Wednesday, January 28, 2026
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श्री राम नाम तारक (Shri Rama Naam Tarakam PDF)

श्री राम नाम तारक (Shri Rama Naam Tarakam) का अर्थ है भगवान श्री राम के नाम का उच्चारण। यह नाम भक्ति मार्ग में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। ‘राम’ नाम को तारक मंत्र कहा गया है, जो जीवन के समस्त कष्टों और पापों से मुक्त करने वाला होता है। श्री राम का नाम स्वयं भगवान शिव ने माता पार्वती को बताया था कि यह नाम मोक्ष प्राप्ति का सशक्त साधन है।

श्री राम नाम की महिमा:

  1. मोक्ष प्रदान करने वाला: राम नाम को मृत्यु के समय उच्चारित करने से जीवात्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  2. सभी बाधाओं का नाशक: राम नाम का जाप करने से जीवन की समस्त बाधाएँ और कष्ट दूर हो जाते हैं।
  3. मन की शांति: यह नाम मानसिक शांति और संतोष प्रदान करता है।
  4. आध्यात्मिक उन्नति: राम नाम का नियमित जाप व्यक्ति को आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ाता है।

राम नाम का जाप और कीर्तन भक्तों द्वारा भक्ति भाव से किया जाता है। इसके माध्यम से वे भगवान राम के प्रति अपनी श्रद्धा और समर्पण प्रकट करते हैं। भारत में राम नवमी और अन्य पर्वों पर राम नाम का विशेष महात्म्य रहता है, जहाँ भक्तगण भजन, कीर्तन और राम कथा का आयोजन करते हैं।


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|| श्री राम नाम तारक ||

राम राम राम राम नाम तारकम्
राम कृष्ण वासुदेव भक्ति मुक्ति दायकम्

जानकी मनोहरम सर्वलोक नायकम्
जानकी मनोहरम सर्वलोक नायकम्
जानकी मनोहरम सर्वलोक नायकम्

शङ्करादि सेव्यमान पुण्यनाम कीर्तनम्
शङ्करादि सेव्यमान पुण्यनाम कीर्तनम्

राम राम राम राम नाम तारकम्
राम कृष्ण वासुदेव भक्ति मुक्ति दायकम्

वीरशूर वन्दितं रावणादि नाशकम्
वीरशूर वन्दितं रावणादि नाशकम्

आञ्जनेय जीवनाम राजमन्त्र रुपकम्
आञ्जनेय जीवनाम राजमन्त्र रुपकम्

राम राम राम राम नाम तारकम्
राम कृष्ण वासुदेव भक्ति मुक्ति दायकम्

|| Shri Rama Naam Tarakam ||

Rāma Rāma Rāma Rāma Nāma Tārakam,
Rāma Kṛṣṇa Vāsudeva Bhakti Mukti Dāyakam.

Jānakī Manoharam Sarvaloka Nāyakam,
Jānakī Manoharam Sarvaloka Nāyakam,
Jānakī Manoharam Sarvaloka Nāyakam.

Śaṅkarādi Sevyamāna Puṇyanāma Kīrtanam,
Śaṅkarādi Sevyamāna Puṇyanāma Kīrtanam.

Rāma Rāma Rāma Rāma Nāma Tārakam,
Rāma Kṛṣṇa Vāsudeva Bhakti Mukti Dāyakam.

Vīraśūra Vanditaṁ Rāvaṇādi Nāśakam,
Vīraśūra Vanditaṁ Rāvaṇādi Nāśakam.

Āñjaneya Jīvanāma Rājamantra Rūpakam,
Āñjaneya Jīvanāma Rājamantra Rūpakam.

Rāma Rāma Rāma Rāma Nāma Tārakam,
Rāma Kṛṣṇa Vāsudeva Bhakti Mukti Dāyakam.


श्री राम नाम तारक के लाभ

श्री राम नाम तारक (Shri Rama Naam Tarakam) का जाप करने के अनेक लाभ हैं, जो आध्यात्मिक और मानसिक दोनों ही प्रकार के होते हैं। यहाँ कुछ प्रमुख लाभ दिए जा रहे हैं:

आध्यात्मिक शांति: राम नाम का जाप करने से मन को शांति और संतोष मिलता है। यह मानसिक तनाव और चिंता को दूर करने में सहायक होता है।

पापों का नाश: यह माना जाता है कि श्री राम का नाम लेने से जीवन के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यह नाम व्यक्ति को पवित्र और शुद्ध बनाता है।

मोक्ष प्राप्ति: राम नाम का उच्चारण मृत्यु के समय करने से आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसे जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है।

बाधाओं का नाश: जीवन में आने वाली सभी प्रकार की बाधाओं और कष्टों का नाश होता है। राम नाम का जाप व्यक्ति को सभी संकटों से मुक्त करता है।

धार्मिक और आध्यात्मिक उन्नति: राम नाम का नियमित जाप करने से व्यक्ति की धार्मिक और आध्यात्मिक उन्नति होती है। यह भक्ति मार्ग पर आगे बढ़ने में सहायक होता है।

स्वास्थ्य लाभ: मानसिक शांति और संतुलन प्राप्त होने से व्यक्ति का शारीरिक स्वास्थ्य भी सुधरता है। यह शरीर और मन दोनों को स्वस्थ बनाए रखता है।

सकारात्मक ऊर्जा: राम नाम का जाप करने से व्यक्ति के चारों ओर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह ऊर्जा जीवन में सुख-शांति और समृद्धि लाती है।

धैर्य और सहनशीलता: राम नाम का नियमित जाप व्यक्ति के धैर्य और सहनशीलता को बढ़ाता है। यह विपरीत परिस्थितियों में भी स्थिर और संतुलित रहने की शक्ति प्रदान करता है।

श्री राम नाम तारक का जाप करना भक्तों के लिए एक सरल और सशक्त साधन है, जो उन्हें भगवान राम के चरणों में समर्पित करता है और जीवन के हर क्षेत्र में उन्नति और सफलता प्रदान करता है।

राम तारक मंत्र कौन सा होता है?

राम तारक मंत्र “राम” नाम का जाप है। इसे “तारक मंत्र” इसलिए कहते हैं क्योंकि यह जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है। इस मंत्र का नियमित जाप करने से व्यक्ति को मानसिक शांति और आत्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

राम के 5 नाम कौन कौन से हैं?

राम के पांच प्रमुख नाम निम्नलिखित हैं:
राम
सीता पति
रघुपति
रामचंद्र
जानकी वल्लभ

राम जी का गुप्त नाम क्या है?

राम जी का गुप्त नाम “राजीवलोचन” है। इसका अर्थ है “कमल के समान नेत्रों वाला”, जो भगवान राम की विशेषता को दर्शाता है।

श्री राम का मूल नाम क्या है?

श्री राम का मूल नाम “राम” ही है। यह नाम स्वयं भगवान विष्णु ने रखा था और यह नाम संसार के सभी दुखों से मुक्त कराने वाला माना जाता है।

राम तारक का मंत्र कौन सा है?

राम तारक का मंत्र “ॐ रामाय नमः” है। इस मंत्र का जाप करने से व्यक्ति के मन में शांति और संतोष की भावना आती है और यह संसार के सभी कष्टों से मुक्ति दिलाने में सहायक होता है।

राम जी का प्रिय मंत्र कौन सा है?

राम जी का प्रिय मंत्र “श्रीराम जय राम जय जय राम” है। इस मंत्र का नियमित जाप करने से भक्त भगवान राम की कृपा प्राप्त कर सकता है और जीवन में सुख-शांति प्राप्त कर सकता है।

भगवद्‍ गीता आरती (Aarti Shri Bhagwat Geeta)

भगवद्‍ गीता आरती (Aarti Shri Bhagwat Geeta) का एक प्रसिद्ध आरती है जिसमें इस महाकाव्य के महत्वपूर्ण सन्देशों को समर्पित किया गया है। यह आरती भगवद्‍ गीता के अनमोल ज्ञान, धार्मिक तत्त्व और मानवता के मूल्यों को स्तुति और प्रशंसा का अद्वितीय रूप मानी जाती है। आप हमारी वेबसाइट में दुर्गा आरतीदुर्गा चालीसादुर्गा अमृतवाणी और दुर्गा मंत्र भी पढ़ सकते हैं।

इसमें भगवद्‍ गीता के प्रत्येक अध्याय की महत्वपूर्ण बातें और उसके उच्च महिमा को बयान किया गया है, जिससे पाठकों को आध्यात्मिक उद्दीपना और भगवद्‍ गीता के आदर्शों की वास्तविकता समझने में मदद मिलती है। यह आरती हिन्दू धर्म के महान ग्रंथ भगवद्‍ गीता के माध्यम से मानवता के लिए प्रेरणा स्थापित करती है, उसके मार्गदर्शन में आध्यात्मिक समृद्धि और शांति की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करती है।



  • हिंदी / संस्कृत
  • English

|| भगवद्‍ गीता आरती ||

जय भगवद् गीते,
जय भगवद् गीते ।
हरि-हिय-कमल-विहारिणि,
सुन्दर सुपुनीते ॥

कर्म-सुमर्म-प्रकाशिनि,
कामासक्तिहरा ।
तत्त्वज्ञान-विकाशिनि,
विद्या ब्रह्म परा ॥
जय भगवद् गीते…॥

निश्चल-भक्ति-विधायिनि,
निर्मल मलहारी ।
शरण-सहस्य-प्रदायिनि,
सब विधि सुखकारी ॥
जय भगवद् गीते…॥

राग-द्वेष-विदारिणि,
कारिणि मोद सदा ।
भव-भय-हारिणि,
तारिणि परमानन्दप्रदा ॥
जय भगवद् गीते…॥

आसुर-भाव-विनाशिनि,
नाशिनि तम रजनी ।
दैवी सद् गुणदायिनि,
हरि-रसिका सजनी ॥
जय भगवद् गीते…॥

समता, त्याग सिखावनि,
हरि-मुख की बानी ।
सकल शास्त्र की स्वामिनी,
श्रुतियों की रानी ॥
जय भगवद् गीते…॥

दया-सुधा बरसावनि,
मातु! कृपा कीजै ।
हरिपद-प्रेम दान कर,
अपनो कर लीजै ॥
जय भगवद् गीते…॥

जय भगवद् गीते,
जय भगवद् गीते ।
हरि-हिय-कमल-विहारिणि,
सुन्दर सुपुनीते ॥

|| Aarti Shri Bhagwat Geeta ||

Jay Bhagavad Geete,
Jay Bhagavad Geete.
Hari-hiya-kamal-viharini,
Sundar supunite.

Karma-sumarma-prakashini,
Kama-asaktihara.
Tattvajnana-vikashini,
Vidya Brahma para.
Jay Bhagavad Geete…

Nischala-bhakti-vidhayini,
Nirmala malahari.
Sharana-sahasya-pradayini,
Sab vidhi sukhakari.
Jay Bhagavad Geete…

Raga-dvesha-vidarini,
Karini moda sada.
Bhava-bhaya-harini,
Taarini paramanandaprada.
Jay Bhagavad Geete…

Aasura-bhava-vinashini,
Nashini tam rajani.
Daivi sad gunadayini,
Hari-rasika sajani.
Jay Bhagavad Geete…

Samata, tyag sikhavani,
Hari-mukh ki bani.
Sakal shastra ki swamini,
Shrutiyo ki rani.
Jay Bhagavad Geete…

Daya-sudha barsavani,
Matu! Krupa kijiye.
Haripada-prema dan kar,
Apano kar lijiye.
Jay Bhagavad Geete…

Jay Bhagavad Geete,
Jay Bhagavad Geete.
Hari-hiya-kamal-viharini,
Sundar supunite.


भगवद्‍ गीता आरती के लाभ

भगवद्‍ गीता, जिसे भारतीय संस्कृति और दर्शन के सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक माना जाता है, का पाठ और आरती एक गहन आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करता है। इस लेख में, हम विस्तार से समझेंगे कि भगवद्‍ गीता आरती के क्या-क्या लाभ हो सकते हैं और यह हमारे जीवन को कैसे प्रभावित कर सकती है।

आध्यात्मिक उन्नति

भगवद्‍ गीता आरती का नियमित पाठ और संगीतिक वातावरण आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होता है। भगवद्‍ गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने जीवन के कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डाला है। आरती के दौरान गीता के श्लोकों का पाठ करने से, व्यक्ति भगवान के दिव्य ज्ञान को समझने और आत्मसात करने में सक्षम होता है। यह ध्यान और साधना के माध्यम से आत्मा की शुद्धि और उच्च आध्यात्मिक स्थिति प्राप्त करने में मदद करता है।

मानसिक शांति और स्थिरता

आरती के समय गीता के श्लोकों का समर्पण मानसिक शांति और स्थिरता प्रदान करता है। यह एक प्रकार की ध्यान की प्रक्रिया होती है, जो मन को स्थिर करने और मानसिक तनाव को कम करने में सहायक होती है। जब व्यक्ति गीता की शिक्षाओं का अनुसरण करता है, तो वह जीवन की चुनौतियों और परेशानियों को शांतिपूर्वक और समझदारी से निपट सकता है।

जीवन के उद्देश्य की समझ

भगवद्‍ गीता जीवन के उद्देश्य और जीवन की वास्तविकता को समझाने में सहायक होती है। आरती के समय गीता के श्लोकों का सुनना और उन्हें मनन करना, व्यक्ति को अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य की पहचान करने में मदद करता है। यह व्यक्ति को समझाता है कि सच्चा सुख और शांति केवल भौतिक वस्तुओं या परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होती, बल्कि आंतरिक शांति और आत्मज्ञान पर आधारित होती है।

धार्मिक और सांस्कृतिक संबंध

भगवद्‍ गीता आरती न केवल आध्यात्मिक लाभ देती है, बल्कि यह धार्मिक और सांस्कृतिक संबंधों को भी मजबूत करती है। जब परिवार या समुदाय एक साथ गीता की आरती करते हैं, तो यह एकता और सामंजस्य का संदेश फैलाता है। यह धार्मिक परंपराओं को बनाए रखने और सांस्कृतिक धरोहर को संजोने में सहायक होता है।

सकारात्मक ऊर्जा का संचार

आरती के समय गीता की उपासना से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। गीता के श्लोकों के उच्चारण से वातावरण में सकारात्मकता का प्रवाह होता है, जो व्यक्ति के मन और आत्मा को शुद्ध करता है। यह सकारात्मक ऊर्जा जीवन में प्रगति और समृद्धि की ओर ले जाती है।

स्वास्थ्य लाभ

गौर करें कि आरती के समय मन की शांति और ध्यान की प्रक्रिया से मानसिक स्वास्थ्य लाभ होता है। मानसिक शांति का सीधा संबंध शारीरिक स्वास्थ्य से होता है। जब व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ होता है, तो इसका सकारात्मक प्रभाव शारीरिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। गीता की आरती के नियमित पाठ से व्यक्ति अधिक स्वस्थ और उर्जावान महसूस कर सकता है।

आत्म-संयम और अनुशासन

भगवद्‍ गीता आरती के नियमित पाठ से आत्म-संयम और अनुशासन की भावना विकसित होती है। नियमित रूप से आरती करने से व्यक्ति अपनी दिनचर्या में अनुशासन बनाए रखता है, जिससे उसकी जीवनशैली में संतुलन और संगति बनी रहती है। यह अनुशासन जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी सकारात्मक प्रभाव डालता है।

कर्मयोग और स्वधर्म की समझ

भगवद्‍ गीता कर्मयोग और स्वधर्म की महत्वपूर्ण शिक्षाएं देती है। आरती के दौरान गीता के श्लोकों का पाठ करने से व्यक्ति को अपने कर्मों और कर्तव्यों को समझने में मदद मिलती है। यह व्यक्ति को अपने स्वधर्म के पालन और निष्काम कर्म करने के महत्व को समझाता है, जिससे जीवन में एक नई दिशा और उद्देश्य मिलता है।

नैतिक और आध्यात्मिक सुधार

गीता की आरती से नैतिक और आध्यात्मिक सुधार होता है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने धर्म, सत्य और नैतिकता के महत्व पर प्रकाश डाला है। आरती के समय इन शिक्षाओं का पालन करने से व्यक्ति में नैतिक मूल्यों का विकास होता है और वह एक सच्चे और ईमानदार जीवन की ओर अग्रसर होता है।

दुखों और समस्याओं से मुक्ति

भगवद्‍ गीता की शिक्षाएं और आरती व्यक्ति को दुखों और समस्याओं का सामना करने की शक्ति देती हैं। गीता के श्लोक जीवन के संघर्षों और समस्याओं को समझने और उनसे पार पाने की विधियाँ प्रदान करते हैं। जब व्यक्ति इन शिक्षाओं का पालन करता है, तो वह अपने जीवन के दुखों और समस्याओं से मुक्त हो सकता है।

भगवद्‍ गीता आरती के लाभ अत्यधिक व्यापक और गहन हैं। यह न केवल आध्यात्मिक उन्नति और मानसिक शांति प्रदान करती है, बल्कि धार्मिक, सांस्कृतिक, और नैतिक लाभ भी देती है। गीता की शिक्षाएं जीवन के हर क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव लाने की क्षमता रखती हैं, और इसके नियमित अभ्यास से व्यक्ति का जीवन अधिक समृद्ध और पूर्ण बन सकता है। भगवद्‍ गीता आरती एक दिव्य अनुभव है जो जीवन को एक नई दिशा और उद्देश्य प्रदान करती है।


गीता का कौन सा अध्याय रोज पढ़ना चाहिए?

आप रोजाना भगवत गीता का अध्याय 12 (भक्ति योग) या अध्याय 2 (सांख्य योग) पढ़ सकते हैं। अध्याय 12 भक्ति और समर्पण की महत्ता पर केंद्रित है, जबकि अध्याय 2 जीवन के तत्वज्ञान और कर्तव्य की शिक्षा देता है।

गीता का शक्तिशाली मंत्र क्या है?

भगवत गीता में कई शक्तिशाली मंत्र हैं, लेकिन अध्याय 9 का श्लोक 22 “अनन्याश्चिन्तयन्तो मां…” और अध्याय 18 का श्लोक 66 “सर्वधर्मान्परित्यज्य…” विशेष रूप से शक्तिशाली माने जाते हैं।

गीता का पहला शब्द क्या है?

भगवत गीता का पहला शब्द “धृतराष्ट्र” है, जो पहले श्लोक के प्रारंभ में आता है: “धृतराष्ट्र उवाच…”

भगवत गीता कब पढ़ना चाहिए?

भगवत गीता का पाठ किसी भी समय किया जा सकता है। परन्तु, ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4-6 बजे) का समय विशेष रूप से उपयुक्त माना जाता है क्योंकि उस समय मन शांत और एकाग्र होता है।

क्या हम बिस्तर पर गीता पढ़ सकते हैं?

हाँ, आप बिस्तर पर भी भगवत गीता का पाठ कर सकते हैं। महत्वपूर्ण यह है कि आप इसे मन और आत्मा की शुद्धि के उद्देश्य से पढ़ें, चाहे वह किसी भी स्थान पर हो।

असली गीता कौन सी है?

भगवत गीता का मूल पाठ संस्कृत में है। कई विद्वानों द्वारा इसका अनुवाद और व्याख्या की गई है, लेकिन असली गीता वह है जो संस्कृत में श्रीमद्भगवद्गीता के नाम से जानी जाती है।

Aarti Kunj Bihari Ki PDF (आरती कुंज बिहारी की)

आरती कुंज बिहारी की (Aarti Kunj Bihari Ki PDF) भगवान श्रीकृष्ण की आरती है, जो उनकी महिमा का गुणगान करती है और भक्तों को उनके अनंत प्रेम और करुणा का अनुभव कराती है। यह आरती विशेष रूप से उनके वृंदावन लीलाओं का स्मरण कराती है, जहाँ भगवान कृष्ण ने अपनी बाल लीलाओं से संसार को मोहित किया था। आप बनवारी तेरी यारी ने दीवाना बना दिया, मुझे अपने ही रंग में रंग ले मेरे यार सवारे लिरिक्स भी पढ़ सकते हैं।

आरती का हर शब्द भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अपार भक्ति और श्रद्धा का प्रतीक है। इसमें भगवान कृष्ण के अलग-अलग रूपों का वर्णन किया गया है, जैसे कि उनकी मोहक मुरली, उनकी क्रीड़ाएँ, उनके सखा, और उनके साथ रास रचाने वाली गोपियाँ। इस आरती के द्वारा भक्तजन श्रीकृष्ण के चरणों में अपनी अटूट भक्ति और समर्पण व्यक्त करते हैं।

इस आरती की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे गाते समय भक्तों का मन स्वतः ही भगवान श्रीकृष्ण की ओर खिंच जाता है। उनके सुंदर रूप, बाललीलाओं और मधुर मुस्कान की छवि मन में उभरने लगती है। “आरती कुंज बिहारी की” गाते समय ऐसा प्रतीत होता है जैसे स्वयं भगवान कृष्ण हमारे सामने खड़े होकर हमारी भक्ति स्वीकार कर रहे हों।

आरती में वृंदावन की पवित्रता और माधुर्य का भी वर्णन किया गया है, जो भगवान कृष्ण का सबसे प्रिय स्थान है। वृंदावन, जहाँ उन्होंने अपने बालपन की लीलाएँ कीं, गोपियों के साथ रास रचाया, और अपने भक्तों को अनंत प्रेम का अनुभव कराया। इस आरती में वृंदावन के कुंजों का उल्लेख किया गया है, जहाँ भगवान कृष्ण ने अपनी रास लीलाओं से संसार को प्रेम और भक्ति का अद्वितीय संदेश दिया।

आरती कुंज बिहारी की” केवल एक साधारण आरती नहीं है, बल्कि यह भगवान कृष्ण के जीवन और लीलाओं का संक्षिप्त सार है। इसमें भगवान कृष्ण की उन सभी लीलाओं का वर्णन किया गया है, जिनसे उनका संपूर्ण जीवन दिव्यता से परिपूर्ण हो गया।

भगवान श्रीकृष्ण का रूप, उनकी वाणी, उनकी लीलाएँ और उनकी मधुर मुरली का स्वर सब कुछ इस आरती के माध्यम से जीवंत हो उठता है। भक्तगण जब इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में भगवान कृष्ण के प्रति प्रेम और भक्ति की लहरें उमड़ने लगती हैं।

यह आरती भक्तों को भगवान कृष्ण के दिव्य प्रेम और उनकी अपार कृपा का अनुभव कराती है। इसके हर शब्द में श्रीकृष्ण की महिमा का गुणगान है, जो हमें उनके चरणों में शीश झुकाने के लिए प्रेरित करता है। “आरती कुंज बिहारी की” गाते समय भक्तों को ऐसा अनुभव होता है कि वे स्वयं भगवान के सम्मुख खड़े होकर उनकी आरती कर रहे हों।

इस आरती का गायन विशेष रूप से उन भक्तों के लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है, जो भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अपनी भक्ति और श्रद्धा को प्रकट करना चाहते हैं। इस आरती के माध्यम से भक्तगण भगवान कृष्ण के प्रति अपनी आत्मीयता और उनके प्रति अपने अटूट विश्वास को व्यक्त करते हैं।


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|| आरती कुंज बिहारी की ||

आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की
आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की
आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की
आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की

गले में बैजंती माला, बजावे मुरली मधुर बाला।
श्रवण में कुंडल झलकला,नंद के आनंद नंदलाला।
गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली।
लतन में ठाढ़े बनमाली, भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक,
चन्द्र सी झलक, ललित छवि श्यामा प्यारी की॥
श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की॥

आरती कुंज बिहारी की
श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की॥ x2

कनकमय मोर मुकुट बिलसे, देवता दरसन को तरसे।
गगन सो सुमन रासी बरसे, बाजे मुरचंग, मधुर मृदंग,
ग्वालिन संग, वर्तमान रति गोप कुमारी की॥
श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की॥

आरती कुंज बिहारी की
श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की॥ x2

जहां ते प्रगट भयि गंगा, कलुष कलि हारिणी श्री गंगा।
स्मरण ते होत मोह भंगा, बसि शिव शीश, जटा के बीच,
हरेइ अघ कीच, चरण छवि श्री बनवारि की॥
श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की॥

आरती कुंज बिहारी की
श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की॥ x2

चमकती उज्जवल तात रेनू, बज रही वृन्दावन बेनु।
चहु दिसि गोपी ग्वाल धेनु हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद्रा,
कटत भव फंद, तेर सुन दीन भिखारी की॥
श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की॥

आरती कुंज बिहारी की
श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की॥ x2

आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की॥

आरती कुंज बिहारी की
श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की॥ x2

|| Aarti Kunj Bihari Ki ||

Aarti Kunj Bihari Ki, Shri Girdhar Krishna Murari Ki
Aarti Kunj Bihari Ki, Shri Girdhar Krishna Murari Ki
Aarti Kunj Bihari Ki, Shri Girdhar Krishna Murari Ki
Aarti Kunj Bihari Ki, Shri Girdhar Krishna Murari Ki

Gale Mein Baijanti Mala, Bajave Murali Madhur Bala।
Shravan Mein Kundal Jhalakala,Nand Ke Anand Nandlala।
Gagan Sam Ang Kanti Kali, Radhika Chamak Rahi Aali।
Latan Mein Thadhe Banamali, Bhramar Si Alak, Kasturi Tilak,
Chandra Si Jhalak, Lalit Chavi Shyama Pyari Ki॥
Shri Girdhar Krishna Murari Ki॥

Aarti Kunj Bihari Ki
Shri Girdhar Krishna Murari Ki॥ x2

Kanakmay Mor Mukut Bilse, Devata Darsan Ko Tarse।
Gagan So Suman Raasi Barse, Baje Murchang, Madhur Mridang,
Gwaalin Sang, Atual Rati Gop Kumaari Ki॥
Shri Girdhar Krishna Murari Ki॥

Aarti Kunj Bihari Ki
Shri Girdhar Krishna Murari Ki॥ x2

Jahaan Te Pragat Bhayi Ganga, Kalush Kali Haarini Shri Ganga।
Smaran Te Hot Moh Bhanga, Basi Shiv Shish, Jataa Ke Beech,
Harei Agh Keech, Charan Chhavi Shri Banvaari Ki॥
Shri Girdhar Krishna Murari Ki॥

Aarti Kunj Bihari Ki
Shri Girdhar Krishna Murari Ki॥ x2

Chamakati Ujjawal Tat Renu, Baj Rahi Vrindavan Benu।
Chahu Disi Gopi Gwaal Dhenu Hansat Mridu Mand, Chandani Chandra,
Katat Bhav Phand, Ter Sun Deen Bhikhaaree Ki॥
Shri Girdhar Krishna Murari Ki॥

Aarti Kunj Bihari Ki
Shri Girdhar Krishna Murari Ki॥ x2

Aarti Kunj Bihari Ki, Shri Girdhar Krishna Murari Ki॥
Aarti Kunj Bihari Ki, Shri Girdhar Krishna Murari Ki॥

Aarti Kunj Bihari Ki
Shri Girdhar Krishna Murari Ki॥ x2




आरती कुंज बिहारी की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली भक्ति स्तोत्र है, जो भगवान श्रीकृष्ण की आराधना के लिए गाया जाता है। इस आरती के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति और श्रद्धा प्रकट की जाती है, और यह न केवल धार्मिक बल्कि आध्यात्मिक और मानसिक लाभ भी प्रदान करती है। इस लेख में हम “आरती कुंज बिहारी की” के विभिन्न लाभों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

भक्ति और श्रद्धा में वृद्धि

आरती कुंज बिहारी की” का नियमित गायन व्यक्ति के भीतर भक्ति और श्रद्धा को बढ़ावा देता है। जब हम इस आरती का गान करते हैं, तो हमारा मन भगवान श्रीकृष्ण के प्रति केंद्रित हो जाता है। इस दौरान हमें उनके दिव्य रूप, लीलाओं और चरित्र का स्मरण होता है, जिससे हमारी भक्ति प्रगाढ़ होती है।

भक्ति और श्रद्धा में वृद्धि का अर्थ है, जीवन में सकारात्मकता का आगमन। जब हम भगवान की आरती गाते हैं, तो हमारा हृदय पवित्र भावनाओं से भर जाता है, जिससे मन को शांति मिलती है और जीवन की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति प्राप्त होती है।

मानसिक शांति और स्थिरता

“आरती कुंज बिहारी की” के माध्यम से मानसिक शांति और स्थिरता प्राप्त होती है। इस आरती के गायन से मन को एकाग्रता मिलती है, जो दैनिक जीवन के तनाव और चिंताओं को कम करने में सहायक होती है। भगवान कृष्ण की आराधना करने से मन में शांत और सुखद विचार आते हैं, जिससे मानसिक शांति प्राप्त होती है।

भगवान श्रीकृष्ण के प्रति ध्यान केंद्रित करने से हमारी आत्मा में शांति का अनुभव होता है। यह आरती हमारे मन को स्थिरता प्रदान करती है और हमें जीवन की परेशानियों से मुक्त कर, शांति और संतोष के मार्ग पर ले जाती है।

आध्यात्मिक विकास

आध्यात्मिक विकास का अर्थ है आत्मा का उत्थान और भगवान के प्रति समर्पण की भावना का विकास। “आरती कुंज बिहारी की” का नियमित गायन व्यक्ति के आध्यात्मिक जीवन को समृद्ध करता है। इस आरती के माध्यम से हम भगवान श्रीकृष्ण के साथ एक गहन आत्मीय संबंध स्थापित करते हैं, जो हमें आध्यात्मिकता के मार्ग पर अग्रसर करता है।

आध्यात्मिक विकास के लिए भगवान के प्रति समर्पण और ध्यान आवश्यक है। यह आरती भगवान के प्रति समर्पण की भावना को प्रबल करती है, जिससे हमारा आत्मबल और आत्मविश्वास बढ़ता है। आध्यात्मिकता की वृद्धि हमें जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन और स्थिरता प्रदान करती है।

सकारात्मक ऊर्जा का संचार

“आरती कुंज बिहारी की” का गायन सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। भगवान श्रीकृष्ण की महिमा और उनकी लीलाओं का स्मरण करने से हमारे आसपास की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सकारात्मकता का माहौल बनता है। इस आरती के माध्यम से हम अपने घर और जीवन में सुख-शांति और समृद्धि को आमंत्रित कर सकते हैं।

सकारात्मक ऊर्जा का संचार व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी होता है। यह हमें जीवन के कठिन समय में सहारा देती है और हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर वातावरण में व्यक्ति को प्रसन्नता, संतोष, और आनंद की अनुभूति होती है।

भावनात्मक संतुलन

भावनात्मक संतुलन का अभाव व्यक्ति को तनाव, चिंता और अन्य मानसिक समस्याओं का शिकार बना सकता है। “आरती कुंज बिहारी की” का नियमित रूप से गान करने से व्यक्ति के भावनात्मक स्वास्थ्य में सुधार होता है। भगवान श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति और श्रद्धा व्यक्ति के भीतर संतुलन की भावना को बढ़ावा देती है, जिससे वह अपने भावनाओं को सही तरीके से नियंत्रित कर पाता है।

