Wednesday, January 28, 2026
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काली चालीसा माँ महाकाली (KAALI CHALISA PDF Maa Maha Kali)

माँ महाकाली चालीसा (Kaali Chalisa Pdf) हिन्दू धर्म में अत्यधिक पूजनीय और शक्तिशाली स्तोत्र है। यह चालीसा माँ काली की महिमा और उनके अद्भुत शक्तियों का गुणगान करती है। माँ काली को शक्ति और विनाश की देवी माना जाता है, जो अपने भक्तों की सभी बुराइयों और कठिनाइयों का नाश करती हैं।

माँ काली का स्वरूप अति भयानक और तेजस्वी है, जिसमें उनका काला रंग, गले में नरमुंड की माला, और हाथ में खड्ग और कटे हुए सिर होता है। यह रूप प्रतीक है कि माँ काली अज्ञान, अहंकार, और अधर्म का संहार करती हैं और अपने भक्तों को दुष्ट शक्तियों से बचाती हैं।

माँ महाकाली चालीसा के 40 छंद (चालीस छंद) में माँ काली की स्तुति और उनकी महानता का वर्णन किया गया है। इस चालीसा का पाठ भक्तों को अद्वितीय साहस, आत्मविश्वास, और शक्ति प्रदान करता है। माँ काली के प्रति सच्ची श्रद्धा और भक्ति के साथ इस चालीसा का पाठ करने से भक्तों को मानसिक शांति और संकटों से मुक्ति मिलती है।

चालीसा का नियमित पाठ करने से भक्त माँ काली के आशीर्वाद से समृद्ध होते हैं और उनके जीवन में सुख, समृद्धि और शांति का वास होता है। माँ काली की कृपा से सभी प्रकार के भय, रोग, और बाधाएं दूर होती हैं, और भक्त जीवन में सफलता और उन्नति की ओर अग्रसर होते हैं।


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  • हिंदी / संस्कृत
  • English

|| काली चालीसा – जय काली कंकाल मालिनी ||

॥ दोहा ॥
जय जय सीताराम के मध्यवासिनी अम्ब,
देहु दर्श जगदम्ब अब करहु न मातु विलम्ब ॥
जय तारा जय कालिका जय दश विद्या वृन्द,
काली चालीसा रचत एक सिद्धि कवि हिन्द ॥
प्रातः काल उठ जो पढ़े दुपहरिया या शाम,
दुःख दरिद्रता दूर हों सिद्धि होय सब काम ॥

॥ चौपाई ॥
 जय काली कंकाल मालिनी,
जय मंगला महाकपालिनी ॥

रक्तबीज वधकारिणी माता,
सदा भक्तन की सुखदाता ॥

शिरो मालिका भूषित अंगे,
 जय काली जय मद्य मतंगे ॥

हर हृदयारविन्द सुविलासिनी,
जय जगदम्बा सकल दुःख नाशिनी ॥ ४ ॥

ह्रीं काली श्रीं महाकाराली,
क्रीं कल्याणी दक्षिणाकाली ॥

जय कलावती जय विद्यावति,
जय तारासुन्दरी महामति ॥

देहु सुबुद्धि हरहु सब संकट,
होहु भक्त के आगे परगट ॥

जय ॐ कारे जय हुंकारे,
महाशक्ति जय अपरम्पारे ॥ ८ ॥

कमला कलियुग दर्प विनाशिनी,
सदा भक्तजन की भयनाशिनी ॥

अब जगदम्ब न देर लगावहु,
दुख दरिद्रता मोर हटावहु ॥

जयति कराल कालिका माता,
कालानल समान घुतिगाता ॥

जयशंकरी सुरेशि सनातनि,
कोटि सिद्धि कवि मातु पुरातनी ॥ १२ ॥

कपर्दिनी कलि कल्प विमोचनि,
जय विकसित नव नलिन विलोचनी ॥

आनन्दा करणी आनन्द निधाना,
देहुमातु मोहि निर्मल ज्ञाना ॥

करूणामृत सागरा कृपामयी,
होहु दुष्ट जन पर अब निर्दयी ॥

सकल जीव तोहि परम पियारा,
सकल विश्व तोरे आधारा ॥ १६ ॥

प्रलय काल में नर्तन कारिणि,
जग जननी सब जग की पालिनी ॥

महोदरी माहेश्वरी माया,
हिमगिरि सुता विश्व की छाया ॥

स्वछन्द रद मारद धुनि माही,
गर्जत तुम्ही और कोउ नाहि ॥

स्फुरति मणिगणाकार प्रताने,
तारागण तू व्योम विताने ॥ २० ॥

श्रीधारे सन्तन हितकारिणी,
अग्निपाणि अति दुष्ट विदारिणि ॥

धूम्र विलोचनि प्राण विमोचिनी,
शुम्भ निशुम्भ मथनि वर लोचनि ॥

सहस भुजी सरोरूह मालिनी,
चामुण्डे मरघट की वासिनी ॥

खप्पर मध्य सुशोणित साजी,
मारेहु माँ महिषासुर पाजी ॥ २४ ॥

अम्ब अम्बिका चण्ड चण्डिका,
सब एके तुम आदि कालिका ॥

अजा एकरूपा बहुरूपा,
अकथ चरित्रा शक्ति अनूपा ॥

कलकत्ता के दक्षिण द्वारे,
मूरति तोरि महेशि अपारे ॥

कादम्बरी पानरत श्यामा,
जय माँतगी काम के धामा ॥ २८ ॥

कमलासन वासिनी कमलायनि,
जय श्यामा जय जय श्यामायनि ॥

मातंगी जय जयति प्रकृति हे,
जयति भक्ति उर कुमति सुमति हे ॥

कोटि ब्रह्म शिव विष्णु कामदा,
जयति अहिंसा धर्म जन्मदा ॥

जलथल नभ मण्डल में व्यापिनी,
सौदामिनी मध्य आलापिनि ॥ ३२ ॥

झननन तच्छु मरिरिन नादिनी,
जय सरस्वती वीणा वादिनी ॥

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे,
कलित कण्ठ शोभित नरमुण्डा ॥

जय ब्रह्माण्ड सिद्धि कवि माता,
कामाख्या और काली माता ॥

हिंगलाज विन्ध्याचल वासिनी,
अटठहासिनि अरु अघन नाशिनी ॥ ३६ ॥

कितनी स्तुति करूँ अखण्डे,
तू ब्रह्माण्डे शक्तिजित चण्डे ॥

करहु कृपा सब पे जगदम्बा,
रहहिं निशंक तोर अवलम्बा ॥

चतुर्भुजी काली तुम श्यामा,
रूप तुम्हार महा अभिरामा ॥

खड्ग और खप्पर कर सोहत,
सुर नर मुनि सबको मन मोहत ॥ ४० ॥

तुम्हारी कृपा पावे जो कोई,
रोग शोक नहिं ताकहँ होई ॥

जो यह पाठ करै चालीसा,
तापर कृपा करहिं गौरीशा ॥

॥ दोहा ॥
जय कपालिनी जय शिवा,
जय जय जय जगदम्ब,
सदा भक्तजन केरि दुःख हरहु,
मातु अविलम्ब ॥

KAALI CHALISA PDF (in English)

॥ Doha ॥
jay jay sitaaraam ke madhyavaasinee amb,
dehu daras jagadamb ab karahu na maatu vilamb ॥
jay taara jay kaalika jay dash vidya vrnd,
kaalee chaaleesa rachat ek siddhi kavi hind ॥
praatah kaal uthen jo dopahariya ya shaam padhen,
duhkh daridrata door hoy siddhi hoy sab kaam ॥

॥ Dhaupaee ॥
jay kaalee kankaal maalinee,
jay mangala mahaakapaalinee ॥

raktabeej vadhakaarinee maata,
sada bhakton ke sukhadaata ॥

shiro maalika bhooshit ange,
jay kaalee jay maday maatange ॥

harataaravind suvilaasinee,
jay jagadamba sakal duhkh naashinee ॥ 4 ॥

hreen kaalee shreen mahaakaalee,
kreen kalyaanee dakshinakaalee ॥

jay kalaavatee jay vidyaavatee,
jay taaraasundaree mahaamati ॥

dehu subuddhi harahu sab sankat,
hohu bhakt ke aage pragat ॥

jay om kaare jay hunkaare,
mahaashakti jay aparampaare ॥ 8 ॥

kamala kaliyug darp vinaashinee,
sada bhaktajan kee bhayanaashini ॥

ab jagadamb na der kavitaahu,
duhkh daridrata more hataavahu ॥

jayati karaal kaalika maata,
kaalaanal samaan ghutigaata ॥

jayashankaree sureshi sanaatanee,
koti siddhi kavi maatu puraatanee ॥ 12 ॥

kapardinee kali kalp mukti,
jay vikasit nav nalin vilochanee ॥

aanand lena aanand karana,
dehumaatu mohi nirmal gyaana ॥

karunaamrt saagar krpaamayee,
hohu dusht jan par ab nirdayee ॥

sakal jeev tohi param piyaara,
sakal vishv tore raama ॥ 16 ॥

pralay kaal mein nartan karini,
jag janani sab jag kee paalinee ॥

mahodaree maaheshvaree maaya,
himagiri suta vishv kee chhaaya ॥

svachhand rad marad dhuni maahee,
garazat tumheen aur kooo nahin ॥

sphoorti maniganaakaar praaptane,
taaraagan tu vyom vitaane ॥ 20 ॥

shreedhaare santan hitakaarinee,
agnipaani ati dusht vidaareeni ॥

dhoomr vilochani praan vimocheenee,
shumbh nishumbh mathani var lochani ॥

sahas bhujee sarorooh maalinee,
chaamunde maraghat kee vaasinee ॥

khappar madhy sushonit saajee,
maarehu maan mahishaasur paajee ॥ 24 ॥

amb ambika chand chandika,
sab eke tum aadi kaalika ॥

aja ekaroopa bahuroopa,
akath charitra shaktianopa ॥

kolakaata ke dakshin dvaare,
moorati to maheshari apaare ॥

kaadambaree paanarat shyaama,
jay maantagee kaam ke dhaama ॥ 28 ॥

kamalaasan vaasinee kamalaayanee,
jay shyaama jay jay shyaamaayani ॥

maatangee jay jayati prakrti he,
jayati bhakti ur kumati sumati he ॥

koti brahm shiv vishnu kaamada,
jayati ahinsa dharm janmada ॥

jalathal naabh mandal mein vyaapinee,
delamini madhy alaapini ॥ 32 ॥

jhannann tachchu maririn naadinee,
jay sarasvatee veena vaadinee ॥

om ain hreen kleen chaamundaayai vichche,
kalit kanth shobhit narunada ॥

jay brahmaand siddhi kavi maata,
kaamaakhya aur kaalee maata ॥

hingalaaj vindhyaachal vaasinee,
atthahaasinee aru aghan naashinee ॥ 36 ॥

kitanee stuti karoon akhande,
too brahmaande shaktijit chande ॥

karahu krpa sab pe jagadamba,
rahahin nishank tor avalamba ॥

chaturbhujee kaalee tum shyaama,
roop tuhaar maha abhiraama ॥

khadg aur khappar kar sohat,
soor nar muni bos man mohat ॥ 40 ॥

doosara krpaya paave jo koee,
rog shok nahin taakhan hoi ॥

jo yah paath kare chaaleesa,
taapar krpa karahin gaureesha ॥

॥ Doha ॥
jay kapaalinee jay shiva,
jay jay jay jagadamb,
sada bhaktajan keree duhkh harahu,
maatu avilaam ॥


काली चालीसा माँ महाकाली के लाभ

माँ महाकाली की पूजा और काली चालीसा का पाठ भारतीय संस्कृति और आध्यात्म में विशेष महत्व रखता है। काली चालीसा एक अद्भुत स्तोत्र है जो भक्तों को अनेक प्रकार के लाभ प्रदान करता है। यहाँ काली चालीसा के पाठ के मुख्य लाभों का विस्तार से वर्णन किया गया है।

1. शत्रुओं से रक्षा:

काली चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति को शत्रुओं से मुक्ति मिलती है। माँ महाकाली को समर्पित यह स्तोत्र व्यक्ति की चारों ओर एक सुरक्षा कवच का निर्माण करता है जो नकारात्मक ऊर्जा और शत्रुओं से रक्षा करता है। माँ काली का आशीर्वाद प्राप्त करने से व्यक्ति को किसी भी प्रकार के भय और असुरक्षा का सामना नहीं करना पड़ता।

2. आध्यात्मिक उन्नति:

काली चालीसा का पाठ व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होता है। यह मन को शांति प्रदान करता है और ध्यान की गहराई को बढ़ाता है। भक्त अपने आध्यात्मिक पथ पर अधिक दृढ़ता और समर्पण के साथ आगे बढ़ सकते हैं। माँ काली की कृपा से व्यक्ति को आत्म-साक्षात्कार का अनुभव होता है।

3. संकटों से मुक्ति:

जीवन में आने वाले विभिन्न संकटों और कठिनाइयों से मुक्ति पाने के लिए काली चालीसा का पाठ अत्यंत प्रभावी होता है। माँ काली अपने भक्तों के सभी कष्टों और दुःखों को दूर करती हैं और उन्हें सुखमय जीवन प्रदान करती हैं। आर्थिक, सामाजिक, और व्यक्तिगत समस्याओं का समाधान प्राप्त करने के लिए यह स्तोत्र अत्यंत लाभकारी है।

4. नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति:

काली चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को नकारात्मक ऊर्जा और बुरी आत्माओं से मुक्ति मिलती है। माँ काली की उपासना से व्यक्ति के चारों ओर एक सकारात्मक ऊर्जा का वातावरण बनता है जिससे बुरी शक्तियाँ दूर रहती हैं। यह स्तोत्र व्यक्ति के मन, शरीर, और आत्मा को शुद्ध करता है।

5. स्वास्थ्य लाभ:

काली चालीसा का नियमित पाठ करने से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। माँ काली की कृपा से व्यक्ति को रोगों से मुक्ति मिलती है और उसकी आयु बढ़ती है। यह स्तोत्र तनाव, चिंता, और अवसाद को दूर करता है और मन को शांति और संतुलन प्रदान करता है।

6. धन-धान्य की प्राप्ति:

काली चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को धन-धान्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है। माँ काली की कृपा से व्यक्ति की आर्थिक स्थिति में सुधार होता है और उसके जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है। यह स्तोत्र व्यक्ति के व्यापार और नौकरी में सफलता दिलाने में सहायक होता है।

7. दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास:

काली चालीसा का नियमित पाठ व्यक्ति के आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प को बढ़ाता है। माँ काली की उपासना से व्यक्ति में नई ऊर्जा का संचार होता है और वह अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अधिक प्रेरित होता है। यह स्तोत्र व्यक्ति को मानसिक शक्ति और साहस प्रदान करता है।

8. भय और चिंता का निवारण:

काली चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के भय और चिंता का निवारण होता है। माँ काली की कृपा से व्यक्ति को किसी भी प्रकार का भय नहीं सताता और वह शांतिपूर्ण जीवन जी सकता है। यह स्तोत्र मानसिक शांति और संतुलन प्रदान करता है।

9. परिवारिक सुख-शांति:

काली चालीसा का पाठ करने से परिवार में सुख-शांति और सामंजस्य बना रहता है। माँ काली की कृपा से परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम और सहयोग बढ़ता है और घर का वातावरण सकारात्मक होता है। यह स्तोत्र परिवार के कल्याण और समृद्धि के लिए अत्यंत लाभकारी है।

10. मनोवांछित फलों की प्राप्ति:

काली चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। माँ काली की कृपा से व्यक्ति को मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है और उसके जीवन में खुशियों का आगमन होता है। यह स्तोत्र व्यक्ति के सभी इच्छाओं और अभिलाषाओं को पूरा करने में सहायक होता है।

काली चालीसा का पाठ: विधि और सावधानियाँ

काली चालीसा का पाठ करने के लिए कुछ विशेष विधियों और सावधानियों का पालन करना चाहिए ताकि इसका पूर्ण लाभ प्राप्त हो सके।

1. शुद्धता और स्वच्छता:

काली चालीसा का पाठ करने से पहले व्यक्ति को शुद्ध और स्वच्छ होना चाहिए। स्नान करके और स्वच्छ वस्त्र पहनकर माँ काली की उपासना करनी चाहिए।

2. आसन और ध्यान:

काली चालीसा का पाठ करते समय व्यक्ति को एक शुद्ध और शांत स्थान पर बैठना चाहिए। ध्यान करते समय माँ काली की मूर्ति या चित्र के सामने बैठकर ध्यान करना चाहिए।

3. नियमितता:

काली चालीसा का पाठ नियमित रूप से करना चाहिए। इसका पाठ हर दिन एक निश्चित समय पर करना लाभकारी होता है। नियमित पाठ करने से माँ काली की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है।

4. आस्था और समर्पण:

काली चालीसा का पाठ करते समय व्यक्ति को पूर्ण आस्था और समर्पण के साथ पाठ करना चाहिए। मन और आत्मा को माँ काली के चरणों में समर्पित करके यह पाठ करना चाहिए।

5. शांति और एकाग्रता:

काली चालीसा का पाठ करते समय मन को शांत और एकाग्र रखना चाहिए। किसी भी प्रकार के विकार और विचारों से मन को मुक्त रखकर यह पाठ करना चाहिए।

6. विशेष समय और दिन:

काली चालीसा का पाठ करने के लिए विशेष समय और दिन का चयन करना लाभकारी होता है। अमावस्या, नवमी, और काली पूजा के दिन यह पाठ विशेष रूप से प्रभावी होता है।

माँ महाकाली की कृपा से प्राप्त होने वाले अनुभव

माँ महाकाली की कृपा से भक्तों को अनेक प्रकार के अनुभव प्राप्त होते हैं। ये अनुभव व्यक्ति के जीवन को सकारात्मक दिशा में परिवर्तित करते हैं और उसे आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाते हैं।

1. दिव्य दृष्टि:

काली चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति को दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है। माँ काली की कृपा से वह अदृश्य शक्तियों और ऊर्जा को अनुभव करने लगता है।

2. आत्मज्ञान:

माँ काली की उपासना से व्यक्ति को आत्मज्ञान का अनुभव होता है। वह अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने लगता है और जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझता है।

3. दुःस्वप्नों से मुक्ति:

काली चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को दुःस्वप्नों से मुक्ति मिलती है। माँ काली की कृपा से वह रात को शांतिपूर्ण नींद का अनुभव करता है।

4. सकारात्मक ऊर्जा का संचार:

काली चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के चारों ओर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह ऊर्जा उसे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता दिलाने में सहायक होती है।

5. मानसिक शांति और संतुलन:

माँ काली की कृपा से व्यक्ति को मानसिक शांति और संतुलन प्राप्त होता है। वह अपने जीवन के सभी कार्यों को धैर्य और संयम के साथ पूरा करता है।

6. अलौकिक शक्तियों का अनुभव:

काली चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को अलौकिक शक्तियों का अनुभव होता है। वह माँ काली के अद्वितीय और रहस्यमय स्वरूप को समझने लगता है।

काली चालीसा माँ महाकाली की महिमा का गान है जो व्यक्ति को अनेक प्रकार के लाभ प्रदान करता है। इसके पाठ से व्यक्ति को शत्रुओं से रक्षा, आध्यात्मिक उन्नति, संकटों से मुक्ति, नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति, स्वास्थ्य लाभ, धन-धान्य की प्राप्ति, दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास, भय और चिंता का निवारण, परिवारिक सुख-शांति, और मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है।

काली चालीसा का पाठ नियमित रूप से और पूर्ण आस्था के साथ करने से माँ काली की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है और व्यक्ति का जीवन सुखमय और सफल होता है। माँ महाकाली की उपासना से प्राप्त होने वाले अनुभव व्यक्ति के जीवन को सकारात्मक दिशा में परिवर्तित करते हैं और उसे आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाते हैं।

माँ महाकाली की कृपा से हम सभी के जीवन में शांति, सुख, और समृद्धि का वास हो, यही प्रार्थना है। जय माँ महाकाली!

शीतला माता चालीसा (Sheetla Mata Chalisa PDF)

शीतला चालीसा (Sheetla mata Chalisa Pdf) हिन्दू धर्म में माता शीतला की स्तुति और पूजा के लिए एक महत्वपूर्ण पाठ है। माता शीतला को रोग निवारक और स्वास्थ्य की देवी माना जाता है। विशेष रूप से चेचक और अन्य संक्रामक रोगों से बचाव के लिए माता शीतला की पूजा की जाती है।

माता शीतला का स्वरूप अत्यंत शांत और ममतामयी है। वे अपने हाथ में झाडू, कलश, नीम की पत्तियाँ और दवाइयाँ लिए हुए दिखाई देती हैं। माता शीतला की पूजा से रोग-शोक का नाश होता है और परिवार में सुख-शांति और समृद्धि का वास होता है।

शीतला चालीसा 40 छंदों का एक संग्रह है, जिसमें माता शीतला की महिमा, उनके कार्यों और उनके आशीर्वाद का विस्तार से वर्णन किया गया है। इस चालीसा का पाठ भक्तों को स्वास्थ्य, शांति और समृद्धि प्रदान करता है। माता शीतला की कृपा से सभी प्रकार के रोगों और कष्टों से मुक्ति मिलती है।

शीतला चालीसा का नियमित पाठ करने से माता शीतला की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह चालीसा विशेष रूप से शीतला अष्टमी के दिन और अन्य पूजा अवसरों पर गायी जाती है। माता शीतला की भक्ति से भक्तों को मानसिक और शारीरिक शांति मिलती है और वे जीवन में सफलता की ओर अग्रसर होते हैं।


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|| शीतला माता चालीसा ||

घट-घट वासी शीतला,
शीतल प्रभा तुम्हार ।
शीतल छइयां में झुलई,
मइयां पलना डार ॥

॥ चौपाई ॥
जय-जय-जय श्री शीतला भवानी ।
जय जग जननि सकल गुणधानी ॥

गृह-गृह शक्ति तुम्हारी राजित ।
पूरण शरदचंद्र समसाजित ॥

विस्फोटक से जलत शरीरा ।
शीतल करत हरत सब पीड़ा ॥

मात शीतला तव शुभनामा ।
सबके गाढे आवहिं कामा ॥4॥

शोक हरी शंकरी भवानी ।
बाल-प्राणक्षरी सुख दानी ॥

शुचि मार्जनी कलश करराजै ।
मस्तक तेज सूर्य सम साजै ॥

चौसठ योगिन संग में गावैं ।
वीणा ताल मृदंग बजावै ॥

नृत्य नाथ भैरौं दिखलावैं ।
सहज शेष शिव पार ना पावैं ॥8॥

धन्य धन्य धात्री महारानी ।
सुरनर मुनि तब सुयश बखानी ॥

ज्वाला रूप महा बलकारी ।
दैत्य एक विस्फोटक भारी ॥

घर घर प्रविशत कोई न रक्षत ।
रोग रूप धरी बालक भक्षत ॥

हाहाकार मच्यो जगभारी ।
सक्यो न जब संकट टारी ॥12॥

तब मैंय्या धरि अद्भुत रूपा ।
कर में लिये मार्जनी सूपा ॥

विस्फोटकहिं पकड़ि कर लीन्हो ।
मूसल प्रमाण बहुविधि कीन्हो ॥

बहुत प्रकार वह विनती कीन्हा ।
मैय्या नहीं भल मैं कछु कीन्हा ॥

अबनहिं मातु काहुगृह जइहौं ।
जहँ अपवित्र वही घर रहि हो ॥16॥

अब भगतन शीतल भय जइहौं ।
विस्फोटक भय घोर नसइहौं ॥

श्री शीतलहिं भजे कल्याना ।
वचन सत्य भाषे भगवाना ॥

पूजन पाठ मातु जब करी है ।
भय आनंद सकल दुःख हरी है ॥

विस्फोटक भय जिहि गृह भाई ।
भजै देवि कहँ यही उपाई ॥20॥

कलश शीतलाका सजवावै ।
द्विज से विधीवत पाठ करावै ॥

तुम्हीं शीतला, जगकी माता ।
तुम्हीं पिता जग की सुखदाता ॥

तुम्हीं जगद्धात्री सुखसेवी ।
नमो नमामी शीतले देवी ॥

नमो सुखकरनी दु:खहरणी ।
नमो- नमो जगतारणि धरणी ॥24॥

नमो नमो त्रलोक्य वंदिनी ।
दुखदारिद्रक निकंदिनी ॥

श्री शीतला , शेढ़ला, महला ।
रुणलीहृणनी मातृ मंदला ॥

हो तुम दिगम्बर तनुधारी ।
शोभित पंचनाम असवारी ॥

रासभ, खर , बैसाख सुनंदन ।
गर्दभ दुर्वाकंद निकंदन ॥28॥

सुमिरत संग शीतला माई,
जाही सकल सुख दूर पराई ॥

गलका, गलगन्डादि जुहोई ।
ताकर मंत्र न औषधि कोई ॥

एक मातु जी का आराधन ।
और नहिं कोई है साधन ॥

निश्चय मातु शरण जो आवै ।
निर्भय मन इच्छित फल पावै ॥32॥

कोढी, निर्मल काया धारै ।
अंधा, दृग निज दृष्टि निहारै ॥

बंध्या नारी पुत्र को पावै ।
जन्म दरिद्र धनी होइ जावै ॥

मातु शीतला के गुण गावत ।
लखा मूक को छंद बनावत ॥

यामे कोई करै जनि शंका ।
जग मे मैया का ही डंका ॥36॥

भगत ‘कमल’ प्रभुदासा ।
तट प्रयाग से पूरब पासा ॥

ग्राम तिवारी पूर मम बासा ।
ककरा गंगा तट दुर्वासा ॥

अब विलंब मैं तोहि पुकारत ।
मातृ कृपा कौ बाट निहारत ॥

पड़ा द्वार सब आस लगाई ।
अब सुधि लेत शीतला माई ॥40॥

॥ दोहा ॥
यह चालीसा शीतला,
पाठ करे जो कोय ।
सपनें दुख व्यापे नही,
नित सब मंगल होय ॥

बुझे सहस्र विक्रमी शुक्ल,
भाल भल किंतू ।
जग जननी का ये चरित,
रचित भक्ति रस बिंतू ॥


॥ इति श्री शीतला चालीसा ॥

Sheetla MATA Chalisa PDF (in English)

ghat-ghat vaasee sheetla,
sheetlaprabha tumhaar ॥
sheetlahar relave steshan mein jalaee,
om vivaran palana daar ॥

॥ Chaupaee ॥
jay-jay-jay shree sheetla bhavaanee ॥
jay jag janani sakal gunadhaanee ॥

grh-grh shakti vivaah raajit ॥
pooran sharadachandr samasaajit ॥

daunalod se jalat shareera ॥
sheetal karat hrday sab peeda ॥

maata sheetla tav shubhanaama ॥
sarvasv gaadhe avahin kaam ॥4 ॥

shok haree shankaree bhavaanee ॥
baal-praanaaksharee sukh daanee ॥

shuchi maarjanee kalash kararaajai ॥
mastak tej soory sam saajai ॥

chausath yogin sang mein gaavain ॥
veena taal mrdangavai baja ॥

nrty naath bhairaun dikhalaavain ॥
sahaj shiv shesh paar na paavain ॥8 ॥

dhany dhany dhaatree mahaaraanee ॥
suranar muni tab suyash bakhaani ॥

bam roop mahaabalakaaree ॥
daity ek jvaalaamukhee bhaaree ॥

ghar ghar pravisht koee na rakshat ॥
rog roop dhari baalak bhakshat ॥

haahaakaar machyo jagabhaaree ॥
saakyo na jab sankat taaree ॥12 ॥

tab mainya dhari adbhut roopa ॥
kar mein liy maarjanee supa ॥

dokalaanhin pakadi kar leenhon ॥
moosal pramaan bahuvidhi keenho ॥

bahut prakaar vah vinatee keenha ॥
maiya nahin bhal main kachhu keenha ॥

abanahin maatu kaahugrh jaihaun ॥
jahaan apavitr vahee ghar rahi ho ॥16 ॥

ab bhaktan sheetal bhay jaihaun ॥
doda bhay ghor naasihaun ॥

shree sheetlahin bhaje kalyaana ॥
vachan saty bhaashe bhagavaana ॥

poojan paath maatu jab kari hai ॥
bhay aanand sakal duhkh haree hai ॥

vidhvans bhay jihi grh bhaee ॥
bhajai devee kahan yahee upaee ॥20 ॥

kalash sheetlaaka savavai ॥
dvij se vidhivat paath karaavai ॥

tumheen sheetla, jaagakee maata ॥
tumheen pita jag ke sukhadaata ॥

tumheen jagaddhaatree sukhasevee ॥
namo namaami sheetale devee ॥

namo sukhakaranee du:khaharaanee ॥
namo- namo jagataarani dharani ॥24 ॥

namo namo trailoky vandinee ॥
du:khadaridrak nikandinee ॥

shree sheetla, sheetla, mahala ॥
runlihrni maatr mandala ॥

ho tum digambar tanudhaaree ॥
shobhit panchanaam asavaaree ॥

rshabh, khar, baisaakh sunda ॥
gardabh doorvaakand nikandan ॥28 ॥

sumirat sang sheetla maee,
jaahi sakal sukh door paraee ॥

galaka, galagandaadi juhoee ॥
taakar mantr na aushadhi ॥

ek maatu jee kee aaraadhana ॥
aur nahin koee hai saadhan ॥

nishchit maatu sharan jo aavai ॥
nirbhay man ichchhit phal paavai ॥32 ॥

kodhee, nirmal kaaya dharai ॥
ankau, durg nij drshti nihaarai ॥

bandhya naaree putr ko paavai ॥
janm daridr dhanee hoi jaavai ॥

maatu sheetla ke gun gaavat ॥
laakha mook ko chhand banaavat ॥

yaame koee karai jani sandeh ॥
jag mein maiya ka hee danka ॥36 ॥

bhagat kamal prabhudaasa ॥
tat prayaag se poorab paasa ॥

graam tivaaree poor mam baasa ॥
kaakara ganga tat durvaasa ॥

ab der ho gaee to main bulaoonga ॥
maatr krpa kau baat nihaarat ॥

padhe dvaar sab as sai ॥
ab sudhit le sheetla maee ॥40 ॥

॥ Doha ॥
yah chaaleesa sheetla,
paath kare jo koee ॥
sapanen dukh vyaape nahin,
nit sab mangal hoy ॥

bujhe sahastr vikramee shukl,
bhal bhal kintu ॥
jag jananee ka ye charit,
rachit bhakti ras bintu ॥

॥ iti Shree Sheetla chaaleesa ॥


शीतला माता चालीसा के लाभ

शीतला माता चालीसा एक धार्मिक पाठ है जो शीतला माता की आराधना के लिए गाया जाता है। इस चालीसा के पाठ के अनेक लाभ होते हैं, जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:

1. रोगों से मुक्ति

शीतला माता को रोग निवारण की देवी माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि शीतला माता चालीसा के पाठ से चेचक, खसरा, और अन्य संक्रामक रोगों से मुक्ति मिलती है। माता शीतला के आशीर्वाद से व्यक्ति के शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और वह स्वस्थ रहता है।

2. मानसिक शांति

चालीसा का पाठ करने से मानसिक शांति मिलती है। इसमें सम्मिलित मंत्र और स्तुति मन को शांत करते हैं और तनाव को दूर करते हैं। इससे व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है और वह अधिक संतुलित और स्थिर रहता है।

3. परिवार में सुख-शांति

शीतला माता चालीसा का नियमित पाठ करने से परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आती है। माता के आशीर्वाद से परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम और सहयोग बढ़ता है, जिससे परिवारिक जीवन सुखमय होता है।

4. आर्थिक समृद्धि

शीतला माता चालीसा के पाठ से आर्थिक संकटों का निवारण होता है। माता के आशीर्वाद से व्यक्ति के व्यवसाय में वृद्धि होती है और धन की प्राप्ति होती है। इससे व्यक्ति की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है और वह सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करता है।

5. बच्चों के लिए सुरक्षा

माता शीतला को बच्चों की रक्षा करने वाली देवी माना जाता है। शीतला माता चालीसा का पाठ करने से बच्चों की सुरक्षा होती है और वे विभिन्न प्रकार की बीमारियों से बचे रहते हैं। इसके अलावा, माता के आशीर्वाद से बच्चों की बुद्धि और ज्ञान में वृद्धि होती है।

6. समाज में प्रतिष्ठा

जो व्यक्ति नियमित रूप से शीतला माता चालीसा का पाठ करता है, उसे समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। माता के आशीर्वाद से उसकी सामाजिक स्थिति मजबूत होती है और लोग उसका सम्मान करते हैं।

7. बाधाओं का निवारण

शीतला माता चालीसा का पाठ करने से जीवन में आने वाली विभिन्न बाधाओं का निवारण होता है। माता के आशीर्वाद से व्यक्ति के मार्ग में आने वाली सभी समस्याएं और अड़चनें दूर होती हैं और वह सफलता की ओर अग्रसर होता है।

8. शत्रुओं से रक्षा

शीतला माता चालीसा के पाठ से शत्रुओं से रक्षा होती है। माता के आशीर्वाद से व्यक्ति के शत्रु परास्त होते हैं और उसे किसी भी प्रकार की हानि नहीं पहुंचा पाते। इससे व्यक्ति निर्भीक और सुरक्षित रहता है।

9. धार्मिक लाभ

शीतला माता चालीसा का पाठ करने से धार्मिक लाभ भी प्राप्त होते हैं। इससे व्यक्ति का धर्म और आध्यात्मिक ज्ञान बढ़ता है और वह धर्म के मार्ग पर चलता है। इससे उसकी आत्मा को शांति मिलती है और वह भगवान के करीब आता है।

10. शुभ कार्यों में सफलता

शीतला माता चालीसा का पाठ करने से सभी शुभ कार्यों में सफलता मिलती है। माता के आशीर्वाद से व्यक्ति के सभी कार्य सफल होते हैं और वह अपने जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त करता है। इससे उसकी जीवन में संतुष्टि और खुशी बढ़ती है।

शीतला माता चालीसा का पाठ करने से उपरोक्त लाभ प्राप्त होते हैं। यह पाठ शीतला माता के प्रति श्रद्धा और विश्वास को बढ़ाता है और व्यक्ति के जीवन को सुखमय बनाता है। नियमित रूप से इस चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में शांति, समृद्धि और सफलता प्राप्त होती है।

श्री दुर्गा माता की आरती हिन्दी – DURGA AARTI PDF 2024-25

श्री दुर्गा माता की आरती (Durga Aarti PDF) हमारे धार्मिक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो श्रद्धालुओं को देवी दुर्गा की कृपा प्राप्त करने का अवसर प्रदान करती है। आरती एक ऐसा विधि-विधान है, जिसमें दीप, फूल, धूप, और भक्ति के साथ माँ दुर्गा की स्तुति की जाती है। “जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी” जैसी प्रसिद्ध आरती हमारे समाज में सदियों से प्रचलित है, जिसे भक्तगण अपने घरों और मंदिरों में नियमित रूप से गाते हैं। आप हमारी वेबसाइट में दुर्गा चालीसा और दुर्गा मंत्र भी पढ़ सकते हैं।

माँ दुर्गा को शक्ति की देवी माना जाता है, जो अपने भक्तों को न केवल शक्ति प्रदान करती हैं, बल्कि उन्हें उनके जीवन के कष्टों से मुक्ति भी दिलाती हैं। आरती के माध्यम से हम अपनी भक्ति और समर्पण को व्यक्त करते हैं। यह हमारे मन को शांति, संतोष और सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है। जब हम माँ दुर्गा की आरती करते हैं, तो यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं होता, बल्कि यह एक आत्मिक अनुभव होता है जो हमें माँ दुर्गा के दिव्य रूप से जोड़ता है।

आरती का समय विशेष रूप से सुबह और शाम का होता है, जब वातावरण शुद्ध और शांत होता है। इस समय की गई आरती से न केवल हमारा मन शुद्ध होता है, बल्कि यह हमारे चारों ओर की नकारात्मक ऊर्जा को भी दूर करती है। आरती के माध्यम से माँ दुर्गा की कृपा से हमें सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है और हमारा जीवन सुख, शांति, और समृद्धि से भर जाता है।

श्री दुर्गा माता की आरती हिन्दी आपको इस दिव्य अनुष्ठान को सही विधि-विधान से करने का अवसर प्रदान करती है। इस PDF में माँ दुर्गा की आरती के शब्द, विधि और महत्व को विस्तार से समझाया गया है, जिससे आप अपने पूजा पाठ को और भी अधिक प्रभावी बना सकते हैं। यह PDF उन सभी श्रद्धालुओं के लिए एक अनमोल संसाधन है जो माँ दुर्गा की भक्ति में लीन होकर अपने जीवन को सुखमय बनाना चाहते हैं।


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माँ दुर्गा आरती:
(जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी)

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी।।
ॐ जय अम्बे…..

मांग सिंदूर बिराजत, टीको मृगमद को।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रबदन नीको।।
ॐ जय अम्बे…..

कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।
रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै।।
ॐ जय अम्बे…..

केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्परधारी।
सुर-नर मुनिजन सेवत, तिनके दुःखहारी।।
ॐ जय अम्बे…..

कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।
कोटिक चंद्र दिवाकर, राजत समज्योति।।
ॐ जय अम्बे…..

शुम्भ निशुम्भ बिडारे, महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना, निशिदिन मदमाती।।
ॐ जय अम्बे…..

चण्ड-मुण्ड संहारे, शौणित बीज हरे।
मधु कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे।।
ॐ जय अम्बे…..

ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी।
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी।।
ॐ जय अम्बे…..

चौंसठ योगिनि मंगल गावैं, नृत्य करत भैरू।
बाजत ताल मृदंगा, अरू बाजत डमरू।।
ॐ जय अम्बे…..

तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।
भक्तन की दुःख हरता, सुख सम्पत्ति करता।।
ॐ जय अम्बे…..

भुजा चार अति शोभित, वर-मुद्रा धारी।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी।।
ॐ जय अम्बे…..

कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।
श्री मालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति।।
ॐ जय अम्बे…..

अम्बेजी की आरती जो कोई नर गावै।
कहत शिवानंद स्वामी, सुख-सम्पत्ति पावै।।
ॐ जय अम्बे…..

**देवी वन्दना**

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

॥Durga Ji Ki Aarti Lyrics PDF॥

Jai Ambe Gauri,Maiya Jai Shyama Gauri।
Tumako Nishidina Dhyawata,Hari Brahma Shivari॥
Jai Ambe Gauri

Manga Sindura Virajata,Tiko Mrigamada Ko।
Ujjavala Se Dou Naina,Chandravadana Niko॥
Jai Ambe Gauri

Kanaka Samana Kalewara,Raktambara Rajai।
Raktapushpa Gala Mala,Kanthana Para Sajai॥
Jai Ambe Gauri

Kehari Vahana Rajata,Khadga Khapparadhari।
Sura-Nara-Muni-Jana Sevata,Tinake Dukhahari॥
Jai Ambe Gauri

Kanana Kundala Shobhita,Nasagre Moti।
Kotika Chandra Diwakara,Sama Rajata Jyoti॥
Jai Ambe Gauri

Shumbha-Nishumbha Bidare,Mahishasura Ghati।
Dhumra Vilochana Naina,Nishidina Madamati॥
Jai Ambe Gauri

Chanda-Munda Sanhare,Shonita Bija Hare।
Madhu-Kaitabha Dou Mare,Sura Bhayahina Kare॥
Jai Ambe Gauri

Brahmani RudraniTuma Kamala Rani।
Agama-Nigama-Bakhani,Tuma Shiva Patarani॥
Jai Ambe Gauri

Chausatha Yogini Mangala Gavata,Nritya Karata Bhairun।
Bajata Tala Mridanga,Aru Bajata Damaru॥
Jai Ambe Gauri

Tuma Hi Jaga Ki Mata,Tuma Hi Ho Bharata।
Bhaktana Ki Dukha Harata,Sukha Sampatti Karata॥
Jai Ambe Gauri

Bhuja Chara Ati Shobhita,Vara-Mudra Dhari।
Manavanchhita Phala Pavata,Sevata Nara-Nari॥
Jai Ambe Gauri

Kanchana Thala Virajata,Agara Kapura Bati।
Shrimalaketu Mein Rajata,Koti Ratana Jyoti॥
Jai Ambe Gauri

Shri Ambeji Ki Aarti,Jo Koi Nara Gavai।
Kahata Shivananda Swami,Sukha Sampatti Pavai॥
Jai Ambe Gauri




श्री दुर्गा माता की आरती लिखित

दुर्गा आरती क्या है?

