Wednesday, January 28, 2026
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धन-समृद्धि की कुंजी: कनकधारा स्तोत्र | Kanakadhara Stotram PDF 2024

कनकधारा स्तोत्र (Kanakadhara Stotram PDF) आर्थिक तंगी और धन की कमी से जीवन में अक्सर परेशानियाँ आती हैं। धन प्राप्ति के लिए लोग हरसंभव श्रेष्ठ उपाय करने की कोशिश करते हैं। इस संदर्भ में, पुराणों में वर्णित कनकधारा यंत्र और स्तोत्र चमत्कारिक रूप से लाभ प्रदान करते हैं। यह यंत्र विशेष रूप से प्रभावशाली है क्योंकि इसे किसी भी प्रकार की विशेष माला, जाप, या पूजन विधि की आवश्यकता नहीं होती। आप श्री सूक्त पाठ इन हिंदी को भी यहाँ से पढ़ सकते हैं!

केवल दिन में एक बार इसका पाठ करना ही पर्याप्त होता है। इसके साथ ही, प्रतिदिन इसके सामने दीपक और अगरबत्ती लगाना आवश्यक है। यदि किसी दिन यह भी भूल जाएं, तो भी चिंता की बात नहीं है, क्योंकि यह सिद्ध मंत्र होने के कारण चैतन्य माना जाता है।

कनकधारा स्तोत्र का संस्कृत पाठ और हिन्दी अनुवाद यहाँ प्रस्तुत है। आपको केवल कनकधारा यंत्र को किसी भी तंत्र-मंत्र सामग्री की दुकान से लाकर अपने पूजा घर में स्थापित करना है। यह यंत्र आसानी से उपलब्ध हो जाता है। मां लक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए जितने भी यंत्र हैं, उनमें कनकधारा यंत्र और स्तोत्र सबसे प्रभावशाली और अतिशीघ्र फलदायी हैं।

आर्थिक समृद्धि और धन संचय के लिए कनकधारा स्तोत्र का नियमित पाठ करने से चमत्कारिक लाभ प्राप्त होता है। इस दिव्य पाठ को अपनाकर आप भी अपने जीवन में धन और समृद्धि की ओर एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ा सकते हैं।


  • संस्कृत
  • हिन्दी
  • English

संस्कृत में कनकधारा स्तोत्रम्

।। श्री कनकधारा स्तोत्रम् ।।

अंगहरे पुलकभूषण माश्रयन्ती भृगांगनैव मुकुलाभरणं तमालम।
अंगीकृताखिल विभूतिरपांगलीला मांगल्यदास्तु मम मंगलदेवताया:।।1।।

मुग्ध्या मुहुर्विदधती वदनै मुरारै: प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि।
माला दृशोर्मधुकर विमहोत्पले या सा मै श्रियं दिशतु सागर सम्भवाया:।।2।।

विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षमानन्द हेतु रधिकं मधुविद्विषोपि।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्द्धमिन्दोवरोदर सहोदरमिन्दिराय:।।3।।

आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दमानन्दकन्दम निमेषमनंगतन्त्रम्।
आकेकर स्थित कनी निकपक्ष्म नेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजंगरायांगनाया:।।4।।

बाह्यन्तरे मधुजित: श्रितकौस्तुभै या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति।
कामप्रदा भगवतो पि कटाक्षमाला कल्याण भावहतु मे कमलालयाया:।।5।।

कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्धाराधरे स्फुरति या तडिदंगनेव्।
मातु: समस्त जगतां महनीय मूर्तिभद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनाया:।।6।।

प्राप्तं पदं प्रथमत: किल यत्प्रभावान्मांगल्य भाजि: मधुमायनि मन्मथेन।
मध्यापतेत दिह मन्थर मीक्षणार्द्ध मन्दालसं च मकरालयकन्यकाया:।।7।।

दद्याद दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम स्मिभकिंचन विहंग शिशौ विषण्ण।
दुष्कर्मधर्ममपनीय चिराय दूरं नारायण प्रणयिनी नयनाम्बुवाह:।।8।।

इष्टा विशिष्टमतयो पि यथा ययार्द्रदृष्टया त्रिविष्टपपदं सुलभं लभंते।
दृष्टि: प्रहूष्टकमलोदर दीप्ति रिष्टां पुष्टि कृषीष्ट मम पुष्कर विष्टराया:।।9।।

गीर्देवतैति गरुड़ध्वज भामिनीति शाकम्भरीति शशिशेखर वल्लभेति।
सृष्टि स्थिति प्रलय केलिषु संस्थितायै तस्यैनमस्त्रि भुवनैक गुरोस्तरूण्यै ।।10।।

श्रुत्यै नमोस्तु शुभकर्मफल प्रसूत्यै रत्यै नमोस्तु रमणीय गुणार्णवायै।
शक्तयै नमोस्तु शतपात्र निकेतानायै पुष्टयै नमोस्तु पुरूषोत्तम वल्लभायै।।11।।

नमोस्तु नालीक निभाननायै नमोस्तु दुग्धौदधि जन्म भूत्यै ।
नमोस्तु सोमामृत सोदरायै नमोस्तु नारायण वल्लभायै।।12।।

सम्पतकराणि सकलेन्द्रिय नन्दानि साम्राज्यदान विभवानि सरोरूहाक्षि।
त्व द्वंदनानि दुरिता हरणाद्यतानि मामेव मातर निशं कलयन्तु नान्यम्।।13।।

यत्कटाक्षसमुपासना विधि: सेवकस्य कलार्थ सम्पद:।
संतनोति वचनांगमानसंसत्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे।।14।।

सरसिजनिलये सरोज हस्ते धवलमांशुकगन्धमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्।।15।।

दग्धिस्तिमि: कनकुंभमुखा व सृष्टिस्वर्वाहिनी विमलचारू जल प्लुतांगीम।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिनाथ गृहिणी ममृताब्धिपुत्रीम्।।16।।

कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरां गतैरपाड़ंगै:।
अवलोकय माम किंचनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयाया: ।।17।।

स्तुवन्ति ये स्तुतिभिर भूमिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो भवन्ति ते बुधभाविताया:।।18।।

।। इति श्री कनकधारा स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

Kanakadhara Stotram in Hindi

|| कनकधारा स्तोत्रम् (हिन्दी पाठ) ||

जैसे भ्रमरी अधखिले कुसुमों से अलंकृत तमाल-तरु का आश्रय लेती है, उसी प्रकार जो प्रकाश श्रीहरि के रोमांच से सुशोभित श्रीअंगों पर निरंतर पड़ता रहता है तथा जिसमें संपूर्ण ऐश्वर्य का निवास है, संपूर्ण मंगलों की अधिष्ठात्री देवी भगवती महालक्ष्मी का वह कटाक्ष मेरे लिए मंगलदायी हो।।1।।

जैसे भ्रमरी महान कमल दल पर मंडराती रहती है, उसी प्रकार जो श्रीहरि के मुखारविंद की ओर बराबर प्रेमपूर्वक जाती है और लज्जा के कारण लौट आती है। समुद्र कन्या लक्ष्मी की वह मनोहर मुग्ध दृष्टिमाला मुझे धन संपत्ति प्रदान करें ।।2।।

जो संपूर्ण देवताओं के अधिपति इंद्र के पद का वैभव-विलास देने में समर्थ है, मधुहन्ता श्रीहरि को भी अधिकाधिक आनंद प्रदान करने वाली है तथा जो नीलकमल के भीतरी भाग के समान मनोहर जान पड़ती है, उन लक्ष्मीजी के अधखुले नेत्रों की दृष्टि क्षण भर के लिए मुझ पर थोड़ी सी अवश्य पड़े।।3।।

शेषशायी भगवान विष्णु की धर्मपत्नी श्री लक्ष्मीजी के नेत्र हमें ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हों, जिनकी पुतली तथा बरौनियां अनंग के वशीभूत हो अधखुले, किंतु साथ ही निर्निमेष (अपलक) नयनों से देखने वाले आनंदकंद श्री मुकुन्द को अपने निकट पाकर कुछ तिरछी हो जाती हैं।।4।।

जो भगवान मधुसूदन के कौस्तुभमणि-मंडित वक्षस्थल में इंद्रनीलमयी हारावली-सी सुशोभित होती है तथा उनके भी मन में प्रेम का संचार करने वाली है, वह कमल-कुंजवासिनी कमला की कटाक्षमाला मेरा कल्याण करे।।5।।

जैसे मेघों की घटा में बिजली चमकती है, उसी प्रकार जो कैटभशत्रु श्रीविष्णु के काली मेघमाला के श्यामसुंदर वक्षस्थल पर प्रकाशित होती है, जिन्होंने अपने आविर्भाव से भृगुवंश को आनंदित किया है तथा जो समस्त लोकों की जननी है, उन भगवती लक्ष्मी की पूजनीय मूर्ति मुझे कल्याण प्रदान करे।।6।

समुद्र कन्या कमला की वह मंद, अलस, मंथर और अर्धोन्मीलित दृष्टि, जिसके प्रभाव से कामदेव ने मंगलमय भगवान मधुसूदन के हृदय में प्रथम बार स्थान प्राप्त किया था, यहां मुझ पर पड़े।।7।।

भगवान नारायण की प्रेयसी लक्ष्मी का नेत्र रूपी मेघ दयारूपी अनुकूल पवन से प्रेरित हो दुष्कर्म (धनागम विरोधी अशुभ प्रारब्ध) रूपी धाम को चिरकाल के लिए दूर हटाकर विषाद रूपी धर्मजन्य ताप से पीड़ित मुझ दीन रूपी चातक पर धनरूपी जलधारा की वृष्टि करें।।

विशिष्ट बुद्धि वाले मनुष्य जिनके प्रीति पात्र होकर जिस दया दृष्टि के प्रभाव से स्वर्ग पद को सहज ही प्राप्त कर लेते हैं, पद्मासना पद्मा की वह विकसित कमल-गर्भ के समान कांतिमयी दृष्टि मुझे मनोवांछित पुष्टि प्रदान करें।।9।।

जो सृष्टि लीला के समय वाग्देवता (ब्रह्मशक्ति) के रूप में विराजमान होती है तथा प्रलय लीला के काल में शाकम्भरी (भगवती दुर्गा) अथवा चन्द्रशेखर वल्लभा पार्वती (रुद्रशक्ति) के रूप में अवस्थित होती है, त्रिभुवन के एकमात्र पिता भगवान नारायण की उन नित्य यौवना प्रेयसी श्रीलक्ष्मीजी को नमस्कार है।।10।।

मात:। शुभ कर्मों का फल देने वाली श्रुति के रूप में आपको प्रणाम है। रमणीय गुणों की सिंधु रूपा रति के रूप में आपको नमस्कार है। कमल वन में निवास करने वाली शक्ति स्वरूपा लक्ष्मी को नमस्कार है तथा पुष्टि रूपा पुरुषोत्तम प्रिया को नमस्कार है।।11।।

कमल वदना कमला को नमस्कार है। क्षीरसिंधु सभ्यता श्रीदेवी को नमस्कार है। चंद्रमा और सुधा की सगी बहन को नमस्कार है। भगवान नारायण की वल्लभा को नमस्कार है। ।।12।।

कमल सदृश नेत्रों वाली माननीय मां ! आपके चरणों में किए गए प्रणाम संपत्ति प्रदान करने वाले, संपूर्ण इंद्रियों को आनंद देने वाले, साम्राज्य देने में समर्थ और सारे पापों को हर लेने के लिए सर्वथा उद्यत हैं, वे सदा मुझे ही अवलम्बन दें। (मुझे ही आपकी चरण वंदना का शुभ अवसर सदा प्राप्त होता रहे)।।13।।

जिनके कृपा कटाक्ष के लिए की गई उपासना उपासक के लिए संपूर्ण मनोरथों और संपत्तियों का विस्तार करती है, श्रीहरि की हृदयेश्वरी उन्हीं आप लक्ष्मी देवी का मैं मन, वाणी और शरीर से भजन करता हूं।।14।।

भगवती हरिप्रिया! तुम कमल वन में निवास करने वाली हो, तुम्हारे हाथों में नीला कमल सुशोभित है। तुम अत्यंत उज्ज्वल वस्त्र, गंध और माला आदि से सुशोभित हो। तुम्हारी झांकी बड़ी मनोरम है। त्रिभुवन का ऐश्वर्य प्रदान करने वाली देवी, मुझ पर प्रसन्न हो जाओ।।15।।

दिग्गजों द्वारा सुवर्ण-कलश के मुख से गिराए गए आकाश गंगा के निर्मल एवं मनोहर जल से जिनके श्री अंगों का अभिषेक (स्नान) संपादित होता है, संपूर्ण लोकों के अधीश्वर भगवान विष्णु की गृहिणी और क्षीरसागर की पुत्री उन जगज्जननी लक्ष्मी को मैं प्रात:काल प्रणाम करता हूं।।16।।

कमल नयन केशव की कमनीय कामिनी कमले! मैं अकिंचन (दीन-हीन) मनुष्यों में अग्रगण्य हूं, अतएव तुम्हारी कृपा का स्वाभाविक पात्र हूं। तुम उमड़ती हुई करुणा की बाढ़ की तरह तरंगों के समान कटाक्षों द्वारा मेरी ओर देखो।।17।।

जो मनुष्य इन स्तु‍तियों द्वारा प्रतिदिन वेदत्रयी स्वरूपा त्रिभुवन-जननी भगवती लक्ष्मी की स्तुति करते हैं, वे इस भूतल पर महान गुणवान और अत्यंत सौभाग्यशाली होते हैं तथा विद्वान पुरुष भी उनके मनोभावों को जानने के लिए उत्सुक रहते हैं।।18।।

(समाप्त)

Kanakadhara Stotram Lyrics English

|| Kanakadhara Stotram (English) ||

Jaise bhramari adhkhile kusumon se alankrit tamal-taru ka ashray leti hai, usi prakar jo prakash Shrihari ke romanch se sushobhit Shriangon par nirantar padta rehta hai tatha jismein sampoorn aishwarya ka niwas hai, sampoorn mangalon ki adhishtatri devi Bhagwati Mahalakshmi ka wah kataksh mere liye mangaldaayi ho.।।1।।

Jaise bhramari mahaan kamal dal par mandraati rehti hai, usi prakar jo Shrihari ke mukharavind ki or barabar prempoorvak jaati hai aur laajja ke karan laut aati hai. Samudra kanya Lakshmi ki wah manohar mughda drishti mala mujhe dhan sampatti pradaan karein.।।2।।

Jo sampoorn devtaon ke adhipati Indra ke pad ka vaibhav-vilas dene mein samarth hai, Madhuhanta Shrihari ko bhi adhikadhik anand pradaan karne wali hai tatha jo neelkamal ke bheetari bhag ke saman manohar jaan padti hai, un Lakshmiji ke adhkhule netron ki drishti kshan bhar ke liye mujhe thodi si avashya pade.।।3।।

Sheshashayi Bhagwan Vishnu ki dharmapatni Shri Lakshmiji ke netra humein aishwarya pradaan karne wale hon, jinki putli tatha barouniya Anang ke vasheebhoot ho adhkhule, kintu saath hi nirnimish (apalak) nayanon se dekhne wale Anandkand Shri Mukund ko apne nikat paakar kuch tirchi ho jaati hain.।।4।।

Jo Bhagwan Madhusudan ke Kaustubhamani-mandit vakshasthal mein Indraneelmayi haaravali-si sushobhit hoti hai tatha unke bhi man mein prem ka sanchar karne wali hai, wah kamal-kunjavasini Kamala ki katakshmala mera kalyan kare.।।5।।

Jaise meghon ki ghata mein bijli chamakti hai, usi prakar jo Kaitabhshatru Shri Vishnu ke kaali meghmala ke shyamsundar vakshasthal par prakaashit hoti hai, jinhone apne avirbhav se Bhruvansh ko anandit kiya hai tatha jo samast lokon ki janani hai, un Bhagwati Lakshmi ki poojaniya murti mujhe kalyan pradaan kare.।।6।।

Samudra kanya Kamala ki wah mand, alas, manthar aur ardhanmeelit drishti, jiske prabhav se Kamadev ne mangalmay Bhagwan Madhusudan ke hriday mein pratham baar sthan prapt kiya tha, yahaan mujhe par pade.।।7।।

Bhagwan Narayan ki preyas Lakshmi ka netra roopi megh dayarupi anukool pavan se prerit ho dushkarm (dhanagam virodhi ashubh prarabdh) roopi dham ko chirkaal ke liye door hatakar vishad roopi dharmjanaya taap se peedit mujhe deen roopi chaatak par dhanroopi jaladhaara ki vrishti karein.।

Vishisht buddhi wale manushya jinke preeti patra hokar jis daya drishti ke prabhav se swarg pad ko sahaj hi prapt kar lete hain, padmasana Padma ki wah viksit kamal-garbha ke saman kantimayi drishti mujhe manovanchhit pushti pradaan karein.।।9।।

Jo srishti leela ke samay Vagdevata (Brahmashakti) ke roop mein virajmaan hoti hai tatha pralaya leela ke kaal mein Shakambhari (Bhagwati Durga) athwa Chandrashekhar Vallabha Parvati (Rudrashakti) ke roop mein avasthit hoti hai, tribhuvan ke ekmatra pita Bhagwan Narayan ki un nitya yauvana preyas Shri Lakshmiji ko namaskaar hai.।।10।।

Maata: Shubh karmon ka phal dene wali shruti ke roop mein aapko pranam hai. Ramaniya gunon ki sindhu roopa rati ke roop mein aapko namaskar hai. Kamal van mein nivasi shakti swaroopa Lakshmi ko namaskar hai tatha pushti roopa Purushottam priya ko namaskar hai.।।11।।

Kamal vadana Kamala ko namaskar hai. Kshirasindhu sabhyata Shri Devi ko namaskar hai. Chandrama aur sudha ki sagi behan ko namaskar hai. Bhagwan Narayan ki Vallabha ko namaskar hai.।।12।।

Kamal sadri netron wali maananiya maa! Aapke charanon mein kiye gaye pranam sampatti pradaan karne wale, sampoorn indriyon ko anand dene wale, samraajy dene mein samarth aur saare paapon ko har lene ke liye sarvatha udyat hain, ve sada mujhe hi avalamban dein. (Mujhe hi aapki charan vandana ka shubh avasar sada prapt hota rahe).।।13।।

Jinke kripa kataksh ke liye kiye gaye upasana upasak ke liye sampoorn manorathon aur sampattiyon ka visthaar karti hai, Shrihari ki hridayeshwari unhi aap Lakshmi Devi ka main man, vaani aur sharir se bhajan karta hoon.।।14।।

Bhagwati Haripriya! Tum kamal van mein nivasi ho, tumhare haathon mein neela kamal sushobhit hai. Tum atyant ujwal vastra, gandh aur maala adi se sushobhit ho. Tumhari jhanki badi manohar hai. Tribhuvan ka aishwarya pradaan karne wali devi, mujhe par prasanna ho jao.।।15।।

Diggajon dwara suvarna-kalash ke mukh se giraaye gaye aakash ganga ke nirmal evam manohar jal se jinke Shri angon ka abhishhek (snaan) sampadit hota hai, sampoorn lokon ke adhiswar Bhagwan Vishnu ki grihini aur Kshirasagar ki putri un jagatjanani Lakshmi ko main praatkala pranam karta hoon.।।16।।

Kamal nayan Keshav ki kamaniya kaamini Kamle! Main akinchana (deen-heen) manushyon mein agraganya hoon, ataeva tumhari kripa ka swabhavik patra hoon. Tum umadti hui karuna ki baadh ki tarah tarangon ke saman katakshon dwara meri or dekho.।।17।।

Jo manushya in stutiyon dwara pratidin Vedatrayi swaroopa tribhuvan-janani Bhagwati Lakshmi ki stuti karte hain, ve is bhootal par mahaan gunvaan aur atyant saubhagyashali hote hain tatha vidwan purush bhi unke manobhavaon ko jaanne ke liye utsuk rehte hain.।।18।।

(End)



ॐ अङ्गं हरै (हरेः) पुलकभूषण-माश्रयन्ती भृङ्गाऽगनेव मुकुला-भरणं तमालं |
अंगीकृता-ऽखिलविभूतिर-पॉँगलीला-माँगल्य-दाऽस्तु मम् मङ्गलदेवतायाः || १ ||

अर्थ – जैसे भ्रमरी अधखिले कुसुमों से अलंकृत तमाल-तरु का आश्रय लेती है, उसी प्रकार जो प्रकाश श्रीहरि के रोमांच से सुशोभित श्रीअंगों पर निरंतर पड़ता रहता है तथा जिसमें संपूर्ण ऐश्वर्य का निवास है, संपूर्ण मंगलों की अधिष्ठात्री देवी भगवती महालक्ष्मी की वह दृष्टि मेरे लिए मंगलदायी हो।

मुग्धा मुहुर्विदधी वदने मुरारेः प्रेमत्रपा प्रणि-हितानि गताऽगतानि ।
मला-र्दशोर्म-धुकरीव महोत्पले या सा में श्रियं दिशतु सागर सम्भवायाः || २ ||

अर्थ – जैसे भ्रमरी महान कमल दल पर मंडराती रहती है, उसी प्रकार जो श्रीहरि के मुखारविंद की ओर बराबर प्रेमपूर्वक जाती है और लज्जा के कारण लौट आती है। समुद्र कन्या लक्ष्मी की वह मनोहर मुग्ध दृष्टिमाला मुझे धन संपत्ति प्रदान करें।

विश्वामरेन्द्र पद-विभ्रम-दानदक्षमा-नन्दहेतु-रधिकं मुरविद्विषोपि |
ईषन्निषीदतु मयि क्षण मीक्षणार्धं-मिन्दीवरोदर सहोदर-मिन्दीरायाः || ३ ||

अर्थ – जो देवताओ के स्वामी इंद्र को के पद का वैभव-विलास देने में समर्थ है, मधुहंता नाम के दैत्य के शत्रु भगवान विष्णु को भी आप आधिकाधिक आनंद प्रदान करने वाली है, नीलकमल जिसका सहोदर है अर्थात भाई है, उन लक्ष्मीजी के अर्ध खुले हुए नेत्रों की दृश्टि किंचित क्षण के लिए मुझ पर पड़े।

आमीलिताक्ष-मधिगम्य मुदा-मुकुन्दमा-नन्द कंद-मनिमेष-मनंगतन्त्रं |
आकेकर स्थित कनीतिक-पद्मनेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजङ्ग शयाङ्गनायाः || ४ ||

अर्थ – जिसकी पुतली एवं भौहे काम के वशीभूत हो अर्धविकसित एकटक आँखों से देखनेवाले आनंद सत्चिदानन्द मुकुंद भगवान को अपने निकट पाकर किंचित तिरछी हो जाती हो, ऐसे शेष पर शयन करने वाले भगवान नारायण की अर्द्धांगिनी श्रीमहालक्ष्मीजी के नेत्र हमें धन-संपत्ति प्रदान करे।

बाह्यन्तरे मुरजितः (मधुजितः) श्रुत-कौस्तुभे या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति ।
कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला कल्याण-मावहतु में कमला-लयायाः ॥ ५ ॥

अर्थ – जो भगवान मधुसूदन के कौस्तुभमणि-मंडित वक्षस्थल में इंद्रनीलमयी हारावली-सी सुशोभित होती है तथा उनके भी मन में प्रेम का संचार करने वाली है, वह कमल-कुंजवासिनी कमला की कटाक्षमाला मेरा कल्याण करे।

कालाम्बुदालि ललितो-रसि कैटभारे-र्धाराधरे स्फुरति या तडिदंगनेव |
मातुः समस्त-जगतां महनीय-मूर्तिर्भद्राणि में दिशतु भार्गव-नंदनायाः || ६ ||

अर्थ – जिस तरह से मेघो की घटा में बिजली चमकती है, उसी प्रकार मधु-कैटभ के शत्रु भगवान विष्णु के काली मेघपंक्ति की तरह सुमनोहर वक्षस्थल पर आप एक विद्युत के समान देदीप्यमान होती हो, जिन्होंने अपने अविर्भाव से भृगुवंश को आनंदित किया है तथा जो समस्त लोकों की जननी है वो भगवती लक्ष्मी मुझे कल्याण प्रदान करे।

प्राप्तं पदं प्रथमतः किल यत प्रभावा-न्मांगल्य-भाजि मधुमाथिनी मन्मथेन |
मय्यापतेत्त-दिह मन्थर-मीक्षणार्धं मन्दालसं च मकरालय-कन्यकायाः || ७ ||

अर्थ – समुद्रकन्या कमला की वह मन्द, अलस, मन्थर और अर्धोन्मीलित दृष्टि, जिसके प्रभाव से कामदेव ने मंगलमय भगवान मधुसूदन के हृदय में प्रथम बार स्थान प्राप्त किया था, यहाँ मुझ पर पड़े।

दद्याद दयानु-पवनो द्रविणाम्बु-धारामस्मिन्न-किञ्चन विहङ्ग-शिशो विषण्णे |
दुष्कर्म-धर्म-मपनीय चिराय दूरं नारायण-प्रणयिनी-नयनाम्बु-वाहः ॥ ८ ॥

अर्थ – भगवान नारायण की प्रेयसी लक्ष्मी का नेत्र रूपी मेघ दयारूपी अनुकूल पवन से प्रेरित हो दुष्कर्म (धनागम विरोधी अशुभ प्रारब्ध) रूपी धाम को चिरकाल के लिए दूर हटाकर विषाद रूपी धर्मजन्य ताप से पीड़ित मुझ दीन रूपी चातक पर धनरूपी जलधारा की वृष्टि करें।

इष्टा-विषिश्टम-तयोऽपि यया दयार्द्र-दृष्टया त्रिविष्ट-पपदं सुलभं लभन्ते ।
दृष्टिः प्रहष्ट-कमलोदर-दीप्ति-रिष्टां पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्कर-विष्टरायाः || ९ ||

अर्थ – विशिष्ट बुद्धिवाले मनुष्य जिनके प्रीतिपात्र होकर उनकी दयादृष्टि के प्रभाव से स्वर्गपद को सहज ही प्राप्त कर लेते हैं, उन्हीं पद्मासना पद्मा की वह विकसित कमल गर्भ के समान कान्तिमती दृष्टि मुझे मनोवांछित पुष्टि प्रदान करे।

गीर्देव-तेति गरुड़-ध्वज-सुन्दरीति शाकम्भ-रीति शशि-शेखर-वल्लभेति |
सृष्टि-स्थिति-प्रलय-केलिषु संस्थि-तायै तस्यै नमस्त्रिभुवनै-कगुरोस्तरुण्यै || १० ||

अर्थ – जो माँ भगवती श्री सृष्टिक्रीड़ा में अवसर अनुसार वाग्देवता (ब्रह्मशक्ति) के रूप में विराजमान होती है, पालनक्रीड़ा के समय लक्ष्मी के रूप में विष्णु की पत्नी के विराजमान होती है, प्रलयक्रीड़ा के समय शाकम्भरी (भगवती दुर्गा) अथवा चन्द्रशेखर वल्लभा पार्वती (रूद्रशक्ति) भगवान शंकर की पत्नी के रूप में विद्यमान होती है, उन त्रिलोक के एकमात्र गुरु पालनहार विष्णु की नित्य यौवना प्रेमिका भगवती लक्ष्मी को मेरा सम्पूर्ण नमस्कार है।

श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभ-कर्मफल-प्रसूत्यै रत्यै नमोऽस्तु रमणीय गुणार्ण-वायै |
शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्र-निकेतनायै पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तम-वल्लभायै || ११ ||

अर्थ – हे माता ! शुभ कर्मों का फल देनेवाली श्रुति के रूप में आपको प्रणाम है। रमणीय गुणों की सिन्धुरूप रति के रूप में आपको नमस्कार है। कमलवन में निवास करनेवाली शक्तिस्वरूपा लक्ष्मी को नमस्कार है तथा पुरुषोत्तमप्रिया पुष्टि को नमस्कार है।

नमोऽस्तु नालीकनि-भाननायै नमोऽस्तु दुग्धो-दधि-जन्म-भूत्यै |
नमोऽस्तु सोमा-मृत-सोदरायै नमोऽस्तु नारायण-वल्लभायै || १२ ||

अर्थ – कमल वदना कमला को नमस्कार है। क्षीरसिंधु सभ्यता श्रीदेवी को नमस्कार है। चंद्रमा और सुधा की सगी बहन को नमस्कार है। भगवान नारायण की वल्लभा को नमस्कार है।

नमोऽस्तु हेमाम्बुज पीठिकायै नमोऽस्तु भूमण्डल नयिकायै ।
नमोऽस्तु देवादि दया-परायै नमोऽस्तु शारङ्ग-युध वल्लभायै || १३ ||

अर्थ – सोने के कमलासन पर बैठनेवाली, भूमण्डल नायिका, देवताओ पर दयाकरनेवाली, शाङ्घायुध विष्णु की वल्लभा शक्ति को नमस्कार है।

नमोऽस्तु देव्यै भृगुनन्दनायै नमोऽस्तु विष्णोरुरसि संस्थितायै ।
नमोऽस्तु लक्ष्म्यै कमलालयायै नमोऽस्तु दामोदरवल्लभायै || १४ ||

अर्थ – भगवान् विष्णु के वक्षःस्थल में निवास करनेवाली देवी, कमल के आसनवाली, दामोदर प्रिय लक्ष्मी, आपको मेरा नमस्कार है।

नमोऽस्तु कान्त्यै कमलेक्षणायै नमोऽस्तु भूत्यै भुवनप्रसूत्यै |
नमोऽस्तु देवादिभिरर्चितायै नमोऽस्तु नन्दात्मजवल्लभायै ॥ १५ ॥

अर्थ – भगवान् विष्णु की कान्ता, कमल के जैसे नेत्रोंवाली, त्रैलोक्य को उत्पन्न करने वाली, देवताओ के द्वारा पूजित, नन्दात्मज की वल्लभा ऐसी श्रीलक्ष्मीजी को मेरा नमस्कार है।

सम्पत्कराणि सकलेन्द्रिय-नंदनानि साम्राज्य-दान-विभवानि सरो-रुहाक्षि ।
त्वद्वन्द-नानि दुरिता-हरणो-द्यतानी मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये || १६ ||

अर्थ – कमल सदृश नेत्रों वाली माननीय मां! आपके चरणों में किए गए प्रणाम संपत्ति प्रदान करने वाले, संपूर्ण इंद्रियों को आनंद देने वाले, साम्राज्य देने में समर्थ और सारे पापों को हर लेने के लिए सर्वथा उद्यत हैं, वे सदा मुझे ही अवलम्बन दें। मुझे ही आपकी चरण वंदना का शुभ अवसर सदा प्राप्त होता रहे।

यत्कटाक्ष-समुपासना-विधिः सेव-कस्य सकलार्थ-सम्पदः ।
सन्त-नोति वचनाङ्ग-मानसै-स्त्वां मुरारि-हृदयेश्वरीं भजे ॥ १७ ॥

अर्थ – जिनके कृपा कटाक्ष के लिए की गई उपासना उपासक के लिए संपूर्ण मनोरथों और संपत्तियों का विस्तार करती है, श्रीहरि की हृदयेश्वरी उन्हीं आप लक्ष्मी देवी का मैं मन, वाणी और शरीर से भजन करता हूं।

सरसिज-निलये सरोज-हस्ते धवल-तमांशुक-गन्धमाल्य-शोभे ।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवन-भूतिकरि प्रसीद मह्यं ॥ १८ ॥

अर्थ – हे भगवती नारायण की पत्नी आप कमल में निवास करने वाली है, आप के हाथो में नीलकमल शोभायमान है आप श्वेत वस्त्र, गंध और माला आदि से सुशोभित है, आपकी झांकी बड़ी मनोहर है, अद्वितीय है, हे त्रिभुवन के ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली आप मुझ पर भी प्रसन्न हो जाईये।

दिग्ध-स्तिभिः कनककुम्भ-मुखावसृष्ट-स्वर्वाहिनी-विमलचारु-जलप्लु तांगीं ।
प्रात-र्नमामि जगतां जननी-मशेष-लोकाधिनाथ-गृहिणी-ममृताब्धि-पुत्रीं || १९ ॥