भावनात्मक संतुलन व्यक्ति को आत्मविश्वास और मानसिक स्थिरता प्रदान करता है। यह आरती हमें भगवान के साथ जुड़ने का अवसर प्रदान करती है, जिससे हमारे भीतर सकारात्मक विचार और भावनाएँ उत्पन्न होती हैं। इस संतुलन से व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है और वह जीवन की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम होता है।

धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्य

“आरती कुंज बिहारी की” भारतीय संस्कृति और धार्मिकता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस आरती के माध्यम से हम अपने धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों को बनाए रख सकते हैं। यह आरती हमें हमारे पूर्वजों के द्वारा स्थापित धर्म और संस्कृति की याद दिलाती है और हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहने में सहायता करती है।

धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्य हमें जीवन में सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। यह आरती हमें भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का स्मरण कराती है, जिससे हम अपने जीवन में धार्मिकता और नैतिकता का पालन कर सकते हैं। यह हमारे जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने में सहायक होती है और हमें समाज में एक अच्छे नागरिक के रूप में स्थापित करती है।

परिवारिक एकता और सद्भावना

“आरती कुंज बिहारी की” का सामूहिक गायन परिवार में एकता और सद्भावना को बढ़ावा देता है। जब पूरा परिवार एक साथ मिलकर भगवान श्रीकृष्ण की आरती करता है, तो उसमें प्रेम, सौहार्द, और समर्पण की भावना उत्पन्न होती है। यह आरती परिवार के सदस्यों के बीच आपसी संबंधों को मजबूत करती है और उन्हें भगवान की कृपा के प्रति कृतज्ञता का अनुभव कराती है।

परिवारिक एकता और सद्भावना का हमारे जीवन में बहुत बड़ा महत्व है। यह आरती हमें एक साथ आने और भगवान के प्रति अपनी श्रद्धा और भक्ति को प्रकट करने का अवसर प्रदान करती है। इससे परिवार के सदस्य एक-दूसरे के प्रति और भी अधिक प्रेम और सम्मान का अनुभव करते हैं, जिससे परिवार का माहौल सुखद और सकारात्मक होता है।

स्वास्थ्य लाभ

धार्मिक गतिविधियाँ और भक्ति का मन और शरीर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। “आरती कुंज बिहारी की” का नियमित रूप से गान करने से व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। इस आरती के माध्यम से व्यक्ति को शारीरिक रूप से स्वस्थ और मानसिक रूप से स्थिर रहने में सहायता मिलती है।

स्वास्थ्य लाभ का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इस आरती के गान से व्यक्ति को तनाव और चिंता से मुक्ति मिलती है, जो शरीर के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं। इसके अतिरिक्त, भगवान के प्रति भक्ति और श्रद्धा व्यक्ति के जीवन में संतोष और आनंद का संचार करती है, जिससे उसका संपूर्ण स्वास्थ्य बेहतर होता है।

समर्पण और विनम्रता की भावना

“आरती कुंज बिहारी की” का गायन व्यक्ति के भीतर समर्पण और विनम्रता की भावना को बढ़ावा देता है। भगवान श्रीकृष्ण के प्रति समर्पण और विनम्रता व्यक्ति के अहंकार को कम करती है और उसे दूसरों के प्रति दयालु और सहानुभूतिपूर्ण बनाती है। यह आरती हमें यह सिखाती है कि जीवन में विनम्रता और समर्पण का कितना महत्व है।

समर्पण और विनम्रता व्यक्ति के चरित्र को मजबूत करती है और उसे एक अच्छा इंसान बनने में सहायता करती है। यह आरती हमें भगवान के प्रति हमारी जिम्मेदारियों और कर्तव्यों का स्मरण कराती है, जिससे हम जीवन के प्रति एक संतुलित दृष्टिकोण रख पाते हैं।

जीवन में संतोष और आनंद का अनुभव

“आरती कुंज बिहारी की” के माध्यम से व्यक्ति को जीवन में संतोष और आनंद का अनुभव होता है। भगवान श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति और श्रद्धा व्यक्ति के मन में संतोष और संतुलन की भावना को जन्म देती है। यह आरती हमें यह सिखाती है कि भगवान के प्रति भक्ति और समर्पण ही सच्चे आनंद का स्रोत है।

संतोष और आनंद का अनुभव जीवन को सरल और खुशहाल बनाता है। यह आरती हमें भगवान की महिमा का गुणगान करने का अवसर प्रदान करती है, जिससे हमारे जीवन में संतोष, शांति, और आनंद का अनुभव होता है। इस आरती के माध्यम से हम जीवन की कठिनाइयों को आसानी से सहन कर पाते हैं और जीवन को एक नई दृष्टि से देखने की शक्ति प्राप्त करते हैं।

कर्म और धर्म का पालन

“आरती कुंज बिहारी की” का नियमित रूप से गान करने से व्यक्ति के भीतर कर्म और धर्म का पालन करने की भावना जागृत होती है। भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का स्मरण कर हमें यह एहसास होता है कि जीवन में सही कर्म और धर्म का पालन करना कितना महत्वपूर्ण है। यह आरती हमें सही दिशा में चलने और जीवन के सही मार्ग को अपनाने की प्रेरणा देती है।

कर्म और धर्म का पालन व्यक्ति को जीवन में सफलता और संतोष की ओर ले जाता है। इस आरती के माध्यम से हमें यह सीख मिलती है कि भगवान के प्रति समर्पण और सही कर्म ही जीवन का सच्चा उद्देश्य है। यह हमें जीवन में सही निर्णय लेने और कठिनाइयों का सामना करने में सहायक होती है।


FAQs – Aarti Kunj Bihari Ki PDF (आरती कुंज बिहारी की)

1. कृष्ण का पूरा नाम क्या है?

कृष्ण का पूरा नाम “श्रीकृष्ण” है, जो संस्कृत शब्द “कृष्ण” से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है ‘काला’ या ‘आकर्षक’। भगवान कृष्ण को “वसुदेव-नंदन” भी कहा जाता है क्योंकि वे वसुदेव और देवकी के पुत्र थे। उनके अनेक नाम हैं, जैसे गोविंद, मुरारी, श्यामसुंदर, माधव आदि।

2. श्री कृष्ण जी कैसे दिखते थे?

श्री कृष्ण जी का वर्णन शास्त्रों में अत्यंत सुंदर, गहरे श्यामल वर्ण और मोहक रूप में किया गया है। उनके गले में वनमाला, सिर पर मोर मुकुट, और हाथ में मुरली होती थी। उनकी आँखें कमल के फूल के समान बड़ी और आकर्षक थीं, और उनका मुस्कान सभी का मन मोह लेती थी। वे अपने भक्तों के लिए सदा आनंद और प्रेम के प्रतीक माने जाते हैं।

3. श्री कृष्ण किसका रूप है?

श्री कृष्ण को भगवान विष्णु का पूर्ण अवतार माना जाता है। वे ब्रह्मा, विष्णु, और महेश के त्रिदेवों में से विष्णु के रूप हैं, जो सृष्टि के पालनकर्ता माने जाते हैं। श्री कृष्ण ने धरती पर अवतरित होकर अधर्म का नाश किया और धर्म की स्थापना की।

4. पूजा कृष्ण क्या है?

“पूजा कृष्ण” एक ऐसी उपासना है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है। इसमें भक्त भगवान कृष्ण की मूर्ति या चित्र के समक्ष उनके प्रिय मंत्रों, आरती और भजनों के माध्यम से उन्हें प्रसन्न करते हैं। पूजा में श्रीकृष्ण की प्रसाद, फूल, दीप, धूप आदि अर्पित किए जाते हैं और उनका ध्यान किया जाता है।

5. राधा कृष्ण के कितने पुत्र थे?

श्री कृष्ण और राधा के कोई पुत्र नहीं थे। राधा और कृष्ण का संबंध आध्यात्मिक प्रेम का प्रतीक माना जाता है। हालांकि, श्री कृष्ण के रुक्मिणी सहित अन्य पत्नियों से कई पुत्र थे, जिनमें प्रमुख रूप से प्रद्युम्न, सांब और अनिरुद्ध शामिल हैं।

6. कृष्ण में 108 क्या है?

“कृष्ण में 108” का संदर्भ भगवान श्रीकृष्ण के 108 नामों या उनके दिव्य लीलाओं और स्वरूपों से हो सकता है। 108 का संख्या हिन्दू धर्म में विशेष रूप से पवित्र मानी जाती है और यह भगवान के विभिन्न रूपों और गुणों का प्रतिनिधित्व करती है। श्री कृष्ण के भक्त अक्सर माला में 108 बार उनके नाम का जाप करते हैं, जिसे “जप माला” कहते हैं।

सजा दो घर को गुलशन सा (Saja Do Ghar Ko Gulshan Sa PDF)

सजा दो घर को गुलशन सा (Saja Do Ghar Ko Gulshan Sa) एक अत्यंत लोकप्रिय भजन है जो भगवान के प्रति श्रद्धा, प्रेम और समर्पण को दर्शाता है। यह भजन हमें जीवन में भक्ति, सकारात्मकता और आनंद के महत्व को समझाता है। भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में, भजनों का महत्वपूर्ण स्थान है, और यह विशेष भजन उन आध्यात्मिक अनुभवों और भावनाओं का वर्णन करता है जो भक्तगण अपने इष्टदेव के साथ साझा करते हैं। इस भजन का मूल संदेश है कि जैसे एक बाग में फूल खिलते हैं और वातावरण को सुगंधित करते हैं, वैसे ही हमारे जीवन और घर को भी भगवान की कृपा और आशीर्वाद से सजाया जा सकता है।

इस भजन में घर की तुलना एक गुलशन (बाग) से की गई है, जो प्रतीक है शांति, सुख और समृद्धि का। गुलशन का मतलब केवल भौतिक सुख-सुविधाओं से नहीं है, बल्कि यह आध्यात्मिक और मानसिक शांति की भी बात करता है। जब हम अपने घर को भगवान की भक्ति और उनकी उपासना से सजाते हैं, तो वह घर एक पवित्र स्थान बन जाता है। यह भजन हमें यह समझने का अवसर देता है कि केवल भौतिक वस्त्र और सुंदरता ही नहीं, बल्कि भगवान की उपस्थिति ही हमारे जीवन और घर को सचमुच सुंदर बना सकती है।

भजन का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू है परिवार और समाज के बीच सामंजस्य का सन्देश। परिवार और समाज, दोनों को एक ‘गुलशन’ के रूप में सजाने की प्रेरणा देने वाला यह भजन इस बात पर जोर देता है कि जब हम प्रेम, करुणा और विश्वास के साथ अपने परिवार का निर्माण करते हैं, तब वह एक सुंदर बाग़ जैसा हो जाता है। घर की पवित्रता और उसकी सुख-शांति केवल भौतिक सुखों से नहीं, बल्कि उसके सदस्यों के बीच की आपसी समझ, प्यार और भक्ति से होती है।

इस भजन में यह भी बताया गया है कि भगवान की उपस्थिति से ही जीवन का सही अर्थ प्रकट होता है। जब हम भगवान को अपने घर में आमंत्रित करते हैं, तो वह घर केवल ईंट और पत्थरों का बना ढांचा नहीं रह जाता, बल्कि वह एक ऐसा स्थान बन जाता है जहां जीवन की असली खुशियाँ और आंतरिक संतोष प्रकट होते हैं। भगवान की कृपा से घर का हर कोना रोशनी से भर जाता है और उसमें रहने वाले लोग मानसिक शांति और सुख का अनुभव करते हैं।

“सजा दो घर को गुलशन सा” भजन भक्तों को यह संदेश देता है कि उनके जीवन का हर हिस्सा भगवान के साथ जुड़े रहना चाहिए। यह भजन इस बात पर जोर देता है कि भक्ति, प्रेम और समर्पण के बिना जीवन में सच्ची खुशियाँ प्राप्त नहीं की जा सकतीं। भजन हमें याद दिलाता है कि भगवान की आराधना और उनकी सेवा से ही हमारे जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आ सकता है।

इस भजन का मधुर संगीत और शब्दावली भी लोगों के हृदय में गहरे असर छोड़ते हैं। इसका गायन सुनते ही मन में एक अद्भुत शांति और प्रेम का अनुभव होता है। यह भजन केवल गाने के लिए नहीं, बल्कि हमारे जीवन की दिशा और सोच को बदलने के लिए भी है। जब हम इस भजन के माध्यम से भगवान को अपने जीवन का हिस्सा बनाते हैं, तब हम न केवल अपने घर को, बल्कि अपने दिल को भी गुलशन सा सजा सकते हैं।

इस प्रकार “सजा दो घर को गुलशन सा” भजन हमें याद दिलाता है कि भक्ति और भगवान का साथ ही जीवन में सच्ची समृद्धि और खुशियों का आधार है।


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  • English

|| सजा दो घर को गुलशन सा ||

सजा दो घर को गुलशन सा,
मेरे सरकार आये है,
मेरे सरकार आये है,
लगे कुटिया भी दुल्हन सी,
लगे कुटिया भी दुल्हन सी,
मेरे सरकार आये है,
सजा दो घर को गूलशन सा,
मेरे सरकार आये है।।

तर्ज – जगत के रंग में क्या देखु।

पखारो इनके चरणो को,
बहा कर प्रेम की गंगा,
बहा कर प्रेम की गंगा,
बिछा दो अपनी पलको को,
मेरे सरकार आये है,
सजा दो घर को गूलशन सा,
मेरे सरकार आये है।।

उमड़ आई मेरी आँखे,
देख कर अपने बाबा को,
देख कर अपने बाबा को,
हुई रोशन मेरी गलियां,
मेरे सरकार आये है,
सजा दो घर को गूलशन सा,
मेरे सरकार आये है।।

तुम आकर फिर नहीं जाना,
मेरी इस सुनी दुनिया से,
मेरी इस सुनी दुनिया से,
कहूँ हर दम यही सब से,
मेरे सरकार आये है,
सजा दो घर को गूलशन सा,
मेरे सरकार आये है।।

सजा दो घर को गुलशन सा,
मेरे सरकार आये है,
मेरे सरकार आये है,
लगे कुटिया भी दुल्हन सी,
लगे कुटिया भी दुल्हन सी,
मेरे सरकार आये है,
सजा दो घर को गूलशन सा,
मेरे सरकार आये है।

|| Saja Do Ghar Ko Gulshan Sa ||

Saja Do Ghar Ko Gulshan Sa,
Awadh Mein Ram Aaye Hain,
Awadh Me Ram Aaye Hai,
Mere Sarkar Aaye Hain,
Lage Kutiya Bhi Dulhan Si,
Awadh Me Ram Aaye Hain,
Saja Do Ghar Ko Gulshan Sa,
Awadh Me Ram Aayen Hain ।

Pakharon Inke Charnon Ko,
Baha Kar Prem Ki Ganga,
Bichha Do Apni Palkon Ko,
Awadh Me Ram Aaye Hain,
Saja Do Ghar Ko Gulshan Sa,
Awadh Me Ram Aaye Hain ।

Teri Aahat Se Hai Wakif,
Nahin Chehre Ki Hai Darkar,
Bina Dekhen Hi Kah Denge,
Lo Aa Gaye Hai Mere Sarkar,
Lo Aa Gaye Hai Mere Sarkar,
Duaon Ka Hua Hai Asar,
Duaon Ka Hua Hai Asar,
Awadh Me Ram Aaye Hain,
Saja Do Ghar Ko Gulshan Sa,
Awadh Me Ram Aaye Hain ।

Saja Do Ghar Ko Gulshan Sa,
Awadh Mein Ram Aaye Hain,
Awadh Me Ram Aaye Hai,
Mere Sarkar Aaye Hain,
Lage Kutiya Bhi Dulhan Si,
Awadh Me Ram Aaye Hain,
Saja Do Ghar Ko Gulshan Sa,
Awadh Me Ram Aayen Hain ।



“सजा दो घर को गुलशन सा” भजन न केवल भक्तिमय संगीत का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, बल्कि इसके गहरे भावनात्मक, आध्यात्मिक, और सांस्कृतिक लाभ भी हैं। यह भजन व्यक्तिगत जीवन में भक्ति, शांति, और सामंजस्य लाने के साथ-साथ परिवार और समाज में प्रेम, सौहार्द, और सकारात्मक ऊर्जा का प्रसार करता है। भारतीय संस्कृति में भजनों का गहरा महत्त्व है और इस भजन के माध्यम से जीवन को निखारने और उसे ईश्वर की कृपा से सुशोभित करने के अनेक लाभ सामने आते हैं।

1. आध्यात्मिक शांति और संतुलन

भक्ति में सबसे महत्वपूर्ण बात है आत्मिक शांति और संतुलन। जब कोई व्यक्ति “सजा दो घर को गुलशन सा” भजन गाता या सुनता है, तो उसके मन में एक अद्भुत शांति और संतोष का अनुभव होता है। इस भजन के शब्द भगवान की भक्ति में समर्पण का संदेश देते हैं, जो व्यक्ति के अंदर की अशांति और तनाव को कम करता है। जीवन के संघर्षों और तनावपूर्ण स्थितियों से बचने के लिए भगवान की शरण में जाना एक आत्मिक यात्रा है, और यह भजन उस यात्रा को सरल और सुगम बनाता है।

भगवान की उपासना से हम अपने मन और आत्मा को सकारात्मक ऊर्जा से भरते हैं। “सजा दो घर को गुलशन सा” में यही भावना प्रकट होती है कि भगवान की कृपा से हमारा जीवन और घर दोनों ही सुन्दर और खुशहाल बन सकते हैं। यह भजन व्यक्ति के भीतर आंतरिक संतुलन लाता है और उसकी आत्मिक उन्नति में सहायक होता है।

2. परिवार और समाज में सौहार्द

यह भजन न केवल व्यक्तिगत जीवन में बल्कि परिवार और समाज में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसमें परिवार को एक गुलशन के रूप में सजाने की बात की जाती है, जिसका अर्थ है कि परिवार में प्रेम, करुणा, और सामंजस्य होना चाहिए। जब कोई परिवार ईश्वर के प्रति समर्पित होता है, तो वह एक सुदृढ़ और सकारात्मक वातावरण का निर्माण करता है, जहाँ हर सदस्य एक दूसरे की भलाई के लिए सोचता है।

इस भजन का लाभ यह है कि यह परिवार के बीच संबंधों को मजबूत करने में मदद करता है। जब परिवार के सभी सदस्य मिलकर इस भजन का पाठ या गायन करते हैं, तो उनके बीच एकता, सहयोग, और प्रेम की भावना प्रकट होती है। यह भजन परिवार को एकजुट करता है और उन्हें एक साझा उद्देश्य की ओर प्रेरित करता है – ईश्वर की भक्ति और सेवा।

सामाजिक दृष्टिकोण से भी यह भजन अत्यंत लाभकारी है। जब समाज के लोग एक साथ मिलकर भक्ति करते हैं, तो उनमें आपसी समझ और सामंजस्य की भावना बढ़ती है। यह भजन समाज में प्रेम और सौहार्द का संदेश फैलाता है, जिससे समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

3. मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव

आधुनिक जीवन की व्यस्तता और तनावपूर्ण परिस्थितियों में मानसिक स्वास्थ्य का बिगड़ना एक आम समस्या बन गई है। “सजा दो घर को गुलशन सा” भजन मानसिक शांति और आराम प्रदान करता है। इसके गायन और सुनने से व्यक्ति का मन शांत होता है और वह अपनी चिंताओं और तनावों से मुक्त होता है।

भजन सुनने से मन में एकाग्रता और शांति आती है, जो ध्यान और मानसिक स्वास्थ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह भजन ध्यान साधना के समय सुना या गाया जा सकता है, जिससे व्यक्ति के मन को स्थिरता मिलती है। भजन के शब्द और उसकी धुन में ऐसा आकर्षण होता है जो व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति की ओर प्रेरित करता है, और उसकी मानसिक शांति को बनाए रखने में सहायक होता है।

4. भक्ति और धार्मिक परंपराओं का पालन

यह भजन हमें भक्ति और धार्मिक परंपराओं की ओर प्रेरित करता है। भारतीय समाज में धर्म और भक्ति का अत्यंत महत्त्व है और यह भजन उन धार्मिक मान्यताओं को पुनर्जीवित करता है जो हमारे जीवन को सही दिशा में ले जाती हैं। जब हम “सजा दो घर को गुलशन सा” का गायन करते हैं, तो हम भगवान के प्रति अपनी श्रद्धा और समर्पण को व्यक्त करते हैं।

यह भजन धार्मिक परंपराओं का अनुसरण करने और उन्हें अपने जीवन में आत्मसात करने की प्रेरणा देता है। इसके माध्यम से व्यक्ति अपने धर्म और संस्कृति से जुड़ता है और भगवान की भक्ति में लीन होकर अपने जीवन के लक्ष्य को समझने में सक्षम होता है।

5. सकारात्मक ऊर्जा और वातावरण का निर्माण

“सजा दो घर को गुलशन सा” भजन न केवल व्यक्तिगत जीवन में बल्कि घर और वातावरण में भी सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। भजन गाने और सुनने से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जो घर के हर कोने को शुद्ध और पवित्र बनाता है। यह भजन इस बात पर जोर देता है कि घर को भगवान की भक्ति और सेवा से सजाना चाहिए, जिससे उसमें शांति, सुख, और समृद्धि का वास हो।

घर में भजन गाने से न केवल घर की ऊर्जा सकारात्मक होती है, बल्कि घर में रहने वाले लोगों के मन और शरीर पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह भजन घर के वातावरण को शांत और पवित्र बनाता है, जिससे परिवार के सभी सदस्य खुशहाल और मानसिक रूप से स्वस्थ रहते हैं।

6. सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का संरक्षण

यह भजन हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारतीय समाज में भजनों का महत्वपूर्ण स्थान है और यह भजन विशेष रूप से धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों को संजोने और आगे बढ़ाने में मदद करता है।

जब हम “सजा दो घर को गुलशन सा” का गायन करते हैं या इसे सुनते हैं, तो हम अपनी धार्मिक जड़ों से जुड़ते हैं और अपनी सांस्कृतिक धरोहर का सम्मान करते हैं। यह भजन आने वाली पीढ़ियों को भी धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों का पालन करने की प्रेरणा देता है।

7. आंतरिक रूपांतरण और आत्म-ज्ञान

भजन का एक अन्य महत्वपूर्ण लाभ यह है कि यह व्यक्ति के भीतर एक आंतरिक रूपांतरण की प्रक्रिया को शुरू करता है। जब व्यक्ति भगवान की भक्ति में लीन होता है, तो वह अपने भीतर की बुराइयों और नकारात्मक भावनाओं से मुक्त होने लगता है।

“सजा दो घर को गुलशन सा” भजन व्यक्ति को अपने जीवन के उद्देश्य को समझने और उसे पूरा करने के लिए प्रेरित करता है। यह भजन आत्म-ज्ञान की ओर ले जाने वाला एक मार्गदर्शक है, जो व्यक्ति को उसकी आंतरिक शक्ति और भगवान के प्रति समर्पण की भावना को जाग्रत करता है। जब व्यक्ति इस भजन को गाता या सुनता है, तो वह अपने भीतर एक गहरा परिवर्तन महसूस करता है, जो उसे आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है।

8. संगीत और भक्ति का संगम

इस भजन में संगीत और भक्ति का अद्भुत संगम है। इसके मधुर स्वर और भक्ति-भावना से भरे शब्द व्यक्ति के मन को गहरे तक छूते हैं। संगीत का सकारात्मक प्रभाव व्यक्ति के मन, शरीर और आत्मा पर पड़ता है और यह भजन उन सभी तत्वों को एक साथ लाकर एक गहरा भक्ति अनुभव प्रदान करता है।

संगीत न केवल मनोरंजन का साधन है, बल्कि यह भक्ति का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी है। “सजा दो घर को गुलशन सा” भजन संगीत और भक्ति का एक ऐसा संगम है, जो व्यक्ति को ईश्वर के करीब लाता है और उसे मानसिक शांति और आनंद का अनुभव कराता है।


श्री लक्ष्मी चालीसा (Shri Lakshmi Chalisa PDF)

श्री लक्ष्मी चालीसा (Shri Lakshmi Chalisa Pdf) माँ लक्ष्मी, जो धन, ऐश्वर्य, और समृद्धि की देवी हैं, हिन्दू धर्म में विशेष पूजनीय हैं। वे भगवान विष्णु की अर्धांगिनी और संसार की पालनकर्ता मानी जाती हैं। श्री लक्ष्मी चालीसा में माँ लक्ष्मी के दिव्य रूप, उनकी महिमा, और उनकी कृपा से मिलने वाले आशीर्वादों का वर्णन किया गया है।

माँ लक्ष्मी की चालीसा का पाठ करने से जीवन में धन, वैभव, और समृद्धि की प्राप्ति होती है। इससे मानसिक शांति, आत्मविश्वास, और सौभाग्य की भी वृद्धि होती है। आइए, हम सभी श्रद्धा और भक्ति के साथ माँ लक्ष्मी की चालीसा का पाठ करें और उनकी असीम कृपा प्राप्त करें।



  • हिंदी / संस्कृत
  • English

|| श्री लक्ष्मी चालीसा ||

॥ दोहा॥
मातु लक्ष्मी करि कृपा,
करो हृदय में वास ।
मनोकामना सिद्घ करि,
परुवहु मेरी आस ॥

॥ सोरठा॥
यही मोर अरदास,
हाथ जोड़ विनती करुं ।
सब विधि करौ सुवास,
जय जननि जगदंबिका ॥

॥ चौपाई ॥
सिन्धु सुता मैं सुमिरौ तोही ।
ज्ञान बुद्घि विघा दो मोही ॥

तुम समान नहिं कोई उपकारी ।
सब विधि पुरवहु आस हमारी ॥

जय जय जगत जननि जगदम्बा ।
सबकी तुम ही हो अवलम्बा ॥

तुम ही हो सब घट घट वासी ।
विनती यही हमारी खासी ॥

जगजननी जय सिन्धु कुमारी ।
दीनन की तुम हो हितकारी ॥

विनवौं नित्य तुमहिं महारानी ।
कृपा करौ जग जननि भवानी ॥

केहि विधि स्तुति करौं तिहारी ।
सुधि लीजै अपराध बिसारी ॥

कृपा दृष्टि चितववो मम ओरी ।
जगजननी विनती सुन मोरी ॥

ज्ञान बुद्घि जय सुख की दाता ।
संकट हरो हमारी माता ॥

क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो ।
चौदह रत्न सिन्धु में पायो ॥ 10॥

चौदह रत्न में तुम सुखरासी ।
सेवा कियो प्रभु बनि दासी ॥

जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा ।
रुप बदल तहं सेवा कीन्हा ॥

स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा ।
लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा ॥

तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं ।
सेवा कियो हृदय पुलकाहीं ॥

अपनाया तोहि अन्तर्यामी ।
विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी ॥

तुम सम प्रबल शक्ति नहीं आनी ।
कहं लौ महिमा कहौं बखानी ॥

मन क्रम वचन करै सेवकाई ।
मन इच्छित वांछित फल पाई ॥

तजि छल कपट और चतुराई ।
पूजहिं विविध भांति मनलाई ॥

और हाल मैं कहौं बुझाई ।
जो यह पाठ करै मन लाई ॥

ताको कोई कष्ट नोई ।
मन इच्छित पावै फल सोई ॥ 20॥

त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि ।
त्रिविध ताप भव बंधन हारिणी ॥

जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै ।
ध्यान लगाकर सुनै सुनावै ॥

ताकौ कोई न रोग सतावै ।
पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै ॥

पुत्रहीन अरु संपति हीना ।
अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना ॥

विप्र बोलाय कै पाठ करावै ।
शंका दिल में कभी न लावै ॥

पाठ करावै दिन चालीसा ।
ता पर कृपा करैं गौरीसा ॥

सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै ।
कमी नहीं काहू की आवै ॥

बारह मास करै जो पूजा ।
तेहि सम धन्य और नहिं दूजा ॥

प्रतिदिन पाठ करै मन माही ।
उन सम कोइ जग में कहुं नाहीं ॥

बहुविधि क्या मैं करौं बड़ाई ।
लेय परीक्षा ध्यान लगाई ॥ 30॥

करि विश्वास करै व्रत नेमा ।
होय सिद्घ उपजै उर प्रेमा ॥

जय जय जय लक्ष्मी भवानी ।
सब में व्यापित हो गुण खानी ॥

तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं ।
तुम सम कोउ दयालु कहुं नाहिं ॥

मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै ।
संकट काटि भक्ति मोहि दीजै ॥

भूल चूक करि क्षमा हमारी ।
दर्शन दजै दशा निहारी ॥

बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी ।
तुमहि अछत दुःख सहते भारी ॥

नहिं मोहिं ज्ञान बुद्घि है तन में ।
सब जानत हो अपने मन में ॥

रुप चतुर्भुज करके धारण ।
कष्ट मोर अब करहु निवारण ॥

केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई ।
ज्ञान बुद्घि मोहि नहिं अधिकाई ॥40॥

॥ दोहा॥
त्राहि त्राहि दुख हारिणी,
हरो वेगि सब त्रास ।
जयति जयति जय लक्ष्मी,
करो शत्रु को नाश ॥

रामदास धरि ध्यान नित,
विनय करत कर जोर ।
मातु लक्ष्मी दास पर,
करहु दया की कोर ॥

|| Shri Lakshmi Chalisa PDF ||

॥ Doha ॥
Maatu lakshmee kari krpa,
Karo dil mein vaas ॥
Mann siddh karee,
Puruvahu meree aas ॥

॥ Soratha ॥
Yahee mor aradaas,
Hast jod vinatee karun ॥
Sab vidhi karau suvaas,
Jay janani jagadambika ॥