दुर्गा आरती एक महत्वपूर्ण हिंदू धार्मिक अनुष्ठान है जो माँ दुर्गा की पूजा में किया जाता है। आरती के दौरान, भक्त दीपक या दीये को घी या तेल से जलाते हैं और माँ दुर्गा के सम्मान में गीत गाते हैं। यह अनुष्ठान विशेष रूप से माँ दुर्गा की कृपा प्राप्त करने के लिए किया जाता है। आरती के माध्यम से भक्त अपनी श्रद्धा और भक्ति को व्यक्त करते हैं, और इसे एक महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है जिससे वे अपनी आत्मा को माँ दुर्गा के दिव्य आशीर्वाद से भर सकते हैं।

हिंदू अनुष्ठानों में आरती का महत्व

हिंदू धर्म में, आरती को एक अत्यधिक पवित्र और आध्यात्मिक क्रिया माना जाता है। यह केवल माँ दुर्गा की पूजा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि सभी देवताओं की पूजा में किया जाता है। आरती के दौरान, दीपक का उपयोग करते हुए दीये की लौ को देवता के सामने घुमाया जाता है। यह प्रक्रिया प्रतीकात्मक रूप से अज्ञानता के अंधकार को दूर कर ज्ञान और प्रकाश का प्रसार करती है। हिंदू अनुष्ठानों में आरती का महत्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि यह पूजा का समापन करने का एक प्रमुख तरीका है, जिससे भक्त और देवता के बीच की दूरी को पाटने में मदद मिलती है।


दुर्गा आरती का महत्व

आध्यात्मिक अर्थ

दुर्गा आरती केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह एक आध्यात्मिक अनुभव भी है। यह आरती माँ दुर्गा की शक्ति और कृपा का आह्वान करती है। आरती के माध्यम से, भक्त अपनी आत्मा को शुद्ध करने और अपने जीवन में शांति और संतुलन लाने का प्रयास करते हैं। यह आरती माँ दुर्गा की असीम शक्ति का प्रतीक है, जो बुराईयों को नष्ट करती है और भक्तों को आशीर्वाद देती है।

भक्ति का माध्यम

आरती, विशेष रूप से दुर्गा आरती, भक्तों के लिए भक्ति और समर्पण का एक प्रमुख माध्यम है। इसे गाने और सुनने से भक्तों में एक दिव्य ऊर्जा का संचार होता है, जो उन्हें माँ दुर्गा के प्रति अपनी भक्ति को प्रकट करने में मदद करता है। आरती के दौरान गाए जाने वाले मंत्र और भजन भक्तों के मन को शांति और संतोष प्रदान करते हैं।

नवरात्रि के त्योहार से संबंध

दुर्गा आरती का विशेष महत्व नवरात्रि के दौरान होता है। नवरात्रि, जो माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा का पर्व है, के दौरान दुर्गा आरती का विशेष रूप से आयोजन किया जाता है। इस दौरान, आरती के माध्यम से माँ दुर्गा की पूजा की जाती है और उनसे शक्ति, समृद्धि, और आशीर्वाद की कामना की जाती है। नवरात्रि के दौरान दुर्गा आरती का आयोजन बड़े धूमधाम से किया जाता है, जिसमें समुदाय के लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।


दुर्गा आरती का इतिहास और उत्पत्ति

पौराणिक पृष्ठभूमि

दुर्गा आरती का इतिहास और इसकी उत्पत्ति पौराणिक काल से जुड़ी हुई है। ऐसा माना जाता है कि माँ दुर्गा की आराधना का आरंभ महिषासुर मर्दिनी के रूप में उनके महिषासुर राक्षस को मारने के बाद हुआ। पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि माँ दुर्गा ने अपनी अद्वितीय शक्ति का प्रदर्शन कर संसार को महिषासुर के आतंक से मुक्त किया था। इसके बाद, उनकी शक्ति और वीरता की पूजा के रूप में आरती का चलन शुरू हुआ।

प्राचीन ग्रंथों में दुर्गा आरती का उल्लेख

दुर्गा आरती का उल्लेख प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है। विशेष रूप से, देवी भागवत, मार्कंडेय पुराण, और दुर्गा सप्तशती जैसे ग्रंथों में दुर्गा आरती का वर्णन किया गया है। इन ग्रंथों में माँ दुर्गा की आरती के विभिन्न रूपों और इसके महत्व को विस्तार से समझाया गया है। इन ग्रंथों के अनुसार, दुर्गा आरती एक शक्तिशाली माध्यम है जो भक्तों को माँ दुर्गा की कृपा प्राप्त करने में मदद करता है।

शताब्दियों में विकास

दुर्गा आरती का स्वरूप और इसका महत्व समय के साथ विकसित हुआ है। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक समय तक, दुर्गा आरती ने विभिन्न संस्कृतियों और परंपराओं के साथ तालमेल बिठाया है। आरती के स्वरूप में भी विभिन्न क्षेत्रों के अनुसार बदलाव हुआ है, लेकिन इसका मूल उद्देश्य और महत्व हमेशा एक जैसा रहा है। आज, दुर्गा आरती पूरे भारत में और विशेष रूप से नवरात्रि के दौरान एक प्रमुख धार्मिक अनुष्ठान के रूप में मनाई जाती है।


देवी दुर्गा: शक्ति और संरक्षण की प्रतीक

देवी दुर्गा कौन हैं?

देवी दुर्गा हिंदू धर्म में शक्ति और विजय की देवी मानी जाती हैं। उन्हें आदि शक्ति, पराशक्ति, और त्रिनेत्रधारी देवी के रूप में भी पूजा जाता है। माँ दुर्गा को बुराई और अज्ञानता का नाश करने वाली देवी के रूप में जाना जाता है। उनके नौ रूप हैं, जिन्हें नवरात्रि के नौ दिनों में पूजा जाता है। माँ दुर्गा की पूजा विशेष रूप से उनके शौर्य और पराक्रम के लिए की जाती है।

दुर्गा के विभिन्न रूप

माँ दुर्गा के विभिन्न रूप हैं, जिनमें से प्रत्येक का अपना अलग महत्व और पूजा का तरीका है। उनके नौ प्रमुख रूपों को नवदुर्गा कहा जाता है, जिनमें शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, और सिद्धिदात्री शामिल हैं। इन रूपों में माँ दुर्गा की पूजा नवरात्रि के दौरान विशेष रूप से की जाती है।

शक्ति और संरक्षण की प्रतीक

माँ दुर्गा को शक्ति और संरक्षण की देवी माना जाता है। वह अपने भक्तों को न केवल शारीरिक शक्ति प्रदान करती हैं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति भी देती हैं। उनकी पूजा से भक्तों को जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता प्राप्त होती है और वे बुराईयों से सुरक्षित रहते हैं। माँ दुर्गा की आराधना से भक्तों को साहस, आत्मविश्वास, और संकल्प की प्राप्ति होती है, जिससे वे अपने जीवन में आने वाली सभी चुनौतियों का सामना कर सकते हैं।


दुर्गा आरती की संरचना

दुर्गा आरती में प्रयुक्त प्रमुख श्लोक

दुर्गा आरती के दौरान गाए जाने वाले श्लोक और भजन अत्यधिक पवित्र और महत्वपूर्ण होते हैं। इन श्लोकों का मूल उद्देश्य माँ दुर्गा की शक्ति और कृपा का आह्वान करना होता है। “जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी” जैसे भजन और श्लोक दुर्गा आरती के प्रमुख हिस्से होते हैं। इनके माध्यम से भक्त माँ दुर्गा की महिमा का गुणगान करते हैं और उनसे आशीर्वाद की कामना करते हैं।

धुन और लय

दुर्गा आरती की धुन और लय अत्यधिक महत्वपूर्ण होती है, जो भक्तों के मन में एक अद्वितीय भावनात्मक और आध्यात्मिक अनुभव का संचार करती है। आरती की लय और संगीत शांति और सकारात्मकता का वातावरण उत्पन्न करते हैं। विशेष रूप से, नवरात्रि के दौरान, दुर्गा आरती की धुन और लय में एक विशेष प्रकार की ऊर्जा होती है जो भक्तों को माँ दुर्गा की भक्ति में लीन होने में मदद करती है।

विभिन्न क्षेत्रों में विविधता

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में दुर्गा आरती के स्वरूप और विधि में कुछ अंतर देखने को मिलते हैं। प्रत्येक क्षेत्र की अपनी सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं के अनुसार दुर्गा आरती का आयोजन किया जाता है। उदाहरण के लिए, उत्तर भारत में दुर्गा आरती में प्रयुक्त श्लोक और भजन पश्चिम बंगाल, गुजरात, या दक्षिण भारत से भिन्न हो सकते हैं। लेकिन इन सभी क्षेत्रों में दुर्गा आरती का मूल उद्देश्य एक ही होता है, और वह है माँ दुर्गा की पूजा और उनके आशीर्वाद की प्राप्ति।


दैनिक पूजा में दुर्गा आरती की भूमिका

सुबह और शाम की आरती विधि

दुर्गा आरती को सुबह और शाम के समय करना अत्यधिक फलदायी माना जाता है। सुबह की आरती से दिन की शुरुआत एक सकारात्मक ऊर्जा के साथ होती है, जबकि शाम की आरती पूरे दिन की थकान और तनाव को दूर करती है। इन दोनों समयों में की जाने वाली दुर्गा आरती से भक्तों के मन में शांति और संतुलन की भावना उत्पन्न होती है।

मंदिरों और घरों में आरती की भूमिका

माँ दुर्गा की आरती केवल मंदिरों में ही नहीं, बल्कि घरों में भी की जाती है। मंदिरों में सामूहिक रूप से की जाने वाली दुर्गा आरती का अपना विशेष महत्व होता है, जिसमें बड़ी संख्या में भक्त हिस्सा लेते हैं। वहीं, घरों में की जाने वाली आरती भी परिवार के सदस्यों के बीच सामूहिकता और भक्ति का संचार करती है। मंदिरों और घरों में दुर्गा आरती के माध्यम से माँ दुर्गा की कृपा प्राप्त की जाती है, जिससे जीवन में सुख, शांति, और समृद्धि का आगमन होता है।

शांति और सकारात्मकता का संचार

दुर्गा आरती के माध्यम से भक्त अपने जीवन में शांति और सकारात्मकता का संचार करते हैं। आरती के समय गाए जाने वाले भजन और श्लोक मन को शुद्ध करते हैं और सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जाओं को दूर करते हैं। आरती का प्रकाश और धूप वातावरण को पवित्र बनाते हैं, जिससे मन और आत्मा को शांति मिलती है।


नवरात्रि के दौरान दुर्गा आरती

नवरात्रि में विशेष महत्व

नवरात्रि के दौरान दुर्गा आरती का विशेष महत्व होता है। नवरात्रि, जो माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा का पर्व है, के दौरान दुर्गा आरती का आयोजन बड़े धूमधाम से किया जाता है। इस दौरान, भक्त नौ दिनों तक माँ दुर्गा की आराधना करते हैं और हर दिन आरती के माध्यम से अपनी भक्ति को प्रकट करते हैं। नवरात्रि के दौरान दुर्गा आरती का आयोजन विशेष रूप से रात के समय किया जाता है, जब मंदिरों और घरों में दीप जलाए जाते हैं और माँ दुर्गा की महिमा का गुणगान किया जाता है।

अनुष्ठान और उत्सव

नवरात्रि के दौरान दुर्गा आरती के साथ-साथ विभिन्न अनुष्ठान और उत्सव भी मनाए जाते हैं। इन उत्सवों में भक्तों के द्वारा देवी दुर्गा के विभिन्न रूपों की पूजा की जाती है। विशेष रूप से दुर्गा पूजा और विजयादशमी के दौरान, दुर्गा आरती का आयोजन भव्य रूप से किया जाता है। इन अनुष्ठानों में दुर्गा आरती के माध्यम से माँ दुर्गा की कृपा और आशीर्वाद की प्राप्ति की जाती है।

सामुदायिक सहभागिता

नवरात्रि के दौरान दुर्गा आरती एक सामुदायिक आयोजन बन जाता है, जिसमें सभी भक्त एक साथ मिलकर माँ दुर्गा की पूजा करते हैं। सामुदायिक दुर्गा आरती का आयोजन मंदिरों, पंडालों, और सामुदायिक केंद्रों में किया जाता है, जहाँ बड़ी संख्या में लोग भाग लेते हैं। यह सामुदायिक आयोजन भक्तों में एकता, सामूहिकता, और भक्ति का संचार करता है, जिससे समाज में एक सकारात्मक माहौल उत्पन्न होता है।


घर में दुर्गा आरती का आयोजन

आरती के लिए आवश्यक सामग्री

घर में दुर्गा आरती करने के लिए कुछ आवश्यक सामग्रियों की आवश्यकता होती है। इनमें प्रमुख रूप से दीपक, घी या तेल, धूप, कपूर, फूल, और एक साफ-सुथरी थाली शामिल होती है। इसके साथ ही, दुर्गा आरती की पुस्तक या प्रिंटआउट होना भी जरूरी होता है, जिससे भक्त श्लोकों और भजनों का सही उच्चारण कर सकें।

आरती करने की चरणबद्ध विधि

घर में दुर्गा आरती करने की विधि बहुत ही सरल होती है, जिसे निम्नलिखित चरणों में किया जा सकता है:

  1. सबसे पहले, माँ दुर्गा की मूर्ति या तस्वीर को एक साफ स्थान पर स्थापित करें।
  2. दीपक में घी या तेल डालकर उसे जलाएं और माँ दुर्गा के सामने रखें।
  3. धूप और कपूर जलाकर माँ दुर्गा के समक्ष अर्पित करें।
  4. दुर्गा आरती की पुस्तक या प्रिंटआउट से श्लोक और भजनों का उच्चारण करें।
  5. आरती के दौरान दीपक को माँ दुर्गा के सामने घुमाएं और भजन गाएं।
  6. आरती के बाद, प्रसाद को माँ दुर्गा के चरणों में अर्पित करें और इसे परिवार के सदस्यों में बांटें।

सार्थक और भक्ति-पूर्ण आरती के लिए सुझाव

आरती को और अधिक सार्थक और भक्ति-पूर्ण बनाने के लिए कुछ सुझाव निम्नलिखित हैं:

  1. आरती के दौरान अपने मन को पूरी तरह से शुद्ध और शांत रखें।
  2. श्लोकों और भजनों का सही उच्चारण करें और उन्हें श्रद्धा के साथ गाएं।
  3. आरती के समय घर का वातावरण शुद्ध और पवित्र रखें।
  4. आरती के बाद, ध्यान और प्रार्थना में समय बिताएं, जिससे माँ दुर्गा के प्रति अपनी भक्ति को और गहरा कर सकें।

दुर्गा आरती गाने के आध्यात्मिक लाभ

आंतरिक शांति और मानसिक स्पष्टता

दुर्गा आरती गाने से भक्तों के मन में आंतरिक शांति और मानसिक स्पष्टता का संचार होता है। आरती के माध्यम से भक्त अपने मन को सभी प्रकार की चिंताओं और तनावों से मुक्त कर सकते हैं।

ध्यान और एकाग्रता में सुधार

दुर्गा आरती गाने से ध्यान और एकाग्रता में भी सुधार होता है। आरती के समय श्लोकों और भजनों का गान मन को शांत और स्थिर रखता है, जिससे ध्यान केंद्रित होता है। यह भक्तों को आध्यात्मिक जागृति और माँ दुर्गा के साथ गहरे संबंध की अनुभूति कराता है।

आध्यात्मिक जागृति और दिव्य संपर्क

दुर्गा आरती गाने से भक्तों में आध्यात्मिक जागृति होती है। यह आरती एक माध्यम है जिसके द्वारा भक्त माँ दुर्गा के साथ एक गहरे आध्यात्मिक संबंध का अनुभव कर सकते हैं। आरती के माध्यम से भक्त अपने जीवन में दिव्य ऊर्जा का संचार कर सकते हैं, जो उन्हें मानसिक और आध्यात्मिक शांति प्रदान करती है।


दुर्गा आरती का सांस्कृतिक प्रभाव

भारतीय कला और संगीत पर प्रभाव

दुर्गा आरती का भारतीय कला और संगीत पर गहरा प्रभाव पड़ा है। आरती के श्लोक और भजन भारतीय संगीत की धरोहर का हिस्सा हैं। आरती की धुन और लय ने संगीतकारों को प्रेरित किया है और इसे भारतीय शास्त्रीय संगीत में भी स्थान मिला है।

फिल्मों और टेलीविजन में प्रस्तुतिकरण

दुर्गा आरती का फिल्मों और टेलीविजन में भी प्रमुख रूप से चित्रण किया गया है। कई भारतीय फिल्मों और धारावाहिकों में दुर्गा आरती का उपयोग किया गया है, जो दर्शकों को आध्यात्मिकता और भक्ति की भावना से जोड़ता है।

सामाजिक और सांस्कृतिक एकता में भूमिका

दुर्गा आरती सामाजिक और सांस्कृतिक एकता में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। सामुदायिक आरती के आयोजन से लोग एक साथ आते हैं और मिलकर माँ दुर्गा की पूजा करते हैं। इससे समाज में एकता और सामूहिकता का संचार होता है, और सभी वर्गों के लोग एक साथ मिलकर धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं।


भारत के विभिन्न क्षेत्रों में दुर्गा आरती

उत्तर भारत: परंपराएँ और विविधताएँ

उत्तर भारत में दुर्गा आरती की परंपरा बहुत पुरानी है। यहाँ के मंदिरों और घरों में दुर्गा आरती का आयोजन भव्य रूप से किया जाता है। विशेष रूप से नवरात्रि के दौरान, दुर्गा आरती का आयोजन बड़े धूमधाम से होता है, जिसमें सभी आयु वर्ग के लोग भाग लेते हैं।

दक्षिण भारत: अनूठे अनुष्ठान और प्रथाएँ

दक्षिण भारत में दुर्गा आरती की परंपराएँ और अनुष्ठान उत्तर भारत से थोड़े भिन्न होते हैं। यहाँ पर माँ दुर्गा की पूजा देवी पार्वती के रूप में की जाती है, और आरती के समय विशेष मंत्रों और श्लोकों का उच्चारण किया जाता है। दक्षिण भारत में दुर्गा आरती के दौरान तेल के दीयों का विशेष महत्व होता है, जो घरों और मंदिरों को रोशन करते हैं।

पूर्वी और पश्चिमी भारत: क्षेत्रीय भिन्नताएँ

पूर्वी और पश्चिमी भारत में भी दुर्गा आरती के अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं। पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान दुर्गा आरती का आयोजन विशेष रूप से किया जाता है, जहाँ माँ दुर्गा की महिमा का गुणगान किया जाता है। वहीं, महाराष्ट्र और गुजरात में भी दुर्गा आरती का आयोजन नवरात्रि के दौरान बड़े धूमधाम से किया जाता है, जिसमें गरबा और डांडिया नृत्य का भी आयोजन किया जाता है।


दुर्गा आरती कैसे सीखें

ऑनलाइन संसाधन और ऐप्स

आजकल कई ऑनलाइन संसाधन और ऐप्स उपलब्ध हैं, जिनके माध्यम से भक्त दुर्गा आरती को आसानी से सीख सकते हैं। इन ऐप्स में दुर्गा आरती के श्लोक, भजन, और धुनें उपलब्ध होती हैं, जिन्हें सुनकर और अभ्यास करके भक्त आरती को सही तरीके से गाना सीख सकते हैं।

गुरु या आध्यात्मिक शिक्षक से सीखना

दुर्गा आरती को सीखने का सबसे अच्छा तरीका है गुरु या आध्यात्मिक शिक्षक से सीखना। गुरु के मार्गदर्शन में भक्त आरती के श्लोकों और भजनों का सही उच्चारण और गान सीख सकते हैं। गुरु की शिक्षाओं से भक्त आरती को अधिक भक्ति और श्रद्धा के साथ गाने की कला को समझ सकते हैं।

सामुदायिक कक्षाएँ और मंदिर सत्र

सामुदायिक कक्षाओं और मंदिर सत्रों के माध्यम से भी दुर्गा आरती को सीखा जा सकता है। इन कक्षाओं में अनुभवी शिक्षक आरती की विधि और श्लोकों का अभ्यास कराते हैं। इसके अलावा, मंदिरों में भी विशेष सत्रों का आयोजन किया जाता है, जहाँ भक्त एक साथ मिलकर आरती का अभ्यास करते हैं और एक-दूसरे से सीखते हैं।


दुर्गा आरती के बारे में भ्रांतियाँ और मिथक

सामान्य गलतफहमियाँ

दुर्गा आरती के बारे में कुछ सामान्य गलतफहमियाँ होती हैं, जैसे कि आरती के समय का गलत चयन, श्लोकों का गलत उच्चारण, और अनुष्ठानों में भूलें करना। इन गलतफहमियों के कारण भक्त आरती का पूर्ण लाभ नहीं उठा पाते हैं।

मिथकों के पीछे की सच्चाई

दुर्गा आरती के बारे में कुछ मिथक भी प्रचलित हैं, जैसे कि आरती केवल विशेष अवसरों पर ही की जानी चाहिए, या कि इसे केवल मंदिरों में ही किया जाना चाहिए। लेकिन वास्तविकता यह है कि दुर्गा आरती को किसी भी समय और किसी भी स्थान पर किया जा सकता है, चाहे वह घर हो या मंदिर।

भक्तों के लिए संदेहों का निराकरण

दुर्गा आरती के बारे में भक्तों के मन में उत्पन्न होने वाले संदेहों को दूर करना आवश्यक है। भक्तों को आरती के महत्व, विधि, और लाभों के बारे में सही जानकारी दी जानी चाहिए, जिससे वे इस पवित्र अनुष्ठान का पूर्ण लाभ उठा सकें और अपनी भक्ति को और अधिक गहरा कर सकें।


माता की आरती कैसे करनी चाहिए?

माता की आरती करना एक विशेष धार्मिक अनुष्ठान है, जो भक्तों को मां की कृपा प्राप्त करने का एक माध्यम प्रदान करता है। आरती करने का सही तरीका जानना महत्वपूर्ण है। सबसे पहले, शुद्ध मन और पवित्र वातावरण का ध्यान रखना चाहिए। आरती के लिए आवश्यक सामग्री में धूप, दीपक, फूल, और कपूर शामिल होते हैं।

आरती से पहले मां दुर्गा की प्रतिमा या चित्र को साफ और सुसज्जित करना चाहिए। एक थाली में दीपक रखें, जिसमें घी या तेल भरा हो, और उसमें एक या पांच बत्तियां लगाएं। दीपक को जलाकर मां के समक्ष रखें। इसके साथ ही, फूलों और कपूर को भी तैयार रखें।

आरती की शुरुआत करते समय मां के समक्ष धूप जलाएं और उसे सभी दिशाओं में घुमाएं। इसके बाद दीपक उठाकर मां के चरणों में घुमाएं। यह प्रक्रिया कम से कम तीन बार करें। आरती के दौरान मां की स्तुति में गाए जाने वाले गीतों या मंत्रों का उच्चारण करें।

आरती समाप्त होने के बाद, दीपक को सभी उपस्थित लोगों के पास ले जाकर उन्हें आरती दिखाएं और उनके सिर के ऊपर घुमाएं। अंत में, कपूर जलाएं और मां को समर्पित करें। आरती के बाद सभी भक्तों को प्रसाद वितरण करें। यह पूरी प्रक्रिया भक्तिभाव से करें, जिससे मां की कृपा प्राप्त हो सके।

मां दुर्गा का महामंत्र कौन सा है?

मां दुर्गा का महामंत्र ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे’ है। इस महामंत्र का उच्चारण अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है और यह विभिन्न संकटों से मुक्ति दिलाने वाला है। इस मंत्र का प्रयोग विशेष रूप से मां दुर्गा की उपासना के दौरान किया जाता है।

इस महामंत्र का जप करने से मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक शुद्धि प्राप्त होती है। यह मंत्र देवी की आंतरिक शक्तियों को जागृत करता है और साधक को आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है। इसका नियमित जप करने से मां दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है और जीवन के सभी संकट दूर होते हैं।

महामंत्र का उच्चारण करते समय मन और शरीर को शुद्ध और शांत रखना चाहिए। बैठने के लिए एक स्वच्छ स्थान चुनें और अपने मन को मां दुर्गा की ध्यान में केंद्रित करें। मंत्र का उच्चारण धीरे-धीरे और ध्यानपूर्वक करें।

इसके अलावा, इस महामंत्र का जप विशेष रूप से नवरात्रि के समय किया जाता है, जब मां दुर्गा की पूजा और उपासना का विशेष महत्व होता है। नवरात्रि के नौ दिनों में इस मंत्र का 108 बार जप करने से देवी की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है।

महामंत्र का जप प्रातःकाल या संध्याकाल में करना श्रेष्ठ माना गया है। इसका प्रभाव तब और अधिक होता है जब इसे सच्चे हृदय से, पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ किया जाता है।

दुर्गा माता का मूल मंत्र क्या है?

दुर्गा माता का मूल मंत्र ‘ॐ दुं दुर्गायै नमः’ है। यह मंत्र बहुत ही प्रभावशाली और शक्तिशाली माना जाता है। इस मंत्र का उच्चारण करने से मां दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है और साधक को सभी प्रकार के भय, कष्ट और बाधाओं से मुक्ति मिलती है।

इस मंत्र का प्रयोग विशेष रूप से दुर्गा पूजा, नवरात्रि या किसी विशेष साधना के दौरान किया जाता है। मंत्र का जप करने से व्यक्ति के अंदर आत्मबल और साहस का संचार होता है। यह मंत्र मां दुर्गा की शक्ति और ऊर्जा को जागृत करता है और जीवन के सभी संकटों को दूर करता है।

इस मूल मंत्र का उच्चारण करने के लिए साधक को शुद्ध मन और ध्यान की आवश्यकता होती है। एकांत स्थान में बैठकर, आंखें बंद करके, मन को शांत कर इस मंत्र का जप करना चाहिए। इस मंत्र का 108 बार जप करने से साधक को विशेष फल की प्राप्ति होती है।

यह मंत्र न केवल साधक की आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होता है, बल्कि उसकी मानसिक और शारीरिक स्थिति को भी सुदृढ़ करता है। इस मंत्र का नियमित जप करने से साधक को मां दुर्गा की असीम कृपा प्राप्त होती है और उसके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।

दुर्गा मां के लिए प्रार्थना कैसे करें?

दुर्गा मां के लिए प्रार्थना करने के लिए साधक को शुद्ध मन, पवित्र भाव और सच्ची श्रद्धा की आवश्यकता होती है। प्रार्थना का समय प्रातःकाल या संध्याकाल में सर्वश्रेष्ठ होता है, जब वातावरण शुद्ध और शांत होता है।

प्रार्थना करने से पहले साधक को स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए। इसके बाद मां दुर्गा की प्रतिमा या चित्र के समक्ष दीपक जलाकर, हाथ जोड़कर प्रार्थना आरंभ करें। प्रार्थना के दौरान मां के विभिन्न नामों और उनके गुणों का स्मरण करें।

प्रार्थना का प्रारंभ मां के किसी भी स्तुति गीत या श्लोक से किया जा सकता है। इसके बाद ‘ॐ दुं दुर्गायै नमः’ या ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे’ जैसे मंत्रों का जप करें। प्रार्थना करते समय मां के चरणों में समर्पित होकर, उनके सामने अपने मन की व्यथा और इच्छाओं को व्यक्त करें।

प्रार्थना का समापन मां की आरती और पुष्प अर्पण से करें। अंत में, मां से अपने और अपने परिवार के कल्याण की कामना करें। प्रार्थना के दौरान मन में शांति और श्रद्धा का भाव बनाए रखें, जिससे मां दुर्गा की कृपा शीघ्र प्राप्त हो सके।

आरती करते समय क्या बोलना चाहिए?

आरती करते समय मां की स्तुति में विभिन्न श्लोक, मंत्र और आरती गीतों का उच्चारण किया जाता है। आरती के दौरान साधक को अपने मन और विचारों को मां दुर्गा की ओर केंद्रित करना चाहिए और उनका गुणगान करना चाहिए।

आरती के दौरान ‘जय अम्बे गौरी’ या ‘जय मां दुर्गे’ जैसे आरती गीतों का गान किया जाता है। इसके साथ ही, ‘ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी’ जैसे श्लोकों का भी पाठ किया जा सकता है। इन गीतों और श्लोकों के माध्यम से मां दुर्गा के विभिन्न रूपों, उनके शक्तियों और उनके अनुग्रह का वर्णन किया जाता है।

आरती के दौरान साधक को दीपक लेकर मां की प्रतिमा के चारों ओर घुमाना चाहिए और उनके चरणों में अपनी भक्ति अर्पित करनी चाहिए। इसके अलावा, आरती के समय ‘ॐ दुं दुर्गायै नमः’ जैसे मंत्रों का भी उच्चारण किया जा सकता है।

आरती समाप्त होने पर सभी उपस्थित भक्तों के पास दीपक ले जाकर उन्हें आरती दिखाना चाहिए और उनके सिर के ऊपर घुमाना चाहिए। आरती के अंत में, सभी भक्तों को प्रसाद वितरित करें और मां से अपने कल्याण की प्रार्थना करें। आरती का पूरा अनुष्ठान भक्तिभाव और श्रद्धा से सम्पन्न करें।

आरती के पहले कौन सा मंत्र बोलना चाहिए?

आरती से पहले किसी मंत्र का उच्चारण करना आवश्यक होता है, जिससे कि आरती का प्रभाव अधिक हो और मां दुर्गा की कृपा शीघ्र प्राप्त हो सके। आरती से पहले बोले जाने वाले मंत्र का चुनाव भक्त की श्रद्धा और मां दुर्गा के प्रति उसकी आस्था पर निर्भर करता है।

साधारणत: आरती से पहले ‘ॐ दुं दुर्गायै नमः’ या ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे’ जैसे मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। ये मंत्र मां दुर्गा की शक्ति और कृपा को जागृत करने के लिए अत्यंत प्रभावशाली माने जाते हैं।

मंत्र का उच्चारण करते समय साधक को मन, वचन और कर्म से शुद्ध होना चाहिए। मंत्र का जप एकांत और शांत वातावरण में करना चाहिए, जिससे साधक का ध्यान पूर्णतः मां दुर्गा पर केंद्रित हो सके। मंत्र का जप करने से पहले साधक को स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए।

आरती से पहले मंत्र जप करते समय मां दुर्गा की प्रतिमा या चित्र के समक्ष दीपक जलाकर, हाथ जोड़कर बैठना चाहिए। मंत्र का उच्चारण धीमी गति से, ध्यानपूर्वक और सच्चे हृदय से करें। मंत्र का कम से कम 108 बार जप करना उचित माना जाता है।

इस प्रक्रिया के बाद आरती आरंभ करें और मां दुर्गा के समक्ष अपनी भक्ति अर्पित करें। आरती समाप्त होने के बाद सभी उपस्थित भक्तों के साथ प्रसाद वितरण करें और मां से अपने और अपने परिवार के कल्याण की कामना करें।

खाटू श्याम चालीसा (Khatu Shyam Chalisa PDF)

खाटू श्याम जी (Khatu Shyam Chalisa), जिन्हें श्री श्याम बाबा के नाम से भी जाना जाता है, उनके भक्तों के लिए प्रेरणा और आशा का स्तंभ हैं। खाटू श्याम जी को भगवान श्रीकृष्ण का कलियुग अवतार माना जाता है और उनकी भक्ति से सभी दुख और कष्ट दूर हो जाते हैं। खाटू श्याम जी की चालीसा में उनकी महिमा, लीलाओं और गुणों का वर्णन किया गया है, जो भक्तों के मन में श्रद्धा और भक्ति का संचार करता है।

खाटू श्याम चालीसा का पाठ करने से जीवन में सुख-समृद्धि, शांति और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। आइए, हम सभी श्रद्धापूर्वक खाटू श्याम जी की चालीसा का पाठ करें और उनकी असीम कृपा प्राप्त करें।


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|| खाटू श्याम चालीसा ||

॥ दोहा॥
श्री गुरु चरणन ध्यान धर,
सुमीर सच्चिदानंद ।
श्याम चालीसा भजत हूँ,
रच चौपाई छंद ।

॥ चौपाई ॥
श्याम-श्याम भजि बारंबारा ।
सहज ही हो भवसागर पारा ॥

इन सम देव न दूजा कोई ।
दिन दयालु न दाता होई ॥

भीम सुपुत्र अहिलावाती जाया ।
कही भीम का पौत्र कहलाया ॥

यह सब कथा कही कल्पांतर ।
तनिक न मानो इसमें अंतर ॥

बर्बरीक विष्णु अवतारा ।
भक्तन हेतु मनुज तन धारा ॥

बासुदेव देवकी प्यारे ।
जसुमति मैया नंद दुलारे ॥

मधुसूदन गोपाल मुरारी ।
वृजकिशोर गोवर्धन धारी ॥

सियाराम श्री हरि गोबिंदा ।
दिनपाल श्री बाल मुकुंदा ॥

दामोदर रण छोड़ बिहारी ।
नाथ द्वारिकाधीश खरारी ॥

राधाबल्लभ रुक्मणि कंता ।
गोपी बल्लभ कंस हनंता ॥ 10

मनमोहन चित चोर कहाए ।
माखन चोरि-चारि कर खाए ॥

मुरलीधर यदुपति घनश्यामा ।
कृष्ण पतित पावन अभिरामा ॥

मायापति लक्ष्मीपति ईशा ।
पुरुषोत्तम केशव जगदीशा ॥

विश्वपति जय भुवन पसारा ।
दीनबंधु भक्तन रखवारा ॥

प्रभु का भेद न कोई पाया ।
शेष महेश थके मुनिराया ॥

नारद शारद ऋषि योगिंदरर ।
श्याम-श्याम सब रटत निरंतर ॥

कवि कोदी करी कनन गिनंता ।
नाम अपार अथाह अनंता ॥

हर सृष्टी हर सुग में भाई ।
ये अवतार भक्त सुखदाई ॥

ह्रदय माहि करि देखु विचारा ।
श्याम भजे तो हो निस्तारा ॥

कौर पढ़ावत गणिका तारी ।
भीलनी की भक्ति बलिहारी ॥ 20

सती अहिल्या गौतम नारी ।
भई श्रापवश शिला दुलारी ॥

श्याम चरण रज चित लाई ।
पहुंची पति लोक में जाही ॥

अजामिल अरु सदन कसाई ।
नाम प्रताप परम गति पाई ॥

जाके श्याम नाम अधारा ।
सुख लहहि दुःख दूर हो सारा ॥

श्याम सलोवन है अति सुंदर ।
मोर मुकुट सिर तन पीतांबर ॥

गले बैजंती माल सुहाई ।
छवि अनूप भक्तन मान भाई ॥

श्याम-श्याम सुमिरहु दिन-राती ।
श्याम दुपहरि कर परभाती ॥

श्याम सारथी जिस रथ के ।
रोड़े दूर होए उस पथ के ॥

श्याम भक्त न कही पर हारा ।
भीर परि तब श्याम पुकारा ॥

रसना श्याम नाम रस पी ले ।
जी ले श्याम नाम के ही ले ॥ 30

संसारी सुख भोग मिलेगा ।
अंत श्याम सुख योग मिलेगा ॥

श्याम प्रभु हैं तन के काले ।
मन के गोरे भोले-भाले ॥

श्याम संत भक्तन हितकारी ।
रोग-दोष अध नाशे भारी ॥

प्रेम सहित जब नाम पुकारा ।
भक्त लगत श्याम को प्यारा ॥

खाटू में हैं मथुरावासी ।
पारब्रह्म पूर्ण अविनाशी ॥

सुधा तान भरि मुरली बजाई ।
चहु दिशि जहां सुनी पाई ॥

वृद्ध-बाल जेते नारि नर ।
मुग्ध भये सुनि बंशी स्वर ॥

हड़बड़ कर सब पहुंचे जाई ।
खाटू में जहां श्याम कन्हाई ॥

जिसने श्याम स्वरूप निहारा ।
भव भय से पाया छुटकारा ॥

॥ दोहा ॥
श्याम सलोने संवारे,
बर्बरीक तनुधार ।
इच्छा पूर्ण भक्त की,
करो न लाओ बार


॥ इति श्री खाटू श्याम चालीसा ॥

|| Khatu Shyam Chalisa PDF ||

॥ Doha ॥
shree guru charan dhyaan dhar,
sumeer sachchidaanand ॥
shyaam chaaleesa bhajat hoon,
raach chaupaee chhand ॥

॥ Chaupaee ॥
shyaam-shyaam bhajee baarambaara ॥
sahaj hee ho bhavasaagar paara ॥

in sam dev na dooja koee ॥
din dayaalu na daata hoee ॥

bheem suputr ahilavatee jay ॥
kahi bheem ka putr kahalaaya ॥

yah sab katha kahee kalpaantar ॥
tanik na maano isamen antar ॥

harabeek vishnu avataar ॥
bhaktan vikaas manuj tan dhaara ॥

baasudev devakee priy ॥
jasumati maiya nand dulaare ॥

madhusoodan gopaal muraaree ॥
vrjakishor govardhan dhaaree ॥

siyaaraam shree hari govinda ॥
dinapaal shree baal mukund ॥

daamodar ran ne bihaaree ko chhod diya ॥
naath dvaarika kharee ॥

raadhaakrshn rukmanee kaanta ॥
gopee varsh kans hananta ॥ 10 ॥

manamohan chit chor kahae ॥
maakhan choree-chaaree kar ॥

muraleedhar yadupatia ॥
krshn patit paavan abhiraama ॥

maayaapati lakshmeepati eesha ॥
sarvottam keshav jagadeesha ॥

vishvapati jay bhuvan pasaara ॥
deenabandhu bhaktan rakhavaara ॥

prabhu ka bhed na paaya ॥
shesh mahesh thake muniraaya ॥

naarad sharad rshi yogindar ॥
shyaam-shyaam sab ratat nirantar ॥

kavi kodi karee kannan ginanta ॥
naam apaar athaah ananta ॥

har srshti har sug mein bhaee ॥
ye avataar bhakt sukhadaee ॥

hari maahi kari dekhu vichaara ॥
shyaam bhaje to ho nistaara ॥

kaur paavat ganika taaree ॥
bheelanee kee bhakti balihaaree ॥20 ॥

satee ahilya gautam naaree ॥
bhee shraapavash shila dulaaree ॥

shyaam charan raj chit lai ॥
avalokan pati lok mein jaahee ॥

ajaamil aru sadan kasaee ॥
naam prataap param gati paee ॥

jaake shyaam naam adhaara ॥
sukh lahahi duhkh door ho saara ॥

shyaam salovan ati sundar hai ॥
mor mukut sir tan peetaambar ॥

gale bajantee maal suhaee ॥
chhavi anupam bhaktan man bhaee ॥

shyaam-shyaam sumirahu din-rati ॥
shyaam dupaharee kar prabhaatee ॥

shyaam saarathee jis rath ke ॥
rode door hoe us path ke ॥

shyaam bhakt na kahi par haara ॥
phir bhee paree tab shyaam pukaara ॥

rasana shyaam naam ras pee le ॥
jee le shyaam naam ke hee le ॥ 30 ॥

sansaaree sukh bhog milega ॥
ant shyaam sukh yog milega ॥

shyaam prabhu hain tan ke kaale ॥
man ke gore bhole-bhaale ॥

shyaam sant bhaktan hitakaaree ॥
rog-dosh adh naashe bhaaree ॥

prem jab naam sahit pukaara ॥
bhakt lagat shyaam ko pyaara ॥

khaatoo mein hain mathuraavaasee ॥
paarabrahm poorn agyaanee ॥

sudha taan bhaaree muralee bajaee ॥
chahu dishi jahaan seeta paee ॥

vrddh-baal jete naaree nar ॥
mugdha bhaye suni banshee svar ॥

hadab kar poore amerika mein ॥
khaatoo mein jahaan shyaam kanhaee ॥

jo shyaam svaroop nihaara ॥
bhav bhay se dhoondha ॥

॥ Doha ॥
shyaam salone saanvare,
harbik tanudhaar ॥
ichchha poorn bhakt kee,
karo na lao baar

॥ iti shree khaatoo shyaam chaaleesa ॥


श्री खाटू श्याम जी की पूजा विधि अत्यंत सरल और भक्तिमय होती है। खाटू श्याम जी को भगवान श्रीकृष्ण का अवतार माना जाता है, और इन्हें प्रेम, भक्ति और श्रद्धा से पूजा जाता है। आइए, उनकी पूजा विधि को विस्तार से समझें:

1. शुद्धिकरण (Purification):

पूजा की शुरुआत शुद्धिकरण से होती है, जो मानसिक और शारीरिक पवित्रता को सुनिश्चित करता है। भक्त को सबसे पहले अपने हाथ-पैर धोने चाहिए और स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। पूजा स्थल की सफाई भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसे गंगाजल से पवित्र किया जाता है। शुद्धिकरण का उद्देश्य यह है कि हम अपने मन, शरीर और वातावरण को पवित्र बनाकर भगवान के सामने उपस्थित हों।

जब हमारा मन और शरीर शुद्ध होता है, तो हम भगवान के प्रति अपनी भक्ति और समर्पण को और भी गहराई से व्यक्त कर सकते हैं। यह प्रक्रिया हमें अज्ञान और पापों से मुक्त करके आत्मिक शांति प्रदान करती है। शुद्धिकरण के बाद ही हम पूजा की अन्य विधियों को पूरे मनोयोग से संपन्न कर पाते हैं, जिससे भगवान की कृपा प्राप्त होती है।

2. पूजा सामग्री (Pooja Materials):

पूजा सामग्री का चयन और तैयारी पूजा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो भक्ति और समर्पण को प्रकट करता है। श्री खाटू श्याम जी की पूजा के लिए विशेष सामग्री की आवश्यकता होती है, जैसे प्रतिमा या तस्वीर, सफेद वस्त्र, चंदन, रोली, पुष्प, धूप, दीप, पंचामृत, तुलसी पत्ता, और प्रसाद। इन सामग्रियों का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व होता है।

उदाहरण के लिए, सफेद वस्त्र श्याम बाबा को विशेष प्रिय होता है और पंचामृत का उपयोग भगवान को स्नान कराने के लिए किया जाता है। हर सामग्री का चयन इस ध्यान से किया जाता है कि वह भगवान के प्रति हमारी भक्ति और श्रद्धा को प्रकट कर सके। यह सामग्री न केवल पूजा की शुद्धता और पवित्रता को बढ़ाती है, बल्कि भगवान के प्रति हमारी आस्था और समर्पण को भी दर्शाती है।

3. आसन ग्रहण करें (Take a Seat):

पूजा करते समय आसन ग्रहण करना बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसे शुद्धता और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। भक्त को साफ और पवित्र आसन पर बैठना चाहिए, जो कि आमतौर पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होता है। दिशा का चयन धार्मिक मान्यताओं के आधार पर किया जाता है, जो भगवान के प्रति भक्त की एकाग्रता और समर्पण को बढ़ाता है।

आसन ग्रहण करने का उद्देश्य यह है कि पूजा के दौरान मन और शरीर स्थिर रहे, जिससे ध्यान में कोई विघ्न न आए। आसन पर बैठकर पूजा करने से भगवान के प्रति हमारे श्रद्धा और भक्ति का संचार होता है, जिससे हमें उनकी कृपा प्राप्त होती है। यह आसन भक्त और भगवान के बीच एक पुल की तरह कार्य करता है, जो हमें भगवान के निकट लाता है।

4. दीप प्रज्वलित करें (Light the Lamp):

दीप प्रज्वलन पूजा का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो अज्ञान के अंधकार को दूर करने और ज्ञान के प्रकाश को फैलाने का प्रतीक है। दीपक का प्रकाश भगवान के प्रति हमारी श्रद्धा और भक्ति को प्रकट करता है। पूजा प्रारंभ करते समय सबसे पहले दीपक जलाया जाता है, जिसे भगवान के समक्ष समर्पित किया जाता है।

यह दीपक भगवान की दिव्य उपस्थिति का प्रतीक है और हमें अपने जीवन में मार्गदर्शन प्राप्त करने में मदद करता है। दीपक जलाने का अर्थ है कि हम अपने मन और आत्मा को भगवान के चरणों में समर्पित कर रहे हैं, ताकि हमारे जीवन में ज्ञान और पवित्रता का प्रकाश फैले। दीप प्रज्वलन के माध्यम से हम भगवान से प्रार्थना करते हैं कि वे हमारे जीवन में सदैव मार्गदर्शक बनकर रहें।