अर्थ – दिग्गजों द्वारा स्वर्ण कलश के मुख से गिराए गए, आकाशगंगा के स्वच्छ और मनोहर जल से जिन भगवान के श्रीअंगो का अभिषेक (स्नान) होता है, उस समस्त लोको के अधीश्वर भगवान विष्णु की गृहिणी, समुद्र तनया (क्षीरसागर पुत्री), जगतजननी भगवती लक्ष्मी को मै प्रातःकाल नमस्कार करता हू ।

कमले कमलाक्ष-वल्लभे त्वां करुणा-पूरतरङ्गी-तैर-पारङ्गैः ।
अवलोक-यमां-किञ्चनानां प्रथमं पात्रम-कृत्रिमं दयायाः || २० ||

अर्थ – कमल नयन केशव की कमनीय कामिनी कमले! मैं अकिंचन (दीन-हीन) मनुष्यों में अग्रगण्य हूं, अतएव तुम्हारी कृपा का स्वाभाविक पात्र हूं। तुम उमड़ती हुई करुणा की बाढ़ की तरह तरंगों के समान कटाक्षों द्वारा मेरी ओर देखो।

स्तुवन्ति ये स्तुति-भिरमू-भिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवन-मातरं रमां ।
गुणाधिका गुरु-तरभाग्य-भाजिनो (भागिनो) भवन्ति ते भुवि बुध-भाविता-शयाः || २१ ||

अर्थ – जो मनुष्य इन स्तु‍तियों द्वारा प्रतिदिन वेदत्रयी स्वरूपा त्रिभुवन-जननी भगवती लक्ष्मी की स्तुति करते हैं, वे इस भूतल पर महान गुणवान और अत्यंत सौभाग्यशाली होते हैं तथा विद्वान पुरुष भी उनके मनोभावों को जानने के लिए उत्सुक रहते हैं।

ॐ सुवर्ण-धारास्तोत्रं यच्छंकराचार्य निर्मितं |
त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं स कुबेरसमो भवेत || २२ ||

अर्थ – यह उत्तम स्तोत्र जो आद्यगुरु शंकराचार्य विरचित स्तोत्र का (कनकधारा) का पाठ तीनो कालो में (प्रातःकाल मध्याह्नकाल-सायंकाल) करता है वो मनुष्य या साधक कुबेर के समान धनवान हो जाता है।

॥ इति श्रीमद्द शंकराचार्य विरचित कनकधारा स्तोत्र सम्पूर्णं॥


कनकधारा स्तोत्रम् का जन्म एक प्रसिद्ध धार्मिक घटना से जुड़ा हुआ है। इसे आदिशंकराचार्य ने रचा था। कथा के अनुसार, यह स्तोत्र तब उत्पन्न हुआ जब एक निर्धन ब्राह्मण के घर एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति उत्पन्न हुई थी। ब्राह्मण के घर एक दिन भगवान विष्णु के प्रति उनकी भक्ति और विश्वास के बावजूद, उनकी स्थिति अत्यंत दीन-हीन हो गई।

आर्थिक संकट ने उनकी ज़िंदगी को बहुत कठिन बना दिया था। उनकी पत्नी की भी स्थिति बहुत ही दयनीय थी और उसे खाने के लिए भी कुछ नहीं मिलता था। इस कठिन स्थिति में, ब्राह्मण ने भगवान विष्णु से सहायता की प्रार्थना की। उन्होंने आदिशंकराचार्य से इस कठिनाई से मुक्ति पाने के लिए मार्गदर्शन मांगा। आदिशंकराचार्य ने इस स्थिति को जानकर ब्राह्मण को आश्वस्त किया और भगवान लक्ष्मी की आराधना करने का उपाय बताया।

आदिशंकराचार्य ने ब्राह्मण को कनकधारा स्तोत्रम् का पाठ करने के लिए प्रेरित किया। यह स्तोत्र भगवान लक्ष्मी की महिमा का वर्णन करता है और उनकी कृपा को प्राप्त करने के लिए भक्ति और समर्पण का माध्यम है। आदिशंकराचार्य ने इस स्तोत्र के माध्यम से भगवान लक्ष्मी की विशेष महिमा और दया का वर्णन किया। कनकधारा स्तोत्रम् का पाठ करने के बाद ब्राह्मण की किस्मत बदल गई और उनके घर में धन-धान्य की कोई कमी नहीं रही। उनकी आर्थिक स्थिति सुधर गई और उन्होंने भगवान लक्ष्मी की अनुकंपा को अनुभव किया। यह स्तोत्र आज भी भगवान लक्ष्मी की पूजा और आराधना में महत्वपूर्ण माना जाता है और इसे विशेष रूप से धन, समृद्धि और सुख-समृद्धि के लिए पढ़ा जाता है।


कनकधारा स्तोत्र के कई चमत्कारी प्रभाव और लाभ बताए गए हैं, जो इसके पाठकों और भक्तों के जीवन को सकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं। यहाँ कुछ प्रमुख चमत्कारों का वर्णन किया गया है:

आर्थिक समृद्धि: कनकधारा स्तोत्र का नियमित पाठ आर्थिक संकट में राहत प्रदान कर सकता है। इसे पढ़ने से धन की कमी दूर हो सकती है और समृद्धि का आगमन हो सकता है। ब्राह्मण के परिवार की कथा, जिसमें उनकी दीन-हीन स्थिति के बाद आर्थिक सुधार हुआ, इसका एक उदाहरण है।

सौभाग्य और समृद्धि: इस स्तोत्र का पाठ करने से जीवन में सौभाग्य और समृद्धि प्राप्त होती है। यह स्तोत्र माता लक्ष्मी की कृपा को आकर्षित करता है, जो धन, ऐश्वर्य और सुख-शांति का प्रतीक हैं।

मन की शांति: कनकधारा स्तोत्र का जाप मानसिक तनाव और चिंता को दूर करने में सहायक होता है। यह मन को शांति और संतुलन प्रदान करता है, जिससे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

स्वास्थ्य और लंबी उम्र: नियमित रूप से कनकधारा स्तोत्र का पाठ करने से स्वास्थ्य लाभ प्राप्त हो सकते हैं। यह शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद करता है और जीवन की लंबी उम्र को प्रोत्साहित करता है।

पारिवारिक सुख: परिवार में सुख-शांति और harmony बनाए रखने के लिए भी यह स्तोत्र अत्यंत लाभकारी माना जाता है। परिवारिक समस्याओं को दूर करने और रिश्तों को सुधारने के लिए इसे पढ़ा जा सकता है।

शिक्षा और सफलता: कनकधारा स्तोत्र का पाठ विद्यार्थियों और पेशेवरों के लिए भी लाभकारी है। यह शिक्षा में सफलता प्राप्त करने, एकाग्रता बढ़ाने और करियर में उन्नति के लिए सहायक हो सकता है।

कष्टों और संकटों से मुक्ति: यह स्तोत्र जीवन के विभिन्न कष्टों और संकटों से मुक्ति प्रदान करने में सहायक हो सकता है। इसमें भगवान लक्ष्मी की विशेष कृपा की याचना की जाती है, जो हर प्रकार के संकटों से बचाव कर सकती है।

कनकधारा स्तोत्र के ये चमत्कार श्रद्धा और विश्वास के साथ किए गए पाठ के अनुसार प्रभावी होते हैं। इसे नियमित रूप से पाठ करने से भक्तों को सुख-समृद्धि और आशीर्वाद प्राप्त होते हैं।


कनकधारा स्तोत्र का नियमित पाठ व्यक्ति के जीवन में अनेक लाभकारी प्रभाव ला सकता है। सबसे प्रमुख लाभ यह है कि यह आर्थिक समृद्धि को आकर्षित करता है। इस स्तोत्र का जाप विशेष रूप से आर्थिक संकटों से उबरने और धन-धान्य की कमी को दूर करने में सहायक होता है। भक्त इसे पढ़कर अपने वित्तीय मामलों में सुधार देख सकते हैं और आर्थिक समृद्धि का अनुभव कर सकते हैं।

दूसरा लाभ मानसिक शांति और संतुलन प्राप्त करना है। कनकधारा स्तोत्र का जाप व्यक्ति को आंतरिक शांति और मानसिक स्थिरता प्रदान करता है, जिससे जीवन में तनाव और चिंता कम होती है। यह मानसिक तनाव को दूर करके सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है, जिससे व्यक्ति अपने जीवन को अधिक संतुलित और सुखमय अनुभव करता है।

तीसरा लाभ पारिवारिक सुख और समृद्धि का है। इस स्तोत्र का पाठ परिवार में खुशहाली और सौहार्द बनाए रखने में मदद करता है। यह परिवारिक संबंधों को मजबूत करता है और पारिवारिक समस्याओं को सुलझाने में सहायक होता है। परिवार के सदस्यों के बीच सामंजस्य और प्रेम बढ़ाने के लिए इसे नियमित रूप से पढ़ा जा सकता है।

अंततः, कनकधारा स्तोत्र का पाठ स्वास्थ्य और लंबी उम्र में भी योगदान कर सकता है। यह व्यक्ति को शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार प्रदान करता है और जीवन की लंबी उम्र को प्रोत्साहित करता है। इस प्रकार, कनकधारा स्तोत्र के फायदे व्यापक और बहुपरकारी हैं, जो जीवन के विभिन्न पहलुओं में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं।



कनकधारा स्तोत्रम के क्या लाभ हैं?

कनकधारा स्तोत्रम के अनेक लाभ हैं, जो भक्तों के जीवन को बेहतर बनाने में सहायक होते हैं। सबसे प्रमुख लाभ यह है कि यह आर्थिक समृद्धि को आकर्षित करता है। इसके नियमित पाठ से धन की कमी दूर हो सकती है और वित्तीय संकट में राहत मिल सकती है। मानसिक शांति और संतुलन प्राप्त करना भी इसके लाभों में शामिल है; यह व्यक्ति को तनाव और चिंता से मुक्ति दिलाता है। पारिवारिक सुख और सौहार्द भी बढ़ता है, जिससे परिवारिक समस्याओं को सुलझाने में मदद मिलती है। इसके अतिरिक्त, यह स्वास्थ्य और लंबी उम्र में सुधार भी कर सकता है, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में सहायक होता है। कुल मिलाकर, कनकधारा स्तोत्रम जीवन के विभिन्न पहलुओं में सकारात्मक प्रभाव डालता है और भक्तों को सुख-समृद्धि का अनुभव कराता है।

क्या हम प्रतिदिन कनकधारा स्तोत्र का जाप कर सकते हैं?

हां, आप प्रतिदिन कनकधारा स्तोत्र का जाप कर सकते हैं। इस स्तोत्र का नियमित पाठ या जाप न केवल आत्मिक शांति और संतुलन प्रदान करता है, बल्कि यह आर्थिक समृद्धि, पारिवारिक सुख और स्वास्थ्य लाभ भी दे सकता है। प्रतिदिन पाठ करने से भगवती लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है, जिससे जीवन की कठिनाइयाँ और संकट कम होते हैं। हालांकि, यह महत्वपूर्ण है कि जाप के दौरान पूर्ण श्रद्धा और समर्पण के साथ किया जाए। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान की तरह, कनकधारा स्तोत्र का नियमित पाठ भी आपकी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बन सकता है और इसके लाभपूर्ण परिणाम प्राप्त करने में सहायक हो सकता है।

कनकधारा स्तोत्रम किसने गाया था?

कनकधारा स्तोत्रम की रचना और गायन आदिशंकराचार्य ने किया था। यह स्तोत्र उनके द्वारा उस समय की आर्थिक कठिनाई और संकट से उबारने के लिए लिखा गया था, जब एक निर्धन ब्राह्मण के घर में संकट आया था। आदिशंकराचार्य ने इस स्तोत्र के माध्यम से भगवान लक्ष्मी की कृपा की याचना की और ब्राह्मण के घर में धन-धान्य की कोई कमी नहीं रही। यह स्तोत्र आज भी भक्तों के लिए समृद्धि और सौभाग्य प्राप्त करने का महत्वपूर्ण साधन माना जाता है। आदिशंकराचार्य की भक्ति और स्नेह से प्रेरित होकर लिखा गया यह स्तोत्र भक्ति और श्रद्धा का प्रतीक है।

कनकधारा पूजा कैसे करें?

कनकधारा पूजा करने के लिए सबसे पहले एक स्वच्छ स्थान पर पूजा की तैयारी करें। पूजा स्थान को साफ करके वहां लक्ष्मी माता की एक सुंदर तस्वीर या मूर्ति स्थापित करें। फिर, एक दीपक जलाएं और फूल, चंदन, और प्रसाद तैयार रखें। कनकधारा स्तोत्र का पाठ शुरू करने से पहले, भगवान लक्ष्मी की आरती करें और उन्हें प्रणाम करें। तत्पश्चात, कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें, जिसमें प्रत्येक श्लोक को सही उच्चारण और श्रद्धा के साथ पढ़ें। पूजा के अंत में, भगवान लक्ष्मी को प्रसाद अर्पित करें और उन्हें धन्यवाद दें। अंत में, घर के सभी सदस्यों को प्रसाद वितरित करें और पूजा के प्रभावी लाभ के लिए अपनी श्रद्धा और समर्पण को बनाए रखें।

श्री लक्ष्मी जी की आरती PDF – Shri Maha Lakshmi Ji Ki Aarti PDF 2024-25

श्री लक्ष्मी जी की आरती – Lakshmi Ji Ki Aarti PDF एक दिव्य धार्मिक ग्रंथ है जो देवी लक्ष्मी की पूजा और आराधना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। देवी लक्ष्मी, जो धन, समृद्धि और समृद्धि की देवी मानी जाती हैं, उनकी आरती का यह PDF विशेष रूप से उन भक्तों के लिए तैयार किया गया है जो अपनी दैनिक पूजा में गहराई और आध्यात्मिकता लाना चाहते हैं। इस PDF में लक्ष्मी जी की आरती के समस्त बोल, उनके अर्थ, और पूजा की विधि का विस्तृत वर्णन किया गया है, जो भक्तों को उनकी पूजा में पूर्णता और शुद्धता प्रदान करता है। आप यहां से लक्ष्मी चालीसा और धन-समृद्धि की कुंजी: कनकधारा स्तोत्र पढ़ सकते हैं!

इस PDF के माध्यम से, भक्तों को लक्ष्मी जी की आरती के सुंदर बोल और उनके साथ जुड़ी धार्मिक महत्वता को समझने का एक सरल और सुलभ तरीका मिलता है। यह दस्तावेज़ न केवल पूजा की प्रक्रिया को आसान बनाता है बल्कि देवी लक्ष्मी के आशीर्वाद को पाने के लिए सही मार्गदर्शन भी प्रदान करता है। यदि आप अपने पूजा स्थल पर एक नई ऊर्जा और दिव्यता लाना चाहते हैं, तो श्री लक्ष्मी जी की आरती का यह PDF आपकी भक्ति को एक नई दिशा दे सकता है। विनय चालीसा | शनि चालीसा | साईं चालीसा पढ़ने के लिए इनपर क्लिक करें


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|| आरती माँ लक्ष्मी जी ||

{ॐ जय लक्ष्मी माता}

महालक्ष्मी नमस्तुभ्यं,
नमस्तुभ्यं सुरेश्वरि ।
हरि प्रिये नमस्तुभ्यं,
नमस्तुभ्यं दयानिधे ॥

पद्मालये नमस्तुभ्यं,
नमस्तुभ्यं च सर्वदे ।
सर्वभूत हितार्थाय,
वसु सृष्टिं सदा कुरुं ॥

ॐ जय लक्ष्मी माता,
मैया जय लक्ष्मी माता ।
तुमको निसदिन सेवत,
हर विष्णु विधाता ॥

उमा, रमा, ब्रम्हाणी,
तुम ही जग माता ।
सूर्य चद्रंमा ध्यावत,
नारद ऋषि गाता ॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता…॥

दुर्गा रुप निरंजनि,
सुख-संपत्ति दाता ।
जो कोई तुमको ध्याता,
ऋद्धि-सिद्धि धन पाता ॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता…॥

तुम ही पाताल निवासनी,
तुम ही शुभदाता ।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशनी,
भव निधि की त्राता ॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता…॥

जिस घर तुम रहती हो,
ताँहि में हैं सद्‍गुण आता ।
सब सभंव हो जाता,
मन नहीं घबराता ॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता…॥

तुम बिन यज्ञ ना होता,
वस्त्र न कोई पाता ।
खान पान का वैभव,
सब तुमसे आता ॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता…॥

शुभ गुण मंदिर सुंदर,
क्षीरोदधि जाता ।
रत्न चतुर्दश तुम बिन,
कोई नहीं पाता ॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता…॥

महालक्ष्मी जी की आरती,
जो कोई नर गाता ।
उँर आंनद समाता,
पाप उतर जाता ॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता…॥

ॐ जय लक्ष्मी माता,
मैया जय लक्ष्मी माता ।
तुमको निसदिन सेवत,
हर विष्णु विधाता ॥

|| Laxmi Mata Aarti in English ||

{Lakshmi Ji Ki Aarti Lyrics}

Om Jai Lakshmi Mata,Maiya Jai Lakshmi Mata।
Tumako Nishidin Sevat,Hari Vishnu Vidhata॥
Om Jai Lakshmi Mata॥

Uma Rama Brahmani,Tum Hi Jag-Mata।
Surya-Chandrama DhyavatNaarad Rishi Gata॥
Om Jai Lakshmi Mata॥

Durga Roop Niranjani,Sukh Sampatti Data।
Jo Koi Tumako Dhyavat,Riddhi-Siddhi Dhan Pata॥
Om Jai Lakshmi Mata॥

Tum Patal-Nivasini,Tum Hi Shubhdata।
Karma-Prabhav-Prakashini,Bhavanidhi Ki Trata॥
Om Jai Lakshmi Mata॥

Jis Ghar Mein Tum Rahti,Sab Sadgun Aata।
Sab Sambhav Ho Jata,Man Nahi Ghabrata॥
Om Jai Lakshmi Mata॥

Tum Bin Yagya Na Hote,Vastra Na Koi Pata।
Khan-Pan Ka Vaibhav,Sab Tumase Aata॥
Om Jai Lakshmi Mata॥

Shubh-Gun Mandir Sundar,Kshirodadhi-Jata।
Ratna Chaturdash Tum Bin,Koi Nahi Pata॥
Om Jai Lakshmi Mata॥

Mahalakshmi Ji Ki Aarti,Jo Koi Jan Gata।
Ur Anand Samata,Paap Utar Jata॥
Om Jai Lakshmi Mata॥



Lakshmi Ji Ki Aarti Lyrics

लक्ष्मी माता जी की आरती के लाभ

लक्ष्मी माता जी की आरती हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण पूजा विधि है, जो देवी लक्ष्मी की आराधना के लिए की जाती है। देवी लक्ष्मी धन, समृद्धि, वैभव और खुशहाली की देवी हैं, और उनकी आरती का नियमित पाठ भक्तों के जीवन में अनेक सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है। इस लेख में, हम विस्तार से जानेंगे कि लक्ष्मी माता जी की आरती के क्या-क्या लाभ हो सकते हैं और यह कैसे आपके जीवन को सकारात्मक दिशा दे सकती है।

धन और समृद्धि की प्राप्ति

लक्ष्मी माता जी की आरती करने से सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह धन और समृद्धि की प्राप्ति में सहायक होती है। देवी लक्ष्मी की पूजा से घर में आर्थिक स्थिरता आती है, और व्यवसाय या नौकरी में उन्नति के अवसर बढ़ते हैं। नियमित आरती से लक्ष्मी माता की कृपा से आर्थिक संकटों का समाधान होता है और धन की कमी से छुटकारा मिलता है। जिन व्यक्तियों को आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, वे इस आरती को श्रद्धा भाव से पढ़कर अपने जीवन में आर्थिक सुख प्राप्त कर सकते हैं।

मानसिक शांति और संतुलन

लक्ष्मी माता की आरती का एक और महत्वपूर्ण लाभ है मानसिक शांति और संतुलन की प्राप्ति। पूजा के दौरान मंत्रों और आरती के बोलों का जाप मन को शांत करता है और मानसिक तनाव को कम करता है। आरती के समय वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जो मानसिक स्थिरता और शांति प्रदान करता है। मानसिक शांति से जीवन में सुख और संतुलन बना रहता है, जो व्यक्ति के समग्र स्वास्थ्य और खुशी के लिए लाभकारी होता है।

सुख और सौभाग्य की वृद्धि

लक्ष्मी माता की आरती से सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है। जब भक्त पूरे मनोयोग से आरती करते हैं, तो देवी लक्ष्मी उनकी दुआओं को सुनती हैं और उनके जीवन में सुख, समृद्धि और सौभाग्य लाने का प्रयास करती हैं। यह आरती न केवल व्यक्तिगत जीवन में बल्कि परिवार और समाज में भी सुख और सौभाग्य की वृद्धि करती है। आरती के माध्यम से व्यक्ति अपने घर में सुख-शांति और समृद्धि का अनुभव कर सकता है।

संकट और परेशानियों से मुक्ति

लक्ष्मी माता की आरती संकट और परेशानियों से मुक्ति दिलाने में सहायक होती है। जब कोई व्यक्ति नियमित रूप से लक्ष्मी माता की आरती करता है, तो देवी की कृपा से जीवन की समस्याएं और संकट दूर हो जाते हैं। देवी लक्ष्मी की आरती संकट के समय मनोबल को ऊंचा बनाए रखती है और कठिन परिस्थितियों से उबरने में मदद करती है। यह आरती व्यक्तिगत, पारिवारिक और व्यवसायिक जीवन में आने वाली समस्याओं का समाधान करती है।

आध्यात्मिक उन्नति

लक्ष्मी माता की आरती आध्यात्मिक उन्नति का भी एक महत्वपूर्ण साधन है। आरती के दौरान मंत्रों का जाप और पूजा की विधि भक्त की आध्यात्मिक यात्रा को प्रगति देती है। यह भक्तों को मानसिक और आत्मिक स्तर पर उन्नति प्राप्त करने में मदद करती है। देवी लक्ष्मी की आराधना से आत्मा को शांति और उच्चतर चेतना का अनुभव होता है, जिससे आध्यात्मिक विकास की दिशा में कदम बढ़ाते हैं।

परिवार में खुशहाली

लक्ष्मी माता की आरती करने से परिवार में खुशहाली और समर्पण बढ़ता है। जब परिवार के सभी सदस्य मिलकर देवी लक्ष्मी की आरती करते हैं, तो परिवार में प्रेम, एकता और समझदारी की भावना बढ़ती है। यह आरती परिवार की एकता और सामंजस्य को बनाए रखने में सहायक होती है। खुशहाल और समर्पित परिवार जीवन को और भी सुखमय और संतोषजनक बनाता है।

धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्य

लक्ष्मी माता की आरती से धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों की भी वृद्धि होती है। यह आरती हिंदू धर्म की सांस्कृतिक धरोहर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसे पूजा और श्रद्धा के साथ करना आवश्यक है। आरती करने से धार्मिक अनुष्ठान और सांस्कृतिक परंपराओं की प्रतिष्ठा बनी रहती है, जो व्यक्ति को अपनी धार्मिक पहचान और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ती है।

स्वास्थ्य और समृद्धि

लक्ष्मी माता की आरती से स्वास्थ्य और समृद्धि में भी सुधार होता है। यह आरती स्वास्थ्य को बनाए रखने और बीमारियों से बचाव में सहायक होती है। देवी लक्ष्मी की कृपा से शरीर और मन स्वस्थ रहते हैं, और समृद्धि की प्राप्ति होती है। आरती के नियमित पाठ से शरीर में ऊर्जा और शक्ति का संचार होता है, जो स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है।

उपसंहार

लक्ष्मी माता जी की आरती के कई लाभ होते हैं जो भक्तों के जीवन को सकारात्मक दिशा देते हैं। यह आरती न केवल धन और समृद्धि की प्राप्ति में सहायक होती है, बल्कि मानसिक शांति, सुख, सौभाग्य, और आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। नियमित आरती से जीवन की समस्याओं और संकटों से मुक्ति मिलती है और परिवार में खुशहाली बनी रहती है। इस प्रकार, लक्ष्मी माता की आरती एक सम्पूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है जो जीवन को समृद्ध और संतुलित बनाता है।


लक्ष्मी जी की आरती कैसे की जाती है?

लक्ष्मी जी की आरती एक पवित्र धार्मिक अनुष्ठान है जिसे श्रद्धा और भक्ति के साथ किया जाता है। आरती करने के लिए सबसे पहले, पूजा स्थल को स्वच्छ करें और वहां एक सुंदर आसन बिछाएं। लक्ष्मी माता की तस्वीर या मूर्ति को पूजा स्थल पर स्थापित करें। फिर, दीपक जलाएं और धूप अर्पित करें। आरती के दौरान, दीपक को चारों ओर घुमाते हुए देवी लक्ष्मी के सामने रखें।

ध्यान रखें कि दीपक और धूप को एकत्र करके ही आरती की जाती है, जिससे देवी लक्ष्मी के प्रति सम्मान प्रकट होता है। आरती के समय, भक्तगण अपने हृदय से देवी लक्ष्मी की महिमा गाते हैं और उनके कृपा की प्रार्थना करते हैं। आरती के दौरान देवी लक्ष्मी के मंत्रों और श्लोकों का जाप करना चाहिए। पूजा समाप्त होने के बाद, देवी लक्ष्मी को भोग अर्पित करें और आरती का प्रसाद सभी को वितरित करें। इस प्रकार, आरती के समय शांतिपूर्ण वातावरण बनाए रखें और समर्पण के साथ पूजा करें, ताकि देवी लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त हो सके।

लक्ष्मी जी का प्रिय मंत्र कौन सा है?

लक्ष्मी जी का प्रिय मंत्र उनकी पूजा और आराधना में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लक्ष्मी माता के कई मंत्र हैं, लेकिन सबसे प्रिय और प्रभावशाली मंत्र “ॐ श्री महालक्ष्म्यै नमः” है। यह मंत्र देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है। इस मंत्र का जाप नियमित रूप से करने से जीवन में धन, समृद्धि और सुख की प्राप्ति होती है। मंत्र का जाप करने से देवी लक्ष्मी की आशीर्वाद से आर्थिक स्थिति में सुधार होता है और हर संकट से मुक्ति मिलती है।

इस मंत्र का जाप विशेष रूप से लक्ष्मी पूजा और आरती के समय किया जाता है। इसे उच्च स्वर में और श्रद्धा के साथ जाप करने से मन की शांति और संतुलन भी बना रहता है। इसके अतिरिक्त, “श्री लक्ष्मी अष्टाक्षरी मंत्र” भी अत्यंत प्रिय है, जिसे “ॐ श्री महालक्ष्म्यै नमः” के साथ पढ़ा जाता है। इस प्रकार, लक्ष्मी जी के प्रिय मंत्रों का जाप नियमित रूप से करने से देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।

क्या दिवाली पर लक्ष्मी माता की आरती करनी चाहिए?

दिवाली पर लक्ष्मी माता की आरती करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। दिवाली, जिसे दीपावली भी कहा जाता है, देवी लक्ष्मी के आगमन का त्योहार है, और इस दिन उनकी पूजा और आराधना विशेष महत्व रखती है। दिवाली के दिन, घरों में दीप जलाए जाते हैं और देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है ताकि उनके आशीर्वाद से घर में सुख-समृद्धि और वैभव की प्राप्ति हो सके। दिवाली की रात लक्ष्मी माता की आरती विशेष रूप से की जाती है, जिसमें परिवार के सभी सदस्य मिलकर देवी लक्ष्मी की आरती करते हैं।

इस दिन आरती के दौरान लक्ष्मी माता के मंत्रों का जाप और पूजा की विधि पूरी श्रद्धा से करनी चाहिए। दिवाली की रात, लक्ष्मी माता को विशेष भोग अर्पित करें और उनके चरणों में दीपक रखें। इससे देवी लक्ष्मी आपके घर में आकर समृद्धि और खुशहाली का आगमन करेंगी। इस प्रकार, दिवाली पर लक्ष्मी माता की आरती करना न केवल धार्मिक बल्कि शुभ संकेत भी होता है जो घर में सुख और समृद्धि का वास लाता है।

लक्ष्मी की बेटी का क्या नाम है?

लक्ष्मी की बेटी का नाम संतोषी माता है। संतोषी माता, जो देवी लक्ष्मी की पुत्री मानी जाती हैं, को संतोष और सुख की देवी के रूप में पूजा जाता है। उनकी पूजा विशेष रूप से मंगलवार और शुक्रवार को की जाती है। संतोषी माता के पूजन से जीवन में सुख, संतोष और मानसिक शांति प्राप्त होती है।

भक्तगण संतोषी माता की पूजा करते समय विशेष व्रत और उपवासन करते हैं। संतोषी माता की पूजा का उद्देश्य जीवन में शांति, संतोष और सुख की प्राप्ति करना होता है। इस प्रकार, लक्ष्मी माता की पुत्री संतोषी माता की पूजा से मनोकामनाओं की पूर्ति और जीवन में सुख-शांति का अहसास होता है।

लक्ष्मी पूजा में क्या क्या चढ़ाया जाता है?

लक्ष्मी पूजा में कई प्रकार की वस्तुएं अर्पित की जाती हैं जो देवी लक्ष्मी को प्रिय होती हैं। पूजा के दौरान, पंखा, दीपक, धूप और मिठाई अर्पित की जाती है। इसके अतिरिक्त, फल, नारियल, सुपारी, साखर (चीनी), दूध और घी भी चढ़ाए जाते हैं। इन वस्तुओं को देवी लक्ष्मी के समक्ष अर्पित करने से उनकी कृपा प्राप्त होती है।

पूजा के समय, देवी लक्ष्मी को विशेष भोग अर्पित करने से उनके आशीर्वाद की प्राप्ति होती है और घर में समृद्धि का आगमन होता है। पूजा के बाद, चढ़ाए गए भोग को भक्तों में वितरित किया जाता है और प्रसाद के रूप में सेवन किया जाता है। इस प्रकार, लक्ष्मी पूजा में अर्पित की जाने वाली वस्तुएं विशेष धार्मिक महत्व रखती हैं और इनसे देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त की जा सकती है।

सुबह की आरती कैसे करें?

