Wednesday, January 28, 2026
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संतोषी माता चालीसा – Santoshi Mata Chalisa PDF 2025

संतोषी माता चालीसा (Santoshi Mata Chalisa pdf) का अपना एक विशेष महत्व है। संतोषी माता को संतोष और सुख की देवी माना जाता है। उनकी पूजा से जीवन में शांति, समृद्धि और संतोष की प्राप्ति होती है। जो लोग आर्थिक तंगी, पारिवारिक कलह या अन्य किसी प्रकार की समस्याओं से परेशान हैं, उनके लिए संतोषी माता की चालीसा का पाठ अत्यंत लाभकारी हो सकता है।

संतोषी माता की चालीसा में उनके अद्भुत रूप, लीलाओं और भक्तों के प्रति उनकी करुणा का वर्णन किया गया है। इस चालीसा का नियमित पाठ करने से भक्तों को माता का आशीर्वाद प्राप्त होता है और जीवन में सुख-शांति का संचार होता है।

चालीसा के माध्यम से माता संतोषी की महिमा का गुणगान करते हुए, हम उनके प्रति अपनी भक्ति और श्रद्धा प्रकट करते हैं। यह चालीसा न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि मानसिक शांति और आत्मिक संतोष की प्राप्ति के लिए भी अत्यंत उपयोगी है।



  • हिंदी / संस्कृत
  • English

|| संतोषी माता चालीसा ||

भक्तन को सन्तोष दे सन्तोषी तव नाम ।
कृपा करहु जगदम्ब अब आया तेरे धाम ॥

॥ चौपाई ॥
जय सन्तोषी मात अनूपम ।
शान्ति दायिनी रूप मनोरम ॥

सुन्दर वरण चतुर्भुज रूपा ।
वेश मनोहर ललित अनुपा ॥

श्‍वेताम्बर रूप मनहारी ।
माँ तुम्हारी छवि जग से न्यारी ॥

दिव्य स्वरूपा आयत लोचन ।
दर्शन से हो संकट मोचन ॥ 4 ॥

जय गणेश की सुता भवानी ।
रिद्धि- सिद्धि की पुत्री ज्ञानी ॥

अगम अगोचर तुम्हरी माया ।
सब पर करो कृपा की छाया ॥

नाम अनेक तुम्हारे माता ।
अखिल विश्‍व है तुमको ध्याता ॥

तुमने रूप अनेकों धारे ।
को कहि सके चरित्र तुम्हारे ॥ 8 ॥

धाम अनेक कहाँ तक कहिये ।
सुमिरन तब करके सुख लहिये ॥

विन्ध्याचल में विन्ध्यवासिनी ।
कोटेश्वर सरस्वती सुहासिनी ॥

कलकत्ते में तू ही काली ।
दुष्ट नाशिनी महाकराली ॥

सम्बल पुर बहुचरा कहाती ।
भक्तजनों का दुःख मिटाती ॥ 12 ॥

ज्वाला जी में ज्वाला देवी ।
पूजत नित्य भक्त जन सेवी ॥

नगर बम्बई की महारानी ।
महा लक्ष्मी तुम कल्याणी ॥

मदुरा में मीनाक्षी तुम हो ।
सुख दुख सबकी साक्षी तुम हो ॥

राजनगर में तुम जगदम्बे ।
बनी भद्रकाली तुम अम्बे ॥ 16 ॥

पावागढ़ में दुर्गा माता ।
अखिल विश्‍व तेरा यश गाता ॥

काशी पुराधीश्‍वरी माता ।
अन्नपूर्णा नाम सुहाता ॥

सर्वानन्द करो कल्याणी ।
तुम्हीं शारदा अमृत वाणी ॥

तुम्हरी महिमा जल में थल में ।
दुःख दारिद्र सब मेटो पल में ॥ 20 ॥

जेते ऋषि और मुनीशा ।
नारद देव और देवेशा ।

इस जगती के नर और नारी ।
ध्यान धरत हैं मात तुम्हारी ॥

जापर कृपा तुम्हारी होती ।
वह पाता भक्ति का मोती ॥

दुःख दारिद्र संकट मिट जाता ।
ध्यान तुम्हारा जो जन ध्याता ॥ 24 ॥

जो जन तुम्हरी महिमा गावै ।
ध्यान तुम्हारा कर सुख पावै ॥

जो मन राखे शुद्ध भावना ।
ताकी पूरण करो कामना ॥

कुमति निवारि सुमति की दात्री ।
जयति जयति माता जगधात्री ॥

शुक्रवार का दिवस सुहावन ।
जो व्रत करे तुम्हारा पावन ॥ 28 ॥

गुड़ छोले का भोग लगावै ।
कथा तुम्हारी सुने सुनावै ॥

विधिवत पूजा करे तुम्हारी ।
फिर प्रसाद पावे शुभकारी ॥

शक्ति-सामरथ हो जो धनको ।
दान-दक्षिणा दे विप्रन को ॥

वे जगती के नर औ नारी ।
मनवांछित फल पावें भारी ॥ 32 ॥

जो जन शरण तुम्हारी जावे ।
सो निश्‍चय भव से तर जावे ॥

तुम्हरो ध्यान कुमारी ध्यावे ।
निश्चय मनवांछित वर पावै ॥

सधवा पूजा करे तुम्हारी ।
अमर सुहागिन हो वह नारी ॥

विधवा धर के ध्यान तुम्हारा ।
भवसागर से उतरे पारा ॥ 36 ॥

जयति जयति जय संकट हरणी ।
विघ्न विनाशन मंगल करनी ॥

हम पर संकट है अति भारी ।
वेगि खबर लो मात हमारी ॥

निशिदिन ध्यान तुम्हारो ध्याता ।
देह भक्ति वर हम को माता ॥

यह चालीसा जो नित गावे ।
सो भवसागर से तर जावे ॥ 40 ॥

॥ दोहा ॥
संतोषी माँ के सदा बंदहूँ पग निश वास ।
पूर्ण मनोरथ हो सकल मात हरौ भव त्रास ॥


॥ इति श्री संतोषी माता चालीसा ॥

Santoshi Mata Chalisa PDF (in English)

bhakton ko santosh de santoshee tav naam ॥
krpa karahu jagadamb ab aaya tere dhaam ॥

॥ Chaupaee ॥
jay santoshee maatopam ॥
shaanti daayinee roop manoram ॥

sundar varn chaturbhuj roopa ॥
ve manohar lalit anupa ॥

vaaltetaambar roop manahaaree ॥
maan banee chhavi jag se nyaaree ॥

divy svaroopa aayat lochan ॥
darshan se ho sankat mochan ॥ 4 ॥

jay ganesh kee suta bhavaanee ॥
riddhi-siddhi kee putree gyaanee ॥

agam agochar tumhaaree maaya ॥
sab par karo krpa kee chhaaya ॥

naam anek faif maata ॥
sampoorn angrejee hai tumako dhyaata ॥

tum roop anekon dhaare ॥
ko kahi saake charitra ॥ 8 ॥

dhaam anek kahaan tak kahiye ॥
sumiran tab karake sukh lahae ॥

vindhyaachal mein vindhyavaasinee ॥
koteshvar sarasvatee suhaasinee ॥

kalakatte mein too hee kaalee ॥
dusht naashinee mahaakaraalee ॥

sambal pur bahuchara kahaatee ॥
bhakton ka duhkh duhkhatee ॥ 12 ॥

boot jee mein boot devee ॥
poojat nity bhakt jan sevee ॥

nagar bambee kee mahaaraanee ॥
maha lakshmee tum kalyaanee ॥

madura mein meenaakshee tum ho ॥
sukh duhkh gavaah tum ho ॥

raajanagar mein tum jagadambe ॥
basee bhadrakaalee tum ambe ॥ 16 ॥

paavaagadh mein durga maata ॥
akhil anamol taara yash gaata ॥

kaashee puraadhi vaalvaaree maata ॥
annapoorna naam suhaata ॥

sarvaanand kalyaanakaaronee ॥
tumheen saarada amrt vaanee ॥

teree mahima jal mein thal mein ॥
duhkh daaridr sab meto pal mein ॥ 20॥

jete rshi aur munisha ॥
naarad dev aur devesha ॥

is jagatee ke nar aur naaree ॥
dhyaan dharat he maata vivaah ॥

jaapar krpa vivaah hona ॥
vah paata bhakti ka motee ॥

duhkh daaridr sankat mit jaata hai ॥
dhyaan jo jan dhyaan ॥ 24 ॥

jo jan teree mahima gaavai ॥
dhyaan de kar sukh paavai ॥

jo man raakhe shuddh bhaavana ॥
taakee pooran karo kaamana ॥

kumati nivaaree sumati kee daatree ॥
jayati jayati maata jagadhaatree ॥

shukravaar ka din suhaavan ॥
jo vrat kare pavitr ॥ 28 ॥

gud chhole ka bhog lagaayaavai ॥
katha sune sunaavai ॥

antim pooja kare vivaah ॥
phir prasaad paave shubhakaaree ॥

shakti-samarath ho jo dhanako ॥
daan-dakshina de vipran ko ॥

ve jagatee ke nar au naaree ॥
manavaanchhit phal paaven bhaaree ॥ 32 ॥

jo jan sharan jaave ॥
so nishchayachaay bhav se tar jaave ॥

tummharo dhyaan kumaaree dhyaave ॥
nishchit manavaanchhit var paavai ॥

saadhava pooja kare vivaah ॥
amar suhaagin ho vah naaree ॥

vidhava dharm ke dhyaan ॥
bhavasaagar se utara paara ॥ 36 ॥

jayati jayati jay sankat haranee ॥
vighn vinaashan mangal karana ॥

ham par sankat bahut bhaaree hai ॥
vegee khabar lo mat hamaaree ॥

nishidin dhyaan tumhaaro dhyaata ॥
deh bhakti var hamako maata ॥

yah chaaleesa jo nit gaave ॥
so bhavasaagar se tar jaave ॥ 40 ॥

॥ Doha ॥
santoshee maan ke sada bandahoon pag nish vaas ॥
poorn manorath ho sakal maat harau bhav traas ॥

॥ Iti Shree Santoshi Mata Chalisa


संतोषी माता चालीसा के लाभ

संतोषी माता चालीसा एक विशेष प्रकार की भक्ति कविता है जो संतोषी माता के प्रति श्रद्धा और भक्ति को व्यक्त करती है। यह चालीसा विशेष रूप से उन भक्तों द्वारा पढ़ी जाती है जो संतोषी माता की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं। संतोषी माता का ध्यान और पूजा आमतौर पर शुक्रवार को किया जाता है, और इस चालीसा के पाठ से भक्तों को अनेक लाभ प्राप्त होते हैं। इस लेख में, हम संतोषी माता चालीसा के लाभों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

1. मानसिक शांति और सुकून

संतोषी माता चालीसा का नियमित पाठ मानसिक शांति और सुकून प्रदान करता है। जब भक्त इस चालीसा का पाठ करते हैं, तो उनका ध्यान केवल संतोषी माता की आराधना में लग जाता है, जिससे मन को शांति मिलती है। यह शांति तनाव और चिंता को दूर करने में सहायक होती है और एक सकारात्मक मानसिक स्थिति को प्रोत्साहित करती है।

2. आर्थिक समृद्धि

संतोषी माता चालीसा के पाठ से आर्थिक समृद्धि प्राप्त करने की भी मान्यता है। भक्त जो लगातार इस चालीसा का पाठ करते हैं, उन्हें वित्तीय समस्याओं से राहत मिलती है और उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार होता है। यह विश्वास किया जाता है कि संतोषी माता अपने भक्तों की आर्थिक परेशानियों को दूर कर उन्हें धन और समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।

3. परिवार में सुख और शांति

संतोषी माता चालीसा का पाठ परिवार में सुख और शांति बनाए रखने में भी मदद करता है। यह चालीसा पारिवारिक समस्याओं को दूर करने और परिवार के सदस्यों के बीच अच्छे संबंध स्थापित करने में सहायक होती है। संतोषी माता की आराधना से परिवार में सामंजस्य और सहयोग बढ़ता है।

4. संतान सुख

संतोषी माता को संतान सुख देने वाली देवी के रूप में भी पूजा जाता है। जो लोग संतान सुख प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं, वे इस चालीसा का नियमित पाठ करके संतोषी माता से संतान प्राप्ति की प्रार्थना करते हैं। इस चालीसा के पाठ से संतान सुख प्राप्त होने की संभावना बढ़ जाती है।

5. स्वास्थ्य लाभ

संतोषी माता चालीसा के नियमित पाठ से स्वास्थ्य लाभ भी प्राप्त होते हैं। यह विश्वास किया जाता है कि संतोषी माता अपने भक्तों को विभिन्न प्रकार की बीमारियों और स्वास्थ्य समस्याओं से बचाती हैं। इस चालीसा का पाठ स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और जीवन में स्फूर्ति और ऊर्जा लाने में सहायक होता है।

6. दुख और बाधाओं का निवारण

संतोषी माता चालीसा के पाठ से जीवन की विभिन्न समस्याओं और बाधाओं का निवारण होता है। यह चालीसा संकट और कठिनाइयों के समय में आशा और विश्वास बनाए रखने में सहायक होती है। संतोषी माता की कृपा से जीवन की बाधाएं और समस्याएं समाप्त हो जाती हैं और सफलता के नए मार्ग खुलते हैं।

7. मानसिक और भावनात्मक संतुलन

संतोषी माता चालीसा का पाठ मानसिक और भावनात्मक संतुलन बनाए रखने में सहायक होता है। यह चालीसा मानसिक तनाव, चिंता और अवसाद को दूर करने में मदद करती है। संतोषी माता की आराधना से भावनात्मक स्थिरता प्राप्त होती है, जिससे जीवन की चुनौतियों का सामना करना आसान हो जाता है।

8. आध्यात्मिक उन्नति

संतोषी माता चालीसा का नियमित पाठ भक्त की आध्यात्मिक उन्नति में भी सहायक होता है। यह चालीसा भक्तों को आत्मिक शांति, ज्ञान और समझ प्राप्त करने में मदद करती है। संतोषी माता की आराधना से आध्यात्मिक विकास और आत्मा की शुद्धि होती है।

9. जीवन में सफलता

संतोषी माता चालीसा के पाठ से जीवन में सफलता प्राप्त करने की संभावना बढ़ जाती है। यह चालीसा कठिनाइयों और विफलताओं को पार करने और सफलता प्राप्त करने में सहायक होती है। संतोषी माता की कृपा से जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफलता प्राप्त होती है।

10. देवी का आशीर्वाद

संतोषी माता चालीसा का पाठ करने से भक्त को देवी का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। संतोषी माता भक्तों की सभी इच्छाओं को पूरा करती हैं और उन्हें सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। देवी की कृपा से जीवन में खुशहाली और सौभाग्य बढ़ता है।

संतोषी माता चालीसा के अनेक लाभ हैं जो भक्तों के जीवन को सुखमय और समृद्ध बना सकते हैं। यह चालीसा मानसिक शांति, आर्थिक समृद्धि, पारिवारिक सुख, संतान सुख, स्वास्थ्य लाभ, दुख और बाधाओं का निवारण, मानसिक और भावनात्मक संतुलन, आध्यात्मिक उन्नति, जीवन में सफलता और देवी का आशीर्वाद प्रदान करती है। भक्तों को चाहिए कि वे इस चालीसा का नियमित पाठ करें और संतोषी माता की आराधना करें ताकि वे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त कर सकें।

श्री राधा चालीसा – जय वृषभान कुंवारी श्री श्यामा (Radha Chalisa PDF– Jai Vrashbhan Kumari Shri Shyama)

श्री राधा चालीसा (Radha Chalisa Pdf) एक भक्तिपूर्ण स्तोत्र है जो राधा रानी की महिमा का वर्णन करता है। इसमें श्री राधा रानी के दिव्य रूप, गुण और लीला का गुणगान किया गया है। राधा रानी को भगवान श्रीकृष्ण की प्रेमिका और आध्यात्मिक शक्ति के रूप में पूजा जाता है। आप सरस्वती चालीसा के लिए क्लिक करें

इस श्री राधा चालीसा में 40 छंद होते हैं, जो श्री राधा रानी की महिमा और उनकी लीलाओं का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं। इसे पढ़ने और सुनने से भक्तों को मानसिक शांति, प्रेम, और दिव्य आशीर्वाद की प्राप्ति होती है। श्री राधा चालीसा का पाठ भक्तों के जीवन में आध्यात्मिक उन्नति और भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अटूट भक्ति उत्पन्न करता है। आप लक्ष्मी चालीसा के लिए क्लिक करें

राधा रानी की कृपा से जीवन के सभी कष्ट और दुख दूर हो जाते हैं और भक्तों को आनंद और समृद्धि की प्राप्ति होती है। यह चालीसा भक्तों के लिए अत्यंत पवित्र और प्रभावशाली मानी जाती है।


  • हिंदी / संस्कृत
  • English

|| श्री राधा चालीसा ||

Shri Radha Chalisa Lyrics in Hindi

|| जय वृषभान कुंवारी श्री श्यामा ||

॥ दोहा ॥
श्री राधे वुषभानुजा,
भक्तनि प्राणाधार ।
वृन्दाविपिन विहारिणी,
प्रानावौ बारम्बार ॥

जैसो तैसो रावरौ,
कृष्ण प्रिय सुखधाम ।
चरण शरण निज दीजिये,
सुन्दर सुखद ललाम ॥

॥ चौपाई ॥
जय वृषभान कुंवारी श्री श्यामा ।
कीरति नंदिनी शोभा धामा ॥

नित्य विहारिणी श्याम अधर ।
अमित बोध मंगल दातार ॥

रास विहारिणी रस विस्तारिन ।
सहचरी सुभाग यूथ मन भावनी ॥

नित्य किशोरी राधा गोरी ।
श्याम प्रन्नाधन अति जिया भोरी ॥

करुना सागरी हिय उमंगिनी ।
ललितादिक सखियाँ की संगनी ॥

दिनकर कन्या कूल विहारिणी ।
कृष्ण प्रण प्रिय हिय हुल्सवानी ॥

नित्य श्याम तुम्हारो गुण गावें ।
श्री राधा राधा कही हर्शवाहीं ॥

मुरली में नित नाम उचारें ।
तुम कारण लीला वपु धरें ॥

प्रेमा स्वरूपिणी अति सुकुमारी ।
श्याम प्रिय वृषभानु दुलारी ॥

नावाला किशोरी अति चाबी धामा ।
द्युति लघु लाग कोटि रति कामा ॥10

गौरांगी शशि निंदक वदना ।
सुभाग चपल अनियारे नैना ॥

जावक यूथ पद पंकज चरण ।
नूपुर ध्वनी प्रीतम मन हारना ॥

सन्तता सहचरी सेवा करहीं ।
महा मोड़ मंगल मन भरहीं ॥

रसिकन जीवन प्रण अधर ।
राधा नाम सकल सुख सारा ॥

अगम अगोचर नित्य स्वरूप ।
ध्यान धरत निशिदिन ब्रजभूपा ॥

उप्जेऊ जासु अंश गुण खानी ।
कोटिन उमा राम ब्रह्मणि ॥

नित्य धाम गोलोक बिहारिनी ।
जन रक्षक दुःख दोष नासवानी ॥

शिव अज मुनि सनकादिक नारद ।
पार न पायं सेष अरु शरद ॥

राधा शुभ गुण रूपा उजारी ।
निरखि प्रसन्ना हॉट बनवारी ॥

ब्रज जीवन धन राधा रानी ।
महिमा अमित न जय बखानी ॥ 20

प्रीतम संग दिए गल बाहीं ।
बिहारता नित वृन्दावन माहीं ॥

राधा कृष्ण कृष्ण है राधा ।
एक रूप दौऊ -प्रीती अगाधा ॥

श्री राधा मोहन मन हरनी ।
जन सुख प्रदा प्रफुल्लित बदानी ॥

कोटिक रूप धरे नन्द नंदा ।
दरश कारन हित गोकुल चंदा ॥

रास केलि कर तुम्हें रिझावें ।
मान करो जब अति दुःख पावें ॥

प्रफ्फुल्लित होठ दरश जब पावें ।
विविध भांति नित विनय सुनावें ॥

वृन्दरंन्य विहारिन्नी श्याम ।
नाम लेथ पूरण सब कम ॥

कोटिन यज्ञ तपस्या करुहू ।
विविध नेम व्रत हिय में धरहु ॥

तू न श्याम भक्ताही अपनावें ।
जब लगी नाम न राधा गावें ॥

वृंदा विपिन स्वामिनी राधा ।
लीला वपु तुवा अमित अगाध ॥ 30

स्वयं कृष्ण नहीं पावहीं पारा ।
और तुम्हें को जननी हारा ॥

श्रीराधा रस प्रीती अभेद ।
सादर गान करत नित वेदा ॥

राधा त्यागी कृष्ण को भाजिहैं ।
ते सपनेहूं जग जलधि न तरिहैं ॥

कीरति कुमारी लाडली राधा ।
सुमिरत सकल मिटहिं भाव बड़ा ॥

नाम अमंगल मूल नासवानी ।
विविध ताप हर हरी मन भवानी ॥

राधा नाम ले जो कोई ।
सहजही दामोदर वश होई ॥

राधा नाम परम सुखदायी ।
सहजहिं कृपा करें यदुराई ॥

यदुपति नंदन पीछे फिरिहैन ।
जो कौउ राधा नाम सुमिरिहैन ॥

रास विहारिणी श्यामा प्यारी ।
करुहू कृपा बरसाने वारि ॥

वृन्दावन है शरण तुम्हारी ।
जय जय जय व्र्शभाणु दुलारी ॥ 40

॥ दोहा ॥
श्री राधा सर्वेश्वरी,
रसिकेश्वर धनश्याम ।
करहूँ निरंतर बास मै,
श्री वृन्दावन धाम ॥
॥ इति श्री राधा चालीसा ॥

|| Radha Chalisa PDF ||

Shri Radha Chalisa Lyrics in English

(Jai Vrashbhan Kumari Shri Shyama)

॥ Doha ॥
shreeraadhe vishnubhaanuja,
bhaktani praanaadhaar ॥
vrndaavipin vihaarinee,
pranavau baarambaar ॥

jaiso taiso raavarau,
krshn priy sukhadhaam ॥
charan sharan nij jaaye,
sundar sukhad lalaam ॥