5. आचमन (Achman):

आचमन पूजा की शुरुआत में की जाने वाली एक पवित्र क्रिया है, जिसमें तीन बार जल ग्रहण कर उसे पीया जाता है। इसका उद्देश्य हमारे शरीर और मन को पवित्र करना है, ताकि हम भगवान की पूजा शुद्धता और श्रद्धा के साथ कर सकें। आचमन करते समय मंत्रों का उच्चारण भी किया जाता है, जिससे इस क्रिया की पवित्रता और भी बढ़ जाती है।

यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जो हमें मानसिक और शारीरिक शुद्धि की अनुभूति कराती है, जिससे हम भगवान के समक्ष पवित्र और स्वच्छ होकर उपस्थित होते हैं। आचमन का धार्मिक महत्व भी है, क्योंकि इसे आत्मा और शरीर के शुद्धिकरण का प्रतीक माना जाता है। आचमन के बाद ही पूजा की अन्य विधियों को संपन्न किया जाता है, जिससे भगवान की कृपा प्राप्त होती है।

6. संकल्प (Sankalp):

संकल्प पूजा का एक महत्वपूर्ण चरण है, जिसमें भक्त पूजा की विधि को पूर्ण करने का संकल्प लेता है। यह क्रिया पूजा की दिशा और उद्देश्य को निर्धारित करती है। संकल्प करते समय, भक्त अपने हाथ में चावल, फूल, और जल लेकर भगवान से प्रार्थना करता है कि वह उनकी पूजा को स्वीकार करें और अपनी कृपा प्रदान करें।

संकल्प का उद्देश्य यह है कि पूजा की हर क्रिया भगवान के प्रति समर्पित हो और भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए ईश्वर से आशीर्वाद प्राप्त करे। संकल्प करने से पूजा में एकाग्रता और श्रद्धा बनी रहती है, जिससे भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह चरण हमें भगवान के प्रति अपने समर्पण और भक्ति को प्रकट करने का अवसर देता है।

7. ध्यान (Meditation):

ध्यान पूजा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण चरण है, जिसमें भक्त अपने मन और आत्मा को भगवान के प्रति समर्पित करता है। ध्यान के माध्यम से भक्त भगवान की छवि को अपने मन में बसाता है और उनसे आत्मिक संबंध स्थापित करता है। यह क्रिया मानसिक शांति और आत्मिक शुद्धि प्रदान करती है, जिससे भक्त अपने जीवन में भगवान की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त कर सकता है।

ध्यान के समय भगवान के नाम का स्मरण और मंत्रों का उच्चारण किया जाता है, जो ध्यान को और भी प्रभावी बनाता है। ध्यान के माध्यम से हम भगवान की उपस्थिति का अनुभव कर सकते हैं और उनसे अपने जीवन के मार्गदर्शन के लिए प्रार्थना कर सकते हैं। यह चरण हमें भगवान के साथ आत्मिक स्तर पर जोड़ता है।

8. आवाहन (Invocation):

आवाहन पूजा की एक महत्वपूर्ण विधि है, जिसमें भक्त भगवान को अपनी पूजा में उपस्थित होने का निमंत्रण देता है। यह क्रिया भगवान की कृपा प्राप्त करने और उनकी उपस्थिति का अनुभव करने के लिए की जाती है। आवाहन के समय “ॐ खाटू श्यामाय नमः” का उच्चारण करते हुए भगवान का आह्वान किया जाता है।

यह मंत्र भगवान को हमारी पूजा में साक्षी बनने के लिए आमंत्रित करता है और उनकी कृपा प्राप्त करने का माध्यम बनता है। आवाहन का उद्देश्य यह है कि भगवान हमारे समक्ष उपस्थित होकर हमारी पूजा को स्वीकार करें और हमें आशीर्वाद प्रदान करें। यह विधि भगवान और भक्त के बीच एक आत्मिक संबंध स्थापित करती है, जिससे भगवान की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है।

9. अभिषेक (Abhishek):

अभिषेक पूजा का एक प्रमुख अंग है, जिसमें भगवान को पंचामृत और गंगाजल से स्नान कराया जाता है। पंचामृत, जो दूध, दही, घी, शहद, और शक्कर से बना होता है, का उपयोग भगवान को शुद्धता और पवित्रता का अनुभव कराने के लिए किया जाता है। अभिषेक के बाद गंगाजल से भगवान को स्नान कराकर उन्हें पवित्र किया जाता है।

इस क्रिया का उद्देश्य भगवान की पूजा को शुद्ध और पवित्र बनाना है, जिससे उनकी कृपा प्राप्त हो सके। अभिषेक के दौरान भक्त भगवान के प्रति अपनी भक्ति और समर्पण को प्रकट करता है, जिससे भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह विधि भक्त के मन और आत्मा को भगवान के प्रति समर्पित करती है।

10. वस्त्र और आभूषण (Clothing and Ornaments):

भगवान खाटू श्याम जी की पूजा में उन्हें वस्त्र और आभूषण अर्पित करना भक्त के समर्पण और श्रद्धा का प्रतीक है। सफेद वस्त्र और माला अर्पित करना श्याम बाबा को विशेष प्रिय है, क्योंकि यह रंग उनकी शांति और करुणा का प्रतीक माना जाता है। आभूषणों का अर्पण भगवान की दिव्यता और भव्यता को प्रकट करता है।

यह विधि भगवान को सजाने और उन्हें सम्मानित करने का माध्यम है, जिससे भक्त उनकी कृपा और आशीर्वाद प्राप्त कर सकता है। वस्त्र और आभूषण अर्पित करने का उद्देश्य भगवान को प्रसन्न करना और उनकी दिव्य उपस्थिति का अनुभव करना है। यह क्रिया भगवान के प्रति हमारी भक्ति और समर्पण को और भी गहरा बनाती है।

11. चंदन और रोली (Sandalwood and Vermillion):

चंदन और रोली का तिलक भगवान को अर्पित करना पूजा की एक महत्वपूर्ण विधि है, जो शुद्धता, भक्ति और श्रद्धा का प्रतीक है। तिलक लगाने से भगवान के प्रति भक्त की आस्था और समर्पण प्रकट होता है। चंदन की सुगंध और ठंडक भगवान को प्रसन्न करती है और उन्हें शांति का अनुभव कराती है, जबकि रोली का तिलक भक्त और भगवान के बीच के पवित्र संबंध को दर्शाता है।

यह क्रिया भगवान के प्रति हमारी भक्ति और श्रद्धा को और भी मजबूत बनाती है, जिससे हमें उनकी कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है। तिलक लगाने का उद्देश्य भगवान को सम्मानित करना और उनकी दिव्यता का अनुभव करना है।

12. पुष्प अर्पण (Offering Flowers):

पुष्प अर्पण भगवान के प्रति हमारी भक्ति और समर्पण को प्रकट करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। भगवान खाटू श्याम जी को सफेद, पीले और लाल फूल विशेष प्रिय हैं, जिन्हें अर्पित करके हम उनकी कृपा प्राप्त कर सकते हैं। फूलों की माला और पुष्पों का अर्पण भगवान के चरणों में श्रद्धा और प्रेम के साथ किया जाता है, जो भगवान को प्रसन्न करता है।

पुष्पों का सुगंधित और पवित्र वातावरण भगवान की उपस्थिति को और भी दिव्य बना देता है। यह क्रिया भक्त के मन की पवित्रता और भगवान के प्रति उसकी श्रद्धा को प्रकट करती है, जिससे भगवान की कृपा प्राप्त होती है। पुष्प अर्पण का उद्देश्य भगवान को प्रसन्न करना और उनकी दिव्यता का अनुभव करना है।

13. धूप और दीप (Incense and Lamp):

धूप और दीप भगवान की पूजा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो भक्त के मन और आत्मा को शुद्ध करने और भगवान के प्रति उसकी श्रद्धा को प्रकट करने का माध्यम हैं। धूप जलाने से वातावरण पवित्र होता है और भगवान की उपस्थिति को महसूस किया जा सकता है। दीपक का प्रकाश अज्ञान के अंधकार को दूर करता है और ज्ञान का प्रकाश फैलाता है।

धूप और दीप की सुगंध और प्रकाश भगवान के प्रति हमारी आस्था और समर्पण को बढ़ाते हैं। यह विधि भगवान को सम्मानित करने और उनकी कृपा प्राप्त करने का माध्यम है। धूप और दीप की पूजा के माध्यम से हम भगवान से अपने जीवन में शांति, समृद्धि, और सुख की प्रार्थना करते हैं।

14. प्रसाद अर्पण (Offering Prasad):

प्रसाद अर्पण भगवान के प्रति भक्ति और श्रद्धा का प्रतीक है, जिसे पूजा के बाद भक्तों के बीच बांटा जाता है। भगवान खाटू श्याम जी को विशेष रूप से गुड़ और चूरमा का भोग अर्पित किया जाता है, जो उन्हें प्रिय है। प्रसाद का अर्पण भगवान के प्रति हमारी समर्पण और भक्ति को प्रकट करता है।

प्रसाद में भगवान की कृपा होती है, जिसे ग्रहण करने से भक्त को आशीर्वाद और सुख की प्राप्ति होती है। यह विधि भगवान के प्रति हमारी आस्था और श्रद्धा को और भी मजबूत बनाती है। प्रसाद अर्पण का उद्देश्य भगवान को प्रसन्न करना और उनकी कृपा प्राप्त करना है, जिससे हमारा जीवन सुखमय और समृद्ध बन सके।

15. आरती (Aarti):

आरती पूजा का एक महत्वपूर्ण और हृदयस्पर्शी भाग है, जिसमें दीपक जलाकर भगवान की स्तुति की जाती है। श्री खाटू श्याम जी की आरती “ॐ जय श्री श्याम हरे” जैसे मंत्रों के साथ की जाती है। आरती के समय घंटी बजाना और शंख की ध्वनि करना वातावरण को और भी पवित्र बनाता है।

आरती के माध्यम से हम भगवान से अपने जीवन के हर क्षेत्र में मार्गदर्शन और कृपा की प्रार्थना करते हैं। यह विधि भगवान के प्रति हमारी श्रद्धा और समर्पण को प्रकट करती है और हमें उनकी उपस्थिति का अनुभव कराती है। आरती के समय भक्तगण भी भगवान की स्तुति में शामिल होते हैं, जिससे सामूहिक भक्ति का अनुभव होता है।

16. प्रदक्षिणा (Circumambulation):

प्रदक्षिणा भगवान की प्रतिमा या मंदिर की परिक्रमा करने की एक पवित्र विधि है, जिसे आरती के बाद किया जाता है। इस क्रिया का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है, जो भगवान के प्रति भक्त की श्रद्धा और समर्पण को दर्शाता है। प्रदक्षिणा करते समय भगवान के मंत्रों का उच्चारण किया जाता है और भक्तगण तीन बार परिक्रमा करते हैं।

यह क्रिया भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण और उनकी कृपा प्राप्त करने का प्रतीक है। प्रदक्षिणा से भक्त को आत्मिक शांति, समृद्धि, और भगवान की कृपा प्राप्त होती है। यह विधि भगवान और भक्त के बीच एक पवित्र संबंध स्थापित करती है और भक्त को भगवान के निकट लाती है।

17. प्रार्थना और भजन (Prayer and Bhajan):

प्रार्थना और भजन भगवान के प्रति अपनी भक्ति और श्रद्धा को प्रकट करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। पूजा के दौरान भक्तगण भगवान से अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं और श्याम बाबा के भजनों का गायन करते हैं। भजनों के माध्यम से भक्त अपनी भक्ति को प्रकट करता है और भगवान के साथ आत्मिक संबंध स्थापित करता है। प्रार्थना और भजन के समय भगवान के प्रति हमारी आस्था और समर्पण और भी मजबूत हो जाती है।

यह विधि भक्त को आत्मिक शांति, समृद्धि, और भगवान की कृपा प्राप्त करने में सहायक होती है। प्रार्थना और भजन के माध्यम से भगवान के साथ जुड़ने का अनुभव प्राप्त होता है।

18. श्री श्याम चालीसा का पाठ (Shri Shyam Chalisa):

श्याम बाबा की चालीसा का पाठ पूजा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो भक्त को भगवान के प्रति समर्पण और श्रद्धा का अनुभव कराता है। चालीसा का पाठ भगवान की महिमा और उनकी लीलाओं का वर्णन करता है, जिससे भक्त को आत्मिक शांति और भगवान की कृपा प्राप्त होती है। यह विधि भगवान के प्रति हमारी आस्था और समर्पण को और भी गहरा बनाती है।

श्याम चालीसा का पाठ भक्त को भगवान के साथ आत्मिक संबंध स्थापित करने में सहायक होता है और उनके जीवन में मार्गदर्शन प्रदान करता है। चालीसा का पाठ भगवान के प्रति हमारी श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है, जिससे हमें उनकी कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है।

19. प्रसाद वितरण (Distribution of Prasad):

प्रसाद वितरण पूजा का एक महत्वपूर्ण भाग है, जिसमें भगवान को अर्पित प्रसाद भक्तों में बांटा जाता है। प्रसाद को ग्रहण करने से भक्त को भगवान की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह विधि भगवान के प्रति हमारी श्रद्धा और समर्पण को प्रकट करती है और भक्तों के बीच प्रसाद बांटकर सामूहिक भक्ति का अनुभव प्राप्त होता है। प्रसाद वितरण का उद्देश्य भगवान की कृपा को सभी भक्तों तक पहुंचाना है, जिससे उनका जीवन सुखमय और समृद्ध बन सके। यह क्रिया भक्त के मन में भगवान के प्रति आस्था और श्रद्धा को और भी मजबूत बनाती है।

20. शांतिपाठ (Shantipath):

शांतिपाठ पूजा के अंत में किया जाता है, जिसमें “ॐ शांति: शांति: शांति:” का उच्चारण करके भगवान से संसार में शांति, समृद्धि, और सुख की प्रार्थना की जाती है। यह विधि पूजा के समापन का प्रतीक है और भगवान के प्रति हमारी कृतज्ञता को प्रकट करती है। शांतिपाठ के माध्यम से हम भगवान से अपने जीवन में शांति, समृद्धि, और सुख की कामना करते हैं। यह क्रिया भगवान के प्रति हमारे समर्पण और भक्ति को प्रकट करती है और हमें उनके आशीर्वाद और कृपा की प्राप्ति कराती है। शांतिपाठ का उद्देश्य भगवान से अपने जीवन और संसार में शांति और समृद्धि की प्राप्ति करना है।

21. विसर्जन (Immersion):

पूजा के अंत में भगवान की प्रतिमा या तस्वीर का विसर्जन किया जाता है, जिसमें भगवान को प्रणाम करके उनसे अपने जीवन में सदा बने रहने की प्रार्थना की जाती है। विसर्जन का अर्थ है कि भगवान को पूजा में बुलाने के बाद अब उन्हें विदा किया जा रहा है, लेकिन उनके आशीर्वाद और कृपा की कामना की जाती है कि वे हमेशा हमारे जीवन में मार्गदर्शन करते रहें। यह क्रिया भगवान के प्रति हमारी आस्था और श्रद्धा को प्रकट करती है और हमें आत्मिक शांति और समर्पण का अनुभव कराती है। विसर्जन के समय भगवान को प्रणाम करके उनकी कृपा और आशीर्वाद की कामना की जाती है।

22. नम्रता और कृतज्ञता (Humility and Gratitude):

पूजा समाप्त होने पर भगवान का धन्यवाद करें। भगवान से मिले आशीर्वाद के लिए कृतज्ञता व्यक्त करें और जीवन में उनका मार्गदर्शन स्वीकार करें।

इस प्रकार, श्री खाटू श्याम जी की पूजा विधि पूर्ण होती है। इस पूजा के द्वारा भक्तगण अपने जीवन में सुख, शांति, और समृद्धि प्राप्त करते हैं। श्याम बाबा की कृपा से सारे कष्ट दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

श्याम बाबा को सच्चे दिल से याद करने पर वे हर भक्त की पुकार सुनते हैं और उन्हें अपनी कृपा से नवाजते हैं। उनकी पूजा में सबसे महत्वपूर्ण है श्रद्धा, विश्वास और समर्पण।



खाटू श्याम चालीसा के लाभ

1. आध्यात्मिक शांति और मानसिक स्थिरता

खाटू श्याम चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को आध्यात्मिक शांति मिलती है। इसका नियमित पाठ मानसिक तनाव और चिंता को कम करता है। जब व्यक्ति अपने दिन की शुरुआत श्याम बाबा की आराधना से करता है, तो उसे मानसिक शांति और स्थिरता प्राप्त होती है, जिससे दिनभर की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति मिलती है।

2. धार्मिक विश्वास और आस्था में वृद्धि

खाटू श्याम चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के धार्मिक विश्वास और आस्था में वृद्धि होती है। यह चालीसा भगवान श्याम की महिमा का गुणगान करती है, जिससे भक्त का भगवान के प्रति विश्वास मजबूत होता है। आस्था के इस बढ़ावे से व्यक्ति को अपने जीवन की कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति मिलती है।

3. स्वास्थ्य लाभ

आध्यात्मिक और मानसिक शांति के साथ-साथ खाटू श्याम चालीसा का पाठ स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है। नियमित पाठ से व्यक्ति का मानसिक संतुलन बना रहता है, जिससे तनाव संबंधित बीमारियों का जोखिम कम होता है। इसके अलावा, ध्यान और पूजा से शारीरिक स्वास्थ्य भी सुधरता है।

4. समृद्धि और सुख-शांति

खाटू श्याम चालीसा का पाठ घर में समृद्धि और सुख-शांति लाता है। जब घर के सदस्य नियमित रूप से इस चालीसा का पाठ करते हैं, तो परिवार में आपसी प्रेम और समझ बढ़ती है। भगवान श्याम की कृपा से आर्थिक समस्याओं का समाधान होता है और परिवार में खुशहाली बनी रहती है।

5. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

चालीसा का पाठ करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह व्यक्ति को जीवन के हर पहलू में सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने में मदद करता है। सकारात्मक ऊर्जा से भरे व्यक्ति का आत्मविश्वास बढ़ता है और वह अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में अधिक सक्षम होता है।

6. बाधाओं का निवारण

खाटू श्याम चालीसा का पाठ जीवन की बाधाओं को दूर करने में सहायक होता है। भगवान श्याम की आराधना से व्यक्ति के जीवन में आने वाली समस्याओं और चुनौतियों का समाधान होता है। यह चालीसा भक्त को कठिन परिस्थितियों में साहस और धैर्य प्रदान करती है।

7. भय और अशांति से मुक्ति

इस चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को भय और अशांति से मुक्ति मिलती है। भगवान श्याम की कृपा से मन में व्याप्त सभी प्रकार के भय और अनिश्चितताएँ समाप्त होती हैं। इससे व्यक्ति का जीवन शांतिपूर्ण और सुरक्षित बनता है।

8. सकारात्मक विचारों का विकास

खाटू श्याम चालीसा का नियमित पाठ व्यक्ति के मन में सकारात्मक विचारों का विकास करता है। यह चालीसा व्यक्ति को नैतिक और आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनाती है, जिससे उसके विचारों में शुद्धता और सकारात्मकता आती है। सकारात्मक विचार व्यक्ति को सही निर्णय लेने में मदद करते हैं और उसे जीवन में सही दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।

9. कर्म की प्रेरणा

खाटू श्याम चालीसा का पाठ व्यक्ति को अच्छे कर्म करने की प्रेरणा देता है। यह चालीसा भगवान श्याम के महान कार्यों और उनकी दयालुता का वर्णन करती है, जिससे व्यक्ति को सही मार्ग पर चलने और परोपकार के कार्य करने की प्रेरणा मिलती है। इससे व्यक्ति के जीवन में पुण्य और सद्गुणों का संचार होता है।

10. ध्यान और एकाग्रता में वृद्धि

खाटू श्याम चालीसा का पाठ करने से ध्यान और एकाग्रता में वृद्धि होती है। इसका नियमित पाठ व्यक्ति को ध्यान और ध्यान केंद्रित करने में मदद करता है। इससे व्यक्ति के कार्यक्षमता में सुधार होता है और वह अपने कार्यों को अधिक कुशलता से संपन्न कर पाता है।

11. धार्मिक अनुष्ठानों में सहायता

खाटू श्याम चालीसा धार्मिक अनुष्ठानों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसका पाठ धार्मिक आयोजनों, पूजा-पाठ और त्योहारों के समय किया जाता है, जिससे अनुष्ठान का महत्त्व और बढ़ जाता है। इससे भगवान श्याम की कृपा प्राप्त होती है और अनुष्ठान सफलतापूर्वक संपन्न होते हैं।

12. भक्त और भगवान के बीच संबंध की प्रगाढ़ता

खाटू श्याम चालीसा का पाठ भक्त और भगवान के बीच संबंध को और प्रगाढ़ बनाता है। जब भक्त नियमित रूप से इस चालीसा का पाठ करता है, तो उसे भगवान श्याम के प्रति अधिक निकटता और प्रेम का अनुभव होता है। इससे भक्त का भगवान के साथ आध्यात्मिक संबंध मजबूत होता है।

13. सकारात्मक परिवेश का निर्माण

खाटू श्याम चालीसा का पाठ घर और आसपास के वातावरण को सकारात्मक बनाता है। जब व्यक्ति इस चालीसा का पाठ करता है, तो उसके आसपास की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इससे घर का माहौल सुखद और शांतिपूर्ण बना रहता है।

14. आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति

खाटू श्याम चालीसा का पाठ व्यक्ति को आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति में सहायक होता है। यह चालीसा भगवान श्याम की महिमा और उनके दिव्य गुणों का वर्णन करती है, जिससे व्यक्ति को आध्यात्मिक ज्ञान और समझ प्राप्त होती है। इससे व्यक्ति का जीवन में आध्यात्मिक दृष्टिकोण विकसित होता है।

15. जीवन में संतुलन

खाटू श्याम चालीसा का पाठ व्यक्ति को जीवन में संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। यह चालीसा व्यक्ति को अपने जीवन के हर पहलू में संतुलन और सामंजस्य स्थापित करने की प्रेरणा देती है। इससे व्यक्ति का जीवन सुखमय और संतुलित बनता है।

16. भावनात्मक स्थिरता

इस चालीसा का पाठ व्यक्ति को भावनात्मक स्थिरता प्रदान करता है। भगवान श्याम की आराधना से व्यक्ति के मन में स्थिरता और संतुलन आता है, जिससे वह अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रख पाता है। इससे व्यक्ति का मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य बेहतर होता है।

17. सकारात्मक दृष्टिकोण

खाटू श्याम चालीसा का पाठ व्यक्ति को जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देता है। यह चालीसा व्यक्ति को हर परिस्थिति में सकारात्मक सोचने और चुनौतियों का सामना करने की हिम्मत देती है। सकारात्मक दृष्टिकोण से व्यक्ति का आत्मविश्वास बढ़ता है और वह अपने जीवन के लक्ष्यों को आसानी से प्राप्त कर पाता है।

18. आध्यात्मिक मार्गदर्शन

खाटू श्याम चालीसा का पाठ व्यक्ति को आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त करने में मदद करता है। यह चालीसा व्यक्ति को सही और सच्चे मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। भगवान श्याम की कृपा से व्यक्ति को जीवन में सही निर्णय लेने और सही दिशा में आगे बढ़ने का मार्गदर्शन मिलता है।

19. सामाजिक संबंधों में सुधार

खाटू श्याम चालीसा का पाठ व्यक्ति के सामाजिक संबंधों में सुधार लाता है। जब व्यक्ति इस चालीसा का पाठ करता है, तो उसके मन में प्रेम, करुणा और सहानुभूति का विकास होता है, जिससे उसके सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं। इससे समाज में सामंजस्य और सद्भाव का वातावरण बनता है।

20. आध्यात्मिक साधना में सहायता

खाटू श्याम चालीसा का पाठ आध्यात्मिक साधना में भी सहायक होता है। इसका नियमित पाठ व्यक्ति को ध्यान, ध्यान केंद्रित करने और आध्यात्मिक साधना में मदद करता है। इससे व्यक्ति के साधना में प्रगति होती है और वह अपने आध्यात्मिक लक्ष्यों को प्राप्त कर पाता है।

खाटू श्याम चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं। यह चालीसा व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता, शांति और संतुलन लाने में सहायक होती है। खाटू श्याम की कृपा से व्यक्ति का जीवन सुखमय, स्वस्थ और संतुलित बनता है। इस चालीसा का नियमित पाठ व्यक्ति को भगवान के निकट लाता है और उसे आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

नन्द के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की – Nand Ke Anand Bhayo Lyrics

नन्द के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की (Nand Ke Anand Bhayo) एक अत्यंत लोकप्रिय और मंगलमय भजन है जो भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के अवसर पर गाया जाता है। इस भजन की हर पंक्ति में बालकृष्ण के जन्म की खुशी और आनंद को बड़े ही सुंदर और भावपूर्ण तरीके से व्यक्त किया गया है। भारतीय संस्कृति में श्रीकृष्ण को न केवल एक महान देवता के रूप में पूजा जाता है, बल्कि उन्हें प्रेम, करुणा, और जीवन के विभिन्न रंगों के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है।

भजन “नन्द के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की” का गान विशेष रूप से जन्माष्टमी के पर्व पर किया जाता है, जो कि भगवान श्रीकृष्ण के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। यह भजन भक्तों के दिलों में भगवान कृष्ण के प्रति प्रेम और श्रद्धा को प्रकट करता है। इस भजन का प्रमुख उद्देश्य भगवान कृष्ण के जन्म के उस पावन क्षण को याद करना और उसे मन में संजोना होता है जब नन्द बाबा के घर बालकृष्ण का आगमन हुआ था।

भजन के पहले ही शब्दों से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह गीत किस प्रकार भक्तों के दिलों में आनंद और उल्लास का संचार करता है। “नन्द के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की” का अर्थ है कि नन्द बाबा के घर आनंद का समय आया है क्योंकि कन्हैया लाल यानी श्रीकृष्ण का जन्म हुआ है। यह वाक्यांश बार-बार दोहराया जाता है ताकि इस महान घटना की महत्ता और उसका प्रभाव भक्तों के मन में गहरे तक अंकित हो जाए।

भजन में यशोदा माता के उस असीमित आनंद को भी दर्शाया गया है जब उन्होंने अपने पुत्र श्रीकृष्ण का पहली बार दर्शन किया। श्रीकृष्ण के जन्म से नन्द बाबा और यशोदा माता का जीवन एकदम से बदल जाता है। इस भजन में भक्त उस खुशी का अनुभव कर सकते हैं जो नन्द और यशोदा को अपने पुत्र के रूप में भगवान कृष्ण के जन्म के समय हुई थी।

इस भजन के माध्यम से भक्त अपने जीवन में श्रीकृष्ण की उपस्थिति का अनुभव करते हैं। इसके हर शब्द में कृष्ण के प्रति प्रेम, श्रद्धा और भक्ति का अद्वितीय संगम है। इस भजन को गाने के समय भक्त अपने ह्रदय को भगवान श्रीकृष्ण के प्रेम और आनंद से भर लेते हैं। यही कारण है कि यह भजन केवल एक गान मात्र नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा का माध्यम है।

इसके अलावा, इस भजन के माध्यम से श्रीकृष्ण की बाल लीला, उनकी मासूमियत और उनके चंचल स्वभाव का भी अनुभव किया जा सकता है। इस भजन में वर्णित भगवान कृष्ण का बाल स्वरूप प्रत्येक भक्त के मन में एक पवित्र और कोमल भावनाओं का संचार करता है।

भजन “नन्द के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की” को विभिन्न शैलियों में गाया जाता है, लेकिन इसकी मुख्य भावना और उद्देश्य सभी में समान रहते हैं – भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की खुशी और उनके प्रति भक्तों की असीमित भक्ति। यह भजन न केवल कृष्ण भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक गीत है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति और संगीत का एक अभिन्न हिस्सा भी है।

अंततः, यह भजन हमें यह संदेश देता है कि भगवान श्रीकृष्ण के आगमन से संसार में प्रेम, आनंद और शांति का प्रसार होता है। जब भी इस भजन का गान किया जाता है, तो भक्तों के ह्रदय में भगवान श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम और श्रद्धा की भावना जागृत होती है, जो उनके जीवन को आनंद और शांति से भर देती है।



  • हिंदी
  • English

|| नन्द के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की ||

आनंद उमंग भयो, जय हो नन्द लाल की,
नन्द के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की….

बृज में आनंद भयो, जय यशोदा लाल की,
नन्द के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की….

आनंद उमंग भयो, जय हो नन्द लाल की,
गोकुल में आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की….

जय हो नंदलाल की, जय यशोदा लाल की,
हाथी घोडा पालकी, जय कन्हैया लाल की ||

कोटि ब्रह्माण्ड के अधिपति लाल की,
हाथी घोडा पालकी, जय कन्हैया लाल की….

गउवे चराने आये, जय हो पशुपाल की,
गोकुल में आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की….

कोटि ब्रह्माण्ड के अधिपति लाल की,
नन्द के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की….

गउवे चराने आये, जय हो पशुपाल की,
नन्द के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की ||

पूनम के चाँद जैसी शोभा है बाल की,
हाथी घोडा पालकी, जय कन्हैया लाल की….

आनंद उमंग भयो, जय हो नन्द लाल की,
गोकुल में आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की….

कोटि ब्रह्माण्ड के अधिपति लाल की,
नन्द के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की….

गउवे चराने आये, जय हो पशुपाल की,
नन्द के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की ||

भक्तो के आनंदकंद जय यशोदा लाल की,
हाथी घोडा पालकी, जय कन्हैया लाल की….

जय हो यशोदा लाल की, जय हो गोपाल की,
गोकुल में आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की….

कोटि ब्रह्माण्ड के अधिपति लाल की,
नन्द के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की….

गउवे चराने आये, जय हो पशुपाल की,
नन्द के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की ||

आनद से बोलो सब जय हो बृज लाल की,
हाथी घोडा पालकी, जय कन्हैया लाल की….

जय हो बृज लाल की, पावन प्रतिपाल की,
गोकुल में आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की….

कोटि ब्रह्माण्ड के अधिपति लाल की,
नन्द के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की….

गउवे चराने आये, जय हो पशुपाल की,
नन्द के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की ||

आनंद उमंग भयो, जय हो नन्द लाल की,
नन्द के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की….

बृज में आनंद भयो, जय यशोदा लाल की,
नन्द के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की….

जय हो नंदलाल की, जय यशोदा लाल की,
हाथी घोडा पालकी, जय कन्हैया लाल की….

आनंद उमंग भयो, जय हो नन्द लाल की,
हाथी घोडा पालकी, जय कन्हैया लाल की….

बृज में आनंद भयो, जय यशोदा लाल की,
नन्द के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की ||

|| Nand Ke Anand Bhayo Lyrics ||

Hey anand umang bhayo, Jai ho nand lal ki
Nand ke anand bhayo, Jai Kanhiya lal ki
Braj mein anand bhayo, Jai Yashoda lal ki
Haathi Ghoda Paal Ki, Jai Kanhiya lal ki

Jai ho Nand lal ki, Jai Yashoda lal ki
Gokul mein anand bhayo, Jai Kanhiya lal ki

Hey anand umang bhayo, Jai ho nand lal ki
Gokul ke anand bhayo, Jai Kanhiya lal ki
Jai Yashoda lal ki, Jai ho Nand lal ki
Hathi ghoda paal ki, Jai Kanhiya lal ki

Jai ho Nand lal ki, Jai Yashoda lal ki
Hathi ghoda paal ki, Jai Kanhiya lal ki

Koti Brahmaand ke, Adhipati laal ki
Hathi ghoda paal ki, Jai Kanhiya laal ki
Gaune chaarane aaye, Jai ho Pashupaal ki
Nand ke anand bhayo, Jai Kanhiya lal ki

Punam ki chand jaise, shobha hai baal ki
Hathi ghoda paal ki, jai kanhiya laal ki
Hey anand umang bhayo jai ho nand laal ki
Gokul mein anand bhayo, jai kanhiya laal ki

Bhakto ke anand kand, jai yashoda laal ki
Hathi ghoda paal ki, jai kanhiya laal ki
Hey jai yashoda laal ki, jai ho gopal ki
Gokul mein anand bhayo, jai kanhiya laal ki

Anand se bolo sab, Jai ho Braj laal ki
Hathi ghoda paal ki, Jai Kanhiya laal ki
Jai ho Braj laal ki, Paawan Pratipaal ki
Hey Nand ke anand bhayo, Jai ho Nand laal ki



आध्यात्मिक शांति और मानसिक संतुलन:

“नन्द के आनंद भयो” भजन का नियमित रूप से गान करने से व्यक्ति को मानसिक शांति और संतुलन प्राप्त होता है। जब हम भजन गाते हैं, तो हमारा मन एकाग्र और शांत हो जाता है, जिससे तनाव और चिंता कम होती है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में श्रीकृष्ण के जन्म का उल्लास और आनंद निहित है, जो हमारे मन और आत्मा को शांति प्रदान करता है। भजन के दौरान भक्त भगवान के साथ गहरा आध्यात्मिक संबंध अनुभव करते हैं, जिससे उनका मन शांत और स्थिर हो जाता है।

भक्ति और श्रद्धा में वृद्धि:

इस भजन का गान भगवान श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति और श्रद्धा को गहराई से बढ़ाता है। “नन्द के आनंद भयो” भजन में श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की महिमा का वर्णन है, जो भक्तों के ह्रदय में उनके प्रति प्रेम और भक्ति की भावना को मजबूत करता है। भजन के माध्यम से भक्त भगवान के प्रति अपनी असीमित भक्ति और प्रेम को व्यक्त कर सकते हैं, जो उनके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और शक्ति का संचार करता है।

सकारात्मकता और आनंद की अनुभूति

“नन्द के आनंद भयो” भजन का नियमित गान व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता और आनंद की अनुभूति कराता है। इस भजन में नन्द बाबा के घर में श्रीकृष्ण के जन्म की खुशी का वर्णन किया गया है, जो सुनने वालों के मन में भी उसी आनंद और उल्लास का संचार करता है। इस भजन का गान करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण का विकास होता है और वे जीवन की चुनौतियों का सामना अधिक उत्साह और आत्मविश्वास के साथ कर सकते हैं।

सामूहिक भजन के माध्यम से सामुदायिक एकता:

इस भजन को सामूहिक रूप से गाने से सामुदायिक एकता और सौहार्द्र की भावना का विकास होता है। जब लोग एक साथ “नन्द के आनंद भयो” भजन गाते हैं, तो वे एक दूसरे के साथ भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अपनी भक्ति और प्रेम को साझा करते हैं। इससे सामूहिक प्रार्थना का माहौल बनता है, जो समाज में एकता और भाईचारे की भावना को प्रबल करता है।

धार्मिक उत्सवों में उत्साह और उल्लास

“नन्द के आनंद भयो” भजन विशेष रूप से जन्माष्टमी जैसे धार्मिक उत्सवों के दौरान गाया जाता है, जिससे इन पर्वों में उत्साह और उल्लास का माहौल बनता है। इस भजन का गान धार्मिक पर्वों की महत्ता को बढ़ाता है और भक्तों को भगवान के जन्म की खुशी में भागीदार बनने का अवसर देता है। इस प्रकार, यह भजन धार्मिक पर्वों को अधिक आनंदमय और सार्थक बनाता है।


“नन्द के आनंद भयो” भजन का क्या अर्थ है?

“नन्द के आनंद भयो” भजन का अर्थ है कि नन्द बाबा के घर में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के कारण अत्यंत आनंद और खुशी का माहौल है। यह भजन श्रीकृष्ण के जन्म के उत्सव को मनाने के लिए गाया जाता है और इसमें उनके बाल स्वरूप की महिमा का वर्णन किया गया है।

“नन्द के आनंद भयो” भजन को किस अवसर पर गाया जाता है?

यह भजन विशेष रूप से जन्माष्टमी के अवसर पर गाया जाता है, जो भगवान श्रीकृष्ण के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। इसके अलावा, यह भजन अन्य धार्मिक और सांस्कृतिक समारोहों में भी गाया जा सकता है जहां श्रीकृष्ण की पूजा और उनकी बाल लीलाओं का गुणगान किया जाता है।

“नन्द के आनंद भयो” भजन गाने के क्या लाभ हैं?

इस भजन के गान से मानसिक शांति, भक्ति में वृद्धि, जीवन में सकारात्मकता का संचार, सामुदायिक एकता, और धार्मिक उत्सवों में उत्साह और उल्लास का अनुभव होता है। यह भजन भक्तों के मन में भगवान श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम और श्रद्धा को गहराई से बढ़ाता है।

“नन्द के आनंद भयो” भजन का स्रोत क्या है?

“नन्द के आनंद भयो” एक पारंपरिक भजन है, जो सदियों से भारतीय संस्कृति में गाया जाता रहा है। इसके सटीक स्रोत का पता लगाना कठिन है, क्योंकि यह भजन विभिन्न संतों और भक्तों द्वारा रचित और गाया गया है, लेकिन इसका संबंध भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से जुड़ी पौराणिक कथाओं से है।

इस भजन को किस शैली में गाया जाता है?

“नन्द के आनंद भयो” भजन को विभिन्न संगीत शैलियों में गाया जा सकता है, जैसे कि भजन, कीर्तन, शास्त्रीय संगीत, या लोक संगीत। इसकी धुन सरल होती है, जिससे इसे सभी आयु वर्ग के लोग आसानी से गा सकते हैं।

क्या “नन्द के आनंद भयो” भजन का गान केवल जन्माष्टमी पर किया जा सकता है?

नहीं, इस भजन का गान किसी भी समय किया जा सकता है। हालांकि, यह भजन जन्माष्टमी पर अधिक लोकप्रिय है, लेकिन इसे अन्य धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा, या श्रीकृष्ण से जुड़े किसी भी उत्सव में भी गाया जा सकता है।

क्या “नन्द के आनंद भयो” भजन बच्चों के लिए भी उपयुक्त है?