सुबह की आरती करने का विशेष महत्व है क्योंकि यह दिन की शुरुआत को पवित्र और शुभ बनाता है। सुबह की आरती करने के लिए सबसे पहले, पूजा स्थल को स्वच्छ करें और वहां एक आसन बिछाएं। लक्ष्मी माता की तस्वीर या मूर्ति को पूजा स्थल पर स्थापित करें। फिर, दीपक और धूप जलाएं।

दीपक को चारों ओर घुमाते हुए देवी लक्ष्मी के सामने रखें और आरती के गीत गाएं। आरती के दौरान, श्रद्धा और भक्ति के साथ देवी लक्ष्मी के मंत्रों का जाप करें। इसके बाद, देवी को भोग अर्पित करें, जिसमें फल, मिठाई, और अन्य पवित्र वस्तुएं शामिल हो सकती हैं। पूजा समाप्त करने के बाद, आरती का प्रसाद सभी को वितरित करें और अपनी दिन की शुरुआत को पवित्र और शुभ बनाएं। सुबह की आरती से दिनभर सकारात्मक ऊर्जा और शांति बनी रहती है।

रिद्धि सिद्धि के दाता सुनो गणपति – Riddhi Siddhi Ke Data Suno Ganpati Lyrics 2024-25

रिद्धि सिद्धि के दाता सुनो गणपति (Riddhi Siddhi Ke Data Suno Ganpati Lyrics) एक अत्यंत लोकप्रिय भजन है जो भगवान गणेश को समर्पित है। यह भजन भक्तों के मन में श्रद्धा और भक्ति की भावना जागृत करता है और भगवान गणेश की महिमा का गुणगान करता है। “रिद्धि सिद्धि” गणेशजी की दो पत्नियों का प्रतीक हैं, जो समृद्धि (रिद्धि) और बुद्धि (सिद्धि) की प्रतीक मानी जाती हैं। इस भजन के माध्यम से भक्त भगवान गणेश से अपने जीवन में रिद्धि-सिद्धि का आशीर्वाद प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं।

भगवान गणेश हिंदू धर्म में विघ्नहर्ता और शुभ आरंभ के देवता के रूप में पूजे जाते हैं। कोई भी शुभ कार्य या पूजा उनकी आराधना के बिना अधूरी मानी जाती है। “रिद्धि सिद्धि के दाता सुनो गणपति” भजन में भक्त भगवान गणेश से जीवन के सभी कष्टों को हरने और सुख-समृद्धि प्रदान करने की विनती करते हैं। यह भजन भक्तों के दिलों में भगवान गणेश के प्रति आस्था को मजबूत करता है और उनके प्रति गहरी भक्ति का प्रतीक है।

इस भजन का संगीत और इसके बोल इतने सरल और भावपूर्ण होते हैं कि यह हर वर्ग के लोगों के दिलों को छू जाता है। इसे गाते या सुनते समय, भक्त अपने सारे दुःख और चिंताओं को भगवान गणेश के चरणों में समर्पित कर देते हैं, जिससे उन्हें मानसिक शांति और आंतरिक शक्ति का अनुभव होता है।


  • Hindi
  • English

|| रिद्धि सिद्धि के दाता सुनो गणपति ||

– श्लोक –
सारी चिंता छोड़ दो, चिंतामण के द्वार,
बिगड़ी बनायेंगे वही, विनती कर स्वीकार,
बड़े बड़े कारज सभी, पल मे करे साकार,
बड़े गणपति का है साथ, सच्चा ये दरबार,
सिध्द हो हर कामना, सिध्दिविनायक धाम,
खजराना मे आन बसे मेरे, शिव गौरी के लाल ॥

रिद्धि सिद्धि के दाता सुनो गणपति,
आपकी मेहरबानी हमें चाहिये,
पहले सुमिरन करूँ गणपति आपका,
लब पे मीठी सी वाणी हमें चाहिये,
रिद्धि सिद्धि के दाता सुणो गणपति….

तर्ज – हाल क्या है दिलो का

सर झुकाता हूँ चरणों मे सुन लीजिये,
आज बिगड़ी हमारी बना दीजिये,
ना तमन्ना है धन की ना सर ताज की,
तेरे चरणों की सेवा हमें चाहिये,
रिद्धि सिद्धि के दाता सुणो गणपति….

तेरी भक्ति का दील मे नशा चूर हो,
बस आँखो मे मालिक तेरा नूर हो,
कंठ पे शारदा माँ हमेशा रहे,
रिध्धि सिद्धि का वरदान हमें चाहिये,
रिद्धि सिद्धि के दाता सुणो गणपति….

सारे देवों मे गुणवान दाता हो तुम,
सारे वेदों मे ज्ञानो के ज्ञाता हो तुम,
ज्ञान देदो भजन गीत गाते रहे,
बस यही ज़िन्दगानी हमें चाहिये,
रिद्धि सिद्धि के दाता सुणो गणपति….

रिद्धि सिद्धि के दाता सुनो गणपति,
आपकी मेहरबानी हमें चाहिये,
पहले सुमिरन करूँ गणपति आपका,
लब पे मीठी सी वाणी हमें चाहिये,
रिद्धि सिद्धि के दाता सुणो गणपति….

Riddhi Siddhi Ke Data Suno Ganpati Lyrics English

– Shlok –
Saari Chinta Chhod Do, Chintaman Ke Dwar,
Bigdi Banayenge Wahi, Vinati Kar Swikaar,
Bade Bade Kaaraj Sabhi, Pal Me Kare Saakaar,
Bade Ganpati Ka Hai Sath, Sachcha Ye Darbaar,
Sidh Ho Har Kaamna, Siddhivinayak Dham,
Khajrana Me Aan Base Mere, Shiv Gauri Ke Laal ॥

Riddhi Siddhi Ke Data Suno Ganpati,
Aapki Meharbani Humen Chahiye,
Pahle Sumiran Karoon Ganpati Aapka,
Lab Pe Mithi Si Vani Humen Chahiye,
Riddhi Siddhi Ke Data Suno Ganpati ॥

Sar Jhukata Hoon Charnon Me Sun Lijiye,
Aaj Bigdi Humari Bana Lijiye,
Na Tamanna Hai Dhan Ki Na Sar Taaj Ki,
Tere Charnon Ki Seva Humen Chahiye,
Riddhi Siddhi Ke Data Suno Ganpati ॥

Teri Bhakti Ka Deel Me Nasha Choor Ho,
Bas Aankho Me Baba Tera Noor Ho,
Kanth Pe Sharda Maan Hamesha Rahe,
Riddhi Siddhi Ka Var Hi Humen Chahiye,
Riddhi Siddhi Ke Data Suno Ganpati ॥

Saare Devon Me Gunvaan Data Ho Tum,
Saare Vedon Me Gyano Ke Gyata Ho Tum,
Gyaan Dedo Bhajan Geet Gaate Rahe,
Bas Yahi Zindagani Humen Chaahiye,
Riddhi Siddhi Ke Data Suno Ganpati ॥

Riddhi Siddhi Ke Data Suno Ganpati,
Aapki Meharbani Humen Chahiye,
Pahle Sumiran Karoon Ganpati Aapka,
Lab Pe Mithi Si Vani Humen Chahiye,
Riddhi Siddhi Ke Data Suno Ganpati ॥



रिद्धि सिद्धि के दाता सुनो गणपति भजन के लाभ

आध्यात्मिक शांति और मानसिक संतुलन

रिद्धि सिद्धि के दाता सुनो गणपति भजन के नियमित गान से मानसिक शांति प्राप्त होती है। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता कहा जाता है, और यह भजन गाते समय व्यक्ति अपने जीवन के कष्टों और चिंताओं को गणपति बप्पा के चरणों में समर्पित करता है। इससे मन में संतुलन और शांति का अनुभव होता है, जिससे तनाव और चिंता कम होते हैं। यह भजन ध्यान और साधना के समय मन को एकाग्र करने में भी सहायक होता है।

सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि का प्रवाह

इस भजन के माध्यम से व्यक्ति भगवान गणेश से जीवन में समृद्धि और सफलता का आशीर्वाद मांगता है। रिद्धि और सिद्धि, जो समृद्धि और बुद्धि का प्रतीक हैं, गणपति की कृपा से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह लाती हैं। भजन के शब्दों में छिपी श्रद्धा और भक्ति व्यक्ति के चारों ओर सकारात्मक वातावरण का निर्माण करती है, जिससे घर और जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है।

विघ्नों का नाश और सफलता का मार्ग

गणेशजी को विघ्नहर्ता कहा जाता है, जो सभी बाधाओं और परेशानियों को दूर करने वाले देवता हैं। जब कोई व्यक्ति इस भजन का गान करता है, तो वह भगवान गणेश से अपने जीवन के विघ्नों को हरने की प्रार्थना करता है। इस भजन का नियमित गान व्यक्ति के जीवन में आने वाले बाधाओं को दूर करता है और उसे सफलता के मार्ग पर ले जाता है। गणपति बप्पा का आशीर्वाद प्राप्त कर व्यक्ति नए अवसरों और सफलताओं की ओर अग्रसर होता है।

भक्ति और श्रद्धा में वृद्धि

रिद्धि सिद्धि के दाता सुनो गणपति भजन का नियमित गान व्यक्ति की भगवान गणेश के प्रति भक्ति और श्रद्धा को गहरा करता है। भगवान गणेश की महिमा का गुणगान करते हुए भक्त के मन में ईश्वर के प्रति निष्ठा और समर्पण की भावना प्रबल होती है। यह भजन व्यक्ति को अपनी आत्मा से जोड़ता है और उसे आध्यात्मिक रूप से जागरूक बनाता है, जिससे उसकी भक्ति मार्ग पर दृढ़ता बढ़ती है।

संघर्षों में धैर्य और साहस
जीवन के संघर्षों में धैर्य और साहस बनाए रखने के लिए इस भजन का गान अत्यंत लाभकारी होता है। गणपति बप्पा का स्मरण और उनकी कृपा से व्यक्ति कठिन समय में भी धैर्यपूर्वक संघर्षों का सामना कर सकता है। भजन के शब्द व्यक्ति को आत्मविश्वास और साहस प्रदान करते हैं, जिससे वह जीवन की चुनौतियों को आसानी से पार कर सकता है। यह भजन व्यक्ति के भीतर सकारात्मकता और आत्मबल को जागृत करता है, जिससे वह कठिनाइयों से लड़ने में सक्षम हो जाता है।

शिव अमृतवाणी – Shiv Amritwani PDF 2024-25

शिव अमृतवाणी (Shiv Amritwani PDF), भगवान शिव की महिमा और उनकी कृपा का अद्भुत स्तोत्र है। यह दिव्य पाठ उन भक्तों के लिए अमूल्य धरोहर है जो शिवजी के चरणों में अटूट श्रद्धा और विश्वास रखते हैं। शिव अमृतवाणी में भगवान शिव के विभिन्न रूपों, उनकी लीला, उनके अवतारों और उनके शक्तियों का वर्णन मिलता है। यह पाठ न केवल शिवजी की आराधना का माध्यम है, बल्कि भक्तों के मन में शांति, सद्भावना और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार भी करता है।

शिव अमृतवाणी को पढ़ने और सुनने से नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है। यह पाठ जीवन की कठिनाइयों को दूर करने और सफलता, समृद्धि, स्वास्थ्य, और सुख-शांति को प्राप्त करने में सहायक है। शिव अमृतवाणी की हर पंक्ति में शिवजी की अनंत कृपा और आशीर्वाद छिपा हुआ है, जो भक्तों को निरंतर प्रेरित और उत्साहित करता है।

भगवान शिव को संहारक और सृष्टि के पुनर्निर्माणकर्ता के रूप में जाना जाता है। उनकी आराधना से जीवन में संतुलन, दृढ़ता, और आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है। शिव अमृतवाणी का नियमित पाठ करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है। यह पाठ भक्तों को शिवजी के सान्निध्य का अनुभव कराता है और उन्हें आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर करता है।

शिव अमृतवाणी, शिवभक्तों के लिए एक ऐसा मार्गदर्शक है जो उन्हें जीवन की कठिनाइयों से उबारकर उन्हें शांति, आनंद और आत्मिक संतोष की ओर ले जाता है। अतः, आइए हम सब मिलकर भगवान शिव की इस अमृतवाणी का पाठ करें और उनकी कृपा प्राप्त करें।



॥ भाग १ ॥
कल्पतरु पुन्यातामा,
प्रेम सुधा शिव नाम
हितकारक संजीवनी,
शिव चिंतन अविराम
पतिक पावन जैसे मधुर,
शिव रसन के घोलक
भक्ति के हंसा ही चुगे,
मोती ये अनमोल
जैसे तनिक सुहागा,
सोने को चमकाए
शिव सुमिरन से आत्मा,
अद्भुत निखरी जाये
जैसे चन्दन वृक्ष को,
डसते नहीं है नाग
शिव भक्तो के चोले को,
कभी लगे न दाग

ॐ नमः शिवाय, ॐ नमः शिवाय !

दयानिधि भूतेश्वर,
शिव है चतुर सुजान
कण कण भीतर है बसे,
नील कंठ भगवान
चंद्रचूड के त्रिनेत्र,
उमा पति विश्वास
शरणागत के ये सदा,
काटे सकल क्लेश
शिव द्वारे प्रपंच का,
चल नहीं सकता खेल
आग और पानी का,
जैसे होता नहीं है मेल
भय भंजन नटराज है,
डमरू वाले नाथ
शिव का वंधन जो करे,
शिव है उनके साथ

ॐ नमः शिवाय, ॐ नमः शिवाय !

लाखो अश्वमेध हो,
सौ गंगा स्नान
इनसे उत्तम है कही,
शिव चरणों का ध्यान
अलख निरंजन नाद से,
उपजे आत्मज्ञान
भटके को रास्ता मिले,
मुश्किल हो आसान
अमर गुणों की खान है,
चित शुद्धि शिव जाप
सत्संगति में बैठ कर,
करलो पश्चाताप
लिंगेश्वर के मनन से,
सिद्ध हो जाते काज
नमः शिवाय रटता जा,
शिव रखेंगे लाज

ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय !

शिव चरणों को छूने से,
तन मन पावन होये
शिव के रूप अनूप की,
समता करे न कोई
महाबलि महादेव है,
महाप्रभु महाकाल
असुराणखण्डन भक्त की,
पीड़ा हरे तत्काल
सर्व व्यापी शिव भोला,
धर्म रूप सुख काज
अमर अनंता भगवंता,
जग के पालन हार
शिव करता संसार के,
शिव सृष्टि के मूल
रोम रोम शिव रमने दो,
शिव न जईओ भूल

ॐ नमः शिवाय, ॐ नमः शिवाय !
ॐ नमः शिवाय, ॐ नमः शिवाय !
ॐ नमः शिवाय, ॐ नमः शिवाय !

॥ भाग २ – ३ ॥
शिव अमृत की पावन धारा,
धो देती हर कष्ट हमारा
शिव का काज सदा सुखदायी,
शिव के बिन है कौन सहायी
शिव की निसदिन कीजो भक्ति,
देंगे शिव हर भय से मुक्ति
माथे धरो शिव नाम की धुली,
टूट जायेगी यम कि सूली
शिव का साधक दुःख ना माने,
शिव को हरपल सम्मुख जाने
सौंप दी जिसने शिव को डोर,
लूटे ना उसको पांचो चोर
शिव सागर में जो जन डूबे,
संकट से वो हंस के जूझे
शिव है जिनके संगी साथी,
उन्हें ना विपदा कभी सताती
शिव भक्तन का पकडे हाथ,
शिव संतन के सदा ही साथ
शिव ने है बृह्माण्ड रचाया,
तीनो लोक है शिव कि माया
जिन पे शिव की करुणा होती,
वो कंकड़ बन जाते मोती
शिव संग तान प्रेम की जोड़ो,
शिव के चरण कभी ना छोडो
शिव में मनवा मन को रंग ले,
शिव मस्तक की रेखा बदले
शिव हर जन की नस-नस जाने,
बुरा भला वो सब पहचाने
अजर अमर है शिव अविनाशी,
शिव पूजन से कटे चौरासी
यहाँ-वहाँ शिव सर्व व्यापक,
शिव की दया के बनिये याचक
शिव को दीजो सच्ची निष्ठा,
होने न देना शिव को रुष्टा
शिव है श्रद्धा के ही भूखे,
भोग लगे चाहे रूखे-सूखे
भावना शिव को बस में करती,
प्रीत से ही तो प्रीत है बढ़ती
शिव कहते है मन से जागो,
प्रेम करो अभिमान त्यागो

॥ दोहा ॥
दुनिया का मोह त्याग के
शिव में रहिये लीन ।
सुख-दुःख हानि-लाभ तो
शिव के ही है अधीन ॥

भस्म रमैया पार्वती वल्ल्भ,
शिव फलदायक शिव है दुर्लभ
महा कौतुकी है शिव शंकर,
त्रिशूलधारी शिव अभयंकर
शिव की रचना धरती अम्बर,
देवो के स्वामी शिव है दिगंबर
काल दहन शिव रूण्डन पोषित,
होने न देते धर्म को दूषित
दुर्गापति शिव गिरिजानाथ,
देते है सुखों की प्रभात
सृष्टिकर्ता त्रिपुरधारी,
शिव की महिमा कही ना जाती
दिव्य तेज के रवि है शंकर,
पूजे हम सब तभी है शंकर
शिव सम और कोई और न दानी,
शिव की भक्ति है कल्याणी
कहते मुनिवर गुणी स्थानी,
शिव की बातें शिव ही जाने
भक्तों का है शिव प्रिय हलाहल,
नेकी का रस बाटँते हर पल
सबके मनोरथ सिद्ध कर देते,
सबकी चिंता शिव हर लेते
बम भोला अवधूत सवरूपा,
शिव दर्शन है अति अनुपा
अनुकम्पा का शिव है झरना,
हरने वाले सबकी तृष्णा
भूतो के अधिपति है शंकर,
निर्मल मन शुभ मति है शंकर
काम के शत्रु विष के नाशक,
शिव महायोगी भय विनाशक
रूद्र रूप शिव महा तेजस्वी,
शिव के जैसा कौन तपस्वी
हिमगिरी पर्वत शिव का डेरा,
शिव सम्मुख न टिके अंधेरा
लाखों सूरज की शिव ज्योति,
शस्त्रों में शिव उपमान होती
शिव है जग के सृजन हारे,
बंधु सखा शिव इष्ट हमारे
गौ ब्राह्मण के वे हितकारी,
कोई न शिव सा पर उपकारी

॥ दोहा ॥
शिव करुणा के स्रोत है
शिव से करियो प्रीत ।
शिव ही परम पुनीत है
शिव साचे मन मीत ॥

शिव सर्पो के भूषणधारी,
पाप के भक्षण शिव त्रिपुरारी
जटाजूट शिव चंद्रशेखर,
विश्व के रक्षक कला कलेश्वर
शिव की वंदना करने वाला,
धन वैभव पा जाये निराला
कष्ट निवारक शिव की पूजा,
शिव सा दयालु और ना दूजा
पंचमुखी जब रूप दिखावे,
दानव दल में भय छा जावे
डम-डम डमरू जब भी बोले,
चोर निशाचर का मन डोले
घोट घाट जब भंग चढ़ावे,
क्या है लीला समझ ना आवे
शिव है योगी शिव सन्यासी,
शिव ही है कैलास के वासी
शिव का दास सदा निर्भीक,
शिव के धाम बड़े रमणीक
शिव भृकुटि से भैरव जन्मे,
शिव की मूरत राखो मन में
शिव का अर्चन मंगलकारी,
मुक्ति साधन भव भयहारी
भक्त वत्सल दीन दयाला,
ज्ञान सुधा है शिव कृपाला
शिव नाम की नौका है न्यारी,
जिसने सबकी चिंता टारी
जीवन सिंधु सहज जो तरना,
शिव का हरपल नाम सुमिरना
तारकासुर को मारने वाले,
शिव है भक्तो के रखवाले
शिव की लीला के गुण गाना,
शिव को भूल के ना बिसराना
अन्धकासुर से देव बचाये,
शिव ने अद्भुत खेल दिखाये
शिव चरणो से लिपटे रहिये,
मुख से शिव शिव जय शिव कहिये
भाष्मासुर को वर दे डाला,
शिव है कैसा भोला भाला
शिव तीर्थो का दर्शन कीजो,
मन चाहे वर शिव से लीजो

॥ दोहा ॥
शिव शंकर के जाप से
मिट जाते सब रोग ।
शिव का अनुग्रह होते ही
पीड़ा ना देते शोक ॥

ब्र्हमा विष्णु शिव अनुगामी,
शिव है दीन हीन के स्वामी
निर्बल के बलरूप है शम्भु,
प्यासे को जलरूप है शम्भु
रावण शिव का भक्त निराला,
शिव को दी दस शीश कि माला
गर्व से जब कैलाश उठाया,
शिव ने अंगूठे से था दबाया
दुःख निवारण नाम है शिव का,
रत्न है वो बिन दाम शिव का
शिव है सबके भाग्यविधाता,
शिव का सुमिरन है फलदाता
शिव दधीचि के भगवंता,
शिव की तरी अमर अनंता
शिव का सेवादार सुदर्शन,
सांसे कर दी शिव को अर्पण
महादेव शिव औघड़दानी,
बायें अंग में सजे भवानी
शिव शक्ति का मेल निराला,
शिव का हर एक खेल निराला
शम्भर नामी भक्त को तारा,
चन्द्रसेन का शोक निवारा
पिंगला ने जब शिव को ध्याया,
देह छूटी और मोक्ष पाया
गोकर्ण की चन चूका अनारी,
भव सागर से पार उतारी
अनसुइया ने किया आराधन,
टूटे चिन्ता के सब बंधन
बेल पत्तो से पूजा करे चण्डाली,
शिव की अनुकम्पा हुई निराली
मार्कण्डेय की भक्ति है शिव,
दुर्वासा की शक्ति है शिव
राम प्रभु ने शिव आराधा,
सेतु की हर टल गई बाधा
धनुषबाण था पाया शिव से,
बल का सागर तब आया शिव से
श्री कृष्ण ने जब था ध्याया,
दस पुत्रों का वर था पाया
हम सेवक तो स्वामी शिव है,
अनहद अन्तर्यामी शिव है

॥ दोहा ॥
दीन दयालु शिव मेरे,
शिव के रहियो दास ।
घट घट की शिव जानते,
शिव पर रख विश्वास ॥

परशुराम ने शिव गुण गाया,
कीन्हा तप और फरसा पाया
निर्गुण भी शिव शिव निराकार,
शिव है सृष्टि के आधार
शिव ही होते मूर्तिमान,
शिव ही करते जग कल्याण
शिव में व्यापक दुनिया सारी,
शिव की सिद्धि है भयहारी
शिव है बाहर शिव ही अन्दर,
शिव ही रचना सात समुन्द्र
शिव है हर इक मन के भीतर,
शिव है हर एक कण कण के भीतर
तन में बैठा शिव ही बोले,
दिल की धड़कन में शिव डोले
हम कठपुतली शिव ही नचाता,
नयनों को पर नजर ना आता
माटी के रंगदार खिलौने,
साँवल सुन्दर और सलोने
शिव ही जोड़े शिव ही तोड़े,
शिव तो किसी को खुला ना छोड़े
आत्मा शिव परमात्मा शिव है,
दयाभाव धर्मात्मा शिव है
शिव ही दीपक शिव ही बाती,
शिव जो नहीं तो सब कुछ माटी
सब देवो में ज्येष्ठ शिव है,
सकल गुणो में श्रेष्ठ शिव है
जब ये ताण्डव करने लगता,
बृह्माण्ड सारा डरने लगता
तीसरा चक्षु जब जब खोले,
त्राहि-त्राहि यह जग बोले
शिव को तुम प्रसन्न ही रखना,
आस्था लग्न बनाये रखना
विष्णु ने की शिव की पूजा,
कमल चढाऊँ मन में सूझा
एक कमल जो कम था पाया,
अपना सुंदर नयन चढ़ाया
साक्षात तब शिव थे आये,
कमल नयन विष्णु कहलाये
इन्द्रधनुष के रंगो में शिव,
संतो के सत्संगों में शिव

॥ दोहा ॥
महाकाल के भक्त को,
मार ना सकता काल ।
द्वार खड़े यमराज को,
शिव है देते टाल ॥

यज्ञ सूदन महा रौद्र शिव है,
आनन्द मूरत नटवर शिव है
शिव ही है श्मशान के वासी,
शिव काटें मृत्युलोक की फांसी
व्याघ्र चरम कमर में सोहे,
शिव भक्तों के मन को मोहे
नन्दी गण पर करे सवारी,
आदिनाथ शिव गंगाधारी
काल के भी तो काल है शंकर,
विषधारी जगपाल है शंकर
महासती के पति है शंकर,
दीन सखा शुभ मति है शंकर
लाखो शशि के सम मुख वाले,
भंग धतूरे के मतवाले
काल भैरव भूतो के स्वामी,
शिव से कांपे सब फलगामी
शिव है कपाली शिव भष्मांगी,
शिव की दया हर जीव ने मांगी
मंगलकर्ता मंगलहारी,
देव शिरोमणि महासुखकारी
जल तथा विल्व करे जो अर्पण,
श्रद्धा भाव से करे समर्पण
शिव सदा उनकी करते रक्षा,
सत्यकर्म की देते शिक्षा
लिंग पर चंदन लेप जो करते,
उनके शिव भंडार हैं भरते
६४ योगनी शिव के बस में,
शिव है नहाते भक्ति रस में
वासुकि नाग कण्ठ की शोभा,
आशुतोष है शिव महादेवा
विश्वमूर्ति करुणानिधान,
महा मृत्युंजय शिव भगवान
शिव धारे रुद्राक्ष की माला,
नीलेश्वर शिव डमरू वाला
पाप का शोधक मुक्ति साधन,
शिव करते निर्दयी का मर्दन

॥ दोहा ॥
शिव सुमरिन के नीर से,
धूल जाते है पाप ।
पवन चले शिव नाम की,
उड़ते दुख संताप ॥

पंचाक्षर का मंत्र शिव है,
साक्षात सर्वेश्वर शिव है
शिव को नमन करे जग सारा,
शिव का है ये सकल पसारा
क्षीर सागर को मथने वाले,
ऋद्धि-सिद्धि सुख देने वाले
अहंकार के शिव है विनाशक,
धर्म-दीप ज्योति प्रकाशक
शिव बिछुवन के कुण्डलधारी,
शिव की माया सृष्टि सारी
महानन्दा ने किया शिव चिन्तन,
रुद्राक्ष माला किन्ही धारण
भवसिन्धु से शिव ने तारा,
शिव अनुकम्पा अपरम्पारा
त्रि-जगत के यश है शिवजी,
दिव्य तेज गौरीश है शिवजी
महाभार को सहने वाले,
वैर रहित दया करने वाले
गुण स्वरूप है शिव अनूपा,
अम्बानाथ है शिव तपरूपा
शिव चण्डीश परम सुख ज्योति,
शिव करुणा के उज्ज्वल मोती
पुण्यात्मा शिव योगेश्वर,
महादयालु शिव शरणेश्वर
शिव चरणन पे मस्तक धरिये,
श्रद्धा भाव से अर्चन करिये
मन को शिवाला रूप बना लो,
रोम-रोम में शिव को रमा लो
माथे जो भक्त धूल धरेंगे,
धन और धन से कोष भरेंगे
शिव का बाक भी बनना जावे,
शिव का दास परम पद पावे
दशों दिशाओं मे शिव दृष्टि,
सब पर शिव की कृपा दृष्टि
शिव को सदा ही सम्मुख जानो,
कण-कण बीच बसे ही मानो
शिव को सौंपो जीवन नैया,
शिव है संकट टाल खिवैया
अंजलि बाँध करे जो वंदन,
भय जंजाल के टूटे बन्धन

॥ दोहा ॥
जिनकी रक्षा शिव करे,
मारे न उसको कोय ।
आग की नदिया से बचे,
बाल ना बांका होय ॥

शिव दाता भोला भण्डारी,
शिव कैलाशी कला बिहारी
सगुण ब्रह्म कल्याण कर्ता,
विघ्न विनाशक बाधा हर्ता
शिव स्वरूपिणी सृष्टि सारी,
शिव से पृथ्वी है उजियारी
गगन दीप भी माया शिव की,
कामधेनु है छाया शिव की
गंगा में शिव, शिव मे गंगा,
शिव के तारे तुरत कुसंगा
शिव के कर में सजे त्रिशूला,
शिव के बिना ये जग निर्मूला
स्वर्णमयी शिव जटा निराळी,
शिव शम्भू की छटा निराली
जो जन शिव की महिमा गाये,
शिव से फल मनवांछित पाये
शिव पग पँकज सवर्ग समाना,
शिव पाये जो तजे अभिमाना
शिव का भक्त ना दुःख मे डोलें,
शिव का जादू सिर चढ बोले
परमानन्द अनन्त स्वरूपा,
शिव की शरण पड़े सब कूपा
शिव की जपियो हर पल माळा,
शिव की नजर मे तीनो क़ाला
अन्तर घट मे इसे बसा लो,
दिव्य जोत से जोत मिला लो
नम: शिवाय जपे जो स्वासा,
पूरीं हो हर मन की आसा

॥ दोहा ॥
परमपिता परमात्मा,
पूरण सच्चिदानन्द ।
शिव के दर्शन से मिले,
सुखदायक आनन्द ॥

शिव से बेमुख कभी ना होना,
शिव सुमिरन के मोती पिरोना
जिसने भजन है शिव के सीखे,
उसको शिव हर जगह ही दिखे
प्रीत में शिव है शिव में प्रीती,
शिव सम्मुख न चले अनीति
शिव नाम की मधुर सुगन्धी,
जिसने मस्त कियो रे नन्दी
शिव निर्मल निर्दोष निराले,
शिव ही अपना विरद संभाले
परम पुरुष शिव ज्ञान पुनीता,
भक्तो ने शिव प्रेम से जीता

॥ दोहा ॥
आंठो पहर आराधिए,
ज्योतिर्लिंग शिव रूप ।
नयनं बीच बसाइये,
शिव का रूप अनूप ॥

लिंग मय सारा जगत हैं,
लिंग धरती आकाश
लिंग चिंतन से होत है,
सब पापो का नाश
लिंग पवन का वेग है,
लिंग अग्नि की ज्योत
लिंग से पाताल है,
लिंग वरुण का स्त्रोत
लिंग से हैं वनस्पति,
लिंग ही हैं फल फूल
लिंग ही रत्न स्वरूप हैं,
लिंग माटी निर्धूप

ॐ नमः शिवाय, ॐ नमः शिवाय !

लिंग ही जीवन रूप हैं,
लिंग मृत्युलिंगकार
लिंग मेघा घनघोर हैं,
लिंग ही हैं उपचार
ज्योतिर्लिंग की साधना,
करते हैं तीनो लोग
लिंग ही मंत्र जाप हैं,
लिंग का रूम श्लोक
लिंग से बने पुराण हैं,
लिंग वेदो का सार
रिधिया सिद्धिया लिंग हैं,
लिंग करता करतार
प्रातकाल लिंग पूजिये,
पूर्ण हो सब काज
लिंग पे करो विश्वास तो,
लिंग रखेंगे लाज

ॐ नमः शिवाय, ॐ नमः शिवाय !

सकल मनोरथ से होत हैं,
दुखो का अंत
ज्योतिर्लिंग के नाम से,
सुमिरत जो भगवंत
मानव दानव ऋषिमुनि,
ज्योतिर्लिंग के दास
सर्व व्यापक लिंग हैं,
पूरी करे हर आस
शिव रुपी इस लिंग को,
पूजे सब अवतार
ज्योतिर्लिंगों की दया,
सपने करे साकार
लिंग पे चढ़ने वैद्य का,
जो जन ले परसाद
उनके ह्रदय में बजे,
शिव करूणा का नाद

ॐ नमः शिवाय, ॐ नमः शिवाय !

महिमा ज्योतिर्लिंग की,
जाएंगे जो लोग
भय से मुक्ति पाएंगे,
रोग रहे न शोब
शिव के चरण सरोज तू,
ज्योतिर्लिंग में देख
सर्व व्यापी शिव बदले,
भाग्य तीरे
डारीं ज्योतिर्लिंग पे,
गंगा जल की धार
करेंगे गंगाधर तुझे,
भव सिंधु से पार
चित सिद्धि हो जाए रे,
लिंगो का कर ध्यान
लिंग ही अमृत कलश हैं,
लिंग ही दया निधान

ॐ नमः शिवाय, ॐ नमः शिवाय !