॥ Chaupai ॥
jay vrshabhaan poojy shree shyaama ॥
keerti nandinee shobha dhaama ॥

nity vihaarinee shyaam aadhaar ॥
amit bodh mangal daataar ॥

raas vihaarinee ras vistaarin ॥
sahacharee saubhaagy yuva man bhavaanee ॥

nity kishoree raadha goree ॥
shyaam praanadhan ati jiya bhoree ॥

karuna saagar hayayasanjayinee ॥
lalitaadik sakhiyon kee sangati ॥

dinakar kanya kool vihaarinee ॥
krshn praan priy hi hulasaani ॥

nity shyaam tumhaaro gun gaaven ॥
shree raadha raadha kahi harshavahin ॥

muralee mein nit naam uchaaren ॥
tum kaaran leela vapu dharen ॥

prema svaroopinee ati sukumaaree ॥
shyaam priy vrshabhaanu dulaaree ॥

naavaala kishoree ati chaabee dhaama ॥
dyuti laghu lag koti rati kaam ॥10 ॥

gauraangee shashi nindak vadana ॥
subhaag chapal aniyaare naina ॥

jaavak yooth pad pankaj manch ॥
noopur dhvani puram man haarana ॥

santata sahacharee seva karahen ॥
maha parivartan mangal man bharaheen ॥

rasikan jeevan praan aadhaar ॥
raadha naam sakal sukh saara ॥

agam agochar nity svaroop ॥
dhyaan dharat nishidin brajabhoopa ॥

upajeu jaasu ansh gun khaanee ॥
kotin uma raam brahmaani ॥

nity dhaam golok bihaarinee ॥
jan rakshak duhkh dosh naasavaanee ॥

shiv aj muni sanakaadik naarad ॥
paar na paayan shesh aru sharad ॥

raadha shubh gun roopa ujaaree ॥
nirakhee mazaaha hot baunaari ॥

braj jeevan dhan raadha raanee ॥
mahima amit na jay bakhaanee ॥ 20 ॥

patti sang vivaran ॥
bihaarata nit vrndaavan maaheen ॥

raadha krshn krshn hain raadha ॥
ek roop dauu -preeti agaadha ॥

shree raadha mohan man haranee ॥
jan sukh prada roshanit badaanee ॥

kotik roop dhare nand nand ॥
darsh karan hit gokul chanda ॥

raas keli kar saagar rijhaaven ॥
man karo jab ati duhkh paaven ॥

praphullit hoth darash jab paaven ॥
vividh vividh nit vinay sunaaven ॥

vrndranya vihaarini shyaamah ॥
naam leth pooran sab kam ॥

kotin yagy tapasya karuhoo ॥
vividh nem vrat hiy mein dharahu ॥

too na shyaam bhaktaahi apanaaven ॥
jab lagee naam na raadha gaaven ॥

vrnda maan svaameekee raadha ॥
leela vapu tuva amit agaadh ॥ 30 ॥

svayan krshn nahin paavaheen paara ॥
aur suraksha ko jananee haara ॥

shreeraadha ras preeti abhed ॥
saadar gan karat nit veda ॥

raadha raadhaakrshn ko bhaajeehain ॥
te svapnahoon jag jaladhi na taarihain ॥

keerti kumaaree laadalee raadha ॥
sumirat sakal mithin bhav bada ॥

naam mangal mool naasavaanee ॥
vividh taap har haree man bhavaanee ॥

raadha naam le jo koee ॥
sahajahi daamodar vash hoi ॥

raadha naam param sukhad ॥
sahajahin krpa karen yadurai ॥

yadupati nanda peechhe phirihin ॥
jo kauu raadha naam sumirihan ॥

raas vihaarinee shyaama pyaaree ॥
karuhoo krpa barasaane vaaree ॥

vrndaavan hai sharan sthalee ॥
jay jay jay vrshabhaanu dulaaree ॥ 40॥

॥ Doha ॥
shree raadha sarveshvaree,
rasik dhaneshvarashyaam ॥
karahoon nirantar baas mai,
shree vrndaavan dhaam ॥


॥ iti shree raadha chaaleesa ॥



राधा चालीसा श्री राधा रानी की महिमा का गुणगान करने वाला एक अत्यंत पवित्र पाठ है। श्री राधा, भगवान श्रीकृष्ण की प्रिय संगिनी और भक्ति, प्रेम एवं करुणा की देवी मानी जाती हैं। राधा चालीसा का नियमित पाठ करने से भक्त को शुद्ध भक्ति, प्रेम और आध्यात्मिक सुख की प्राप्ति होती है। राधा रानी के आशीर्वाद से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है। राधा चालीसा पढ़ने की सही विधि से अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

श्री राधा चालीसा पढ़ने की विधि

  1. स्वच्छता और पवित्रता: सबसे पहले स्नान करके स्वयं को शारीरिक और मानसिक रूप से शुद्ध करें। साफ कपड़े पहनें और एक शुद्ध स्थान पर पूजा स्थल तैयार करें। राधा चालीसा का पाठ करने से पहले शरीर, मन और स्थान की पवित्रता बहुत महत्वपूर्ण होती है।
  2. पूजा स्थल की स्थापना: एक साफ स्थान पर राधा-कृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। पूजा स्थल को सफेद या पीले कपड़े से सजाएं। दीपक जलाएं और अगरबत्ती लगाएं। पुष्प, फल और मिठाई का भोग चढ़ाएं।
  3. आरंभिक प्रार्थना: पाठ शुरू करने से पहले भगवान श्रीकृष्ण और श्री राधा का ध्यान करें। राधा रानी के चरणों में समर्पण भाव से प्रणाम करें और उनकी कृपा प्राप्त करने की प्रार्थना करें।
  4. राधा चालीसा का पाठ: अब शांत मन से राधा चालीसा का पाठ शुरू करें। पाठ करते समय ध्यान राधा रानी की महिमा और उनकी दिव्य लीलाओं पर केंद्रित करें। पाठ को स्पष्ट और शुद्ध उच्चारण के साथ करें।
  5. ध्यान और समर्पण: पाठ समाप्त होने के बाद कुछ समय के लिए शांत बैठें और श्री राधा और श्रीकृष्ण का ध्यान करें। उनके प्रति अपना समर्पण व्यक्त करें और आशीर्वाद की प्रार्थना करें। ध्यान के साथ चालीसा का पाठ आपके मन को शांति और भक्ति से भर देगा।
  6. नियमितता: राधा चालीसा का नियमित रूप से पाठ करना अत्यंत लाभकारी होता है। इसे प्रतिदिन सुबह के समय करना सबसे शुभ माना जाता है, क्योंकि इस समय का वातावरण ध्यान और भक्ति के लिए अनुकूल होता है।

श्री राधा चालीसा पढ़ने के लाभ

  • भक्ति में वृद्धि: राधा चालीसा के नियमित पाठ से भक्ति का स्तर बढ़ता है और श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम गहरा होता है।
  • मन की शांति: इस पाठ से मन में शांति और संतुलन आता है। यह तनाव और चिंता को दूर करता है।
  • ईश्वर की कृपा: राधा रानी की कृपा से जीवन में सफलता, शांति और आध्यात्मिक प्रगति होती है।
  • सच्चे प्रेम की प्राप्ति: राधा चालीसा पाठ करने से जीवन में प्रेम, सौहार्द और सुख की प्राप्ति होती है।

राधा चालीसा का पाठ भक्ति, प्रेम और समर्पण की उच्चतम अवस्था प्राप्त करने का एक साधन है। इसे नियमपूर्वक, शुद्ध भावनाओं और श्रद्धा के साथ पढ़ने से राधा रानी की कृपा प्राप्त होती है, जो जीवन में शांति, प्रेम और आध्यात्मिक विकास का मार्ग प्रशस्त करती है।


राधा चालीसा (Radha Chalisa PDF) श्री राधा रानी की स्तुति में गाए गए 40 पवित्र श्लोकों का समूह है, जो उनकी महिमा, भक्ति और प्रेम का गुणगान करता है। राधा रानी को भक्ति और प्रेम की देवी माना जाता है, और भगवान श्रीकृष्ण के साथ उनके अनंत प्रेम को भक्ति का सर्वोच्च आदर्श माना गया है। राधा चालीसा का पाठ न केवल भक्तों को राधा रानी के आशीर्वाद से जोड़ता है, बल्कि उनके जीवन में प्रेम, शांति, और आध्यात्मिक उन्नति भी लाता है।

1. भक्ति और प्रेम की प्रतीक

राधा रानी की भक्ति और श्रीकृष्ण के प्रति उनका अनन्य प्रेम, भक्तों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। राधा चालीसा का नियमित पाठ भक्तों को उनकी भक्ति की गहराई और प्रेम के सार को समझने में मदद करता है। यह पाठ भक्त के मन में राधा-कृष्ण के प्रति अपार प्रेम और समर्पण की भावना जगाता है, जो भक्ति मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

2. आध्यात्मिक उन्नति और मन की शांति

श्री राधा चालीसा (Radha Chalisa PDF) का पाठ मानसिक और आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है। इस पवित्र पाठ के नियमित उच्चारण से मन शुद्ध होता है और मानसिक तनाव, चिंता, और अशांति दूर होती है। यह चालीसा आत्मा को शांति और संतुलन प्रदान करती है, जो भक्त को जीवन के उतार-चढ़ाव में स्थिर रहने में मदद करती है।

3. भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्ति

राधा रानी को भगवान श्रीकृष्ण की शक्ति और प्रेम का प्रतीक माना जाता है। कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पहले श्री राधा की पूजा की जाती है। राधा चालीसा का पाठ करने से भक्त को न केवल राधा रानी की कृपा प्राप्त होती है, बल्कि श्रीकृष्ण का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है। यह पाठ भक्त को भगवान के साथ एक आध्यात्मिक संबंध स्थापित करने में मदद करता है।

4. जीवन में प्रेम और सौहार्द का विकास

श्री राधा चालीसा (Radha Chalisa PDF) प्रेम और करुणा का पाठ है। इसके नियमित पाठ से जीवन में प्रेम, सौहार्द, और सहनशीलता का विकास होता है। राधा रानी के गुणों को अपने जीवन में अपनाने से व्यक्ति के संबंधों में मधुरता और स्नेह बढ़ता है। यह पाठ व्यक्ति के अहंकार को कम करके उसे एक सच्चे और विनम्र भक्त में परिवर्तित करता है।

श्री राधा चालीसा (Radha Chalisa PDF) न केवल भक्त के जीवन में आध्यात्मिक उन्नति लाती है, बल्कि प्रेम, भक्ति, और मानसिक शांति भी प्रदान करती है। इसके नियमित पाठ से राधा रानी की कृपा प्राप्त होती है, जो भगवान श्रीकृष्ण की अनंत कृपा और प्रे



श्री राधा चालीसा के लाभ

श्री राधा चालीसा (Radha Chalisa PDF) एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्तोत्र है जो देवी राधा को समर्पित है। यह स्तोत्र 40 श्लोकों (चालीस श्लोकों) में विभाजित है और इसे भक्तिपूर्वक पढ़ने या सुनने से कई लाभ होते हैं। राधा चालीसा को सुनने और पढ़ने से भक्तों को शांति, समृद्धि, और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। यहाँ पर राधा चालीसा के लाभों का विस्तृत वर्णन किया गया है:

आध्यात्मिक उन्नति

श्री राधा चालीसा (Radha Chalisa PDF) का नियमित पाठ करने से भक्त की आध्यात्मिक स्थिति में सुधार होता है। यह चालीसा देवी राधा की महिमा और गुणों का वर्णन करती है, जिससे भक्तों को उनके जीवन में दिव्य प्रकाश और सच्चाई का अनुभव होता है। यह ध्यान और ध्यान की स्थिति को सुधारता है, और भक्तों को आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर करता है।

मन की शांति और संतुलन

राधा चालीसा (Radha Chalisa PDF) का पाठ मानसिक शांति और संतुलन प्रदान करता है। जब व्यक्ति रोजाना इसे पढ़ता है या सुनता है, तो उसका मन एकाग्र और शांत रहता है। यह तनाव और चिंता को कम करने में सहायक होती है, और मन को शांत करने का एक प्रभावी साधन है।

भक्ति और प्रेम की वृद्धि

यह चालीसा देवी राधा के प्रति अटूट भक्ति और प्रेम को बढ़ावा देती है। राधा के गुणों और उनके प्रेम की स्तुति करने से भक्त के भीतर प्रेम और समर्पण की भावना विकसित होती है। यह भावना जीवन को अधिक सकारात्मक और प्रेमपूर्ण बनाती है।

सकारात्मक ऊर्जा का संचार

श्री राधा चालीसा (Radha Chalisa PDF) का पाठ सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। यह वातावरण को सकारात्मक बनाता है और नकारात्मकता को दूर करने में मदद करता है। जब व्यक्ति नियमित रूप से राधा चालीसा का पाठ करता है, तो उसके चारों ओर की ऊर्जा बदल जाती है, जिससे जीवन में सकारात्मक परिवर्तन होते हैं।

संकटों और समस्याओं से मुक्ति

श्री राधा चालीसा (Radha Chalisa PDF) के नियमित पाठ से विभिन्न प्रकार की समस्याओं और संकटों से मुक्ति मिलती है। यह चालीसा संकटों के समय एक सुरक्षित आश्रय का काम करती है। भक्त इसे पढ़ने से कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति प्राप्त करते हैं और उनकी समस्याएं धीरे-धीरे हल होती जाती हैं।

धन और समृद्धि में वृद्धि

यह चालीसा आर्थिक समृद्धि और धन की प्राप्ति के लिए भी लाभकारी होती है। देवी राधा के आशीर्वाद से जीवन में धन और समृद्धि की वृद्धि होती है। इसके पाठ से विशेष रूप से वित्तीय समस्याओं के समाधान में मदद मिलती है और आर्थिक स्थिति में सुधार होता है।

स्वास्थ्य और कल्याण

श्री राधा चालीसा (Radha Chalisa PDF) के पाठ से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। यह चालीसा तनाव, चिंता और अन्य मानसिक समस्याओं को दूर करने में सहायक होती है, जिससे समग्र स्वास्थ्य में सुधार होता है। नियमित पाठ से व्यक्ति की रोग प्रतिकारक क्षमता भी बढ़ती है।

शांति और सौहार्द्र का वातावरण

श्री राधा चालीसा (Radha Chalisa PDF) का पाठ घर और परिवार के भीतर शांति और सौहार्द्र का वातावरण बनाता है। जब परिवार के सभी सदस्य इसे मिलकर पढ़ते हैं, तो यह संबंधों को मजबूत करता है और घर में सुख-शांति की भावना को बढ़ावा देता है।

आध्यात्मिक मार्गदर्शन

श्री राधा चालीसा (Radha Chalisa PDF) आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करती है। यह जीवन के सही मार्ग को पहचानने और पालन करने में सहायता करती है। भक्तों को अपने जीवन में सही दिशा और उद्देश्य प्राप्त करने में मदद करती है।

पापों से मुक्ति

श्री राधा चालीसा (Radha Chalisa PDF) का नियमित पाठ पापों और दोषों से मुक्ति दिलाता है। यह पापों को धोने और कर्मों की सफाई में सहायक होती है। भक्त इस चालीसा के पाठ से धार्मिक और आध्यात्मिक शुद्धि प्राप्त कर सकते हैं।

सुख और समृद्धि का वर्धन

श्री राधा चालीसा (Radha Chalisa PDF) के पाठ से जीवन में सुख और समृद्धि की वृद्धि होती है। यह आशीर्वाद देती है कि जीवन में खुशहाली बनी रहे और समृद्धि में वृद्धि हो। यह जीवन को आनंदमय और संतोषजनक बनाने में सहायक होती है।

अध्यात्मिक बल और धैर्य

राधा चालीसा (Radha Chalisa PDF) का नियमित पाठ भक्त को अध्यात्मिक बल और धैर्य प्रदान करता है। यह कठिन परिस्थितियों में संयम और धैर्य रखने में सहायता करती है, और आध्यात्मिक यात्रा में निरंतरता बनाए रखने में मदद करती है।

मन की स्पष्टता

राधा चालीसा (Radha Chalisa PDF) का पाठ मन की स्पष्टता को बढ़ाता है। यह मानसिक भ्रम और अंधकार को दूर करने में सहायक होती है, और व्यक्ति को स्पष्टता और समझ प्रदान करती है। इससे जीवन के निर्णय लेने में सहायता मिलती है।

समर्पण और विनम्रता

श्री राधा चालीसा (Radha Chalisa PDF) भक्तों में समर्पण और विनम्रता की भावना को उत्पन्न करती है। देवी राधा के प्रति अटूट भक्ति और प्रेम से भक्त की आत्मा में विनम्रता और समर्पण की भावना बढ़ती है।

आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर अग्रसरता

श्री राधा चालीसा (Radha Chalisa PDF) का पाठ भक्त को आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर अग्रसर करता है। यह पथप्रदर्शक होती है, जो भक्तों को आध्यात्मिक यात्रा में आगे बढ़ने में मदद करती है और उन्हें दिव्य लक्ष्यों की प्राप्ति की दिशा दिखाती है।

राधा नाम का जप करने से क्या होता है?

राधा नाम का जप करने से व्यक्ति के हृदय में शुद्ध भक्ति और प्रेम की भावना उत्पन्न होती है। राधा रानी भगवान श्रीकृष्ण की प्रिय संगिनी हैं, और उनका नाम जपने से भक्त को मानसिक शांति, भक्ति में स्थिरता, और आत्मिक सुख की प्राप्ति होती है। यह जप भक्त के जीवन से नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है और उसे भगवान के प्रति समर्पण का मार्ग दिखाता है। राधा नाम के जप से भक्त को भगवान श्रीकृष्ण का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है, जिससे जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है।

राधा तत्व क्या है?

राधा तत्व भक्ति, प्रेम, और समर्पण का प्रतीक है। यह तत्व हमें यह सिखाता है कि सच्ची भक्ति में प्रेम और समर्पण का महत्व सर्वोच्च है। श्री राधा भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य प्रेमिका और भक्त के रूप में जानी जाती हैं। राधा तत्व यह दर्शाता है कि व्यक्ति अपने जीवन में अहंकार, मोह, और माया से परे जाकर ईश्वर की आराधना करे। यह तत्व भक्ति में आत्म-विस्मृति और प्रेम की पराकाष्ठा का प्रतीक है, जो भौतिक सुखों से मुक्त होकर भगवान के चरणों में समर्पित होता है।

राधा राधा का जप करने से क्या होता है?

राधा राधा का जप करने से भक्त के जीवन में शुद्ध भक्ति, प्रेम, और ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना उत्पन्न होती है। इस जप से मानसिक शांति, आत्मिक शुद्धि, और आध्यात्मिक उन्नति होती है। राधा का नाम जपना भगवान श्रीकृष्ण की कृपा को प्राप्त करने का सरल और प्रभावी साधन है। यह जप भक्त के हृदय से नकारात्मक भावनाओं को दूर करता है और उसे सकारात्मक ऊर्जा और ईश्वर के प्रति प्रेम से भर देता है। यह भक्त को भगवान के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित करने में मदद करता है।

राधा रानी का मूल मंत्र क्या है?

राधे राधे” और “राधा राधा” दोनों का जप भक्त की श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है। “राधे राधे” का उच्चारण अधिक आम है और इसे भगवान श्रीकृष्ण की प्रेमिका राधा को पुकारने के रूप में देखा जाता है। वहीं, “राधा राधा” का जप राधा रानी की महिमा और उनके प्रति समर्पण को दर्शाता है। दोनों जपों का उद्देश्य एक ही है: भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी की कृपा प्राप्त करना। यह व्यक्तिगत भक्ति और अनुभूति पर निर्भर करता है कि कौन सा मंत्र अधिक प्रभावी होता है।

लोग राधा का जाप क्यों करते हैं?

लोग राधा का जाप करते हैं क्योंकि राधा रानी भक्ति और प्रेम की देवी मानी जाती हैं। उनका नाम जपने से भक्त को शुद्ध भक्ति, मानसिक शांति, और भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है। राधा का नाम भक्त को ईश्वर से जोड़ने वाला माध्यम है, जो उसके जीवन से अहंकार, मोह, और अन्य नकारात्मक भावनाओं को दूर करता है। इसके अलावा, राधा का जाप भक्त को आत्मिक सुख और संतोष प्रदान करता है, जिससे वह भगवान के प्रति समर्पण की भावना को और गहरा कर पाता है।

राधा और राधे में क्या अंतर है?

“राधा” और “राधे” दोनों नाम श्री राधा रानी के लिए उपयोग किए जाते हैं, लेकिन इनका संदर्भ भिन्न हो सकता है। “राधा” नाम सीधे तौर पर श्री राधा को संदर्भित करता है, जो भगवान श्रीकृष्ण की प्रेमिका और भक्ति की देवी हैं। वहीं, “राधे” नाम अधिक व्यक्तिगत और स्नेहपूर्वक संबोधन के रूप में प्रयोग होता है, जिसमें भक्त राधा रानी को स्नेह और आदर के साथ पुकारते हैं। “राधे” का उपयोग अक्सर भक्तिपूर्ण गीतों और भजनों में किया जाता है, जिससे भक्त का प्रेम और श्रद्धा प्रकट होती है।

राधा नाम की शक्ति क्या है?

राधा नाम की शक्ति भक्त के जीवन में शुद्ध भक्ति, प्रेम, और ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना उत्पन्न करती है। राधा नाम जपने से मानसिक शांति, सकारात्मकता, और आत्मिक शुद्धि प्राप्त होती है। यह नाम भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य कृपा प्राप्त करने का सरल और प्रभावी साधन है। राधा नाम की शक्ति नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर जीवन में सकारात्मक बदलाव लाती है। इस नाम का जप भक्त के जीवन में ईश्वर के प्रति प्रेम और भक्ति को प्रबल बनाता है, जिससे उसे आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है।

गंगा स्तुति: जय जय भगीरथ नन्दिनि – Ganga Stuti: Jai Jai Bhagirath Nandini 2025

गंगा स्तुति: जय जय भगीरथ नन्दिनि (Ganga Stuti) नामक इस स्तुति में गंगा माँ की महिमा और उनके द्वारा हमारे जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन किया गया है। गंगा माँ को भगीरथ की पुत्री माना जाता है, जिन्होंने अपने कठोर तप से गंगा को धरती पर अवतरित किया। गंगा का पवित्र जल सदियों से न केवल धार्मिक अनुष्ठानों में, बल्कि हमारे जीवन के अनेक पहलुओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आ रहा है। श्री गायत्री चालीसा के नियमित पाठ से साधक का मन शांत होता है

गंगा स्तुति एक अद्वितीय और शक्तिशाली भक्ति गीत है जो गंगा माँ की महिमा का गान करता है और उनके प्रति श्रद्धा और भक्ति को अभिव्यक्त करता है। इस स्तुति का पाठ करने से न केवल मन को शांति मिलती है, बल्कि आत्मा को भी एक विशेष प्रकार की संतुष्टि और ऊर्जा का अनुभव होता है।

गंगा माँ के प्रति श्रद्धा और प्रेम को और भी प्रबल बनाने के लिए इस गंगा स्तुति को जरूर पढ़ें और गाएं। जय गंगे!



