरण को सकारात्मक और शांतिपूर्ण बनाती है। जब परिवार के सदस्य या कर्मचारी चालीसा का पाठ करते हैं, तो यह सभी के मन को शांति और संतुलन प्रदान करती है।

                    8. कठिन कार्यों में सफलता: कठिन और चुनौतीपूर्ण कार्यों में सफलता प्राप्त करने के लिए विश्वकर्मा चालीसा का पाठ किया जा सकता है। भगवान विश्वकर्मा की कृपा से व्यक्ति को कठिन कार्यों में सफलता प्राप्त होती है और उसकी मेहनत रंग लाती है। यह चालीसा साहस और आत्मविश्वास बढ़ाने में भी मदद करती है।

                    9. धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व: विश्वकर्मा चालीसा का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी है। यह चालीसा भगवान विश्वकर्मा की आराधना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और भारतीय संस्कृति में इसका विशेष स्थान है। चालीसा का पाठ भारतीय धार्मिकता और संस्कृति की गहराई को दर्शाता है।

                    10. सामूहिक आराधना और सहयोग: विश्वकर्मा चालीसा का सामूहिक पाठ भी बहुत लाभकारी होता है। जब लोग मिलकर इस चालीसा का पाठ करते हैं, तो इससे समाज में एकता और सहयोग की भावना उत्पन्न होती है। यह सामूहिक आराधना लोगों को एक साथ लाती है और समाज में एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।

                    11. व्यक्तिगत और पारिवारिक संबंधों में सुधार: विश्वकर्मा चालीसा का पाठ व्यक्तिगत और पारिवारिक संबंधों में सुधार लाने में भी सहायक होता है। यह चालीसा परिवार के सदस्यों के बीच एकता और प्रेम को बढ़ावा देती है और पारिवारिक समस्याओं का समाधान करती है। जब परिवार के सदस्य मिलकर चालीसा का पाठ करते हैं, तो इससे उनके संबंधों में सुधार होता है और परिवार में शांति और सुख का वातावरण बनता है।

                    12. धार्मिक शिक्षा और प्रेरणा: विश्वकर्मा चालीसा धार्मिक शिक्षा और प्रेरणा का भी स्रोत है। यह चालीसा व्यक्ति को धार्मिकता और ईश्वर के प्रति भक्ति की प्रेरणा देती है। यह व्यक्ति को सही मार्ग पर चलने और अपने कर्तव्यों को निभाने की प्रेरणा देती है।

                    13. यथार्थवादी दृष्टिकोण और सकारात्मक सोच: चालीसा का नियमित पाठ व्यक्ति को यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाने और सकारात्मक सोच विकसित करने में मदद करता है। जब व्यक्ति भगवान विश्वकर्मा की आराधना करता है, तो उसकी सोच सकारात्मक होती है और वह अपने जीवन की चुनौतियों का सामना धैर्य और साहस के साथ करता है।

                    14. स्वास्थ्य और कल्याण: विश्वकर्मा चालीसा का पाठ स्वास्थ्य और कल्याण के लिए भी लाभकारी होता है। यह चालीसा व्यक्ति की मानसिक और भावनात्मक स्थिति को संतुलित करती है, जिससे शारीरिक स्वास्थ्य में भी सुधार होता है। जब व्यक्ति मानसिक रूप से शांत और संतुलित होता है, तो इसका प्रभाव उसके शारीरिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।

                    15. समर्पण और भक्ति की भावना: विश्वकर्मा चालीसा का पाठ व्यक्ति में समर्पण और भक्ति की भावना को बढ़ाता है। यह चालीसा व्यक्ति को भगवान विश्वकर्मा के प्रति अपनी भक्ति और श्रद्धा को व्यक्त करने का अवसर प्रदान करती है।

                    विश्वकर्मा चालीसा के लाभ कई प्रकार के होते हैं, जो व्यक्ति के जीवन के विभिन्न पहलुओं को सुधारने में सहायक होते हैं। यह चालीसा मानसिक शांति, समृद्धि, सफलता, सकारात्मक ऊर्जा, और भक्ति का स्रोत है। इसके नियमित पाठ से व्यक्ति अपने जीवन में सुख, शांति, और सफलता प्राप्त कर सकता है।

                    इस प्रकार, विश्वकर्मा चालीसा न केवल धार्मिक आस्था का हिस्सा है, बल्कि यह व्यक्ति के जीवन को समृद्ध और सफल बनाने में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

                    चित्रगुप्त चालीसा – Chitragupt Chalisa PDF 2024-25

                    चित्रगुप्त चालीसा (Chitragupt Chalisa Pdf) एक भक्ति स्तोत्र है जो चित्रगुप्त भगवान को समर्पित है। चित्रगुप्त भगवान, जिन्हें यमराज के लेखनीधारी और लेखक माना जाता है, को इस चालीसा के माध्यम से भक्तों द्वारा पूजा और स्तुति की जाती है। चित्रगुप्त चालीसा में उनकी दिव्यता, कार्यक्षमता, और उनके द्वारा मानव जीवन के कर्मों का निरीक्षण करने की महिमा का वर्णन होता है। आप हमारी वेबसाइट में हनुमान चालीसा और हनुमान अमृतवाणी भी पढ़ सकते हैं।

                    यह चालीसा उन भक्तों के लिए विशेष महत्व रखती है जो धर्म, न्याय, और कर्म के महत्व को समझते हैं और चित्रगुप्त भगवान की कृपा और अनुग्रह में विश्वास रखते हैं। चित्रगुप्त चालीसा के पाठ से भक्तों को न्याय, सत्यता, और कर्मफल की महत्वपूर्णता का अनुभव होता है।

                    इस चालीसा में चित्रगुप्त भगवान के विभिन्न स्वरूपों, उनके कार्यों की महिमा, और उनके द्वारा सम्पन्न किए गए कर्मों के फल का वर्णन किया गया है। चित्रगुप्त चालीसा के पाठ से भक्तों का मन शुद्ध होता है, उन्हें कर्मफल के लिए सच्चाई और न्याय का पाठ होता है और उनके जीवन में समृद्धि और सफलता का संचार होता है।

                    चित्रगुप्त चालीसा का नियमित पाठ विशेष रूप से पितृ पक्ष के अवसर पर किया जाता है, जिससे भक्तों को चित्रगुप्त भगवान की कृपा और पितृ श्राद्ध के अनुग्रह से लाभ मिलता है।


                    • हिंदी / संस्कृत
                    • English

                    || चित्रगुप्त चालीसा ||

                    ॥ दोहा ॥
                    सुमिर चित्रगुप्त ईश को, सतत नवाऊ शीश।
                    ब्रह्मा विष्णु महेश सह, रिनिहा भए जगदीश॥
                    करो कृपा करिवर वदन, जो सरशुती सहाय।
                    चित्रगुप्त जस विमलयश, वंदन गुरूपद लाय॥

                    ॥ चौपाई ॥
                    जय चित्रगुप्त ज्ञान रत्नाकर।
                    जय यमेश दिगंत उजागर॥

                    अज सहाय अवतरेउ गुसांई।
                    कीन्हेउ काज ब्रम्ह कीनाई॥

                    श्रृष्टि सृजनहित अजमन जांचा।
                    भांति-भांति के जीवन राचा॥

                    अज की रचना मानव संदर।
                    मानव मति अज होइ निरूत्तर॥ ४ ॥

                    भए प्रकट चित्रगुप्त सहाई।
                    धर्माधर्म गुण ज्ञान कराई॥

                    राचेउ धरम धरम जग मांही।
                    धर्म अवतार लेत तुम पांही॥

                    अहम विवेकइ तुमहि विधाता।
                    निज सत्ता पा करहिं कुघाता॥

                    श्रष्टि संतुलन के तुम स्वामी।
                    त्रय देवन कर शक्ति समानी॥ ८ ॥

                    पाप मृत्यु जग में तुम लाए।
                    भयका भूत सकल जग छाए॥

                    महाकाल के तुम हो साक्षी।
                    ब्रम्हउ मरन न जान मीनाक्षी॥

                    धर्म कृष्ण तुम जग उपजायो।
                    कर्म क्षेत्र गुण ज्ञान करायो॥

                    राम धर्म हित जग पगु धारे।
                    मानवगुण सदगुण अति प्यारे॥ १२ ॥

                    विष्णु चक्र पर तुमहि विराजें।
                    पालन धर्म करम शुचि साजे॥

                    महादेव के तुम त्रय लोचन।
                    प्रेरकशिव अस ताण्डव नर्तन॥

                    सावित्री पर कृपा निराली।
                    विद्यानिधि माँ सब जग आली॥

                    रमा भाल पर कर अति दाया।
                    श्रीनिधि अगम अकूत अगाया॥ २० ॥

                    ऊमा विच शक्ति शुचि राच्यो।
                    जाकेबिन शिव शव जग बाच्यो॥

                    गुरू बृहस्पति सुर पति नाथा।
                    जाके कर्म गहइ तव हाथा॥

                    रावण कंस सकल मतवारे।
                    तव प्रताप सब सरग सिधारे॥

                    प्रथम् पूज्य गणपति महदेवा।
                    सोउ करत तुम्हारी सेवा॥ २४ ॥

                    रिद्धि सिद्धि पाय द्वैनारी।
                    विघ्न हरण शुभ काज संवारी॥

                    व्यास चहइ रच वेद पुराना।
                    गणपति लिपिबध हितमन ठाना॥

                    पोथी मसि शुचि लेखनी दीन्हा।
                    असवर देय जगत कृत कीन्हा॥

                    लेखनि मसि सह कागद कोरा।
                    तव प्रताप अजु जगत मझोरा॥ २८ ॥

                    विद्या विनय पराक्रम भारी।
                    तुम आधार जगत आभारी॥

                    द्वादस पूत जगत अस लाए।
                    राशी चक्र आधार सुहाए॥

                    जस पूता तस राशि रचाना।
                    ज्योतिष केतुम जनक महाना॥

                    तिथी लगन होरा दिग्दर्शन।
                    चारि अष्ट चित्रांश सुदर्शन॥ ३२ ॥

                    राशी नखत जो जातक धारे।
                    धरम करम फल तुमहि अधारे॥

                    राम कृष्ण गुरूवर गृह जाई।
                    प्रथम गुरू महिमा गुण गाई॥

                    श्री गणेश तव बंदन कीना।
                    कर्म अकर्म तुमहि आधीना॥

                    देववृत जप तप वृत कीन्हा।
                    इच्छा मृत्यु परम वर दीन्हा॥ ३६ ॥

                    धर्महीन सौदास कुराजा।
                    तप तुम्हार बैकुण्ठ विराजा॥

                    हरि पद दीन्ह धर्म हरि नामा।
                    कायथ परिजन परम पितामा॥

                    शुर शुयशमा बन जामाता।
                    क्षत्रिय विप्र सकल आदाता॥

                    जय जय चित्रगुप्त गुसांई।
                    गुरूवर गुरू पद पाय सहाई॥ ४० ॥

                    जो शत पाठ करइ चालीसा।
                    जन्ममरण दुःख कटइ कलेसा॥

                    विनय करैं कुलदीप शुवेशा।
                    राख पिता सम नेह हमेशा॥

                    ॥ दोहा ॥
                    ज्ञान कलम, मसि सरस्वती, अंबर है मसिपात्र।
                    कालचक्र की पुस्तिका, सदा रखे दंडास्त्र॥
                    पाप पुन्य लेखा करन, धार्यो चित्र स्वरूप।
                    श्रृष्टिसंतुलन स्वामीसदा, सरग नरक कर भूप॥

                    ॥ इति श्री चित्रगुप्त चालीसा समाप्त॥

                    || Chitragupt Chalisa PDF ||

                    ॥ Doha ॥
                    sumir chitragupt eesh ko, satat navau sheesha ॥
                    brahma vishnu mahesh sah, riniha bhe jagadeesh ॥
                    karo krpa karivar vadan, jo sarashuti sahaayata ॥
                    chitragupt jas vimalayash, vandan gurupad laay ॥

                    ॥ Chaupaee ॥
                    jay chitragupt gyaan ratnaakar ॥
                    jay yamesh digant sparsh ॥

                    aj sahaayata avataareu gusaanee ॥
                    keenheu kaaj bramh keenai ॥

                    shrrshti rachanaahit ajaman jaancha ॥
                    parivaar-bhakti ke jeevan rachaaya ॥

                    aaj kee rachana maanav sandar ॥
                    maanav mati aj hoi niroottar ॥ 4 ॥

                    bhe prakat chitragupt sahaay ॥
                    dharmadharm gun gyaan kiya ॥

                    raacheu dharam dharam jag maanhi ॥
                    dharm avataar let tum paanhee ॥

                    aham viveki tumahi vidhaata ॥
                    nij satta pa karahin kughaata ॥

                    shrashti santulan ke tum svaamee ॥
                    tray devan kar shakti samaanee ॥ 8 ॥

                    paap kee maut jag mein tumhaaree kahaanee ॥
                    bhayaka bhoot sakal jag chhae ॥

                    mahaakaal ke tum hosaakshee ॥
                    bramhau maran na jaan meenaakshee ॥

                    dharm krshn tum jag upajaayo ॥
                    karm kshetr gun gyaan karaayo ॥

                    raam dharm hit jag pagu dhaare ॥
                    maanavagun sadagun ati priye ॥ 12 ॥

                    vishnu chakr par tumhee viraajen ॥
                    dharm karm shuchi saaje ॥

                    mahaadev ke tum tray lochan ॥
                    prerakashiv as taandav nartan ॥

                    saavitree par krpa niraalee ॥
                    vidyaanidhi maan sab jag alee ॥

                    raam bhaal par kar ati daya ॥
                    shreenidhi agam akoot aagaya ॥ 20 ॥

                    uma vich shakti shuchi rachyo ॥
                    jaakebin shiv shav jag bachyo ॥

                    guru brhaspati sur pati naatha ॥
                    jaake karm gahi tav haatha ॥

                    raavan kans sakal matavaare ॥
                    tav prataap sab sarag sidhaare ॥

                    pratham poojy ganapati mahaadeva ॥
                    sou karat vivaah seva ॥ 24 ॥

                    riddhi siddhi paay daivanaaree ॥
                    vighn haran shubh kaaj sanvaaree ॥

                    vyaas chaahi raach ved puraana ॥
                    ganapati lipibadh hitaman thaana ॥

                    pothee masi shuchi lekhi deenha ॥
                    asvar dey jagat krt keenha ॥

                    lekhani masi sah kaagad kora ॥
                    tav prataap aju jagat majhora ॥ 28 ॥

                    vidya vigy sambhaavit bhaaree ॥
                    aadhaar tum jagat stor ॥

                    dvaadas poot jagat as kaal ॥
                    raashi chakr aadhaar suhae ॥

                    jas poota tas raashi rachana ॥
                    jyotish ketum jan mahaana ॥

                    tithi lagn hora digdarshan ॥
                    chaari asht chitraansh sudarshan ॥ 32 ॥

                    raashi nakhat jo jaatak dhaare ॥
                    dharam karam phal tumahi adhaare ॥

                    raam krshn guruvar grh jaee ॥
                    pratham guru mahima gun gaay ॥

                    shree ganesh tav bandan keena ॥
                    karm akarm tumahi aadheena ॥

                    devavrt jap tap vrt keenha ॥
                    ichchha mrtyu param var deenha ॥ 36 ॥

                    dharmaheen saudaas kuraja ॥
                    tumhaara tap baikunth viha ॥

                    hari pad deenh dharm hari naama ॥
                    kaayath parivaar param pitaama ॥

                    shoor shuyashama ban jaamaata ॥
                    kshatriy vipr sakal adaata ॥

                    jay jay chitragupt gusaanee ॥
                    guruvar guru pad paay sahaee ॥ 40 ॥

                    jo shat paath karai chaaleesa ॥
                    janmamaran duhkh kati kalesa ॥

                    vinee karain boleen suvesha ॥
                    raakh pita sam neh sada ॥

                    ॥ Doha ॥
                    gyaan kamal, masi sarasvatee, ambar masipaatr hai ॥
                    kaalachakr kee pustika, sada tike dandashaastr ॥
                    paap puny lekha karan, dhaaryo chitr svaroop ॥
                    srshtisantulan svaameesada, sarg narak kar bhoop ॥