॥ Chaupaee ॥
Sindhu suta main sumirau tohee ॥
Gyaan buddhi vigha do mohi ॥

Tum samaan nahin koee upakaaree ॥
Sab vidhi puravahu aas hamaaree ॥

Jay jay jagat janani jagadamba ॥
Prakrti tum hee ho avalamba ॥

Tum hee ho sab ghatate ghatate vaasee ॥
Vinatee yahee hamaaree vebasait ॥

Jagajananee jay sindhu kumaaree ॥
Deen kee tum ho hitakaaree ॥

Vinavaun nity tumahin mahaaraanee ॥
Kripa karau jag janani bhavaanee ॥

Kehi vidhi stuti karaun tihaari ॥
Sudhi leejai aparaadh bisaari ॥

kripaya drishti chitavvo mam ori ॥
Jagajananee vinatee sun moree ॥

Gyaan buddhi jay sukh ke daata ॥
Sankat haro hamaaree maata ॥

Ksheerasindhu jab vishnu mathaayo ॥
Chaudah ratn sindhu mein paayo ॥10 ॥

Chaudah ratnon mein tum sukharaasee ॥
Seva kiyo prabhu bani daasee ॥

Jab-jab janm jahaan prabhu leenha ॥
Roop badal tahan seva keenha ॥

Svayan vishnu jab nar tanu dhaara ॥
Leenheu avadhapuree avataara ॥

Tab tum pragat jenapur maaheen ॥
Seva kiyo hrday pulakahin ॥

Bhinn tohi antaryaamee ॥
Vishv vidit tribhuvan ke svaamee ॥

Tum sam prabal shakti nahin aanee ॥
Kahan lau mahima kahaun bakhaanee ॥

Mann kram vachan karai sevakaee ॥
Mann maanga poora phal paaya ॥

Taji chhal kapat aur chaturaee ॥
Poojahin vividh bhaeechaare manalaee ॥

Aur haal main kahaun boobaee ॥
Jo yah paath karai man lai ॥

Taako koee kasht noee ॥
Man chaahe paavai phal soee ॥20 ॥

Traahi traahi jay duhkh nivaarini ॥
Trividh taap bhav bandhan haarinee ॥

Jo chaaleesa padhaee paavai ॥
Dhyaan dhyaan sunai sunaavai ॥

Taakau koee na rog sataavai ॥
Putra aadi dhan sampatti paavai ॥

Putraheen aru sampati heena ॥
Andh badhir kodhi ati deena ॥

Vipr bolaay kai paath karaavai ॥
Sachcha dil mein kabhee na laavai ॥

Paath karaavai din chaaleesa ॥
Ta par krpa karain gaureesa ॥

Sukh adhikaar bahut see paavai ॥
Kamee nahin kaahoo kee aavai ॥

Baarah maas karai jo pooja ॥
Tehi sam dhany aur nahin dooja ॥

Nity paath karai man maahee ॥
Un sam koee jag mein kahoon nahin ॥

Bahuvidhi kya main karaun badaee ॥
Ley pareeksha dhyaan do ॥30 ॥

Kari vishvaas karai vrat nema ॥
Hoy siddh upajai ur prema ॥

Jay jay jay lakshmee bhavaanee ॥
Sab mein vyaapt ho gun khaanee ॥

Tummharo tej prataap jag maaheen ॥
Tum sam kooo priy kahun nahin ॥

Mohi anaath kee sudhi ab leejai ॥
Sankat kati bhakti mohi deejai ॥

Bhool chook karee kshama hamaaree ॥
Darshan dajai dasha nihaaree ॥

Bin darshan vyaakul adhikaaree ॥
Tumahi achat duhkh sahate bhaaree ॥

Nahin mohin gyaan buddhi hai tan mein ॥
Sab jaanat ho apane man mein ॥

Roop chaturbhuj dhaaran dhaaran ॥
Kasht mor ab karahu seva ॥

Kehi prakaar main karaun badaee ॥
Gyaan buddhi mohi nahin moraee ॥

॥ Doha ॥
Traahi traahi duhkh haarinee,
Haro vegi sab traas ॥
Jayati jayati jay lakshmee,
Karo shatru ko naash ॥

Raamadaas dhari dhyaan nit,
Vin karat kar jor ॥
Maatu lakshmee daas par,
Karahu daya kee kor ॥


लक्ष्मी चालीसा एक भक्तिपूर्ण स्तुति है जो धन, वैभव, और समृद्धि की देवी माँ लक्ष्मी की आराधना के लिए गाई जाती है। यह चालीसा 40 छंदों का संग्रह है, जिसमें देवी लक्ष्मी के विभिन्न स्वरूपों, गुणों, और महिमा का वर्णन किया गया है। भारतीय सनातन धर्म में लक्ष्मी को धन, ऐश्वर्य, और सुख-समृद्धि की देवी माना जाता है। माना जाता है कि लक्ष्मी चालीसा के नियमित पाठ से व्यक्ति के जीवन में आर्थिक समस्याओं का निवारण होता है, उसके जीवन में सुख, समृद्धि और वैभव का आगमन होता है।

यह चालीसा न केवल धन की देवी लक्ष्मी की महिमा का बखान करती है, बल्कि भक्तों को मानसिक शांति, सकारात्मकता, और आत्मिक बल भी प्रदान करती है। चालीसा के प्रत्येक छंद में देवी लक्ष्मी के गुणों का गुणगान किया गया है, जिससे पाठक के मन में श्रद्धा और भक्ति की भावना जाग्रत होती है। लक्ष्मी चालीसा का पाठ विशेष रूप से शुक्रवार और दीवाली जैसे विशेष अवसरों पर किया जाता है, जब देवी लक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।

इस चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के घर-परिवार में सुख-समृद्धि और शांति का वास होता है, और दरिद्रता, संकट और अशांति का नाश होता है। इसलिए, लक्ष्मी चालीसा को देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने और जीवन में समृद्धि लाने के लिए अत्यंत प्रभावी और महत्वपूर्ण माना जाता है।

माँ लक्ष्मी चालीसा की संरचना एक गेय स्तोत्र के रूप में की गई है, जिसमें कुल 40 छंद होते हैं। यह छंद देवी लक्ष्मी के विभिन्न स्वरूपों, महिमा, और उनकी आराधना के लाभों का विस्तृत वर्णन करते हैं। लक्ष्मी चालीसा का रचना-शैली अत्यंत सरल और प्रभावी है, ताकि इसे आम लोग भी आसानी से पढ़ और समझ सकें। इसके छंदों की लय और छंदबद्धता इसे गेय और स्मरणीय बनाते हैं, जिससे भक्त इसे आसानी से याद कर सकते हैं और नियमित रूप से इसका पाठ कर सकते हैं।

माँ लक्ष्मी चालीसा का रचनाकार का नाम स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं है, लेकिन यह माना जाता है कि इसकी रचना किसी महान भक्त या संत द्वारा की गई थी, जो माँ लक्ष्मी के अनन्य उपासक थे। उन्होंने अपने अनुभवों और देवी के प्रति असीम श्रद्धा को व्यक्त करने के लिए इस चालीसा की रचना की होगी। चालीसा का मूल उद्देश्य भक्तों को लक्ष्मी की महिमा का बखान करना और उनके प्रति अपार श्रद्धा उत्पन्न करना है।

इस स्तोत्र के माध्यम से माँ लक्ष्मी के भक्त अपने मन, वचन, और कर्म से देवी की आराधना करते हैं और उनकी कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। इसकी संरचना इतनी सुलभ और प्रभावशाली है कि इसे हर उम्र के लोग पढ़ सकते हैं, चाहे वे किसी भी पृष्ठभूमि से हों।

लक्ष्मी चालीसा के पूर्ण पाठ का धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से अत्यधिक महत्त्व है। इसका नियमित और सम्पूर्ण पाठ व्यक्ति के जीवन में धन-धान्य, सुख-समृद्धि, और मानसिक शांति की प्राप्ति में सहायक होता है। ऐसा माना जाता है कि लक्ष्मी चालीसा के पाठ से देवी लक्ष्मी अत्यंत प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों के घर में हमेशा वास करती हैं। यह चालीसा न केवल आर्थिक समृद्धि का प्रतीक है, बल्कि जीवन में सौभाग्य और समृद्धि का द्वार भी खोलती है। चालीसा के प्रत्येक छंद में देवी लक्ष्मी के विभिन्न रूपों और उनके द्वारा प्रदत्त आशीर्वादों का वर्णन है, जो व्यक्ति के मनोबल को बढ़ाता है और उसमें सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।

लक्ष्मी चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति की दरिद्रता और आर्थिक संकट दूर होते हैं, और उसे मानसिक शांति और सुकून की प्राप्ति होती है। साथ ही, यह चालीसा भक्तों के मन में दृढ़ता, श्रद्धा, और विश्वास की भावना को प्रबल करती है, जो उनके जीवन को सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ाती है। इस प्रकार, लक्ष्मी चालीसा के सम्पूर्ण पाठ का नियमित रूप से पालन करने से व्यक्ति को न केवल देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में उन्नति और प्रगति भी होती है।

लक्ष्मी चालीसा का पाठ करने के लिए कुछ विशेष नियमों और विधियों का पालन करना महत्वपूर्ण है, ताकि इसका अधिकतम लाभ प्राप्त किया जा सके। सबसे पहले, पाठ से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए और एक शांत तथा पवित्र स्थान का चयन करना चाहिए जहाँ शांति से पाठ किया जा सके। एक दीपक जलाकर माँ लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र के सामने बैठना चाहिए और फूल, अगरबत्ती, और प्रसाद के साथ देवी की पूजा करनी चाहिए। पाठ को शुरू करने से पहले, देवी लक्ष्मी का ध्यान करते हुए उन्हें प्रणाम करें और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करें।

लक्ष्मी चालीसा का पाठ एकाग्रचित्त होकर और सही उच्चारण के साथ करना चाहिए। शुक्रवार का दिन, विशेष रूप से दीवाली या पूर्णिमा के दिन, लक्ष्मी चालीसा के पाठ के लिए सबसे उपयुक्त माने जाते हैं, लेकिन इसे प्रतिदिन भी पढ़ा जा सकता है। पाठ के दौरान, मन में पवित्रता और भक्ति की भावना होनी चाहिए। पाठ के बाद देवी लक्ष्मी की आरती करें और प्रसाद वितरण करें। ध्यान रहे कि पाठ को कभी भी जल्दीबाजी में नहीं करना चाहिए; इसे श्रद्धा और समर्पण के साथ करना चाहिए, ताकि माँ लक्ष्मी की कृपा आप पर बनी रहे।

लक्ष्मी चालीसा के नियमित पाठ से व्यक्ति को अनेक लाभ प्राप्त होते हैं, जिनमें धन-सम्पत्ति की प्राप्ति, आर्थिक संकटों से मुक्ति, और समृद्धि की वृद्धि प्रमुख हैं। यह चालीसा न केवल भौतिक सुख-समृद्धि का प्रतीक है, बल्कि यह मानसिक शांति और आत्मिक संतुष्टि भी प्रदान करती है। लक्ष्मी चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के मन में सकारात्मकता का संचार होता है और उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। देवी लक्ष्मी की कृपा से व्यक्ति के जीवन में दरिद्रता, संकट, और नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और उसके स्थान पर सुख, शांति, और समृद्धि का वास होता है।

यह चालीसा विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभदायक होती है जो अपने व्यवसाय, नौकरी, या अन्य आर्थिक मामलों में संघर्ष कर रहे होते हैं। इसके अलावा, लक्ष्मी चालीसा का पाठ करने से पारिवारिक संबंधों में भी सुधार होता है, क्योंकि यह घर के वातावरण को पवित्र और सकारात्मक बनाता है। जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता और उन्नति प्राप्त करने के लिए लक्ष्मी चालीसा का पाठ अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावी माना जाता है। इसके नियमित पाठ से व्यक्ति को अदृश्य शक्तियों का संरक्षण प्राप्त होता है और उसके जीवन में हर प्रकार की विपत्ति से मुक्ति मिलती है।



श्री लक्ष्मी चालीसा के लाभ

श्री लक्ष्मी चालीसा (Shri Lakshmi Chalisa) का पाठ हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह चालीसा माँ लक्ष्मी को समर्पित है, जो धन, समृद्धि, और वैभव की देवी मानी जाती हैं। इस चालीसा का नियमित पाठ करने से अनेक लाभ प्राप्त होते हैं। यहाँ हम श्री लक्ष्मी चालीसा के लाभों को विस्तार से वर्णन कर रहे हैं:

1. धन और समृद्धि की प्राप्ति

श्री लक्ष्मी चालीसा का पाठ मुख्य रूप से धन और समृद्धि की प्राप्ति के लिए किया जाता है। मान्यता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से इस चालीसा का पाठ करता है, उसे माँ लक्ष्मी की कृपा से आर्थिक समस्याओं से मुक्ति मिलती है और वह धन-धान्य से संपन्न हो जाता है।

2. व्यवसाय और करियर में उन्नति

जो लोग व्यवसाय या करियर में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं, उनके लिए श्री लक्ष्मी चालीसा का पाठ अत्यंत लाभकारी होता है। यह चालीसा व्यक्ति के कार्यक्षेत्र में आने वाली बाधाओं को दूर करती है और उसे सफलता की ओर अग्रसर करती है।

3. कर्ज और ऋण से मुक्ति

श्री लक्ष्मी चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति को कर्ज और ऋण से मुक्ति मिलती है। यह चालीसा आर्थिक संकटों को दूर कर व्यक्ति को वित्तीय स्थिरता प्रदान करती है।

4. सुख-शांति की प्राप्ति

माँ लक्ष्मी का आशीर्वाद केवल धन और समृद्धि तक ही सीमित नहीं है। श्री लक्ष्मी चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में सुख-शांति और खुशहाली भी आती है। यह चालीसा व्यक्ति के मन और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।

5. पारिवारिक सद्भाव और सौहार्द

श्री लक्ष्मी चालीसा का पाठ पारिवारिक संबंधों को भी सुदृढ़ करता है। इसके नियमित पाठ से परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम और सद्भाव बढ़ता है और घर में सुख-शांति बनी रहती है।

6. स्वास्थ्य लाभ

श्री लक्ष्मी चालीसा के पाठ से व्यक्ति के स्वास्थ्य में भी सुधार होता है। यह चालीसा मानसिक तनाव को कम करती है और व्यक्ति को मानसिक शांति प्रदान करती है, जिससे उसका शारीरिक स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है।

7. सकारात्मक ऊर्जा और आत्मविश्वास की वृद्धि

श्री लक्ष्मी चालीसा का नियमित पाठ व्यक्ति के आत्मविश्वास में वृद्धि करता है और उसे जीवन की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति प्रदान करता है। यह चालीसा व्यक्ति के चारों ओर सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण करती है, जिससे वह हर कार्य में सफलता प्राप्त करता है।

8. वास्तु दोष का निवारण

श्री लक्ष्मी चालीसा का पाठ घर के वास्तु दोष को भी दूर करता है। इसके पाठ से घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है और वास्तु दोषों के कारण उत्पन्न होने वाली समस्याएं समाप्त हो जाती हैं।

9. धार्मिक और आध्यात्मिक विकास

श्री लक्ष्मी चालीसा का पाठ व्यक्ति के धार्मिक और आध्यात्मिक विकास में भी सहायक होता है। इसके नियमित पाठ से व्यक्ति का आत्मिक बल बढ़ता है और वह आध्यात्मिक शांति की प्राप्ति करता है।

10. कर्म और भाग्य में सुधार

श्री लक्ष्मी चालीसा का पाठ व्यक्ति के कर्म और भाग्य को भी सुधारता है। यह चालीसा व्यक्ति के पिछले बुरे कर्मों का निवारण करती है और उसे अच्छे कर्मों की ओर प्रेरित करती है, जिससे उसका भाग्य भी सुधरता है।

11. बाधाओं और संकटों से मुक्ति

श्री लक्ष्मी चालीसा का नियमित पाठ व्यक्ति के जीवन में आने वाली बाधाओं और संकटों को दूर करता है। यह चालीसा माँ लक्ष्मी की कृपा से व्यक्ति को हर प्रकार की विपत्ति और संकट से बचाती है।

12. मनोबल और आत्मशक्ति की वृद्धि

श्री लक्ष्मी चालीसा का पाठ व्यक्ति के मनोबल और आत्मशक्ति में वृद्धि करता है। यह चालीसा व्यक्ति को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाती है, जिससे वह हर प्रकार की चुनौती का सामना कर सके।

13. विद्यार्थियों के लिए लाभकारी

विद्यार्थियों के लिए भी श्री लक्ष्मी चालीसा का पाठ अत्यंत लाभकारी होता है। यह चालीसा उनकी बुद्धि और ज्ञान में वृद्धि करती है और उन्हें अध्ययन में सफलता प्राप्त करने में मदद करती है।

14. माँ लक्ष्मी की कृपा प्राप्ति

सबसे महत्वपूर्ण लाभ यह है कि श्री लक्ष्मी चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को माँ लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। माँ लक्ष्मी की कृपा से व्यक्ति का जीवन सुखमय और समृद्ध होता है।

श्री लक्ष्मी चालीसा का पाठ एक सरल और प्रभावशाली उपाय है, जिसे कोई भी व्यक्ति आसानी से कर सकता है। इसका पाठ नियमित रूप से सुबह या शाम के समय करना चाहिए। चालीसा का पाठ करने से पहले व्यक्ति को स्वच्छ और शांत वातावरण में बैठना चाहिए और माँ लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र के समक्ष दीप जलाकर इस चालीसा का पाठ करना चाहिए। पाठ के दौरान मन को एकाग्र रखना और माँ लक्ष्मी के प्रति पूर्ण श्रद्धा और भक्ति भाव रखना अत्यंत आवश्यक है।

श्री लक्ष्मी चालीसा का पाठ केवल आर्थिक लाभों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन में सुख-शांति और समृद्धि लाने में सहायक है। यह चालीसा न केवल भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति में मदद करती है, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति और आत्मिक शांति की प्राप्ति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अतः श्री लक्ष्मी चालीसा का नियमित पाठ हर व्यक्ति के जीवन में अवश्य करना चाहिए।


क्या लक्ष्मी चालीसा का पाठ हर कोई कर सकता है?

हाँ, लक्ष्मी चालीसा का पाठ हर कोई कर सकता है। यह सभी के लिए खुला है, चाहे वे किसी भी उम्र, लिंग, या पृष्ठभूमि के हों। इसे पढ़ने के लिए केवल श्रद्धा और विश्वास आवश्यक है।

लक्ष्मी चालीसा का पाठ कितनी बार करना चाहिए?

लक्ष्मी चालीसा का पाठ एक बार, तीन बार, या सात बार किया जा सकता है। पाठ की संख्या भक्त की श्रद्धा और उपलब्ध समय पर निर्भर करती है। नियमित रूप से कम से कम एक बार पाठ करने से भी देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।

क्या लक्ष्मी चालीसा का पाठ रात में किया जा सकता है?

हाँ, लक्ष्मी चालीसा का पाठ दिन या रात के किसी भी समय किया जा सकता है, जब भक्त का मन शांत और एकाग्र हो। हालांकि, इसे सुबह या शाम के समय करना अधिक फलदायी माना जाता है, क्योंकि ये समय ध्यान और पूजा के लिए शुभ होते हैं।

क्या लक्ष्मी चालीसा का पाठ करने के लिए किसी विशेष भाषा की आवश्यकता होती है?

लक्ष्मी चालीसा मूल रूप से हिंदी में उपलब्ध है, लेकिन भक्त अपनी समझ के अनुसार किसी भी भाषा में इसका पाठ कर सकते हैं। भाषा की बजाय, श्रद्धा और भक्ति का भाव अधिक महत्वपूर्ण होता है।

क्या लक्ष्मी चालीसा का पाठ करने से परिवार में शांति आती है?

हाँ, लक्ष्मी चालीसा का पाठ करने से न केवल आर्थिक समृद्धि मिलती है, बल्कि घर में शांति, सुख, और सामंजस्य भी बढ़ता है। देवी लक्ष्मी की कृपा से परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम और आपसी समझ बढ़ती है।

श्री कृष्णाष्टकम् PDF – भजे व्रजैक Krishnashtakam – Bhaje Vrajaika Mandanam 2024-25

श्री कृष्णाष्टकम् (Krishnashtakam – Bhaje Vrajaik Maṇḍanam) एक ऐसा पावन स्तोत्र है जो भगवान श्रीकृष्ण की महिमा और उनकी लीलाओं का वर्णन करता है। यह स्तोत्र आठ श्लोकों का संग्रह है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण के विभिन्न रूपों, गुणों और उनके भक्तों के प्रति उनकी करुणा का चित्रण किया गया है। इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति को मानसिक शांति, भक्ति की वृद्धि और भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है।

श्री कृष्णाष्टकम् का आरंभ भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की स्तुति से होता है। इसमें व्रज के बालकों के साथ उनकी क्रीड़ाओं का वर्णन है। उनके मुख की मधुर मुस्कान, गोपियों के प्रति उनकी स्नेहपूर्ण दृष्टि, और उनकी बांसुरी की धुन का सजीव चित्रण किया गया है। यह स्तोत्र भगवान के उन सुंदर क्षणों को याद दिलाता है जब वे अपने बाल सखाओं के साथ यमुना के तट पर खेलते थे और गोपियों के मन को मोह लेते थे।

भगवान श्रीकृष्ण की दिव्यता का वर्णन करते हुए, यह स्तोत्र उनके अद्भुत पराक्रम और शौर्य का भी वर्णन करता है। कंस के अत्याचार से पृथ्वी को मुक्त कराने वाले भगवान के अद्भुत कारनामों को इसमें उकेरा गया है। उनके माखन चोरी की लीला, कालिया नाग के फन पर नृत्य, और गोवर्धन पर्वत को उठाने की घटनाएं सभी भक्तों के हृदय में उत्साह और श्रद्धा का संचार करती हैं।

श्री कृष्णाष्टकम् में भगवान श्रीकृष्ण की कृपा और दया का भी उल्लेख है। वे अपने भक्तों के कष्टों को दूर करने वाले और उन्हें संजीवनी प्रदान करने वाले हैं। उनके चरणों में समर्पण करने वाले भक्तों को वे सदैव अभय प्रदान करते हैं। यह स्तोत्र भगवान की करुणामयी दृष्टि और उनकी अनंत दया का स्मरण कराता है।

इस स्तोत्र का पाठ करने से मनुष्य को श्रीकृष्ण के प्रति अपनी भक्ति को गहराई मिलती है। यह उनके मन, वचन और कर्म को शुद्ध करता है और उन्हें श्रीकृष्ण की कृपा का पात्र बनाता है। श्री कृष्णाष्टकम् का नियमित पाठ करने से व्यक्ति को अपने जीवन में दिव्य आनंद की अनुभूति होती है और उसके सभी कष्टों का नाश होता है।

श्री कृष्णाष्टकम् – भजे व्रजैक मण्डनम् एक अद्वितीय स्तोत्र है जो भगवान श्रीकृष्ण की महिमा और उनकी लीलाओं का सजीव चित्रण करता है। इसका पाठ भक्तों को भगवान के समीप लाता है और उन्हें उनकी कृपा का अनुभव कराता है। श्रीकृष्ण की भक्ति से ओतप्रोत यह स्तोत्र न केवल भक्तों के हृदय को शांति प्रदान करता है, बल्कि उन्हें आध्यात्मिक उन्नति की ओर भी अग्रसर करता है। इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने वाले भक्तों को भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से उनके जीवन में अनंत सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त होती है।



  • हिंदी / संस्कृत
  • English

|| श्री कृष्णाष्टकम् PDF ||

भजे व्रजैक मण्डनम्, समस्त पाप खण्डनम्,
स्वभक्त चित्त रञ्जनम्, सदैव नन्द नन्दनम्,
सुपिन्छ गुच्छ मस्तकम् , सुनाद वेणु हस्तकम् ,
अनङ्ग रङ्ग सागरम्, नमामि कृष्ण नागरम् ॥ १ ॥

मनोज गर्व मोचनम् विशाल लोल लोचनम्,
विधूत गोप शोचनम् नमामि पद्म लोचनम्,
करारविन्द भूधरम् स्मितावलोक सुन्दरम्,
महेन्द्र मान दारणम्, नमामि कृष्ण वारणम् ॥ २ ॥

कदम्ब सून कुण्डलम् सुचारु गण्ड मण्डलम्,
व्रजान्गनैक वल्लभम नमामि कृष्ण दुर्लभम.
यशोदया समोदया सगोपया सनन्दया,
युतम सुखैक दायकम् नमामि गोप नायकम् ॥ ३ ॥

सदैव पाद पङ्कजम मदीय मानसे निजम्,
दधानमुत्तमालकम् , नमामि नन्द बालकम्,
समस्त दोष शोषणम्, समस्त लोक पोषणम्,
समस्त गोप मानसम्, नमामि नन्द लालसम् ॥ ४ ॥

भुवो भरावतारकम् भवाब्दि कर्ण धारकम्,
यशोमती किशोरकम्, नमामि चित्त चोरकम्.
दृगन्त कान्त भङ्गिनम् , सदा सदालसंगिनम्,
दिने दिने नवम् नवम् नमामि नन्द संभवम् ॥ ५ ॥

गुणाकरम् सुखाकरम् क्रुपाकरम् कृपापरम् ,
सुरद्विषन्निकन्दनम् , नमामि गोप नन्दनम्.
नवीनगोप नागरम नवीन केलि लम्पटम् ,
नमामि मेघ सुन्दरम् तथित प्रभालसथ्पतम् ॥ ६ ॥

समस्त गोप नन्दनम् , ह्रुदम्बुजैक मोदनम्,
नमामि कुञ्ज मध्यगम्, प्रसन्न भानु शोभनम्.
निकामकामदायकम् दृगन्त चारु सायकम्,
रसालवेनु गायकम, नमामि कुञ्ज नायकम् ॥ ७ ॥

विदग्ध गोपिका मनो मनोज्ञा तल्पशायिनम्,
नमामि कुञ्ज कानने प्रवृद्ध वह्नि पायिनम्.
किशोरकान्ति रञ्जितम, द्रुगन्जनम् सुशोभितम,
गजेन्द्र मोक्ष कारिणम, नमामि श्रीविहारिणम ॥ ८ ॥

यथा तथा यथा तथा तदैव कृष्ण सत्कथा ,
मया सदैव गीयताम् तथा कृपा विधीयताम.
प्रमानिकाश्टकद्वयम् जपत्यधीत्य यः पुमान ,
भवेत् स नन्द नन्दने भवे भवे सुभक्तिमान ॥ ९ ॥

ॐ नमो श्रीकृष्णाय नमः॥
ॐ नमो नारायणाय नमः॥

|| Krishnashtakam – Bhaje Vrajaik Mandanam ||

Bhaje vrajaik mandanam, sampoorn paap khandanam,
Svabhakt chitt ranjanam, sadaiv nand nandanam,
Supinch guchchh mastakam, sunaad venu hastakam,
Anang rang saagaram, namaami krshn naagaam ॥ ॥

Manoj gaurav mochanam vishaal lol lochanam,
Vidhut gop shochanam namaami padm lochanam,
Karavind bhoodharam smitaavalok sundaram,
Mahendr maan daaranam, namaami krshn varnam ॥ 2॥

Charanab soon kundalam suchaaru gand mandalam,
Vrjaanganaak vallabham namaami krshn durlabham॥
Yashoday samoday sagopaay sannadaya,
Yutam sukhaikadaayakam namaami gop naayakam ॥ 3 ॥

Sada paad paakajam madeey manase nijam,
Dadhaanamuttamaalakam, namaami nand aayulaam,
Samagr dosh shoshanam, samagr lok poshanam,
Sarv gop maanasan, namaami nand laalasam ॥ 4 ॥

Bhuvo bhaaravataarakam bhavaabdi karn dhaarakam,
Yashomatee kishorakam, namaami chitt chorakam॥
Digant kaant bhaginam, sada sadaalasanginam,
Dine dine navam navam namaami nand sambhavam ॥ 5 ॥

Gunaakaram sukhakaram krpapaakaram krpaaparam,
Suradvishnnikandanam, namaami gop nandanam॥
Naveenagop naagaam naveen keli lampatam,
Namaami megh sundaram tathit prabhallastaptam ॥ 6 ॥

Samagr gop nandanam, hrudambujaik modanam,
Namaami kunj madhyagam, manohar bhaanu shobhanam॥
Nikamakaamadaayakam digant chaaru saayakam,
Rasaalavenu gaayakam, namaami kunj naayakam ॥ 7 ॥

Vidagdh gopika mano manogy talpashaayinam,
Namaami kunj kaane pravrddh vahni paayanam॥
Kishorakaanti ranjitam, druganjanam sushobhitam,
Gajendra moksha karinam, namaami shreevihaarinam ॥ 8॥

Yatha tatha yatha tatha tadaiv krshn satakatha,
Maaya sadaiv geeyataam tatha krpa vidheeyatam॥
Praamaanikaashtakadvayam japatyadheety yah pumaan,
Bhavet sa nand nandane bhave bhave subhaktiman॥ 9 ॥

Om namo shreekrshnaay namah॥
Om namo naaraayanaay namah॥


श्री कृष्णाष्टकम् PDF – भजे व्रजैक मण्डनम् के लाभ

श्री कृष्णाष्टकम् – भजे व्रजैक मण्डनम् का पाठ करने के अनेक लाभ हैं, जो भक्तों को मानसिक, शारीरिक, और आध्यात्मिक रूप से लाभान्वित करते हैं। इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से व्यक्ति को अनेक प्रकार के दिव्य अनुभव प्राप्त होते हैं। यहाँ हम विस्तार से उन लाभों का वर्णन करेंगे जो इस पवित्र स्तोत्र के पाठ से प्राप्त होते हैं:

मानसिक लाभ

  1. मानसिक शांति: श्री कृष्णाष्टकम् का पाठ करने से मन को अद्भुत शांति मिलती है। यह स्तोत्र भगवान श्रीकृष्ण के मधुर लीलाओं का स्मरण कराता है, जो मन को शांत और स्थिर करता है।
  2. तनाव में कमी: आधुनिक जीवन की भागदौड़ में लोग तनावग्रस्त हो जाते हैं। इस स्तोत्र का पाठ करने से तनाव कम होता है और व्यक्ति को मानसिक शांति प्राप्त होती है।
  3. एकाग्रता में वृद्धि: श्री कृष्णाष्टकम् का नियमित पाठ करने से ध्यान और एकाग्रता में वृद्धि होती है। भगवान श्रीकृष्ण की लीला और गुणों का स्मरण करने से व्यक्ति का मन भटकता नहीं है और उसे ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलती है।
  4. सकारात्मक सोच: इस स्तोत्र का पाठ करने से नकारात्मक विचारों का नाश होता है और व्यक्ति के मन में सकारात्मकता का संचार होता है। श्रीकृष्ण की मधुर लीला और उनके गुणों का स्मरण व्यक्ति को आशावादी बनाता है।

शारीरिक लाभ

  1. स्वास्थ्य में सुधार: श्री कृष्णाष्टकम् का पाठ करने से व्यक्ति के स्वास्थ्य में सुधार होता है। यह स्तोत्र मानसिक शांति प्रदान करता है, जो शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है।
  2. ऊर्जा में वृद्धि: भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का स्मरण और उनके प्रति भक्ति भाव से शरीर में ऊर्जा का संचार होता है। यह व्यक्ति को दिनभर तरोताजा और ऊर्जावान बनाए रखता है।
  3. रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि: इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता में भी वृद्धि होती है। मानसिक शांति और सकारात्मकता शरीर को स्वस्थ रखते हैं और बीमारियों से बचाते हैं।

आध्यात्मिक लाभ

  1. भगवत कृपा की प्राप्ति: श्री कृष्णाष्टकम् का पाठ करने से भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है। यह स्तोत्र भक्तों को भगवान के समीप लाता है और उन्हें उनकी कृपा का अनुभव कराता है।
  2. भक्ति में वृद्धि: इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से व्यक्ति की भक्ति में वृद्धि होती है। भगवान श्रीकृष्ण की मधुर लीलाओं का स्मरण व्यक्ति के हृदय में भक्ति भाव को जागृत करता है।
  3. आध्यात्मिक उन्नति: श्री कृष्णाष्टकम् का पाठ करने से व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। यह स्तोत्र भगवान की महिमा का गुणगान करता है, जो आत्मा को शुद्ध करता है और उसे आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर करता है।
  4. मुक्ति की प्राप्ति: इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। भगवान श्रीकृष्ण की करुणा और उनकी कृपा से व्यक्ति के सभी पापों का नाश होता है और उसे मुक्ति प्राप्त होती है।