हां, यह भजन बच्चों के लिए भी उपयुक्त है। भजन के सरल और मधुर शब्द बच्चों को आसानी से समझ में आते हैं और श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की महिमा को उजागर करते हैं, जिससे बच्चों में भी भक्ति और श्रद्धा का भाव जागृत होता है।

श्री कृष्ण के बारे में सम्पूर्ण जानकारी (Shri Krishna Ke Baare Mein Sampoorna Jaankari)

श्री कृष्ण के बारे में सम्पूर्ण जानकारी (Shri Krishna ke baare mein Sampoorna Jaankari) श्री कृष्ण हिन्दू धर्म के प्रमुख देवताओं में से एक हैं, जिन्हें भगवान विष्णु का आठवां अवतार माना जाता है। श्री कृष्ण का जीवन असाधारण घटनाओं और लीलाओं से भरा हुआ है। वे अपने अद्वितीय व्यक्तित्व, आकर्षण, और दिव्य खेलों के लिए प्रसिद्ध हैं।

बाल्यकाल में माखन चोरी, गोपियों के साथ रासलीला, और कंस का वध जैसी घटनाएं उनकी लीलाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उन्होंने महाभारत के युद्ध में पांडवों का साथ दिया और अर्जुन को गीता का उपदेश दिया, जो धर्म, कर्म, और भक्ति के मार्गदर्शन का महत्वपूर्ण ग्रंथ है। श्री कृष्ण का व्यक्तित्व मानवता और दिव्यता का अद्भुत संगम है, जो आज भी लोगों को प्रेरणा देता है।

श्री कृष्ण का जन्म

श्री कृष्ण का जन्म द्वापर युग में हुआ था, जब धरती पर अधर्म और अत्याचार अपने चरम पर थे। वे भगवान विष्णु के आठवें अवतार के रूप में प्रकट हुए, जिनका उद्देश्य धरती से अधर्म का नाश करना और धर्म की पुनर्स्थापना करना था। श्री कृष्ण का जन्म मथुरा नगरी में, कारागार में हुआ था। उनके जन्म के समय चारों ओर अंधकार और भय का वातावरण था, क्योंकि कंस ने अपनी बहन देवकी के आठवें पुत्र को मारने की प्रतिज्ञा कर रखी थी। लेकिन श्री कृष्ण के जन्म के साथ ही वह अंधकार स्वतः ही समाप्त हो गया और दिव्य प्रकाश ने कारागार को आलोकित कर दिया।

परिवार और वंश

श्री कृष्ण यादव वंश के थे, जो कि भारत के प्राचीन और प्रतिष्ठित वंशों में से एक था। उनके पिता वसुदेव और माता देवकी थे, जो मथुरा के राजा उग्रसेन के पुत्र और पुत्रवधू थे। हालांकि, कंस ने उग्रसेन को सिंहासन से हटा दिया था और स्वयं राजा बन बैठा था। वसुदेव और देवकी को कंस ने बंदी बना लिया था, और यहीं पर श्री कृष्ण का जन्म हुआ। श्री कृष्ण को उनके जन्म के तुरंत बाद, वसुदेव द्वारा गोकुल में नंद बाबा और यशोदा माता के पास पहुंचाया गया, जहां उन्होंने अपना बचपन बिताया। उनका पालन-पोषण नंद यदुवंशी परिवार में हुआ, जो यादव समुदाय के मुखिया थे। यदुवंशी वंश, श्री कृष्ण के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि इसी वंश में भगवान ने अवतार लिया और यहीं से उन्होंने अपने जीवन की लीलाएं शुरू कीं।

गोकुल में बाल लीला

श्री कृष्ण का जन्म मथुरा के कारागार में हुआ था, लेकिन उनके पिता वसुदेव ने उन्हें कंस के अत्याचार से बचाने के लिए गोकुल में नंद बाबा और यशोदा माता के पास पहुंचा दिया। गोकुल में उनका बाल्यकाल अत्यंत आनंदमय और लीलाओं से भरा हुआ था। गोकुल की भूमि ने उनके नटखट स्वभाव और अद्वितीय बाल लीलाओं का साक्षी बनी। गोपियों और ग्वाल-बालों के साथ उनका खेलना, यमुना नदी के किनारे गायों को चराना, और अपनी बाल सुलभ चपलता से सभी को मोह लेना, उनके बाल्यकाल की कुछ प्रमुख लीलाएं थीं। गोकुल में रहकर उन्होंने अपने माता-पिता के साथ एक साधारण जीवन जिया, लेकिन उनकी लीलाओं में दिव्यता की झलक हमेशा दिखाई देती थी।

पूतना वध और बालकृष्ण की लीलाएं

श्री कृष्ण के बाल्यकाल में उनके अद्भुत पराक्रम की कई कथाएं हैं, जिनमें से एक है पूतना वध। कंस ने बालकृष्ण को मारने के लिए राक्षसी पूतना को भेजा था। पूतना एक सुंदर महिला का रूप धारण करके कृष्ण को अपना दूध पिलाने आई, जिसमें विष था। लेकिन बालकृष्ण ने उसकी चाल को भांप लिया और दूध पीते-पीते उसका वध कर दिया। इस घटना ने गोकुलवासियों को चमत्कृत कर दिया, और वे कृष्ण की दिव्यता को समझने लगे। इसके अलावा, बालकृष्ण ने कई और राक्षसों का वध किया, जैसे शकटासुर, तृणावर्त, आदि। इन घटनाओं के माध्यम से उन्होंने अपने परमेश्वरत्व का परिचय दिया और गोकुलवासियों को सुरक्षा का एहसास दिलाया।

माखन चोरी और कन्हैया

श्री कृष्ण के बाल्यकाल की सबसे प्रसिद्ध लीलाओं में से एक है माखन चोरी। गोकुल में बालकृष्ण को माखन अत्यंत प्रिय था, और वे अपने मित्रों के साथ माखन की चोरी करने के लिए जाने जाते थे। गोपियों के घरों में माखन के मटके लटकाए जाते थे, और कन्हैया अपने मित्रों के साथ मिलकर उन्हें चुराते थे। गोपियों की शिकायतें और कृष्ण की शरारतें गोकुल के जीवन का हिस्सा बन गई थीं। कन्हैया का माखन चुराने का यह खेल मात्र एक शरारत नहीं थी, बल्कि इसके माध्यम से उन्होंने लोगों को सिखाया कि वे साधारण जीवन के सुखों का आनंद लें और प्रेम और भक्ति से जुड़े रहें। उनका यह नटखट स्वभाव उनके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा था, जिसने गोकुल के लोगों के दिलों में उनके प्रति अपार प्रेम और स्नेह भर दिया।

श्री कृष्ण की बाल लीलाएं न केवल मनोरंजक थीं, बल्कि उनमें गहरे आध्यात्मिक संदेश भी छिपे हुए थे, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बने।

राधा और कृष्ण का प्रेम

श्री कृष्ण और राधा का प्रेम हिन्दू धर्म में एक आदर्श प्रेम का प्रतीक माना जाता है। राधा और कृष्ण के प्रेम को आध्यात्मिक प्रेम के रूप में देखा जाता है, जो संसारिक प्रेम से परे है। ब्रजभूमि में राधा और कृष्ण का प्रेम महज एक सांसारिक प्रेम कथा नहीं है, बल्कि यह एक दिव्य प्रेम है जो आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है। राधा, जो कि श्री कृष्ण की प्रिय गोपी थीं, उनके साथ रासलीला करती थीं। यह प्रेम अनन्य, निश्छल और आत्मिक था, जहां राधा ने कृष्ण को पूर्णतः समर्पण भाव से प्रेम किया। श्री कृष्ण भी राधा से अनंत प्रेम करते थे, और यही कारण है कि उनका नाम सदैव राधा के साथ जोड़ा जाता है। यह प्रेम कृष्ण की लीलाओं का मुख्य भाग था और इसे भक्ति का उच्चतम रूप माना जाता है। राधा-कृष्ण के प्रेम का महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि उनका प्रेम मानव जीवन के विभिन्न भावनात्मक और आध्यात्मिक पहलुओं का प्रतिनिधित्व करता है।

कृष्ण का मथुरा आगमन

श्री कृष्ण की युवावस्था में मथुरा में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। जब कंस को यह पता चला कि देवकी का आठवां पुत्र अभी भी जीवित है और वही उसका वध करेगा, तो उसने कृष्ण को मारने के लिए कई असुरों को भेजा, लेकिन वे सभी असफल रहे। अंततः कंस ने श्री कृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम को मथुरा बुलाया। मथुरा में, कंस ने उनके साथ छल करने की कई कोशिशें की, लेकिन सभी प्रयास व्यर्थ गए। अंततः कृष्ण ने अखाड़े में कंस के मल्लों को पराजित किया और कंस को भी मार गिराया। कंस का वध कर उन्होंने मथुरा को उसके अत्याचार से मुक्त किया और राजा उग्रसेन को पुनः सिंहासन पर बैठाया।

कंस के वध के बाद, श्री कृष्ण ने मथुरा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अपने माता-पिता वसुदेव और देवकी को कारावास से मुक्त कराया और यादवों को सम्मान और सुरक्षा प्रदान की। इसके बाद, उन्होंने मथुरा में धर्म और न्याय की स्थापना की। श्री कृष्ण का मथुरा आगमन न केवल एक अत्याचारी का अंत था, बल्कि धर्म की पुनर्स्थापना का भी प्रतीक था। मथुरा में उनके शासन ने एक नई युग की शुरुआत की, जहां उन्होंने धर्म, नीति, और भक्ति के आदर्शों को स्थापित किया।

इस प्रकार, श्री कृष्ण की युवावस्था में उनके प्रेम और वीरता दोनों की झलक मिलती है, जो उनके व्यक्तित्व को और अधिक महान बनाती है।

महाभारत में श्री कृष्ण की भूमिका

महाभारत के महायुद्ध में श्री कृष्ण की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और केंद्रीय थी। वे पांडवों के मित्र, मार्गदर्शक, और सलाहकार थे। महाभारत के युद्ध की पृष्ठभूमि में श्री कृष्ण ने सदैव धर्म का साथ दिया और अधर्म के विनाश के लिए हर संभव प्रयास किया। जब युद्ध की नौबत आई, तो अर्जुन ने उनसे अपनी मानसिक स्थिति और संदेहों के बारे में चर्चा की, जिसके उत्तर में श्री कृष्ण ने उन्हें भगवद गीता का अमूल्य ज्ञान दिया।

महाभारत में श्री कृष्ण ने केवल एक सारथी की भूमिका निभाई, लेकिन उनकी भूमिका इससे कहीं अधिक गहरी और प्रभावशाली थी। वे युद्ध में पांडवों की रणनीति के निर्माण और निर्णय लेने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। उन्होंने युद्ध की नैतिकता, राजनीति, और धर्म की गहरी समझ के माध्यम से पांडवों का मार्गदर्शन किया। श्री कृष्ण ने सुनिश्चित किया कि पांडव धर्म और न्याय के मार्ग पर चलते हुए युद्ध करें, और वे स्वयं युद्ध में हथियार न उठाने के बावजूद युद्ध के परिणाम को प्रभावित करते रहे। उनके नेतृत्व और मार्गदर्शन ने पांडवों को न केवल जीत दिलाई, बल्कि धर्म और न्याय की विजय भी सुनिश्चित की।

भगवद गीता का ज्ञान

महाभारत के युद्ध से पहले, जब अर्जुन ने कौरवों के खिलाफ युद्ध करने से इनकार कर दिया और अपने परिवार के खिलाफ हथियार उठाने में संकोच किया, तब श्री कृष्ण ने उन्हें भगवद गीता का उपदेश दिया। गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन को कर्म, धर्म, और मोक्ष का गहन ज्ञान प्रदान किया। उन्होंने समझाया कि मनुष्य को अपने कर्तव्यों का पालन बिना किसी फल की चिंता किए करना चाहिए, क्योंकि कर्म ही धर्म है।

गीता का ज्ञान जीवन की हर परिस्थिति में मार्गदर्शन प्रदान करता है। श्री कृष्ण ने अर्जुन को सिखाया कि आत्मा अजर-अमर है और शरीर केवल एक वस्त्र के समान है। इसलिए, मृत्यु का भय व्यर्थ है, और मनुष्य को अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए भगवान के प्रति समर्पण भाव रखना चाहिए। गीता में योग, भक्ति, ज्ञान, और कर्म की चार प्रमुख विधाओं का उल्लेख है, जो जीवन में संतुलन और मुक्ति प्राप्त करने के मार्ग हैं।

भगवद गीता न केवल एक धार्मिक ग्रंथ है, बल्कि यह जीवन के हर क्षेत्र में प्रेरणा और मार्गदर्शन देने वाला एक अमूल्य ग्रंथ है। इसमें निहित शिक्षाएं केवल अर्जुन के लिए नहीं थीं, बल्कि वे समस्त मानवता के लिए हैं। श्री कृष्ण ने गीता के माध्यम से मानव जीवन के गूढ़ रहस्यों को सरलता से समझाया और यह दिखाया कि कैसे धर्म, कर्म, और भक्ति के मार्ग पर चलकर मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।

इस प्रकार, महाभारत और गीता में श्री कृष्ण की भूमिका ने न केवल उस समय के समाज को बल्कि आने वाली सभी पीढ़ियों को धर्म और जीवन के सिद्धांतों का मार्ग दिखाया है।

द्वारका नगरी का निर्माण

श्री कृष्ण द्वारा द्वारका नगरी का निर्माण उनकी महान और दूरदर्शी सोच का प्रतीक है। मथुरा में कंस के वध के बाद, यादवों की सुरक्षा और समृद्धि के लिए श्री कृष्ण ने समुद्र के किनारे एक नई नगरी की स्थापना करने का निर्णय लिया। मथुरा पर लगातार मगध के राजा जरासंध के आक्रमण से बचने और यादवों को स्थायी सुरक्षा प्रदान करने के लिए श्री कृष्ण ने अपनी राजधानी मथुरा से दूर एक सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करने का विचार किया। इसी उद्देश्य से उन्होंने समुद्र देवता से अनुमति प्राप्त कर गुजरात के वर्तमान द्वारका क्षेत्र में एक नई नगरी बसाई, जिसे “द्वारका” नाम दिया गया।

द्वारका नगरी का निर्माण वास्तुकला और शिल्पकला का अद्भुत उदाहरण था। इसे समुद्र के किनारे एक सुंदर, सुरक्षित और समृद्ध नगरी के रूप में बसाया गया था, जिसमें सभी प्रकार की सुविधाएं और सुख-सुविधाएं उपलब्ध थीं। यह नगरी श्री कृष्ण के दूरदर्शी नेतृत्व और प्रजा की सुरक्षा व कल्याण की उनकी भावना का प्रतीक थी। द्वारका का नाम संस्कृत में “द्वार” से बना है, जिसका अर्थ है “द्वार” या “प्रवेश द्वार”। इसे सात द्वारों वाली नगरी भी कहा जाता है, जो इसके वास्तुशिल्पीय भव्यता को दर्शाता है।

श्री कृष्ण का शासन

श्री कृष्ण का शासन एक आदर्श और धर्म आधारित शासन का प्रतीक था। द्वारका में उन्होंने प्रजा के कल्याण, न्याय और धर्म की स्थापना की। श्री कृष्ण न केवल एक महान योद्धा और दार्शनिक थे, बल्कि एक आदर्श राजा भी थे, जिन्होंने अपने शासनकाल में जनता की सुरक्षा, समृद्धि, और खुशहाली के लिए हर संभव प्रयास किया। उनका शासन सुशासन और न्याय पर आधारित था, जहां हर नागरिक को समान अधिकार और अवसर प्राप्त थे।

श्री कृष्ण का शासन नीति “धर्म” पर आधारित थी, जिसका मुख्य उद्देश्य था प्रजा की सेवा और कल्याण। वे स्वयं को प्रजा का सेवक मानते थे और हमेशा उनकी समस्याओं का समाधान करने के लिए तत्पर रहते थे। उनका शासन न्यायप्रिय था, जिसमें धर्म और नैतिकता का विशेष स्थान था। उन्होंने द्वारका को एक समृद्ध और सुरक्षित नगरी बनाया, जहां कला, संस्कृति, व्यापार और शिक्षा का विकास हुआ। उनकी नीतियों ने द्वारका को एक संपन्न और खुशहाल राज्य बना दिया।

श्री कृष्ण का शासन केवल राजनीति तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने समाज के हर क्षेत्र में धर्म, नैतिकता और संस्कृति का प्रसार किया। वे अपने प्रजाजनों के साथ सीधे संवाद करते थे और उनकी समस्याओं को सुनकर उचित समाधान निकालते थे। उनका नेतृत्व जनता में विश्वास, प्रेम और सम्मान का प्रतीक था। श्री कृष्ण का शासन मॉडल आज भी एक आदर्श शासन के रूप में देखा जाता है, जहां राजा अपने प्रजाजनों के कल्याण और सुरक्षा को प्राथमिकता देता है।

इस प्रकार, द्वारका नगरी का निर्माण और श्री कृष्ण का शासन, एक आदर्श राज्य और शासन की परिकल्पना को साकार करता है, जो धर्म, न्याय, और प्रजा के कल्याण पर आधारित था।

दिव्यता और मानवता का संयोग

श्री कृष्ण का व्यक्तित्व अद्वितीय था, जिसमें दिव्यता और मानवता का अनूठा संयोग दिखाई देता है। वे भगवान विष्णु के अवतार होने के बावजूद, एक साधारण मानव के रूप में धरती पर जन्मे और जीवन के हर पहलू को जीया। उनकी दिव्यता उनके चमत्कारी कार्यों, अद्भुत लीलाओं, और धर्म की स्थापना में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। वहीं, उनकी मानवता उनकी नटखट शरारतों, प्रेम, और मित्रता में झलकती है।

श्री कृष्ण ने जीवन के हर पहलू को गहराई से समझा और उसे अपने जीवन में अपनाया। उनका बाल्यकाल माखन चोरी, गोपियों के साथ रासलीला, और राक्षसों के वध जैसी लीलाओं से भरा था, जिसमें उनके बाल सुलभ चंचलता और ईश्वरत्व दोनों की झलक मिलती है। उनकी लीलाएं न केवल मनोरंजक थीं, बल्कि उनमें गहरे आध्यात्मिक संदेश भी छिपे हुए थे। वे एक आदर्श मित्र, भाई, राजा, और गुरु थे, जो हर रिश्ते को निभाने में उत्कृष्ट थे।

श्री कृष्ण ने महाभारत के युद्ध में अर्जुन को गीता का उपदेश देते समय अपने ईश्वर स्वरूप का दर्शन कराया, लेकिन वे स्वयं को सदैव एक साधारण मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करते रहे। उनके चरित्र की यह विशेषता उन्हें अन्य अवतारों से अलग बनाती है। उन्होंने सिखाया कि जीवन के हर पहलू को ईश्वर के प्रति समर्पण भाव से जीना चाहिए, चाहे वह खुशी हो या दुख, प्रेम हो या संघर्ष।

सार्वभौमिकता

श्री कृष्ण की शिक्षाओं का वैश्विक संदेश है, जो केवल एक समय या स्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे विश्व और मानवता के लिए प्रासंगिक है। उनकी शिक्षाएं धर्म, कर्म, और भक्ति के सिद्धांतों पर आधारित हैं, जो जीवन के हर क्षेत्र में मार्गदर्शन प्रदान करती हैं। भगवद गीता में उन्होंने अर्जुन को जो ज्ञान दिया, वह जीवन के हर पहलू पर लागू होता है और आज भी विश्वभर में इसका अध्ययन और अनुसरण किया जाता है।

श्री कृष्ण ने “वसुधैव कुटुम्बकम्” यानी “संपूर्ण विश्व एक परिवार है” की अवधारणा को अपने जीवन में साकार किया। उनका संदेश था कि सभी जीवात्माएं एक ही परमात्मा का अंश हैं, और इसलिए सभी के साथ प्रेम, करुणा, और सहानुभूति से पेश आना चाहिए। उन्होंने जाति, धर्म, भाषा, और राष्ट्र की सीमाओं से परे जाकर एक सार्वभौमिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया, जो मानवता को जोड़ता है।

उनकी शिक्षाओं में कर्मयोग, भक्तियोग, और ज्ञानयोग का समन्वय है, जो सभी प्रकार के व्यक्तियों के लिए उपयुक्त हैं। उन्होंने बताया कि जीवन में कर्तव्य को महत्व देना चाहिए, और इसे बिना किसी फल की आशा के निष्काम भाव से करना चाहिए। उनका संदेश आज भी प्रासंगिक है, और उन्होंने दुनिया को यह सिखाया कि सही मार्ग पर चलते हुए जीवन को कैसे संतुलित और समृद्ध बनाया जा सकता है।

श्री कृष्ण का व्यक्तित्व और उनकी शिक्षाएं आज भी लोगों के लिए प्रेरणास्रोत हैं और आने वाले समय में भी रहेंगे। उनकी दिव्यता और मानवता का संयोग और उनका सार्वभौमिक संदेश एक ऐसा आदर्श प्रस्तुत करता है, जो न केवल भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है, बल्कि वैश्विक मानवता के लिए भी मूल्यवान है।

कृष्ण भक्ति और उपासना

कृष्ण भक्ति और उपासना हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है, जो भक्ति योग के माध्यम से भगवान श्री कृष्ण की पूजा और आराधना को दर्शाती है। कृष्ण की उपासना विभिन्न रूपों में की जाती है, जिनमें मंदिर, उत्सव, और व्रत शामिल हैं।

  • मंदिर: श्री कृष्ण के मंदिर हर प्रमुख शहर और गांव में पाए जाते हैं। इन मंदिरों में भगवान श्री कृष्ण की मूर्तियों की पूजा की जाती है, और भक्त जन नियमित रूप से यहां आकर दर्शन और पूजा करते हैं। मंदिरों में विशेष पूजा विधियों, आरती, और कीर्तन का आयोजन होता है, जिससे भक्त भगवान के दिव्य गुणों का अनुभव करते हैं। द्वारका, वृंदावन, मथुरा, और नंदगांव जैसे स्थान विशेष रूप से श्री कृष्ण के मंदिरों के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • उत्सव: कृष्ण भक्ति में विभिन्न उत्सव भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनमें जन्माष्टमी, राधा अष्टमी, गोवर्धन पूजा, और होली जैसे प्रमुख उत्सव शामिल हैं। इन उत्सवों के दौरान विशेष पूजा, भजन, कीर्तन, और रासलीला का आयोजन किया जाता है। उत्सवों के माध्यम से भक्त श्री कृष्ण के जीवन की लीलाओं को याद करते हैं और उनके प्रति अपनी भक्ति प्रकट करते हैं।
  • व्रत: श्री कृष्ण की उपासना में व्रत का भी विशेष स्थान है। भक्त जन विशेष दिनों पर व्रत रखते हैं जैसे कि एकादशी, जन्माष्टमी, और कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी। व्रत के दौरान भक्त विशेष आहार ग्रहण करते हैं, उपवासी रहते हैं, और भगवान की पूजा और भजन-कीर्तन करते हैं। व्रत करने से भक्त श्री कृष्ण की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

जन्माष्टमी

जन्माष्टमी, श्री कृष्ण का जन्मोत्सव, हिन्दू धर्म के प्रमुख उत्सवों में से एक है। यह उत्सव कृष्ण के जन्म की खुशी में मनाया जाता है और विशेष रूप से श्रावण मास की अष्टमी तिथि को आयोजित किया जाता है। जन्माष्टमी पर भक्त जन विशेष अनुष्ठान, पूजा, और भजन-कीर्तन करते हैं।

  • उत्सव का आयोजन: जन्माष्टमी के दिन, भक्त रातभर जागरण करते हैं और श्री कृष्ण की पूजा करते हैं। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, सजावट, और रासलीला का आयोजन होता है। लोग श्री कृष्ण के जन्म की लीलाओं का मंचन करते हैं, जिसे “जन्माष्टमी की रात्रि” कहा जाता है।
  • खास आयोजन: उत्सव के दिन विशेष प्रसाद जैसे कि दूध, माखन, और मिश्री का भोग भगवान को अर्पित किया जाता है। घरों में भी श्री कृष्ण की मूर्तियों को सुंदर वस्त्र पहनाए जाते हैं और पूजा की जाती है। कई स्थानों पर झूला, झाँकी, और लघु नाटक का आयोजन भी किया जाता है, जो श्री कृष्ण के जीवन की घटनाओं को दर्शाते हैं।
  • महत्व: जन्माष्टमी का महत्व केवल श्री कृष्ण के जन्म की खुशी मनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भक्तों को श्री कृष्ण के जीवन और शिक्षाओं के प्रति जागरूक करने का भी एक अवसर है। यह उत्सव एक नई ऊर्जा और भक्ति से भरा होता है, जिसमें लोग अपनी धार्मिक भावनाओं को प्रकट करते हैं और श्री कृष्ण की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

इस प्रकार, श्री कृष्ण की उपासना और जन्माष्टमी जैसे उत्सव, उनके प्रति भक्ति और प्रेम को प्रकट करने के महत्वपूर्ण माध्यम हैं। ये परंपराएं धार्मिक जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं और भक्तों को आध्यात्मिक मार्ग पर चलने में प्रेरित करती हैं।

धर्म, कर्म और भक्ति: गीता के माध्यम से धर्म और कर्म की अवधारणा:

श्री कृष्ण की शिक्षाएं, विशेष रूप से भगवद गीता में, धर्म, कर्म, और भक्ति की अवधारणाओं को समझने में गहरी अंतर्दृष्टि प्रदान करती हैं। गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन को जीवन की जटिलताओं और संघर्षों के बीच धर्म और कर्म का सही मार्ग दिखाया।

  • धर्म: गीता में श्री कृष्ण ने धर्म को जीवन के कर्तव्यों और नैतिकता का पालन करने के रूप में परिभाषित किया। उन्होंने अर्जुन को समझाया कि धर्म केवल व्यक्तिगत या सामाजिक मान्यता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मा की सतत उन्नति और सच्चे मार्ग पर चलने की प्रक्रिया है। धर्म का पालन करना केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि समाज और विश्व के समग्र कल्याण के लिए होता है।
  • कर्म: श्री कृष्ण ने गीता में कर्म के महत्व को स्पष्ट किया और बताया कि कर्म ही जीवन का आधार है। उन्होंने अर्जुन को सिखाया कि व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का पालन बिना किसी फल की आशा के करना चाहिए। कर्म के बिना परिणाम की चिंता किए बिना काम करना, कर्मयोग कहलाता है। यह विचारशीलता और आत्मसमर्पण की स्थिति को दर्शाता है, जिसमें व्यक्ति अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाता है और निस्वार्थ भाव से काम करता है।
  • भक्ति: गीता में भक्ति की अवधारणा भी प्रमुख है। श्री कृष्ण ने बताया कि भक्ति केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सच्चे समर्पण और प्रेम का भाव है जो व्यक्ति को ईश्वर के साथ जोड़ता है। भक्ति योग का अनुसरण करके व्यक्ति ईश्वर की प्राप्ति और आत्मा की शांति को प्राप्त कर सकता है। श्री कृष्ण के अनुसार, भक्ति का मार्ग सरल और सीधा है, और यह व्यक्ति को ईश्वर के करीब ले जाता है।

जीवन का संतुलन: जीवन जीने की कला और संतुलन की आवश्यकता:

श्री कृष्ण की शिक्षाओं में जीवन के संतुलन और जीवन जीने की कला पर भी विशेष जोर दिया गया है। उन्होंने बताया कि एक संतुलित जीवन ही सुख और शांति का मार्ग है।

  • संतुलन: श्री कृष्ण ने जीवन के विभिन्न पहलुओं में संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता को समझाया। उन्होंने बताया कि जीवन में सुख और दुख, सफलता और असफलता, सभी का अनुभव होता है, लेकिन व्यक्ति को इन परिस्थितियों में संतुलित रहना चाहिए। आत्मा की स्थिरता और मानसिक शांति के लिए, व्यक्ति को इन परिवर्तनों के प्रति अनासक्त रहना चाहिए और स्थिरता बनाए रखनी चाहिए।
  • जीवन जीने की कला: श्री कृष्ण ने जीवन जीने की कला को एक उच्च दृष्टिकोण से समझाया। उन्होंने कहा कि जीवन का उद्देश्य केवल भौतिक सुख प्राप्त करना नहीं है, बल्कि आत्मा की उन्नति और ईश्वर के साथ एकता प्राप्त करना है। जीवन को एक साधना के रूप में देखना और अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए आत्मा की शांति और संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है।
  • संतुलित दृष्टिकोण: गीता में, श्री कृष्ण ने “सर्वेभ्यः सर्वेभ्यः” यानी “सर्वप्रणि” (सभी प्राणियों) के प्रति समान दृष्टिकोण रखने की सलाह दी। इसका अर्थ है कि व्यक्ति को किसी भी परिस्थिति में अपने व्यवहार और भावनाओं में संतुलन बनाए रखना चाहिए। जीवन की धारा में बदलाव आते रहते हैं, लेकिन एक संतुलित दृष्टिकोण से व्यक्ति हर परिस्थिति का सामना कर सकता है और जीवन के उद्देश्य को समझ सकता है।

इस प्रकार, श्री कृष्ण की शिक्षाएं जीवन को समझने और जीने की कला में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करती हैं। धर्म, कर्म, और भक्ति के सिद्धांतों के माध्यम से उन्होंने जीवन की जटिलताओं को सरल और सुलभ तरीके से समझाया और जीवन के संतुलन को बनाए रखने के महत्व को दर्शाया।

श्री कृष्ण का अवसान द्वापर युग के अंत और कलियुग की शुरुआत का प्रतीक है। उनके पृथ्वी से प्रस्थान का समय एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और आध्यात्मिक घटना था, जिसने धर्म और समाज की दिशा को बदल दिया।

प्रभाव और उत्तराधिकार

श्री कृष्ण के पृथ्वी से प्रस्थान के बाद, उनके जीवन और शिक्षाओं का प्रभाव व्यापक रूप से महसूस किया गया। उनके अंत के बाद, यादव वंश में दुराचार और संघर्षों की स्थिति उत्पन्न हुई, और द्वारका नगरी का पतन भी हुआ।श्री कृष्ण के जीवनकाल में उन्होंने धर्म, न्याय, और भक्ति के आदर्श स्थापित किए थे। उनके प्रस्थान के बाद, उनके अनुयायी और शिष्य उनके द्वारा सिखाए गए उपदेशों और जीवन मूल्यों को आगे बढ़ाने के प्रयास में लगे रहे। उनके उत्तराधिकारियों ने उनके सिद्धांतों को संरक्षित रखने और उनके उपदेशों को जनमानस में फैलाने का कार्य किया। श्री कृष्ण के प्रस्थान के बाद, उनके द्वारा स्थापित धर्म और भक्ति की परंपराएं आगे बढ़ी और हिन्दू धर्म के अनुयायियों ने उनके शिक्षाओं को अपने जीवन में अपनाया।

कलियुग का आरंभ

श्री कृष्ण के अवसान के साथ ही द्वापर युग का अंत हुआ और कलियुग का आरंभ हुआ। हिन्दू धर्म के अनुसार, समय को चार युगों में बांटा गया है—सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग, और कलियुग। द्वापर युग के अंत के साथ कलियुग की शुरुआत हुई, जो वर्तमान समय का युग है।कलियुग को धर्म के पतन, नैतिकता की कमी, और अधर्म के प्रबल होने का युग माना जाता है। इस युग में मानवता के मूल्य और नैतिकता में गिरावट देखने को मिलती है, और समाज में विभिन्न प्रकार की समस्याएं उत्पन्न होती हैं। श्री कृष्ण के अवसान ने इस परिवर्तन की शुरुआत की और मानवता को नई चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रेरित किया।कलियुग के प्रारंभ के साथ, श्री कृष्ण ने यह भी घोषणा की थी कि वे भविष्योत्तर युग में फिर से प्रकट होंगे और धर्म की स्थापना करेंगे। इस तरह, उनका प्रस्थान केवल एक युग का अंत नहीं था, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए आशा और प्रेरणा का स्रोत भी था।

श्री कृष्ण का अवसान एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और आध्यात्मिक घटना थी, जिसने न केवल तत्कालीन युग को प्रभावित किया बल्कि भविष्य के युगों के लिए भी दिशा निर्धारित की। उनके जीवन और शिक्षाएं आज भी प्रेरणा का स्रोत हैं और हिन्दू धर्म के अनुयायियों के लिए मार्गदर्शक बनी हुई हैं।

श्री कृष्ण की संपूर्णता

श्री कृष्ण का व्यक्तित्व और उनकी शिक्षाएं भारतीय धर्म और संस्कृति में एक अनमोल धरोहर हैं। उनके जीवन की लीलाएं, उनकी भक्ति, और उनके उपदेश आज भी विश्वभर में प्रासंगिक हैं। श्री कृष्ण का व्यक्तित्व एक अद्वितीय संयोग है, जिसमें दिव्यता और मानवता दोनों का मिश्रण है। वे एक महान दार्शनिक, योद्धा, और प्रेमी थे, जिनका जीवन हर पहलू में पूर्णता को दर्शाता है।

उनकी शिक्षाएं, विशेष रूप से भगवद गीता के माध्यम से, जीवन के गहरे रहस्यों को उजागर करती हैं और लोगों को सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं। श्री कृष्ण ने धर्म, कर्म, और भक्ति के सिद्धांतों को समझाते हुए जीवन को जीने की कला का अनूठा दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उनका जीवन और उनकी शिक्षाएं आज भी समाज के हर वर्ग के लिए एक प्रेरणास्त्रोत हैं, और उनके उपदेशों का अनुसरण करने से जीवन में संतुलन, शांति, और उद्देश्य प्राप्त किया जा सकता है।

श्री कृष्ण का संदेश

श्री कृष्ण का संदेश धर्म, प्रेम, और कर्म का मार्ग है। उन्होंने अपने जीवन और उपदेशों के माध्यम से यह सिद्ध किया कि सच्चे धर्म का पालन करना केवल पूजा और अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नैतिकता, कर्तव्य, और प्रेम का अनुसरण करने से है।

  • धर्म: धर्म को श्री कृष्ण ने केवल व्यक्तिगत या सामाजिक कर्तव्यों तक सीमित नहीं माना, बल्कि इसे आत्मा की उन्नति और समाज के समग्र कल्याण का मार्ग बताया। उनका धर्म की अवधारणा का आधार सत्य, न्याय, और नैतिकता था, जो जीवन की हर स्थिति में मार्गदर्शन प्रदान करता है।
  • प्रेम: श्री कृष्ण का प्रेम भौतिक प्रेम से परे है; यह एक दिव्य और आत्मिक प्रेम है जो सभी जीवों के प्रति समान होता है। उनके प्रेम का संदेश यह है कि सच्चा प्रेम स्वार्थहीन होता है और इसमें सबके प्रति समानता और करुणा का भाव होता है।
  • कर्म: श्री कृष्ण ने कर्म को जीवन का आधार माना और यह सिखाया कि अपने कर्तव्यों का पालन बिना किसी फल की आशा के करना चाहिए। कर्म के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन में वास्तविकता और ईश्वर के करीब पहुंच सकता है।

श्री कृष्ण का संदेश, धर्म, प्रेम, और कर्म का मार्ग, आज भी जीवन के हर क्षेत्र में प्रासंगिक है। उनकी शिक्षाओं को अपनाकर व्यक्ति अपने जीवन को संतुलित और सार्थक बना सकता है, और समाज में सकारात्मक योगदान दे सकता है। श्री कृष्ण का जीवन और उनके उपदेश, सच्चे मार्गदर्शन और आध्यात्मिक उन्नति के प्रतीक हैं, जो अनंत काल तक लोगों को प्रेरित और मार्गदर्शित करते रहेंगे।

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भगवान कृष्ण की पूरी कहानी क्या है?

भगवान कृष्ण की कहानी भारतीय धर्मग्रंथों, विशेष रूप से महाभारत, भगवद गीता, और भागवतमाहापुराण में विस्तृत रूप से वर्णित है। श्री कृष्ण का जन्म द्वापर युग में मथुरा में वसुदेव और देवकी के पुत्र के रूप में हुआ था। उन्होंने अपने बाल्यकाल में गोकुल में विभिन्न लीलाएं कीं, जैसे माखन चोरी और पूतना का वध। युवा अवस्था में उन्होंने मथुरा में कंस का वध किया और द्वारका नगरी की स्थापना की। महाभारत के युद्ध में उन्होंने पांडवों को मार्गदर्शन दिया और अर्जुन को भगवद गीता का उपदेश दिया। श्री कृष्ण की शिक्षाएं धर्म, कर्म, और भक्ति पर आधारित हैं। उनके अवसान के बाद, कलियुग की शुरुआत हुई, और वे अपनी दिव्य शिक्षाओं के माध्यम से आज भी भक्तों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

श्री कृष्ण का इतिहास क्या है?

श्री कृष्ण का इतिहास धार्मिक ग्रंथों में विस्तार से वर्णित है। श्री कृष्ण का जन्म मथुरा के कंस के अत्याचार से मुक्ति के लिए हुआ था। वसुदेव और देवकी के पुत्र के रूप में जन्मे श्री कृष्ण ने बाल्यकाल में गोकुल में माखन चोरी की, पूतना का वध किया और गोपियों के साथ रासलीला की। युवा अवस्था में, उन्होंने कंस का वध किया और द्वारका नगरी की स्थापना की। महाभारत के युद्ध में वे पांडवों के मार्गदर्शक बने और भगवद गीता के माध्यम से महत्वपूर्ण उपदेश दिए। उनके जीवन और शिक्षाएं धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं।

कृष्ण जी का असली नाम क्या है?

भगवान कृष्ण के असली नाम “कृष्ण” ही है। “कृष्ण” संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ होता है “काले” या “अंधेरे रंग का,” जो उनके रूप की विशेषता को दर्शाता है। श्री कृष्ण को विभिन्न उपनामों और नामों से भी जाना जाता है, जैसे “कन्हैया,” “गोपाल,” “नंदलाल,” और “वसुदेव पुत्र,” लेकिन उनके असली नाम “कृष्ण” ही है।

श्री कृष्ण की उम्र कितनी थी?

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, श्री कृष्ण का जीवन 125 वर्ष तक का था। उनके जीवन की अवधि और घटनाएं द्वापर युग की घटनाओं के अनुसार निर्धारित की जाती हैं, जो लगभग 5000 वर्षों पूर्व की मानी जाती है। श्री कृष्ण के जीवनकाल के प्रमुख घटनाक्रम, उनके बाल्यकाल से लेकर महाभारत के युद्ध और उनके अवसान तक, उनके 125 वर्षों की अवधि में घटित हुए।

कृष्ण कहाँ चले गए हैं?

श्री कृष्ण का प्रस्थान द्वापर युग के अंत में हुआ, जब उन्होंने पृथ्वी से विदा ली और अपने दिव्य लोक, श्री वैकुंठ की ओर लौट गए। उनके प्रस्थान के बाद, यादव वंश का पतन हुआ और द्वारका नगरी समुद्र में समा गई। उनके प्रस्थान को कलियुग की शुरुआत के साथ जोड़ा जाता है, जो एक नए युग का प्रतीक है। श्री कृष्ण की शिक्षाएं और उपदेश आज भी उनके भक्तों द्वारा श्रद्धा और आदर के साथ स्मरण किए जाते हैं।

राधा कृष्ण के कितने पुत्र थे?

धार्मिक ग्रंथों और पौराणिक कथाओं के अनुसार, श्री कृष्ण और राधा के कोई पुत्र नहीं थे। राधा और कृष्ण का प्रेम दिव्य और आध्यात्मिक था, जो भौतिक जीवन की सीमाओं से परे था। राधा और कृष्ण की कथा प्रेम और भक्ति का आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करती है, और उनके रिश्ते को ईश्वर और भक्त के बीच का अनुपम संबंध माना जाता है। उनके जीवन की कथा को भक्ति, प्रेम, और समर्पण के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

बनवारी तेरी यारी ने दीवाना बना दिया – Banwari Teri Yaari Ne Deewana Bana Diya

भजन बनवारी तेरी यारी ने दीवाना बना दिया (Banwari Teri Yaari Ne Deewana Bana Diya) भगवान श्रीकृष्ण के प्रति एक भक्त की गहरी भक्ति और प्रेम को व्यक्त करता है। इस भजन में भगवान श्रीकृष्ण को ‘बनवारी’ कहकर पुकारा गया है, जो उन्हें वृंदावन के वन में रमण करने वाले के रूप में दर्शाता है। यह भजन भक्त की उन भावनाओं का प्रतीक है, जिसमें वह अपने आराध्य से इतना जुड़ गया है कि उसकी हर सोच, हर भावना केवल श्रीकृष्ण के इर्द-गिर्द ही घूमती है। आप नन्द के आनन्द भयो , मुझे अपने ही रंग में रंग ले मेरे यार सवारे लिरिक्स भी पढ़ सकते हैं।

भक्त को भगवान की यारी, यानी उनकी संगति, ने इस हद तक प्रभावित किया है कि वह संसार के मोह-माया से मुक्त होकर केवल प्रभु की भक्ति में लीन हो गया है। ‘दीवाना’ शब्द का प्रयोग यह दर्शाने के लिए किया गया है कि भक्त की भक्ति किसी साधारण प्रेम से नहीं, बल्कि एक गहन और अनन्य प्रेम से उत्पन्न हुई है। यह प्रेम उसे संसार की सभी चिंताओं से मुक्त कर देता है और केवल भगवान की भक्ति में डूबने को प्रेरित करता है।

यह भजन केवल भगवान श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम का ही नहीं, बल्कि उनके साथ संबंध की एक गहरी अनुभूति का भी वर्णन करता है। जब भक्त कहता है, “बनवारी तेरी यारी ने दीवाना बना दिया,” तो वह यह मानता है कि भगवान के साथ उसकी मित्रता या यारी ही उसके जीवन का सबसे बड़ा उपहार है। यह मित्रता उसे हर प्रकार की बंधनों से मुक्त कर देती है और उसे एक अद्वितीय आध्यात्मिक आनंद की ओर ले जाती है।

अंततः, यह भजन एक सच्चे भक्त की भावना का प्रतीक है, जो भगवान श्रीकृष्ण के साथ अपने संबंध को सर्वोच्च मानता है। यह भजन भक्त को याद दिलाता है कि भगवान के साथ सच्ची मित्रता और प्रेम ही जीवन का असली सार है, और यह भक्ति उसे किसी भी सांसारिक बंधन से ऊपर उठाकर दिव्य आनंद की अनुभूति करा सकती है।


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|| बनवारी तेरी यारी ने दीवाना बना दिया ||

बनवारी तेरी यारी ने दीवाना बना दिया (2)
दीवाना बना दिया हमे, मस्ताना बना दिया (2)
बनवारी गिरधारी बनवारी
तेरी यारी ने, दीवाना बना दिया ll
बनवारी तेरी यारी ने दीवाना बना दिया

भूल गई सुध बुध अपनी, बे-सुध सी हो गई,
अपने ही घर में रह कर, अनजानी हो गई ll (2)
तुम्हे शमा बना के, तुम्हे शमा बना के
दिल अपना, परवाना बना दिया
बनवारी तेरी यारी ने………..

तेरी पायल का बन घुंघरूं, नाचूंगी संग मैं,
छोड़ रंग दुनियाँ के रंग गई, तेरे ही रंग में ll (2)
तुम्हे बना के मथुरा, तुम्हे बना के मथुरा
और खुद को, बरसाना बना दिया
बनवारी तेरी यारी ने…………

कुछ भी कहे ज़माना, अब कोई परवाह ही नहीं,
धन दौलत और शोहरत की, अब मुझ को चाह नहीं ll (2)
क्या करूँ कांच के, क्या करूँ कांच के टुकड़ों का,
मैंने हीरा पा लिया,
बनवारी तेरी यारी ने……..

तुम जो प्रेम पतंग बना, बन जाऊँगी डोर मैं,
उड़ती फिरूं गगन में संग संग, चारों ओर मैं ll (2)
कहे किशन तेरी, कहे किशन तेरी,
पद रैनू ने जग बंधन छुड़ा लिया,
बनवारी तेरी यारी ने………….

|| Banwari Teri Yaari Ne Deewana Bana Diya ||

Banwari Teri Yaari Ne Deewana Bana Diya (2)
Deewana Bana Diya Humein Mastana Bana Diya (2)
Banwari Girdhari Banwari
Teri Yaari Ne Deewana Bana Diya
Banwari Teri Yaari Ne Deewana Bana Diya

Bhool Gayi Budh Apni, Be-Sudh Si Ho Gayi,
Apne Hi Ghar Mein Reh Kar, Anjaani Ho Gayi (2)
Tumhe Shama Bana Ke, Tumhe Shama Bana Ke
Dil Apna, Parwana Bana Diya
Banwari Teri Yaari Ne………..

Teri Payal Ka Bann Ghunghroo, Nachungi Sangh Mein
Chord Rang Duniya Ke Rang Gayi, Tere Rang Mein (2)
Tumhe Bana Ke Mathura, Tumhe Bana Ke Mathura,
Aur Khudh Ko, Barsana Bana Diya
Banwari Teri Yaari Ne………..

Kuch Bhi Kahe Jamana, Ab Koi Parwah Hi Nahi
Dhan Daulat Aur Shohrat Ki, Ab Mujh Ko Chah Nahi (2)
Kya Karun Kaanch Ke, Kya Karun Kaanch Ke Tukdo Ka
Maine Heera Paa Liya
Banwari Teri Yaari Ne………..

Tum Ko Prem Patang Bana, Bann Jaungi Dor Mein
Udti Phiru Gagan Mein Sangh Sangh, Chaaro Aur Mein (2)
Kahe Kishan Teri, Kahe Kishan Teri
Padh Renu Ne Jagh Bandhan Chuda Liya
Banwari Teri Yaari Ne………..