                    ॥ Iti Shree Chitragupt chaaleesa samaapt ॥




                    चित्रगुप्त चालीसा के लाभ

                    चित्रगुप्त चालीसा एक महत्वपूर्ण हिन्दू भजन है, जिसे चित्रगुप्त जी की पूजा के समय गाया जाता है। चित्रगुप्त जी, यमराज के सचिव और लेखाकार माने जाते हैं। उनका कार्य मृत्यु के बाद आत्माओं के कर्मों का लेखा-जोखा रखना है। इस चालीसा का पाठ धार्मिक और आध्यात्मिक लाभों से भरा हुआ है। यहाँ चित्रगुप्त चालीसा के लाभों को विस्तार से समझाने का प्रयास किया गया है।

                    कर्मों का लेखा-जोखा सही रहता है:

                    चित्रगुप्त जी की पूजा और चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के कर्मों का लेखा-जोखा सही ढंग से रखा जाता है। यह माना जाता है कि चित्रगुप्त जी उन लोगों की मदद करते हैं, जो सच्चे मन से अपनी गलतियों को स्वीकार करते हैं और सुधार करने की कोशिश करते हैं। इस प्रकार, चित्रगुप्त चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के कर्मों में शुद्धता और संतुलन बना रहता है।

                    धार्मिक अनुशासन:

                    चित्रगुप्त चालीसा का नियमित पाठ व्यक्ति में धार्मिक अनुशासन विकसित करता है। यह व्यक्ति को हर दिन एक निश्चित समय पर पूजा और ध्यान की आदत डालता है, जो जीवन में एक स्थिरता और अनुशासन प्रदान करता है। धार्मिक अनुशासन व्यक्ति की मानसिक स्थिति को बेहतर बनाता है और उसे शांति और संतुलन की ओर ले जाता है।

                    आध्यात्मिक उन्नति:

                    चालीसा का पाठ व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। चित्रगुप्त जी की आराधना से व्यक्ति को आध्यात्मिक दृष्टि प्राप्त होती है, जो उसकी मानसिक स्थिति को सशक्त बनाती है। इस प्रक्रिया के माध्यम से व्यक्ति आत्मज्ञान प्राप्त कर सकता है और अपने जीवन के गहरे अर्थ को समझ सकता है।

                    पापों का नाश:

                    चित्रगुप्त चालीसा का पाठ करने से पापों का नाश होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है। इस चालीसा का नियमित पाठ उन व्यक्तियों के लिए लाभकारी है जो अपने पूर्वजन्म के पापों से मुक्ति पाना चाहते हैं। यह माना जाता है कि चित्रगुप्त जी पापों का नाश करने में सहायता करते हैं और पुण्य की प्राप्ति में मदद करते हैं।

                    आर्थिक समृद्धि:

                    चित्रगुप्त जी की आराधना और चालीसा का पाठ आर्थिक समृद्धि और धन-धान्य की प्राप्ति में सहायक हो सकता है। यह माना जाता है कि चित्रगुप्त जी धन और समृद्धि के देवता हैं, और उनकी पूजा करने से व्यक्ति को आर्थिक कठिनाइयों से राहत मिल सकती है। चालीसा का पाठ करने से धन और समृद्धि के स्रोत खुल सकते हैं।

                    पारिवारिक सुख-शांति:

                    चित्रगुप्त चालीसा का नियमित पाठ पारिवारिक सुख-शांति में भी योगदान कर सकता है। परिवार के सभी सदस्यों के बीच संबंध बेहतर होते हैं और आपसी समझ में वृद्धि होती है। यह चालीसा परिवार में प्रेम और सहयोग का वातावरण बनाती है, जिससे पारिवारिक समस्याएं कम होती हैं और खुशी की भावना बढ़ती है।

                    स्वास्थ्य और सुरक्षा:

                    स्वास्थ्य और सुरक्षा के मामले में भी चित्रगुप्त चालीसा का पाठ लाभकारी हो सकता है। यह विश्वास है कि चित्रगुप्त जी भक्तों को सुरक्षित रखते हैं और उनके जीवन में स्वास्थ्य संबंधित समस्याओं से बचाते हैं। चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार हो सकता है।

                    मानसिक शांति और संतुलन:

                    चित्रगुप्त चालीसा का पाठ मानसिक शांति और संतुलन में भी सहायक होता है। जब व्यक्ति नियमित रूप से चालीसा का पाठ करता है, तो उसकी मानसिक स्थिति स्थिर रहती है और तनाव कम होता है। ध्यान और पूजा के दौरान मन की शांति बनी रहती है, जिससे जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं।

                    आध्यात्मिक सुरक्षा:

                    चित्रगुप्त जी की पूजा और चालीसा का पाठ आध्यात्मिक सुरक्षा प्रदान करता है। यह विश्वास किया जाता है कि चित्रगुप्त जी अपने भक्तों को आध्यात्मिक रूप से सुरक्षित रखते हैं और उन्हें नकारात्मक ऊर्जा और आत्मा की बुरी शक्तियों से बचाते हैं। यह आध्यात्मिक सुरक्षा व्यक्ति को मानसिक और भावनात्मक रूप से सशक्त बनाती है।

                    सच्चे भक्तों को सम्मान और पुरस्कार:

                    चित्रगुप्त चालीसा के पाठ से सच्चे भक्तों को सम्मान और पुरस्कार प्राप्त होते हैं। यह माना जाता है कि चित्रगुप्त जी उन भक्तों को विशेष पुरस्कार और आशीर्वाद प्रदान करते हैं जो सच्चे मन से उनकी पूजा और चालीसा का पाठ करते हैं। यह पुरस्कार व्यक्तिगत और आध्यात्मिक जीवन में सकारात्मक बदलाव लाते हैं।

                    चित्रगुप्त चालीसा का पाठ धार्मिक, आध्यात्मिक, और भौतिक लाभों से भरा हुआ है। यह व्यक्ति के जीवन को संतुलित, सुखी, और समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति को अपनी धार्मिक आस्था को मजबूत बनाने का अवसर मिलता है और उसके जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं।

                    नर्मदा चालीसा (Narmada Chalisa PDF)

                    नर्मदा चालीसा (Narmada Chalisa Pdf) एक भक्ति स्तोत्र है जो माँ नर्मदा को समर्पित है। माँ नर्मदा, जो नर्मदा नदी का देवता रूप मानी जाती हैं, को इस चालीसा के माध्यम से भक्तों द्वारा श्रद्धा और भक्ति के साथ स्मरण किया जाता है। नर्मदा चालीसा माँ नर्मदा की महिमा, उनकी दिव्यता और उनके आशीर्वाद का वर्णन करती है।

                    यह चालीसा उन भक्तों के लिए विशेष महत्व रखती है जो नर्मदा नदी के तट पर निवास करते हैं या जो माँ नर्मदा की पूजा और अराधना करते हैं। नर्मदा चालीसा के पाठ से भक्तों को मानसिक शांति, आध्यात्मिक शुद्धता और माँ नर्मदा की कृपा प्राप्त होती है।

                    इस चालीसा में माँ नर्मदा की उत्पत्ति, उनके विभिन्न रूपों, और उनके द्वारा की गई विभिन्न लीलाओं का वर्णन किया गया है। नर्मदा चालीसा के पाठ से भक्त माँ नर्मदा की दिव्यता का अनुभव करते हैं और उनके जीवन में सकारात्मकता और समृद्धि का संचार होता है।

                    नर्मदा चालीसा का नियमित पाठ करने से भक्तों को आंतरिक शांति मिलती है और वे माँ नर्मदा की अनुकंपा और आशीर्वाद से परिपूर्ण होते हैं। विशेष रूप से नर्मदा जयंती और अन्य पवित्र अवसरों पर इसका पाठ अत्यंत फलदायी माना जाता है।


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                    || श्री नर्मदा चालीसा – जय जय नर्मदा भवानी ||


                    ॥ दोहा॥
                    देवि पूजित, नर्मदा,
                    महिमा बड़ी अपार ।
                    चालीसा वर्णन करत,
                    कवि अरु भक्त उदार॥

                    इनकी सेवा से सदा,
                    मिटते पाप महान ।
                    तट पर कर जप दान नर,
                    पाते हैं नित ज्ञान ॥

                    ॥ चौपाई ॥
                    जय-जय-जय नर्मदा भवानी,
                    तुम्हरी महिमा सब जग जानी ।

                    अमरकण्ठ से निकली माता,
                    सर्व सिद्धि नव निधि की दाता ।

                    कन्या रूप सकल गुण खानी,
                    जब प्रकटीं नर्मदा भवानी ।

                    सप्तमी सुर्य मकर रविवारा,
                    अश्वनि माघ मास अवतारा ॥4॥

                    वाहन मकर आपको साजैं,
                    कमल पुष्प पर आप विराजैं ।

                    ब्रह्मा हरि हर तुमको ध्यावैं,
                    तब ही मनवांछित फल पावैं ।

                    दर्शन करत पाप कटि जाते,
                    कोटि भक्त गण नित्य नहाते ।

                    जो नर तुमको नित ही ध्यावै,
                    वह नर रुद्र लोक को जावैं ॥8॥

                    मगरमच्छा तुम में सुख पावैं,
                    अंतिम समय परमपद पावैं ।

                    मस्तक मुकुट सदा ही साजैं,
                    पांव पैंजनी नित ही राजैं ।

                    कल-कल ध्वनि करती हो माता,
                    पाप ताप हरती हो माता ।

                    पूरब से पश्चिम की ओरा,
                    बहतीं माता नाचत मोरा ॥12॥

                    शौनक ऋषि तुम्हरौ गुण गावैं,
                    सूत आदि तुम्हरौं यश गावैं ।

                    शिव गणेश भी तेरे गुण गवैं,
                    सकल देव गण तुमको ध्यावैं ।

                    कोटि तीर्थ नर्मदा किनारे,
                    ये सब कहलाते दु:ख हारे ।

                    मनोकमना पूरण करती,
                    सर्व दु:ख माँ नित ही हरतीं ॥16॥

                    कनखल में गंगा की महिमा,
                    कुरुक्षेत्र में सरस्वती महिमा ।

                    पर नर्मदा ग्राम जंगल में,
                    नित रहती माता मंगल में ।

                    एक बार कर के स्नाना,
                    तरत पिढ़ी है नर नारा ।

                    मेकल कन्या तुम ही रेवा,
                    तुम्हरी भजन करें नित देवा ॥20॥

                    जटा शंकरी नाम तुम्हारा,
                    तुमने कोटि जनों को है तारा ।

                    समोद्भवा नर्मदा तुम हो,
                    पाप मोचनी रेवा तुम हो ।

                    तुम्हरी महिमा कहि नहीं जाई,
                    करत न बनती मातु बड़ाई ।

                    जल प्रताप तुममें अति माता,
                    जो रमणीय तथा सुख दाता ॥24॥

                    चाल सर्पिणी सम है तुम्हारी,
                    महिमा अति अपार है तुम्हारी ।

                    तुम में पड़ी अस्थि भी भारी,
                    छुवत पाषाण होत वर वारि ।

                    यमुना मे जो मनुज नहाता,
                    सात दिनों में वह फल पाता ।

                    सरस्वती तीन दीनों में देती,
                    गंगा तुरत बाद हीं देती ॥28॥

                    पर रेवा का दर्शन करके
                    मानव फल पाता मन भर के ।

                    तुम्हरी महिमा है अति भारी,
                    जिसको गाते हैं नर-नारी ।

                    जो नर तुम में नित्य नहाता,
                    रुद्र लोक मे पूजा जाता ।

                    जड़ी बूटियां तट पर राजें,
                    मोहक दृश्य सदा हीं साजें ॥32॥

                    वायु सुगंधित चलती तीरा,
                    जो हरती नर तन की पीरा ।

                    घाट-घाट की महिमा भारी,
                    कवि भी गा नहिं सकते सारी ।

                    नहिं जानूँ मैं तुम्हरी पूजा,
                    और सहारा नहीं मम दूजा ।

                    हो प्रसन्न ऊपर मम माता,
                    तुम ही मातु मोक्ष की दाता ॥36॥

                    जो मानव यह नित है पढ़ता,
                    उसका मान सदा ही बढ़ता ।

                    जो शत बार इसे है गाता,
                    वह विद्या धन दौलत पाता ।

                    अगणित बार पढ़ै जो कोई,
                    पूरण मनोकामना होई ।

                    सबके उर में बसत नर्मदा,
                    यहां वहां सर्वत्र नर्मदा ॥40॥

                    ॥ दोहा ॥
                    भक्ति भाव उर आनि के,
                    जो करता है जाप ।

