Wednesday, January 28, 2026
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आरती: श्री महावीर भगवान | जय सन्मति देवा (Shri Mahaveer Bhagwan Aarti: Jai Sanmati Deva)

आरती: श्री महावीर भगवान | जय सन्मति देवा (Shri Mahaveer Bhagwan Aarti) हमारे भारतीय संस्कृति में धर्म, अध्यात्म और आराधना का महत्वपूर्ण स्थान है। इन्हीं धार्मिक गतिविधियों में आरती का एक विशेष महत्व होता है। आरती के माध्यम से भक्त भगवान के प्रति अपनी श्रद्धा और भक्ति प्रकट करते हैं। इसी संदर्भ में, जैन धर्म के अनुयायियों के लिए भगवान महावीर की आरती विशेष महत्व रखती है।

श्री महावीर भगवान, जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर, ने अपने जीवन में अनेकों तप और साधना करके मोक्ष की प्राप्ति की थी। उनके उपदेश और जीवनशैली आज भी लाखों लोगों को सत्य, अहिंसा, और संयम का मार्ग दिखाते हैं। भगवान महावीर का जीवन संपूर्ण मानवता के लिए एक प्रेरणा स्रोत है। उनकी शिक्षाएं हमें अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह जैसे महान सिद्धांतों की ओर प्रेरित करती हैं।

भगवान महावीर की आरती, जिसे “जय सन्मति देवा” के नाम से जाना जाता है, उनके प्रति भक्तों की अपार श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है। इस आरती के माध्यम से हम भगवान महावीर के प्रति अपनी भक्ति को प्रकट करते हैं और उनसे जीवन में सन्मति की प्राप्ति की प्रार्थना करते हैं।

आरती का प्रारंभ भगवान महावीर की महिमा और उनके दिव्य गुणों का वर्णन करने से होता है। इसमें उनके महान तप, साधना और मोक्ष की प्राप्ति का गुणगान किया जाता है। आरती के शब्दों में उनके प्रति भक्तों की आस्था और श्रद्धा का भाव स्पष्ट रूप से प्रकट होता है।

“जय सन्मति देवा” आरती का गायन हमें आध्यात्मिक शांति और सुकून प्रदान करता है। इसके माध्यम से हम भगवान महावीर के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लेते हैं। यह आरती न केवल एक धार्मिक क्रिया है, बल्कि यह आत्मिक उन्नति का एक माध्यम भी है।

भगवान महावीर की आरती के माध्यम से हम अपने जीवन में सन्मति, शांति, और अहिंसा का मार्ग अपना सकते हैं। यह आरती हमें यह संदेश देती है कि हम अपने जीवन में सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों को अपनाकर एक श्रेष्ठ मानव बन सकते हैं।

इस आरती के माध्यम से हम भगवान महावीर से प्रार्थना करते हैं कि वे हमें सन्मति प्रदान करें, जिससे हम अपने जीवन में सही मार्ग का अनुसरण कर सकें। आरती के शब्दों में छिपी हुई भक्ति और श्रद्धा की भावना हमारे मन को पवित्र और शुद्ध बनाती है।

भगवान महावीर की आरती “जय सन्मति देवा” हमारे जीवन में एक नई ऊर्जा और प्रेरणा का संचार करती है। यह हमें यह सिखाती है कि भगवान महावीर के उपदेशों और शिक्षाओं का पालन करके हम अपने जीवन को सच्चे अर्थों में सफल बना सकते हैं।

इस आरती के माध्यम से हम भगवान महावीर के प्रति अपनी श्रद्धा और भक्ति को प्रकट करते हैं और उनसे सन्मति की प्राप्ति की प्रार्थना करते हैं। जय सन्मति देवा!


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|| श्री महावीर भगवान आरती ||

जय सन्मति देवा,
प्रभु जय सन्मति देवा।
वर्द्धमान महावीर वीर अति,
जय संकट छेवा ॥
॥ऊँ जय सन्मति देवा…॥

सिद्धार्थ नृप नन्द दुलारे,
त्रिशला के जाये ।
कुण्डलपुर अवतार लिया,
प्रभु सुर नर हर्षाये ॥
॥ऊँ जय सन्मति देवा…॥

देव इन्द्र जन्माभिषेक कर,
उर प्रमोद भरिया ।
रुप आपका लख नहिं पाये,
सहस आंख धरिया ॥
॥ऊँ जय सन्मति देवा…॥

जल में भिन्न कमल ज्यों रहिये,
घर में बाल यती ।
राजपाट ऐश्वर्य छोड़ सब,
ममता मोह हती ॥
॥ऊँ जय सन्मति देवा…॥

बारह वर्ष छद्मावस्था में,
आतम ध्यान किया।
घाति-कर्म चूर-चूर,
प्रभु केवल ज्ञान लिया ॥
॥ऊँ जय सन्मति देवा…॥

पावापुर के बीच सरोवर,
आकर योग कसे ।
हने अघातिया कर्म शत्रु सब,
शिवपुर जाय बसे ॥
॥ऊँ जय सन्मति देवा…॥

भूमंडल के चांदनपुर में,
मंदिर मध्य लसे ।
शान्त जिनेश्वर मूर्ति आपकी,
दर्शन पाप नसे ॥
॥ऊँ जय सन्मति देवा…॥

करुणासागर करुणा कीजे,
आकर शरण गही।
दीन दयाला जगप्रतिपाला,
आनन्द भरण तु ही ॥
॥ऊँ जय सन्मति देवा…॥

जय सन्मति देवा,
प्रभु जय सन्मति देवा।
वर्द्धमान महावीर वीर अति,
जय संकट छेवा ॥

जय सन्मति देवा,
प्रभु जय सन्मति देवा।
वर्द्धमान महावीर वीर अति,
जय संकट छेवा ॥

|| Shri Mahaveer Bhagwan Aarti ||

Jai ho jai jai hai sanmati deva,
Prabhu jai sanmati deva।
Varddhamān mahāvīr vīr ati,
Jai sankat chheva॥
॥Om jai sanmati deva…॥

Siddhārth nṛip nandan dulāre,
Triśhalā ke jāye।
Kuṇḍalapur avatār liyā,
Prabhu sur nar harshāye॥
॥Om jai sanmati deva…॥

Dev indra janmābhiṣek kar,
Ur pramod bhariyā।
Rūp āpakā lakh nahīṁ pāye,
Sahas ānkh dhariyā॥
॥Om jai sanmati deva…॥

Jal mein bhinn kamal jyoṁ rahiye,
Ghar mein bāl yatī।
Rājapāṭ aiśvarya chhod sab,
Mamatā moh hatī॥
॥Om jai sanmati deva…॥

Bārah varṣ chhdmāvasthā mein,
Ātam dhyān kiyā।
Ghāti-karm chūr-chūr,
Prabhu keval jñān liyā॥
॥Om jai sanmati deva…॥

Pāvāpur ke bīch sarovar,
Ākar yog kase।
Hane aghātiyā karm śatru sab,
Shivpur jāye base॥
॥Om jai sanmati deva…॥

Bhūmandal ke chāndanapur mein,
Mandir madhya lase।
Shānt jinēśvar mūrti āpakī,
Darśan pāp nase॥
॥Om jai sanmati deva…॥

Karunāsāgar karuṇā kīje,
Ākar śaraṇ gahe।
Dīn dayālā jagpratipālā,
Ānand bharaṇ tu hī॥
॥Om jai sanmati deva…॥

Jai sanmati deva,
Prabhu jai sanmati deva।
Varddhamān mahāvīr vīr ati,
Jai sankat chheva॥

Jai sanmati deva,
Prabhu jai sanmati deva।
Varddhamān mahāvīr vīr ati,
Jai sankat chheva॥


श्री महावीर भगवान की आरती के लाभ

श्री महावीर भगवान की आरती “जय सन्मति देवा” जैन धर्म के अनुयायियों के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इस आरती के माध्यम से भक्त भगवान महावीर के प्रति अपनी भक्ति और श्रद्धा प्रकट करते हैं। आरती के कई आध्यात्मिक, मानसिक, और सामाजिक लाभ हैं। इस लेख में हम 2100 शब्दों में श्री महावीर भगवान की आरती “जय सन्मति देवा” के विभिन्न लाभों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

आध्यात्मिक लाभ:

आध्यात्मिक शांति और संतुलन: श्री महावीर भगवान की आरती का नियमित अभ्यास करने से भक्तों को आध्यात्मिक शांति और संतुलन प्राप्त होता है। जब हम भगवान महावीर की आरती गाते हैं, तो हमारे मन में एक अद्वितीय शांति का अनुभव होता है। यह शांति हमारे दैनिक जीवन की चिंताओं और तनावों को दूर करती है।

आध्यात्मिक जागृति: श्री महावीर भगवान की आरती के माध्यम से हमारे अंदर आध्यात्मिक जागृति उत्पन्न होती है। भगवान महावीर के प्रति श्रद्धा और भक्ति का भाव हमारे अंदर सच्चाई, अहिंसा, और प्रेम के गुणों को बढ़ावा देता है। इससे हमारा आध्यात्मिक विकास होता है और हम जीवन में उच्चतर लक्ष्यों की प्राप्ति की दिशा में अग्रसर होते हैं।

आध्यात्मिक मार्गदर्शन: श्री महावीर भगवान की आरती के माध्यम से हमें उनके उपदेशों और शिक्षाओं का स्मरण होता है। यह हमें सही और गलत के बीच अंतर करने में मदद करता है और हमें सन्मार्ग की ओर प्रेरित करता है। आरती के शब्द हमें धर्म और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।

मानसिक लाभ:

तनाव और चिंता में कमी: श्री महावीर भगवान की आरती का नियमित अभ्यास मानसिक तनाव और चिंता को कम करने में सहायक होता है। जब हम आरती गाते हैं, तो हमारा ध्यान भगवान महावीर पर केंद्रित होता है, जिससे हमारे मन में शांति और सुकून का अनुभव होता है। यह ध्यान केंद्रित करने की शक्ति को बढ़ाता है और मानसिक शांति को बढ़ावा देता है।

मानसिक स्थिरता और संतुलन: श्री महावीर भगवान की आरती के माध्यम से हमारे मन में स्थिरता और संतुलन आता है। जब हम भगवान महावीर की महिमा का गुणगान करते हैं, तो हमारे मन में सकारात्मक विचार उत्पन्न होते हैं। इससे हमारे मनोबल में वृद्धि होती है और हम जीवन की विभिन्न परिस्थितियों का सामना धैर्य और संयम के साथ कर सकते हैं।

स्वयं की पहचान: श्री महावीर भगवान की आरती के माध्यम से हमें स्वयं की पहचान प्राप्त होती है। भगवान महावीर के उपदेश और शिक्षाएं हमें आत्म-निरीक्षण करने और अपने भीतर की अच्छाइयों और बुराइयों को समझने में मदद करती हैं। इससे हमें अपने जीवन को सुधारने और आत्म-विकास की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है।

सामाजिक लाभ:

सामाजिक समरसता: श्री महावीर भगवान की आरती का सामूहिक रूप से गाया जाना सामाजिक समरसता को बढ़ावा देता है। जब हम एक साथ मिलकर भगवान महावीर की आरती गाते हैं, तो हमारे बीच एकता और भाईचारे का भाव उत्पन्न होता है। इससे सामाजिक बंधन मजबूत होते हैं और समाज में शांति और सद्भावना का वातावरण बनता है।

संवेदनशीलता और सहानुभूति: श्री महावीर भगवान की आरती के माध्यम से हमें संवेदनशीलता और सहानुभूति का महत्व समझ में आता है। उनकी शिक्षाएं हमें दूसरों के प्रति सहानुभूति और प्रेम की भावना विकसित करने की प्रेरणा देती हैं। इससे हम समाज में दूसरों की मदद करने और उनके दुखों को समझने के प्रति अधिक संवेदनशील बनते हैं।

समाज सुधार: श्री महावीर भगवान की आरती के माध्यम से हम समाज में सुधार की दिशा में कार्य कर सकते हैं। उनकी शिक्षाएं हमें अहिंसा, सत्य, और अपरिग्रह जैसे गुणों को अपनाने की प्रेरणा देती हैं। इससे हम समाज में नैतिकता और सच्चाई का प्रचार-प्रसार कर सकते हैं और समाज को एक बेहतर दिशा में ले जा सकते हैं।

शारीरिक लाभ:

शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार: श्री महावीर भगवान की आरती का नियमित अभ्यास शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को सुधारने में सहायक होता है। जब हम भगवान महावीर की आरती गाते हैं, तो हमारे शरीर में एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह ऊर्जा हमारे शरीर और मन को स्वस्थ और संतुलित बनाए रखने में मदद करती है।

प्राणायाम और ध्यान: श्री महावीर भगवान की आरती के दौरान की जाने वाली प्राणायाम और ध्यान की विधियाँ हमारे शारीरिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होती हैं। यह हमारी श्वसन प्रणाली को सुधारती हैं और हमारे मन को शांत और स्थिर बनाती हैं। इससे हमारा शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है।

नैतिक और आध्यात्मिक उन्नति:

नैतिक मूल्यों का विकास: श्री महावीर भगवान की आरती के माध्यम से हमारे नैतिक मूल्यों का विकास होता है। उनकी शिक्षाएं हमें सत्य, अहिंसा, और नैतिकता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं। इससे हम एक अच्छे और सच्चे इंसान बनने की दिशा में अग्रसर होते हैं।

आध्यात्मिक अनुशासन: श्री महावीर भगवान की आरती के माध्यम से हमारे अंदर आध्यात्मिक अनुशासन का विकास होता है। यह हमें नियमित रूप से ध्यान, प्रार्थना, और साधना की दिशा में प्रेरित करता है। इससे हमारे जीवन में अनुशासन और संयम आता है, जो हमारे आध्यात्मिक विकास के लिए आवश्यक है।

दैनिक जीवन में लाभ:

दैनिक जीवन में शांति और संतोष: श्री महावीर भगवान की आरती के नियमित अभ्यास से हमारे दैनिक जीवन में शांति और संतोष का अनुभव होता है। यह हमें जीवन की चुनौतियों का सामना धैर्य और संयम के साथ करने की शक्ति देता है। इससे हमारे जीवन में सुख-शांति और संतोष का अनुभव होता है।

जीवन की दिशा: श्री महावीर भगवान की आरती के माध्यम से हमें जीवन की दिशा प्राप्त होती है। भगवान महावीर की शिक्षाएं हमें सही और गलत के बीच अंतर करने में मदद करती हैं और हमें जीवन के उच्चतर लक्ष्यों की प्राप्ति की दिशा में प्रेरित करती हैं। इससे हमारा जीवन अधिक सार्थक और सफल बनता है।

पारिवारिक लाभ:

परिवार में एकता और प्रेम: श्री महावीर भगवान की आरती का सामूहिक रूप से गाया जाना परिवार में एकता और प्रेम को बढ़ावा देता है। जब परिवार के सभी सदस्य एक साथ मिलकर भगवान महावीर की आरती गाते हैं, तो उनके बीच स्नेह और भाईचारे का भाव उत्पन्न होता है। इससे परिवार में प्रेम और सामंजस्य का वातावरण बनता है।

पारिवारिक मूल्य: श्री महावीर भगवान की आरती के माध्यम से हमें पारिवारिक मूल्यों का महत्व समझ में आता है। भगवान महावीर की शिक्षाएं हमें परिवार के प्रति हमारी जिम्मेदारियों और कर्तव्यों का पालन करने की प्रेरणा देती हैं। इससे परिवार में सद्भाव और शांति का वातावरण बनता है।

आध्यात्मिक विकास:

आध्यात्मिक अनुभव: श्री महावीर भगवान की आरती के माध्यम से हमें आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त होते हैं। यह अनुभव हमें हमारे आंतरिक आत्मा से जुड़ने में मदद करते हैं और हमें जीवन के उच्चतर सत्य की अनुभूति कराते हैं। इससे हमारा आध्यात्मिक विकास होता है और हम मोक्ष की दिशा में अग्रसर होते हैं।

ध्यान और साधना: श्री महावीर भगवान की आरती के माध्यम से हमारे ध्यान और साधना की दिशा में वृद्धि होती है। जब हम भगवान महावीर की आरती गाते हैं, तो हमारा मन एकाग्र होता है और हम ध्यान की अवस्था में पहुँचते हैं। इससे हमारे ध्यान और साधना की गुणवत्ता में सुधार होता है।

आध्यात्मिक साधना: श्री महावीर भगवान की आरती के माध्यम से हमारे अंदर आध्यात्मिक साधना की भावना उत्पन्न होती है। भगवान महावीर की आरती के माध्यम से हमें आत्म-निरीक्षण और आत्म-विकास की दिशा में प्रेरणा मिलती है। इससे हमारे आध्यात्मिक साधना की दिशा में प्रगति होती है।

श्री महावीर भगवान की आरती “जय सन्मति देवा” का नियमित अभ्यास भक्तों के लिए अत्यधिक लाभकारी है। इसके माध्यम से हमें आध्यात्मिक, मानसिक, सामाजिक, शारीरिक, और नैतिक लाभ प्राप्त होते हैं। आरती के शब्दों में छिपी हुई भक्ति और श्रद्धा की भावना हमारे जीवन को पवित्र और शुद्ध बनाती है। इससे हम भगवान महावीर के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लेते हैं और जीवन में सन्मति, शांति, और अहिंसा का मार्ग अपना सकते हैं। जय सन्मति देवा!

महावीर जयंती पर किसकी कथा सुनाई जाती है?

महावीर जयंती पर भगवान महावीर की कथा सुनाई जाती है। भगवान महावीर, जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर हैं, और उनकी जयंती पर उनके जीवन, शिक्षाओं और उपदेशों की कथा का वर्णन किया जाता है। यह कथा उनके उपदेशों, ध्यान, तपस्या, और अहिंसा के सिद्धांतों को उजागर करती है।

महावीर की पूजा कौन करता है?

भगवान महावीर की पूजा मुख्य रूप से जैन धर्म के अनुयायी करते हैं। जैन भक्त विशेष पूजा, ध्यान, और अनुष्ठान के माध्यम से भगवान महावीर की आराधना करते हैं। जैन मंदिरों और घरों में उनकी पूजा और आरती की जाती है, विशेषकर महावीर जयंती के दिन।

महावीर का चिन्ह क्या है?

भगवान महावीर का चिन्ह “सिंह” (शेर) है। यह चिन्ह उनकी शक्ति, साहस और दृढ़ता का प्रतीक है। जैन धर्म में महावीर को शेर के रूप में भी पूजा जाता है, जो उनके बल और नेतृत्व का संकेत है।

आरती जैन कौन है?

“आरती जैन” एक नाम है, और यह एक प्रसिद्ध भारतीय नाम है। यदि यह किसी विशेष व्यक्ति को संदर्भित करता है, तो कृपया और जानकारी प्रदान करें ताकि उत्तर को और सटीक बनाया जा सके। आम तौर पर, “आरती जैन” किसी आम जैन व्यक्ति का नाम हो सकता है, और इसमें अधिक विवरण की आवश्यकता हो सकती है।

आरती किसकी पत्नी है?

“आरती” नामक किसी विशेष व्यक्ति की पत्नी के बारे में जानकारी के लिए अधिक संदर्भ की आवश्यकता होती है। सामान्यत: “आरती” एक सामान्य भारतीय नाम है और इसके आधार पर किसी भी व्यक्ति की पत्नी का निर्धारण नहीं किया जा सकता। यदि आप किसी विशेष “आरती” की पत्नी के बारे में जानना चाहते हैं, तो कृपया और जानकारी प्रदान करें।

आरती कौन सा धर्म है?

“आरती” एक नाम है और यह धर्म से संबंधित नहीं है। हालांकि, “आरती” एक हिन्दू धार्मिक परंपरा भी है, जिसमें पूजा के समय दीपक की पूजा की जाती है। यह धार्मिक अनुष्ठान हिन्दू धर्म में आम है। यदि “आरती” एक व्यक्ति का नाम है, तो धर्म उसकी व्यक्तिगत पहचान पर निर्भर करता है।

आरती सरस्वती जी: ओम् जय वीणे वाली (Saraswati Aarti: Om Jai Veene Wali)

आरती सरस्वती जी: ओम् जय वीणे वाली (Saraswati Aarti) भारतीय संस्कृति में सरस्वती जी की आराधना का एक विशेष स्थान है। ज्ञान, संगीत, कला और वाणी की देवी सरस्वती को मान्यता प्राप्त है। उनके प्रति श्रद्धा और भक्ति प्रकट करने का सबसे लोकप्रिय माध्यम है आरती। आरती सरस्वती जी: ओइम् जय वीणे वाली, एक ऐसी ही आरती है जो हमें देवी सरस्वती की महिमा और उनकी कृपा की याद दिलाती है।

ओइम् जय वीणे वाली आरती की शुरुआत ओम् जय वीणे वाली, माँ जय वीणे वाली, भक्त जनों की दुलारी, माँ जय वीणे वाली जैसे शब्दों से होती है। यह आरती हमें देवी सरस्वती के उन गुणों का स्मरण कराती है, जिनसे वे हमारे जीवन को प्रकाशित करती हैं। देवी सरस्वती को वीणा धारण करने वाली माना जाता है, जो संगीत और कला का प्रतीक है। इस आरती में देवी के विभिन्न रूपों और गुणों का वर्णन किया गया है, जो हमें यह समझने में मदद करता है कि वे हमारे जीवन में कितनी महत्वपूर्ण हैं।

आरती का अगला भाग है हरिगुण चित में आनी, हरिगुण गा-गा कर, माँ भवसागर तारण, माँ भवसागर तारण। इसमें देवी सरस्वती की कृपा से हरि (भगवान विष्णु) के गुणों का स्मरण और गान करने का महत्व बताया गया है। देवी की कृपा से भक्तों को भवसागर (जीवन के कठिनाइयों और समस्याओं का सागर) पार करने में मदद मिलती है। यह आरती भक्तों को प्रेरित करती है कि वे अपने जीवन में हरि के गुणों का अनुसरण करें और उनकी आराधना करें।

आरती का अंतिम भाग है “प्रेम भक्ति सब पा-कर, प्रेम भक्ति सब पा-कर, माँ भवसागर तारण, माँ भवसागर तारण।” इसमें यह बताया गया है कि प्रेम और भक्ति के माध्यम से देवी सरस्वती की कृपा प्राप्त की जा सकती है। यह आरती हमें यह सिखाती है कि देवी सरस्वती की आराधना में प्रेम और भक्ति का महत्वपूर्ण स्थान है। भक्तजन अपने हृदय में प्रेम और भक्ति को बनाए रखते हुए देवी सरस्वती की आराधना करते हैं और उनकी कृपा प्राप्त करते हैं।

आरती सरस्वती जी: ओइम् जय वीणे वाली, न केवल देवी सरस्वती की महिमा का वर्णन करती है, बल्कि यह हमें यह भी सिखाती है कि कैसे हम अपने जीवन में ज्ञान, संगीत और कला के माध्यम से उन्नति कर सकते हैं। देवी सरस्वती की आराधना हमें यह सिखाती है कि हम अपने जीवन में प्रेम, भक्ति और समर्पण के साथ आगे बढ़ें और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करें।

इस आरती को गाने से हमें मानसिक शांति और स्थिरता प्राप्त होती है। देवी सरस्वती की कृपा से हम अपने जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकते हैं। यह आरती हमें यह सिखाती है कि हमें अपने जीवन में देवी सरस्वती की आराधना करनी चाहिए और उनकी कृपा से अपने जीवन को सफल और सार्थक बनाना चाहिए।

इस प्रकार, आरती सरस्वती जी: ओइम् जय वीणे वाली, देवी सरस्वती की महिमा का गान है और भक्तों को यह प्रेरणा देती है कि वे अपने जीवन में ज्ञान, संगीत, और कला के माध्यम से उन्नति करें।



  • हिंदी / संस्कृत
  • English

|| आरती सरस्वती जी: ओम् जय वीणे वाली ||

ओइम् जय वीणे वाली,
मैया जय वीणे वाली
ऋद्धि-सिद्धि की रहती,
हाथ तेरे ताली
ऋषि मुनियों की बुद्धि को,
शुद्ध तू ही करती
स्वर्ण की भाँति शुद्ध,
तू ही माँ करती॥ 1 ॥

ज्ञान पिता को देती,
गगन शब्द से तू
विश्व को उत्पन्न करती,
आदि शक्ति से तू॥ 2 ॥

हंस-वाहिनी दीज,
भिक्षा दर्शन की
मेरे मन में केवल,
इच्छा तेरे दर्शन की॥ 3 ॥

ज्योति जगा कर नित्य,
यह आरती जो गावे
भवसागर के दुख में,
गोता न कभी खावे॥ 4 ॥

|| Saraswati Aarti lyrics: Om Jai Veene Wali ||

Om jay veene vaalee,
Maiya jay veene vaalee
Riddhi-siddhi kee rahtee,
Haath tere taalee
Rishi muniyon kee buddhi ko,
Shuddh too hee karatee
Svarn kee bhaanti shuddh,
Too hee Maa karatee॥ 1 ॥

Gyaan pitaa ko detee,
Gagan shabd se too
Vishwa ko utpann karatee,
Aadi shakti se too॥ 2 ॥

Hans-vaahinee deeje,
Bhiksha darshan kee
Mere man mein keval,
Ichha tere darshan kee॥ 3 ॥

Jyoti jaga kar nitya,
Yah aaratee jo gaave
Bhavasaagar ke dukh mein,
Gotaa na kabhee khaave॥ 4 ॥