भजन “बनवारी तेरी यारी ने दीवाना बना दिया” का अर्थ और उसके लाभों को समझने के लिए हमें सबसे पहले इस भजन के मूल तत्वों और उसके गहरे आध्यात्मिक महत्व को समझना होगा। यह भजन एक भक्त और उसके आराध्य भगवान श्रीकृष्ण के बीच के अटूट प्रेम, भक्ति, और समर्पण को उजागर करता है। श्रीकृष्ण को ‘बनवारी’ कहकर संबोधित करना, उनके वृंदावन के जीवन और उनके प्रति भक्तों के प्रेम का प्रतीक है।

1. मानसिक शांति और स्थिरता

इस भजन के माध्यम से जो लाभ सबसे पहले सामने आता है, वह है मानसिक शांति और स्थिरता। भजन गाने और सुनने से मन को एक अद्वितीय शांति मिलती है। जब कोई व्यक्ति भगवान के प्रति गहरे प्रेम और भक्ति से ओत-प्रोत हो जाता है, तो वह सभी प्रकार की मानसिक चिंताओं और तनावों से मुक्त हो जाता है। “बनवारी तेरी यारी ने दीवाना बना दिया” इस बात का प्रतीक है कि भगवान की यारी या संगति में जो आनंद मिलता है, वह किसी भी सांसारिक सुख से बढ़कर है। यह भजन हमें मानसिक और भावनात्मक स्थिरता प्रदान करता है, जो आज के युग में बेहद महत्वपूर्ण है।

2. आत्मसमर्पण का भाव

भजन का दूसरा महत्वपूर्ण लाभ है आत्मसमर्पण का भाव। जब एक भक्त यह स्वीकार करता है कि “तेरी यारी ने दीवाना बना दिया,” तो वह वास्तव में अपने अहंकार और स्वार्थ को त्यागकर पूरी तरह से भगवान की इच्छा में समर्पित हो जाता है। इस आत्मसमर्पण से व्यक्ति का जीवन सरल और समृद्ध हो जाता है, क्योंकि वह हर चीज़ में भगवान की इच्छा को देखता है और स्वीकार करता है। यह समर्पण हमें संसार के माया-जाल से मुक्त करता है और एक सरल, सादगीपूर्ण और शांति-भरा जीवन जीने की प्रेरणा देता है।

3. भक्तिमय जीवन का विकास

यह भजन भक्त को भगवान की भक्ति में डूबने के लिए प्रेरित करता है। “तेरे नाम की मस्ती ने मुझे दीवाना बना दिया” यह पंक्ति भगवान के नाम और उनकी महिमा की निरंतर स्मरण करने की प्रेरणा देती है। इस स्मरण से भक्त का जीवन पूरी तरह से भक्ति-पूर्ण हो जाता है। जब व्यक्ति अपने जीवन के हर क्षण में भगवान का नाम जपता है और उनकी महिमा का गुणगान करता है, तो वह सभी प्रकार की विपत्तियों से सुरक्षित रहता है और उसके जीवन में सकारात्मकता का संचार होता है।

4. जीवन में एकाग्रता और उद्देश्य की प्राप्ति

भजन गाने से भक्त का मन भगवान में एकाग्रित हो जाता है। “तेरी बाँसुरी की धुन ने ऐसा जादू कर दिया” यह पंक्ति भगवान की मधुर वाणी और उनके उपदेशों की ओर इशारा करती है। जब भक्त भगवान की वाणी और उनकी शिक्षाओं में एकाग्रित हो जाता है, तो वह अपने जीवन के उद्देश्य को स्पष्ट रूप से समझने लगता है। यह भजन व्यक्ति को एक स्पष्ट और उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा देता है, जहाँ हर कार्य और सोच भगवान की महिमा और उनकी सेवा के लिए समर्पित होता है।

5. प्रेम और करुणा का प्रसार

भजन के माध्यम से प्रेम और करुणा का प्रसार होता है। “तेरे प्यार में खो गया, तेरे रंग में रंग गया” यह पंक्ति बताती है कि भगवान के प्रेम में डूबकर व्यक्ति का मन करुणा और दया से भर जाता है। भगवान की भक्ति में रंगा हुआ व्यक्ति अपने आसपास के लोगों के प्रति भी प्रेम और सहानुभूति का भाव रखता है। यह प्रेम और करुणा का भाव व्यक्ति को एक बेहतर इंसान बनाता है और समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने में सहायक होता है।

6. आत्मज्ञान की प्राप्ति

यह भजन व्यक्ति को आत्मज्ञान की ओर ले जाता है। जब भक्त कहता है, “अब तो हर सांस में तेरा ही नाम है,” तो वह वास्तव में आत्मज्ञान की स्थिति में पहुंच चुका होता है। यह आत्मज्ञान उसे अपने वास्तविक स्वरूप का बोध कराता है और उसे जीवन के सही मायने समझने में सहायता करता है। भगवान के प्रति यह अटूट भक्ति व्यक्ति को आत्मज्ञान की दिशा में अग्रसर करती है, जहाँ वह अपनी आत्मा और परमात्मा के एकत्व का अनुभव करता है।

7. संसारिक मोह-माया से मुक्ति

भजन का एक और महत्वपूर्ण लाभ यह है कि यह भक्त को संसारिक मोह-माया से मुक्त करता है। “तेरी यारी ने मुझे दीवाना बना दिया” यह पंक्ति इस बात की प्रतीक है कि भगवान की भक्ति में डूबकर व्यक्ति सभी प्रकार की सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाता है। वह केवल भगवान की भक्ति में लीन हो जाता है और उसे संसार के अन्य भौतिक सुखों में कोई दिलचस्पी नहीं रहती। यह भजन हमें यह सिखाता है कि भगवान की भक्ति में ही जीवन की सच्ची खुशी है और अन्य सभी चीजें तुच्छ हैं।

8. आध्यात्मिक प्रगति और मोक्ष की प्राप्ति

यह भजन भक्त को आध्यात्मिक प्रगति की ओर अग्रसर करता है। जब भक्त पूरी तरह से भगवान में लीन हो जाता है, तो वह सभी प्रकार की आध्यात्मिक बाधाओं को पार कर लेता है। “तेरी यारी ने मुझे दीवाना बना दिया” यह पंक्ति इस बात का प्रतीक है कि भगवान के साथ संबंध में वह मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है। यह भजन हमें यह सिखाता है कि भगवान की भक्ति और उनके प्रति समर्पण से ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है, और यही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है।

9. नकारात्मक विचारों से मुक्ति

भजन के माध्यम से व्यक्ति नकारात्मक विचारों और भावनाओं से मुक्त हो जाता है। भगवान के नाम का स्मरण और उनकी महिमा का गुणगान करने से व्यक्ति के मन में सकारात्मक विचारों का उदय होता है। “तेरे नाम की मस्ती ने मुझे दीवाना बना दिया” यह पंक्ति इस बात का प्रतीक है कि भगवान के नाम का स्मरण व्यक्ति के मन को शांत और सकारात्मक बनाता है। नकारात्मक विचार और भावनाएँ, जो व्यक्ति को दुखी और तनावग्रस्त बनाती हैं, वे इस भजन के माध्यम से समाप्त हो जाती हैं।

10. समाज में शांति और सद्भावना का प्रसार

भजन के माध्यम से व्यक्ति न केवल अपने जीवन में शांति और स्थिरता प्राप्त करता है, बल्कि समाज में भी शांति और सद्भावना का प्रसार करता है। “तेरी बाँसुरी की धुन ने ऐसा जादू कर दिया” यह पंक्ति इस बात का प्रतीक है कि भगवान की मधुर धुन सभी प्रकार के द्वेष और संघर्षों को समाप्त कर देती है। जब समाज में हर व्यक्ति भगवान की भक्ति में लीन होता है, तो समाज में शांति और सद्भावना का वातावरण बनता है। यह भजन समाज में एकता, प्रेम और सहयोग की भावना का विकास करता है।

11. परिवारिक और सामाजिक संबंधों का सुधार

भजन गाने और सुनने से पारिवारिक और सामाजिक संबंधों में सुधार होता है। जब व्यक्ति भगवान की भक्ति में लीन होता है, तो वह अपने परिवार और समाज के प्रति भी अपने कर्तव्यों का पालन करता है। “तेरे प्यार में खो गया, तेरे रंग में रंग गया” यह पंक्ति इस बात का प्रतीक है कि भगवान के प्रेम में रंगा हुआ व्यक्ति अपने परिवार और समाज के प्रति भी प्रेम और सहानुभूति का भाव रखता है। यह भजन व्यक्ति को एक अच्छा पति, पत्नी, माता-पिता और समाज का सदस्य बनने की प्रेरणा देता है।

12. धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण

भजन के माध्यम से धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण होता है। “अब तो हर सांस में तेरा ही नाम है” यह पंक्ति इस बात का प्रतीक है कि व्यक्ति अपने जीवन में धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों को अपनाता है। यह भजन व्यक्ति को भगवान के प्रति समर्पित जीवन जीने की प्रेरणा देता है, जिसमें धर्म और संस्कृति का पालन करना महत्वपूर्ण होता है। इससे धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहरों का संरक्षण होता है और वे आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करती हैं।

13. धार्मिक उत्सवों और समारोहों में महत्व

भजन का एक और महत्वपूर्ण लाभ यह है कि यह धार्मिक उत्सवों और समारोहों का अभिन्न हिस्सा बनता है। “बनवारी तेरी यारी ने दीवाना बना दिया” जैसे भजन धार्मिक उत्सवों, पूजा-पाठ और सामूहिक भक्ति समारोहों में गाए जाते हैं। यह भजन धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सवों को और भी खास बनाता है और उनमें एक विशेष आध्यात्मिक वातावरण का निर्माण करता है। इसके गाने से धार्मिक उत्सवों की गरिमा बढ़ती है और भक्तों को भगवान के करीब आने का अवसर मिलता है।

14. समय के साथ भक्ति की गहराई

भजन का लाभ यह भी है कि यह समय के साथ भक्त की भक्ति की गहराई को बढ़ाता है। “तेरी यारी ने मुझे दीवाना बना दिया” यह पंक्ति इस बात का प्रतीक है कि भगवान के साथ समय बिताने से भक्त की भक्ति और भी गहरी हो जाती है। जब व्यक्ति नियमित रूप से भजन गाता है और भगवान का स्मरण करता है, तो उसकी भक्ति और भी दृढ़ हो जाती है। यह भजन हमें नियमित रूप से भगवान की भक्ति में लीन रहने की प्रेरणा देता है, जिससे हमारी भक्ति की गहराई और भी बढ़ती है।

15. जीवन में संतोष और आनंद का अनुभव

अंततः, भजन का सबसे महत्वपूर्ण लाभ यह है कि यह हमें जीवन में संतोष और आनंद का अनुभव कराता है। “तेरी यारी ने मुझे दीवाना बना दिया” यह पंक्ति इस बात का प्रतीक है कि भगवान की भक्ति में डूबकर व्यक्ति को एक अद्वितीय आनंद और संतोष की प्राप्ति होती है। यह भजन व्यक्ति को यह सिखाता है कि सच्चा आनंद और संतोष केवल भगवान की भक्ति में ही मिल सकता है, और अन्य सभी सांसारिक सुख-समृद्धियाँ तुच्छ हैं। जब व्यक्ति भगवान की भक्ति में संतुष्ट हो जाता है, तो वह हर परिस्थिति में खुश और संतुष्ट रहता है।

विष्णु सहस्त्रनाम पाठ हिन्दी में PDF – Vishnu Sahasranama Stotram Hindi PDF 2024-25

विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र (Vishnu Sahasranama Stotram), हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह स्तोत्र महाभारत के अनुशासन पर्व से लिया गया है, जिसमें भगवान विष्णु के हजार नामों का संकलन किया गया है। इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति को मानसिक शांति, सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं। विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसका आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी अत्यधिक है। यहां पर श्री लक्ष्मी चालीसा | श्री लक्ष्मी जी की आरती | श्री महालक्ष्मी अष्टक पाठ भी उपलब्ध है!

इस स्तोत्र में भगवान विष्णु के विभिन्न नामों और उनके अर्थों का वर्णन किया गया है। हर नाम में एक विशेष अर्थ और महत्व छिपा हुआ है, जो भगवान के गुणों और उनके कर्तव्यों को प्रकट करता है। यह नाम संकलन भगवान विष्णु की महिमा का गुणगान करता है और उनके प्रति भक्तों की आस्था को और भी सुदृढ़ बनाता है। इसे प्रतिदिन या विशेष अवसरों पर पाठ करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।



॥ श्रीहरिः ॥

॥ अथ श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्रम् ॥

यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात् ।
विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ।

अर्थ – जिनके स्मरण करने मात्र से मनुष्य जन्म-मृत्यु रूप संसार बन्धन से मुक्त हो जाता है,
सबकी उत्पत्ति के कारणभूत उन भगवान विष्णु को नमस्कार है।

नमः समस्तभूतानामादिभूताय भूभृते ।
अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे ।

अर्थ – सम्पूर्ण प्राणियों के आदिभूत, पृथ्वी को धारण करने वाले,
अनेक रूपधारी और सर्वसमर्थ भगवान विष्णु को प्रणाम है।

[ वैशम्पायन उवाच ]

श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः ।
युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत ॥1॥

अर्थ – [ वैशम्पायन जी कहते हैं ]
राजन् ! धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर ने सम्पूर्ण विधिरूप धर्म
तथा पापों का क्षय करने वाले धर्म रहस्यों को सब प्रकार सुनकर शान्तनु पुत्र भीष्म से फिर पूछा ॥1॥

[ युधिष्ठिर उवाच ]

किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् ।
स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम् ॥2॥

अर्थ – [ युधिष्ठिर बोले ]
समस्त जगत में एक ही देव कौन है ? तथा इस लोक में एक ही परम आश्रय स्थान कौन है ?
जिसका साक्षात्कार कर लेने पर जीव की अविद्यारूप हृदय-ग्रन्थि टूट जाती है,
सब संशय नष्ट हो जाते हैं तथा सम्पूर्ण कर्म क्षीण हो जाते हैं।
किस देव की स्तुति, गुण-कीर्तन करने से तथा किस देव का नाना प्रकार से बाह्य
और आन्तरिक पूजन करने से मनुष्य कल्याण की प्राप्ति कर सकते हैं ? ॥2॥

को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः ।
किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात् ॥3॥

अर्थ – आप समस्त धर्मों में पूर्वोक्त लक्षणों से युक्त किस धर्म को परम श्रेष्ठ मानते हैं ?
तथा किसका जप करने से जीव जन्म-मरणरूप संसार बंधन से मुक्त हो जाता है ? ॥3॥

[ भीष्म उवाच ]

जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम् ।
स्तुवन्नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः ॥4॥

अर्थ – [ भीष्म जी ने कहा ]
स्थावर जंगमरूप संसार के स्वामी, ब्रह्मादि देवों के देव,
देश-काल और वस्तु से अपरिच्छिन्न, क्षर-अक्षर से श्रेष्ठ पुरुषोत्तम का सहस्र नामों के द्वारा
निरन्तर तत्पर रह कर गुण-संकीर्तन करने से पुरुष सब दुःखों से पार हो जाता है ॥4॥

तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम् ।
ध्यायन्स्तुवन्नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ॥5॥

अर्थ – तथा उसी विनाशरहित पुरुष का सब समय भक्ति से युक्त होकर पूजन करने से,
उसी का ध्यान करने से तथा पूर्वोक्त प्रकार से सहस्र नामों के द्वारा
स्तवन एवं नमस्कार करने से पूजा करने वाला सब दुःखों से छूट जाता है ॥5॥

अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम् ।
लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत् ॥6॥

अर्थ – उस जन्म-मृत्यु आदि छः भाव विकारों से रहित, सर्वव्यापक, सम्पूर्ण लोकों के महेश्वर,
लोकाध्यक्ष देव की निरन्तर स्तुति करने से मनुष्य सब दुःखों से पार हो जाता है ॥6॥

ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम् ।
लोकनाथं महद्भूतं सर्वभूतभवोद्भवम् ॥7॥

अर्थ – जगत की रचना करने वाले ब्रह्मा के तथा ब्राह्मण, तप और श्रुति के हितकारी,
सब धर्मों को जानने वाले, प्राणियों की कीर्ति को बढ़ाने वाले, सम्पूर्ण लोकों के स्वामी,
समस्त भूतों के उत्पत्ति स्थान एवं संसार के कारणरूप परमेश्वर का
स्तवन करने से मनुष्य सब दुःखों से छूट जाता है ॥7॥

एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः ।
यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा ॥8॥

अर्थ – विधिरूप सम्पूर्ण धर्मों में मैं इसी धर्म को सबसे बड़ा मानता हूँ
कि मनुष्य अपने हृदय कमल में विराजमान कमलनयन भगवान वासुदेव का
भक्तिपूर्वक तत्परता सहित गुण-संकीर्तन रूप स्तुतियों से सदा अर्चन करे ॥8॥

परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः ।
परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥9॥

अर्थ – जो देव परम तेज, परम तप, परम ब्रह्म और परम परायण है,
वही समस्त प्राणियों की परम गति है ॥9॥

पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् ।
दैवतं देवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥10॥।

यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे ।
यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥11॥।

तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते ।।
विष्णोर्नामसहस्रं मे शृणु पापभयापहम् ॥12॥

अर्थ – पृथ्वीपते ! जो पवित्र करने वाले तीर्थादिकों में परम पवित्र है,
मंगलों का मंगल है, देवों का देव है तथा जो भूत प्राणियों का अविनाशी पिता है,
कल्प के आदि में जिससे सम्पूर्ण भूत उत्पन्न होते हैं और
फिर युग का क्षय होने पर महाप्रलय में जिसमें वे विलीन हो जाते हैं,
उस लोकप्रधान, संसार के स्वामी भगवान विष्णु के पाप और
संसार भय को दूर करने वाले हजार नामों को मुझसे सुन ॥10 – 12॥

यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः ।
ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये ॥13॥

अर्थ – जो नाम गुण के कारण प्रवृत्त हुए हैं, उनमें से जो-जो प्रसिद्ध हैं और मन्त्रद्रष्टा मुनियों द्वारा जो जहाँ-तहाँ सर्वत्र भगवत्कथाओं में गाये गये हैं, उस अचिन्त्य प्रभाव महात्मा के उन समस्त नामों को पुरुषार्थ सिद्धि के लिये वर्णन करता हूँ ॥13॥

ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
भूतकृद् भूतभृद् भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥14॥

अर्थ – ॐ सच्चिदानन्द स्वरूप,
विश्वम् – समस्त जगत के कारणरूप,
विष्णुः – सर्वव्यापी,
वषट्कारः – जिनके उद्देश्य से यज्ञ में वषट्क्रिया की जाती है, ऐसे यज्ञस्वरूप,
भूतभव्यभवत्प्रभुः – भूत, भविष्य और वर्तमान के स्वामी,
भूतकृत् – रजोगुण का आश्रय लेकर ब्रह्मारूप से सम्पूर्ण भूतों की रचना करने वाले,
भूतभृत् – सत्त्वगुण का आश्रय लेकर सम्पूर्ण भूतों का पालन-पोषण करने वाले,
भावः – नित्यस्वरूप होते हुए भी स्वतः उत्पन्न होने वाले,
भूतात्मा – सम्पूर्ण भूतों के आत्मा अर्थात अन्तर्यामी,
भूतभावनः – भूतों की उत्पत्ति और वृद्धि करने वाले ॥14॥

पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः ।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥15॥

अर्थ –
पूतात्मा – पवित्रात्मा,
परमात्मा – परम श्रेष्ठ नित्यशुद्ध-बुद्ध मुक्त स्वभाव,
मुक्तानां परमा गतिः – मुक्त पुरुषों की सर्वश्रेष्ठ गतिस्वरूप,
अव्ययः – कभी विनाश को प्राप्त न होने वाले,
पुरुषः – पुर अर्थात शरीर में शयन करने वाले,
साक्षी – बिना किसी व्यवधान के सब कुछ देखने वाले,
क्षेत्रज्ञः – क्षेत्र अर्थात समस्त प्रकृति रूप शरीर को पूर्णतया जानने वाले,
अक्षरः – कभी क्षीण न होने वाले ॥15॥

योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः ।
नारसिंहवपुः श्रीमान्केशवः पुरुषोत्तमः ॥16॥

अर्थ –
योगः – मनसहित सम्पूर्ण ज्ञानेन्द्रियों के निरोधरूप योग से प्राप्त होने वाले,
योगविदां नेता – योग को जानने वाले भक्तों के योगक्षेम आदि का निर्वाह करने में अग्रसर रहने वाले,
प्रधानपुरुषेश्वरः – प्रकृति और पुरुष के स्वामी,
नारसिंहवपुः – मनुष्य और सिंह दोनों के जैसा शरीर धारण करने वाले नरसिंह रूप,
श्रीमान् – वक्षःस्थल में सदा श्री को धारण करने वाले,
केशवः – ब्रह्मा, विष्णु और महादेव ( त्रिमूर्ति स्वरुप ),
पुरुषोत्तमः – क्षर और अक्षर इन दोनों से सर्वथा उत्तम ॥16॥

सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः ।
सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥17॥

अर्थ –
सर्वः – असत् और सत् , सबकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के स्थान,
शर्वः – सारी प्रजा का प्रलयकाल में संहार करने वाले,
शिवः – तीनों गुणों से परे कल्याण स्वरुप,
स्थाणुः – स्थिर,
भूतादिः – भूतों के आदिकारण,
निधिरव्ययः – प्रलयकाल में सब प्राणियों के लीन होने के अविनाशी स्थानरूप,
सम्भवः – अपनी इच्छा से भली प्रकार प्रकट होने वाले,
भावनः – समस्त भोक्ताओं के फलों को उत्पन्न करने वाले,
भर्ता – सबका भरण करने वाले,
प्रभवः – दिव्य जन्म वाले,
प्रभुः – सबके स्वामी,
ईश्वरः – उपाधिरहित ऐश्वर्य वाले ॥17॥

स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।
अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥18॥

अर्थ –
स्वयम्भूः – स्वयं उत्पन्न होने वाले,
शम्भुः – भक्तों के लिये सुख उत्पन्न करने वाले,
आदित्यः – द्वादश आदित्यों में विष्णु नामक आदित्य,
पुष्कराक्षः – कमल के समान नेत्र वाले,
महास्वनः – वेदरूप अत्यन्त महान घोष वाले,
अनादिनिधनः – जन्म मृत्यु से रहित,
धाता – विश्व को धारण करने वाले,
विधाता – कर्म और उसके फलों की रचना करने वाले,
धातुरुत्तमः – कार्य-कारणरूप सम्पूर्ण प्रपंच को धारण करने वाले एवं सर्वश्रेष्ठ ॥18॥

अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः ।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥19॥

अर्थ –
अप्रमेयः – प्रमाण आदि से जानने में न आ सकने वाले,
हृषीकेशः – इन्द्रियों के स्वामी,
पद्मनाभः – जगत के कारणरूप कमल को अपनी नाभि में स्थान देने वाले,
अमरप्रभुः – देवताओं के स्वामी,
विश्वकर्मा – सारे जगत की रचना करने वाले,
मनुः – प्रजापति मनुरूप,
त्वष्टा – संहार के समय सम्पूर्ण प्राणियों को क्षीण करने वाले,
स्थविष्ठः – अत्यन्त स्थूल,
स्थविरो ध्रुवः – अति प्राचीन एवं अत्यन्त स्थिर ॥19॥

अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः ।
प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥20॥

अर्थ –
अग्राह्यः – मन से भी ग्रहण न किये जा सकने वाले,
शाश्वतः – सब काल में स्थित रहने वाले,
कृष्णः – सब के चित्त को बलात अपनी ओर आकर्षित करने वाले परमानन्द स्वरुप,
लोहिताक्षः – लाल नेत्रों वाले,
प्रतर्दनः – प्रलयकाल में प्राणियों का संहार करने वाले,
प्रभूतः – ज्ञान, ऐश्वर्य आदि गुणों से सम्पन्न,
त्रिककुब्धाम – ऊपर, नीचे और मध्य भेदवाली तीनों दिशाओं के आश्रयरुप,
पवित्रम् – सबको पवित्र करने वाले,
मङ्गलं परम् – परम मंगल स्वरुप ॥20॥

ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः ।
हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥21॥

अर्थ –
ईशानः – सर्वभूतों के नियन्ता,
प्राणदः – सबके प्राण संशोधन करने वाले,
प्राणः – सबको जीवित रखने वाले प्राण स्वरुप,
ज्येष्ठः – सबके कारण होने से सबसे बड़े,
श्रेष्ठः – सबमें उत्कृष्ट होने से परम श्रेष्ठ,
प्रजापतिः – ईश्वर रूप से सारी प्रजाओं के मालिक,
हिरण्यगर्भः – ब्रह्माण्ड रूप हिरण्यमय अण्ड के भीतर ब्रह्मा रूप से व्याप्त होने वाले,
भूगर्भः – पृथ्वी के गर्भ में रहने वाले,
माधवः – लक्ष्मी के पति,
मधुसूदनः – मधु नामक दैत्य को मारने वाले ॥21॥

ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान् ॥22॥

अर्थ –
ईश्वरः – सर्वशक्तिमान ईश्वर,
विक्रमी – शूरवीरता से युक्त,
धन्वी – शार्ङ्ग धनुष रखने वाले,
मेधावी – अतिशय बुद्धिमान,
विक्रमः – गरुड़ पक्षी द्वारा गमन करने वाले,
क्रमः – क्रम विस्तार के कारण,
अनुत्तमः – सर्वोत्कृष्ट,
दुराधर्षः – किसी से भी तिरस्कृत न हो सकने वाले,
कृतज्ञः – अपने निमित्त से थोड़ा सा भी त्याग किये जाने पर उसे बहुत मानने वाले,
कृतिः – पुरुष प्रयत्न के आधार रूप,
आत्मवान् – अपनी ही महिमा में स्थित ॥22॥

सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः ।
अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥23॥

अर्थ –
सुरेशः – देवताओं के स्वामी,
शरणम् – दीन-दुःखियों के परम आश्रय,
शर्म – परमानन्द स्वरूप,
विश्वरेताः – विश्व के कारण,
प्रजाभवः – सारी प्रजा को उत्पन्न करने वाले,
अहः – प्रकाश रूप,
संवत्सरः – काल रूप से स्थित,
व्यालः – सर्प के समान ग्रहण करने में न आ सकने वाले,
प्रत्ययः – उत्तम बुद्धि से जानने में आने वाले,
सर्वदर्शनः – सब के द्रष्टा ॥23॥

अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः ।
वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः ॥24॥

अर्थ –
अजः – जन्मरहित,
सर्वेश्वरः – समस्त ईश्वरों के भी ईश्वर,
सिद्धः – नित्यसिद्ध,
सिद्धिः – सबके फल स्वरूप,
सर्वादिः – सर्वभूतों के आदि कारण,
अच्युतः – अपनी स्वरुप-स्थिति से कभी च्युत न होने वाले,
वृषाकपिः – धर्म और वराहरूप,
अमेयात्मा – अप्रमेय स्वरुप,
सर्वयोगविनिःसृतः – नाना प्रकार के शास्त्रोक्त साधनों से जानने में आने वाले ॥24॥

वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्मासम्मितः समः ।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ॥25॥

अर्थ –
वसुः – सब भूतों के वास स्थान,
वसुमनाः – उदार मन वाले,
सत्यः – सत्य स्वरुप,
समात्मा – सम्पूर्ण प्राणियों में एक आत्मा रूप से विराजने वाले,
असम्मितः – समस्त पदार्थों से मापे न जा सकने वाले,
समः – सब समय समस्त विकारों से रहित,
अमोघः – भक्तों के द्वारा पूजन, स्तवन अथवा स्मरण किये जाने पर
उन्हें पूर्णरूप से उनका फल प्रदान करने वाले,
पुण्डरीकाक्षः – कमल के समान नेत्रों वाले,
वृषकर्मा – धर्ममय कर्म करने वाले,
वृषाकृतिः – धर्म की स्थापना करने के लिये विग्रह धारण करने वाले ॥25॥

रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः ।
अमृतः शाश्वतः स्थाणुर्वरारोहो महातपाः ॥26॥

अर्थ –
रुद्रः – दुःख या दुःख के कारण को दूर भगा देने वाले,
बहुशिराः – बहुत से सिरों वाले,
बभ्रुः – लोकों का भरण करने वाले,
विश्वयोनिः – विश्व को उत्पन्न करने वाले,
शुचिश्रवाः – पवित्र कीर्ति वाले,
अमृतः – कभी न मरने वाले,
शाश्वतस्थाणुः – नित्य सदा एकरस रहने वाले एवं स्थिर,
वरारोहः – आरूढ़ होने के लिये परम उत्तम स्थान रूप,
महातपाः – प्रताप रूप महान तप वाले ॥26॥

सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः ।
वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित्कविः ॥27॥

अर्थ –
सर्वगः – कारण रूप से सर्वत्र व्याप्त रहने वाले,
सर्वविद्भानुः – सब कुछ जानने वाले तथा प्रकाश रूप,
विष्वक्सेनः – युद्ध के लिये की हुई तैयारी मात्र से ही
दैत्य सेना को तितर-बितर कर डालने वाले,
जनार्दनः – भक्तों के द्वारा अभ्युदय-निःश्रेयस रूप
परम पुरुषार्थ की याचना किये जाने वाले,
वेदः – वेद रूप,
वेदवित् – वेद तथा वेद के अर्थ को यथावत जानने वाले,
अव्यङ्गः – ज्ञानादि से परिपूर्ण अर्थात किसी प्रकार अधूरे न रहने वाले,
वेदाङ्गः – वेद रूप अंगों वाले,
वेदवित् – वेदों को विचारने वाले,
कविः – सर्वज्ञ ॥27॥

लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः ।
चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥28॥

अर्थ –
लोकाध्यक्षः – समस्त लोकों के अधिपति,
सुराध्यक्षः – देवताओं के अध्यक्ष,
धर्माध्यक्षः – अनुरूप फल देने के लिये धर्म और अधर्म का निर्णय करने वाले,
कृताकृतः – कार्य रूप से कृत और कारण रूप से अकृत,
चतुरात्मा – सृष्टि की उत्पत्ति आदि के लिये चार पृथक मूर्तियों वाले,
चतुर्व्यूहः – उत्पत्ति, स्थिति, नाश और रक्षा रूप चार व्यूह वाले,
चतुर्दंष्ट्रः – चार दाढ़ों वाले नरसिंह रूप,
चतुर्भुजः – चार भुजाओं वाले ॥28॥

भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः ।
अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥29॥

अर्थ –
भ्राजिष्णुः – एकरस प्रकाश स्वरुप,
भोजनम् – ज्ञानियों द्वारा भोगने योग्य अमृत स्वरुप,
भोक्ता – पुरुष रूप से भोक्ता,
सहिष्णुः – सहनशील,
जगदादिजः – जगत के आदि में हिरण्यगर्भ रूप से स्वयं उत्पन्न होने वाले,
अनघः – पापरहित,
विजयः – ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य आदि गुणों में सबसे बढ़कर,
जेता – स्वभाव से ही समस्त भूतों को जीतने वाले,
विश्वयोनिः – प्रकृति स्वरुप,
पुनर्वसुः – बार-बार शरीरों में आत्मरूप से बसने वाले ॥29॥

उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरुर्जितः ।
अतीन्द्रः संग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ॥30॥

अर्थ –
उपेन्द्रः – इन्द्र को अनुज रूप से प्राप्त होने वाले,
वामनः – वामन रूप से अवतार लेने वाले,
प्रांशुः – तीनों लोकों को लाँघने के लिये त्रिविक्रम रूप से ऊँचे होने वाले,
अमोघः – अव्यर्थ चेष्टा वाले,
शुचिः – स्मरण, स्तुति और पूजन करने वालों को पवित्र कर देने वाले,
ऊर्जितः – अत्यन्त बलशाली,
अतीन्द्रः – स्वयंसिद्ध ज्ञान, ऐश्वर्य आदि के कारण इन्द्र से भी बढ़े-चढ़े हुए,
संग्रहः – प्रलय के समय सबको समेट लेने वाले,
सर्गः – सृष्टि के कारण रुप,
धृतात्मा – जन्मादि से रहित रहकर स्वेच्छा से स्वरुप धारण करने वाले,
नियमः – प्रजा को अपने-अपने अधिकारों में नियमित करने वाले,
यमः – अन्तःकरण में स्थित होकर नियमन करने वाले ॥30॥

वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः ।
अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ॥31॥

अर्थ –
वेद्यः – कल्याण की इच्छा वालों के द्वारा जानने योग्य,
वैद्यः – सब विद्याओं के जानने वाले,
सदायोगी – सदा योग में स्थित रहने वाले,
वीरहा – धर्म की रक्षा के लिये असुर योद्धाओं को मार डालने वाले,
माधवः – विद्या के स्वामी,
मधुः – अमृत की तरह सबको प्रसन्न करने वाले,
अतीन्द्रियः – इन्द्रियों से सर्वथा अतीत,
महामायः – मायावियों पर भी माया डालने वाले, महान मायावी,
महोत्साहः – जगत की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के लिये तत्पर रहने वाले परम उत्साही,
महाबलः – महान बलशाली ॥31॥

महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः ।
अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ॥32॥

अर्थ –
महाबुद्धिः – महान बुद्धिमान,
महावीर्यः – महान पराक्रमी,
महाशक्तिः – महान सामर्थ्यवान,
महाद्युतिः – महान कान्तिमान,
अनिर्देश्यवपुः – अनिर्देश्य विग्रह वाले,
श्रीमान् – ऐश्वर्यवान,
अमेयात्मा – जिसका अनुमान न किया जा सके ऐसे आत्मा वाले,
महाद्रिधृक् – अमृत मंथन और गोरक्षण के समय मन्दराचल
और गोवर्धन नामक महान पर्वतों को धारण करने वाले ॥32॥

महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः ।
अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ॥33॥

अर्थ –
महेष्वासः – महान धनुष वाले,
महीभर्ता – पृथ्वी को धारण करने वाले,
श्रीनिवासः – अपने वक्षःस्थल में श्री को निवास देने वाले,
सतां गतिः – सत्पुरुषों के परम आश्रय,
अनिरुद्धः – सच्ची भक्ति के बिना किसी के भी द्वारा न रुकने वाले,
सुरानन्दः – देवताओं को आनन्दित करने वाले,
गोविन्दः – वेदवाणी के द्वारा अपने को प्राप्त करा देने वाले,
गोविदां पतिः – वेदवाणी को जानने वालों के स्वामी ॥33॥

मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः ।
हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥34॥

अर्थ –
मरीचिः – तेजस्वियों के भी परम तेजरूप,
दमनः – प्रमाद करने वाली प्रजा को यम आदि के रूप से दमन करने वाले,
हंसः – पितामह ब्रह्मा को वेद का ज्ञान कराने के लिये हंस रूप धारण करने वाले,
सुपर्णः – सुन्दर पंख वाले गरुड़ स्वरुप,
भुजगोत्तमः – सर्पों में श्रेष्ठ शेषनाग रूप,
हिरण्यनाभः – हितकारी और रमणीय नाभि वाले,
सुतपाः – बदरिकाश्रम में नर-नारायण रूप से सुन्दर तप करने वाले,
पद्मनाभः – कमल के समान सुन्दर नाभि वाले,
प्रजापतिः – सम्पूर्ण प्रजाओं के पालनकर्ता ॥34॥

अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान्स्थिरः ।
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥35॥

अर्थ –
अमृत्युः – मृत्यु से रहित,
सर्वदृक् – सब कुछ देखने वाले,
सिंहः – दुष्टों का विनाश करने वाले,
सन्धाता – पुरुषों को उनके कर्मों के फलों से संयुक्त करने वाले,
संधिमान् – सम्पूर्ण यज्ञ और तपों को भोगने वाले,
स्थिरः – सदा एकरूप,
अजः – भक्तों के हृदयों में जाने वाले तथा दुर्गुणों को दूर हटा देने वाले,
दुर्मर्षणः – किसी से भी सहन नहीं किये जा सकने वाले,
शास्ता – सब पर शासन करने वाले,
विश्रुतात्मा – वेदशास्त्रों में विशेष रूप से प्रसिद्ध स्वरुप वाले,
सुरारिहा – देवताओं के शत्रुओं को मारने वाले ॥35॥

गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः ।
निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥36॥

अर्थ –
गुरुः – सब विद्याओं का उपदेश करने वाले,
गुरुतमः – ब्रह्मा आदि को भी ब्रह्मविद्या प्रदान करने वाले,
धाम – सम्पूर्ण प्राणियों की कामनाओं के आश्रय,
सत्यः – सत्यस्वरूप,
सत्यपराक्रमः – अमोघ पराक्रम वाले,
निमिषः – योगनिद्रा से मुँदे हुए नेत्रों वाले,
अनिमिषः – मत्स्यरूप से अवतार लेने वाले,
स्रग्वी – वैजयन्ती माला धारण करने वाले,
वाचस्पतिरुदारधीः – सारे पदार्थों को प्रत्यक्ष करने वाली बुद्धि से
युक्त समस्त विद्याओं के पति ॥36॥

अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान्न्यायो नेता समीरणः ।
सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥37॥

अर्थ –
अग्रणीः – मुमुक्षुओं को उत्तम पद पर ले जाने वाले,
ग्रामणीः – भूत समुदाय के नेता,
श्रीमान् – सबसे बढ़ी-चढ़ी कान्ति वाले,
न्यायः – प्रमाणों के आश्रयभूत तर्क की मूर्ति,
नेता – जगत रूपी यन्त्र को चलाने वाले,
समीरणः – श्वास रूप से प्राणियों से चेष्टा कराने वाले,
सहस्रमूर्धा – हजार सिर वाले,
विश्वात्मा – विश्व के आत्मा,
सहस्राक्षः – हजार आँखों वाले,
सहस्रपात् – हजार पैरों वाले ॥37॥

आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः ।
अहःसंवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ॥38॥

अर्थ –
आवर्तनः – संसार चक्र को चलाने के स्वभाव वाले,
निवृत्तात्मा – संसार बन्धन से मुक्त आत्मस्वरूप,
संवृतः – अपनी योगमाया से ढके हुए,
सम्प्रमर्दनः – अपने रूद्र आदि स्वरुप से सबका मर्दन करने वाले,
अहःसंवर्तकः – सूर्यरूप से सम्यक्तया दिन के प्रवर्तक,
वह्निः – हवि को वहन करने वाले अग्निदेव,
अनिलः – प्राणरूप से वायु स्वरुप,
धरणीधरः – वराह और शेष रूप से पृथ्वी को धारण करने वाले ॥38॥

सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः ।
सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ॥39॥

अर्थ –
सुप्रसादः – शिशुपाल आदि अपराधियों पर भी कृपा करने वाले,
प्रसन्नात्मा – प्रसन्न स्वभाव वाले अर्थात करुणा करने वाले,
विश्वधृक् – जगत् को धारण करने वाले,
विश्वभुक् – विश्व को भोगने वाले अर्थात विश्व का पालन करने वाले,
विभुः – विविध प्रकार से प्रकट होने वाले,
सत्कर्ता – भक्तों का सत्कार करने वाले,
सत्कृतः – पूजितों से भी पूजित,
साधुः – भक्तों के कार्य साधने वाले,
जह्नुः – संहार के समय जीवों का लय करने वाले,
नारायणः – जल में शयन करने वाले,
नरः – भक्तों को परमधाम में ले जाने वाले ॥39॥

असंख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः ।
सिद्धार्थः सिद्धसंकल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ॥40॥

अर्थ –
असंख्येयः – नाम और गुणों की संख्या से शून्य,
अप्रमेयात्मा – किसी से भी मापे न जा सकने वाले,
विशिष्टः – सबसे उत्कृष्ट,
शिष्टकृत् – शासन करने वाले,
शुचिः – परम शुद्ध,
सिद्धार्थः – इच्छित अर्थ को सर्वथा सिद्ध कर चुकने वाले,
सिद्धसंकल्पः – सत्य संकल्प वाले,
सिद्धिदः – कर्म करने वालों को उनके अधिकार के अनुसार फल देने वाले,
सिद्धिसाधनः – सिद्धिरूप क्रिया के साधक ॥40॥

वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः ।
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥41॥

अर्थ –
वृषाही – यज्ञों को अपने में स्थित रखने वाले,
वृषभः – भक्तों के लिये इच्छित वस्तुओं की वर्षा करने वाले,
विष्णुः – शुद्ध सत्त्वमूर्ति,
वृषपर्वा – परमधाम में आरूढ़ होने की इच्छा वालों के लिये धर्मरूप सीढ़ियों वाले,
वृषोदरः – अपने उदर में धर्म को धारण करने वाले,
वर्धनः – भक्तों को बढ़ाने वाले,
वर्धमानः – संसार रूप से बढ़ने वाले,
विविक्तः – संसार से पृथक् रहने वाले,
श्रुतिसागरः – वेदरूप जल के समुद्र ॥41॥

सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः ।
नैकरूपो बृहद् रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥42॥

अर्थ –
सुभुजः – जगत की रक्षा करने वाली अति सुन्दर भुजाओं वाले,
दुर्धरः – दूसरों से धारण न किये जा सकने वाले,
वाग्मी – वेदमयी वाणी को उत्पन्न करने वाले,
महेन्द्रः – ईश्वरों के भी ईश्वर,
वसुदः – धन देने वाले,
वसुः – धनरूप,
नैकरूपः – अनेक रूपधारी,
बृहद् रूपः – विश्वरूप धारी,
शिपिविष्टः – सूर्य किरणों में स्थित रहने वाले,
प्रकाशनः – सबको प्रकाशित करने वाले ॥42॥

ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः ।
ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥43॥

अर्थ –
ओजस्तेजोद्युतिधरः – प्राण और बल, शूरवीरता आदि गुण तथा
ज्ञान की दीप्ति को धारण करने वाले,
प्रकाशात्मा – प्रकाशरूप विग्रह वाले,
प्रतापनः – सूर्य आदि अपनी विभूतियों से विश्व को तप्त करने वाले,
ऋद्धः – धर्म, ज्ञान और वैराग्य आदि से सम्पन्न,
स्पष्टाक्षरः – ओंकार रूप स्पष्ट अक्षर वाले,
मन्त्रः – ऋक्, साम और यजुरूप मन्त्रों से जानने योग्य,
चन्द्रांशुः – संसार ताप से संतप्त चित्त पुरुषों को
चन्द्रमा की किरणों के समान आह्लादित करने वाले,
भास्करद्युतिः – सूर्य के समान प्रकाश स्वरूप ॥43॥

अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः ।
औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ॥44॥

अर्थ –
अमृतांशूद्भवः – समुद्र मन्थन करते समय चन्द्रमा को उत्पन्न करने वाले समुद्र रूप,
भानुः – भासने वाले,
शशबिन्दुः – खरगोश के समान चिह्न वाले,
चन्द्रमा की तरह सम्पूर्ण प्रजा का पोषण करने वाले,
सुरेश्वरः – देवताओं के ईश्वर,
औषधम् – संसार रोग को मिटाने के लिये औषध रूप,
जगतः सेतुः – संसार सागर को पार कराने के लिये सेतुरूप,
सत्यधर्मपराक्रमः – सत्यरूप धर्म और पराक्रम वाले ॥44॥

भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः ।
कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ॥45॥

