Wednesday, January 28, 2026
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गुरु नानक आरती: धनासरी महला (Guru Nanak Aarti: Dhanasari Mahala)

गुरु नानक आरती (Guru Nanak Aarti) गुरु नानक देव जी सिख धर्म के पहले गुरु और संस्थापक हैं, जिनके जीवन और उपदेशों ने लाखों लोगों को आध्यात्मिक मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी है। उनकी आरती “धनासरी महला” एक विशेष प्रार्थना है जो गुरु नानक जी की महानता और उनके दिव्य प्रकाश की स्तुति करती है। यह आरती सिख धर्म में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है और इसे गुरु नानक जी के प्रति श्रद्धा और प्रेम की अभिव्यक्ति के रूप में गाया जाता है।

इस आरती में गुरु नानक देव जी की शरणागत वंदना की जाती है और उनके द्वारा दिए गए सिख धर्म के मूलभूत सिद्धांतों का सम्मान किया जाता है। “धनासरी महला” विशेष रूप से उनकी भक्ति, सत्य और मानवता के प्रति समर्पण की भावना को प्रकट करती है। इसे सिख धार्मिक समारोहों, पूजा और अन्य धार्मिक गतिविधियों में गाया जाता है, जो गुरु नानक जी की उपस्थिति और उनकी शिक्षाओं के प्रति श्रद्धा को व्यक्त करता है।

गुरु नानक की इस आरती के माध्यम से भक्तों को आत्मा की शांति, धर्म की समझ और आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है। यह आरती सिख समुदाय में एकता और भक्ति का प्रतीक है, जो गुरु नानक के जीवन और उनके उपदेशों की महिमा को उजागर करती है।


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Dhanasari Mahala Lyrics PDF


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|| गुरु नानक आरती: धनासरी महला ||

धनासरी महला १ आरती ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गगन मै थालु रवि चंदु दीपक
बने तारिका मंडल जनक मोती ॥

धूपु मल आनलो पवणु चवरो करे
सगल बनराइ फूलंत जोती ॥

कैसी आरती होइ भव खंडना तेरी आरती ॥
अनहता सबद वाजंत भेरी रहाउ ॥

सहस तव नैन नन नैन है तोहि कउ
सहस मूरति नना एक तोही ॥

सहस पद बिमल नन एक पद गंध बिनु
सहस तव गंध इव चलत मोही ॥

सभ महि जोति जोति है सोइ ॥
तिस कै चानणि सभ महि चानणु होइ ॥

गुर साखी जोति परगटु होइ ॥
जो तिसु भावै सु आरती होइ ॥

हरि चरण कमल मकरंद लोभित मनो
अनदिनो मोहि आही पिआसा ॥

कृपा जलु देहि नानक सारिंग
कउ होइ जा ते तेरै नामि वासा ॥

गगन मै थालु, रवि चंदु दीपक बने,
तारका मंडल, जनक मोती।
धूपु मलआनलो, पवण चवरो करे,
सगल बनराइ फुलन्त जोति॥
कैसी आरती होइ॥
भवखंडना तेरी आरती॥
अनहत सबद बाजंत भेरी॥

Guru Nanak Aarti: dhanasari mahala lyrics

ਧਨਾਸਰੀ ਮਹਲਾ ੧ ਆਰਤੀ ॥
ਇਕੁ ਓਅੰਕਾਰੁ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਗਗਨ ਮੈ ਥਾਲੁ ਰਵਿ ਚੰਦੁ ਦੀਪਕੁ ॥
ਬਨੇ ਤਾਰਿਕਾ ਮੰਡਲ ਜਨਕ ਮੋਤੀ ॥

ਧੂਪੁ ਮਲ ਆਨਲੋ ਪਵਣੁ ਚਵਰੋ ਕਰੇ ॥
ਸਗਲ ਬਨਰਾਇ ਫੂਲੰਤ ਜੋਤਿ ਜਗਦੀਸੁ ਬਨੇ ॥

ਕੈਸੀ ਆਰਤੀ ਹੋਇ ਭਵ ਖੰਡਨਾ ਤੇਰੀ ਆਰਤੀ ॥
ਅਨਹਤਾ ਸਬਦੁ ਵਾਜੰਤ ਭੇਰੀ ਰਹਾਉ ॥

ਸਹਸ ਤਵ ਨੈਨ ਨਨ ਨੈਨ ਹੈ ਤੋਹਿ ਕਉ ॥
ਸਹਸ ਮੂਰਤਿ ਨਨਾ ਏਕ ਤੋਹੀ ॥

ਸਹਸ ਪਦ ਬਿਮਲ ਨਨ ਏਕ ਪਦ ਗੰਧ ਬਿਨੁ ॥
ਸਹਸ ਤਵ ਗੰਧ ਇਵ ਚਲਤ ਮੋਹੀ ॥

ਸਭ ਮਹਿ ਜੋਤਿ ਜੋਤਿ ਹੈ ਸੋਇ ॥
ਤਿਸ ਕੈ ਚਾਨਣਿ ਸਭ ਮਹਿ ਚਾਨਣੁ ਹੋਇ ॥

ਗੁਰ ਸਾਖੀ ਜੋਤਿ ਪਰਗਟੁ ਹੋਇ ॥
ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੁ ਆਰਤੀ ਹੋਇ ॥

ਹਰਿ ਚਰਣ ਕਮਲ ਮਕਰੰਦ ਲੋਭਤ ਮਨੋ ॥
ਅਨਦਿਨੋ ਮੋਹਿ ਆਹੀ ਪਿਆਸਾ ॥

ਕ੍ਰਿਪਾ ਜਲੁ ਦੇਹਿ ਨਾਨਕ ਸਾਰੰਗ ਕਉ ॥
ਹੋਇ ਜਾ ਤੇ ਤੇਰੈ ਨਾਮਿ ਵਾਸਾ ॥

ਗਗਨ ਮੈ ਥਾਲੁ, ਰਵਿ ਚੰਦੁ ਦੀਪਕੁ ਬਨੇ,
ਤਾਰਕਾ ਮੰਡਲ, ਜਨਕ ਮੋਤੀ।
ਧੂਪੁ ਮਲਆਨਲੋ, ਪਵਣ ਚਵਰੋ ਕਰੇ,
ਸਗਲ ਬਨਰਾਇ ਫੁਲਨਤ ਜੋਤਿ॥
ਕੈਸੀ ਆਰਤੀ ਹੋਇ॥
ਭਵਖੰਡਨਾ ਤੇਰੀ ਆਰਤੀ॥
ਅਨਹਤ ਸਬਦ ਬਾਜੰਤ ਭੇਰੀ॥

Guru Nanak Aarti PDF

Gagan Mae Thal Ravachanda Deepak Banay
Tarka Mandala Janak Moti

Dhoop Mal Analo Pavan Chavro Karey
Sagal Banray Phulant Jyoti

Kaisi Aarti Hoi Bhavkhanda Teri Aarti
Anhata Shabad Vajant Pheri

Sahas Tav Nain Na Na Nain Hai Tohi Kau
Sahas Moorat Na Na Ika Tohi

Sahas Pad Bimal Na Na Ik Pad
Gandh Bin Sahas Tav Gandha Iv Chalat Mohi

Sabh Mae Jot Jot Hai Soi
Tis De Chanan Sab Mein Chanan Hoi

Gur Sakhi Jyot Praghat Hoi
Jo Tis Bhave So Aarti Hoi

Har Charan Kamal Mukrand Lobita Man
Ananda Na Mohey Ai Pyaasa

Kirpa Jal Deh Nanak Sarang Kau
Hoi Jaat Tere Nae Vasa


गुरु नानक आरती: धनासरी महला के लाभ

गुरु नानक देव जी की आरती “धनासरी महला” केवल एक धार्मिक प्रथा नहीं, बल्कि यह एक आध्यात्मिक साधना का भी हिस्सा है। इस आरती के कई लाभ हैं, जो भक्तों की आध्यात्मिक और मानसिक स्थिति को सुदृढ़ बनाने में सहायक होते हैं।

आध्यात्मिक शांति और संतुलन

धनासरी महला आरती के नियमित पाठ से भक्तों को आत्मिक शांति और मानसिक संतुलन प्राप्त होता है। गुरु नानक देव जी की स्तुति और उनके उपदेशों को ध्यान में रखकर की जाने वाली यह आरती आत्मा की गहराई में शांति का अनुभव कराती है।

धार्मिक समर्पण और भक्ति

इस आरती के माध्यम से भक्त गुरु नानक देव जी के प्रति अपने समर्पण और भक्ति को प्रकट करते हैं। यह प्रार्थना भक्तों को धर्म के प्रति जागरूक और समर्पित बनाती है, जिससे उनकी भक्ति और श्रद्धा में वृद्धि होती है।

सकारात्मक ऊर्जा का संचार

आरती के समय गाए जाने वाले शब्द और संगीत सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। यह वातावरण को शुद्ध करता है और भक्तों के जीवन में सकारात्मकता और खुशी को बढ़ाता है।

आध्यात्मिक उन्नति और आत्मज्ञान

गुरु नानक देव जी की आरती के माध्यम से भक्त उनके उपदेशों और शिक्षाओं से प्रेरित होते हैं। इससे उन्हें आत्मज्ञान प्राप्त होता है और वे जीवन के सही मार्ग पर चलने के लिए प्रोत्साहित होते हैं।

सामाजिक और समुदायिक एकता

गुरु नानक आरती को सामूहिक रूप से गाने से सिख समुदाय में एकता और भाईचारे की भावना को बढ़ावा मिलता है। यह समाज को एकजुट करती है और सामूहिक धार्मिक गतिविधियों के माध्यम से सामाजिक संबंधों को मजबूत बनाती है।

आध्यात्मिक बल और धैर्य

धनासरी महला के नियमित पाठ से भक्तों को आध्यात्मिक बल और धैर्य प्राप्त होता है। यह उन्हें जीवन की कठिनाइयों का सामना करने में सक्षम बनाता है और उन्हें धैर्य रखने की प्रेरणा देता है।

गुरु नानक आरती “धनासरी महला” न केवल धार्मिक बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक लाभ प्रदान करती है, जो भक्तों के जीवन को सकारात्मक दिशा में बदलने में सहायक होती है।

श्री बद्रीनाथजी की आरती (Shri Badrinath Aarti: Pavan Mand Sugandh Sheetal Lyrics)

श्री बद्रीनाथजी की आरती (Shri Badrinath Aarti) उनके भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक अद्यात्मिक अनुभव है। यह आरती उनके पावन मंदिर में प्रतिदिन समर्पित की जाती है, जो हिमालय के श्रृंगारों में स्थित है। बद्रीनाथजी, विष्णु भगवान के एक प्रमुख अवतार माने जाते हैं, और उनके इस मंदिर में उनकी प्राचीनता और भगवानी का प्रतीक्षा करने वाले उनके भक्तों की भक्ति नियामक बनती है।

बद्रीनाथजी की आरती का पाठ एक विशेष विधि से किया जाता है, जिसमें भक्त उनके दिव्य स्वरूप की महिमा गाते हैं और उनकी प्रसन्नता के लिए प्रार्थना करते हैं। इस आरती में बद्रीनाथजी के तेज, सुगंध, और पावनता की व्याख्या की गई है, जो उनके दिव्य आत्मा को स्थायीत करती है।

बद्रीनाथजी की आरती के पाठ से भक्त उनकी अनुपम कृपा और आशीर्वाद का अनुभव करते हैं। यह आरती उनके दिव्य स्वरूप के सामने भक्त की भक्ति और समर्पण को व्यक्त करने का एक माध्यम है, जिससे उनके मन और आत्मा की शुद्धता में वृद्धि होती है।

इस आरती में उनकी प्रत्यक्षता और प्राचीनता के साथ-साथ, उनकी अनंत शक्ति और सौंदर्य की भी चर्चा होती है। भक्त उनके चरणों में अपने मन की स्वच्छता और समर्पण का प्रकटीकरण करते हैं, जिससे उन्हें उनके आदर्शों का पालन करने के लिए प्रेरित किया जाता है।

बद्रीनाथजी की आरती एक ध्यानात्मक अनुभव है, जिसमें भक्त उनके सामर्थ्य, उपकार, और दया का बोध करते हैं। इस आरती के माध्यम से उनके भक्त उनकी प्रतीति में बल और उनकी प्रसन्नता के लिए प्रार्थना करते हैं, जो उन्हें सदैव उनके भव्य स्वरूप में स्थायी करता है।

इस प्रकार, बद्रीनाथजी की आरती उनके भक्तों के लिए एक अत्यधिक महत्वपूर्ण साधना है, जो उन्हें उनके आराध्य भगवान के समीप लाकर उनकी कृपा और आशीर्वाद को प्राप्त करने का साधन प्रदान करती है।


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Pavan Mand Sugandh Sheetal Lyrics PDF


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|| श्री बद्रीनाथजी की आरती ||

पवन मंद सुगंध शीतल,
हेम मंदिर शोभितम् ।
निकट गंगा बहत निर्मल,
श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम् ॥

शेष सुमिरन करत निशदिन,
धरत ध्यान महेश्वरम् ।
वेद ब्रह्मा करत स्तुति,
श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम् ॥
॥ पवन मंद सुगंध शीतल…॥

शक्ति गौरी गणेश शारद,
नारद मुनि उच्चारणम् ।
जोग ध्यान अपार लीला,
श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम् ॥
॥ पवन मंद सुगंध शीतल…॥

इंद्र चंद्र कुबेर धुनि कर,
धूप दीप प्रकाशितम् ।
सिद्ध मुनिजन करत जय जय,
बद्रीनाथ विश्व्म्भरम् ॥
॥ पवन मंद सुगंध शीतल…॥

यक्ष किन्नर करत कौतुक,
ज्ञान गंधर्व प्रकाशितम् ।
श्री लक्ष्मी कमला चंवरडोल,
श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम् ॥
॥ पवन मंद सुगंध शीतल…॥

कैलाश में एक देव निरंजन,
शैल शिखर महेश्वरम् ।
राजयुधिष्ठिर करत स्तुति,
श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम् ॥
॥ पवन मंद सुगंध शीतल…॥

श्री बद्रजी के पंच रत्न,
पढ्त पाप विनाशनम् ।
कोटि तीर्थ भवेत पुण्य,
प्राप्यते फलदायकम् ॥
॥ पवन मंद सुगंध शीतल…॥

पवन मंद सुगंध शीतल,
हेम मंदिर शोभितम् ।
निकट गंगा बहत निर्मल,
श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम् ॥

|| Shri Badrinath Aarti ||

Pavan mand sugandh shital,
Hem mandir shobhitam.
Nikat ganga bahat nirmal,
Shri Badrinath vishwambharam.

Shesh sumiran karat nishadin,
Dharat dhyan Maheshwaram.
Ved Brahma karat stuti,
Shri Badrinath vishwambharam.

|| Pavan mand sugandh shital… ||

Shakti Gauri Ganesh Sharad,
Narad muni uchaaranam.
Jog dhyan apaar leela,
Shri Badrinath vishwambharam.

|| Pavan mand sugandh shital… ||

Indra Chandra Kubera dhuni kar,
Dhoop deep prakashitam.
Siddh munijan karat jay jay,
Badrinath vishwambharam.

|| Pavan mand sugandh shital… ||

Yaksh kinnar karat kautuk,
Gyan Gandharv prakashitam.
Shri Lakshmi Kamala chamvardol,
Shri Badrinath vishwambharam.

|| Pavan mand sugandh shital… ||

Kailash mein ek dev niranjana,
Shail shikhar Maheshwaram.
Rajyudhishthir karat stuti,
Shri Badrinath vishwambharam.

|| Pavan mand sugandh shital… ||

Shri Badraji ke panch ratna,
Padht pap vinashanam.
Koti teerth bhavet punya,
Prapyate phaladayakam.

|| Pavan mand sugandh shital… ||

Pavan mand sugandh shital,
Hem mandir shobhitam.
Nikat ganga bahat nirmal,
Shri Badrinath vishwambharam.