पारिवारिक और सामाजिक लाभ

  1. परिवार में सुख-शांति: श्री कृष्णाष्टकम् का पाठ करने से परिवार में सुख-शांति का वातावरण बनता है। भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से सभी परिवारजन सुखी और संतुष्ट रहते हैं।
  2. सद्भावना का विकास: इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति के मन में सभी के प्रति सद्भावना का विकास होता है। भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का स्मरण व्यक्ति को सभी जीवों के प्रति करुणा और प्रेम का भाव सिखाता है।
  3. समाज में सामंजस्य: श्री कृष्णाष्टकम् का पाठ करने से समाज में सामंजस्य का विकास होता है। यह स्तोत्र सभी लोगों को एकता और भाईचारे का संदेश देता है।

अन्य लाभ

  1. संकटों का नाश: श्री कृष्णाष्टकम् का पाठ करने से व्यक्ति के सभी संकटों का नाश होता है। भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से व्यक्ति के जीवन में आने वाले सभी कष्ट और विपत्तियों का समाधान होता है।
  2. सकारात्मक ऊर्जा का संचार: इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति के आस-पास सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह ऊर्जा व्यक्ति को जीवन के हर क्षेत्र में सफलता दिलाने में सहायक होती है।
  3. जीवन में समृद्धि: श्री कृष्णाष्टकम् का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में समृद्धि आती है। भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से व्यक्ति को धन, ऐश्वर्य और मान-सम्मान की प्राप्ति होती है।
  4. आत्मज्ञान की प्राप्ति: इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति को आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है। भगवान श्रीकृष्ण की महिमा का गुणगान करने से व्यक्ति को आत्मा के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान होता है।

श्री कृष्णाष्टकम् – भजे व्रजैक मण्डनम् का पाठ न केवल भक्तों को मानसिक और शारीरिक लाभ प्रदान करता है, बल्कि उन्हें आध्यात्मिक उन्नति की ओर भी अग्रसर करता है। भगवान श्रीकृष्ण की मधुर लीलाओं और उनके गुणों का स्मरण करने से व्यक्ति को जीवन के हर क्षेत्र में सफलता और संतोष प्राप्त होता है। यह स्तोत्र भक्तों को भगवान की कृपा और दया का अनुभव कराता है और उन्हें उनके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करता है।

इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से व्यक्ति को भगवान श्रीकृष्ण की अपार कृपा का अनुभव होता है और उसे जीवन में हर प्रकार के कष्टों और विपत्तियों से मुक्ति मिलती है। भगवान की भक्ति में लीन होकर व्यक्ति को अपने जीवन के उद्देश्य का ज्ञान होता है और वह आध्यात्मिक मार्ग पर निरंतर अग्रसर होता है। श्री कृष्णाष्टकम् का पाठ करने वाले भक्तों को भगवान की अनंत दया का अनुभव होता है और उन्हें उनके जीवन में अनंत सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त होती है।

1. मैं भगवान कृष्ण की सदा पूजा करता हूँ, जो नन्द के पुत्र हैं, जो व्रज के एकमात्र आभूषण हैं, जो सभी पापों को टुकड़े-टुकड़े कर देते हैं, तथा जो भक्तों के हृदय को प्रसन्न करते हैं। मैं उन वीर भगवान कृष्ण को सादर प्रणाम करता हूँ, जिनका सिर मोर के पंखों से सुशोभित है, जिनके हाथ में मधुर बांसुरी है, तथा जो कामदेव की लीलाओं के सागर हैं।

2. मैं कमल-नयन वाले भगवान कृष्ण को सादर प्रणाम करता हूँ, जो कामदेव को उसके अभिमान से मुक्त करते हैं, जिनके बड़े-बड़े नेत्र अत्यंत चंचल हैं, तथा जो गोपों के दुःख को दूर करते हैं। मैं श्याम भगवान कृष्ण को सादर प्रणाम करता हूँ, जिनके कमल-हाथ ने गोवर्धन पर्वत को उठाया, जिनकी मुस्कुराहट मनमोहक है, तथा जिन्होंने इंद्र के अभिमान को चूर-चूर कर दिया।

3. मैं भगवान कृष्ण को सादर प्रणाम करता हूँ, जो कि प्राप्त करने में कठिन हैं, जो कदम्ब पुष्प की बाली पहनते हैं, जिनके गालों का घेरा बहुत ही सुन्दर है, तथा जो व्रज की कन्याओं के एकमात्र प्रिय हैं। मैं भगवान कृष्ण को सादर प्रणाम करता हूँ, जो कि चंचल ग्वालबाल हैं, तथा जो यशोदा, नन्द तथा गोप लोगों के साथ मिलकर उन सभी को आनन्द देने वाली लीलाओं का आनन्द लेते हैं।

4. मैं भगवान कृष्ण को सादर प्रणाम करता हूँ, जो कि नन्द के छोटे बालक हैं, तथा जो अपने कुंकुम-अभिषिक्त चरण-कमलों को सदैव मेरे हृदय में रखते हैं। मैं प्रसन्नचित्त भगवान कृष्ण को सादर प्रणाम करता हूँ, जो कि सभी दोषों को दूर करते हैं, सभी लोकों को समृद्ध बनाते हैं, तथा सभी गोप लोगों के विचारों में रहते हैं।

5. मैं दूधचोर भगवान कृष्ण को सादर प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने पृथ्वी का भार हर लिया है, जो जन्म-मृत्यु के सागर से पार जाने वाले जहाज के कप्तान हैं, और जो यशोदा के किशोर पुत्र हैं। मैं भगवान कृष्ण को सादर प्रणाम करता हूँ, जो नन्द के पुत्र हैं, जो अपनी आँखों की कोरों से टेढ़ी दृष्टि डालते हैं, जो हमेशा गोपियों के साथ रहते हैं, और जो दिन-प्रतिदिन नई-नई लीलाओं का आनंद लेते हैं।

6. मैं भगवान कृष्ण को सादर प्रणाम करता हूँ, जो दिव्य गुणों की रत्न-खान हैं, दिव्य आनंद की रत्न-खान हैं, दया की रत्न-खान हैं, जो देवताओं के शत्रुओं को पराजित करते हैं, और जो ग्वाल-बालों को प्रसन्न करते हैं। मैं भगवान कृष्ण को सादर प्रणाम करता हूँ, जो ग्वाल-बालों के युवा नायक हैं, जो चंचल युवा रंक हैं, जो मानसून के बादल की तरह सुंदर और काले हैं, और जिनके पीले वस्त्र बिजली की तरह चमकते हैं।

7. मैं भगवान कृष्ण को सादर प्रणाम करता हूँ, जो सभी ग्वाल-बालों को प्रसन्न करते हैं, जो भक्तों के हृदय-कमलों को मोहित करते हैं, जो वन के उपवनों में रहते हैं, और जो चमकते हुए सूर्य की तरह तेजस्वी हैं। मैं भगवान कृष्ण को सादर प्रणाम करता हूँ, जो सभी इच्छाओं को पूरा करते हैं, जिनकी तिरछी नज़रें आकर्षक बाण हैं, जिनकी बांसुरी का संगीत अमृत है, और जो वन के उपवनों के कामुक नायक हैं।

8. मैं भगवान कृष्ण को सादर प्रणाम करता हूँ, जो बुद्धिमान गोपियों के हृदय के आकर्षक पलंग पर विश्राम करते हैं, और जिन्होंने मुंजतवी वन में दावाग्नि को पी लिया था। मैं प्रार्थना करता हूँ कि जब भी और जिस तरह भी मैं उनकी महिमा गाऊँ, भगवान कृष्ण मुझ पर दया करें।

9. मैं प्रार्थना करता हूँ कि जो कोई भी इन आठ प्रार्थनाओं को पढ़ेगा या सुनाएगा, वह जन्म-जन्मांतर तक नंद के पुत्र के प्रति समर्पित रहेगा।


श्री कृष्ण का प्रिय मंत्र कौन सा है?

श्री कृष्ण का प्रिय मंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” है। यह मंत्र भगवान श्री कृष्ण की कृपा प्राप्त करने और उनके प्रति भक्ति व्यक्त करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।

श्री कृष्ण जी का बीज मंत्र क्या है?

श्री कृष्ण का बीज मंत्र “क्लीं कृष्णाय नमः” है। यह बीज मंत्र भगवान कृष्ण के दिव्य शक्ति और उनके दिव्य स्वरूप का प्रतीक है।

भगवान श्री कृष्ण को कैसे खुश करें?

भगवान श्री कृष्ण को खुश करने के लिए भक्तिपूर्ण मन से उनके नाम का जाप करें, गीता के उपदेशों का पालन करें, और निष्काम कर्म योग का अनुसरण करें। साथ ही, तुलसी दल चढ़ाकर उनकी पूजा करें और उनके भजन गाएं।

श्री कृष्णा किसका अवतार है?

भगवान श्री कृष्ण विष्णु के आठवें अवतार माने जाते हैं। वे भगवान विष्णु के पूर्ण अवतार हैं और उन्होंने धरती पर धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए अवतार लिया था।

कृष्ण महामंत्र कौन सा है?

कृष्ण महामंत्र “हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे” है। इस महामंत्र का जप करने से व्यक्ति भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त कर सकता है और भक्ति में लीन हो सकता है।

कौन सा कृष्ण मंत्र बहुत शक्तिशाली है?

कृष्ण का बहुत शक्तिशाली मंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” और “हरे कृष्ण महामंत्र” माने जाते हैं। इन मंत्रों का नियमित जप करने से व्यक्ति को मानसिक शांति, आध्यात्मिक उन्नति, और भगवान की कृपा प्राप्त होती है।

श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् (Gopal Sahastranam Stotram PDF)

श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् (Gopal Sahastranam Stotram) एक महत्वपूर्ण और पवित्र ग्रंथ है जो भगवान श्रीकृष्ण के विभिन्न नामों का संकलन है। इस स्तोत्र के माध्यम से भक्तजन भगवान श्रीकृष्ण की महिमा का गान करते हैं और उनके विविध रूपों एवं गुणों का वर्णन करते हैं। श्रीकृष्ण, जो गोपाल, गोविंद, माधव, केशव आदि अनेक नामों से प्रसिद्ध हैं, इस स्तोत्र के हर नाम में उनकी दिव्यता और महिमा को प्रकट किया गया है।

गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का उल्लेख मुख्यतः सनातन धर्म के धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। यह स्तोत्र वल्लभ सम्प्रदाय और ग्वाल बालकों के प्रिय भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं के माध्यम से उनके चरित्र का सुंदर वर्णन करता है। इस स्तोत्र के पाठ से भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में शांति, समृद्धि, और आध्यात्मिक उन्नति मिलती है।

श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् में भगवान के एक हजार नामों का वर्णन किया गया है, जो उनके विभिन्न स्वरूपों, गुणों और लीलाओं का चित्रण करते हैं। यह स्तोत्र केवल एक प्रार्थना नहीं है, बल्कि यह भगवान श्रीकृष्ण के साथ आत्मिक संबंध को गहरा बनाने का माध्यम भी है। हर नाम के साथ एक अनूठी कथा और आध्यात्मिक संदेश जुड़ा हुआ है, जो भक्तों को प्रेरित करता है और उनके हृदय में भक्ति की भावना को जागृत करता है।

इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति के समस्त पापों का नाश होता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसे नियमित रूप से पढ़ने से मानसिक शांति, आत्मिक बल और आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति होती है। इस स्तोत्र का उच्चारण करने से भक्त को भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में स्थान मिलता है और वह उनकी कृपा का पात्र बनता है।

श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् की रचना करने वाले ऋषि, संत, या भक्त का नाम स्पष्ट नहीं है, लेकिन इसे वैदिक और पौराणिक काल से ही महत्वपूर्ण माना गया है। इसके नामों का उच्चारण न केवल भक्त के लिए आध्यात्मिक अनुभव का कारण बनता है, बल्कि यह उसकी दैनिक जीवन की समस्याओं का समाधान भी प्रदान करता है।

अतः, श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् एक अद्वितीय और पवित्र ग्रंथ है जो भगवान श्रीकृष्ण की महिमा का विस्तार से वर्णन करता है और भक्तों को उनके चरणों में भक्ति और प्रेम का अनुभव कराता है। इसे नियमित रूप से पढ़ने और सुनने से जीवन में असीम शांति, सुख, और समृद्धि की प्राप्ति होती है।



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|| श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् संपूर्ण ||

कैलासशिखरे रम्ये गौरी पप्रच्छ शङ्करम् ।
ब्रह्माण्डाखिलनाथस्त्वं सृष्टिसंहारकारकः ॥ १ ॥

त्वमेव पूज्यसे लोकैर्ब्रह्मविष्णुसुरादिभिः ।
नित्यं पठसि देवेश कस्य स्तोत्रम् महेश्वर ॥ २ ॥

आश्चर्यमिदमत्यन्तं जायते मम शङ्कर ।
तत्प्राणेश महाप्राज्ञ संशयं छिन्धि मे प्रभो ॥ ३ ॥

श्रीमहादेव उवाच-
धन्यासि कृतपुण्यासि पार्वति प्राणवल्लभे ।
रहस्यातिरहस्यं च यत्पृच्छसि वरानने ॥ ४ ॥

स्त्रीस्वभावान्महादेवि पुनस्त्वं परिपृच्छसि ।
गोपनीयं गोपनीयं गोपनीयं प्रयत्नतः ॥ ५ ॥

दत्ते च सिद्धिहानिः स्यात्तस्माद्यत्नेन गोपयेत् ।
इदं रहस्यं परमं पुरुषार्थप्रदायकम् ॥ ६ ॥

धनरत्नौघमाणिक्यं तुरङ्गं च गजादिकम् ।
ददाति स्मरणादेव महामोक्षप्रदायकम् ॥ ७ ॥

तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि शृणुष्वावहिता प्रिये ।
योऽसौ निरञ्जनो देवश्चित्स्वरूपी जनार्दनः ॥ ८ ॥

संसारसागरोत्तारकारणाय नृणां सदा ।
श्रीरङ्गादिकरूपेण त्रैलोक्यं व्याप्य तिष्ठति ॥ ९ ॥

ततो लोका महामूढा विष्णुभक्तिविवर्जिताः ।
निश्चयं नाधिगच्छन्ति पुनर्नारायणो हरिः ॥ १० ॥

निरञ्जनो निराकारो भक्तानां प्रीतिकामदः ।
बृन्दावनविहाराय गोपालं रूपमुद्वहन् ॥ ११ ॥

मुरलीवादनाधारी राधायै प्रीतिमावहन् ।
अंशांशेभ्यः समुन्मील्य पूर्णरूपकलायुतः ॥ १२ ॥

श्रीकृष्णचन्द्रो भगवान् नन्दगोपवरोद्यतः ।
धरणीरूपिणी माता यशोदा नन्दगेहिनी ॥ १३ ॥

द्वाभ्यां प्रयाचितो नाथो देवक्यां वसुदेवतः ।
ब्रह्मणाऽभ्यर्थितो देवो देवैरपि सुरेश्वरः ॥ १४ ॥

जातोऽवन्यां च मुदितो मुरलीवाचनेच्छया ।
श्रिया सार्धं वचः कृत्वा ततो जातो महीतले ॥ १५ ॥

संसारसारसर्वस्वं श्यामलं महदुज्ज्वलम् ।
एतज्ज्योतिरहं वन्द्यं चिन्तयामि सनातनम् ॥ १६ ॥

गौरतेजो विना यस्तु श्यामतेजस्समर्चयेत् ।
जपेद्वा ध्यायते वापि स भवेत्पातकी शिवे ॥ १७ ॥

स ब्रह्महा सुरापी च स्वर्णस्तेयी च पञ्चमः ।
एतैर्दोषैर्विलिप्येत तेजोभेदान्महीश्वरि ॥ १८ ॥

तस्माज्ज्योतिरभूद्द्वेधा राधामाधवरूपकम् ।
तस्मादिदं महादेवि गोपालेनैव भाषितम् ॥ १९ ॥

दुर्वाससो मुनेर्मोहे कार्तिक्यां रासमण्डले ।
ततः पृष्टवती राधा सन्देहं भेदमात्मनः ॥ २० ॥

निरञ्जनात्समुत्पन्नं मायातीतं जगन्मयम् ।
श्रीकृष्णेन ततः प्रोक्तं राधायै नारदाय च ॥ २१ ॥

ततो नारदतस्सर्वं विरला वैष्णवास्तथा ।
कलौ जानन्ति देवेशि गोपनीयं प्रयत्नतः ॥ २२ ॥

शठाय कृपणायाथ डाम्भिकाय सुरेश्वरि ।
ब्रह्महत्यामवाप्नोति तस्माद्यत्नेन गोपयेत् ॥ २३ ॥

ओं अस्य श्रीगोपालसहस्रनामस्तोत्र महामन्त्रस्य श्रीनारद ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीगोपालो देवता, कामो बीजं, माया शक्तिः, चन्द्रः कीलकं, श्रीकृष्णचन्द्र भक्तिरूपफलप्राप्तये श्रीगोपालसहस्रनामस्तोत्रजपे विनियोगः ।

ओं ऐं क्लीं बीजं, श्रीं ह्रीं शक्तिः, श्री बृन्दावननिवासः कीलकं, श्रीराधाप्रियं परं ब्रह्मेति मन्त्रः, धर्मादि चतुर्विध पुरुषार्थसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।

न्यासः ।
ओं नारद ऋषये नमः शिरसि ।
अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे ।
श्रीगोपालदेवतायै नमः हृदये ।
क्लीं कीलकाय नमः नाभौ ।
ह्रीं शक्तये नमः गुह्ये ।
श्रीं कीलकाय नमः फालयोः ।
ओं क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा इति मूलमन्त्रः ।

करन्यासः ।
ओं क्लां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
ओं क्लीं तर्जनीभ्यां नमः ।
ओं क्लूं मध्यमाभ्यां नमः ।
ओं क्लैं अनामिकाभ्यां नमः ।
ओं क्लौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ओं क्लः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।

हृदयादिन्यासः ।
ओं क्लां हृदयाय नमः ।
ओं क्लीं शिरसे स्वाहा ।
ओं क्लूं शिखायै वषट् ।
ओं क्लैं कवचाय हुम् ।
ओं क्लौं नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ओं क्लः अस्त्राय फट् ।

मूलमन्त्रन्यासः ।
क्लीं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
कृष्णाय तर्जनीभ्यां नमः ।
गोविन्दाय मध्यमाभ्यां नमः ।
गोपीजन अनामिकाभ्यां नमः ।
वल्लभाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
स्वाहा करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
क्लीं हृदयाय नमः ।
कृष्णाय शिरसे स्वाहा ।
गोविन्दाय शिखायै वषट् ।
गोपीजन कवचाय हुम् ।
वल्लभाय नेत्रत्रयाय वौषट् ।
स्वाहा अस्त्राय फट् ।

ध्यानम् ।

फुल्लेन्दीवरकान्तिमिन्दुवदनं बर्हावतंसप्रियं
श्रीवत्साङ्कमुदारकौस्तुभधरं पीताम्बरं सुन्दरम् ।
गोपीनां नयनोत्पलार्चिततनुं गोगोपसङ्घावृतं
गोविन्दं कलवेणुवादनपरं दिव्याङ्गभूषं भजे ॥ १ ॥

कस्तूरीतिलकं ललाटफलके वक्षस्स्थले कौस्तुभं
नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले वेणुं करे कङ्कणम् ।
सर्वाङ्गे हरिचन्दनं च कलयन् कण्ठे च मुक्तावलिं
गोपस्त्रीपरिवेष्टितो विजयते गोपालचूडामणिः ॥ २ ॥

इति ध्यानम
ओं क्लीं देवः कामदेवः कामबीजशिरोमणिः ।
श्रीगोपालो महीपालो वेदवेदाङ्गपारगः ॥ १ ॥

कृष्णः कमलपत्राक्षः पुण्डरीकः सनातनः ।
गोपतिर्भूपतिः शास्ता प्रहर्ता विश्वतोमुखः ॥ २ ॥

आदिकर्ता महाकर्ता महाकालः प्रतापवान् ।
जगज्जीवो जगद्धाता जगद्भर्ता जगद्वसुः ॥ ३ ॥

मत्स्यो भीमः कुहूभर्ता हर्ता वाराहमूर्तिमान् ।
नारायणो हृषीकेशो गोविन्दो गरुडध्वजः ॥ ४ ॥

गोकुलेशो महाचन्द्रः शर्वरीप्रियकारकः ।
कमलामुखलोलाक्षः पुण्डरीकः शुभावहः ॥ ५ ॥

दुर्वासाः कपिलो भौमः सिन्धुसागरसङ्गमः ।
गोविन्दो गोपतिर्गोत्रः कालिन्दीप्रेमपूरकः ॥ ६ ॥

गोपस्वामी गोकुलेन्द्रः गोवर्धनवरप्रदः ।
नन्दादिगोकुलत्राता दाता दारिद्र्यभञ्जनः ॥ ७ ॥

सर्वमङ्गलदाता च सर्वकामवरप्रदः ।
आदिकर्ता महीभर्ता सर्वसागरसिन्धुजः ॥ ८ ॥

गजगामी गजोद्धारी कामी कामकलानिधिः ।
कलङ्करहितश्चन्द्रो बिम्बास्यो बिम्बसत्तमः ॥ ९ ॥

मालाकारः कृपाकारः कोकिलस्वरभूषणः ।
रामो नीलाम्बरो देही हली द्विविदमर्दनः ॥ १० ॥

सहस्राक्षपुरीभेत्ता महामारीविनाशनः ।
शिवः शिवतमो भेत्ता बलारातिप्रपूजकः ॥ ११ ॥

कुमारीवरदायी च वरेण्यो मीनकेतनः ।
नरो नारायणो धीरो धरापतिरुदारधीः ॥ १२ ॥

श्रीपतिः श्रीनिधिः श्रीमान् मापतिः प्रतिराजहा ।
बृन्दापतिः कुलं ग्रामी धाम ब्रह्मसनातनः ॥ १३ ॥

रेवतीरमणो रामः प्रियश्चञ्चललोचनः ।
रामायणशरीरश्च रामो रामः श्रियःपतिः ॥ १४ ॥

शर्वरः शर्वरी शर्वः सर्वत्र शुभदायकः ।
राधाराधयिताराधी राधाचित्तप्रमोदकः ॥ १५ ॥

राधारतिसुखोपेतो राधामोहनतत्परः ।
राधावशीकरो राधाहृदयाम्भोजषट्पदः ॥ १६ ॥

राधालिङ्गनसम्मोदो राधानर्तनकौतुकः ।
राधासञ्जातसम्प्रीतो राधाकामफलप्रदः ॥ १७ ॥

बृन्दापतिः कोकनिधिः कोकशोकविनाशनः ।
चन्द्रापतिश्चन्द्रपतिश्चण्डकोदण्डभञ्जनः ॥ १८ ॥

रामो दाशरथी रामो भृगुवंशसमुद्भवः ।
आत्मारामो जितक्रोधो मोहो मोहान्धभञ्जनः ॥ १९ ॥

वृषभानुभवो भावी काश्यपिः करुणानिधिः ।
कोलाहलो हलो हाली हली हलधरप्रियः ॥ २० ॥

राधामुखाब्जमार्ताण्डो भास्करो रविजो विधुः ।
विधिर्विधाता वरुणो वारुणो वारुणीप्रियः ॥ २१ ॥

रोहिणीहृदयानन्दी वसुदेवात्मजो बलिः ।
नीलाम्बरो रौहिणेयो जरासन्धवधोऽमलः ॥ २२ ॥

नागो जवाम्भो विरुदो वीरहा वरदो बली ।
गोपदो विजयी विद्वान् शिपिविष्टः सनातनः ॥ २३ ॥

परशुरामवचोग्राही वरग्राही सृगालहा ।
दमघोषोपदेष्टा च रथग्राही सुदर्शनः ॥ २४ ॥

वीरपत्नीयशस्त्राता जराव्याधिविघातकः ।
द्वारकावासतत्त्वज्ञो हुताशनवरप्रदः ॥ २५ ॥

यमुनावेगसंहारी नीलाम्बरधरः प्रभुः ।
विभुः शरासनो धन्वी गणेशो गणनायकः ॥ २६ ॥

लक्ष्मणो लक्षणो लक्ष्यो रक्षोवंशविनाशकः ।
वामनो वामनीभूतो वमनो वमनारुहः ॥ २७ ॥

यशोदानन्दनः कर्ता यमलार्जुनमुक्तिदः ।
उलूखली महामानो दामबद्धाह्वयी शमी ॥ २८ ॥

भक्तानुकारी भगवान् केशवोऽचलधारकः ।
केशिहा मधुहा मोही वृषासुरविघातकः ॥ २९ ॥

अघासुरविघाती च पूतनामोक्षदायकः ।
कुब्जाविनोदी भगवान् कंसमृत्युर्महामुखी ॥ ३० ॥

अश्वमेधो वाजपेयो गोमेधो नरमेधवान् ।
कन्दर्पकोटिलावण्यश्चन्द्रकोटिसुशीतलः ॥ ३१ ॥

रविकोटिप्रतीकाशो वायुकोटिमहाबलः ।
ब्रह्मा ब्रह्माण्डकर्ता च कमलावाञ्छितप्रदः ॥ ३२ ॥

कमली कमलाक्षश्च कमलामुखलोलुपः ।
कमलाव्रतधारी च कमलाभः पुरन्दरः ॥ ३३ ॥

सौभाग्याधिकचित्तश्च महामायी मदोत्कटः ।
ताटकारिः सुरत्राता मारीचक्षोभकारकः ॥ ३४ ॥

विश्वामित्रप्रियो दान्तो रामो राजीवलोचनः ।
लङ्काधिपकुलध्वंसी विभीषणवरप्रदः ॥ ३५ ॥

सीतानन्दकरो रामो वीरो वारिधिबन्धनः ।
खरदूषणसंहारी साकेतपुरवासवान् ॥ ३६ ॥

चन्द्रावलिपतिः कूलः केशिकंसवधोऽमरः ।
माधवो मधुहा माध्वी माध्वीको माधवी विभुः ॥ ३७ ॥

मुञ्जाटवीगाहमानो धेनुकारिर्दशात्मजः ।
वंशीवटविहारी च गोवर्धनवनाश्रयः ॥ ३८ ॥

तथा तालवनोद्देशी भाण्डीरवनशङ्करः ।
तृणावर्तकृपाकारी वृषभानुसुतापतिः ॥ ३९ ॥

राधाप्राणसमो राधावदनाब्जमधूत्कटः ।
गोपीरञ्जनदैवज्ञः लीलाकमलपूजितः ॥ ४० ॥

क्रीडाकमलसन्दोहो गोपिकाप्रीतिरञ्जनः ।
रञ्जको रञ्जनो रङ्गो रङ्गी रङ्गमहीरुहः ॥ ४१ ॥

कामः कामारिभक्तश्च पुराणपुरुषः कविः ।
नारदो देवलो भीमो बालो बालमुखाम्बुजः ॥ ४२ ॥

अम्बुजो ब्रह्मसाक्षी च योगी दत्तवरो मुनिः ।
ऋषभः पर्वतो ग्रामो नदीपवनवल्लभः ॥ ४३ ॥

पद्मनाभः सुरज्येष्ठो ब्रह्मा रुद्रोऽहिभूषितः ।
गणानां त्राणकर्ता च गणेशो ग्रहिलो ग्रहिः ॥ ४४ ॥

गणाश्रयो गणाध्यक्षो क्रोडीकृतजगत्त्रयः ।
यादवेन्द्रो द्वारकेन्द्रो मथुरावल्लभो धुरी ॥ ४५ ॥

भ्रमरः कुन्तली कुन्तीसुतरक्षी महामनाः ।
यमुनावरदाता च काश्यपस्य वरप्रदः ॥ ४६ ॥

शङ्खचूडवधोद्दामो गोपीरक्षणतत्परः ।
पाञ्चजन्यकरो रामी त्रिरामी वनजो जयः ॥ ४७ ॥

फाल्गुणः फल्गुनसखो विराधवधकारकः ।
रुक्मिणीप्राणनाथश्च सत्यभामाप्रियङ्करः ॥ ४८ ॥

कल्पवृक्षो महावृक्षो दानवृक्षो महाफलः ।
अङ्कुशो भूसुरो भावो भामको भ्रामको हरिः ॥ ४९ ॥

सरलः शाश्वतो वीरो यदुवंशशिवात्मकः ।
प्रद्युम्नो बलकर्ता च प्रहर्ता दैत्यहा प्रभुः ॥ ५० ॥

महाधनो महावीरो वनमालाविभूषणः ।
तुलसीदामशोभाढ्यो जालन्धरविनाशनः ॥ ५१ ॥

सूरः सूर्यो मृकण्डुश्च भास्वरो विश्वपूजितः ।
रविस्तमोहा वह्निश्च बाडबो बडबानलः ॥ ५२ ॥

दैत्यदर्पविनाशी च गरुडो गरुडाग्रजः ।
गोपीनाथो महीनाथो बृन्दानाथोऽवरोधकः ॥ ५३ ॥

प्रपञ्ची पञ्चरूपश्च लतागुल्मश्च गोमतिः ।
गङ्गा च यमुनारूपो गोदा वेत्रवती तथा ॥ ५४ ॥

कावेरी नर्मदा तापी गण्डकी सरयू रजः ।
राजसस्तामसस्सत्त्वी सर्वाङ्गी सर्वलोचनः ॥ ५५ ॥

सुधामयोऽमृतमयो योगिनां वल्लभः शिवः ।
बुद्धो बुद्धिमतां श्रेष्ठो विष्णुर्जिष्णुः शचीपतिः ॥ ५६ ॥

वंशी वंशधरो लोको विलोको मोहनाशनः ।
रवरावो रवो रावो वलो वालो वलाहकः ॥ ५७ ॥

शिवो रुद्रो नलो नीलो लाङ्गली लाङ्गलाश्रयः ।
पारदः पावनो हंसो हंसारूढो जगत्पतिः ॥ ५८ ॥

मोहिनीमोहनो मायी महामायो महासुखी ।
वृषो वृषाकपिः कालः कालीदमनकारकः ॥ ५९ ॥

कुब्जाभाग्यप्रदो वीरो रजकक्षयकारकः ।
कोमलो वारुणी राजा जलजो जलधारकः ॥ ६० ॥

हारकः सर्वपापघ्नः परमेष्ठी पितामहः ।
खड्गधारी कृपाकारी राधारमणसुन्दरः ॥ ६१ ॥

द्वादशारण्यसम्भोगी शेषनागफणालयः ।
कामः श्यामः सुखश्रीदः श्रीपतिः श्रीनिधिः कृतिः ॥ ६२ ॥

हरिर्हरो नरो नारो नरोत्तम इषुप्रियः ।
गोपालचित्तहर्ता च कर्ता संसारतारकः ॥ ६३ ॥

आदिदेवो महादेवो गौरीगुरुरनाश्रयः ।
साधुर्मधुर्विधुर्धाता त्राताऽक्रूरपरायणः ॥ ६४ ॥

रोलम्बी च हयग्रीवो वानरारिर्वनाश्रयः ।
वनं वनी वनाध्यक्षो महावन्द्यो महामुनिः ॥ ६५ ॥

स्यमन्तकमणिप्राज्ञः विज्ञो विघ्नविघातकः ।
गोवर्धनो वर्धनीयो वर्धनी वर्धनप्रियः ॥ ६६ ॥