आरती सरस्वती जी: ओइम् जय वीणे वाली के लाभ

भारतीय संस्कृति में देवी सरस्वती का महत्वपूर्ण स्थान है। वे ज्ञान, संगीत, कला और वाणी की देवी मानी जाती हैं। उनकी आरती, विशेषकर “ओम् जय वीणे वाली”, भक्तों के लिए विशेष महत्व रखती है। यह आरती न केवल भक्ति और श्रद्धा की भावना को बढ़ाती है, बल्कि इसके अनेक लाभ भी हैं। इस लेख में हम ओम् जय वीणे वाली आरती के विभिन्न लाभों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

मानसिक शांति और स्थिरता

ओम् जय वीणे वाली आरती का नियमित पाठ और गान करने से मानसिक शांति और स्थिरता प्राप्त होती है। जब हम इस आरती को गाते हैं, तो हमारे मन में एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह आरती हमें ध्यान की स्थिति में पहुंचाती है, जिससे तनाव और चिंता कम होती है। मानसिक शांति हमारे जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाती है और हमें कठिनाइयों का सामना करने में सक्षम बनाती है।

ज्ञान और विद्या की प्राप्ति

देवी सरस्वती ज्ञान और विद्या की देवी हैं। उनकी आराधना करने से व्यक्ति को ज्ञान और विद्या की प्राप्ति होती है। विशेषकर छात्र और विद्या-अध्ययन में लगे लोग, सरस्वती की आरती से बहुत लाभान्वित होते हैं। ओम् जय वीणे वाली आरती का नियमित पाठ करने से स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है और पढ़ाई में रुचि बढ़ती है। इसके अलावा, यह आरती विद्यार्थियों को परीक्षा में अच्छे परिणाम प्राप्त करने में भी मदद करती है।

कला और संगीत में उन्नति

सरस्वती देवी संगीत और कला की भी देवी हैं। उनकी आरती का गान करने से कला और संगीत के क्षेत्र में उन्नति होती है। संगीतकार, गायक, नर्तक और कलाकार इस आरती का नियमित पाठ करके अपने कला कौशल में निखार ला सकते हैं। ओम् जय वीणे वाली आरती का नियमित पाठ करने से सृजनात्मकता में वृद्धि होती है और कला के प्रति समर्पण बढ़ता है।

वाणी में मधुरता

सरस्वती देवी वाणी की भी देवी हैं। उनकी आराधना से व्यक्ति की वाणी में मधुरता आती है। ओम् जय वीणे वाली आरती का नियमित पाठ करने से व्यक्ति की वाणी में मिठास और प्रभावशीलता बढ़ती है। इससे सामाजिक और पेशेवर जीवन में भी सफलता मिलती है। एक मधुर वाणी से व्यक्ति दूसरों को आसानी से प्रभावित कर सकता है और संबंधों में मधुरता बनाए रख सकता है।

सकारात्मक ऊर्जा का संचार

ओम् जय वीणे वाली आरती का गान करने से हमारे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह आरती नकारात्मकता को दूर करती है और सकारात्मकता को बढ़ावा देती है। जब हम इस आरती को गाते हैं, तो हमारे घर और मन दोनों में एक सकारात्मक माहौल बनता है। यह सकारात्मक ऊर्जा हमारे जीवन के हर क्षेत्र में सफलता और खुशहाली लाती है।

आत्मविश्वास में वृद्धि

ओम् जय वीणे वाली आरती का नियमित पाठ करने से आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। देवी सरस्वती की कृपा से व्यक्ति आत्मविश्वास से भर जाता है और अपने कार्यों को पूरे मनोबल के साथ करता है। आत्मविश्वास हमारी सफलता की कुंजी है और इस आरती का गान करने से हमें यह कुंजी प्राप्त होती है। आत्मविश्वास के साथ हम जीवन की हर चुनौती का सामना कर सकते हैं और अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हैं।

आध्यात्मिक उन्नति

ओम् जय वीणे वाली आरती का गान करने से हमारी आध्यात्मिक उन्नति होती है। यह आरती हमें ईश्वर के प्रति हमारी श्रद्धा और भक्ति को बढ़ाती है। आध्यात्मिक उन्नति हमें जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझने में मदद करती है और हमें सच्चे सुख और शांति की प्राप्ति होती है। देवी सरस्वती की आराधना से हमें यह समझ में आता है कि सच्चा सुख और शांति केवल भौतिक संपत्तियों में नहीं, बल्कि ईश्वर की भक्ति और आध्यात्मिकता में है।

स्वास्थ्य लाभ

ओम् जय वीणे वाली आरती का नियमित पाठ करने से स्वास्थ्य लाभ भी होते हैं। इस आरती का गान करने से मन और शरीर दोनों में संतुलन बनता है। यह आरती तनाव को कम करती है और मानसिक शांति प्रदान करती है, जिससे शारीरिक स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है। मानसिक शांति और तनावमुक्त जीवन हमारे शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं और इस आरती का गान करने से हमें यह लाभ प्राप्त होते हैं।

रिश्तों में सुधार

ओम् जय वीणे वाली आरती का गान करने से हमारे रिश्तों में भी सुधार होता है। देवी सरस्वती की कृपा से हमारे संबंधों में मधुरता और सामंजस्य बढ़ता है। यह आरती हमें सिखाती है कि हम अपने संबंधों में प्रेम, विश्वास और समझ को बनाए रखें। रिश्तों में सुधार से हमारा सामाजिक जीवन खुशहाल और संतुलित बनता है।

घर में सुख-शांति

ओम् जय वीणे वाली आरती का नियमित पाठ करने से हमारे घर में सुख-शांति और समृद्धि का वास होता है। यह आरती हमारे घर को नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त करती है और सकारात्मकता को बढ़ावा देती है। देवी सरस्वती की कृपा से हमारे घर में सदैव सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है। इससे हमारे परिवार के सभी सदस्य खुशहाल और संतुष्ट रहते हैं।

भक्ति और समर्पण

ओम् जय वीणे वाली आरती का गान करने से हमारी भक्ति और समर्पण की भावना में वृद्धि होती है। यह आरती हमें यह सिखाती है कि हमें देवी सरस्वती के प्रति सच्ची भक्ति और समर्पण के साथ आराधना करनी चाहिए। भक्ति और समर्पण से हमें ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है और हमारे जीवन की सभी समस्याएं और कठिनाइयां दूर होती हैं।

आत्मा की शुद्धि

ओम् जय वीणे वाली आरती का गान करने से हमारी आत्मा की शुद्धि होती है। यह आरती हमारे मन और आत्मा को शुद्ध करती है और हमें पवित्रता का अनुभव कराती है। आत्मा की शुद्धि से हमें सच्ची शांति और आनन्द की प्राप्ति होती है। देवी सरस्वती की कृपा से हम अपने जीवन के सभी पापों और बुराइयों से मुक्त हो जाते हैं।

समय की प्रबंधन

ओम् जय वीणे वाली आरती का नियमित पाठ करने से हमें समय की प्रबंधन में भी मदद मिलती है। यह आरती हमें अनुशासन और समय की महत्वपूर्णता सिखाती है। समय का सही प्रबंधन हमारी सफलता के लिए बहुत आवश्यक है और इस आरती का गान करने से हमें यह कला प्राप्त होती है।

संयम और धैर्य

ओम् जय वीणे वाली आरती का गान करने से हमारे जीवन में संयम और धैर्य की वृद्धि होती है। यह आरती हमें सिखाती है कि हमें हर परिस्थिति में संयम और धैर्य बनाए रखना चाहिए। संयम और धैर्य हमारे जीवन की कठिनाइयों को आसान बनाते हैं और हमें सफलता की ओर अग्रसर करते हैं।

समाज सेवा और परोपकार

ओम् जय वीणे वाली आरती का गान करने से हमारे मन में समाज सेवा और परोपकार की भावना जागृत होती है। देवी सरस्वती की कृपा से हम दूसरों की मदद करने के लिए प्रेरित होते हैं और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं। समाज सेवा और परोपकार से हमें आत्मसंतोष की प्राप्ति होती है और हमारा जीवन सार्थक बनता है।

आध्यात्मिक ज्ञान

ओम् जय वीणे वाली आरती का गान करने से हमें आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति होती है। यह आरती हमें जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझने में मदद करती है और हमें सच्चे सुख और शांति की प्राप्ति होती है। आध्यात्मिक ज्ञान से हमारा जीवन संपूर्ण और संतुलित बनता है।

संकल्प शक्ति

ओम् जय वीणे वाली आरती का गान करने से हमारी संकल्प शक्ति में वृद्धि होती है। यह आरती हमें सिखाती है कि हमें अपने लक्ष्यों के प्रति संकल्पित रहना चाहिए और अपने संकल्प को पूरा करने के लिए कठिन परिश्रम करना चाहिए। संकल्प शक्ति से हम अपने जीवन में सफलता प्राप्त करते हैं।

संतुलित जीवन

ओम् जय वीणे वाली आरती का गान करने से हमारा जीवन संतुलित बनता है। यह आरती हमें सिखाती है कि हमें अपने जीवन में सभी क्षेत्रों में संतुलन बनाए रखना चाहिए। संतुलित जीवन से हम खुशहाल और सफल होते हैं।

ओम् जय वीणे वाली आरती के लाभ अपार हैं। यह आरती हमें मानसिक शांति, ज्ञान, विद्या, कला, संगीत, वाणी में मधुरता, सकारात्मक ऊर्जा, आत्मविश्वास, आध्यात्मिक उन्नति, स्वास्थ्य लाभ, रिश्तों में सुधार, घर में सुख-शांति, भक्ति और समर्पण, आत्मा की शुद्धि, समय की प्रबंधन, संयम और धैर्य, समाज सेवा और परोपकार, आध्यात्मिक ज्ञान, संकल्प शक्ति और संतुलित जीवन प्रदान करती है। देवी सरस्वती की कृपा से हमारा जीवन खुशहाल, सफल और संतुलित बनता है। इस आरती का नियमित पाठ और गान हमें देवी सरस्वती की कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ माध्यम है।

सरस्वती आरती के लाभ क्या हैं?

ससरस्वती आरती के कई लाभ होते हैं, जिनमें प्रमुख हैं:

ज्ञान की प्राप्ति: सरस्वती आरती से भगवान सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है, जो बुद्धि, ज्ञान, और शिक्षा में वृद्धि करती है।

सर्जनात्मकता में वृद्धि: सरस्वती देवी कला और संगीत की देवी हैं, इसलिए उनकी आरती से सर्जनात्मक क्षमताएँ और प्रतिभा में सुधार हो सकता है।

परीक्षा में सफलता: विद्यार्थियों और शिक्षा प्राप्त कर रहे लोगों के लिए यह आरती विशेष रूप से लाभकारी हो सकती है, क्योंकि यह मन की एकाग्रता और सफलता में मदद करती है।

आध्यात्मिक शांति: सरस्वती आरती से भक्तों को मानसिक शांति और ध्यान केंद्रित करने में सहायता मिलती है, जिससे जीवन में संतुलन और शांति बनी रहती है।

सरस्वती महत्वपूर्ण क्यों हैं?

सरस्वती देवी हिंदू धर्म में ज्ञान, बुद्धि, कला, और संगीत की देवी हैं। वे शिक्षा और संस्कार की संरक्षिका हैं और विद्या, भाषा, और सर्जनात्मकता के क्षेत्र में प्रमुख स्थान रखती हैं। उनके सम्मान और पूजा से शिक्षा में सुधार होता है और मानसिक विकास संभव होता है।

सरस्वती का प्रतीक क्या है?

सरस्वती देवी का प्रमुख प्रतीक एक पूर्ण पंख वाला हंस है। इसके अतिरिक्त, वे वीणा (संगीत वाद्य) बजाते हुए चित्रित की जाती हैं, जो कला और संगीत का प्रतीक है। सरस्वती देवी के चार हाथ होते हैं, जिनमें वे एक हाथ में वीणा, एक हाथ में पुस्तक, एक हाथ में मोती की माला और एक हाथ में जल का कलश पकड़े रहती हैं। ये प्रतीक ज्ञान, शिक्षा, और आध्यात्मिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं।

सरस्वती क्यों महत्वपूर्ण हैं?

सरस्वती देवी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे ज्ञान, शिक्षा, और कला की देवी हैं। वे बुद्धि, सृजनात्मकता, और समझ को बढ़ावा देती हैं और इस प्रकार से वे व्यक्तियों के व्यक्तिगत और पेशेवर विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उनकी पूजा और आराधना से विद्या, विवेक, और मानसिक विकास में सहायता मिलती है, जिससे जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफलता प्राप्त होती है।

अन्नपूर्णा स्तोत्रम् (Annapoorna Stotram)

अन्नपूर्णा स्तोत्रम् (Annapoorna Stotram) हिंदू धर्म में माता अन्नपूर्णा को समर्पित एक प्रसिद्ध स्तोत्र है। माता अन्नपूर्णा को अन्न की देवी माना जाता है, जो अपने भक्तों को अन्न-धान्य का आशीर्वाद प्रदान करती हैं। उनका नाम संस्कृत के दो शब्दों “अन्न” और “पूर्णा” से बना है, जिसका अर्थ है “अन्न से परिपूर्ण” या “भोजन की देवी”। यह स्तोत्र उनके आशीर्वाद और कृपा की महिमा का वर्णन करता है।

अन्नपूर्णा स्तोत्रम् का मुख्य उद्देश्य माता अन्नपूर्णा की महिमा का गुणगान करना और उनके आशीर्वाद से जीवन में समृद्धि, शांति और संतोष प्राप्त करना है। इस स्तोत्र को नियमित रूप से पाठ करने से जीवन में किसी भी प्रकार के अन्न और धन की कमी नहीं होती है। माता अन्नपूर्णा की पूजा और इस स्तोत्र के पाठ से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और किसी भी प्रकार की आर्थिक समस्याएं दूर होती हैं।

माता अन्नपूर्णा की कथा पुराणों में विशेष रूप से वर्णित है। एक प्रमुख कथा के अनुसार, भगवान शिव और माता पार्वती के बीच एक बार अन्न को लेकर विवाद हो गया। भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा कि संसार में अन्न का महत्व नहीं है और तपस्या से ही सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है। इस पर माता पार्वती ने पृथ्वी से अन्न की आपूर्ति को रोक दिया, जिससे पृथ्वी पर भयंकर अकाल पड़ा।

तब भगवान शिव को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने माता पार्वती से अन्न की आपूर्ति को पुनः बहाल करने की प्रार्थना की। माता पार्वती ने अन्नपूर्णा के रूप में प्रकट होकर सभी को अन्न का वरदान दिया और तब से वे अन्नपूर्णा देवी के रूप में पूजित होती हैं।

अन्नपूर्णा स्तोत्रम् में देवी के रूप, गुण, और उनके अनन्त कृपा का वर्णन है। इसे श्रद्धापूर्वक और भक्ति भाव से पाठ करने से भक्तों के जीवन में किसी भी प्रकार के अन्न, धन, और समृद्धि की कमी नहीं होती है। इस स्तोत्र के माध्यम से भक्तगण माता अन्नपूर्णा से प्रार्थना करते हैं कि वे अपने जीवन में सदैव अन्नपूर्णा देवी की कृपा बनी रहे और उनके जीवन में समृद्धि, शांति और खुशहाली का वास हो।

माता अन्नपूर्णा की स्तुति करने वाला यह स्तोत्र हर किसी के लिए बहुत ही लाभकारी और मंगलकारी है। इसके नियमित पाठ से जीवन में किसी भी प्रकार की अन्न और धन की कमी नहीं रहती और हर प्रकार की समस्याओं का निवारण होता है। माता अन्नपूर्णा की कृपा से हर कोई अपने जीवन में सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त कर सकता है।

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|| अन्नपूर्णा स्तोत्रम् ||

नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौन्दर्यरत्नाकरी
निर्धूताखिलघोरपावनकरी प्रत्यक्षमाहेश्वरी ।
प्रालेयाचलवंशपावनकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥१॥

नानारत्नविचित्रभूषणकरी हेमाम्बराडम्बरी
मुक्ताहारविलम्बमानविलसद्वक्षोजकुम्भान्तरी ।
काश्मीरागरुवासिताङ्गरुचिरे काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥२॥

योगानन्दकरी रिपुक्षयकरी धर्मार्थनिष्ठाकरी
चन्द्रार्कानलभासमानलहरी त्रैलोक्यरक्षाकरी ।
सर्वैश्वर्यसमस्तवाञ्छितकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥३॥

कैलासाचलकन्दरालयकरी गौरी उमा शङ्करी
कौमारी निगमार्थगोचरकरी ओङ्कारबीजाक्षरी ।
मोक्षद्वारकपाटपाटनकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥४॥

दृश्यादृश्यविभूतिवाहनकरी ब्रह्माण्डभाण्डोदरी
लीलानाटकसूत्रभेदनकरी विज्ञानदीपाङ्कुरी ।
श्रीविश्वेशमनःप्रसादनकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥५॥

उर्वीसर्वजनेश्वरी भगवती मातान्नपूर्णेश्वरी
वेणीनीलसमानकुन्तलहरी नित्यान्नदानेश्वरी ।
सर्वानन्दकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥६॥

आदिक्षान्तसमस्तवर्णनकरी शम्भोस्त्रिभावाकरी
काश्मीरात्रिजलेश्वरी त्रिलहरी नित्याङ्कुरा शर्वरी ।
कामाकाङ्क्षकरी जनोदयकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥७॥

देवी सर्वविचित्ररत्नरचिता दाक्षायणी सुन्दरी
वामं स्वादुपयोधरप्रियकरी सौभाग्यमाहेश्वरी ।
भक्ताभीष्टकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥८॥

चन्द्रार्कानलकोटिकोटिसदृशा चन्द्रांशुबिम्बाधरी
चन्द्रार्काग्निसमानकुन्तलधरी चन्द्रार्कवर्णेश्वरी ।
मालापुस्तकपाशासाङ्कुशधरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥९॥

क्षत्रत्राणकरी महाऽभयकरी माता कृपासागरी
साक्षान्मोक्षकरी सदा शिवकरी विश्वेश्वरश्रीधरी ।
दक्षाक्रन्दकरी निरामयकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥१०॥

अन्नपूर्णे सदापूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे ।
ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति ॥११॥

माता च पार्वती देवी पिता देवो महेश्वरः ।
बान्धवाः शिवभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम् ॥१२॥

|| Annapoorna Stotram ||

Nityaanandakaree varaabhayaakaree saundaryaratnaakaree
Nirdhootaakhilaghorapaavanakaree pratyakshamaheshvaree॥
Praleyaachalavanshapaavanakaree kaasheepuraadheeshvaree
Bhikshaan dehi krpaavalambanakaaree matannapoorneshvaree ॥1॥

Naanaaratnavichitrabhooshanakaree hemaambaraadambaree
Muktaahaaravilambamaanavilaasadvakshojakumbhantaree॥
Kaasheeraaguruvaasitaanguruchire kaasheepuraadheeshvaree
Bhikshaan dehi krpaavalambanakaaree matannapoorneshvaree ॥2॥

Yogaanandakaree ripukshayaakaaree dharmaarthanitaakaaree
Chandraarkaanalaabhaasamaanalahari trailokyarakshaakari॥
Sarvaishvaryasamastvanchhitakaree kaasheepuraadheeshvaree
Bhikshaan dehi krpaavalambanakaaree matannapoorneshvaree ॥3॥

Kailaasaachalakendraalayakaree gauree uma shankaree
Kaumaaree nigamaarthagocharakaree onkaarabeejaaksharee॥
Mokshadvaarakapaatapaatanakaree kaasheepuraadheeshvaree
Bhikshaan dehi krpaavalambanakaaree matannapoorneshvaree ॥4॥

Drshyaadrshyavibhootivaahanakaaree brahmaandabhaandodri
Leelaanaatakasootrabhedanakaaree vigyaanadeepaankuree॥
Shreevishveshmanahprasaadanakaree kaasheepuraadheeshvaree
Bhikshaan dehi krpaavalambanakaaree matannapoorneshvaree ॥5॥

Urveesarvajaneshvaree bhagavatee maataannapoorneshvaree
Veneeneelasmaanakuntalahari nityaannadaaneshvaree॥
Sarvaanandakaree sada shubhakaree kaasheepuraadheeshvaree
Bhikshaan dehi krpaavalambanakaaree matannapoorneshvaree ॥6॥

Aadikshaantasamastavarnanakaaree shambhostribhaavaakaree
Kashmeereeraatrijaleshvaree trilaharee nityaanakura sharvaree॥
Kaamakaanakaree janodayakaaree kaasheepuraadheeshvaree
Bhikshaan dehi krpaavalambanakaaree matannapoorneshvaree ॥7॥

Devee sarvavichitraratnaarchita daakshaayani sundaree
Vaaman svaadupayodharapriyakaaree saubhaagyamaaheshvaree॥
Bhaktaabhishtakaaree sada shubhakaaree kaasheepuraadheeshvaree
Bhikshaan dehi krpaavalambanakaaree matannapoorneshvaree ॥8॥

Chandrakaanaalkotikotisadrsha chandraanshubimbaadhaaree
Chandraarkagnismaankuntaladhaaree chandraarkavarneshvaree॥
Mangalapustakapaashaasaanakushadhaaree kaasheepuraadheeshvaree
Bhikshaan dehi krpaavalambanakaaree matannapoorneshvaree ॥ya॥

Kshatratraanakaaree mahaabhaakaree maata krpaasaagaree
Saakshaatmoksharee sada shivakaree vishveshvarashreedhaaree॥
Dakshaakrandakaree niraamayakaree kaasheepuraadheeshvaree
Bhikshaan dehi krpaavalambanakaaree matannapoorneshvaree ॥10॥

Annapoorne sadaapoorne shankarapraanavallabhe॥
Gyaanavairaagyasiddhyarthan bhikshaan dehi ch paarvatee ॥ek॥

Maata ch paarvatee devee pita devo maheshvarah॥
Bandhvaah shivabhaktashch svadesho bhuvanatrayam ॥12॥


अन्नपूर्णा स्तोत्रम् के लाभ

अन्नपूर्णा स्तोत्रम् हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है, जिसे माता अन्नपूर्णा की स्तुति और आशीर्वाद के लिए पढ़ा जाता है। अन्नपूर्णा देवी को अन्न और समृद्धि की देवी माना जाता है, और उनका आशीर्वाद पाने से जीवन में किसी भी प्रकार की अन्न और धन की कमी नहीं होती है। अन्नपूर्णा स्तोत्रम् का नियमित पाठ करने से कई लाभ प्राप्त होते हैं, जो इस प्रकार हैं:

अन्न और धन की कमी नहीं होती:

अन्नपूर्णा स्तोत्रम् के नियमित पाठ से व्यक्ति के जीवन में कभी भी अन्न और धन की कमी नहीं होती। माता अन्नपूर्णा की कृपा से परिवार में हमेशा अन्न-धान्य की समृद्धि बनी रहती है और धन की कोई कमी नहीं होती।

समृद्धि और सुख-शांति:

इस स्तोत्र के पाठ से घर में समृद्धि और सुख-शांति का वास होता है। माता अन्नपूर्णा की कृपा से परिवार के सभी सदस्य खुशहाल और संतुष्ट रहते हैं। घर में कभी भी किसी प्रकार की आर्थिक तंगी या समस्याएं नहीं आती।

सकारात्मक ऊर्जा का संचार:

अन्नपूर्णा स्तोत्रम् का पाठ करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और घर में सुखद माहौल बना रहता है। यह स्तोत्र मन को शांति और संतोष प्रदान करता है, जिससे मानसिक तनाव दूर होता है।

आध्यात्मिक उन्नति:

इस स्तोत्र के नियमित पाठ से व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति होती है। माता अन्नपूर्णा की कृपा से व्यक्ति के अंदर आत्मविश्वास और धैर्य की वृद्धि होती है। व्यक्ति आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ता है और जीवन में सही दिशा प्राप्त करता है।

भय और अशुभ शक्तियों का नाश:

अन्नपूर्णा स्तोत्रम् का पाठ करने से सभी प्रकार के भय और अशुभ शक्तियों का नाश होता है। माता अन्नपूर्णा की कृपा से व्यक्ति को किसी भी प्रकार का भय नहीं सताता और वह जीवन में निर्भय होकर अपने कार्यों को संपन्न करता है।

शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य:

इस स्तोत्र के नियमित पाठ से व्यक्ति का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य भी उत्तम बना रहता है। माता अन्नपूर्णा की कृपा से सभी रोग और दुख दूर होते हैं और व्यक्ति स्वस्थ और तंदुरुस्त रहता है।

रिश्तों में मधुरता:

अन्नपूर्णा स्तोत्रम् का पाठ करने से परिवार में रिश्तों में मधुरता बनी रहती है। माता अन्नपूर्णा की कृपा से पति-पत्नी, माता-पिता, और बच्चों के बीच में प्रेम और सामंजस्य बना रहता है। सभी सदस्य एक दूसरे के प्रति आदर और स्नेह का भाव रखते हैं।

आर्थिक समस्याओं का समाधान:

इस स्तोत्र के पाठ से आर्थिक समस्याओं का समाधान होता है। माता अन्नपूर्णा की कृपा से व्यक्ति के जीवन में सभी आर्थिक कठिनाइयों का निवारण होता है और उसे जीवन में किसी भी प्रकार की वित्तीय समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता।

कर्मों का फल:

अन्नपूर्णा स्तोत्रम् का नियमित पाठ करने से व्यक्ति को उसके अच्छे कर्मों का फल मिलता है। माता अन्नपूर्णा की कृपा से व्यक्ति के सभी शुभ कर्म सफल होते हैं और उसे जीवन में सफलता प्राप्त होती है।

धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व:

अन्नपूर्णा स्तोत्रम् का पाठ करने से धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी प्राप्त होता है। माता अन्नपूर्णा की पूजा और स्तोत्र के पाठ से व्यक्ति अपने धर्म और संस्कृति के प्रति जागरूक होता है और उसकी धार्मिक गतिविधियों में रुचि बढ़ती है।

मन की शांति और संतोष:

अन्नपूर्णा स्तोत्रम् का पाठ करने से मन को शांति और संतोष मिलता है। माता अन्नपूर्णा की कृपा से व्यक्ति के मन में संतोष और शांति का वास होता है, जिससे वह जीवन में किसी भी परिस्थिति का सामना करने में सक्षम होता है।

सपनों की पूर्ति:

इस स्तोत्र के पाठ से व्यक्ति के सभी सपने और इच्छाएं पूरी होती हैं। माता अन्नपूर्णा की कृपा से व्यक्ति के सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और उसे जीवन में किसी भी प्रकार की कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ता।

भक्ति और श्रद्धा में वृद्धि:

अन्नपूर्णा स्तोत्रम् का पाठ करने से व्यक्ति की भक्ति और श्रद्धा में वृद्धि होती है। माता अन्नपूर्णा की कृपा से व्यक्ति के अंदर भक्तिभाव और श्रद्धा का संचार होता है, जिससे वह अधिक से अधिक समय पूजा और साधना में व्यतीत करता है।

धन और संपत्ति की वृद्धि:

इस स्तोत्र के नियमित पाठ से धन और संपत्ति में भी वृद्धि होती है। माता अन्नपूर्णा की कृपा से व्यक्ति के पास हमेशा पर्याप्त धन और संपत्ति रहती है, जिससे वह जीवन में सुख और आराम से रह सकता है।

संतान सुख:

अन्नपूर्णा स्तोत्रम् का पाठ करने से संतान सुख भी प्राप्त होता है। माता अन्नपूर्णा की कृपा से नि:संतान दंपतियों को संतान की प्राप्ति होती है और संतान को माता-पिता का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

जीवन में सफलता:

अन्नपूर्णा स्तोत्रम् का पाठ करने से व्यक्ति को जीवन में हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है। चाहे वह व्यवसाय हो, शिक्षा हो, नौकरी हो या कोई अन्य कार्य, माता अन्नपूर्णा की कृपा से व्यक्ति को हर कार्य में सफलता प्राप्त होती है।

मृत्यु के भय से मुक्ति:

इस स्तोत्र के नियमित पाठ से व्यक्ति को मृत्यु के भय से भी मुक्ति मिलती है। माता अन्नपूर्णा की कृपा से व्यक्ति को जीवन में मृत्यु का भय नहीं सताता और वह आत्मविश्वास के साथ जीवन जीता है।

पापों का नाश:

अन्नपूर्णा स्तोत्रम् का पाठ करने से व्यक्ति के सभी पापों का नाश होता है। माता अन्नपूर्णा की कृपा से व्यक्ति के सभी अशुभ कर्म नष्ट होते हैं और उसे जीवन में पुण्य की प्राप्ति होती है।

ईश्वर के प्रति विश्वास:

इस स्तोत्र के पाठ से व्यक्ति के अंदर ईश्वर के प्रति विश्वास और आस्था बढ़ती है। माता अन्नपूर्णा की कृपा से व्यक्ति को ईश्वर के अस्तित्व का अनुभव होता है और वह धर्म के मार्ग पर चलता है।

जीवन में संतुलन:

अन्नपूर्णा स्तोत्रम् का नियमित पाठ करने से जीवन में संतुलन बना रहता है। माता अन्नपूर्णा की कृपा से व्यक्ति को जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन प्राप्त होता है, जिससे वह हर परिस्थिति में स्थिर और संतुलित रहता है।

अन्नपूर्णा स्तोत्रम् का पाठ करने से व्यक्ति को अनगिनत लाभ प्राप्त होते हैं। माता अन्नपूर्णा की कृपा से व्यक्ति के जीवन में समृद्धि, सुख-शांति, और संतोष का वास होता है। हर व्यक्ति को इस स्तोत्र का नियमित पाठ करना चाहिए और माता अन्नपूर्णा की कृपा प्राप्त करनी चाहिए।

अन्नपूर्णा स्तोत्र का जाप कब करें?

अन्नपूर्णा स्तोत्र का जाप विशेष रूप से अन्नपूर्णा माता के पूजा दिन या विशेष अवसरों पर किया जाता है, जैसे कि अन्नपूर्णा जयंती, दुर्गा पूजा, या नवरात्रि के दौरान। इसके अलावा, यह जाप किसी भी समय किया जा सकता है जब भक्त आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं या विशेष रूप से अपनी खाद्य संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए प्रार्थना करना चाहते हैं।

अन्नपूर्णा माता का मंत्र क्या है?

अन्नपूर्णा माता का प्रमुख मंत्र है:
“ॐ अन्नपूर्णायै नमः”
यह मंत्र अन्नपूर्णा माता की पूजा और आराधना के दौरान उनके आशीर्वाद और कृपा प्राप्त करने के लिए बोला जाता है।

मां अन्नपूर्णा को कैसे प्रसन्न करें?

मां अन्नपूर्णा को प्रसन्न करने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:
भक्ति और श्रद्धा: नियमित रूप से मां अन्नपूर्णा की पूजा और आराधना करें, और उनके भजनों या स्तोत्रों का पाठ करें।

खाना वितरित करें: भोजन के समय मां अन्नपूर्णा की पूजा करके और भोजन का कुछ हिस्सा गरीबों या जरूरतमंदों को दान करके उनकी कृपा प्राप्त करें।

स्वच्छता: पूजा स्थान को स्वच्छ और पवित्र रखें, और पूजा के दौरान आदर्श धार्मिक आचार-व्यवहार अपनाएँ।

उपवासी: अन्नपूर्णा जयंती जैसे विशेष दिनों पर उपवासी रहकर और विशेष पूजा करके मां को प्रसन्न करें।

अन्नपूर्णा देवी किसकी कुलदेवी है?

अन्नपूर्णा देवी को सामान्यतः वे लोग अपनी कुलदेवी मानते हैं, जो अपने परिवार या कबीले की परंपराओं में उन्हें मान्यता देते हैं। अन्नपूर्णा माता को विशेष रूप से उन लोगों की कुलदेवी माना जाता है जो भोजन, समृद्धि, और ऐश्वर्य के प्रति विशेष श्रद्धा रखते हैं।

अन्नपूर्णा माता का दिन कौन सा है?

अन्नपूर्णा माता का विशेष दिन “अन्नपूर्णा जयंती” होता है, जो प्रतिवर्ष कार्तिक माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन विशेष पूजा और व्रत करके मां अन्नपूर्णा की पूजा की जाती है।

अन्नपूर्णा देवी को घर में कहां रखें?

अन्नपूर्णा देवी की मूर्ति या चित्र को घर के पूजा स्थान में, जैसे कि पूजा के कमरे या पूजा के मंदिर में रखें। यह स्थान स्वच्छ और पवित्र होना चाहिए। मूर्ति या चित्र को उत्तर-पूर्व दिशा में रखना शुभ माना जाता है, जिससे सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बना रहता है। पूजा के स्थान को नियमित रूप से साफ और व्यवस्थित रखें, और पूजा करते समय ध्यान और श्रद्धा का पालन करें।

गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र – Gajendra Moksham Stotram 2024-25

गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र (Gajendra Moksham Stotram), श्रीमद्भागवत महापुराण के आठवें स्कंध में वर्णित एक महत्त्वपूर्ण अध्याय है। यह स्तोत्र एक अलौकिक कथा का वर्णन करता है जिसमें एक हाथी, गजेंद्र, भगवान विष्णु की करुणा और कृपा से मोक्ष प्राप्त करता है। गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का प्रमुख उद्देश्य मानव जीवन में भक्ति, शरणागति और ईश्वर की महिमा का प्रचार करना है।

गजेंद्र, एक महान हाथी, एक विशाल जंगल में निवास करता था। वह अपने परिवार और अन्य हाथियों के साथ सुखमय जीवन व्यतीत कर रहा था। एक दिन, अत्यंत गर्मी के कारण गजेंद्र और उसकी टोली पानी की खोज में एक तालाब पर पहुंचे। गजेंद्र जब पानी में प्रवेश कर जल पीने लगा, तभी एक मगरमच्छ ने उसके पैर को पकड़ लिया। गजेंद्र ने अपनी पूरी शक्ति का प्रयोग किया, परंतु वह मगरमच्छ के पकड़ से स्वयं को मुक्त नहीं कर सका। यह संघर्ष वर्षों तक चला और गजेंद्र की शक्ति क्षीण होती गई।

अंत में, गजेंद्र ने अपनी शक्ति की सीमाओं को स्वीकार कर लिया और भगवान विष्णु की शरण में जाने का निश्चय किया। उसने एक कमल का फूल उठाया और भगवान विष्णु की स्तुति करने लगा। गजेंद्र ने अपने पिछले जन्म की भक्ति और ज्ञान को स्मरण करते हुए अत्यंत भक्ति भाव से गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का उच्चारण किया। यह स्तोत्र भगवान विष्णु की महिमा, करुणा और सर्वशक्तिमानता का वर्णन करता है।

गजेंद्र की इस प्रबल भक्ति और शरणागति से प्रभावित होकर भगवान विष्णु ने गरुड़ पर सवार होकर तुरंत वहां पहुंचे। उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से मगरमच्छ का वध किया और गजेंद्र को मोक्ष प्रदान किया। यह कथा भक्ति और शरणागति की महत्ता को दर्शाती है और यह सिखाती है कि जब सभी साधन विफल हो जाएं, तब ईश्वर की शरण ही अंतिम उपाय होता है।

गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र की व्याख्या और उसका पाठ भक्तों को यह संदेश देता है कि ईश्वर अपने भक्तों की प्रार्थनाओं को अवश्य सुनते हैं और उन्हें संकट से उबारते हैं। यह स्तोत्र न केवल भक्ति और विश्वास की गहराई को प्रकट करता है, बल्कि यह भी सिखाता है कि हमें अपने अहंकार और आत्मशक्ति की सीमाओं को पहचानकर ईश्वर की शरण में जाना चाहिए। भगवान विष्णु की करुणा और उनकी सहायता प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि हम सच्चे हृदय से उनकी स्तुति और प्रार्थना करें।

गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र एक प्रेरणादायक कथा है जो भक्ति मार्ग पर चलने वाले प्रत्येक साधक को यह विश्वास दिलाती है कि ईश्वर की कृपा से सभी बाधाओं का निवारण संभव है और मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है।



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|| गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र ||

श्री शुक उवाच –

एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि ।
जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम ॥१॥

गजेन्द्र उवाच –
ऊं नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम ।
पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ॥२॥

यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयं ।
योस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम ॥३॥

यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं
क्वचिद्विभातं क्व च तत्तिरोहितम ।
अविद्धदृक साक्ष्युभयं तदीक्षते
स आत्म मूलोsवत् मां परात्परः ॥४॥

कालेन पंचत्वमितेषु कृत्स्नशो
लोकेषु पालेषु च सर्व हेतुषु ।
तमस्तदाऽऽऽसीद गहनं गभीरं
यस्तस्य पारेsभिविराजते विभुः ॥५॥

न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु-
र्जन्तुः पुनः कोsर्हति गन्तुमीरितुम ।
यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो
दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु ॥६॥

दिदृक्षवो यस्य पदं सुमंगलम
विमुक्त संगा मुनयः सुसाधवः ।
चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वने
भूतात्मभूता सुहृदः स मे गतिः ॥७॥

न विद्यते यस्य न जन्म कर्म वा
न नाम रूपे गुणदोष एव वा ।
तथापि लोकाप्ययसम्भवाय यः
स्वमायया तान्यनुकालमृच्छति ॥८॥

तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेsनन्तशक्तये ।
अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्य कर्मणे ॥९॥

नम आत्म प्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने ।
नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ॥१०॥

सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता ।
नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥११॥

नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुण धर्मिणे ।
निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥१२॥

क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे ।
पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः ॥१३॥

सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे ।
असताच्छाययोक्ताय सदाभासाय ते नमः ॥१४॥

नमो नमस्तेsखिल कारणाय
निष्कारणायाद्भुत कारणाय ।
सर्वागमान्मायमहार्णवाय
नमोपवर्गाय परायणाय ॥१५॥

गुणारणिच्छन्न चिदूष्मपाय
तत्क्षोभविस्फूर्जित मानसाय ।
नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम-
स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ॥१६॥

मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय
मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोsलयाय ।
स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत-
प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते ॥१७॥

आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तै-
र्दुष्प्रापणाय गुणसंगविवर्जिताय ।
मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभाविताय
ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय ॥१८॥

यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामा
भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति ।
किं त्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययं
करोतु मेsदभ्रदयो विमोक्षणम् ॥१९॥

एकान्तिनो यस्य न कंचनार्थ
वांछन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः ।
अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमंगलं
गायन्त आनन्द समुद्रमग्नाः ॥२०॥

तमक्षरं ब्रह्म परं परेश-
मव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम ।
अतीन्द्रियं सूक्ष्ममिवातिदूर-
मनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे ॥२१॥

यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः ।
नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः ॥२२॥

यथार्चिषोsग्नेः सवितुर्गभस्तयो
निर्यान्ति संयान्त्यसकृत् स्वरोचिषः ।
तथा यतोsयं गुणसंप्रवाहो
बुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः ॥२३॥

स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यंग
न स्त्री न षण्डो न पुमान न जन्तुः ।
नायं गुणः कर्म न सन्न चासन
निषेधशेषो जयतादशेषः ॥२४॥

जिजीविषे नाहमिहामुया कि-
मन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या ।
इच्छामि कालेन न यस्य विप्लव-
स्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम ॥२५॥

सोsहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम ।
विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोsस्मि परं पदम् ॥२६॥

योगरन्धित कर्माणो हृदि योगविभाविते ।
योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोsस्म्यहम् ॥२७॥

नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग-
शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय ।
प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये
कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ॥२८॥

नायं वेद स्वमात्मानं यच्छ्क्त्याहंधिया हतम् ।
तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोsस्म्यहम् ॥२९॥

श्री शुकदेव उवाच –
एवं गजेन्द्रमुपवर्णितनिर्विशेषं
ब्रह्मादयो विविधलिंगभिदाभिमानाः ।
नैते यदोपससृपुर्निखिलात्मकत्वात
तत्राखिलामरमयो हरिराविरासीत् ॥३०॥

तं तद्वदार्त्तमुपलभ्य जगन्निवासः
स्तोत्रं निशम्य दिविजैः सह संस्तुवद्भि : ।
छन्दोमयेन गरुडेन समुह्यमान –
श्चक्रायुधोsभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः ॥३१॥

सोsन्तस्सरस्युरुबलेन गृहीत आर्त्तो
दृष्ट्वा गरुत्मति हरिम् ख उपात्तचक्रम ।
उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छा –
नारायणाखिलगुरो भगवन्नमस्ते ॥३२॥

तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य
सग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार ।
ग्राहाद् विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रं
सम्पश्यतां हरिरमूमुच दुस्त्रियाणाम् ॥३३॥

— श्री गजेन्द्र कृत

|| Gajendra Moksham Stotram ||

Shree Shuk uvaach –

evan vyavasito buddhiya samaadhaay mano hrdi॥
jajap paraman japyan praagjanmanyaanushikshitam ॥1॥

Gajendr uvaach –
oon namo bhagavate tasmai yat etachchidaatmyam॥
purushayaadibeejaay pareshayaabhidhimahi ॥2॥

yasminnidan yatshchedan yenedan ya idan svayan॥
yosmaatparasamaachch prastan prapadye svayambhuvam ॥3॥

yah svaatmanidan nijamaayaarpitan
kvachidvibhaatan kv ch tattirohitam॥
avidyaadrk lakshanubhayan tadikshate
sa aatma moolosvat maan parataparah ॥4॥

kaalen panchatvamiteshu krtsnasho
lokeshu paleshu ch sarv kaayashu॥
tamastadaaseed gahanan gabheeran
yastasy paaresabhiviraajate vibhuh ॥5॥

na yasy deva rshayah padan vidu-
rajantuh punahpraapti kosherahati gantumiritum॥
yatha natasyaakrtibhirvicheshtato
dooratyaanukramanah sa maavatu ॥6॥

didrkshavo yasy padan samungalam
vimukt sanga manushyah susaadhavah॥
charantyalokavratamavaranan vane
bhootaatmabhoot suhrdah sa me gatih ॥7॥

na vidyate yasy na janm karm va
na naam roope gunadosh ev va॥
tathaapi lokaapyasmaabhavaay yah
svamaaya taanyanukaalamrchchhati ॥8॥

tasmai namah pareshaay brahmanesantashaktaye॥
aroopayoruroopaay nam chamatkaar karmane ॥jay॥

nam aatm pradeepaay saakshine paramaatmane॥
namo giran viduraay manashchetasaamapi ॥10॥

sattven pratilaabhyaay naishkarmayen vipashchita॥
namah kaivalyanaathaay nirvaanasukhasanvide ॥॥

namah shaantaay ghoraay moodhaay gun dharmine॥
nirvisheshaay saamyai namo gyaanaghnaay ch ॥12॥

gyaanaay namastubhyan sarvaadhyakshaay kshetre॥
purushaayaatmamoolaay moolaprakrtaye namah ॥5॥

sarvendriyagunadrashtre sarvapratyayahetave॥
asatachchayayoktaay sadaabhaasay te namah 14॥

namoskhil namaste kaaranaay
nishkaranayaadbhut kaaranaay॥
sarvaagamanamayamahaarnaay
namopavargaay paraayanaay ॥15॥

gunaarichchhann chidushmapaay
tatkshobhavisphoorjit manasaay॥
naishkarmyabhaaven vivarjitaagam-
svayamprakaashaay namaskaaromi ॥16॥

maadrkaprapannapashupaashavimokshanaay
muktaay bhoorikurnaay namoshalaay॥
svaanshen sarvatanubhrnmansi spasht-
pratyagdrshe bhagavate brhate namaste ॥17॥

aatmaatmajaaptagrhavittajaneshu saktai-
rudushpraapanaay gunasangavivarjitaay॥
muktaatmabhih svahrdaye paribhaavitay
gyaanaatmane bhagavate naam eeshvaraay ॥18॥

yan dharmakaamaarthavimuktikaama
bhajanat ishtaan gatimaapnuvanti॥
kin tvashisho ratyaapi dehamavyayan
karotu mesadbhradayo vimokshanam ॥19॥

ekaantino yasy na kanchanaarth
vanchanti ye vai bhagavatprapannah॥
atyadbhutan tachchharitan samungalan
gaayant samudr aanandamagnaah ॥20॥

tamaaksharan brahm paran paresh-
mavyaktamaadhyaatmikayogagamyam॥
atiindriyan sookshmamivaatidoor-
manantamaadyan uttamameede ॥21॥

yasy brahmaadayo deva veda lokashcharaachaarah॥
naamaroopavibheden phalgvya ch kalyaan krtah ॥22॥

yathaarchishosagneh saviturgbhastayo
niryaanti sanyantyasakrt svarochish:॥
tatha yatosyaan gunasampravaaho
buddhirmanah khaani shareerasargah ॥3॥

sa vai na devaasuramartyatiryang
na stree na shando na pumaan na jantuh॥
nayan gunah karm na sann chaasan
nishedhashesho jayataadasheshah ॥24॥

jijeevishe nahamihaamuya ki-
mantarbahishchaavrtayebhyonya॥
ichchhaami kaalen na yasy viplav-
stasyaatmalokaavaranasy moksham ॥25॥

soshan vishvasrjan vishvamavishvan vishvavedasam॥
vishvaatmaanamajan brahm praanatosmi paran padam ॥26॥

yogaraandhit karmano hrdi yogavibhaavite॥
yogino yan prapashyanti yogan tan natossmyaham ॥27॥

namo namastubhyamasahyaveg-
shaktitrayaakhiladhigunaay॥
prapannapaalaay doorantashaktaye
kaadindriyaanaamanavaapyavartmane ॥28॥

nayan ved svamaatmaanan yachchhaktyaahandhiya hatam॥
tan dooratyamaahaatmyan bhagavantamitosmyaham ॥29॥

shree shukadev uvaach –
evan gajendramupavarnitanirvisheshan
brahmaadayo vividhalingabhidaabhimaanah॥
naite yadopaassurnikhilaatmakatvaat
tatraakhilaaraamayo hariraavaseet ॥30॥

tan tadvadarttamupalaabhy jagannivaasah
stotran nishmy divyah sah sanstuvadbhih॥
chhandomayen garuden samuhyamaan –
shchakrayudhosabhyagamadaashu yato gajendrah ॥31॥

sosantassarasyurubalen grheet aartato
drshtva garutamati harim kh upattachakram॥
utkshepy sambujakaran giramah krchchha –
naaraayanaakhilaguro bhagavaanmaste ॥32॥

tan veekshy peeditamajah sahasaavatiry
sagrahamaashu sarasah krpaayojjahaar॥
graahad vipatimukhaadrina gajendran
sampashyataan harirmumuch dustriyaanaam ॥33॥

— Shree Gajendra krt॥


गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र के लाभ

गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र, श्रीमद्भागवत महापुराण के आठवें स्कंध में वर्णित एक पवित्र और प्रभावशाली स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान विष्णु की महिमा और करुणा का गुणगान करता है और इसे पढ़ने और सुनने से अनेक आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं। इस स्तोत्र के पाठ से भक्ति, विश्वास, शांति, और समर्पण की भावना में वृद्धि होती है। यहाँ गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र के लाभों का विस्तृत विवरण दिया गया है:

भक्ति और श्रद्धा में वृद्धि

गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ भगवान विष्णु के प्रति भक्ति और श्रद्धा को प्रगाढ़ बनाता है। गजेंद्र की कथा यह सिखाती है कि सच्चे दिल से की गई प्रार्थना और भक्ति से भगवान विष्णु अवश्य प्रसन्न होते हैं और अपने भक्त की सहायता करते हैं। यह स्तोत्र हमारे अंदर ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास और समर्पण की भावना को मजबूत करता है।

मानसिक शांति और संतुलन

इस स्तोत्र का नियमित पाठ मानसिक शांति और संतुलन प्रदान करता है। गजेंद्र के संघर्ष और उसकी भक्ति की कथा हमें यह सिखाती है कि जीवन में कठिनाइयाँ और चुनौतियाँ तो आती हैं, लेकिन ईश्वर की शरण में जाने से उन सभी समस्याओं का समाधान मिल सकता है। यह विश्वास और ज्ञान हमारे मन को शांत और स्थिर बनाता है।

संकट से मुक्ति

गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ संकट और विपत्ति से मुक्ति दिलाता है। गजेंद्र की कथा में जब वह मगरमच्छ के चंगुल में फंस गया था, तब उसने भगवान विष्णु की शरण में जाकर उन्हें पुकारा। भगवान विष्णु ने उसकी प्रार्थना सुनी और उसे संकट से मुक्त किया। यह कथा हमें यह सिखाती है कि जीवन में जब हम किसी भी प्रकार के संकट में हों, तो भगवान विष्णु की शरण में जाने से हमें मुक्ति मिल सकती है।

आध्यात्मिक उन्नति

गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ हमारी आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होता है। यह स्तोत्र भगवान विष्णु की महिमा और उनकी असीम शक्ति का वर्णन करता है, जिससे हमारे अंदर आध्यात्मिक जागरूकता और ज्ञान की वृद्धि होती है। यह हमें जीवन के वास्तविक उद्देश्य और ईश्वर की अनुकंपा का अहसास कराता है।

नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा

गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ नकारात्मक ऊर्जा और बुरी शक्तियों से सुरक्षा प्रदान करता है। भगवान विष्णु की महिमा का गुणगान करने वाला यह स्तोत्र एक शक्तिशाली कवच के रूप में कार्य करता है, जो हमें बुरी दृष्टि और नकारात्मक शक्तियों से बचाता है।

शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार

इस स्तोत्र का नियमित पाठ शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को भी सुधारता है। गजेंद्र की कथा हमें यह सिखाती है कि जीवन में संघर्ष और कठिनाइयों के समय भी हमें धैर्य और विश्वास बनाए रखना चाहिए। यह मानसिक दृढ़ता और सकारात्मकता को बढ़ावा देता है, जिससे हमारा शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है।

परिवार और समाज में सुख-शांति

गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ करने से परिवार और समाज में सुख-शांति का वातावरण बनता है। भगवान विष्णु की महिमा का गान करने वाला यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि ईश्वर की शरण में जाने से सभी प्रकार के कलह और विवाद समाप्त हो सकते हैं और हमारे परिवार और समाज में शांति और प्रेम का संचार हो सकता है।

आत्मविश्वास में वृद्धि

गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ हमारे आत्मविश्वास को बढ़ाता है। गजेंद्र की कथा हमें यह सिखाती है कि हमें अपने जीवन में आने वाली कठिनाइयों से डरना नहीं चाहिए, बल्कि धैर्य और विश्वास के साथ उनका सामना करना चाहिए। भगवान विष्णु की कृपा से हम सभी प्रकार की बाधाओं को पार कर सकते हैं और अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हैं।

मोक्ष की प्राप्ति

गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का सबसे प्रमुख लाभ यह है कि इसका पाठ मोक्ष की प्राप्ति में सहायक होता है। गजेंद्र की कथा हमें यह सिखाती है कि जब हम सच्चे हृदय से भगवान विष्णु की शरण में जाते हैं और उनकी स्तुति करते हैं, तो हमें मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह स्तोत्र हमारे जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिलाकर हमें मोक्ष का मार्ग दिखाता है।

समर्पण और विनम्रता

इस स्तोत्र का पाठ हमें समर्पण और विनम्रता की शिक्षा देता है। गजेंद्र ने अपनी शक्ति और अहंकार को त्यागकर भगवान विष्णु की शरण में जाकर उनके प्रति समर्पण दिखाया। यह हमें यह सिखाता है कि हमें अपने अहंकार और आत्मशक्ति की सीमाओं को पहचानकर ईश्वर की शरण में जाना चाहिए और उनकी करुणा और कृपा पर विश्वास करना चाहिए।

गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र एक अत्यंत पवित्र और प्रभावशाली स्तोत्र है जो भगवान विष्णु की महिमा और करुणा का गुणगान करता है। इसका नियमित पाठ भक्ति, विश्वास, शांति, और समर्पण की भावना को बढ़ावा देता है और हमारे जीवन में अनेक आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्रदान करता है। यह स्तोत्र हमें संकट और विपत्ति से मुक्ति दिलाता है, मानसिक शांति और संतुलन प्रदान करता है, और मोक्ष की प्राप्ति में सहायक होता है। इसलिए, गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ सभी भक्तों के लिए अत्यंत लाभकारी है।

गजेंद्र मोक्ष का पाठ कितने दिन करना चाहिए?