श्री बद्रीनाथजी की आरती के लाभ

श्री बद्रीनाथजी की आरती भारतीय धर्म और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह आरती विशेष रूप से बद्रीनाथ धाम की पूजा और दर्शन के दौरान गाई जाती है। बद्रीनाथ धाम भगवान विष्णु का एक प्रमुख तीर्थ स्थल है और इसे भारत के चार धामों में से एक माना जाता है। आरती, जो एक धार्मिक गीत या प्रार्थना होती है, भगवान की भक्ति और सम्मान का एक महत्वपूर्ण तरीका है। आइए इस आरती के लाभों को विस्तार से समझते हैं:

भक्ति और समर्पण की भावना में वृद्धि

श्री बद्रीनाथजी की आरती गाने से भक्तों के दिल में भगवान के प्रति भक्ति और समर्पण की भावना बढ़ती है। इस आरती के माध्यम से भक्त अपने ईश्वर के प्रति अपनी निष्ठा और प्रेम प्रकट करते हैं, जो आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होता है।

आध्यात्मिक शांति और मानसिक सुकून

बद्रीनाथजी की आरती के नियमित पाठ से मानसिक तनाव और अशांति को कम किया जा सकता है। भगवान के समक्ष आरती करना मन को शांति और सुकून प्रदान करता है। यह मानसिक शांति और संतुलन को बढ़ावा देता है, जो जीवन की चुनौतियों को संभालने में मदद करता है।

शुद्धिकरण और सकारात्मक ऊर्जा

बद्रीनाथजी की आरती का नियमित अभ्यास करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है। यह नकारात्मक विचारों और भावनाओं को दूर करने में मदद करता है और एक शुद्ध और शांतिपूर्ण वातावरण का निर्माण करता है।

आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष की प्राप्ति

बद्रीनाथजी की आरती के माध्यम से भगवान की भक्ति करना और उसकी महिमा का गान करना व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है। यह मोक्ष की प्राप्ति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है, क्योंकि भक्त अपनी साधना के माध्यम से भगवान के करीब पहुँचता है।

समाज में सौहार्द और एकता की भावना

बद्रीनाथजी की आरती का आयोजन सामूहिक रूप से किया जाता है, जिससे समाज में एकता और भाईचारे की भावना को प्रोत्साहन मिलता है। लोग मिलकर भगवान की आरती करते हैं, जो समाज में सहयोग और आपसी प्रेम को बढ़ावा देता है।

धार्मिक अनुष्ठान और पूजा की विधियों का पालन

श्री बद्रीनाथजी की आरती धार्मिक अनुष्ठानों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसे गाने और सुनने से भक्तों को पूजा विधियों और धार्मिक रीतियों का पालन करने में मदद मिलती है। यह धार्मिक अनुशासन को मजबूत करता है और धार्मिकता को बढ़ावा देता है।

स्वास्थ्य और भलाई

बद्रीनाथजी की आरती के समय मन की एकाग्रता और ध्यान लगाना, स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है। यह मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद करता है। धार्मिक क्रियाओं में संलग्न होने से तनाव कम होता है और आत्म-संयम बढ़ता है।

दृष्टिकोण में सकारात्मक परिवर्तन

बद्रीनाथजी की आरती के नियमित अभ्यास से व्यक्ति के दृष्टिकोण में सकारात्मक परिवर्तन आता है। यह आंतरिक दृष्टिकोण को शुद्ध करता है और जीवन को सकारात्मक दृष्टिकोण से देखने की क्षमता को बढ़ाता है।

संकट और कठिनाइयों से मुक्ति

श्री बद्रीनाथजी की आरती का पाठ संकट और कठिनाइयों को दूर करने में सहायक हो सकता है। भगवान की भक्ति और आरती के माध्यम से व्यक्ति को कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति मिलती है और समस्याओं का समाधान प्राप्त होता है।

धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान

बद्रीनाथजी की आरती करने से धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को प्रोत्साहन मिलता है। यह धार्मिक परंपराओं को बनाए रखने में मदद करता है और नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और धर्म के प्रति जागरूक करता है।

श्री बद्रीनाथजी की आरती केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह जीवन के विभिन्न पहलुओं पर सकारात्मक प्रभाव डालने का एक महत्वपूर्ण साधन है। इसके माध्यम से भक्तों को भक्ति, मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा, और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। इसके अलावा, यह सामाजिक एकता, धार्मिक अनुशासन, और सांस्कृतिक पहचान को भी बढ़ावा देती है। इस प्रकार, श्री बद्रीनाथजी की आरती एक समग्र साधना है जो जीवन को अधिक समृद्ध और संतुलित बनाती है।

जय शनि देवा – श्री शनिदेव आरती (Aarti Shri Shani Jai Jai Shani Dev)

श्री शनि देव की आरती (jai Jai Shani Dev) एक महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा है जो विशेष रूप से शनिवारी पूजा में की जाती है। शनि देव, जिन्हें सभी ग्रहों में सबसे प्रभावशाली माना जाता है, न्याय और धर्म के प्रतीक हैं। उनका प्रकोप किसी भी व्यक्ति के जीवन में कठिनाइयों और बाधाओं का कारण बन सकता है, लेकिन उनकी पूजा और आरती से उन समस्याओं को दूर किया जा सकता है। आप हमारी वेबसाइट पर शनि चालीसा और हनुमान चालीसा भी पढ़ सकते हैं!

श्री शनि देव को भगवान सूर्य का पुत्र माना जाता है, और उनका स्वरूप काला या नीला होता है। उनके हाथ में एक तलवार और एक काले रंग की छड़ी होती है, जो उनके न्यायप्रिय स्वभाव को दर्शाती है। उनकी पूजा में खासतौर पर तेल, तिल, काले तिल, और काले वस्त्रों का उपयोग किया जाता है, जो उनकी पसंदीदा वस्तुएँ मानी जाती हैं।

आरती के दौरान, भक्त श्री शनि देव के समक्ष दीपक जलाकर उनकी स्तुति करते हैं। यह धार्मिक क्रिया न केवल आध्यात्मिक शांति प्रदान करती है, बल्कि शनिदेव की कृपा भी प्राप्त होती है। भक्त उनके द्वारा दिए गए कष्टों को दूर करने के लिए उनके नाम का उच्चारण करते हैं और उन्हें अपनी समस्याओं के समाधान के लिए प्रार्थना करते हैं।


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|| शनि आरती PDF ||

|| जय शनि देवा – श्री शनिदेव आरती ||

जय शनि देवा, जय शनि देवा,
जय जय जय शनि देवा ।
अखिल सृष्टि में कोटि-कोटि जन,
करें तुम्हारी सेवा ।
जय शनि देवा, जय शनि देवा,
जय जय जय शनि देवा ॥

जा पर कुपित होउ तुम स्वामी,
घोर कष्ट वह पावे ।
धन वैभव और मान-कीर्ति,
सब पलभर में मिट जावे ।
राजा नल को लगी शनि दशा,
राजपाट हर लेवा ।
जय शनि देवा, जय शनि देवा,
जय जय जय शनि देवा ॥

जा पर प्रसन्न होउ तुम स्वामी,
सकल सिद्धि वह पावे ।
तुम्हारी कृपा रहे तो,
उसको जग में कौन सतावे ।
ताँबा, तेल और तिल से जो,
करें भक्तजन सेवा ।
जय शनि देवा, जय शनि देवा,
जय जय जय शनि देवा ॥

हर शनिवार तुम्हारी,
जय-जय कार जगत में होवे ।
कलियुग में शनिदेव महात्तम,
दु:ख दरिद्रता धोवे ।
करू आरती भक्ति भाव से,
भेंट चढ़ाऊं मेवा ।
जय शनि देवा, जय शनि देवा,
जय जय जय शनि देवा ॥

|| Shani Dev Aarti PDF ||

|| Aarti Shri Shani Jai Jai Shani Dev ||

Jay Shani Deva, jay Shani Deva,
Jay jay jay Shani Deva.
Akhil srishti mein koti-koti jan,
Karein tumhari seva.
Jay Shani Deva, jay Shani Deva,
Jay jay jay Shani Deva.

Ja par kupit hou tum swami,
Ghor kasth vah paave.
Dhan vaibhav aur maan-kirti,
Sab palbhar mein mit jaave.
Raja Nal ko lagi Shani dasha,
Rajpat har leva.
Jay Shani Deva, jay Shani Deva,
Jay jay jay Shani Deva.

Ja par prasann hou tum swami,
Sakal siddhi vah paave.
Tumhari kripa rahe to,
Usko jag mein kaun sataave.
Taamba, tel aur til se jo,
Karein bhaktjan seva.
Jay Shani Deva, jay Shani Deva,
Jay jay jay Shani Deva.

Har Shanivaar tumhari,
Jay-jay kaar jagat mein hove.
Kaliyug mein Shanidev mahaatma,
Dukh daridrata dhove.
Karu aarti bhakti bhav se,
Bhent chadaun meva.
Jay Shani Deva, jay Shani Deva,
Jay jay jay Shani Deva.



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शनिदेव की पूजा हिंदू धर्म में विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है। शनि ग्रह के अधिपति शनिदेव को न्याय का देवता और कर्मों के फलदाता माना जाता है। शनिदेव की कृपा प्राप्त करने के लिए श्रद्धालु विधिपूर्वक उनकी पूजा करते हैं। यहां शनिदेव की पूजा विधि को विस्तार से बताया गया है:

पूजन का दिन और समय

शनिवार का दिन शनिदेव की पूजा के लिए सबसे उत्तम माना जाता है। विशेष रूप से शनि अमावस्या या शनि जयंती के दिन पूजा करना अधिक फलदायी होता है। प्रातः काल या सायंकाल, दोनों समय पूजा कर सकते हैं। लेकिन सूर्यास्त के समय पूजा करना अत्यधिक प्रभावशाली माना गया है।

पूजन सामग्री

  • काले तिल
  • सरसों का तेल
  • लोहे की कोई वस्तु (जैसे काले धागे वाला छल्ला)
  • नीले या काले वस्त्र
  • काले उड़द (उड़द की दाल)
  • दीपक, धूप, अगरबत्ती
  • पुष्प (विशेषकर नीले फूल)
  • प्रसाद (गुड़, काले तिल से बनी मिठाई या लड्डू)

स्नान और शुद्धिकरण

पूजा से पहले स्वयं को शुद्ध करने के लिए स्नान करें और साफ वस्त्र धारण करें। यदि संभव हो तो काले या नीले वस्त्र पहनें, क्योंकि यह शनिदेव से संबंधित रंग माने जाते हैं।

शनिदेव का ध्यान और आसन

शनिदेव की मूर्ति या तस्वीर को पूर्व दिशा की ओर स्थापित करें। इसके बाद पूजा स्थल को स्वच्छ करें और आसन बिछाएं। ध्यान रखें कि शनिदेव की मूर्ति या चित्र काले पत्थर या धातु से बना हो।

मंत्र जप और आराधना

शनिदेव के निम्नलिखित मंत्र का जप पूजा के दौरान किया जा सकता है:

ॐ शं शनैश्चराय नमः।

इसके साथ ही शनिदेव का ध्यान करें और उनके सामने दीपक जलाएं। काले तिल, सरसों का तेल और उड़द का उपयोग करते हुए पूजा सामग्री अर्पित करें।

तेल से अभिषेक

शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए सरसों के तेल से अभिषेक करना शुभ माना जाता है। शनिदेव की प्रतिमा पर तेल चढ़ाने से उनके क्रोध का शमन होता है और भक्तों पर उनकी कृपा बनी रहती है।

दान और आचरण

शनिदेव की पूजा के बाद गरीबों और जरुरतमंदों को दान करना बहुत ही शुभ माना जाता है। काले तिल, काले कपड़े, लोहे की वस्तुएं, काले उड़द, और सरसों का तेल दान करने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं। इसके अलावा, दिनभर अच्छे कर्म करने, अनुशासित और संयमित जीवन जीने का संकल्प लें।

प्रसाद वितरण

पूजा समाप्त होने के बाद शनिदेव को अर्पित किया गया प्रसाद श्रद्धा से बांटें। इसमें विशेष रूप से गुड़ और काले तिल से बनी मिठाइयां या लड्डू होते हैं। यह प्रसाद घर के सभी सदस्यों में वितरित करें।

शांतिपूर्वक ध्यान और प्रार्थना

पूजा के अंत में शनिदेव से अपने जीवन में शांति, समृद्धि और न्याय की प्रार्थना करें।


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शनिदेव की पूजा के दौरान कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है, जिससे उनकी कृपा प्राप्त की जा सके और किसी प्रकार के दोष या विपरीत प्रभाव से बचा जा सके। यहां कुछ महत्वपूर्ण बातें बताई जा रही हैं, जिनका पालन करना चाहिए:

शनिदेव की सीधी दृष्टि से बचें:

शनिदेव की प्रतिमा या तस्वीर की सीधी दृष्टि में आने से बचना चाहिए। उनकी पूजा करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि उनकी आंखों में न देखें, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि उनकी सीधी दृष्टि भारी होती है, जो जीवन में विपरीत प्रभाव डाल सकती है। पूजा में ध्यान हमेशा उनके चरणों पर केंद्रित रखें।

शुद्ध आचरण और विचार:

शनिदेव कर्मों के देवता हैं, इसलिए पूजा के दौरान और पूरे दिन अपने आचरण और विचार शुद्ध रखें। बुरी आदतों, झूठ, छल-कपट, क्रोध और अहंकार से दूर रहें। शनिदेव को सत्य, ईमानदारी और निस्वार्थ सेवा प्रिय है, इसलिए इन गुणों का पालन करें।

पीपल वृक्ष की पूजा:

शनिवार को पीपल के वृक्ष की पूजा करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है। पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं और वृक्ष के चारों ओर सात बार परिक्रमा करें। साथ ही, “ॐ शं शनैश्चराय नमः” मंत्र का जप करते रहें।

सरसों के तेल का दीपक जलाएं:

शनिवार को दिनभर सरसों के तेल का दीपक जलाना शुभ माना जाता है। यह दीपक शनिदेव की प्रतिमा या पीपल के वृक्ष के नीचे जलाया जा सकता है। इससे शनिदेव प्रसन्न होते हैं और जीवन में शांति और समृद्धि प्रदान करते हैं।

आचरण में संयम और धैर्य:

शनिदेव की कृपा पाने के लिए संयमित जीवन जीना और धैर्य बनाए रखना आवश्यक है। शनिदेव व्यक्ति को उसके कर्मों का फल देते हैं, इसलिए बुरे समय में धैर्य रखें और अच्छे कर्म करते रहें। शनिदेव व्यक्ति की परीक्षा लेते हैं, लेकिन उनके धैर्य और संयम को देखकर वे आशीर्वाद भी देते हैं।

नीले और काले रंग के वस्त्र:

शनिवार के दिन विशेष रूप से नीले और काले रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है। शनिदेव को यह रंग प्रिय होते हैं और इससे उनकी पूजा का फल अधिक मिलता है।

मांस-मदिरा से दूर रहें:

शनिदेव की पूजा के दिन मांसाहार और शराब के सेवन से बचना चाहिए। यह शुद्धता और संयम का प्रतीक है। ऐसे दिन आत्मसंयम और आध्यात्मिकता का पालन करना महत्वपूर्ण होता है।

गरीबों की सेवा और दान:

शनिदेव को दान और सेवा का महत्व बहुत प्रिय है। शनिवार को गरीबों को भोजन कराएं और काले तिल, लोहे की वस्तुएं, और काले कपड़े दान करें। इससे शनिदेव का आशीर्वाद प्राप्त होता है और जीवन में कष्ट कम होते हैं।

इन सभी बातों का पालन करने से शनिदेव की कृपा जल्दी प्राप्त होती है और जीवन में शांति, समृद्धि और संतुलन बना रहता है।


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जय शनि देवा – श्री शनिदेव आरती के लाभ