                    माता जी की कृपा से,
                    दूर होत संताप॥


                    ॥ इति श्री नर्मदा चालीसा ॥

                    || Narmada Chalisa PDF ||

                    ॥ Doha ॥
                    Devi Pujita Narmada,Mahima Badi Apara।
                    Chalisa Varnana Karata,Kavi Aru Bhakta Udara॥

                    Inaki Seva Se Sada,Mitate Papa Mahana।
                    Tata Para Kara Japa Dana Nara,Pate Hain Nita Gyana॥

                    ॥ Chaupai ॥
                    Jai-Jai-Jai Narmada Bhavani।Tumhari Mahima Saba Jaga Jani॥
                    Amarakantha Se Nikalin Mata।Sarva Siddhi Nava Nidhi Ki Data॥

                    Kanya Rupa Sakala Guna Khani।Jaba Prakatin Narmada Bhavani॥
                    Saptami Surya Makara Ravivara।Ashwani Magha Masa Avatara॥

                    Vahana Makara Apako Sajain।Kamala Pushpa Para Apa Virajain॥
                    Brahma Hari Hara Tumako Dhyavain।Taba Hi Manavanchhita Phala Pavain॥

                    Darshana Karata Papa Kati Jate।Koti Bhakta Gana Nitya Nahate॥
                    Jo Nara Tumako Nita Hi Dhyavai।Vaha Nara Rudra Loka Ko Javain॥

                    Magaramachchha Tuma Mein Sukha Pavain।Antima Samaya Paramapada Pavain॥
                    Mastaka Mukuta Sada Hi Sajain।Panva Painjani Nita Hi Rajain॥

                    Kala-Kala Dhvani Karati Ho Mata।Papa Tapa Harati Ho Mata॥
                    Puraba Se Pashchima Ki Ora।Bahatin Mata Nachata Mora॥

                    Shaunaka Rishi Tumhrau Guna Gavain।Suta Adi Tumharau Yash Gavain॥
                    Shiva Ganesha Bhi Tere Guna Gavain।Sakala Deva Gana Tumako Dhyavain॥

                    Koti Tirtha Narmada Kinare।Ye Saba Kahalate Duhkha Hare॥
                    Manokamana Purana Karati।Sarva Duhkha Ma Nita Hi Haratin॥

                    Kanakhala Mein Ganga Ki Mahima।Kurukshetra Mein Saraswati Mahima॥
                    Para Narmada Grama Jangala Mein।Nita Rahati Mata Mangal Mein॥

                    Eka Bara Karake Asanana।Tarata Pidhi Hai Nara Nara॥
                    Mekala Kanya Tuma Hi Reva।Tumhari Bhajana Karein Nita Deva॥

                    Jata Shankari Nama Tumhara।Tumane Koti Janon Ko Tara॥
                    Samodbhava Narmada Tum Ho।Papa Mochani Reva Tuma Ho॥

                    Tuma Mahima Kahi Nahin Jai।Karata Na Banati Matu Badai॥
                    Jala Pratapa Tumamen Ati Mata।Jo Ramaniya Tatha Sukha Data॥

                    Chala Sarpini Sama Hai Tumhari।Mahima Ati Apara Hai Tumhari॥
                    Tuma Mein Padi Asthi Bhi Bhari।Chuvata Pashan Hota Vara Vari॥

                    Yamuna Me Jo Manuja Nahata।Sata Dinon Mein Vaha Phala Pata॥
                    Saraswati Tina Dinon Mein Deti।Ganga Turata Bada Hi Deti॥

                    Para Reva Ka Darshana Karake।Manava Phala Pata Mana Bhara Ke॥
                    Tumhari Mahima Hai Ati Bhari।Jisko Gate Hain Nara-Nari॥

                    Jo Nara Tuma Mein Nitya Nahata।Rudra Loka Me Puja Jata॥
                    Jadi Butiyan Tata Para Rajein।Mohaka Drishya Sada Hi Sajein॥

                    Vayu Sugandhita Chalati Tira।Jo Harati Nara Tana Ki Pira॥
                    Ghata-Ghata Ki Mahima Bhari।Kavi Bhi Ga Nahin Sakate Sari॥

                    Nahin Janun Main Tumhari Puja।Aura Sahara Nahin Mama Duja॥
                    Ho Prasanna Upara Mama Mata।Tuma Hi Matu Moksha Ki Data॥

                    Jo Manava Yaha Nita Hai Padhta।Uska Mana Sada Hi Badhata॥
                    Jo Shata Bara Ise Hai Gata।Vaha Vidya Dhana Daulata Pata॥

                    Aganita Bara Padhai Jo Koi।Purana Manokamana Hoi॥
                    Sabake Ura Mein Basata Narmada।Yaham Vaham Sarvatra Narmada॥

                    ॥ Doha ॥
                    Bhakti Bhava Ura Ani Ke,Jo Karata Hai Japa।
                    Mata Ji Ki Kripa Se,Dura Hota Santapa॥


                    नर्मदा चालीसा के लाभ

                    नर्मदा चालीसा, जिसे ‘नर्मदा देवी चालीसा’ भी कहा जाता है, हिन्दू धर्म के महत्वपूर्ण भजन और स्तोत्रों में से एक है। यह चालीसा माँ नर्मदा के प्रति भक्तों की भक्ति और श्रद्धा को प्रकट करने का एक सशक्त साधन है। इसे 40 श्लोकों (चालीसा) के रूप में लिखा गया है, जिनके माध्यम से माँ नर्मदा की महिमा और उनके गुणों का वर्णन किया गया है। इस लेख में हम नर्मदा चालीसा के लाभों पर विस्तृत चर्चा करेंगे।

                    नर्मदा चालीसा के लाभ:

                    1. आध्यात्मिक उन्नति:नर्मदा चालीसा का नियमित पाठ आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होता है। इसमें माँ नर्मदा की महिमा का वर्णन किया गया है जो भक्तों को ध्यान और साधना में सहयोग करता है। यह चालीसा श्रद्धा और भक्ति को बढ़ावा देती है, जिससे व्यक्ति की आध्यात्मिक यात्रा में सहारा मिलता है।
                    2. मन की शांति:नर्मदा चालीसा के पाठ से मन को शांति और स्थिरता मिलती है। माँ नर्मदा के नाम का जप और स्तुति मन को शांति प्रदान करती है और मानसिक तनाव को दूर करने में मदद करती है। यह पाठ दिनभर की व्यस्तता और तनावपूर्ण स्थिति से बाहर निकलने का एक अच्छा उपाय है।
                    3. समस्याओं का समाधान:नर्मदा चालीसा का नियमित पाठ जीवन की समस्याओं का समाधान करने में सहायक हो सकता है। भक्तों का मानना है कि यह चालीसा आर्थिक, पारिवारिक और स्वास्थ्य समस्याओं को दूर करने में प्रभावी होती है। माँ नर्मदा की कृपा से कई भक्तों ने अपनी समस्याओं का समाधान पाया है।
                    4. सुख और समृद्धि:नर्मदा चालीसा के पाठ से घर में सुख और समृद्धि बनी रहती है। यह माना जाता है कि माँ नर्मदा के आशीर्वाद से जीवन में सुख-शांति, धन और ऐश्वर्य का आगमन होता है। इस चालीसा के पाठ से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और आर्थिक समृद्धि की संभावना बढ़ जाती है।
                    5. स्वास्थ्य लाभ:नियमित नर्मदा चालीसा के पाठ से स्वास्थ्य लाभ भी हो सकता है। यह चालीसा मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में सहायक होती है। भक्तों का कहना है कि इस पाठ से शरीर में ऊर्जा और स्फूर्ति बनी रहती है, जो स्वस्थ जीवन के लिए आवश्यक है।
                    6. कर्म सुधार:नर्मदा चालीसा का पाठ व्यक्ति के कर्मों को सुधारने में भी सहायक होता है। इसके माध्यम से व्यक्ति अपने पाप कर्मों से मुक्ति प्राप्त कर सकता है और पुण्य के रास्ते पर अग्रसर हो सकता है। यह चालीसा आत्म सुधार और कर्म सुधार के लिए एक महत्वपूर्ण साधन है।
                    7. धार्मिक और सांस्कृतिक जागरूकता:नर्मदा चालीसा का पाठ धार्मिक और सांस्कृतिक जागरूकता को बढ़ावा देता है। यह चालीसा माँ नर्मदा की महिमा और उनके आशीर्वाद की कहानी को बताती है, जो भक्तों को हिन्दू धर्म और संस्कृति के प्रति जागरूक करती है। यह धार्मिक अनुशासन और सांस्कृतिक परंपराओं को बनाए रखने में सहायक होती है।
                    8. भक्ति और श्रद्धा की वृद्धि:नर्मदा चालीसा भक्ति और श्रद्धा को बढ़ावा देती है। इसके पाठ से भक्तों की नर्मदा माता के प्रति भक्ति और प्रेम में वृद्धि होती है। यह चालीसा भक्तों को भगवान के प्रति एक गहरी श्रद्धा और विश्वास के साथ जोड़े रखती है।
                    9. आध्यात्मिक शक्ति का संचार:नर्मदा चालीसा के पाठ से आध्यात्मिक शक्ति का संचार होता है। यह चालीसा नर्मदा माता की दिव्य ऊर्जा को भक्तों तक पहुँचाने का एक माध्यम है। इस शक्ति के प्रभाव से व्यक्ति अपने जीवन में आध्यात्मिक उन्नति और सुख-शांति प्राप्त कर सकता है।
                    10. सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह:नर्मदा चालीसा के पाठ से घर और परिवेश में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है। यह चालीसा नकारात्मकता को दूर करने और सकारात्मकता को बढ़ावा देने में सहायक होती है। यह घर के वातावरण को शांत और सुखद बनाने में मदद करती है।
                    11. सामाजिक और पारिवारिक संबंधों में सुधार:नर्मदा चालीसा का पाठ सामाजिक और पारिवारिक संबंधों में सुधार लाने में भी सहायक होता है। यह चालीसा पारिवारिक सदस्यों के बीच प्रेम और सामंजस्य को बढ़ावा देती है और पारिवारिक जीवन को सुखमय बनाती है।
                    12. संकट से मुक्ति:नर्मदा चालीसा का नियमित पाठ जीवन के संकटों से मुक्ति पाने में भी सहायक हो सकता है। माँ नर्मदा की कृपा से व्यक्ति कठिन परिस्थितियों का सामना करने में सक्षम हो जाता है और संकटों से उबरने का मार्ग प्राप्त करता है।
                    13. प्रेरणा और उत्साह:नर्मदा चालीसा का पाठ व्यक्ति को प्रेरणा और उत्साह प्रदान करता है। यह चालीसा भक्तों को जीवन के लक्ष्यों की ओर अग्रसर करने और आत्म विश्वास को बढ़ावा देने में मदद करती है।
                    14. सकारात्मक मानसिकता:नर्मदा चालीसा का नियमित पाठ सकारात्मक मानसिकता को प्रोत्साहित करता है। यह चालीसा व्यक्तित्व को सकारात्मक दिशा में विकसित करती है और मानसिक ताकत को बढ़ाती है।
                    15. धार्मिक अनुष्ठान और पूजा:नर्मदा चालीसा का पाठ धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा के अवसरों पर विशेष महत्व रखता है। यह चालीसा पूजा और अनुष्ठानों की सिद्धि में सहायक होती है और धार्मिक क्रियाओं को सफल बनाती है।
                    16. भविष्यवाणी और मार्गदर्शन:नर्मदा चालीसा का पाठ भविष्यवाणी और मार्गदर्शन प्राप्त करने में सहायक हो सकता है। यह चालीसा माँ नर्मदा की कृपा से जीवन की दिशा और मार्गदर्शन प्रदान करती है।
                    17. सामाजिक कल्याण:नर्मदा चालीसा का पाठ सामाजिक कल्याण के लिए भी सहायक हो सकता है। यह चालीसा समाज में भलाई और सुधार लाने में मदद करती है और सामाजिक जिम्मेदारियों को समझने में सहायक होती है।

                    नर्मदा चालीसा के अनेक लाभ हैं जो भक्तों के जीवन को सुखमय, समृद्ध और संतुलित बनाने में सहायक होते हैं। इसका नियमित पाठ आध्यात्मिक उन्नति, मानसिक शांति, समस्याओं का समाधान, सुख और समृद्धि, स्वास्थ्य लाभ, कर्म सुधार, धार्मिक जागरूकता, भक्ति वृद्धि, आध्यात्मिक शक्ति का संचार, सकारात्मक ऊर्जा, पारिवारिक संबंधों में सुधार, संकट से मुक्ति, प्रेरणा, सकारात्मक मानसिकता, धार्मिक अनुष्ठान, भविष्यवाणी, और सामाजिक कल्याण में योगदान करता है। माँ नर्मदा की कृपा से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन और उन्नति संभव है।

                    तुलसी चालीसा (Tulsi Chalisa pdf)

                    तुलसी चालीसा (Tulsi Chalisa Pdf) हिन्दू धर्म में माता तुलसी की स्तुति और पूजा के लिए एक महत्वपूर्ण पाठ है। तुलसी, जिसे पवित्र तुलसी (ऑसिमम टेनुइफ्लोरम) भी कहा जाता है, एक अत्यंत पूजनीय पौधा है और इसे देवी तुलसी का स्वरूप माना जाता है। तुलसी माता को स्वास्थ्य, शुद्धता, और धार्मिकता की देवी माना जाता है और उनके पौधे को घर में सुख-शांति और समृद्धि का प्रतीक समझा जाता है।

                    तुलसी माता का स्वरूप बहुत ही पवित्र और ममतामयी है। उन्हें भगवान विष्णु की प्रिय माना जाता है और उनके बिना कोई भी पूजा अधूरी मानी जाती है। तुलसी के पौधे का धार्मिक और आयुर्वेदिक महत्व भी अत्यधिक है, जिसमें अनेक रोगों के निवारण की शक्ति है।

                    तुलसी चालीसा 40 छंदों का एक संग्रह है, जिसमें माता तुलसी की महिमा, उनके गुणों और उनके आशीर्वाद का वर्णन किया गया है। इस चालीसा का पाठ भक्तों को मानसिक शांति, शुद्धता और स्वास्थ्य प्रदान करता है। माता तुलसी की कृपा से सभी प्रकार के पाप, रोग और कष्टों से मुक्ति मिलती है।