  • हिंदी / संस्कृत
  • English

|| गंगा स्तुति: जय जय भगीरथ नन्दिनि ||

जय जय भगीरथ नन्दिनि, मुनि-चय चकोर-चन्दनि,
नर-नाग-बिबुध-बन्दिनि जय जहनु बालिका ।
बिस्नु-पद-सरोजजासि, ईस-सीसपर बिभासि,
त्रिपथ गासि, पुन्रूरासि, पाप-छालिका ॥

बिमल बिपुल बहसि बारि, सीतल त्रयताप-हारि,
भँवर बर, बिभंगतर तरंग-मालिका ।
पुरजन पूजोपहार, सोभित ससि धवलधार,
भंजन भव-भार, भक्ति-कल्पथालिका ॥

थ्नज तटबासी बिहंग, जल-थल-चर पसु-पतंग,
कीट,जटिल तापस सब सरिस पालिका ।
तुलसी तव तीर तीर सुमिरत रघुवंस-बीर,
बिचरत मति देहि मोह-महिष-कालिका ॥

|| Ganga Stuti – Jai Jai Bhagirath Nandini ||

Jay Jay Bhagirath Nandini, Muni-Chay Chakor-Chandani,
Nar-Nag-Bibudh-Bandini Jay Jahanu Balika.
Visnu-Pad-Saroja-Jaasi, Ees-Sispar Bibhasi,
Tripath Gaasi, Punroorasi, Paap-Chaalika.

Bimal Bipul Bahasi Baari, Seetal Traya-Taap-Haari,
Bhanvar Bar, Bibhangtar Tarang-Maalika.
Purjan Pujopahaar, Sobhit Sasi Dhavaladhaari,
Bhanjan Bhav-Bhaar, Bhakti-Kalpathaalika.

Thanaj Tatabaasi Bihang, Jal-Thal-Char Pasu-Patang,
Keet Jatil Tapas Sab Saris Palika.
Tulsi Tav Teer Teer Sumirat RaghuVansh-Veer,
Bicharat Mati Dehi Moh-Mahish-Kaalika.


गंगा स्तुति के लाभ

गंगा स्तुति (Ganga Stuti) एक धार्मिक और आध्यात्मिक गीत है जो हिन्दू धर्म में गंगा नदी की पूजा और स्तुति को व्यक्त करता है। यह स्तुति गंगा नदी की पवित्रता, महत्व, और उसकी दिव्यता की सराहना करती है। गंगा नदी को हिन्दू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है और इसे देवी माना जाता है।

गंगा स्तुति के मुख्य लाभ और महत्व को समझने के लिए, निम्नलिखित बिंदुओं पर चर्चा की जा सकती है:

गंगा का आध्यात्मिक महत्व

गंगा नदी को हिन्दू धर्म में सबसे पवित्र नदी माना जाता है। इसे देवी गंगा का रूप माना जाता है और इसे धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ और तीर्थयात्रा में अत्यधिक महत्व दिया जाता है। गंगा स्तुति में गंगा माता की पूजा और उनके दिव्य गुणों का वर्णन किया गया है, जो भक्तों को आध्यात्मिक शांति और परम सुख प्राप्त करने में सहायता करती है।

गंगा की पवित्रता और शुद्धता

गंगा नदी को शुद्धता और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। गंगा स्तुति में गंगा नदी की शुद्धता की सराहना की जाती है और इसे जीवनदायिनी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह भक्तों को आत्मिक शुद्धता प्राप्त करने और उनके जीवन को पवित्र बनाने के लिए प्रेरित करती है।

भक्तों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन

गंगा स्तुति को नियमित रूप से गाने और सुनने से भक्तों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आ सकते हैं। यह स्तुति मानसिक शांति, आत्म-संतोष, और भावनात्मक संतुलन प्रदान करने में सहायक होती है। गंगा स्तुति के माध्यम से भक्त अपने दुखों और समस्याओं से उबर सकते हैं और आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

गंगा स्तुति सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। यह भारतीय संस्कृति और धार्मिकता की पहचान को मजबूत करती है और समाज में एकता और अखंडता को बढ़ावा देती है। गंगा स्तुति के माध्यम से लोग अपने धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों को सहेज सकते हैं और उन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचा सकते हैं।

स्वास्थ्य लाभ

गंगा नदी के पानी को शुद्ध और औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है। स्तुति सुनने और गाने से मानसिक तनाव कम हो सकता है, जिससे शारीरिक स्वास्थ्य भी बेहतर हो सकता है। भक्तों को गंगा नदी में स्नान करने से शारीरिक और मानसिक शुद्धि प्राप्त होती है, जो उनके समग्र स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है।

धार्मिक और आध्यात्मिक जागरूकता

गंगा स्तुति धार्मिक और आध्यात्मिक जागरूकता को बढ़ावा देती है। यह भक्तों को गंगा नदी के महत्व और उसकी दिव्यता के बारे में जानने में मदद करती है। इसके माध्यम से लोग धार्मिकता और आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर हो सकते हैं और अपने जीवन में आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर सकते हैं।

सुख और समृद्धि की प्राप्ति

गंगा स्तुति करने से भक्तों को सुख और समृद्धि की प्राप्ति हो सकती है। यह स्तुति देवी गंगा की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने का एक तरीका है, जो जीवन में सुख, समृद्धि, और सफलता लाने में सहायक हो सकती है। भक्त इस स्तुति के माध्यम से गंगा माता की कृपा को अपने जीवन में महसूस कर सकते हैं और अपने जीवन की समस्याओं को दूर कर सकते हैं।

धार्मिक अनुष्ठानों में उपयोग

गंगा स्तुति धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा-पाठ में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसे विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ, और व्रतों में गाया जाता है, जो धार्मिक अनुष्ठानों की सफलता और प्रभावशीलता को बढ़ाते हैं। स्तुति को पूजा में शामिल करने से अनुष्ठान की दिव्यता और प्रभावशीलता बढ़ जाती है।

परंपरा और संस्कारों का संरक्षण

गंगा स्तुति भारतीय परंपरा और संस्कारों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसे गाकर और सुनकर लोग अपनी परंपराओं और संस्कारों को जीवित रखते हैं और उन्हें आगामी पीढ़ियों तक पहुंचाते हैं। स्तुति के माध्यम से धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण और संवर्धन होता है।

प्रेरणा और मानसिक शक्ति

गंगा स्तुति सुनने और गाने से मानसिक प्रेरणा और शक्ति प्राप्त होती है। यह भक्तों को आत्म-विश्वास, धैर्य, और सकारात्मकता के साथ जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रेरित करती है। स्तुति के माध्यम से लोग आत्म-समर्पण और दृढ़ता की भावना को जागृत कर सकते हैं।

स्तुति की धार्मिक और आध्यात्मिक लाभों की समझ से भक्त अपने जीवन को अधिक समृद्ध, पवित्र, और संतुलित बना सकते हैं। इस स्तुति के माध्यम से वे गंगा माता की कृपा प्राप्त कर सकते हैं और अपने जीवन को सही दिशा में मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं।

बुद्ध अमृतवाणी – Buddha Amritwani PDF 2025

बुद्ध अमृतवाणी (Buddha Amritwani Pdf) एक पवित्र और महत्वपूर्ण धार्मिक पाठ है जो भगवान बुद्ध की शिक्षाओं, उनके जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं, और बौद्ध धर्म के मूल सिद्धांतों का संकलन है। यह पाठ विशेष रूप से उन लोगों के लिए है जो आत्मिक शांति, मानसिक संतुलन, और जीवन की कठिनाइयों से मुक्ति पाना चाहते हैं। बुद्ध अमृतवाणी का पाठ न केवल धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह हमारे जीवन में व्यावहारिक और नैतिक मूल्यों को भी सुदृढ़ करता है। आप हमारी वेबसाइट में राम अमृतवाणी और दुर्गा अमृतवाणी भी पढ़ सकते हैं।

बुद्ध अमृतवाणी का महत्व

बुद्ध अमृतवाणी का महत्व अनंत है। भगवान बुद्ध ने मानवता को प्रेम, करुणा, और अहिंसा का संदेश दिया। उन्होंने यह सिखाया कि व्यक्ति अपने विचारों, शब्दों, और कर्मों के माध्यम से अपने जीवन को सुधार सकता है। बुद्ध अमृतवाणी में उनकी शिक्षाओं का संग्रह है जो हमें जीवन के सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। यह पाठ हमारे मन और आत्मा को शुद्ध करता है और हमें आत्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करता है।

भगवान बुद्ध की शिक्षाएं

भगवान बुद्ध की शिक्षाएं चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग पर आधारित हैं। चार आर्य सत्य इस प्रकार हैं:

  1. दुःख: जीवन में दुःख है।
  2. दुःख का कारण: दुःख का कारण तृष्णा है।
  3. दुःख का निवारण: तृष्णा का निवारण करके दुःख से मुक्त हुआ जा सकता है।
  4. दुःख निवारण का मार्ग: अष्टांगिक मार्ग का पालन करके दुःख से मुक्त हुआ जा सकता है।

अष्टांगिक मार्ग में आठ प्रमुख तत्व शामिल हैं: सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक प्रयास, सम्यक स्मृति, और सम्यक समाधि। बुद्ध अमृतवाणी में इन सभी तत्वों का विस्तार से वर्णन किया गया है और उन्हें अपने जीवन में लागू करने के लिए मार्गदर्शन प्रदान किया गया है।

बुद्ध अमृतवाणी का पाठ

बुद्ध अमृतवाणी का पाठ करने के लिए किसी विशेष समय या स्थान की आवश्यकता नहीं होती। इसे किसी भी समय, कहीं भी पढ़ा जा सकता है। लेकिन, यदि इसे शांत और पवित्र स्थान पर, ध्यान मुद्रा में बैठकर पढ़ा जाए, तो इसके लाभ अधिक होते हैं। इस पाठ को पढ़ते समय हमें अपने मन को केंद्रित करना चाहिए और पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान बुद्ध की शिक्षाओं का स्मरण करना चाहिए।

लाभ

बुद्ध अमृतवाणी का नियमित पाठ करने से हमें कई लाभ प्राप्त होते हैं:

आत्मिक शांति: यह पाठ हमें मानसिक और आत्मिक शांति प्रदान करता है।

सकारात्मक ऊर्जा: यह हमारे चारों ओर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और नकारात्मकता को दूर करता है।

जीवन की कठिनाइयों से मुक्ति: भगवान बुद्ध की शिक्षाओं का अनुसरण करके हम जीवन की कठिनाइयों का सामना करने में सक्षम होते हैं।

सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा: यह पाठ हमें सत्य, अहिंसा, और करुणा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

स्वास्थ्य लाभ: मानसिक शांति और सकारात्मकता के कारण हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।



|| बुद्ध अमृतवाणी ||
|| BUDDHA AMRITWANI PDF ||

त्रिशरणम

बुद्धं शरणं गच्छामि।
धम्मं शरणं गच्छामि।
सङ्घं शरणं गच्छामि।

त्रिशरणम् (तीन बार)

द्वितीयं पि बुद्धं शरणं गच्छामि।
द्वितीयं पि धम्मं शरणं गच्छामि।
द्वितीयं पि सङ्घं शरणं गच्छामि।

तृतीयं पि बुद्धं शरणं गच्छामि।
तृतीयं पि धम्मं शरणं गच्छामि।
तृतीयं पि सङ्घं शरणं गच्छामि।

पंचशील

– पाणातिपाता वेरमणि सिक्खापदं समादियामि।
– अदिन्नादाना वेरमणि सिक्खापदं समादियामि।
– कामेसुमिच्छाचार वेरमणि सिक्खापदं समादियामि।
– मुसावादा वेरमणि सिक्खापदं समादियामि।
– सुरामेरय-मज्जपमादट्ठाना वेरमणि सिक्खापदं समादियामि।

बुद्ध वंदना

नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स।
नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स।
नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स।

बुद्धा अमृतवाणी

हे बुद्ध महान, करुणा के सागर, तुम्हारी शिक्षा में, हम पाएं निरंतर।
दुखों का नाश हो, सुख का संचार हो, तुम्हारी कृपा से, जीवन साकार हो।

हे धम्म महान, सत्य की राह दिखाओ, अज्ञान का अंधकार, कृपा से मिटाओ।
तुम्हारे संदेश से, हम सब जगाएं, शांति और प्रेम का, संकल्प बढ़ाएं।

हे संघ महान, संगति का बल हो, मिलजुलकर चलें, सबका कल्याण हो।
तुम्हारे सहारे से, हम आगे बढ़ें, सद्मार्ग पर चलें, और सफल हों।

बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि, सङ्घं शरणं गच्छामि, यही हमारा प्रण हो।
तुम्हारी अमृतवाणी, हमारे मन में बसे, हर कदम पर हमें, सच्ची राह दिखाए।


बुद्ध को क्या खाकर निकलना चाहिए?

बुद्ध को भोजन का चयन करते समय हमेशा साधारण और संतुलित आहार की सलाह दी जाती है। वे विशेष रूप से हल्का, पौष्टिक, और अहिंसक भोजन ग्रहण करते थे, जैसे फल, सब्जियाँ, और अनाज। बुद्ध ने अपने अनुयायियों को भी यही सिखाया कि भोजन को संयम और साधना के साथ ग्रहण किया जाए।

क्या बुद्ध बुद्धिमान थे?

हाँ, भगवान बुद्ध अत्यंत बुद्धिमान और ज्ञानवान थे। उन्होंने अपने जीवन की सभी कठिनाइयों और प्रश्नों का समाधान अपनी गहन बुद्धि और ध्यान द्वारा खोजा। उनके शिक्षाएं और दर्शन आज भी मानवता के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शक हैं और उन्हें महान विचारक और ज्ञानवर्धक माना जाता है।

गौतम बुद्ध ने संन्यास क्यों लिया?

गौतम बुद्ध ने संन्यास इसलिए लिया क्योंकि उन्होंने अपने राजसी जीवन के भौतिक सुखों और ऐश्वर्य के बावजूद जीवन की अस्थिरता, दुःख, और मृत्यु की सच्चाइयों का सामना किया। उन्होंने समझा कि इन समस्याओं का समाधान केवल आध्यात्मिक साधना और ज्ञान के माध्यम से संभव है। संन्यास लेकर उन्होंने स्वयं को आत्मज्ञान प्राप्त करने और दुःख के कारणों को समझने के लिए समर्पित किया।

बुद्ध ने हिंदू धर्म क्यों छोड़ा?

बुद्ध ने हिंदू धर्म को इसलिए छोड़ा क्योंकि उन्होंने पाया कि उसके धार्मिक प्रथाएँ और उपासनाएँ मानव दुःख और मोक्ष के प्रश्नों का समाधान नहीं करती थीं। उन्होंने खुद के अनुभव और आत्मा के गहन ज्ञान के आधार पर एक नया मार्ग अपनाया, जिसे उन्होंने “धम्म” कहा। यह मार्ग बौद्ध धर्म के रूप में स्थापित हुआ, जिसमें ध्यान, समर्पण, और सत्य की खोज पर जोर दिया गया।

क्या गौतम बुद्ध शाकाहारी थे?

गौतम बुद्ध ने शाकाहारी आहार को प्रोत्साहित किया, लेकिन वे स्वयं पूर्णतः शाकाहारी नहीं थे। वे विशेष रूप से उन अन्नों को ग्रहण करते थे जो दूसरों द्वारा उन्हें भेंट किए जाते थे। बौद्ध धर्म में आमतौर पर शाकाहारी आहार का समर्थन किया जाता है, लेकिन बुद्ध के समय में अन्न के प्रकार और परंपराएं भिन्न हो सकती थीं।

बुद्ध के योग गुरु कौन थे?

भगवान बुद्ध के कई योग गुरु थे, जिनमें प्रमुख हैं:

उड्डक रामापुत्र: बुद्ध ने उनसे ध्यान और साधना की विधियों को सीखा।

अलार कलामा: उन्होंने ध्यान और मानसिक विकास की तकनीकें सिखाईं। हालांकि, भगवान बुद्ध ने अंततः खुद की ध्यान की विधियों और साधना की खोज की और अपने स्वयं के साधना मार्ग को विकसित किया, जिसे बौद्ध धर्म के रूप में जाना जाता है।

महाकाल का स्तोत्र: श्री कालभैरवाष्टकम् – Kaal Bhairav Ashtakam PDF 2025

श्री काल भैरव अष्टकम् (Kaal Bhairav Ashtakam PDF) एक दिव्य स्तोत्र है जो भगवान कालभैरव को समर्पित है। यह अष्टकम् संस्कृत में रचित है और इसमें कुल आठ श्लोक होते हैं। भगवान कालभैरव, जिन्हें तंत्र और भैरव संप्रदाय में विशेष महत्व प्राप्त है, भगवान शिव के क्रोधस्वरूप और संहारक रूप के रूप में पूजे जाते हैं। उनका उद्देश्य अज्ञानता, बुराई और विघ्नों का नाश करना है, और वे अपने भक्तों को संकटों से उबारने के लिए जाने जाते हैं। आप श्री काल भैरव चालीसा का भी पाठ कर सकते हैं

श्री काल भैरव अष्टकम् की रचना धार्मिक ग्रंथों में वर्णित शक्तिशाली मंत्रों और स्तोत्रों में से एक है। इसे विशेष रूप से उन भक्तों के लिए रचित गया है जो भगवान कालभैरव की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं और अपने जीवन में मानसिक शांति, सुरक्षा और समृद्धि की खोज में हैं। इस स्तोत्र में भगवान कालभैरव की आठ विशेषताओं और उनकी दिव्य शक्तियों का उल्लेख किया गया है, जो भक्तों को कठिनाइयों से उबारने और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करने में मदद करती हैं।

श्री कालभैरव अष्टकम् का पाठ भक्तों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का एक प्रभावी साधन है। यह श्लोक न केवल आध्यात्मिक जागरूकता बढ़ाता है, बल्कि जीवन की हर परिस्थिति में स्थिरता और संबल प्रदान करता है।


  • हिंदी / संस्कृत
  • English

|| श्री काल भैरव अष्टकम् ||

देवराजसेव्यमानपावनांघ्रिपङ्कजं व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम् ।
नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगंबरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ १॥

भानुकोटिभास्वरं भवाब्धितारकं परं नीलकण्ठमीप्सितार्थदायकं त्रिलोचनम् ।
कालकालमंबुजाक्षमक्षशूलमक्षरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ २॥

शूलटंकपाशदण्डपाणिमादिकारणं श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम् ।
भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ३॥

भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहं भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम् ।
विनिक्वणन्मनोज्ञहेमकिङ्किणीलसत्कटिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥ ४॥

धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशनं कर्मपाशमोचकं सुशर्मधायकं विभुम् ।
स्वर्णवर्णशेषपाशशोभितांगमण्डलं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ५॥

रत्नपादुकाप्रभाभिरामपादयुग्मकं नित्यमद्वितीयमिष्टदैवतं निरंजनम् ।
मृत्युदर्पनाशनं करालदंष्ट्रमोक्षणं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ६॥

अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसंततिं दृष्टिपात्तनष्टपापजालमुग्रशासनम् ।
अष्टसिद्धिदायकं कपालमालिकाधरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ७॥

भूतसंघनायकं विशालकीर्तिदायकं काशिवासलोकपुण्यपापशोधकं विभुम् ।
नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ८॥

॥ फल श्रुति॥

कालभैरवाष्टकं पठंति ये मनोहरं ज्ञानमुक्तिसाधनं विचित्रपुण्यवर्धनम् ।
शोकमोहदैन्यलोभकोपतापनाशनं प्रयान्ति कालभैरवांघ्रिसन्निधिं नरा ध्रुवम् ॥

॥इति कालभैरवाष्टकम् संपूर्णम् ॥

|| Kaal Bhairav Ashtakam Lyrics in English ||

Deva-Raaja-Sevyamaana-Paavana-Angghri-Pankajam
Vyaala-Yajnya-Suutram-Indu-Shekharam Krpaakaram |
Naarada-[A]adi-Yogi-Vrnda-Vanditam Digambaram
Kaashikaa-Pura-Adhinaatha-Kaalabhairavam Bhaje ||1||

Bhaanu-Kotti-Bhaasvaram Bhavaabdhi-Taarakam Param
Niila-Kannttham-Iipsita-Artha-Daayakam Trilocanam |
Kaala-Kaalam-Ambuja-Akssam-Akssa-Shuulam-Akssaram
Kaashikaa-Pura-Adhinaatha-Kaalabhairavam Bhaje ||2||

Shuula-Tanka-Paasha-Danndda-Paannim-Aadi-Kaarannam
Shyaama-Kaayam-Aadi-Devam-Akssaram Nir-Aamayam |
Bhiimavikramam Prabhum Vichitra-Taannddava-Priyam
Kaashikaa-Pura-Adhinaatha-Kaalabhairavam Bhaje ||3||

Bhukti-Mukti-Daayakam Prashasta-Caaru-Vigraham
Bhakta-Vatsalam Sthitam Samasta-Loka-Vigraham |
Vi-Nikvannan-Manojnya-Hema-Kinkinnii-Lasat-Kattim
Kaashikaa-Pura-Adhinaatha-Kaalabhairavam Bhaje ||4||

Dharma-Setu-Paalakam Tva-Adharma-Maarga-Naashakam
Karma-Paasha-Mocakam Su-Sharma-Daayakam Vibhum |
Svarnna-Varnna-Shessa-Paasha-Shobhitaangga-Mannddalam
Kaashikaa-Pura-Adhinaatha-Kaalabhairavam Bhaje ||5||

Ratna-Paadukaa-Prabhaabhi-Raama-Paada-Yugmakam
Nityam-Advitiiyam-Isstta-Daivatam Niramjanam |
Mrtyu-Darpa-Naashanam Karaala-Damssttra-Mokssannam
Kaashikaa-Pura-Adhinaatha-Kaalabhairavam Bhaje ||6||

Atttta-Haasa-Bhinna-Padmaja-Anndda-Kosha-Samtatim
Drsstti-Paata-Nasstta-Paapa-Jaalam-Ugra-Shaasanam |
Asstta-Siddhi-Daayakam Kapaala-Maalikaa-Dharam
Kaashikaa-Pura-Adhinaatha-Kaalabhairavam Bhaje ||7||

Bhuuta-Samgha-Naayakam Vishaala-Kiirti-Daayakam
Kaashi-Vaasa-Loka-Punnya-Paapa-Shodhakam Vibhum |
Niiti-Maarga-Kovidam Puraatanam Jagatpatim
Kaashikaapuraadhinaathakaalabhairavam Bhaje ||8||

Kaalabhairavaassttakam Patthamti Ye Manoharam
Jnyaana-Mukti-Saadhanam Vicitra-Punnya-Vardhanam |
Shoka-Moha-Dainya-Lobha-Kopa-Taapa-Naashanam
Prayaanti Kaalabhairava-Amghri-Sannidhim Naraa Dhruvam ||9||

Ithi Srimatsankaracharya virachitam Kalabhairava Ashtakam Sampoornam ||



कालभैरव अष्टकम् के लाभ

कालभैरव अष्टकम् के नियमित पाठ के कई लाभ होते हैं। सबसे पहले, यह मानसिक शांति और स्थिरता प्रदान करता है। जब व्यक्ति जीवन की समस्याओं और तनावों से जूझ रहा होता है, तब यह स्तोत्र उसे मानसिक संबल प्रदान करता है और उसकी चिंताओं को दूर करता है।