॥ भाग ४ – ५ ॥
ज्योतिर्लिंग है शिव की ज्योति,
ज्योतिर्लिंग है दया का मोती
ज्योतिर्लिंग है रत्नों की खान,
ज्योतिर्लिंग में रमा जहान
ज्योतिर्लिंग का तेज़ निराला,
धन सम्पति का देने वाला
ज्योतिर्लिंग में है नट नागर,
अमर गुणों का है ये सागर
ज्योतिर्लिंग की कीजो सेवा,
ज्ञान पान का पाओगे मेवा
ज्योतिर्लिंग है पिता सामान,
सष्टि इसकी है संतान
ज्योतिर्लिंग है इष्ट प्यारे,
ज्योतिर्लिंग है सखा हमारे
ज्योतिर्लिंग है नारीश्वर,
ज्योतिर्लिंग है शिव विमलेश्वर
ज्योतिर्लिंग गोपेश्वर दाता,
ज्योतिर्लिंग है विधि विधाता
ज्योतिर्लिंग है शर्रेंडश्वर स्वामी,
ज्योतिर्लिंग है अन्तर्यामी
सतयुग में रत्नो से शोभित,
देव जनो के मन को मोहित
ज्योतिर्लिंग है अत्यंत सुन्दर,
छत्ता इसकी ब्रह्माण्ड अंदर
त्रेता युग में स्वर्ण सजाता,
सुख सूरज ये ध्यान ध्वजाता
सक्ल सृष्टि मन की करती,
निसदिन पूजा भजन भी करती
द्वापर युग में पारस निर्मित,
गुणी ज्ञानी सुर नर सेवी
ज्योतिर्लिंग सबके मन को भाता,
महमारक को मार भगाता
कलयुग में पार्थिव की मूरत,
ज्योतिर्लिंग नंदकेश्वर सूरत
भक्ति शक्ति का वरदाता,
जो दाता को हंस बनता
ज्योतिर्लिंग पर पुष्प चढ़ाओ,
केसर चन्दन तिलक लगाओ
जो जन करें दूध का अर्पण,
उजले हो उनके मन दर्पण

॥ दोहा ॥
ज्योतिर्लिंग के जाप से,
तन मन निर्मल होये ।
इसके भक्तों का मनवा,
करे न विचलित कोई ॥

सोमनाथ सुख करने वाला,
सोम के संकट हरने वाला
दक्ष श्राप से सोम छुड़ाया,
सोम है शिव की अद्भुत माया
चंद्र देव ने किया जो वंदन,
सोम ने काटे दुःख के बंधन
ज्योतिर्लिंग है सदा सुखदायी,
दीन हीन का सहायी
भक्ति भाव से इसे जो ध्याये,
मन वाणी शीतल तर जाये
शिव की आत्मा रूप सोम है,
प्रभु परमात्मा रूप सोम है
यहाँ उपासना चंद्र ने की,
शिव ने उसकी चिंता हर ली
इस तीर्थ की शोभा न्यारी,
शिव अमृत सागर भवभयधारी
चंद्र कुंड में जो भी नहाये,
पाप से वे जन मुक्ति पाए
छ: कुष्ठ सब रोग मिटाये,
नाया कुंदन पल में बनावे
मलिकार्जुन है नाम न्यारा,
शिव का पावन धाम प्यारा
कार्तिकेय है जब शिव से रूठे,
माता पिता के चरण है छूते
श्री शैलेश पर्वत जा पहुंचे,
कष्ट भय पार्वती के मन में
प्रभु कुमार से चली जो मिलने,
संग चलना माना शंकर ने
श्री शैलेश पर्वत के ऊपर,
गए जो दोनों उमा महेश्वर
उन्हें देखकर कार्तिकेय उठ भागे,
और कुमार पर्वत पर विराजे
यहाँ श्रित हुए पारवती शंकर,
काम बनावे शिव का सुन्दर
शिव का अर्जुन नाम सुहाता,
मलिका है मेरी पारवती माता
लिंग रूप हो जहाँ भी रहते,
मलिकार्जुन है उसको कहते
मनवांछित फल देने वाला,
निर्बल को बल देने वाला

॥ दोहा ॥
ज्योतिर्लिंग के नाम की,
ले मन माला फेर।
मनोकामना पूरी होगी,
लगे न क्षिण भी देर॥

उज्जैन की नदी क्षिप्रा किनारे,
ब्राह्मण थे शिव भक्त न्यारे
दूषण दैत्य सताता निसदिन,
गर्म द्वेश दिखलाता जिस दिन
एक दिन नगरी के नर नारी,
दुखी हो राक्षस से अतिहारी
परम सिद्ध ब्राह्मण से बोले,
दैत्य के डर से हर कोई डोले
दुष्ट निसाचर छुटकारा,
पाने को यज्ञ प्यारा
ब्राह्मण तप ने रंग दिखाए,
पृथ्वी फाड़ महाकाल आये
राक्षस को हुंकार से मारा,
भय से भक्तों उबारा
आग्रह भक्तों ने जो कीन्हा,
महाकाल ने वर था दीना
ज्योतिर्लिंग हो रहूं यहाँ पर,
इच्छा पूर्ण करूँ यहाँ पर
जो कोई मन से मुझको पुकारे,
उसको दूंगा वैभव सारे
उज्जैनी राजा के पास मणि थी,
अद्भुत बड़ी ही ख़ास
जिसे छीनने का षड़यंत्र,
किया था कल्यों ने ही मिलकर
मणि बचाने की आशा में,
शत्रु भी कई थे अभिलाषा में
शिव मंदिर में डेरा जमाकर,
खो गए शिव का ध्यान लगाकर
एक बालक ने हद ही कर दी,
उस राजा की देखा देखी
एक साधारण सा पत्थर लेकर,
पहुंचा अपनी कुटिया भीतर
शिवलिंग मान के वे पाषाण,
पूजने लगा शिव भगवान्
उसकी भक्ति चुम्बक से,
खींचे ही चले आये झट से भगवान्
ओमकार ओमकार की रट सुनकर,
प्रतिष्ठित ओमकार बनकर
ओम्कारेश्वर वही है धाम,
बन जाए बिगड़े जहाँ पे काम
नर नारायण ये दो अवतार,
भोलेनाथ को था जिनसे प्यार
पत्थर का शिवलिंग बनाकर,
नमः शिवाय की धुन गाकर

॥ दोहा ॥
शिव शंकर ओमकार का,
रट ले मनवा नाम ।
जीवन की हर राह में,
शिवजी लेंगे काम ॥

नर नारायण ये दो अवतार,
भोलेनाथ को था जिनसे प्यार
पत्थर का शिवलिंग बनाकर,
नमः शिवाय की धुन गाकर
कई वर्ष तप किया शिव का,
पूजा और जप किया शंकर का
शिव दर्शन को अंखिया प्यासी,
आ गए एक दिन शिव कैलाशी
नर नारायण से शिव है बोले,
दया के मैंने द्वार है खोले
जो हो इच्छा लो वरदान,
भक्त के बस में है भगवान्
करवाने की भक्त ने विनती,
कर दो पवन प्रभु ये धरती
तरस रहा केदार का खंड ये,
बन जाये अमृत उत्तम कुंड ये
शिव ने उनकी मानी बात,
बन गया बेनी केदानाथ
मंगलदायी धाम शिव का,
गूंज रहा जहाँ नाम शिव का
कुम्भकरण का बेटा भीम,
ब्रह्मवार का हुआ बलि असीर
इंद्रदेव को उसने हराया,
काम रूप में गरजता आया
कैद किया था राजा सुदक्षण,
कारागार में करे शिव पूजन
किसी ने भीम को जा बतलाया,
क्रोध से भर के वो वहाँ आया
पार्थिव लिंग पर मार हथोड़ा,
जग का पावन शिवलिंग तोडा
प्रकट हुए शिव तांडव करते,
लगा भागने भीम था डर के
डमरू धार ने देकर झटका,
धरा पे पापी दानव पटका
ऐसा रूप विक्राल बनाया,
पल में राक्षस मार गिराया
बन गए भोले जी प्रयलंकार,
भीम मार के हुए भीमशंकर
शिव की कैसी अलौकिक माया,
आज तलक कोई जान न पाया

हर हर हर महादेव का मंत्र पढ़ें हर दिन रे
दुःख से पीड़क मंदिर पा जायेगा चैन

परमेश्वर ने एक दिन भक्तों,
जानना चाहा एक में दो को
नारी पुरुष हो प्रकटे शिवजी,
परमेश्वर के रूप हैं शिवजी
नाम पुरुष का हो गया शिवजी,
नारी बनी थी अम्बा शक्ति
परमेश्वर की आज्ञा पाकर,
तपी बने दोनों समाधि लगाकर
शिव ने अद्भुत तेज़ दिखाया,
पांच कोष का नगर बसाया
ज्योतिर्मय हो गया आकाश,
नगरी सिद्ध हुई पुरुष के पास
शिव ने की तब सृष्टि की रचना,
पड़ा उस नगरों को कशी बनना
पाठ पौष के कारण तब ही,
इसको कहते हैं पंचकोशी
विश्वेश्वर ने इसे बसाया,
विश्वनाथ ये तभी कहलाया
जहाँ नमन जो मन से करते,
सिद्ध मनोरथ उनके होते
ब्रह्मगिरि पर तप गौतम लेकर,
पाए कितनो के सिद्ध लेकर
तृषा ने कुछ ऋषि भटकाए,
गौतम के वैरी बन आये
द्वेष का सबने जाल बिछाया,
गौ हत्या का दोष लगाया
और कहा तुम प्रायश्चित्त करना,
स्वर्गलोक से गंगा लाना
एक करोड़ शिवलिंग लगाकर,
गौतम की तप ज्योत उजागर
प्रकट शिव और शिवा वहाँ पर,
माँगा ऋषि ने गंगा का वर
शिव से गंगा ने विनय की,
ऐसे प्रभु में जहाँ न रहूंगी
ज्योतिर्लिंग प्रभु आप बन जाए,
फिर मेरी निर्मल धरा बहाये
शिव ने मानी गंगा की विनती,
गंगा बानी झटपट गौतमी
त्रियंबकेश्वर है शिवजी विराजे,
जिनका जग में डंका बाजे

॥ दोहा ॥
गंगा धर की अर्चना,
करे जो मन्चित लाये ।
शिव करुणा से उनपर,
आंच कभी न आये ॥

राक्षस राज महाबली रावण,
ने जब किया शिव तप से वंदन
भये प्रसन्न शम्भू प्रगटे,
दिया वरदान रावण पग पढ़के
ज्योतिर्लिंग लंका ले जाओ,
सदा ही शिव शिव जय शिव गाओ
प्रभु ने उसकी अर्चन मानी,
और कहा रहे सावधानी
रस्ते में इसको धरा पे न धरना,
यदि धरेगा तो फिर न उठना
शिवलिंग रावण ने उठाया,
गरुड़देव ने रंग दिखाया
उसे प्रतीत हुई लघुशंका,
धीरज खोया उसने मन का
विष्णु ब्राह्मण रूप में आये,
ज्योतिर्लिंग दिया उसे थमाए
रावण निभ्यात हो जब आया,
ज्योतिर्लिंग पृथ्वी पर पाया
जी भर उसने जोर लगाया,
गया न फिर से उठाया
लिंग गया पाताल में उस पल,
अध्अंगुल रहा भूमि ऊपर
पूरी रात लंकेश पछताया,
चंद्रकूप फिर कूप बनाया
उसमे तीर्थों का जल डाला,
नमो शिवाय की फेरी माला
जल से किया था लिंग-अभिषेका,
जय शिव ने भी दृश्य देखा
रत्न पूजन का उसे उन कीन्हा,
नटवर पूजा का उसे वर दीना
पूजा करि मेरे मन को भावे,
वैधनाथ ये सदा कहाये
मनवांछित फल मिलते रहेंगे,
सूखे उपवन खिलते रहेंगे
गंगा जल जो कांवड़ लावे,
भक्तजन मेरे परम पद पावे
ऐसा अनुपम धाम है शिव का,
मुक्तिदाता नाम है शिव का
भक्तन की यहाँ हरी बनाये,
बोल बम बोल बम जो न गाये

॥ दोहा ॥
बैधनाथ भगवान् की,
पूजा करो धर ध्याये ।
सफल तुम्हारे काज,
हो मुश्किलें आसान ॥

सुप्रिय वैभव प्रेम अनुरागी,
शिव संग जिसकी लगी थी
ताड़ प्रताड दारुक अत्याचारी,
देता उसको त्रास था भारी
सुप्रिय को निर्लज्पुरी लेजाकर,
बंद किया उसे बंदी बनाकर
लेकिन भक्ति रुक नहीं पायी,
जेल में पूजा रुक नहीं पायी
दारुक एक दिन फिर वंहा आया,
सुप्रिय भक्त को बड़ा धमकाया
फिर भी श्रद्धा हुई न विचलित,
लगा रहा वंदन में ही चित
भक्तन ने जब शिवजी को पुकारा,
वहाँ सिंघासन प्रगट था न्यारा
जिस पर ज्योतिर्लिंग सजा था,
मष्तक अश्त्र ही पास पड़ा था
अस्त्र ने सुप्रिय जब ललकारा,
दारुक को एक वार में मारा
जैसा शिव का आदेश था आया,
जय शिवलिंग नागेश कहलाया
रघुवर की लंका पे चढ़ाई,
ललिता ने कला दिखाई
सौ योजन का सेतु बांधा,
राम ने उस पर शिव आराधा
रावण मार के जब लौट आये,
परामर्श को ऋषि बुलाये
कहा मुनियों ने ध्यान दीजौ,
प्रभु हत्या का प्रायश्चित्य कीजौ
बालू काली ने सीए बनाया,
जिससे रघुवर ने ये ध्याया
राम कियो जब शिव का ध्यान,
ब्रह्म दलन का धुल गया पाप
हर हर महादेव जयकारी,
भूमण्डल में गूंजे न्यारी
जहाँ चरना शिव नाम की बहती,
उसको सभी रामेश्वर कहते
गंगा जल से जहाँ जो नहाये,
जीवन का वो हर सख पाए
शिव के भक्तों कभी न डोलो,
जय रामेश्वर जय शिव बोलो

॥ दोहा ॥
पारवती बल्ल्भ शंकर,
कहे जो एक मन होये
 ।
शिव करुणा से उसका,
करे न अनिष्ट कोई
 ॥

देवगिरि ही सुधर्मा रहता,
शिव अर्चन का विधि से करता
उसकी सुदेहा पत्नी प्यारी,
पूजती मन से तीर्थ पुरारी
कुछ-कुछ फिर भी रहती चिंतित,
क्यूंकि थी संतान से वंचित
सुषमा उसकी बहिन थी छोटी,
प्रेम सुदेहा से बड़ा करती
उसे सुदेहा ने जो मनाया,
लगन सुधर्मा से करवाया
बालक सुषमा कोख से जन्मा,
चाँद से जिसकी होती उपमा
पहले सुदेहा अति हर्षायी,
ईर्ष्या फिर थी मन में समायी
कर दी उसने बात निराली,
हत्या बालक की कर डाली
उसी सरोवर में शव डाला,
सुषमा जपती शिव की माला
श्रद्धा से जब ध्यान लगाया,
बालक जीवित हो चल आया
साक्षात् शिव दर्शन दीन्हे,
सिद्ध मनोरथ सारे कीन्हे
वासित होकर परमेश्वर,
हो गए ज्योतिर्लिंग घुश्मेश्वर
जो चुगन लगे लगन के मोती,
शिव की वर्षा उन पर होती
शिव है दयालु डमरू वाले,
शिव है संतन के रखवाले
शिव की भक्ति है फलदायक,
शिव भक्तों के सदा सहायक
मन के शिवाले में शिव देखो,
शिव चरण में मस्तक टेको
गणपति के शिव पिता हैं प्यारे,
तीनो लोक से शिव हैं न्यारे
शिव चरणन का होये जो दास,
उसके गृह में शिव का निवास
शिव ही हैं निर्दोष निरंजन,
मंगलदायक भय के भंजन
श्रद्धा के मांगे बिन पत्तियां,
जाने सबके मन की बतियां

॥ दोहा ॥
शिव अमृत का प्यार से,
करे जो निसदिन पान ।
चंद्रचूड़ सदा शिव करे,
उनका तो कल्याण ॥


शिव शंकर को कैसे प्रसन्न करें?

शिव शंकर को प्रसन्न करने के लिए उनकी सच्चे मन से आराधना करें, सोमवार का व्रत रखें, शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र अर्पित करें, ओम नमः शिवाय मंत्र का जाप करें, और शिव जी के भजन और स्तोत्र का पाठ करें।

शिव अमृतवाणी का गायक कौन है?

शिव अमृतवाणी के गायक भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। अधिकतर शिव अमृतवाणी को अनूप जलोटा, लता मंगेशकर, अनुराधा पौडवाल, और अन्य प्रसिद्ध भजन गायकों ने गाया है।

शिव को किससे क्रोध आता है?

भगवान शिव को असत्य, अधर्म, अहंकार, और अन्याय से क्रोध आता है। वे सच्चाई, धर्म, और विनम्रता के प्रतीक हैं और इन गुणों का अपमान उन्हें नाराज कर सकता है।

मैं शिव को तुरंत कैसे प्रसन्न कर सकता/सकती हूँ?

शिव को तुरंत प्रसन्न करने के लिए श्रद्धा और भक्ति से ओम नमः शिवाय मंत्र का जाप करें, शिवलिंग पर जल और दूध अर्पित करें, और सोमवार का व्रत रखें। शिव की आराधना में सच्ची निष्ठा महत्वपूर्ण है।

मैं शिव ऊर्जा को कैसे सक्रिय कर सकता/सकती हूँ?

शिव ऊर्जा को सक्रिय करने के लिए ध्यान करें, प्राणायाम करें, ओम नमः शिवाय का जाप करें, शिवलिंग की पूजा करें, और अपनी आंतरिक शांति और संतुलन बनाए रखें। शिव तत्व को आत्मसात करने के लिए नियमित साधना आवश्यक है।

मुझे शिव की ओर आकर्षण क्यों महसूस होता है?

शिव की ओर आकर्षण महसूस होने का कारण उनकी दिव्यता, सादगी, और उनकी अनंत शक्तियों का प्रभाव हो सकता है। शिवजी का सच्चे भक्तों पर अनुग्रह होता है, जिससे उनकी ओर प्राकृतिक आकर्षण उत्पन्न होता है। वे सृष्टि के संहारक और पुनर्निर्माणकर्ता हैं, और उनके अद्वितीय गुण और लीलाएं लोगों को आकर्षित करती हैं।

श्री विष्णु सहस्त्रनाम संस्कृत PDF – Vishnu Sahasranama Stotram Sanskrit

श्री विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र (Vishnu Sahasranama Stotram Sanskrit) एक प्रमुख वैदिक ग्रंथ है, जो भगवती विष्णु की हजारों नामों का स्तुति करने वाला स्तोत्र है। यह स्तोत्र महाभारत के अनुशासन पर्व में वर्णित है और इसके अध्ययन और पाठ से भक्तों को अत्यधिक आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है। श्री विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र की महत्ता और शक्ति असीम है, क्योंकि यह भगवान विष्णु के अनगिनत स्वरूपों और उनकी दिव्य गुणों को अभिव्यक्त करता है।

यह स्तोत्र संस्कृत में लिखा गया है, और इसमें भगवान विष्णु के एक हजार नामों का समावेश है, जो उनकी महानता, उनके विविध स्वरूपों और उनके कार्यों की प्रशंसा करते हैं। इन नामों के जाप से व्यक्ति की आत्मा को शांति, शक्ति, और समृद्धि प्राप्त होती है। भक्त इस स्तोत्र को नियमित रूप से पढ़कर विष्णु भगवान के कृपा पात्र बन सकते हैं और उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं।

श्री विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र का पाठ करने से न केवल आध्यात्मिक उन्नति होती है, बल्कि यह व्यक्ति के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है। इस स्तोत्र के नियमित पाठ से व्यक्ति की मनोकामनाएँ पूरी होती हैं और वह जीवन की कठिनाइयों का सामना अधिक साहस और धैर्य के साथ कर सकता है। इस प्रकार, यह स्तोत्र धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यक्तिगत विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।



ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम:

ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः।
भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः ।। 1 ।।

पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमं गतिः।
अव्ययः पुरुष साक्षी क्षेत्रज्ञो अक्षर एव च ।। 2 ।।

योगो योग-विदां नेता प्रधान-पुरुषेश्वरः ।
नारसिंह-वपुः श्रीमान केशवः पुरुषोत्तमः ।। 3 ।।

सर्वः शर्वः शिवः स्थाणु: भूतादि: निधि: अव्ययः ।
संभवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभु: ईश्वरः ।। 4 ।।

स्वयंभूः शम्भु: आदित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।
अनादि-निधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ।। 5 ।।

अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभो-अमरप्रभुः ।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ।। 6 ।।

अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः ।
प्रभूतः त्रिककुब-धाम पवित्रं मंगलं परं ।। 7।।

ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः ।
हिरण्य-गर्भो भू-गर्भो माधवो मधुसूदनः ।। 8 ।।

ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृति: आत्मवान ।। 9 ।।

सुरेशः शरणं शर्म विश्व-रेताः प्रजा-भवः ।
अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ।। 10 ।।

अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादि: अच्युतः ।
वृषाकपि: अमेयात्मा सर्व-योग-विनिःसृतः ।। 11 ।।

वसु:वसुमनाः सत्यः समात्मा संमितः समः ।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ।। 12 ।।

रुद्रो बहु-शिरा बभ्रु: विश्वयोनिः शुचि-श्रवाः ।
अमृतः शाश्वतः स्थाणु: वरारोहो महातपाः ।। 13 ।।

सर्वगः सर्वविद्-भानु:विष्वक-सेनो जनार्दनः ।
वेदो वेदविद-अव्यंगो वेदांगो वेदवित् कविः ।। 14 ।।

लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृता-कृतः ।
चतुरात्मा चतुर्व्यूह:-चतुर्दंष्ट्र:-चतुर्भुजः ।। 15 ।।

भ्राजिष्णु भोजनं भोक्ता सहिष्णु: जगदादिजः ।
अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ।। 16 ।।

उपेंद्रो वामनः प्रांशु: अमोघः शुचि: ऊर्जितः ।
अतींद्रः संग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ।। 17 ।।

वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः।
अति-इंद्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ।। 18 ।।

महाबुद्धि: महा-वीर्यो महा-शक्ति: महा-द्युतिः।
अनिर्देश्य-वपुः श्रीमान अमेयात्मा महाद्रि-धृक ।। 19 ।।

महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः ।
अनिरुद्धः सुरानंदो गोविंदो गोविदां-पतिः ।। 20 ।।

मरीचि:दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः ।
हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ।। 21 ।।

अमृत्युः सर्व-दृक् सिंहः सन-धाता संधिमान स्थिरः ।
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ।। 22 ।।

गुरुःगुरुतमो धामः सत्यः सत्य-पराक्रमः ।
निमिषो-अ-निमिषः स्रग्वी वाचस्पति: उदार-धीः ।। 23 ।।

अग्रणी: ग्रामणीः श्रीमान न्यायो नेता समीरणः ।
सहस्र-मूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात ।। 24 ।।

आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सं-प्रमर्दनः ।
अहः संवर्तको वह्निः अनिलो धरणीधरः ।। 25 ।।

सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृक्-विश्वभुक्-विभुः ।
सत्कर्ता सकृतः साधु: जह्नु:-नारायणो नरः ।। 26 ।।

असंख्येयो-अप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्ट-कृत्-शुचिः ।
सिद्धार्थः सिद्धसंकल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ।। 27।।

वृषाही वृषभो विष्णु: वृषपर्वा वृषोदरः ।
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुति-सागरः ।। 28 ।।

सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेंद्रो वसुदो वसुः ।
नैक-रूपो बृहद-रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ।। 29 ।।

ओज: तेजो-द्युतिधरः प्रकाश-आत्मा प्रतापनः ।
ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मंत्र:चंद्रांशु: भास्कर-द्युतिः ।। 30 ।।

अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिंदुः सुरेश्वरः ।
औषधं जगतः सेतुः सत्य-धर्म-पराक्रमः ।। 31 ।।

भूत-भव्य-भवत्-नाथः पवनः पावनो-अनलः ।
कामहा कामकृत-कांतः कामः कामप्रदः प्रभुः ।। 32 ।।

युगादि-कृत युगावर्तो नैकमायो महाशनः ।
अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजित्-अनंतजित ।। 33 ।।

इष्टो विशिष्टः शिष्टेष्टः शिखंडी नहुषो वृषः ।
क्रोधहा क्रोधकृत कर्ता विश्वबाहु: महीधरः ।। 34 ।।

अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः ।
अपाम निधिरधिष्टानम् अप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ।। 35 ।।

स्कन्दः स्कन्द-धरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः ।
वासुदेवो बृहद भानु: आदिदेवः पुरंदरः ।। 36 ।।

अशोक: तारण: तारः शूरः शौरि: जनेश्वर: ।
अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ।। 37 ।।

पद्मनाभो-अरविंदाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत ।
महर्धि-ऋद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुड़ध्वजः ।। 38 ।।

अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः ।
सर्वलक्षण लक्षण्यो लक्ष्मीवान समितिंजयः ।। 39 ।।

विक्षरो रोहितो मार्गो हेतु: दामोदरः सहः ।
महीधरो महाभागो वेगवान-अमिताशनः ।। 40 ।।

उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः ।
करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ।। 41 ।।

व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो-ध्रुवः ।
परर्रद्वि परमस्पष्टः तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ।। 42 ।।

रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयो-अनयः ।
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठ: धर्मो धर्मविदुत्तमः ।। 43 ।।

वैकुंठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः ।
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ।। 44।।

ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः ।
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्व-दक्षिणः ।। 45 ।।

विस्तारः स्थावर: स्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम ।
अर्थो अनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ।। 46 ।।

अनिर्विण्णः स्थविष्ठो-अभूर्धर्म-यूपो महा-मखः ।
नक्षत्रनेमि: नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ।। 47 ।।

यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः ।
सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमं ।। 48 ।।

सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत ।
मनोहरो जित-क्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ।। 49 ।।

स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत ।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ।। 50 ।।

धर्मगुब धर्मकृद धर्मी सदसत्क्षरं-अक्षरं ।
अविज्ञाता सहस्त्रांशु: विधाता कृतलक्षणः ।। 51 ।।

गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः ।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद गुरुः ।। 52 ।।

उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः ।
शरीर भूतभृद्भोक्ता कपींद्रो भूरिदक्षिणः ।। 53 ।।

सोमपो-अमृतपः सोमः पुरुजित पुरुसत्तमः ।
विनयो जयः सत्यसंधो दाशार्हः सात्वतां पतिः ।। 54 ।।

जीवो विनयिता-साक्षी मुकुंदो-अमितविक्रमः ।
अम्भोनिधिरनंतात्मा महोदधिशयो-अंतकः ।। 55 ।।

अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः ।
आनंदो नंदनो नंदः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ।। 56 ।।

महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः ।
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाश्रृंगः कृतांतकृत ।। 57 ।।

महावराहो गोविंदः सुषेणः कनकांगदी ।
गुह्यो गंभीरो गहनो गुप्तश्चक्र-गदाधरः ।। 58 ।।

वेधाः स्वांगोऽजितः कृष्णो दृढः संकर्षणो-अच्युतः ।
वरूणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ।। 59 ।।

भगवान भगहानंदी वनमाली हलायुधः ।
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णु:-गतिसत्तमः ।। 60 ।।

सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः ।
दिवि:स्पृक् सर्वदृक व्यासो वाचस्पति:अयोनिजः ।। 61 ।।

त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक ।
संन्यासकृत्-छमः शांतो निष्ठा शांतिः परायणम ।। 62 ।।

शुभांगः शांतिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः ।
गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ।। 63 ।।

अनिवर्ती निवृत्तात्मा संक्षेप्ता क्षेमकृत्-शिवः ।
श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतां वरः ।। 64 ।।

श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः ।
श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमान्-लोकत्रयाश्रयः ।। 65 ।।

स्वक्षः स्वंगः शतानंदो नंदिर्ज्योतिर्गणेश्वर: ।
विजितात्मा विधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः ।। 66 ।।

उदीर्णः सर्वत:चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः ।
भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ।। 67 ।।

अर्चिष्मानर्चितः कुंभो विशुद्धात्मा विशोधनः ।
अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ।। 68 ।।

कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः ।
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ।। 69 ।।

कामदेवः कामपालः कामी कांतः कृतागमः ।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णु: वीरोअनंतो धनंजयः ।। 70 ।।

ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृत् ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः ।
ब्रह्मविद ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ।। 71 ।।

महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः ।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ।। 72 ।।

स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः ।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ।। 73 ।।

मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः ।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ।। 74 ।।

सद्गतिः सकृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः ।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ।। 75 ।।

भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयो-अनलः ।
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरो-अथापराजितः ।। 76 ।।

विश्वमूर्तिमहार्मूर्ति:दीप्तमूर्ति: अमूर्तिमान ।
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ।। 77 ।।

एको नैकः सवः कः किं यत-तत-पद्मनुत्तमम ।
लोकबंधु: लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ।। 78 ।।

सुवर्णोवर्णो हेमांगो वरांग: चंदनांगदी ।
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरऽचलश्चलः ।। 79 ।।

अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक ।
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ।। 80 ।।

प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकश्रृंगो गदाग्रजः ।। 81 ।।

चतुर्मूर्ति: चतुर्बाहु:श्चतुर्व्यूह:चतुर्गतिः ।
चतुरात्मा चतुर्भाव:चतुर्वेदविदेकपात ।। 82 ।।

समावर्तो-अनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः ।
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ।। 83 ।।

शुभांगो लोकसारंगः सुतंतुस्तंतुवर्धनः ।
इंद्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ।। 84 ।।

उद्भवः सुंदरः सुंदो रत्ननाभः सुलोचनः ।
अर्को वाजसनः श्रृंगी जयंतः सर्वविज-जयी ।। 85 ।।

सुवर्णबिंदुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः ।
महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधः ।। 86 ।।

कुमुदः कुंदरः कुंदः पर्जन्यः पावनो-अनिलः ।
अमृतांशो-अमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ।। 87 ।।

सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः ।
न्यग्रोधो औदुंबरो-अश्वत्थ:चाणूरांध्रनिषूदनः ।। 88 ।।

सहस्रार्चिः सप्तजिव्हः सप्तैधाः सप्तवाहनः ।
अमूर्तिरनघो-अचिंत्यो भयकृत्-भयनाशनः ।। 89 ।।

अणु:बृहत कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् ।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ।। 90 ।।

भारभृत्-कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः ।
आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ।। 91 ।।

धनुर्धरो धनुर्वेदो दंडो दमयिता दमः ।
अपराजितः सर्वसहो नियंता नियमो यमः ।। 92 ।।

सत्त्ववान सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः ।
अभिप्रायः प्रियार्हो-अर्हः प्रियकृत-प्रीतिवर्धनः ।। 93 ।।

विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग विभुः ।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ।। 94 ।।

अनंतो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः ।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकधिष्ठानमद्भुतः ।। 95।।

सनात्-सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः ।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत स्वस्ति स्वस्तिभुक स्वस्तिदक्षिणः ।। 96 ।।

अरौद्रः कुंडली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः ।
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ।। 97 ।।

अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां वरः ।
विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ।। 98 ।।

उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः ।
वीरहा रक्षणः संतो जीवनः पर्यवस्थितः ।। 99 ।।

अनंतरूपो-अनंतश्री: जितमन्यु: भयापहः ।
चतुरश्रो गंभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ।। 100 ।।

अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मी: सुवीरो रुचिरांगदः ।
जननो जनजन्मादि: भीमो भीमपराक्रमः ।। 101 ।।

आधारनिलयो-धाता पुष्पहासः प्रजागरः ।
ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ।। 102 ।।

प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत प्राणजीवनः ।
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्यु जरातिगः ।। 103 ।।

भूर्भवः स्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः ।
यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञांगो यज्ञवाहनः ।। 104 ।।

यज्ञभृत्-यज्ञकृत्-यज्ञी यज्ञभुक्-यज्ञसाधनः ।
यज्ञान्तकृत-यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ।। 105 ।।

आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः ।
देवकीनंदनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ।। 106 ।।

शंखभृन्नंदकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ।
रथांगपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ।। 107

सर्वप्रहरणायुध ॐ नमः इति।

वनमालि गदी शार्ङ्गी शंखी चक्री च नंदकी ।
श्रीमान् नारायणो विष्णु: वासुदेवोअभिरक्षतु ।


श्री विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र एक अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथ है जो भगवान विष्णु के एक हजार नामों की स्तुति करता है। इसे महाभारत के अनुशासन पर्व में वर्णित किया गया है, और यह भारतीय धार्मिक परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस स्तोत्र के नियमित पाठ से न केवल आध्यात्मिक उन्नति होती है, बल्कि यह व्यक्ति की जीवनशैली, मानसिक स्थिति और भौतिक स्थिति पर भी सकारात्मक प्रभाव डालता है। निम्नलिखित में विस्तार से चर्चा की गई है कि श्री विष्णु सहस्त्रनाम के पाठ से क्या-क्या लाभ होते हैं:

1. आध्यात्मिक उन्नति

श्री विष्णु सहस्त्रनाम का नियमित पाठ करने से भक्त की आत्मा को गहरी शांति और संतुलन प्राप्त होता है। यह स्तोत्र भगवान विष्णु के अनगिनत नामों के माध्यम से उनकी दिव्य गुणों की स्तुति करता है। भगवान विष्णु को ‘पालक’, ‘रक्षक’ और ‘संसार के पालनकर्ता’ के रूप में पूजा जाता है। उनके हजारों नामों के जाप से भक्त की आत्मा को उनके दिव्य गुणों और शक्ति का अनुभव होता है।

इस स्तोत्र के नियमित जाप से व्यक्ति की आध्यात्मिक स्थिति में सुधार होता है। भक्त अपने जीवन के उद्देश्य को स्पष्ट रूप से समझने लगता है और उसके मन में धर्म, न्याय और सच्चाई के प्रति गहरी आस्था उत्पन्न होती है। यह आस्था व्यक्ति को आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करती है और उसे आत्मिक उन्नति की ओर ले जाती है।

2. मानसिक शांति

श्री विष्णु सहस्त्रनाम का जाप मानसिक शांति और स्थिरता प्रदान करता है। हमारे आधुनिक जीवन में मानसिक तनाव और चिंता एक सामान्य समस्या बन गई है। इस स्तोत्र के नियमित पाठ से व्यक्ति का मन शांत और स्थिर होता है। इसके नामों के जाप से एक प्रकार की मानसिक सुकून प्राप्त होती है जो चिंता और तनाव को कम करती है।

जब व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ करता है, तो उसके मन में सकारात्मक विचार उत्पन्न होते हैं। भगवान विष्णु के दिव्य नामों का जाप मानसिक अशांति को दूर करता है और व्यक्ति को मानसिक बल प्रदान करता है। इससे व्यक्ति की सोच में सकारात्मकता आती है और वह जीवन की चुनौतियों का सामना अधिक धैर्य और संतुलन के साथ कर सकता है।

3. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

श्री विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। भगवान विष्णु की स्तुति से व्यक्ति को उनके दिव्य आशीर्वाद की प्राप्ति होती है, जिससे उसके जीवन में सुख, समृद्धि और सफलता की संभावना बढ़ जाती है।

सकारात्मक ऊर्जा का संचार व्यक्ति के मानसिक, भावनात्मक और भौतिक स्वास्थ्य को सुधारता है। इस ऊर्जा के प्रभाव से व्यक्ति की आर्थिक स्थिति में सुधार हो सकता है, उसके रिश्ते मजबूत हो सकते हैं और उसकी व्यक्तिगत समस्याएँ हल हो सकती हैं। इसके अलावा, यह व्यक्ति को जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए आवश्यक ताकत और साहस प्रदान करता है।

4. धार्मिक और भौतिक लाभ

श्री विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ व्यक्ति की धार्मिक और भौतिक स्थिति पर भी गहरा प्रभाव डालता है। धार्मिक दृष्टिकोण से, इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति को भगवान विष्णु के कृपा प्राप्त होती है। यह कृपा उसे धार्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है और उसकी जीवन यात्रा को सुखमय बनाती है।

भौतिक दृष्टिकोण से, इस स्तोत्र का जाप व्यक्ति के जीवन में समृद्धि और सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है। व्यक्ति की आर्थिक स्थिति में सुधार होता है, उसकी सामाजिक स्थिति मजबूत होती है और वह जीवन में भौतिक सुखों का आनंद उठा सकता है। इस प्रकार, यह स्तोत्र भौतिक और धार्मिक लाभ दोनों की प्राप्ति के लिए महत्वपूर्ण है।

5. रोग और विघ्नों से मुक्ति

श्री विष्णु सहस्त्रनाम के पाठ से व्यक्ति को विभिन्न प्रकार की रोगों और विघ्नों से मुक्ति मिलती है। भगवान विष्णु के नामों का जाप शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाता है। यह विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी है जो विभिन्न प्रकार के स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं।

इस स्तोत्र का जाप करने से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है, जो विभिन्न प्रकार की बीमारियों और अस्वस्थताओं से राहत प्रदान करता है। इसके अलावा, यह जीवन की समस्याओं और विघ्नों को दूर करने में भी सहायक होता है। भक्त की भक्ति और श्रद्धा से भगवान विष्णु उसकी समस्याओं को दूर करने में सहायता करते हैं और उसे स्वास्थ्य और समृद्धि प्रदान करते हैं।

6. संतान सुख

श्री विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ संतान सुख की प्राप्ति के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है। जो दांपत्य जीवन में संतान सुख की प्राप्ति की कामना रखते हैं, उनके लिए यह स्तोत्र एक शक्तिशाली उपाय हो सकता है। इस स्तोत्र के नियमित पाठ से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है, जो संतान सुख और परिवार की सुख-शांति को बढ़ावा देती है।

संतान सुख की प्राप्ति के लिए इस स्तोत्र का जाप करने से परिवार में खुशहाली और शांति बनी रहती है। माता-पिता को संतान सुख प्राप्त होता है और परिवार में एकता और स्नेह का वातावरण होता है। इसके अलावा, यह स्तोत्र संतान के स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य के लिए भी शुभ होता है।

7. मानसिक और भावनात्मक बल

श्री विष्णु सहस्त्रनाम का जाप मानसिक और भावनात्मक बल को बढ़ाता है। इस स्तोत्र के पाठ से व्यक्ति के मन में स्थिरता और संतुलन आता है, जो उसे मानसिक और भावनात्मक रूप से मजबूत बनाता है। जब व्यक्ति इस स्तोत्र का जाप करता है, तो उसके मन में आत्म-संयम और धैर्य की भावना उत्पन्न होती है।

इस मानसिक और भावनात्मक बल के कारण व्यक्ति जीवन की कठिनाइयों और संकटों का सामना अधिक आत्म-विश्वास के साथ कर सकता है। उसकी मानसिक स्थिति मजबूत रहती है और वह जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाता है। यह बल उसे अपनी समस्याओं का समाधान खोजने में सक्षम बनाता है और जीवन में संतुलित और सुखी जीवन जीने में मदद करता है।

8. सामाजिक संबंधों में सुधार

श्री विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ सामाजिक संबंधों में भी सुधार लाता है। इस स्तोत्र के जाप से व्यक्ति का व्यक्तित्व बदलता है और वह दूसरों के प्रति अधिक स्नेही और सहानुभूतिशील बनता है। इसके प्रभाव से व्यक्ति के रिश्तों में मधुरता और सहयोग की भावना उत्पन्न होती है।

जब व्यक्ति इस स्तोत्र का नियमित पाठ करता है, तो उसके व्यवहार में एक सकारात्मक बदलाव होता है। वह दूसरों के साथ अधिक अच्छे से पेश आता है और समाज में एक सकारात्मक छवि प्रस्तुत करता है। इसके परिणामस्वरूप, उसके सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं और वह सामाजिक जीवन में अधिक सफल और खुशहाल रहता है।

9. दैवीय आशीर्वाद की प्राप्ति

श्री विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ भगवान विष्णु के दैवीय आशीर्वाद की प्राप्ति के लिए महत्वपूर्ण है। भगवान विष्णु की स्तुति और पूजा से भक्त को उनके आशीर्वाद प्राप्त होते हैं, जो जीवन के सभी पहलुओं में सहायक होते हैं।

इस स्तोत्र का जाप करने से भगवान विष्णु की कृपा से व्यक्ति को अपने जीवन में सौभाग्य, सुख और समृद्धि मिलती है। यह आशीर्वाद जीवन की कठिनाइयों को दूर करने में मदद करता है और व्यक्ति को जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है। इसके अलावा, यह आशीर्वाद व्यक्ति को आत्मिक शांति और संतुलन प्रदान करता है।

10. दिव्य संबंध की स्थापना

श्री विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ दिव्य संबंध की स्थापना में भी सहायक होता है। इस स्तोत्र के माध्यम से भक्त भगवान विष्णु के साथ एक गहरा और दिव्य संबंध स्थापित करता है। यह संबंध भक्त की आत्मा को भगवान के दिव्य गुणों और शक्ति के संपर्क में लाता है, जिससे उसकी जीवन यात्रा को आध्यात्मिक दिशा मिलती है।

इस दिव्य संबंध से भक्त की आत्मा को स्थिरता, शांति और आनंद प्राप्त होता है। यह संबंध व्यक्ति को भगवान विष्णु की उपस्थिति और उनकी कृपा का अनुभव कराता है, जो जीवन के सभी पहलुओं में सहायता प्रदान करता है। इस प्रकार, श्री विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ दिव्य संबंध स्थापित करने और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।


सर्वप्रथम योजना और तैयारी

विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र का पाठ करने से पहले एक ठोस योजना और तैयारी आवश्यक है। इस प्रक्रिया को सही ढंग से करने के लिए निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान देना चाहिए:

  • सिद्ध समय और स्थान: पाठ के लिए एक शांत और पवित्र स्थान का चयन करें। यह स्थान ऐसा होना चाहिए जहाँ आप बिना किसी व्यवधान के ध्यान केंद्रित कर सकें। प्रात:काल या संध्या समय इस उद्देश्य के लिए सबसे उपयुक्त समय माना जाता है।
  • स्वच्छता और पवित्रता: स्थान को स्वच्छ रखें और स्वयं भी स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। पवित्रता का ध्यान रखने से ध्यान और भक्ति में वृद्धि होती है।
  • पाठ की सामग्री: विष्णु सहस्त्रनाम का सही संस्करण प्राप्त करें। यह सुनिश्चित करें कि आप एक मान्यता प्राप्त और सही संस्कृत संस्करण का उपयोग कर रहे हैं, जिसमें उच्चारण और अर्थ स्पष्ट रूप से दिए गए हों।

सिद्धि और तैयारी

  • संकल्प: पाठ शुरू करने से पहले एक संकल्प लें कि आप इस स्तोत्र का पाठ श्रद्धा और पूर्ण निष्ठा के साथ करेंगे। संकल्प से मन को एकाग्रता प्राप्त होती है और भक्तिपथ पर दृढ़ता बनी रहती है।
  • पाठ विधि: विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ दो प्रमुख विधियों से किया जा सकता है: मौखिक पाठ और लिखित पाठ। मौखिक पाठ में स्तोत्र का जाप किया जाता है, जबकि लिखित पाठ में इसे कागज पर लिखा जाता है। आप दोनों विधियों का उपयोग कर सकते हैं, लेकिन मौखिक पाठ अधिक प्रभावी माना जाता है।
  • आवाहन: भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र के सामने बैठकर उनका आवाहन करें। अपने मन को भगवान विष्णु की उपस्थिति में केंद्रित करें और उन्हें अपने पाठ के लिए आमंत्रित करें।

पाठ की विधि

  • मंत्रजाप की शुरुआत: पाठ की शुरुआत ‘ओम्’ या ‘श्री’ शब्द से करें। यह शब्द पाठ की पवित्रता को बनाए रखने में मदद करता है और भगवान के प्रति श्रद्धा प्रकट करता है।
  • ध्यान और प्रार्थना: विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ शुरू करने से पहले भगवान विष्णु के विभिन्न स्वरूपों और गुणों पर ध्यान लगाएँ। ध्यान करने से मानसिक शांति और ध्यान केंद्रित होता है।
  • पाठ विधि: विष्णु सहस्त्रनाम के एक हजार नामों का जाप क्रमवार करें। प्रत्येक नाम को ध्यानपूर्वक और सही उच्चारण के साथ पढ़ें। पाठ करते समय समझें कि हर नाम का एक विशेष अर्थ और महत्व है।
  • मालागिरी: पाठ के दौरान माला (जपमाला) का उपयोग करें। एक माला पर 108 मनकों के साथ जाप करें। प्रत्येक मनके पर एक नाम का जाप करें। इससे मानसिक शांति और एकाग्रता में वृद्धि होती है।
  • पाठ की संख्या: पाठ को एक बार, तीन बार या १०८ बार करना उत्तम माना जाता है। आप अपनी सुविधा के अनुसार संख्या निर्धारित कर सकते हैं।

उच्चारण और अर्थ

  • सही उच्चारण: विष्णु सहस्त्रनाम का सही उच्चारण करना महत्वपूर्ण है। अगर आप उच्चारण में भ्रमित हैं, तो एक योग्य गुरु से मार्गदर्शन प्राप्त करें। सही उच्चारण से मंत्र की शक्ति बढ़ती है।
  • अर्थ की समझ: प्रत्येक नाम का अर्थ समझना भी आवश्यक है। इससे पाठ की प्रभावशीलता बढ़ती है और भक्त को भगवान विष्णु की गुणों और शक्तियों का अधिक गहरा अनुभव होता है।
  • शिक्षा: अगर संभव हो, तो विष्णु सहस्त्रनाम का अध्ययन करें और इसके नामों के अर्थ और महत्व को समझें। इससे पाठ के दौरान भक्ति और समर्पण बढ़ेगा।

अर्चना और पूजन

  • अर्चना: पाठ के अंत में भगवान विष्णु की अर्चना करें। उन्हें पुष्प, दीप, और नैनलाल (आभूषण) अर्पित करें। अर्चना के दौरान अपनी भक्ति और प्रेम को व्यक्त करें।
  • प्रार्थना: पाठ समाप्त होने के बाद भगवान विष्णु से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करें। उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए अपने मन की सारी इच्छाएँ और संकल्प उन्हें अर्पित करें।
  • भोग और अर्पण: भगवान विष्णु को भोग अर्पित करें और फिर उस भोग को स्वयं भी ग्रहण करें। यह एक शुभ और पवित्र प्रक्रिया होती है।

ध्यान और समर्पण

  • ध्यान: पाठ के दौरान ध्यान केंद्रित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। भगवान विष्णु के गुणों और स्वरूपों पर ध्यान लगाएं और मानसिक रूप से उनकी उपस्थिति का अनुभव करें।
  • समर्पण: पाठ के दौरान पूर्ण समर्पण और श्रद्धा रखें। भगवान विष्णु के प्रति अपनी भक्ति को प्रकट करें और स्वयं को उनकी सेवा में समर्पित करें।
  • संतुलन: पाठ के दौरान अपने मन को स्थिर और संतुलित रखें। नकारात्मक विचारों और बाहरी व्यवधानों से बचने का प्रयास करें।

पाठ के लाभ

  • आध्यात्मिक लाभ: नियमित पाठ से आत्मिक उन्नति और मानसिक शांति प्राप्त होती है। यह व्यक्ति को भगवान विष्णु के दिव्य गुणों और शक्ति का अनुभव कराता है।
  • भौतिक लाभ: पाठ से भौतिक सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है। यह आर्थिक स्थिति में सुधार, स्वास्थ्य लाभ और जीवन में खुशहाली को बढ़ावा देता है।
  • धार्मिक लाभ: धार्मिक दृष्टिकोण से, विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ व्यक्ति को भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का अवसर प्रदान करता है। यह धार्मिक पथ पर प्रगति और दैवीय आशीर्वाद को सुनिश्चित करता है।

नियमितता और अनुशासन

  • नियमित पाठ: विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ नियमित रूप से करना अत्यंत लाभकारी होता है। नियमित पाठ से जीवन में स्थिरता और संतुलन बना रहता है।
  • अनुशासन: पाठ के दौरान अनुशासन बनाए रखें। हर दिन एक निश्चित समय पर पाठ करने की आदत डालें और इसे अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाएं।
  • समर्पण: पाठ को समर्पण और श्रद्धा के साथ करें। यह आपकी भक्ति को बढ़ाता है और पाठ की प्रभावशीलता को बढ़ाता है।

परिणाम और अनुभूति

  • सकारात्मक परिणाम: विष्णु सहस्त्रनाम का नियमित पाठ जीवन में सकारात्मक बदलाव लाता है। व्यक्ति के मानसिक, भावनात्मक और भौतिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।
  • अनुभूति: पाठ के दौरान और बाद में भगवान विष्णु की उपस्थिति का अनुभव करें। यह अनुभव भक्ति और आध्यात्मिक उन्नति को प्रोत्साहित करता है।
  • सुख और समृद्धि: पाठ के परिणामस्वरूप व्यक्ति को जीवन में सुख और समृद्धि प्राप्त होती है। यह भगवान विष्णु की कृपा का प्रतिफल होता है।

सामाजिक और सांस्कृतिक पहलू

  • सामाजिक जीवन: विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ सामाजिक जीवन में भी सकारात्मक प्रभाव डालता है। यह व्यक्ति को दूसरों के प्रति सहानुभूति और सहयोग की भावना विकसित करता है।
  • सांस्कृतिक संबंध: इस स्तोत्र का पाठ भारतीय सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं के साथ जुड़ा होता है। इसे पढ़ने से भारतीय संस्कृति और परंपराओं के प्रति सम्मान और प्रेम बढ़ता है।

सर्वश्रेष्ठ सहस्रनाम कौन सा है?

सहस्रनामों का चयन व्यक्तिगत धार्मिक विश्वासों और जरूरतों पर निर्भर करता है। विष्णु सहस्त्रनाम, शिव सहस्त्रनाम, और दुर्गा सहस्त्रनाम प्रमुख और प्रसिद्ध सहस्रनाम हैं। इनमें से प्रत्येक का महत्व और प्रभाव विभिन्न धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं के आधार पर भिन्न हो सकता है। विष्णु सहस्त्रनाम विशेष रूप से भगवान विष्णु की हजार नामों का संकलन है और यह भगवान की विभिन्न शक्तियों और गुणों का वर्णन करता है।

प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का जाप करने से क्या होता है?

प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का जाप करने से मानसिक शांति, आध्यात्मिक उन्नति और जीवन में सुख-समृद्धि प्राप्त होती है। यह अभ्यास भक्तों को भगवान विष्णु की कृपा और संरक्षण प्राप्त करने में मदद करता है, साथ ही साथ सकारात्मक ऊर्जा और स्थिरता भी प्रदान करता है। नियमित जाप से मन और आत्मा की शुद्धि होती है और कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखने की क्षमता बढ़ती है।

विष्णु जी का मूल मंत्र क्या है?

भगवान विष्णु का मूल मंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” है। यह मंत्र भगवान विष्णु की स्तुति और उनकी अनंत शक्ति का सम्मान करने के लिए प्रयुक्त होता है। इस मंत्र का जाप करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है और भक्तों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आ सकता है।

विष्णु सहस्त्रनाम पढ़ने से क्या फल मिलता है?

विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करने से भगवान विष्णु की अनंत कृपा प्राप्त होती है। यह पाठ मानसिक शांति, बुरे प्रभावों से मुक्ति, और जीवन में समृद्धि प्रदान करता है। भक्तों को जीवन की समस्याओं से निजात मिलती है और वे आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होते हैं। विष्णु सहस्त्रनाम का जाप करने से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है।

कौन सा सहस्रनाम सबसे अच्छा है?

सहस्रनामों की उत्कृष्टता व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं और आवश्यकताओं पर निर्भर करती है। विष्णु सहस्त्रनाम, शिव सहस्त्रनाम, और दुर्गा सहस्त्रनाम सभी के अपने-अपने महत्व हैं। हर सहस्रनाम की विशेषता और प्रभाव भक्तों की आस्था और धार्मिक परंपराओं के अनुसार भिन्न हो सकते हैं। उपयुक्त सहस्रनाम का चयन व्यक्ति की आध्यात्मिक जरूरतों और इच्छाओं के आधार पर किया जा सकता है।

श्री हनुमान अमृतवाणी – Shri Hanuman Amritwani PDF 2024-25

श्री हनुमान अमृतवाणी (Shri Hanuman Amritwani PDF) हनुमान जी, जिन्हें अंजनी पुत्र, पवन पुत्र, बजरंगबली और संकटमोचन के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में अत्यंत पूजनीय देवता हैं। वे भगवान शिव के रूद्र अवतार माने जाते हैं और भगवान राम के अनन्य भक्त हैं। उनकी भक्ति और शक्ति का वर्णन विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में मिलता है, जिनमें प्रमुख हैं रामायण, महाभारत और श्रीमद्भागवत पुराण। श्री हनुमान अमृतवाणी उन भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण पाठ है जो हनुमान जी की भक्ति और उनके आशीर्वाद को प्राप्त करना चाहते हैं।

श्री हनुमान अमृतवाणी का पाठ करने से हनुमान जी की कृपा प्राप्त होती है और सभी प्रकार की बाधाओं, कष्टों और संकटों से मुक्ति मिलती है। यह पाठ विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी है जो जीवन में किसी प्रकार की समस्या या दुख से गुजर रहे हैं। हनुमान जी के नाम का जाप और उनके चरित्र का स्मरण करने से आत्मबल और साहस की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही, यह भक्तों के मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और उन्हें आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराता है।

हनुमान जी की महिमा का गुणगान करते हुए, श्री हनुमान अमृतवाणी में उनके विभिन्न नामों, गुणों और कार्यों का वर्णन किया गया है। इसमें उनकी भक्ति, शक्ति, सेवा भावना और साहस का विस्तार से उल्लेख होता है। हनुमान जी की कथा और उनके कार्यों को सुनने और गाने से भक्तों के मन में भक्ति की भावना जागृत होती है और वे हनुमान जी के आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करते हैं।

श्री हनुमान अमृतवाणी का नियमित पाठ करने से भक्तों को मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं। यह पाठ न केवल भक्तों के लिए आशीर्वाद का स्रोत है, बल्कि उन्हें जीवन की कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति भी प्रदान करता है। हनुमान जी की भक्ति और उनके प्रति समर्पण से भक्तों का जीवन सुख, शांति और समृद्धि से भर जाता है।

हनुमान जी की कृपा से, श्री हनुमान अमृतवाणी का पाठ सभी भक्तों के लिए एक संजीवनी की तरह है, जो उन्हें जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता और संतुष्टि प्रदान करता है। उनके प्रति अटूट विश्वास और प्रेम से भरा यह पाठ, भक्तों को उनके जीवन में आने वाली सभी चुनौतियों का सामना करने की क्षमता और साहस प्रदान करता है। श्री हनुमान अमृतवाणी, हनुमान जी की महिमा और उनकी कृपा को अपने जीवन में अनुभव करने का एक अनुपम माध्यम है।


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रामायण की भव्य जो माला,
हनुमत उसका रत्न निराला।

निश्चय पूर्वक अलख जगाओ,
जय जय जय बजरंग ध्याओ।।

अंतर्यामी है हनुमंता,
लीला अनहद अमर अनंता।

रामकी निष्ठा नस नस अंदर
रोम रोम रघुनाथ का मंदिर।।

सिद्धि महात्मा ये सुख धाम,
इसको कोटि कोटि प्रमाण।

तुलसीदास के भाग्य जगाये,
साक्षात के दर्श दिखाए।।

सूझ बूझ धैर्य का है स्वामी,
इसके भय खाते खलकामी।

निर्भिमान चरित्र है उसका,
हर एक खेल विचित्र है इसका।।

सुंदरकांड है महिमा इसकी,
ऐसी शोभा और है किसकी।

जिसपे मारुती की हो छाया,
माया जाल ना उसपर आया।।

मंगलमूर्ति महसुखदायक,
लाचारों के सदा सहायक।

कपिराज ये सेवा परायण,
इससे मांगो राम रसायन।।

जिसको दे भक्ति की युक्ति,
जन्म मरण से मलती मुक्ति।

स्वार्थ रहित हर काज है इसका,
राम के मन पे राज है इसका।।

वाल्मीकि ने लिखी है महिमा,
हनुमान के गुणों की गरिमा।

ये ऐसी अनमोल कस्तूरी,
जिसके बिना रामायण अधूरी।

कैसा मधुर स्वाभाव है इसका,
जन जन पर प्रभाव है इसका।

धर्म अनुकूल नीति इसकी,
राम चरण से प्रीती इसकी।

दुर्गम काज सुगम ये करता,
जन मानस की विपदा हरता।

युगो में जैसे सतयुग प्यारा,
सेवको में हनुमान निरारा।

दोहा- श्रद्धा रवि बजरंग की रे मन माला फेर,
भय भद्रा छंट जाएंगे घडी लगे ना देर।।


हनुमान से मदद कैसे मांगे?

हनुमान जी से मदद मांगने के लिए सच्ची श्रद्धा और भक्ति के साथ उनकी आराधना करें। आप हनुमान चालीसा का पाठ कर सकते हैं या किसी अन्य हनुमान मंत्र का जाप कर सकते हैं। अपनी समस्या को स्पष्ट रूप से उनके सामने रखें और हनुमान जी से सहायता के लिए प्रार्थना करें। सच्चे मन और विश्वास से की गई प्रार्थना अवश्य सुनी जाती है।

हनुमान चालीसा जल्दी कैसे सीखें?

हनुमान चालीसा जल्दी सीखने के लिए निम्नलिखित उपाय कर सकते हैं:

– प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें।
– चालीसा को टुकड़ों में बांटकर याद करें, जैसे चार-चार चौपाई।
– हनुमान चालीसा को लिखकर याद करें।
– हनुमान चालीसा के अर्थ को समझकर याद करें, इससे आपका मन अधिक जुड़ा रहेगा।
– हनुमान चालीसा का ऑडियो सुनें और उसके साथ-साथ बोलने का प्रयास करें।

श्री हनुमान जी से क्या सीखा जा सकता है?

श्री हनुमान जी से कई महत्वपूर्ण जीवन मूल्य सीखे जा सकते हैं:

– और समर्पण: श्री राम के प्रति उनकी निष्ठा और भक्ति अद्वितीय है।
– सेवा भावना: दूसरों की सेवा में समर्पित होना।
– साहस और बल: विपरीत परिस्थितियों में धैर्य और साहस बनाए रखना।
– विनम्रता: अत्यंत शक्तिशाली होते हुए भी हनुमान जी विनम्रता का आदर्श हैं।
– निस्वार्थता: उन्होंने अपने व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर श्री राम की सेवा की।

दुर्गा अमृतवाणी (Durga Amritwani PDF 2024-25)

दुर्गा अमृतवाणी (Durga Amritwani Pdf) एक पवित्र और महत्वपूर्ण धार्मिक पाठ है, जो देवी दुर्गा की महिमा का वर्णन करता है और भक्तों को आध्यात्मिक आनंद और शांति प्रदान करता है। यह पाठ विशेष रूप से नवरात्रि और दुर्गा पूजा के अवसर पर पढ़ा जाता है, लेकिन इसे किसी भी समय पढ़ा जा सकता है जब भक्त देवी दुर्गा की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं। आप हमारी वेबसाइट में बुद्ध अमृतवाणी और राम अमृतवाणी भी पढ़ सकते हैं।

दुर्गा अमृतवाणी का महत्व

दुर्गा अमृतवाणी का महत्व अनंत है। यह पाठ देवी दुर्गा की विभिन्न स्वरूपों, उनकी महिमा, शक्ति, और उनके दिव्य कार्यों का वर्णन करता है। यह पाठ न केवल भक्तों को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है, बल्कि उन्हें जीवन की कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति भी प्रदान करता है। दुर्गा अमृतवाणी के नियमित पाठ से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता और शांति का संचार होता है।

देवी दुर्गा की महिमा

देवी दुर्गा को शक्ति की देवी माना जाता है। वे दुर्गति नाशिनी, दुष्टों का संहार करने वाली, और भक्तों की रक्षक हैं। दुर्गा अमृतवाणी में देवी दुर्गा की महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है। यह बताया गया है कि कैसे उन्होंने विभिन्न राक्षसों का वध कर धर्म की स्थापना की। दुर्गा माँ के नौ रूपों का भी वर्णन इसमें किया गया है, जो भक्तों को अलग-अलग तरीके से आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

पाठ की विधि

दुर्गा अमृतवाणी का पाठ करने के लिए भक्तों को एक शांत और पवित्र स्थान का चयन करना चाहिए। पाठ की शुरुआत माँ दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक जलाकर और अगरबत्ती जलाकर की जाती है। इसके बाद भक्त ध्यान मुद्रा में बैठकर दुर्गा अमृतवाणी का पाठ करते हैं। इसे पढ़ते समय, भक्तों को अपने मन को केंद्रित करना चाहिए और पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ माँ दुर्गा की आराधना करनी चाहिए।

लाभ

दुर्गा अमृतवाणी का नियमित पाठ करने से व्यक्ति को कई लाभ प्राप्त होते हैं:
आध्यात्मिक उन्नति: यह पाठ व्यक्ति के आध्यात्मिक स्तर को ऊँचा उठाता है और उन्हें दिव्य ऊर्जा से भर देता है।
मानसिक शांति: दुर्गा अमृतवाणी का पाठ मानसिक शांति और सुकून प्रदान करता है।
सकारात्मक ऊर्जा: यह पाठ व्यक्ति के चारों ओर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और नकारात्मकता को दूर करता है।
कठिनाइयों का नाश: दुर्गा माँ की कृपा से जीवन की सभी कठिनाइयाँ और समस्याएँ दूर होती हैं।
स्वास्थ्य लाभ: यह पाठ व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को सुधारता है।



दुर्गा अमृतवाणी (Durga Amritwani PDF)3

दुर्गा माँ दुःख हरने वाली
मंगल मंगल करने वाली
भय के सर्प को मारने वाली
भवनिधि से जग्तारने वाली

अत्याचार पाखंड की दमिनी
वेद पुराणों की ये जननी
दैत्य भी अभिमान के मारे
दीन हीन के काज संवारे

सर्वकलाओं की ये मालिक
शरणागत धनहीन की पालक
इच्छित वर प्रदान है करती
हर मुश्किल आसान है करती

भ्रामरी हो हर भ्रम मिटावे
कण -कण भीतर कजा दिखावे
करे असम्भव को ये सम्भव
धन धन्य और देती वैभव

महासिद्धि महायोगिनी माता
महिषासुर की मर्दिनी माता
पूरी करे हर मन की आशा
जग है इसका खेल तमाशा 

जय दुर्गा जय-जय दमयंती
जीवन- दायिनी ये ही जयन्ती
ये ही सावित्री ये कौमारी
महाविद्या ये पर उपकारी

सिद्ध मनोरथ सबके करती
भक्त जनों के संकट हरती
विष को अमृत करती पल में
ये ही तारती पत्थर जल में

इसकी करुणा जब है होती
माटी का कण बनता मोती
पतझड़ में ये फूल खिलावे
अंधियारे में जोत जलावे

वेदों में वर्णित महिमा इसकी
ऐसी शोभा और है किसकी
ये नारायणी ये ही ज्वाला
जपिए इसके नाम की माला

ये है सुखेश्वरी माता
इसका वंदन करे विधाता
पग-पंकज की धूलि चंदन
इसका देव करे अभिनंदन

जगदम्बा जगदीश्वरी दुर्गा दयानिधान
इसकी करुणा से बने निर्धन भी धनवान

छिन्नमस्ता जब रंग दिखावे
भाग्यहीन के भाग्य जगावे
सिद्धि – दात्री – आदि भवानी
इसको सेवत है ब्रह्मज्ञानी

शैल-सुता माँ शक्तिशाला
इसका हर एक खेल निराला
जिस पर होवे अनुग्रह इसका
कभी अमंगल हो ना उसका

इसकी दया के पंख लगाकर
अम्बर छूते है कई जाकर
राय को ये ही पर्वत करती
गागर में है सागर भरती

इसके कब्जे जग का सब है
शक्ति के बिना शिव भी शव है
शक्ति ही है शिव की माया
शक्ति ने ब्रह्मांड रचाया

इस शक्ति का साधक बनना
निष्ठावान उपासक बनना
कुष्मांडा भी नाम इसका
कण – कण में है धाम इसका

दुर्गा माँ प्रकाश स्वरूपा
जप-तप ज्ञान तपस्या रूपा
मन में ज्योत जला लो इसकी
साची लगन लगा लो इसकी

कालरात्रि ये महामाया
श्रीधर के सिर इसकी छाया
इसकी ममता पावन झुला
इसको ध्यानु भक्त ना भुला

इसका चिंतन चिंता हरता
भक्तो के भंडार है भरता
साँसों का सुरमंडल छेड़ो
नवदुर्गा से मुंह न मोड़ो

चन्द्रघंटा कात्यानी
महादयालू महाशिवानी
इसकी भक्ति कष्ट निवारे
भवसिंधु से पार उतारे

अगम अनंत अगोचर मैया
शीतल मधुकर इसकी छैया
सृष्टि का है मूल भवानी
इसे कभी न भूलो प्राणी