                    तुलसी चालीसा का नियमित पाठ करने से माता तुलसी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह चालीसा विशेष रूप से तुलसी विवाह, एकादशी और अन्य पूजा अवसरों पर गायी जाती है। माता तुलसी की भक्ति से भक्तों को मानसिक और शारीरिक शांति मिलती है और वे जीवन में सफलता और समृद्धि की ओर अग्रसर होते हैं।


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                    || तुलसी चालीसा ||

                    ॥ दोहा ॥
                    जय जय  तुलसी भगवती सत्यवती सुखदानी ।
                    नमो नमो हरि प्रेयसी श्री वृन्दा गुन खानी ॥

                    श्री हरि शीश बिरजिनी, देहु अमर वर अम्ब ।
                    जनहित हे वृन्दावनी अब न करहु विलम्ब ॥

                    ॥ चौपाई ॥
                    धन्य धन्य श्री तलसी माता ।
                    महिमा अगम सदा श्रुति गाता ॥

                    हरि के प्राणहु से तुम प्यारी ।
                    हरीहीँ हेतु कीन्हो तप भारी ॥

                    जब प्रसन्न है दर्शन दीन्ह्यो ।
                    तब कर जोरी विनय उस कीन्ह्यो ॥

                    हे भगवन्त कन्त मम होहू ।
                    दीन जानी जनि छाडाहू छोहु ॥ ४ ॥

                    सुनी लक्ष्मी  तुलसी की बानी ।
                    दीन्हो श्राप कध पर आनी ॥

                    उस अयोग्य वर मांगन हारी ।
                    होहू विटप तुम जड़ तनु धारी ॥

                    सुनी  तुलसी हीँ श्रप्यो तेहिं ठामा ।
                    करहु वास तुहू नीचन धामा ॥

                    दियो वचन हरि तब तत्काला ।
                    सुनहु सुमुखी जनि होहू बिहाला ॥ ८ ॥

                    समय पाई व्हौ रौ पाती तोरा ।
                    पुजिहौ आस वचन सत मोरा ॥

                    तब गोकुल मह गोप सुदामा ।
                    तासु भई तुलसी तू बामा ॥

                    कृष्ण रास लीला के माही ।
                    राधे शक्यो प्रेम लखी नाही ॥

                    दियो श्राप तुलसिह तत्काला ।
                    नर लोकही तुम जन्महु बाला ॥ १२ ॥

                    यो गोप वह दानव राजा ।
                    शङ्ख चुड नामक शिर ताजा ॥

                     तुलसी भई तासु की नारी ।
                    परम सती गुण रूप अगारी ॥

                    अस द्वै कल्प बीत जब गयऊ ।
                    कल्प तृतीय जन्म तब भयऊ ॥

                    वृन्दा नाम भयो  तुलसी को ।
                    असुर जलन्धर नाम पति को ॥ १६ ॥

                    करि अति द्वन्द अतुल बलधामा ।
                    लीन्हा शंकर से संग्राम ॥

                    जब निज सैन्य सहित शिव हारे ।
                    मरही न तब हर हरिही पुकारे ॥

                    पतिव्रता वृन्दा थी नारी ।
                    कोऊ न सके पतिहि संहारी ॥

                    तब जलन्धर ही भेष बनाई ।
                    वृन्दा ढिग हरि पहुच्यो जाई ॥ २० ॥

                    शिव हित लही करि कपट प्रसंगा ।
                    कियो सतीत्व धर्म तोही भंगा ॥

                    भयो जलन्धर कर संहारा ।
                    सुनी उर शोक उपारा ॥

                    तिही क्षण दियो कपट हरि टारी ।
                    लखी वृन्दा दुःख गिरा उचारी ॥

                    जलन्धर जस हत्यो अभीता ।
                    सोई रावन तस हरिही सीता ॥ २४ ॥

                    अस प्रस्तर सम ह्रदय तुम्हारा ।
                    धर्म खण्डी मम पतिहि संहारा ॥

                    यही कारण लही श्राप हमारा ।
                    होवे तनु पाषाण तुम्हारा ॥

                    सुनी हरि तुरतहि वचन उचारे ।
                    दियो श्राप बिना विचारे ॥

                    लख्यो न निज करतूती पति को ।
                    छलन चह्यो जब पारवती को ॥ २८ ॥

                    जड़मति तुहु अस हो जड़रूपा ।
                    जग मह  तुलसी विटप अनूपा ॥

                    धग्व रूप हम शालिग्रामा ।
                    नदी गण्डकी बीच ललामा ॥

                    जो  तुलसी दल हमही चढ़ इहैं ।
                    सब सुख भोगी परम पद पईहै ॥

                    बिनु तुलसी हरि जलत शरीरा ।
                    अतिशय उठत शीश उर पीरा ॥ ३२ ॥

                    जो तुलसी दल हरि शिर धारत ।
                    सो सहस्त्र घट अमृत डारत ॥

                    तुलसी हरि मन रञ्जनी हारी ।
                    रोग दोष दुःख भंजनी हारी ॥

                    प्रेम सहित हरि भजन निरन्तर ।
                    तुलसी राधा में नाही अन्तर ॥

                    व्यन्जन हो छप्पनहु प्रकारा ।
                    बिनु तुलसी दल न हरीहि प्यारा ॥ ३६ ॥

                    सकल तीर्थ तुलसी तरु छाही ।
                    लहत मुक्ति जन संशय नाही ॥

                    कवि सुन्दर इक हरि गुण गावत ।
                    तुलसिहि निकट सहसगुण पावत ॥

                    बसत निकट दुर्बासा धामा ।
                    जो प्रयास ते पूर्व ललामा ॥

                    पाठ करहि जो नित नर नारी ।
                    होही सुख भाषहि त्रिपुरारी ॥ ४० ॥

                    ॥ दोहा ॥
                     तुलसी चालीसा पढ़ही  तुलसी तरु ग्रह धारी ।
                    दीपदान करि पुत्र फल पावही बन्ध्यहु नारी ॥

                    सकल दुःख दरिद्र हरि हार ह्वै परम प्रसन्न ।
                    आशिय धन जन लड़हि ग्रह बसही पूर्णा अत्र ॥

                    लाही अभिमत फल जगत मह लाही पूर्ण सब काम ।
                    जेई दल अर्पही तुलसी तंह सहस बसही हरीराम ॥

                    तुलसी महिमा नाम लख तुलसी सूत सुखराम ।
                    मानस चालीस रच्यो जग महं तुलसीदास ॥

                    || Tulsi Chalisa pdf ||

                    ॥ Doha ॥
                    jay jay Tulsi bhagavatee satyavatee sukhadaanee ॥
                    namo namo hari priyasee shree vrnda gun khaani ॥

                    shree hari aasheesh birajini, dehu amar var amb ॥
                    barbaadee he vrndaavanee ab na karahu vilaam ॥

                    ॥ chaupaee ॥
                    dhany dhany shree talasee maata ॥
                    mahima agam sada shruti gata ॥

                    hari ke pranahu se tum priy ॥
                    harihin keenho tap bhaaree ॥

                    jab aakarshak hai darshan dinahyo ॥
                    tab kar joree vin us kinhyo ॥

                    he bhagavant kant mam hohoo ॥
                    deen jaani jaani chhadaahoo chhohu ॥ 4 ॥

                    aneeti lakshmee Tulsi kee vaanee ॥
                    deenho shraap kadh par aani ॥

                    vah antim var maangan haaree ॥
                    hohoo vitap tum jadatanu dhaaree ॥

                    seeta Tulsi heen sarpyo tehin thama ॥
                    karahu vaas tuhoo nindaan dhaama ॥

                    diyo vachan hari taba ॥
                    sunahu sumukhee jani hohoo bihaala ॥ 8 ॥

                    samay paee vhau raun rizort tora ॥
                    poojihau aas vachan sat mora ॥

                    tab gokul mah gop sudaama ॥
                    taasu bhee Tulsi too baama ॥

                    krshn raas leela ke maahee ॥
                    raadhe shakyo prem lakhee nahin ॥

                    diyo shraap Tulsisah aatuta ॥
                    nar lokahee tum janmahu baala ॥ 12 ॥

                    yo gop he daanav raaja ॥
                    shankh chud naamak sheer taaza ॥

                    Tulsi bhee taasu kee naaree ॥
                    param sati gun roop agaaree ॥

                    as davai kalp beet jab gayau ॥
                    kalp trteey janm tab bhayau ॥

                    vrnda naam bhayo Tulsi ko ॥
                    asur jalandhar naam pati ko ॥ 16 ॥

                    kari ati dvand atul baladhaama ॥
                    leena shankar sembaat ॥

                    jab nij sainy sahit shiv haare ॥
                    marahi na tab har harihi bulaay ॥

                    pativrata vrnda thee naaree ॥
                    kou na sake patihi sanhaari ॥

                    tab jaalandhar hee bhesh banaaya ॥
                    vrnda dhig hari pyaachyo jay ॥ 20 ॥

                    shiv hit lahi kari kapaat prasanga ॥
                    kiyo satitv dharm tohi bhanga ॥

                    bhayo jalandhar kar sanhaara ॥
                    ekata ur shok upaara ॥

                    tihi kshan diyo kapaat hari taari ॥
                    lakhee vrnda duhkh gir uchaaree ॥

                    jalandhar jas hatyo abheeta ॥
                    soi raavan tas harihi seeta ॥ 24 ॥

                    ees prastar samadharmee haridvaar ॥
                    dharm khandee mam patihi sanhaara ॥

                    yahee kaaran hai ki lahee shraap hamaara ॥
                    hove tanu paashaan gareeb ॥

                    ekaant hari turathi vachan uchaare ॥
                    diyo shraap bina vichaare ॥

                    lakshyo na nij karatooti pati ko ॥
                    chhalan chahyo jab paarvatee ko ॥ 28 ॥

                    jadamati tuhu as ho jadavataroopa ॥
                    jag mah Tulsi vitap soopa ॥

                    bhagavaan roop ham shaaligraam ॥
                    nadee gandakee beech laama ॥

                    jo Tulsi dal hamahee chadhe ihain ॥
                    sab sukh bhogee param pad paihai ॥

                    binu Tulsi hari jalat shareera ॥
                    atishay uthat sheesh ur peera ॥ 32 ॥

                    jo Tulsi dal hari shree dhaarat ॥
                    so sahastr ghat amrt daarat ॥

                    Tulsi hari man rajanee haaree ॥
                    rog dosh duhkh bhanjanee haaree ॥

                    prem hari sahit bhajan mool ॥
                    Tulsi mein raadha nahin antara ॥

                    vyanjan ho chhappanahu prakaara ॥
                    binu Tulsi dal na harihi pyaaree ॥ 36 ॥

                    sakal teerth Tulsi taru chaahee ॥
                    lahat mukti janasanshay nahin ॥

                    kavi sundar ik hari gun gaavat ॥
                    Tulsi hi nikat sahasagun paavat ॥

                    basat nikat durbaasa dhaama ॥
                    jo prayaas te poorv lalaama ॥

                    paath karahi jo nit nar naaree ॥
                    hohi sukh bhaashahi tripuraari ॥ 40 ॥

                    ॥ Doha ॥
                    Tulsi Tulsi padhahee Tulsi taru grah dhaaree ॥
                    deepadaan kari putr phal paavahee bandhyaahu naaree ॥

                    sakal duhkh daridr hari har hvai param prasann ॥
                    aashiy dhan jan lahi grah basahi poorna atr ॥

                    laahi abhimat phal jagat mah laahi poorn sab kaam ॥
                    Tulsi dal arpahi Tulsi tanh sahas basahi hariraam ॥

                    Tulsi mahima naam laakh Tulsi sut sukharaam ॥
                    maanas chaaleesa rachyo jag mahan Tulsidas ॥


                    तुलसी चालीसा के लाभ

                    1. भक्ति और श्रद्धा में वृद्धि: तुलसी चालीसा का पाठ करने से हमारी भक्ति और श्रद्धा में वृद्धि होती है। यह हमें ईश्वर के प्रति और उसकी सेवा में आग्रह प्रदान करता है।
                    2. मन की शुद्धि: तुलसी चालीसा का पाठ करने से मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धि होती है। यह हमारे मन को शांति और स्थिरता प्रदान करता है और नकारात्मकता से मुक्ति दिलाता है।
                    3. स्वास्थ्य के लाभ: तुलसी चालीसा के पाठ से हमारे शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। तुलसी के गुण और उसके आयुर्वेदिक लाभ हमें रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि करते हैं।
                    4. अशुभ प्रभावों से मुक्ति: तुलसी चालीसा का नियमित पाठ करने से बुरी आदतों, अशुभ प्रभावों और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति मिलती है। यह हमें सकारात्मक दिशा में ले जाता है और जीवन में समृद्धि की ओर प्रेरित करता है।
                    5. परिवार में समरसता: तुलसी चालीसा का पाठ परिवार के बीच समरसता और शांति बनाए रखने में मदद करता है। यह परिवार के सदस्यों के बीच सम्मान, प्रेम और सहयोग की भावना को बढ़ाता है।
                    6. कर्मयोगी बनाने में सहायक: तुलसी चालीसा का पाठ करने से हमारे कर्मयोगी जीवन को बढ़ावा मिलता है। यह हमें कर्मों में निष्काम भाव से कार्य करने की प्रेरणा देता है और समर्पण भाव से जीवन जीने में मदद करता है।
                    7. आर्थिक समृद्धि: तुलसी चालीसा का पाठ करने से आर्थिक समृद्धि और लाभ प्राप्ति में सहायक मिलता है। यह हमें उत्तम विचारधारा और कर्मठता से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।
                    8. धर्मिक उन्नति: तुलसी चालीसा का पाठ करने से हमारी धार्मिक उन्नति होती है। यह हमें धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है और अच्छे कर्मों में लगने की प्रेरणा देता है।

                    ये थे कुछ मुख्य लाभ जो तुलसी चालीसा के पाठ से प्राप्त हो सकते हैं। इसे नियमित रूप से पाठ करने से हमारे जीवन में सकारात्मक परिवर्तन और उत्कृष्टता आ सकती है।

                    श्री आदिनाथ चालीसा (Shri Adinath Chalisa PDF)