वार्धन्यो वर्धनो वर्धी वर्धिष्णस्तु सुखप्रियः ।
वर्धितो वर्धको वृद्धो बृन्दारकजनप्रियः ॥ ६७ ॥

गोपालरमणीभर्ता साम्बकुष्ठविनाशनः ।
रुक्मिणीहरणप्रेमा प्रेमी चन्द्रावलीपतिः ॥ ६८ ॥

श्रीकर्ता विश्वभर्ता च नारायण नरो बली ।
गणो गणपतिश्चैव दत्तात्रेयो महामुनिः ॥ ६९ ॥

व्यासो नारायणो दिव्यो भव्यो भावुकधारकः ।
श्वःश्रेयसं शिवं भद्रं भावुकं भवुकं शुभम् ॥ ७० ॥

शुभात्मकः शुभः शास्ता प्रशस्तो मेघनादहा ।
ब्रह्मण्यदेवो दीनानामुद्धारकरणक्षमः ॥ ७१ ॥

कृष्णः कमलपत्राक्षः कृष्णः कमललोचनः ।
कृष्णः कामी सदा कृष्णः समस्तप्रियकारकः ॥ ७२ ॥

नन्दो नन्दी महानन्दी मादी मादनकः किली ।
मीली हिली गिली गोली गोलो गोलालयो गुली ॥ ७३ ॥

गुग्गुली मारकी शाखी वटः पिप्पलकः कृती ।
म्लेच्छहा कालहर्ता च यशोदा यश एव च ॥ ७४ ॥

अच्युतः केशवो विष्णुः हरिः सत्यो जनार्दनः ।
हंसो नारायणो नीलो लीनो भक्तिपरायणः ॥ ७५ ॥

जानकीवल्लभो रामो विरामो विषनाशनः ।
सिंहभानुर्महाभानु-र्वीरभानुर्महोदधिः ॥ ७६ ॥

समुद्रोऽब्धिरकूपारः पारावारः सरित्पतिः ।
गोकुलानन्दकारी च प्रतिज्ञापरिपालकः ॥ ७७ ॥

सदारामः कृपारामो महारामो धनुर्धरः ।
पर्वतः पर्वताकारो गयो गेयो द्विजप्रियः ॥ ७८ ॥

कमलाश्वतरो रामो रामायणप्रवर्तकः ।
द्यौर्दिवो दिवसो दिव्यो भव्यो भागी भयापहः ॥ ७९ ॥

पार्वतीभाग्यसहितो भर्ता लक्ष्मीसहायवान् ।
विलासी साहसी सर्वी गर्वी गर्वितलोचनः ॥ ८० ॥

सुरारिर्लोकधर्मज्ञो जीवनो जीवनान्तकः ।
यमो यमारिर्यमनो यमी यामविघातकः ॥ ८१ ॥

वंशुली पांशुली पांसुः पाण्डुरर्जुनवल्लभः ।
ललिता चन्द्रिकामाला माली मालाम्बुजाश्रयः ॥ ८२ ॥

अम्बुजाक्षो महायक्षो दक्षश्चिन्तामणिप्रभुः ।
मणिर्दिनमणिश्चैव केदारो बदरीश्रयः ॥ ८३ ॥

बदरीवनसम्प्रीतो व्यासः सत्यवतीसुतः ।
अमरारिनिहन्ता च सुधासिन्धुविधूदयः ॥ ८४ ॥

चन्द्रो रविः शिवः शूली चक्री चैव गदाधरः ।
श्रीकर्ता श्रीपतिः श्रीदः श्रीदेवो देवकीसुतः ॥ ८५ ॥

श्रीपतिः पुण्डरीकाक्षः पद्मनाभो जगत्पतिः ।
वासुदेवोऽप्रमेयात्मा केशवो गरुडध्वजः ॥ ८६ ॥

नारायणः परं धाम देवदेवो महेश्वरः ।
चक्रपाणिः कलापूर्णो वेदवेद्यो दयानिधिः ॥ ८७ ॥

भगवान् सर्वभूतेशो गोपालः सर्वपालकः ।
अनन्तो निर्गुणो नित्यो निर्विकल्पो निरञ्जनः ॥ ८८ ॥

निराधारो निराकारो निराभासो निराश्रयः ।
पुरुषः प्रणवातीतो मुकुन्दः परमेश्वरः ॥ ८९ ॥

क्षणावनिः सार्वभौमो वैकुण्ठो भक्तवत्सलः ।
विष्णुर्दामोदरः कृष्णो माधवो मथुरापतिः ॥ ९० ॥

देवकीगर्भसम्भूतो यशोदावत्सलो हरिः ।
शिवः सङ्कर्षणः शम्भुर्भूतनाथो दिवस्पतिः ॥ ९१ ॥

अव्ययः सर्वधर्मज्ञो निर्मलो निरुपद्रवः ।
निर्वाणनायको नित्यो नीलजीमूतसन्निभः ॥ ९२ ॥

कलाक्षयश्च सर्वज्ञः कमलारूपतत्परः ।
हृषीकेशः पीतवासा वसुदेवप्रियात्मजः ॥ ९३ ॥

नन्दगोपकुमारार्यो नवनीताशनो विभुः ।
पुराणः पुरुषश्रेष्ठः शङ्खपाणिः सुविक्रमः ॥ ९४ ॥

अनिरुद्धश्चक्रधरः शार्ङ्गपाणिश्चतुर्भुजः ।
गदाधरः सुरार्तिघ्नो गोविन्दो नन्दकायुधः ॥ ९५ ॥

बृन्दावनचरः शौरिर्वेणुवाद्यविशारदः ।
तृणावर्तान्तको भीमसाहसो बहुविक्रमः ॥ ९६ ॥

शकटासुरसंहारी बकासुरविनाशनः ।
धेनुकासुरसंहारी पूतनारिर्नृकेसरी ॥ ९७ ॥

पितामहो गुरुस्साक्षी प्रत्यगात्मा सदाशिवः ।
अप्रमेयः प्रभुः प्राज्ञोऽप्रतर्क्यः स्वप्नवर्धनः ॥ ९८ ॥

धन्यो मान्यो भवो भावो धीरः शान्तो जगद्गुरुः ।
अन्तर्यामीश्वरो दिव्यो दैवज्ञो देवसंस्तुतः ॥ ९९ ॥

क्षीराब्धिशयनो धाता लक्ष्मीवान् लक्ष्मणाग्रजः ।
धात्रीपतिरमेयात्मा चन्द्रशेखरपूजितः ॥ १०० ॥

लोकसाक्षी जगच्चक्षुः पुण्यचारित्रकीर्तनः ।
कोटिमन्मथसौन्दर्यो जगन्मोहनविग्रहः ॥ १०१ ॥

मन्दस्मिततनुर्गोपगोपिकापरिवेष्टितः ।
फुल्लारविन्दनयनश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः ॥ १०२ ॥

इन्दीवरदलश्यामो बर्हिबर्हावतंसकः ।
मुरलीनिनदाह्लादो दिव्यमालाम्बरावृतः ॥ १०३ ॥

सुकपोलयुगः सुभ्रूयुगलः सुललाटकम् ।
कम्बुग्रीवो विशालाक्षो लक्ष्मीवाञ्छुभलक्षणः ॥ १०४ ॥

पीनवक्षाश्चतुर्बाहुश्चतुर्मूर्तिस्त्रिविक्रमः ।
कलङ्करहितः शुद्धो दुष्टशत्रुनिबर्हणः ॥ १०५ ॥

किरीटकुण्डलधरः कटकाङ्गदमण्डितः ।
मुद्रिकाभरणोपेतः कटिसूत्रविराजितः ॥ १०६ ॥

मञ्जीररञ्जितपदः सर्वाभरणभूषितः ।
विन्यस्तपादयुगलो दिव्यमङ्गलविग्रहः ॥ १०७ ॥

गोपिकानयनानन्दः पूर्णचन्द्रनिभाननः ।
समस्तजगदानन्दः सुन्दरो लोकनन्दनः ॥ १०८ ॥

यमुनातीरसञ्चारी राधामन्मथवैभवः ।
गोपनारीप्रियो दान्तो गोपीवस्त्रापहारकः ॥ १०९ ॥

शृङ्गारमूर्तिः श्रीधामा तारको मूलकारणम् ।
सृष्टिसंरक्षणोपायः क्रूरासुरविभञ्जनः ॥ ११० ॥

नरकासुरसंहारी मुरारिर्वैरिमर्दनः ।
आदितेयप्रियो दैत्यभीकरो यदुशेखरः ॥ १११ ॥

जरासन्धकुलध्वंसी कंसारातिः सुविक्रमः ।
पुण्यश्लोकः कीर्तनीयो यादवेन्द्रो जगन्नुतः ॥ ११२ ॥

रुक्मिणीरमणः सत्यभामाजाम्बवतीप्रियः ।
मित्रविन्दानाग्नजितीलक्ष्मणासमुपासितः ॥ ११३ ॥

सुधाकरकुले जातोऽनन्तः प्रबलविक्रमः ।
सर्वसौभाग्यसम्पन्नो द्वारकापट्‍टणस्थितः ॥ ११४ ॥

भद्रासूर्यसुतानाथो लीलामानुषविग्रहः ।
सहस्रषोडशस्त्रीशो भोगमोक्षैकदायकः ॥ ११५ ॥

वेदान्तवेद्यः संवेद्यो वैद्यो ब्रह्माण्डनायकः ।
गोवर्धनधरो नाथः सर्वजीवदयापरः ॥ ११६ ॥

मूर्तिमान् सर्वभूतात्मा आर्तत्राणपरायणः ।
सर्वज्ञः सर्वसुलभः सर्वशास्त्रविशारदः ॥ ११७ ॥

षड्गुणैश्वर्यसम्पन्नः पूर्णकामो धुरन्धरः ।
महानुभावः कैवल्यदायको लोकनायकः ॥ ११८ ॥

आदिमध्यान्तरहितः शुद्धसात्त्विकविग्रहः ।
असमानः समस्तात्मा शरणागतवत्सलः ॥ ११९ ॥

उत्पत्तिस्थितिसंहारकारणं सर्वकारणम् ।
गम्भीरः सर्वभावज्ञः सच्चिदानन्दविग्रहः ॥ १२० ॥

विष्वक्सेनः सत्यसन्धः सत्यवाक् सत्यविक्रमः ।
सत्यव्रतः सत्यरतः सत्यधर्मपरायणः ॥ १२१ ॥

आपन्नार्तिप्रशमनः द्रौपदीमानरक्षकः ।
कन्दर्पजनकः प्राज्ञो जगन्नाटकवैभवः ॥ १२२ ॥

भक्तिवश्यो गुणातीतः सर्वैश्वर्यप्रदायकः ।
दमघोषसुतद्वेषी बाणबाहुविखण्डनः ॥ १२३ ॥

भीष्मभक्तिप्रदो दिव्यः कौरवान्वयनाशनः ।
कौन्तेयप्रियबन्धुश्च पार्थस्यन्दनसारथिः ॥ १२४ ॥

नारसिंहो महावीरः स्तम्भजातो महाबलः ।
प्रह्लादवरदः सत्यो देवपूज्योऽभयङ्करः ॥ १२५ ॥

उपेन्द्र इन्द्रावरजो वामनो बलिबन्धनः ।
गजेन्द्रवरदः स्वामी सर्वदेवनमस्कृतः ॥ १२६ ॥

शेषपर्यङ्कशयनो वैनतेयरथो जयी ।
अव्याहतबलैश्वर्यसम्पन्नः पूर्णमानसः ॥ १२७ ॥

योगीश्वरेश्वरः साक्षी क्षेत्रज्ञो ज्ञानदायकः ।
योगिहृत्पङ्कजावासो योगमायासमन्वितः ॥ १२८ ॥

नादबिन्दुकलातीतश्चतुर्वर्गफलप्रदः ।
सुषुम्नामार्गसञ्चारी देहस्यान्तरसंस्थितः ॥ १२९ ॥

देहेन्द्रियमनःप्राणसाक्षी चेतःप्रसादकः ।
सूक्ष्मः सर्वगतो देही ज्ञानदर्पणगोचरः ॥ १३० ॥

तत्त्वत्रयात्मकोऽव्यक्तः कुण्डली समुपाश्रितः ।
ब्रह्मण्यः सर्वधर्मज्ञः शान्तो दान्तो गतक्लमः ॥ १३१ ॥

श्रीनिवासः सदानन्दो विश्वमूर्तिर्महाप्रभुः ।
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ १३२ ॥

समस्तभुवनाधारः समस्तप्राणरक्षकः ।
समस्तस्सर्वभावज्ञो गोपिकाप्राणवल्लभः ॥ १३३ ॥

नित्योत्सवो नित्यसौख्यो नित्यश्रीर्नित्यमङ्गलम् ।
व्यूहार्चितो जगन्नाथः श्रीवैकुण्ठपुराधिपः ॥ १३४ ॥

पूर्णानन्दघनीभूतो गोपवेषधरो हरिः ।
कलापकुसुमश्यामः कोमलः शान्तविग्रहः ॥ १३५ ॥

गोपाङ्गनावृतोऽनन्तो बृन्दावनसमाश्रयः ।
वेणुनादरतः श्रेष्ठो देवानां हितकारकः ॥ १३६ ॥

जलक्रीडासमासक्तो नवनीतस्य तस्करः ।
गोपालकामिनीजारश्चोरजारशिखामणिः ॥ १३७ ॥

परञ्ज्योतिः पराकाशः परावासः परिस्फुटः ।
अष्टादशाक्षरो मन्त्रो व्यापको लोकपावनः ॥ १३८ ॥

सप्तकोटिमहामन्त्रशेखरो देवशेखरः ।
विज्ञानज्ञानसन्धानस्तेजोराशिर्जगत्पतिः ॥ १३९ ॥

भक्तलोकप्रसन्नात्मा भक्तमन्दारविग्रहः ।
भक्तदारिद्र्यशमनो भक्तानां प्रीतिदायकः ॥ १४० ॥

भक्ताधीनमनाः पूज्यो भक्तलोकशिवङ्करः ।
भक्ताभीष्टप्रदः सर्वभक्ताघौघनिकृन्तकः ॥ १४१ ॥

अपारकरुणासिन्धुर्भगवान् भक्ततत्परः ॥ १४२ ॥

इति श्रीराधिकानाथ नाम्नां साहस्रमीरितम् ।
स्मरणात्पापराशीनां खण्डनं मृत्युनाशनम् ॥ १४३ ॥

वैष्णवानां प्रियकरं महादारिद्र्यनाशनम् ।
ब्रह्महत्यासुरापानं परस्त्रीगमनं तथा ॥ १४४ ॥

परद्रव्यापहरणं परद्वेषसमन्वितम् ।
मानसं वाचिकं कायं यत्पापं पापसम्भवम् ॥ १४५॥

सहस्रनामपठनात्सर्वे नश्यन्ति तत्क्षणात् ।
महादारिद्र्ययुक्तो वै वैष्णवो विष्णुभक्तिमान् ॥ १४६॥

कार्तिक्यां यः पठेद्रात्रौ शतमष्टोत्तरं क्रमात् ।
पीताम्बरधरो धीमान् सुगन्धी पुष्पचन्दनैः ॥ १४७॥

पुस्तकं पूजयित्वा च नैवेद्यादिभिरेव च ।
राधाध्यानाङ्कितो धीरो वनमालाविभूषितः ॥ १४८॥

शतमष्टोत्तरं देवि पठेन्नामसहस्रकम् ।
चैत्रे कृष्णे च शुक्ले च कुहूसङ्क्रान्तिवासरे ॥ १४९॥

पठितव्यं प्रयत्नेन त्रैलोक्यं मोहयेत् क्षणात् ।
तुलसीमालया युक्तो वैष्णवो भक्तितत्परः ॥ १५०॥

रविवारे च शुक्रे च द्वादश्यां श्राद्धवासरे ।
ब्राह्मणं पूजयित्वा च भोजयित्वा विधानतः ॥ १५१॥

पठेन्नामसहस्रं च ततः सिद्धिः प्रजायते ।
महानिशायां सततं वैष्णवो यः पठेत्सदा ॥ १५२॥

देशान्तरगता लक्ष्मीः समायाति न संशयः ।
त्रैलोक्ये तु महादेवि सुन्दर्यः काममोहिताः ॥ १५३॥

मुग्धाः स्वयं समायान्ति वैष्णवं च भजन्ति ताः ।
रोगी रोगात्प्रमुच्येत बद्धो मुच्येत बन्धनात् ॥ १५४॥

गर्भिणी जनयेत्पुत्रं कन्या विन्दति सत्पतिम् ।
राजानो वशतां यान्ति किं पुनः क्षुद्रमानुषाः ॥ १५५॥

सहस्रनामश्रवणात् पठनात् पूजनात् प्रिये ।
धारणात् सर्वमाप्नोति वैष्णवो नात्र संशयः ॥ १५६॥

वंशीवटे चान्यवटे तथा पिप्पलकेऽथ वा ।
कदम्बपादपतले श्रीगोपालस्य सन्निधौ ॥ १५७॥

यः पठेद्वैष्णवो नित्यं स याति हरिमन्दिरम् ।
कृष्णेनोक्तं राधिकायै तया प्रोक्तं पुरा शिवे ॥ १५८॥

नारदाय मया प्रोक्तं नारदेन प्रकाशितम् ।
मया तव वरारोहे प्रोक्तमेतत्सुदुर्लभम् ॥ १५९॥

गोपनीयं प्रयत्नेन न प्रकाश्यं कदाचन ।
शठाय पापिने चैव लम्पटाय विशेषतः ॥ १६०॥

न दातव्यं न दातव्यं न दातव्यं कदाचन ।
देयं शान्ताय शिष्याय विष्णुभक्तिरताय च ॥ १६१॥

गोदानब्रह्मयज्ञादेर्वाजपेयशतस्य च ।
अश्वमेधसहस्रस्य फलं पाठे भवेद्ध्रुवम् ॥ १६२॥

मोहनं स्तम्भनं चैव मारणोच्चाटनादिकम् ।
यद्यद्वाञ्छति चित्तेन तत्तत्प्राप्नोति वैष्णवः ॥ १६३॥

एकादश्यां नरः स्नात्वा सुगन्धद्रव्यतैलकैः ।
आहारं ब्राह्मणे दत्त्वा दक्षिणां स्वर्णभूषणम् ॥ १६४॥

ततः प्रारम्भकर्तासौ सर्वं प्राप्नोति मानवः ।
शतावृत्त सहस्रं च यः पठेद्वैष्णवो जनः ॥ १६५॥

श्रीबृन्दावनचन्द्रस्य प्रसादात्सर्वमाप्नुयात् ।
यद्गृहे पुस्तकं देवि पूजितं चैव तिष्ठति ॥ १६६॥

न मारी न च दुर्भिक्षं नोपसर्गभयं क्वचित् ।
सर्पादिभूतयक्षाद्या नश्यन्ते नात्र संशयः ॥ १६७॥

श्रीगोपालो महादेवि वसेत्तस्य गृहे सदा ।
यद्गृहे च सहस्रं च नाम्नां तिष्ठति पूजितम् ॥ १६८॥

इति श्रीसम्मोहनतन्त्रे हरगौरीसंवादे श्रीगोपाल सहस्रनामस्तोत्रम् ।

|| Gopal Sahastranam Stotram ||

kalashashikhare raamye gauree paprachchh shankaram॥
brahmaandaakhilanaathastvan srshtisanhaarakaarakah ॥ 1॥

tvamev poojyase lokairbrahmavishnusuraadibhih॥
nityan pathasi devesh kasy stotram maheshvar ॥ 2॥

aashcharyamidamatyantan jaayate mam shankar॥
tatpraanesh mahaapraagy sanshayan chhindhi me prabho ॥ 3 ॥

Shree Mahaadev uvaach-
Dhanyaasi krtapunyasi paarvatee praanavallabhe॥
rahasyatirahasyan ch yatprchchhasi varaanane ॥ 4 ॥

streesvabhaavaanmahaadevee punastvan pariprchchhasi॥
vishvaasan vishvaasan vishvaasan prayatnah ॥ 5 ॥

datte chadidhaanih syaattasmaadyatnen gopayet॥
idan rahasyan paraman purushaarthapradaayakam ॥ 6 ॥

dhanaratnaughamaanikyan turanagan ch gajaadikam॥
dadaati smaranadev mahaamokshapradaayakam ॥ 7 ॥

tattehan sampravakshyaami shrnushvaahahita priye॥
yosau niranjano devashchitsaroopee janaardanah ॥ 8॥

sansaarasaagarottarakaaranaay nrnaan sada॥
shreeraangaadikaroopen trailokyan vyaapy tishthati ॥ 9 ॥

tato loka mahaamoodha vishnubhaktivivartitaah॥
nishchitan naadhigachchhanti punarnaaraayano harih ॥ 10 ॥

nirjano niraakaaro bhaktaanaan preetikaamadah॥
brndaavanavihaaraay gopaalan roopamudvahan ॥11 ॥

muraleevaadanaadaaree raadhaayai priyatamaavahan॥
anshaanshebhyah samunmily poornaroopakaalayutah ॥ 12 ॥

shreekrshnachandro bhagavaan nandagopavarodyah॥
dharaneeroopinee maata yashoda nandagehinee॥ 13 ॥

dvaabhyaan prayaachito naatho devakyaan vaasudevatah॥
braahmanabhayarthito devo devairapi sureshvarah ॥ 14॥

jaatovanyaan ch mudito muraleevachanechchhaya॥
shriya saardhan vaachah krtva tato jaato mahitale॥ 15 ॥

sansaarasaarasarvasvan shyaamalan mahadujjvalam॥
etajjyotirahan vandyan chintayaami sanaatanam ॥ 16॥

gauratejo vina yastu shyaamatejassamorchayet॥
japedva dhyaayate vaapi sa bhavetpaatakee shive ॥ 17 ॥

sa brahmaha surapi ch svarnastaye ch panchamah॥
etairdoshairvilipyet tejobhedaanamaheshvari॥ aath ॥

tasmaajjyotirbhudvedha raadhaamaadhavaroopakam॥
tasmaadidan mahaadevi gopaalenaiv bhaashitam ॥ 19 ॥

durvaasaso muneramohe kaartikyaan raasamandale॥
tatah prshtavatee raadha sandehan bhedamaatmanah ॥ 20॥

niranjanaatsamutpannan maayaateetan jaganmayam॥
shreekrshnen tatah proktan raadhaayai naaradaay ch ॥ 21 ॥

tato naaradatssarvan virala vaishnavastatha॥
kalau jaananti deveshi vishvaasan prayaasatah ॥ 22 ॥

shathaay krpaanayath dambhikaay sureshvari॥
brahmahatyaamavaapnoti tasmaadyatnen gopayet ॥ 23 ॥

oom asy shreegopaalasahasranaamastotr mahaamantrasy shreenaarad rshih, anushtup chhandah, shreegopaalo devata, kaamo beejan, maaya shaktih, chandrah keelakan, shreekrshnachandr bhaktiroopaphalapraaptaye shreegopaalasahasranaamastotrajape viniyogah॥

oom ain kleen beejan, shreen hreen shaktih, shree brndaavananivaasah keelakan, shreeraadhaapriyan paran brahmeti mantrah, dharmaadi chaturvidh purooshaarthasiddhyarthe jape viniyogah॥

bharosaah ॥
om naarad rshaye namah shirasi॥
anushtup chhandase namah mukhe॥॥
shreegopaaladevataayai namah hrdaye॥
kleen keelakaay namah naabhau॥
hreen shaktaye namah guhaye॥
shreen keelakaay namah phalayoh॥
oon kleen krshnaay govindaay gopeejanavallabhaay svaaha iti moolamantrah॥

karanyaasah॥
om kleen angushthaabhyaan namah॥
om kleen mahaanibhyaan namah॥
om kleen madhyamaabhyaan namah॥
om klaan anaamikaabhyaan namah॥
om ain kleen kanishthikaabhyaan namah॥
om kleen karatalakaraprajaabhyaan namah॥

hrdayaadinyaasah॥
om kleen hrdayaay namah॥
oon kleen shirase svaaha॥
oon kleen shikhaayai vashat॥
oon klain kavachaay hum॥
oon klaun utsavatrayai vaushat॥
oon klah astraay phat॥

moolamantranyaasah॥
kleen angushthaabhyaan namah॥
krshnaay mahaapaanibhyaan namah॥
govindaay madhyamaabhyaan namah॥
gopeejan anaamikaabhyaan namah॥
vallabhaay kanishthikaabhyaan namah॥
svaaha karatalakaraprajaabhyaan namah॥॥
kleen hrdayaay namah॥
krshnaay shirase svaaha॥
govindaay shikhaayai vashat॥
gopeejan kavachaay hum॥
vallabhaay utsavatrayaay vaushat॥
svaaha astraay phat॥

dhyaanam ॥

phullendeevarakaantiminduvadan brhavatansapriyan
shreevatsaankamudaarakaustubhadran peetaambaran sundaram॥
gopeenaan nayanotpalaarchitanun gogopasanaghavrtan
govindan kalavenuvaadanaparan divyangabhooshan bhaje ॥ 1॥

kastooreetilakan lalaataphalake vakshasthale kaustubhan
naasaagre varaamauktikan karatale venu kare kaankanam॥
sarvaange harichandanan ch kalyaanan kanthe ch muktaavalin
gopaastreepariveshito vijayate gopaalachoodaamanih ॥ 2॥


oon kleen devah kaamadevah kaamabeejashiromanih॥
shreegopaalo mahipaalo vedavedaangapaaragah ॥ 1॥

krshnah kamalapatraakshah pundareekah sanaatanah॥
gopeerbhoopatih shaasta praharta vishvatomukhah ॥ 2॥

aadi karta mahaanaayakah prataapavaan॥
jagajjeevo jagaddhaata jagbharta jagadvasuh ॥ 3 ॥

matsyo bheemah kuhoobharta harta varaahamoortimaan॥
naaraayano hrsheekesho govindo garudadhvajah ॥ 4 ॥

gokulesho mahaachandrah sarvipriyakaarakah॥
kamalaamukhalolaakshah pundareekah shubhaavahah ॥ 5 ॥

durvaasaah kapilo bhaumah sindhusaagarasangamah॥
govindaro gopeetargotrah kaalindeepremapoorakah ॥ 6 ॥

gopasvaamee gokulendrah govardhanavarapradaah॥
nandaadigokulatrata daata daaridryabhanjanah ॥ 7 ॥

sarvamangaladaata ch sarvakaamvarapradaah॥
aadikarta maheebhaarata sarvasaagarasindhujah ॥ 8॥

gajagaamee gojodhari kaamee kaamakalaanidhih॥
kaalankaaritashchandro bimbasyo bimbasattamah ॥ 9 ॥

mangalakaarah krpaakaarah kokilasvarabhooshanah॥
raamo neelaambaro dehi hali dvividamardanah ॥ 10 ॥

sahasraakshapureebhettaamahaamaareevinaashanah॥
shivah shivatamo bhetta balaratiprapoojakah ॥ 11॥

kumaareevarayaad ch varenyo meeniketanah॥
naro naaraayano dheero dharapatirudaaradhih ॥ 12 ॥

shreepatih shreenidhih shreemaan maapatih pratiraajaha॥
brndaapatih kulan graamee dhaam brahmasanaatanah ॥ 13 ॥

revateeramano raamah priyashchalalochanah॥
raamaayanashareerashch raamo raamah shreepatih ॥ 14॥

sarvaah sarvaari sarvaah sarvatr shubhadaayakah॥
raadhaaraadhyaayitaraadhi raadhaachittapramodakah ॥ 15 ॥

raadhaaratisukhopeto raadhaamohanatatparah॥
raadhaavashikro raadhaahrdyamabhojashatpaadah ॥ 16॥

raadhaalinganasammodo raadhaanartanakautukah॥
raadhaasanjaatasampreeto raadhaakaamaphalapradah ॥ 17 ॥

brndaapatih kokanidhih kokashokavinaashanah॥
chandrapatishchachandrapatishchandakodandabhanjanah ॥ 18 ॥

raamo daasharathee raamo bhrguvanshasamudbhavah॥
aatmaaraamo jitakrodho moho mohaandhabhanjanah ॥ 19 ॥

vrshabhaanubhavo bhaavee kashyapih karunaanidhih॥
kolaahalo halo haalee hali haladharapriyah ॥ 20॥

raadhaamukhaabajamaartando bhaaskaro ravijo vidhuh॥
vaidharvidhata varuno varuno varuneepriyah ॥ 21 ॥

rohinihrdayaanandi vasudevaatmajo balih॥
neelaambaro rauhineyo jaraasandhavadhomalah ॥ 22 ॥

naago javaambho virudo viraha varado balee॥
gopado vijayee vidvaanah sanaatanah ॥ 23 ॥

parashuraamavachagraahee varagraahee srgaalaha॥
damaghoshopadeshta ch rathagraahee sudarshanah ॥ 24॥

veerapatiyashastrata jaraavyaadhivighaatakah॥
dvaarakaavaasattvagyo hutaashanavarapradah ॥ 25 ॥

yamunaavegasanhaaree neelaambaradharah prabhuh॥
vibhuh sharaasano dhanvee ganesho gananaayah ॥ 26 ॥

lakshmano lakshano lakshyo rakshovanshavinaayakah॥
vaamano vaamanibhooto vaamano vaamanaaruh ॥ 27 ॥

yashodaanandanah karta yamalaarjunamuktidah॥
ulookhali mahaamaano dambaddhahvyi shamee ॥ 28 ॥

bhaktaanukaaree bhagavaan keshavochaladhaarakah॥
keshiha madhuha mohi vrshaasuravighaatakah ॥ 29 ॥

aghaasuravighaatee ch pootanaamokshadaayakah॥
kubjaavinodee bhagavaan kansaamrtyumahaamukhee ॥ 30 ॥

ashvamedho vaajapeyo gomedho naradhevaan॥
kandarpakotilavanyaashchandrakotisusheetalah ॥ 31 ॥

ravikotipratikaasho vaayukotimahaabalah॥
brahma brahmaandakarta ch kamalaavanchitapradah ॥ 32 ॥

kamali kamalaakshashch kamalaamukhalolupah॥
kamalaavratadhaaree ch kamalaabhah purandarah ॥ 33 ॥

saubhaagyaadhikchittashch mahaamaayee madotkatah॥
tatkaarih suratraata maareechakshobhakaarakah ॥ 34 ॥

vishvaamitrapriyo danto raamo raajeevalochanah॥
lankaadhipakuladhvansee vibheeshanvarapradaah ॥ 35 ॥

seetaanandakaro raamo veero vaaridhibandhanah॥
kharadooshanasanhaaree saaketapuravaasavaan॥ 36 ॥

chandraavalipatih sheetalah keshikaanshavadhomarah॥
maadhavo madhuha maadhvee maadhaveeko maadhavee vibhuh ॥ 37 ॥

munjaataveegaahamaano dhenukaarirdashaatmajah॥
vansheevatavihaaree ch govardhanaashrayah ॥ 38 ॥

tatha talavanodadeshee bhaandeeravansankarah॥
trnaavartakrpaakaaree vrshabhaanusutaapatih ॥ 39 ॥