श्री शनि देव की आर्ति एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है, जो भक्तों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने में सहायक होती है। शनि देव को न्याय और धर्म का प्रतीक माना जाता है, और उनकी पूजा का उद्देश्य उनके आशीर्वाद को प्राप्त करना और जीवन में संतुलन बनाए रखना होता है। आर्ति के माध्यम से भक्त अपने जीवन की समस्याओं और कठिनाइयों को दूर करने की आशा करते हैं। श्री शनि देव की आर्ति के अनेक लाभ हैं, जो जीवन को सुखमय और समृद्ध बना सकते हैं।

धार्मिक शांति और मानसिक संतुलन: श्री शनि देव की आर्ति से धार्मिक शांति प्राप्त होती है। जब भक्त ईश्वर की आराधना करते हैं, तो मन की चिंता और तनाव दूर होता है। आर्ति के दौरान किए गए मंत्र जाप और भजन से मानसिक शांति मिलती है, जो जीवन की परेशानियों का सामना करने में मदद करती है। यह मानसिक संतुलन बनाए रखने में सहायक होती है, जिससे जीवन में स्थिरता बनी रहती है।

कष्टों और समस्याओं से मुक्ति: शनि देव को उनके न्यायप्रिय स्वभाव के लिए जाना जाता है। जो लोग शनिदोष या अन्य समस्याओं का सामना कर रहे होते हैं, उनके लिए आर्ति एक प्रभावी उपाय हो सकती है। आर्ति के माध्यम से शनिदेव की कृपा प्राप्त की जाती है, जिससे जीवन की समस्याएँ और कष्टों में कमी आती है। भक्त इस प्रक्रिया से अपने जीवन की कठिनाइयों को कम कर सकते हैं और बेहतर परिस्थितियाँ प्राप्त कर सकते हैं।

धन और समृद्धि में वृद्धि: शनि देव की पूजा विशेष रूप से आर्थिक लाभ और समृद्धि प्राप्त करने के लिए की जाती है। आर्ति से भक्तों को धन और समृद्धि में वृद्धि देखने को मिल सकती है। शनि देव की आराधना से उनकी कृपा प्राप्त होती है, जो आर्थिक समस्याओं को दूर करने और वित्तीय स्थिति को मजबूत बनाने में मदद करती है।

न्याय और सच्चाई की प्राप्ति: श्री शनि देव को न्याय का देवता माना जाता है। आर्ति के माध्यम से भक्त न्याय और सच्चाई की प्राप्ति की प्रार्थना करते हैं। यह आर्ति भक्तों को यह सुनिश्चित करने में मदद करती है कि उनके कर्म और कार्य ईमानदार और सही हों, जिससे जीवन में न्याय और सच्चाई की विजय होती है।

आध्यात्मिक उन्नति: आर्ति के दौरान मंत्र जाप और भजन की प्रक्रिया से भक्तों की आध्यात्मिक उन्नति होती है। यह समय भक्तों को आत्मसाक्षात्कार और आत्मज्ञान प्राप्त करने का अवसर प्रदान करता है। शनि देव की आर्ति में भाग लेने से भक्तों की आध्यात्मिक स्थिति में सुधार होता है और वे अपने जीवन को आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखने में सक्षम होते हैं।

संबंधों में सुधार: शनि देव की आर्ति परिवारिक और व्यक्तिगत संबंधों में भी सुधार ला सकती है। जब भक्त शनि देव की पूजा करते हैं, तो उनके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है, जो रिश्तों में सामंजस्य और सुधार लाने में सहायक होता है। यह आर्ति परिवार के सदस्य और मित्रों के साथ रिश्तों को मजबूत करती है और सामंजस्यपूर्ण वातावरण प्रदान करती है।

स्वास्थ्य में सुधार: आर्ति और पूजा से मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में भी सुधार हो सकता है। जब भक्त नियमित रूप से आर्ति करते हैं, तो यह उनके स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डालती है। तनाव और चिंता कम होती है, जिससे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। इसके अलावा, शनि देव की कृपा से बीमारियों और स्वास्थ्य समस्याओं में राहत मिल सकती है।

विपत्तियों से सुरक्षा: आर्ति के माध्यम से भक्त अपने जीवन को विपत्तियों और नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षित रखने की प्रार्थना करते हैं। शनि देव की पूजा से भक्तों को सुरक्षा और संरक्षण प्राप्त होता है। यह उन्हें जीवन की अप्रत्याशित समस्याओं और विपत्तियों से बचाने में सहायक होती है।

सच्चे मार्ग की प्राप्ति: श्री शनि देव की आर्ति से भक्तों को जीवन के सही मार्ग को पहचानने और अनुसरण करने में मदद मिलती है। आर्ति के दौरान की गई प्रार्थनाएँ और पूजा भक्तों को उनके जीवन के उद्देश्यों और लक्ष्यों को स्पष्ट रूप से समझने में सहायता करती हैं। यह सही दिशा में आगे बढ़ने और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है।

श्री शनि देव की आर्ति के ये लाभ भक्तों के जीवन को संतुलित, खुशहाल, और समृद्ध बनाने में सहायक होते हैं। आर्ति का नियमित आयोजन और सही तरीके से पूजा करने से भक्तों को शनि देव की कृपा प्राप्त होती है और उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं।


शनि देव का मूल मंत्र क्या है?

शनि देव का मूल मंत्र है:
“ॐ शं शनैश्चराय नमः”

यह मंत्र शनिदेव की पूजा और आराधना में उपयोग किया जाता है और उनके सकारात्मक प्रभाव को प्राप्त करने के लिए बोला जाता है।

शनिदेव की पूजा करते समय कौन सा मंत्र बोलना चाहिए?

शनिदेव की पूजा करते समय निम्नलिखित मंत्रों का जाप किया जा सकता है:
“ॐ शं शनैश्चराय नमः”
“ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः”

ये मंत्र शनिदेव की कृपा प्राप्त करने और उनके प्रभाव को कम करने के लिए उपयोग किए जाते हैं।

शनि मंत्र कितनी बार पढ़ना है?

शनि मंत्र को नियमित रूप से जाप करना चाहिए। आमतौर पर, इसे 108 बार पढ़ने की सलाह दी जाती है, विशेष रूप से शनि अमावस्या, शनिवार या अन्य महत्वपूर्ण दिनों पर। जाप की संख्या व्यक्तिगत विश्वास और समय की उपलब्धता के अनुसार बढ़ाई जा सकती है।

शनि देव को प्रसन्न कैसे करें?

शनि देव को प्रसन्न करने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:
नियमित पूजा: शनि देव के मंदिर में जाकर पूजा करें और निम्नलिखित मंत्रों का जाप करें।

दान और पुण्य: शनिवार के दिन गरीबों और जरूरतमंदों को दान दें, विशेष रूप से काले कपड़े, सरसों का तेल, और काले उड़द की दाल।

साधना: शनिदेव की विशेष पूजा और व्रत का पालन करें, जैसे शनिवार का उपवास।

ध्यान और प्रार्थना: शनि मंत्र का नियमित जाप करें और शांति और समर्पण के साथ ध्यान लगाएं।

कौन सा शनि मंत्र शक्तिशाली है?

शनि देव के शक्तिशाली मंत्रों में निम्नलिखित शामिल हैं:
“ॐ शं शनैश्चराय नमः”
“ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः”

इन मंत्रों का जाप करने से शनि देव की कृपा प्राप्त होती है और शनिदोष से मुक्ति मिल सकती है।

शनि देव शक्तिशाली का मंत्र क्या है?

शनि देव के शक्तिशाली मंत्रों में प्रमुख मंत्र है:
“ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः”

यह मंत्र शनिदेव के प्रभाव को कम करने और उनके आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए बहुत प्रभावशाली माना जाता है। इस मंत्र का जाप विशेष रूप से शनिवार को करना लाभकारी होता है।

श्री ललिता माता की आरती (Shri Lalita Mata Ki Aarti: Shree Mateshwari Jai Tripureswari)

श्री ललिता माता की आरती (Shri Lalita Mata Ki Aarti) हिंदू धर्म में देवी ललिता को समर्पित एक प्रमुख स्तुति है। देवी ललिता को त्रिपुरा सुंदरी के रूप में भी जाना जाता है, और वे दस महाविद्याओं में से एक हैं। उनका पूजन और आराधना विशेष रूप से शाक्त परंपरा में महत्वपूर्ण मानी जाती है।

ललिता देवी का स्वरूप अत्यंत ही आकर्षक, सौम्य और शांतिमय है। वे सृष्टि, स्थिति, और संहार की देवी मानी जाती हैं और उनकी पूजा से भक्तों को समृद्धि, सुख और शांति की प्राप्ति होती है। माता ललिता को सौंदर्य, विद्या और शक्ति की अधिष्ठात्री देवी भी कहा जाता है।

श्री ललिता माता की आरती के दौरान, भक्तगण दीप जलाकर, फूलों की माला चढ़ाकर, और मधुर भजनों के साथ देवी की महिमा का गान करते हैं। इस आरती में देवी के विभिन्न नामों और रूपों का वर्णन किया जाता है, जो उनकी अद्वितीय शक्ति और सुंदरता को प्रकट करते हैं। भक्तगण उनकी कृपा और आशीर्वाद की कामना करते हैं, जिससे उनका जीवन सुखमय और समृद्ध हो सके।

आरती के शब्द सरल और मनोहारी होते हैं, जो भक्तों के हृदय को भक्ति और श्रद्धा से भर देते हैं। यह आरती न केवल देवी ललिता के प्रति प्रेम और भक्ति को दर्शाती है, बल्कि उनके प्रति सम्मान और आस्था को भी प्रकट करती है। आरती के माध्यम से भक्त अपनी सभी कठिनाइयों और दुखों को देवी के चरणों में समर्पित करते हैं और उनसे मार्गदर्शन और संबल की प्रार्थना करते हैं।

श्री ललिता माता की आरती विशेष अवसरों पर, विशेषकर नवरात्रि और अन्य महत्वपूर्ण तीज-त्योहारों पर गाई जाती है। यह आरती न केवल धार्मिक अनुष्ठानों का एक अभिन्न हिस्सा है, बल्कि यह भक्तों के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिकता का संचार भी करती है।

श्री ललिता माता की आरती के गायन से भक्तों को मानसिक शांति, आत्मबल और आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है। यह आरती भक्तों को अपनी आध्यात्मिक यात्रा में आगे बढ़ने और देवी ललिता के अनुग्रह से अपने जीवन को सार्थक बनाने की प्रेरणा देती है।


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Shree Mateshwari Jai Tripureswari Lyrics PDF


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|| श्री ललिता माता की आरती ||

श्री मातेश्वरी जय त्रिपुरेश्वरी ।
राजेश्वरी जय नमो नमः ॥

करुणामयी सकल अघ हारिणी ।
अमृत वर्षिणी नमो नमः ॥

जय शरणं वरणं नमो नमः ।
श्री मातेश्वरी जय त्रिपुरेश्वरी ॥

अशुभ विनाशिनी, सब सुख दायिनी ।
खल-दल नाशिनी नमो नमः ॥

भण्डासुर वधकारिणी जय माँ ।
करुणा कलिते नमो नम: ॥

जय शरणं वरणं नमो नमः ।
श्री मातेश्वरी जय त्रिपुरेश्वरी ॥

भव भय हारिणी, कष्ट निवारिणी ।
शरण गति दो नमो नमः ॥

शिव भामिनी साधक मन हारिणी ।
आदि शक्ति जय नमो नमः ॥

जय शरणं वरणं नमो नमः ।
जय त्रिपुर सुन्दरी नमो नमः ॥

श्री मातेश्वरी जय त्रिपुरेश्वरी ।
राजेश्वरी जय नमो नमः ॥

|| Shri Lalita Mata Ki Aarti ||

Shri Maateshvari jay Tripureshvari,
Raajeshvari jay namo namaḥ.

Karuṇāmayi sakal agh hāriṇi,
Amṛita varshīni namo namaḥ.

Jay sharaṇam varaṇam namo namaḥ,
Shri Maateshvari jay Tripureshvari.

Ashubh vināshini, sab sukh dāyini,
Khal-dal nāshini namo namaḥ.

Bhandaasur vadhakārini jay Maa,
Karunā kalite namo namaḥ.

Jay sharaṇam varaṇam namo namaḥ,
Shri Maateshvari jay Tripureshvari.

Bhav bhay hāriṇi, kasht nivāriṇi,
Sharan gati do namo namaḥ.

Shiv bhāminī sādhak man hāriṇi,
Ādi shakti jay namo namaḥ.

Jay sharaṇam varaṇam namo namaḥ,
Jay Tripur Sundari namo namaḥ.

Shri Maateshvari jay Tripureshvari,
Raajeshvari jay namo namaḥ.


श्री ललिता माता की आरती के लाभ

श्री ललिता माता की आरती का पाठ और उनकी पूजा के कई लाभ होते हैं जो भक्तों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं। यह आरती देवी ललिता की महिमा का गान करती है और उनकी कृपा प्राप्त करने का एक प्रभावशाली तरीका है। निम्नलिखित लाभ इस आरती के नियमित पाठ और पूजा से प्राप्त हो सकते हैं:

आध्यात्मिक उन्नति: श्री ललिता माता की आरती से भक्तों की आध्यात्मिक स्थिति में सुधार होता है। देवी ललिता ज्ञान, भक्ति और शक्ति की देवी हैं, और उनकी आरती से भक्त आत्मा को शुद्ध करने और आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में अग्रसर होते हैं। यह आरती भक्ति और विश्वास को प्रबल करती है, जिससे भक्त की आध्यात्मिक यात्रा में गहरी अनुभूति होती है।

मानसिक शांति: आरती के दौरान देवी ललिता की स्तुति और मंत्रों का जाप मानसिक शांति और संतुलन को बढ़ावा देता है। यह भक्तों के मन को शांति प्रदान करता है और मानसिक तनाव को कम करता है। आरती की मधुर ध्वनि और भक्ति पूर्ण वातावरण से मन में स्थिरता और संतुलन की अनुभूति होती है|

सकारात्मक ऊर्जा का संचार: ललिता माता की आरती से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। देवी ललिता की पूजा से घर और वातावरण में सकारात्मकता का प्रवाह होता है, जिससे परिवारिक जीवन में सामंजस्य और खुशी बनी रहती है। यह आरती जीवन में सकारात्मकता और आनंद को आकर्षित करती है।

वित्तीय समृद्धि: देवी ललिता को धन, ऐश्वर्य और समृद्धि की देवी माना जाता है। उनकी आरती से धन-धान्य की प्राप्ति और वित्तीय समृद्धि की दिशा में भी सहायता मिलती है। भक्तों की आर्थिक स्थिति में सुधार और जीवन में धन के प्रवाह में वृद्धि हो सकती है।

स्वास्थ्य लाभ: नियमित रूप से आरती का पाठ करने से मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। मानसिक शांति और संतुलन के कारण, तनाव और चिंता कम होती है, जो स्वास्थ्य को सकारात्मक रूप से प्रभावित करती है। आरती के माध्यम से प्राप्त आध्यात्मिक संतोष और शांति भी संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है।

समस्याओं का समाधान: देवी ललिता की आरती कठिन समय और समस्याओं में सहारा बन सकती है। भक्तों की प्रार्थनाओं को सुनकर देवी ललिता उनकी समस्याओं का समाधान करती हैं। यह आरती संकटों और मुश्किलों का सामना करने में ताकत और संबल प्रदान करती है।

आध्यात्मिक संरक्षण: देवी ललिता की आरती से भक्तों को आध्यात्मिक संरक्षण प्राप्त होता है। देवी के आशीर्वाद से जीवन में सुरक्षा और रक्षा का अनुभव होता है। यह आरती आत्मरक्षा और नकारात्मक ऊर्जा से बचाव में सहायक होती है।

कुलीनता और सम्मान: देवी ललिता की पूजा और आरती से भक्तों को कुलीनता और सामाजिक सम्मान प्राप्त होता है। यह आरती समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा बढ़ाने में भी सहायक होती है। देवी के आशीर्वाद से व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में सम्मान प्राप्त होता है।

संबंधों में सुधार: आरती का नियमित पाठ और पूजा परिवार और संबंधों में सुधार लाने में मददगार होती है। यह आरती परिवारिक सौहार्द और एकता को बढ़ावा देती है। देवी ललिता की कृपा से रिश्तों में सामंजस्य और प्रेम का संचार होता है।

आध्यात्मिक दृष्टिकोण में वृद्धि: ललिता माता की आरती से भक्तों का आध्यात्मिक दृष्टिकोण विस्तृत और गहरा होता है। यह आरती आध्यात्मिक दृष्टिकोण को समझने और आत्मा की गहराई को जानने में मदद करती है। भक्तों को जीवन के उच्चतम उद्देश्य को पहचानने में सहायता मिलती है।

आत्मसमर्पण और भक्ति में वृद्धि: इस आरती के माध्यम से भक्तों के दिल में माता के प्रति आत्मसमर्पण और भक्ति की भावना प्रबल होती है। यह आरती भक्तों को माता के प्रति अधिक समर्पित और समर्पित बनाती है, जिससे भक्ति में गहराई और मजबूती आती है।

समाजिक और धार्मिक समर्पण: ललिता माता की आरती समाज में धार्मिक जागरूकता और समर्पण को बढ़ावा देती है। यह आरती समाज में धार्मिक उत्सवों और अनुष्ठानों के महत्व को समझाने में मदद करती है और धार्मिक समर्पण की भावना को बढ़ाती है।

    इन लाभों के माध्यम से श्री ललिता माता की आरती भक्तों के जीवन को बेहतर बनाती है और उन्हें आत्मिक, मानसिक और भौतिक समृद्धि की ओर अग्रसर करती है। नियमित पूजा और आरती के माध्यम से भक्त देवी ललिता की अनंत कृपा और आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं, जो उनके जीवन को खुशहाल और संतुलित बनाता है।

    श्री ललिता देवी कौन है?