                    श्री आदिनाथ चालीसा (Shri Adinath Chalisa Pdf) जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ को समर्पित एक स्तुति है। इसका पाठ भगवान आदिनाथ की महिमा का बखान करता है और उनके दिव्य गुणों का स्मरण कराता है। इस चालीसा का नियमित पाठ करने से भक्तों को मानसिक शांति, आंतरिक शक्ति, और आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है। इसके माध्यम से भक्त अपने जीवन में शुद्धि, सत्य, और अहिंसा का पालन करने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं। श्री आदिनाथ चालीसा का पाठ न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह जीवन में नैतिकता और सदाचार की स्थापना के लिए भी मार्गदर्शक है।

                    भगवान आदिनाथ की चालीसा से यह भी सिखने को मिलता है कि धैर्य और संयम से जीवन के सभी संकटों का समाधान संभव है। यह चालीसा भक्तों को प्रेरित करती है कि वे अपने कर्मों को शुद्ध और निश्छल बनाए रखें, और सत्य के मार्ग पर अडिग रहें। इसके नियमित पाठ से आत्मविश्वास में वृद्धि होती है और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होता है।

                    श्री आदिनाथ चालीसा की पंक्तियाँ अत्यंत मधुर और हृदयस्पर्शी हैं, जो भगवान आदिनाथ की महिमा का सजीव चित्रण करती हैं। इसके माध्यम से भक्त भगवान के चरणों में समर्पित होकर आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति करते हैं। इस चालीसा का पाठ जीवन के सभी कष्टों और दुखों को हर लेता है, और भक्तों को धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष की प्राप्ति की ओर अग्रसर करता है।

                    इस प्रकार, श्री आदिनाथ चालीसा न केवल भगवान आदिनाथ की स्तुति है, बल्कि यह जीवन के हर पहलू में मार्गदर्शक और प्रेरणादायक है, जिससे भक्तों का जीवन सुखमय और सफल बनता है।


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                    || श्री आदिनाथ चालीसा ||

                    ॥ दोहा॥
                    शीश नवा अरिहंत को,
                    सिद्धन को, करूं प्रणाम ।
                    उपाध्याय आचार्य का,
                    ले सुखकारी नाम ॥

                    सर्व साधु और सरस्वती,
                    जिन मन्दिर सुखकार ।
                    आदिनाथ भगवान को,
                    मन मन्दिर में धार ॥

                    ॥ चौपाई ॥
                    जै जै आदिनाथ जिन स्वामी ।
                    तीनकाल तिहूं जग में नामी ॥

                    वेष दिगम्बर धार रहे हो ।
                    कर्मो को तुम मार रहे हो ॥

                    हो सर्वज्ञ बात सब जानो ।
                    सारी दुनियां को पहचानो ॥

                    नगर अयोध्या जो कहलाये ।
                    राजा नाभिराज बतलाये ॥4॥

                    मरुदेवी माता के उदर से ।
                    चैत वदी नवमी को जन्मे ॥

                    तुमने जग को ज्ञान सिखाया ।
                    कर्मभूमी का बीज उपाया ॥

                    कल्पवृक्ष जब लगे बिछरने ।
                    जनता आई दुखड़ा कहने ॥

                    सब का संशय तभी भगाया ।
                    सूर्य चन्द्र का ज्ञान कराया ॥8॥

                    खेती करना भी सिखलाया ।
                    न्याय दण्ड आदिक समझाया ॥

                    तुमने राज किया नीति का ।
                    सबक आपसे जग ने सीखा ॥

                    पुत्र आपका भरत बताया ।
                    चक्रवर्ती जग में कहलाया ॥

                    बाहुबली जो पुत्र तुम्हारे ।
                    भरत से पहले मोक्ष सिधारे ॥12॥

                    सुता आपकी दो बतलाई ।
                    ब्राह्मी और सुन्दरी कहलाई ॥

                    उनको भी विध्या सिखलाई ।
                    अक्षर और गिनती बतलाई ॥

                    एक दिन राजसभा के अंदर ।
                    एक अप्सरा नाच रही थी ॥

                    आयु उसकी बहुत अल्प थी ।
                    इसलिए आगे नहीं नाच रही थी ॥16॥

                    विलय हो गया उसका सत्वर ।
                    झट आया वैराग्य उमड़कर ॥

                    बेटो को झट पास बुलाया ।
                    राज पाट सब में बंटवाया ॥

                    छोड़ सभी झंझट संसारी ।
                    वन जाने की करी तैयारी ॥

                    राव हजारों साथ सिधाए ।
                    राजपाट तज वन को धाये ॥20॥

                    लेकिन जब तुमने तप किना ।
                    सबने अपना रस्ता लीना ॥

                    वेष दिगम्बर तजकर सबने ।
                    छाल आदि के कपड़े पहने ॥

                    भूख प्यास से जब घबराये ।
                    फल आदिक खा भूख मिटाये ॥

                    तीन सौ त्रेसठ धर्म फैलाये ।
                    जो अब दुनियां में दिखलाये ॥24॥

                    छै: महीने तक ध्यान लगाये ।
                    फिर भजन करने को धाये ॥

                    भोजन विधि जाने नहि कोय ।
                    कैसे प्रभु का भोजन होय ॥

                    इसी तरह बस चलते चलते ।
                    छः महीने भोजन बिन बीते ॥

                    नगर हस्तिनापुर में आये ।
                    राजा सोम श्रेयांस बताए ॥28॥

                    याद तभी पिछला भव आया ।
                    तुमको फौरन ही पड़धाया ॥

                    रस गन्ने का तुमने पाया ।
                    दुनिया को उपदेश सुनाया ॥

                    पाठ करे चालीसा दिन ।
                    नित चालीसा ही बार ॥

                    चांदखेड़ी में आय के ।
                    खेवे धूप अपार ॥32॥

                    जन्म दरिद्री होय जो ।
                    होय कुबेर समान ॥

                    नाम वंश जग में चले ।
                    जिनके नहीं संतान ॥

                    तप कर केवल ज्ञान पाया ।
                    मोक्ष गए सब जग हर्षाया ॥

                    अतिशय युक्त तुम्हारा मन्दिर ।
                    चांदखेड़ी भंवरे के अंदर ॥36॥

                    उसका यह अतिशय बतलाया ।
                    कष्ट क्लेश का होय सफाया ॥

                    मानतुंग पर दया दिखाई ।
                    जंजीरे सब काट गिराई ॥

                    राजसभा में मान बढ़ाया ।
                    जैन धर्म जग में फैलाया ॥

                    मुझ पर भी महिमा दिखलाओ ।
                    कष्ट भक्त का दूर भगाओ ॥40॥

                    ॥ सोरठा ॥
                    पाठ करे चालीसा दिन,
                    नित चालीसा ही बार ।
                    चांदखेड़ी में आय के,
                    खेवे धूप अपार ॥

                    जन्म दरिद्री होय जो,
                    होय कुबेर समान ।
                    नाम वंश जग में चले,
                    जिनके नहीं संतान ॥

                    || Shri Adinath Chalisa PDF ||

                    ॥ Doha॥
                    sheesh nava arihant ko,
                    siddhan ko, naamaankan pramaan patr॥
                    aachaary ka aachaary,
                    le sukhakaaree naam ॥

                    sarv saadhu evan sarasvatee,
                    jin mandir sukhakaar॥
                    aadinaath bhagavaan ko,
                    man mandir mein dhaar ॥

                    ॥ chaupaee ॥
                    jay jay aadinaath jin svaamee॥
                    teenakaal tihoon jag mein naamee॥

                    vesh digambar dhaar rahe ho॥
                    karmo ko tum maar rahe ho ॥

                    ho sarvagy baat sab jaano॥
                    saaree duniyaan ko pahachaano॥

                    nagar ayodhya jo kahalaaye॥
                    raaja naabhiraaj batalaaye ॥4॥

                    merudevee maata ke uddhaar se॥
                    chait vadee navamee ko chhath ॥

                    tumhen jag ko gyaan sikhaaya॥
                    karmabhoomi ka beej upaay ॥

                    kalpavrksh jab laage bichhadane॥
                    janata aaee dukhada darshan ॥

                    sabaka sanshay tabhee khatm॥
                    soory chandr ka gyaan sootr ॥8॥

                    khetee karana bhee sikhaaya॥
                    nyaay dand aadik samaaj ॥

                    tumane raaj kiya neeti ka॥
                    sabak tumase jag ne paath ॥

                    putr aapaka bhaarat bataaya॥
                    sahakarmee jag mein kahalaaya ॥

                    babeeta jo putafe॥
                    bhaarat se pahale moksh siddhare ॥12॥

                    suta aapakee do baaten॥
                    braahmee aur sundaree kahalaee॥

                    yahaan bhee vidya sikhaee jae॥
                    akshar aur ginatee batalaee ॥

                    ek din raajasabha ke andar॥
                    ek apsara naach rahee thee ॥

                    aayu usakee bahut alpaavadhi thee॥
                    aage isalie naach rahee thee ॥16॥

                    ekeekaran usaka satvar ho gaya॥
                    jhat aaya vairaagy brahmaandakar॥

                    beto ko jaldee paas bulaaya gaya॥
                    raaj paat sab mein bantavaaya ॥

                    sabhee jhanjhat sansaaree chhodo॥
                    van jaane kee karee taiyaaree॥

                    raav hajaaro saath sidhae॥
                    raajapaat taj van ko dhaaye ॥20॥

                    lekin jab tum tapana॥
                    sabane apana raasta lena ॥

                    vesh digambar tajakar sabane॥
                    chhaatr aadi ke kapade pahane ॥

                    bhookh pyaas se jab ghabaraaye॥
                    phal aadi khaaye bhookhaaye ॥

                    tri sau trisath dharm vikhanditaye॥
                    jo ab duniyaan mein dikhalaaye ॥24॥

                    chh: maas tak dhyaan sthaan॥
                    phir bhajan karane ko dhaaye ॥

                    bhojan vidhi jaane nahin koy॥
                    prabhu ka bhojan kaise hoy ॥

                    isee tarah bas chalaana॥
                    chhah maas bhojan bin darshan ॥

                    nagar hastinaapur mein aaye॥
                    raaja som shreyaans raajavansh ॥28॥

                    yaad aa gaya pichhalee baar ka bhaav॥
                    tumako toornaament hee padhaaya ॥

                    ras babool ka maalik paaya॥
                    duniya ko upadesh siddhaant ॥

                    paath chaaleesa kare din॥
                    nit chaaleesa hee baar ॥

                    chaandakhedee mein aay ke॥
                    kheve dhoop apaar ॥32॥

                    janm daaridri hoy jo॥
                    hoy kuber samaan॥

                    naam raajavansh jag mein chale॥
                    jo nahin sant ॥

                    taip kar keval gyaan paaya॥
                    moksh gaya sab jag harshaaya॥

                    atishay yukt divy mandir॥
                    chaandakhedee bhanvare ke bheetar ॥36॥

                    ye hai atishay batalaaya॥
                    kasht klesh ka hoy safaaya॥

                    maanatung par daya dikhaee dee॥
                    janjeere sab kaat giraee॥

                    raajasabha mein man varg॥
                    jain dharm jag mein phailaaya ॥

                    mujhe bhee mahima dikhalao॥
                    atibhakt ka door bhagao ॥40॥

                    ॥ soratha ॥
                    paath chaaleesa kare din,
                    nit chaaleesa hee baar॥
                    chaandakhedee mein aay ke,
                    kheve dhoop apaar॥

                    janm daaridree hoy jo,
                    hoy kuber samaan॥
                    naam raajavansh jag mein chale,
                    jo nahin sant 


                    श्री आदिनाथ चालीसा के लाभ

                    आत्मिक शांति: श्री आदिनाथ चालीसा का पाठ करने से मनुष्य के मन में गहरी आत्मिक शांति की अनुभूति होती है। इसके माध्यम से व्यक्ति अपने दैनिक जीवन की चिंताओं और तनावों से मुक्त हो सकता है। भगवान आदिनाथ के प्रति समर्पण और श्रद्धा से मनुष्य की आत्मा को शांति और संतोष मिलता है।

                    आध्यात्मिक प्रगति: यह चालीसा व्यक्ति को आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करती है। इसके नियमित पाठ से व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति होती है और वह अपने जीवन के उच्चतम उद्देश्य को प्राप्त करने में सक्षम होता है। यह जीवन की गूढ़ रहस्यों को समझने और आत्मज्ञान प्राप्त करने में सहायक होती है।

                    मनोबल और आत्मविश्वास में वृद्धि: श्री आदिनाथ चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के मनोबल और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। इसके शब्द और भाव व्यक्ति के अंदर ऊर्जा और आत्मविश्वास का संचार करते हैं, जिससे वह अपने कार्यों में सफलता प्राप्त कर सकता है। यह नकारात्मक सोच को दूर कर सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने में मदद करती है।

                    मानसिक तनाव से मुक्ति: आधुनिक जीवन की भागदौड़ और समस्याओं के कारण मानसिक तनाव आम हो गया है। श्री आदिनाथ चालीसा का पाठ करने से मनुष्य के मन को शांति और सुकून मिलता है। इसके नियमित पाठ से तनाव कम होता है और मानसिक स्थिरता प्राप्त होती है। यह ध्यान और योग के समान मानसिक संतुलन बनाए रखने में सहायक होती है।

                    शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार: चालीसा के नियमित पाठ से न केवल मानसिक बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य में भी सुधार होता है। इसके शब्दों की ध्वनि और भावनात्मक प्रभाव से शरीर की ऊर्जा संतुलित होती है और विभिन्न रोगों से बचाव होता है। इसके प्रभाव से व्यक्ति की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और वह स्वस्थ जीवन जी सकता है।

                    कष्टों और बाधाओं का निवारण: श्री आदिनाथ चालीसा के पाठ से जीवन में आने वाली विभिन्न कष्टों और बाधाओं का निवारण होता है। भगवान आदिनाथ की कृपा से व्यक्ति के समस्त दुखों और समस्याओं का समाधान होता है। यह चालीसा भक्त को हर संकट से उबारने और उसके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाने में सहायक होती है।

                    परिवारिक सुख और समृद्धि: चालीसा का पाठ करने से परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। इसके प्रभाव से घर में सुख-शांति का माहौल बनता है और परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम और सद्भाव बढ़ता है। यह परिवारिक समस्याओं का समाधान करने और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने में सहायक होती है।

                    आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति: श्री आदिनाथ चालीसा के माध्यम से व्यक्ति को आध्यात्मिक ज्ञान और बुद्धि की प्राप्ति होती है। इसके पाठ से व्यक्ति अपने आत्मा के सत्य स्वरूप को पहचानने में सक्षम होता है। यह जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझने और आत्मज्ञान प्राप्त करने में मदद करती है।