दूसरे, यह श्लोक व्यक्ति की समृद्धि और सफलता में वृद्धि करने में सहायक होता है। इसे नियमित रूप से पढ़ने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं और उसकी वित्तीय स्थिति में सुधार होता है। यह व्यवसायिक सफलता, पदोन्नति और आर्थिक समृद्धि के लिए भी अत्यंत लाभकारी है।

तीसरे, कालभैरव अष्टकम् का पाठ सुरक्षा और रक्षा की भावना को भी प्रबल करता है। भगवान कालभैरव की उपासना से व्यक्ति को विभिन्न तरह की बुराईयों और संकटों से बचाव प्राप्त होता है। वह व्यक्ति को शत्रुओं से रक्षा और आत्मरक्षा में सक्षम बनाता है।

अंततः, इस स्तोत्र के पाठ से व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति होती है। यह आत्मज्ञान और आत्मविकास की ओर मार्गदर्शन करता है, जिससे व्यक्ति अपने जीवन के उद्देश्य को समझ सकता है और उसकी प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ सकता है।


कालभैरवाष्टकम् का महत्व

कालभैरव अष्टकम् का महत्व हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह एक पवित्र श्लोक है जो भगवान कालभैरव को समर्पित है। भगवान कालभैरव को तंत्र और भैरव संप्रदाय में प्रमुख देवता माना जाता है। वह भगवान शिव के क्रोधस्वरूप और संहारक रूप में जाने जाते हैं। उनका उद्देश्य अज्ञानता और बुराई का नाश करना है।

कालभैरव अष्टकम् में भगवान कालभैरव की आठ शक्तियों और उनके गुणों का वर्णन किया गया है। इस स्तोत्र के पाठ से भक्त भगवान कालभैरव की कृपा प्राप्त कर सकते हैं और उनके जीवन में सुख-समृद्धि ला सकते हैं। यह स्तोत्र आध्यात्मिक जागरूकता, मानसिक शांति और कठिनाइयों से मुक्ति दिलाने में सहायक होता है। विशेष रूप से, यह उन व्यक्तियों के लिए अत्यधिक लाभकारी है जो जीवन में तनाव और अस्थिरता का सामना कर रहे हैं।


  • Hindi
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कालभैरव अष्टकम का हिंदी में अर्थ

मैं काशी के स्वामी कालभैरव की स्तुति करता हूँ, जो अपने चरण कमलों से सुशोभित हैं, जिनकी पूजा और सेवा इंद्र (देवराज) करते हैं, जो सर्प को पवित्र धागे के रूप में धारण करते हैं, जिनके माथे पर चंद्रमा है, जो दया के धाम हैं, जिनकी स्तुति नारद और अन्य योगी करते हैं, और जो आकाश को अपने वस्त्र के रूप में धारण करते हैं।

मैं काशी के स्वामी कालभैरव की स्तुति करता हूँ, जो करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी हैं, जो पुनर्जन्म के चक्र के सागर को नष्ट करते हैं, जो सर्वोच्च हैं, जिनकी गर्दन नीली है, जो किसी की भी इच्छा पूरी करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो मृत्यु के भी काल हैं, जिनके कमल जैसे नेत्र हैं, जिनका त्रिशूल संसार को सहारा देता है और जो अमर हैं।

मैं काशी के स्वामी कालभैरव की स्तुति करता हूँ, जिनके हाथों में एकदंत, कुदाल, पाश और गदा है, जो आदि के कारण हैं, जिनका शरीर भस्म से लिपटा हुआ है, जो आदिदेव हैं, जो अविनाशी हैं, जो रोग और आरोग्य से रहित हैं, जो अत्यन्त शक्तिशाली हैं, तथा जिन्हें विशेष ताण्डव नृत्य प्रिय है।

मैं काशी के स्वामी कालभैरव की स्तुति करता हूँ, जो कामनाओं और मोक्ष के दाता हैं, जिनका स्वरूप मोहक है, जो अपने भक्तों के प्रति प्रेम करने वाले हैं, जो स्थिर हैं, जो अनेक रूप धारण करके संसार का निर्माण करते हैं, तथा जिनके पास सुन्दर स्वर्णिम करधनी है, जिसमें छोटी-छोटी मधुर घंटियाँ हैं।

मैं काशी के स्वामी कालभैरव की स्तुति करता हूँ, जो धर्म के पालनकर्ता हैं, जो अधर्म के मार्गों के नाश करने वाले हैं, जो हमें कर्मों के बन्धनों से मुक्त करते हैं, जो तेजस्वी हैं, तथा जिनके शरीर में स्वर्णिम सर्प सुशोभित हैं।

मैं काशी के स्वामी कालभैरव की स्तुति करता हूँ, जिनके पैरों में दो स्वर्ण पादुकाएँ हैं, जिनकी कान्ति अत्यन्त तेजस्वी है, जो नित्य हैं, जो अद्वितीय हैं, जो हमारी कामनाओं को पूर्ण करते हैं, जो कामनाओं से रहित हैं, जो यमराज या मृत्यु के देवता के अभिमान को नष्ट करते हैं, तथा जिनके दाँत हमें मुक्ति प्रदान करते हैं।

मैं काशी के स्वामी कालभैरव की स्तुति करता हूँ, जिनकी गर्जना कमल-जनित ब्रह्मा द्वारा निर्मित समस्त सृष्टि को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है, जिनकी कृपा दृष्टि समस्त पापों को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है, जो अष्ट-शक्तियों को प्रदान करते हैं, तथा जो मुंडों की माला धारण करते हैं।

मैं काशी के स्वामी कालभैरव की स्तुति करता हूँ, जो भूत-प्रेतों के नेता हैं, जो अपार महिमा की वर्षा करते हैं, जो काशी में रहने वाले लोगों को उनके पापों और पुण्यों से मुक्त करते हैं, जो तेजस्विता हैं, जिन्होंने हमें धर्म का मार्ग दिखाया है, जो नित्य हैं, तथा जो ब्रह्मांड के स्वामी हैं।

Kalabhairava Ashtakam Meaning in English

I sing praise of Kalabhairava, the lord of Kashi, who is adorned by lotus-feet which is revered and served by Indra (Devaraj), Who wears a snake as a sacred thread, who has the moon on his forehead, who is the abode of mercy, whose praises are sung by Narada and other yogis, and who wears the sky as his raiment.

I sing praise of Kalabhairava, the lord of Kashi, who is resplendent like millions of Suns, who absolves the ocean of cycle of rebirth, who is supreme, who has a blue neck, who fulfils one’s desires, who has three-eyes, who is the death of death, who has lotus-like eyes, whose trident supports the world and who is immortal.

I sing praise of Kalabhairava, the lord of Kashi, who has a monodent, a spade, a noose and a club in his hands, who is the cause behind the beginning, who has an ash smeared body, Who is the first God, who is imperishable, who is free from illness and health, who is immensely mighty, and who loves the special Tandava dance.

I sing praise of Kalabhairava, the lord of Kashi, who is the bestower of desires and salvation, who has an enticing appearance, who is loving to his devotees, who is stable, who takes various manifestations and forms the world, and who has a beautiful golden belt with small melodious bells.

I sing praise of Kalabhairava, the lord of Kashi, who is the maintainer of dharma, who is the destroyer of unrighteous paths, who liberates us from the bonds of Karma or deeds, who is splendid, and whose is adorned with golden snakes.

I sing praise of Kalabhairava, the lord of Kashi, who has feet adorned by two golden sandals, who has a resplendent shine, who is eternal, who is inimitable, who bestows our desires to us, who is without desires, who destroys the pride of Yama or the God of death, and whose teeth liberate us.

I sing praise of Kalabhairava, the lord of Kashi, whose loud roar is enough to destroy all the manifestations created by the lotus-born Brahma, whose merciful glance is enough to destroy all sins, who bestows the eight-powers, and who wears a garland of skulls.

I sing praise of Kalabhairava, the lord of Kashi, who is the leader of the ghosts and spirits, who showers immense glory, who absolves people dwelling in Kashi both from their sins and virtues, who is splendor, who has shown us the path of righteousness, who is eternal, and who is the lord of the universe.


कालभैरव अष्टकम् का पाठ

कालभैरव अष्टकम् का पाठ करने से पूर्व कुछ महत्वपूर्ण बातें ध्यान में रखनी चाहिए। सबसे पहले, पाठ को शुद्धता और भक्तिभाव से करना चाहिए। इसके लिए एक शांत और पवित्र स्थान पर बैठकर इसे पढ़ना उत्तम रहता है। ध्यान केंद्रित करने के लिए इस पाठ को नियमित रूप से करना चाहिए, सुबह के समय।

दूसरे, पाठ के समय श्रद्धा और विश्वास से शब्दों का उच्चारण करना महत्वपूर्ण है। श्लोक के अर्थ को समझते हुए और भगवान कालभैरव की गुणों को ध्यान में रखते हुए पाठ करना चाहिए। इससे पाठ की शक्ति और प्रभाव में वृद्धि होती है।

तीसरे, यदि संभव हो तो, पाठ के बाद भगवान कालभैरव के प्रति आभार व्यक्त करें और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करने की प्रार्थना करें। यह आपके मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन को बनाए रखने में सहायक होगा।


FAQs – श्री काल भैरव अष्टकम् – Kaal Bhairav Ashtakam

1. काल भैरव अष्टकम कौन है?

काल भैरव अष्टकम एक प्रसिद्ध स्तोत्र है जो भगवान काल भैरव की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र आदिगुरु श्री आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाता है। इसमें भगवान काल भैरव के विभिन्न रूपों और उनके शक्तिशाली स्वरूप का वर्णन किया गया है। भगवान काल भैरव को शिव के उग्र रूप के रूप में पूजा जाता है, जो समय (काल) के स्वामी और मृत्यु के देवता हैं।

वह न्याय और धर्म के रक्षक माने जाते हैं, और उनकी पूजा से जीवन की बाधाएं, भय, और नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं। काल भैरव अष्टकम की आठ श्लोकों में उनकी अद्भुत शक्ति, सौंदर्य और गुणों का गुणगान किया गया है। यह माना जाता है कि इसे श्रद्धा और विश्वास के साथ पढ़ने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता, समृद्धि, और शांति आती है। काल भैरव अष्टकम भक्तों को उनके भय, दुख, और संकटों से मुक्ति दिलाने में मदद करता है और उन्हें एक नई ऊर्जा प्रदान करता है। यह स्तोत्र विशेष रूप से भैरवाष्टमी और काल भैरव जयंती पर पढ़ा जाता है, लेकिन इसे नियमित रूप से पढ़ने से भी अत्यधिक लाभ प्राप्त होते हैं।

2. काल भैरव का मंत्र कौन सा है?

काल भैरव के कई मंत्र हैं जो उनकी पूजा और आराधना में उपयोग किए जाते हैं। सबसे प्रचलित और शक्तिशाली मंत्रों में से एक है:

“ॐ कालभैरवाय नमः”

यह मंत्र भगवान काल भैरव के लिए अर्पित किया जाता है, और इसे जपने से भक्तों को शक्ति, साहस, और संकटों से मुक्ति प्राप्त होती है। भगवान काल भैरव, जिन्हें शिव का एक उग्र रूप माना जाता है, को प्रसन्न करने के लिए यह मंत्र अत्यंत प्रभावशाली है। इस मंत्र का जप करने से व्यक्ति को सुरक्षा मिलती है और नकारात्मक ऊर्जा से बचाव होता है।

दूसरा एक प्रसिद्ध मंत्र है:

“ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ स्वाहा”

यह मंत्र विशेष रूप से संकटों और बाधाओं से मुक्ति के लिए जपा जाता है। मान्यता है कि इस मंत्र का नियमित जाप करने से जीवन में आने वाली समस्याएं दूर होती हैं और व्यक्ति को भौतिक और आध्यात्मिक प्रगति मिलती है। मंत्र का सही उच्चारण और एकाग्रता के साथ जाप करने से भगवान काल भैरव की कृपा प्राप्त होती है और भक्त को आत्मिक शांति मिलती है।

3. काल भैरव को कैसे सिद्ध किया जाता है?

काल भैरव की साधना और सिद्धि के लिए अनुशासन, एकाग्रता और भक्ति की आवश्यकता होती है। उन्हें सिद्ध करने के लिए विशेष रूप से उनकी मंत्रों का जाप, पूजन, और ध्यान किया जाता है। सिद्धि प्राप्त करने के कुछ प्रमुख तरीके निम्नलिखित हैं:

– मंत्र जाप: काल भैरव के मंत्रों का नियमित और सटीक जाप करना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। जैसे “ॐ कालभैरवाय नमः” या “ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय स्वाहा” मंत्र का रोजाना जाप करके भगवान काल भैरव की कृपा प्राप्त की जा सकती है।

पूजन: काल भैरव की मूर्ति या चित्र के सामने दीप जलाकर और उन्हें तिलक, फूल, नैवेद्य अर्पण कर पूजा की जाती है। पूजा में काले तिल, काले वस्त्र, और सरसों का तेल विशेष रूप से उपयोग किया जाता है।

– विशेष दिन: काल भैरव की सिद्धि के लिए भैरवाष्टमी, अमावस्या, और अष्टमी के दिन विशेष माने जाते हैं। इन दिनों पर भगवान की आराधना करने से साधक को विशेष लाभ होता है।

ध्यान और एकाग्रता: ध्यान और एकाग्रता के साथ भगवान काल भैरव का ध्यान करना और उनकी शक्तियों का आह्वान करना भी आवश्यक होता है। यह साधक को आध्यात्मिक ऊँचाइयों तक ले जाता है।

काल भैरव की साधना एक गुप्त और शक्तिशाली साधना मानी जाती है, और इसे विधिपूर्वक और सही मार्गदर्शन में किया जाना चाहिए।

4. काल भैरव कितना शक्तिशाली है?

काल भैरव को अत्यधिक शक्तिशाली देवता माना जाता है, जो समय और मृत्यु के स्वामी हैं। वह शिव का उग्र और क्रोधमय रूप हैं, जिनकी शक्ति अनंत और असीमित है। काल भैरव के पास पूरे ब्रह्मांड को नियंत्रित करने की क्षमता है, और वे समय के प्रवाह को भी नियंत्रित कर सकते हैं। उनकी पूजा से भक्तों को अनेक प्रकार की समस्याओं से मुक्ति मिलती है, जैसे कि भय, संकट, और जीवन के बड़े-बड़े अवरोध। उन्हें न्याय के देवता माना जाता है, जो धर्म की रक्षा करते हैं और अधर्म का नाश करते हैं।

काल भैरव की शक्ति उनकी उग्रता में नहीं, बल्कि उनके संरक्षण में भी है। वे अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और उन्हें बुरी शक्तियों और नकारात्मक ऊर्जा से बचाते हैं। उनकी पूजा से व्यक्ति को साहस, आत्मविश्वास, और मानसिक शक्ति मिलती है। साथ ही, काल भैरव को मार्ग का रक्षक भी माना जाता है, जो यात्रा के दौरान सुरक्षा प्रदान करते हैं।

उनकी शक्ति इतनी महान है कि वे जीवन के सभी पहलुओं को प्रभावित कर सकते हैं—भौतिक, मानसिक, और आध्यात्मिक। जो व्यक्ति भक्ति भाव से उनकी आराधना करता है, उसे काल भैरव की कृपा से सफलता, समृद्धि, और शांति प्राप्त होती है।

5. कालभैरव अष्टकम पढ़ने से क्या होता है?

कालभैरव अष्टकम एक अत्यधिक पवित्र और शक्तिशाली स्तोत्र है, जो भगवान काल भैरव की महिमा का गुणगान करता है। इसे पढ़ने से कई आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं।

भय और संकट से मुक्ति: काल भैरव को भय का नाशक माना जाता है, और अष्टकम का नियमित पाठ करने से व्यक्ति को जीवन में आने वाले भय, संकट, और परेशानियों से मुक्ति मिलती है।

आत्मविश्वास और साहस: कालभैरव अष्टकम पढ़ने से व्यक्ति के अंदर आत्मविश्वास और साहस का संचार होता है। यह मानसिक शक्ति बढ़ाने में मदद करता है और कठिनाइयों का सामना करने की क्षमता प्रदान करता है।

नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा: इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति को नकारात्मक ऊर्जा, बुरी शक्तियों, और बुरे प्रभावों से सुरक्षा मिलती है। यह घर और परिवार के लिए भी सुरक्षा कवच का काम करता है।

समृद्धि और शांति: कालभैरव अष्टकम का पाठ करने से जीवन में समृद्धि और शांति का आगमन होता है। यह व्यक्ति के मन और आत्मा को शांत करता है और मानसिक शांति प्रदान करता है।

आध्यात्मिक प्रगति: काल भैरव की आराधना और अष्टकम का पाठ करने से व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति होती है। यह व्यक्ति को धर्म और अध्यात्म के मार्ग पर अग्रसर करता है और उसे मुक्ति के मार्ग पर ले जाता है।

6. क्या मैं पीरियड्स पर काल भैरव अष्टकम सुन सकती हूं?

धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यताओं के संदर्भ में, महिलाओं के मासिक धर्म (पीरियड्स) के दौरान धार्मिक कार्यों और पूजा में भाग लेने को लेकर विभिन्न विचारधाराएं हैं। आधुनिक दृष्टिकोण से, पीरियड्स एक स्वाभाविक और जैविक प्रक्रिया है, और इसे अशुद्धता से जोड़ना सही नहीं माना जाता। अतः पीरियड्स के दौरान काल भैरव अष्टकम सुनने या पढ़ने में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए।

काल भैरव अष्टकम सुनने या पाठ करने का मुख्य उद्देश्य भगवान काल भैरव की महिमा का गुणगान करना और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करना होता है। भक्ति और श्रद्धा का संबंध व्यक्ति की आंतरिक शुद्धता और भावना से होता है, न कि बाहरी शारीरिक स्थिति से। यदि आप श्रद्धा और भक्ति के साथ अष्टकम सुनना या पढ़ना चाहती हैं, तो आप इसे कर सकती हैं, भले ही पीरियड्स हो रहे हों।

हालांकि, यह भी जरूरी है कि आप अपनी धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं के आधार पर निर्णय लें, क्योंकि कुछ परंपराएं इन मुद्दों पर अलग दृष्टिकोण रखती हैं। अंततः, भक्ति का मूल उद्देश्य भगवान से जुड़ना और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करना होता है, और इसमें शारीरिक स्थिति कोई बाधा नहीं होनी चाहिए।

महामाया अष्टकम् – Mahamaya Ashtakam PDF 2025

महामाया अष्टकम् (Mahamaya Ashtakam PDF) देवी महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की स्तुति में रचित एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र देवी दुर्गा के “महामाया” रूप का वर्णन करता है, जिन्हें सृष्टि, पालन और संहार की शक्ति के रूप में पूजा जाता है। महामाया को जगत की समस्त शक्तियों और रहस्यमयी शक्तियों का स्रोत माना गया है।

इस अष्टक का रचयिता आदि शंकराचार्य माने जाते हैं, जिन्होंने वैदिक परंपरा के अनुसार देवियों की महिमा का गुणगान किया। महामाया अष्टकम् में आठ श्लोक हैं, जो देवी के विभिन्न स्वरूपों और उनकी शक्तियों का वर्णन करते हैं। इसमें देवी की अनंत करुणा, उनकी अद्वितीय शक्ति और उनके रक्षक रूप का गुणगान किया गया है।

यह स्तोत्र भक्तों को यह समझाने का प्रयास करता है कि देवी महामाया ही इस संसार को चलाने वाली मूल शक्ति हैं। उनके बिना सृष्टि का अस्तित्व संभव नहीं है। वह जन्म-मरण के बंधनों को काटने वाली और भक्तों को मोक्ष प्रदान करने वाली हैं।

महामाया अष्टकम् का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। यह स्तोत्र विशेष रूप से नवरात्रि और दुर्गा पूजा के समय पढ़ा जाता है। यह न केवल आध्यात्मिक शांति देता है बल्कि आत्मबल और सकारात्मक ऊर्जा भी प्रदान करता है।

संक्षेप में, महामाया अष्टकम् का महत्व केवल धार्मिक दृष्टिकोण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन को एक सकारात्मक और ऊर्जावान दृष्टिकोण देने का मार्गदर्शन करता है। भक्त इसे श्रद्धा और विश्वास के साथ पाठ करें तो उनकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

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महामाया अष्टकम् हिन्दी में पढ़ें

भद्रकाळी बिश्बमाता जगत्स्रोत कारिणी
शिबपत्नी पापहर्त्री सर्वभूत तारिणी
स्कन्दमाता शिवा शिवा सर्वसृष्टि धारिणी
नमः नमः महामाय़ा ! हिमाळय-नन्दिनी ॥ १

नारीणाम्च संखिन्यापि हस्तिनी बा चित्रिणी
पद्मगन्धा पुष्परूपा सम्मोहिनी पद्मिनी
मातृ-पुत्री-भग्नि-भार्य़ा सर्वरूपा भबानी
नमः नमः महामाय़ा ! भबभय-खण्डिनी ॥ २

पाप-ताप-भब-भय़ भूतेश्बरी कामिनी
तब-कृपा-सर्व-क्षय सर्वजना-बन्दिनी
प्रेम-प्रीति-लज्जा-न्याय नारीणाञ्च-मोहिनी
नमः नमः महामाय़ा ! ॠण्डमाळा-धारिणी ॥ ३

खड्ग-चक्र-हस्तेधारी संखीनि-सुनादिनी
संमोहना-रूपा-नारी हृदय-विदारिणी
अहंकार-कामरूपा-भुवन-विळासिनी
नमः नमः महामाय़ा ! जगत-प्रकाशिनी ॥ ४

लह्व-लह्व-तब-जिह्वा पापाशुर मर्द्धिनी
खण्ड-गण्ड-मुण्ड-स्पृहा शोभाकान्ति बर्द्धिनी
अङ्ग-भङ्ग-रंग-काय़ा माय़ाछन्द छन्दिनी
नमः नमः महामाय़ा ! दुःखशोक नाशिनी ॥ ५

धन-जन-तन-मान रूपेण त्वम् संस्थिता
काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद बापि मूढता
निद्राहार-काम-भय़ पशुतुल्य़ जीबनात्
नमः नमः महामाय़ा ! कुरु मुक्त बन्धनात् ॥ ६

मैत्री-दय़ा-लक्ष्मी-बृत्ति-अन्ते जीब लक्षणा
लज्जा-छाय़ा-तृष्णा-क्षुधा बन्धनस्य़ कारणा
तुष्टि-बुद्धि-श्रद्धा-भक्ति सदा मुक्ति दाय़ीका
शान्ति-भ्रान्ति-क्ळान्ति-क्षान्ति तब रूपा अनेका
प्रीति-स्मृति-जाति-शक्ति-रूपा माय़ा अभेद्य़ा
नमः नमः महामाय़ा ! नमस्त्वम् महाबिद्य़ा ॥ ७

नबदुर्गा-महाकाळि सर्वाङ्गभूषाबृत्ताम्
भुबनेश्वरी-मातङ्गी हन्तु मधुकैटभं
विमळा-तारा-षोड़शी हस्ते खड्ग धारीणि
धुमाबति-मा-बगळा महिषासुर मर्द्धिनी
बाळात्रिपुरासुन्दरी त्रिभुबन मोहिनी
नमः नमः महामाय़ा ! सर्वदुःख हारिणी ॥ ८