    श्री ललिता देवी, हिंदू धर्म की प्रमुख देवी हैं और उन्हें त्रिमूर्ति की शक्तियों में से एक माना जाता है। वे शक्ति और सौंदर्य की देवी हैं, जिनका संबंध आदिशक्ति और मातृशक्ति से है। श्री ललिता देवी को “ललिता त्रिपुरसुंदरी” के नाम से भी जाना जाता है और वे प्रमुख रूप से शाक्त संप्रदाय में पूजा जाती हैं।

    माता ललिता का दूसरा नाम क्या है?

    माता ललिता का दूसरा नाम “ललिता त्रिपुरसुंदरी” है। उन्हें “श्री विद्या” और “रक्षा” जैसे नामों से भी पूजा जाता है, जो उनके विभिन्न रूपों और शक्तियों को दर्शाते हैं।

    ललिता बेन कौन है?

    “ललिता बेन” एक सामान्य हिंदी शब्द नहीं है, लेकिन यदि आप ललिता देवी की बात कर रहे हैं, तो यह एक सांस्कृतिक या स्थानीय संदर्भ हो सकता है। इस संदर्भ में, ललिता बेन का मतलब किसी व्यक्तिगत या स्थानीय नाम से हो सकता है जो देवी ललिता से जुड़ा हो।

    ललिता देवी की देवी कौन है?

    ललिता देवी स्वयं ही एक प्रमुख देवी हैं और उनकी पूजा में वे एक आदर्श रूप होती हैं। वे देवी पार्वती, लक्ष्मी, और सरस्वती के तत्वों को सम्मिलित करती हैं। इसलिए, ललिता देवी को आदिशक्ति, जो सृजन, पालन, और संहार की शक्ति की प्रतीक होती हैं, के रूप में पूजा जाता है।

    ललिता देवी शिव पर क्यों बैठती है?

    श्री ललिता देवी शिव पर बैठती हैं क्योंकि वे शक्ति और शिव की अद्वितीय एकता को दर्शाती हैं। यह प्रतीकात्मक रूप से दर्शाता है कि शक्ति (शक्ति) और शिव (पुरुष) का संयोजन सृष्टि का मूल आधार है। ललिता देवी की शिव पर स्थिति यह भी दर्शाती है कि शक्ति शिव के अर्धांगिनी और उनसे अभिन्न रूप से जुड़ी होती है।

    ॐ जय धर्म धुरन्धर (Dharmraj Ki Aarti – Om Jai Dharm Dhurandar Lyrics)

    धर्मराज की आरती (Om Jai Dharm Dhurandar) को हिंदू धर्म में बहुत महत्व दिया जाता है। यह आरती धर्मराज की स्तुति और उपासना के लिए गाई जाती है। धर्मराज को न्याय के देवता के रूप में पूजा जाता है, जो न्यायप्रियता और सत्य के प्रतीक माने जाते हैं। उनकी आरती के माध्यम से भक्तगण उनकी कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करते हैं।


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    Om Jai Dharm Dhurandar Lyrics PDF


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    || धर्मराज आरती – ॐ जय धर्म धुरन्धर ||

    ॐ जय जय धर्म धुरन्धर,
    जय लोकत्राता ।
    धर्मराज प्रभु तुम ही,
    हो हरिहर धाता ॥

    जय देव दण्ड पाणिधर यम तुम,
    पापी जन कारण ।
    सुकृति हेतु हो पर तुम,
    वैतरणी ताराण ॥2॥

    न्याय विभाग अध्यक्ष हो,
    नीयत स्वामी ।
    पाप पुण्य के ज्ञाता,
    तुम अन्तर्यामी ॥3॥

    दिव्य दृष्टि से सबके,
    पाप पुण्य लखते ।
    चित्रगुप्त द्वारा तुम,
    लेखा सब रखते ॥4॥

    छात्र पात्र वस्त्रान्न क्षिति,
    शय्याबानी ।
    तब कृपया, पाते हैं,
    सम्पत्ति मनमानी ॥5॥

    द्विज, कन्या, तुलसी,
    का करवाते परिणय ।
    वंशवृद्धि तुम उनकी,
    करते नि:संशय ॥6॥

    दानोद्यापन-याजन,
    तुष्ट दयासिन्धु ।
    मृत्यु अनन्तर तुम ही,
    हो केवल बन्धु ॥7॥

    धर्मराज प्रभु,
    अब तुम दया ह्रदय धारो ।
    जगत सिन्धु से स्वामिन,
    सेवक को तारो ॥8॥

    धर्मराज जी की आरती,
    जो कोई नर गावे ।
    धरणी पर सुख पाके,
    मनवांछित फल पावे ॥9॥

    || Dharmraj Ki Aarti ||

    Om, jay jay dharma dhurandhar,
    Jay lokatraata.
    Dharmaraj prabhu tum hi,
    Ho harihar dhaata.

    Jay dev dand paanidhar yam tum,
    Paapi jan kaaran.
    Sukriti hetu ho par tum,
    Vaitarani taaran.

    Nyay vibhaag adhyaksh ho,
    Niyat swami.
    Paap punya ke gyaata,
    Tum antaryaami.

    Divy drishti se sabke,
    Paap punya lakhte.
    Chitragupt dwara tum,
    Lekha sab rakhte.

    Chhatra patra vastraann kshiti,
    Shayyabani.
    Tab kripaya, paate hain,
    Sampatti manmaani.

    Dwij, kanya, tulsi,
    Ka karvaate parinay.
    Vanshvriddhi tum unki,
    Karte nishchay.

    Daanodyapan-yajan,
    Tusht dayasindhu.
    Mrityu anantar tum hi,
    Ho keval bandhu.

    Dharmaraj prabhu,
    Ab tum daya hriday dhaaro.
    Jagat sindhu se swaamin,
    Sevak ko taaro.

    Dharmaraj ji ki aarti,
    Jo koi nar gaave.
    Dharani par sukh paake,
    Manvaanchhit phal paave.


    धर्मराज आरती– ॐ जय धर्म धुरन्धर के लाभ

    धर्मराज की आरती का हिन्दू धर्म में विशेष महत्व है। आरती गाने के कई आध्यात्मिक, मानसिक और सामाजिक लाभ होते हैं।

    आध्यात्मिक लाभ

    आध्यात्मिक उन्नति: धर्मराज की आरती गाने से व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति होती है। यह आरती हमें भगवान के न्याय और धर्म की महिमा का स्मरण कराती है, जिससे हमारी आत्मा को शांति और संतोष मिलता है।

    सत्य और धर्म का पालन: आरती गाने से सत्य और धर्म का पालन करने की प्रेरणा मिलती है। धर्मराज न्याय के देवता हैं, इसलिए उनकी आरती गाकर हम सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रतिज्ञा करते हैं।

    पुण्य की प्राप्ति: धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने से पुण्य की प्राप्ति होती है। धर्मराज की आरती गाने से भी व्यक्ति को पुण्य मिलता है, जो जीवन के हर क्षेत्र में सकारात्मक परिणाम लाता है।

    भक्तिमार्ग में प्रगति: आरती गाने से भक्तिमार्ग में प्रगति होती है। यह आरती हमें धर्मराज के प्रति श्रद्धा और भक्ति को बढ़ाने में सहायक होती है।

    मानसिक लाभ

    मानसिक शांति: धर्मराज की आरती गाने से मानसिक शांति मिलती है। जब हम इस आरती को पूरी श्रद्धा के साथ गाते हैं, तो हमारे मन में शांति और स्थिरता का अनुभव होता है।

    तनाव में कमी: आरती गाने से मानसिक तनाव कम होता है। धार्मिक संगीत और भजन सुनने से मानसिक शांति मिलती है, जो तनाव को दूर करने में सहायक होता है।

    ध्यान और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता: आरती गाने से ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में सुधार होता है। यह आरती हमें ध्यान और एकाग्रता बढ़ाने में मदद करती है, जिससे हमारे दैनिक जीवन के कार्यों में भी सुधार होता है।

    आत्मविश्व Ias में वृद्धि: आरती गाने से आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। यह आरती हमें धर्म और न्याय के मार्ग पर चलने का साहस देती है, जिससे हमारे आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।

    सामाजिक लाभ

    समाज में समरसता: धर्मराज की आरती गाने से समाज में समरसता और एकता का अनुभव होता है। धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने से समाज के सभी वर्गों के लोग एक साथ आते हैं, जिससे सामाजिक समरसता बढ़ती है।

    सामाजिक सेवा का प्रोत्साहन: धर्मराज की आरती गाने से सामाजिक सेवा का प्रोत्साहन मिलता है। धर्मराज न्याय के देवता हैं, इसलिए उनकी आरती गाकर हम समाज में न्याय और सेवा का महत्व समझते हैं।

    पारिवारिक एकता: आरती गाने से पारिवारिक एकता बढ़ती है। जब परिवार के सभी सदस्य एक साथ आरती गाते हैं, तो उनमें प्रेम और स्नेह बढ़ता है, जिससे पारिवारिक संबंध मजबूत होते हैं।

    सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण: धर्मराज की आरती गाने से हमारी सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण होता है। यह आरती हमारी परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं को सहेजने में सहायक होती है।

    अन्य लाभ

    आनंद और उल्लास: आरती गाने से आनंद और उल्लास का अनुभव होता है। धार्मिक संगीत और भजन सुनने से हमारे मन में प्रसन्नता का संचार होता है।

    स्वास्थ्य लाभ: आरती गाने से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने से मानसिक शांति मिलती है, जो हमारे शारीरिक स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव डालती है।

    आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार: आरती गाने से आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है। यह आरती हमें आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनाती है, जिससे हमारे जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं।

    सकारात्मक विचारधारा: आरती गाने से सकारात्मक विचारधारा का विकास होता है। यह आरती हमें जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने में मदद करती है, जिससे हम हर परिस्थिति में सकारात्मक रह सकते हैं।

    धर्मराज की आरती गाने के ये विभिन्न लाभ हमारे जीवन को हर दृष्टिकोण से समृद्ध बनाते हैं। यह न केवल हमारी आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होती है, बल्कि मानसिक और सामाजिक जीवन में भी सकारात्मक बदलाव लाती है। इसलिए, हमें धर्मराज की आरती को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए।

    धर्मराज जी कौन हैं?

    धर्मराज जी हिंदू धर्म में युधिष्ठिर, महाभारत के प्रमुख पात्र और पांडवों के सबसे बड़े भाई के रूप में जाने जाते हैं। उन्हें धर्मराज, युधिष्ठिर, और सत्यवादी धर्मराज के नाम से भी जाना जाता है। वे धर्म और न्याय के प्रतीक हैं और उनके जीवन का आदर्श सच्चाई और धार्मिकता पर आधारित था।

    धर्मराज जी की आरती क्या है?

    धर्मराज जी की आरती एक विशेष पूजा विधि है जिसमें उनकी महिमा, उनके धर्म और उनकी पवित्रता की स्तुति की जाती है। “ॐ जय धर्म धुरंधर” इस आरती का प्रमुख मंत्र है, जिसे भक्ति भाव से गाया जाता है। यह आरती धर्मराज जी की पूजा और सम्मान के लिए की जाती है और इसमें उनके गुणों की सराहना की जाती है।

    धर्मराज जी की आरती “ॐ जय धर्म धुरंधर” के मुख्य मंत्र का अर्थ क्या है?

    “ॐ जय धर्म धुरंधर” का अर्थ है: “हे धर्म के महान धारणकर्ता, आपको विजय प्राप्त हो!” इसमें ‘धर्म धुरंधर’ का तात्पर्य धर्म के संरक्षक और पालनकर्ता से है। यह मंत्र धर्मराज जी की महानता और उनकी धर्म की रक्षा करने की शक्ति को मान्यता देता है।

    धर्मराज जी की आरती कैसे की जाती है?

    धर्मराज जी की आरती करने के लिए, भक्त एक पवित्र स्थान पर प्रार्थना करते हैं और आरती के दौरान दीपक या अगरबत्ती जलाते हैं। आरती के समय, विशेष मंत्रों का उच्चारण करते हुए, धर्मराज जी की स्तुति की जाती है। यह आरती पूजा की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जिसमें भक्ति, श्रद्धा और सम्मान प्रकट किया जाता है।

    धर्मराज जी की आरती के क्या लाभ होते हैं?

    धर्मराज जी की आरती करने से व्यक्ति को धर्म, सत्य और न्याय के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। इसके अतिरिक्त, यह आरती करने से मन की शांति, मानसिक स्थिरता और नैतिक शक्ति प्राप्त होती है। धर्मराज जी की आरती से भक्त को उनकी दया, कृपा और संरक्षण प्राप्त होने की भी मान्यता है।

    धर्मराज जी की आरती का विशेष समय क्या होता है?

    धर्मराज जी की आरती आमतौर पर सुबह और शाम के समय की जाती है, जब भक्त पूजा के लिए समय निकालते हैं। खासकर महाभारत के पर्व और विशेष धार्मिक अवसरों पर भी यह आरती अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है।

    धर्मराज जी की आरती को कौन गा सकता है?