गजेंद्र मोक्ष का पाठ विभिन्न धार्मिक परंपराओं और व्यक्तिगत विश्वासों के आधार पर किया जाता है। आमतौर पर, यह पाठ 7 दिन, 11 दिन, या 21 दिन तक किया जाता है। कई भक्त इसे विशेष अवसरों जैसे अमावस्या, पूर्णिमा, या अन्य धार्मिक दिनों पर भी करते हैं। व्यक्ति की स्थिति और उद्देश्य के अनुसार पाठ की अवधि तय की जाती है।

गजेंद्र मोक्ष का पाठ करने से क्या लाभ होता है?

गजेंद्र मोक्ष का पाठ करने से निम्नलिखित लाभ होते हैं:

संकट से मुक्ति: यह पाठ संकट और परेशानियों से मुक्ति दिलाने में मदद करता है। गजेंद्र मोक्ष की कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने गजेंद्र की मदद की, इसलिए पाठ करने से कठिनाइयों में राहत मिलती है।

भक्तिकर्मी में वृद्धि: गजेंद्र मोक्ष के पाठ से भक्ति और आस्था में वृद्धि होती है, और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।

स्वास्थ्य और समृद्धि: यह पाठ स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए भी लाभकारी माना जाता है, और जीवन में सुख और शांति प्राप्त करने में मदद करता है।

गजेंद्र मोक्ष में कितने श्लोक हैं?

गजेंद्र मोक्ष के पाठ में कुल 33 श्लोक होते हैं। ये श्लोक गजेंद्र की कहानी और भगवान विष्णु के प्रकट होने के विवरण को वर्णित करते हैं।

गजेंद्र मोक्ष में मगरमच्छ कौन था?

गजेंद्र मोक्ष की कथा में मगरमच्छ एक राक्षस था, जिसे “अग्रसर्व” के नाम से भी जाना जाता है। यह मगरमच्छ गजेंद्र के साथ एक जलाशय में निवास करता था और गजेंद्र को पकड़ लिया था। गजेंद्र ने भगवान विष्णु की प्रार्थना की और भगवान ने मगरमच्छ को हराकर गजेंद्र को मुक्ति दी।

राम को देख कर श्री जनक नंदिनी – Ram Ko Dekh Kar Shri Janak Nandini Lyrics

राम को देख कर श्री जनक नंदिनी (Ram Ko Dekh Kar Shri Janak Nandini) भगवान श्री राम और माता सीता के मधुर मिलन का वर्णन करता है। इस भजन में श्री जनक नंदिनी, अर्थात माता सीता, जब पहली बार भगवान श्री राम को देखती हैं, तो उनके मन में जो भाव उत्पन्न होते हैं, उनका बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण वर्णन किया गया है। यह भजन हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति और धार्मिक मान्यताओं का एक अहम हिस्सा है, जिसमें भक्ति और प्रेम की भावना को बेहद सरल और सजीव रूप में प्रस्तुत किया गया है।

भजन में श्री राम के दिव्य स्वरूप का वर्णन किया गया है, जिसे देखकर माता सीता का हृदय आनंदित हो उठता है। श्री राम का व्यक्तित्व, उनका स्नेहिल और शांत स्वभाव, और उनका तेजस्वी रूप, सबकुछ माता सीता के मन को मोह लेता है। भजन में यह बताया गया है कि श्री जनक नंदिनी का मन श्री राम के दर्शन मात्र से ही उन पर पूर्णतः समर्पित हो जाता है, और वह अपने हृदय में भगवान राम के प्रति गहन प्रेम और भक्ति का अनुभव करती हैं।

इस भजन के माध्यम से भक्तों को यह संदेश मिलता है कि जब भी हम भगवान के दर्शन करते हैं, तो हमारा मन भी उन्हीं की भक्ति में लीन हो जाना चाहिए। भगवान राम का प्रेम और उनका आशीर्वाद, जो हमें हमारे जीवन में सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है, इस भजन का मूल भाव है। यह भजन हमें सिखाता है कि भगवान के प्रति सच्ची भक्ति और प्रेम से जीवन में सच्ची खुशी और शांति प्राप्त की जा सकती है।

अंत में, यह भजन हमें माता सीता और भगवान राम के आदर्श संबंध की याद दिलाता है, जो न केवल प्रेम और समर्पण का प्रतीक है, बल्कि जीवन में सही दिशा में चलने के लिए प्रेरणा भी देता है। श्री राम और माता सीता का यह दिव्य मिलन हमें अपने जीवन में भक्ति, प्रेम और आदर्शों को अपनाने की प्रेरणा देता है।

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  • हिंदी लिरिक्स
  • English Lyrics

|| राम को देख कर श्री जनक नंदिनी ||

राम को देख कर श्री जनक नंदिनी,
बाग में जा खड़ी की खड़ी रह गयी,
राम देखे सिया माँ सिया राम को,
चारो अँखिआ लड़ी की लड़ी रह गयी….

थे जनकपुर गये देखने के लिए,
सारी सखियाँ झरोकान से झाँकन लगी,
देखते ही नजर मिल गयी दोनों की,
जो जहाँ थी खड़ी की खड़ी रह गयी….

बोली है एक सखी राम को देखकर,
रच दिए है विधाता ने जोड़ी सुघर,
पर धनुष कैसे तोड़ेंगे वारे कुंवर,
सब में शंका बनी की बनी रह गयी….

बोली दूजी सखी छोटन देखन में है,
पर चमत्कार इनका नहीं जानती,
एक ही बाण में ताड़िका राक्षसी,
उठ सकी ना पड़ी की पड़ी रह गयी….

राम को देख कर श्री जनक नंदिनी,
बाग में जा खड़ी की खड़ी रह गयी,
राम देखे सिया माँ सिया राम को,
चारो अँखिआ लड़ी की लड़ी रह गयी….

|| Ram Ko Dekh Kar Shri Janak Nandini ||

Ram Ko Dekh Kar Ke Janak Nandini,
Bag Mein Vo Khadi Ki Khadee Rah Gayi।
Ram Dekhe Siya Ko Siya Ram Ko,
Charon Ankhia Ladee Ki Ladee Rah Gayi॥

The JanakPur Gaye Dekhne Ke Liye,
Saari Sakhiyan Jharokho Se Jhakan Lage।
Dekhte Hi Nazar Mil Gayi Prem Ki,
Jo Jaha Thi Khadi Ki Khadi Reh Gayi॥
॥ Ram Ko Dekh Kar Ke Janak Nandini…॥

Boli Ek Sakhi Ram Ko Dekhkar,
Rach Gayi Hai Vidhata Ne Jodi Sughar।
Per Dhanush Kaise Todenge Vaare Kunwar,
Man Mein Shanka Bani Ki Bani Rah Gayi॥
॥ Ram Ko Dekh Kar Ke Janak Nandini…॥

Boli Dusari Sakhi Chhote Dekhan Mein Hai,
Per Chamatkaar Inka Nahi Janti।
Ek Hi Baan Mein Tadika Rakshasi,
Uth Saki Naa Padi Ki Padi Reh Gayi॥
॥ Ram Ko Dekh Kar Ke Janak Nandini…॥

Ram Ko Dekh Kar Ke Janak Nandini,
Bag Mein Vo Khadi Ki Khadee Rah Gayi।
Ram Dekhe Siya Ko Siya Ram Ko,
Charon Ankhia Ladee Ki Ladee Rah Gayi॥

“राम को देख कर श्री जनक नंदिनी” एक अत्यंत मधुर और भावपूर्ण भजन है, जो भगवान श्री राम और माता सीता की अद्भुत भक्ति को दर्शाता है। यह भजन भारतीय धार्मिक संगीत में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है और भक्ति रस में डूबे भक्तों के हृदय को छू जाता है। इस भजन का मुख्य भाव यह है कि जब माता सीता ने पहली बार भगवान राम को देखा, तो उनके मन में कैसी भावनाएँ उमड़ीं और उन्होंने किस प्रकार भगवान राम के दिव्य स्वरूप का अनुभव किया।

इस भजन की रचना भारत के प्राचीन संतों और भक्त कवियों द्वारा की गई है, जो अपनी सरल भाषा और गहरे भावनात्मक तत्वों के लिए प्रसिद्ध हैं। यह भजन भगवान राम और माता सीता के मिलन की कहानी को दर्शाता है, जिसमें माता सीता की पहली दृष्टि भगवान राम पर पड़ती है और वे उनके सौंदर्य, शक्ति और दिव्यता से अभिभूत हो जाती हैं। इस भजन के माध्यम से भक्तजन भगवान राम और माता सीता की पवित्रता, उनकी दिव्य प्रेम कथा और उनके आदर्श चरित्र का स्मरण करते हैं।

भजन की शुरुआत माता सीता की भगवान राम को पहली बार देखने की घटना से होती है। जनकपुर के राजा जनक की पुत्री सीता, जो अपनी सुंदरता, विनम्रता और गुणों के लिए जानी जाती थीं, भगवान राम को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाती हैं। भगवान राम, जो अपने दिव्य तेज, सौम्य व्यक्तित्व और असीम करुणा के लिए प्रसिद्ध हैं, माता सीता के हृदय में एक अद्वितीय स्थान बना लेते हैं। इस भजन में माता सीता की भावनाओं का वर्णन इतनी सरलता और सजीवता से किया गया है कि सुनने वाला स्वयं को उस समय और स्थान में महसूस करने लगता है।

भजन के शब्द और उनकी ध्वनि सुनने वाले को एक आध्यात्मिक अनुभव में डुबो देते हैं। भजन के गायन में उपयोग की गई ताल और लय सुनने वालों के मन-मस्तिष्क को शांति और आनंद की अनुभूति कराती है। इस भजन का संगीत और शब्द संयोजन इतना सुंदर और प्रभावशाली है कि यह सीधे भक्तों के हृदय तक पहुँचता है और उन्हें भगवान राम और माता सीता के प्रति अपनी भक्ति को और गहरा करने के लिए प्रेरित करता है।

भजन में माता सीता के द्वारा भगवान राम के स्वरूप का वर्णन भी किया गया है। भगवान राम का सुंदर और मनमोहक रूप, उनकी बड़ी-बड़ी आंखें, उनके सजीले वस्त्र और उनके दिव्य आभा का वर्णन इस भजन में बहुत ही सुंदर तरीके से किया गया है। माता सीता भगवान राम के प्रत्येक अंग-प्रत्यंग को निहारती हैं और उनके सौंदर्य की प्रशंसा करती हैं। भगवान राम के रूप, उनके गुण और उनकी दिव्यता से अभिभूत होकर माता सीता का मन भगवान राम के प्रति पूर्णतः समर्पित हो जाता है।

इस भजन में न केवल भगवान राम और माता सीता के प्रति भक्ति का भाव है, बल्कि यह जीवन के विभिन्न पहलुओं पर भी प्रकाश डालता है। यह भजन हमें सिखाता है कि कैसे भगवान राम और माता सीता का जीवन और उनके आदर्श हमारे जीवन में प्रेरणा का स्रोत बन सकते हैं। भगवान राम का मर्यादा पुरुषोत्तम रूप और माता सीता का पतिव्रता धर्म का पालन करना हमें सिखाता है कि हमें भी अपने जीवन में उच्च आदर्शों का पालन करना चाहिए और समाज में सत्य, धर्म और न्याय की स्थापना करनी चाहिए।

“राम को देख कर श्री जनक नंदिनी” भजन हमें भगवान राम और माता सीता के प्रति अपनी भक्ति को और गहरा करने की प्रेरणा देता है। यह भजन हमारे हृदय में भक्ति, श्रद्धा और प्रेम की भावना को जागृत करता है और हमें अपने जीवन में भगवान के आदर्शों को अपनाने के लिए प्रेरित करता है। इस भजन के माध्यम से हम भगवान राम और माता सीता के दिव्य प्रेम की अनुभूति कर सकते हैं और उनकी कृपा प्राप्त कर सकते हैं।

इस प्रकार, “राम को देख कर श्री जनक नंदिनी” भजन एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली भजन है जो भक्तों के हृदय में भगवान राम और माता सीता के प्रति भक्ति की भावना को प्रज्वलित करता है। यह भजन हमें भगवान के प्रति अपनी निष्ठा और समर्पण को बढ़ाने की प्रेरणा देता है और हमें उनके आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने के लिए प्रेरित करता है।

“राम को देख कर श्री जनक नंदिनी” एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली भजन है, जो भक्तों के हृदय में भगवान राम और माता सीता के प्रति भक्ति की भावना को प्रज्वलित करता है। इस भजन के माध्यम से हमें अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं। यहां इस भजन के लाभों का विस्तार से वर्णन किया गया है:

आध्यात्मिक शांति और संतोष

यह भजन सुनने और गाने से हमें आंतरिक शांति और संतोष की अनुभूति होती है। भगवान राम और माता सीता के प्रेम और उनके दिव्य गुणों का स्मरण हमारे मन को शांति और स्थिरता प्रदान करता है। यह भजन हमें हमारे दैनिक जीवन के तनाव और चिंताओं से मुक्त करता है और हमें आंतरिक शांति की अनुभूति कराता है।

भक्ति और श्रद्धा की वृद्धि

इस भजन के माध्यम से भगवान राम और माता सीता के प्रति हमारी भक्ति और श्रद्धा बढ़ती है। भजन के शब्द और संगीत हमारे हृदय में भगवान के प्रति प्रेम और भक्ति की भावना को गहरा करते हैं। यह हमें भगवान के निकट लाता है और हमारी भक्ति को मजबूत करता है।

आध्यात्मिक उन्नति

“राम को देख कर श्री जनक नंदिनी” भजन हमारे आध्यात्मिक जीवन में उन्नति करने में सहायता करता है। यह भजन हमें भगवान के आदर्शों और उनके गुणों का अनुसरण करने के लिए प्रेरित करता है। भगवान राम के मर्यादा पुरुषोत्तम रूप और माता सीता के पतिव्रता धर्म का पालन करने की प्रेरणा हमें अपने जीवन को धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से जीने के लिए प्रेरित करती है।

सकारात्मक ऊर्जा का संचार

इस भजन का गायन और श्रवण हमारे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। भजन के माध्यम से उत्पन्न होने वाली सकारात्मक ऊर्जा हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी होती है। यह ऊर्जा हमारे जीवन में सकारात्मकता, खुशी और स्वास्थ्य का संचार करती है।

मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य

भजन सुनना और गाना दोनों ही हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होते हैं। यह हमारे मन को शांत करता है, तनाव और चिंता को कम करता है, और हमारे शारीरिक स्वास्थ्य को सुधारता है। भजन के माध्यम से उत्पन्न होने वाली सकारात्मक भावनाएँ हमारे शारीरिक स्वास्थ्य को भी उत्तम बनाती हैं।

सामाजिक और सांस्कृतिक एकता

“राम को देख कर श्री जनक नंदिनी” भजन समाज में सामाजिक और सांस्कृतिक एकता को बढ़ावा देता है। इस भजन का गायन और श्रवण हमें हमारी सांस्कृतिक धरोहर और परंपराओं के प्रति गर्व महसूस कराता है। यह भजन हमें हमारी संस्कृति और धार्मिक परंपराओं के प्रति सम्मान और आदर का भाव पैदा करता है।

धार्मिक और आध्यात्मिक ज्ञान

इस भजन के माध्यम से हमें धार्मिक और आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति होती है। भजन के शब्द और उसकी भावना हमें भगवान राम और माता सीता के जीवन और उनके आदर्शों के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं। यह ज्ञान हमारे जीवन को सही दिशा में ले जाने में सहायता करता है और हमें धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बनाता है।

भावनात्मक शुद्धि

“राम को देख कर श्री जनक नंदिनी” भजन हमारे भावनात्मक शुद्धि में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भजन का गहन अर्थ और उसकी मधुरता हमारे हृदय को पवित्र करती है और हमारी भावनाओं को शुद्ध करती है। यह भजन हमारे भीतर की नकारात्मक भावनाओं को समाप्त करता है और हमें प्रेम, करुणा और दया की भावना से भर देता है।

ध्यान और योग

इस भजन का उपयोग ध्यान और योग में भी किया जा सकता है। भजन की मधुर ध्वनि और उसके दिव्य शब्द ध्यान के लिए अत्यंत उपयुक्त होते हैं। यह भजन हमारे मन को एकाग्र करता है और ध्यान के माध्यम से हमारे आत्मा की उन्नति करता है। योग अभ्यास के दौरान भी इस भजन का श्रवण और गायन हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को सुधारने में सहायक होता है।

जीवन के आदर्शों की प्राप्ति

भजन “राम को देख कर श्री जनक नंदिनी” हमें जीवन के उच्च आदर्शों की प्राप्ति के लिए प्रेरित करता है। भगवान राम और माता सीता के आदर्श चरित्र और उनके गुण हमें अपने जीवन में सत्य, धर्म, न्याय और करुणा का पालन करने के लिए प्रेरित करते हैं। यह भजन हमें अपने जीवन में उच्च आदर्शों को अपनाने और उन्हें जीवन में लागू करने की प्रेरणा देता है।

संगीत का आनंद

इस भजन का संगीत और उसकी मधुरता हमारे जीवन में आनंद और खुशी का संचार करती है। भजन का गायन और श्रवण हमारे जीवन में संगीत के महत्व को उजागर करता है और हमें संगीत के माध्यम से आनंद की अनुभूति कराता है। यह भजन हमारे मन और आत्मा को प्रसन्नता और खुशी की भावना से भर देता है।

समाज में शांति और सद्भावना का संचार

“राम को देख कर श्री जनक नंदिनी” भजन समाज में शांति और सद्भावना का संचार करता है। भजन के माध्यम से उत्पन्न होने वाली सकारात्मक ऊर्जा और प्रेम की भावना समाज में शांति, सद्भावना और सहयोग की भावना को बढ़ावा देती है। यह भजन समाज के विभिन्न वर्गों को एकत्रित करता है और समाज में एकता और प्रेम की भावना को मजबूत करता है।

इस प्रकार, “राम को देख कर श्री जनक नंदिनी” भजन हमें अनेक प्रकार के लाभ प्रदान करता है। यह भजन हमारे जीवन को आध्यात्मिक, मानसिक, शारीरिक और सामाजिक दृष्टिकोण से समृद्ध बनाता है और हमें भगवान राम और माता सीता के प्रति अपनी भक्ति को गहरा करने की प्रेरणा देता है।

“राम को देख कर श्री जनक नंदिनी” भजन क्या है?

“राम को देख कर श्री जनक नंदिनी” भजन एक प्रसिद्ध भक्ति गीत है जिसमें भगवान राम की आराधना और श्री सीता (जनक नंदिनी) के प्रति उनके प्रेम को व्यक्त किया जाता है। यह भजन विशेष रूप से भगवान राम और सीता की दिव्य जोड़ी की पूजा और सम्मान के लिए गाया जाता है।

इस भजन के बोल क्या हैं?

“राम को देख कर श्री जनक नंदिनी” भजन के बोल भगवान राम और माता सीता के प्रेम और उनकी पूजा की महिमा का वर्णन करते हैं। भजन के बोल सुनने या पढ़ने के लिए आप धार्मिक संगीत वेबसाइट्स, भजन संग्रह, या यूट्यूब पर इस भजन के वीडियो देख सकते हैं।

इस भजन को कौन गाता है?

इस भजन को विभिन्न भजन गायक गाते हैं। भजन के वीडियो विवरण में या धार्मिक संगीत एल्बम में गायक का नाम बताया गया होता है। आप प्रमुख धार्मिक गायकों की आवाज़ में इसे सुन सकते हैं।

“राम को देख कर श्री जनक नंदिनी” भजन का वीडियो कहाँ देख सकते हैं?

इस भजन का वीडियो आप यूट्यूब जैसे वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म्स पर देख सकते हैं। इसके अलावा, धार्मिक संगीत और भजन एप्स पर भी इसे उपलब्ध पाया जा सकता है।

इस भजन का उद्देश्य क्या है?

“राम को देख कर श्री जनक नंदिनी” भजन का उद्देश्य भगवान राम और माता सीता की भक्ति और श्रद्धा को बढ़ावा देना है। यह भजन भक्तों को भगवान के दिव्य रूप और उनके प्रेम की अनुभूति कराता है।

इस भजन को गाने का सही समय क्या है?

इस भजन को आमतौर पर पूजा, भजन संध्या, या धार्मिक अवसरों पर गाया जाता है। इसे विशेष रूप से राम नवमी, सीता नवमी, और अन्य धार्मिक अवसरों पर गाने की परंपरा होती है।

क्या इस भजन की कोई विशेष सांगीतिक या लिरिकल विशेषताएँ हैं?

हाँ, “राम को देख कर श्री जनक नंदिनी” भजन की सांगीतिक विशेषताएँ इसकी मधुर धुन और भावपूर्ण लिरिक्स हैं। यह भजन भक्तों को एक दिव्य अनुभव प्रदान करता है और भगवान राम तथा माता सीता के प्रति गहरी श्रद्धा और प्रेम को व्यक्त करता है।

क्या इस भजन का कोई लिखित रूप उपलब्ध है?