raadhaapraanasamo raadhaavadanaabjamadhutkatah॥
gopeeranjanadaivagyah leelaakamalapoojitah ॥ 40॥

kreedaakamalasandoho gopikaapreetiranjanah॥
ranjako ranjano rango rangee rangamaheeruhah ॥ 41 ॥

kaamah kaamaribhaktashch puraanapurushah kavih॥
naarado devalo bheemo baalo baalamukhaambujah ॥ 42 ॥

ambujo brahmasaakshee ch yogee dattavaro munih॥
rshabhah parvato graamo nadeepaavanavallabhah ॥ 43 ॥

padmanaabhah surajyeshtho brahma rudrohibhooshitah॥
ganaanaan traanakarta ch ganesho grahilo grahih ॥ 44 ॥

ganashrayo ganaadhyaksho krodiphaidajagatatrayah॥
yaadavendro dvaarakendro mathuraavallabho dhuree॥ 45 ॥

bhraamarah kuntali kunteesutarakshee mahaamanaah॥
jamunaavaradaata ch kashyapasy varapradah ॥ 46 ॥

shankhachoodavadhodaamo gopeerakshanatatparah॥
panchajanyakaro rami triraami vanajo jayah ॥ 47 ॥

phaalgunah phalgunasakho viraadhavakaarakah॥
rukmineepraananaathashch satyabhaamaapriyankarah ॥ 48 ॥

kalpavrksho mahaavrksho daanavrksho mahaaphalah॥
aakaasho bhusuro bhaavo bhaamako krshno harih ॥ 49 ॥

saralah shaashvato veero yaduvanshashivaatmakah॥
pradyumno balakarta ch praharta daityaha prabhuh ॥ 50 ॥

mahaadhano mahaaveero vanamaalaavibhooshanah॥
tulaseedaamashobhaadhyo jaalandharavinaashanah ॥ 51 ॥

soorah sooryo mrkandushch bhaasvaro vishvapoojitah॥
ravistamoha vahnishch badabo badabaanalah ॥ 52 ॥

daityadarpanashi ch garudo garudagrajah॥
gopeenaatho mantho brndaanaathovarodhakah ॥ 53 ॥

praapanchi pancharoopashch maataagulmashch gomatih॥
ganga ch yamunaaroopo goda vetravatee tatha ॥ 54 ॥

kaaveree narmada taapee gaandakee sarayoo raajah॥
raajasastaamasassattvee sarvaangee sarvalochanah ॥ 55 ॥

sudhaamayomrtamayo yoginaan vallabhah shivah॥
buddho buddhimataan shreshtho vishnurjishnuh shacheepatih ॥ 56 ॥

vansh vanshadharo loko viloko mohanaashanah॥
raavaraavavo raavo vaalo vaalo valaahakah ॥ 57 ॥

shivo rudro nalo neelo laangalee laangalaashrayah॥
paradaah pauro hanso hansaaroodho jagatpatih ॥ 58 ॥

mohineemohano mayi mahaamaayo mahaasukhee॥
vrsho vrshaakapih kaalah kaaleedamanakaarakah ॥ 59 ॥

kubjaabhaagyaprado veero raajakakshayakaarakah॥
komalo vaaruni raaja jalajo jaladhaarakah ॥ 60 ॥

harakah sarvapaapaghnah parameshthee pitaamahah॥
khadgadhaaree krpaakaaree raadhaaramanasundarah ॥ 61 ॥

dvaadashaaranyasambhogee sheshanaagaphanaalayah॥
kaamah shyaamah sukhashreedah shreepatih shreenidhih krtih ॥ 62 ॥

harirharo naro naro narottam ishupriyah॥
gopaalachittaharta ch karta sansaarataarakah ॥ 63 ॥

aadidevo mahaadevo gaureegururanaashrayah॥
saadhurmurvidhuradhaata traataakrooraparaayanah ॥ 64 ॥

rolambi ch hyagreevo vaanararirvanaashrayah॥
vanan vaanee vanaadhyaksho mahaavandyo mahaamunih ॥ 65 ॥

syamantakamanipragyah vigyo vighnavighaatakah॥
govardhano vardhaniyo vardhani vardhanapriyah ॥ 66 ॥

vardhaanyo vardhi vardhistu sukhapriyah॥
udyogo vrddho vrddho vrddho janapriyah ॥ 67 ॥

gopaalaramanibharta saambakushthavinaashanah॥
rukmineeharanaprema premee chandravalipatih ॥ 68 ॥

shreekarta vishvabharta ch naaraayan naro balee॥
gano ganapatishchaiv saashtaatreyo mahaamunih ॥ 69 ॥

vyaasaso naaraayano divyo bhavyo mandhaarakah॥
shvashresan shivan bhadran manidan bhuvukan shubham ॥ 70 ॥

shubhaatmakah shubhah shaasta poorno meghanaadaha॥
brahmanyadevo deenaanaamuddhaarakaranakshamah ॥ 71 ॥

krshnah kamalapatraakshah krshnah kamalalochanah॥
krshnah kaamee sada krshnah sarvapriyakaarakah ॥ 72 ॥

nando nandi mahaanandi maadi madanakah kilee॥
mailee hilee gilee golo golo golyao galee ॥ 73 ॥

guggulee maarkee shaakhee vatah pippalakah krti॥
mlechchh kaalaharta ch yashoda yash ev ch ​​॥ 74 ॥

achyutah keshavo vishnuh harih satyo janaardanah॥
hanso naaraayano neelo leeno bhaktiparaayanah ॥ 75 ॥

jaanakeevallabho raamo raajo vinaashanah॥
sinhabhaanurmahaabhaanu-raveerabhaanurmahodhih ॥ 76 ॥

samudrobdhirakupaaraah paravaarah saritpatih॥
gokulaanandakaaree ch pratigyaaparipaalakah ॥ 77 ॥

sadaaraamah krpaaraamo mahaaraamo dhanurdharah॥
parvatah parvataakaaro gayo gayo dvijapriyah ॥ 78 ॥

kamalaashvatro raamo raamaayanapravartakah॥
dyaurdivo dayo divyo bhavyo bhagee bhayaapah ॥ 79 ॥

paarvateebhaagyasahito bharta lakshmeesahaayavaan॥
vilaasee devils sarvi gauravee gauravalochanah ॥ 80 ॥

surairalokadharmagyo jeevano jeevanaantakah॥
yamo yamaariyamano yami yamavighaatakah ॥ 81 ॥

vanshulee paanshuli paansuh paandurarjunavallabhah॥
lalita chandrikaamaala maalee maalaambujaashrayah ॥ 82 ॥

ambujaaksho mahaayaksho dakshinachintaamaniprabhuh॥
manirdinamanishchaiv kedaaro badreeshrayah ॥ 83 ॥

badreevanasampreeto vyaasah satyavateesutah॥
amaraarinihanta ch sudhaasindhuvidhudayah ॥ 84 ॥

chandro ravih shivah shoolee chakree chaiv gadaadharah॥
shreekarta shreepatih shreedah shreedevo devakeesutah ॥ 85 ॥

shreepatih pundareekaakshah padmanaabho jagatpatih॥
vaasudevoprameyaatma keshavo garudadhvajah ॥ 86 ॥

naaraayanah paran dhaam devadevo maheshvarah॥
chakrapaanih kalaapoorno vedavedyo dayaanodih ॥ 87 ॥

bhagavaan sarvabhootesho gopaalah sarvapaalakah॥
ananto nirguno nityo nirvikalpo niranjanah ॥ 88 ॥

niraadhaaro niraakaaro niraabhaaso niraashrayah॥
purushah pranavateeto mukundah bhagavaanah ॥ 89 ॥

kshanaavanih sarvabhaumo vaikuntho bhaktavatsalah॥
vishnuradaamodarah krshno maadhavo mathuraapatih ॥ 90 ॥

devakeegarbhasambhooto yashodaavatsalo harih॥
shivah sankarshanah shambhurbhootanaatho dippatih ॥ 91 ॥

avyayah sarvadharmagyo nirmalo nirupadravah॥
nirvaananaayako nityo neelajeemutsannibah ॥ 92 ॥

kalaakshayashch sarvagyah kamalaaroopatatparah॥
hrsheekeshah peetavaasa vaasudevapriyaatmajah ॥ 93 ॥

nandagopakumaarayor navaneetaashano vibhuh॥
puraanah purushashreshthah shankhapaanih suvikramah ॥ 94 ॥

aniruddhashchakradharah shaarangapaanishchaturbhujah॥
gadaadharah suratighno govindo nandakaayudhah ॥ 95 ॥

brndaavanacharah shaurirvenuvaadyavishaaradah॥
trnaavartantako bheemasaahaso bahuvikramah ॥ 96 ॥

shaktaasur sanhaare bakaasuravinaashanah॥
dhenukaasurasanhaaree pootanaarirnakesaree ॥ 97 ॥

pitaamaho gurussasaakshee pratyagaatma sadaashivah॥
aprameyah prabhuh praagyopratarkyah svapnavardhanah ॥ 98 ॥

dhanyo manayo bhaavo bhaavo dheerah shaanto jagguruh॥
antaryaameeshvaro divyo daivagyo devasanstutah ॥ 99 ॥

ksheerabdhishayano dhaata lakshmeevaan lakshmaagraj:॥
dhaatreepatiraameyaatma chandrashekharapoojitah ॥ 100 ॥

lokasaakshee jagachchakshuh punyacharitrakeertanah॥
kotimanmathasaundaryo jaganmohanavigrahah ॥ 101 ॥

mandasmitaanurgopagopikaapariveshatah॥
phullaravindanayanashchaanuraandhranishudanah ॥ 102 ॥

indeevaradalashyaamo barhibarhaavatansakah॥
muraleeninadaahlaado divyamaalaambaraavrtah ॥ 103 ॥

sukapolayugah subhrooyugalah sullaatakam॥
kambugreevo vishaalaaksho lakshmeevanchubhalakshanah ॥ 104 ॥

peenavakshaashchaturbaahushchaturmoortistrivikramah॥
kaalankaaritah shuddho dushtashatrunibarhanah ॥ 105 ॥

kireetakundaladharah katakaanagadamanditah॥
mudrikaabharanopetah katisootraviraajitah ॥ 106 ॥

manjeeranjitapadah sarvaabharanabhooshitah॥
vinyastapaad yugalo divyamangalavigrahah ॥ 107 ॥

gopikaayanaanandah poornachandranibhaanah॥
sarvajagadaanandah sundaro lokanandanah ॥ 108 ॥

yamunaateerasanchaaree raadhaamanmathaibhavah॥
gopanaaripriyo danto gopeevastropahaarakah ॥ 109 ॥

shreegaarmoortih shreedhaama taarako moolakaranam॥
srshtisanrakshanopaayah kroraasuravibhanjanah ॥ 110॥

helaasurasanhaare muraarivairimardanah॥
aditipriyo daityabhikaaro yadushekharah ॥ 111॥

jaraasandhakuladhvansi kansaratih suvikramah॥
punyashlokah keertaniyo yaadavendro jagannutah ॥ 112 ॥

rukmeenirmanah satyabhaamaajaambavateepriyah॥
mitravindaanaagnilakshmanaasamupaasitah ॥ 130 ॥

sudhaakarakule jaatonantah prabalavikramah॥
sarvasaubhaagyasampanno dvaarakaapat phlaitanasthitah ॥ 114 ॥

bhadrasooryasutaanaatho leelaamaanushavigrahah॥
sahasrashodhashaastreesho bhogamokshaayakah ॥ 115 ॥

vedaantavedyah sanvedyo vaidyo brahmaandanaayakah॥
govardhanadharo naathah sarvajeevadayaaparah ॥ 116 ॥

moortimaan sarvabhootaatma aartatraanaparaayanah॥
sarvagyah sarvasulabhah sarvashaastravishaaradah ॥ 117॥

shadgunaishvaryasampannah poornakaamo dhurandharah॥
mahaanubhaavah kaivalyadaayako lokanaayakah ॥ 118॥

aadimadhyaantaritah shuddhasaattvikavigrahah॥
samagrah sarvaatma sharanagatavatsalah ॥ 119 ॥

utpattisthitisanhaarakaaranan sarvakaaranam॥
mahatvah sarvabhaavagyah sachchidaanandavigrahah ॥ 120 ॥

vishvaksenah satyasandhah satyavaak satyavikramah॥
satyavratah satyatah satyadharmaparaayanah ॥ 121 ॥

apannaartiprashamanah dropadeemaanarakshakah॥
kandarpajanakah praagyo jagannaatakavaibhavah ॥ 122 ॥

bhaktivashayo gunaateetah sarvaishvaryapradaayakah॥
damaghoshasutadveshee baanabaahuvikhandanah ॥ 123 ॥

bheeshmabhaktiprado divyah kauravanaashanah॥
kaunteyapriyabandhushch paarthasyandanasaarathih ॥ 124 ॥

naarasinho mahaaveerah stambhajaato mahaabalah॥
prahlaadavaradah satyo devapoojyobhayankarah ॥ 125 ॥

upendr indrabandhavarajo vaamano balinaah॥
gajendravaradah svaamee sarvadevanamaskrtah ॥ 126 ॥

sheshaparyankshayano vanteyeratho jayi॥
avyaahatabalaishvaryasampannah poornamaanasah ॥ 127 ॥

yogeeshvareshvarah saakshaat kshetragyo gyaanadaayakah॥
yogihrtapankajaavaaso yogamaayasamanvitah ॥ 128 ॥

naadabindukalaateetashchaturvargaphalapradah॥
sushumnaamaargasanchaaree dehasyaantarasansthitah ॥ 129 ॥

dehendroniyamahpraanasaakshee chetahprasaadakah॥
sookshmah sarvagato dehi gyaanadarpanagocharah ॥ 130 ॥

tattvatrayaatmakovyaktah kundalee samaapaashritah॥
brahmanyah sarvadharmagyah shaanto danto gatiklamah ॥ 131 ॥

shreenivaasah sadaanando vishvamoortirmahaaprabhuh॥
sahasrasheersha purushah sahasraakshah sahasarpat ॥ 132 ॥

samagrabhuvanaadhaarah samagrapraanarakshakah॥
sarvasvabhaavagyo gopikaapraanavallabhah ॥ 133 ॥

nityotsavo nityasaukhyo nityashreenityamangalam॥
vyoohaarchito jagannaathah shreevaikunthapuraadhipah ॥ 134 ॥

poornaanandaghaneebhooto gopaveshadharo harih॥
kalaapakusumashyaamah komalah shaantavigrahah ॥ 135 ॥

gopaangaanaavrtonaananto brndaavanasamaashrayah॥
venunaadaaratah shreshtho devaanaan hitakaarakah ॥ 136 ॥

jalakreedaasamaasakto navaneetasy taaraah॥
gopaalakaamineejaarashorjaashikhaamanih ॥ 137 ॥

pranjyotih prakaashah paraavaasah parishphutah॥
ashtaadashaaksharo mantro vyaapako lokapaavanah ॥ 138 ॥

saptakotimamahaamantrashekharo devashekharah॥
vigyaanagyaanasandhaanastejoraashirjagatpatih ॥ 139 ॥

bhaktalokaprasannaatma bhaktamandaravigrahah॥
bhaktadaaridryashamano bhaktaanaan priyataapakah ॥ 140 ॥

bhakt adheenamanaah poojyo bhaktalokashivankarah॥
bhaktaabheeshtapradah sarvabhaktaghaughnikraantakah ॥ 141 ॥

apaarakarunaasindhurbhagavaan bhaktatatparah ॥ 142 ॥

iti shreeraadhikaanaath naamnaan saahasamiritam॥
smaranaatpaaparaasheenaan khandanan mrtyunaashanam ॥ 143 ॥

vaishnavaanaan priyakaran mahaadaaridryanaashanam॥
brahmahatyaasuraapannan parastreegamanan tatha ॥ 144 ॥

paradravyaapaharanan paradveshasamanvitam॥
manasan vaachikan kaayan yatpaapan paapasambhavam ॥ 145॥

sahasranaamapathanaatsarve nashyanti tatkshanaat॥
mahaadaaridryayukto vai vaishnavo vishnubhaktimaan॥ 146॥

kaartikyaan yah pathedratrau shatamashtotan kramaat॥
peetaambaradharo dheemann sugandhi pushpachandanaih ॥ 147॥

bukan poojyitva ch naivedyaadibhirev ch॥
raadhaadhyaanaankito dheero vanamaalaavibhooshitah ॥ 148॥

shatamashtottan devee patthainamasahasrakam॥
chaitre krshne ch shukle ch kuhusukraantivaasare ॥ 149॥

patitavyan prayatnen trailokyan mohayet kshanaat॥
tulaseemaalaya yukto vaishnavo bhaktitatparah ॥ 150॥

ravivaare ch shukre ch dvaadashyaan shraaddhaashre॥
braahmanan poojayitva ch bhojayitva vihitatah ॥ 151॥

pathenanaamasahasran ch tatah siddhih prajaayate॥
mahaanishaayaan satatan vaishnavo yah pathetsada ॥ 152॥

deshaantaragata lakshmeeh samayati na sanshayah॥
trailokye tu mahaadevee sundaryah kaamamohitaah ॥ 153॥

mugdhaah svayan samayanti vaishnavan ch bhajanti taah॥
rogee rogaatpramuchyet baddho muchyet bandhanaat ॥ 154॥

garbhinee janayetputran kanya vindati shatapatim॥
raajaano vashtaan yaanti kin punah aarambh kshudramanushaah ॥ 155॥

sahasranaamashravanaat pathaat poojanaat priye॥
dhaaranaat sarvamaapnoti vaishnavo naatr sanshayah ॥ 156॥

vanshaivate chaanyavate tatha pippalaketh va॥
charanapaadapaatale shreegopaalasy sannidhau ॥ 157॥

yah pathedvaishnvo nityan sa yaati harimandiram॥
krshnenoktan raadhaayai taiy proktan pura shive ॥ 158॥

naaradaay maaya proktan naaraden prakaashitam॥
maaya tav vararohe proktametatsudurlabham ॥ 159॥

vishvaasan prayaasen na prakaashyan kadaachan॥
shathaay paapine chaiv lampatay visheshatah ॥ 160॥

na daatavyan na daatavyan na daatavyan kadaachan॥
deyan shaantaay shishyaay vishnubhaktirataay ch ॥ 161॥

godaanabrahmayagyaderavaajapeyashatasy ch॥
ashvamedhasahasrasy phalan paathe bhaveddhruvam ॥ 162॥

mohanan stambhanan chaiv maaranochchaatanaadikam॥
yadyadvanchati chitten tattatpraapnoti vaishnavah ॥ 163॥

ekaadashyaan narah snaatva sugandhadravyatalaikaih॥
aahaaran braahmane dattva dakshinaan svarnabhooshanam ॥ 164॥

tatah nishchayakartaasau sarvan praapnoti maanavah॥
shataavrttan sahasran ch yah pathedvaishnvo janah ॥ 165॥

shreebrndaavanachandrasy prasaadaatsarvamaapnuyaat॥
yadgrhe pustakan devee poojitan chaiv tishthati ॥ 166॥

na maaree na ch durbhikshan nopasargabhyan kvachit॥
saaraadibhootayakshaady nashyante naatr sanshayah ॥ 167॥

shreegopaalo mahaadevee vasettasy grhe sada॥
yadgrhe ch sahasran ch naamnaan tishthati poojitam ॥ 168॥

Iti shreesammohanatrte haragaureesanvaade shreegopaalasahasranaamastotram॥


श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् के लाभ

श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली स्तोत्र है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण के एक हजार नामों का वर्णन किया गया है। इस स्तोत्र के नियमित पाठ से अनेक आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं। आइए, इन लाभों को विस्तार से समझें।

मानसिक शांति और स्थिरता: श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का नियमित पाठ करने से मन को अद्वितीय शांति और स्थिरता प्राप्त होती है। इसके नामों के उच्चारण से मन के विकार दूर होते हैं और मानसिक तनाव, चिंता और अवसाद का नाश होता है। यह व्यक्ति को एकाग्रचित्त बनाता है और उसकी मानसिक स्थिति को संतुलित करता है।

आध्यात्मिक उन्नति: इस स्तोत्र के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है, जिससे भक्त का आध्यात्मिक स्तर बढ़ता है। इसके पाठ से आत्मा की शुद्धि होती है और व्यक्ति को आत्मज्ञान प्राप्त होता है। यह स्तोत्र भक्त के हृदय में भक्ति और प्रेम की भावना को जागृत करता है, जिससे उसका भगवान के साथ संबंध और गहरा होता है।

पापों का नाश: श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् के उच्चारण से व्यक्ति के समस्त पापों का नाश होता है। भगवान श्रीकृष्ण के एक हजार नामों का स्मरण करने से व्यक्ति के जीवन में किए गए सभी पाप और दोष नष्ट हो जाते हैं। इससे व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है और वह पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो जाता है।

स्वास्थ्य लाभ: इस स्तोत्र के पाठ से व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। यह व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है और उसे विभिन्न बीमारियों से मुक्त रखता है। इसके नियमित पाठ से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे व्यक्ति स्वस्थ और तंदुरुस्त रहता है।

धन, समृद्धि और सुख-शांति: श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् के नियमित पाठ से व्यक्ति के जीवन में धन, समृद्धि और सुख-शांति की प्राप्ति होती है। भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से व्यक्ति के सभी कष्ट और समस्याएँ दूर होती हैं और उसे आर्थिक संपन्नता और समृद्धि प्राप्त होती है। यह स्तोत्र व्यक्ति के घर में सुख-शांति और हर्षोल्लास का वातावरण बनाता है।

परिवारिक कल्याण: इस स्तोत्र के पाठ से परिवार में प्रेम, सौहार्द और एकता बनी रहती है। इसके प्रभाव से परिवार के सभी सदस्य एक-दूसरे के प्रति सम्मान और स्नेह की भावना रखते हैं। यह स्तोत्र परिवार के सभी सदस्यों की रक्षा करता है और उन्हें सुखी और समृद्ध जीवन प्रदान करता है।

कार्यों में सफलता: श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् के पाठ से व्यक्ति को उसके कार्यों में सफलता प्राप्त होती है। भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से व्यक्ति के सभी कार्य बिना किसी बाधा के सफलतापूर्वक संपन्न होते हैं। यह स्तोत्र व्यक्ति की जीवन में आने वाली सभी कठिनाइयों और बाधाओं को दूर करता है और उसे सफलता के मार्ग पर अग्रसर करता है।

मोक्ष की प्राप्ति: इस स्तोत्र के माध्यम से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। भगवान श्रीकृष्ण के एक हजार नामों का स्मरण करने से व्यक्ति को इस संसार के बंधनों से मुक्ति मिलती है और वह भगवान के चरणों में स्थान पाता है।

अतः, श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का नियमित पाठ करने से व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक, आर्थिक और आध्यात्मिक सभी प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं।

FAQ – श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् (Gopal Sahastranam Stotram

गोपाल सहस्त्रनाम का पाठ कब करना चाहिए?

गोपाल सहस्त्रनाम का पाठ किसी भी शुभ अवसर पर किया जा सकता है। विशेष रूप से, इसे बुधवार और शुक्रवार के दिन करना अधिक फलदायी माना जाता है।

गोपाल सहस्त्रनाम पाठ करने से क्या फायदा होता है?

गोपाल सहस्त्रनाम पाठ करने से मानसिक शांति, सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। यह पाठ मन की एकाग्रता को बढ़ाता है और जीवन में आने वाली कठिनाइयों को दूर करता है।

संतान गोपाल मंत्र का पाठ कितनी बार करना है?

संतान गोपाल मंत्र का पाठ कम से कम 108 बार करना चाहिए। संतान प्राप्ति और संतान की सुरक्षा के लिए इस मंत्र का नियमित रूप से जप करना लाभकारी होता है।

गोपाल पाठा कौन है?

गोपाल पाठा भगवान श्रीकृष्ण का एक अन्य नाम है। इसे विशेष रूप से उनके बाल रूप के संदर्भ में उपयोग किया जाता है।

गोपाल सहस्त्रनाम के रचयिता कौन है?

गोपाल सहस्त्रनाम का रचनाकार स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं है, परंतु यह माना जाता है कि यह ग्रंथ वैदिक ऋषियों द्वारा रचा गया है।

गोपाल कवच क्या फल है?

गोपाल कवच का पाठ करने से व्यक्ति की रक्षा होती है और उसे जीवन में आने वाली बाधाओं से मुक्ति मिलती है। यह कवच नकारात्मक ऊर्जा और बुरी नजर से बचाता है।

विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने से क्या होता है?

विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। यह पाठ जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाता है और व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करता है।

श्री जाहरवीर चालीसा – Shri Jaharveer Chalisa PDF 2024-25

श्री जाहरवीर चालीसा (Shri Jaharveer Chalisa PDF) एक अत्यंत लोकप्रिय और श्रद्धेय धार्मिक स्तुति है, जिसे भगवान जाहरवीर जी की महिमा का गान करने के लिए लिखा गया है। जाहरवीर जी, जिन्हें जाहरवीर गोगा जी महाराज या गोगा वीर के नाम से भी जाना जाता है, राजस्थान और हरियाणा के अनेक भागों में व्यापक रूप से पूजे जाते हैं। वे विशेषकर नागवंशी राजपूतों के बीच में पूजनीय माने जाते हैं, लेकिन उनकी भक्ति का प्रसार सभी जातियों और समुदायों में है।

जाहरवीर जी का जीवन और उनके चमत्कारिक कार्य उनकी भक्ति और श्रद्धा का प्रतीक हैं। वे अपने जीवनकाल में अद्वितीय साहस और न्यायप्रियता के लिए जाने जाते थे। उनकी वीरता की कहानियाँ आज भी लोकगीतों और कहानियों के माध्यम से लोगों के बीच जीवंत हैं। गोगा जी महाराज को मुख्य रूप से नाग देवता के रूप में पूजा जाता है, जो कि नागों और अन्य जहरीले जीवों से रक्षा करने वाले माने जाते हैं। इस कारणवश, उनके भक्त उन्हें नागराज के रूप में भी संबोधित करते हैं।

श्री जाहरवीर चालीसा का पाठ करने से भक्तों को जीवन में आने वाली विपत्तियों से मुक्ति मिलती है, और उन्हें आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह चालीसा भगवान जाहरवीर जी की स्तुति करते हुए उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं का वर्णन करती है, जिसमें उनके वीरता भरे कार्य, दया, करुणा और न्यायप्रियता का उल्लेख है। इस चालीसा के माध्यम से भक्त उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए उनसे प्रार्थना करते हैं और जीवन में आने वाली कठिनाइयों का सामना करने के लिए शक्ति प्राप्त करते हैं।

श्री जाहरवीर चालीसा का महत्व सिर्फ धार्मिक दृष्टिकोण से ही नहीं है, बल्कि यह भक्ति और आध्यात्मिकता का भी प्रतीक है। इसका पाठ करने से मानसिक शांति मिलती है और भक्तों को आत्मिक बल मिलता है। यह चालीसा जाहरवीर जी के प्रति गहरी आस्था और प्रेम का परिचायक है। इसे श्रद्धा से पढ़ने वाले भक्तों का विश्वास है कि इससे जीवन के सभी संकट दूर होते हैं और उनके परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।

श्री जाहरवीर चालीसा का पाठ विशेष अवसरों पर जैसे पूजा, व्रत, और त्योहारों में किया जाता है। इसे नित्य पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और उसके समस्त कष्टों का निवारण होता है। आज के समय में, जब जीवन में अनेक प्रकार के तनाव और चुनौतियाँ हैं, इस चालीसा का पाठ व्यक्ति को मानसिक शांति और धैर्य प्रदान करता है।

इसलिए, जो भी भक्त श्री जाहरवीर चालीसा का पाठ सच्चे मन से करता है, उसे निश्चित रूप से जाहरवीर जी की कृपा प्राप्त होती है। इस चालीसा के पाठ से न केवल व्यक्ति की आत्मा को शांति मिलती है, बल्कि उसे भगवान जाहरवीर जी की दिव्य शक्ति का भी अनुभव होता है। यदि आप भी जाहरवीर जी की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं और जीवन के समस्त संकटों से मुक्ति पाना चाहते हैं, तो श्री जाहरवीर चालीसा का नियमित पाठ अवश्य करें।



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|| श्री जाहरवीर चालीसा ||

॥ दोहा ॥

सुवन केहरी जेवर, सुत महाबली रनधीर ।
बन्दौं सुत रानी बाछला, विपत निवारण वीर ॥
जय जय जय चौहान, वन्स गूगा वीर अनूप ।
अनंगपाल को जीतकर, आप बने सुर भूप ॥

॥ चौपाई ॥

जय जय जय जाहर रणधीरा । पर दुख भंजन बागड़ वीरा ॥१॥
गुरु गोरख का है वरदानी । जाहरवीर जोधा लासानी ॥२॥
गौरवरण मुख महा विशाला । माथे मुकट घुंघराले बाला ॥३॥
कांधे धनुष गले तुलसी माला । कमर कृपान रक्षा को डाला ॥४॥

जन्में गूगावीर जग जाना । ईसवी सन हजार दरमियाना ॥५॥
बल सागर गुण निधि कुमारा । दुखी जनों का बना सहारा ॥६॥
बागड़ पति बाछला नन्दन । जेवर सुत हरि भक्त निकन्दन ॥७॥
जेवर राव का पुत्र कहाये । माता पिता के नाम बढ़ाये ॥८॥

पूरन हुई कामना सारी । जिसने विनती करी तुम्हारी ॥९॥
सन्त उबारे असुर संहारे । भक्त जनों के काज संवारे ॥१०॥
गूगावीर की अजब कहानी । जिसको ब्याही श्रीयल रानी ॥११॥
बाछल रानी जेवर राना । महादुःखी थे बिन सन्ताना ॥१२॥

भंगिन ने जब बोली मारी । जीवन हो गया उनको भारी ॥१३॥
सूखा बाग पड़ा नौलक्खा । देख-देख जग का मन दुक्खा ॥१४॥
कुछ दिन पीछे साधू आये । चेला चेली संग में लाये ॥१५॥
जेवर राव ने कुआ बनवाया । उद्घाटन जब करना चाहा ॥१६॥

खारी नीर कुए से निकला । राजा रानी का मन पिघला ॥१७॥
रानी तब ज्योतिषी बुलवाया । कौन पाप मैं पुत्र न पाया ॥१८॥
कोई उपाय हमको बतलाओ । उन कहा गोरख गुरु मनाओ ॥१९॥
गुरु गोरख जो खुश हो जाई । सन्तान पाना मुश्किल नाई ॥२०॥

बाछल रानी गोरख गुन गावे । नेम धर्म को न बिसरावे ॥२१॥
करे तपस्या दिन और राती । एक वक्त खाय रूखी चपाती ॥२२॥
कार्तिक माघ में करे स्नाना । व्रत इकादसी नहीं भुलाना ॥२३॥
पूरनमासी व्रत नहीं छोड़े । दान पुण्य से मुख नहीं मोड़े ॥२४॥

चेलों के संग गोरख आये । नौलखे में तम्बू तनवाये ॥२५॥
मीठा नीर कुए का कीना । सूखा बाग हरा कर दीना ॥२६॥
मेवा फल सब साधु खाए । अपने गुरु के गुन को गाये ॥२७॥
औघड़ भिक्षा मांगने आए । बाछल रानी ने दुख सुनाये ॥२८॥