मम माता लोके मर्त्त्य़ कृष्णदास तब भृत्त्य़
य़दा तदा य़था तथा माय़ा छिन्न मोक्ष कथा
सदा सदा तव भिक्षा कृपा दीने भब रक्षा
नम नम महामाय़ा कृष्ण दासे तब दय़ा ॥ ९

॥ इति कृष्णदास विरचित महामाय़ा अष्टकम् यः पठति सः भव सागर निस्तरति ॥

Mahamaya Ashtakam in English

Bhadrakali Vishvamata Jagatsrot Karini
Shibapatni Papahrtri Sarvabhoot Tarini
Skandamata Shiva Shiva Sarvasrshti Dharini
Namah Namah Mahamaya! Himalay-Nandini ॥ 1

Narinamach Sankhinyapi Hastini Ba Chitrini
Padmagandha Pushparoopa Sammohini Padmini
Matr-Putri-Bhagni-Bharya Sarvaroopa Bhabani
Namah Namah Mahamaya! Bhabhay-Khandini॥ 2

Pap-Tap-Bhab-Bhay Bhooteshabari Kamini
Tab-Krpa-Sarv-Kshay Sarvajan-Bandini
Prem-Priti-Lajja-Nyay Narinanch-Mohini
Namah Namah Mahamaya! Rndamala-Dharini॥ 3

Khadg-Chakr-Hastedhari Sankhini-Sunadini
Sammohana-Roopa-Nari Hrday-Vidarini
Vyavahar-Kamaroopa-Bhuvan-Vilasini
Namah Namah Mahamaya! Jagat-Prakashini॥ 4

Lahv-Lahv-Tab-Jihva Papashur Mardini
Khand-Gand-Mund-Sprha Shobhakanti Barddhini
Ang-Bhang-Rang-Kaya Mayachhandini
Namah Namah Mahamaya! Duhkhashok Nashini॥ 5

Dhan-Jan-Tan-Man Roopen Tvam Sansthita
Kam-Krodh-Lobh-Moh-Mad Bapi Moodhata
Pashu Nidrahar-Kam-Bhayyatuly Jibanat
Namah Namah Mahamaya! Kuru Mukt Bandhanat॥ 6

Maitri-Daya-Lakshmi-Brtti-Ante Jib Lakshana
Lajja-Chhaya-Trshna-Kshudha Bandhanasy Karan
Tushti-Buddhi-Shraddha-Bhakti Sada Mukti Dayika
Shanti-Bhranti-Kranti-Kanti Tab Roopa Anya
Priti-Smrti-Jati-Shakti-Roopa Maya Abhedy
Namah Namah Mahamaya! Namastvam Mahavidya॥ 7

Nabadurga-Mahakali Sarvangabhooshabrtam
Bhubaneshvari-Matngi Hantu Madhukaitabhan
Vimala-Tara-Kshodashi Haste Khadg Dharini
Dhumabati-Ma-Bagala Mahishasur Mardini
Balatripurasundari Tribhuvan Mohini
Namah Namah Mahamaya! Sarvaduhkh Harini॥ 8

Mam Mata Loke Mrtyah Krshnadas Tab Bhrtyah
Yada Tada Yatha Tatha Maya Chhinn Moksh Katha
Sada Sada Tav Bhiksha Krpa Dine Bhab Raksha
Nam Nam Mahamaya Krshn Dase Tab Daya ॥ 9

॥ Iti Krshnadas Virachit Mahamaya Ashtakam Yah Pathati Sah Bhav Sagar Nistarati ॥



महामाया अष्टकम् का अर्थ देवी महामाया की महिमा और शक्ति का गहन वर्णन है। यह स्तोत्र उनके अद्वितीय गुणों और विविध स्वरूपों का वर्णन करता है। यहाँ प्रत्येक श्लोक का सरल अर्थ प्रस्तुत है:

श्लोक 1
भद्रकाली, विश्व की माता, सृष्टि की स्रोतस्विनी, शिव की पत्नी और समस्त पापों की विनाशिनी हैं। वह सभी प्राणियों का उद्धार करती हैं। उनकी शक्ति और अनुग्रह को नमन करते हुए हिमालय की पुत्री को बार-बार प्रणाम।

Mahāmāyā is Bhadrakāli, the universal mother, and the source of all creation. She is Shiva’s consort and the destroyer of sins, protecting all beings. Hailing from the Himalayas, she is revered as the supreme goddess. I bow to her repeatedly.

श्लोक 2
देवी को विभिन्न रूपों में पूजा जाता है—वे स्त्रियों, हस्तिनियों और अन्य रूपों में प्रकट होती हैं। वे पद्म की सुगंध और पुष्पों के रूप में सम्मोहित करती हैं। देवी माँ भगवती सर्वरूपा हैं और संसार के भय का अंत करती हैं।

The goddess manifests in various forms, including women, elephants, and mystical shapes. She embodies the fragrance of lotus and the allure of flowers. She is the universal mother, sister, daughter, and wife, the source of all forms, and the remover of worldly fears.

श्लोक 3
देवी पाप, ताप और भौतिक भय का नाश करती हैं। उनकी कृपा से सब कष्ट समाप्त हो जाते हैं। प्रेम, लज्जा, और न्याय की प्रतिमूर्ति देवी महामाया को नमस्कार। वे रुद्राक्ष की माला धारण करती हैं।

Mahāmāyā destroys sin, suffering, and worldly fears. Her grace eradicates all afflictions. She is the personification of love, modesty, and justice, captivating all beings. She wears a garland of Rudrākṣa beads and is a source of divine compassion.

श्लोक 4
देवी खड्ग और चक्र धारण करती हैं, उनकी गर्जना से समस्त लोक मोहित होते हैं। वे अहंकार और काम को नष्ट करती हैं और समस्त ब्रह्मांड को प्रकाश देती हैं।

The goddess wields a sword and discus, and her resounding conch captivates the world. She pierces hearts with her fierce form and eradicates ego and desire. She illuminates the entire cosmos with her divine radiance.

श्लोक 5
देवी की जिह्वा से पापी और असुरों का नाश होता है। वे मुण्डमाल धारण करती हैं और उनके रूप से शोभा और शक्ति बढ़ती है। उनकी छाया दुःख और शोक को समाप्त करती है।

Her fiery tongue destroys sinners and demons. She adorns herself with a garland of severed heads, symbolizing her fierce aspect. Her presence dispels sorrow and grief, and she is the ultimate source of beauty and power.

श्लोक 6
देवी धन, जन, और तन के रूप में उपस्थित रहती हैं। वे काम, क्रोध, लोभ, और मोह से परे ले जाती हैं। उनके आशीर्वाद से बंधनों से मुक्ति मिलती है।

Mahāmāyā exists in forms representing wealth, humanity, and the body. She liberates from lust, anger, greed, and attachment. Her blessings free beings from the bondage of ignorance, granting ultimate liberation.

श्लोक 7
देवी मैत्री, दया, लक्ष्मी और अन्य रूपों में समस्त जीवों का लक्षण देती हैं। वे लज्जा, तृष्णा और तृप्ति के रूप में संसार को नियंत्रित करती हैं और मुक्ति प्रदान करती हैं।

The goddess manifests as friendship, compassion, wealth, and fulfillment. She controls the universe through modesty, desire, hunger, and satisfaction. She grants liberation and is a source of faith, devotion, and wisdom.

श्लोक 8
देवी नवदुर्गा, महाकाली, भुवनेश्वरी और तारा के रूपों में महिषासुर और मधुकैटभ जैसे दैत्यों का नाश करती हैं। वे त्रिभुवन को मोहित करने वाली और समस्त दुःखों को हरने वाली हैं।

Mahāmāyā is worshiped as Navadurgā, Mahākāli, Bhuvaneśvarī, and Tārā. She annihilates demons like Mahishāsura and Madhu-Kaiṭabha. As Tripurasundarī, she captivates the three worlds and removes all suffering.

श्लोक 9
कृष्णदास कहते हैं कि महामाया मेरी माता हैं। उनके भक्त सदैव उनकी कृपा के पात्र रहते हैं। देवी के प्रति समर्पण से संसार सागर को पार किया जा सकता है।

Krishnadāsa, the composer, proclaims that Mahāmāyā is his eternal mother. He surrenders completely to her grace. By her blessings, one can cross the ocean of worldly existence and attain salvation.


महामाया अष्टकम् देवी महामाया की स्तुति में रचित एक दिव्य स्तोत्र है, जिसका पाठ जीवन के कष्टों को दूर करने और मानसिक शांति प्राप्त करने में सहायक है। इस स्तोत्र का नियमित पाठ भय, चिंता और संकटों से मुक्ति दिलाता है। यह भक्त को जीवन की कठिन परिस्थितियों में साहस और आत्मविश्वास प्रदान करता है। देवी महामाया की कृपा से व्यक्ति निडर होकर अपने जीवन में आगे बढ़ता है और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है।

यह स्तोत्र पापों के नाश और आध्यात्मिक शुद्धि का साधन है। इसके पाठ से पूर्वजन्म और वर्तमान जीवन के पाप समाप्त होते हैं, और व्यक्ति धर्म और सत्य के मार्ग पर अग्रसर होता है। महामाया अष्टकम् का पाठ करने से मन में सकारात्मकता और स्थिरता आती है। यह मानसिक अशांति, तनाव और नकारात्मक विचारों को दूर कर मन को शांति प्रदान करता है।

महामाया अष्टकम् का पाठ परिवार में सुख-शांति और समृद्धि लाने में सहायक है। देवी महामाया की कृपा से पारिवारिक कलह समाप्त होते हैं, और घर में सौहार्दपूर्ण वातावरण बना रहता है। यह स्तोत्र आर्थिक संकटों को दूर कर धन और समृद्धि प्रदान करता है। साथ ही, यह स्वास्थ्य लाभ में भी सहायक है और शारीरिक एवं मानसिक रोगों से राहत देता है।

इस स्तोत्र का सबसे महत्वपूर्ण लाभ आत्मिक उन्नति और मोक्ष की प्राप्ति है। महामाया अष्टकम् का नियमित पाठ व्यक्ति को जीवन-मरण के बंधन से मुक्ति दिलाकर आत्मज्ञान और मोक्ष प्रदान करता है। यह भक्त को देवी महामाया की कृपा और आशीर्वाद का पात्र बनाता है, जिससे उसके जीवन में हर क्षेत्र में सफलता और शांति का अनुभव होता है।


यहाँ महामाया अष्टकम के कुछ ऐसे कम ज्ञात तथ्य हैं, जो आमतौर पर चर्चा में नहीं आते, हिंदी में सरल और मानवीय भाषा में:

  1. मूल स्रोत का रहस्य:
    ज्यादातर लोग इसे सिर्फ एक स्तोत्र मानते हैं, पर इसका मूल स्रोत “देवी भागवत पुराण” (खंड 5, अध्याय 35) है। यह कोई अलग-थलग रचना नहीं, बल्कि पुराण के उस हिस्से का अंश है जहाँ भगवान शिव स्वयं देवी के गुण गा रहे हैं।
  2. “अष्टकम” नाम का राज:
    “अष्टकम” का मतलब है आठ श्लोकों वाला। पर यहाँ जादू यह है कि हर श्लोक एक विशिष्ट शक्ति या कृपा का प्रतीक है। ये सिर्फ आठ पंक्तियाँ नहीं, बल्कि देवी के आठ अलौकिक रूपों को समेटे हुए हैं।
  3. शक्तिपीठों से गहरा नाता:
    मान्यता है कि यह स्तोत्र विशेष रूप से 51 शक्तिपीठों के आसपास के क्षेत्रों में साधकों द्वारा गाया जाता रहा है। इसे पढ़ने से देवी के उन पवित्र स्थानों की ऊर्जा जुड़ने का विश्वास है।
  4. तंत्र साधना की गूढ़ कुंजी:
    सतही तौर पर भक्ति स्तोत्र लगता है, लेकिन तांत्रिक परंपरा में इसे “महाविद्या” साधना की एक प्रबल कुंजी माना जाता है। इसके शब्दों में छिपे बीजाक्षरों को साधक गोपनीय रूप से उपयोग करते हैं।
  5. काली के रूप की झलक:
    “महामाया” नाम से शांत स्वरूप की याद आती है, पर इस स्तोत्र के कुछ श्लोक (खासकर “कालरात्रि महारात्रि…”) में देवी के उग्र रूप, विशेषकर माँ काली के तेज का स्पष्ट वर्णन है। यह शांत और उग्र का अद्भुत मेल है।
  6. “मोह” का दार्शनिक अर्थ:
    “महामाया” का एक अर्थ है “मोह पैदा करने वाली”। लेकिन यहाँ “मोह” सिर्फ भ्रम नहीं। यह उस दैवीय शक्ति का प्रतीक है जो सम्पूर्ण सृष्टि को अपनी माया से बांधकर चलाती है – जिसके बिना यह जगत टिक नहीं सकता।
  7. संकटों का त्वरित निवारक:
    लोकमान्यता है कि असाध्य बीमारियाँ, गंभीर संकट या भूत-प्रेत बाधा जैसी स्थितियों में इस अष्टकम का नियमित पाठ विशेष रूप से फलदायी होता है। यह एक “शक्तिशाली कवच” की तरह काम करता है।
  8. हृदय से जुड़ाव की बात:
    इसे “हृदय की भाषा में लिखा गया स्तोत्र” कहा जा सकता है। इसमें जटिल दर्शन नहीं, बल्कि सीधे भक्त के भय, आशा, प्रेम और समर्पण को छूने वाले शब्द हैं। यह मन को सीधे देवी से जोड़ देता है।
  9. पाँच देवियों का सार:
    कुछ विद्वान मानते हैं कि ये आठ श्लोक पाँच प्रमुख देवियों – श्री (लक्ष्मी), सरस्वती, पार्वती, काली और गायत्री के तेज और गुणों का सार संक्षेप में प्रस्तुत करते हैं।
  10. जीवित परंपरा:
    यह सिर्फ पुराना पाठ नहीं है। आज भी बंगाल, ओडिशा, असम और दक्षिण भारत के कई गाँवों और आश्रमों में यह एक जीवित साधना पद्धति है, जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी साधक सिद्ध करते आ रहे हैं।

सार यही है कि “महामाया अष्टकम” सिर्फ आठ श्लोक नहीं, बल्कि शक्ति साधना की एक गहरी, प्रचंड और करुणामयी धारा है जो सदियों से चली आ रही है। जय महामाया की! 


1. महामाया का दोष क्या होता है?

महामाया का दोष मुख्य रूप से संसार में अज्ञान, मोह और भ्रम का प्रतीक है। यह वह शक्ति है जो मनुष्य को भौतिक जगत में आसक्त कर देती है, जिससे वह सत्य और असत्य का भेद नहीं कर पाता। व्यक्ति माया के कारण सांसारिक वस्तुओं में उलझा रहता है और आत्मिक ज्ञान से वंचित रह जाता है। इस दोष के प्रभाव से व्यक्ति स्वार्थ, लोभ, क्रोध और अहंकार के जाल में फंस जाता है। हालांकि, देवी महामाया की साधना और उनके अष्टकम का पाठ इन दोषों को दूर कर मोक्ष की ओर ले जाता है।

2. महामाया कौन सी देवी है?

महामाया शक्ति की परम अधिष्ठात्री और समस्त ब्रह्मांड की रचयिता देवी हैं। वे महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के त्रिगुणात्मक रूप का समावेश हैं। देवी दुर्गा का “महामाया” स्वरूप संसार को चलाने वाली ऊर्जा है। वे केवल सृष्टि का निर्माण ही नहीं करतीं, बल्कि उसे संरक्षित और संहार भी करती हैं। पौराणिक कथाओं में महामाया को वह शक्ति माना गया है जिसने महिषासुर, शुंभ-निशुंभ और मधु-कैटभ जैसे राक्षसों का वध किया। वे अज्ञान को समाप्त कर ज्ञान का प्रकाश फैलाती हैं।

3. महामाया का मतलब क्या होता है?

“महामाया” का अर्थ “महान भ्रम” या “दिव्य शक्ति” होता है। यह वह शक्ति है जो जीव को भौतिक और आध्यात्मिक संसार के बीच संतुलन बनाए रखने में मदद करती है। वैदिक दर्शन में, माया वह शक्ति है जो संसार को वास्तविक जैसा दिखाती है, जबकि सच्चाई आत्मा के ज्ञान में छिपी होती है। महामाया इस भ्रम से परे की शक्ति हैं। उनके माध्यम से, भक्त अपने भीतर छिपे ब्रह्मांडीय सत्य को समझ सकता है और जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति पा सकता है।

4. महामाया की पूजा क्यों की जाती है?

महामाया की पूजा इसलिए की जाती है क्योंकि वे जीव को संसार के बंधनों और मोह से मुक्त करने वाली हैं। वे अपने भक्तों को सांसारिक कष्टों, मानसिक अशांति और भय से बचाती हैं। उनकी पूजा करने से भक्त को आत्मिक शांति, समृद्धि, और सफलता प्राप्त होती है। महामाया न केवल सांसारिक सुखों की प्राप्ति कराती हैं, बल्कि व्यक्ति को आध्यात्मिक मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती हैं।

5. महामाया की पूजा से क्या लाभ होते हैं?

महामाया की पूजा से भय, संकट, और पापों का नाश होता है। यह मानसिक शांति, सकारात्मकता और आत्मविश्वास प्रदान करती है। उनके अनुग्रह से व्यक्ति को धन, स्वास्थ्य, और पारिवारिक सुख की प्राप्ति होती है। सबसे महत्वपूर्ण, उनकी पूजा मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है। देवी महामाया की कृपा से भक्त सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझ पाता है।

श्री नवग्रह चालीसा – Navgrah Chalisa PDF 2025

नवग्रह चालीसा (Navgrah Chalisa Pdf) हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथ है, जो नवग्रहों (सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, और केतु) के प्रति आस्था और भक्ति को व्यक्त करता है। “चालीसा” का मतलब होता है चालीस (40) श्लोक, और इस चालीसा में नवग्रहों की महिमा और उनके प्रभावों के बारे में 40 श्लोकों के माध्यम से विस्तार से वर्णन किया गया है।

नवग्रह चालीसा का पाठ विशेष रूप से ग्रह दोषों को दूर करने, जीवन में सुख-शांति और समृद्धि प्राप्त करने, और ग्रहों के सकारात्मक प्रभाव को बढ़ाने के लिए किया जाता है। प्रत्येक ग्रह की अपनी विशेषताएँ और प्रभाव होते हैं, और यह चालीसा उन प्रभावों को संतुलित करने के लिए एक प्रभावी साधन मानी जाती है।

ग्रहों की स्थिति का हमारे जीवन पर गहरा असर पड़ता है, और नवग्रह चालीसा का पाठ करके साधक ग्रहों के शुभ प्रभाव को बढ़ा सकते हैं और अशुभ प्रभावों को कम कर सकते हैं। यह चालीसा विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी है जो अपने जीवन में ग्रह दोषों के कारण समस्याओं का सामना कर रहे हैं या जो अपने जीवन में अधिक सकारात्मक ऊर्जा और सुख चाहते हैं।

नवग्रह चालीसा का नियमित पाठ न केवल आध्यात्मिक लाभ देता है, बल्कि यह मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा, और जीवन में सुख-समृद्धि को बढ़ावा देने में भी सहायक होता है। यह धार्मिक और आध्यात्मिक साधना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो भक्तों को अपने जीवन में संतुलन और समृद्धि प्राप्त करने में मदद करता है।


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  • हिंदी / संस्कृत
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|| श्री नवग्रह चालीसा ||

॥ दोहा ॥
श्री गणपति गुरुपद कमल,
प्रेम सहित सिरनाय ।
नवग्रह चालीसा कहत,
शारद होत सहाय ॥

जय जय रवि शशि सोम बुध,
जय गुरु भृगु शनि राज।
जयति राहु अरु केतु ग्रह,
करहुं अनुग्रह आज ॥

॥ चौपाई ॥

॥ श्री सूर्य स्तुति ॥
प्रथमहि रवि कहं नावौं माथा,
करहुं कृपा जनि जानि अनाथा ।
हे आदित्य दिवाकर भानू,
मैं मति मन्द महा अज्ञानू ।
अब निज जन कहं हरहु कलेषा,
दिनकर द्वादश रूप दिनेशा ।
नमो भास्कर सूर्य प्रभाकर,
अर्क मित्र अघ मोघ क्षमाकर ।

॥ श्री चन्द्र स्तुति ॥
शशि मयंक रजनीपति स्वामी,
चन्द्र कलानिधि नमो नमामि ।
राकापति हिमांशु राकेशा,
प्रणवत जन तन हरहुं कलेशा ।
सोम इन्दु विधु शान्ति सुधाकर,
शीत रश्मि औषधि निशाकर ।
तुम्हीं शोभित सुन्दर भाल महेशा,
शरण शरण जन हरहुं कलेशा ।

॥ श्री मंगल स्तुति ॥
जय जय जय मंगल सुखदाता,
लोहित भौमादिक विख्याता ।
अंगारक कुज रुज ऋणहारी,
करहुं दया यही विनय हमारी ।
हे महिसुत छितिसुत सुखराशी,
लोहितांग जय जन अघनाशी ।
अगम अमंगल अब हर लीजै,
सकल मनोरथ पूरण कीजै ।

॥ श्री बुध स्तुति ॥
जय शशि नन्दन बुध महाराजा,
करहु सकल जन कहं शुभ काजा ।
दीजै बुद्धि बल सुमति सुजाना,
कठिन कष्ट हरि करि कल्याणा ।
हे तारासुत रोहिणी नन्दन,
चन्द्रसुवन दुख द्वन्द्व निकन्दन ।
पूजहिं आस दास कहुं स्वामी,
प्रणत पाल प्रभु नमो नमामी ।

॥ श्री बृहस्पति स्तुति ॥
जयति जयति जय श्री गुरुदेवा,
करूं सदा तुम्हरी प्रभु सेवा ।
देवाचार्य तुम देव गुरु ज्ञानी,
इन्द्र पुरोहित विद्यादानी ।
वाचस्पति बागीश उदारा,
जीव बृहस्पति नाम तुम्हारा ।
विद्या सिन्धु अंगिरा नामा,
करहुं सकल विधि पूरण कामा ।

॥ श्री शुक्र स्तुति ॥
शुक्र देव पद तल जल जाता,
दास निरन्तन ध्यान लगाता ।
हे उशना भार्गव भृगु नन्दन,
दैत्य पुरोहित दुष्ट निकन्दन ।
भृगुकुल भूषण दूषण हारी,
हरहुं नेष्ट ग्रह करहुं सुखारी ।
तुहि द्विजबर जोशी सिरताजा,
नर शरीर के तुमही राजा ।