हाँ, “राम को देख कर श्री जनक नंदिनी” भजन का लिखित रूप विभिन्न धार्मिक पुस्तकों, भजन संग्रहों, और वेबसाइट्स पर उपलब्ध हो सकता है। आप इसे भक्ति साहित्य, धार्मिक पुस्तकालय, या ऑनलाइन धार्मिक सामग्री की वेबसाइट्स से प्राप्त कर सकते हैं।

पितृ पक्ष – Pitru Paksha 2024

पितृ पक्ष (Pitru Paksha 2024) हिंदू धर्म में विशेष महत्त्व रखने वाला एक धार्मिक समय है, जो पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है। यह 16 दिनों की अवधि होती है, जो भाद्रपद महीने की पूर्णिमा (अन्नदाता पूर्णिमा) के बाद प्रतिपदा से प्रारंभ होकर अश्विन महीने की अमावस्या तक चलती है। इस अवधि को श्राद्ध पक्ष या पितृ पक्ष के नाम से जाना जाता है।

पितृ पक्ष का धार्मिक महत्त्व इस विश्वास पर आधारित है कि हमारे पूर्वजों की आत्माएं इस समय पृथ्वी पर आती हैं और अपने वंशजों से तर्पण की अपेक्षा करती हैं। तर्पण का अर्थ होता है जल अर्पण करना, जो हमारे पूर्वजों की आत्माओं की तृप्ति के लिए किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस समय किए गए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान से पूर्वजों की आत्माएं संतुष्ट होती हैं और उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है। साथ ही, वे अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं, जिससे परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

श्राद्ध का आयोजन परिवार के प्रमुख सदस्य, जिसे ‘कर्त्ता’ कहा जाता है, द्वारा किया जाता है। यह कर्मकांड आमतौर पर ब्राह्मणों को भोजन कराकर, गायों को दान देकर, और जल तर्पण कर किया जाता है। पितरों के लिए पकाए जाने वाले भोजन में विशेष रूप से खीर, पूरी, सब्जी, और कुछ मिठाइयां शामिल होती हैं, जिन्हें ब्राह्मणों के माध्यम से पितरों को अर्पित किया जाता है।

पितृ पक्ष के दौरान प्रत्येक दिन का श्राद्ध उन पूर्वजों के लिए किया जाता है, जिनकी मृत्यु उसी तिथि को हुई होती है। यदि किसी को अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, तो अमावस्या के दिन सर्व पितृ श्राद्ध किया जा सकता है, जिसमें सभी पितरों का collectively श्राद्ध किया जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष में किए गए श्राद्ध और तर्पण से न केवल पितर प्रसन्न होते हैं, बल्कि भगवान भी प्रसन्न होते हैं। यह माना जाता है कि श्राद्ध न करने से पितर नाराज हो जाते हैं, जो परिवार में संकट, दुर्भाग्य और अन्य कठिनाइयों का कारण बन सकता है।

पितृ पक्ष की परंपरा और महत्व भारतीय संस्कृति में गहरे निहित हैं और इसका पालन हर पीढ़ी द्वारा श्रद्धापूर्वक किया जाता है। यह हमें हमारे पूर्वजों के प्रति हमारे कर्तव्यों और उनकी स्मृतियों को संजोने का अवसर देता है, जो हमारी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर का एक अभिन्न अंग है।


Pitru Paksha 2024 Date

पितृ पक्ष 2024 की तिथियां इस प्रकार हैं:

  • पितृ पक्ष प्रारंभ: 17 सितंबर 2024 (बुधवार)
  • पितृ पक्ष समाप्ति: 2 अक्टूबर 2024 (बुधवार)

पितृपक्ष की शुरुआत हर साल भाद्रपद माह की पूर्णिमा से अमावस्या तक होती है, जो इस बार 17 सितंबर 2024 से शुरू होकर 2 अक्टूबर 2024 तक रहेगा, इनमें कुल 16 तिथियां पड़ेगी जो इस प्रकार है-

  • 17 सितंबर 2024, मंगलवार- पूर्णिमा का श्राद्ध
  • 18 सितंबर 2024, बुधवार- प्रतिपदा का श्राद्ध
  • 19 सितंबर 2024, गुरुवार- द्वितीय का श्राद्ध
  • 20 सितंबर 2024, शुक्रवार तृतीया का श्राद्ध-
  • 21 सितंबर 2024, शनिवार- चतुर्थी का श्राद्ध
  • 21 सितंबर 2024, शनिवार महा भरणी श्राद्ध
  • 22 सितंबर 2014, रविवार- पंचमी का श्राद्ध
  • 23 सितंबर 2024, सोमवार- षष्ठी का श्राद्ध
  • 23 सितंबर 2024, सोमवार- सप्तमी का श्राद्ध
  • 24 सितंबर 2024, मंगलवार- अष्टमी का श्राद्ध
  • 25 सितंबर 2024, बुधवार- नवमी का श्राद्ध
  • 26 सितंबर 2024, गुरुवार- दशमी का श्राद्ध
  • 27 सितंबर 2024, शुक्रवार- एकादशी का श्राद्ध
  • 29 सितंबर 2024, रविवार- द्वादशी का श्राद्ध
  • 29 सितंबर 2024, रविवार- माघ श्रद्धा
  • 30 सितंबर 2024, सोमवार- त्रयोदशी श्राद्ध
  • 1 अक्टूबर 2024, मंगलवार- चतुर्दशी का श्राद्ध
  • 2 अक्टूबर 2024, बुधवार- सर्वपितृ अमावस्या

इस अवधि में श्राद्ध और तर्पण करने के लिए प्रत्येक तिथि का विशेष महत्व होता है, और यह पितरों की तृप्ति के लिए सबसे शुभ समय माना जाता है।


हिंदू संस्कृति में पितृ पक्ष का महत्व

पितृ पक्ष हिंदू धर्म में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र समय माना जाता है, जो हमारे पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है। यह 16 दिनों की अवधि है, जो भाद्रपद मास की पूर्णिमा से प्रारंभ होकर अश्विन मास की अमावस्या तक चलती है। इस अवधि को श्राद्ध पक्ष या पितृ पक्ष के नाम से भी जाना जाता है, जिसमें हिंदू धर्मावलंबी अपने पितरों की आत्माओं की तृप्ति के लिए विशेष अनुष्ठान करते हैं।

पितृ पक्ष का धार्मिक महत्व

हिंदू मान्यताओं के अनुसार, जब कोई व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त करता है, तो उसकी आत्मा पितृलोक में चली जाती है। पितृ पक्ष के दौरान यह माना जाता है कि पितृलोक में रहने वाले पितरों की आत्माएं पृथ्वी पर अपने वंशजों के पास आती हैं। इस समय वे तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान की आशा करते हैं, जिससे उनकी आत्माओं को शांति और संतुष्टि मिलती है। यदि वंशज इन अनुष्ठानों को श्रद्धापूर्वक करते हैं, तो पितर प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देते हैं, जिससे उनके परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।

श्राद्ध कर्म और पिंडदान का विशेष महत्व है। इसमें विशेष रूप से तैयार किए गए भोजन को ब्राह्मणों के माध्यम से पितरों को अर्पित किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह भोजन पितरों तक पहुंचता है और उनकी तृप्ति का कारण बनता है। इस कर्मकांड के दौरान तिल, कुशा, जल और दूध का प्रयोग विशेष रूप से किया जाता है, जो पवित्रता और शुद्धता के प्रतीक माने जाते हैं।

पितृ पक्ष की प्राचीन परंपराएं

पितृ पक्ष की परंपरा वैदिक काल से चली आ रही है। विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में श्राद्ध कर्म के नियम और विधियां विस्तार से वर्णित हैं। महाभारत में भी इसका उल्लेख मिलता है, जब भीष्म पितामह ने अपने वंशजों को श्राद्ध कर्म के महत्व के बारे में बताया था। इसके अलावा, गरुड़ पुराण और अग्नि पुराण जैसे धर्मग्रंथों में भी पितृ पक्ष और श्राद्ध कर्म की महत्ता को रेखांकित किया गया है।

समाज और परिवार में पितृ पक्ष का प्रभाव

हिंदू समाज में पितृ पक्ष का समय एक धार्मिक अनुष्ठान के साथ-साथ सामाजिक और पारिवारिक बंधनों को मजबूत करने का भी अवसर है। इस समय परिवार के सभी सदस्य एकत्रित होते हैं, और सामूहिक रूप से पूर्वजों की स्मृति में अनुष्ठान करते हैं। यह एक ऐसा समय होता है जब परिवार के बुजुर्ग अपनी पीढ़ियों को धर्म और संस्कृति के महत्व को समझाते हैं, और उन्हें अपने पूर्वजों की परंपराओं से जोड़ते हैं।

पितृ पक्ष का आध्यात्मिक संदेश

पितृ पक्ष न केवल हमारे पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है, बल्कि यह हमें जीवन और मृत्यु के चक्र, कर्म और धर्म के सिद्धांतों को समझने का भी अवसर देता है। यह समय हमें यह भी सिखाता है कि जीवन में हमें अपने कर्तव्यों को निभाते हुए अपनी जड़ों को नहीं भूलना चाहिए। पूर्वजों की स्मृति में किया गया तर्पण और श्राद्ध हमें यह एहसास दिलाता है कि हम भी इस चक्र का एक हिस्सा हैं, और एक दिन हमें भी इस जीवन से विदा लेना है।


pitru paksha 2024

पितृ पक्ष के मुख्य अनुष्ठान और प्रथाएं

पितृ पक्ष हिंदू धर्म में एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण समय है, जिसमें पूर्वजों की आत्माओं की तृप्ति और शांति के लिए विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों और कर्मकांडों का पालन किया जाता है। इस 16 दिवसीय अवधि में किए जाने वाले मुख्य अनुष्ठान और प्रथाएं धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। पितृ पक्ष की यह अवधि भाद्रपद महीने की पूर्णिमा से शुरू होती है और अश्विन महीने की अमावस्या तक चलती है, जिसे ‘महालय अमावस्या’ या ‘सर्वपितृ अमावस्या’ के नाम से भी जाना जाता है।

1. श्राद्ध कर्म:

श्राद्ध पितृ पक्ष का सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान है, जिसका उद्देश्य पितरों की आत्मा की शांति और तृप्ति करना होता है। ‘श्राद्ध’ शब्द संस्कृत के ‘श्रद्धा’ से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है विश्वास और भक्ति के साथ किया गया कार्य। इस अनुष्ठान के दौरान विशेष रूप से तैयार किए गए भोजन, जिसे ‘पिंड’ कहा जाता है, को पितरों को अर्पित किया जाता है। पिंड में आमतौर पर चावल, जौ, तिल, गाय का दूध, घी, और शहद का मिश्रण होता है।

श्राद्ध कर्म को करने के लिए परिवार का मुखिया, जिसे ‘कर्त्ता’ कहा जाता है, विशेष पूजा विधि का पालन करता है। इस पूजा में पवित्र जल (गंगा जल) का उपयोग, तिल के दाने, और कुशा घास का प्रयोग किया जाता है। श्राद्ध के अंत में, ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है और उन्हें दान दिया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस अनुष्ठान से पितर संतुष्ट होते हैं और अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं।

2. तर्पण:

तर्पण एक अन्य महत्वपूर्ण अनुष्ठान है, जो पितरों को जल अर्पित करने के लिए किया जाता है। तर्पण का अर्थ होता है ‘तृप्त करना’। इस प्रक्रिया में पवित्र जल, दूध, तिल और कुशा घास का उपयोग किया जाता है। तर्पण करते समय मंत्रों का उच्चारण किया जाता है और जल को पितरों के नाम पर अर्पित किया जाता है। यह अनुष्ठान विशेष रूप से अमावस्या के दिन किया जाता है, जिसे ‘सर्वपितृ अमावस्या’ कहा जाता है, ताकि जिन पितरों की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, उनका भी तर्पण हो सके।

3. पिंडदान:

पिंडदान पितृ पक्ष का एक अन्य प्रमुख अनुष्ठान है, जिसमें चावल के गोले (पिंड) बनाए जाते हैं और उन्हें पितरों को अर्पित किया जाता है। पिंडदान का उद्देश्य पितरों की आत्माओं की तृप्ति और उन्हें मोक्ष प्राप्ति कराना है। यह अनुष्ठान गंगा, यमुना, या अन्य पवित्र नदियों के किनारे पर किया जाता है। माना जाता है कि पिंडदान से पितरों की आत्माएं मुक्त हो जाती हैं और उन्हें स्वर्ग में स्थान मिलता है।

4. दान और सेवा:

पितृ पक्ष के दौरान दान और सेवा का विशेष महत्व है। ब्राह्मणों को भोजन कराने के साथ-साथ उन्हें वस्त्र, धन, अनाज, और अन्य उपयोगी वस्तुएं दान में दी जाती हैं। यह दान पितरों के नाम पर किया जाता है, जिससे उनकी आत्मा को शांति और संतोष प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त, जरूरतमंदों को भोजन कराना, गरीबों को दान देना, और पशु-पक्षियों की सेवा करना भी इस अवधि के दौरान पुण्यकारी माना जाता है।

5. व्रत और उपवास:

पितृ पक्ष के दौरान कई लोग व्रत और उपवास भी रखते हैं। इस अवधि में मांस, मछली, प्याज, लहसुन, और अन्य तामसिक भोजन से परहेज किया जाता है। व्रत रखने का उद्देश्य आत्मशुद्धि और पितरों के प्रति समर्पण व्यक्त करना होता है। कुछ लोग पूरे पितृ पक्ष के दौरान केवल सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं और व्रत का पालन करते हैं।

6. महालय श्राद्ध:

पितृ पक्ष के अंतिम दिन, जिसे ‘महालय अमावस्या’ या ‘सर्वपितृ अमावस्या’ कहा जाता है, विशेष श्राद्ध का आयोजन किया जाता है। इस दिन उन सभी पितरों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती या जिन्हें किसी कारणवश विशेष दिन पर श्राद्ध नहीं किया जा सका। इस दिन को सभी पितरों की आत्माओं की शांति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है और इस दिन किए गए अनुष्ठान अत्यंत पुण्यकारी माने जाते हैं।

7. प्रेत श्राद्ध:

पितृ पक्ष के दौरान एक विशेष श्राद्ध भी किया जाता है जिसे प्रेत श्राद्ध कहा जाता है। यह उन आत्माओं के लिए किया जाता है, जिन्हें जीवनकाल में मोक्ष प्राप्ति नहीं हो पाई हो, या जिनकी मृत्यु किसी असामान्य परिस्थिति में हुई हो। इस अनुष्ठान का उद्देश्य उन आत्माओं को शांति प्रदान करना और उन्हें पितृलोक में स्थान दिलाना होता है।


पितृ पक्ष का अर्थ और महत्व

पितृ पक्ष हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक अवधि है, जिसमें पूर्वजों की आत्माओं की तृप्ति और शांति के लिए विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। यह अवधि 16 दिनों की होती है, जो भाद्रपद महीने की पूर्णिमा से शुरू होकर अश्विन महीने की अमावस्या तक चलती है। पितृ पक्ष का अर्थ है “पितरों का पक्ष,” यानी वह समय जब हमारे पूर्वजों की आत्माएं पृथ्वी पर आती हैं और अपने वंशजों से श्रद्धा और तर्पण की अपेक्षा करती हैं।

पितृ पक्ष का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

पितृ पक्ष का महत्व हिंदू धर्म में गहरा है। इसे एक ऐसा समय माना जाता है जब पितृलोक में निवास करने वाले पितर (पूर्वज) पृथ्वी पर आते हैं। यह अवधि उनके लिए समर्पित है, जहां वंशज अपने पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं और उनकी आत्माओं की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे अनुष्ठान करते हैं। इन अनुष्ठानों का उद्देश्य पितरों की आत्माओं को तृप्त करना और उन्हें मोक्ष प्राप्त कराना होता है। साथ ही, ऐसा माना जाता है कि पितरों की कृपा से परिवार में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है।

श्राद्ध और तर्पण का महत्व

श्राद्ध कर्म पितृ पक्ष का मुख्य अनुष्ठान है। ‘श्राद्ध’ शब्द ‘श्रद्धा’ से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ है विश्वास और समर्पण। इस अनुष्ठान के दौरान पितरों को भोजन अर्पित किया जाता है, जिसे ‘पिंड’ कहा जाता है। यह पिंड चावल, जौ, तिल, और दूध आदि का मिश्रण होता है। पिंडदान का उद्देश्य पितरों की आत्मा की तृप्ति और उन्हें स्वर्ग में स्थान दिलाना होता है।

तर्पण एक अन्य महत्वपूर्ण अनुष्ठान है, जिसमें पवित्र जल अर्पित किया जाता है। तर्पण का अर्थ है ‘तृप्त करना’। तर्पण करते समय पवित्र जल के साथ तिल और कुशा घास का उपयोग किया जाता है, और मंत्रों का उच्चारण करते हुए पितरों को जल अर्पित किया जाता है। यह माना जाता है कि तर्पण से पितरों की आत्माएं प्रसन्न होती हैं और वे अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं।

पितृ पक्ष की विशेष तिथियां

पितृ पक्ष की प्रत्येक तिथि का विशेष महत्व होता है, क्योंकि इन तिथियों पर अलग-अलग पितरों का श्राद्ध किया जाता है। जिस तिथि को किसी पितर का निधन हुआ होता है, उसी तिथि को उसका श्राद्ध करना आवश्यक होता है। यदि किसी पितर की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं हो, तो अमावस्या के दिन ‘सर्वपितृ अमावस्या’ के अवसर पर श्राद्ध किया जाता है, जिसमें सभी पितरों का सामूहिक श्राद्ध किया जाता है।

पितृ पक्ष का आध्यात्मिक संदेश

पितृ पक्ष का अर्थ और महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक गहरा आध्यात्मिक संदेश भी देता है। यह हमें हमारे पूर्वजों के प्रति हमारे कर्तव्यों की याद दिलाता है और हमें उनकी स्मृतियों को संजोने का अवसर देता है। पितृ पक्ष हमें यह सिखाता है कि हमें अपने पूर्वजों का सम्मान करना चाहिए और उनके द्वारा स्थापित मूल्यों और परंपराओं को आगे बढ़ाना चाहिए।


पितृ पक्ष एकादशी 2024 में 27 सितंबर, शुक्रवार को पड़ेगी। इसे इंदिरा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन श्राद्ध और तर्पण का विशेष महत्व होता है, और लोग अपने पितरों की आत्माओं की शांति के लिए विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। इंदिरा एकादशी के दिन उपवास रखने और पितरों के लिए श्राद्ध करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है और पितर प्रसन्न होते हैं।


पितृ पक्ष में क्या नहीं करना चाहिए: परंपराएं और निषेध

पितृ पक्ष हिंदू धर्म में एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण समय है, जिसमें पूर्वजों की आत्माओं की शांति और तृप्ति के लिए श्राद्ध और तर्पण जैसे अनुष्ठान किए जाते हैं। इस दौरान कुछ विशेष नियमों और परंपराओं का पालन करना अनिवार्य माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि पितृ पक्ष के दौरान कुछ कार्यों को करने से पितर नाराज हो सकते हैं, जिससे परिवार पर संकट आ सकता है। इसलिए, इन दिनों में कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना जरूरी है।

1. शुभ कार्यों से परहेज:

पितृ पक्ष के दौरान किसी भी प्रकार के शुभ कार्य, जैसे विवाह, मुंडन संस्कार, गृह प्रवेश, नया घर या वाहन खरीदना आदि नहीं करने चाहिए। यह समय पूर्वजों को समर्पित होता है, और शुभ कार्यों के लिए इसे अशुभ माना जाता है। इस दौरान केवल पितरों की शांति के लिए कर्मकांड और अनुष्ठान ही किए जाते हैं।

2. मांसाहार और तामसिक भोजन से बचें:

पितृ पक्ष के दौरान मांसाहार, मछली, अंडा, प्याज, लहसुन जैसे तामसिक भोजन का सेवन वर्जित है। इन दिनों में केवल सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए, जिससे शरीर और मन की शुद्धता बनी रहे। ऐसा माना जाता है कि तामसिक भोजन करने से पितरों की आत्मा की तृप्ति नहीं होती और वे असंतुष्ट हो सकते हैं।

3. नए वस्त्र या आभूषण न खरीदें:

पितृ पक्ष के दौरान नए वस्त्र, आभूषण या अन्य कीमती वस्तुएं खरीदने से बचना चाहिए। इस समय को अशुभ माना जाता है, इसलिए नई चीजों का क्रय-विक्रय नहीं किया जाता। इसके बजाय, पुराने और साफ-सुथरे वस्त्र पहनने की सलाह दी जाती है।

4. बाल और नाखून काटने से परहेज:

पितृ पक्ष के दौरान बाल और नाखून काटने से बचना चाहिए। यह समय पितरों के सम्मान और श्रद्धा का होता है, और बाल या नाखून काटना अपशकुन माना जाता है। विशेषकर जिन घरों में श्राद्ध कर्म किए जा रहे हों, वहां यह नियम और भी कठोरता से पालन किया जाता है।

5. शाम के समय सोने से बचें:

पितृ पक्ष के दौरान दिन के समय, विशेष रूप से शाम के वक्त सोने से बचना चाहिए। ऐसा कहा जाता है कि इस समय पूर्वजों की आत्माएं पृथ्वी पर आती हैं, और उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए जाग्रत रहना चाहिए।

6. घर की साफ-सफाई में कमी न होने दें:

पितृ पक्ष के दौरान घर की साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए। घर को गंदा या अव्यवस्थित रखना पितरों के लिए अपमानजनक माना जाता है। यह भी कहा जाता है कि गंदगी से पितर नाराज हो सकते हैं, जिससे परिवार पर संकट आ सकता है।


पीपल का वृक्ष हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र और पूजनीय माना जाता है। इसे देववृक्ष कहा जाता है, क्योंकि इसमें सभी देवी-देवताओं का वास होता है। पीपल की पूजा करने से न केवल पर्यावरण शुद्ध होता है, बल्कि इससे विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक लाभ भी प्राप्त होते हैं। यहाँ पीपल की पूजा करने की विधि और इसके महत्व के बारे में बताया जा रहा है:

पीपल की पूजा की विधि:

  1. स्नान और शुद्धिकरण:
    पूजा से पहले, सुबह-सवेरे स्नान कर स्वयं को शुद्ध करें। स्वच्छ वस्त्र धारण करें और मन में शुद्ध भाव रखें।
  2. पीपल के पास दीपक जलाएं:
    सुबह-सुबह पीपल के वृक्ष के पास जाकर दीया जलाएं। अगर संभव हो तो सरसों के तेल का दीपक जलाना शुभ माना जाता है।
  3. जल अर्पण:
    पीपल के वृक्ष की जड़ में जल चढ़ाएं। पानी में कच्चा दूध, तिल, चावल और चंदन मिलाकर अर्पण करना उत्तम माना जाता है। जल अर्पण करते समय “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः” मंत्र का उच्चारण करें। विष्णु चालीसा PDF भी पढ़ सकते हैं।
  4. प्रदक्षिणा (फेरों) का महत्व:
    पीपल के वृक्ष की परिक्रमा करना अत्यधिक पुण्यकारी माना जाता है। प्रदक्षिणा करते समय इस मंत्र का जाप करें: “ॐ अश्वत्थाय नमः।” परिक्रमा की संख्या 7, 21, या 108 हो सकती है, जो आपके सामर्थ्य और श्रद्धा पर निर्भर करता है।
  5. फूल और अक्षत अर्पण करें:
    पीपल के वृक्ष के नीचे फूल, चंदन और अक्षत (चावल) अर्पित करें। पीपल के वृक्ष पर हल्दी और सिंदूर भी चढ़ाया जा सकता है।
  6. धूप और अगरबत्ती जलाएं:
    धूप और अगरबत्ती से वृक्ष की आरती करें। इससे वातावरण शुद्ध होता है और पूजा का प्रभाव बढ़ता है।
  7. पीपल की जड़ में दीपदान:
    विशेष रूप से शनिवार के दिन, पीपल की जड़ में तेल का दीपक जलाना अत्यधिक शुभ माना जाता है। इससे शनि ग्रह के दोषों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
  8. मंत्र जाप और ध्यान:
    पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान करें और विष्णु या शिव का नाम जपें। इससे मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

पीपल की पूजा का महत्व:

  1. धार्मिक महत्व:
    पीपल का वृक्ष त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का प्रतीक माना जाता है। इसकी पूजा करने से सभी देवी-देवताओं का आशीर्वाद मिलता है।
  2. आध्यात्मिक उन्नति:
    पीपल के नीचे बैठकर ध्यान और जप करने से मानसिक शांति मिलती है। इससे ध्यान की शक्ति बढ़ती है और मन को एकाग्रता प्राप्त होती है।
  3. स्वास्थ्य लाभ:
    पीपल का वृक्ष पर्यावरण को शुद्ध करता है। इसका वातावरण शुद्ध और ताजगी भरा होता है, जो स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है।
  4. पितृ दोष निवारण:
    पीपल की पूजा करने से पितृ दोष का निवारण होता है। पितृ पक्ष में पीपल की पूजा विशेष रूप से फलदायी मानी जाती है।
  5. शनि दोष निवारण:
    शनिवार को पीपल की पूजा और दीपदान करने से शनि दोष कम होता है और शनि की कृपा प्राप्त होती है।

पितृ पक्ष एक महत्वपूर्ण अवधि है, जिसमें पूर्वजों की आत्माओं की शांति और तृप्ति के लिए विशेष उपाय किए जाते हैं। यह समय हमारे पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। इस दौरान किए गए उपाय परिवार की सुख-समृद्धि और पितृ दोष के निवारण में सहायक हो सकते हैं। यहाँ कुछ महत्वपूर्ण उपाय दिए गए हैं जो पितृ पक्ष के दौरान किए जा सकते हैं:

1. श्राद्ध कर्म का आयोजन:

  • पितरों की तिथि अनुसार श्राद्ध: पितृ पक्ष के दौरान प्रत्येक तिथि को उन पूर्वजों के श्राद्ध कर्म का आयोजन करें जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात हो। ऐसा करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और वे अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं।
  • अमावस्या पर श्राद्ध: अगर किसी पितर की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, तो अमावस्या के दिन, जिसे सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है, उनका सामूहिक श्राद्ध करें। यह दिन सभी पितरों की आत्माओं के लिए विशेष होता है।

2. तर्पण:

  • जल अर्पण: पितृ पक्ष के दौरान पवित्र जल, दूध, तिल और चंदन मिलाकर तर्पण करें। यह विशेष रूप से अमावस्या के दिन किया जाता है। जल अर्पित करते समय “ॐ पितृभ्यो नमः” मंत्र का जाप करें।
  • धूप और अगरबत्ती: तर्पण के समय धूप और अगरबत्ती का प्रयोग करें, जिससे वातावरण शुद्ध हो और पितरों को प्रसन्नता मिले।

3. पिंडदान:

  • पिंड का निर्माण: चावल, जौ, तिल, दूध और घी का मिश्रण बनाकर पिंड तैयार करें और पितरों को अर्पित करें। यह उपाय पितरों की आत्मा की तृप्ति के लिए महत्वपूर्ण होता है।
  • पिंडदान का समय: विशेष रूप से अमावस्या के दिन पिंडदान करना अत्यधिक लाभकारी माना जाता है। इसे गंगा, यमुना या अन्य पवित्र नदियों के किनारे पर किया जा सकता है।

4. दान और सेवा:

  • ब्राह्मणों को भोजन: पितृ पक्ष के दौरान ब्राह्मणों को भोजन कराएं और उन्हें दान दें। भोजन में सात्विक पदार्थों का उपयोग करें और दान में वस्त्र, अनाज, या धन प्रदान करें।
  • गरीबों की सहायता: जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या अन्य उपयोगी सामग्री दान करें। यह पुण्यकारी कार्य पितरों की आत्मा की शांति के लिए किया जाता है।

5. व्रत और उपवास:

  • सप्ताहिक उपवास: पितृ पक्ष के दौरान व्रत और उपवास रखना विशेष लाभकारी होता है। तामसिक भोजन से परहेज करें और सात्विक आहार ग्रहण करें।
  • पितृ पक्ष के व्रत: कुछ लोग पूरे पितृ पक्ष के दौरान विशेष व्रत रखते हैं, जिसमें केवल सात्विक भोजन किया जाता है और उपवास रखा जाता है।