    धर्मराज जी की आरती को कोई भी भक्त गा सकता है, चाहे वह साधारण व्यक्ति हो या पूजा करने वाला पुजारी। महत्वपूर्ण यह है कि आरती भक्ति और श्रद्धा से गाई जाए, जिससे धर्मराज जी की कृपा प्राप्त हो सके।

    श्री शाकुम्भरी देवी जी की आरती (Shakumbhari Devi Ki Aarti 2024)

    श्री शाकुम्भरी देवी जी की आरती (Shakumbhari Devi Ki Aarti) हिंदू धर्म में अत्यंत श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ गाई जाती है। शाकुम्भरी देवी को शाकंभरी, शताक्षी और दुर्गा के अवतार के रूप में पूजा जाता है। वे देवी शक्ति की एक प्रमुख रूप हैं, जो अपने भक्तों की सभी प्रकार की कष्टों और संकटों से रक्षा करती हैं। माना जाता है कि वे अपने भक्तों को अन्न, जल और सभी आवश्यक वस्त्रों से समृद्ध करती हैं। आप लक्ष्मी चालीसा और दुर्गा चालीसा के लिए क्लिक करें

    आरती के दौरान देवी की महिमा का गान किया जाता है और उनसे सुख, समृद्धि और शांति की कामना की जाती है। इस आरती में देवी की कृपा और उनके दयालु स्वभाव का वर्णन होता है, जो भक्तों को प्रेरणा और आत्मबल प्रदान करता है। भक्तगण दीप जलाकर और शंख ध्वनि के साथ इस आरती को गाते हैं, जिससे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    आइये, हम भी श्रद्धा पूर्वक श्री शाकुम्भरी देवी की आरती का पाठ करें और उनके आशीर्वाद की कामना करें।


    • हिंदी / संस्कृत
    • English

    || श्री शाकुम्भरी देवी जी की आरती ||

    हरि ओम श्री शाकुम्भरी अंबा जी की आरती क़ीजो
    एसी अद्वभुत रूप हृदय धर लीजो
    शताक्षी दयालू की आरती किजो

    तुम परिपूर्ण आदि भवानी माँ,
    सब घट तुम आप भखनी माँ
    शकुंभारी अंबा जी की आरती किजो

    तुम्ही हो शाकुम्भर,
    तुम ही हो सताक्षी माँ
    शिवमूर्ति माया प्रकाशी माँ
    शाकुम्भरी अंबा जी की आरती किजो

    नित जो नर नारी अंबे आरती गावे माँ
    इच्छा पूरण किजो,
    शाकुम्भर दर्शन पावे माँ
    शाकुम्भरी अंबा जी की आरती किजो

    जो नर आरती पढ़े पढ़ावे माँ,
    जो नर आरती सुनावे माँ
    बस बैकुण्ठ शाकुम्भर दर्शन पावे
    शाकुम्भरी अंबा जी की आरती किजो

    || Shakumbhari Devi Ki Aarti ||

    Hari Om Shri Shakumbhari Ambe Ji ki Aarti kijiyo,
    Aisi advabhut roop hridaya dhar lijiyo.
    Shatakshi dayalu ki Aarti kijo.

    Tum paripurna aadi Bhavani Maa,
    Sab ghat tum aap bhakhani Maa.
    Shakumbhari Ambe Ji ki Aarti kijo.

    Tumhi ho Shakumbhari,
    Tum hi ho Shatakshi Maa.
    Shivamurti Maya prakashi Maa.
    Shakumbhari Ambe Ji ki Aarti kijo.

    Nit jo nar nari Ambe Aarti gaave Maa,
    Ichha puran kijo,
    Shakumbhari darshan paave Maa.
    Shakumbhari Ambe Ji ki Aarti kijo.

    Jo nar Aarti padhe padhawe Maa,
    Jo nar Aarti sunawe Maa.
    Bas Vaikunth Shakumbhari darshan paave.
    Shakumbhari Ambe Ji ki Aarti kijo.




    श्री शाकुम्भरी देवी की आरती के लाभ

    श्री शाकुम्भरी देवी की आरती हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण और लाभकारी मानी जाती है। देवी शाकुम्भरी को माँ दुर्गा का अवतार माना जाता है, जो अपने भक्तों की सभी प्रकार की समस्याओं और कष्टों को दूर करती हैं। उनकी आरती करने से भक्तों को मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं। आइए, विस्तार से जानते हैं श्री शाकुम्भरी देवी की आरती के लाभ:

    आध्यात्मिक शांति: श्री शाकुम्भरी देवी की आरती करने से भक्तों को आध्यात्मिक शांति और संतोष की प्राप्ति होती है। देवी की कृपा से मन और आत्मा को शांति मिलती है, जिससे जीवन में सकारात्मकता और समृद्धि आती है।

    भय और संकट से मुक्ति: देवी शाकुम्भरी की आरती करने से भक्तों को सभी प्रकार के भय और संकटों से मुक्ति मिलती है। देवी की कृपा से कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति मिलती है और जीवन में साहस और आत्मविश्वास की वृद्धि होती है

    स्वास्थ्य लाभ: माना जाता है कि श्री शाकुम्भरी देवी की आरती करने से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। देवी की कृपा से रोग और पीड़ा दूर होती है और जीवन में स्वास्थ्य और आरोग्य की प्राप्ति होती है।

    समृद्धि और धन: श्री शाकुम्भरी देवी को अन्नपूर्णा का स्वरूप भी माना जाता है, जो अपने भक्तों को अन्न, धन और समृद्धि से सम्पन्न करती हैं। उनकी आरती करने से आर्थिक समस्याओं का समाधान होता है और जीवन में धन, वैभव और समृद्धि का आगमन होता है।

    परिवार में सुख और शांति: देवी शाकुम्भरी की आरती करने से परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। परिवार के सभी सदस्य आपसी प्रेम और सहयोग से रहते हैं और परिवारिक संबंधों में मजबूती आती है।

    कृषि और फसल: शाकुम्भरी देवी को कृषि और वनस्पतियों की देवी माना जाता है। उनकी आरती करने से फसलों में वृद्धि होती है और कृषि कार्यों में सफलता प्राप्त होती है। देवी की कृपा से भूमि उर्वर होती है और फसलों में कीट और रोगों से बचाव होता है।

    संतान सुख: जो दंपत्ति संतान सुख की इच्छा रखते हैं, वे श्रद्धा और विश्वास के साथ शाकुम्भरी देवी की आरती करते हैं। देवी की कृपा से संतान प्राप्ति होती है और संतान स्वस्थ, बुद्धिमान और सुखी होती है।

    आध्यात्मिक उन्नति: शाकुम्भरी देवी की आरती करने से भक्तों की आध्यात्मिक उन्नति होती है। देवी की कृपा से ध्यान, साधना और भक्ति में प्रगति होती है और जीवन में उच्च आध्यात्मिक लक्ष्यों की प्राप्ति होती है।

    संकल्प और सिद्धि: श्री शाकुम्भरी देवी की आरती करने से भक्तों के सभी संकल्प पूर्ण होते हैं और उन्हें सिद्धि की प्राप्ति होती है। देवी की कृपा से सभी कार्य सफल होते हैं और जीवन में सफलता और समृद्धि का आगमन होता है।

    मानसिक शांति और ध्यान: देवी की आरती करने से मन शांत होता है और ध्यान की क्षमता में वृद्धि होती है। ध्यान और साधना में सफलता मिलती है और आत्मबल में वृद्धि होती है।

    श्री शाकुम्भरी देवी की आरती करने से उपरोक्त सभी लाभ प्राप्त होते हैं। यह भक्तों को जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता, सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करती है। देवी की आरती श्रद्धा और भक्तिभाव से करने से जीवन में सकारात्मकता और प्रगति का संचार होता है। अतः हमें नियमित रूप से श्री शाकुम्भरी देवी की आरती का पाठ करना चाहिए और उनके आशीर्वाद की प्राप्ति करनी चाहिए।

    शाकंभरी माता कौन से वंश की कुलदेवी हैं?

    शाकंभरी माता विशेष रूप से कई वंशों की कुलदेवी मानी जाती हैं, लेकिन वे विशेष रूप से राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कई राजपूतों और अन्य जातियों द्वारा पूजी जाती हैं। विशेष रूप से, चित्तौड़ और नंगला जैसे राजपूत परिवारों की कुलदेवी के रूप में उनकी पूजा की जाती है।

    माता शाकंभरी किसका अवतार हैं?

    माता शाकंभरी देवी, पृथ्वी की सुरक्षा और समृद्धि के लिए प्रकट हुई थीं। उन्हें पृथ्वी के रक्षक के रूप में पूजा जाता है और वे देवी पार्वती के एक रूप मानी जाती हैं। उनके बारे में मान्यता है कि वे अन्न और फल-फूल देने वाली देवी हैं।

    शाकंभरी माता का दूसरा नाम क्या है?

    शाकंभरी माता का दूसरा प्रमुख नाम “शाकुंभरी देवी” है। इसके अलावा, उन्हें “शाकमां” और “शाकंभरी” के नामों से भी जाना जाता है।

    शाकंभरी माता कौन से जिले में आती हैं?

    शाकंभरी माता का प्रमुख मंदिर राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले के शाकंभरी में स्थित है। इसके अलावा, उत्तर प्रदेश में भी शाकंभरी माता के मंदिर पाए जाते हैं, जैसे कि शहजहांपुर और लखीमपुर खीरी जिलों में।

    मैं अपनी कुलदेवी कैसे ढूंढूं?

    अपनी कुलदेवी खोजने के लिए, आप निम्नलिखित उपाय कर सकते हैं:
    परिवार के पुरखों से पूछें: अपने परिवार के बुजुर्गों या पुरखों से इस बारे में जानकारी प्राप्त करें।
    वंश वृक्ष: परिवार की वंशावली या कुल वृक्ष (जन्म पत्रिका) की जांच करें।
    स्थानीय पूजा स्थल: अपने गांव या क्षेत्र के मंदिरों में जाकर जानकारी प्राप्त करें।
    पारंपरिक दस्तावेज: परिवार की धार्मिक पुस्तकों या दस्तावेजों में देखें।

    शाकुंभरी देवी में सती का कौन सा भाग गिरा था?

    शाकुंभरी देवी के बारे में मान्यता है कि सती का एक अंग उनके शरीर से गिरा था, जिससे वे एक महत्वपूर्ण शक्तिपीठ बनीं। विशेष रूप से, यह मान्यता है कि सती की जांघ या गुदा क्षेत्र का भाग यहां गिरा था, जो इस क्षेत्र को विशेष धार्मिक महत्व प्रदान करता है।

    गोत्र की कुलदेवी कौन सी है?

    गोत्र की कुलदेवी आमतौर पर उस विशेष गोत्र या परिवार के अनुसार भिन्न हो सकती है। हर गोत्र का अपना एक धार्मिक या पारंपरिक कुलदेवी होता है, जिसे परिवार की परंपराओं के अनुसार पूजा जाता है। गोत्र की कुलदेवी जानने के लिए, परिवार की परंपराओं और धार्मिक ग्रंथों की जांच करनी होती है।

    ब्राह्मण जाति की कुलदेवी कौन हैं?

    ब्राह्मण जाति की कुलदेवी विभिन्न क्षेत्रों और उपजातियों के अनुसार भिन्न हो सकती है। सामान्यतः, कई ब्राह्मण परिवारों की कुलदेवी माता गायत्री, दुर्गा, या लक्ष्मी होती हैं। विशेष क्षेत्र और परिवार की परंपराओं के अनुसार कुलदेवी की पहचान की जाती है।

    श्री यमुनाष्टक (Shri Yamunashtakam PDF)

    श्री यमुनाष्टक (Shri Yamunashtakam) एक प्राचीन और अत्यंत महत्वपूर्ण स्तोत्र है, जो श्री यमुना नदी की महिमा और उनके दिव्य स्वरूप का गुणगान करता है। इस स्तोत्र की रचना महाप्रभु वल्लभाचार्य ने की थी, जो वैष्णव सम्प्रदाय के प्रसिद्ध संत और आचार्य थे। वल्लभाचार्य जी ने भक्तों के लिए कई महत्वपूर्ण ग्रंथ और स्तोत्रों की रचना की है, जिनमें से श्री यमुनाष्टक विशेष स्थान रखता है। आप लक्ष्मी चालीसा के लिए क्लिक करें

    श्री यमुनाष्टक में कुल आठ श्लोक होते हैं, जो यमुना देवी के विभिन्न रूपों, लीलाओं और महिमा का वर्णन करते हैं। इन श्लोकों के माध्यम से भक्त यमुना जी की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। यह स्तोत्र भक्ति और श्रद्धा का प्रतीक है, और इसे सुनने या गाने से भक्तों के मन में शांति और संतोष की अनुभूति होती है। आप सरस्वती चालीसा के लिए क्लिक करें

    यमुना नदी का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यंत उच्च है। हिन्दू धर्म में यमुना को एक पवित्र नदी माना जाता है, और इसके तट पर कई महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल स्थित हैं। यमुना जी का वर्णन विभिन्न पुराणों और धर्मग्रंथों में भी मिलता है। मान्यता है कि यमुना जी के जल में स्नान करने से पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

    श्री यमुनाष्टक में यमुना जी की विभिन्न लीलाओं का उल्लेख किया गया है, जिनमें से प्रमुख हैं श्री कृष्ण के साथ उनकी लीलाएं। वल्लभाचार्य जी ने यमुना जी को श्री कृष्ण की प्रिय सखी के रूप में दर्शाया है और उनके माध्यम से भक्तों को भगवान श्री कृष्ण की कृपा प्राप्त करने का मार्ग बताया है। यमुना जी की महिमा का वर्णन करते हुए वल्लभाचार्य जी ने कहा है कि यमुना जी के जल में स्नान करने से भक्तों के सभी पाप धुल जाते हैं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।

    श्री यमुनाष्टक का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है। यह स्तोत्र व्यक्ति को भक्ति मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है और उसे ईश्वर के निकट ले जाने में सहायक होता है। यमुना जी की महिमा का गुणगान करते हुए वल्लभाचार्य जी ने कहा है कि यमुना जी के बिना श्री वृंदावन की महिमा अधूरी है। श्री यमुनाष्टक के माध्यम से भक्त यमुना जी की कृपा प्राप्त कर सकते हैं और अपने जीवन को पवित्र बना सकते हैं।



    • हिंदी / संस्कृत
    • English

    || श्री यमुनाष्टक ||

    नमामि यमुनामहं सकल सिद्धि हेतुं मुदा
    मुरारि पद पंकज स्फ़ुरदमन्द रेणुत्कटाम ।

    तटस्थ नव कानन प्रकटमोद पुष्पाम्बुना
    सुरासुरसुपूजित स्मरपितुः श्रियं बिभ्रतीम ॥१॥

    कलिन्द गिरि मस्तके पतदमन्दपूरोज्ज्वला
    विलासगमनोल्लसत्प्रकटगण्ड्शैलोन्न्ता ।

    सघोषगति दन्तुरा समधिरूढदोलोत्तमा
    मुकुन्दरतिवर्द्धिनी जयति पद्मबन्धोः सुता ॥२॥

    भुवं भुवनपावनीमधिगतामनेकस्वनैः
    प्रियाभिरिव सेवितां शुकमयूरहंसादिभिः ।

    तरंगभुजकंकण प्रकटमुक्तिकावाकुका-
    नितन्बतटसुन्दरीं नमत कृष्ण्तुर्यप्रियाम ॥३॥

    अनन्तगुण भूषिते शिवविरंचिदेवस्तुते
    घनाघननिभे सदा ध्रुवपराशराभीष्टदे ।

    विशुद्ध मथुरातटे सकलगोपगोपीवृते
    कृपाजलधिसंश्रिते मम मनः सुखं भावय ॥४॥

    यया चरणपद्मजा मुररिपोः प्रियं भावुका
    समागमनतो भवत्सकलसिद्धिदा सेवताम ।

    तया सह्शतामियात्कमलजा सपत्नीवय-
    हरिप्रियकलिन्दया मनसि मे सदा स्थीयताम ॥५॥

    नमोस्तु यमुने सदा तव चरित्र मत्यद्भुतं
    न जातु यमयातना भवति ते पयः पानतः ।

    यमोपि भगिनीसुतान कथमुहन्ति दुष्टानपि
    प्रियो भवति सेवनात्तव हरेर्यथा गोपिकाः ॥६॥

    ममास्तु तव सन्निधौ तनुनवत्वमेतावता
    न दुर्लभतमारतिर्मुररिपौ मुकुन्दप्रिये ।

    अतोस्तु तव लालना सुरधुनी परं सुंगमा-
    त्तवैव भुवि कीर्तिता न तु कदापि पुष्टिस्थितैः ॥७॥

    स्तुति तव करोति कः कमलजासपत्नि प्रिये
    हरेर्यदनुसेवया भवति सौख्यमामोक्षतः ।

    इयं तव कथाधिका सकल गोपिका संगम-
    स्मरश्रमजलाणुभिः सकल गात्रजैः संगमः ॥८॥

    तवाष्टकमिदं मुदा पठति सूरसूते सदा
    समस्तदुरितक्षयो भवति वै मुकुन्दे रतिः ।

    तया सकलसिद्धयो मुररिपुश्च सन्तुष्यति
    स्वभावविजयो भवेत वदति वल्लभः श्री हरेः ॥९॥