॥ श्री शनि स्तुति ॥
जय श्री शनिदेव रवि नन्दन,
जय कृष्णो सौरी जगवन्दन ।
पिंगल मन्द रौद्र यम नामा,
वप्र आदि कोणस्थ ललामा ।
वक्र दृष्टि पिप्पल तन साजा,
क्षण महं करत रंक क्षण राजा ।
ललत स्वर्ण पद करत निहाला,
हरहुं विपत्ति छाया के लाला ।

॥ श्री राहु स्तुति ॥
जय जय राहु गगन प्रविसइया,
तुमही चन्द्र आदित्य ग्रसइया ।
रवि शशि अरि स्वर्भानु धारा,
शिखी आदि बहु नाम तुम्हारा ।
सैहिंकेय तुम निशाचर राजा,
अर्धकाय जग राखहु लाजा ।
यदि ग्रह समय पाय हिं आवहु,
सदा शान्ति और सुख उपजावहु ।

॥ श्री केतु स्तुति ॥
जय श्री केतु कठिन दुखहारी,
करहु सुजन हित मंगलकारी ।
ध्वजयुत रुण्ड रूप विकराला,
घोर रौद्रतन अघमन काला ।
शिखी तारिका ग्रह बलवान,
महा प्रताप न तेज ठिकाना ।
वाहन मीन महा शुभकारी,
दीजै शान्ति दया उर धारी ।

॥ नवग्रह शांति फल ॥
तीरथराज प्रयाग सुपासा,
बसै राम के सुन्दर दासा ।
ककरा ग्रामहिं पुरे-तिवारी,
दुर्वासाश्रम जन दुख हारी ।
नवग्रह शान्ति लिख्यो सुख हेतु,
जन तन कष्ट उतारण सेतू ।
जो नित पाठ करै चित लावै,
सब सुख भोगि परम पद पावै ॥

॥ दोहा ॥
धन्य नवग्रह देव प्रभु,
महिमा अगम अपार ।
चित नव मंगल मोद गृह,
जगत जनन सुखद्वार ॥

यह चालीसा नवोग्रह,
विरचित सुन्दरदास ।
पढ़त प्रेम सुत बढ़त सुख,
सर्वानन्द हुलास ॥

॥ इति श्री नवग्रह चालीसा ॥

Navgrah Chalisa PDF

॥ Doha ॥
shree ganapati gurupad kamal,
prem siranaay ॥
navagrah chaaleesa kahat,
sharad hot sahaayata ॥

jay jay ravi shashi som budh,
jay guru bhrgushani raaj ॥
jayati raahu aru ketu grah,
karahun anugrah aaj ॥

॥ Chaupaee ॥

॥ Shree Surya stuti ॥
prathamahi ravi kahan naavaun maatha,
karahun krpa jani jani anaatha ॥
he aadity divaakar bhaanu,
main mati mand maha agyaanu ॥
ab nij jan kahan harahu kalesha,
dinakar dvaadash roop dinesha ॥
namo bhaaskar soory naukaraanee,
ark mitr agh mogh kshamaakar ॥

॥ Shree Chandra stuti ॥
shashi makkee rajanee svaamee,
chandr kalaanidhi namo namaami ॥
raakaapati himaanshu raakesha,
pranavat jan tan harahun kalesha ॥
som indu vidhu shaanti sudhaakar,
sheet rashmee aushadhi nishaachar ॥
tumheen shobhit sundar bhaal mahesa,
sharan sharan jan harahun kalesha ॥

॥ Shree Mangal stuti ॥
jay jay jay mangal sukhadaata,
lohit bhaumadik saahity ॥
angaarak kuj ruj rnaahaaree,
karahun daya yahee vinay hamaaree ॥
he mahisut chhitisut sukharaashee,
lohitaang jay jan aghanaashee ॥
agam mangal ab har leejai,
sakal manorath pooran keejai ॥

॥ Shree Budh stuti ॥
jay shashi nandan budh mahaaraaja,
karahu sakal jan kahan shubh kaaja ॥
deejai buddhi bal sumati sujaana,
kathin kasht hari kari kalyaan ॥
he taaraasut rohinee nandan,
chandrasuvan duhkh dvandv nikkandan ॥
poojahin aas daas kahu svaamee,
pranat pal prabhu namo namaami ॥

॥ Shree Brhaspati stuti ॥
jayati jayati jay shree gurudeva,
indakshan sada tumhaaree prabhu seva ॥
devaachaary tum dev guru gyaanee,
indr purohit vidyaadaanee ॥
vaachaspati baageez libaral,
jeev brhaspati naam ॥
vidya sindhu angira naama,
karahun sakal vidhi pooran kaam ॥

॥ Shree Shukra stuti ॥
shukr dev tal jal,
daas nirantan dhyaan sthaan ॥
he ushana bhaagavat bhrgu nandan,
daity purohit dusht nikandan ॥
bhrgukul bhooshan dooshan haaree,
harahun nesht grah karahun sukhaari ॥
tuhi dvijabar joshee sirataaja,
nar shareer ke tumheen raaja ॥

॥ shree Shani stuti ॥
jay shree shanidev ravi nandan,
jay krshno sauri jagavandan ॥
pingal mand raudr yam naama,
vapr aadi konasth laama ॥
vajr drshti pippal tan saaja,
kshan mahan karat rank kshan raaja ॥
laalat svarn pad karat nihaala,
harahun vipatti chhaaya ke laala ॥

॥ Shree Raahu stuti ॥
jay jay raahu gagan pravisiya,
tumheen chandr aadity graasiya ॥
ravi shashi ari svarbhaanu dhaara,
sikhee aadi bahu naam lipi ॥
sahinkey tum nishaachar raaja,
ardhakaay jag raakhahu laaja ॥
yadi grah samay paay hin aavahu,
sada shaanti aur sukh upajaavahu ॥

॥ Shree Ketu stuti ॥
jay shree ketu kathin duhkhahaaree,
karahu sujan hit mangalakaaree ॥
dhvajayut rund roop vikaarala,
ghor raudrataan aghaman kaala ॥
shikhee taarika grah balavaan,
maha prataap na tej vakta ॥
vaahan meen maha shubhakaaree,
deejai shaanti daya ur dhaaree ॥

॥ Navagrah shaanti phal ॥
teeratharaaj prayaag supaasa,
basai raam ke sundar daasa ॥
kakarara graamahin poore-tivaaree,
durvaasaashram jan duhkh haaree ॥
navagrah shaanti paathyo sukhaay,
jan tan utprerana setu ॥
jo nit paath karai chit laavai,
sab sukh bhogee param pad paavai ॥

॥ Doha ॥
dhany navagrah dev prabhu,
mahima agam apaar ॥
chit nav mangal mod grh,
jagat janan sukhadvaar ॥

yah chaaleesa navograh,
virachit sundaradaas ॥
padhat prem sut badhat sukh,
sarvaanand hulaas ॥

॥ iti shree navagrah chaaleesa ॥


नवग्रह चालीसा के लाभ

नवग्रह चालीसा एक महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथ है जो नवग्रहों (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, और केतु) की स्तुति में लिखा गया है। इसे नियमित रूप से पढ़ने से व्यक्ति को कई प्रकार के लाभ मिलते हैं। यहाँ नवग्रह चालीसा के प्रमुख लाभों का विस्तार से वर्णन किया गया है:

ग्रह दोषों का निवारण

नवग्रह चालीसा के पाठ से ग्रह दोषों का निवारण होता है। यदि किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली में ग्रहों की स्थिति अशुभ है, तो नवग्रह चालीसा का पाठ करने से ग्रहों की दुष्प्रभाव कम होता है। इससे जीवन में आने वाली बाधाएं और परेशानियाँ कम होती हैं।

मानसिक शांति

नवग्रह चालीसा का नियमित पाठ करने से मानसिक शांति प्राप्त होती है। यह मन को स्थिरता और शांति प्रदान करता है, जिससे व्यक्ति तनावमुक्त और खुशहाल रहता है।

स्वास्थ्य लाभ

नवग्रह चालीसा के पाठ से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। यह नकारात्मक ऊर्जाओं को दूर करता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है, जिससे व्यक्ति स्वस्थ और सशक्त रहता है।

आर्थिक समृद्धि

नवग्रह चालीसा का पाठ करने से आर्थिक समस्याओं का समाधान होता है। यह व्यक्ति को आर्थिक समृद्धि और स्थिरता प्रदान करता है। व्यवसाय में सफलता और नौकरी में उन्नति प्राप्त होती है।

पारिवारिक सुख

नवग्रह चालीसा का पाठ करने से पारिवारिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। यह पारिवारिक सदस्यों के बीच प्रेम और सामंजस्य को बढ़ाता है, जिससे परिवार में खुशहाली बनी रहती है।

जीवन में संतुलन

नवग्रह चालीसा का पाठ जीवन में संतुलन लाता है। यह व्यक्ति के जीवन के विभिन्न पहलुओं में सामंजस्य स्थापित करता है, जिससे जीवन में सकारात्मकता और संतुलन बना रहता है।

आध्यात्मिक विकास

नवग्रह चालीसा का पाठ व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास में सहायक होता है। यह व्यक्ति को आध्यात्मिकता की ओर प्रेरित करता है और उसे ईश्वर के निकट ले जाता है। इससे आत्मा की शुद्धि और मानसिक स्थिरता प्राप्त होती है।

बुरी नजर और नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा

नवग्रह चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति बुरी नजर और नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षित रहता है। यह व्यक्ति को हर प्रकार की नकारात्मकता से बचाता है और उसे सकारात्मकता से भरता है।

करियर और शिक्षा में सफलता

नवग्रह चालीसा का पाठ करने से करियर और शिक्षा में सफलता प्राप्त होती है। यह छात्रों के लिए विशेष रूप से लाभकारी है, क्योंकि यह उनकी एकाग्रता और स्मरण शक्ति को बढ़ाता है और उन्हें शिक्षा में सफलता प्राप्त करने में मदद करता है।

प्रेम और विवाह में सफलता

नवग्रह चालीसा का पाठ प्रेम और विवाह में सफलता प्रदान करता है। यह वैवाहिक जीवन को सुखद और खुशहाल बनाता है और प्रेम संबंधों में स्थिरता और विश्वास बढ़ाता है।

शुभ फलों की प्राप्ति

नवग्रह चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति को शुभ फलों की प्राप्ति होती है। यह व्यक्ति के जीवन में शुभता और समृद्धि लाता है और उसे हर प्रकार की सुख-सुविधाएं प्रदान करता है।

मनोकामनाओं की पूर्ति

नवग्रह चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति की मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। यह व्यक्ति की इच्छाओं और सपनों को पूरा करने में मदद करता है और उसे हर प्रकार की सफलताएं प्रदान करता है।

आंतरिक शक्ति और आत्मविश्वास में वृद्धि

नवग्रह चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति की आंतरिक शक्ति और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। यह व्यक्ति को आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनाता है और उसे हर चुनौती का सामना करने की शक्ति प्रदान करता है।

शत्रुओं से रक्षा

नवग्रह चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति शत्रुओं से सुरक्षित रहता है। यह व्यक्ति को हर प्रकार के शत्रुओं और विरोधियों से बचाता है और उसे सफलता और सुरक्षा प्रदान करता है।

भाग्य में सुधार

नवग्रह चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के भाग्य में सुधार होता है। यह व्यक्ति के जीवन में सौभाग्य और सफलता लाता है और उसे हर प्रकार की मुश्किलों से उबारता है।

नवग्रह चालीसा का पाठ व्यक्ति को हर प्रकार की समस्याओं से मुक्ति दिलाता है और उसे जीवन में सुख, शांति, और समृद्धि प्रदान करता है। यह एक अद्भुत धार्मिक ग्रंथ है जो व्यक्ति को हर प्रकार की समस्याओं से निजात दिलाता है और उसे जीवन में सफलता और खुशहाली प्रदान करता है।


नवग्रह चालीसा पढ़ने से क्या होता है?

नवग्रह चालीसा पढ़ने से ग्रहों के दुष्प्रभाव कम होते हैं और व्यक्ति की जीवनशैली में सुधार होता है। यह समृद्धि, स्वास्थ्य, और सुख-समृद्धि के लिए लाभकारी माना जाता है। यह ग्रहों की अनुकूलता बढ़ाने में मदद करता है और मानसिक शांति भी प्रदान करता है।

नवग्रह शांत कैसे करें?

नवग्रह शांत करने के लिए नियमित रूप से नवग्रह पूजा, हवन, और व्रत का आयोजन किया जाता है। इसके अलावा, ग्रहों की अशांति को दूर करने के लिए विशेष मंत्रों का जाप, दान-पुण्य, और तंत्र-मंत्र का पालन भी किया जाता है। प्रत्येक ग्रह के अनुसार विशेष उपाय किए जाते हैं।

नवग्रह स्तोत्र कब पढ़ना है?

नवग्रह स्तोत्र का पाठ विशेष रूप से ग्रहों की समस्याओं को दूर करने के लिए किया जाता है। इसे मंगलवार, शनिवार, और अन्य ग्रहों के विशेष दिनों पर पढ़ना शुभ माना जाता है। इसे सुबह और संध्या के समय विशेष रूप से पढ़ा जाता है।

नवग्रह का मंत्र क्या है?

नवग्रहों के लिए विभिन्न मंत्र होते हैं। यहाँ कुछ सामान्य मंत्र दिए जा रहे हैं:

सूर्य: “ॐ सूर्याय नमः”
चंद्रमा: “ॐ चंद्रमसे नमः”
मंगल: “ॐ अंगारकाय नमः”
बुध: “ॐ बुधाय नमः”
गुरु: “ॐ गुरवे नमः”
शुक्र: “ॐ शुक्राय नमः”
शनि: “ॐ शनैश्चराय नमः”
राहू: “ॐ राहवे नमः”
केतू: “ॐ केतवे नमः”

नवग्रह के देवता कौन हैं?

नवग्रहों के देवता निम्नलिखित हैं:

सूर्य: सूर्य देव
चंद्रमा: चंद्र देव
मंगल: मंगल देव
बुध: बुध देव
गुरु: गुरु देव
शुक्र: शुक्र देव
शनि: शनि देव
राहू: राहू (छाया ग्रह)
केतू: केतू (छाया ग्रह)

नवग्रह में सबसे शक्तिशाली ग्रह कौन सा है?

नवग्रहों में सबसे शक्तिशाली ग्रह की पहचान विभिन्न धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिषीय दृष्टिकोण के आधार पर की जाती है। परंपरागत रूप से, गुरु और शनि को अत्यंत शक्तिशाली ग्रह माना जाता है। गुरु को भाग्य और समृद्धि का कारक माना जाता है, जबकि शनि को न्याय और कर्मफल का कारक माना जाता है।

Sai Baba Aarti PDF | श्री शिरडी साईं बाबा की आरती 2025

साईं बाबा की आरती (Sai Baba Aarti Lyrics PDF) की आरती का महत्त्व उनकी भक्ति और श्रद्धा के प्रति गहरी आस्था को दर्शाता है। साईं बाबा, जिन्हें शिरडी साईं बाबा के नाम से भी जाना जाता है, एक संत और गुरु के रूप में समर्पित भक्तों के हृदयों में बसे हुए हैं। उनकी आरती न केवल उनकी दिव्यता का गुणगान करती है, बल्कि भक्तों के जीवन में शांति और सौभाग्य की कामना भी करती है। साईं बाबा की आरती, भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है, जिसमें वे अपने आराध्य गुरु के प्रति अपनी श्रद्धा और प्रेम व्यक्त करते हैं। आप यहां से साईं चालीसा भी पढ़ सकते हैं।

साईं बाबा की आरतियाँ दिन में चार बार की जाती हैं: काकड़ आरती (सुबह), मध्यान्ह आरती (दोपहर), धूप आरती (शाम), और शेज आरती (रात)। इन आरतियों के माध्यम से साईं बाबा के भक्त उनके चरणों में समर्पित होते हैं और अपने जीवन में सुख-शांति की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करते हैं। शिरडी में साईं बाबा के समाधि स्थल पर हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन इन आरतियों में शामिल होते हैं, जिससे वहां की दिव्यता और भक्ति का माहौल और भी पवित्र हो जाता है।

आरती का महत्व सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान में नहीं, बल्कि यह भक्तों के लिए एक आत्मिक अनुभव है, जिसमें वे साईं बाबा की कृपा का अनुभव करते हैं। आरतियों के दौरान गाए जाने वाले भजन और मंत्र साईं बाबा की शिक्षाओं और उनके द्वारा किए गए चमत्कारों का स्मरण कराते हैं। यह भक्ति गीत साईं बाबा के प्रति असीम प्रेम और आस्था को उजागर करते हैं, जो भक्तों के जीवन को मार्गदर्शित करता है।


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|| श्री शिरडी साईं बाबा की आरती ||

आरती साईबाबा ।
सौख्यदातारा जीवा ।
चरणरजतळीं निज दासां विसावां ।
भक्तां विसावा

जाळुनियां अनंग ।
स्वस्वरुपी राहे दंग ।
मुमुक्षुजना दावी ।
निजडोळां श्रीरंग ॥१॥

जया मनीं जैसा भाव ।
तया तैसा अनुभव ।
दाविसी दयाघना ।
ऐसी ही तुझी माव ॥२॥

तुमचें नाम ध्यातां ।
हरे संसृतिव्यथा ।
अगाध तव करणी ।
मार्ग दाविसी अनाथा ॥३॥

कलियुगीं अवतार ।
सगुणब्रह्म साचार ।
अवतीर्ण झालासे ।
स्वामी दत्त दिगंबर ॥४॥

आठा दिवसां गुरुवारी ।
भक्त करिती वारी ।
प्रभुपद पहावया ।
भवभय निवारी ॥५॥

माझा निजद्रव्य ठेवा ।
तव चरणसेवा ।
मागणें हेंचि आता ।
तुम्हा देवाधिदेवा ॥६॥

इच्छित दीन चातक ।
निर्मळ तोय निजसुख ।
पाजावें माधवा या ।
सांभाळ आपुली भाक ॥७॥

|| Sai Baba Aarti Lyrics ||

Aarti Saibaba
Saukhyadatara Jeeva
Charanrajatali Nija Daasaan Visaava
Bhaktaan Visaava

Jaaluniya Anang
Swaswarupi Rahe Dang
Mumukshu Janaa Daavi
Nij Dolaan Shrirang ॥1॥

Jaya Manee Jaisa Bhaav
Tayaa Taisaa Anubhav
Daavisi Dayaghana
Aisee Hi Tujhi Maav ॥2॥

Tumche Naam Dhyaataa
Hare Sansruti Vyatha
Agadha Tav Karanee
Maarg Daavisi Anaathaa ॥3॥

Kaliyugee Avataar
Saguna Brahma Sachaara
Avateern Jhalaase
Swami Datt Digambar ॥4॥

Aathaa Divasaan Guruwari
Bhakta Karitee Vaari
Prabhupad Pahavaya
Bhavabhaya Nivaari ॥5॥

Maazaa Nijdravya Thevaa
Tav Charansevaa
Maagane Henchi Aataa
Tumha Devaadhidevaa ॥6॥

Ichchhit Deen Chaatak
Nirmal Toy Nijasukh
Paajaave Maadhavaa Yaa
Saambhaal Aapuli Bhaak ॥7॥




साईं बाबा के 11 वचन

शिरडी साईं बाबा, जिन्हें शिरडी के साईं बाबा के नाम से जाना जाता है, एक महान संत और आध्यात्मिक गुरु थे। उन्होंने अपने भक्तों को जीवन के विभिन्न पहलुओं में मार्गदर्शन करने के लिए 11 वचन दिए, जो उनके अनुयायियों के लिए प्रेरणा और साहस का स्रोत हैं। इन वचनों में उन्होंने जीवन के विभिन्न पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया और सच्चाई, धर्म, और भक्ति का संदेश दिया। इन 11 वचनों के माध्यम से, साईं बाबा ने अपने भक्तों को जीवन के विभिन्न पहलुओं में संतुलन बनाए रखने और आत्मा की शांति प्राप्त करने का मार्ग दिखाया है। यहाँ हम इन 11 वचनों का विस्तृत वर्णन करेंगे।

1. जो शिरडी आएगा, मेरा दर्शन पाएगा

यह वचन साईं बाबा के भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है, जो उनकी शरण में आते हैं। शिरडी आना साईं बाबा के भक्तों के लिए उनकी कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने का एक प्रतीक है। साईं बाबा ने अपने भक्तों से वादा किया कि जो कोई भी उनकी शरण में आएगा, वह उनके दर्शन और उनकी कृपा का अनुभव करेगा। यह वचन इस बात का प्रतीक है कि बाबा अपने भक्तों के लिए हमेशा उपलब्ध हैं और उनकी मदद के लिए तत्पर रहते हैं। शिरडी आना और बाबा के दर्शन करना भक्तों के लिए एक पवित्र और आत्मिक अनुभव है, जो उन्हें आध्यात्मिक शांति और संतोष प्रदान करता है।

2. मेरे भक्तों का कभी अनिष्ट नहीं होगा

साईं बाबा के इस वचन में गहरी आस्था और विश्वास की भावना है। बाबा अपने भक्तों को यह आश्वासन देते हैं कि वे कभी भी अपने भक्तों को कष्ट में नहीं छोड़ेंगे। बाबा के इस वचन के अनुसार, वे अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और उन्हें जीवन की कठिनाइयों से बचाते हैं। यह वचन भक्तों के लिए एक आस्था का प्रतीक है, जिससे उन्हें यह विश्वास होता है कि बाबा हमेशा उनके साथ हैं और उनकी रक्षा कर रहे हैं। जब भक्त सच्चे मन से बाबा की शरण में आते हैं, तो उन्हें जीवन की कठिनाइयों से मुक्ति मिलती है और बाबा की कृपा से उनके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

3. जो मुझसे मांगेगा, उसे मैं दूंगा

यह वचन बाबा की उदारता और कृपा का प्रतीक है। साईं बाबा ने अपने भक्तों को यह वचन दिया कि जो कोई भी उनसे कुछ मांगेगा, वह उसे प्रदान करेंगे। बाबा के इस वचन का अर्थ यह है कि वह अपने भक्तों की इच्छाओं और आवश्यकताओं को समझते हैं और उन्हें पूरा करने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। हालांकि, बाबा ने अपने भक्तों से यह भी कहा कि वे केवल उचित और धर्म के अनुसार ही मांगे, क्योंकि बाबा वही प्रदान करते हैं जो उनके भक्तों के लिए सही और उचित हो। यह वचन भक्तों को यह संदेश देता है कि वे बाबा पर विश्वास रखें और अपनी सभी इच्छाओं और आवश्यकताओं के लिए उनसे प्रार्थना करें।

4. जो मेरे शरण आएगा, उसे मैं मुक्त करूंगा

साईं बाबा के इस वचन का मतलब है कि जो भी व्यक्ति सच्चे दिल से उनकी शरण में आता है, वह सभी सांसारिक बंधनों और कष्टों से मुक्त हो जाता है। बाबा के अनुसार, उनकी शरण में आकर व्यक्ति अपने सभी पापों और दुखों से मुक्ति पा सकता है। यह वचन भक्तों के लिए एक प्रेरणा का स्रोत है, जिससे वे बाबा की शरण में आकर अपनी आत्मा की शुद्धि और मुक्ति का अनुभव कर सकते हैं। बाबा के इस वचन से भक्तों को यह समझ में आता है कि सच्ची भक्ति और विश्वास से ही मुक्ति प्राप्त की जा सकती है।