6. पीपल की पूजा:

  • पीपल के वृक्ष की पूजा: पीपल के वृक्ष की पूजा करना पितृ पक्ष के दौरान विशेष लाभकारी होता है। पीपल के नीचे दीपक जलाएं, तर्पण करें और प्रदक्षिणा करें।
  • दीपदान: शनिवार के दिन पीपल की जड़ में तेल का दीपक जलाना विशेष रूप से शुभ माना जाता है। इससे शनि दोष का निवारण होता है और पितरों की कृपा प्राप्त होती है।

7. परिवार की एकता:

  • परिवार के साथ पूजा: पितृ पक्ष के दौरान परिवार के सभी सदस्यों को एकत्रित करके पूजा और श्राद्ध कर्म करें। इससे परिवार में एकता और सौहार्द बना रहता है।
  • धार्मिक कथा और भजन: पितृ पक्ष के दौरान धार्मिक कथा सुनना और भजन करना भी पितरों की आत्मा की शांति के लिए लाभकारी होता है।

श्राद्ध पक्ष (पितृ पक्ष) एक महत्वपूर्ण समय होता है जब पूर्वजों की आत्माओं की शांति और तृप्ति के लिए विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। इस समय का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व बहुत अधिक होता है, और इसे सही तरीके से मनाने के लिए कुछ विशेष नियमों और ध्यान देने योग्य बातों का पालन करना आवश्यक होता है। यहाँ कुछ महत्वपूर्ण बातों का उल्लेख किया गया है जिन्हें श्राद्ध पक्ष 2024 के दौरान ध्यान में रखना चाहिए:

1. स्नान और शुद्धता:

  • स्नान करें: प्रत्येक दिन विशेष रूप से सुबह-सुबह स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। यह शारीरिक और मानसिक शुद्धता को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
  • स्वच्छता का ध्यान: पूजा स्थल और घर को साफ-सुथरा रखें। गंदगी और अव्यवस्था से बचें, क्योंकि यह पितरों के प्रति सम्मान और श्रद्धा को दर्शाता है।

2. पितरों की तिथि का पालन:

  • मृत्यु तिथि पर श्राद्ध: पितरों के श्राद्ध कर्म करने के लिए उनके निधन की तिथि का सही पालन करें। अगर तिथि ज्ञात नहीं है, तो सर्वपितृ अमावस्या (2 अक्टूबर 2024) को सभी पितरों का श्राद्ध करें।
  • उपयुक्त तिथि पर अनुष्ठान: हर तिथि को विशेष पितरों का श्राद्ध कर्म करना महत्वपूर्ण है। इसे सही तिथि पर करना सुनिश्चित करें, जिससे पितरों की आत्मा संतुष्ट हो सके।

3. सात्विक आहार और उपवास:

  • सात्विक भोजन: पितृ पक्ष के दौरान तामसिक भोजन (मांस, मछली, प्याज, लहसुन) से परहेज करें और केवल सात्विक भोजन का सेवन करें।
  • व्रत और उपवास: पितृ पक्ष के दौरान उपवास रखना लाभकारी होता है। अगर संभव हो, तो कुछ दिनों तक व्रत रखें और पितरों के लिए विशेष पूजा करें।

4. नए वस्त्र और शुभ कार्यों से परहेज:

  • नई चीजें न खरीदें: इस समय में नए वस्त्र, आभूषण या अन्य कीमती वस्तुएं न खरीदें। यह समय पितरों के सम्मान और श्रद्धा का होता है, न कि नए शुभ कार्यों का।
  • शुभ कार्यों से बचें: इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश या अन्य शुभ कार्य करने से बचें। यह समय केवल पितरों की पूजा और श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए है।

5. पिंडदान और तर्पण:

  • पिंडदान विधि: पिंडदान करते समय चावल, तिल, दूध और घी का मिश्रण बनाएं और पितरों को अर्पित करें। यह विशेष रूप से अमावस्या के दिन किया जाता है।
  • तर्पण विधि: तर्पण करते समय पवित्र जल, दूध और तिल अर्पित करें और मंत्र का जाप करें। यह पितरों की आत्मा की शांति के लिए आवश्यक है।

6. पीपल की पूजा:

  • पीपल की पूजा: पीपल के वृक्ष की पूजा करना पितृ पक्ष के दौरान विशेष महत्व रखता है। पीपल के नीचे दीपक जलाएं और प्रदक्षिणा करें।
  • धूप और अगरबत्ती: पीपल की पूजा के समय धूप और अगरबत्ती जलाएं, जिससे पूजा का प्रभाव बढ़े और वातावरण शुद्ध हो।

7. दान और सेवा:

  • ब्राह्मणों को भोजन: ब्राह्मणों को भोजन कराना और उन्हें दान देना पितृ पक्ष के दौरान महत्वपूर्ण होता है। दान में वस्त्र, अनाज, या धन शामिल करें।
  • गरीबों की सहायता: जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या अन्य सामग्री दान करें। यह पुण्यकारी कार्य पितरों की आत्मा की शांति के लिए किया जाता है।

8. घर की सुरक्षा:

  • घर की सुरक्षा: पितृ पक्ष के दौरान घर में सुरक्षा का ध्यान रखें। किसी भी प्रकार की दुर्घटना या परेशानी से बचने के लिए सतर्क रहें।
  • परिवार की एकता: परिवार के सभी सदस्यों को एकत्रित करें और मिलकर पूजा और अनुष्ठान करें। यह परिवार में एकता और सामंजस्य बनाए रखता है।

श्राद्ध एक महत्वपूर्ण हिंदू धार्मिक अनुष्ठान है, जो पितरों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए किया जाता है। इसे विशेष रूप से पितृ पक्ष के दौरान किया जाता है। श्राद्ध की विधि और सामग्री की सही जानकारी होना इस अनुष्ठान को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक है। यहाँ श्राद्ध विधि और इसकी सामग्री की सूची दी गई है:

श्राद्ध विधि:

  1. स्नान और शुद्धिकरण:
    स्नान करें: पूजा से पहले स्नान करके शारीरिक और मानसिक शुद्धता प्राप्त करें।
    स्वच्छ वस्त्र: स्वच्छ और साधारण वस्त्र पहनें।
  2. पितरों की तिथि का पालन:
    पितरों की तिथि: पितरों की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध कर्म करें। अगर तिथि ज्ञात नहीं हो, तो सर्वपितृ अमावस्या (2 अक्टूबर 2024) को श्राद्ध करें।
  3. पूजा स्थल की तैयारी:
    साफ-सफाई: पूजा स्थल को साफ और व्यवस्थित करें।
    पवित्र वस्त्र: पूजा स्थल पर एक पवित्र वस्त्र बिछाएं।
  4. पिंडदान:
    पिंड तैयार करें: चावल, तिल, जौ, दूध, घी और शहद का मिश्रण बनाकर पिंड तैयार करें।
    पिंड अर्पित करें: पिंड को पितरों के लिए अर्पित करें और तर्पण करें।
  5. तर्पण और जल अर्पण:
    पवित्र जल: पवित्र जल, दूध, तिल, और चंदन मिलाकर तर्पण करें।
    मंत्र जाप: “ॐ पितृभ्यो नमः” मंत्र का जाप करें।
  6. ब्राह्मणों को भोजन:
    ब्राह्मणों को आमंत्रित करें: ब्राह्मणों को आमंत्रित करें और उन्हें भोजन कराएं।
    भोजन में शामिल करें: विशेष भोजन, जैसे पांरपरिक व्यंजन, पत्तल पर परोसे।
  7. दान और सेवा:
    दान: ब्राह्मणों को वस्त्र, अनाज, या धन दान करें।
    गरीबों की सहायता: जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या अन्य सामग्री दान करें।
  8. आरती और पूजा समाप्ति:
    धूप और अगरबत्ती: धूप और अगरबत्ती जलाएं।
    आरती करें: पितरों की पूजा की आरती करें।
    प्रार्थना: समापन पर प्रार्थना करें और परिवार के सुख-समृद्धि की कामना करें।

श्राद्ध के लिए आवश्यक सामग्री:

  1. पिंडदान सामग्री:
    चावल: 1-2 कप
    तिल: 1 कप
    जौ: 1 कप
    दूध: 1-2 गिलास
    घी: 1 कप
    शहद: 1 चमच
    पानी: पवित्र जल अर्पण के लिए
  2. तर्पण सामग्री:
    पवित्र जल: 1-2 गिलास
    दूध: 1 गिलास
    तिल: 1 चमच
    चंदन: 1 चमच
  3. भोजन सामग्री:
    सात्विक व्यंजन: चावल, दाल, सब्ज़ी, पूड़ी, हलवा, इत्यादि।
    पत्तल: भोजन परोसने के लिए पत्तल या थाली।
    पानी और मिठाई: पितरों को अर्पित करने के लिए विशेष मिठाई।
  4. अनुष्ठान की सामग्री:
    दीपक और तेल: दीपक जलाने के लिए सरसों का तेल।
    धूप और अगरबत्ती: पूजा स्थल को पवित्र करने के लिए।
    फूल और अक्षत: पूजा और तर्पण के लिए।
  5. पूजा स्थल सजावट:
    साफ वस्त्र: पूजा स्थल पर बिछाने के लिए।
    पवित्र कलश: जल भरने के लिए।
    सिद्धि की सामग्री: जैसे कि चंदन, रोली, और सिंदूर।

1. पितृ पक्ष का मतलब क्या होता है?

पितृ पक्ष वह विशेष अवधि होती है जो हिंदू कैलेंडर के अनुसार आश्वयुज शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से शुरू होती है और अमावस्या तक चलती है। इस दौरान पूर्वजों की आत्माओं की शांति और तृप्ति के लिए विशेष पूजा, श्राद्ध और तर्पण अनुष्ठान किए जाते हैं। इसे पितृ पक्ष इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस दौरान पितरों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।

2. पितृ पक्ष में क्या नहीं करना चाहिए?

पितृ पक्ष के दौरान कुछ विशेष बातें हैं जिनसे बचना चाहिए:
– शुभ कार्य, जैसे विवाह, गृह प्रवेश आदि न करें।
– तामसिक भोजन (मांस, मछली, प्याज, लहसुन) से परहेज करें।
– नए वस्त्र, आभूषण या अन्य कीमती वस्तुएं न खरीदें।
– बाल और नाखून न काटें।
– घर की साफ-सफाई का ध्यान रखें।

3. पितृ पक्ष कब नहीं करना चाहिए?

पितृ पक्ष को खास दिनों में नहीं किया जाना चाहिए:
– जब पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो तो विशेष रूप से अमावस्या के दिन श्राद्ध करना चाहिए।
– कोई भी शुभ कार्य, जैसे विवाह, गृह प्रवेश आदि पितृ पक्ष के दौरान न करें।

पितृ पक्ष अशुभ क्यों है?

पितृ पक्ष अशुभ नहीं होता, लेकिन इसे शुभ कार्यों से अलग रखा जाता है। इस समय को पितरों की पूजा और श्रद्धांजलि अर्पित करने का समय माना जाता है, इसलिए इस दौरान शुभ कार्य, जैसे विवाह या गृह प्रवेश, नहीं किए जाते। यह समय पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए समर्पित होता है।

पितृ पक्ष में क्या वर्जित है?

पितृ पक्ष के दौरान निम्नलिखित चीजों से बचना चाहिए:
– मांसाहार, मछली, अंडा, प्याज और लहसुन का सेवन।
– नए वस्त्र, आभूषण, या कीमती सामान खरीदना।
– बाल और नाखून काटना।
– घर की गंदगी को नजरअंदाज करना।

पितरों में कौन कौन आते हैं?

पितरों में वे सभी पूर्वज आते हैं जिनकी मृत्यु हो चुकी है, जैसे दादा-दादी, परदादा-परदादी, और अन्य पूर्वज जो परिवार के वंश में शामिल हैं। इनकी आत्माओं की शांति और तृप्ति के लिए श्राद्ध और तर्पण किया जाता है।

पितरों को पानी कौन दे सकता है?

पितरों को पानी अर्पित करने का कार्य परिवार के सदस्य, विशेष रूप से पुरुष सदस्य, करते हैं। यह अनुष्ठान विशेष रूप से श्राद्ध और तर्पण के समय किया जाता है, जिसमें पवित्र जल, दूध और तिल अर्पित किए जाते हैं।

पितृ पक्ष के दौरान मृत्यु अच्छी है या बुरी?

पितृ पक्ष के दौरान मृत्यु की बात धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं की जाती। इस समय का मुख्य उद्देश्य पूर्वजों की आत्मा की शांति और तृप्ति होता है। मृत्यु का समय व्यक्तिगत और कर्तव्यपरायणता से संबंधित होता है और इसे अशुभ या शुभ के रूप में नहीं देखा जाता।

श्री झूलेलाल आरती- ॐ जय दूलह देवा (Shri Jhulelal Aarti: Om Jai Doolah Deva lyrics)

श्री झूलेलाल आरती (Shri Jhulelal Aarti) का अपना एक विशिष्ट महत्व है। झूलेलाल जी को जल के देवता और सिन्धी समुदाय के आराध्य देवता माना जाता है। उनकी आराधना से भक्तों को जीवन में शांति, समृद्धि और सुख की प्राप्ति होती है। झूलेलाल जी की आरती का पाठ करने से भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं और उन्हें भगवान का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

यह आरती झूलेलाल जी की महिमा, उनके अद्भुत रूप और भक्तों के प्रति उनकी असीम कृपा का वर्णन करती है। झूलेलाल जी के प्रति अपनी भक्ति और श्रद्धा प्रकट करते हुए, भक्त इस आरती का पाठ करते हैं और उनसे सुख-शांति की कामना करते हैं।

आरती के माध्यम से हम झूलेलाल जी की महिमा का गुणगान करते हुए, उनके प्रति अपनी अटूट श्रद्धा और भक्ति प्रकट करते हैं। यह आरती न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि मानसिक और आत्मिक संतुलन के लिए भी अत्यंत उपयोगी है।


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  • हिंदी / संस्कृत
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|| श्री झूलेलाल आरती ||

ॐ जय दूलह देवा,
साईं जय दूलह देवा ।
पूजा कनि था प्रेमी,
सिदुक रखी सेवा ॥

तुहिंजे दर दे केई,
सजण अचनि सवाली ।
दान वठन सभु दिलि,
सां कोन दिठुभ खाली ॥
॥ ॐ जय दूलह देवा…॥

अंधड़नि खे दिनव,
अखडियूँ – दुखियनि खे दारुं ।
पाए मन जूं मुरादूं,
सेवक कनि थारू ॥
॥ ॐ जय दूलह देवा…॥

फल फूलमेवा सब्जिऊ,
पोखनि मंझि पचिन ।
तुहिजे महिर मयासा अन्न,
बि आपर अपार थियनी ॥
॥ ॐ जय दूलह देवा…॥

ज्योति जगे थी जगु में,
लाल तुहिंजी लाली ।
अमरलाल अचु मूं वटी,
हे विश्व संदा वाली ॥
॥ ॐ जय दूलह देवा…॥

जगु जा जीव सभेई,
पाणिअ बिन प्यास ।
जेठानंद आनंद कर,
पूरन करियो आशा ॥

ॐ जय दूलह देवा,
साईं जय दूलह देवा ।
पूजा कनि था प्रेमी,
सिदुक रखी सेवा ॥

|| Shri Jhulelal Aarti ||

Om Jay Dulah Deva,
Sai Jay Dulah Deva।
Puja Kani Tha Premi,
Siduk Rakhi Seva॥

Tuhinje Dar De Kaei,
Sajan Achan Sawaali।
Daan Vathan Sabh Dil,
Sa Kon Dithubh Khali॥
॥ Om Jay Dulah Deva…॥

Andhadni Khe Dinav,
Akhadiyun – Dukhiyani Khe Darun।
Paye Man Ju Muradun,
Sevak Kani Tharu॥
॥ Om Jay Dulah Deva…॥

Phal Phulmeva Sabjiu,
Pokhani Manji Pachin।
Tuhinje Mahir Mayasa Ann,
Bi Apar Apar Thiyani॥
॥ Om Jay Dulah Deva…॥

Jyoti Jage Thi Jagu Mein,
Lal Tuhinji Lali।
Amarlal Achu Mum Vati,
He Vishwa Sanda Wali॥
॥ Om Jay Dulah Deva…॥

Jagu Ja Jiv Sabhei,
Panian Bin Pyas।
Jethanand Anand Kar,
Puran Kariyo Asha॥

Om Jay Dulah Deva,
Sai Jay Dulah Deva।
Puja Kani Tha Premi,
Siduk Rakhi Seva॥


श्री झूलेलाल आरती- ॐ जय दूलह देवा के लाभ

श्री झूलेलाल आरती: ॐ जय दूलह देवा हिंदू धर्म के अनुयायियों के लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। विशेष रूप से सिंधी समुदाय में, झूलेलाल को जल देवता और रक्षक के रूप में पूजा जाता है। आरती के माध्यम से भक्त अपने आराध्य को सम्मान देते हैं और उनके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से श्री झूलेलाल आरती के लाभों को विस्तृत रूप से समझ सकते हैं:

मानसिक शांति और संतुलन

श्री झूलेलाल की आरती करने से मन को शांति मिलती है। इसका नियमित गायन मानसिक तनाव और चिंता को कम करता है। जब हम आरती गाते हैं, तो हमारी सारी नकारात्मक भावनाएं शांत हो जाती हैं और हमें आंतरिक शांति का अनुभव होता है।

आध्यात्मिक उन्नति

आरती के दौरान, व्यक्ति का ध्यान भगवान की ओर केन्द्रित होता है। यह प्रक्रिया आत्मा को शुद्ध करती है और आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होती है। आरती गाते समय, भक्त भगवान से सीधे संपर्क महसूस करते हैं जो उनकी आध्यात्मिक यात्रा में सहायक होता है।

सकारात्मक ऊर्जा का संचार

आरती के समय उत्पन्न ध्वनि और वाइब्रेशन घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाता है और वातावरण को पवित्र और सुखद बनाता है। आरती का नियमित गायन घर के माहौल को सकारात्मक और शुद्ध बनाए रखता है।

भक्ति और समर्पण की वृद्धि

आरती गाने से व्यक्ति की भगवान के प्रति भक्ति और समर्पण की भावना बढ़ती है। यह एक माध्यम है जिसके द्वारा भक्त अपने आराध्य के प्रति अपनी श्रद्धा और प्रेम व्यक्त करते हैं। यह भावना व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाती है और उसे अच्छे कर्म करने के लिए प्रेरित करती है।

सामाजिक और सांस्कृतिक जुड़ाव

श्री झूलेलाल आरती का सामूहिक गायन समाज और समुदाय को एकजुट करता है। यह सामाजिक और सांस्कृतिक एकता को बढ़ावा देता है। आरती के अवसर पर एकत्रित होकर, लोग अपने धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखते हैं और उसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाते हैं।

आंतरिक शक्ति और आत्मविश्वास

आरती के नियमित अभ्यास से व्यक्ति के भीतर आंतरिक शक्ति और आत्मविश्वास का विकास होता है। भगवान की महिमा का गुणगान करने से व्यक्ति को आत्मबल मिलता है और वह जीवन की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम होता है।

ईश्वर के प्रति कृतज्ञता

आरती गाते समय, व्यक्ति भगवान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है। यह भावना व्यक्ति को जीवन में संतोष और सुख का अनुभव कराती है। कृतज्ञता का भाव व्यक्ति को विनम्र बनाता है और उसे हर परिस्थिति में भगवान का धन्यवाद करने के लिए प्रेरित करता है।

स्वास्थ्य लाभ

आरती के गायन के दौरान सांस की गति नियंत्रित रहती है, जिससे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसके नियमित अभ्यास से श्वास प्रक्रिया सुधरती है और ह्रदय तथा मस्तिष्क को लाभ पहुंचता है।

आत्मा का शुद्धिकरण

आरती का गायन आत्मा का शुद्धिकरण करता है। जब व्यक्ति पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ आरती गाता है, तो उसके भीतर की सभी नकारात्मकता समाप्त हो जाती है और उसकी आत्मा शुद्ध हो जाती है।

जीवन में संतुलन

आरती गाने से जीवन में संतुलन बना रहता है। यह व्यक्ति को धार्मिक, मानसिक, और शारीरिक रूप से संतुलित बनाता है। इससे व्यक्ति हर परिस्थिति में संतुलित और स्थिर रहता है।

धर्म और संस्कृति की शिक्षा

श्री झूलेलाल आरती बच्चों और युवाओं को धर्म और संस्कृति की शिक्षा देने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। यह उन्हें अपने धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों को समझने और अपनाने में मदद करता है। आरती के माध्यम से, नई पीढ़ी अपने पूर्वजों की परंपराओं और विश्वासों से जुड़ती है।

उत्सव और समारोह का अभिन्न अंग

आरती विभिन्न धार्मिक उत्सवों और समारोहों का अभिन्न अंग है। यह उत्सवों को और भी विशेष और पवित्र बनाता है। श्री झूलेलाल के जन्मोत्सव, चैत्र चांद, और अन्य महत्वपूर्ण अवसरों पर आरती का आयोजन सामूहिक भक्ति और आनन्द का माहौल बनाता है।

समाज में शांति और सौहार्द्र

आरती के सामूहिक आयोजन से समाज में शांति और सौहार्द्र की भावना प्रबल होती है। यह विभिन्न सामाजिक और धार्मिक समूहों को एक मंच पर लाता है और उनमें आपसी समझ और सहयोग की भावना को बढ़ावा देता है।

कर्मों का सुधार

आरती गाने से व्यक्ति के कर्मों में सुधार होता है। यह उसे धार्मिक और नैतिक मूल्यों के प्रति जागरूक बनाता है। आरती के प्रभाव से व्यक्ति सदाचार, दया, और सहनशीलता को अपने जीवन में अपनाने के लिए प्रेरित होता है।

आत्मज्ञान और प्रेरणा

श्री झूलेलाल आरती का नियमित गायन आत्मज्ञान और प्रेरणा का स्रोत है। इसके माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन के उद्देश्य को समझने और प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर होता है। आरती के शब्द और धुन व्यक्ति के भीतर नई ऊर्जा और उत्साह का संचार करते हैं।

प्राकृतिक संतुलन

श्री झूलेलाल, जो जल देवता हैं, की आरती करने से प्राकृतिक संतुलन और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ती है। यह आरती हमें जल और प्राकृतिक संसाधनों के महत्व को समझने और उन्हें संरक्षित करने की प्रेरणा देती है।

श्रद्धालुओं का एकत्रित होना

आरती के अवसर पर, विभिन्न स्थानों से श्रद्धालु एकत्रित होते हैं, जिससे आपसी भाईचारे और एकता की भावना मजबूत होती है। यह सामाजिक एकता और सहयोग को बढ़ावा देने का एक महत्वपूर्ण साधन है।

आध्यात्मिक ध्यान

आरती के दौरान, व्यक्ति का ध्यान पूरी तरह से भगवान पर केन्द्रित होता है, जो ध्यान और साधना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह अभ्यास व्यक्ति को ध्यान की गहराइयों में ले जाता है और उसे आत्म-साक्षात्कार की ओर अग्रसर करता है।

श्री झूलेलाल आरती- ॐ जय दूलह देवा का गायन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के जीवन में कई सकारात्मक बदलाव लाने वाला एक आध्यात्मिक अभ्यास है। इसका नियमित अभ्यास व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक, और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध करता है। आरती का महत्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि जीवन के विभिन्न पहलुओं में भी प्रकट होता है। इससे न केवल व्यक्ति का जीवन सुधरता है, बल्कि समाज और समुदाय में भी शांति और समृद्धि का संचार होता है।


श्री झूलेलाल आरती का महत्व क्या है?

श्री झूलेलाल आरती ‘ॐ जय दूलह देवा’ का महत्व यह है कि इसे गाने से झूलेलाल भगवान की कृपा प्राप्त होती है। यह आरती भगवान झूलेलाल के भक्तों को मानसिक शांति, सुख-समृद्धि और जीवन में खुशहाली प्रदान करती है।

श्री झूलेलाल आरती कब और कैसे करनी चाहिए?

श्री झूलेलाल आरती प्रातःकाल और संध्याकाल में की जाती है। आरती के समय भगवान झूलेलाल की मूर्ति या चित्र के सामने दीप जलाकर, प्रसाद चढ़ाकर और श्रद्धा से इस आरती का गान करना चाहिए।

श्री झूलेलाल आरती करने से क्या लाभ होता है?

श्री झूलेलाल आरती से भक्तों को झूलेलाल भगवान की कृपा प्राप्त होती है, जिससे उनके जीवन में सुख, शांति, समृद्धि, और संकटों से मुक्ति मिलती है। आरती का नियमित पाठ करने से भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

क्या श्री झूलेलाल आरती का पाठ किसी विशेष दिन करना शुभ होता है?

श्री झूलेलाल आरती का पाठ किसी भी दिन किया जा सकता है, लेकिन चैती चंड (चेटीचंड), जो झूलेलाल भगवान का प्रकट उत्सव है, इस दिन इस आरती का विशेष महत्व है। इस दिन आरती करने से विशेष लाभ प्राप्त होता है।

श्री झूलेलाल आरती में किस प्रकार का प्रसाद चढ़ाना चाहिए?