दुर्गा की कर साधना, मन में रख विश्वास
जो मांगोगे पाओगे क्या नहीं मेरी माँ के पास

खड्ग – धारिणी हो जब आई
काल रूप महा-काली कहाई
शुम्भ निशुम्भ को मार गिराया
देवों को भय-मुक्त बनाया

अग्निशिखा से हुई सुशोभित
सूरज की भाँती प्रकाशित
युद्ध-भूमि में कला दिखाई
मानव बोले त्राहि-त्राहि

करे जो इसका जाप निरंतर
चले ना उस पर टोना मंत्र
शुभ-अशुभ सब इसकी माया
किसी ने इसका पार ना पाया

इसकी भक्ति जाए ना निष्फल
मुश्किल को ये डाले मुश्किल
कष्टों को हर लेने वाली
अभयदान वर देने वाली

धन लक्ष्मी हो जब आती
कंगाली है मुंह छुपाती
चारों और छाए खुशाहली
नजर ना आये फिर बदहाली

कल्पतरु है महिमा इसकी
कैसे करू मै उपमा इसकी
फल दायिनी है भक्ति जिसकी
सबसे न्यारी शक्ति उसकी

अन्नपूर्णा अन्न-धनं को देती
सुख के लाखों साधन देती
प्रजा-पालक इसे ध्याते
नर-नारायण भी गुण गाते

चम्पाकली सी छवि मनोहर
इसकी दया से धर्म धरोहर
त्रिभुवन की स्वामिनी ये है
योगमाया गजदामिनी ये है

रक्तदन्ता भी इसे है कहते
चोर निशाचर दानव डरते
जब ये अमृत-रस बरसावे
मृत्युलोक का भय ना आवे

काल के बंधन तोड़े पल में
सांस की डोरी जोड़े पल में
ये शाकम्भरी माँ सुखदायी
जहां पुकारू वहां सहाई


विंध्यवासिनी नाम से,करे जो निशदिन याद
उसे ग्रह में गूंजता, हर्ष का सुरमय नाद


ये चामुण्डा चण्ड -मुण्ड घाती
निर्धन के सिर ताज सजाती
चरण-शरण में जो कोई जाए
विपदा उसके निकट ना आये

चिंतपूर्णी चिंता है हरती
अन्न-धनं के भंडारे भरती
आदि-अनादि विधि विधाना
इसकी मुट्ठी में है जमाना

रोली कुम -कुम चन्दन टीका
जिसके सम्मुख सूरज फीका
ऋतुराज भी इसका चाकर
करे आराधना पुष्प चढ़ाकर

इंद्र देवता भवन धुलावे
नारद वीणा यहाँ बजावे
तीन लोक में इसकी पूजा
माँ के सम न कोई भी दूजा

ये ही वैष्णो आद्कुमारी
भक्तन की पत राखनहारी
भैरव का वध करने वाली
खण्डा हाथ पकड़ने वाली

ये करुणा का न्यारा मोती
रूप अनेकों एक है ज्योति
माँ वज्रेश्वरी कांगड़ा वाली
खाली जाए न कोई सवाली

ये नरसिंही ये वाराही
नेहमत देती ये मनचाही
सुख समृद्धि दान है करती
सबका ये कल्याण है करती

मयूर कही है वाहन इसका
करते ऋषि आहवान इसका
मीठी है ये सुगंध पवन में
इसकी मूरत राखो मन में

नैना देवी रंग इसी का
पतितपावन अंग इसी का
भक्तो के दुःख लेती ये है
नैनो को सुख देती ये है

नैनन में जो इसे बसाते
बिन मांगे ही सब कुछ पाते
शक्ति का ये सागर गहरा
दे बजरंगी द्वार पे पहरा

इसके रूप अनूप की, समता करे ना कोय
पूजे चरण-सरोज जो, तन मन शीतल होय

काली स्वरूप में लीला करती
सभी बलाएं इससे डरती
कही पे है ये शांत स्वरूपा
अनुपम देवी अति अनूपा

अर्चना करना एकाग्र मन से
रोग हरे धनवंतरी बन के
चरणपादुका मस्तक धर लो
निष्ठा लगन से सेवा कर लो

मनन करे जो मनसा माँ का
गौरव उत्तम पाय जवाका
मन से मनसा-मनसा जपना
पूरा होगा हर इक सपना

ज्वाला -मुखी का दर्शन कीजो
भय से मुक्ति का वर लीजो
ज्योति यहाँ अखण्ड हो जलती
जो है अमावस पूनम करती

श्रद्धा -भाव को कम न करना
दुःख में हंसना गम न करना
घट – घट की माँ जाननहारी
हर लेती सब पीड़ा तुम्हारी

बगलामुखी के द्वारे जाना
मनवांछित ही वैभव पाना
उसी की माया हंसना रोना
उससे बेमुख कभी ना होना

शीतल – शीतल रस की धारा
कर देगी कल्याण तुम्हारा
धुनी वहां पे रमाये रखना
मन से अलख जगाये रखना

भजन करो कामाख्या जी का
धाम है जो माँ पार्वती का
सिद्ध माता सिद्धेश्वरी है
राजरानी राजेश्वरी है

धूप दीप से उसे मनाना
श्यामा गौरी रटते जाना
उकिनी देवी को जिसने आराधा
दूर हुई हर पथ की बाधा

नंदा देवी माँ जो जाओगे
सच्चा आनंद वही पाओगे
कौशिकी माता जी का द्वारा
देगा तुझको सदा सहारा

हरसिद्धि के ध्यान में, जाओंगे जब खो
सिद्ध मनोरथ सब तुम्हारे, पल में जायेंगे हो

महालक्ष्मी को पूजते रहियो
धन सम्पत्ति पाते ही रहिओ
घर में सच्चा सुख बरसेगा
भोजन को ना कोई तरसेगा

जिव्ह्दानी करते जो चिंतन
छुट जायेंगे यम के बंधन
महाविद्या की करना सेवा
ज्ञान ध्यान का पाओगे मेवा

अर्बुदा माँ का द्वार निराला
पल में खोले भाग्य का ताला
सुमिरन उसका फलदायक
कठिन समय में होए सहायक

त्रिपुर-मालिनी नाम है न्यारा
चमकाए तकदीर का तारा
देविकानाभ में जाकर देखो
स्वर्ग-धाम वो माँ का देखो

पाप सारे धोती पल में
काया कुंदन होती पल में
सिंह चढ़ी माँ अम्बा देखो
शारदा माँ जगदम्बा देखो

लक्ष्मी का वहां प्रिय वासा
पूरी होती सब की आशा
चंडी माँ की ज्योत जगाना
सच्चा सेवी समझ वहां जाना

दुर्गा भवानी के दर जाके
आस्था से एक चुनर चढ़ा के
जग की खुशियाँ पा जाओगे
शहंशाह बनकर आ जाओगे

वहां पे कोई फेर नहीं है
देर तो है अंधेर नहीं है
कैला देवी करौली वाली
जिसने सबकी चिंता टाली

लीला माँ की अपरम्पारा
करके ही विशवास तुम्हारा
करणी माँ की अदभुत करणी
महिमा उसकी जाए ना वरणी

भूलो ना कभी शची की माता
जहाँ पे कारज सिद्ध हो जाता
भूखो को जहाँ भोजन मिलता
हाल वो जाने सबके दिल का

सप्तश्रंगी मैया की, साधना कर दिन रैन
कोष भरेंगे रत्नों से, पुलकित होंगे नैन

मंगलमयी सुख धाम है दुर्गा
कष्ट निवारण नाम है दुर्गा
सुख्दरूप भव तारिणी मैया
हिंगलाज भयहारिणी मैया

रमा उमा माँ शक्तिशाला
दैत्य दलन को भई विकराला
अंत:करण में इसे बसालो
मन को मंदिर रूप बनालो

रोग शोक बाहर कर देती
आंच कभी ना आने देती
रत्न जड़ित ये भूषण धारी
सेव दरिद्र के सदा आभारी

धरती से ये अम्बर तक है
महिमा सात समंदर तक है
चींटी हाथी सबको पाले
चमत्कार है बड़े निराले

मृत संजीवनी विध्यावाली
महायोगिनी ये महाकाली
साधक की है साधना ये ही
जपयोगी आराधना ये ही

करुणा की जब नजर घुमावे
कीर्तिमान धनवान बनावे
तारा माँ जग तारने वाली
लाचारों की करे रखवाली

कही बनी ये आशापुरनी
आश्रय दाती माँ जगजननी
ये ही है विन्धेश्वारी मैया
है वो जगभुवनेश्वरी मैया

इसे ही कहते देवी स्वाहा
साधक को दे फल मनचाहा
कमलनयन सुरसुन्दरी माता
इसको करता नमन विधाता

वृषभ पर भी करे सवारी
रुद्राणी माँ महागुणकारी
सर्व संकटो को हर लेती
विजय का विजया वर है देती

‘योगक्षमा ‘ जप तप की दाती
परमपदों की माँ वरदाती
गंगा में है अमृत इसका
साधक मन है जातक इसका

अन्तर्मन में अम्बिके, रखे जो हर ठौर
उसको जग में देवता, भावे ना कोई और

पदमावती मुक्तेश्वरी मैया
शरण में ले शरनेश्वरी मैया
आपातकाल रटे जो अम्बा
माँ दे हाथ ना करत विलम्बा

मंगल मूर्ति महा सुखकारी
संत जनों की है रखवारी
धूमावती के पकड़े पग जो
वश में करले सारे जग को

दुर्गा भजन महा फलदायी
हृदय काज में होत सहाई
भक्ति कवच हो जिसने पहना
और पड़े ना दुःख का सहना

मोक्षदायिनी माँ जो सुमिरे
जन्म मरण के भव से उबरे
रक्षक हो जो क्षीर भवानी
रहे काल की ना मनमानी

जिस ग्रह माँ की ज्योति जागे
तिमार वहां से भय का भागे
दुखसागर में सुखी जो रहना
दुर्गा नाम जपो दिन रैना

अष्ट- सिद्धि नौ निधियों वाली
महादयालु भये कृपाली
सपने सब साकार करेगी
दुखियों का उद्धार करेगी

मंगला माँ का चिंतन कीजो
हरसिद्धि ते हर सुख लीजो
थामे रहो विश्वास की डोरी
पकड़ा देगी अम्बा गौरी

भक्तो के मन के अंदर
रहती है कण -कण के अंदर
सूरज चाँद करोड़ो तारे
जोत से जोत ये लेते सारे

वो ज्योति है प्राण स्वरूपा
तेज वही भगवान स्वरूपा
जिस ज्योति से आये ज्योति
अंत उसी में जाए ज्योति

ज्योति है निर्दोष निराली
ज्योति सर्वकलाओं वाली
ज्योति ही अन्धकार मिटाती
ज्योति साचा राह दिखाती

अम्बा माँ की ज्योति में, तू ब्रह्मांड को देख
ज्योति ही तो खींचती, हर मस्तक की रेख
जगदम्बा जगतारिणी जगदाती जगपाल
इसके चरणन जो हुए उन पर होए दयाल

माँ की शीतल छाँव में, स्वर्ग सा सुखहोये
जिसकी रक्षा माँ करे , मार सके ना कोय
करुणामयी कापालिनी , दुर्गा दयानिधान
जैसे जिसकी भावना, वैसे दे वरदान

माँ श्री महां – शारदे , ममता देत अपार
हानि बदले लाभ में, जब ये हिलावे तार
जै जै अंबे माँ जै जगदम्बे माँ

नश्वर हम खिलौनों की, चाबी माँ के हाथ
जैसे इशारा माँ करे नाचे हम दिन-रात
भाग्य लिखे भाग्येश्वरी लेकर कलम-दवात
कठपुतली के बस में क्या, सब कुछ माँ के हाथ

पतझड़ दे या दे हमें खुशियों का मधुमास
माँ की मर्जी है जो दे हर सुख उसके पास
माँ करुणा के नाव पर होंगे जो भी सवार
बाल भी बांका होए ना वैरी जो हो संसार
जै जै अम्बे माँ जै जगदम्बे माँ

मंगला माँ के भक्त के, ग्रह में मंगलाचार
कभी अमंगल हो नहीं, पवन चले सुखकार
शक्ति ही को लो शक्ति मिलती इसके धाम
कामधेनु के तुल्य है शिवशक्ति का नाम

जन-जन वृक्ष है एक भला बुरे है लाख बबूल
बदी के कांटे छोड़ के चुन नेकी के फूल
माँ के चरण-सरोज की, कलियों जैसे सुगंध
स्वर्ग में भी ना होगा जो है यहाँ आनंद
जै जै माँ जै जगदम्बे माँ

पाप के काले खेल में सुख ना पावे कोय
कोयले की तो खान में सब कुछ काला होय
निकट ना आने दो कभी दुष्कर मोह के लाग
मानव चोले पर नहीं लगने दे जो दाग
जै जै माँ जै जगदम्बे माँ

नवदुर्गा के नाम का मनन करो सुखकार
बिन मोल बिन दाम ही करेगी माँ उपकार
भव से पार लगाएगी माँ की एक आशीष
तभी तो माँ को खोजते श्री हरी जगदीश

जै जै अम्बे माँ जै जगदम्बे माँ
जै जै अम्बे माँ जै जगदम्बे माँ
जै जै अम्बे माँ जै जगदम्बे माँ
जै जै अम्बे माँ जै जगदम्बे माँ

विधि- पूर्वक ही जोत जलाकर
माँ-चरणन में ध्यान लगाकर
जो जन, मन से पूजा करेंगे
जीवन-सिन्धु सहज तरेंगे

कन्या रूप में जब दे दर्शन
श्रद्धा – सुमन कर दीजो अर्पण
सर्वशक्ति वो आदिकौमारी
जाइये चरणन पे बलिहारी

त्रिपुर रूपिणी ज्ञान महिमा
भगवती वो वरदान महिमा
चंड -मुंड नाशक दिव्या-स्वरूपा
त्रिशुलधारिणी शंकर रूपा

करे कामाक्षी कामना पूरी
देती सदा माँ सबरस पूरी
चंडिका देवी का करो अर्चन
साफ़ रहेगा मन का दर्पण

सर्व भूतमयी सर्वव्यापक
माँ की दया के देव याचक
स्वर्णमयी है जिसकी आभा
करती नहीं है कोई दिखावा

कही वो रोहिणी कही सुभद्रा
दूर कर्त अज्ञान की निंद्रा
छल कपट अभिमान की दमिनी
नरप सौ भाग्य हर्ष की जननी

आश्रय दाति माँ जगदम्बे
खप्पर वाली महाबली अम्बे
मुंडन की जब पहने माला
दानव -दल पर बरसे ज्वाला

जो जन उसकी महिमा गाते
दुर्गम काज सुगम हो जाते
जै विध्या अपराजिता माई
जिसकी तपस्या महाफलदाई

चेतना बुद्धि श्रधा माँ है
दया शान्ति लज्जा माँ है
साधन सिद्धि वर है माँ का
जहा बुद्धि वो घर है माँ का

सप्तशती में दुर्गा दर्शन
शतचंडी है उसका चिन्तन
पूजा ये सर्वार्थ- साधक
भवसिंधु की प्यारी नावक

देवी-कुण्ड के अमृत से, तन मन निर्मल होय
पावन ममता के रस में, पाप जन्म के धोय

अष्टभुजा जग मंगल करणी
योगमाया माँ धीरज धरनी
जब कोई इसकी स्तुति करता
कागा मन हंस बनता

महिष-मर्दिनी नाम है न्यारा
देवों को जिसने दिया सहारा
रक्तबीज को मारा जिसने
मधु-कैटभ को मारा जिसने

धूम्रलोचन का वध कीन्हा
अभय-दान देवन को दीन्हा
जग में कहाँ विश्राम इसको
बार-बार प्रणाम है इसको


यज्ञ हवन कर जो बुलाते
भ्रामरी माँ की शरण में जाते
उनकी रखती दुर्गा लाज
बन जाते है बिगड़े काज

सुख पदार्थ उनको है मिलते
पांचो चोर ना उनको छलते
शुद्ध भाव से गुण गाते
चक्रवर्ती है वो कहलाते

दुर्गा है हर जन की माता
कर्महीन निर्धन की माता
इसके लिए कोई गैर नहीं है
इसे किसी से बैर नहीं है

रक्षक सदा भलाई की मैया
शत्रु सिर्फ बुराई की मैया
अनहद ये स्नेहा का सागर
कोई नहीं है इसके बराबर

दधिमति भी नाम है इसका
पतित-पावन धाम है इसका
तारा माँ जब कला दिखाती
भाग्य के तारे है चमकाती


दुर्गा अमृतवाणी (Durga Amritwani PDF)2

दुर्गा अमृतवाणी क्या है?

दुर्गा अमृतवाणी एक पवित्र धार्मिक पाठ है जो देवी दुर्गा की महिमा और उनकी दिव्य शक्तियों का वर्णन करता है। इसे श्रद्धा और भक्ति के साथ पढ़ने से आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं।

दुर्गा अम्मा को कैसे खुश करें?

दुर्गा अम्मा को खुश करने के लिए नियमित रूप से उनकी पूजा, दुर्गा चालीसा और दुर्गा अमृतवाणी का पाठ करें। साथ ही, अपने कार्यों में सच्चाई, सदाचार और दूसरों की सहायता करें।

मां दुर्गा किस चीज से खुश होती है?

मां दुर्गा सच्ची भक्ति, श्रद्धा, और निस्वार्थ सेवा से खुश होती हैं। वे अपने भक्तों के सच्चे प्रेम और समर्पण को देख कर प्रसन्न होती हैं। नवरात्रि के दौरान उपवास और दुर्गा सप्तशती का पाठ भी उन्हें प्रसन्न करता है।

दुर्गा मां कैसी दिखती है?

दुर्गा मां का रूप अद्वितीय और दिव्य है। वे लाल या पीले वस्त्र धारण करती हैं, उनके कई हाथ होते हैं जिनमें वे शस्त्र और विभिन्न प्रतीक रखती हैं। उनके वाहन सिंह है, जो उनकी शक्ति और साहस का प्रतीक है। उनके चेहरे पर दिव्यता और करुणा की झलक होती है।

दुर्गा मां की प्रतिदिन कैसे पूजा करें?

प्रतिदिन मां दुर्गा की पूजा करने के लिए निम्नलिखित विधि अपनाएं:

– सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
– एक पवित्र स्थान पर मां दुर्गा की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।
– धूप, दीप, और अगरबत्ती जलाएं।
– मां दुर्गा को फूल, अक्षत (चावल), और प्रसाद चढ़ाएं।
दुर्गा चालीसा, दुर्गा अमृतवाणी या दुर्गा सप्तशती का पाठ करें।
– अंत में मां दुर्गा की आरती करें और प्रणाम करें।

दुर्गा के 32 नामों का जाप करने का क्या लाभ है?

दुर्गा के 32 नामों का जाप करने से कई आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं। यह जाप भक्तों को भय, रोग, शोक और दरिद्रता से मुक्त करता है। इससे जीवन में सुख, शांति, और समृद्धि का संचार होता है। साथ ही, यह जाप मां दुर्गा की कृपा प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।

ब्रह्मा चालीसा PDF – Brahma Chalisa PDF 2024-25

ब्रह्म चालीसा (Brahma Chalisa PDF) हिंदू धर्म के अनमोल रत्नों में से एक है, जो ब्रह्मा जी की महिमा और उनकी कृपा का गुणगान करता है। यह चालीसा श्रद्धालुओं को ब्रह्मा जी की आराधना करने के लिए प्रेरित करती है और उन्हें जीवन में धर्म, ज्ञान और सृजन के महत्व को समझने में मदद करती है। ब्रह्मा जी को सृष्टि के सृजनकर्ता के रूप में पूजा जाता है, और उनकी आराधना से व्यक्ति को सृजनात्मक ऊर्जा और मानसिक शांति प्राप्त होती है। बृहस्पति देव चालीसा

ब्रह्मा चालीसा को नियमित रूप से पढ़ने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं। यह चालीसा उन लोगों के लिए विशेष रूप से लाभकारी मानी जाती है जो ज्ञान प्राप्ति के लिए प्रयासरत हैं। ब्रह्मा जी की कृपा से व्यक्ति का मन शांत होता है और उसे संसार के झूठे मोह-माया से मुक्ति मिलती है।

ब्रह्मा चालीसा के पाठ से व्यक्ति को चारों दिशाओं से आने वाली नकारात्मक शक्तियों से बचाव मिलता है और वह अपने जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है। इसके साथ ही, यह चालीसा हमें हमारे कर्तव्यों का पालन करने और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।

ब्रह्मा चालीसा का पाठ व्यक्ति के मन, बुद्धि और आत्मा को शुद्ध करता है। इसके माध्यम से हम ब्रह्मा जी की कृपा से अपने जीवन में आने वाली कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति प्राप्त कर सकते हैं। यह चालीसा हमारे भीतर की आत्मिक शक्ति को जागृत करती है और हमें सत्य, ज्ञान और धर्म के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करती है।

ब्रह्मा चालीसा के पाठ का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह व्यक्ति को उसकी सृजनात्मक शक्तियों का एहसास कराती है। ब्रह्मा जी की आराधना से व्यक्ति को सृजन की अद्भुत शक्ति प्राप्त होती है, जो उसे न केवल भौतिक जगत में बल्कि आध्यात्मिक जगत में भी उन्नति की ओर अग्रसर करती है।

ब्रह्मा चालीसा का पाठ करने वाले श्रद्धालुओं को ब्रह्मा जी की विशेष कृपा प्राप्त होती है, जिससे उनके जीवन में समृद्धि, शांति और सफलता का आगमन होता है। यह चालीसा व्यक्ति के जीवन को सृजनात्मक दृष्टि से समृद्ध करती है और उसे संसार के विभिन्न पहलुओं को समझने और उन्हें सृजनात्मक रूप से आगे बढ़ाने की शक्ति प्रदान करती है।

ब्रह्मा चालीसा के माध्यम से ब्रह्मा जी की आराधना करने से व्यक्ति को उसके जीवन में आने वाली सभी प्रकार की बाधाओं से मुक्ति मिलती है। यह चालीसा हमें ब्रह्मा जी की महिमा का स्मरण कराती है और हमें यह सिखाती है कि सृष्टि के सृजन के पीछे किस प्रकार की दिव्य शक्तियां कार्य करती हैं।



  • हिंदी / संस्कृत
  • English

|| ब्रह्म चालीसा ||
Brahma Chalisa – Lyrics in Hindi

॥ दोहा ॥

जय ब्रह्मा जय स्वयम्भू,चतुरानन सुखमूल।
करहु कृपा निज दास पै,रहहु सदा अनुकूल॥

तुम सृजक ब्रह्माण्ड के,अज विधि घाता नाम।
विश्वविधाता कीजिये,जन पै कृपा ललाम॥

॥ चौपाई ॥

जय जय कमलासान जगमूला।
रहहु सदा जनपै अनुकूला॥

रुप चतुर्भुज परम सुहावन।
तुम्हें अहैं चतुर्दिक आनन॥

रक्तवर्ण तव सुभग शरीरा।
मस्तक जटाजुट गंभीरा॥

ताके ऊपर मुकुट बिराजै।
दाढ़ी श्वेत महाछवि छाजै॥

श्वेतवस्त्र धारे तुम सुन्दर।
है यज्ञोपवीत अति मनहर॥

कानन कुण्डल सुभग बिराजहिं।
गल मोतिन की माला राजहिं॥

चारिहु वेद तुम्हीं प्रगटाये।
दिव्य ज्ञान त्रिभुवनहिं सिखाये॥

ब्रह्मलोक शुभ धाम तुम्हारा।
अखिल भुवन महँ यश बिस्तारा॥

अर्द्धांगिनि तव है सावित्री।
अपर नाम हिये गायत्री॥

सरस्वती तब सुता मनोहर।
वीणा वादिनि सब विधि मुन्दर॥

कमलासन पर रहे बिराजे।
तुम हरिभक्ति साज सब साजे॥

क्षीर सिन्धु सोवत सुरभूपा।
नाभि कमल भो प्रगट अनूपा॥

तेहि पर तुम आसीन कृपाला।
सदा करहु सन्तन प्रतिपाला॥

एक बार की कथा प्रचारी।
तुम कहँ मोह भयेउ मन भारी॥

कमलासन लखि कीन्ह बिचारा।
और न कोउ अहै संसारा॥

तब तुम कमलनाल गहि लीन्हा।
अन्त बिलोकन कर प्रण कीन्हा॥

कोटिक वर्ष गये यहि भांती।
भ्रमत भ्रमत बीते दिन राती॥

पै तुम ताकर अन्त न पाये।
ह्वै निराश अतिशय दुःखियाये॥

पुनि बिचार मन महँ यह कीन्हा।
महापघ यह अति प्राचीन॥

याको जन्म भयो को कारन।
तबहीं मोहि करयो यह धारन॥

अखिल भुवन महँ कहँ कोई नाहीं।
सब कुछ अहै निहित मो माहीं॥

यह निश्चय करि गरब बढ़ायो।
निज कहँ ब्रह्म मानि सुखपाये॥

गगन गिरा तब भई गंभीरा।
ब्रह्मा वचन सुनहु धरि धीरा॥

सकल सृष्टि कर स्वामी जोई।
ब्रह्म अनादि अलख है सोई॥

निज इच्छा इन सब निरमाये।
ब्रह्मा विष्णु महेश बनाये॥

सृष्टि लागि प्रगटे त्रयदेवा।
सब जग इनकी करिहै सेवा॥

महापघ जो तुम्हरो आसन।
ता पै अहै विष्णु को शासन॥

विष्णु नाभितें प्रगट्यो आई।
तुम कहँ सत्य दीन्ह समुझाई॥

भैतहू जाई विष्णु हितमानी।
यह कहि बन्द भई नभवानी॥

ताहि श्रवण कहि अचरज माना।
पुनि चतुरानन कीन्ह पयाना॥

कमल नाल धरि नीचे आवा।
तहां विष्णु के दर्शन पावा॥

शयन करत देखे सुरभूपा।
श्यायमवर्ण तनु परम अनूपा॥

सोहत चतुर्भुजा अतिसुन्दर।
क्रीटमुकट राजत मस्तक पर॥

गल बैजन्ती माल बिराजै।
कोटि सूर्य की शोभा लाजै॥

शंख चक्र अरु गदा मनोहर।
शेष नाग शय्या अति मनहर॥

दिव्यरुप लखि कीन्ह प्रणामू।
हर्षित भे श्रीपति सुख धामू॥

बहु विधि विनय कीन्ह चतुरानन।
तब लक्ष्मी पति कहेउ मुदित मन॥

ब्रह्मा दूरि करहु अभिमाना।
ब्रह्मारुप हम दोउ समाना॥

तीजे श्री शिवशंकर आहीं।
ब्रह्मरुप सब त्रिभुवन मांही॥

तुम सों होई सृष्टि विस्तारा।
हम पालन करिहैं संसारा॥

शिव संहार करहिं सब केरा।
हम तीनहुं कहँ काज धनेरा॥

अगुणरुप श्री ब्रह्मा बखानहु।
निराकार तिनकहँ तुम जानहु॥

हम साकार रुप त्रयदेवा।
करिहैं सदा ब्रह्म की सेवा॥

यह सुनि ब्रह्मा परम सिहाये।
परब्रह्म के यश अति गाये॥

सो सब विदित वेद के नामा।
मुक्ति रुप सो परम ललामा॥

यहि विधि प्रभु भो जनम तुम्हारा।
पुनि तुम प्रगट कीन्ह संसारा॥

नाम पितामह सुन्दर पायेउ।
जड़ चेतन सब कहँ निरमायेउ॥

लीन्ह अनेक बार अवतारा।
सुन्दर सुयश जगत विस्तारा॥

देवदनुज सब तुम कहँ ध्यावहिं।
मनवांछित तुम सन सब पावहिं॥

जो कोउ ध्यान धरै नर नारी।
ताकी आस पुजावहु सारी॥

पुष्कर तीर्थ परम सुखदाई।
तहँ तुम बसहु सदा सुरराई॥

कुण्ड नहाइ करहि जो पूजन।
ता कर दूर होई सब दूषण॥

Brahma Chalisa – Lyrics in English

॥ Doha॥

Jai Brahma Jai Svayambhu,
Chaturanan Sukhamul |
Karahu Krpa Nij Das Pai,
Rahahu Sada Anukul |

Tum Srjak Brahmand Ke,
Aj Vidhi Ghata Nam |
Vishvavidhata Kijiye,
Jan Pai Krpa Lalam |

॥ Chaupai ॥

Jai Jai Kamalasan Jagamula,
Rahahu Sada Janapai Anukula |
Rup Chaturbhuj Param Suhavan,
Tumhen Ahain Chaturdik Anan |

Raktavarn Tav Subhag Sharira,
Mastak Jatajut Gambhira |
Take Upar Mukut Virajai,
Dadhi Shvet Mahachhavi Chhajai |

Shvetavastr Dhare Tum Sundar,
Hai Yagyopavit Ati Manahar |
Kanan Kundal Subhag Virajahin,
Gal Motin Ki Mala Rajahin |

Charihu Ved Tumhin Pragataye,
Divy Gyan Tribhuvanahin Sikhaye |
Brahmalok Shubh Dham Tumhara,
Akhil Bhuvan Mahan Yash Vistara |

Arddhagini Tav Hai Savitri,
Apar Nam Hiye Gayatri |
Sarasvati Tab Suta Manohar,
Vina Vadini Sab Vidhi Mundar |

Kamalasan Par Rahe Viraje,
Tum Haribhakti Saj Sab Saje |
Kshir Sindhu Sovat Surabhupa,
Nabhi Kamal Bho Pragat Anupa |

Tehi Par Tum Asin Krpala,
Sada Karahu Santan Pratipala |
Ek Bar Ki Katha Prachari,
Tum Kahan Moh Bhayeu Man Bhari |

Kamalasan Lakhi Kinh Bichara,
Aur Na Kou Ahai Sansara |
Tab Tum Kamalanal Gahi Linha,
Ant Vilokan Kar Pran Kinha |

Kotik Varsh Gaye Yahi Bhanti,
Bhramat Bhramat Bite Din Rati |
Pai Tum Takar Ant Na Paye,
Hvai Nirash Atishay Duhkhiyaye |

Puni Bichar Man Mahan Yah Kinha Mahapagh Yah Ati Prachin |
Yako Janm Bhayo Ko Karan,
Tabahin Mohi Karayo Yah Dharan |

Akhil Bhuvan Mahan Kahan Koi Nahin,
Sab Kuchh Ahai Nihit Mo Mahin |
Yah Nishchay Kari Garab Badhayo,
Nij Kahan Brahm Mani Sukhapaye |

Gagan Gira Tab Bhi Gambhira,
Brahma Vachan Sunahu Dhari Dhira |
Sakal Srshti Kar Svami Joi,
Brahm Anadi Alakh Hai Soi |

Nij Ichchha In Sab Niramaye,
Brahma Vishnu Mahesh Banaye |
Srshti Lagi Pragate Trayadeva,
Sab Jag Inaki Karihai Seva |

Mahapagh Jo Tumharo Asan,
Ta Pai Ahai Vishnu Ko Shasan |
Vishnu Nabhiten Pragatyo Ai,
Tum Kahan Saty Dinh Samujhai |

Bhaitahu Jai Vishnu Hitamani,
Yah Kahi Band Bhi Nabhavani |
Tahi Shravan Kahi Acharaj Mana,
Puni Chaturanan Kinh Payana |
Kamal Nal Dhari Niche Ava,
Tahan Vishnu Ke Darshan Pava |
Shayan Karat Dekhe Surabhupa,
Shyayamavarn Tanu Param Anupa |

Sohat Chaturbhuja Atisundar,
Kritamukat Rajat Mastak Par |
Gal Baijanti Mal Virajai,
Koti Sury Ki Shobha Lajai |

Shankh Chakr Aru Gada Manohar,
Pagh Nag Shayya Ati Manahar |
Divyarup Lakhi Kinh Pranamu,
Harshit Bhe Shripati Sukh Dhamu |