                    भक्ति और श्रद्धा में वृद्धि: श्री आदिनाथ चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति की भगवान के प्रति भक्ति और श्रद्धा में वृद्धि होती है। इसके माध्यम से व्यक्ति भगवान आदिनाथ के प्रति अपनी निष्ठा और समर्पण को प्रकट करता है। यह भक्त के हृदय में भक्ति की भावना को प्रबल बनाती है और उसे आध्यात्मिक रूप से मजबूत बनाती है।

                    सकारात्मक ऊर्जा का संचार: चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इसके शब्द और भावनाएं व्यक्ति के मन और आत्मा को प्रेरित करती हैं और उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाती हैं। यह नकारात्मकता को दूर कर व्यक्ति के जीवन में उत्साह, आनंद और उत्साह का संचार करती है।

                    आध्यात्मिक साधना में सहायता: श्री आदिनाथ चालीसा आध्यात्मिक साधना के मार्ग पर चलने वाले साधकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके नियमित पाठ से साधक की साधना में गहराई और स्थिरता आती है। यह साधना में आने वाली विभिन्न कठिनाइयों को दूर कर साधक को भगवान की कृपा प्राप्त करने में सहायता करती है।

                    ईश्वर के प्रति अटल विश्वास: चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के मन में ईश्वर के प्रति अटल विश्वास और निष्ठा का निर्माण होता है। इसके माध्यम से व्यक्ति भगवान आदिनाथ की महिमा और कृपा का अनुभव करता है और उसके जीवन में भगवान के प्रति अटूट विश्वास उत्पन्न होता है।

                    ध्यान और मनन में सहायक: श्री आदिनाथ चालीसा का पाठ ध्यान और मनन के समय अत्यंत लाभकारी होता है। इसके शब्द और भाव व्यक्ति के मन को एकाग्रचित और स्थिर बनाते हैं, जिससे ध्यान और मनन में सफलता प्राप्त होती है। यह ध्यान के माध्यम से आत्मज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करने में सहायक होती है।

                    समाज में शांति और सद्भावना: चालीसा का पाठ न केवल व्यक्तिगत बल्कि समाजिक स्तर पर भी शांति और सद्भावना का संदेश देता है। इसके प्रभाव से समाज में आपसी प्रेम, भाईचारा और सद्भावना का वातावरण बनता है। यह समाज में एकता और सौहार्द्र को बढ़ावा देने में सहायक होती है।

                    जीवन में सुख और संतोष: श्री आदिनाथ चालीसा के नियमित पाठ से व्यक्ति के जीवन में सुख और संतोष की प्राप्ति होती है। इसके माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन के हर क्षण में सुख, शांति और संतोष का अनुभव करता है। यह जीवन की कठिनाइयों और समस्याओं से ऊपर उठकर सुखमय और संतोषपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा देती है।

                    आध्यात्मिक संरक्षण: श्री आदिनाथ चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को भगवान आदिनाथ का आध्यात्मिक संरक्षण प्राप्त होता है। इसके माध्यम से व्यक्ति भगवान की कृपा और आशीर्वाद का अनुभव करता है और उसके जीवन में हर कठिनाई और संकट से रक्षा होती है।

                    जीवन में दिशा और उद्देश्य: चालीसा का पाठ व्यक्ति के जीवन को दिशा और उद्देश्य प्रदान करता है। इसके माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को पहचानता है और अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए प्रेरित होता है। यह जीवन के मार्गदर्शन और प्रेरणा का स्रोत बनती है।

                    आत्मसाक्षात्कार: श्री आदिनाथ चालीसा के माध्यम से व्यक्ति आत्मसाक्षात्कार की ओर अग्रसर होता है। इसके पाठ से व्यक्ति अपने आत्मा के सत्य स्वरूप को पहचानने में सक्षम होता है और आत्मज्ञान की प्राप्ति करता है। यह आत्मा के शुद्ध स्वरूप को जानने और समझने में सहायता करती है।

                    कर्मों का शुद्धिकरण: चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के बुरे कर्मों का शुद्धिकरण होता है। इसके माध्यम से व्यक्ति अपने पिछले कर्मों के परिणामस्वरूप प्राप्त होने वाली कष्टों और दुखों से मुक्ति प्राप्त करता है। यह अच्छे कर्मों की ओर प्रेरित करती है और व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाती है।

                    ईश्वर के समीपता: श्री आदिनाथ चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति भगवान आदिनाथ के समीप अनुभव करता है। इसके माध्यम से व्यक्ति भगवान के प्रति अपने प्रेम और भक्ति को प्रकट करता है और उनके समीपता का अनुभव करता है। यह ईश्वर के साथ आत्मीय संबंध स्थापित करने में सहायक होती है।

                    श्री गायत्री चालीसा – Shri Gayatri Chalisa PDF 2025

                    श्री गायत्री चालीसा (Shri Gayatri Chalisa Pdf) के पाठ से साधक को अनेक श्रेष्ठ गुण और लाभ प्राप्त होते हैं। यह चालीसा गायत्री माता की महिमा को गाती है और उनके शक्तिशाली स्वरूप का वर्णन करती है। गायत्री माता को ‘वेद माता’ भी कहा जाता है क्योंकि उनकी ध्यान-भक्ति से सभी कष्ट दूर होते हैं और जीवन में समृद्धि आती है।

                    इस चालीसा के नियमित पाठ से साधक का मन शांत होता है, मानसिक शक्ति में वृद्धि होती है और वे आध्यात्मिक उन्नति को प्राप्त करते हैं। इसके अलावा, ज्ञान, बुद्धि और विवेक की प्राप्ति होती है जो व्यक्ति को अच्छे कार्यों में सफलता प्रदान करती हैं। गायत्री चालीसा का नियमित जप और स्मरण करने से साधक को सुख, समृद्धि और आरोग्य की प्राप्ति होती है।



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                    || श्री गायत्री चालीसा PDF ||

                    ॥ दोहा ॥
                    हीं श्रीं, क्लीं, मेधा, प्रभा, जीवन ज्योति प्रचण्ड ।
                    शांति, क्रांति, जागृति, प्रगति, रचना शक्ति अखण्ड ॥
                    जगत जननि, मंगल करनि, गायत्री सुखधाम ।
                    प्रणवों सावित्री, स्वधा, स्वाहा पूरन काम ॥

                    ॥ चालीसा ॥
                    भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी ।
                    गायत्री नित कलिमल दहनी ॥१॥

                    अक्षर चौबिस परम पुनीता ।
                    इनमें बसें शास्त्र, श्रुति, गीता ॥

                    शाश्वत सतोगुणी सतरुपा ।
                    सत्य सनातन सुधा अनूपा ॥

                    हंसारुढ़ सितम्बर धारी ।
                    स्वर्णकांति शुचि गगन बिहारी ॥४॥

                    पुस्तक पुष्प कमंडलु माला ।
                    शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला ॥

                    ध्यान धरत पुलकित हिय होई ।
                    सुख उपजत, दुःख दुरमति खोई ॥

                    कामधेनु तुम सुर तरु छाया ।
                    निराकार की अदभुत माया ॥

                    तुम्हरी शरण गहै जो कोई ।
                    तरै सकल संकट सों सोई ॥८॥

                    सरस्वती लक्ष्मी तुम काली ।
                    दिपै तुम्हारी ज्योति निराली ॥

                    तुम्हरी महिमा पारन पावें ।
                    जो शारद शत मुख गुण गावें ॥

                    चार वेद की मातु पुनीता ।
                    तुम ब्रहमाणी गौरी सीता ॥

                    महामंत्र जितने जग माहीं ।
                    कोऊ गायत्री सम नाहीं ॥१२॥

                    सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै ।
                    आलस पाप अविघा नासै ॥

                    सृष्टि बीज जग जननि भवानी ।
                    काल रात्रि वरदा कल्यानी ॥

                    ब्रहमा विष्णु रुद्र सुर जेते ।
                    तुम सों पावें सुरता तेते ॥

                    तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे ।
                    जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे ॥१६॥

                    महिमा अपरम्पार तुम्हारी ।
                    जै जै जै त्रिपदा भय हारी ॥

                    पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना ।
                    तुम सम अधिक न जग में आना ॥

                    तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा ।
                    तुमहिं पाय कछु रहै न क्लेषा ॥

                    जानत तुमहिं, तुमहिं है जाई ।
                    पारस परसि कुधातु सुहाई ॥२०॥

                    तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई ।
                    माता तुम सब ठौर समाई ॥

                    ग्रह नक्षत्र ब्रहमाण्ड घनेरे ।
                    सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे ॥

                    सकलसृष्टि की प्राण विधाता ।
                    पालक पोषक नाशक त्राता ॥

                    मातेश्वरी दया व्रत धारी ।
                    तुम सन तरे पतकी भारी ॥२४॥

                    जापर कृपा तुम्हारी होई ।
                    तापर कृपा करें सब कोई ॥

                    मंद बुद्घि ते बुधि बल पावें ।
                    रोगी रोग रहित है जावें ॥

                    दारिद मिटै कटै सब पीरा ।
                    नाशै दुःख हरै भव भीरा ॥

                    गृह कलेश चित चिंता भारी ।
                    नासै गायत्री भय हारी ॥२८ ॥

                    संतिति हीन सुसंतति पावें ।
                    सुख संपत्ति युत मोद मनावें ॥

                    भूत पिशाच सबै भय खावें ।
                    यम के दूत निकट नहिं आवें ॥

                    जो सधवा सुमिरें चित लाई ।
                    अछत सुहाग सदा सुखदाई ॥

                    घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी ।
                    विधवा रहें सत्य व्रत धारी ॥३२॥

                    जयति जयति जगदम्ब भवानी ।
                    तुम सम और दयालु न दानी ॥

                    जो सदगुरु सों दीक्षा पावें ।
                    सो साधन को सफल बनावें ॥

                    सुमिरन करें सुरुचि बड़भागी ।
                    लहैं मनोरथ गृही विरागी ॥

                    अष्ट सिद्घि नवनिधि की दाता ।
                    सब समर्थ गायत्री माता ॥३६॥

                    ऋषि, मुनि, यती, तपस्वी, जोगी ।
                    आरत, अर्थी, चिंतित, भोगी ॥

                    जो जो शरण तुम्हारी आवें ।
                    सो सो मन वांछित फल पावें ॥

                    बल, बुद्घि, विघा, शील स्वभाऊ ।
                    धन वैभव यश तेज उछाऊ ॥

                    सकल बढ़ें उपजे सुख नाना ।
                    जो यह पाठ करै धरि ध्याना ॥४०॥

                    ॥ दोहा ॥
                    यह चालीसा भक्तियुत, पाठ करे जो कोय ।
                    तापर कृपा प्रसन्नता, गायत्री की होय ॥

                    || Shri Gayatri Chalisa PDF Lyrics ||

                    ॥ Doha
                    heen shreen, kleen, medha, prabha, jeevan jyoti prachand |
                    shaanti, kraanti, jaagrti, pragati, rachana shakti akhand ॥
                    jagat janani, mangal karani, gaayatree sukhadhaam|
                    pranavon saagar, svadha, svaaha poorn kaam 

                     Chalisa 
                    bhoorbhuvah svah om yut jananee |
                    gaayatree nit kalimal dahanee ॥1॥

                    akkara chaubiz param puneena |
                    vibhinn prakaar ke shaastr, shruti, geeta ॥

                    shaashvat satogunee sataroopa |
                    saty sanaatan sudhaasa ॥

                    hansaaroodh sint daaree |
                    svarnakaanti shuchi gagan bihaaree ॥4॥

                    pustak pushp kamandalu mangal |
                    shubhr varn tanu nayan vishaala ॥

                    dhyaan dharat pulakit hiy hoi |
                    sukh upajaat, duhkh duramati khoi ॥

                    kaamadhenu tum sur taru chhaaya |
                    niraakaar kee adbhut maaya ॥

                    tumhaaree sharan gahai jo koee |
                    tarai sakal sankat son soi ॥8॥

                    sarasvatee lakshmee tum kaalee |
                    dipai taara jyoti niraalee ॥

                    tumhaaree mahima paaran paaven |
                    jo sharad shat mukh gun gaaven ॥

                    chaar ved kee maatu puna |
                    tum brahmaanee gauree seeta ॥

                    mahaamantr mantr jag maaheen |
                    kauu gaayatree sam nahin ॥12॥

                    sumirat hiy mein gyaan prakaashaay |
                    alas paap vigha naasaee ॥

                    srshti beej jag janani bhavaanee |
                    kaal raatri varada kalyaanee ॥

                    brahma vishnu rudr sur jete |
                    sa tumon paaven surata tete ॥

                    tum bhaktan kee bhaktaphe |
                    jananihin putr praan te priye ॥16॥

                    mahima aparampaar vivaah |
                    jay jay jay tripada bhay haaree ॥

                    poornat sakal gyaan vigyaan |
                    tum sam mor na jag mein aana ॥

                    tumahin jaani kachhu rahai na shesha |
                    tumahin paay kachhu rahai na klesha ॥

                    jaanat tuhin, tuhin hai jaee |
                    paras parasee kudhaatu suhaee ॥20॥

                    tumhaaree shakti dipai sab thaee |
                    maata tum sab thaur samaee ॥

                    grah nakshatr brahmaand ghanere |
                    sab gativaanaphe prere ॥

                    sakalasrshti kee praan vidhaata |
                    paalak poshak poshak tatv॥

                    maateshvaree daya vrat dhaaree |
                    tum tere patakee bhaaree san ॥24॥

                    jaapar krpa vivaah hoee |
                    krpaya sabhee ko bataen ॥

                    mandabuddhi te buddhi bal paaven |
                    rogee rog anupayogee hai jaaven ॥

                    darid mitai katai sab peera |
                    naashay duhkh harai bhav bheera ॥

                    grh klesh chit chinta bhaaree |
                    naasaee gaayatree bhay haaree ॥28 ॥

                    santati hin susantati paaven |
                    sukh sampatti yut mod manaaven ॥

                    bhoot pishaach sabai bhay khaaven |
                    yam ke doot nikat nahin aaven ॥

                    jo saadhava sumiren chit lai |
                    achhat suhaag sada sukhadaee ॥

                    ghar var sukh prad lahen kumaaree |
                    vidhava saty vrat dhaaree ॥32॥

                    jayati jayati jagadamb bhavaanee |
                    tum sam aur priy na daanee ॥

                    jo sadguru son digdarshan paaven |
                    so saadhan ko saphal banaaven ॥

                    sumiran karen suruchi badabhaagee |
                    lahain manorath grhi viraagee ॥

                    asht siddhi navanidhi ke daata |
                    sab samarth gaayatree maata ॥36॥

                    rshi, muni, yati, tapasvee, jogee |
                    aarat, arthee, chinta, bhogee ॥

                    jo jo sharan aaven |
                    so so man saty phal paaven ॥

                    bal, buddhi, vigha, sheel svabhau |
                    dhan vaibhav yash tej uchau ॥

                    sakal vrddhi upaje sukh naana |
                    jo yah paath karai dhari dhyaan ॥40॥