    ॥ इति श्री वल्लभाचार्य विरचितं यमुनाष्टकं सम्पूर्णम ॥

    || Shri Yamunashtakam Lyrics in English ||

    Namaami Yamuna Maham, Sakal Sidhi Hetu Muda.
    Murari Pad Pankaj, Sphurad Mand Renutkataam.
    Tatastha Nav Kaanan Prakat Mod Pushpambuna.
    Surasursu-Poojit Smarpitu Shreeyam Bibhrateem. [1]

    Kalind-Giri-Mastake, Patdamand-Poorojwalaa.
    Vilas-Gamanollasat, Prakat-Gand Shailonnattaa.
    Saghosh Gati-Dantura, Samadhi-Roodh-Dolottammaa.
    Mukund-Rati-Vardhini, Jayati Padmabandho-Sutaa. [2]

    Bhuvam Bhuvan Paavani, Madhi-Gataa-Maneka Swane.
    Priya-Bhiriv-Sevitaam, Shuk Mayur Hansadibhi.
    Tarang-Bhuj Kankan, Prakat-Muktika-Valuka.
    Nitamb-Tat-Sundareem, Namat Krushna-Turya-Priyaam. [3]

    Anant-Gun-Bhooshite, Shiv-Viranchi-Dev Stute.
    Ghanaa-Ghan-Nibhe-Sadaa, Dhruv-Paraasharaa-Bhishta-De.
    Vishuddh-Mathura-Tate, Sakal Gop Gopi Vrite.
    Kripa-Jaladhi-SanShreete, Mam Manah Sukham Bhaavay. [4]

    Yayaa Charan Padmaja, Muraripoh Priyam Bhaavuka.
    Samaa-Gamanato-Bhavat, Sakal Sidhida Sevtam.
    Taya Sadrushtamiyat, Kamalja-Sapatneev Yat.
    Hari-Priy-Kalindayaa, Manasi-Me Sadaa Stheeyataam. [5]

    Namostu Yamune Sadaa, Tav Charitr-Matyadbhutam.
    Na-Jaatu-Yam-Yaatna, Bhavati-Te-Payah-Paanatah.
    Yamopi-Bhagini Sutaan, Kath-Muhanti-Dushtaanapi
    Priyo-Bhavati Sevnaat, Tav Hareryathaa Gopika. [6]

    Mamaastu Tav Sannidhau, Tanu Navatv-Metaavataa.
    Na-Durlabhtamaa-Rati, Muraripau-Mukund-Priye.
    Atostu-Tav-Laalna, Surdhuni Param Sangamaat.
    Tavaiv Bhuvi Keertitaa, Na-Tu-Kadaapi Pushti-Sthithe. [7]

    Stutim Tav Karoti Kah, Kamalja-Sapatni-Priye
    Hareryadanu-Sevaya, Bhavati-Saukhya-Ma-Mokshatah.
    Iyam Tav Kathaadhika, Sakal Gopikaa-Sangamah.
    Smar-Shram Jalarubhih, Sakal Gatrajaih Sangamah. [8]

    Tavaashtak-Midam-Mudaa, Pathati Surasoote Sadaa.
    Samast Duritakshayo, Bhavati Vai Mukunde-Rati.
    Tayaa Sakal Sidhayo, Murari-Pushch-Santushyati.
    Swabhaav-Vijayo-Bhavet, Vadati Vallabhah Shree Hareh. [9]

    ॥ Iti Shree Vallabh veeraachaaryachitan yamunaashtakan sampoornam ॥




    श्री यमुनाष्टक के लाभ

    श्री यमुनाष्टक एक अत्यंत पवित्र और लाभकारी स्तोत्र है, जिसे भगवान श्री वल्लभाचार्य द्वारा रचित किया गया है। इस स्तोत्र का पाठ और गायन भक्तों को आध्यात्मिक, मानसिक, और शारीरिक लाभ प्रदान करता है। यहाँ श्री यमुनाष्टक के प्रमुख लाभों का वर्णन किया गया है:

    आध्यात्मिक शांति और मोक्ष की प्राप्ति

    श्री यमुनाष्टक के नियमित पाठ से भक्तों के जीवन में आध्यात्मिक शांति और संतोष आता है। यमुना जी की महिमा का गुणगान करने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है, जोकि हिन्दू धर्म में परम लक्ष्य माना गया है। यमुना जी के जल में स्नान करने और उनकी स्तुति करने से पापों का नाश होता है और आत्मा पवित्र होती है।

    मानसिक शांति और तनावमुक्ति

    श्री यमुनाष्टक के पाठ से मानसिक शांति और संतुलन प्राप्त होता है। यह स्तोत्र व्यक्ति के मन से तनाव, चिंता और नकारात्मक विचारों को दूर करता है। यमुना जी की महिमा का स्मरण करते हुए व्यक्ति को मानसिक शांति का अनुभव होता है, जो आज के व्यस्त जीवन में अत्यंत आवश्यक है।

    शारीरिक स्वास्थ्य

    यमुना जी के पवित्र जल का सेवन और स्नान करने से शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। यमुना जी के जल को अमृत समान माना गया है, जो शरीर को रोगमुक्त और स्वस्थ बनाता है। श्री यमुनाष्टक के पाठ से शरीर की ऊर्जा और शक्ति में वृद्धि होती है, जिससे व्यक्ति दिनभर ऊर्जावान और सक्रिय रहता है।

    भक्ति और श्रद्धा में वृद्धि

    श्री यमुनाष्टक का नियमित पाठ और गायन व्यक्ति के भक्ति और श्रद्धा को बढ़ाता है। यह स्तोत्र भक्तों को भगवान श्री कृष्ण और यमुना जी के प्रति अपने प्रेम और भक्ति को प्रकट करने का एक माध्यम प्रदान करता है। यमुना जी की महिमा का गुणगान करते हुए भक्तों का विश्वास और समर्पण और अधिक गहरा होता है।

    सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि का आगमन

    श्री यमुनाष्टक के पाठ से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि का आगमन होता है। यह स्तोत्र व्यक्ति के जीवन में शुभता और समृद्धि लाता है। यमुना जी की कृपा से भक्तों के घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।

    पारिवारिक सद्भाव और एकता

    श्री यमुनाष्टक का पाठ परिवार में सद्भाव और एकता को बढ़ावा देता है। इस स्तोत्र का गायन पूरे परिवार के साथ मिलकर करने से पारिवारिक बंधन मजबूत होते हैं और आपसी प्रेम और सहयोग में वृद्धि होती है।

    धार्मिक और सांस्कृतिक समृद्धि

    श्री यमुनाष्टक का पाठ धार्मिक और सांस्कृतिक समृद्धि को भी बढ़ावा देता है। यमुना जी की महिमा का स्मरण करते हुए व्यक्ति अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा रहता है, जिससे उसकी धार्मिक भावना और सांस्कृतिक पहचान मजबूत होती है।

    अतः, श्री यमुनाष्टक का नियमित पाठ और गायन व्यक्ति के जीवन में आध्यात्मिक, मानसिक, और शारीरिक लाभ प्रदान करता है। यह स्तोत्र व्यक्ति के जीवन को पवित्र, शांत और समृद्ध बनाता है और उसे भक्ति मार्ग पर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करता है।

    यमुनाष्टक किसकी रचना है?

    यमुनाष्टक की रचना महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ने की है।

    यमुना किसकी बेटी है?

    यमुना भगवान सूर्य की बेटी हैं। उन्हें सूर्यदेव की पुत्री के रूप में भी जाना जाता है।

    यमुना जी किसकी पत्नी थी?

    यमुना जी श्रीकृष्ण की पत्नी थीं।

    यमुनाष्टकम किसने लिखा था?

    यमुनाष्टकम की रचना महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ने की थी।

    गौरीनन्दन गजानना: मंत्र (Gauri Nandana Gajanana)

    गौरीनन्दन गजानना (Gauri Nandana Gajanana) हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण देवता माने जाते हैं। उन्हें प्रथम पूज्य, विघ्नहर्ता, बुद्धि, ज्ञान और समृद्धि के देवता के रूप में जाना जाता है। गणेश जी का चित्रण एक हाथी के सिर और मानवीय शरीर के रूप में होता है, जो उनके अनूठे और विशेष रूप का प्रतीक है।

    गणेश जी को गौरी (पार्वती) और शिव के पुत्र के रूप में जाना जाता है। उनकी माता गौरी ने उन्हें अपने शरीर के उबटन से बनाया था और जीवन का वरदान दिया था। एक बार जब माता पार्वती स्नान कर रही थीं, तब गणेश जी द्वार पर पहरा दे रहे थे। इस दौरान भगवान शिव आए और अंदर प्रवेश करने का प्रयास किया, लेकिन गणेश जी ने उन्हें रोका। इससे क्रोधित होकर शिव ने अपने त्रिशूल से गणेश जी का सिर काट दिया। बाद में पार्वती के दुःख को देखकर, शिव ने हाथी के सिर को गणेश जी के शरीर पर स्थापित किया और उन्हें जीवनदान दिया। इस प्रकार गणेश जी का नया रूप प्रकट हुआ।

    गणेश जी के अनेक नाम और स्वरूप हैं, जैसे कि विघ्नहर्ता, गणपति, लंबोदर, गजानन आदि। वे बुद्धि और ज्ञान के देवता हैं, और सभी कार्यों की शुरुआत में उनकी पूजा की जाती है। यह मान्यता है कि गणेश जी की पूजा करने से सभी कार्य निर्विघ्न संपन्न होते हैं और समृद्धि प्राप्त होती है।

    गणेश जी की पूजा मुख्य रूप से गणेश चतुर्थी के पर्व पर की जाती है, जो भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को होता है। इस पर्व में गणेश जी की मूर्ति की स्थापना की जाती है और दस दिनों तक उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। इस अवधि में भक्ति, उत्साह और प्रेम का माहौल रहता है।


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    • हिंदी / संस्कृत
    • English

    || गौरीनन्दन गजानना: मंत्र ||

    गौरीनन्दन गजानना
    गौरीनन्दन गजानना
    गिरिजानन्दन निरञ्जना
    गिरिजानन्दन निरञ्जना
    पार्वतीनन्दन शुभानना
    पार्वतीनन्दन शुभानना
    शुभानना शुभानना
    शुभानना शुभानना
    पाहि प्रभो मां पाहि प्रसन्नाम्‌
    पाहि प्रभो मां पाहि प्रसन्नाम्‌ ॥

    Gauri Nandana Gajanana (in English)

    Gaurīnandana gajānanā
    Gaurīnandana gajānanā
    Girijānandana nirañjanā
    Girijānandana nirañjanā
    Pārvatīnandana śubhānanā
    Pārvatīnandana śubhānanā
    Śubhānanā śubhānanā
    Śubhānanā śubhānanā
    Pāhi prabho māṃ pāhi prasannām
    Pāhi prabho māṃ pāhi prasannām


    गौरीनन्दन गजानना मंत्र के लाभ

    गौरीनन्दन गजानना (गणेश जी) की पूजा और आराधना से अनेक लाभ प्राप्त होते हैं। गणेश जी हिंदू धर्म के प्रमुख देवताओं में से एक हैं और उन्हें विघ्नहर्ता, बुद्धि, ज्ञान और समृद्धि के देवता के रूप में जाना जाता है। उनकी पूजा करने से भक्तों को भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार के लाभ मिलते हैं।

    विघ्नों का नाश:

    गणेश जी को विघ्नहर्ता कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि वे सभी बाधाओं और समस्याओं को दूर करते हैं। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत गणेश जी की पूजा से की जाती है ताकि कार्य निर्विघ्न रूप से संपन्न हो। चाहे वह शादी हो, नया व्यवसाय हो या किसी महत्वपूर्ण योजना की शुरुआत, गणेश जी की आराधना से सभी विघ्न दूर होते हैं।

    बुद्धि और ज्ञान की प्राप्ति:

    गणेश जी बुद्धि और ज्ञान के देवता हैं। उनकी पूजा करने से व्यक्ति की मानसिक शक्ति, एकाग्रता और स्मरणशक्ति में वृद्धि होती है। विद्यार्थी गणेश जी की पूजा कर परीक्षा में सफलता प्राप्त करते हैं और विद्वान अपने ज्ञान में वृद्धि करते हैं। गणेश जी की कृपा से व्यक्ति के विवेक और निर्णय लेने की क्षमता में सुधार होता है।

    समृद्धि और सौभाग्य:

    गणेश जी की आराधना से धन, संपत्ति और समृद्धि की प्राप्ति होती है। उनके आशीर्वाद से व्यक्ति के आर्थिक स्थिति में सुधार होता है और वह धन-धान्य से परिपूर्ण होता है। व्यवसाय में वृद्धि, नौकरी में प्रमोशन और व्यापार में सफलता प्राप्त करने के लिए गणेश जी की पूजा अत्यंत फलदायी मानी जाती है।

    शांति और सुख:

    गणेश जी की पूजा से मन की शांति और मानसिक संतुलन प्राप्त होता है। वे सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा और चिंताओं को दूर करते हैं और व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति और संतोष का संचार करते हैं। उनके आशीर्वाद से परिवार में प्रेम और सद्भावना बनी रहती है।

    स्वास्थ्य और दीर्घायु:

    गणेश जी की कृपा से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। उनकी आराधना से व्यक्ति को रोगों से मुक्ति मिलती है और वह दीर्घायु प्राप्त करता है। गणेश जी की पूजा करने से शरीर में ऊर्जा और ताजगी का संचार होता है, जिससे व्यक्ति स्फूर्तिवान और स्वस्थ रहता है।

    आत्मज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति:

    गणेश जी की आराधना से आत्मज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। वे व्यक्ति को जीवन के आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर करते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग दिखाते हैं। उनकी कृपा से व्यक्ति के भीतर आत्मविश्वास और आत्मसंयम की भावना विकसित होती है।

    सामाजिक प्रतिष्ठा:

    गणेश जी की पूजा से व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा और मान-सम्मान में वृद्धि होती है। उनके आशीर्वाद से व्यक्ति के सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं और उसे समाज में मान्यता और सम्मान प्राप्त होता है।

    गणेश जी की पूजा से व्यक्ति के जीवन में समग्र उन्नति और विकास होता है। उनकी कृपा से जीवन में आने वाली सभी समस्याएं और चुनौतियां आसान हो जाती हैं और व्यक्ति सुख, समृद्धि और शांति से परिपूर्ण जीवन जीता है। गणेश जी की भक्ति और आराधना से व्यक्ति का जीवन सफल और संतोषजनक बनता है।

    गौरीनन्दन गजानना मंत्र का क्या महत्व है?

    गौरीनन्दन गजानना मंत्र भगवान गणेश को समर्पित है और इसे जपने से बुद्धि, ज्ञान, और समृद्धि प्राप्त होती है। यह मंत्र सभी प्रकार की बाधाओं और विघ्नों को दूर करने में सहायक है।

    गौरीनन्दन गजानना मंत्र कब जपना चाहिए?

    गौरीनन्दन गजानना मंत्र का जप प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद, पूजा स्थल पर शांत मन से करना चाहिए। विशेष रूप से बुधवार और चतुर्थी के दिन इस मंत्र का जप अधिक फलदायी माना जाता है।

    गौरीनन्दन गजानना मंत्र का जप कैसे करना चाहिए?

    गौरीनन्दन गजानना मंत्र का जप करने के लिए एकाग्रता और श्रद्धा आवश्यक है। इसे कम से कम 108 बार जपना चाहिए। मंत्र जप के दौरान भगवान गणेश की मूर्ति या चित्र के सामने दीप जलाकर बैठना चाहिए।

    गौरीनन्दन गजानना मंत्र के लाभ क्या हैं?

    गौरीनन्दन गजानना मंत्र के जप से मानसिक शांति, बुद्धि, और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। यह मंत्र जीवन की समस्याओं को दूर करने और सफलता प्राप्त करने में सहायक होता है।

    गौरीनन्दन गजानना मंत्र को कौन जप सकता है?