Bahu Vidhi Vinay Kinh Chaturanan,
Tab Lakshmi Pati Kaheu Mudit Man |
Brahma Duri Karahu Abhimana,
Brahmarup Ham Dou Samana |

Tije Shri Shivashankar Ahin,
Brahmarup Sab Tribhuvan Manhi |
Tum Son Hoi Srshti Vistara,
Ham Palan Karihain Sansara |

Shiv Sanhar Karahin Sab Kera,
Ham Tinahun Kahan Kaj Ghanera |
Agunarup Shri Brahma Bakhanahu,
Nirakar Tinakahan Tum Janahu |

Ham Sakar Rup Trayadeva,
Karihain Sada Brahm Ki Seva |
Yah Suni Brahma Param Sihaye,
Parabrahm Ke Yash Ati Gaye |

So Sab Vidit Ved Ke Nama,
Mukti Rup So Param Lalama |
Yahi Vidhi Prabhu Bho Janam Tumhara,
Puni Tum Pragat Kinh Sansara |

Nam Pitamah Sundar Payeu,
Jad Chetan Sab Kahan Niramayeu |
Linh Anek Bar Avatara,
Sundar Suyash Jagat Vistara |

Devadanuj Sab Tum Kahan Dhyavahin,
Manavanchhit Tum San Sab Pavahin |
Jo Kou Dhyan Dharai Nar Nari,
Taki As Pujavahu Sari |

Pushkar Tirth Param Sukhadai,
Tahan Tum Basahu Sada Surarai |
Kund Nahai Karahi Jo Pujan,
Ta Kar Dur Hoi Sab Dushan |



श्री ब्रह्मा चालीसा के लाभ

ब्रह्म चालीसा हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण धार्मिक पाठ है, जो ब्रह्मा जी की आराधना के लिए समर्पित है। इस चालीसा का नियमित रूप से पाठ करने से अनेक आध्यात्मिक, मानसिक और भौतिक लाभ मिलते हैं। इस लेख में, हम ब्रह्म चालीसा के 2500 शब्दों में विस्तृत रूप से उन लाभों की चर्चा करेंगे, जो इसे पढ़ने और अनुसरण करने से प्राप्त होते हैं।

आध्यात्मिक उन्नति और आत्मज्ञान

ब्रह्म चालीसा का नियमित पाठ व्यक्ति के आत्मा को शुद्ध करता है और उसे आध्यात्मिक उन्नति की ओर प्रेरित करता है। ब्रह्मा जी सृष्टि के सृजनकर्ता हैं, और उनकी आराधना से व्यक्ति को आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है। यह चालीसा व्यक्ति को उसके भीतर छिपे हुए ज्ञान और शक्तियों का एहसास कराती है, जो उसे संसार के मोह-माया से मुक्त कर आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने में मदद करती है।

मानसिक शांति और स्थिरता

ब्रह्म चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के मन को शांति मिलती है। यह पाठ मानसिक तनाव, चिंता और अवसाद को दूर करता है और व्यक्ति के मन को स्थिरता प्रदान करता है। मानसिक शांति के साथ-साथ, यह चालीसा व्यक्ति को उसकी समस्याओं का समाधान ढूंढने में सहायता करती है, जिससे वह अधिक प्रभावी ढंग से जीवन की चुनौतियों का सामना कर सकता है।

सृजनात्मकता और नवाचार

ब्रह्मा जी को सृजन के देवता के रूप में पूजा जाता है। ब्रह्म चालीसा का पाठ व्यक्ति की सृजनात्मकता को बढ़ावा देता है और उसे नवाचार की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। चाहे वह कला, साहित्य, विज्ञान या किसी अन्य क्षेत्र में हो, ब्रह्मा जी की कृपा से व्यक्ति अपने कार्यक्षेत्र में नई सोच और रचनात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्कृष्टता प्राप्त कर सकता है।

धार्मिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शन

ब्रह्म चालीसा व्यक्ति को धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। यह पाठ व्यक्ति को उसके कर्तव्यों का पालन करने और धर्म के सिद्धांतों के अनुसार जीवन जीने की शिक्षा देता है। ब्रह्मा जी की आराधना से व्यक्ति को सच्चाई, न्याय और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है, जिससे वह समाज में एक आदर्श नागरिक के रूप में प्रतिष्ठित हो सकता है।

जीवन में सफलता और समृद्धि

ब्रह्म चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में सफलता और समृद्धि का आगमन होता है। ब्रह्मा जी की कृपा से व्यक्ति के जीवन में आने वाली सभी प्रकार की बाधाएं दूर हो जाती हैं, और वह अपने जीवन के लक्ष्यों को आसानी से प्राप्त कर सकता है। यह चालीसा व्यक्ति के भाग्य को संवारती है और उसे हर क्षेत्र में सफलता दिलाने में सहायक सिद्ध होती है।

स्वास्थ्य और कल्याण

ब्रह्म चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के स्वास्थ्य में सुधार होता है। यह चालीसा शरीर और मन के बीच संतुलन स्थापित करती है, जिससे व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहता है। इसके साथ ही, यह पाठ व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है और उसे विभिन्न बीमारियों से बचाता है।

समय प्रबंधन और अनुशासन

ब्रह्म चालीसा का पाठ व्यक्ति को समय प्रबंधन और अनुशासन की शिक्षा देता है। यह पाठ व्यक्ति को उसके कार्यों में अनुशासन और समय की महत्ता का एहसास कराता है। ब्रह्मा जी की कृपा से व्यक्ति अपने कार्यों को समय पर पूरा कर पाता है और जीवन में अनुशासन बनाए रखने में सक्षम होता है।

सकारात्मक सोच और आत्मविश्वास

ब्रह्म चालीसा का नियमित पाठ व्यक्ति के भीतर सकारात्मक सोच का विकास करता है। यह पाठ व्यक्ति को आत्मविश्वास से भर देता है और उसे जीवन के हर क्षेत्र में चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रेरित करता है। सकारात्मक सोच और आत्मविश्वास के साथ, व्यक्ति अपने जीवन में सफलता प्राप्त करता है और समाज में सम्मानित स्थान हासिल करता है।

परिवार और सामाजिक संबंधों में सुधार

ब्रह्म चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के परिवार और सामाजिक संबंधों में सुधार होता है। यह पाठ व्यक्ति को उसके परिवार और समाज के प्रति उसके कर्तव्यों का एहसास कराता है। ब्रह्मा जी की कृपा से व्यक्ति के रिश्तों में प्रेम, सौहार्द और समझदारी बढ़ती है, जिससे उसके पारिवारिक और सामाजिक जीवन में शांति और समृद्धि का वातावरण बनता है।

धार्मिक उत्सवों और संस्कारों में महत्त्व

ब्रह्म चालीसा का पाठ धार्मिक उत्सवों और संस्कारों में विशेष महत्त्व रखता है। इसका पाठ विवाह, गृहप्रवेश, नामकरण, और अन्य धार्मिक समारोहों में किया जाता है। यह पाठ धार्मिक समारोहों को और भी पवित्र और मंगलमय बनाता है, जिससे सभी उपस्थित लोगों को ब्रह्मा जी की कृपा प्राप्त होती है।

शिक्षा और ज्ञान का विकास

ब्रह्म चालीसा का पाठ शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र में अत्यधिक लाभकारी है। यह पाठ छात्रों और विद्वानों को ज्ञान प्राप्ति के मार्ग पर प्रेरित करता है। ब्रह्मा जी की आराधना से व्यक्ति की बुद्धि में वृद्धि होती है और वह अपने अध्ययन में सफलता प्राप्त करता है। यह चालीसा छात्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है, जो उच्च शिक्षा और ज्ञान की खोज में हैं।

कर्म और धर्म का संतुलन

ब्रह्म चालीसा व्यक्ति को कर्म और धर्म के बीच संतुलन बनाए रखने की शिक्षा देती है। यह पाठ व्यक्ति को उसके कर्तव्यों का पालन करते हुए धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। ब्रह्मा जी की कृपा से व्यक्ति अपने कर्मों में सफलता प्राप्त करता है और धर्म के सिद्धांतों के अनुसार जीवन जीता है, जिससे उसका जीवन संतुलित और सुखमय बनता है।

मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति

ब्रह्म चालीसा का पाठ व्यक्ति को संसार के बंधनों से मुक्त कर मोक्ष की प्राप्ति की ओर अग्रसर करता है। ब्रह्मा जी की आराधना से व्यक्ति के जीवन में धर्म, कर्म और ज्ञान का विकास होता है, जिससे वह संसार के मोह-माया से मुक्त होकर मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है।

आध्यात्मिक समुदाय का हिस्सा बनना

ब्रह्म चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति एक आध्यात्मिक समुदाय का हिस्सा बनता है। यह पाठ व्यक्ति को अन्य श्रद्धालुओं के साथ जुड़ने का अवसर प्रदान करता है, जिससे वह अपने अनुभवों को साझा कर सकता है और एक सामूहिक आराधना में भाग ले सकता है। इस प्रकार, ब्रह्म चालीसा का पाठ व्यक्ति को एक आध्यात्मिक समुदाय का हिस्सा बनने का अवसर देता है, जो उसे सामाजिक और आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनाता है।

दैनिक जीवन में सादगी और संयम

ब्रह्म चालीसा व्यक्ति को सादगी और संयम का महत्व समझाती है। यह पाठ व्यक्ति को उसके जीवन में अनावश्यक भौतिक वस्तुओं और इच्छाओं से दूर रहकर एक सादा और संयमित जीवन जीने की प्रेरणा देता है। ब्रह्मा जी की कृपा से व्यक्ति के जीवन में अनावश्यक उलझनों से मुक्ति मिलती है और वह एक शांतिपूर्ण जीवन जीता है।

धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण

ब्रह्म चालीसा का पाठ धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण करता है। यह पाठ पीढ़ी दर पीढ़ी संजोया गया है, और इसका नियमित पाठ धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखने में मदद करता है। यह चालीसा हमारे धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों का प्रतीक है, और इसका संरक्षण हमारे धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

अध्यात्मिक साधना का आधार

ब्रह्म चालीसा व्यक्ति की आध्यात्मिक साधना का आधार है। यह पाठ व्यक्ति को उसकी आत्मा के साथ जुड़ने और उसकी आंतरिक शक्तियों का एहसास करने में मदद करता है। ब्रह्मा जी की आराधना से व्यक्ति को उसकी आत्मिक साधना में सफलता मिलती है, जिससे वह आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होता है।

समाज में धार्मिक चेतना का प्रसार

ब्रह्म चालीसा का पाठ समाज में धार्मिक चेतना का प्रसार करता है। इसका पाठ व्यक्ति को धर्म के प्रति जागरूक करता है और उसे धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है। ब्रह्मा जी की आराधना से व्यक्ति में धार्मिक चेतना जागृत होती है, जिससे वह समाज में धर्म और नैतिकता का प्रचार करता है।

व्यक्तिगत और सामाजिक समस्याओं का समाधान

ब्रह्म चालीसा का पाठ व्यक्तिगत और सामाजिक समस्याओं का समाधान प्रदान करता है। यह पाठ व्यक्ति को उसकी समस्याओं का समाधान ढूंढने में मदद करता है और उसे सामाजिक समस्याओं के प्रति जागरूक करता है। ब्रह्मा जी की कृपा से व्यक्ति अपनी समस्याओं का समाधान पाता है और समाज में एक सकारात्मक बदलाव लाने में सक्षम होता है।

धार्मिक शिक्षा का प्रसार

ब्रह्म चालीसा का पाठ धार्मिक शिक्षा के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह पाठ व्यक्ति को धार्मिक शिक्षाओं का ज्ञान प्रदान करता है और उसे धर्म के सिद्धांतों के अनुसार जीवन जीने की प्रेरणा देता है। ब्रह्मा जी की आराधना से व्यक्ति धार्मिक शिक्षा प्राप्त करता है और उसे अपने जीवन में लागू करता है, जिससे उसका जीवन धर्ममय बनता है।

समाज में नैतिक मूल्यों का संरक्षण

ब्रह्म चालीसा का पाठ समाज में नैतिक मूल्यों का संरक्षण करता है। इसका पाठ व्यक्ति को सत्य, अहिंसा, प्रेम और न्याय के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। ब्रह्मा जी की आराधना से व्यक्ति के जीवन में नैतिक मूल्यों का विकास होता है, जिससे वह समाज में नैतिकता और धर्म का पालन करता है।

ईश्वर के प्रति समर्पण और भक्ति

ब्रह्म चालीसा व्यक्ति को ईश्वर के प्रति समर्पण और भक्ति की शिक्षा देती है। इसका पाठ व्यक्ति को ब्रह्मा जी की आराधना के माध्यम से ईश्वर के प्रति अपनी भक्ति और समर्पण को प्रकट करने का अवसर देता है। ब्रह्मा जी की कृपा से व्यक्ति का जीवन भक्ति और समर्पण के मार्ग पर अग्रसर होता है, जिससे वह ईश्वर की कृपा प्राप्त करता है।

जीवन में स्थायित्व और स्थिरता

ब्रह्म चालीसा का पाठ व्यक्ति के जीवन में स्थायित्व और स्थिरता लाता है। इसका नियमित पाठ व्यक्ति को जीवन के उतार-चढ़ावों के बीच स्थिरता बनाए रखने में मदद करता है। ब्रह्मा जी की आराधना से व्यक्ति के जीवन में संतुलन और स्थायित्व आता है, जिससे वह जीवन की चुनौतियों का सामना अधिक धैर्य और स्थिरता के साथ कर सकता है।

धार्मिक साधना का प्रोत्साहन

ब्रह्म चालीसा का पाठ व्यक्ति को धार्मिक साधना की ओर प्रोत्साहित करता है। इसका पाठ व्यक्ति को धार्मिक साधना में सफलता प्राप्त करने की दिशा में प्रेरित करता है। ब्रह्मा जी की आराधना से व्यक्ति को उसकी धार्मिक साधना में सफलता मिलती है, जिससे वह आध्यात्मिक रूप से उन्नत होता है।

संसार के बंधनों से मुक्ति

ब्रह्म चालीसा का पाठ व्यक्ति को संसार के बंधनों से मुक्त करता है। यह पाठ व्यक्ति को संसार के मोह-माया से मुक्त होकर ईश्वर की आराधना की ओर प्रेरित करता है। ब्रह्मा जी की कृपा से व्यक्ति को संसार के बंधनों से मुक्ति मिलती है, जिससे वह मोक्ष की प्राप्ति की दिशा में अग्रसर होता है।

ब्रह्म चालीसा एक महत्वपूर्ण धार्मिक पाठ है, जो व्यक्ति के जीवन में आध्यात्मिक, मानसिक, और भौतिक लाभ लाने में सक्षम है। इसका नियमित पाठ करने से व्यक्ति को न केवल धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है, बल्कि वह जीवन में सफलता, शांति, और समृद्धि प्राप्त कर सकता है। ब्रह्मा जी की आराधना से व्यक्ति के जीवन में स्थायित्व, स्थिरता, और सृजनात्मकता का संचार होता है, जो उसे जीवन के हर क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त करने में सहायक सिद्ध होता है।


ब्रह्मा जी का मूल मंत्र क्या है?

ब्रह्मा जी का मूल मंत्र “ॐ ब्रह्मणे नमः” है। इस मंत्र का जाप करने से ब्रह्मा जी की कृपा प्राप्त होती है और व्यक्ति के जीवन में सृजनात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए क्या करें?

ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए नियमित रूप से उनके मंत्रों का जाप करें, ब्रह्मा चालीसा का पाठ करें, और सच्चे मन से उनकी पूजा करें। इसके अलावा, सृजनात्मक कार्यों में संलग्न रहें और ज्ञान प्राप्ति के लिए प्रयासरत रहें।

ब्रह्मा की पूजा कैसे करें?

ब्रह्मा जी की पूजा के लिए प्रातःकाल में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। उनके चित्र या प्रतिमा के सामने दीपक जलाएं और पुष्प अर्पित करें। “ॐ ब्रह्मणे नमः” मंत्र का जाप करें और ब्रह्मा चालीसा का पाठ करें। पूजा के अंत में ब्रह्मा जी से ज्ञान और सृजनात्मकता की प्रार्थना करें।

ब्रह्मा का चिन्ह क्या है?

ब्रह्मा जी का चिन्ह “कमल” है। कमल का फूल सृजन और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है, और यह ब्रह्मा जी के साथ जुड़ा हुआ है क्योंकि वह सृजन के देवता हैं।

पूर्ण ब्रह्म का मंत्र क्या है?

पूर्ण ब्रह्म का मंत्र “ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥” है। यह मंत्र ब्रह्म के अखंड, अपरिवर्तनीय और पूर्ण स्वभाव का बोध कराता है।

ब्रह्म मुहूर्त में किस मंत्र का जाप करना है?

ब्रह्म मुहूर्त में “ॐ ब्रह्मणे नमः” मंत्र का जाप करना अत्यंत लाभकारी माना जाता है। इस समय किए गए मंत्र जाप से व्यक्ति को विशेष आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं और उसके जीवन में शांति और सृजनात्मकता का संचार होता है।

कुबेर चालीसा PDF – Kuber Chalisa PDF 2024-25

कुबेर चालीसा (Kuber Chalisa PDF) हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथ है, जिसे भगवान कुबेर की स्तुति और पूजा के लिए समर्पित किया गया है। भगवान कुबेर को धन, ऐश्वर्य और वैभव के देवता के रूप में पूजा जाता है, और भारतीय पौराणिक कथाओं में उनका विशेष स्थान है। वे सिर्फ धन के देवता ही नहीं, बल्कि समृद्धि और सुख-शांति के प्रतीक भी माने जाते हैं। कुबेर चालीसा के पाठ के साथ लक्ष्मी जी की आरती करने से माता लक्ष्मी भी प्रसन्न होती हैं, जिससे घर में धन और समृद्धि का वास होता है।

कुबेर चालीसा में कुल 40 श्लोक हैं, जो भगवान कुबेर की महिमा का वर्णन करते हैं और उनका आशीर्वाद पाने के लिए एक शक्तिशाली माध्यम माने जाते हैं। नियमित रूप से इसका पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में धन, समृद्धि और खुशहाली आती है, साथ ही आर्थिक अर्थशास्त्रियों के साथ भी।

विशेष रूप से जब किसी व्यक्तिगत आर्थिक ढांचे का सामना किया जा रहा हो या वित्तीय स्थिरता की कामना की जा रही हो, तब कुबेर चालीसा का महत्व और भी बढ़ जाता है। धार्मिक दृष्टि से देखा जाए तो इसका पाठ मानसिक शांति, संतुलन और आध्यात्मिक विकास में भी सहायक होता है।


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  • English

|| कुबेर चालीसा PDF ||

– Kuber Chalisa in Hindi PDF –

॥ दोहा ॥
जैसे अटल हिमालय,
और जैसे अडिग सुमेर ।
ऐसे ही स्वर्ग द्वार पे,
अविचल खडे कुबेर ॥

विघ्न हरण मंगल करण,
सुनो शरणागत की टेर ।
भक्त हेतु वितरण करो,
धन माया के ढेर ॥

॥ चौपाई ॥
जै जै जै श्री कुबेर भण्डारी ।
धन माया के तुम अधिकारी ॥

तप तेज पुंज निर्भय भय हारी ।
पवन वेग सम सम तनु बलधारी ॥

स्वर्ग द्वार की करें पहरे दारी ।
सेवक इंद्र देव के आज्ञाकारी ॥

यक्ष यक्षणी की है सेना भारी ।
सेनापति बने युद्ध में धनुधारी ॥4॥

महा योद्धा बन शस्त्र धारैं ।
युद्ध करैं शत्रु को मारैं ॥

सदा विजयी कभी ना हारैं ।
भगत जनों के संकट टारैं ॥

प्रपितामह हैं स्वयं विधाता ।
पुलिस्ता वंश के जन्म विख्याता ॥

विश्रवा पिता इडविडा जी माता ।
विभीषण भगत आपके भ्राता ॥8॥

शिव चरणों में जब ध्यान लगाया ।
घोर तपस्या करी तन को सुखाया ॥

शिव वरदान मिले देवत्य पाया ।
अमृत पान करी अमर हुई काया ॥

धर्म ध्वजा सदा लिए हाथ में ।
देवी देवता सब फिरैं साथ में ॥

पीताम्बर वस्त्र पहने गात में ।
बल शक्ति पूरी यक्ष जात में ॥12॥

स्वर्ण सिंहासन आप विराजैं ।
त्रिशूल गदा हाथ में साजैं ॥

शंख मृदंग नगारे बाजैं ।
गंधर्व राग मधुर स्वर गाजैं ॥

चौंसठ योगनी मंगल गावैं ।
ऋद्धि-सिद्धि नित भोग लगावैं ॥

दास दासनी सिर छत्र फिरावैं ।
यक्ष यक्षणी मिल चंवर ढूलावैं ॥16॥

ऋषियों में जैसे परशुराम बली हैं ।
देवन्ह में जैसे हनुमान बली हैं ॥

पुरुषों में जैसे भीम बली हैं ।
यक्षों में ऐसे ही कुबेर बली हैं ॥

भगतों में जैसे प्रहलाद बड़े हैं ।
पक्षियों में जैसे गरुड़ बड़े हैं ॥

नागों में जैसे शेष बड़े हैं ।
वैसे ही भगत कुबेर बड़े हैं ॥20॥

कांधे धनुष हाथ में भाला ।
गले फूलों की पहनी माला ॥

स्वर्ण मुकुट अरु देह विशाला ।
दूर-दूर तक होए उजाला ॥

कुबेर देव को जो मन में धारे ।
सदा विजय हो कभी न हारे ॥

बिगड़े काम बन जाएं सारे ।
अन्न धन के रहें भरे भण्डारे ॥24॥

कुबेर गरीब को आप उभारैं ।
कुबेर कर्ज को शीघ्र उतारैं ॥

कुबेर भगत के संकट टारैं ।
कुबेर शत्रु को क्षण में मारैं ॥

शीघ्र धनी जो होना चाहे ।
क्युं नहीं यक्ष कुबेर मनाएं ॥

यह पाठ जो पढ़े पढ़ाएं ।
दिन दुगना व्यापार बढ़ाएं ॥28॥

भूत प्रेत को कुबेर भगावैं ।
अड़े काम को कुबेर बनावैं ॥

रोग शोक को कुबेर नशावैं ।
कलंक कोढ़ को कुबेर हटावैं ॥

कुबेर चढ़े को और चढ़ादे ।
कुबेर गिरे को पुन: उठा दे ॥

कुबेर भाग्य को तुरंत जगा दे ।
कुबेर भूले को राह बता दे ॥32॥

प्यासे की प्यास कुबेर बुझा दे ।
भूखे की भूख कुबेर मिटा दे ॥

रोगी का रोग कुबेर घटा दे ।
दुखिया का दुख कुबेर छुटा दे ॥

बांझ की गोद कुबेर भरा दे ।
कारोबार को कुबेर बढ़ा दे ॥

कारागार से कुबेर छुड़ा दे ।
चोर ठगों से कुबेर बचा दे ॥36॥

कोर्ट केस में कुबेर जितावै ।
जो कुबेर को मन में ध्यावै ॥

चुनाव में जीत कुबेर करावैं ।
मंत्री पद पर कुबेर बिठावैं ॥

पाठ करे जो नित मन लाई ।
उसकी कला हो सदा सवाई ॥

जिसपे प्रसन्न कुबेर की माई ।
उसका जीवन चले सुखदाई ॥40॥

जो कुबेर का पाठ करावै ।
उसका बेड़ा पार लगावै ॥

उजड़े घर को पुन: बसावै ।
शत्रु को भी मित्र बनावै ॥

सहस्त्र पुस्तक जो दान कराई ।
सब सुख भोद पदार्थ पाई ॥

प्राण त्याग कर स्वर्ग में जाई ।
मानस परिवार कुबेर कीर्ति गाई ॥44॥

॥ दोहा ॥
शिव भक्तों में अग्रणी,
श्री यक्षराज कुबेर ।
हृदय में ज्ञान प्रकाश भर,
कर दो दूर अंधेर ॥

कर दो दूर अंधेर अब,
जरा करो ना देर ।
शरण पड़ा हूं आपकी,
दया की दृष्टि फेर ॥

नित्त नेम कर प्रातः ही,
पाठ करौं चालीसा ।
तुम मेरी मनोकामना,
पूर्ण करो जगदीश ॥

मगसर छठि हेमन्त ॠतु,
संवत चौसठ जान ।
अस्तुति चालीसा शिवहि,
पूर्ण कीन कल्याण ॥

|| Kuber Chalisa PDF ||

Shree Kuber Chalisa Lyrics In English

॥ Doha
Jaise Ki Himaalay,
Aur Jaise Adig Sumer ॥
Aise Hee Svarg Dvaar Pe,
Avichal Khade Kuber ॥

Vighn Haran Mangal Karana,
Suno Sharanaagat Kee Ter ॥
Bhakt Vikaas Vitaran Karo,
Dhan Maaya Ke Haay ॥

॥ Chaupai ॥
Jay Jay Jay Shree Kuber Bhandaaree ॥
Dhan Maaya Ke Tum Adhikaaree ॥

Tap Tej Punj Nirbhay Bhay Haaree ॥
Pavan Veg Sam Sam Tanu Baladhaaree ॥

Svarg Dvaar Kee Raksha Karo ॥
Sevak Indr Dev Ke Aagyaakaaree ॥

Yaksh Yakshanee Kee Hai Sena Bhaaree ॥
Senaapati Bane Yuddh Mein Dhanudhaaree ॥4

Maha Yoddha Ban Shastr Dhaaren ॥
Yuddh Karain Shatru Ko Maarain ॥

Sada Vijayee Kabhee Na Haaren ॥
Bhagat Logon Ke Sankat Taaren ॥

Prapitaamah Hain Svayan Vidhaata ॥
Pulista Raajavansh Ke Janm Sangrahaalay ॥

Vishrava Pita Idvida Jee Maata ॥
Vibheeshan Bhagat Tera Bhraata ॥8

Shiv Charan Mein Jab Dhyaan Lagaaya Jaata Hai ॥
Ghor Tapasya Kari Tan Ko Sukhaaya ॥

Shiv Shrrngaar Mile Devata Paaya ॥
Amrt ​​Paan Kari Amar Huee Kaaya ॥

Dharm Dhvaja Sada Haath Mein ॥
Devee Devata Sab Phirain Saath Mein ॥

Peetaambar Vastr Paridhaan Gaat Mein ॥
Bal Shakti Poorn Yaksh Jaat Mein ॥12

Svarn Sinhaasan Aap Viraajen ॥
Trishool Gada Haath Mein Saajai ॥

Shankh Mrdang Nagare Baajen ॥
Gandharv Raag Madhur Svar Gaayen ॥

Chaunsath Yogani Mangal Gaavain ॥
Rddhi-Siddhi Nit Bhogen ॥

Daas Daasaanee Sir Chhatr Firaaven ॥
Yaksh Yakshanee Mil Chanvar Dhulaavain ॥16

Kuber Gareeb Ko Aap Shobhaayamaan ॥
Kuber Rn Ko Sheeghr Udghaatit Karen ॥

Kuber Bhagat Ke Sankat Taaran ॥
Kuber Shatru Ko Kshan Mein Maaren ॥

Sheeghr Dhanee Jo Hona Chaahata Hai ॥
Kyoon Nahin Yaksh Kuber Manae ॥

Yah Paath Jo Padha Gaya ॥
Din Dugana Vyaapaar Raajakumaaree ॥28

Bhoot Pret Ko Kuber Bhaagavain ॥
Ade Kaam Ko Kuber Banaavain ॥

Rog Shok Ko Kuber Nashaavain ॥
Kalank Kodh Ko Kuber Hataaven ॥

Kuber Chadhe Ko Aur Chadhaade ॥
Kuber Pratibha Ko Pun: Utha De ॥

Kuber Bhaagy Ko Turant Jaga De ॥
Kuber Bhoole Ko Raah Bata De॥32

Pyaase Kee Pyaas Kuber Boha De ॥
Rishtedaar Kee Bhookh Kuber Bete De ॥

Mareez Ka Rog Kuber Ghata De ॥
Duhkhiya Ka Duhkh Kuber Chhuta De ॥

Baanjh Kee God Kuber Bhara De ॥
Bizanes Ko Kuber Badha De ॥

Kaaraagaar Se Kuber Vichaaradhaara De ॥
Chor Thagon Se Kuber Bacha De ॥36

Kort Kes Mein Kuber Jitaavai ॥
Jo Kuber Ko Man Mein Dhyaavai ॥

Chunaav Mein Jeet Kuber Karaaven ॥
Mantree Pad Par Kuber Devataavain ॥

Paath Kare Jo Nit Man Laee ॥
Usakee Kala Ho Sada Savaee ॥

Jisape Aakarshak Kuber Kee Maee ॥
Unaka Jeevan Chale Sukhadaee ॥40 ॥

Jo Kuber Ka Paath Karaavai ॥
Usaka Beda Paar Lagaavai ॥

Ujje Ghar Ko Pun: Basaavai ॥
Shatru Ko Bhee Mitr Banaavai ॥

Sahastr Pustak Jo Daan Kiya ॥
Sab Sukh Bhod Padaarth Paaya ॥

Praan Tyaag Kar Svarg Mein Jay ॥
Maanas Parivaar Kuber Keerti Gaee ॥44 ॥

॥ Doha
Shivabhakton Mein Agranee,
Shree Yaksharaaj Kuber ॥
Hrday Mein Gyaan Prakaash Bhar,
Kar Do Door Andhere ॥

Kar Do Door Ke Andhere Ab,
Jara Karo Na Der ॥
Sharan Padha Hoon Aapakee,
Daya Kee Drshti Pher ॥

Nitt Nem Kar Subah Hee,
Paath Karaun Chaaleesa ॥
Tum Mere Man,
Poorn Karo Jagadeesh ॥

Magasar Chhathi Hemant Rtu,
Sanvat Chausath Jaan ॥
Astuti Chaaleesa Shivahi,
Poorn Keen Kalyaan 



Shree Kuber Chalisa Lyrics In Hindi


कुबेर चालीसा के लाभ

कुबेर चालीसा (Kuber Chalisa Pdf) एक प्रमुख हिंदू धार्मिक स्तोत्र है जो भगवान कुबेर को समर्पित है। कुबेर, जो धन, संपत्ति और समृद्धि के देवता माने जाते हैं, उनके पूजन से जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। इस लेख में, हम कुबेर चालीसा के लाभ और इसके प्रभावों पर विस्तृत चर्चा करेंगे।

कुबेर चालीसा का महत्व

कुबेर चालीसा भगवान कुबेर के 40 श्लोकों का संग्रह है। यह स्तोत्र भगवान कुबेर की स्तुति और उनके आशीर्वाद की प्राप्ति के लिए पढ़ा जाता है। कुबेर को धन के देवता के रूप में जाना जाता है, और उनकी पूजा से आर्थिक स्थिति में सुधार होता है। कुबेर चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति की वित्तीय स्थिति में सकारात्मक बदलाव आ सकता है और जीवन में स्थिरता आ सकती है।

कुबेर चालीसा के लाभ

आर्थिक समृद्धि: कुबेर चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति की आर्थिक स्थिति में सुधार हो सकता है। यह माना जाता है कि भगवान कुबेर की पूजा करने से धन के प्रवाह में वृद्धि होती है और आर्थिक परेशानियों का समाधान होता है।

वित्तीय संकट से मुक्ति: जिन लोगों को वित्तीय संकट का सामना करना पड़ रहा है, वे कुबेर चालीसा का पाठ करके राहत प्राप्त कर सकते हैं। यह स्तोत्र संकटों को दूर करने और धन के मार्ग को खोलने में सहायक होता है।

संपत्ति में वृद्धि: कुबेर चालीसा के पाठ से व्यक्ति की संपत्ति और दौलत में वृद्धि हो सकती है। यह विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी है जो व्यापार या निवेश के क्षेत्र में हैं।

व्यापार में सफलता: व्यापारियों और उद्यमियों के लिए कुबेर चालीसा का पाठ अत्यंत लाभकारी है। यह उनके व्यापार को प्रगतिशील बनाता है और नए अवसर प्रदान करता है।

ऋण मुक्ति: जिन लोगों के ऊपर बड़े पैमाने पर ऋण है, वे कुबेर चालीसा का पाठ करके ऋण मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। यह स्तोत्र ऋणों को चुकाने के लिए सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।

स्वास्थ्य में सुधार: आर्थिक समृद्धि के साथ-साथ, कुबेर चालीसा का पाठ स्वास्थ्य में भी सुधार ला सकता है। इसके प्रभाव से जीवन में संतुलन और शांति बनी रहती है, जो कि स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है।

मानसिक शांति: कुबेर चालीसा का नियमित पाठ करने से मानसिक शांति प्राप्त होती है। जब व्यक्ति की वित्तीय स्थिति ठीक होती है, तो मानसिक तनाव कम होता है और जीवन में शांति का अनुभव होता है।

धार्मिक और आध्यात्मिक उन्नति: कुबेर चालीसा के पाठ से व्यक्ति की धार्मिक और आध्यात्मिक उन्नति होती है। यह व्यक्ति को धर्म और नैतिकता की ओर अग्रसर करता है और जीवन के उच्च उद्देश्यों की प्राप्ति में मदद करता है।

समाज में सम्मान: भगवान कुबेर की पूजा करने से समाज में सम्मान प्राप्त होता है। आर्थिक स्थिति में सुधार के साथ-साथ, व्यक्ति की सामाजिक स्थिति में भी वृद्धि होती है।

सुख और समृद्धि: कुबेर चालीसा का पाठ सुख और समृद्धि की प्राप्ति में सहायक होता है। यह व्यक्ति को जीवन में खुशहाल और संतुलित रहने में मदद करता है।

कुबेर चालीसा का पाठ विधिपूर्वक करना चाहिए। निम्नलिखित तरीके से कुबेर चालीसा का पाठ किया जा सकता है:

स्वच्छता और ध्यान: पाठ से पहले स्वच्छता का ध्यान रखें और एक शांत स्थान पर बैठें। भगवान कुबेर की मूर्ति या चित्र के सामने बैठकर ध्यान लगाएं।

दीप और धूप: पूजा स्थल पर दीप जलाएं और धूप करें। यह वातावरण को पवित्र बनाता है और ध्यान को केंद्रित करता है।

मंत्र जाप: कुबेर चालीसा के श्लोकों का मन ही मन जाप करें या जोर से पढ़ें। हर श्लोक के बाद एक बार “ॐ श्री कुबेराय नमः” का जाप करें।

प्रार्थना: पाठ के बाद भगवान कुबेर से प्रार्थना करें और उनकी कृपा की कामना करें। आप अपनी इच्छाओं और समस्याओं को भगवान के सामने व्यक्त कर सकते हैं।

अर्चना: पूजा के बाद भगवान कुबेर को पुष्प अर्पित करें और उनके चरणों में माथा टेकें।

प्रसाद: पूजा समाप्त करने के बाद, भगवान कुबेर को भोग अर्पित करें और प्रसाद का वितरण करें।

कुबेर चालीसा (Kuber Chalisa Pdf) का प्रयोग विशेष परिस्थितियों में किया जा सकता है, जैसे:

वित्तीय कठिनाइयों के समय: जब व्यक्ति को वित्तीय समस्याओं का सामना करना पड़ रहा हो, तब कुबेर चालीसा का पाठ लाभकारी हो सकता है।

व्यापार में वृद्धि के लिए: व्यापारियों और उद्यमियों को अपने व्यवसाय में सफलता प्राप्त करने के लिए कुबेर चालीसा का पाठ करना चाहिए।

ऋण मुक्ति के लिए: यदि किसी के ऊपर कर्ज है, तो कुबेर चालीसा का पाठ करके ऋण मुक्ति की कामना की जा सकती है।

संपत्ति में वृद्धि के लिए: संपत्ति की वृद्धि और आर्थिक समृद्धि के लिए भी कुबेर चालीसा का पाठ किया जा सकता है।

कुबेर चालीसा क्या है?