                    ॥ Doha॥
                    yah chaaleesa bhaktiyut, paath kare jo koy |
                    taapar praarthana prashansa, gaayatree kee hoy 


                    श्री गायत्री चालीसा के लाभ

                    श्री गायत्री चालीसा एक महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथ है जो देवी गायत्री की स्तुति और पूजा के लिए लिखा गया है। यह चालीसा 40 श्लोकों में बंटी हुई है और इसका पाठ भक्तों के जीवन में कई लाभ और सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।

                    नीचे “श्री गायत्री चालीसा” के लाभ विस्तार से समझाए गए हैं:

                    आध्यात्मिक उन्नति

                    गायत्री चालीसा का पाठ करने से भक्त की आध्यात्मिक उन्नति होती है। देवी गायत्री के मंत्रों का जाप करने से मनुष्य के मन में शांति, संतुलन और ज्ञान का प्रवाह होता है। यह चालीसा सच्चे भक्ति और श्रद्धा से की जाने वाली पूजा का हिस्सा है, जो भक्त को आत्मिक शांति और शुद्धता की ओर ले जाती है।

                    सकारात्मक ऊर्जा का संचार

                    गायत्री चालीसा के पाठ से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। जब भक्त नियमित रूप से इस चालीसा का पाठ करते हैं, तो उनके जीवन में सकारात्मकता का प्रवाह होता है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। इससे व्यक्ति के चारों ओर एक सकारात्मक ऊर्जा का वातावरण बनता है।

                    जीवन में सुख-समृद्धि

                    गायत्री चालीसा का नियमित पाठ करने से जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। देवी गायत्री की कृपा से घर-परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और आर्थिक स्थिति में सुधार होता है। यह चालीसा वि**धि और समृद्धि की दिशा में मार्गदर्शन करती है।

                    स्वास्थ्य और आरोग्य

                    गायत्री चालीसा का पाठ शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी होता है। इसके नियमित पाठ से तनाव कम होता है और मानसिक शांति प्राप्त होती है, जो स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी है। यह चालीसा बीमारियों और स्वास्थ्य समस्याओं से निजात पाने में भी सहायक हो सकती है।

                    शिक्षा और बुद्धि में वृद्धि

                    गायत्री चालीसा का नियमित पाठ विद्यार्थियों के लिए भी फायदेमंद है। यह बुद्धि और ज्ञान में वृद्धि करता है, जिससे पढ़ाई और परीक्षा में सफलता मिलती है। देवी गायत्री की कृपा से विद्यार्थियों को शिक्षा में उत्कृष्टता प्राप्त होती है और उनकी सोच और समझ में सुधार होता है।

                    मन की शांति और संतुलन

                    गायत्री चालीसा का पाठ मन को शांति और संतुलन प्रदान करता है। यह मानसिक तनाव और चिंता को दूर करने में मदद करता है। जब व्यक्ति निरंतर इस चालीसा का पाठ करता है, तो उसका मन शांत रहता है और वह जीवन के विभिन्न समस्याओं का सामना अधिक धैर्य और साहस के साथ करता है।

                    समय की प्रबंधन में सहायक

                    गायत्री चालीसा का पाठ करने से समय की प्रबंधन में भी सहायता मिलती है। यह चालीसा जीवन के हर क्षेत्र में अनुशासन और समय की अहमियत को समझने में मदद करती है, जिससे व्यक्ति अपने कार्यों को बेहतर तरीके से प्रबंधित कर पाता है।

                    आध्यात्मिक दृष्टिकोण और दृष्टि

                    गायत्री चालीसा पढ़ने से आध्यात्मिक दृष्टिकोण में सुधार होता है। व्यक्ति अपने जीवन को एक उच्च दृष्टिकोण से देखने लगता है और उसे जीवन के उद्देश्य और उसकी महानता का अनुभव होता है। यह चालीसा जीवन की सच्चाई और धर्म के मार्ग को समझने में मदद करती है।

                    समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा

                    गायत्री चालीसा के पाठ से व्यक्ति को समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। जब व्यक्ति नियमित रूप से इस चालीसा का पाठ करता है, तो उसके व्यक्तित्व में बदलाव आता है और उसे समाज में एक आदर्श व्यक्तित्व के रूप में देखा जाता है।

                    संकटों और समस्याओं का समाधान

                    गायत्री चालीसा संकटों और समस्याओं के समाधान में भी सहायक है। यह चालीसा देवी गायत्री की कृपा से जीवन में आने वाली समस्याओं और कठिनाइयों को दूर करने में मदद करती है। भक्तों को जीवन के हर क्षेत्र में सुख और सफलता प्राप्त होती है।

                    प्रेरणा और उत्साह

                    गायत्री चालीसा का नियमित पाठ व्यक्ति को प्रेरित करता है और उत्साह से भर देता है। यह चालीसा जीवन की चुनौतियों का सामना करने और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है। इससे व्यक्ति की ऊर्जा और सकारात्मक सोच में वृद्धि होती है।

                    आध्यात्मिक अनुभव और साक्षात्कार

                    गायत्री चालीसा का पाठ व्यक्ति को आध्यात्मिक अनुभव और साक्षात्कार प्राप्त करने में भी सहायक होता है। यह चालीसा भक्त को ध्यान और साधना के माध्यम से आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में मार्गदर्शन करती है और ईश्वर के साक्षात्कार की ओर ले जाती है।

                    धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्य

                    गायत्री चालीसा धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों को भी प्रोत्साहित करती है। यह चालीसा भारतीय संस्कृति और परंपरा के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में जानी जाती है, जो धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर को बनाए रखने में सहायक होती है।

                    भक्ति और श्रद्धा की वृद्धि

                    गायत्री चालीसा का पाठ भक्ति और श्रद्धा को बढ़ाता है। यह चालीसा भक्तों को देवी गायत्री के प्रति अपनी भक्ति और श्रद्धा को प्रकट करने के लिए प्रेरित करती है, जो उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाती है।

                    सकारात्मक सोच और मानसिक स्थिति

                    गायत्री चालीसा के पाठ से सकारात्मक सोच और मानसिक स्थिति में सुधार होता है। यह चालीसा व्यक्ति के मन को सकारात्मक विचारों से भर देती है और मानसिक स्थिति को स्थिर बनाती है, जिससे जीवन की समस्याओं का सामना करना आसान हो जाता है।

                    इस प्रकार, “श्री गायत्री चालीसा” के लाभ व्यापक और विविध हैं। इसके नियमित पाठ से व्यक्ति के जीवन में अनेक सकारात्मक परिवर्तन आते हैं और देवी गायत्री की कृपा प्राप्त होती है। यह चालीसा जीवन की हर समस्या और चुनौती का समाधान प्रदान करने में सक्षम है।

                    धर्मराज आरती – धर्मराज कर सिद्ध काज (Dharmraj Ki Aarti – Dharmraj Kar Siddh Kaaj)

                    धर्मराज की आरती (Dharmraj Ki Aarti) एक पवित्र और शुभ अनुष्ठान है जो हिंदू धर्म में धर्मराज को समर्पित है। धर्मराज, जिन्हें यमराज भी कहा जाता है, धर्म और न्याय के देवता हैं। इस आरती का गान करने से व्यक्ति को जीवन में न्याय और सत्य का पालन करने की प्रेरणा मिलती है।

                    धर्मराज की आरती का महत्व विशेष रूप से उन अवसरों पर होता है जब व्यक्ति न्याय, सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने का संकल्प लेता है। इस आरती का नियमित पाठ करने से जीवन में संतुलन और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

                    धर्मराज की आरती का संगीतमय पाठ न केवल भक्तों के मन को शांति और सुकून देता है, बल्कि उन्हें धार्मिक कर्तव्यों और सामाजिक उत्तरदायित्वों की याद भी दिलाता है। इस आरती का गान मंदिरों में, धार्मिक आयोजनों में और विशेष अवसरों पर किया जाता है, जिससे व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति और आंतरिक शांति प्राप्त होती है।

                    धर्मराज की आरती का महत्व और इसके गान का प्रभाव व्यक्ति के जीवन में धर्म, न्याय और सत्य की स्थापन को सुनिश्चित करता है। यह आरती उन सभी के लिए एक मार्गदर्शक है जो धर्म और सत्य के मार्ग पर चलना चाहते हैं।


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                    || धर्मराज आरती – धर्मराज कर सिद्ध काज ||

                    धर्मराज कर सिद्ध काज,
                    प्रभु मैं शरणागत हूँ तेरी ।
                    पड़ी नाव मझदार भंवर में,
                    पार करो, न करो देरी ॥
                    ॥ धर्मराज कर सिद्ध काज..॥

                    धर्मलोक के तुम स्वामी,
                    श्री यमराज कहलाते हो ।
                    जों जों प्राणी कर्म करत हैं,
                    तुम सब लिखते जाते हो ॥

                    अंत समय में सब ही को,
                    तुम दूत भेज बुलाते हो ।
                    पाप पुण्य का सारा लेखा,
                    उनको बांच सुनते हो ॥

                    भुगताते हो प्राणिन को तुम,
                    लख चौरासी की फेरी ॥
                    ॥ धर्मराज कर सिद्ध काज..॥

                    चित्रगुप्त हैं लेखक तुम्हारे,
                    फुर्ती से लिखने वाले ।
                    अलग अगल से सब जीवों का,
                    लेखा जोखा लेने वाले ॥

                    पापी जन को पकड़ बुलाते,
                    नरको में ढाने वाले ।
                    बुरे काम करने वालो को,
                    खूब सजा देने वाले ॥

                    कोई नही बच पाता न,
                    याय निति ऐसी तेरी ॥
                    ॥ धर्मराज कर सिद्ध काज..॥

                    दूत भयंकर तेरे स्वामी,
                    बड़े बड़े दर जाते हैं ।
                    पापी जन तो जिन्हें देखते ही,
                    भय से थर्राते हैं ॥

                    बांध गले में रस्सी वे,
                    पापी जन को ले जाते हैं ।
                    चाबुक मार लाते,
                    जरा रहम नहीं मन में लाते हैं ॥

                    नरक कुंड भुगताते उनको,
                    नहीं मिलती जिसमें सेरी ॥
                    ॥ धर्मराज कर सिद्ध काज..॥

                    धर्मी जन को धर्मराज,
                    तुम खुद ही लेने आते हो ।
                    सादर ले जाकर उनको तुम,
                    स्वर्ग धाम पहुचाते हो ।

                    जों जन पाप कपट से डरकर,
                    तेरी भक्ति करते हैं ।
                    नर्क यातना कभी ना करते,
                    भवसागर तरते हैं ॥

                    कपिल मोहन पर कृपा करिये,
                    जपता हूँ तेरी माला ॥
                    ॥ धर्मराज कर सिद्ध काज..॥

                    || Dharmraj Ki Aarti – Dharmraj Kar Siddh Kaaj ||

                    Dharmaraj Kar Siddh Kaaj,
                    Prabhu Main Sharanagat Hoon Teri.
                    Padi Naav Majhdar Bhawar Mein,
                    Paar Karo, Na Karo Deri.
                    Dharmaraj Kar Siddh Kaaj…

                    Dharmalok Ke Tum Swami,
                    Shri Yamraj Kahlate Ho.
                    Jom Jom Prani Karm Karte Hain,
                    Tum Sab Likhte Jaate Ho.

                    Ant Samay Mein Sab Hi Ko,
                    Tum Doot Bhej Bulate Ho.
                    Paap Punya Ka Sara Lekha,
                    Unko Baanch Sunte Ho.

                    Bhugtate Ho Pranin Ko Tum,
                    Lakh Chaurasi Ki Feri.
                    Dharmaraj Kar Siddh Kaaj…

                    Chitragupta Hain Lekhak Tumhare,
                    Furti Se Likne Wale.
                    Alag Agal Se Sab Jeevon Ka,
                    Lekha Jokha Lene Wale.

                    Paapi Jan Ko Pakad Bulate,
                    Narako Mein Dhaane Wale.
                    Bure Kaam Karne Walo Ko,
                    Khoob Saza Dene Wale.

                    Koi Nahi Bach Paata Na,
                    Yay Niti Aisi Teri.
                    Dharmaraj Kar Siddh Kaaj…

                    Doot Bhayankar Tere Swami,
                    Bade Bade Dar Jaate Hain.
                    Paapi Jan To Jinhein Dekhte Hi,
                    Bhay Se Tharrate Hain.

                    Baandh Gale Mein Rassi Ve,
                    Paapi Jan Ko Le Jaate Hain.
                    Chaabuk Maar Laate,
                    Jara Reham Nahi Man Mein Laate Hain.

                    Narak Kund Bhugtate Unko,
                    Nahi Milti Jisme Seeri.
                    Dharmaraj Kar Siddh Kaaj…

                    Dharmi Jan Ko Dharmaraj,
                    Tum Khud Hi Lene Aate Ho.
                    Saadar Le Jaakar Unko Tum,
                    Svarg Dhaam Pahuchate Ho.

                    Jom Jan Paap Kapat Se Darrkar,
                    Teri Bhakti Karte Hain.
                    Nark Yatna Kabhi Na Karte,
                    Bhavsaagar Tarate Hain.