अर्थ –
भूतभव्यभवन्नाथः – भूत, भविष्य और वर्तमान सभी विषयों के स्वामी,
पवनः – वायुरूप,
पावनः – दृष्टि मात्र से जगत् को पवित्र करने वाले,
अनलः – अग्नि स्वरूप,
कामहा – अपने भक्तजनों के सकाम भाव को नष्ट करने वाले,
कामकृत् – भक्तों की कामनाओं को पूर्ण करने वाले,
कान्तः – कमनीय रूप,
कामः – ब्रह्मा (क), विष्णु (अ), महादेव (म) — इस प्रकार त्रिदेव रूप,
कामप्रदः – भक्तों को उनकी कामना की हुई वस्तुएँ प्रदान करने वाले,
प्रभुः – सर्वोत्कृष्ट सर्व सामर्थ्यवान् स्वामी ॥45॥

युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः ।
अदृश्योऽव्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ॥46॥

अर्थ –
युगादिकृत् – युगादि का आरम्भ करने वाले,
युगावर्तः – चारों युगों को चक्र के समान घुमाने वाले,
नैकमायः – अनेकों मायाओं को धारण करने वाले,
महाशनः – कल्प के अन्त में सबको ग्रसन करने वाले,
अदृश्यः – समस्त ज्ञानेन्द्रियों के अविषय,
अव्यक्तरूपः – निराकार स्वरूप वाले,
सहस्रजित् – युद्ध में हजारों देवशत्रुओं को जीतने वाले,
अनन्तजित् – युद्ध और क्रीड़ा आदि में सर्वत्र समस्त भूतों को जीतने वाले ॥46॥

इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः ।
क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ॥47॥

अर्थ –
इष्टः – परमानन्द रूप होने से सर्वप्रिय,
अविशिष्टः – सम्पूर्ण विशेषणों से रहित, सर्वश्रेष्ठ,
शिष्टेष्टः – शिष्ट पुरुषों के इष्टदेव,
शिखण्डी – मयूरपिच्छ को अपना शिरोभूषण बना लेने वाले,
नहुषः – भूतों को माया से बाँधने वाले,
वृषः – कामनाओं को पूर्ण करने वाले,
क्रोधहा – क्रोध का नाश करने वाले,
क्रोधकृत्कर्ता – दुष्टों पर क्रोध करने वाले और जगत् को उनके कर्मों के अनुसार रचने वाले,
विश्वबाहुः – सब ओर बाहुओं वाले, 317 महीधरः – पृथ्वी को धारण करने वाले ॥47॥

अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः ।
अपां निधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ॥48॥

अर्थ –
अच्युतः – छः भाव विकारों से रहित,
प्रथितः – जगत् की उत्पत्ति आदि कर्मों के कारण,
प्राणः – हिरण्यगर्भ रूप से प्रजा को जीवित रखने वाले,
प्राणदः – सबका भरण-पोषण करने वाले,
वासवानुजः – वामन अवतार में कश्यप जी द्वारा अदिति से इन्द्र के अनुज रूप में उत्पन्न होने वाले,
अपां निधिः – जल को एकत्र रखने वाले समुद्र रूप,
अधिष्ठानम् – उपादान कारण रूप से सब भूतों के आश्रय,
अप्रमत्तः – अधिकारियों को उनके कर्मानुसार फल देने में कभी प्रमाद न करने वाले,
प्रतिष्ठितः – अपनी महिमा में स्थित ॥48॥

स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः ।
वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्दरः ॥49॥

अर्थ –
स्कन्दः – स्वामी कार्तिकेय रूप,
स्कन्दधरः – धर्मपथ को धारण करने वाले,
धुर्यः – समस्त भूतों के जन्मादि रूप धुर को धारण करने वाले,
वरदः – इच्छित वर देने वाले,
वायुवाहनः – सारे वायुभेदों को चलाने वाले,
वासुदेवः – समस्त प्राणियों को अपने में बसाने वाले तथा
सब भूतों में सर्वात्मा रूप से बसने वाले दिव्य स्वरूप,
बृहद्भानुः – महान किरणों से युक्त एवं सम्पूर्ण जगत् को
प्रकाशित करने वाले,
आदिदेवः – सबके आदि कारण देव,
पुरन्दरः – असुरों के नगरों का ध्वंस करने वाले ॥49॥

अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः ।
अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ॥50॥

अर्थ –
अशोकः – सब प्रकार के शोक से रहित,
तारणः – संसार सागर से तारने वाले,
तारः – जन्म, जरा, मृत्युरूप भय से तारने वाले,
शूरः – पराक्रमी,
शौरिः – शूरवीर श्री वसुदेव जी के पुत्र,
जनेश्वरः – समस्त जीवों के स्वामी,
अनुकूलः – आत्मा रूप होने से सबके अनुकूल,
शतावर्तः – धर्म रक्षा के लिये सैकड़ों अवतार लेने वाले,
पद्मी – अपने हाथ में कमल धारण करने वाले,
पद्मनिभेक्षणः – कमल के समान कोमल दृष्टि वाले ॥50॥

पद्मनाभोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत् ।
महर्द्धिर्ऋद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः ॥51॥

अर्थ –
पद्मनाभः – हृदय कमल के मध्य निवास करने वाले,
अरविन्दाक्षः – कमल के समान आँखों वाले,
पद्मगर्भः – हृदय कमल में ध्यान करने योग्य,
शरीरभृत् – अन्न रूप से सबके शरीरों का भरण करने वाले,
महर्द्धिः – महान विभूति वाले,
ऋद्धः – सबमें बढ़े-चढ़े,
वृद्धात्मा – पुरातन आत्मवान्,
महाक्षः – विशाल नेत्रों वाले,
गरुडध्वजः – गरुड़ के चिह्न से युक्त ध्वजा वाले ॥51॥

अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः ।
सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान्समितिञ्जयः ॥52॥

अर्थ –
अतुलः – तुलनारहित,
शरभः – शरीरों को प्रत्यगात्म रूप से प्रकाशित करने वाले,
भीमः – जिससे पापियों को भय हो ऐसे भयानक,
समयज्ञः – समभाव रूप यज्ञ से प्राप्त होने वाले,
हविर्हरिः – यज्ञों में हविर्भाग को और अपना स्मरण करने वालों
के पापों को हरण करने वाले,
सर्वलक्षणलक्षण्यः – समस्त लक्षणों से लक्षित होने वाले,
लक्ष्मीवान् – अपने वक्षःस्थल में लक्ष्मी जी को सदा बसाने वाले,
समितिञ्जयः – संग्राम विजयी ॥52॥

विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः ।
महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ॥53॥

अर्थ –
विक्षरः – नाशरहित,
रोहितः – मत्स्य विशेष का स्वरूप धारण करके अवतार लेने वाले,
मार्गः – परमानन्द प्राप्ति के साधन स्वरूप,
हेतुः – संसार के निमित्त और उपादान कारण,
दामोदरः – यशोदा जी द्वारा रस्सी से बँधे हुए उदर वाले,
सहः – भक्तजनों के अपराधों को सहन करने वाले,
महीधरः – पर्वत रूप से पृथ्वी को धारण करने वाले,
महाभागः – महान भाग्यशाली,
वेगवान् – तीव्र गति वाले,
अमिताशनः – सारे विश्व को भक्षण करने वाले ॥53॥

उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः ।
करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ॥54॥

अर्थ –
उद्भवः – जगत की उत्पत्ति के कारण,
क्षोभणः – जगत की उत्पत्ति के समय प्रकृति और
पुरुष में प्रविष्ट होकर उन्हें क्षुब्ध करने वाले,
देवः – प्रकाश स्वरूप,
श्रीगर्भः – सम्पूर्ण ऐश्वर्य को अपने उदरगर्भ में रखने वाले,
परमेश्वरः – सर्वश्रेष्ठ शासन करने वाले,
करणम् – संसार की उत्पत्ति के सबसे बड़े साधन,
कारणम् – जगत् के उपादान और निमित्त कारण,
कर्ता – सब प्रकार से स्वतन्त्र
विकर्ता – विचित्र भुवनों की रचना करने वाले,
गहनः – अपने विलक्षण स्वरूप, सामर्थ्य और लीलादि
के कारण पहचाने न जा सकने वाले,
गुहः – माया से अपने स्वरूप को ढक लेने वाले ॥54॥

व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः ।
परर्द्धिः परमस्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ॥55॥

अर्थ – व्यवसायः – ज्ञानमात्र स्वरूप,
व्यवस्थानः – लोकपालादिकों को, समस्त जीवों को, चारों वर्णाश्रमों को
एवं उनके धर्मों को व्यवस्थापूर्वक रचने वाले,
संस्थानः – प्रलय के सम्यक् स्थान,
स्थानदः – ध्रुव आदि भक्तों को स्थान देने वाले,
ध्रुवः – अविनाशी,
परर्द्धिः – श्रेष्ठ विभूति वाले,
परमस्पष्टः – अवतार विग्रह में सबके सामने प्रत्यक्ष प्रकट होने वाले,
तुष्टः – एकमात्र परमानन्द स्वरूप,
पुष्टः – सर्वत्र परिपूर्ण,
शुभेक्षणः – दर्शन मात्र से कल्याण करने वाले ॥55॥

रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयोऽनयः ।
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः ॥56॥

अर्थ –
रामः – योगिजनों के स्मरण करने के लिये नित्यानन्द स्वरूप,
विरामः – प्रलय के समय प्राणियों को अपने में विराम देने वाले,
विरजः – रजोगुण तथा तमोगुण से सर्वथा शून्य,
मार्गः – मुमुक्षु जनों के अमर होने के साधन स्वरूप,
नेयः – उत्तम ज्ञान से ग्रहण करने योग्य,
नयः – सबको नियम में रखने वाले,
अनयः – स्वतन्त्र,
वीरः – पराक्रमशाली,
शक्तिमतां श्रेष्ठः – शक्तिमानों में भी अतिशय शक्तिमान,
धर्मः – श्रुति स्मृति रूप धर्म,
धर्मविदुत्तमः – समस्त धर्मवेत्ताओं में उत्तम ॥56॥

वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः ।
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ॥57॥

अर्थ –
वैकुण्ठः – परमधाम स्वरूप,
पुरुषः – विश्वरूप शरीर में शयन करने वाले,
प्राणः – प्राणवायु रूप से चेष्टा करने वाले,
प्राणदः – सर्ग के आदि में प्राण प्रदान करने वाले,
प्रणवः – जिसको वेद भी प्रणाम करते हैं, वे भगवान,
पृथुः – विराट रूप से विस्तृत होने वाले,
हिरण्यगर्भः – ब्रह्मारूप से प्रकट होने वाले,
शत्रुघ्नः – शत्रुओं को मारने वाले,
व्याप्तः – कारणरूप से सब कार्यों को व्याप्त करने वाले,
वायुः – पवनरूप,
अधोक्षजः – अपने स्वरूप से क्षीण न होने वाले ॥57॥

ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः ।
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥58॥

अर्थ –
ऋतुः – काल रूप से लक्षित होने वाले,
सुदर्शनः – भक्तों को सुगमता से ही दर्शन दे देने वाले,
कालः – सबकी गणना करने वाले,
परमेष्ठी – अपनी प्रकृष्ट महिमा में स्थित रहने के स्वभाव वाले,
परिग्रहः – शरणार्थियों के द्वारा सब ओर से ग्रहण किये जाने वाले,
उग्रः – सूर्यादि के भी भय के कारण,
संवत्सरः – सम्पूर्ण भूतों के वासस्थान,
दक्षः – सब कार्यों को बड़ी कुशलता से करने वाले,
विश्रामः – विश्राम की इच्छा वाले, मुमुक्षुओं को मोक्ष देने वाले,
विश्वदक्षिणः – बलि के यज्ञ में समस्त विश्व को दक्षिणा रूप में प्राप्त करने वाले ॥58॥

विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम् ।
अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥59॥

अर्थ –
विस्तारः – समस्त लोकों के विस्तार के कारण,
स्थावरस्थाणुः – स्वयं स्थितिशील रहकर पृथ्वी आदि
स्थितिशील पदार्थों को अपने में स्थित रखने वाले,
प्रमाणम् – ज्ञानस्वरूप होने के कारण स्वयं प्रमाण रूप,
बीजमव्ययम् – संसार के अविनाशी कारण,
अर्थः – सुखस्वरूप होने के कारण सबके द्वारा प्रार्थनीय,
अनर्थः – पूर्णकाम होने के कारण प्रयोजन रहित,
महाकोशः – बड़े खजाने वाले,
महाभोगः – सुखरूप महान भोग वाले,
महाधनः – यथार्थ और अतिशय धन स्वरूप ॥59॥

अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामखः ।
नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ॥60॥

अर्थ –
अनिर्विण्णः – उकताहट रूप विकार से रहित,
स्थविष्ठः – विराट् रूप से स्थित,
अभूः – अजन्मा,
धर्मयूपः – धर्म के स्तम्भ रूप,
महामखः – अर्पित किये हुए यज्ञों को निर्वाण रूप महान फलदायक बना देने वाले,
नक्षत्रनेमिः – समस्त नक्षत्रों के केन्द्र स्वरूप,
नक्षत्री – चन्द्र रूप,
क्षमः – समस्त कार्यों में समर्थ,
क्षामः – समस्त विकारों के क्षीण हो जाने पर परमात्म भाव से स्थित,
समीहनः – सृष्टि आदि के लिये भली भाँति चेष्टा करने वाले ॥60॥

यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः ।
सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥61॥

अर्थ –
यज्ञः – भगवान विष्णु,
इज्यः – पूजनीय,
महेज्यः – सबसे अधिक उपासनीय,
क्रतुः – यूपसंयुक्त यज्ञ स्वरूप,
सत्रम् – सत्पुरुषों की रक्षा करने वाले,
सतां गतिः – सत्पुरुषों के परम प्रापणीय स्थान,
सर्वदर्शी – समस्त प्राणियों को और उनके कार्यों को देखने वाले,
विमुक्तात्मा – सांसारिक बन्धन से रहित आत्मस्वरूप,
सर्वज्ञः – सबको जानने वाले,
ज्ञानमुत्तमम् – सर्वोत्कृष्ट ज्ञान स्वरूप ॥61॥

सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् ।
मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ॥62॥

अर्थ –
सुव्रतः – प्रणतपालनादि श्रेष्ठ व्रतों वाले,
सुमुखः – सुन्दर और प्रसन्न मुख वाले,
सूक्ष्मः – अणु से भी अणु,
सुघोषः – सुन्दर और गम्भीर वाणी बोलने वाले,
सुखदः – अपने भक्तों को सब प्रकार से सुख देने वाले,
सुहृत् – प्राणिमात्र पर अहैतुकी दया करने वाले परम मित्र,
मनोहरः – अपने रूप – लावण्य और मधुर भाषण आदि से सबके मन को हरने वाले,
जितक्रोधः – क्रोध पर विजय करने वाले अर्थात अपने साथ अत्यन्त
अनुचित व्यवहार करने वाले पर भी क्रोध न करने वाले,
वीरबाहुः – अत्यन्त पराक्रमशाली भुजाओं से युक्त,
विदारणः – अधर्मियों को नष्ट करने वाले ॥62॥

स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत् ।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥63॥

अर्थ –
स्वापनः – प्रलयकाल में समस्त प्राणियों को अज्ञान निद्रा में शयन कराने वाले,
स्ववशः – स्वतन्त्र,
व्यापी – आकाश की भाँति सर्वव्यापी,
नैकात्मा – प्रत्येक युग में लोकोद्धार के लिये अनेक रूप धारण करने वाले,
नैककर्मकृत् – जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयरूप तथा भिन्न-भिन्न अवतारों में
मनोहर लीलारूप अनेक कर्म करने वाले,
वत्सरः – सबके निवास स्थान,
वत्सलः – भक्तों के परम स्नेही,
वत्सी – वृन्दावन में बछड़ों का पालन करने वाले,
रत्नगर्भः – रत्नों को अपने गर्भ में धारण करने वाले समुद्र रूप,
धनेश्वरः – सब प्रकार के धनों के स्वामी ॥63॥

धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम् ।
अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ॥64॥

अर्थ –
धर्मगुप् – धर्म की रक्षा करने वाले,
धर्मकृत् – धर्म की स्थापना करने के लिये स्वयं धर्म का आचरण करने वाले,
धर्मी – सम्पूर्ण धर्मों के आधार,
सत् – सत्य स्वरूप,
असत् – स्थूल जगत्स्वरूप,
क्षरम् – सर्वभूतमय,
अक्षरम् – अविनाशी,
अविज्ञाता – क्षेत्रज्ञ जीवात्मा को विज्ञाता कहते हैं,
उनसे विलक्षण भगवान विष्णु,
सहस्रांशुः – हजारों किरणों वाले सूर्यस्वरूप,
विधाता – सबको अच्छी प्रकार धारण करने वाले,
कृतलक्षणः – श्रीवत्स आदि चिह्नों को धारण करने वाले ॥64॥

गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः ।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः ॥65॥

अर्थ –
गभस्तिनेमिः – किरणों के बीच में सूर्य रूप से स्थित,
सत्त्वस्थः – अन्तर्यामी रूप से समस्त प्राणियों के अन्तःकरण में स्थित रहने वाले,
सिंहः – भक्त प्रह्लाद के लिये नृसिंह रूप धारण करने वाले,
भूतमहेश्वरः – सम्पूर्ण प्राणियों के महान ईश्वर,
आदिदेवः – सबके आदि कारण और दिव्य स्वरूप,
महादेवः – ज्ञानयोग और ऐश्वर्य आदि महिमाओं से युक्त,
देवेशः – समस्त देवों के स्वामी,
देवभृद्गुरुः – देवों का विशेष रूप से भरण-पोषण करने वाले उनके परम गुरु ॥65॥

उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः ।
शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ॥66॥

अर्थ –
उत्तरः – संसार समुद्र से उद्धार करने वाले और सर्वश्रेष्ठ,
गोपतिः – गोपाल रूप से गायों की रक्षा करने वाले,
गोप्ता – समस्त प्राणियों का पालन और रक्षा करने वाले,
ज्ञानगम्यः – ज्ञान के द्वारा जानने में आने वाले,
पुरातनः – सदा एकरस रहने वाले, सबके आदि पुराण पुरुष,
शरीरभूतभृत् – शरीर के उत्पादक पंचभूतों का प्राणरूप से पालन करने वाले,
भोक्ता – निरतिशय आनन्द पुंजों को भोगने वाले,
कपीन्द्रः – बंदरों के स्वामी श्रीराम,
भूरिदक्षिणः – श्रीरामादि अवतारों में यज्ञ करते समय
बहुत सी दक्षिणा प्रदान करने वाले ॥66॥

सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः ।
विनयो जयः सत्यसंधो दाशार्हः सात्वतां पतिः ॥67॥

अर्थ –
सोमपः – यज्ञों में देवरूप से और यजमान रूप से सोमरस का पान करने वाले,
अमृतपः – समुद्र मन्थन से निकाला हुआ अमृत देवों को पिला कर स्वयं पीने वाले,
सोमः – औषधियों का पोषण करने वाले चन्द्रमा रूप,
पुरुजित् – बहुतों पर विजय लाभ करने वाले,
पुरुसत्तमः – विश्वरूप और अत्यन्त श्रेष्ठ,
विनयः – दुष्टों को दण्ड देने वाले,
जयः – सब पर विजय प्राप्त करने वाले,
सत्यसंधः – सच्ची प्रतिज्ञा करने वाले,
दाशार्हः – दाशार्ह कुल में प्रकट होने वाले,
सात्वतां पतिः – यादवों के और अपने भक्तों के स्वामी
यानी उनका योगक्षेम चलाने वाले ॥67॥

जीवो विनयितासाक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः ।
अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः ॥68॥

अर्थ –
जीवः – क्षेत्रज्ञ रूप से प्राणों को धारण करने वाले,
विनयितासाक्षी – अपने शरणापन्न भक्तों के विनय भाव को तत्काल प्रत्यक्ष अनुभव करने वाले,
मुकुन्दः – मुक्तिदाता,
अमितविक्रमः – वामनावतार में पृथ्वी नापते समय अत्यन्त विस्तृत पैर रखने वाले,
अम्भोनिधिः – जल के निधान समुद्र स्वरूप,
अनन्तात्मा – अनन्त मूर्ति,
महोदधिशयः – प्रलयकाल के महान समुद्र में शयन करने वाले,
अन्तकः – प्राणियों का संहार करने वाले मृत्यु स्वरूप ॥68॥

अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः ।
आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ॥69॥

अर्थ –
अजः – अकार भगवान विष्णु का वाचक है, उससे उत्पन्न होने वाले ब्रह्मा,
महार्हः – पूजनीय,
स्वाभाव्यः – नित्य सिद्ध होने के कारण स्वभाव से ही उत्पन्न न होने वाले,
जितामित्रः – रावण, शिशुपाल आदि शत्रुओं को जीतने वाले,
प्रमोदनः – स्मरण मात्र से नित्य प्रमुदित करने वाले,
आनन्दः – आनन्द स्वरूप,
नन्दनः – सबको प्रसन्न करने वाले,
नन्दः – सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से सम्पन्न,
सत्यधर्मा – धर्म, ज्ञान आदि सब गुणों से युक्त,
त्रिविक्रमः – तीन
डग में तीनों लोकों को नापने वाले ॥69॥

महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः ।
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत् ॥70॥

अर्थ –
महर्षिः कपिलाचार्यः – सांख्य शास्त्र के प्रणेता भगवान कपिलाचार्य,
कृतज्ञः – किये हुए को जानने वाले यानी अपने भक्तों की सेवा को
बहुत मानकर अपने को उनका ऋणी समझने वाले,
मेदिनीपतिः – पृथ्वी के स्वामी,
त्रिपदः – त्रिलोकी रूप तीन पैरों वाले विश्वरूप,
त्रिदशाध्यक्षः – देवताओं के स्वामी,
महाशृङ्गः – मत्स्यावतार में महान सींग धारण करने वाले,
कृतान्तकृत् – स्मरण करने वालों के समस्त कर्मों का अन्त करने वाले ॥70॥

महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी ।
गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः ॥71॥

अर्थ –
महावराहः – हिरण्याक्ष का वध करने के लिये महावराह रूप धारण करने वाले,
गोविन्दः – नष्ट हुई पृथ्वी को पुनः प्राप्त कर लेने वाले,
सुषेणः – पार्षदों के समुदाय रूप सुन्दर सेना से सुसज्जित,
कनकाङ्गदी – सुवर्ण का बाजूबंद धारण करने वाले,
गुह्यः – हृदयाकाश में छिपे रहने वाले,
गभीरः – अतिशय गम्भीर स्वभाव वाले,
गहनः – जिनके स्वरुप में प्रविष्ट होना अत्यन्त कठिन हो,
गुप्तः – वाणी और मन से जानने में न आनेवाले,
चक्रगदाधरः – भक्तों की रक्षा करने के लिये चक्र और गदा आदि
दिव्य आयुधों को धारण करने वाले ॥71॥

वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः सङ्कर्षणोऽच्युतः ।
वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ॥72॥

अर्थ –
वेधाः – सब कुछ विधान करने वाले,
स्वाङ्गः – कार्य करने में स्वयं ही सहकारी,
अजितः – किसी के द्वारा न जीते जाने वाले,
कृष्णः – श्याम सुन्दर श्री कृष्ण,
दृढः – अपने स्वरुप और सामर्थ्य से कभी भी च्युत न होने वाले,
सङ्कर्षणोऽच्युतः – प्रलयकाल में एक साथ सबका संहार करने वाले
और जिनका कभी किसी भी कारण से पतन न हो सके ऐसे अविनाशी,
वरुणः – जल के स्वामी वरुण देवता,
वारुणः – वरुण के पुत्र वसिष्ठ स्वरुप,
वृक्षः – अश्वत्थ वृक्ष रूप,
पुष्कराक्षः – हृदय कमल में चिन्तन करने से प्रत्यक्ष होने वाले,
महामनाः – संकल्प मात्र से उत्पत्ति, पालन और संहार आदि समस्त लीला करने की शक्तिवाले। ॥72॥

भगवान् भगहानन्दी वनमाली हलायुधः ।
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ॥73॥

अर्थ –
भगवान् – उत्पत्ति और प्रलय, आना और जाना तथा विद्या और अविद्या को
जानने वाले एवं सर्वैश्वर्यादि छहों भगों से युक्त,
भगहा – अपने भक्तों का प्रेम बढ़ाने के लिये उनके ऐश्वर्य का हरण करने वाले
और प्रलयकाल में सबके ऐश्वर्य को नष्ट करने वाले,
आनन्दी – परमसुख स्वरुप,
वनमाली – वैजयन्ती वनमाला धारण करने वाले,
हलायुधः – हलरूप शस्त्र को धारण करने वाले बलभद्र स्वरुप,
आदित्यः – अदितिपुत्र वामन भगवान,
ज्योतिरादित्यः – सूर्यमण्डल में विराजमान ज्योति स्वरुप,
सहिष्णुः – समस्त द्वन्द्वों को सहन करने में समर्थ,
गतिसत्तमः – सत्पुरुषों के परम गन्तव्य और सर्वश्रेष्ठ ॥73॥

सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः ।
दिविस्पृक्सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ॥74॥

अर्थ –
सुधन्वा – अतिशय सुन्दर शार्ङ्ग धनुष धारण करने वाले,
खण्डपरशुः – शत्रुओं का खण्डन करने वाले, फरसे को धारण करने वाले परशुराम स्वरुप,
दारुणः – सन्मार्ग विरोधियों के लिये महान भयंकर,
द्रविणप्रदः – अर्थार्थी भक्तों को धन-सम्पत्ति प्रदान करने वाले,
दिविस्पृक् – स्वर्गलोक तक व्याप्त,
सर्वदृग् व्यासः – सबके द्रष्टा एवं वेद का विभाग करने वाले वेदव्यास स्वरुप,
वाचस्पतिरयोनिजः – विद्या के स्वामी तथा बिना योनि के स्वयं ही प्रकट होने वाले ॥74॥

त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् ।
संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम् ॥75॥

अर्थ –
त्रिसामा – देवव्रत आदि तीन साम श्रुतियों द्वारा जिनकी स्तुति की जाती है,
सामगः – सामवेद का गान करने वाले,
साम – सामवेद स्वरुप,
निर्वाणम् – परम शान्ति के निधान परमानन्द स्वरुप,
भेषजम् – संसार रोग की ओषधि,
भिषक् – संसार रोग का नाश करने के लिये
गीतारूप उपदेशामृत का पान कराने वाले परम वैद्य,
संन्यासकृत् – मोक्ष के लिये संन्यासाश्रम और संन्यासयोग का निर्माण करने वाले,
शमः – उपशमता का उपदेश देने वाले,
शान्तः – परमशान्ताकृति,
निष्ठा – सबकी स्थिति के आधार अधिष्ठान स्वरुप,
शान्तिः – परम शान्ति स्वरुप,
परायणम् – मुमुक्षु पुरुषों के परम प्राप्य स्थान ॥75॥

शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः ।
गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ॥76॥

अर्थ –
शुभाङ्गः – अति मनोहर परम सुन्दर अंगों वाले,
शान्तिदः – परमशान्ति देने वाले,
स्रष्टा – सर्ग के आदि में सबकी रचना करने वाले,
कुमुदः – पृथ्वी पर प्रसन्नतापूर्वक लीला करने वाले,
कुवलेशयः – जल में शेषनाग की शय्या पर शयन करने वाले,
गोहितः – गोपाल रूप से गायों का और अवतार धारण करके
भार उतार कर पृथ्वी का हित करने वाले,
गोपतिः – पृथ्वी के और गायों के स्वामी,
गोप्ता – अवतार धारण करके सबके सम्मुख प्रकट होते समय
अपनी माया से अपने स्वरुप को आच्छादित करने वाले,
वृषभाक्षः – समस्त कामनाओं की वर्षा करने वाली कृपादृष्टि से युक्त,
वृषप्रियः – धर्म से प्यार करने वाले ॥76॥

अनिवर्ती निवृत्तात्मा संक्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः ।
श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतां वरः ॥77॥

अर्थ –
अनिवर्ती – रणभूमि में और धर्मपालन में पीछे न हटने वाले,
निवृत्तात्मा – स्वभाव से ही विषय वासना रहित नित्य शुद्ध मन वाले,
संक्षेप्ता – विस्तृत जगत को क्षणभर में संक्षिप्त यानी सूक्ष्मरूप करने वाले,
क्षेमकृत् – शरणागत की रक्षा करने वाले,
शिवः – स्मरणमात्र से पवित्र करने वाले कल्याण स्वरुप,
श्रीवत्सवक्षाः – श्रीवत्स नामक चिह्न को वक्षःस्थल में धारण करने वाले,
श्रीवासः – श्री लक्ष्मी जी के वासस्थान,
श्रीपतिः – परम शक्तिरूपा श्री लक्ष्मी जी के स्वामी,
श्रीमतां वरः – सब प्रकार की सम्पत्ति और ऐश्वर्य से
युक्त ब्रह्मादि समस्त लोकपालों से श्रेष्ठ ॥77॥

श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः ।
श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः ॥78॥

अर्थ –
श्रीदः – भक्तों को श्री प्रदान करने वाले,
श्रीशः – लक्ष्मी के नाथ,
श्रीनिवासः – श्री लक्ष्मी जी के अन्तःकरण में नित्य निवास करने वाले,
श्रीनिधिः – समस्त श्रियों के आधार,
श्रीविभावनः – सब मनुष्यों के लिये उनके कर्मानुसार नाना प्रकार के ऐश्वर्य प्रदान करने वाले,
श्रीधरः – जगज्जननी श्री को वक्षःस्थल में धारण करने वाले,
श्रीकरः – स्मरण, स्तवन और अर्चन आदि करने वाले भक्तों के लिये श्री का विस्तार करने वाले,
श्रेयः – कल्याण स्वरूप,
श्रीमान् – सब प्रकार की श्रियों से युक्त,
लोकत्रयाश्रयः – तीनों लोकों के आधार ॥78॥

स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः ।
विजितात्मा विधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः ॥79॥

अर्थ –
स्वक्षः – मनोहर कृपा कटाक्ष से युक्त परम सुन्दर आँखों वाले,
स्वङ्गः – अतिशय कोमल परम सुन्दर मनोहर अंगों वाले,
शतानन्दः – लीलाभेद से सैकड़ों विभागों में विभक्त आनन्द स्वरुप,
नन्दिः – परमानन्द विग्रह,
ज्योतिर्गणेश्वरः – नक्षत्र समुदायों के ईश्वर,
विजितात्मा – जीते हुए मन वाले,
अविधेयात्मा – जिनके असली स्वरुप का किसी प्रकार भी वर्णन नहीं किया जा सके,
सत्कीर्तिः – सच्ची कीर्ति वाले,
छिन्नसंशयः – हथेली में रखे हुए बेर के समान सम्पूर्ण विश्व को
प्रत्यक्ष देखने वाले होने के कारण सब प्रकार के संशयों से रहित ॥79॥

उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः ।
भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ॥80॥

अर्थ –
उदीर्णः – सब प्राणियों से श्रेष्ठ,
सर्वतश्चक्षुः – समस्त वस्तुओं को सब दिशाओं में सदा-सर्वदा देखने की शक्ति वाले,
अनीशः – जिनका दूसरा कोई शासक न हो, ऐसे स्वतंत्र,
शाश्वतस्थिरः – सदा एकरस स्थिर रहने वाले, निर्विकार,
भूशयः – लंका गमन के लिये मार्ग की याचना करते समय समुद्र तट की भूमि पर शयन करने वाले,
भूषणः – स्वेच्छा से नाना अवतार लेकर अपने चरण चिह्नों से भूमि की शोभा बढ़ाने वाले,
भूतिः – सत्ता स्वरूप और समस्त विभूतियों के आधार स्वरुप,
विशोकः – सब प्रकार से शोक रहित,
शोकनाशनः – स्मृति मात्र से भक्तों के शोक का समूल नाश करने वाले ॥80॥

अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः ।
अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ॥81॥

अर्थ –
अर्चिष्मान् – चन्द्र, सूर्य आदि समस्त ज्योतियों को देदीप्यमान करने वाली
अतिशय प्रकाशमय अनन्त किरणों से युक्त,
अर्चितः – समस्त लोकों के पूज्य ब्रह्मादि से भी पूजे जाने वाले,
कुम्भः – घट की भाँति सबके निवास स्थान,
विशुद्धात्मा – परम शुद्ध निर्मल आत्म स्वरूप,
विशोधनः – स्मरण मात्र से समस्त पापों का नाश करके
भक्तों के अन्तःकरण को परम शुद्ध कर देने वाले,
अनिरुद्धः – जिनको कोई बाँधकर नहीं रख सके,
अप्रतिरथः – प्रतिपक्ष से रहित,
प्रद्युम्नः – परमश्रेष्ठ अपार धन से युक्त,
अमितविक्रमः – अपार पराक्रमी ॥81॥

कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः ।
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ॥82॥

अर्थ –
कालनेमिनिहा – कालनेमि नामक असुर को मारने वाले,
वीरः – परम शूरवीर,
शौरिः – शूरकुल में उत्पन्न होने वाले श्रीकृष्ण स्वरुप,
शूरजनेश्वरः – अतिशय शूरवीरता के कारण इन्द्रादि शूरवीरों के भी इष्ट,
त्रिलोकात्मा – अन्तर्यामी रूप से तीनों लोकों के आत्मा,
त्रिलोकेशः – तीनों लोकों के स्वामी,
केशवः – सूर्य की किरण रूप केश वाले,
केशिहा – केशी नाम के असुर को मारने वाले,
हरिः – स्मरण मात्र से समस्त पापों का और समूल संसार का हरण करने वाले ॥82॥

कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः ।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनञ्जयः ॥83॥

अर्थ –
कामदेवः – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – इन चारों पुरुषार्थों को चाहने वाले
मनुष्यों द्वारा अभिलषित समस्त कामनाओं के अधिष्ठाता परमदेव,
कामपालः – सकामी भक्तों की कामनाओं की पूर्ति करने वाले,
कामी – स्वभाव से ही पूर्ण काम और अपने प्रियतमों को चाहने वाले,
कान्तः – परम मनोहर श्याम सुन्दर देह धारण करने वाले गोपीजन वल्लभ,
कृतागमः – समस्त वेद और शास्त्रों को रचने वाले,
अनिर्देश्यवपुः – जिसके दिव्य स्वरुप का किसी प्रकार भी वर्णन नहीं किया जा सके,
विष्णुः – शेषशायी भगवान विष्णु,
वीरः – बिना पैरों के ही गमन करने आदि अनेक दिव्य शक्तियों से युक्त,
अनन्तः – जिनके स्वरुप, शक्ति, ऐश्वर्य, सामर्थ्य और गुणों का कोई भी पार नहीं पा सके,
धनञ्जयः – अर्जुन रूप से दिग्विजय के समय बहुत सा धन जीतकर लाने वाले ॥83॥

ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद् ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः ।
ब्रह्मविद् ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ॥84॥

अर्थ –
ब्रह्मण्यः – तप, वेद, ब्राह्मण और ज्ञान की रक्षा करने वाले,
ब्रह्मकृत् – पूर्वोक्त तप आदि की रचना वाले,
ब्रह्मा – ब्रह्मा रूप से जगत को उत्पन्न करने वाले,
ब्रह्म – सच्चिदानन्द स्वरुप,
ब्रहमविवर्धनः – पूर्वोक्त ब्रह्मशब्द वाची तप आदि की वृद्धि करने वाले,
ब्रह्मवित् – वेद और वेदार्थ को पूर्णतया जानने वाले,
ब्राह्मणः – समस्त वस्तुओं को ब्रह्मरूप से देखने वाले,
ब्रह्मी – ब्रह्मशब्द वाची तपादि समस्त पदार्थों के अधिष्ठान,
ब्रह्मज्ञः – अपने आत्मस्वरूप ब्रह्मशब्द वाची वेद को पूर्णतया यथार्थ जानने वाले,
ब्राह्मणप्रियः – ब्राह्मणों के परम प्रिय और ब्राह्मणों को अतिशय प्रिय मानने वाले ॥84॥

महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः ।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ॥85॥

अर्थ –
महाक्रमः – बड़े वेग से चलने वाले,
महाकर्मा – भिन्न-भिन्न अवतारों में नाना प्रकार के महान कर्म करने वाले,
महातेजाः – जिसके तेज से समस्त तेजस्वी देदीप्यमान होते हैं,
महोरगः – बड़े भारी सर्प यानी वासुकि स्वरुप,
महाक्रतुः – महान यज्ञ स्वरूप,
महायज्वा – बड़े यजमान यानी लोक संग्रह के लिये बड़े-बड़े यज्ञों का अनुष्ठान करने वाले,
महायज्ञः – जप यज्ञ आदि भगवत्प्राप्ति के साधन रूप, समस्त यज्ञ जिनकी विभूतियाँ हैं – ऐसे महान यज्ञ स्वरूप,
महाहविः – ब्रह्मरूप अग्नि में हवन किये जाने योग्य प्रपंच रूप हवि जिनका स्वरुप है ॥85॥

स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः ।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ॥86॥

अर्थ –
स्तव्यः – सबके द्वारा स्तुति किये जाने योग्य,
स्तवप्रियः – स्तुति से प्रसन्न होने वाले,
स्तोत्रम् – जिनके द्वारा भगवान के गुण प्रभाव का कीर्तन किया जाता है, वह स्तोत्र,
स्तुतिः – स्तवन क्रिया स्वरुप,
स्तोता – स्तुति करने वाले,
रणप्रियः – युद्ध से प्रेम करने वाले,
पूर्णः – समस्त ज्ञान, शक्ति, ऐश्वर्य और गुणों से परिपूर्ण,
पूरयिता – अपने भक्तों को सब प्रकार से परिपूर्ण करने वाले,
पुण्यः – स्मरण मात्र से पापों का नाश करने वाले पुण्य स्वरुप,
पुण्यकीर्तिः – परम पावन कीर्ति वाले,
अनामयः – आन्तरिक और बाह्य, सब प्रकार की व्याधियों से रहित ॥86॥

मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः ।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ॥87॥

अर्थ –
मनोजवः – मन की भाँति वेग वाले,
तीर्थकरः – समस्त विद्याओं के रचयिता और उपदेशकर्ता,
वसुरेताः – हिरण्यमय पुरुष जिनका वीर्य है, ऐसे सुवर्णवीर्य,
वसुप्रदः – प्रचुर धन प्रदान करने वाले,
वसुप्रदः – अपने भक्तों को मोक्षरूप महान धन देने वाले,
वासुदेवः – वसुदेव पुत्र श्रीकृष्ण,
वसुः – सबके अन्तःकरण में निवास करने वाले,
वसुमनाः – समान भाव से सबमें निवास करने की शक्ति से युक्त मन वाले,
हविः – यज्ञ में हवन किये जाने योग्य हविः स्वरुप ॥87॥

सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः ।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ॥88॥

अर्थ –
सद्गतिः – सत्पुरुषों द्वारा प्राप्त किये जाने योग्य गति स्वरुप,
सत्कृतिः – जगत की रक्षा आदि सत्कार्य करने वाले,
सत्ता – सदा सर्वदा विद्यमान सत्ता स्वरुप,
सद्भूतिः – बहुत प्रकार से बहुत रूपों में भासित होने वाले,
सत्परायणः – सत्पुरुषों के परम प्रापणीय स्थान,
शूरसेनः – हनुमानादि श्रेष्ठ शूरवीर योद्धाओं से युक्त सेना वाले,
यदुश्रेष्ठः – यदुवंशियों में सर्वश्रेष्ठ,
सन्निवासः – सत्पुरुषों के आश्रय,
सुयामुनः – जिनके परिकर यमुना तट निवासी गोपाल बाल
आदि अति सुन्दर हैं, ऐसे श्रीकृष्ण ॥88॥

भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः ।
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः ॥89॥

अर्थ –
भूतावासः – समस्त प्राणियों के मुख्य निवास स्थान,
वासुदेवः – अपनी माया से जगत को आच्छादित करने वाले परम देव,
सर्वासुनिलयः – समस्त प्राणियों के आधार,
अनलः – अपार शक्ति और सम्पत्ति से युक्त,
दर्पहा – धर्म विरुद्ध मार्ग में चलने वालों के घमण्ड को नष्ट करने वाले,
दर्पदः – अपने भक्तों को विशुद्ध गौरव देने वाले,
दृप्तः – नित्यानन्द मग्न,
दुर्धरः – बड़ी कठिनता से हृदय में धारित होने वाले,
अपराजितः – दूसरों से अजित अर्थात भक्त परवश ॥89॥

विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान् ।
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ॥90॥

अर्थ –
विश्वमूर्तिः – समस्त विश्व ही जिनकी मूर्ति है – ऐसे विराट स्वरूप,
महामूर्तिः – बड़े रूप वाले,
दीप्तमूर्तिः – स्वेच्छा से धारण किये हुए देदीप्यमान स्वरुप से युक्त,
अमूर्तिमान् – जिनकी कोई मूर्ति नहीं – ऐसे निराकार,
अनेकमूर्तिः – नाना अवतारों में स्वेच्छा से लोगों का उपकार करने के लिये
बहुत मूर्तियों को धारण करने वाले,
अव्यक्तः – अनेक मूर्ति होते हुए भी जिनका स्वरुप
किसी प्रकार व्यक्त न किया जा सके – ऐसे अप्रकट स्वरुप,
शतमूर्तिः – सैकड़ों मूर्तियों वाले,
शताननः – सैकड़ों मुख वाले ॥90॥

एको नैकः सवः कः किं यत्तत्पदमनुत्तमम् ।
लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ॥91॥

अर्थ –
एकः – सब प्रकार के भेद-भावों से रहित अद्वितीय,
नैकः – उपाधि भेद से अनेक,
सवः – जिनमें सोम नाम की ओषधि का रस निकाला जाता है, ऐसे यज्ञ स्वरूप,
कः – सुख स्वरूप,
किम् – विचारणीय ब्रह्म स्वरूप,
यत् – स्वतःसिद्ध,
तत् – विस्तार करने वाले,
पदमनुत्तमम् – मुमुक्षु पुरुषों द्वारा प्राप्त किये जाने योग्य अत्युत्तम परमपद,
लोकबन्धुः – समस्त प्राणियों के हित करने वाले परम मित्र,
लोकनाथः – सबके द्वारा याचना किये जाने योग्य लोकस्वामी,
माधवः – मधुकुल में उत्पन्न होने वाले,
भक्तवत्सलः – भक्तों से प्रेम करने वाले ॥91॥

सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी ।
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ॥92॥