औघड़ जान लियो मन माहीं । तप बल से कुछ मुश्किल नाहीं ॥२९॥
रानी होवे मनसा पूरी । गुरु शरण है बहुत जरूरी ॥३०॥
बारह बरस जपा गुरु नामा । तब गोरख ने मन में जाना ॥३१॥
पुत्र देन की हामी भर ली । पूरनमासी निश्चय कर ली ॥३२॥

काछल कपटिन गजब गुजारा । धोखा गुरु संग किया करारा ॥३३॥
बाछल बनकर पुत्र पाया । बहन का दरद जरा नहीं आया ॥३४॥
औघड़ गुरु को भेद बताया । तब बाछल ने गूगल पाया ॥३५॥
कर परसादी दिया गूगल दाना । अब तुम पुत्र जनो मरदाना ॥३६॥

लीली घोड़ी और पण्डतानी । लूना दासी ने भी जानी ॥३७॥
रानी गूगल बाट के खाई । सब बांझों को मिली दवाई ॥३८॥
नरसिंह पंडित लीला घोड़ा । भज्जु कुतवाल जना रणधीरा ॥३९॥
रूप विकट धर सब ही डरावे । जाहरवीर के मन को भावे ॥४०॥

भादों कृष्ण जब नौमी आई । जेवरराव के बजी बधाई ॥४१॥
विवाह हुआ गूगा भये राना । संगलदीप में बने मेहमाना ॥४२॥
रानी श्रीयल संग परे फेरे । जाहर राज बागड़ का करे ॥४३॥
अरजन सरजन काछल जने । गूगा वीर से रहे वे तने ॥४४॥

दिल्ली गए लड़ने के काजा । अनंग पाल चढ़े महाराजा ॥४५॥
उसने घेरी बागड़ सारी । जाहरवीर न हिम्मत हारी ॥४६॥
अरजन सरजन जान से मारे । अनंगपाल ने शस्त्र डारे ॥४७॥
चरण पकड़कर पिण्ड छुड़ाया । सिंह भवन माड़ी बनवाया ॥४८॥

उसीमें गूगावीर समाये । गोरख टीला धूनी रमाये ॥४९॥
पुण्य वान सेवक वहाँ आये । तन मन धन से सेवा लाए ॥५०॥
मनसा पूरी उनकी होई । गूगावीर को सुमरे जोई ॥५१॥
चालीस दिन पढ़े जाहर चालीसा । सारे कष्ट हरे जगदीसा ॥५२॥
दूध पूत उन्हें दे विधाता । कृपा करे गुरु गोरखनाथ ॥५३॥

॥ इति श्री जाहरवीर चालीसा संपूर्णम् ॥

|| Jaharveer Chalisa PDF ||

॥ Doha ॥
Suvana Kehari Jevar, Suta Mahabali Ranadhira।
Bandau Suta Rani Bachhala, Bipta Nivarana Vira॥

Jai Jai Jai Chauhana, Vansa Guga Vira Anupa।
Anangapala Ko Jitakara, Apa Bane Sura Bhupa॥

॥ Chaupai ॥
Jai Jai Jai Jahara Ranadhira।
Para Dukha Bhanjana Bagada Vira॥
Guru Gorakha Ka Hai Vardani।
Jaharvira Jodha Lasani॥

Gauravarana Mukha Maha Vishala।
Mathe Mukuta Ghunghrale Bala॥
Kandhe Dhanusha Gale Tulasi Mala।
Kamara Kripana Raksha Ko Dala॥

Janmen Gugavira Jaga Jana।
Isvi Sana Hajar Daramiyana॥
Bala Sagara Guna Nidhi Kumara।
Dukhi Jano Ka Bana Sahara॥

Bagada Pati Bachala Nandana।
Jewara Suta Hari Bhakata Nikandana॥
Jevar Rava Ka Putra Kahaye।
Mata Pita Ke Nama Badhaye॥

Purana Hui Kamana Sari।
Jisane Vinati Kari Tumhari॥
Santa Ubare Asura Samhare।
Bhakta Jano Ke Kaja Sanvare॥

Gugavira Ki Ajaba Kahani।
Jisako Byahi Shriyala Rani॥
Bachala Rani Jevara Rana।
Mahadukhi The Bina Santana॥

Bhangina Ne Jaba Boli Mari।
Jivana Ho Gaya Unako Bhari॥
Sukha Baga Pada Naulakha।
Dekha-Dekha Jaga Ka Mana Dukha॥

Kucha Dina Pichhe Sadhu Aye।
Chela Cheli Sanga Me Laye॥
Jevara Rava Ne Kua Banvaya।
Udghatana Java Karana Chaha॥

Khari Nira Kue Se Nikala।
Raja Rani Ka Mana Pighala॥
Rani Taba Jyotishi Bulvaya।
Kauna Papa Me Putra Na Paya॥

Koi Upai Hamako Batalao।
Una Kaha Gorakha Guru Manao॥
Guru Gorakha Jo Khush Ho Jayi।
Santana Pana Mushkil Nayi॥

Bachala Rani Gorakha Guna Gave।
Nema Dharama Ko Na Bisrave॥
Kare Tapsya Dina Aur Rati।
Eka Vakta Khai Rukhi Chapati॥

Kartika Magha Me Kare Snana।
Vrata Ikadasi Nhi Bhulana॥
Puranamasi Vrata Nahi Chhode।
Dana Punya Se Mukha Nahi Mode॥

Chelon Ke Sanga Gorakha Aye।
Naulakhe Mein Tambu Tanvaye॥
Mitha Nira Kue Ka Kina।
Sukha Baga Hara Kara Dina॥

Meva Phala Saba Sadhu Khae।
Apane Guru Ke Guna Ko Gaye॥
Aughada Bhiksha Mange Aye।
Bachala Rani Ne Dukha Sunaye॥

Aughada Jana Liyo Mana Mahi।
Tapa Bala Se Kucha Mushkila Nahi॥
Rani Hove Manasa Puri।
Guru Sharana Hain Bahuta Jaruri॥

Baraha Barasa Japa Guru Nama।
Taba Gorakha Ne Mana Me Jana॥
Putra Dena Ko Hami Bhara Li।
Puranamasi Nischaya Kara Li॥

Kachhala Kapatina Gajaba Gujara।
Dhokha Guru Sanga Kiya Karara॥
Bachhala Banakara Putra Paya।
Bahana Ka Darada Jara Nahi Aya॥

Aughada Guru Ko Bheda Bataya।
Taba Bachhala Ne Gugala Paya॥
Kara Paradasi Diya Gugala Dana।
Aba Tuma Putra Jano Maradana॥

Lili Ghodi Aur Pandatani।
Luna Dasi Ne Bhi Jani॥
Rani Gugala Bata Ke Khayi।
Saba Banjho Ko Mili Dabayi॥

Narasimha Pandita Lila Ghoda।
Bhajju Kutawala Jana Ranadhira॥
Rupa Vikata Dhara Saba Hi Darave।
Jaharvira Ke Mana Ko Bhave॥

Bhado Krishna Jaba Naumi Ayi।
Jevararava Ke Baji Badhayi॥
Vivaha Hua Guga Bhaye Rana।
Sangaldipa Me Bane Mehamana॥

Rani Shriyala Sanga Pare Phere।
Jahara Raja Bagada Ka Kare॥
Arajana Sarajana Kachhala Jane।
Guga Vira Se Rahe Ve Tane॥

Dilli Jaye Ladne Ke Kaja।
Ananga Pala Chadhe Maharaja॥
Usane Gheri Bagada Sari।
Jaharvira Na Himmata Hari॥

Arajana Sarajana Jana Se Mare।
Anangapala Ne Shastra Dare॥
Charana Pakadkara Pinda Chhudaya।
Singha Bhavana Madi Banavaya॥

Usime Gugavira SAmaye।
Gorakha Tila Dhuni Ramaye॥
Punya Vana Sevaka Vahan Aye।
Tana Mana Dhana Se Seva Lae॥

Manasa Puri Unaki Hoyi।
Gugavira Ki Samare Joyi॥
Chalis Din Padhe Jahara Chalisa।
Sare Kasta Hare Jagadisa॥

Dudha Puta Unahe De Vidhata।
Kripa Kare Guru Gorakhanatha॥




श्री जाहरवीर चालीसा के लाभ

श्री जाहरवीर चालीसा, जिसे गोगा जी महाराज की स्तुति में लिखा गया है, भक्ति और श्रद्धा का अद्वितीय स्रोत है। जाहरवीर जी, जिनके बारे में माना जाता है कि वे नाग देवता हैं और जिन्हें भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न हिस्सों में अत्यधिक सम्मानित किया जाता है, की चालीसा का पाठ भक्तों के लिए अनेक लाभकारी परिणाम लेकर आता है। इस लेख में, हम श्री जाहरवीर चालीसा के विभिन्न लाभों पर विस्तार से चर्चा करेंगे, जो भक्ति, मानसिक शांति, और जीवन की विभिन्न समस्याओं के समाधान से संबंधित हैं।

भक्ति और श्रद्धा का संवर्धन

श्री जाहरवीर चालीसा का नियमित पाठ भक्तों के दिल में भगवान जाहरवीर जी के प्रति गहरी भक्ति और श्रद्धा को जन्म देता है। चालीसा के श्लोकों में जाहरवीर जी की अद्वितीय शक्तियों, उनके चमत्कारिक कार्यों और उनके भक्तों के प्रति करुणा का वर्णन किया गया है। इस पाठ के माध्यम से भक्तों को भगवान की उपस्थिति का एहसास होता है और वे अपने जीवन में अधिक समर्पित और श्रद्धालु बनते हैं।

आध्यात्मिक उत्थान

श्री जाहरवीर चालीसा का पाठ करने से भक्तों को आध्यात्मिक उत्थान की प्राप्ति होती है। यह चालीसा एक शक्तिशाली साधन है जो भक्तों को मानसिक शांति और आत्मिक संतुलन प्रदान करता है। चालीसा के पाठ से व्यक्ति अपने आध्यात्मिक पथ पर स्थिरता प्राप्त करता है और उसकी आत्मा को शांति और सुकून मिलता है। इससे व्यक्ति का आंतरिक विकास होता है और उसे जीवन के महत्वपूर्ण उद्देश्यों का बोध होता है।

विपत्तियों से मुक्ति

जाहरवीर जी को विशेषकर उन व्यक्तियों के रक्षक के रूप में पूजा जाता है जो किसी प्रकार की विपत्ति या संकट का सामना कर रहे होते हैं। श्री जाहरवीर चालीसा का पाठ करने से भक्त अपने जीवन की विभिन्न समस्याओं और संकटों से मुक्ति पा सकते हैं। यह चालीसा उन्हें आत्मिक शक्ति प्रदान करती है जिससे वे किसी भी कठिनाई का सामना कर सकते हैं। चालीसा के मंत्र और श्लोक संकटों के नाशक होते हैं और भक्तों को मानसिक और भावनात्मक समर्थन प्रदान करते हैं।

स्वास्थ्य और समृद्धि में वृद्धि

श्री जाहरवीर चालीसा के नियमित पाठ से स्वास्थ्य और समृद्धि में भी वृद्धि होती है। भगवान जाहरवीर जी की कृपा से भक्तों की शारीरिक और मानसिक स्थिति में सुधार होता है। यह चालीसा शरीर और मन दोनों को स्वस्थ और सशक्त बनाती है। भक्तों की जीवनशैली में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं और उन्हें आर्थिक समृद्धि भी प्राप्त होती है। चालीसा की कृपा से जीवन में सुख और समृद्धि का आगमन होता है।

सुरक्षा और शांति

श्री जाहरवीर चालीसा का पाठ भक्तों को सुरक्षा और शांति प्रदान करता है। भगवान जाहरवीर जी को नागराज के रूप में पूजा जाता है, जो कि नागों और जहरीले जीवों से रक्षा करने वाले माने जाते हैं। इस प्रकार, चालीसा का पाठ करने से भक्तों को विभिन्न प्रकार की भयानक स्थितियों और संकटों से सुरक्षा मिलती है। इसके साथ ही, चालीसा की शक्ति से भक्तों के जीवन में शांति और संतुलन बना रहता है।

परिवार में सुख-शांति

श्री जाहरवीर चालीसा का पाठ परिवार के सभी सदस्य को एकजुट और सुखी बनाए रखने में सहायक होता है। परिवार में आपसी समझ, सहयोग और प्रेम की भावना को बढ़ावा देने के लिए चालीसा का पाठ किया जाता है। इससे घर में एक सकारात्मक और शांतिपूर्ण वातावरण बनता है और परिवार के सभी सदस्य मानसिक शांति का अनुभव करते हैं।

नैतिक और मानसिक बल

श्री जाहरवीर चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति को नैतिक और मानसिक बल मिलता है। चालीसा के श्लोकों में भगवान जाहरवीर जी की वीरता और न्यायप्रियता का वर्णन है, जो भक्तों को अपने जीवन में साहस और शक्ति का अनुभव कराता है। यह चालीसा व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में आत्मविश्वास और धैर्य बनाए रखने में मदद करती है।

आध्यात्मिक मार्गदर्शन

श्री जाहरवीर चालीसा का पाठ भक्तों को आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करता है। यह चालीसा भक्तों को जीवन के सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है और उन्हें अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए मार्गदर्शन करती है। इसके माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन के लक्ष्य को समझने और उस पर सही दिशा में कार्य करने के लिए प्रेरित होता है।

सामाजिक और धार्मिक जागरूकता

श्री जाहरवीर चालीसा का पाठ सामाजिक और धार्मिक जागरूकता को भी बढ़ावा देता है। यह चालीसा न केवल व्यक्तिगत भक्ति को प्रोत्साहित करती है, बल्कि सामाजिक एकता और धार्मिक सहिष्णुता को भी बढ़ावा देती है। इसके पाठ से भक्तों में सामाजिक सेवा की भावना जागृत होती है और वे अपने समाज के प्रति अधिक जिम्मेदार और सजग बनते हैं।

आध्यात्मिक शांति का अनुभव

श्री जाहरवीर चालीसा का पाठ करने से भक्तों को आत्मिक शांति का अनुभव होता है। यह चालीसा मन और आत्मा को शांति और संतुलन प्रदान करती है। जब व्यक्ति जीवन की कठिनाइयों और तनावों से परेशान होता है, तब चालीसा का पाठ उसे मानसिक और आत्मिक शांति प्रदान करता है। यह शांति उसकी जीवनशैली को संतुलित करती है और उसे तनावमुक्त बनाती है।

श्री जाहरवीर चालीसा एक अत्यंत शक्तिशाली और प्रभावशाली साधन है जो भक्तों को अनेक लाभ प्रदान करती है। इसकी भक्ति, आध्यात्मिक उत्थान, स्वास्थ्य, समृद्धि, सुरक्षा, शांति, नैतिक बल, आध्यात्मिक मार्गदर्शन, और सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह चालीसा जीवन के विभिन्न पहलुओं को संतुलित करने और सुधारने में सहायक है, और भगवान जाहरवीर जी की कृपा से भक्तों के जीवन में सुख-शांति और समृद्धि का आगमन होता है।

इसलिए, यदि आप भी अपने जीवन में सुख-शांति और समृद्धि की प्राप्ति चाहते हैं, तो श्री जाहरवीर चालीसा का नियमित पाठ करें और इसके लाभों का अनुभव करें।


1. जाहरवीर बाबा किसका अवतार है?

जाहरवीर बाबा, जिन्हें गोगा जी या गोगा वीर के नाम से भी जाना जाता है, नागवंशी राजपूतों के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक और ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं। वे नाग देवता के अवतार के रूप में पूजा जाते हैं और विशेष रूप से नागों और जहरीले जीवों से रक्षा करने के लिए प्रसिद्ध हैं। उनका जीवन और उनकी वीरता की कहानियाँ भारतीय लोककथाओं और धार्मिक ग्रंथों में समाहित हैं।

2. जाहरवीर बाबा का दिन कौन सा होता है?

जाहरवीर बाबा की पूजा मुख्य रूप से हर साल भाद्रपद मास की पूर्णिमा के दिन की जाती है। यह दिन ‘गोगा नवमी’ के रूप में मनाया जाता है। इस दिन विशेष रूप से जाहरवीर बाबा की पूजा, उपवास, और भजन कीर्तन किए जाते हैं, और उनके भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए विशेष आराधना करते हैं।

3. गोगा जी की पूजा क्यों की जाती है?

गोगा जी की पूजा विशेष रूप से उनकी चमत्कारी शक्तियों और उनके द्वारा नागों और जहरीले जीवों से रक्षा करने की क्षमता के कारण की जाती है। उन्हें ‘जाहरवीर’ भी कहा जाता है, और उनके भक्त उन्हें असामान्य संकटों और खतरनाक स्थितियों से बचाने वाले मानते हैं। गोगा जी की पूजा से भक्तों को सुरक्षा, समृद्धि, और शांति प्राप्त होती है।

4. गोगा जहर पीर की कहानी क्या है?

गोगा जहर पीर की कहानी एक प्रसिद्ध लोककथा है जिसमें गोगा जी ने अपने जीवन में कई अद्भुत चमत्कार किए। कहा जाता है कि एक बार, जब गोगा जी को अपने विरोधियों द्वारा जहरीला विष दिया गया, तो उन्होंने उसे पी लिया और बिना किसी नुकसान के अपने भक्तों को सुरक्षा प्रदान की। इस घटना ने उन्हें ‘जहर पीर’ का उपनाम दिलाया और उनके भक्तों के बीच उनकी दिव्यता और चमत्कारी शक्तियों की पुष्टि की।

5. जाहरवीर का बेटा कौन है?

जाहरवीर बाबा का बेटा गोगा जी महाराज के नाम से भी प्रसिद्ध है। उनके पुत्र की पूजा भी उनकी तरह ही की जाती है और उन्हें भी धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जाता है। गोगा जी के पुत्र की पूजा विशेष अवसरों और त्योहारों पर की जाती है।

6. जाहरवीर बाबा की मृत्यु कैसे हुई थी?

जाहरवीर बाबा की मृत्यु के बारे में विभिन्न मान्यताएँ हैं। सामान्यतः, मान्यता है कि जाहरवीर बाबा ने एक अद्वितीय और दिव्य समाधि ली थी, जो उनकी शारीरिक मृत्यु के साथ-साथ उनकी आध्यात्मिक उपस्थिति का प्रतीक है। उनके भक्त मानते हैं कि उन्होंने आत्म-समर्पण और सेवा के मार्ग पर चलते हुए इस संसार से विदा ली और अब वे दिव्य रूप में अपने भक्तों की रक्षा और मार्गदर्शन कर रहे हैं।

जरा इतना बता दे कान्हा (Jara Itna Bata De Kanha Lyrics 2024)

भजन जरा इतना बता दे कान्हा (Jara Itna Bata De Kanha) एक ऐसा आध्यात्मिक गीत है जो श्रोताओं के हृदय में भगवान श्रीकृष्ण के प्रति गहरी भक्ति और प्रेम की भावना को जाग्रत करता है। यह भजन उनके जीवन के विविध पहलुओं को स्पर्श करता है और उनके साथ जुड़ी विभिन्न कथाओं और लीलाओं का स्मरण कराता है। इस भजन में भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े कई प्रसंगों का उल्लेख किया गया है, जो उनके बाल रूप, युवा अवस्था और उनकी लीलाओं को लेकर है।

“जरा इतना बता दे कान्हा” भजन की शुरुआत भगवान श्रीकृष्ण से एक विनम्र प्रश्न के साथ होती है, जिसमें भक्त उनसे अपने जीवन के रहस्यों और सत्य का अनावरण करने की प्रार्थना करता है। यह भजन भक्त और भगवान के बीच के अंतरंग संबंध को दर्शाता है, जहां भक्त अपने सभी संदेहों, चिंताओं और शंकाओं को भगवान के समक्ष प्रस्तुत करता है।

इस भजन के माध्यम से, श्रोता को भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप, उनकी माखन चोरी की लीला, गोपियों के साथ उनके प्रेमपूर्ण संबंध, और महाभारत में अर्जुन के सारथी के रूप में उनके महत्वपूर्ण भूमिका का अनुभव होता है। भजन का हर शब्द और पंक्ति भगवान की महिमा और उनके दिव्य रूप को उजागर करता है, जिससे श्रोता का मन श्रद्धा और भक्ति से भर जाता है।

“जरा इतना बता दे कान्हा” भजन की मुख्य थीम भगवान श्रीकृष्ण के जीवन के उन पहलुओं को समझना है जो हमारे जीवन को दिशा प्रदान कर सकते हैं। भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं में निहित गहरे संदेशों को समझने के लिए यह भजन एक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है। इसमें भक्त भगवान से यह जानना चाहता है कि जीवन में सही मार्ग क्या है और किस प्रकार उनके आदर्शों का पालन करके जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है।

यह भजन उस प्रेम को भी व्यक्त करता है जो भक्त भगवान के प्रति अनुभव करता है। भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएं प्रेम और करुणा से भरी हुई हैं, और यह भजन उन लीलाओं का स्मरण कराते हुए भक्त को भगवान के निकट लाता है। इस भजन के शब्द भगवान की अनन्त करुणा, प्रेम, और उनकी अद्वितीय लीलाओं का वर्णन करते हैं, जो श्रोता को आत्मिक शांति और भक्ति की अनुभूति कराते हैं।

“जरा इतना बता दे कान्हा” भजन का संगीत भी अत्यधिक मधुर और सुमधुर है, जो श्रोता को भगवान की भक्ति में लीन कर देता है। इस भजन के गायन में एक सरलता और मासूमियत है, जो भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप और उनकी लीलाओं का स्मरण कराती है। इस भजन को सुनते हुए, श्रोता को ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह स्वयं भगवान श्रीकृष्ण से संवाद कर रहा हो और उनके जीवन के रहस्यों को समझने का प्रयास कर रहा हो।

यह भजन न केवल धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह एक गहरा दार्शनिक संदेश भी प्रदान करता है। यह भजन हमें यह सिखाता है कि जीवन के हर क्षण में भगवान की महिमा और उनकी लीलाओं का स्मरण करना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण का जीवन हमें सिखाता है कि हमें किस प्रकार अपने जीवन को प्रेम, करुणा, और सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए।

अंततः, “जरा इतना बता दे कान्हा” भजन एक ऐसा माध्यम है जो भक्त को भगवान श्रीकृष्ण के साथ एक गहरे और अर्थपूर्ण संबंध में बांधता है। यह भजन भक्त के हृदय में भगवान के प्रति अनन्त प्रेम और श्रद्धा को जागृत करता है और उसे उनके दिव्य मार्गदर्शन का अनुसरण करने के लिए प्रेरित करता है।



  • हिंदी
  • English

|| जरा इतना बता दे कान्हा ||

जरा इतना बता दे कान्हा,
कि तेरा रंग काला क्यों ।
श्लोक- श्याम का काला बदन,
और श्याम घटा से काला,
शाम होते ही,
गजब कर गया मुरली वाला ॥

जरा इतना बता दे कान्हा,
कि तेरा रंग काला क्यों,
तु काला होकर भी जग से,
इतना निराला क्यों ॥

मैंने काली रात में जन्म लिया,
और काली गाय का दूध पीया,
कजरे का रंग भी काला,
कमली का रंग भी काला,
इसी लिए मै काला ॥

सखी रोज़ ही घर में बुलाती है,
और माखन बहुत खिलाती है,
सखिओं का दिल भी काला,
इसी लिए मै काला ॥

मैंने काले नाग पर नाच किया,
और काले नाग को नाथ लिया,
नागों का रंग भी काला,
यमुना का रंग भी काला,
इसी लिए मै काला ॥

सावन में बिजली कड़कती है,
बादल भी बहुत बरसतें है,
बादल का रंग भी काला,
बिजली का रंग भी काला,
इसी लिए मै काला ॥

सखी नयनों में कजरा लगाती है,
और नयनों में मुझे बिठाती है,
कजरे का रंग भी काला,
नयनों का रंग भी काला,
इसी लिए मै काला ॥

जरा इतना बता दें कान्हा,
कि तेरा रंग काला क्यों,
तु काला होकर भी जग से,
इतना निराला क्यों ॥


|| Jara Itna Bata De Kanha Lyrics English ||

Jara Itna Bata De Kanha,
Ki Tera Rang Kala Kyon ।
Shlok- Shyam Ka Kala Badan,
Aur Shyam Ghata Se Kala,
Shaam Hote Hi,
Gajab Kar Gaya Murli Wala ॥

Jara Itna Bata De Kanha,
Ki Tera Rang Kala Kyon,
Tu Kala Hokar Bhi Jag Se,
Itna Nirala Kyon ॥

Mainne Kali Raat Mein Janm Liya,
Aur Kali Gaay Ka Doodh Peeya,
Kajre Ka Rang Bhi Kala,
Kamli Ka Rang Bhi Kala,
Isi Liye Mai Kala ॥

Sakhi Roz Hi Ghar Mein Bulati Hai,
Aur Makhan Bahut Khilati Hai,
Sakhion Ka Dil Bhi Kala,
Isi Liye Mai Kala ॥

Mainne Kale Nag Par Nach Kiya,
Aur Kale Nag Ko Nath Liya,
Nagon Ka Rang Bhi Kala,
Yamuna Ka Rang Bhi Kala,
Isi Liye Mai Kala ॥

Sawan Mein Bijli Kadakti Hai,
Badal Bhi Bahut Barasaten Hai,
Badal Ka Rang Bhi Kala,
Bijli Ka Rang Bhi Kala,
Isee Lie Mai Kala ॥

Sakhi Nainon Mein Kajra Lagati Hai,
Aur Nainon Mein Mujhe Bithati Hai,
Kajre Ka Rang Bhi Kala,
Nainon Ka Rang Bhi Kala,
Isi Liye Mai Kala ॥

Jara Itna Bata Den Kanha,
Ki Tera Rang Kala Kyon,
Tu Kala Hokar Bhi Jag Se,
Itna Nirala Kyon ॥


भजन “जरा इतना बता दे कान्हा” न केवल एक आध्यात्मिक गीत है, बल्कि यह एक ऐसा माध्यम भी है जो भक्तों को भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में समर्पित करता है और जीवन के गहरे रहस्यों की खोज में मदद करता है। इस भजन के माध्यम से भक्तों को कई लाभ प्राप्त होते हैं, जो उनकी आध्यात्मिक यात्रा को संपूर्ण और सार्थक बनाते हैं। इस लेख में, हम इस भजन के विभिन्न लाभों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

1. आध्यात्मिक उन्नति

भजन “जरा इतना बता दे कान्हा” की नियमित सुनवाई और गायन से भक्तों की आध्यात्मिक उन्नति होती है। इस भजन में भगवान श्रीकृष्ण की दिव्यता और उनके जीवन की विभिन्न लीलाओं का वर्णन किया गया है, जो भक्तों के मन को शांति और संतोष प्रदान करता है। जब भक्त इस भजन को गाते या सुनते हैं, तो वे भगवान के साथ एक गहरे आध्यात्मिक संबंध में जुड़ते हैं, जिससे उनकी आत्मा को शांति मिलती है और वे जीवन के उद्देश्य को समझने में सक्षम होते हैं।

मानसिक शांति

भजन का नियमित पाठ और श्रवण मानसिक शांति प्रदान करता है। जीवन की भागदौड़ और तनावपूर्ण परिस्थितियों में, जब भक्त इस भजन को सुनते हैं, तो उनका मन शांत हो जाता है और उन्हें मानसिक स्थिरता प्राप्त होती है। भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का स्मरण करने से मन को सुख और राहत मिलती है, जिससे मानसिक तनाव और चिंता कम होती है।

आध्यात्मिक जागरूकता

भजन “जरा इतना बता दे कान्हा” भक्तों को आध्यात्मिक जागरूकता प्रदान करता है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण की जीवन की गहराई और उनकी शिक्षाओं का वर्णन है, जो भक्तों को जीवन के वास्तविक अर्थ को समझने में मदद करता है। यह भजन भक्तों को उनकी आध्यात्मिक यात्रा में मार्गदर्शन करता है और उन्हें ईश्वर के वास्तविक स्वरूप को जानने के लिए प्रेरित करता है।

भावनात्मक सशक्तिकरण

इस भजन का गायन और सुनना भक्तों को भावनात्मक रूप से सशक्त बनाता है। भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं की कथा सुनने से भक्तों के भीतर एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जो उन्हें जीवन की कठिनाइयों का सामना करने की ताकत प्रदान करता है। यह भजन उन्हें आत्म-संयम, धैर्य और साहस की भावना से भर देता है।

भक्ति की गहराई

“जरा इतना बता दे कान्हा” भजन भक्ति की गहराई को समझने और अनुभव करने का एक माध्यम है। इस भजन के माध्यम से भक्त भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अपनी गहरी भक्ति और प्रेम को व्यक्त करते हैं। यह भजन भक्तों के हृदय में भगवान के प्रति अपार प्रेम और समर्पण को जगाता है, जिससे उनकी भक्ति और भी मजबूत होती है।

सामाजिक संबंधों में सुधार

भजन की गायन और श्रवण की प्रक्रिया में परिवार और समुदाय के साथ संबंधों को सुधारने में मदद मिलती है। जब लोग मिलकर इस भजन का गायन करते हैं, तो यह एक सामूहिक भक्ति का अनुभव उत्पन्न करता है, जिससे सामंजस्य और भाईचारे की भावना मजबूत होती है। यह सामाजिक संबंधों को सुधारने और एकता को बढ़ावा देने में सहायक होता है।

धार्मिक शिक्षा

इस भजन के माध्यम से भक्तों को धार्मिक शिक्षा प्राप्त होती है। भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं और उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं को समझने से भक्तों को धर्म और आध्यात्मिकता के गहरे अर्थों को जानने में मदद मिलती है। यह भजन धार्मिक शिक्षा का एक महत्वपूर्ण साधन है जो भक्तों को धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है।

आध्यात्मिक ध्यान में सहायता

भजन “जरा इतना बता दे कान्हा” ध्यान और साधना की प्रक्रिया में भी सहायता करता है। जब भक्त इस भजन को सुनते हैं या गाते हैं, तो उनका मन भगवान श्रीकृष्ण की छवि में लीन हो जाता है, जिससे ध्यान की स्थिति में प्रवेश करना आसान होता है। यह भजन ध्यान की गहराई को बढ़ाता है और ध्यान के अनुभव को अधिक सजीव बनाता है।

आत्मिक शांति की प्राप्ति

भजन के नियमित पाठ से आत्मिक शांति प्राप्त होती है। भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य उपस्थिति और उनके लीलाओं का स्मरण करने से आत्मा को शांति और संतोष की अनुभूति होती है। यह भजन आंतरिक शांति और संतुलन को बनाए रखने में सहायक होता है, जिससे जीवन की चुनौतियों का सामना करना आसान हो जाता है।

प्रेरणा और प्रेरणादायक शक्ति

भजन “जरा इतना बता दे कान्हा” प्रेरणा और प्रेरणादायक शक्ति का स्रोत है। इस भजन के माध्यम से भक्तों को जीवन में सच्चे उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्रेरित किया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की कहानियाँ और उनकी शिक्षाएँ भक्तों को अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ने और कठिनाइयों को पार करने की प्रेरणा देती हैं।

सकारात्मक सोच की वृद्धि

भजन सुनने और गाने से सकारात्मक सोच को प्रोत्साहन मिलता है। भगवान श्रीकृष्ण की दिव्यता और उनकी लीलाओं की कथा से भक्तों के मन में सकारात्मक विचार उत्पन्न होते हैं। यह भजन नकारात्मक सोच को दूर करने और जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने में मदद करता है।

आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति

इस भजन के माध्यम से भक्तों को आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है। भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं और उनके जीवन की गहराई को समझने से भक्तों को जीवन के गहरे रहस्यों का ज्ञान मिलता है। यह भजन भक्तों को आध्यात्मिकता की गहराई में ले जाकर उन्हें जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझने में मदद करता है।

सकारात्मक ऊर्जा का संचार

भजन के गायन और श्रवण से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। भगवान श्रीकृष्ण की उपस्थिति और उनके दिव्य गुणों का स्मरण करने से भक्तों के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और उत्साह का संचार होता है। यह भजन जीवन की चुनौतियों को सामना करने की शक्ति प्रदान करता है और एक सकारात्मक दृष्टिकोण को बनाए रखने में मदद करता है।

आध्यात्मिक मार्गदर्शन

भजन “जरा इतना बता दे कान्हा” भक्तों को आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करता है। भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं और उनकी शिक्षाओं का अनुसरण करने से भक्तों को जीवन की कठिनाइयों का समाधान ढूंढ़ने में सहायता मिलती है। यह भजन आध्यात्मिक मार्ग पर चलने और सच्चे मार्गदर्शन की प्राप्ति में सहायक होता है।

संगीत की आनंददायकता

भजन का संगीत भी अत्यधिक आनंददायक होता है। इसकी मधुर धुन और भावपूर्ण गायन से भक्तों के हृदय को एक गहरी संतुष्टि और आनंद की अनुभूति होती है। संगीत का आनंद और उसकी लय भक्ति के अनुभव को और भी संजीवनी बनाती है।

आध्यात्मिक प्रगति का साधन

भजन “जरा इतना बता दे कान्हा” आध्यात्मिक प्रगति के लिए एक महत्वपूर्ण साधन है। इसके माध्यम से भक्त भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अपनी भक्ति को गहरा करते हैं और अपनी आध्यात्मिक यात्रा को आगे बढ़ाते हैं। यह भजन आध्यात्मिक प्रगति के मार्ग पर चलने में मदद करता है और भक्तों को आत्मिक उन्नति की ओर प्रेरित करता है।

जीवन के उद्देश्य की पहचान

भजन के माध्यम से भक्त जीवन के उद्देश्य की पहचान करने में सक्षम होते हैं। भगवान श्रीकृष्ण के जीवन और उनकी शिक्षाओं की गहराई को समझने से भक्तों को जीवन का वास्तविक उद्देश्य और दिशा मिलती है। यह भजन जीवन के सत्य और उद्देश्य को जानने में सहायता करता है।

सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन में संतुलन

भजन “जरा इतना बता दे कान्हा” सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन में संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षाएँ और उनकी लीलाओं का स्मरण करने से व्यक्ति अपने सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन में संतुलन बनाए रखता है और जीवन को बेहतर ढंग से जीने की कला सीखता है।

आध्यात्मिक प्रसन्नता

इस भजन को गाने और सुनने से आध्यात्मिक प्रसन्नता प्राप्त होती है। भगवान श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति और प्रेम की भावना से भक्तों के हृदय में एक आनंद और प्रसन्नता का संचार होता है। यह भजन भक्तों को आध्यात्मिक खुशी और संतोष की अनुभूति कराता है।

आध्यात्मिक समर्पण

भजन “जरा इतना बता दे कान्हा” भक्तों में आध्यात्मिक समर्पण की भावना को प्रबल करता है। भगवान श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति और प्रेम से भक्त अपने जीवन को भगवान के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित कर देते हैं। यह भजन भक्तों को समर्पण की गहराई को समझने और अनुभव करने में मदद करता है।

भजन “जरा इतना बता दे कान्हा” के ये लाभ न केवल भक्तों की आध्यात्मिक यात्रा को सार्थक बनाते हैं, बल्कि उनके जीवन को भी एक नई दिशा और उद्देश्य प्रदान करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में समर्पित होकर, भक्त इस भजन के माध्यम से जीवन के गहरे रहस्यों को समझ सकते हैं और अपनी आध्यात्मिक प्रगति को सुनिश्चित कर सकते हैं।


कान्हा किसका बेटा है?