                    Kapil Mohan Par Kripa Kariye,
                    Japta Hoon Teri Mala.
                    Dharmaraj Kar Siddh Kaaj…


                    धर्मराज आरती – धर्मराज कर सिद्ध काज के लाभ

                    धर्मराज आरती, जिसे अक्सर धर्मराज युधिष्ठिर की आरती भी कहा जाता है, एक विशेष धार्मिक पूजा विधि है जो महाभारत के प्रमुख पात्र धर्मराज युधिष्ठिर के प्रति सम्मान और श्रद्धा अर्पित करने के लिए की जाती है। यह आरती विशेष रूप से उन व्यक्तियों द्वारा की जाती है जो जीवन में न्याय, सत्य, और धर्म के मार्ग पर चलना चाहते हैं। इस लेख में हम विस्तार से चर्चा करेंगे कि धर्मराज आरती के करने से क्या लाभ होते हैं और यह किस प्रकार से जीवन को सकारात्मक दिशा प्रदान करती है।

                    धार्मिक और आध्यात्मिक लाभ

                    धर्मराज आरती का मुख्य लाभ यह है कि यह एक व्यक्ति की धार्मिक और आध्यात्मिक स्थिति को मजबूत करती है। युधिष्ठिर, जो धर्मराज के रूप में प्रसिद्ध हैं, उनके प्रति श्रद्धा और भक्ति की इस पूजा से एक व्यक्ति के भीतर धर्म और सत्य की भावना गहराई से स्थापित होती है।

                    धर्म की पुष्टि

                    धर्मराज आरती करने से व्यक्ति के मन में धर्म के प्रति विश्वास और आदर बढ़ता है। यह पूजा एक व्यक्ति को धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती है, जिससे उसका जीवन सत्य और न्याय से भरा होता है।

                    आध्यात्मिक उन्नति

                    धर्मराज की आरती से आध्यात्मिक उन्नति होती है। यह पूजा एक व्यक्ति को मानसिक शांति, संतुलन और आत्मज्ञान प्राप्त करने में मदद करती है। यह व्यक्तित्व को सुधारने और जीवन में आध्यात्मिक उन्नति के पथ पर ले जाती है।

                    जीवन की समस्याओं का समाधान

                    धर्मराज आरती करने से जीवन की विभिन्न समस्याओं का समाधान हो सकता है। यह पूजा विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी है जो जीवन में विभिन्न संकटों और समस्याओं का सामना कर रहे हैं।

                    संकटों से मुक्ति

                    धर्मराज आरती करने से व्यक्ति को संकटों और कठिनाइयों से मुक्ति मिलती है। युधिष्ठिर के चरित्र में स्थिरता और संयम का प्रतीक होता है, जो व्यक्ति को संकटों का सामना करने की शक्ति प्रदान करता है।

                    समस्याओं का समाधान

                    यह पूजा विशेष रूप से उन समस्याओं के समाधान में सहायक होती है, जो आर्थिक, पारिवारिक, या व्यक्तिगत स्तर पर उत्पन्न होती हैं। धर्मराज की आरती करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे समस्याओं का समाधान सुगमता से हो सकता है।

                    नैतिक और सामाजिक लाभ

                    धर्मराज आरती करने से न केवल व्यक्तिगत जीवन में सुधार होता है, बल्कि समाज और परिवार में भी सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलता है।

                    नैतिक विकास

                    धर्मराज आरती के माध्यम से व्यक्ति के नैतिक गुणों का विकास होता है। यह पूजा व्यक्तित्व को आदर्श, ईमानदार, और नैतिक बनाती है, जिससे समाज में एक सकारात्मक छवि बनती है।

                    सामाजिक सौहार्द

                    यह पूजा समाज में सौहार्द और सामंजस्य बनाए रखने में सहायक होती है। धर्मराज की आरती से व्यक्ति के भीतर सहिष्णुता, समझदारी, और सहकार की भावना उत्पन्न होती है, जिससे सामाजिक संबंधों में सुधार होता है।

                    स्वास्थ्य और मानसिक शांति

                    धर्मराज आरती के नियमित पाठ से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में भी सुधार होता है। यह पूजा शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को संतुलित रखने में सहायक होती है।

                    मानसिक शांति

                    धर्मराज की आरती करने से मानसिक शांति प्राप्त होती है। यह पूजा तनाव, चिंता और अवसाद को दूर करने में सहायक होती है, जिससे व्यक्ति का मन शांत और संतुलित रहता है।

                    स्वास्थ्य में सुधार

                    आरती का नियमित पाठ करने से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे स्वास्थ्य में सुधार होता है। यह पूजा शरीर को ऊर्जा और शक्ति प्रदान करती है, जिससे शारीरिक स्वास्थ्य में भी लाभ होता है।

                    आध्यात्मिक आशीर्वाद और कृपा

                    धर्मराज आरती का महत्व यह भी है कि यह पूजा व्यक्ति के जीवन में आध्यात्मिक आशीर्वाद और कृपा प्राप्त करने का एक माध्यम है।

                    भगवान की कृपा

                    धर्मराज की आरती से भगवान की कृपा प्राप्त होती है। यह पूजा व्यक्ति को ईश्वर के विशेष आशीर्वाद का पात्र बनाती है, जिससे जीवन में सुख और समृद्धि का वास होता है।

                    धार्मिक सिद्धि

                    धर्मराज आरती करने से धार्मिक सिद्धि प्राप्त होती है। यह पूजा व्यक्ति के धार्मिक कर्मों को सिद्ध करती है और जीवन में समर्पण और भक्ति की भावना को मजबूत करती है।

                    आध्यात्मिक यात्रा का सहयोग

                    धर्मराज आरती व्यक्ति की आध्यात्मिक यात्रा में भी सहायक होती है। यह पूजा आध्यात्मिक पथ पर चलने के लिए प्रेरणा देती है और आत्मज्ञान की ओर मार्गदर्शन करती है।

                    आध्यात्मिक पथ पर मार्गदर्शन

                    धर्मराज की आरती आध्यात्मिक पथ पर मार्गदर्शन प्रदान करती है। यह पूजा व्यक्ति को आत्मज्ञान प्राप्त करने और अध्यात्मिक उन्नति की ओर प्रेरित करती है।

                    साधना में सहायक

                    यह पूजा आध्यात्मिक साधना में भी सहायक होती है। धर्मराज आरती से व्यक्ति की साधना की ऊर्जा बढ़ती है और आध्यात्मिक साधना में सफलता प्राप्त होती है।

                    संबंधों में सुधार और स्नेह बढ़ाना

                    धर्मराज आरती परिवारिक और व्यक्तिगत संबंधों में सुधार लाने में भी सहायक होती है। यह पूजा संबंधों में स्नेह और सामंजस्य बढ़ाती है।

                    परिवारिक संबंधों में सुधार

                    धर्मराज की आरती परिवारिक संबंधों में सुधार लाती है। यह पूजा परिवार में सुख और शांति का वातावरण बनाती है और रिश्तों में सामंजस्य स्थापित करती है।

                    व्यक्तिगत संबंधों में स्नेह

                    यह पूजा व्यक्तिगत संबंधों में भी स्नेह और समझदारी को बढ़ाती है। धर्मराज की आरती से रिश्तों में विश्वास और प्यार की भावना प्रबल होती है।

                    धर्मराज आरती – धर्मराज कर सिद्ध काज का महत्व न केवल धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से बल्कि व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी अत्यधिक है। यह पूजा व्यक्ति के जीवन में धर्म, सत्य, और नैतिकता की भावना को स्थापित करती है और उसे संकटों, समस्याओं, और जीवन की कठिनाइयों से उबरने में मदद करती है। इसके साथ ही, यह पूजा मानसिक शांति, स्वास्थ्य, और आध्यात्मिक उन्नति में भी सहायक होती है।

                    इस प्रकार, धर्मराज आरती का महत्व व्यापक और गहरा है, और इसे नियमित रूप से करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव और समृद्धि की संभावना बढ़ जाती है।

                    Free Download Chalisa PDF 2024-25

                    Chalisa PDF, a form of devotional hymn, is an integral part of Hindu worship practices. These 40-verse hymns are dedicated to various deities, with each verse crafted to invoke blessings, protection, and guidance. The term “Chalisa” is derived from the Hindi word “Chalis,” meaning forty, which signifies the number of verses in these hymns.

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                    History of Chalisa

                    The origins of Chalisa date back to medieval India, a period marked by the proliferation of Bhakti literature. These hymns were crafted by saints and poets who sought to make divine worship more accessible to the common people. They were composed in vernacular languages, breaking away from the exclusive use of Sanskrit, thus democratizing spiritual practices. The Hanuman Chalisa, composed by the poet-saint Tulsidas in the 16th century, is one of the most celebrated examples of this genre. Over time, Chalisa PDF has become a vital part of Hindu devotional literature, reflecting the rich tapestry of regional cultures and languages within India.

                    Structure of a Chalisa

                    A typical Chalisa PDF is composed of forty quatrains or verses, each carrying a distinct spiritual message or supplication. These hymns often begin with an invocation to the deity, followed by verses that praise their virtues, recount their legends, and seek their blessings. The concluding verses usually express the devotee’s faith and surrender. This consistent structure not only aids memorization but also creates a rhythmic and meditative quality that enhances the devotional experience.

                    Popular Chalisa Texts

                    Numerous Chalisa PDF texts are revered across different regions of India. Some of the most popular include the Hanuman Chalisa PDF, Durga Chalisa PDF, Ganesh Chalisa PDF, Shiv Chalisa PDF and Saraswati Chalisa PDF. Each of these hymns is dedicated to a specific deity and is believed to bestow unique blessings upon the devotee. For instance, the Hanuman Chalisa is recited for strength and protection, while the Saraswati Chalisa is chanted to invoke wisdom and creativity.








                    Chalisa for Personal Growth

                    Beyond their religious significance, Chalisa hymns play a crucial role in personal development. The act of reciting these verses can foster discipline, concentration, and mental clarity. The spiritual affirmations within the Chalisa can also promote positive thinking, resilience, and a sense of inner peace, contributing to overall well-being.

                    Chalisa in Daily Life

                    Incorporating Chalisa PDF into daily routines can enhance one’s spiritual practice and provide a sense of continuity and devotion. Many devotees begin their day with Chalisa recitations, integrating these hymns into their morning prayers and rituals. This practice not only strengthens their connection to the divine but also sets a positive tone for the day.

                    Benefits of Reciting Chalisa

                    The benefits of reciting Chalisa PDF extend beyond spiritual gains. Regular recitation is believed to improve concentration, reduce stress, and instill a sense of peace and balance. The rhythmic nature of these hymns can have a calming effect on the mind, while the spiritual content fosters a deeper sense of purpose and connection with the divine.

                    Chalisa in Festivals and Rituals

                    Chalisa hymns hold a special place in Hindu festivals and rituals. They are often recited during major festivals like Diwali, Navratri, and Ganesh Chaturthi, as well as during personal milestones such as weddings and housewarming ceremonies. The recitation of Chalisa during these events is believed to invoke divine blessings and ensure the success and prosperity of the occasion.

                    How to Free Download Chalisa PDF

                    Downloading Chalisa PDFs is a simple process that allows devotees to access these sacred texts conveniently. Websites like Chalisa pdf (Download Chalisa’s) offer a wide range of Chalisa texts in PDF format. By following a few easy steps, one can download and store these hymns on their devices, ensuring they are always available for recitation.

                    Online Resources for Chalisa PDF

                    Numerous online platforms provide Chalisa PDFs for free. Websites such as Chalisa pdf (https://www.chalisa-pdf.com), ISKCON, and other spiritual organizations offer comprehensive collections of Chalisa texts. These resources make it easy for devotees to access, download, and share these hymns with others.

                    Free Download Chalisa PDF for Mobile

                    Accessing Chalisa PDFs on mobile devices offers a convenient way to carry these hymns everywhere. Mobile apps and websites optimized for smartphones allow users to read, listen, and even share Chalisa texts effortlessly. This accessibility ensures that devotees can engage with their spiritual practices anytime and anywhere.

                    Printing Chalisa PDF

                    For those who prefer a physical copy, printing Chalisa PDFs is a practical option. High-quality printouts can be created at home or through professional printing services. This allows devotees to keep a personal, tangible version of their favorite hymns, which can be used during prayers, rituals, or as a gift for loved ones.

                    Audio and Video Versions of Chalisa

                    In addition to text formats, Chalisa hymns are also available in audio and video versions. These multimedia formats can enhance the devotional experience, providing an auditory and visual dimension to the recitation. Many devotees find that listening to or watching these versions helps them better connect with the spiritual essence of the hymns.

                    Chalisa in Regional Languages

                    Chalisa hymns are available in various regional languages, reflecting the linguistic diversity of India. This ensures that devotees from different regions can recite these hymns in their native languages, making the spiritual practice more personal and meaningful. Translations and adaptations of Chalisa in languages such as Hindi, Tamil, Telugu, and Bengali are widely accessible.

                    Modern Interpretations of Chalisa

                    Contemporary interpretations of Chalisa hymns have emerged, blending traditional verses with modern musical styles. These adaptations make the hymns more appealing to younger generations, ensuring that the rich heritage of Chalisa remains relevant in today’s fast-paced world. Modern renditions often include orchestral arrangements, fusion music, and innovative visual presentations.

                    Testimonials and Personal Stories

                    Many devotees share personal stories and testimonials about the transformative impact of reciting Chalisa. These narratives highlight the hymns’ ability to bring comfort, inspire faith, and foster a deeper connection with the divine. Such accounts serve as powerful reminders of the enduring spiritual significance of Chalisa in people’s lives.

                    How often should one recite Chalisa?

                    Reciting Chalisa can be a daily practice or reserved for specific occasions, depending on individual preferences and devotional practices.

                    Can Chalisa be recited during any time of the day?

                    Yes, Chalisa can be recited at any time. However, it is often integrated into morning and evening prayers for consistency.

                    Is it necessary to understand the meaning of each verse?

                    While understanding the meaning enhances the devotional experience, the act of recitation itself is considered beneficial.

                    Are there any specific rituals associated with Chalisa’s recitation?

                    Some devotees follow rituals such as lighting a lamp or offering flowers before reciting Chalisa, but this is not mandatory.

                    Can Chalisa be recited in groups?

                    Yes, group recitations are common during festivals and communal worship, amplifying the spiritual energy.

                    Is it okay to recite Chalisa in a language other than Sanskrit?

                    Absolutely. Chalisa hymns are available in many regional languages, making them accessible to a broader audience.

                    Chalisa hymns hold a special place in Hindu devotional practices, offering a profound connection to the divine through their melodic verses. The advent of Chalisa pdf (https://www.chalisa-pdf.com) has made these sacred texts more accessible than ever, allowing devotees to incorporate them into their daily lives with ease. Whether recited for spiritual growth, personal solace, or during festive rituals, Chalisa hymns continue to inspire and uplift millions of hearts across the world.