अर्थ –
सुवर्णवर्णः – सोने के समान पीतवर्ण वाले,
हेमाङ्गः – सोने के समान सुडौल चमकीले अंगों वाले,
वराङ्गः – परम श्रेष्ठ अंग-प्रत्यंगों वाले,
चन्दनाङ्गदी – चन्दन के लेप और बाजूबंद से सुशोभित,
वीरहा – राग-द्वेष आदि प्रबल शत्रुओं से डर कर शरण में आने वालों के अन्तःकरण में उनका अभाव कर देने वाले,
विषमः – जिनके समान दूसरा कोई नहीं, ऐसे अनुपम,
शून्यः – समस्त विशेषणों से रहित,
घृताशीः – अपने आश्रित जनों के लिये कृपा से सने हुए द्रवित संकल्प करने वाले,
अचलः – किसी प्रकार भी विचलित न होने वाले, अविचल,
चलः – वायुरूप से सर्वत्र गमन करने वाले ॥92॥

अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक् ।
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ॥93॥

अर्थ – अमानी – स्वयं मान न चाहने वाले, अभिमान रहित,
मानदः – दूसरों को मान देने वाले,
मान्यः – सबके पूजने योग्य माननीय,
लोकस्वामी – चौदह भुवनों के स्वामी,
त्रिलोकधृक् – तीनों लोकों को धारण करने वाले,
सुमेधाः – अति उत्तम सुन्दर बुद्धि वाले,
मेधजः – यज्ञ में प्रकट होने वाले,
धन्यः – नित्य कृतकृत्य होने के कारण सर्वथा धन्यवाद के पात्र,
सत्यमेधाः – सच्ची और श्रेष्ठ बुद्धि वाले,
धराधरः – अनन्त भगवान के रूप से पृथ्वी को धारण करने वाले ॥93॥

तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः ॥94॥

अर्थ –
तेजोवृषः – आदित्य रूप से तेज की वर्षा करने वाले और भक्तों पर अपने अमृतमय तेज की वर्षा करने वाले,
द्युतिधरः – परम कान्ति को धारण करने वाले,
सर्वशस्त्रभृतां वरः – समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ,
प्रग्रहः – भक्तों के द्वारा अर्पित पत्र-पुष्पादि को ग्रहण करने वाले,
निग्रहः – सबका निग्रह करने वाले,
व्यग्रः – अपने भक्तों को अभीष्ट फल देने में लगे हुए,
नैकशृङ्गः – नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात रूप चार सींगों को धारण करने वाले शब्दब्रह्म स्वरुप,
गदाग्रजः – गद से पहले जन्म लेने वाले ॥94॥

चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः ।
चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ॥95॥

अर्थ – चतुर्मूर्तिः – राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न रूप चार मूर्तियों वाले,
चतुर्बाहुः – चार भुजाओं वाले,
चतुर्व्यूहः – वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध, इन चार व्यूहों से युक्त,
चतुर्गतिः – सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्य रूप चार परम गति स्वरुप,
चतुरात्मा – मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त रुप चार अन्तःकरण वाले,
चतुर्भावः – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – इन चारों पुरुषार्थों के उत्पत्ति स्थान,
चतुर्वेदवित् – चारों वेदों के अर्थ को भली भाँति जानने वाले,
एकपात् – एक पाद वाले यानी एक पाद ( अंश ) से समस्त विश्व को व्याप्त करने वाले ॥95॥

समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः ।
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ॥96॥

अर्थ – समावर्तः – संसार चक्र को भली भाँति घुमाने वाले,
अनिवृत्तात्मा – सर्वत्र विद्यमान होने के कारण जिनका आत्मा कहीं से भी हटा हुआ नहीं है,
दुर्जयः – किसी से भी जीतने में न आने वाले,
दुरतिक्रमः – जिनकी आज्ञा का कोई उल्लंघन नहीं कर सके,
दुर्लभः – बिना भक्ति के प्राप्त न होने वाले,
दुर्गमः – कठिनता से जानने में आने वाले,
दुर्गः – कठिनता से प्राप्त होने वाले,
दुरावासः – बड़ी कठिनता से योगिजनों द्वारा हृदय में बसाये जाने वाले,
दुरारिहा – दुष्ट मार्ग में चलने वाले दैत्यों का वध करने वाले ॥96॥

शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः ।
इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ॥97॥

अर्थ –
शुभाङ्गः – कल्याण कारक नाम वाले,
लोकसारङ्गः – लोकों के सार को ग्रहण करने वाले,
सुतन्तुः – सुन्दर विस्तृत जगत रूप तन्तु वाले,
तन्तुवर्धनः – पूर्वोक्त जगत तन्तु को बढ़ाने वाले,
इन्द्रकर्मा – इन्द्र के समान कर्म वाले,
महाकर्मा – बड़े-बड़े कर्म करने वाले,
कृतकर्मा – जो समस्त कर्तव्य कर्म कर चुके हों,
जिनका कोई कर्तव्य शेष न रहा हो – ऐसे कृतकृत्य,
कृतागमः – अपने अवतार योनि के अनुरूप अनेक कार्यों को पूर्ण करने
के लिये अवतार धारण करके आने वाले ॥97॥

उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः ।
अर्को वाजसनः श्रृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी ॥98॥

अर्थ – 790 उद्भवः – स्वेच्छा से श्रेष्ठ जन्म धारण करने वाले, 791 सुन्दरः – सबसे अधिक भाग्यशाली होने के कारण परम सुन्दर, 792 सुन्दः – परम करुणाशील, 793 रत्ननाभः – रत्न के समान सुन्दर नाभि वाले, 794 सुलोचनः – सुन्दर नेत्रों वाले, 795 अर्कः – ब्रह्मादि पूज्य पुरुषों के भी पूजनीय, 796 वाजसनः – याचकों को अन्न प्रदान करने वाले, 797 श्रृङ्गी – प्रलयकाल में सींग युक्त मत्स्य विशेष का रूप धारण करने वाले, 798 जयन्तः – शत्रुओं को पूर्णतया जीतने वाले, 799 सर्वविज्जयी – सर्वज्ञ यानी सब कुछ जानने वाले और सबको जीतने वाले ॥98॥

सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः ।
महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ॥99॥

अर्थ –
सुवर्णबिन्दुः – सुन्दर अक्षर और बिन्दु से युक्त ओंकार स्वरुप नाम ब्रह्म,
अक्षोभ्यः – किसी के द्वारा भी क्षुभित न किये जा सकने वाले,
सर्ववागीश्वरेश्वरः – समस्त वाणीपतियों के यानी ब्रह्मादि के भी स्वामी,
महाह्रदः – ध्यान करने वाले जिसमें गोता लगा कर आनन्द में मग्न होते हैं,
ऐसे परमानन्द के महान सरोवर,
महागर्तः – मायारूप महान गर्त वाले,
महाभूतः – त्रिकाल में कभी नष्ट न होने वाले महाभूत स्वरुप,
महानिधिः – सबके महान निवास स्थान ॥99॥

कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः ।
अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ॥100॥

अर्थ –
कुमुदः – कु अर्थात पृथ्वी को उसका भार उतार कर प्रसन्न करने वाले,
कुन्दरः – हिरण्याक्ष को मारने के लिये पृथ्वी को विदीर्ण करने वाले,
कुन्दः – कश्यप जी को पृथ्वी प्रदान करने वाले,
पर्जन्यः – बादल की भाँति समस्त इष्ट वस्तुओं की वर्षा करने वाले,
पावनः – स्मरण मात्र से पवित्र करने वाले,
अनिलः – सदा प्रबुद्ध रहने वाले,
अमृताशः – जिनकी आशा कभी विफल न हो – ऐसे अमोघ संकल्प,
अमृतवपुः – जिनका कलेवर कभी नष्ट न हो – ऐसे नित्य विग्रह,
सर्वज्ञः – सदा सर्वदा सब कुछ जानने वाले,
सर्वतोमुखः – सब ओर मुख वाले यानी जहाँ कहीं भी उनके भक्त
भक्तिपूर्वक पत्र-पुष्पादि जो कुछ भी अर्पण करें, उसे भक्षण करने वाले ॥100॥

सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः ।
न्यग्रोधोदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः ॥101॥

अर्थ –
सुलभः – नित्य निरन्तर चिन्तन करने वाले को और एकनिष्ठ श्रद्धालु भक्त को
बिना ही परिश्रम के सुगमता से प्राप्त होने वाले,
सुव्रतः – सुन्दर भोजन करने वाले यानी अपने भक्तों द्वारा
प्रेमपूर्वक अर्पण किये हुए पत्र-पुष्पादि मामूली भोजन को भी परम श्रेष्ठ मान कर खाने वाले,
सिद्धः – स्वभाव से ही समस्त सिद्धियों से युक्त,
शत्रुजित् – देवता और सत्पुरुषों के शत्रुओं को अपने शत्रु मान कर जीतने वाले,
शत्रुतापनः – शत्रुओं को तपाने वाले,
न्यग्रोधः – वट वृक्ष रूप,
उदुम्बरः – कारण रूप से आकाश के भी ऊपर रहने वाले,
अश्वत्थः – पीपल वृक्ष स्वरुप,
चाणूरान्ध्रनिषूदनः – चाणूर नामक अन्ध्र जाति के वीर मल्ल को मारने वाले ॥101॥

सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः ।
अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः ॥102॥

अर्थ – 826 सहस्रार्चिः – अनन्त किरणों वाले, 827 सप्तजिह्वः – काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, धूम्रवर्णा, स्फुलिंगिनी और विश्वरूचि – इन सात जिह्वाओं वाले अग्नि स्वरुप, 828 सप्तैधाः – सात दीप्ति वाले अग्नि स्वरुप, 829 सप्तवाहनः – सात घोड़ों वाले सूर्य रूप, 830 अमूर्तिः – मूर्ति रहित निराकार, 831 अनघः – सब प्रकार से निष्पाप, 832 अचिन्त्यः – किसी प्रकार भी चिन्तन करने में न आने वाले, 833 भयकृत् – दुष्टों को भयभीत करने वाले, 834 भयनाशनः – स्मरण करने वालों के और सत्पुरुषों के भय का नाश करने वाले ॥102॥

अनुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् ।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्द्धनः ॥103॥

अर्थ –
अणुः – अत्यन्त सूक्ष्म,
बृहत् – सबसे बड़े,
कृशः – अत्यन्त पतले और हलके,
स्थूलः – अत्यन्त मोटे और भारी,
गुणभृत् – समस्त गुणों को धारण करने वाले,
निर्गुणः – सत्त्व, रज और तम – इन तीनों गुणों से रहित,
महान् – गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य और ज्ञान आदि की अतिशयता के कारण परम महत्व सम्पन्न,
अधृतः – जिनको कोई भी धारण नहीं कर सकता – ऐसे निराधार,
स्वधृतः – अपने आप से धारित यानी अपनी ही महिमा में स्थित,
स्वास्यः – सुन्दर मुख वाले,
प्राग्वंशः – जिनसे समस्त वंश परम्परा आरम्भ हुई है –
ऐसे समस्त पूर्वजों के भी पूर्वज आदि पुरुष,
वंशवर्द्धनः – जगत प्रपंच रूप वंश को और यादव वंश को बढ़ाने वाले ॥103॥

भारभृत्कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः ।
आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ॥104॥

अर्थ –
भारभृत् – शेषनाग आदि के रूप में पृथ्वी का भार उठाने वाले
और अपने भक्तों के योगक्षेम रूप भार को वहन करने वाले,
कथितः – वेद-शास्त्र और महापुरुषों द्वारा जिनके गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य
और स्वरुप का बारंबार कथन किया गया है, ऐसे सबके द्वारा वर्णित,
योगी – नित्य समाधि युक्त,
योगीशः – समस्त योगियों के स्वामी,
सर्वकामदः – समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले,
आश्रमः – सबको विश्राम देने वाले,
श्रमणः – दुष्टों को संतप्त करने वाले,
क्षामः – प्रलय काल में सब प्रजा का क्षय करने वाले,
सुपर्णः – वेदरूप सुन्दर पत्तों वाले ( संसार वृक्ष स्वरुप ),
वायुवाहनः – वायु को गमन करने के लिये शक्ति देने वाले ॥104॥

धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः ।
अपराजितः सर्वसहो नियन्तानियमोऽयमः ॥105॥

अर्थ –
धनुर्धरः – धनुषधारी श्रीराम,
धनुर्वेदः – धनुर्विद्या को जानने वाले श्रीराम ,
दण्डः – दमन करने वालों की दमन शक्ति,
दमयिता – यम और राजा आदि के रूप में दमन करने वाले,
दमः – दण्ड का कार्य यानी जिनको दण्ड दिया जाता है, उनका सुधार,
अपराजितः – शत्रुओं द्वारा पराजित न होने वाले,
सर्वसहः – सब कुछ सहन करने की सामर्थ्य से युक्त, अतिशय तितिक्षु,
नियन्ता – सबको अपने-अपने कर्तव्य में नियुक्त करने वाले,
अनियमः – नियमों से न बँधे हुए, जिनका कोई भी नियन्त्रण करने वाला नहीं, ऐसे परम स्वतन्त्र,
अयमः – जिनका कोई शासक नहीं अथवा मृत्यु रहित ॥105॥

सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः ।
अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत्प्रीतिवर्धनः ॥106॥

अर्थ –
सत्त्ववान् – बल, वीर्य, सामर्थ्य आदि समस्त सत्त्वों से सम्पन्न,
सात्त्विकः – सत्त्वगुण प्रधान विग्रह,
सत्यः – सत्य भाषण स्वरुप,
सत्यधर्मपरायणः – यथार्थ भाषण और धर्म के परम आधार,
अभिप्रायः – प्रेमीजन जिनको चाहते हैं – ऐसे परम इष्ट,
प्रियार्हः – अत्यन्त प्रिय वस्तु समर्पण करने के लिये योग्य पात्र,
अर्हः – सबके परम पूज्य,
प्रियकृत् – भजने वालों का प्रिय करने वाले,
प्रीतिवर्धनः – अपने प्रेमियों के प्रेम को बढ़ाने वाले ॥106॥

विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः ।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ॥107॥

अर्थ –
विहायसगतिः – आकाश में गमन करने वाले,
ज्योतिः – स्वयं प्रकाश स्वरुप,
सुरुचिः – सुन्दर रूचि और कान्ति वाले,
हुतभुक् – यज्ञ में हवन की हुई समस्त हवि को अग्नि रूप से भक्षण करने वाले,
विभुः – सर्वव्यापी,
रविः – समस्त रसों का शोषण करने वाले सूर्य,
विरोचनः – विविध प्रकार से प्रकाश फैलाने वाले,
सूर्यः – शोभा को प्रकट करने वाले,
सविता – समस्त जगत को प्रसव यानी उत्पन्न करने वाले,
रविलोचनः – सूर्यरूप नेत्रों वाले ॥107॥

अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः ।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः ॥108॥

अर्थ –
अनन्तः – सब प्रकार से अन्त रहित,
हुतभुक् – यज्ञ में हवन की हुई सामग्री को उन-उन देवताओं के रूप में भक्षण करने वाले,
भोक्ता – प्रकृति को भोगने वाले,
सुखदः – भक्तों को दर्शन रूप परम सुख देने वाले,
नैकजः – धर्मरक्षा, साधुरक्षा आदि परम विशुद्ध हेतुओं से स्वेच्छा पूर्वक अनेक जन्म धारण करने वाले,
अग्रजः – सबसे पहले जन्मने वाले आदि पुरुष,
अनिर्विण्णः – पूर्णकाम होने के कारण विरक्ति से रहित,
सदामर्षी – सत्पुरुषों पर क्षमा करने वाले,
लोकाधिष्ठानम् – समस्त लोकों के आधार,
अद्भुतः – अत्यन्त आश्चर्यमय ॥108॥

सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरप्ययः ।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक्स्वस्तिदक्षिणः ॥109॥

अर्थ – 896 सनात् – अनन्त काल स्वरुप, 897 सनातनतमः – सबके कारण होने से ब्रह्मादि पुरुषों की अपेक्षा भी परम पुराण पुरुष, 898 कपिलः – महर्षि कपिल, 899 कपिः – सूर्यदेव, 900 अप्ययः – सम्पूर्ण जगत के लय स्थान, 901 स्वस्तिदः – परमानन्द रूप मंगल देने वाले, 902 स्वस्तिकृत् – आश्रित जनों का कल्याण करने वाले, 903 स्वस्ति – कल्याण स्वरुप, 904 स्वस्तिभुक् – भक्तों के परम कल्याण की रक्षा करने वाले, 905 स्वस्तिदक्षिणः – कल्याण करने में समर्थ और शीघ्र कल्याण करने वाले ॥109॥

अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः ।
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ॥110॥

अर्थ –
अरौद्रः – सब प्रकार के रूद्र ( क्रूर ) भावों से रहित शान्त मूर्ति,
कुण्डली – सूर्य के समान प्रकाशमान मकराकृत कुण्डलों को धारण करने वाले,
चक्री – सुदर्शन चक्र को धारण करने वाले,
विक्रमी – सबसे विलक्षण पराक्रमशील,
ऊर्जितशासनः – जिनका श्रुति – स्मृतिरूप शासन अत्यन्त श्रेष्ठ है –
ऐसे अति श्रेष्ठ शासन करने वाले,
शब्दातिगः – शब्द की जहाँ पहुँच नहीं, ऐसे वाणी के अविषय,
शब्दसहः – समस्त वेदशास्त्र जिनकी महिमा का बखान करते हैं,
शिशिरः – त्रिताप पीड़ितों को शान्ति देने वाले शीतल मूर्ति,
शर्वरीकरः – ज्ञानियों की रात्रि संसार और अज्ञानियों की रात्रि ज्ञान –
इन दोनों को उत्पन्न करने वाले ॥110॥

अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां वरः ।
विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥111॥

अर्थ –
अक्रूरः – सब प्रकार के क्रूर भावों से रहित,
पेशलः – मन, वाणी और कर्म – सभी दृष्टियों से सुन्दर होने के कारण परम सुन्दर,
दक्षः – सब प्रकार से समृद्ध, परम शक्तिशाली और क्षण मात्र में बड़े से बड़ा कार्य कर देने वाले महान कार्य कुशल,
दक्षिणः – संहारकारी,
क्षमिणां वरः – क्षमा करने वालों में सर्वश्रेष्ठ,
विद्वत्तमः – विद्वानों में सर्वश्रेष्ठ परम विद्वान,
वीतभयः – सब प्रकार के भय से रहित,
पुण्यश्रवणकीर्तनः – जिनके नाम, गुण, महिमा और स्वरुप का श्रवण
और कीर्तन परम पुण्य यानी परम पावन है ॥111॥

उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः ।
वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ॥112॥

अर्थ –
उत्तारणः – संसार सागर से पार करने वाले,
दुष्कृतिहा – पापों का और पापियों का नाश करने वाले,
पुण्यः – स्मरण आदि करने वाले समस्त पुरुषों को पवित्र कर देने वाले,
दुःस्वप्ननाशनः – ध्यान, स्मरण, कीर्तन और पूजन करने से बुरे स्वप्नों का
और संसार रूप दुःस्वप्न का नाश करने वाले,
वीरहा – शरणागतों की विविध गतियों का यानी संसार चक्र का नाश करने वाले,
रक्षणः – सब प्रकार से रक्षा करने वाले,
सन्तः – विद्या और विनय का प्रचार करने के लिये संतों के रूप में प्रकट होने वाले,
जीवनः – समस्त प्रजा को प्राणरूप से जीवित रखने वाले,
पर्यवस्थितः – समस्त विश्व को व्याप्त करके स्थित रहने वाले ॥112॥

अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः ।
चतुरस्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ॥113॥

अर्थ –
अनन्तरूपः – अनन्त अमित रूप वाले,
अनन्तश्रीः – अनन्तश्री यानी अपरिमित पराशक्तियों से युक्त,
जितमन्युः – सब प्रकार से क्रोध को जीत लेने वाले,
भयापहः – भक्त भयहारी,
चतुरस्रः – चार वेदरूप कोणों वाले मंगलमूर्ति और न्यायशील,
गभीरात्मा – गम्भीर मन वाले,
विदिशः – अधिकारियों को उनके कर्मानुसार विभागपूर्वक नाना प्रकार के फल देने वाले,
व्यादिशः – सबको यथायोग्य विविध आज्ञा देने वाले,
दिशः – वेदरूप से समस्त कर्मों का फल बतलाने वाले ॥113॥

अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः ।
जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः ॥114॥

अर्थ –
अनादिः – जिसका आदि कोई न हो ऐसे सबके कारण स्वरुप,
भूर्भुवः – पृथ्वी के भी आधार,
लक्ष्मीः – समस्त शोभायमान वस्तुओं की शोभा,
सुवीरः – आश्रित जनों के अन्तःकरण में सुन्दर कल्याणमयी विविध स्फुरणा करने वाले,
रुचिराङ्गदः – परम रुचिकर कल्याणमय बाजूबन्दों को धारण करने वाले,
जननः – प्राणिमात्र को उत्पन्न करने वाले,
जनजन्मादिः – जन्म लेने वालों के जन्म के मूल कारण,
भीमः – सबको भय देने वाले,
भीमपराक्रमः – अतिशय भय उत्पन्न करने वाले, पराक्रम से युक्त ॥114॥

आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः ।
ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ॥115॥

अर्थ –
आधारनिलयः – आधार स्वरुप पृथ्वी आदि समस्त भूतों के स्थान,
अधाता – जिसका कोई भी बनाने वाला न हो ऐसे स्वयं स्थित,
पुष्पहासः – पुष्प की भाँति विकसित हास्य वाले,
प्रजागरः – भली प्रकार जाग्रत रहने वाले नित्य प्रबुद्ध,
ऊर्ध्वगः – सबसे ऊपर रहने वाले,
सत्पथाचारः – सत्पुरुषों के मार्ग का आचरण करने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम,
प्राणदः – परीक्षित आदि मरे हुए को भी जीवन देने वाले,
प्रणवः – ॐकार स्वरुप,
पणः – यथायोग्य व्यवहार करने वाले ॥115॥

प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः ।
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ॥116॥

अर्थ –
प्रमाणम् – स्वतः सिद्ध होने से स्वयं प्रमाण स्वरुप,
प्राणनिलयः – प्राणों के आधारभूत,
प्राणभृत् – समस्त प्राणों का पोषण करने वाले,
प्राणजीवनः – प्राणवायु के संचार से प्राणियों को जीवित रखने वाले,
तत्त्वम् – यथार्थ तत्त्व रूप,
तत्त्ववित् – यथार्थ तत्त्व को पूर्णतया जानने वाले,
एकात्मा – अद्वितीय स्वरुप,
जन्ममृत्युजरातिगः – जन्म, मृत्यु और बुढ़ापा आदि शरीर के धर्मों से सर्वथा अतीत ॥116॥

भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः ।
यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ॥117॥

अर्थ –
भूर्भुवःस्वस्तरुः – भूः, भुवः, स्वः रूप तीनों लोकों को व्याप्त करने वाले और संसार वृक्ष स्वरुप,
तारः – संसार सागर से पार उतारने वाले,
सविता – सबको उत्पन्न करने वाले पितामह,
प्रपितामहः – पितामह ब्रह्मा के भी पिता,
यज्ञः – यज्ञ स्वरुप,
यज्ञपतिः – समस्त यज्ञों के अधिष्ठाता,
यज्वा – यजमान रूप से यज्ञ करने वाले,
यज्ञाङ्गः – समस्त यज्ञरूप अंगों वाले,
यज्ञवाहनः – यज्ञों को चलाने वाले ॥117॥

यज्ञभृद्यज्ञकृद्यज्ञी यज्ञभुग्यज्ञसाधनः ।
यज्ञान्तकृद्यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ॥118॥

अर्थ –
यज्ञभृत् – यज्ञों का धारण पोषण करने वाले,
यज्ञकृत् – यज्ञों के रचयिता,
यज्ञी – समस्त यज्ञ जिसमें समाप्त होते हैं – ऐसे यज्ञशेषी,
यज्ञभुक् – समस्त यज्ञों के भोक्ता,
यज्ञसाधनः – ब्रह्मयज्ञ, जपयज्ञ आदि बहुत से यज्ञ जिनकी प्राप्ति के साधन हैं,
यज्ञान्तकृत् – यज्ञों का अन्त करने वाले यानी उनका फल देने वाले,
यज्ञगुह्यम् – यज्ञों में गुप्त ज्ञान स्वरुप और निष्काम यज्ञ स्वरुप,
अन्नम् – समस्त प्राणियों का अन्न की भाँति उनकी सब प्रकार से तुष्टि-पुष्टि करने वाले,
अन्नादः – समस्त अन्नों के भोक्ता ॥118॥

आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः ।
देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ॥119॥

अर्थ –
आत्मयोनिः – जिनका कारण दूसरा कोई नहीं – ऐसे स्वयं योनि स्वरुप,
स्वयंजातः – स्वयं अपने आप स्वेच्छापूर्वक प्रकट होने वाले,
वैखानः – पातालवासी हिरण्याक्ष का वध करने के लिये पृथ्वी को खोदने वाले,
सामगायनः – सामवेद का गान करने वाले,
देवकीनन्दनः – देवकी पुत्र,
स्रष्टा – समस्त लोकों के रचयिता,
क्षितीशः – पृथ्वीपति,
पापनाशनः – स्मरण, कीर्तन, पूजन और ध्यान आदि करने से
समस्त पाप समुदाय का नाश करने वाले ॥119॥

शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ।
रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ॥120॥

अर्थ –
पांचजन्य शंख को धारण करने वाले,
नन्दकी – नन्दक नामक खड्ग धारण करने वाले,
चक्री – संसार चक्र को चलाने वाले,
शार्ङ्गधन्वा – शार्ङ्ग धनुषधारी,
गदाधरः – कौमोदकी नाम की गदा धारण करने वाले,
रथाङ्गपाणिः – भीष्म की प्रतिज्ञा रखने के लिये सुदर्शन चक्र को हाथ में धारण करने वाले,
अक्षोभ्यः – जो किसी प्रकार भी विचलित नहीं किये जा सके,
सर्वप्रहरणायुधः – ज्ञात और अज्ञात जितने भी युद्ध भूमि में काम करने वाले हथियार हैं,
उन सबको धारण करने वाले ॥120॥

॥ सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति ॥

यहाँ हजार नामों की समाप्ति दिखलाने के लिये अन्तिम नाम को दुबारा लिखा गया है।
मंगलवाची होने से ॐकार का स्मरण किया गया है। अन्त में नमस्कार करके भगवान की पूजा की गयी है।

इतीदं कीर्तनीयस्य केशवस्य महात्मनः ।
नाम्नां सहस्रं दिव्यानामशेषेण प्रकीर्तितम् ॥121॥

अर्थ – इस प्रकार यह कीर्तन करने योग्य महात्मा केशव के दिव्य
एक हजार नामों का पूर्ण रूप से वर्णन कर दिया ॥121॥

य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् ।
नाशुभं प्राप्नुयात्किञ्चित्सोऽमुत्रेह च मानवः ॥122॥

अर्थ – जो मनुष्य इस विष्णु सहस्रनाम का सदा श्रवण करता है
और जो प्रतिदिन इसका कीर्तन या पाठ करता है,
उसका इस लोक में तथा परलोक में कहीं भी कुछ अशुभ नहीं होता ॥122॥

वेदान्तगो ब्राह्मणः स्यात्क्षत्रियो विजयी भवेत् ।
वैश्यो धनसमृद्धः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुयात् ॥123॥

अर्थ – इस विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने से अथवा कीर्तन करने से
ब्राह्मण वेदान्त पारगामी हो जाता है यानी उपनिषदों के अर्थरूप परब्रह्म को पा लेता है।
क्षत्रिय युद्ध में विजय पाता है, वैश्य व्यापार में धन पाता है और शूद्र सुख पाता है ॥123॥

धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात् ।
कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी प्राप्नुयात्प्रजाम् ॥124॥

अर्थ – धर्म की इच्छा वाला धर्म को पाता है, अर्थ की इच्छा वाला अर्थ पाता है,
भोगों की इच्छा वाला भोग पाता है और प्रजा की इच्छा वाला प्रजा पाता है ॥124॥

भक्तिमान्यः सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः ।
सहस्रं वासुदेवस्य नाम्नामेतत्प्रकीर्तयेत् ॥125॥।


यशः प्राप्नोति विपुलं ज्ञातिप्राधान्यमेव च ।
अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥126॥।


न भयं क्वचिदाप्नोति वीर्यं तेजश्च विन्दति ।
भवत्यरोगो द्युतिमान्बलरूपगुणान्वितः ॥127॥

अर्थ – जो भक्तिमान पुरुष सदा प्रातःकाल में उठ कर स्नान करके
पवित्र हो मन में विष्णु का ध्यान करता हुआ इस वासुदेव सहस्रनाम का
भली प्रकार पाठ करता है, वह महान यश पाता है, जाति में महत्व पाता है,
अचल सम्पत्ति पाता है और अति उत्तम कल्याण पाता है तथा
उसको कहीं भय नहीं होता। वह वीर्य और तेज को पाता है तथा
आरोग्यवान, कान्तिमान, बलवान, रूपवान और सर्वगुण सम्पन्न हो जाता है ॥125 – 127॥

रोगार्तो मुच्यते रोगाद् बद्धो मुच्येत बन्धनात् ।
भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः ॥128॥

अर्थ – रोगातुर पुरुष रोग से छूट जाता है, बन्धन में पड़ा हुआ पुरुष बन्धन से छूट जाता है,
भयभीत भय से छूट जाता है और आपत्ति में पड़ा हुआ आपत्ति से छूट जाता है ॥128॥

दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम् ।
स्तुवन्नामसहस्रेण नित्यं भक्तिसमन्वितः ॥129॥

अर्थ – जो पुरुष भक्ति सम्पन्न होकर इस विष्णु सहस्रनाम से पुरुषोत्तम भगवान की प्रतिदिन स्तुति करता है,
वह शीघ्र ही समस्त संकटों से पार हो जाता है ॥129॥

वासुदेवाश्रयो मर्त्यो वासुदेवपरायणः ।
सर्वपापविशुद्धात्मा याति ब्रह्म सनातनम् ॥130॥

अर्थ – जो मनुष्य वासुदेव के आश्रित और उनके परायण है,
वह समस्त पापों से छूट कर विशुद्ध अन्तःकरण वाला हो सनातन परब्रह्म को पाता है ॥130॥

न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित् ।
जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजायते ॥131॥

अर्थ – वासुदेव के भक्तों का कहीं भी अशुभ नहीं होता है तथा उनको जन्म,
मृत्यु, जरा और व्याधि का भी भय नहीं रहता है ॥131॥

इमं स्तवमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ।
युज्येतात्मसुखक्षान्तिश्रीधृतिस्मृतिकीर्तिभिः ॥132॥

अर्थ – जो पुरुष श्रद्धापूर्वक भक्ति भाव से इस विष्णु सहस्रनाम का पाठ करता है,
वह आत्मसुख, क्षमा, लक्ष्मी, धैर्य, स्मृति और कीर्ति को पाता है ॥132॥

न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः ।
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां पुरुषोत्तमे ॥133॥

अर्थ – पुरुषोत्तम के पुण्यात्मा भक्तों को किसी दिन क्रोध नहीं आता,
ईर्ष्या उत्पन्न नहीं होती, लोभ नहीं होता और उनकी बुद्धि कभी अशुद्ध नहीं होती ॥133॥

द्यौः सचन्द्रार्कनक्षत्रा खं दिशो भूर्महोदधिः ।
वासुदेवस्य वीर्येण विधृतानि महात्मनः ॥134॥

अर्थ – स्वर्ग, सूर्य, चन्द्रमा तथा नक्षत्र सहित आकाश, दस दिशाएँ,
पृथ्वी और महासागर – ये सब महात्मा वासुदेव के वीर्य से धारण किये गये हैं ॥134॥

ससुरासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम् ।
जगद्वशे वर्ततेदं कृष्णस्य सचराचरम् ॥135॥

अर्थ – देवता, दैत्य, गन्धर्व, यक्ष, सर्प और राक्षस सहित
यह स्थावर-जंगम रूप सम्पूर्ण जगत श्रीकृष्ण के अधीन रह कर यथा योग्य बरत रहे हैं ॥135॥

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सत्त्वं तेजो बलं धृतिः ।
वासुदेवात्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च ॥136॥

अर्थ – इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, सत्त्व, तेज, बल, धीरज, क्षेत्र ( शरीर ), और क्षेत्रज्ञ ( आत्मा ) –
ये सब श्री वासुदेव के रूप हैं, ऐसा वेद कहते हैं ॥136॥

सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्पते ।
आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः ॥137॥

अर्थ – सब शास्त्रों में आचार प्रथम माना जाता है, आचार से ही धर्म की उत्पत्ति होती है
और धर्म के स्वामी भगवान अच्युत हैं ॥137॥

ऋषयः पितरो देवा महाभूतानि धातवः ।
जङ्गमाजङ्गमं चेदं जगन्नारायणोद्भवम् ॥138॥

अर्थ – ऋषि, पितर, देवता, पंच महाभूत, धातुएँ और स्थावर-जंगम रूप सम्पूर्ण जगत –
ये सब नारायण से ही उत्पन्न हुए हैं ॥138॥

योगो ज्ञानं तथा सांख्यं विद्याः शिल्पादि कर्म च ।
वेदाः शास्त्राणि विज्ञानमेतत्सर्वं जनार्दनात् ॥139॥

अर्थ – योग, ज्ञान, सांख्य, विद्याएँ, शिल्प आदि कर्म, वेद, शास्त्र और विज्ञान –
ये सब विष्णु से उत्पन्न हुए हैं ॥139॥

एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः ।
त्रीँल्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः ॥140॥

अर्थ – वे समस्त विश्व के भोक्ता और अविनाशी विष्णु ही एक ऐसे हैं,
जो अनेक रूपों में विभक्त होकर भिन्न – भिन्न भूत विशेषों के अनेकों रूपों को धारण कर रहे हैं
तथा त्रिलोकी में व्याप्त होकर सबको भोग रहे हैं ॥140॥

इमं स्तवं भगवतो विष्णोर्व्यासेन कीर्तितम् ।
पठेद्य इच्छेत्पुरुषः श्रेयः प्राप्तुं सुखानि च ॥141॥

अर्थ – जो पुरुष परम श्रेय और सुख पाना चाहता हो वह भगवान व्यासजी के कहे हुए
इस विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र का पाठ करे ॥141॥

विश्वेश्वरमजं देवं जगतः प्रभवाप्ययम् ।
भजन्ति ये पुष्कराक्षं न ते यान्ति पराभवम् ॥142॥

अर्थ – जो विश्व के ईश्वर जगत की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश करने वाले जन्मरहित कमललोचन
भगवान विष्णु का भजन करते हैं, वे कभी पराभव नहीं पाते हैं ॥142॥

॥ इस प्रकार श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्रम् सम्पूर्ण हुआ ॥


विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र का पाठ करना एक प्रकार की उपासना मानी जाती है, जो व्यक्ति को भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त करती है। यह स्तोत्र न केवल भक्तों के लिए एक साधना का माध्यम है, बल्कि यह जीवन के विविध समस्याओं का समाधान भी प्रस्तुत करता है। कहा जाता है कि इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के समस्त कष्ट दूर होते हैं और उसे जीवन में हर क्षेत्र में सफलता मिलती है।

विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ सरल और सहज है, जिसे कोई भी व्यक्ति आसानी से कर सकता है। इसके पाठ के लिए किसी विशेष नियम या विधि की आवश्यकता नहीं होती है, केवल शुद्ध मन और श्रद्धा से इसका उच्चारण करना पर्याप्त है। इस PDF संस्करण में आपको विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र का सम्पूर्ण पाठ, हिंदी भाषा में सरल और स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है, जिससे आप इसे आसानी से समझ सकें और अपने जीवन में इसके लाभों का अनुभव कर सकें।

गणेश अंग पूजा मंत्र – Ganesha Anga Puja Mantra PDF 2024-25

गणेश अंग पूजा मंत्र (Ganesha Anga Puja Mantra) हिंदू धर्म में अत्यधिक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है। गणेश जी को विघ्नहर्ता और शुभता के प्रतीक माना जाता है। अंग पूजा मंत्रों का उच्चारण करते समय गणेश जी के शरीर के विभिन्न अंगों का ध्यान किया जाता है और उनके दिव्य गुणों का स्मरण किया जाता है। यह पूजा साधक को मानसिक शांति, सुख और समृद्धि प्रदान करने में सहायक मानी जाती है। श्री गौरीनंदन की आरती

गणेश अंग पूजा में साधक गणेश जी के विभिन्न अंगों का ध्यान करते हुए, प्रत्येक अंग का महत्व समझते हुए और उसका पूजन करते हुए मंत्रों का उच्चारण करता है। इस अनुष्ठान में गणेश जी के मस्तक, नेत्र, कान, मुख, ह्रदय, हाथ, पैर आदि अंगों की पूजा की जाती है। प्रत्येक अंग का अपना विशेष महत्व है और उसके लिए अलग-अलग मंत्रों का उच्चारण किया जाता है।

उदाहरण के लिए, गणेश जी के मस्तक का पूजन करते समय साधक ‘ॐ गणेशाय नमः’ मंत्र का उच्चारण करते हुए मस्तक को ध्यान में रखते हैं। इसी प्रकार, नेत्रों का पूजन करते समय ‘ॐ एकदंताय नमः’ मंत्र का उच्चारण किया जाता है। यह प्रक्रिया पूरे शरीर के अंगों के लिए की जाती है। इस प्रकार के पूजन से साधक को गणेश जी की कृपा प्राप्त होती है और उनके जीवन में आने वाले सभी विघ्नों का नाश होता है।

गणेश अंग पूजा के पीछे धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यताएं भी हैं। यह पूजा आत्मा और शरीर के बीच सामंजस्य स्थापित करने में मदद करती है। इसके माध्यम से साधक गणेश जी के साथ आध्यात्मिक संबंध स्थापित करते हैं और उनके आशीर्वाद से जीवन में सफलता प्राप्त करते हैं। अंग पूजा का महत्व यह है कि यह साधक को अपने भीतर की शक्ति और संभावनाओं को पहचानने में सहायता करती है।

इसके अलावा, गणेश अंग पूजा मंत्रों का उच्चारण करने से साधक की ध्यान शक्ति और मानसिक स्थिरता में वृद्धि होती है। यह पूजा साधक के मन और शरीर को शुद्ध करती है और उसे आत्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करती है। गणेश अंग पूजा मंत्रों का नियमित उच्चारण करने से साधक को सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है और उसका आत्मविश्वास बढ़ता है।

गणेश अंग पूजा मंत्र का महत्व केवल धार्मिक दृष्टिकोण से ही नहीं बल्कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यह पूजा साधक के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाने में सहायक होती है। अतः, गणेश अंग पूजा मंत्र का नियमित रूप से उच्चारण करना और इसके महत्व को समझना प्रत्येक भक्त के लिए आवश्यक है।



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|| गणेश अंग पूजा मंत्र ||

भगवान श्री गणेश अंग पूजा मंत्र

❈ ॐ गणेश्वराय नमः – पादौ पूजयामि ।
❈ ॐ विघ्नराजाय नमः – जानुनि पूजयामि ।
❈ ॐ आखुवाहनाय नमः – ऊरूः पूजयामि ।
❈ ॐ हेरम्बाय नमः – कटि पूजयामि ।
❈ ॐ कामरी सूनवे नमः – नाभिं पूजयामि ।
❈ ॐ लम्बोदराय नमः – उदरं पूजयामि ।
❈ ॐ गौरीसुताय नमः – स्तनौ पूजयामि ।
❈ ॐ गणनाथाय नमः – हृदयं पूजयामि ।
❈ ॐ स्थूल कण्ठाय नमः – कण्ठं पूजयामि ।
❈ ॐ पाश हस्ताय नमः – स्कन्धौ पूजयामि ।
❈ ॐ गजवक्त्राय नमः – हस्तान् पूजयामि ।
❈ ॐ स्कन्दाग्रजाय नमः – वक्त्रं पूजयामि ।
❈ ॐ विघ्नराजाय नमः – ललाटं पूजयामि ।
❈ ॐ सर्वेश्वराय नमः – शिरः पूजयामि ।
❈ ॐ गणाधिपताय नमः – सर्वाङ्गाणि पूजयामि ।

|| Ganesha Anga Puja Mantra ||

❈ om ganesharaay namah – paadau poojayaami॥
❈ om vighnaraajaay namah – jaanuni poojyaami॥
❈ om akhuvaahanaay namah – oorooh poojayaami॥
❈ om herambaay namah – kati poojyaami॥
❈ om kaamari sunave namah – naabhim poojayaami॥
❈ om lambodaraay namah – udaram poojyaami॥
❈ om gaureesutaay namah-stanau poojyaami॥
❈ om gananaathaay namah – hrdayam poojyaami॥
❈ om sthool kanthaay namah – kantham poojyaami॥
❈ om paash hastaay namah – skandhau poojyaami॥
❈ om gajavaktaraay namah – hastaan poojayaami॥
❈ om skandagrajaay namah -vaktran poojyaami॥
❈ om vighnaraajaay namah – lalaatam poojyaami॥
❈ om sarveshvaraay namah – shirah poojyaami॥
❈ om ganaadhipataay namah – sarvaangani poojyaami॥


गणेश अंग पूजा मंत्र के लाभ

गणेश अंग पूजा मंत्र हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र माने जाते हैं। इन मंत्रों का उच्चारण करते हुए भगवान गणेश के विभिन्न अंगों का ध्यान और पूजन किया जाता है। यह पूजा साधक के मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक विकास के लिए अत्यधिक लाभकारी होती है। यहाँ गणेश अंग पूजा मंत्र के कुछ मुख्य लाभों का वर्णन किया जा रहा है:

विघ्नों का नाश: भगवान गणेश को विघ्नहर्ता कहा जाता है। गणेश अंग पूजा मंत्रों का नियमित उच्चारण करने से साधक के जीवन में आने वाले सभी प्रकार के विघ्नों और बाधाओं का नाश होता है। यह पूजा साधक को जीवन में सफलता और समृद्धि प्राप्त करने में मदद करती है।

मानसिक शांति और स्थिरता: गणेश अंग पूजा मंत्रों का उच्चारण मानसिक शांति और स्थिरता प्रदान करता है। यह मंत्र साधक के मन को शुद्ध करते हैं और उसे ध्यान केंद्रित करने में सहायता करते हैं। मानसिक शांति और स्थिरता जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करने के लिए आवश्यक हैं।

आध्यात्मिक विकास: गणेश अंग पूजा मंत्र साधक के आध्यात्मिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन मंत्रों का नियमित रूप से उच्चारण करने से साधक का आत्मा और परमात्मा के बीच संबंध मजबूत होता है। यह पूजा साधक को आत्म-ज्ञान और आत्म-प्राप्ति की दिशा में अग्रसर करती है।

शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार: गणेश अंग पूजा मंत्रों का उच्चारण शारीरिक स्वास्थ्य में भी सुधार लाता है। यह मंत्र साधक के शरीर को ऊर्जा और सकारात्मकता से भर देते हैं। नियमित पूजा करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और साधक स्वस्थ जीवन जीता है।

सकारात्मक ऊर्जा का संचार: गणेश अंग पूजा मंत्र साधक के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। यह मंत्र साधक को नकारात्मक विचारों और भावनाओं से मुक्त करते हैं और उसे सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ जीवन जीने में सहायता करते हैं। सकारात्मक ऊर्जा से भरा हुआ व्यक्ति जीवन में आने वाली सभी चुनौतियों का सामना आसानी से कर सकता है।

ध्यान और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता: गणेश अंग पूजा मंत्रों का नियमित उच्चारण साधक की ध्यान और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को बढ़ाता है। यह मंत्र साधक को मानसिक शांति और संतुलन प्रदान करते हैं, जिससे वह अपने कार्यों में ध्यान केंद्रित कर पाता है और उच्चतम स्तर की सफलता प्राप्त करता है।

सुख और समृद्धि: गणेश अंग पूजा मंत्र साधक के जीवन में सुख और समृद्धि लाते हैं। यह पूजा साधक को आर्थिक, सामाजिक और पारिवारिक जीवन में सफलता प्राप्त करने में सहायता करती है। भगवान गणेश की कृपा से साधक का जीवन खुशियों से भर जाता है।

आत्मविश्वास में वृद्धि: गणेश अंग पूजा मंत्रों का उच्चारण साधक के आत्मविश्वास में वृद्धि करता है। यह मंत्र साधक को अपनी क्षमताओं और योग्यताओं पर विश्वास दिलाते हैं, जिससे वह जीवन के सभी क्षेत्रों में आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ता है।

गणेश अंग पूजा मंत्रों का नियमित उच्चारण साधक के जीवन में असीम लाभ प्रदान करता है। यह पूजा साधक को मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनाती है और उसे जीवन में सफलता, सुख और समृद्धि प्राप्त करने में सहायता करती है। गणेश अंग पूजा मंत्र साधक के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाते हैं और उसे गणेश जी की असीम कृपा से समृद्ध करते हैं।

गणेश जी की पूजा करते समय कौन सा मंत्र बोलना चाहिए?