    गौरीनन्दन गजानना मंत्र को कोई भी व्यक्ति जप सकता है, चाहे वह किसी भी आयु या लिंग का हो। इसे विशेष रूप से विद्यार्थियों, व्यवसायियों और उन लोगों को जपने की सलाह दी जाती है जो अपने जीवन में सफलता और शांति चाहते हैं।

    गौरीनन्दन गजानना का अर्थ क्या है?

    गौरीनन्दन गजानना का अर्थ है “गौरी के पुत्र गणेश”। यह भगवान गणेश के उन रूपों में से एक है जो माता पार्वती (गौरी) और भगवान शिव के पुत्र हैं।

    जय दुर्गे जय दुर्गे मंत्र (Jaya Durge- Durga Mantra)

    जय दुर्गे जय दुर्गे मंत्र (Jaya Durge- durga mantra) एक प्रमुख हिंदू मंत्र है जो देवी दुर्गा की महिमा और प्रशंसा में गाया जाता है। यह मंत्र दुर्गा माता के भक्तों द्वारा प्रेम और समर्पण से उनके प्रति आदर और भक्ति का प्रकटीकरण करता है।

    “जय दुर्गे जय दुर्गे” मंत्र का प्रयोग विभिन्न संदर्भों में होता है, जैसे की पूजा, आरती, और संगीत के समय। इस मंत्र में दुर्गा माता की शक्ति, साहस, और दया की प्रशंसा की गई है, जो उनके भक्तों को संकटों से मुक्ति और सफलता की प्राप्ति में सहायक होती है। आप हमारी वेबसाइट में दुर्गा आरती और दुर्गा चालीसा भी पढ़ सकते हैं।

    दुर्गा माता हिंदू धर्म में शक्ति की अवतार मानी जाती हैं, जो संसार की समस्याओं को दूर करने और भक्तों को संजीवनी शक्ति प्रदान करने की स्वामित्व रखती हैं। इसी कारण, जय दुर्गे जय दुर्गे मंत्र उनके भक्तों के लिए एक प्रमुख ध्यान और आदर्श है, जो उनके जीवन में स्थिरता, शक्ति, और समृद्धि का संकेत करता है।

    इस मंत्र का गान और पाठ उनकी प्रतीति में विशेष शक्ति और प्रासंगिकता भरता है, जिससे भक्त उनकी कृपा को प्राप्त करते हैं और उनके जीवन को संतुलित और पूर्ण बनाने के लिए प्रेरित होते हैं।



    • हिंदी / संस्कृत
    • English

    || जय दुर्गे जय दुर्गे – दुर्गा माता मंत्र ||

    जय दुर्गे जय दुर्गे,
    महिषविमर्दिनी जय दुर्गे ।
    जय दुर्गे जय दुर्गे,
    महिषविमर्दिनी जय दुर्गे ।

    मंगलकारिणी जय दुर्गे,
    जगज्जननी जय जय दुर्गे ।
    मंगलकारिणी जय दुर्गे,
    जगज्जननी जय जय दुर्गे ॥

    वीणापाणिनी पुस्तकधारिणी,
    अम्बा जय जय वाणी ।
    जगदम्बा जय जय वाणी ॥

    वीणापाणिनी पुस्तकधारिणी,
    अम्बा जय जय वाणी ।
    जगदम्बा जय जय वाणी ॥

    वेदरूपिणी सामगायनी,
    अम्बा जय जय वाणी ।
    जगदम्बा जय जय वाणी ॥

    वेदरूपिणी सामगायनी,
    अम्बा जय जय वाणी ।
    जगदम्बा जय जय वाणी ॥

    || Jaya Durge Jaya Durge Lyrics||

    Jaya Durgē Jaya Durgē,
    Mahiṣavimardinī Jaya Durgē |
    Jaya Durgē Jaya Durgē,
    Mahiṣavimardinī Jaya Durgē ||

    Maṅgalakāriṇī Jaya Durgē,
    Jagajjananī Jaya Jaya Durgē |
    Maṅgalakāriṇī Jaya Durgē,
    Jagajjananī Jaya Jaya Durgē ||

    Vīṇāpāṇinī Pustakadhāriṇī,
    Ambā Jaya Jaya Vāṇī |
    Jagadambā Jaya Jaya Vāṇī ||

    Vīṇāpāṇinī Pustakadhāriṇī,
    Ambā Jaya Jaya Vāṇī |
    Jagadambā Jaya Jaya Vāṇī ||

    Vēdarūpiṇī Sāmagāyanī,
    Ambā Jaya Jaya Vāṇī |
    Jagadambā Jaya Jaya Vāṇī ||

    Vēdarūpiṇī Sāmagāyanī,
    Ambā Jaya Jaya Vāṇī |
    Jagadambā Jaya Jaya Vāṇī ||


    जय दुर्गे जय दुर्गे मंत्र के लाभ

    जय दुर्गे जय दुर्गे मंत्र के अनेक लाभ हैं, जो भक्तों को उसके नियमित जप और पाठ से प्राप्त होते हैं:

    आत्मिक शांति: इस मंत्र का जाप करने से भक्त का मन और आत्मा शांति प्राप्त करती है। यह मंत्र मन की चंचलता को शांत करता है और आत्मिक समृद्धि की दिशा में मदद करता है।

    संकट से मुक्ति: दुर्गा माता के इस मंत्र का पाठ करने से भक्त को संकटों और परेशानियों से मुक्ति मिलती है। यह मंत्र उनकी समस्याओं को हल करने में सहायक होता है और उन्हें संजीवनी शक्ति प्रदान करता है।

    शक्ति और समर्थन: यह मंत्र भक्त को अत्यधिक शक्ति और साहस प्रदान करता है। इसके पाठ से उनकी भगवानी के प्रति विश्वास में स्थिरता और समर्थन मिलता है।

    कल्याणकारी शक्ति: जय दुर्गे जय दुर्गे मंत्र का प्रयोग करने से भक्त का जीवन कल्याणकारी दिशा में परिवर्तित होता है। इसके पाठ से सुख, शांति, और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

    आध्यात्मिक उन्नति: इस मंत्र का नियमित जप करने से भक्त की आध्यात्मिक उन्नति होती है। उनका ध्यान और धार्मिकता में विकास होता है और वे अपने जीवन को धार्मिक और नैतिक दृष्टिकोण से जीते हैं।

    इस प्रकार, “जय दुर्गे जय दुर्गे” मंत्र भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण और प्रभावी साधना है जो उन्हें दुर्गा माता के कृपा और आशीर्वाद के साथ जीवन की समस्याओं का समाधान प्राप्त करने में सहायक होता है।

    मां दुर्गा का प्रिय मंत्र कौन सा है?

    मां दुर्गा का प्रिय मंत्र “ॐ दुर्गायै नमः” है। इस मंत्र का जाप करने से मां दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख, समृद्धि और शांति आती है।

    मां दुर्गा का मूल मंत्र क्या है?

    मां दुर्गा का मूल मंत्र “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” है। इस मंत्र का नियमित जाप करने से व्यक्ति के सभी संकट दूर होते हैं और उसे मां दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

    मां दुर्गा का शक्तिशाली मंत्र क्या है?

    मां दुर्गा का शक्तिशाली मंत्र “ॐ दुं दुर्गायै नमः” है। इस मंत्र का उच्चारण करने से व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों से लड़ने की शक्ति मिलती है और उसे मां दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

    दुर्गा का बीज मंत्र कौन सा है?

    दुर्गा का बीज मंत्र “दुं” है। यह एक शक्तिशाली मंत्र है जो मां दुर्गा की ऊर्जा और शक्ति का प्रतीक है। इस मंत्र का जाप करने से मन और शरीर में शक्ति और उत्साह का संचार होता है।

    माता दुर्गा को खुश करने का वास्तविक मंत्र क्या है?

    माता दुर्गा को खुश करने का वास्तविक मंत्र “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” है। इस मंत्र का नियमित जाप करने से मां दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सभी प्रकार की बाधाएं दूर होती हैं।

    दुर्गा जी के कितने मंत्र हैं?

    दुर्गा जी के अनेकों मंत्र हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख मंत्र निम्नलिखित हैं:

    ॐ दुर्गायै नमः
    ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
    ॐ दुं दुर्गायै नमः
    ॐ सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते। भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥
    ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः


    इन मंत्रों का जाप करने से मां दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है।

    अथ चौरासी सिद्ध चालीसा – गोरखनाथ मठ – Ath Chaurasi Siddh Chalisa PDF 2024-25

    गोरखनाथ मठ में चौरासी सिद्ध चालीसा (Ath Chaurasi Siddh Chalisa Pdf) का विशेष महत्व है। यह चालीसा 84 सिद्धों के प्रति सम्मान और श्रद्धा व्यक्त करती है, जिन्होंने योग और तपस्या के माध्यम से उच्च आध्यात्मिक अवस्था प्राप्त की है। इसका नियमित पाठ करने से भक्तों को आंतरिक शांति, आध्यात्मिक बल, और सिद्धियों की प्राप्ति होती है। गोरखनाथ मठ के अनुयायियों के लिए यह चालीसा आस्था और भक्ति का महत्वपूर्ण अंग है, जो उन्हें जीवन के विभिन्न कठिनाइयों से निपटने की शक्ति प्रदान करती है।

    चौरासी सिद्ध चालीसा का पाठ गोरखनाथ मठ की परंपराओं और रीति-रिवाजों का अभिन्न हिस्सा है। यह चालीसा न केवल आध्यात्मिक उन्नति का साधन है, बल्कि यह मठ की सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर को भी सहेजती है। गोरखनाथ मठ में आने वाले श्रद्धालु इस चालीसा का पाठ करके गुरु गोरखनाथ और अन्य सिद्धों का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इसके माध्यम से भक्तगण अपनी आध्यात्मिक यात्रा को मजबूत करते हैं और जीवन में आने वाली कठिनाइयों का समाधान पाते हैं।

    इस चालीसा का पाठ विशेष अवसरों, त्योहारों और मठ में आयोजित होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान किया जाता है। चालीसा का पाठ करने वाले व्यक्ति को आध्यात्मिक जागरूकता, मानसिक शांति, और ऊर्जा का अनुभव होता है। इस पवित्र पाठ के माध्यम से भक्तगण गोरखनाथ मठ की दिव्य आभा से जुड़ते हैं और अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लाते हैं।



    • हिंदी / संस्कृत
    • English

    || अथ चौरासी सिद्ध चालीसा – गोरखनाथ मठ ||

    ||दोहा ||
    श्री गुरु गणनायक सिमर,
    शारदा का आधार ।

    कहूँ सुयश श्रीनाथ का,
    निज मति के अनुसार ।

    श्री गुरु गोरक्षनाथ के चरणों में आदेश ।
    जिनके योग प्रताप को ,
    जाने सकल नरेश ।