5. मुझे जो भी देखेगा, उसके सभी दुख दूर हो जाएंगे

यह वचन साईं बाबा की दिव्यता और उनकी कृपा का प्रतीक है। बाबा ने अपने भक्तों से यह वचन दिया कि जो कोई भी उन्हें सच्चे मन से देखेगा, उसके सभी दुख और कष्ट दूर हो जाएंगे। यह वचन इस बात का संकेत है कि बाबा के दर्शन से भक्तों को मानसिक और आध्यात्मिक शांति मिलती है और उनके जीवन के सभी दुख और कष्ट समाप्त हो जाते हैं। बाबा के इस वचन के अनुसार, उनके दर्शन करने से भक्तों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं और वे अपने जीवन में नई ऊर्जा और उमंग का अनुभव करते हैं।

6. मैं सदैव सभी की सहायता करूंगा

साईं बाबा के इस वचन में उनकी करुणा और दया का भाव प्रकट होता है। बाबा ने अपने भक्तों को यह आश्वासन दिया कि वे हमेशा उनकी सहायता करेंगे, चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों। बाबा के इस वचन का अर्थ है कि वे अपने भक्तों के हर कदम पर उनके साथ हैं और उन्हें कभी भी अकेला नहीं छोड़ेंगे। यह वचन भक्तों को साहस और आत्मविश्वास देता है कि वे अपने जीवन की कठिनाइयों का सामना कर सकते हैं, क्योंकि बाबा हमेशा उनके साथ हैं और उनकी मदद कर रहे हैं। बाबा के इस वचन से भक्तों को यह विश्वास होता है कि वे कभी भी असहाय या अकेले नहीं हैं।

7. मैं समय पर आने में देरी कर सकता हूँ, लेकिन मैं हमेशा आऊंगा

यह वचन साईं बाबा के धैर्य और संकल्प का प्रतीक है। बाबा ने अपने भक्तों को यह वचन दिया कि भले ही उन्हें समय पर मदद पहुंचाने में देरी हो, लेकिन वे हमेशा उनकी सहायता के लिए आएंगे। यह वचन इस बात का संकेत है कि बाबा कभी भी अपने भक्तों को निराश नहीं करते और हमेशा उनकी मदद के लिए उपस्थित होते हैं। यह वचन भक्तों के लिए धैर्य और विश्वास का प्रतीक है, जिससे उन्हें यह समझ में आता है कि बाबा के समय पर भरोसा रखना आवश्यक है और वे हमेशा सही समय पर उनकी मदद के लिए आते हैं।

8. मैं अपने भक्तों के साथ हमेशा खड़ा हूँ

साईं बाबा के इस वचन का मतलब है कि वे अपने भक्तों के साथ हर समय खड़े रहते हैं, चाहे वे किसी भी स्थिति में हों। बाबा ने अपने भक्तों को यह वचन दिया कि वे कभी भी उनका साथ नहीं छोड़ेंगे और हमेशा उनके साथ रहेंगे। यह वचन भक्तों के लिए एक सुरक्षा और आस्था का प्रतीक है, जिससे उन्हें यह विश्वास होता है कि बाबा हमेशा उनके साथ हैं और उन्हें किसी भी प्रकार की कठिनाई में अकेला नहीं छोड़ेंगे। बाबा के इस वचन से भक्तों को आत्मविश्वास मिलता है कि वे किसी भी परिस्थिति का सामना कर सकते हैं, क्योंकि बाबा उनके साथ हैं।

9. मेरे भक्त अगर कुछ और नहीं जानते, तो भी चिंता मत करो, सिर्फ मुझसे प्रेम करो और मुझ पर विश्वास रखो

यह वचन बाबा की भक्ति और प्रेम के प्रति उनके दृष्टिकोण को दर्शाता है। बाबा ने अपने भक्तों से कहा कि अगर वे कुछ और नहीं जानते, तो भी उन्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है। उन्हें बस साईं बाबा से प्रेम करना चाहिए और उन पर पूरा विश्वास रखना चाहिए। बाबा के इस वचन का अर्थ यह है कि भक्ति और प्रेम ही सबसे महत्वपूर्ण है। बाबा के प्रति सच्चा प्रेम और विश्वास रखने से भक्तों को सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान मिल सकता है। यह वचन भक्तों के लिए एक सरल और प्रभावी मार्गदर्शन है, जो उन्हें साईं बाबा के प्रति अपनी भक्ति और प्रेम को बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है।

10. यदि तुम मेरे वचनों का पालन करोगे, तो तुम्हें किसी भी प्रकार की चिंता नहीं करनी पड़ेगी

यह वचन साईं बाबा के अनुशासन और मार्गदर्शन का प्रतीक है। बाबा ने अपने भक्तों से कहा कि अगर वे उनके वचनों का पालन करेंगे, तो उन्हें किसी भी प्रकार की चिंता करने की जरूरत नहीं होगी। बाबा के इस वचन का अर्थ यह है कि उनके निर्देशों का पालन करने से भक्तों को जीवन में शांति और संतोष प्राप्त होगा।

बाबा के वचनों का पालन करना उनके अनुयायियों के लिए एक मार्गदर्शन का स्रोत है, जिससे वे अपने जीवन में सही दिशा प्राप्त कर सकते हैं। बाबा के इस वचन से भक्तों को यह समझ में आता है कि अगर वे बाबा के मार्ग पर चलेंगे, तो उन्हें किसी भी प्रकार की चिंता या कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ेगा।

11. जो मुझ पर विश्वास करेगा, उसे कभी भी अकेला नहीं छोड़ा जाएगा

साईं बाबा के इस वचन में उनकी करुणा और दया का भाव प्रकट होता है। बाबा ने अपने भक्तों को यह वचन दिया कि जो कोई भी उन पर विश्वास करेगा, उसे कभी भी अकेला नहीं छोड़ा जाएगा। बाबा के इस वचन का अर्थ यह है कि वे हमेशा अपने भक्तों के साथ रहेंगे और उन्हें किसी भी परिस्थिति में अकेला नहीं छोड़ेंगे। यह वचन भक्तों के लिए एक सुरक्षा और आस्था का प्रतीक है, जिससे उन्हें यह विश्वास होता है कि बाबा हमेशा उनके साथ हैं और उनकी रक्षा कर रहे हैं। बाबा के इस वचन से भक्तों को आत्मविश्वास मिलता है कि वे किसी भी परिस्थिति का सामना कर सकते हैं, क्योंकि बाबा उनके साथ हैं।


शिरडी साईं बाबा की आरती के लाभ

शिरडी साईं बाबा की आरती का भक्तों के जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान है। यह न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना का मार्ग भी है। साईं बाबा की आरती को सुनने और उसमें भाग लेने से अनेक आध्यात्मिक और मानसिक लाभ होते हैं। इस लेख में हम 786 शब्दों में शिरडी साईं बाबा की आरती के लाभों के बारे में विस्तार से जानेंगे।

1. आध्यात्मिक शांति और संतुलन

शिरडी साईं बाबा की आरती के दौरान गाए जाने वाले भजन और मंत्रों में गहन आध्यात्मिक शक्ति होती है। जब भक्त आरती में ध्यान केंद्रित करते हैं और साईं बाबा की कृपा का आह्वान करते हैं, तो उनके मन और आत्मा को गहरा संतोष और शांति प्राप्त होती है। आरती के दौरान साईं बाबा की दिव्य उपस्थिति का अनुभव करना, आत्मिक शांति का एक अनूठा अनुभव होता है। यह व्यक्ति के जीवन में संतुलन और स्थिरता लाने में सहायक होता है, जिससे वे बाहरी संघर्षों और चुनौतियों का सामना अधिक धैर्य और आत्मविश्वास के साथ कर सकते हैं।

2. सकारात्मक ऊर्जा और वातावरण की शुद्धि

आरती के समय गाए जाने वाले भजनों की ध्वनि और आरती की लौ से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा वातावरण को पवित्र और सकारात्मक बनाती है। जब भक्त एकाग्रता के साथ आरती करते हैं, तो वह ऊर्जा उनके आसपास के क्षेत्र में फैल जाती है, जिससे नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं और वातावरण शुद्ध होता है। साईं बाबा की आरती को नियमित रूप से सुनने और उसमें भाग लेने से घर या मंदिर का वातावरण पवित्र और सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है, जो नकारात्मकता और बुरे प्रभावों को समाप्त कर देता है।

3. आत्मिक उन्नति और भक्ति का गहन अनुभव

साईं बाबा की आरती एक साधना के रूप में भी कार्य करती है। भक्तों को आरती में शामिल होने से भक्ति का गहन अनुभव होता है, जिससे वे अपने जीवन में आध्यात्मिक उन्नति की ओर बढ़ते हैं। आरती के दौरान साईं बाबा की शिक्षाओं का स्मरण और उनके चरणों में समर्पण से व्यक्ति के भीतर भक्ति की भावना प्रबल होती है। यह उन्हें उनके सांसारिक जीवन से परे ले जाकर आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर करता है। इस प्रकार, साईं बाबा की आरती भक्ति का एक सशक्त माध्यम है, जो व्यक्ति के आत्मिक विकास में सहायक होता है।

4. स्वास्थ्य और मानसिक शांति का संवर्धन

आरती के दौरान गाए जाने वाले भजनों और मंत्रों का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ध्वनि तरंगों के माध्यम से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा न केवल मानसिक शांति प्रदान करती है, बल्कि शरीर को भी स्वस्थ रखने में मदद करती है। नियमित रूप से साईं बाबा की आरती में भाग लेने से तनाव और चिंता कम होती है, मन की अशांति समाप्त होती है, और व्यक्ति को गहरी मानसिक शांति प्राप्त होती है। इसके अलावा, आरती के दौरान एकाग्रता और ध्यान बढ़ाने से मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है और व्यक्ति की जीवनशैली में सकारात्मक परिवर्तन आता है।

5. धार्मिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक

साईं बाबा की आरती धार्मिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। साईं बाबा ने अपने जीवनकाल में हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों के अनुयायियों को समान रूप से प्रेम और सेवा का संदेश दिया। आरती के माध्यम से उनके इस संदेश को सभी धर्मों और जातियों के लोगों के बीच प्रचारित किया जाता है। इससे भक्तों के बीच धार्मिक सहिष्णुता और सांस्कृतिक एकता को बढ़ावा मिलता है। साईं बाबा की आरती में भाग लेने से व्यक्ति की धार्मिक सोच का दायरा बढ़ता है और वह सभी धर्मों के प्रति सम्मान और प्रेम का भाव रखता है।

6. संकटों से मुक्ति और जीवन में समृद्धि का आगमन

ऐसा माना जाता है कि साईं बाबा की आरती करने से जीवन में आने वाले संकटों से मुक्ति मिलती है और समृद्धि का आगमन होता है। भक्तगण जब सच्चे मन से साईं बाबा की आरती करते हैं, तो वे अपने जीवन की कठिनाइयों से निजात पाने की प्रार्थना करते हैं। साईं बाबा की कृपा से उनके जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है। कई भक्तों का अनुभव है कि नियमित रूप से साईं बाबा की आरती करने से उनके जीवन में चल रही समस्याओं का समाधान होता है और उन्हें नए अवसर प्राप्त होते हैं।

7. भक्ति और विश्वास में वृद्धि

साईं बाबा की आरती करने से भक्तों के भीतर भक्ति और विश्वास की भावना बढ़ती है। आरती के दौरान साईं बाबा के प्रति श्रद्धा और प्रेम का भाव प्रकट किया जाता है, जिससे भक्तों का विश्वास और भी मजबूत होता है। यह विश्वास उन्हें जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी साईं बाबा की कृपा और मार्गदर्शन पर अडिग बनाए रखता है। भक्ति और विश्वास के इस मार्ग पर चलने से भक्तों को जीवन में आत्मिक बल और साहस प्राप्त होता है।


1. साईं बाबा की कितनी आरती है?

साईं बाबा की चार प्रमुख आरतियाँ हैं:
– काकड़ आरती (सुबह),
– मध्यान्ह आरती (दोपहर),
– धूप आरती (शाम),
– शेज आरती (रात)।

2. साईं बाबा का मुख्य भक्त कौन है?

साईं बाबा के मुख्य भक्तों में शिर्डी के भक्त महलसापति, हेमाडपंत, श्यामा, और लक्ष्मण राव प्रमुख हैं।

3. शिर्डी में आरती क्या है?

शिर्डी में साईं बाबा के सम्मान में की जाने वाली आरती एक धार्मिक अनुष्ठान है, जिसमें भजन, मंत्र और चमत्कारी अनुभवों का गायन किया जाता है। यह आरती प्रतिदिन चार बार की जाती है।

4. साईं बाबा की कौन सी जाति है?

साईं बाबा की जाति के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। उन्होंने कभी अपनी जाति का उल्लेख नहीं किया और उन्होंने अपने अनुयायियों को जाति और धर्म से ऊपर उठने का संदेश दिया।

5. साईं बाबा कौन से धर्म के थे?

साईं बाबा के धर्म के बारे में कोई निश्चित जानकारी नहीं है। उन्होंने हमेशा सभी धर्मों का सम्मान किया और हिंदू और मुस्लिम दोनों के अनुयायियों को समान रूप से मार्गदर्शन दिया।

6. साई बाबा की आरती किसने लिखी थी?

साईं बाबा की आरती का लेखन प्रसिद्ध मराठी संतों और भक्तों द्वारा किया गया है। इनमें से प्रमुख हैं मध्यान्ह आरती (उपयुक्त अज्ञात लेखक) और शेज आरती (माधव अदा)।


The Kanwar Yatra 2025: Where Devotion Defies Gravity – An Epic Journey into India’s Soul

Forget everything you think you know about pilgrimage. The Kanwar Yatra isn’t just a journey; it’s a seismic event, a river of saffron surging across North India, a testament to faith so visceral it reshapes landscapes and defies modern logic. This isn’t passive piety; it’s Bhakti in Motion. If you seek experiences that sear themselves into your memory, that pulse with raw human spirit and ancient tradition, look no further. Here’s why the Kanwar Yatra is India’s most unique, magnetically attracting phenomenon, and an experience that demands to be understood.

The Saffron Tide – More Than Just Water

Imagine highways transformed into sacred arteries. Picture millions of men (and increasingly women), clad in vibrant saffron, walking barefoot for hundreds of kilometers under a relentless sun. Their shoulders bear bamboo poles (kanwars) slung with pots (ganga jal) – holy water from the Ganges. Their destination? A local Shiva temple, often a humble village shrine, where this sacred offering will anoint the lingam. This is the Kanwar Yatra, primarily observed in the Hindu month of Shravan (July-August), a spectacle of devotion unparalleled in its scale and intensity, primarily centered around Lord Shiva, the ascetic god of destruction and renewal. Hanuman Chalisa MP3 Download

But why does this ancient ritual, rooted in mythology, continue to exert such a powerful, almost gravitational pull, attracting millions year after year? What unseen force compels urban professionals, farmers, students, and laborers alike to shed their daily identities and become kanwariyas – foot soldiers of faith? This blog isn’t just a description; it’s an immersion into the heart of this extraordinary phenomenon. We’ll journey beyond the surface spectacle to uncover the potent alchemy of faith, community, endurance, and cultural spectacle that makes the Kanwar Yatra uniquely captivating and profoundly relevant, even in our hyper-connected 21st century.

Unpacking the Uniqueness: Why the Kanwar Yatra Stands Alone

Many pilgrimages exist, but the Kanwar Yatra possesses a distinct DNA:

  1. The Physicality of Faith: This isn’t a comfortable bus ride or a serene temple visit. It’s extreme devotion. Kanwariyas undertake grueling journeys, often barefoot, across scorching asphalt, through rain and mud, carrying significant physical weight (up to 40-50 kgs for Dak Kanwars). The pain becomes penance, a direct offering to Shiva, embodying the concept of Tapasya (austerity). This raw, physical manifestation of faith is rare in its collective intensity.
  2. The Mobile Monastery: The Yatra transforms public spaces. Highways become impromptu temples, rest stops (kanwar camps) morph into vibrant spiritual communities. Chants of “Bol Bam!” and “Har Har Mahadev!” create a continuous sonic tapestry. The journey itself is the sacred space, constantly shifting, dynamic, and all-encompassing.
  3. Democracy of Devotion: The Yatra transcends rigid social hierarchies. Millionaires walk alongside laborers. Brahmins share food with Dalits. Age barriers blur as teenagers trek with elders. Within the saffron sea, identity is simplified to “devotee of Shiva.” This temporary but powerful social leveling is a unique sociological phenomenon.
  4. Ephemeral Mega-City: For two weeks, the Yatra route hosts one of the largest temporary gatherings on Earth. Millions converge, creating a pop-up civilization with its own complex logistics, economy (food stalls, repair shops, medical camps), social rules, and unique culture. It emerges, pulsates, and dissolves with astonishing speed and scale.
  5. The Sacred Burden: The act of carrying the Ganga water is central. It’s not just transport; it’s custodianship. The kanwar becomes a sacred object, treated with utmost reverence. Spilling the water is considered inauspicious, adding immense psychological weight to the physical burden. This focus on transporting a divine essence is distinctive.
  6. Mythology in Motion: The Yatra isn’t just inspired by myth; it reenacts it. Kanwariyas embody the legendary act of Ravana, who carried Ganga water in a kanwar to offer to a Shiva lingam in Lanka to gain power. By undertaking the journey, devotees connect directly with this potent narrative, becoming active participants in an eternal story.

The Magnetic Pull: Why Millions Are Irresistibly Drawn

What compels such vast numbers to embrace hardship? The attraction is multi-layered:

  1. Deep-Rooted Faith & Shiva’s Appeal: Lord Shiva, as the accessible Bholenath (Innocent Lord) and the fierce Mahadev (Great God), holds a unique place in the Hindu psyche. His appeal lies in his paradoxes: destroyer and creator, ascetic and householder, terrifying and benevolent. Devotees seek his blessings for liberation (moksha), overcoming obstacles, fulfilling desires, or simply expressing profound love. The Yatra offers a direct, potent channel to connect with this powerful deity through extreme devotion.
  2. Fulfilling Vows (Mannat): A cornerstone of the Yatra. Many undertake the journey as fulfillment of a vow made to Shiva during times of distress – illness, financial hardship, infertility, or seeking success in exams or ventures. The hardship is seen as repayment for divine intervention, a sacred contract. “Bol Bam” often translates to “I kept my promise, Lord!”
  3. Seeking Purification & Merit: The act of undertaking the arduous journey, bearing the Ganga jal (considered the ultimate purifier), and offering it is believed to wash away sins (paap) and accumulate immense spiritual merit (punya). It’s a powerful reset button for the soul.
  4. The Power of Community & Collective Energy: Walking alone is hard; walking amidst millions chanting the same mantras creates an unparalleled collective effervescence. The shared hardship, the mutual support at camps (“Bhaiya, paani milega?“), the constant devotional singing – this generates an intoxicating energy. It fosters a profound sense of belonging, unity, and shared purpose that is deeply attractive in an often fragmented world.
  5. Challenge & Transformation: For many, especially the youth, the Yatra is the ultimate test of physical and mental endurance. Completing it becomes a badge of honor, a transformative rite of passage. It builds resilience, discipline, and a sense of immense personal achievement. It’s an adventure steeped in spirituality.
  6. Cultural Spectacle & Sensory Overload: The Yatra is a feast for the senses. The vibrant saffron sea, the rhythmic clanging of bells attached to kanwars, the deafening chants, the aroma of community kitchens (langars) serving simple yet soulful food, the sight of elaborately decorated kanwars – it’s an overwhelming, immersive cultural experience unlike any other.
  7. Breaking Monotony & Spiritual Tourism: For many participants, especially from rural backgrounds, the Yatra is a break from the daily grind. It’s an adventure, a chance to travel, see new places (Haridwar, Ayodhya, Varanasi, Gangotri), and be part of something monumental. It blends spiritual quest with a unique form of tourism.
  8. Modern Identity & Tradition: In an era of rapid modernization, the Yatra offers a powerful anchor to tradition. Participating asserts cultural identity and connects younger generations to their roots in a tangible, dynamic way. It’s tradition that feels alive and kicking, not confined to museums.

The Anatomy of the Journey: From Source to Shrine

Understanding the Yatra requires walking in their footsteps (often barefoot!):

  1. The Sacred Sources: The journey begins at holy rivers, primarily:
    • Haridwar (Ganga): The undisputed epicenter. Har-ki-Pauri ghat teems with kanwariyas collecting water.
    • Gaumukh/Gangotri (Ganga Source): For the most arduous pilgrimages.
    • Sultanganj (Bihar – Ganga): A major source for Eastern India, particularly for the Baidyanath Dham (Deoghar) Yatra.
    • Ayodhya (Saryu): Gaining prominence.
    • Other Rivers: Prayagraj (Sangam), Varanasi (Ganga), and even local sacred ponds.
  2. Types of Kanwars & Kanwariyas:
    • Dak Kanwar: The most rigorous. Involves running/jogging barefoot with the kanwar, often covering 100+ km in 24-48 hours. Minimal rest. Embodies ultimate austerity. Chants are rapid, intense.
    • Khawas Kanwar: Walking at a normal pace, but steadily. Allows for more rest and interaction. The most common type.
    • Jhoola Kanwar: The kanwar is suspended from a decorated bamboo pole carried by two or more people, often swaying rhythmically. Focuses on devotion through song and dance.
    • Baithi Kanwar: Involves taking rest breaks at designated points, sometimes for days, before proceeding. More common on longer routes.
    • Dandi Kanwar: Similar to Khawas, but uses a staff (dandi) for support.
  3. The Sacred Route: While major highways (Delhi-Haridwar, Delhi-Meerut, Sultanganj-Deoghar) become the main arteries, countless smaller paths feed into them. The route is lined with:
    • Kanwar Camps (Shivirs): Temporary oases run by trusts, temples, volunteers, and even local communities. Offer free:
      • Accommodation: Tents, floors, sometimes just shaded space.
      • Sawan Food & Water (Langar/Bhandara): Massive community kitchens serving simple, satvik meals (dal, rice, roti, vegetables), tea, buttermilk, and unlimited water. A marvel of volunteer logistics.
      • Medical Aid: First-aid stations staffed by volunteers and NGOs, dealing with blisters, dehydration, sprains, and heatstroke.
      • Foot Care: Washing stations, basic treatment.
      • Repair Stations: For broken kanwars or pots.
      • Spiritual Support: Small shrines, chanting groups, religious discourses.
  4. The Rhythm of the Journey:
    • Pre-Dawn Start: Beating the heat is crucial. Movements often start at 3-4 AM.
    • Chanting & Music: Constant. Groups chant in unison. DJ trucks often accompany larger groups, blasting Shiva bhajans and folk songs. Drums (dhol), cymbals, and conch shells add to the symphony. “Bol Bam!” “Har Har Mahadev!” “Om Namah Shivaya!”
    • Rest & Recharge: Camps provide vital respite during peak afternoon heat. Kanwariyas nap, eat, tend to feet, and recharge spiritually.
    • Night Movement: Especially for Dak Kanwars, walking continues through the cool night, illuminated by headlamps and the glow of camps.
    • Community & Camaraderie: Sharing food, water, stories, and helping fellow kanwariyas in distress is paramount. Bonds form quickly.
  5. The Culmination: The Offering: Reaching the destination temple is euphoric. The kanwar is carefully presented. The Ganga jal is poured over the Shiva lingam amidst intense chanting and emotional release. The sense of fulfillment is overwhelming. Many then undertake the return journey, often lighter (without the water), but still filled with devotion.