कान्हा (श्रीकृष्ण) वासुदेव और देवकी के पुत्र हैं। उनका जन्म मथुरा के कारागार में हुआ था, लेकिन उनका पालन-पोषण गोकुल में यशोदा और नंद बाबा ने किया।

कान्हा कौन है?

कान्हा भगवान श्रीकृष्ण का एक प्यारा नाम है। वे हिन्दू धर्म में विष्णु के आठवें अवतार माने जाते हैं। उनकी कहानियाँ महाभारत और श्रीमद्भागवत पुराण में वर्णित हैं।

कान्हा क्या करता है?

कान्हा ने बचपन में गोकुल और वृंदावन में अनेक चमत्कार किए, जैसे पूतना का वध, गोवर्धन पर्वत उठाना, और कालिया नाग का दमन करना। बड़े होकर उन्होंने महाभारत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अर्जुन के सारथी बनकर धर्म की स्थापना की।

राधा कृष्ण के कितने पुत्र थे?

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, राधा और कृष्ण के कोई संतान नहीं थी। राधा और कृष्ण का प्रेम आध्यात्मिक था और उनके बीच भक्ति और प्रेम का आदान-प्रदान हुआ करता था।

कान्हा की उम्र कितनी है?

श्रीकृष्ण की उम्र उनके अवतार के समय के अनुसार मानी जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब उन्होंने अपना शरीर त्यागा, तब उनकी उम्र लगभग 125 वर्ष थी।

माता वैष्णो देवी मंदिर (Mata Vaishno Devi Mandir)

माता वैष्णो देवी मंदिर (Mata Vaishno Devi Mandir) भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में से एक है। यह मंदिर भारत के जम्मू और कश्मीर राज्य के त्रिकूट पर्वत पर स्थित है और यहाँ की यात्रा हर साल लाखों श्रद्धालुओं द्वारा की जाती है। इस मंदिर की महत्ता धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

माता वैष्णो देवी मंदिर का परिचय

माता वैष्णो देवी मंदिर हिंदू धर्म के प्रमुख मंदिरों में से एक है, जो देवी वैष्णो की पूजा-अर्चना के लिए प्रसिद्ध है। देवी वैष्णो, जिन्हें माँ वैष्णो भी कहा जाता है, देवी दुर्गा का एक रूप हैं। इस मंदिर की मान्यता है कि यहाँ माता स्वयं दर्शन देने के लिए आती हैं और उनके दर्शन करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

धार्मिक महत्ता और मान्यता

माता वैष्णो देवी मंदिर की धार्मिक महत्ता हिन्दू धर्म में अत्यधिक है। इसे माँ दुर्गा का शक्तिपीठ माना जाता है, जहाँ देवी के तीन रूप – माँ महाकाली, माँ महालक्ष्मी, और माँ महासरस्वती की पूजा की जाती है। यहाँ आकर भक्त अपनी मनोकामनाएं पूरी होने की आशा रखते हैं। यह मंदिर न केवल धार्मिक बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। Hanuman Chalisa MP3 Download

भौगोलिक जानकारी

स्थान और स्थिति

माता वैष्णो देवी मंदिर त्रिकूट पर्वत पर स्थित है, जो जम्मू और कश्मीर राज्य के कटरा शहर के निकट है। समुद्र स्तर से लगभग 5,200 फीट की ऊचाई पर स्थित इस मंदिर तक पहुँचने के लिए भक्तों को कई किलोमीटर की चढ़ाई करनी पड़ती है।

मौसम और जलवायु

माता वैष्णो देवी की यात्रा के लिए सबसे उपयुक्त मौसम गर्मियों का होता है, जो अप्रैल से जून तक रहता है। इस समय तापमान लगभग 15 से 30 डिग्री सेल्सियस के बीच होता है, जो यात्रा के लिए सुखद और आरामदायक होता है। सर्दियों में, खासकर जनवरी और फरवरी में, यहाँ का तापमान काफी गिर जाता है और बर्फबारी भी होती है, जिससे यात्रा कठिन हो सकती है।

यात्रा का सबसे अच्छा समय

माता वैष्णो देवी मंदिर की यात्रा के लिए सबसे अच्छा समय गर्मी और वसंत के महीने होते हैं, जैसे कि अप्रैल से जून और सितंबर से नवंबर। इन महीनों में मौसम सुहावना होता है और यात्रा करना अधिक सहज होता है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य (Mata Vaishno Devi Mandir)

मंदिर की उत्पत्ति

माता वैष्णो देवी मंदिर की उत्पत्ति के पीछे कई किंवदंतियाँ और पौराणिक कथाएँ हैं। एक मान्यता के अनुसार, माँ वैष्णो देवी स्वयं इस स्थल पर प्रकट हुईं थीं। देवी वैष्णो देवी का नाम वैष्णो देवी इसलिए पड़ा क्योंकि वह विष्णु के भक्त थीं और उनके भक्तों के प्रति स्नेहपूर्ण व्यवहार के कारण यहाँ पूजा अर्चना की जाती है।

पौराणिक कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता वैष्णो देवी एक ब्रह्मा, विष्णु और शिव के संयुक्त रूप में अवतरित हुईं थीं। उन्हें इस पर्वत पर भक्तों की आस्था और समर्पण के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है। इस स्थल पर देवी ने राक्षसों का संहार किया और भक्तों को शांति और सुख प्रदान किया।

ऐतिहासिक घटनाएँ

माता वैष्णो देवी मंदिर की ऐतिहासिक घटनाएँ भी मंदिर की प्रसिद्धि को बढ़ाती हैं। कई युद्ध और संघर्षों के बावजूद, इस मंदिर ने अपनी धार्मिक महत्ता और लोकप्रियता को बनाए रखा। विशेषकर, कश्मीर क्षेत्र में आतंकवादी गतिविधियों के बावजूद, माता वैष्णो देवी की पूजा अर्चना और यात्रा बिना किसी विघ्न के जारी रही है।

मंदिर की संरचना

मुख्य मंदिर

मुख्य मंदिर में माता वैष्णो देवी की तीन पिंडियाँ हैं, जो तीन शक्तियों – महाकाली, महालक्ष्मी, और महासरस्वती का प्रतीक हैं। इन पिंडियों की पूजा अर्चना विशेष श्रद्धा और भक्ति के साथ की जाती है। यहाँ की पूजा विधि और अर्चना विधि बहुत ही पवित्र और धार्मिक होती है।

अन्य धार्मिक स्थल

मुख्य मंदिर के अलावा, त्रिकूट पर्वत पर कई अन्य धार्मिक स्थल भी हैं, जिनमें भगवान शिव का एक मंदिर, हनुमान जी का मंदिर और गणेश जी का मंदिर शामिल हैं। इन मंदिरों की भी धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता है।

भवन और वास्तुकला

माता वैष्णो देवी मंदिर की वास्तुकला सरल और सुंदर है। यहाँ के भवन प्राचीन हिन्दू वास्तुकला के उदाहरण हैं। मंदिर के निर्माण में स्थानीय पत्थरों का उपयोग किया गया है और इसकी सजावट पारंपरिक हिन्दू शैली में की गई है।

यात्रा और दर्शन

यात्रा मार्ग

माता वैष्णो देवी मंदिर तक पहुँचने के लिए सबसे प्रमुख मार्ग कटरा से शुरू होता है। कटरा से मंदिर तक की यात्रा लगभग 12 किलोमीटर की होती है, जिसे पैदल, घोड़े या पालकी द्वारा किया जा सकता है। कटरा से यात्रा शुरू करने के लिए एक विशेष पंजीकरण अनिवार्य है, जो यात्रा की सुव्यवस्था सुनिश्चित करता है।

यात्रा के प्रमुख पड़ाव

यात्रा के दौरान कई प्रमुख पड़ाव आते हैं, जिनमें अद्भुत धार्मिक स्थल, जैसे कि कर्ण चबूतरा, अर्धकुवारी, और भगवती पादुका शामिल हैं। अर्धकुवारी गुफा में माता वैष्णो देवी ने राक्षस भैरव के द्वारा घेर लिए जाने पर छिपने के लिए ध्यान किया था।

यात्रा की कठिनाइयाँ

माता वैष्णो देवी की यात्रा के दौरान कई कठिनाइयाँ हो सकती हैं, जैसे की ऊँचाई पर चढ़ाई, बदलते मौसम की स्थिति, और भौगोलिक चुनौतियाँ। इन समस्याओं से निपटने के लिए आवश्यक है कि यात्रा के दौरान सावधानी बरती जाए और उचित तैयारी की जाए।

संस्कृति और परंपराएँ

धार्मिक अनुष्ठान

माता वैष्णो देवी मंदिर में कई धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं, जिनमें विशेष पूजा और हवन शामिल हैं। यहाँ की पूजा विधि में भक्तों की आस्था और श्रद्धा का विशेष महत्व है।

विशेष त्यौहार और आयोजन

माता वैष्णो देवी मंदिर में विशेष त्यौहार और आयोजनों के दौरान भीड़ अत्यधिक बढ़ जाती है। नवरात्रि, राम नवमी, और दीपावली जैसे प्रमुख त्यौहारों पर यहाँ विशेष धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

स्थानीय संस्कृति

स्थानीय संस्कृति भी यहाँ की यात्रा को अद्वितीय बनाती है। कटरा और आसपास के क्षेत्रों की संस्कृति बहुत ही समृद्ध और विविधतापूर्ण है। यहाँ की लोक कला, संगीत और नृत्य यहाँ के धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं।

प्रमुख आकर्षण

भवन और गुफाएँ

माता वैष्णो देवी के मंदिर परिसर में कई प्रमुख भवन और गुफाएँ हैं। इनमें कर्ण चबूतरा, भगवती पादुका, और अर्धकुवारी गुफा शामिल हैं। ये सभी स्थल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं और भक्तों की आस्था को प्रकट करते हैं।

प्राकृतिक सौंदर्य

त्रिकूट पर्वत का प्राकृतिक सौंदर्य भी बहुत ही आकर्षक है। यहाँ की हरी-भरी वादियाँ, पर्वतीय दृश्यों और शीतल जलवायु इस यात्रा को और भी सुखद बनाते हैं। यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता भक्तों को मन की शांति और मानसिक सुकून प्रदान करती है।

अन्य पर्यटन स्थल

माता वैष्णो देवी के मंदिर के पास कई अन्य पर्यटन स्थल भी हैं, जैसे कि पटनीटॉप, युसमर्ग, और भद्रवाह। ये स्थल यात्रा के दौरान दर्शनीय स्थलों के रूप में प्रसिद्ध हैं और यहाँ पर पर्यटकों को बहुत सारे अनुभव प्राप्त होते हैं।

गतिविधियाँ और अनुभव

धार्मिक गतिविधियाँ

माता वैष्णो देवी की यात्रा के दौरान प्रमुख धार्मिक गतिविधियाँ होती हैं, जैसे कि पूजा, हवन, और अर्चना। भक्त यहाँ अपनी इच्छाओं और मनोकामनाओं के लिए विशेष प्रार्थना करते हैं।

साहसिक कार्य

माता वैष्णो देवी की यात्रा में साहसिक कार्य भी शामिल होते हैं, जैसे कि पर्वतारोहण और ट्रेकिंग। यह यात्रा आत्म-प्रेरणा और शारीरिक ताकत की परीक्षा भी होती है।

आध्यात्मिक अनुभव

इस यात्रा के दौरान भक्तों को एक अद्वितीय आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त होता है। यहाँ की पवित्रता और शांति से आत्मा को एक गहरी संतुष्टि मिलती है, जो जीवन भर याद रहती है।

यात्रा सुझाव

आवास की व्यवस्था

माता वैष्णो देवी की यात्रा के दौरान आवास की व्यवस्था करने के लिए कटरा और उसके आसपास कई विकल्प उपलब्ध हैं। यहाँ पर विभिन्न प्रकार के होटल, धर्मशालाएं और गेस्ट हाउस हैं, जो हर बजट के अनुरूप हैं।

सरकारी आवास: जम्मू और कश्मीर सरकार द्वारा संचालित कुछ धर्मशालाएँ और रिसॉर्ट्स कटरा में उपलब्ध हैं। ये सामान्यत: बजट फ्रेंडली होते हैं और कुछ सुविधाएँ जैसे कि भोजन, साफ-सफाई और सुरक्षा प्रदान करते हैं।

प्राइवेट होटल्स: कटरा में कई प्राइवेट होटल्स हैं जो विभिन्न बजट और आराम स्तर की सुविधाएँ प्रदान करते हैं। इन होटलों में अधिकांश में बेसिक से लेकर लग्जरी सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं, जैसे कि एयर कंडीशनिंग, Wi-Fi, और 24 घंटे की रूम सर्विस।

गेस्ट हाउस: यदि आप अधिक स्थानीय अनुभव चाहें, तो गेस्ट हाउस या होमस्टे का विकल्प भी उपलब्ध है। यह विकल्प आपको स्थानीय संस्कृति का अधिक गहरा अनुभव प्रदान कर सकता है।

यात्रा साधन

माता वैष्णो देवी मंदिर की यात्रा के लिए आपको विभिन्न साधनों का उपयोग करना पड़ सकता है:

रेलवे: कटरा रेलवे स्टेशन जम्मू रेलवे नेटवर्क से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। आप जम्मू या अन्य प्रमुख शहरों से ट्रेन द्वारा कटरा पहुँच सकते हैं।

विमान: जम्मू का हवाई अड्डा (जम्मू एयरपोर्ट) कटरा के निकटतम हवाई अड्डा है। आप यहाँ फ्लाइट लेकर, फिर टैक्सी या बस से कटरा पहुँच सकते हैं।

सड़क मार्ग: कटरा भारत के विभिन्न प्रमुख शहरों से बस या टैक्सी द्वारा भी पहुँचा जा सकता है। बसें और टैक्सियाँ नियमित रूप से कटरा के लिए चलती हैं और ये यात्रा का एक सुविधाजनक विकल्प हो सकता है।

पैकिंग सुझाव

माता वैष्णो देवी की यात्रा के दौरान आपको निम्नलिखित चीजें पैक करनी चाहिए:

आरामदायक कपड़े: चढ़ाई और लंबी पैदल यात्रा के लिए हल्के और आरामदायक कपड़े लें। गर्मियों में हल्के कपड़े और सर्दियों में ऊनी कपड़े अच्छे रहेंगे।

सुखद चलने वाले जूते: चढ़ाई और चलने के लिए अच्छे, आरामदायक और मजबूत जूते लें। यदि आपके पास ट्रैकिंग जूते हों तो और बेहतर होगा।

स्वास्थ्य सामग्री: यात्रा के दौरान सामान्य दवाइयाँ, प्राथमिक चिकित्सा सामग्री, और पानी की बोतल साथ रखें।

विज्ञापन सामग्री: माता वैष्णो देवी मंदिर में पूजा अर्चना करने के लिए विशेष सामग्री जैसे कि चढ़ावा, प्रसाद आदि का भी ध्यान रखें।

सुरक्षा और स्वास्थ्य

सुरक्षा उपाय

सामान की देखभाल: यात्रा के दौरान अपने सामान की देखभाल करें और उसे सुरक्षित स्थान पर रखें। महत्वपूर्ण दस्तावेज जैसे कि आधार कार्ड, पासपोर्ट और टिकट हमेशा सुरक्षित स्थान पर रखें।

स्वास्थ्य और सुरक्षा: चढ़ाई के दौरान बहुत ध्यान दें और सुरक्षित तरीके से चढ़ाई करें। अगर आप बीमार महसूस करते हैं या अत्यधिक थकावट महसूस करते हैं, तो तुरंत आराम करें और उचित सहायता प्राप्त करें।

विवाद से बचें: धार्मिक स्थलों पर शांति बनाए रखें और किसी भी विवादित स्थिति से बचें। अगर कोई समस्या उत्पन्न हो तो स्थानीय अधिकारियों से संपर्क करें।

स्वास्थ्य संबंधी सावधानियाँ

जलवायु के अनुसार तैयारी: मौसम के अनुसार अपनी तैयारी करें। गर्मियों में गर्मी से बचाव के लिए उचित कपड़े और पानी की बोतल रखें। सर्दियों में ठंड से बचने के लिए ऊनी कपड़े आवश्यक हैं।

खाद्य सुरक्षा: यात्रा के दौरान केवल स्वच्छ और सुरक्षित खाद्य पदार्थ ही खाएँ। स्थानीय भोजन का सेवन करते समय सावधानी बरतें और पानी केवल पैक्ड या उबला हुआ ही पीएँ।

चढ़ाई के दौरान स्वास्थ्य: चढ़ाई के दौरान धीरे-धीरे और आराम से चलें। अगर आप ऊँचाई से प्रभावित महसूस करते हैं, तो थोड़ी देर आराम करें और पानी पियें।

बजट योजना

यात्रा का खर्च

माता वैष्णो देवी यात्रा का कुल खर्च यात्रा के साधनों, आवास, भोजन और अन्य व्यक्तिगत खर्चों पर निर्भर करता है। यात्रा की लागत का अनुमान निम्नलिखित बिंदुओं पर आधारित हो सकता है:

यात्रा साधन: रेलवे, विमान या सड़क मार्ग से यात्रा के लिए किराया अलग-अलग हो सकता है। फ्लाइट की लागत अधिक होती है जबकि रेलवे या बस यात्रा सस्ती हो सकती है।

आवास: आवास के खर्चा बजट के अनुसार बदल सकता है। धर्मशालाओं में कम खर्चा होता है जबकि प्राइवेट होटल्स में खर्च अधिक हो सकता है।

भोजन: स्थानीय भोजन की कीमतें सामान्यत: सस्ती होती हैं, लेकिन होटल या रेस्तरां में भोजन करने पर खर्च बढ़ सकता है।

अन्य खर्च: पूजा अर्चना, चढ़ावा, और व्यक्तिगत खरीदारी के खर्च भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

पैसे बचाने के तरीके

अग्रिम बुकिंग: यात्रा के साधनों और आवास की अग्रिम बुकिंग से आप काफी पैसे बचा सकते हैं। अग्रिम बुकिंग पर डिस्काउंट और ऑफर मिल सकते हैं।

स्थानीय भोजन: स्थानीय रेस्तरां और स्टॉल पर भोजन करने से आप अपने बजट को नियंत्रित कर सकते हैं।

समूह यात्रा: यदि आप परिवार या दोस्तों के साथ यात्रा करते हैं, तो समूह में यात्रा करने पर किराए और आवास पर छूट मिल सकती है।

स्थानीय व्यंजन

माता वैष्णो देवी की यात्रा के दौरान कटरा और उसके आसपास के क्षेत्रों में शाकाहारी भोजन की एक विस्तृत विविधता उपलब्ध है। यहाँ के शाकाहारी व्यंजन स्वाद, पौष्टिकता और स्थानीय संस्कृति का बेहतरीन उदाहरण पेश करते हैं। यहाँ कुछ प्रमुख और स्वादिष्ट शाकाहारी स्थानीय व्यंजन दिए गए हैं:

राजमा चावल
कश्मीरी और उत्तर भारतीय भोजन का एक प्रमुख हिस्सा, राजमा चावल में काले सेम (राजमा) को मसालों के साथ पकाया जाता है और इसे गर्म चावल के साथ परोसा जाता है। यह व्यंजन पौष्टिक और स्वादिष्ट होता है, खासकर सर्दियों में।

अलू का पराठा
यह गेहूं के आटे से बने पराठे में मसालेदार उबले हुए आलू का मिश्रण भरकर तला जाता है। इसे दही, अचार, या चटनी के साथ परोसा जाता है। यह भारतीय भोजन का एक लोकप्रिय और लज़ीज़ व्यंजन है।

कश्मीरी पुलाव
यह मसालेदार चावल का व्यंजन सूखे मेवे, कश्मीरी मसाले और सब्जियों के साथ पकाया जाता है। यह एक स्वादिष्ट और रंगीन पुलाव है जो खास अवसरों और त्यौहारों पर तैयार किया जाता है।

कश्मीरी दही वड़ा
तले हुए वड़े को दही में डालकर, मसालों और चटनी के साथ सजाया जाता है। यह ठंडी, मसालेदार और स्वादिष्ट डिश है, जो एक बेहतरीन स्नैक के रूप में परोसी जाती है।

शाही पनीर
शाही पनीर एक कश्मीरी और उत्तर भारतीय भोजन का प्रमुख हिस्सा है। इसमें पनीर के टुकड़े को मलाईदार और मसालेदार ग्रेवी में पकाया जाता है। यह व्यंजन न केवल स्वादिष्ट होता है, बल्कि खाने में भी बहुत ही अच्छा लगता है।

मटर-गाजर की सब्जी
मटर और गाजर की सब्जी एक साधारण लेकिन स्वादिष्ट शाकाहारी डिश है। इसमें ताजे मटर और गाजर को मसालों के साथ पकाया जाता है और यह चावल या पराठे के साथ अच्छा लगता है।

कश्मीरी यखनी (शाकाहारी संस्करण)
यखनी आमतौर पर मांसाहारी व्यंजन है, लेकिन शाकाहारी संस्करण में इसे दही और कश्मीरी मसालों के साथ सब्जियों के साथ पकाया जाता है। इसमें हरी इलायची, लौंग, और दारचीनी जैसे मसाले डालकर इसे बनाया जाता है।

कश्मीरी हाक
हाक एक प्रकार की हरी पत्तेदार सब्जी है जिसे विशेष रूप से कश्मीरी व्यंजनों में इस्तेमाल किया जाता है। इसे हल्के मसालों के साथ पकाकर परोसा जाता है और यह चावल के साथ बहुत अच्छा लगता है।

गुलाब जामुन
गुलाब जामुन एक लोकप्रिय मिठाई है जिसे भारतीय भोजन में विशेष स्थान प्राप्त है। छोटे-छोटे तले हुए गोलों को चाशनी में डुबोकर तैयार किया जाता है, जिसमें हल्की मीठास और गुलाब जल की खुशबू होती है।

छाप चटनी
छाप चटनी एक ताजगी भरी चटनी होती है जिसे हरी चटनी, दही, और मसाले डालकर तैयार किया जाता है। यह चटनी पराठे, समोसे, या अन्य स्नैक्स के साथ बहुत अच्छा लगता है।

ये शाकाहारी व्यंजन न केवल स्वाद में लाजवाब होते हैं, बल्कि ये स्थानीय कश्मीरी भोजन की संस्कृति और विविधता को भी दर्शाते हैं। आपकी यात्रा को एक आनंददायक और स्वादिष्ट अनुभव बनाने के लिए इन व्यंजनों का आनंद अवश्य लें।

माता वैष्णो देवी की यात्रा एक अद्वितीय धार्मिक और आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करती है। यह यात्रा न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है बल्कि इसमें प्राकृतिक सुंदरता, स्थानीय संस्कृति और स्वादिष्ट भोजन का भी अनुभव होता है। यात्रा की तैयारी सही तरीके से करने पर यह यात्रा आरामदायक और यादगार हो सकती है। यदि आप यात्रा के लिए सही समय, साधन, और सुरक्षा उपायों का ध्यान रखते हैं, तो यह यात्रा आपके जीवन का एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक अनुभव साबित हो सकती है।

वैष्णो देवी की चढ़ाई में कितने घंटे लगते हैं?

वैष्णो देवी की चढ़ाई में समय व्यक्ति की शारीरिक स्थिति और चाल की गति पर निर्भर करता है। सामान्यतः, कटरा से वैष्णो देवी भवन तक चढ़ाई करने में 6 से 8 घंटे का समय लग सकता है। कुछ श्रद्धालु इसे तेज गति से 4 से 5 घंटे में भी पूरा कर सकते हैं, जबकि अन्य को अधिक समय लग सकता है।

वैष्णो देवी कौन से महीने में जाना चाहिए?

वैष्णो देवी की यात्रा किसी भी समय की जा सकती है, लेकिन आमतौर पर सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च के बीच होता है। इस दौरान मौसम सुखद और ठंडा रहता है, जो चढ़ाई के लिए अनुकूल होता है। गर्मी और बरसात के मौसम में यात्रा करना कठिन हो सकता है।

वैष्णो देवी की फेमस चीज क्या है?

वैष्णो देवी की फेमस चीज उनके दर्शन और पूजा की दिव्यता है। मंदिर की पवित्रता, शाही दर्शन और धार्मिक महत्व इसे प्रमुख बनाते हैं। यहाँ आने वाले भक्त माँ वैष्णो देवी की आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए दूर-दूर से आते हैं।

वैष्णो देवी में कौन से कपड़े पहनने चाहिए?

वैष्णो देवी यात्रा के दौरान आरामदायक और साधारण कपड़े पहनने चाहिए। महिलाओं को सूती या हल्के कपड़े और शॉल या स्टॉल लेकर चलना चाहिए। पुरुषों को भी हल्के कपड़े और आरामदायक जूते पहनने की सलाह दी जाती है। मंदिर परिसर में धार्मिक परंपराओं का पालन करते हुए आदर्श कपड़े पहनना उचित होता है।

वैष्णो देवी में क्या खरीदें?

वैष्णो देवी में आप धार्मिक वस्तुएं जैसे कि पूजा की सामग्री, कुमकुम, चूड़ियाँ, और भगवान की मूर्तियाँ खरीद सकते हैं। यहाँ की प्रसिद्ध ‘बांधनी’ और ‘बंदनवार’ भी खरीदी जा सकती हैं। इसके अलावा, स्थानीय हस्तशिल्प और यादगार वस्तुएं भी उपलब्ध होती हैं।

वैष्णो देवी में होटल का किराया कितना है?

वैष्णो देवी में होटल का किराया होटल की श्रेणी और सुविधाओं के आधार पर भिन्न हो सकता है। साधारण होटल में प्रति रात का किराया ₹1000 से ₹2000 के बीच हो सकता है, जबकि बेहतर सुविधाओं वाले होटल और गेस्ट हाउस में ₹3000 से ₹6000 तक किराया हो सकता है। उच्च श्रेणी के होटलों में किराया अधिक हो सकता है।

कटरा की फेमस चीज क्या है?

कटरा मुख्य रूप से वैष्णो देवी के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन यहाँ के स्थानीय उत्पाद और हस्तशिल्प भी प्रसिद्ध हैं। कटरा की विशेष चीजों में स्थानीय कश्मीरी शॉल, हस्तशिल्प वस्तुएं, और खादी के कपड़े शामिल हैं।

कटरा में खरीदने के लिए क्या प्रसिद्ध है?

कटरा में खरीदने के लिए कश्मीरी शॉल, सूती और ऊनी कपड़े, लोकल हैंडीक्राफ्ट, और धार्मिक सामग्री प्रमुख हैं। यहाँ के बाजार में आप अच्छे क्वालिटी के चादर, कश्मीरी कालीन, और वैष्णो देवी के पूजा सामान भी खरीद सकते हैं।