    ||चौपाई||
    जय श्रीनाथ निरंजन स्वामी,
    घट घट के तुम अन्तर्यामी ।

    दीन दयालु दया के सागर,
    सप्तद्वीप नवखण्ड उजागर ।

    आदि पुरुष अद्वैत निरंजन,
    निर्विकल्प निर्भय दुःख भंजन ।

    अजर अमर अविचल अविनाशी,
    ऋद्धि सिद्धि चरणों की दासी ।

    बाल यती ज्ञानी सुखकारी,
    श्री गुरुनाथ परम हितकारी ।

    रूप अनेक जगत में धारे,
    भगत जनों के संकट टारे ।

    सुमिरण चौरंगी जब कीन्हा,
    हुये प्रसन्न अमर पद दीन्हा ।

    सिद्धों के सिरताज मनावो,
    नव नाथों के नाथ कहावो ।

    जिनका नाम लिये भव जाल,
    आवागमन मिटे तत्काल ।

    आदि नाथ मत्स्येन्द्र पीर,
    घोरम नाथ धुन्धली वीर ।

    कपिल मुनि चर्पट कण्डेरी,
    नीम नाथ पारस चंगेरी ।

    परशुराम जमदग्नी नन्दन,
    रावण मार राम रघुनन्दन ।

    कंसादिक असुरन दलहारी,
    वासुदेव अर्जुन धनुधारी ।

    अचलेश्वर लक्ष्मण बल बीर,
    बलदाई हलधर यदुवीर ।

    सारंग नाथ पीर सरसाई,
    तुङ़्गनाथ बद्री बलदाई ।

    भूतनाथ धारीपा गोरा,
    बटुकनाथ भैरो बल जोरा ।

    वामदेव गौतम गंगाई,
    गंगनाथ घोरी समझाई ।

    रतन नाथ रण जीतन हारा,
    यवन जीत काबुल कन्धारा ।

    नाग नाथ नाहर रमताई,
    बनखंडी सागर नन्दाई ।

    बंकनाथ कंथड़ सिद्ध रावल,
    कानीपा निरीपा चन्द्रावल ।

    गोपीचन्द भर्तृहरी भूप,
    साधे योग लखे निज रूप ।

    खेचर भूचर बाल गुन्दाई,
    धर्म नाथ कपली कनकाई ।

    सिद्धनाथ सोमेश्वर चण्डी,
    भुसकाई सुन्दर बहुदण्डी ।

    अजयपाल शुकदेव व्यास,
    नासकेतु नारद सुख रास ।

    सनत्कुमार भरत नहीं निंद्रा,
    सनकादिक शारद सुर इन्द्रा ।

    भंवरनाथ आदि सिद्ध बाला,
    ज्यवन नाथ माणिक मतवाला ।

    सिद्ध गरीब चंचल चन्दराई,
    नीमनाथ आगर अमराई ।

    त्रिपुरारी त्र्यम्बक दुःख भंजन,
    मंजुनाथ सेवक मन रंजन ।

    भावनाथ भरम भयहारी,
    उदयनाथ मंगल सुखकारी ।

    सिद्ध जालन्धर मूंगी पावे,
    जाकी गति मति लखी न जावे ।

    ओघड़देव कुबेर भण्डारी,
    सहजई सिद्धनाथ केदारी ।

    कोटि अनन्त योगेश्वर राजा,
    छोड़े भोग योग के काजा ।

    योग युक्ति करके भरपूर,
    मोह माया से हो गये दूर ।

    योग युक्ति कर कुन्ती माई,
    पैदा किये पांचों बलदाई ।

    धर्म अवतार युधिष्ठिर देवा,
    अर्जुन भीम नकुल सहदेवा ।

    योग युक्ति पार्थ हिय धारा,
    दुर्योधन दल सहित संहारा ।

    योग युक्ति पंचाली जानी,
    दुःशासन से यह प्रण ठानी ।

    पावूं रक्त न जब लग तेरा,
    खुला रहे यह सीस मेरा ।

    योग युक्ति सीता उद्धारी,
    दशकन्धर से गिरा उच्चारी ।

    पापी तेरा वंश मिटाऊं,
    स्वर्ण लङ़्क विध्वंस कराऊँ ।

    श्री रामचन्द्र को यश दिलाऊँ,
    तो मैं सीता सती कहाऊँं ।

    योग युक्ति अनुसूया कीनों,
    त्रिभुवन नाथ साथ रस भीनों ।

    देवदत्त अवधूत निरंजन,
    प्रगट भये आप जग वन्दन ।

    योग युक्ति मैनावती कीन्ही,
    उत्तम गति पुत्र को दीनी ।

    योग युक्ति की बंछल मातू,
    गूंगा जाने जगत विख्यातू ।

    योग युक्ति मीरा ने पाई,
    गढ़ चित्तौड़ में फिरी दुहाई ।

    योग युक्ति अहिल्या जानी,
    तीन लोक में चली कहानी ।

    सावित्री सरसुती भवानी,
    पारबती शङ़्कर सनमानी ।

    सिंह भवानी मनसा माई,
    भद्र कालिका सहजा बाई ।

    कामरू देश कामाक्षा योगन,
    दक्षिण में तुलजा रस भोगन ।

    उत्तर देश शारदा रानी,
    पूरब में पाटन जग मानी ।

    पश्चिम में हिंगलाज विराजे,
    भैरव नाद शंखध्वनि बाजे ।

    नव कोटिक दुर्गा महारानी,
    रूप अनेक वेद नहिं जानी ।

    काल रूप धर दैत्य संहारे,
    रक्त बीज रण खेत पछारे ।

    मैं योगन जग उत्पति करती,
    पालन करती संहृति करती ।

    जती सती की रक्षा करनी,
    मार दुष्ट दल खप्पर भरनी ।

    मैं श्रीनाथ निरंजन दासी,
    जिनको ध्यावे सिद्ध चौरासी ।

    योग युक्ति विरचे ब्रह्मण्डा,
    योग युक्ति थापे नवखण्डा ।

    योग युक्ति तप तपें महेशा,
    योग युक्ति धर धरे हैं शेषा ।

    योग युक्ति विष्णू तन धारे,
    योग युक्ति असुरन दल मारे ।

    योग युक्ति गजआनन जाने,
    आदि देव तिरलोकी माने ।

    योग युक्ति करके बलवान,
    योग युक्ति करके बुद्धिमान ।

    योग युक्ति कर पावे राज,
    योग युक्ति कर सुधरे काज ।

    योग युक्ति योगीश्वर जाने,
    जनकादिक सनकादिक माने ।

    योग युक्ति मुक्ती का द्वारा,
    योग युक्ति बिन नहिं निस्तारा ।

    योग युक्ति जाके मन भावे,
    ताकी महिमा कही न जावे ।

    जो नर पढ़े सिद्ध चालीसा,
    आदर करें देव तेंतीसा ।

    साधक पाठ पढ़े नित जोई,
    मनोकामना पूरण होई ।

    धूप दीप नैवेद्य मिठाई,
    रोट लंगोट को भोग लगाई ।

    ||दोहा ||
    रतन अमोलक जगत में,
    योग युक्ति है मीत ।

    नर से नारायण बने,
    अटल योग की रीत ।

    योग विहंगम पंथ को,
    आदि नाथ शिव कीन्ह ।

    शिष्य प्रशिष्य परम्परा,
    सब मानव को दीन्ह ।

    प्रातः काल स्नान कर,
    सिद्ध चालीसा ज्ञान ।

    पढ़ें सुने नर पावही,
    उत्तम पद निर्वाण ।

    || Ath Chaurasi Siddh Chalisa PDF ||

    ॥Doha ॥
    shree guru gananaayak simar,
    saarada ka aadhaar.

    kahoon suyash shreenaath ka,
    nij mati ke anusaar.

    shree guru gorakshanaath ke charanon mein aadesh.
    jahaan yog prataap ko,
    jaane sakal raashtr.

    ॥Chaupaee॥
    jay shreenaath niranjan svaamee,
    ghaat-ghaat ke tum antaryaamee.

    deen dayaalu daya saagar,
    saptadveep navakhand tat.

    aadi purush advait niranjan,
    nirvikalp nirbhay duhkh bhanjan.

    ajar amar avichal agyaanee,
    rddhi siddhi manch kee daasee.

    baal yati gyaanee sukhakaaree,
    shree gurunaath param hitakaaree.

    roop anek jagat mein dhaare,
    bhagat logon ke sankat taare.

    sumiran chaurangee jab keenha,
    alag-alag pasandeeda amar pad deenha.

    siddhon ke sirataaj manaavo,
    nav naathon ke naath kahaavo.

    naam ke lie bhav jaal,
    avishvaas mite.

    aadi naath matsyendr peer,
    ghoram naath dhundhalee veer.

    kapil muni charpat kanderee,
    neem naath paaras chaangeree.

    parashuraam jamadagni nandan,
    raavan maar raam raghunandan.

    kansaadik asuran daladharmee,
    vaasudev arjun dhanudhaaree.

    achaleshvar lakshman bal beer,
    baladaee haladhar yaduveer.

    saarang naath peer sarasaee,
    tunganaath badree baladaee.

    bhootanaath dhaareepa gora,
    batukanaath bhairo bal jora.

    vaamadev gautam gangaee,
    ganganaath gauree samajhai.

    ratan naath ran jeetan haara,
    yavan jeet kaabul kandhaara.

    naag naath nahar ramataee,
    banakhandee saagar nandaee.

    bankanaath kanth, siddh raaval,
    kaneepa nireepa chandraaval.

    gopeechand bhartrhari bhoop,
    saadhe yog laakhe nij roop.

    khechar bhoochar baal gundee,
    dharm naath kapali kanakai.

    siddhanaath someshvar chandee,
    bhusakaee sundar bahudandee.

    ajayapaal shukadev vyaas,
    naasaketu naarad sukh ras.

    sanatkumaar bharat nahin nindara,
    sanakaadik sharad sur indra.

    bhanvaranaath aadi siddh baala,
    jyavan naath maanik matavaala.

    siddh gareeb chanchal chandaraee,
    neemanaath aagar amaraee.

    tripuraari trayambak duhkh bhanjan,
    manjunaath sevak man ranjan.

    bhaavanaath bharm bhayahaaree,
    udayanaath mangal sukhakaaree.

    siddh jaalandhar moongee paave,
    jaakee gati mati lakhi na jaave.

    oghadadev kuber bhandaaree,
    sahajai siddhanaath kedaaree.

    koti anant yogeshvar raaja,
    bhog yog ka kaaja chhoden.

    yog yuktiyaan prastut karake,
    moh maaya se ho gayee door.

    yog yukti kar kuntee maee,
    janm ke paanchon baladaee.

    dharm avataar yudhishthir deva,
    arjun bheem nakul sahadeva.

    yog yukti paarth hiy dhaara,
    duryodhan dal sahit sanhaar.

    yog yukti panchaalee jaanee,
    du:shaasan se yah praanaayaam.

    paavoon khoon na jab lag tera,
    khol rahe hain ye sees mera.

    yog yukti seeta maata,
    dashakaandhar se gira uchchaaree.

    paapee taara vansh unn,
    goldan lek vidhvans karaadoon.

    shree raamachandr ko yash dilaoon,
    to main seeta satee kahaoon.

    yog yukti anusooya keens,
    tribhuvan naath ke saath ras bhee non.

    devadatt avadhoot niranjan,
    pragat bhaye jag aap vandan.

    yog yukti mainaavatee keenheen,
    uttam gati putr ko deenee.

    yog yukti kee chanchal maatoo,
    goonge jaane jagat sangrahaalay.

    yog yukti meera ne paee,
    gadh chittaud mein phiree duhaee.

    yog yukti ahilya jaanee,
    teen lok mein chalee kahaanee.

    saavitree sarasutee bhavaanee,
    paarabatee shankar sanamaanee.

    sinh bhavaanee manasa maee,
    bhadra kaalika sahaja baee.

    kaamaroo desh kaamaaksha yogan,
    dakshin mein tulaja ras bhogan.

    uttar desh shaarada raanee,
    poorab mein paatan jag mani.

    pashchim mein hingalaaj viraaje,
    bhairav naad shankhadhvani baaje.

    nav kotik mahaaraanee durga,
    roop anek ved nahin jaani.

    kaal roop dhar daity sanhaare,
    rakt beej ran khet pachaare.

    main yogan jag utpann karata hoon,
    paalan ​​sanhrti karata hai.

    jatee satee kee raksha karanee,
    maar dal dusht khappar bharanee.

    main shreenaath niranjan daasee,
    jo dhyaave siddh chauraasee.

    yog yukti virache brahmaand,
    yog yukti thaape navakhanda.

    yog yukti tapen mahesa,
    yog yukti dhare dhare hain shesha.

    yog yukti vishnu tan dhare,
    yog yukti asuran dalamaare.

    yog yukti gyaan jaane,
    aadi tir devalokee maane.

    yog yukti banaakar balavaan,
    yog yukti karake buddhi.

    yog yukti kar paave raaj,
    yog yukti kar sushraante kaaj.

    yog yukti yogeeshvar jaane,
    janaadik sanakaadik maane.

    yog yukti mukti ka,
    yog yukti bin nahin nistaara.

    yog yukti jaake man bhaave,
    taakee mahima kahi na jaave.

    jo nar ne siddh chaaleesa padhee,
    aadar karen dev tenteesa.

    saadhak paath nit joee,
    man puraan hoee .

    dhoop deep naivedy maadhury,
    rot langot ko bhog lagao.

    ॥ doha ॥
    ratan amolak jagat mein,
    yog yukti hai mit.

    nar se naaraayan bane,
    atal yog kee reeti.

    yog vihangam panth ko,
    aadi naath shiv keenh.

    shishy prashishy parampara,
    sab maanav ko deen.

    praatah kaal snaan kar,
    siddh chaaleesa gyaan.

    padhen sune nar paavahee,
    uttam pad nirvaan.


    अथ चौरासी सिद्ध चालीसा के लाभ

    अथ चौरासी सिद्ध चालीसा – गोरखनाथ मठ (Ath Chaurasi Siddh Chalisa) एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है जो नाथ संप्रदाय के अनुयायियों के बीच बहुत प्रसिद्ध है। यह चालीसा योगियों और साधकों के लिए अद्वितीय मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है। इस चालीसा में 84 सिद्धों का वर्णन किया गया है, जिनके जीवन, तपस्या, और सिद्धियों के बारे में बताया गया है। यहाँ हम इस चालीसा के लाभों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

    आत्मज्ञान और आत्मविकास:

    अथ चौरासी सिद्ध चालीसा आत्मज्ञान की दिशा में साधक की मदद करता है। इसमें वर्णित सिद्धों की कहानियाँ और उनकी साधना के तरीके साधक को आत्मविकास के मार्ग पर प्रेरित करते हैं। आत्मज्ञान का अर्थ है अपने आत्मा को पहचानना और उसके साथ जुड़ना। यह चालीसा साधक को आत्मविकास की दिशा में प्रेरित करता है।

    योग और ध्यान में प्रगति:

    अथ चालीसा का नियमित पाठ योग और ध्यान की प्रगति में सहायक होता है। इसमें वर्णित सिद्धों के जीवन से प्रेरणा लेकर साधक अपनी योग साधना को और गहराई से कर सकते हैं। ध्यान और योग के माध्यम से साधक अपने मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को सुधार सकते हैं।

    मानसिक शांति और संतुलन:

    अथ चौरासी सिद्ध चालीसा के नियमित पाठ से मानसिक शांति और संतुलन प्राप्त होता है। इसमें वर्णित सिद्धों की साधना और उनकी तपस्या की कहानियाँ मन को शांत और स्थिर करने में मदद करती हैं। साधक के मन में उत्पन्न होने वाली नकारात्मक भावनाओं को यह चालीसा दूर करती है।

    आध्यात्मिक उन्नति:

    अथ चालीसा का पाठ साधक की आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होता है। इसमें वर्णित सिद्धों के जीवन और उनकी सिद्धियों का वर्णन साधक को आध्यात्मिक मार्ग पर प्रेरित करता है। साधक अपनी साधना के माध्यम से आध्यात्मिक ऊँचाइयों को प्राप्त कर सकते हैं।

    नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा:

    इस चालीसा का नियमित पाठ साधक को नकारात्मक ऊर्जा से बचाता है। इसमें वर्णित मंत्र और श्लोक साधक के चारों ओर एक सकारात्मक ऊर्जा का कवच बनाते हैं, जो उन्हें नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षित रखता है।

    शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार:

    अथ चौरासी सिद्ध चालीसा के पाठ से शारीरिक स्वास्थ्य में भी सुधार होता है। इसमें वर्णित सिद्धों की साधना और तपस्या के तरीके शारीरिक स्वास्थ्य को सुधारने में मदद करते हैं। साधक नियमित रूप से इस चालीसा का पाठ करके अपने शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर बना सकते हैं।

    भौतिक समृद्धि:

    चालीसा का पाठ भौतिक समृद्धि में भी सहायक होता है। इसमें वर्णित सिद्धों के जीवन से प्रेरणा लेकर साधक अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकते हैं। साधक अपने जीवन में समृद्धि और सुख-शांति प्राप्त कर सकते हैं।

    सद्गुणों का विकास:

    अथ चौरासी सिद्ध चालीसा का नियमित पाठ साधक के अंदर सद्गुणों का विकास करता है। इसमें वर्णित सिद्धों के जीवन और उनकी सिद्धियों का अध्ययन करके साधक अपने अंदर सद्गुणों को विकसित कर सकते हैं। साधक के अंदर धैर्य, करुणा, और सहनशीलता जैसे गुण विकसित होते हैं।

    कर्मयोग की प्रेरणा:

    चालीसा का पाठ साधक को कर्मयोग की प्रेरणा देता है। इसमें वर्णित सिद्धों के जीवन से साधक को यह सिखने को मिलता है कि जीवन में कर्म करते हुए भी आध्यात्मिक उन्नति की जा सकती है। साधक अपने दैनिक जीवन में कर्मयोग का पालन करके आध्यात्मिकता और भौतिकता के बीच संतुलन बना सकते हैं।

    धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण:

    अथ चौरासी सिद्ध चालीसा धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का एक महत्वपूर्ण अंग है। इसके पाठ से साधक अपने धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण कर सकते हैं। इसमें वर्णित सिद्धों की कहानियाँ और उनकी साधना के तरीके धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर को संजोने में सहायक होते हैं।

    आध्यात्मिक मार्गदर्शन:

    इस चालीसा के माध्यम से साधक को आध्यात्मिक मार्गदर्शन मिलता है। इसमें वर्णित सिद्धों के जीवन और उनकी सिद्धियों का अध्ययन करके साधक अपने आध्यात्मिक मार्ग को और स्पष्ट और सरल बना सकते हैं।

    समर्पण और भक्ति:

    अथ चौरासी सिद्ध चालीसा का पाठ साधक के अंदर समर्पण और भक्ति की भावना को विकसित करता है। इसमें वर्णित सिद्धों के जीवन से प्रेरणा लेकर साधक अपने इष्ट देवता के प्रति समर्पण और भक्ति की भावना को और गहरा बना सकते हैं।

    तपस्या और साधना की प्रेरणा:

    चालीसा में वर्णित सिद्धों की तपस्या और साधना की कहानियाँ साधक को अपनी तपस्या और साधना के मार्ग पर प्रेरित करती हैं। साधक इन कहानियों से प्रेरणा लेकर अपनी तपस्या और साधना को और गहरा बना सकते हैं।

    जीवन के उद्देश्य की प्राप्ति:

    इस चालीसा का पाठ साधक को जीवन के उद्देश्य की प्राप्ति में सहायक होता है। इसमें वर्णित सिद्धों के जीवन और उनकी साधना से साधक को अपने जीवन के उद्देश्य को समझने और उसे प्राप्त करने में मदद मिलती है।

    अध्यात्मिक और भौतिक संतुलन:

    अथ चौरासी सिद्ध चालीसा का नियमित पाठ साधक के जीवन में अध्यात्मिक और भौतिक संतुलन को बनाता है। इसमें वर्णित सिद्धों के जीवन और उनकी साधना से साधक को यह सिखने को मिलता है कि कैसे जीवन में अध्यात्मिक और भौतिकता के बीच संतुलन बनाया जा सकता है।

    अथ चौरासी सिद्ध चालीसा – गोरखनाथ मठ (Ath Chaurasi Siddh Chalisa) एक अनमोल ग्रंथ है जो साधकों को आत्मज्ञान, आत्मविकास, योग और ध्यान में प्रगति, मानसिक शांति, आध्यात्मिक उन्नति, नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा, शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार, भौतिक समृद्धि, सद्गुणों का विकास, कर्मयोग की प्रेरणा, धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण, आध्यात्मिक मार्गदर्शन, समर्पण और भक्ति, तपस्या और साधना की प्रेरणा, जीवन के उद्देश्य की प्राप्ति, और अध्यात्मिक और भौतिक संतुलन को प्राप्त करने में मदद करता है। इसका नियमित पाठ साधक को अपने जीवन में सुख, शांति, और समृद्धि की दिशा में प्रेरित करता है।