गणेश जी की पूजा करते समय प्रमुख मंत्र हैं:
“ॐ गण गणपतये नमः”
“ॐ गं गणपतये नमः”

इन मंत्रों का जाप गणेश जी की पूजा के दौरान उनकी कृपा प्राप्त करने और विघ्नों से मुक्ति पाने के लिए किया जाता है।

गणेश भगवान का मूल मंत्र क्या है?

गणेश भगवान का मूल मंत्र है:
“ॐ गं गणपतये नमः”

यह मंत्र गणेश जी के प्रमुख मंत्रों में से एक है और उनकी पूजा और आराधना के दौरान बोला जाता है।

गणेश जी के 11 मंत्र कौन-कौन से हैं?

गणेश जी के 11 प्रमुख मंत्र निम्नलिखित हैं:
“ॐ गण गणपतये नमः”
“ॐ गं गणपतये नमः”
“ॐ श्री गणेशाय नमः”
“ॐ विघ्नेश्वराय नमः”
“ॐ नमो भगवते गणपतये”
“ॐ गं गणपतये नमः”
“ॐ गणेशाय नमः”
“ॐ गण गणपतये नमः”
“ॐ श्री गणेशाय नमः”
“ॐ गणेशाय नमः”
“ॐ महागणपतये नमः”

ये मंत्र गणेश जी की विभिन्न अवस्थाओं और उनके गुणों को समर्पित होते हैं।

शक्तिशाली गणेश मंत्र कौन सा है?

गणेश जी के शक्तिशाली मंत्रों में प्रमुख मंत्र है:
“ॐ श्री गणेशाय नमः”

इसके अलावा, “ॐ गं गणपतये नमः” भी एक प्रभावशाली और शक्तिशाली मंत्र माना जाता है जो गणेश जी की पूजा और आराधना के लिए उपयोग किया जाता है।

मनोकामना पूर्ति के लिए कौन सा मंत्र शक्तिशाली है?

मनोकामना पूर्ति के लिए निम्नलिखित मंत्र शक्तिशाली माने जाते हैं:
“ॐ गण गणपतये नमः”
“ॐ श्री गणेशाय नमः”
“ॐ वक्रतुण्डाय नमः”

इन मंत्रों का जाप करने से मनोकामनाएँ पूरी होने की संभावना बढ़ जाती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

मनोकामना पूर्ति के लिए कौन सा मंत्र शक्तिशाली है?

मनोकामना पूर्ति के लिए “ॐ श्री गणेशाय नमः” और “ॐ गण गणपतये नमः” मंत्र अत्यंत शक्तिशाली माने जाते हैं। इन मंत्रों का नियमित जाप करने से मनोकामनाएँ पूरी हो सकती हैं और जीवन में सफलता और समृद्धि प्राप्त की जा सकती है।

Dussehra Wishes in Hindi 2024

दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएं (Dussehra Wishes) अत्याचार पर सदाचार की जीत… क्रोध पर दया और क्षमा की विजय… अज्ञान पर ज्ञान का परचम… दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएं। यह पर्व हमें यह याद दिलाता है कि सत्य और न्याय की हमेशा जीत होती है, चाहे राह कितनी भी कठिन क्यों न हो। भगवान श्रीराम ने हमें सिखाया कि धैर्य, साहस, और सही मार्ग पर चलते हुए, हम किसी भी कठिनाई को पार कर सकते हैं। दशहरा का यह उत्सव हमें अपने भीतर की नकारात्मकताओं को मिटाने और सकारात्मकता का स्वागत करने का संदेश देता है। इस पावन पर्व पर आपके जीवन में शांति, समृद्धि, और खुशहाली का संचार हो। विजयादशमी का यह पर्व आपके और आपके परिवार के लिए मंगलमय हो! Merry Christmas Wishes

त्यौहारों के मौके पर हमारे मन में हर्षोल्लास होता है और न जाने कितनी चीज़ों के बारे में विचार आते हैं। हमारे देश में त्यौहारों के समय अपने सगे-संबंधियों को बधाई देने का एक पुराना और सुंदर प्रचलन है। त्यौहारों का समय आते ही लोग एक से बढ़कर एक विशेज और मैसेज एक-दूसरे को भेजने लगते हैं। अगर आप भी अपने किसी करीबी को कुछ अनोखे संदेश भेजना चाहते हैं, तो आपके लिए हम चुनकर लाए हैं दशहरा की कुछ अनोखी विशेज। आप यहाँ राम चालीसा भी पढ़ सकते हैं।

दशहरा का त्यौहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, और यह हमें जीवन में सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। इस पर्व पर, जब रावण के पुतले को जलाया जाता है, तो यह हमें याद दिलाता है कि चाहे बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः सत्य की विजय होती है। इसलिए, इस दशहरे पर अपने प्रियजनों को शुभकामनाएं भेजें और उन्हें इस पर्व के सच्चे अर्थ की याद दिलाएं।


सत्य की जीत, धर्म का उत्थान, यही है दशहरे का पर्व महान।
आपको और आपके परिवार को विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं।

अधर्म पर धर्म की जीत, असत्य पर सत्य की जीत।
इस विजयदशमी के अवसर पर आपको जीवन में हर कठिनाई पर विजय प्राप्त करने की शक्ति मिले। दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएं!

दशहरा लाए आपके जीवन में ख़ुशियों की बहार, सफलता मिले आपको हर बार।
विजयदशमी की ढेर सारी शुभकामनाएं!

इस दशहरे, जलाएं रावण के साथ अपनी सारी बुराइयों को और जीत हासिल करें सच्चाई की।
आपको और आपके परिवार को दशहरे की ढेरों शुभकामनाएं।

रावण की तरह आपके दुखों का अंत हो और राम की तरह आपके जीवन में खुशियां आएं।
दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएं!

बुराई का होता है नाश, दशहरा लाता है उम्मीदों की आस।
विजयदशमी के पावन पर्व पर आपको और आपके परिवार को ढेरों शुभकामनाएं!

सफलता का हर दिन हो, असत्य पर सत्य की जीत हो।
दशहरे की ढेर सारी शुभकामनाएं!

इस दशहरे, अपने जीवन में खुशियों के रथ पर सवार हो जाएं और बुराइयों का अंत करें।
आपको और आपके परिवार को विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं।

दशहरा का पर्व हमें सिखाता है कि जीवन में सच्चाई और अच्छाई की हमेशा जीत होती है।
आपको और आपके परिवार को दशहरे की ढेरों शुभकामनाएं।

दशहरे की पावन बेला पर, सत्य और धर्म की राह पर चलें।
विजयदशमी की आपको हार्दिक शुभकामनाएं!

दशहरे की शुभ बेला पर, यही है हमारी कामना, हर कदम पर मिले आपको सफलता, आपके जीवन में हो सच्चाई का राज।
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

रावण का संहार और राम का राज्य, दशहरे की यही तो है विशेषता।
इस पावन पर्व पर आपको और आपके परिवार को ढेरों शुभकामनाएं!

सच्चाई की राह पर चलने वालों को कभी हार नहीं मिलती, यह दशहरा आपके जीवन में नई प्रेरणा लेकर आए।
विजयदशमी की ढेर सारी शुभकामनाएं!

हर दिन हो आपके लिए खास, दशहरे के दिन हो खुशियों की बारिश।
आपको और आपके परिवार को विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

दशहरा का पर्व हमें सिखाता है कि जब तक हमारे अंदर सच्चाई और धर्म का बल है, तब तक हम किसी भी बुराई को हरा सकते हैं।
दशहरे की ढेरों शुभकामनाएं!

असत्य पर सत्य की जीत का पर्व, बुराई पर अच्छाई की विजय का दिन।
इस दशहरे पर आपके जीवन में भी हर मुश्किल का अंत हो। शुभ दशहरा!

दशहरा हमें सिखाता है कि जीवन में कितनी भी कठिनाइयां क्यों न आएं, अगर हमारे इरादे सच्चे हों, तो हम हर परेशानी को हरा सकते हैं।
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

इस दशहरे पर, अपने अंदर की बुराइयों को रावण की तरह जलाएं और अच्छाई का दीप जलाएं।
दशहरे की ढेर सारी शुभकामनाएं!

रावण की हार और राम की जीत का यह पर्व आपके जीवन में भी जीत का प्रतीक बने।
आपको और आपके परिवार को दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएं!

दशहरे का पर्व आपके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लेकर आए।
विजयदशमी की ढेर सारी शुभकामनाएं!

अधर्म का नाश हो, धर्म की हो जीत, यही है दशहरे की सीख।
इस पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार को ढेरों शुभकामनाएं!

दशहरा हमें सिखाता है कि जब भी हमें अपने जीवन में कोई रावण दिखाई दे, हमें उसे जलाने के लिए राम जैसा साहस अपनाना चाहिए।
शुभ दशहरा!

दशहरा का पर्व आपके जीवन में नई उम्मीदों और खुशियों का संचार करे।
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

सच्चाई की राह पर चलने वालों को कभी डरने की जरूरत नहीं होती, क्योंकि सत्य की हमेशा जीत होती है।
दशहरे की ढेर सारी शुभकामनाएं!

इस दशहरे पर, जीवन के हर क्षेत्र में जीत आपकी हो और असफलताओं का अंत हो।
आपको और आपके परिवार को विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

दशहरे का यह पर्व आपके जीवन में नई ऊर्जा और उत्साह भर दे।
विजयदशमी की ढेरों शुभकामनाएं!

दशहरा हमें यह संदेश देता है कि अगर हमारे इरादे सच्चे हों, तो हम हर बुराई को हरा सकते हैं।
शुभ दशहरा!

इस दशहरे पर, अपने अंदर की सारी नकारात्मकताओं को रावण की तरह जलाएं और सकारात्मकता की मशाल जलाएं।
आपको और आपके परिवार को दशहरे की ढेरों शुभकामनाएं!

रावण के साथ हर दुख और कष्ट का भी नाश हो, और आपके जीवन में खुशियों का राज हो।
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

दशहरे का यह पर्व आपके जीवन में सच्चाई और अच्छाई की राह पर चलने की प्रेरणा दे।
शुभ दशहरा!

असत्य पर सत्य की जीत का पर्व, जीवन में नए अवसरों का आगमन।
इस विजयदशमी पर आपको और आपके परिवार को ढेरों शुभकामनाएं!

दशहरा हमें सिखाता है कि जब भी जीवन में कोई कठिनाई आए, हमें उसे दूर करने के लिए राम जैसा संकल्प लेना चाहिए।
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

इस दशहरे पर, अपने भीतर के सभी बुरे विचारों और बुरी आदतों को रावण की तरह जला दें।
आपको और आपके परिवार को दशहरे की ढेरों शुभकामनाएं!

दशहरे का पर्व आपके जीवन में नई खुशियों और सफलता का संचार करे।
शुभ दशहरा!

दशहरे की यह शुभ बेला आपके जीवन में हर प्रकार की बुराई का अंत करे और अच्छाई की राह पर चलने की प्रेरणा दे।
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

दशहरे का पर्व हर बुराई को मिटाकर, सच्चाई और धर्म की राह पर चलने का संदेश देता है।
इस विजयदशमी पर आपको और आपके परिवार को ढेरों शुभकामनाएं!

इस दशहरे पर, अपने जीवन के हर मुश्किल को रावण की तरह जला दें और राम की तरह विजय प्राप्त करें।
आपको और आपके परिवार को शुभ दशहरा!

दशहरा का यह पर्व आपके जीवन में नई रोशनी और नई उमंग लेकर आए।
विजयदशमी की ढेर सारी शुभकामनाएं!

रावण का अंत हमें सिखाता है कि कितनी भी बड़ी बुराई हो, उसका अंत निश्चित है।
इस दशहरे पर, हर बुराई से मुक्ति पाएँ। शुभ दशहरा!

दशहरा का यह पर्व आपको और आपके परिवार को शक्ति, साहस, और सफलता की राह पर अग्रसर करे।
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

सच्चाई की जीत का प्रतीक दशहरा, आपके जीवन में नई सफलताओं का मार्ग प्रशस्त करे।
शुभ दशहरा!

दशहरा हमें यह सिखाता है कि अगर हमारे इरादे मजबूत और सच्चे हों, तो कोई भी रावण हमें पराजित नहीं कर सकता।
आपको और आपके परिवार को विजयदशमी की ढेरों शुभकामनाएं!

इस दशहरे पर, अपने भीतर के सभी नकारात्मकताओं को रावण की तरह जलाएं और सकारात्मकता की ज्योति जलाएं।
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

रावण का अंत हमें यह सिखाता है कि जीवन में सच्चाई और धर्म का पालन करने से ही विजय मिलती है।
दशहरे की ढेरों शुभकामनाएं!

दशहरा का पर्व आपके जीवन में नई शुरुआत और नई उमंग लेकर आए।
आपको और आपके परिवार को शुभ दशहरा!

दशहरे की यह शुभ बेला आपके जीवन में हर प्रकार की बुराई का अंत करे और अच्छाई की राह पर चलने की प्रेरणा दे।
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

दशहरा हमें यह सिखाता है कि जब भी जीवन में कठिनाइयाँ आएं, हमें उनसे लड़ने के लिए राम जैसा साहस अपनाना चाहिए।
शुभ दशहरा!

इस दशहरे पर, अपने जीवन के हर मुश्किल को रावण की तरह जला दें और राम की तरह विजय प्राप्त करें।
आपको और आपके परिवार को दशहरे की ढेरों शुभकामनाएं!

दशहरे का यह पर्व आपके जीवन में नई रोशनी और नई उमंग लेकर आए।
विजयदशमी की ढेर सारी शुभकामनाएं!

रावण का अंत हमें सिखाता है कि कितनी भी बड़ी बुराई हो, उसका अंत निश्चित है।
इस दशहरे पर, हर बुराई से मुक्ति पाएँ। शुभ दशहरा!

दशहरा का यह पर्व आपको और आपके परिवार को शक्ति, साहस, और सफलता की राह पर अग्रसर करे।
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

सच्चाई की जीत का प्रतीक दशहरा, आपके जीवन में नई सफलताओं का मार्ग प्रशस्त करे।
शुभ दशहरा!

दशहरा हमें यह सिखाता है कि अगर हमारे इरादे मजबूत और सच्चे हों, तो कोई भी रावण हमें पराजित नहीं कर सकता।
आपको और आपके परिवार को विजयदशमी की ढेरों शुभकामनाएं!

इस दशहरे पर, अपने भीतर के सभी नकारात्मकताओं को रावण की तरह जलाएं और सकारात्मकता की ज्योति जलाएं।
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

रावण का अंत हमें यह सिखाता है कि जीवन में सच्चाई और धर्म का पालन करने से ही विजय मिलती है।
दशहरे की ढेरों शुभकामनाएं!

दशहरा का पर्व आपके जीवन में नई शुरुआत और नई उमंग लेकर आए।
आपको और आपके परिवार को शुभ दशहरा!

दशहरे की यह शुभ बेला आपके जीवन में हर प्रकार की बुराई का अंत करे और अच्छाई की राह पर चलने की प्रेरणा दे।
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

दशहरा हमें यह सिखाता है कि जब भी जीवन में कठिनाइयाँ आएं, हमें उनसे लड़ने के लिए राम जैसा साहस अपनाना चाहिए।
शुभ दशहरा!

इस दशहरे पर, अपने जीवन के हर मुश्किल को रावण की तरह जला दें और राम की तरह विजय प्राप्त करें।
आपको और आपके परिवार को दशहरे की ढेरों शुभकामनाएं!

दशहरे का यह पर्व आपके जीवन में नई रोशनी और नई उमंग लेकर आए।
विजयदशमी की ढेर सारी शुभकामनाएं!

रावण का अंत हमें सिखाता है कि कितनी भी बड़ी बुराई हो, उसका अंत निश्चित है।
इस दशहरे पर, हर बुराई से मुक्ति पाएँ। शुभ दशहरा!

दशहरा का यह पर्व आपको और आपके परिवार को शक्ति, साहस, और सफलता की राह पर अग्रसर करे।
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

सच्चाई की जीत का प्रतीक दशहरा, आपके जीवन में नई सफलताओं का मार्ग प्रशस्त करे।
शुभ दशहरा!

दशहरा हमें यह सिखाता है कि अगर हमारे इरादे मजबूत और सच्चे हों, तो कोई भी रावण हमें पराजित नहीं कर सकता।
आपको और आपके परिवार को विजयदशमी की ढेरों शुभकामनाएं!

इस दशहरे पर, अपने भीतर के सभी नकारात्मकताओं को रावण की तरह जलाएं और सकारात्मकता की ज्योति जलाएं।
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

रावण का अंत हमें यह सिखाता है कि जीवन में सच्चाई और धर्म का पालन करने से ही विजय मिलती है।
दशहरे की ढेरों शुभकामनाएं!

दशहरा का पर्व आपके जीवन में नई शुरुआत और नई उमंग लेकर आए।
आपको और आपके परिवार को शुभ दशहरा!

दशहरे की शुभ बेला आपके जीवन से हर प्रकार की नकारात्मकता को दूर करे और आपको नई सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा दे।
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

दशहरा हमें यह सिखाता है कि जब तक हमारे भीतर साहस और धैर्य है, तब तक हम हर प्रकार की बुराई का सामना कर सकते हैं।
शुभ दशहरा!

इस दशहरे पर, अपने जीवन में सत्य और धर्म की मशाल जलाएं और हर प्रकार की बुराई का अंत करें।
आपको और आपके परिवार को विजयदशमी की ढेरों शुभकामनाएं!

दशहरा का पर्व आपके जीवन में सच्चाई और अच्छाई की रोशनी लेकर आए, और हर कठिनाई को रावण की तरह जला दे।
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!


दशहरा कोट्स इन हिंदी Dussehra Quotes in Hindi

बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व है दशहरा, यह हमें सिखाता है कि सत्य और धर्म की राह पर चलने से ही विजय प्राप्त होती है।

रावण की हार और राम की जीत का संदेश है दशहरा, जो हमें बताता है कि बुराई चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसका अंत निश्चित है।

दशहरे का पर्व हमें सिखाता है कि अगर हमारे इरादे सच्चे हों, तो कोई भी रावण हमें हरा नहीं सकता।

इस दशहरे पर अपने भीतर की सभी नकारात्मकताओं को रावण की तरह जला दें और सकारात्मकता का दीप जलाएं।

दशहरा केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि यह सच्चाई की जीत और बुराई के अंत का प्रतीक है।

विजयदशमी का यह पर्व हमें बताता है कि सच्चाई की राह पर चलकर हर मुश्किल का सामना किया जा सकता है।

दशहरे का पर्व आपके जीवन में नई रोशनी और नई उमंग लेकर आए, और हर अंधकार को दूर कर दे।

रावण का अंत हमें यह सिखाता है कि चाहे बुराई कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसका नाश अवश्य होता है।

दशहरा का यह पर्व हमें बताता है कि बुराई पर अच्छाई की जीत निश्चित है, चाहे राह कितनी भी कठिन क्यों न हो।

रावण की तरह अपने भीतर की बुराइयों को भी समाप्त करें और राम की तरह विजय प्राप्त करें।

दशहरे का पर्व हमें जीवन में सच्चाई, धर्म, और अच्छाई के महत्व का एहसास कराता है।

इस दशहरे पर अपने जीवन में सत्य और धर्म की मशाल जलाएं और हर प्रकार की बुराई का अंत करें।

दशहरा हमें सिखाता है कि जब तक हमारे भीतर साहस और धैर्य है, तब तक हम हर प्रकार की बुराई का सामना कर सकते हैं।

विजयदशमी का यह पर्व हमें बताता है कि अच्छाई का मार्ग ही सच्चा मार्ग है, और इसी पर चलकर हमें सफलता मिलेगी।

दशहरा हमें यह संदेश देता है कि अगर हम सच्चे हैं, तो कोई भी रावण हमें पराजित नहीं कर सकता।

रावण की हार और राम की जीत का यह पर्व हमें प्रेरित करता है कि हम भी अपने जीवन में सच्चाई और अच्छाई की राह पर चलें।

दशहरे का यह पर्व हमें बताता है कि जीवन में कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न आएं, अगर हमारे इरादे सच्चे हों, तो हम हर परेशानी को हरा सकते हैं।

इस दशहरे पर, अपने भीतर की सभी नकारात्मकताओं को रावण की तरह जलाएं और सकारात्मकता की ज्योति जलाएं।

दशहरा का पर्व हमें सिखाता है कि सच्चाई की जीत हमेशा होती है, चाहे परिस्थिति कैसी भी हो।

विजयदशमी का यह पर्व हमें बताता है कि अगर हमारे भीतर धर्म का बल है, तो हम हर प्रकार की बुराई का अंत कर सकते हैं।

दशहरा केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि यह सच्चाई और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा है।

इस दशहरे पर, हर बुराई को रावण की तरह जला दें और जीवन में सच्चाई की रोशनी फैलाएं।

दशहरा हमें सिखाता है कि जब भी जीवन में कठिनाइयाँ आएं, हमें उनसे लड़ने के लिए राम जैसा साहस अपनाना चाहिए।

विजयदशमी का यह पर्व हमें बताता है कि सच्चाई का मार्ग ही विजय का मार्ग है।

रावण का अंत हमें यह सिखाता है कि जीवन में सच्चाई और धर्म का पालन करने से ही विजय मिलती है।

दशहरा का पर्व हमारे जीवन में नई शुरुआत और नई उमंग लेकर आता है, और हर बुराई का अंत करता है।

इस दशहरे पर, अपने जीवन में सकारात्मकता की ज्योति जलाएं और नकारात्मकताओं को रावण की तरह जला दें।

दशहरे का यह पर्व हमें बताता है कि जीवन में सच्चाई और अच्छाई की राह पर चलकर ही हम हर प्रकार की कठिनाई का सामना कर सकते हैं।

रावण की हार और राम की जीत का यह पर्व हमें सिखाता है कि सच्चाई की जीत हमेशा होती है, चाहे परिस्थिति कैसी भी हो।

दशहरा का यह पर्व हमारे जीवन में सुख, शांति, और समृद्धि का आशीर्वाद लेकर आता है।

विजयदशमी का यह पर्व हमें प्रेरित करता है कि हम अपने जीवन में सच्चाई और धर्म की राह पर चलें।

इस दशहरे पर, अपने भीतर की सभी बुराइयों को समाप्त करें और अच्छाई का दीप जलाएं।

दशहरा हमें सिखाता है कि अगर हमारे इरादे सच्चे हों, तो हम हर प्रकार की बुराई को हरा सकते हैं।

रावण का अंत हमें यह सिखाता है कि बुराई चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसका नाश निश्चित है।

दशहरे का पर्व हमारे जीवन में नई रोशनी और नई उमंग लेकर आता है, और हर अंधकार को दूर करता है।

विजयदशमी का यह पर्व हमें बताता है कि सच्चाई की राह पर चलकर हम हर कठिनाई का सामना कर सकते हैं।

दशहरा हमें सिखाता है कि जीवन में सच्चाई और अच्छाई की राह पर चलने से ही हमें विजय मिलती है।

इस दशहरे पर, अपने जीवन में नई ऊर्जा और नई उमंग का संचार करें, और हर प्रकार की बुराई का अंत करें।

रावण के साथ-साथ आपके जीवन से हर दुख और कष्ट का भी अंत हो, और आपको सफलता का मार्ग मिले।

दशहरे का यह पर्व हमारे जीवन में सच्चाई और अच्छाई की राह पर चलने की प्रेरणा देता है।

विजयदशमी का यह पर्व हमें बताता है कि अगर हमारे इरादे सच्चे हों, तो कोई भी रावण हमें हरा नहीं सकता।

दशहरा हमें सिखाता है कि सच्चाई की जीत हमेशा होती है, चाहे परिस्थितियां कैसी भी हों।

इस दशहरे पर, अपने भीतर की सभी नकारात्मकताओं को रावण की तरह जला दें और सकारात्मकता का दीप जलाएं।

दशहरे का यह पर्व हमारे जीवन में सच्चाई और अच्छाई की राह पर चलने की प्रेरणा देता है।

विजयदशमी का यह पर्व हमें बताता है कि अगर हम सच्चे हैं, तो कोई भी रावण हमें पराजित नहीं कर सकता।

दशहरा हमें यह सिखाता है कि जीवन में सच्चाई और धर्म का पालन करने से ही विजय मिलती है।

इस दशहरे पर, अपने जीवन में सत्य और धर्म की मशाल जलाएं और हर प्रकार की बुराई का अंत करें।


दशहरा मैसेज इन हिंदी Dussehra Message in Hindi

दशहरा का पर्व आपके जीवन में सत्य, धर्म और अच्छाई की रोशनी लेकर आए।
शुभ दशहरा!

रावण की हार से हमें यह संदेश मिलता है कि बुराई कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसका नाश निश्चित है।
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

दशहरे का यह पर्व आपके जीवन में नई उमंग और नई शुरुआत लेकर आए।
आपको और आपके परिवार को शुभ दशहरा!

इस दशहरे पर, अपने भीतर की सभी नकारात्मकताओं को रावण की तरह जलाएं और सकारात्मकता का दीप जलाएं।
विजयदशमी की ढेरों शुभकामनाएं!

दशहरा हमें यह सिखाता है कि सत्य की हमेशा विजय होती है।
शुभ दशहरा!

दशहरे का पर्व हमें सच्चाई और अच्छाई की राह पर चलने की प्रेरणा देता है।
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

इस दशहरे पर, हर प्रकार की बुराई का अंत करें और जीवन में अच्छाई की रोशनी फैलाएं।
आपको और आपके परिवार को दशहरे की ढेरों शुभकामनाएं!

रावण की तरह अपने भीतर की बुराइयों को भी समाप्त करें और राम की तरह विजय प्राप्त करें।
शुभ दशहरा!

दशहरे का यह पर्व आपके जीवन में सुख, शांति, और समृद्धि का आशीर्वाद लेकर आए।
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

इस दशहरे पर, अपने जीवन में सत्य और धर्म की मशाल जलाएं और हर प्रकार की बुराई का अंत करें।
शुभ दशहरा!

दशहरा हमें यह सिखाता है कि अगर हमारे इरादे सच्चे हों, तो कोई भी रावण हमें हरा नहीं सकता।
विजयदशमी की ढेरों शुभकामनाएं!

दशहरे का यह पर्व आपके जीवन में नई रोशनी और नई उमंग लेकर आए, और हर अंधकार को दूर कर दे।
शुभ दशहरा!

रावण का अंत हमें यह सिखाता है कि जीवन में सच्चाई और धर्म का पालन करने से ही विजय मिलती है।
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

दशहरा का यह पर्व आपको हर कठिनाई से पार पाने का साहस और शक्ति दे।
शुभ दशहरा!

इस दशहरे पर, अपने जीवन के हर मुश्किल को रावण की तरह जला दें और राम की तरह विजय प्राप्त करें।
विजयदशमी की ढेरों शुभकामनाएं!

दशहरे का यह पर्व आपके जीवन में नई उम्मीदें और नई शुरुआत लेकर आए।
शुभ दशहरा!

दशहरा हमें सिखाता है कि जीवन में सच्चाई की राह पर चलने से ही विजय प्राप्त होती है।
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

रावण की हार से हमें यह सीख मिलती है कि बुराई चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसका अंत निश्चित है।
शुभ दशहरा!

इस दशहरे पर, अपने भीतर की सभी बुराइयों को समाप्त करें और अच्छाई का दीप जलाएं।
विजयदशमी की ढेरों शुभकामनाएं!

दशहरे का यह पर्व आपके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद लेकर आए।
शुभ दशहरा!

दशहरा हमें यह सिखाता है कि सच्चाई की जीत हमेशा होती है।
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

इस दशहरे पर, अपने जीवन में नई ऊर्जा और नई उमंग का संचार करें, और हर प्रकार की बुराई का अंत करें।
शुभ दशहरा!

दशहरे का यह पर्व हमें जीवन में सच्चाई, धर्म, और अच्छाई के महत्व का एहसास कराता है।
विजयदशमी की ढेरों शुभकामनाएं!

रावण का अंत हमें यह सिखाता है कि बुराई चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसका नाश अवश्य होता है।
शुभ दशहरा!

दशहरा का यह पर्व आपके जीवन में नई शुरुआत और नई उमंग लेकर आए, और हर बुराई का अंत करे।
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

इस दशहरे पर, अपने जीवन में सत्य और धर्म की मशाल जलाएं और हर प्रकार की बुराई का अंत करें।
शुभ दशहरा!

दशहरा हमें यह सिखाता है कि जब तक हमारे भीतर साहस और धैर्य है, तब तक हम हर प्रकार की बुराई का सामना कर सकते हैं।
विजयदशमी की ढेरों शुभकामनाएं!

दशहरे का यह पर्व आपके जीवन में सच्चाई और अच्छाई की राह पर चलने की प्रेरणा दे और आपको नई ऊंचाइयों पर पहुंचाए।
शुभ दशहरा!

रावण की तरह अपने भीतर की बुराइयों को भी समाप्त करें और राम की तरह विजय प्राप्त करें।
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

दशहरे का यह पर्व आपके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद लेकर आए।
शुभ दशहरा!

इस दशहरे पर, अपने जीवन में सकारात्मकता की ज्योति जलाएं और नकारात्मकताओं को रावण की तरह जला दें।
विजयदशमी की ढेरों शुभकामनाएं!

दशहरे का यह पर्व हमें बताता है कि जीवन में सच्चाई और अच्छाई की राह पर चलने से ही हम हर प्रकार की कठिनाई का सामना कर सकते हैं।
शुभ दशहरा!

रावण की हार से हमें यह सिखने को मिलता है कि बुराई चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसका अंत अवश्य होता है।
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

इस दशहरे पर, अपने भीतर की सभी नकारात्मकताओं को रावण की तरह जलाएं और सकारात्मकता का दीप जलाएं।
शुभ दशहरा!

दशहरे का यह पर्व हमें जीवन में सच्चाई, धर्म, और अच्छाई के महत्व का एहसास कराता है।
विजयदशमी की ढेरों शुभकामनाएं!

दशहरे का यह पर्व आपके जीवन में नई उमंग और नई शुरुआत लेकर आए।
शुभ दशहरा!

इस दशहरे पर, हर प्रकार की बुराई का अंत करें और जीवन में अच्छाई की रोशनी फैलाएं।
विजयदशमी की ढेरों शुभकामनाएं!

रावण की तरह अपने भीतर की बुराइयों को भी समाप्त करें और राम की तरह विजय प्राप्त करें।
शुभ दशहरा!

दशहरे का यह पर्व आपके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद लेकर आए।
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

इस दशहरे पर, अपने जीवन में सत्य और धर्म की मशाल जलाएं और हर प्रकार की बुराई का अंत करें।
शुभ दशहरा!

दशहरा हमें यह सिखाता है कि अगर हमारे इरादे सच्चे हों, तो कोई भी रावण हमें हरा नहीं सकता।
विजयदशमी की ढेरों शुभकामनाएं!

दशहरे का यह पर्व आपके जीवन में नई रोशनी और नई उमंग लेकर आए, और हर अंधकार को दूर कर दे।
शुभ दशहरा!

रावण का अंत हमें यह सिखाता है कि जीवन में सच्चाई और धर्म का पालन करने से ही विजय मिलती है।
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

दशहरे का यह पर्व आपको हर कठिनाई से पार पाने का साहस और शक्ति दे।
शुभ दशहरा!

इस दशहरे पर, अपने जीवन के हर मुश्किल को रावण की तरह जला दें और राम की तरह विजय प्राप्त करें।
विजयदशमी की ढेरों शुभकामनाएं!

दशहरे का यह पर्व आपके जीवन में नई उम्मीदें और नई शुरुआत लेकर आए।
शुभ दशहरा!

दशहरा हमें सिखाता है कि जीवन में सच्चाई की राह पर चलने से ही विजय प्राप्त होती है।
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

रावण की हार से हमें यह सीख मिलती है कि बुराई चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसका अंत निश्चित है।
शुभ दशहरा!

इस दशहरे पर, अपने भीतर की सभी बुराइयों को समाप्त करें और अच्छाई का दीप जलाएं।
विजयदशमी की ढेरों शुभकामनाएं!


दशहरा स्टेटस इन हिंदी Dussehra 2024 Status in Hindi

रावण की हार और राम की विजय का पर्व है दशहरा। इस दिन, अपने जीवन में भी बुराइयों को खत्म कर अच्छाई की राह पर चलें।
शुभ दशहरा!

दशहरा का यह पर्व आपके जीवन को खुशियों और समृद्धि से भर दे। सच्चाई की जीत हो और हर बुराई का अंत हो।
विजयदशमी की शुभकामनाएं!

रावण की तरह अपने भीतर की बुराइयों को भी समाप्त करें और राम की तरह नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ें।
शुभ दशहरा!

इस दशहरे पर, हर बुराई को जलाकर, अच्छाई का दीप जलाएं और अपने जीवन को उज्जवल बनाएं।
विजयदशमी की ढेरों शुभकामनाएं!

दशहरा का पर्व जीवन में सच्चाई और अच्छाई की विजय का प्रतीक है। इस दिन, अपने जीवन में भी बुराइयों का अंत करें।
शुभ दशहरा!

रावण की हार और राम की विजय का संदेश हमें बताता है कि बुराई चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसका अंत निश्चित है।
विजयदशमी की शुभकामनाएं!

इस दशहरे पर, हर कठिनाई और बुराई को खत्म करके, अपने जीवन को खुशहाल बनाएं।
शुभ दशहरा!

दशहरा हमें सिखाता है कि अगर हमारे इरादे सच्चे हों, तो हम हर बुराई को पराजित कर सकते हैं।
विजयदशमी की ढेरों शुभकामनाएं!

रावण की तरह अपने भीतर की बुराइयों को समाप्त करें और राम की तरह अपने जीवन को सशक्त बनाएं।
शुभ दशहरा!

दशहरा का यह पर्व आपके जीवन में नई उम्मीदें और नई शुरुआत लेकर आए।
विजयदशमी की शुभकामनाएं!

दशहरा हमें सिखाता है कि सच्चाई और धर्म की राह पर चलने से ही विजय प्राप्त होती है।
शुभ दशहरा!

इस दशहरे पर, अपने जीवन में सत्य और अच्छाई का दीप जलाएं और हर बुराई का अंत करें।
विजयदशमी की ढेरों शुभकामनाएं!

रावण की हार और राम की विजय का यह पर्व आपको सच्चाई और अच्छाई की राह पर चलने की प्रेरणा दे।
शुभ दशहरा!

दशहरा का पर्व आपके जीवन में सुख, शांति, और समृद्धि का आशीर्वाद लेकर आए।
विजयदशमी की शुभकामनाएं!

इस दशहरे पर, अपने भीतर की सभी नकारात्मकताओं को जलाएं और सकारात्मकता की रोशनी फैलाएं।
शुभ दशहरा!

दशहरा का यह पर्व आपके जीवन में नई रोशनी और नई उमंग लेकर आए।
विजयदशमी की शुभकामनाएं!

रावण की तरह अपने भीतर की बुराइयों को समाप्त करें और राम की तरह विजय प्राप्त करें।
शुभ दशहरा!

इस दशहरे पर, हर प्रकार की बुराई का अंत करें और अपने जीवन को सकारात्मकता से भर दें।
विजयदशमी की ढेरों शुभकामनाएं!

दशहरा हमें बताता है कि सच्चाई की राह पर चलकर ही हम हर मुश्किल का सामना कर सकते हैं।
शुभ दशहरा!

दशहरा का यह पर्व आपके जीवन में सच्चाई, धर्म, और अच्छाई का संदेश लेकर आए।
विजयदशमी की शुभकामनाएं!

रावण की हार से हमें यह सिखने को मिलता है कि बुराई चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसका अंत अवश्य होता है।
शुभ दशहरा!

इस दशहरे पर, अपने भीतर की बुराइयों को समाप्त करके, जीवन को नई दिशा दें।
विजयदशमी की ढेरों शुभकामनाएं!

दशहरा का पर्व आपको हर कठिनाई से पार पाने का साहस और शक्ति दे।
शुभ दशहरा!

रावण की हार और राम की विजय का संदेश आपके जीवन को भी प्रेरित करे।
विजयदशमी की शुभकामनाएं!

दशहरा हमें यह सिखाता है कि सत्य और धर्म की राह पर चलकर ही विजय प्राप्त होती है।
शुभ दशहरा!

इस दशहरे पर, हर बुराई को समाप्त करके, अपने जीवन में सुख और शांति का संचार करें।
विजयदशमी की ढेरों शुभकामनाएं!

दशहरा का पर्व आपके जीवन में नई उमंग और नई ऊर्जा का संचार करे।
शुभ दशहरा!

रावण की तरह अपने भीतर की बुराइयों को जलाएं और राम की तरह विजय प्राप्त करें।
विजयदशमी की शुभकामनाएं!

इस दशहरे पर, अपने जीवन को सुख, शांति, और समृद्धि से भर दें।
शुभ दशहरा!

दशहरा का यह पर्व आपको जीवन में सच्चाई और अच्छाई की राह पर चलने की प्रेरणा दे।
विजयदशमी की शुभकामनाएं!

रावण की हार और राम की विजय का यह पर्व आपके जीवन को भी नई दिशा दे।
शुभ दशहरा!

इस दशहरे पर, हर बुराई को समाप्त करके अपने जीवन को उज्जवल बनाएं।
विजयदशमी की ढेरों शुभकामनाएं!

दशहरा हमें यह सिखाता है कि बुराई चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसका अंत निश्चित है।
शुभ दशहरा!

रावण की हार और राम की विजय का पर्व आपके जीवन में खुशियाँ और समृद्धि लाए।
विजयदशमी की शुभकामनाएं!

इस दशहरे पर, अपने भीतर की सभी नकारात्मकताओं को खत्म करके, सकारात्मकता का दीप जलाएं।
शुभ दशहरा!

दशहरा का यह पर्व आपके जीवन को खुशियों और नई शुरुआत से भर दे।
विजयदशमी की शुभकामनाएं!

रावण की तरह अपने भीतर की बुराइयों को समाप्त करें और राम की तरह हर मुश्किल को पार करें।
शुभ दशहरा!

इस दशहरे पर, अपने जीवन में सत्य और अच्छाई की राह पर चलकर सफलता प्राप्त करें।
विजयदशमी की ढेरों शुभकामनाएं!

दशहरा का पर्व आपके जीवन में नई उमंग और नई ऊर्जा का संचार करे।
शुभ दशहरा!

रावण की हार और राम की विजय का संदेश आपके जीवन को भी प्रेरित करे।
विजयदशमी की शुभकामनाएं!

इस दशहरे पर, अपने भीतर की सभी बुराइयों को जलाकर, अच्छाई का दीप जलाएं।
शुभ दशहरा!

दशहरा का यह पर्व आपके जीवन में सुख, शांति, और समृद्धि का आशीर्वाद लेकर आए।
विजयदशमी की शुभकामनाएं!

रावण की हार से हमें यह सीख मिलती है कि बुराई चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसका अंत निश्चित है।
शुभ दशहरा!

इस दशहरे पर, अपने जीवन में सत्य और अच्छाई का दीप जलाएं और हर बुराई का अंत करें।
विजयदशमी की ढेरों शुभकामनाएं!

दशहरा हमें सिखाता है कि सच्चाई और धर्म की राह पर चलने से ही विजय प्राप्त होती है।
शुभ दशहरा!

रावण की तरह अपने भीतर की बुराइयों को समाप्त करें और राम की तरह विजय प्राप्त करें।
विजयदशमी की शुभकामनाएं!

इस दशहरे पर, अपने जीवन को सुख, शांति, और समृद्धि से भर दें।
शुभ दशहरा!

दशहरा का यह पर्व आपके जीवन में सच्चाई और अच्छाई की राह पर चलने की प्रेरणा दे।
विजयदशमी की ढेरों शुभकामनाएं!

रावण की हार और राम की विजय का यह पर्व आपके जीवन को भी नई दिशा दे।
शुभ दशहरा!

इस दशहरे पर, हर प्रकार की बुराई का अंत करें और अपने जीवन को सकारात्मकता से भर दें।
विजयदशमी की शुभकामनाएं!