श्री झूलेलाल आरती के समय प्रसाद के रूप में मीठे पदार्थ जैसे लड्डू, फल, या मिष्ठान्न चढ़ाया जा सकता है। इसके अलावा, प्रसाद के रूप में धूप, दीप, और चावल (अक्षत) चढ़ाने की भी परंपरा है।

गंगा चालीसा (Ganga Chalisa PDF)

गंगा चालीसा (Ganga Chalisa Pdf) का अपना एक विशिष्ट महत्व है। माँ गंगा को पवित्रता, शुद्धि और मोक्ष की देवी माना जाता है। उनकी भक्ति और आराधना से व्यक्ति के सभी पाप धुल जाते हैं और जीवन में शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है। गंगा चालीसा का पाठ करने से भक्तों को मानसिक शांति, आध्यात्मिक संतोष और जीवन में सकारात्मकता का संचार होता है।

गंगा चालीसा में माँ गंगा की महिमा, उनकी लीलाओं और भक्तों के प्रति उनकी असीम कृपा का वर्णन किया गया है। इस चालीसा के नियमित पाठ से जीवन के सभी कष्ट और पापों का नाश होता है और व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। माँ गंगा की चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में सुख-शांति का संचार होता है और उसे पवित्रता और शुद्धि की अनुभूति होती है। आप लक्ष्मी चालीसा के लिए क्लिक करें

गंगा माँ की आराधना से सभी प्रकार की बाधाएं और कष्ट दूर होते हैं। यह चालीसा भक्तों के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का संचार करती है। माँ गंगा के आशीर्वाद से भक्तों को हर प्रकार के संकट से मुक्ति मिलती है और वे अपने जीवन में उन्नति और प्रगति करते हैं। आप सरस्वती चालीसा के लिए क्लिक करें

बोलो: हर हर गंगे!



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  • English

|| गंगा चालीसा ||

॥दोहा॥
जय जय जय जग पावनी,
जयति देवसरि गंग ।
जय शिव जटा निवासिनी,
अनुपम तुंग तरंग ॥

॥चौपाई॥
जय जय जननी हराना अघखानी ।
आनंद करनी  गंगा महारानी ॥

जय भगीरथी सुरसरि माता ।
कलिमल मूल डालिनी विख्याता ॥

जय जय जहानु सुता अघ हनानी ।
भीष्म की माता जगा जननी ॥

धवल कमल दल मम तनु सजे ।
लखी शत शरद चंद्र छवि लजाई ॥ ४ ॥

वहां मकर विमल शुची सोहें ।
अमिया कलश कर लखी मन मोहें ॥

जदिता रत्ना कंचन आभूषण ।
हिय मणि हर, हरानितम दूषण ॥

जग पावनी त्रय ताप नासवनी ।
तरल तरंग तुंग मन भावनी ॥

जो गणपति अति पूज्य प्रधान ।
इहूं ते प्रथम  गंगा अस्नाना ॥ ८ ॥

ब्रह्मा कमंडल वासिनी देवी ।
श्री प्रभु पद पंकज सुख सेवि ॥

साथी सहस्त्र सागर सुत तरयो ।
गंगा सागर तीरथ धरयो ॥

अगम तरंग उठ्यो मन भवन ।
लखी तीरथ हरिद्वार सुहावन ॥

तीरथ राज प्रयाग अक्षैवेता ।
धरयो मातु पुनि काशी करवत ॥ १२ ॥

धनी धनी सुरसरि स्वर्ग की सीधी ।
तरनी अमिता पितु पड़ पिरही ॥

भागीरथी ताप कियो उपारा ।
दियो ब्रह्म तव सुरसरि धारा ॥

जब जग जननी चल्यो हहराई ।
शम्भु जाता महं रह्यो समाई ॥

वर्षा पर्यंत गंगा महारानी ।
रहीं शम्भू के जाता भुलानी ॥ १६ ॥

पुनि भागीरथी शम्भुहीं ध्यायो ।
तब इक बूंद जटा से पायो ॥

ताते मातु भें त्रय धारा ।
मृत्यु लोक, नाभा, अरु पातारा ॥

गईं पाताल प्रभावती नामा ।
मन्दाकिनी गई गगन ललामा ॥

मृत्यु लोक जाह्नवी सुहावनी ।
कलिमल हरनी अगम जग पावनि ॥ २० ॥

धनि मइया तब महिमा भारी ।
धर्मं धुरी कलि कलुष कुठारी ॥

मातु प्रभवति धनि मंदाकिनी ।
धनि सुर सरित सकल भयनासिनी ॥

पन करत निर्मल  गंगा जल ।
पावत मन इच्छित अनंत फल ॥

पुरव जन्म पुण्य जब जागत ।
तबहीं ध्यान  गंगा महं लागत ॥ २४ ॥

जई पगु सुरसरी हेतु उठावही ।
तई जगि अश्वमेघ फल पावहि ॥

महा पतित जिन कहू न तारे ।
तिन तारे इक नाम तिहारे ॥

शत योजन हूं से जो ध्यावहिं ।
निशचाई विष्णु लोक पद पावहीं ॥

नाम भजत अगणित अघ नाशै ।
विमल ज्ञान बल बुद्धि प्रकाशे ॥ २८ ॥

जिमी धन मूल धर्मं अरु दाना ।
धर्मं मूल गंगाजल पाना ॥

तब गुन गुणन करत दुख भाजत ।
गृह गृह सम्पति सुमति विराजत ॥

गंगहि नेम सहित नित ध्यावत ।
दुर्जनहूं सज्जन पद पावत ॥

उद्दिहिन विद्या बल पावै ।
रोगी रोग मुक्त हवे जावै ॥ ३२ ॥

गंगा  गंगा जो नर कहहीं ।
भूखा नंगा कभुहुह न रहहि ॥

निकसत ही मुख गंगा माई ।
श्रवण दाबी यम चलहिं पराई ॥

महं अघिन अधमन कहं तारे ।
भए नरका के बंद किवारें ॥

जो नर जपी गंग शत नामा ।
सकल सिद्धि पूरण ह्वै कामा ॥ ३६ ॥

सब सुख भोग परम पद पावहीं ।
आवागमन रहित ह्वै जावहीं ॥

धनि मइया सुरसरि सुख दैनि ।
धनि धनि तीरथ राज त्रिवेणी ॥

ककरा ग्राम ऋषि दुर्वासा ।
सुन्दरदास गंगा कर दासा ॥

जो यह पढ़े गंगा चालीसा ।
मिली भक्ति अविरल वागीसा ॥ ४० ॥

॥ दोहा ॥
नित नए सुख सम्पति लहैं, धरें  गंगा का ध्यान ।
अंत समाई सुर पुर बसल, सदर बैठी विमान ॥

संवत भुत नभ्दिशी, राम जन्म दिन चैत्र ।
पूरण चालीसा किया, हरी भक्तन हित नेत्र ॥

Ganga Chalisa PDF (in English)

॥Doha ॥
Jay jay jay jag pyaaree,
Jayati devasaari gange ॥
Jay shiv jata nivaasinee,
Adbhut tung tarang ॥

॥Chaupaee ॥
Jay jay jananee haraana aghaakhaanee ॥
Aanand karan mahaaraanee ganga ॥

Jay bhaageerathee surasari maata ॥
Kalimal mool daalinee sangrahaalaya ॥

Jay jay jahaanu suta agh hanani ॥
Bheeshm kee maata jag jananee ॥

Dhaval kamal dal mam tanu saje ॥
Lakkhee shat sharad chandr chhavi laajai ॥ 4 ॥

Vahaan makar vikram shuchi sohane ॥
Amiya kalash kar lakhee man mohen ॥

Jadita ratna kanchan aabhooshan ॥
Hiy mani har, haranitam dooshan ॥

Jag poori tray taap naasaavanee ॥
Taar tarang tung man bhaavani ॥

Jo ganapati ati poojy pradhaan ॥
Ihoon te pratham ganga asnaana ॥ 8 ॥

Brahma kamandal vaasinee devee ॥
Shree prabhu pad pankaj sukh sevi ॥

Mitr sahastr saagar sut taraayo ॥
Ganga saagar teerath dharayo ॥

Agam tarang uthyo man bhavan ॥
Lakkhee teerath haridvaar suhaavan ॥

Teerath raaj prayaag akshaiveta ॥
Dharayo maatu puni kaashee karavat ॥ 12 ॥

Dhanee dhanee surasaari svarg kee disha ॥
Tarani amita pitu pad pirahee ॥

Bhaageerathee taap kiyo upaara ॥
Diyo brahm tav surasari dhaara ॥

Jab jag jananee chalyo haarai ॥
Shambhu jaat mahan rahyo samaay ॥

Varsha paryant ganga mahaaraanee ॥
Rath shambhoo ke bhorani ॥ 16 ॥

Puni bhaageerathee shambhuhin dhyaano ॥
Tab ik boom jata se paayo ॥

Taate maatu bhen tray dhaara ॥
Mrityu lok naabha aru paataara ॥

Paataal prabhaavati naama ॥
Mandaakinee gaee gagan lalaama ॥

Mrityu lok garbhapaat suhaavanee ॥
Kalimal harani agam jag pyaaree ॥ 20 ॥

Dhani maiya tab mahima bhaaree ॥
Dharman dhur kaalee kalush kuthaari ॥

Maatu prabhaavati dhani mandaakinee ॥
Dhani sur sarit sakal bhayanaasini ॥

Pan karat nirmal ganga jal ॥
Paavat man ichchhuk anant phal ॥

Poorv janm puny jab jagat ॥
Tabaheen dhyaan ganga mahan laagat ॥ 24 ॥

Jay pagu surasaree uthaavahee ॥
Tai jagi ashvamegh phal paavahi ॥

Maha patit jin kaahoo na taare ॥
Tin taare ik naam tihaare ॥

Shat yojana hoon se jo dhyaanahin ॥
Nishchay vishnu lok pad paavaheen ॥

Naam bhajat aganit agh naashaay ॥
Vimal gyaan bal buddhi prakaashe ॥ 28 ॥

Jimee dhan mool dharman aru daana ॥
Dharman mool gangaajal paana ॥

Tab gun gunan karat duhkh bhajat ॥
Grah grah sampati sumati viraajat ॥

Gangaahi nem sahit nit dhyaavat ॥
Durjan hoon sajjan pad paavat ॥

Uddihin vidya bal paavai ॥
Rogee rog mukt hove jaavai ॥ 32 ॥

Ganga ganga jo nar kahahin ॥
Bhookha nanga kabuhuh na rahahin ॥

Nikasat hee mukh ganga maee ॥
Shravan daabee yam chalahin paraee ॥

Mahan aghin adhaman kahan taare ॥
Bhe hela ke band kivaaren ॥

Jo nar jap gang shat naama ॥
Sakal siddhi poorn hvai kaam ॥ 36 ॥

Sab sukh bhog param pad paavaheen ॥
Asaadhy anupayukt hvai jaavahin ॥

Dhani maiya surasari sukh daayani ॥
Dhani dhani teerath raaj trivenee ॥

Kaakara graam rshi durvaasa ॥
Sundaradaas ganga kar daasa ॥

Jo isane ganga chaaleesa padhee ॥
Mili bhakti aviral vaageesa ॥ 40 ॥

॥ Doha ॥
Nit naye sukh sampati lahen, dharen ganga ka dhyaan ॥
Ant samaee sur pur basal, sadar aavaaseey vimaan ॥

Sanvat bhoot nabhadishee, raam janm divas chaitr ॥
Puraan chaaleesa, hari bhaktan hit utsav ॥


गंगा चालीसा के लाभ

गंगा चालीसा (Ganga Chalisa Pdf) गंगा नदी की महिमा और उसके पवित्रता का वर्णन करने वाला एक महत्वपूर्ण भजन है। यह चालीसा श्री गंगा देवी की स्तुति में रची गई है और इसे पढ़ने से अनेक लाभ प्राप्त होते हैं। नीचे गंगा चालीसा के लाभों का विस्तार से वर्णन किया गया है:

आध्यात्मिक शांति और मानसिक सुकून:

गंगा चालीसा का पाठ करने से मानसिक शांति और सुकून की प्राप्ति होती है। यह मन को स्थिरता प्रदान करता है और चिंताओं को दूर करता है। नियमित पाठ करने से ध्यान केंद्रित होता है और आत्मिक बल में वृद्धि होती है।

पापों का नाश:

गंगा नदी को पापों का नाश करने वाली माना गया है। गंगा चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति अपने पापों से मुक्ति पा सकता है। यह पवित्रता का स्रोत है और आत्मा की शुद्धि में सहायक है।

स्वास्थ्य लाभ:

गंगा चालीसा के नियमित पाठ से शारीरिक स्वास्थ्य में भी सुधार होता है। यह सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है और मानसिक तनाव को कम करता है। इसके अलावा, गंगा नदी के जल का सेवन भी स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी माना गया है।

सुख और समृद्धि:

गंगा चालीसा का पाठ करने से घर में सुख और समृद्धि का वास होता है। यह परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम और एकता को बढ़ाता है और जीवन में खुशहाली लाता है। गंगा देवी की कृपा से धन, वैभव और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

आध्यात्मिक उन्नति:

गंगा चालीसा का नियमित पाठ करने से आध्यात्मिक उन्नति होती है। यह व्यक्ति को धार्मिक और आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर करता है। इससे व्यक्ति के जीवन में सत्संग, साधना और सेवा का महत्व बढ़ता है।

संकटों का निवारण:

गंगा चालीसा का पाठ करने से जीवन के संकटों का निवारण होता है। यह कठिनाइयों और समस्याओं को दूर करने में सहायक है। गंगा देवी की कृपा से व्यक्ति के जीवन में आने वाले विघ्नों का समाधान होता है और जीवन सरल और सुगम बनता है।

मोक्ष की प्राप्ति:

गंगा नदी को मोक्षदायिनी कहा गया है। गंगा चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त कराती है और आत्मा को परमात्मा के साथ एकाकार करती है।

मनोकामनाओं की पूर्ति:

गंगा चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। यह इच्छाओं और अभिलाषाओं को पूरा करने में सहायक है। गंगा देवी की कृपा से व्यक्ति के सभी कार्य सफल होते हैं और उसकी सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं।

सकारात्मक ऊर्जा का संचार:

गंगा चालीसा का पाठ करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह नेगेटिव एनर्जी को दूर करता है और सकारात्मकता को बढ़ावा देता है। इससे व्यक्ति के जीवन में नई ऊर्जा और उत्साह का संचार होता है।

अध्यात्मिक साधना में सहायक:

गंगा चालीसा अध्यात्मिक साधना में भी सहायक होती है। यह ध्यान और प्रार्थना में एकाग्रता बढ़ाती है और साधना को सफल बनाती है। इससे आत्मा की शुद्धि होती है और व्यक्ति आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होता है।

पारिवारिक शांति:

गंगा चालीसा का पाठ करने से परिवार में शांति और सौहार्द का वातावरण बनता है। यह परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम और समझ को बढ़ावा देता है। इससे परिवार में सुख-शांति और समृद्धि का वास होता है।

जल संकट से मुक्ति:

गंगा चालीसा का पाठ करने से जल संकट से मुक्ति मिलती है। गंगा देवी की कृपा से वर्षा होती है और जल का संरक्षण होता है। इससे खेती और अन्य कार्यों में जल की आपूर्ति होती है और जीवन समृद्ध बनता है।

धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व:

गंगा चालीसा का पाठ करने से धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व की भी समझ होती है। यह व्यक्ति को अपनी संस्कृति और धार्मिक परंपराओं से जोड़ता है। इससे व्यक्ति में धार्मिक आस्था और विश्वास बढ़ता है।

प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा:

गंगा चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति में प्रकृति और पर्यावरण के प्रति प्रेम और संवेदना बढ़ती है। यह व्यक्ति को गंगा नदी और अन्य प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए प्रेरित करता है। इससे पर्यावरण की शुद्धता बनी रहती है और पृथ्वी का संतुलन कायम रहता है।

नकारात्मकता से मुक्ति:

गंगा चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को नकारात्मकता से मुक्ति मिलती है। यह बुरी आदतों, बुरे विचारों और नकारात्मक प्रवृत्तियों को दूर करता है। इससे व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता और उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।

आत्मविश्वास में वृद्धि:

गंगा चालीसा का पाठ करने से आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। यह व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाता है और उसे जीवन में आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करता है। इससे व्यक्ति के आत्म-सम्मान में भी वृद्धि होती है।

ध्यान और एकाग्रता:

गंगा चालीसा का पाठ करने से ध्यान और एकाग्रता में वृद्धि होती है। यह मानसिक स्थिरता और शांति प्रदान करता है। इससे व्यक्ति को अपने कार्यों में सफलता प्राप्त होती है और जीवन में संतुलन बना रहता है।

समर्पण और सेवा भावना:

गंगा चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति में समर्पण और सेवा भावना का विकास होता है। यह व्यक्ति को निस्वार्थ सेवा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है। इससे समाज और राष्ट्र की सेवा में योगदान करने की प्रेरणा मिलती है।

आध्यात्मिक गुरु की कृपा:

गंगा चालीसा का पाठ करने से आध्यात्मिक गुरु की कृपा प्राप्त होती है। यह व्यक्ति को अपने गुरु की शिक्षाओं का पालन करने और उन्हें समझने में सहायता करता है। इससे व्यक्ति का आध्यात्मिक मार्ग प्रशस्त होता है।

मानसिक तनाव से मुक्ति:

गंगा चालीसा का पाठ करने से मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है। यह मानसिक शांति और संतुलन प्रदान करता है। इससे व्यक्ति को अपने जीवन में तनाव और चिंता से मुक्ति मिलती है और वह खुशहाल जीवन जीता है।

गंगा चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को अनेक लाभ प्राप्त होते हैं। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के जीवन को संवारने और उसे सही दिशा में अग्रसर करने का माध्यम भी है। गंगा देवी की कृपा से व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और सफलता का वास होता है। अतः नियमित रूप से गंगा चालीसा का पाठ करना चाहिए और इसके अद्भुत लाभों का अनुभव करना चाहिए।


गंगा मैया का मंत्र क्या है?

गंगा मैया का प्रसिद्ध मंत्र है:

“ॐ श्रीम ह्रीं क्लीं स्वाहा,
ॐ श्रीम ह्रीं क्लीं स्वाहा,
ॐ श्रीम ह्रीं क्लीं स्वाहा।”

इस मंत्र का जाप करने से गंगा मैया का आशीर्वाद प्राप्त होता है और समस्त पापों का नाश होता है।

गंगा का पाठ कैसे करते हैं?

गंगा का पाठ करने के लिए सबसे पहले पवित्र भावनाओं के साथ गंगा जी का ध्यान करें। फिर “गंगा चालीसा” या “गंगा स्तोत्र” का पाठ करें। इस दौरान गंगा जल का संकल्प लेना, दीप जलाना और पुष्प अर्पित करना शुभ माना जाता है।

गंगा जी का असली नाम क्या है?

गंगा जी का असली नाम “भागीरथी” है। यह नाम राजा भगीरथ के नाम पर पड़ा, जिन्होंने गंगा को स्वर्ग से धरती पर लाने के लिए कठोर तप किया था।

गंगा किसका अवतार है?

गंगा देवी को भगवान विष्णु के चरणों से उत्पन्न माना जाता है, और वे भगवान शिव की जटाओं में स्थित हैं। उन्हें धरती पर लाने के लिए राजा भगीरथ ने तप किया था, जिससे उन्हें भागीरथी भी कहा जाता है।

गंगा माता को कैसे प्रसन्न करें?

गंगा माता को प्रसन्न करने के लिए प्रतिदिन गंगा मैया का ध्यान करें, गंगा जल से स्नान करें, और उनकी आरती करें। इसके अलावा, गंगा नदी को स्वच्छ रखने का संकल्प लें और किसी भी प्रकार की गंदगी या अपवित्रता से बचें। गंगा के किनारे पर पूजा-अर्चना करना और दीपदान करना भी शुभ माना जाता है।

अन्नपूर्णा चालीसा (Annapurna Chalisa PDF)

अन्नपूर्णा चालीसा (Annapurna Chalisa Pdf) एक भक्ति स्तोत्र है जो माँ अन्नपूर्णा को समर्पित है। माँ अन्नपूर्णा, जिन्हें अन्न और पोषण की देवी माना जाता है, को इस चालीसा के माध्यम से भक्तों द्वारा पूजा और स्तुति की जाती है। अन्नपूर्णा चालीसा माँ अन्नपूर्णा की कृपा, उनकी महिमा, और उनके द्वारा समस्त भक्तों को प्रदान की जाने वाली आहारिक संतोष की वरदान का वर्णन करती है।

यह चालीसा उन भक्तों के लिए विशेष महत्व रखती है जो अन्नदाता माँ अन्नपूर्णा की कृपा और आशीर्वाद में विश्वास रखते हैं। अन्नपूर्णा चालीसा के पाठ से भक्तों को भौतिक और आध्यात्मिक संतोष, समृद्धि, और प्रसन्नता की प्राप्ति होती है।

इस चालीसा में माँ अन्नपूर्णा के दिव्य स्वरूप, उनके प्रसाद का महत्व, और उनके द्वारा प्रदान की गई आहारिक संतोष की महिमा का वर्णन किया गया है। अन्नपूर्णा चालीसा के पाठ करने से भक्तों की मनोयोग्यता में वृद्धि होती है, उन्हें अन्नदाता की कृपा से प्राप्त आशीर्वाद मिलता है।

अन्नपूर्णा चालीसा का नियमित पाठ अन्नपूर्णा जयंती, नवरात्रि के दौरान और विशेष पवित्र अवसरों पर किया जाता है, जिससे भक्तों को आशीर्वाद प्राप्त होता है और उनके जीवन में आनंद और समृद्धि का संचार होता है।


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॥ माँ अन्नपूर्णा चालीसा ॥

॥ दोहा ॥
विश्वेश्वर पदपदम की रज निज शीश लगाय ।
अन्नपूर्णे, तव सुयश बरनौं कवि मतिलाय ।

॥ चौपाई ॥
नित्य आनंद करिणी माता,
वर अरु अभय भाव प्रख्याता ॥

जय ! सौंदर्य सिंधु जग जननी,
अखिल पाप हर भव-भय-हरनी ॥

श्वेत बदन पर श्वेत बसन पुनि,
संतन तुव पद सेवत ऋषिमुनि ॥

काशी पुराधीश्वरी माता,
माहेश्वरी सकल जग त्राता ॥

वृषभारुढ़ नाम रुद्राणी,
विश्व विहारिणि जय ! कल्याणी ॥

पतिदेवता सुतीत शिरोमणि,
पदवी प्राप्त कीन्ह गिरी नंदिनि ॥

पति विछोह दुःख सहि नहिं पावा,
योग अग्नि तब बदन जरावा ॥

देह तजत शिव चरण सनेहू,
राखेहु जात हिमगिरि गेहू ॥

प्रकटी गिरिजा नाम धरायो,
अति आनंद भवन मँह छायो ॥

नारद ने तब तोहिं भरमायहु,
ब्याह करन हित पाठ पढ़ायहु ॥ 10 ॥

ब्रहमा वरुण कुबेर गनाये,
देवराज आदिक कहि गाये ॥

सब देवन को सुजस बखानी,
मति पलटन की मन मँह ठानी ॥

अचल रहीं तुम प्रण पर धन्या,
कीहनी सिद्ध हिमाचल कन्या ॥

निज कौ तब नारद घबराये,
तब प्रण पूरण मंत्र पढ़ाये ॥

करन हेतु तप तोहिं उपदेशेउ,
संत बचन तुम सत्य परेखेहु ॥

गगनगिरा सुनि टरी न टारे,
ब्रहां तब तुव पास पधारे ॥

कहेउ पुत्रि वर माँगु अनूपा,
देहुँ आज तुव मति अनुरुपा ॥

तुम तप कीन्ह अलौकिक भारी,
कष्ट उठायहु अति सुकुमारी ॥

अब संदेह छाँड़ि कछु मोसों,
है सौगंध नहीं छल तोसों ॥

करत वेद विद ब्रहमा जानहु,
वचन मोर यह सांचा मानहु ॥ 20 ॥

तजि संकोच कहहु निज इच्छा,
देहौं मैं मनमानी भिक्षा ॥

सुनि ब्रहमा की मधुरी बानी,
मुख सों कछु मुसुकाय भवानी ॥

बोली तुम का कहहु विधाता,
तुम तो जगके स्रष्टाधाता ॥

मम कामना गुप्त नहिं तोंसों,
कहवावा चाहहु का मोंसों ॥

दक्ष यज्ञ महँ मरती बारा,
शंभुनाथ पुनि होहिं हमारा ॥

सो अब मिलहिं मोहिं मनभाये,
कहि तथास्तु विधि धाम सिधाये ॥

तब गिरिजा शंकर तव भयऊ,
फल कामना संशयो गयऊ ॥

चन्द्रकोटि रवि कोटि प्रकाशा,
तब आनन महँ करत निवासा ॥

माला पुस्तक अंकुश सोहै,
कर मँह अपर पाश मन मोहै ॥

अन्न्पूर्णे ! सदापूर्णे,
अज अनवघ अनंत पूर्णे ॥ 30 ॥

कृपा सागरी क्षेमंकरि माँ,
भव विभूति आनंद भरी माँ ॥

कमल विलोचन विलसित भाले,
देवि कालिके चण्डि कराले ॥

तुम कैलास मांहि है गिरिजा,
विलसी आनंद साथ सिंधुजा ॥

स्वर्ग महालक्ष्मी कहलायी,
मर्त्य लोक लक्ष्मी पदपायी ॥

विलसी सब मँह सर्व सरुपा,
सेवत तोहिं अमर पुर भूपा ॥

जो पढ़िहहिं यह तव चालीसा,
फल पाइंहहि शुभ साखी ईसा ॥

प्रात समय जो जन मन लायो,
पढ़िहहिं भक्ति सुरुचि अघिकायो ॥

स्त्री कलत्र पति मित्र पुत्र युत,
परमैश्रवर्य लाभ लहि अद्भुत ॥

राज विमुख को राज दिवावै,
जस तेरो जन सुजस बढ़ावै ॥

पाठ महा मुद मंगल दाता,
भक्त मनोवांछित निधि पाता ॥ 40 ॥

॥ दोहा ॥
जो यह चालीसा सुभग,
पढ़ि नावैंगे माथ ।
तिनके कारज सिद्ध सब,
साखी काशी नाथ ॥