Beyond the Saffron: The Ecosystem of the Yatra

The Yatra’s scale necessitates a massive support system:

  1. Logistical Marvel:
    • Traffic Management: Authorities implement elaborate diversions, lane allocations, and traffic control measures. It’s a massive operational challenge.
    • Security: Heightened police presence to manage crowds, prevent stampedes (a historical concern), and ensure safety.
    • Sanitation: Thousands of temporary toilets are installed. Waste management is a constant battle.
    • Medical Infrastructure: Mobile hospitals, ambulances on standby, and coordination with local hospitals.
  2. Economic Engine: The Yatra generates significant, albeit temporary, economic activity:
    • Local Businesses: Shops selling saffron clothes, kanwar poles, pots, bells, religious items, shoes, hats, and sunglasses boom.
    • Transport: Buses, trucks, and tempos ferry kanwariyas to starting points and back.
    • Hospitality: Dharamshalas and budget lodgings near sources fill up.
    • Stall Vendors: Countless stalls selling food, drinks, snacks, fruits, and essentials line the routes and near camps.
    • Employment: Temporary jobs surge in security, sanitation, camp management, and transportation.
  3. The Power of Seva (Selfless Service): The backbone of the Yatra. Millions of volunteers:
    • Langar Organizers: Cook and serve mountains of food.
    • Medical Volunteers: Doctors, nurses, paramedics offering free care.
    • Camp Managers: Setting up and running shelters.
    • Traffic Guides & Support Staff: Helping kanwariyas navigate, providing water.
    • Spiritual Guides: Leading chants, offering solace. This voluntary service embodies the spirit of community and devotion.

Facing the Challenges: Shadows Along the Sacred Path

The Yatra’s magnificence coexists with significant challenges:

  1. Environmental Impact: A major concern.
    • Plastic Menace: Discarded water bottles, food packets, and plastic sheets create mountains of waste, polluting roadsides, fields, and rivers. This starkly contradicts the reverence for Ganga.
    • Sanitation & Water Pollution: Inadequate toilet facilities and improper waste disposal near water sources are serious issues.
    • Deforestation: Sourcing bamboo for millions of kanwars raises sustainability questions.
  2. Health & Safety Risks:
    • Heatstroke & Dehydration: The summer timing poses severe risks, sometimes proving fatal.
    • Physical Injuries: Blisters, sprains, fractures from falls or exhaustion are common.
    • Stampedes: Tragic crushes have occurred at crowded ghats or bridges (e.g., 2003 Nasik stampede). Crowd management remains critical.
    • Traffic Accidents: Despite diversions, accidents involving kanwariyas on highways occur.
    • Disease Outbreaks: Concerns about water-borne or communicable diseases in crowded camps.
  3. Social & Logistical Strain:
    • Disruption: Life for non-participants along the routes is significantly disrupted for weeks (traffic jams, noise, market closures).
    • Caste & Gender Dynamics: While democratizing, underlying tensions can surface. Participation of women (Kanwariyins) is growing but still faces traditional barriers and safety concerns in some contexts.
    • Political & Communal Instrumentalization: The massive Hindu mobilization can sometimes be exploited for political messaging, raising communal sensitivities.
    • Commercialization: Concerns about exploitative pricing of essentials and the dilution of spiritual focus by excessive commercialization in some areas.
  4. Modernization vs. Tradition: Balancing safety measures (like footwear rules, which many traditionalists resist) with the core tenets of austerity is an ongoing debate.

Efforts Towards Sustainability & Safety:

Recognizing these challenges, significant efforts are underway:

  1. Banning Single-Use Plastics: Many states now enforce strict bans on plastic near Yatra routes and sources. Kanwariyas are encouraged to use reusable bottles and cloth bags. Awareness campaigns are widespread.
  2. Waste Management Drives: Intensive cleaning drives before, during, and after the Yatra. NGOs and volunteer groups actively collect waste. “Eco-Kanwar” initiatives promote responsible disposal.
  3. Enhanced Medical & Emergency Services: More medical camps, ambulances, hydration points, and heatstroke treatment facilities. Better coordination with hospitals.
  4. Crowd Control Technology: Use of drones, CCTV surveillance, and AI-based crowd monitoring at key points like Haridwar to predict and prevent crushes.
  5. Improved Infrastructure: Building wider ghats and footbridges, designated walking paths, and better camp sanitation facilities.
  6. Digital Integration: Apps providing real-time route information, camp locations, medical points, and safety alerts. Some camps offer mobile charging stations.
  7. Promoting Responsible Participation: Campaigns emphasizing safety (footwear use during extreme heat), hygiene, respect for the environment, and adherence to traffic rules.

Experiencing the Yatra: A Guide for the Curious Observer (Not Participant)

Witnessing the Yatra is an unforgettable experience. Here’s how to do it respectfully and safely:

  1. Choose Your Vantage Point Wisely:
    • Haridwar (Especially Har-ki-Pauri): The epicenter during collection days. Prepare for immense crowds. Best for the raw energy of water collection.
    • Major Highway Routes (e.g., Delhi-Haridwar NH9, Delhi-Meerut): Witness the endless flow. Find a safe spot near a well-organized camp.
    • Destination Temples (e.g., Augharnath in Meerut, Kashi Vishwanath in Varanasi, Baba Baidyanath in Deoghar): Experience the climactic offering and euphoria. Arrive well before the peak offering time.
  2. Timing is Crucial: The most intense period is usually the first Monday of Shravan (Shravan Somvar) and the days leading up to it. However, the Yatra builds over weeks. Mid-week days might be slightly less chaotic for observation.
  3. Essential Tips for Observers:
    • Respect is Paramount: This is deep devotion, not a tourist show. Dress modestly. Maintain a respectful distance.
    • Photography Ethics: Always ask permission before taking close-up photos of individuals, especially if they seem engaged in intense prayer or ritual. Be discreet. Respect signs prohibiting photography in certain areas/camps.
    • Silence Your Judgement: Some aspects (pain, apparent chaos) might seem extreme. Observe with cultural sensitivity and an open mind.
    • Safety First: Stay aware of crowds. Keep children close. Follow police instructions. Avoid jostling. Stay hydrated.
    • Support Seva (Carefully): If moved to help, consider donating to established NGOs managing camps, medical aid, or sanitation before or after your visit. Don’t disrupt camp operations spontaneously.
    • Embrace the Chaos: It will be loud, crowded, and overwhelming. Lean into the sensory experience – the chants, the colors, the energy.
  4. What to Observe:
    • The diverse faces of devotion – young, old, intense, serene.
    • The incredible logistics of the camps – the langar operations.
    • The decoration of the kanwars (especially Jhoola Kanwars).
    • The spirit of community and mutual support.
    • The soundscape – the layered chants, music, and bells.

Personal Narratives: Voices from the Saffron River

To truly understand the attraction, listen to the kanwariyas:

  • Ramesh, 45, Auto-rickshaw Driver (Delhi): “My son was very sick last year. I prayed to Baba Bholenath. I promised a Dak Kanwar if he got well. By Mahadev’s grace, he recovered. This pain in my feet? It’s nothing. It’s my thanks. Every step is ‘Bol Bam!'”
  • Priya, 28, Software Engineer (Bangalore): “My first Yatra! I grew up hearing stories. It’s… indescribable. The energy, the unity. Walking barefoot makes you feel connected to the earth, to everyone around you. Yes, it’s hard. But the feeling when you pour the Ganga jal? Pure bliss. I feel reset.”
  • Vijay Singh, 65, Farmer (Haryana): “35 years I’ve walked. It’s not just faith; it’s my annual pilgrimage to my own strength. Meeting the same brothers year after year on the road. Sharing roti under the stars. The city folks see chaos; I see the biggest family on Earth.”
  • Dr. Ananya Sharma, Volunteer Doctor (Haridwar Camp): “We treat hundreds daily – blisters, dehydration, exhaustion. But the spirit! A man with bleeding feet refuses painkillers, saying ‘It’s for Shankar ji.’ It’s humbling. This Seva is my offering.”
  • Arjun, 19, College Student (Dak Kanwar): “Everyone thinks we’re crazy. Maybe! But running with 40 kilos, chanting, feeling like you could collapse any second… and then finding that burst of energy from somewhere? It shows you what you’re really made of. It’s the ultimate high. Plus, Bholenath has my back for exams now!”

The Kanwar Yatra in the Modern World: Evolution & Future

The Yatra is not static. It’s evolving:

  1. Increasing Women Participation: More Kanwariyins are undertaking the journey, challenging traditional norms. Dedicated women’s camps and support groups are emerging.
  2. Technology Integration:
    • Apps: Route tracking, camp locations, emergency contacts.
    • Social Media: Kanwariyas sharing live updates, experiences (#KanwarYatra, #BolBam).
    • Digital Payments: Donations to camps/trusts via UPI.
    • Safety Tech: Drones, GPS tracking for groups.
  3. Heightened Environmental Consciousness: “Eco-Kanwar” initiatives are gaining traction. Reusable materials, strict plastic bans, and massive clean-ups are becoming more common, driven by both authorities and devotees themselves.
  4. Professional Management: Better coordination between police, administration, NGOs, and religious trusts is improving safety and logistics, though challenges remain.
  5. Global Reach: The concept inspires similar, smaller-scale observances in Hindu diaspora communities worldwide.
  6. Balancing Tradition & Safety: The debate continues – mandatory footwear in extreme conditions? Regulating group sizes? Finding solutions that preserve the Yatra’s essence while minimizing risks is the ongoing challenge.

The Unstoppable River of Faith

The Kanwar Yatra is a force of nature harnessed by faith. It’s a paradox – ancient yet vibrantly alive, intensely personal yet overwhelmingly collective, austere yet bursting with color and sound. It challenges our modern notions of comfort, efficiency, and individual existence, presenting instead a powerful vision of community, sacrifice, and unwavering devotion.

Its unique attraction lies precisely in this defiance. In a world often characterized by isolation and virtual connection, the Yatra offers raw, tangible community. In an age of convenience, it demands and celebrates endurance. In the face of cynicism, it radiates unshakeable faith. It reminds us of the extraordinary power that lies within ordinary people when united by a shared, sacred purpose.

Witnessing the saffron tide flow across the land, hearing the earth-shaking chants of “Har Har Mahadev!”, seeing the blistered feet and radiant smiles – this is not just observing a ritual; it’s encountering the living, breathing soul of India. It’s a phenomenon that doesn’t just attract people; it magnetizes them, transforms them, and leaves an indelible mark on the heart and the landscape. The Kanwar Yatra is more than a pilgrimage; it’s a testament to the enduring, gravity-defying power of human spirit channeled through devotion. It is, quite simply, Bhakti Unbound.

एकादशी माता की आरती (Ekadashi Mata Ki Aarti Lyrics: Om Jai Ekadashi PDF)

एकादशी माता की आरती (Ekadashi Mata Ki Aarti) एक अत्यंत प्रिय और पवित्र भजन है, जो विशेष रूप से एकादशी व्रत के दिन गाया जाता है। एकादशी माता, जिन्हें “एकादशी देवी” भी कहा जाता है, हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखती हैं। यह आरती देवी एकादशी की पूजा-अर्चना का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो भक्तों को उनके व्रत और धार्मिक कर्तव्यों में मदद करती है।

आरती का गान भक्तों की श्रद्धा और भक्ति को प्रकट करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इसमें एकादशी माता के गुण, उनके कृपा और उनके महत्व का गुणगान किया जाता है। यह आरती विशेष रूप से उन लोगों द्वारा गाई जाती है जो एकादशी के दिन उपवासी रहते हैं और देवी एकादशी से विशेष आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं।

आरती की शुरुआत ओम जय एकादशी के उद्घोष से होती है, जो भक्तों की भक्ति को व्यक्त करता है और एकादशी माता की पूजा में मनोबल और श्रद्धा को बढ़ाता है। इस आरती के माध्यम से भक्त अपनी आत्मा की शुद्धि और देवी के आशीर्वाद की प्राप्ति की कामना करते हैं।


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|| एकादशी माता की आरती ||

ॐ जय एकादशी, जय एकादशी, जय एकादशी माता।
विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता॥
ॐ जय एकादशी…॥

तेरे नाम गिनाऊं देवी, भक्ति प्रदान करनी।
गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी॥
ॐ जय एकादशी…॥

मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष की उत्पन्ना, विश्वतारनी जन्मी।
शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा, मुक्तिदाता बन आई॥
ॐ जय एकादशी…॥

पौष के कृष्णपक्ष की, सफला नामक है।
शुक्लपक्ष में होय पुत्रदा, आनन्द अधिक रहै॥
ॐ जय एकादशी…॥

नाम षटतिला माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै।
शुक्लपक्ष में जया, कहावै, विजय सदा पावै॥
ॐ जय एकादशी…॥

विजया फागुन कृष्णपक्ष में शुक्ला आमलकी।
पापमोचनी कृष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की॥
ॐ जय एकादशी…॥

चैत्र शुक्ल में नाम कामदा, धन देने वाली।
नाम बरुथिनी कृष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली॥
ॐ जय एकादशी…॥

शुक्ल पक्ष में होय मोहिनी अपरा ज्येष्ठ कृष्णपक्षी।
नाम निर्जला सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी॥
ॐ जय एकादशी…॥

योगिनी नाम आषाढ में जानों, कृष्णपक्ष करनी।
देवशयनी नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरनी॥
ॐ जय एकादशी…॥

कामिका श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए।
श्रावण शुक्ला होय पवित्रा आनन्द से रहिए॥
ॐ जय एकादशी…॥

अजा भाद्रपद कृष्णपक्ष की, परिवर्तिनी शुक्ला।
इन्द्रा आश्चिन कृष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला॥
ॐ जय एकादशी…॥

पापांकुशा है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी।
रमा मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी॥
ॐ जय एकादशी…॥

देवोत्थानी शुक्लपक्ष की, दुखनाशक मैया।
पावन मास में करूं विनती पार करो नैया॥
ॐ जय एकादशी…॥

परमा कृष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी।
शुक्ल मास में होय पद्मिनी दुख दारिद्र हरनी॥
ॐ जय एकादशी…॥

जो कोई आरती एकादशी की, भक्ति सहित गावै।
जन गुरदिता स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै॥
ॐ जय एकादशी…॥

||Ekadashi Mata Ki Aarti Lyrics||

Om Jay Ekadashi, Jay Ekadashi, Jay Ekadashi Mata.
Vishnu puja vrat ko dharan kar, shakti mukti pata.
Om Jay Ekadashi…

Tere naam gināūṁ devī, bhakti pradān karani.
Gan gaurav kī deni mātā, shāstroṁ meṁ varani.
Om Jay Ekadashi…

Mārgaśīrṣa ke kṛṣṇapakṣa kī utpannā, viśvatāranī janmī.
Śukla pakṣa meṁ huī mokṣadā, muktidātā ban āī.
Om Jay Ekadashi…

Pauṣ ke kṛṣṇapakṣa kī, saphalā nāmaka hai.
Śuklapakṣa meṁ hoy putradā, ānanda adhik rahai.
Om Jay Ekadashi…

Nāma ṣaṭatilā māgha māsa meṁ, kṛṣṇapakṣa āvai.
Śuklapakṣa meṁ jayā, kahāvai, vijaya sadā pāvai.
Om Jay Ekadashi…

Vijayā phāgun kṛṣṇapakṣa meṁ śuklā āmalakī.
Pāpamocanī kṛṣṇa pakṣa meṁ, caitra mahābalī kī.
Om Jay Ekadashi…

Caitra śukla meṁ nāma kāmadā, dhan dene vālī.
Nāma baruthinī kṛṣṇapakṣa meṁ, vaisākha māha vālī.
Om Jay Ekadashi…

Śukla pakṣa meṁ hoy mohinī aparā jyeṣṭha kṛṣṇapakṣī.
Nāma nirjalā sab sukh karanī, śuklapakṣa rakhi.
Om Jay Ekadashi…

Yogini naam aashaadh mein jaanon, krishnapaksh karani.
Devashayani naam kahayo, shuklapaksh dharani.
Om Jay Ekadashi…

Kaamika shraavan maas mein aavai, krishnapaksh kahiyai.
Shraavan shukla hoy pavitra, aanand se rahiye.
Om Jay Ekadashi…

Aja bhaadrapad krishnapaksh ki, parivartini shukla.
Indraa ashchin krishnapaksh mein, vrat se bhavsaagar nikala.
Om Jay Ekadashi…

Paapaankushaa hai shukla paksh mein, aap haranhaari.
Rama maas kaartik mein aavai, sukhadaayak bhaari.
Om Jay Ekadashi…

Devotthaanii shuklapaksh ki, dukhnaashak maiyaa.
Paavan maas mein karu vinati, paar karo naiyaa.
Om Jay Ekadashi…

Paramaa krishnapaksh mein hoti, jan mangal karani.
Shukla maas mein hoy padminii, dukh daaridra harani.
Om Jay Ekadashi…

Jo koi aarati ekadashi ki, bhakti sahit gaavai.
Jan guraditaa swarg ka vaasa, nishchay vah paavai.
Om Jay Ekadashi…




एकादशी माता की आरती के लाभ और इतिहास

लाभ

आध्यात्मिक लाभ: एकादशी माता की आरती के नियमित पाठ से भक्तों को आध्यात्मिक शांति और मानसिक सुकून प्राप्त होता है। यह आरती भक्तों को ध्यान और समर्पण की ओर प्रेरित करती है, जिससे उनकी आत्मा की शुद्धि होती है।

पाप नाश: एकादशी व्रत के साथ आरती का गान करने से पापों का नाश होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है। यह व्रत और आरती भक्तों को धार्मिक कर्तव्यों का पालन करने और जीवन को संयमित बनाने में मदद करती है।

शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य: व्रत के दौरान उपवासी रहने और आरती का गान करने से शरीर और मन की शुद्धि होती है। यह एक प्रकार का detoxification होता है, जो शारीरिक स्वास्थ्य को सुधारता है और मानसिक तनाव को कम करता है।

धार्मिक कर्तव्यों की पूर्ति: एकादशी माता की आरती के माध्यम से भक्त अपने धार्मिक कर्तव्यों को पूरा करते हैं और देवी एकादशी की कृपा प्राप्त करते हैं। यह उनके जीवन में समृद्धि और खुशहाली लाने का मार्ग प्रशस्त करता है।

परिवारिक समृद्धि: एकादशी माता की आरती और व्रत के पालन से परिवार में सुख-समृद्धि और समन्वय बना रहता है। यह पारिवारिक बंधनों को मजबूत करने और शांति बनाए रखने में मदद करती है।

इतिहास

एकादशी माता की आरती का इतिहास बहुत पुराना है और इसका संबंध हिंदू धर्म की प्राचीन परंपराओं से है। एकादशी, हर माह की चौदहवीं तिथि के बाद आने वाली ग्यारहवीं तिथि को मनाई जाती है। यह दिन विशेष रूप से व्रत और उपवास के लिए समर्पित होता है।

एकादशी का महत्व

एकादशी का व्रत विशेष रूप से भगवान विष्णु की पूजा के लिए महत्वपूर्ण है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इस दिन उपवासी रहने और पूजा करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इस दिन का व्रत और आरती भक्तों को धार्मिक और आध्यात्मिक उन्नति की ओर मार्गदर्शित करती है।

आरती का इतिहास

एकादशी माता की आरती की परंपरा भी इसी धार्मिक महत्व से जुड़ी हुई है। यह आरती भक्तों द्वारा एकादशी के दिन देवी एकादशी की पूजा में गाई जाती है। आरती में देवी एकादशी के गुणों और उनकी कृपा का गुणगान किया जाता है, जिससे भक्तों की भक्ति और श्रद्धा को बढ़ावा मिलता है। यह आरती विशेष रूप से उन भक्तों द्वारा गाई जाती है जो एकादशी व्रत का पालन कर रहे होते हैं और देवी की कृपा प्राप्त करने की आकांक्षा रखते हैं।

इस प्रकार, एकादशी माता की आरती न केवल धार्मिक पूजा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, बल्कि यह भक्तों के जीवन में आध्यात्मिक और शारीरिक लाभ भी प्रदान करती है।


FAQs – एकादशी माता की आरती (Ekadashi Mata Ki Aarti)

एकादशी व्रत में शाम की पूजा कैसे करें?

एकादशी व्रत में शाम की पूजा करते समय सबसे पहले भगवान विष्णु की तस्वीर या मूर्ति के सामने दीपक जलाएं। फिर भगवान को तिलक करें और फूल चढ़ाएं। धूप, दीप और नैवेद्य (फल या अन्य सात्विक भोजन) अर्पित करें। इसके बाद भगवान विष्णु की आरती गाएं और अंत में व्रत कथा सुनें या पढ़ें। ध्यान रखें कि पूजा पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ करें।

एकादशी व्रत कितने बजे खोलना चाहिए?

एकादशी व्रत अगले दिन, यानी द्वादशी तिथि के सूर्योदय के बाद, परन्तु दोपहर से पहले खोलना चाहिए। व्रत खोलने का सबसे शुभ समय द्वादशी तिथि के पहले चार घंटे होते हैं, जिसे ‘पारणा’ कहा जाता है।

एकादशी व्रत कैसे खोलें?

एकादशी व्रत खोलने के लिए सबसे पहले भगवान विष्णु की पूजा करें और उन्हें नैवेद्य अर्पित करें। फिर गंगाजल से स्नान करने के बाद सात्विक भोजन ग्रहण करें। पारणा के समय व्रत खोलने के लिए फल, दूध, या पंचामृत ग्रहण करना उत्तम माना जाता है।

एकादशी के व्रत में शाम को क्या खाया जाता है?

एकादशी के व्रत में शाम को सात्विक और फलाहार का सेवन किया जा सकता है। फल, दूध, मेवा, और साबूदाने की खिचड़ी जैसे खाद्य पदार्थ खाए जा सकते हैं। ध्यान रहे कि इस दिन अनाज और तामसिक भोजन का सेवन न करें।

एकादशी व्रत क्या खाकर तोड़ना चाहिए?

एकादशी व्रत को पारणा के समय फल, दूध, या पंचामृत का सेवन करके तोड़ना चाहिए। इसके बाद अन्य सात्विक भोजन ग्रहण कर सकते हैं। अनाज और तामसिक भोजन का सेवन न करें, और व्रत खोलने के बाद भी सात्विक आहार ही लें।