Annapurna Chalisa PDF (in English)

॥ Doha ॥
vishveshvar padapadam kee raj nij chamakaay ॥
annapoorne, tav suyash barnaun kavi matilaay ॥

॥ chaupaee ॥
nity aanand karinee maata,
var aru abhay bhaav aadhyaatm ॥

jay ! saundary sindhu jag jananee,
sampoorn paap har bhav-bhay-haranee ॥

shvet badan par shvet basan puni,
santan tuv pad sevat rshimuni ॥

kaashee puraadheeshvaree maata,
maaheshvaree sakal jag traata ॥

vrshabhaaroodh naam rudraanee,
vishv vihaarinee jay ! kalyaanee ॥

patidevata suteet shiromani,
padavee keenh giree nandinee ॥

pati vichho duhkh sahi nahin paava,
yog agni tab badan jaraava ॥

deh tajat shiv charan sanehoo,
raakhehu jaat himagiri gehoo ॥

prakatee girija naam dharayo,
ati aanand bhavan manh chhaayo ॥

naarad ne tab tohin bharmayahu,
byaah karn hit paath payaahu ॥ 10 ॥

brahma varun kuber ganaye,
devaraaj aadik kahi gaaye ॥

sab devan ko sujas bakhaanee,
mati palatan kee man mahan thaanee ॥

achal raho tum par dhanyavaad,
keehanee siddh himaachal kanya ॥

nij ko tab naarad aashcharyaye,
tab praan puraan mantr padhie ॥

karn uchche tap tohin upadesheu,
sant bachan tum saty parekehu ॥

gaganagira suni taari na taare,
braahn tab tuv paas padhaare ॥

kaheu putree var maanguskopa,
dehun aj tuv mati anuroopa ॥

tum tap keenh alaukik bhaaree,
abhilaasha uthaahu ati sukumaaree ॥

ab sanshay chhaandee kachhu moson,
hai saugandh nahin chhal toson ॥

karat ved vid brahma jaanhu,
vachan mor yah saancha manahu ॥ 20 ॥

taji aardr kahahu nij chaahat,
dehaun main skool bhiksha ॥

suni brahma kee madhuree vaanee,
mukh son kachhu musukaay bhavaanee ॥

bolee tum ka kahu vidhaata,
tum to jagake srshtaata ॥

mam kaamana gupt nahin tonson,
kahava chaahu ka manson ॥

daksh yagy mahan maratee baara,
shambhunaathapuni hohin hamaara ॥

so ab milahin mohin manabhaaye,
kahi tathaastu vidhi dhaam siddhaye ॥

tab girija shankar tav bhayau,
phal kaamana sanshayo gayau ॥

chandrakoti ravi koti prakaasha,
tab sangat mahan karat nivaasa ॥

maigel buk kraikad sohaee,
kar manh apar paash man mohaee ॥

annpoorne ! sadaapoorne,
aj anavagh anant poorne ॥ 30 ॥

krpa saagar kshemankaaree maan,
bhav vibhooti aanand bharee maan ॥

kamal vilochan vilaseet bhaale,
devee kaalike chandee karaale ॥

tum kailaas nahin ho girija,
vasee aanand saath sindhuja ॥

svarg mahaalakshmee kahalaayee,
marty lok lakshmee padapaayee ॥

vilasee sab manh sarv saroopa,
sevat tohin amar pur bhoopa ॥

jo padhihahin yah tav chaaleesa,
phal painhaahi shubh saakhee eesa ॥

praat samay jo jan man laayo,
padhihahin bhakti suruchi aghikaayo ॥

stree kalatr pati mitr putr yut,
paramashrvary laabh lahi adbhut ॥

raaj vimukh ko raaj divaavai,
jas tero jan sujas badhaavai ॥

paath mahaamud mangal daata,
bhakt manovaanchhit nidhi paata ॥ 40 ॥


अन्नपूर्णा चालीसा के लाभ

अन्नपूर्णा चालीसा, माँ अन्नपूर्णा की आराधना के लिए एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसे 40 श्लोकों में लिखा गया है और यह विशेष रूप से माता अन्नपूर्णा की पूजा और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए जानी जाती है। यहाँ हम अन्नपूर्णा चालीसा के लाभों पर विस्तार से चर्चा करेंगे:

आध्यात्मिक शांति और संतुलन

अन्नपूर्णा चालीसा के नियमित पाठ से व्यक्ति को मानसिक शांति और आध्यात्मिक संतुलन प्राप्त होता है। यह चालीसा व्यक्ति को तनाव और चिंता से दूर रखने में मदद करती है, क्योंकि यह भगवान अन्नपूर्णा की शक्ति और कृपा पर विश्वास को मजबूत करती है। पाठक को नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति मिलती है और उसके जीवन में शांति का प्रवाह होता है।

आर्थिक समृद्धि

माँ अन्नपूर्णा को अन्न और समृद्धि की देवी माना जाता है। उनके प्रति श्रद्धा और भक्ति दिखाते हुए अन्नपूर्णा चालीसा का पाठ करने से आर्थिक समृद्धि की प्राप्ति होती है। यह विशेष रूप से उन व्यक्तियों के लिए लाभकारी है जो आर्थिक संकट या वित्तीय समस्याओं का सामना कर रहे हैं। माँ की कृपा से धन-धान्य में वृद्धि होती है और वित्तीय स्थिरता प्राप्त होती है।

भौतिक और मानसिक स्वास्थ्य

अन्नपूर्णा चालीसा के नियमित पाठ से भौतिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। यह चालीसा मानसिक तनाव और शारीरिक समस्याओं को दूर करने में सहायक होती है। माता अन्नपूर्णा की कृपा से शरीर को ऊर्जा मिलती है और मानसिक स्थिति मजबूत होती है, जिससे व्यक्ति एक स्वस्थ और सुखमय जीवन जी सकता है।

कृषि और खाद्य उत्पादन में वृद्धि

माँ अन्नपूर्णा को खाद्य और अन्न की देवी माना जाता है। उनके प्रति श्रद्धा और भक्ति से कृषि में वृद्धि और खाद्य उत्पादन में सुधार होता है। यह विशेष रूप से किसानों के लिए फायदेमंद है, जो फसल उत्पादन और कृषि संबंधित समस्याओं का सामना कर रहे हैं। अन्नपूर्णा चालीसा का पाठ करके किसान अपनी फसलों की वृद्धि और समृद्धि की कामना कर सकते हैं।

आध्यात्मिक जागरूकता और विकास

अन्नपूर्णा चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति की आध्यात्मिक जागरूकता और विकास होता है। यह चालीसा व्यक्ति को ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण की भावना को जगाने में मदद करती है। इसके माध्यम से व्यक्ति अपने आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर होता है और आत्मा की सच्ची पहचान प्राप्त करता है।

नैतिक और चरित्र विकास

अन्नपूर्णा चालीसा के पाठ से व्यक्ति का नैतिक और चरित्र विकास होता है। यह चालीसा व्यक्ति को सही और गलत का अंतर समझाने में मदद करती है और उसे जीवन में उच्च आदर्शों को अपनाने के लिए प्रेरित करती है। इसके माध्यम से व्यक्ति अपने चरित्र को सुधारता है और एक अच्छे इंसान बनने की ओर अग्रसर होता है।

संबंधों में सुधार

अन्नपूर्णा चालीसा का नियमित पाठ परिवारिक और व्यक्तिगत संबंधों में सुधार लाने में भी सहायक हो सकता है। माता अन्नपूर्णा की कृपा से व्यक्ति के संबंधों में सामंजस्य और प्यार बढ़ता है। यह विशेष रूप से उन लोगों के लिए फायदेमंद है जिनके रिश्तों में तनाव या विवाद हैं।

भक्तों की रक्षा

माँ अन्नपूर्णा अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और उन्हें कठिनाइयों से उबारती हैं। चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को विभिन्न प्रकार की समस्याओं से राहत मिलती है और उसकी समस्याओं का समाधान होता है। यह एक प्रकार की सुरक्षा कवच की तरह कार्य करता है जो भक्तों को संकटों से बचाता है।

समाज में सकारात्मक परिवर्तन

अन्नपूर्णा चालीसा के पाठ से समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने की प्रेरणा मिलती है। जब लोग इस चालीसा का पाठ करते हैं और माँ अन्नपूर्णा की आराधना करते हैं, तो वे समाज में अच्छे कार्य करने के लिए प्रेरित होते हैं। यह समाज में सामंजस्य और शांति स्थापित करने में सहायक होती है।

आध्यात्मिक मार्गदर्शन

अन्नपूर्णा चालीसा पढ़ने से व्यक्ति को आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त होता है। यह चालीसा व्यक्ति को सही दिशा में मार्गदर्शन करती है और उसके जीवन के उद्देश्यों को स्पष्ट करती है। इसके माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन की समस्याओं का समाधान ढूंढ सकता है और आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर हो सकता है।

अन्नपूर्णा चालीसा एक शक्तिशाली ग्रंथ है जो माँ अन्नपूर्णा की कृपा और आशीर्वाद को प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण साधन है। इसके पाठ से न केवल व्यक्तिगत जीवन में सुधार होता है बल्कि समाज और परिवार में भी सकारात्मक परिवर्तन आता है। इसका नियमित पाठ आध्यात्मिक शांति, आर्थिक समृद्धि, स्वास्थ्य, नैतिक विकास, और संबंधों में सुधार लाने में सहायक होता है। इस प्रकार, अन्नपूर्णा चालीसा का पाठ जीवन में सुख-समृद्धि और शांति लाने का एक महत्वपूर्ण उपाय है।


अन्नपूर्णा चालीसा का पाठ कब करना चाहिए?

अन्नपूर्णा चालीसा का पाठ विशेष रूप से नवरात्रि, दीपावली या किसी भी शुभ दिन पर किया जा सकता है। इसके अलावा, रोज़ाना सुबह के समय पाठ करने से घर में समृद्धि, अन्न-धन की वृद्धि और परिवार की खुशहाली बनी रहती है।

अन्नपूर्णा चालीसा पढ़ने से क्या लाभ होता है?

अन्नपूर्णा चालीसा पढ़ने से जीवन में धन, धान्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है। इससे घर में अन्न की कभी कमी नहीं होती, और मां अन्नपूर्णा की कृपा से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।

अन्नपूर्णा चालीसा का पाठ कैसे करना चाहिए?

अन्नपूर्णा चालीसा का पाठ एकाग्रता और श्रद्धा के साथ किया जाना चाहिए। सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण कर देवी अन्नपूर्णा की मूर्ति या चित्र के सामने दीप जलाकर, चालीसा का पाठ किया जाता है।

क्या अन्नपूर्णा चालीसा का पाठ किसी विशेष मुहूर्त में करना चाहिए?

अन्नपूर्णा चालीसा का पाठ किसी भी समय किया जा सकता है, लेकिन यदि शुभ मुहूर्त में या ब्रह्ममुहूर्त (सुबह 4-6 बजे) में किया जाए, तो इसका प्रभाव अधिक शुभकारी होता है।

अन्नपूर्णा चालीसा का पाठ कितने दिनों तक करना चाहिए?

अन्नपूर्णा चालीसा का पाठ नियमित रूप से प्रतिदिन करना श्रेष्ठ माना जाता है। विशेष इच्छाओं की पूर्ति के लिए, इसे 21 दिनों तक या 108 बार लगातार पाठ करना भी अत्यंत फलदायी माना जाता है।

ॐ जय जय शनि महाराज: श्री शनिदेव आरती (Shani Aarti: Om Jai Jai Shri Shani Maharaj)

ओम जय जय श्री शनि महाराज (Shani Aarti) भगवान शनि को समर्पित एक भक्तिपूर्ण आरती है, जो हिंदू ज्योतिष में नौ प्राथमिक खगोलीय प्राणियों में से एक हैं, जिन्हें नवग्रह के रूप में जाना जाता है। भगवान शनि शनि ग्रह के अवतार हैं और न्याय, अनुशासन और कर्म पर उनके प्रभाव के लिए पूजनीय हैं।

आरती ओम जय जय श्री शनि महाराज भगवान शनि की स्तुति में गाया जाने वाला एक प्रार्थना गीत है, जिसमें उनका आशीर्वाद और सुरक्षा मांगी जाती है। इसे अक्सर शनि जयंती के दौरान गाया जाता है, जो भगवान शनि की जयंती है, साथ ही शनिवार को भी, जो पारंपरिक रूप से उनकी पूजा के लिए समर्पित दिन है।

आरती के बोल भगवान शनि के प्रति भक्ति और श्रद्धा व्यक्त करते हैं, उनकी शक्ति को स्वीकार करते हैं और बाधाओं को दूर करने, ग्रहों की गड़बड़ी के प्रभावों को कम करने और धार्मिकता और समृद्धि का जीवन जीने के लिए उनकी कृपा मांगते हैं। इस आरती के माध्यम से, भक्त भगवान शनि की दया और मार्गदर्शन की आशा करते हुए अपने सम्मान को व्यक्त करते हैं और अपने गलत कामों के लिए क्षमा मांगते हैं।


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  • हिंदी / संस्कृत
  • English

|| श्री शनिदेव आरती ||

ॐ जय जय शनि महाराज,
स्वामी जय जय शनि महाराज ।
कृपा करो हम दीन रंक पर,
दुःख हरियो प्रभु आज ॥
॥ ॐ जय जय शनि महाराज ॥

सूरज के तुम बालक होकर,
जग में बड़े बलवान ।
सब देवताओं में तुम्हारा,
प्रथम मान है आज ॥
॥ ॐ जय जय शनि महाराज ॥

विक्रमराज को हुआ घमण्ड फिर,
अपने श्रेष्ठन का ।
चकनाचूर किया बुद्धि को,
हिला दिया सरताज ॥
॥ ॐ जय जय शनि महाराज ॥

प्रभु राम और पांडवजी को,
भेज दिया बनवास ।
कृपा होय जब तुम्हारी स्वामी,
बचाई उनकी लॉज ॥
॥ ॐ जय जय शनि महाराज ॥

शुर-संत राजा हरीशचंद्र का,
बेच दिया परिवार ।
पात्र हुए जब सत परीक्षा में,
देकर धन और राज ॥
॥ ॐ जय जय शनि महाराज ॥

गुरुनाथ को शिक्षा फाँसी की,
मन के गरबन को ।
होश में लाया सवा कलाक में,
फेरत निगाह राज ॥
॥ ॐ जय जय शनि महाराज ॥

माखन चोर वो कृष्ण कन्हाइ,
गैयन के रखवार ।
कलंक माथे का धोया उनका,
खड़े रूप विराज ॥
॥ ॐ जय जय शनि महाराज ॥

देखी लीला प्रभु आया चक्कर,
तन को अब न सतावे ।
माया बंधन से कर दो हमें,
भव सागर ज्ञानी राज ॥
॥ ॐ जय जय शनि महाराज ॥

मैं हूँ दीन अनाथ अज्ञानी,
भूल भई हमसे ।
क्षमा शांति दो नारायण को,
प्रणाम लो महाराज ॥
॥ ॐ जय जय शनि महाराज ॥

ॐ जय जय शनि महाराज,
स्वामी जय-जय शनि महाराज ।
कृपा करो हम दीन रंक पर,
दुःख हरियो प्रभु आज ॥
॥ ॐ जय जय शनि महाराज ॥

|| Shri Shani Aarti ||

Om Jay Jay Shani Maharaj,
Swami Jay Jay Shani Maharaj.
Kripa karo hum dein rank par,
Dukh hariyo Prabhu aaj.
Om Jay Jay Shani Maharaj…

Suraj ke tum balak hokar,
Jag mein bade balwan.
Sab devtaon mein tumhara,
Pratham maan hai aaj.
Om Jay Jay Shani Maharaj…

Vikramraj ko hua ghamand phir,
Apne shreshthn ka.
Chaknachur kiya buddhi ko,
Hila diya sartaj.
Om Jay Jay Shani Maharaj…

Prabhu Ram aur Pandavji ko,
Bhej diya banvaas.
Kripa hoye jab tumhari Swami,
Bachai unki laaj.
Om Jay Jay Shani Maharaj…

Shur-sant Raja Harishchandra ka,
Bech diya parivar.
Patra hue jab sat pareeksha mein,
Dekar dhan aur raj.
Om Jay Jay Shani Maharaj…

Gurunath ko shiksha faansi ki,
Man ke garban ko.
Hosh mein laya sava kalak mein,
Ferat nigaah raj.
Om Jay Jay Shani Maharaj…

Makhan chor wo Krishna Kanhai,
Gaiyan ke rakhwaar.
Kalank mathe ka dhoya unka,
Khade roop viraj.
Om Jay Jay Shani Maharaj…

Dekhi leela Prabhu aaya chakkar,
Tan ko ab na satawe.
Maya bandhan se kar do hamein,
Bhav sagar gyaani raj.
Om Jay Jay Shani Maharaj…

Main hoon deen anath agyaani,
Bhool bhai hamaase.
Kshama shaanti do Narayan ko,
Pranaam lo Maharaj.
Om Jay Jay Shani Maharaj…

Om Jay Jay Shani Maharaj,
Swami Jay Jay Shani Maharaj.
Kripa karo hum dein rank par,
Dukh hariyo Prabhu aaj.
Om Jay Jay Shani Maharaj…


ॐ जय जय शनि महाराज: श्री शनिदेव आरती के लाभ

शनि महाराज की आरती “ॐ जय जय शनि महाराज: श्री शनिदेव आरती” एक महत्वपूर्ण पूजा अर्चना है जो शनि ग्रह से संबंधित धार्मिक कार्यों में की जाती है। शनि देवता को न्याय का देवता माना जाता है, और उनकी पूजा का उद्देश्य जीवन में न्याय, कर्म और दंड के सिद्धांतों को समझना और अपने कर्मों को सुधारना होता है। इस आरती के कई लाभ होते हैं, जिनकी चर्चा हम यहाँ विस्तार से करेंगे:

शनि के प्रभाव से मुक्ति

शनि ग्रह का प्रभाव व्यक्ति के जीवन में गंभीर परिणाम ला सकता है, जो व्यक्ति के कर्मों पर निर्भर करता है। शनि की आरती करने से शनि ग्रह के दुष्प्रभावों को कम किया जा सकता है। यह आरती शनि देव को प्रसन्न करने का एक साधन है, जिससे शनि की कृपा प्राप्त होती है और उनके द्वारा दंडित किए जाने की संभावना कम हो जाती है।

पारिवारिक और आर्थिक समस्याओं का समाधान

शनि देवता की आरती करने से पारिवारिक और आर्थिक समस्याओं का समाधान संभव होता है। यह आरती विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी होती है जो वित्तीय संकट या पारिवारिक कलह से जूझ रहे हैं। शनि देवता की पूजा से धन की कमी और पारिवारिक संघर्षों में सुधार होता है, और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।

स्वास्थ्य में सुधार

शनि देवता की आरती करने से स्वास्थ्य में सुधार की संभावनाएँ भी होती हैं। शनि के दुष्प्रभावों से उत्पन्न बीमारियों और शारीरिक समस्याओं से राहत मिल सकती है। आरती के माध्यम से मानसिक शांति प्राप्त होती है, जो स्वास्थ्य को बेहतर बनाती है।

कर्मों का फल

शनि देवता न्याय के प्रतीक हैं और उनके द्वारा किए गए कर्मों का फल दिया जाता है। जब व्यक्ति शनि महाराज की आरती करता है, तो वह अपने कर्मों की समीक्षा करता है और सकारात्मक कर्मों की ओर बढ़ने की कोशिश करता है। यह आरती व्यक्ति को अपने कर्मों के फल को समझने और सुधारने की प्रेरणा देती है।

मानसिक शांति और संतुलन

आरती के दौरान उच्च मनोबल और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जो मानसिक शांति और संतुलन को बनाए रखने में मदद करता है। शनि की आरती करने से व्यक्ति के मन में संतुलन बना रहता है, और मानसिक तनाव दूर होता है। यह आरती एक प्रकार की ध्यान साधना का भी कार्य करती है, जिससे मन को शांति मिलती है।

आध्यात्मिक उन्नति

शनि देवता की आरती करने से आध्यात्मिक उन्नति होती है। यह व्यक्ति को अपने आत्मा की गहराई को समझने और जीवन के उद्देश्यों को पहचानने में मदद करती है। शनि महाराज की पूजा से व्यक्ति का आध्यात्मिक ज्ञान बढ़ता है और आत्मा के साथ एक गहरा संबंध स्थापित होता है।

धैर्य और साहस की वृद्धि

शनि ग्रह को धैर्य और साहस का प्रतीक माना जाता है। जब व्यक्ति शनि देवता की आरती करता है, तो वह धैर्य और साहस को विकसित करने की दिशा में कदम बढ़ाता है। यह आरती व्यक्ति को जीवन की कठिनाइयों का सामना करने के लिए शक्ति और साहस प्रदान करती है।

संस्कार और आचरण में सुधार

शनि देवता की पूजा और आरती करने से व्यक्ति के आचरण और संस्कार में सुधार होता है। शनि के प्रभाव से व्यक्ति अपने जीवन में नैतिकता और ईमानदारी को अपनाने की प्रेरणा प्राप्त करता है। यह आरती व्यक्ति को जीवन के सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।

सामाजिक सम्मान और प्रतिष्ठा

शनि देवता की आरती करने से सामाजिक सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त करने में भी मदद मिलती है। व्यक्ति की सामाजिक स्थिति में सुधार होता है और समाज में उसकी मान्यता बढ़ती है। यह आरती समाज में एक अच्छा स्थान बनाने में सहायक होती है।

प्रेरणा और उत्साह की प्राप्ति

शनि देवता की आरती से प्रेरणा और उत्साह प्राप्त होता है। यह आरती व्यक्ति को अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रेरित करती है और जीवन के प्रति उत्साह बढ़ाती है। शनि देवता की आरती के दौरान मन में सकारात्मक विचार आते हैं, जो जीवन को प्रेरणादायक बनाते हैं।

“ॐ जय जय शनि महाराज: श्री शनिदेव आरती” एक शक्तिशाली धार्मिक क्रिया है जो शनि देवता की कृपा और आशीर्वाद को प्राप्त करने का एक प्रभावी तरीका है। इसके माध्यम से व्यक्ति न केवल शनि के दुष्प्रभावों से मुक्ति प्राप्त कर सकता है, बल्कि जीवन के विभिन्न पहलुओं में सुधार भी देख सकता है। यह आरती मानसिक शांति, आध्यात्मिक उन्नति, और सामाजिक सम्मान प्राप्त करने में सहायक होती है। नियमित रूप से इस आरती को करने से जीवन में सुख, शांति, और संतुलन बना रहता है, और व्यक्ति अपने कर्मों को सुधारने की दिशा में कदम बढ़ा सकता है।


शनि देव का मूल मंत्र क्या है?

शनि देव का मूल मंत्र है:

“ॐ शम शनैश्चराय नमः”

यह मंत्र शनि देव की पूजा और उनके आशीर्वाद को प्राप्त करने के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है।

कौन सा शनि मंत्र शक्तिशाली है?

एक शक्तिशाली शनि मंत्र है:

“ॐ शनैश्चराय नमः”

इसके अलावा, “ॐ शम शनैश्चराय नमः” भी शक्तिशाली माना जाता है। इन मंत्रों का जाप नियमित रूप से करने से शनि ग्रह के प्रभाव को कम किया जा सकता है और जीवन में शांति प्राप्त की जा सकती है।

शनिदेव को खुश करने का कौन सा मंत्र है?

शनिदेव को खुश करने के लिए निम्नलिखित मंत्रों का जाप किया जा सकता है:

“ॐ शं शनैश्चराय नमः”
“ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः”

इन मंत्रों का जाप विशेष रूप से शनिवार के दिन और शनि व्रत के समय किया जाता है।

शनि देव को जल चढ़ाते समय कौन सा मंत्र बोला जाता है?

शनि देव को जल चढ़ाते समय निम्नलिखित मंत्र बोला जा सकता है:

“ॐ शनैश्चराय नमः”

जल अर्पित करते समय इस मंत्र का जाप करने से शनि देव की कृपा प्राप्त होती है और ग्रह की समस्याओं में राहत मिलती है।

शनि देव से क्षमा कैसे मांगे?

शनि देव से क्षमा प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:

मंत्र जाप: नियमित रूप से “ॐ शं शनैश्चराय नमः” मंत्र का जाप करें।

दान: शनिवार के दिन गरीबों को दान करें और पीपल के पेड़ की पूजा करें।

व्रत: शनिवार के दिन व्रत रखें और शनि देव की पूजा करें।

माफी: अपने कर्मों की सफाई के लिए पश्चाताप करें और नये कर्मों की दिशा सही करें।

सत्यनिष्ठा: अपने कार्यों में ईमानदारी और सत्यनिष्ठा बनाए रखें, जिससे शनि देव की कृपा प्राप्त हो।