कुबेर चालीसा भगवान कुबेर की स्तुति में रचित एक 40-श्लोकों वाला भक्तिपूर्ण पाठ है। इसे पढ़ने से धन-संपत्ति, समृद्धि और खुशहाली प्राप्त होती है, क्योंकि कुबेर को धन के देवता माना जाता है।

कुबेर चालीसा कब और कैसे पढ़ें?

कुबेर चालीसा को शुक्रवार या किसी भी शुभ दिन पढ़ना अच्छा माना जाता है, विशेष रूप से धनतेरस और दीपावली के समय। इसे सुबह स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर कुबेर देव की मूर्ति या तस्वीर के सामने पढ़ा जाता है। चालीसा पढ़ते समय दीपक जलाना और कुबेर मंत्रों का जाप करना शुभ माना जाता है।

कुबेर चालीसा को कितनी बार पढ़ना चाहिए?

नियमित रूप से, दिन में एक बार कुबेर चालीसा पढ़ना शुभ माना जाता है। विशेष अवसरों जैसे कि दीपावली या किसी आर्थिक कार्य की शुरुआत के समय इसे 11 या 21 बार पढ़ने का भी महत्व है।

क्या कुबेर चालीसा से वाकई धन की प्राप्ति होती है?

कुबेर चालीसा का पाठ आर्थिक समृद्धि के लिए किया जाता है, लेकिन इसका उद्देश्य केवल धन प्राप्त करना नहीं है, बल्कि जीवन में संतुलन, सुख-समृद्धि और शांति की प्राप्ति भी है। यह पाठ मनोबल को बढ़ाता है और सही दिशा में प्रयास करने की प्रेरणा देता है, जिससे व्यक्ति को सफलता प्राप्त होती है।

कुबेर चालीसा किसने लिखा?

कुबेर चालीसा के रचयिता के बारे में कोई निश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह एक पारंपरिक भक्ति पाठ है जो सदियों से हिंदू धर्म में प्रचलित है।

कुबेर चालीसा के साथ अन्य कौन से पाठ किए जा सकते हैं?

कुबेर चालीसा के साथ कुबेर मंत्र और लक्ष्मी माता की आराधना भी की जा सकती है। भगवान कुबेर और माता लक्ष्मी को धन और समृद्धि के देवता के रूप में साथ-साथ पूजा जाता है।

क्या कुबेर चालीसा केवल हिंदी में उपलब्ध है?

कुबेर चालीसा मूल रूप से हिंदी में ही प्रचलित है, लेकिन यह अन्य भाषाओं में भी अनुवादित हो चुकी है।

श्री नारायण कवच – Shri Narayan Kavach PDF 2024-25

श्री नारायण कवच (Shri Narayan Kavach PDF) भगवद पुराण के छठे स्कंध के आठवें अध्याय में वर्णित है। यह कवच हमें दृश्य और अदृश्य दुश्मनों से सुरक्षा प्रदान करने का एक अत्यंत प्रभावी और प्रसिद्ध उपाय है। नारायण कवच का नियमित पाठ करने से व्यक्ति को भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है, और जीवन में आने वाली अनेक कठिनाइयों और बाधाओं से मुक्ति मिलती है।

कथा:

भगवद पुराण में वर्णित है कि अभिमन्यु के पुत्र राजा परीक्षित ने अपने गुरु शुकदेव गोस्वामी से अपने शत्रुओं से बचने के लिए एक उपाय का निवेदन किया। इस पर ऋषि शुकदेव ने उन्हें नारायण कवच का उपदेश दिया। यह कवच पहले त्वष्ट्र के पुत्र ऋषि विश्वरूप ने इंद्र को दिया था, जिससे इंद्र ने असुरों से अपनी रक्षा की थी। यह विश्वास है कि जो व्यक्ति इस कवच का नियमित पाठ करता है, उसकी आत्मा पवित्र हो जाती है और उसे भगवान विष्णु का आशीर्वाद मिलता है। भगवान विष्णु स्वयं उस व्यक्ति की रक्षा करते हैं जो इस कवच का पाठ श्रद्धा और भक्ति के साथ करता है।

तैयारी की प्रक्रिया:

इस स्तोत्र के श्लोक 4 से 11 तक विस्तार से यह बताया गया है कि इसे पढ़ने से पहले किस प्रकार की तैयारी की जानी चाहिए। इसका पाठ करने से पहले शारीरिक और मानसिक शुद्धता का ध्यान रखना आवश्यक होता है। जप की शुरुआत से पहले व्यक्ति को 12 बार ‘ॐ नमो नारायणाय’ या ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जप करना चाहिए। यह मंत्र हमारी चेतना को शुद्ध करता है और भगवान नारायण की कृपा प्राप्त करने के लिए एक सशक्त माध्यम बनाता है।

प्रयोग और फायदे:

नारायण कवच का जाप करने के लिए उन्नत और अनुभवी विद्वानों की मार्गदर्शन में इसे सीखना चाहिए। अगर यह संभव न हो, तो कवच की केवल अंतिम चार पंक्तियों का पाठ भी किया जा सकता है। इस कवच का नियमित जाप व्यक्ति को अदृश्य खतरों से बचाता है और उसे मानसिक और शारीरिक बल प्रदान करता है। यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है और जीवन में शांति और संतुलन को बनाए रखने में सहायक होता है।

विशेष लाभ:

नारायण कवच केवल शत्रुओं से सुरक्षा ही नहीं देता, बल्कि यह हमें आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में भी प्रेरित करता है। इस कवच का पाठ करने से व्यक्ति का आत्मविश्वास बढ़ता है, और उसे जीवन के हर पहलू में भगवान विष्णु की कृपा का अनुभव होता है। इसके अलावा, यह कवच आध्यात्मिक साधकों को ध्यान और साधना में गहराई प्रदान करता है, जिससे उन्हें मानसिक शांति और उच्चतम सुख की प्राप्ति होती है।

नारायण कवच एक प्राचीन और शक्तिशाली प्रार्थना है जो हमें भगवान नारायण की कृपा और संरक्षण की शक्ति से युक्त करती है। यह स्तोत्र हमारे जीवन में शांति, शक्ति और सुरक्षा की आवश्यकता को पूरा करता है।


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  • English

श्री नारायण कवच

न्यासः

अंगन्यासः
ॐ ॐ पादयोः नमः ।
ॐ नं जानुनोः नमः ।
ॐ मों ऊर्वोः नमः ।
ॐ नां उदरे नमः ।
ॐ रां हृदि नमः ।
ॐ यं उरसि नमः ।
ॐ णां मुखे नमः ।
ॐ यं शिरसि नमः ।

करन्यासः
ॐ ॐ दक्षिणतर्जन्यां नमः ।
ॐ नं दक्षिणमध्यमायां नमः ।
ॐ मों दक्षिणानामिकायां नमः ।
ॐ भं दक्षिणकनिष्ठिकायां नमः ।
ॐ गं वामकनिष्ठिकायां नमः ।
ॐ वं वामानिकायां नमः ।
ॐ तें वाममध्यमायां नमः ।
ॐ वां वामतर्जन्यां नमः ।
ॐ सुं दक्षिणांगुष्ठोर्ध्वपर्वणि नमः ।
ॐ दें दक्षिणांगुष्ठाधः पर्वणि नमः ।
ॐ वां वामांगुष्ठोर्ध्वपर्वणि नमः ।
ॐ यं वामांगुष्ठाधः पर्वणि नमः ।

विष्णुषडक्षरन्यासः
ॐ ॐ हृदये नमः ।
ॐ विं मूर्ध्नै नमः ।
ॐ षं भ्रुर्वोर्मध्ये नमः ।
ॐ णं शिखायां नमः ।
ॐ वें नेत्रयोः नमः ।
ॐ नं सर्वसंधिषु नमः ।
ॐ मः प्राच्यां अस्त्राय फट् ।
ॐ मः आग्नेय्यां अस्त्राय फट् ।
ॐ मः दक्षिणस्यां अस्त्राय फट् ।
ॐ मः नैऋत्ये अस्त्राय फट् ।
ॐ मः प्रतीच्यां अस्त्राय फट् ।
ॐ मः वायव्ये अस्त्राय फट् ।
ॐ मः उदीच्यां अस्त्राय फट् ।
ॐ मः ऐशान्यां अस्त्राय फट् ।
ॐ मः ऊर्ध्वायां अस्त्राय फट् ।
ॐ मः अधरायां अस्त्राय फट् ।

श्री हरिः

अथ श्रीनारायणकवच



॥राजोवाच॥
यया गुप्तः सहस्त्राक्षः सवाहान् रिपुसैनिकान्।
क्रीडन्निव विनिर्जित्य त्रिलोक्या बुभुजे श्रियम्॥1॥

भगवंस्तन्ममाख्याहि वर्म नारायणात्मकम्।
यथास्स्ततायिनः शत्रून् येन गुप्तोस्जयन्मृधे॥2॥

॥श्रीशुक उवाच॥
वृतः पुरोहितोस्त्वाष्ट्रो महेंद्रायानुपृच्छते।
नारायणाख्यं वर्माह तदिहैकमनाः शृणु॥3॥

विश्वरूप उवाचधौतांघ्रिपाणिराचम्य सपवित्र उदङ् मुखः।
कृतस्वांगकरन्यासो मंत्राभ्यां वाग्यतः शुचिः॥4॥

नारायणमयं वर्म संनह्येद् भय आगते।
पादयोर्जानुनोरूर्वोरूदरे हृद्यथोरसि॥5॥

मुखे शिरस्यानुपूर्व्यादोंकारादीनि विन्यसेत्।
ॐ नमो नारायणायेति विपर्ययमथापि वा॥6॥

करन्यासं ततः कुर्याद् द्वादशाक्षरविद्यया।
प्रणवादियकारंतमंगुल्यंगुष्ठपर्वसु॥7॥

न्यसेद् हृदय ॐकारं विकारमनु मूर्धनि।
षकारं तु भ्रुवोर्मध्ये णकारं शिखया दिशेत्॥8॥

वेकारं नेत्रयोर्युंज्यान्नकारं सर्वसंधिषु।
मकारमस्त्रमुद्दिश्य मंत्रमूर्तिर्भवेद् बुधः॥9॥

सविसर्गं फडंतं तत् सर्वदिक्षु विनिर्दिशेत्।
ॐ विष्णवे नम इति ॥10॥

आत्मानं परमं ध्यायेद ध्येयं षट्शक्तिभिर्युतम्।
विद्यातेजस्तपोमूर्तिमिमं मंत्रमुदाहरेत ॥11॥

ॐ हरिर्विदध्यान्मम सर्वरक्षां न्यस्तांघ्रिपद्मः पतगेंद्रपृष्ठे।
दरारिचर्मासिगदेषुचापाशान् दधानोस्ष्टगुणोस्ष्टबाहुः ॥12॥

जलेषु मां रक्षतु मत्स्यमूर्तिर्यादोगणेभ्यो वरूणस्य पाशात्।
स्थलेषु मायावटुवामनोस्व्यात् त्रिविक्रमः खेऽवतु विश्वरूपः ॥13॥

दुर्गेष्वटव्याजिमुखादिषु प्रभुः पायान्नृसिंहोऽसुरयुथपारिः।
विमुंचतो यस्य महाट्टहासं दिशो विनेदुर्न्यपतंश्च गर्भाः ॥14॥

रक्षत्वसौ माध्वनि यज्ञकल्पः स्वदंष्ट्रयोन्नीतधरो वराहः।
रामोऽद्रिकूटेष्वथ विप्रवासे सलक्ष्मणोस्व्याद् भरताग्रजोस्स्मान् ॥15॥

मामुग्रधर्मादखिलात् प्रमादान्नारायणः पातु नरश्च हासात्।
दत्तस्त्वयोगादथ योगनाथः पायाद् गुणेशः कपिलः कर्मबंधात् ॥16॥

सनत्कुमारो वतु कामदेवाद्धयशीर्षा मां पथि देवहेलनात्।
देवर्षिवर्यः पुरूषार्चनांतरात् कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात् ॥17॥

धन्वंतरिर्भगवान् पात्वपथ्याद् द्वंद्वाद् भयादृषभो निर्जितात्मा।
यज्ञश्च लोकादवताज्जनांताद् बलो गणात् क्रोधवशादहींद्रः ॥18॥

द्वैपायनो भगवानप्रबोधाद् बुद्धस्तु पाखंडगणात् प्रमादात्।
कल्किः कले कालमलात् प्रपातु धर्मावनायोरूकृतावतारः ॥19॥

मां केशवो गदया प्रातरव्याद् गोविंद आसंगवमात्तवेणुः।
नारायण प्राह्ण उदात्तशक्तिर्मध्यंदिने विष्णुररींद्रपाणिः ॥20॥

देवोस्पराह्णे मधुहोग्रधन्वा सायं त्रिधामावतु माधवो माम्।
दोषे हृषीकेश उतार्धरात्रे निशीथ एकोस्वतु पद्मनाभः ॥21॥

श्रीवत्सधामापररात्र ईशः प्रत्यूष ईशोऽसिधरो जनार्दनः।
दामोदरोऽव्यादनुसंध्यं प्रभाते विश्वेश्वरो भगवान् कालमूर्तिः ॥22॥

चक्रं युगांतानलतिग्मनेमि भ्रमत् समंताद् भगवत्प्रयुक्तम्।
दंदग्धि दंदग्ध्यरिसैन्यमासु कक्षं यथा वातसखो हुताशः ॥23॥

गदेऽशनिस्पर्शनविस्फुलिंगे निष्पिंढि निष्पिंढ्यजितप्रियासि।
कूष्मांडवैनायकयक्षरक्षोभूतग्रहांश्चूर्णय चूर्णयारीन् ॥24॥

त्वं यातुधानप्रमथप्रेतमातृपिशाचविप्रग्रहघोरदृष्टीन्।
दरेंद्र विद्रावय कृष्णपूरितो भीमस्वनोऽरेर्हृदयानि कंपयन् ॥25॥

त्वं तिग्मधारासिवरारिसैन्यमीशप्रयुक्तो मम छिंधि छिंधि।
चर्मंछतचंद्र छादय द्विषामघोनां हर पापचक्षुषाम् ॥26॥

यन्नो भयं ग्रहेभ्यो भूत् केतुभ्यो नृभ्य एव च।
सरीसृपेभ्यो दंष्ट्रिभ्यो भूतेभ्योंऽहोभ्य एव वा ॥27॥

सर्वाण्येतानि भगन्नामरूपास्त्रकीर्तनात्।
प्रयांतु संक्षयं सद्यो ये नः श्रेयः प्रतीपकाः ॥28॥

गरूड्क्षो भगवान् स्तोत्रस्तोभश्छंदोमयः प्रभुः।
रक्षत्वशेषकृच्छ्रेभ्यो विष्वक्सेनः स्वनामभिः ॥29॥

सर्वापद्भ्यो हरेर्नामरूपयानायुधानि नः।
बुद्धिंद्रियमनः प्राणान् पांतु पार्षदभूषणाः ॥30॥

यथा हि भगवानेव वस्तुतः सद्सच्च यत्।
सत्यनानेन नः सर्वे यांतु नाशमुपाद्रवाः ॥31॥

यथैकात्म्यानुभावानां विकल्परहितः स्वयम्।
भूषणायुद्धलिंगाख्या धत्ते शक्तीः स्वमायया ॥32॥

तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान् हरिः।
पातु सर्वैः स्वरूपैर्नः सदा सर्वत्र सर्वगः ॥33

विदिक्षु दिक्षूर्ध्वमधः समंतादंतर्बहिर्भगवान् नारसिंहः।
प्रहापय~ंल्लोकभयं स्वनेन ग्रस्तसमस्ततेजाः ॥34॥

मघवन्निदमाख्यातं वर्म नारयणात्मकम्।
विजेष्यस्यंजसा येन दंशितोऽसुरयूथपान् ॥35॥

एतद् धारयमाणस्तु यं यं पश्यति चक्षुषा।
पदा वा संस्पृशेत् सद्यः साध्वसात् स विमुच्यते ॥36॥

न कुतश्चित भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत्।
राजदस्युग्रहादिभ्यो व्याघ्रादिभ्यश्च कर्हिचित् ॥37॥

इमां विद्यां पुरा कश्चित् कौशिको धारयन् द्विजः।
योगधारणया स्वांगं जहौ स मरूधन्वनि ॥38॥

तस्योपरि विमानेन गंधर्वपतिरेकदा।
ययौ चित्ररथः स्त्रीर्भिवृतो यत्र द्विजक्षयः ॥39॥

गगनान्न्यपतत् सद्यः सविमानो ह्यवाक् शिराः।
स वालखिल्यवचनादस्थीन्यादाय विस्मितः।
प्रास्य प्राचीसरस्वत्यां स्नात्वा धाम स्वमन्वगात् ॥40॥

॥श्रीशुक उवाच॥
य इदं शृणुयात् काले यो धारयति चादृतः।
तं नमस्यंति भूतानि मुच्यते सर्वतो भयात् ॥41॥

एतां विद्यामधिगतो विश्वरूपाच्छतक्रतुः।
त्रैलोक्यलक्ष्मीं बुभुजे विनिर्जित्यऽमृधेसुरान् ॥42॥

॥इति श्रीनारायणकवचं संपूर्णम्॥

— ( श्रीमद्भागवत स्कंध 6 )

Narayana Kavacham

Nyāsaḥ

Aṅganyāsaḥ
ōṃ ōṃ pādayōḥ namaḥ ।
ōṃ naṃ jānunōḥ namaḥ ।
ōṃ mōṃ ūrvōḥ namaḥ ।
ōṃ nāṃ udarē namaḥ ।
ōṃ rāṃ hṛdi namaḥ ।
ōṃ yaṃ urasi namaḥ ।
ōṃ ṇāṃ mukhē namaḥ ।
ōṃ yaṃ śirasi namaḥ ।

Karanyāsaḥ
ōṃ ōṃ dakṣiṇatarjanyāṃ namaḥ ।
ōṃ naṃ dakṣiṇamadhyamāyāṃ namaḥ ।
ōṃ mōṃ dakṣiṇānāmikāyāṃ namaḥ ।
ōṃ bhaṃ dakṣiṇakaniṣṭhikāyāṃ namaḥ ।
ōṃ gaṃ vāmakaniṣṭhikāyāṃ namaḥ ।
ōṃ vaṃ vāmānikāyāṃ namaḥ ।
ōṃ tēṃ vāmamadhyamāyāṃ namaḥ ।
ōṃ vāṃ vāmatarjanyāṃ namaḥ ।
ōṃ suṃ dakṣiṇāṅguṣṭhōrdhvaparvaṇi namaḥ ।
ōṃ dēṃ dakṣiṇāṅguṣṭhādhaḥ parvaṇi namaḥ ।
ōṃ vāṃ vāmāṅguṣṭhōrdhvaparvaṇi namaḥ ।
ōṃ yaṃ vāmāṅguṣṭhādhaḥ parvaṇi namaḥ ।

Viṣṇuṣaḍakṣaranyāsaḥ
ōṃ ōṃ hṛdayē namaḥ ।
ōṃ viṃ mūrdhnai namaḥ ।
ōṃ ṣaṃ bhrurvōrmadhyē namaḥ ।
ōṃ ṇaṃ śikhāyāṃ namaḥ ।
ōṃ vēṃ nētrayōḥ namaḥ ।
ōṃ naṃ sarvasandhiṣu namaḥ ।
ōṃ maḥ prāchyāṃ astrāya phaṭ ।
ōṃ maḥ āgnēyyāṃ astrāya phaṭ ।
ōṃ maḥ dakṣiṇasyāṃ astrāya phaṭ ।
ōṃ maḥ naiṛtyē astrāya phaṭ ।
ōṃ maḥ pratīchyāṃ astrāya phaṭ ।
ōṃ maḥ vāyavyē astrāya phaṭ ।
ōṃ maḥ udīchyāṃ astrāya phaṭ ।
ōṃ maḥ aiśānyāṃ astrāya phaṭ ।
ōṃ maḥ ūrdhvāyāṃ astrāya phaṭ ।
ōṃ maḥ adharāyāṃ astrāya phaṭ ।

Srī Hari

Atha Srīnārāyaṇakavacha

॥Rājōvācha॥
yayā guptaḥ sahastrākṣaḥ savāhān ripusainikān।
krīḍanniva vinirjitya trilōkyā bubhujē śriyam॥1॥

bhagavaṃstanmamākhyāhi varma nārāyaṇātmakam।
yathāsstatāyinaḥ śatrūn yēna guptōsjayanmṛdhē॥2॥

॥Srīśuka Uvācha॥
vṛtaḥ purōhitōstvāṣṭrō mahēndrāyānupṛchChatē।
nārāyaṇākhyaṃ varmāha tadihaikamanāḥ śṛṇu॥3॥

viśvarūpa uvāchadhautāṅghripāṇirāchamya sapavitra udaṅ mukhaḥ।
kṛtasvāṅgakaranyāsō mantrābhyāṃ vāgyataḥ śuchiḥ॥4॥

nārāyaṇamayaṃ varma sannahyēd bhaya āgatē।
pādayōrjānunōrūrvōrūdarē hṛdyathōrasi॥5॥

mukhē śirasyānupūrvyādōṅkārādīni vinyasēt।
ōṃ namō nārāyaṇāyēti viparyayamathāpi vā॥6॥

karanyāsaṃ tataḥ kuryād dvādaśākṣaravidyayā।
praṇavādiyakārantamaṅgulyaṅguṣṭhaparvasu॥7॥

nyasēd hṛdaya ōṅkāraṃ vikāramanu mūrdhani।
ṣakāraṃ tu bhruvōrmadhyē ṇakāraṃ śikhayā diśēt॥8॥

vēkāraṃ nētrayōryuñjyānnakāraṃ sarvasandhiṣu।
makāramastramuddiśya mantramūrtirbhavēd budhaḥ॥9॥

savisargaṃ phaḍantaṃ tat sarvadikṣu vinirdiśēt।
ōṃ viṣṇavē nama iti ॥10॥

ātmānaṃ paramaṃ dhyāyēda dhyēyaṃ ṣaṭśaktibhiryutam।
vidyātējastapōmūrtimimaṃ mantramudāharēta ॥11॥

ōṃ harirvidadhyānmama sarvarakṣāṃ nyastāṅghripadmaḥ patagēndrapṛṣṭhē।
darāricharmāsigadēṣuchāpāśān dadhānōsṣṭaguṇōsṣṭabāhuḥ ॥12॥

jalēṣu māṃ rakṣatu matsyamūrtiryādōgaṇēbhyō varūṇasya pāśāt।
sthalēṣu māyāvaṭuvāmanōsvyāt trivikramaḥ khē’vatu viśvarūpaḥ ॥13॥

durgēṣvaṭavyājimukhādiṣu prabhuḥ pāyānnṛsiṃhō’surayuthapāriḥ।
vimuñchatō yasya mahāṭṭahāsaṃ diśō vinēdurnyapataṃścha garbhāḥ ॥14॥

rakṣatvasau mādhvani yajñakalpaḥ svadaṃṣṭrayōnnītadharō varāhaḥ।
rāmō’drikūṭēṣvatha vipravāsē salakṣmaṇōsvyād bharatāgrajōssmān ॥15॥

māmugradharmādakhilāt pramādānnārāyaṇaḥ pātu naraścha hāsāt।
dattastvayōgādatha yōganāthaḥ pāyād guṇēśaḥ kapilaḥ karmabandhāt ॥16॥

sanatkumārō vatu kāmadēvāddhayaśīrṣā māṃ pathi dēvahēlanāt।
dēvarṣivaryaḥ purūṣārchanāntarāt kūrmō harirmāṃ nirayādaśēṣāt ॥17॥

dhanvantarirbhagavān pātvapathyād dvandvād bhayādṛṣabhō nirjitātmā।
yajñaścha lōkādavatājjanāntād balō gaṇāt krōdhavaśādahīndraḥ ॥18॥

dvaipāyanō bhagavānaprabōdhād buddhastu pākhaṇḍagaṇāt pramādāt।
kalkiḥ kalē kālamalāt prapātu dharmāvanāyōrūkṛtāvatāraḥ ॥19॥

māṃ kēśavō gadayā prātaravyād gōvinda āsaṅgavamāttavēṇuḥ।
nārāyaṇa prāhṇa udāttaśaktirmadhyandinē viṣṇurarīndrapāṇiḥ ॥20॥

dēvōsparāhṇē madhuhōgradhanvā sāyaṃ tridhāmāvatu mādhavō mām।
dōṣē hṛṣīkēśa utārdharātrē niśītha ēkōsvatu padmanābhaḥ ॥21॥

śrīvatsadhāmāpararātra īśaḥ pratyūṣa īśō’sidharō janārdanaḥ।
dāmōdarō’vyādanusandhyaṃ prabhātē viśvēśvarō bhagavān kālamūrtiḥ ॥22॥

chakraṃ yugāntānalatigmanēmi bhramat samantād bhagavatprayuktam।
dandagdhi dandagdhyarisainyamāsu kakṣaṃ yathā vātasakhō hutāśaḥ ॥23॥

gadē’śanisparśanavisphuliṅgē niṣpiṇḍhi niṣpiṇḍhyajitapriyāsi।
kūṣmāṇḍavaināyakayakṣarakṣōbhūtagrahāṃśchūrṇaya chūrṇayārīn ॥24॥

tvaṃ yātudhānapramathaprētamātṛpiśāchavipragrahaghōradṛṣṭīn।
darēndra vidrāvaya kṛṣṇapūritō bhīmasvanō’rērhṛdayāni kampayan ॥25॥

tvaṃ tigmadhārāsivarārisainyamīśaprayuktō mama Chindhi Chindhi।
charmañChatachandra Chādaya dviṣāmaghōnāṃ hara pāpachakṣuṣām ॥26॥

yannō bhayaṃ grahēbhyō bhūt kētubhyō nṛbhya ēva cha।
sarīsṛpēbhyō daṃṣṭribhyō bhūtēbhyōṃ’hōbhya ēva vā ॥27॥

sarvāṇyētāni bhagannāmarūpāstrakīrtanāt।
prayāntu saṅkṣayaṃ sadyō yē naḥ śrēyaḥ pratīpakāḥ ॥28॥

garūḍxō bhagavān stōtrastōbhaśChandōmayaḥ prabhuḥ।
rakṣatvaśēṣakṛchChrēbhyō viṣvaksēnaḥ svanāmabhiḥ ॥29॥

sarvāpadbhyō harērnāmarūpayānāyudhāni naḥ।
buddhindriyamanaḥ prāṇān pāntu pārṣadabhūṣaṇāḥ ॥30॥

yathā hi bhagavānēva vastutaḥ sadsachcha yat।
satyanānēna naḥ sarvē yāntu nāśamupādravāḥ ॥31॥

yathaikātmyānubhāvānāṃ vikalparahitaḥ svayam।
bhūṣaṇāyuddhaliṅgākhyā dhattē śaktīḥ svamāyayā ॥32॥

tēnaiva satyamānēna sarvajñō bhagavān hariḥ।
pātu sarvaiḥ svarūpairnaḥ sadā sarvatra sarvagaḥ ॥33

vidikṣu dikṣūrdhvamadhaḥ samantādantarbahirbhagavān nārasiṃhaḥ।
prahāpaya~ṃllōkabhayaṃ svanēna grastasamastatējāḥ ॥34॥

maghavannidamākhyātaṃ varma nārayaṇātmakam।
vijēṣyasyañjasā yēna daṃśitō’surayūthapān ॥35॥

ētad dhārayamāṇastu yaṃ yaṃ paśyati chakṣuṣā।
padā vā saṃspṛśēt sadyaḥ sādhvasāt sa vimuchyatē ॥36॥

na kutaśchita bhayaṃ tasya vidyāṃ dhārayatō bhavēt।
rājadasyugrahādibhyō vyāghrādibhyaścha karhichit ॥37॥

imāṃ vidyāṃ purā kaśchit kauśikō dhārayan dvijaḥ।
yōgadhāraṇayā svāṅgaṃ jahau sa marūdhanvani ॥38॥

tasyōpari vimānēna gandharvapatirēkadā।
yayau chitrarathaḥ strīrbhivṛtō yatra dvijakṣayaḥ ॥39॥

gaganānnyapatat sadyaḥ savimānō hyavāk śirāḥ।
sa vālakhilyavachanādasthīnyādāya vismitaḥ।
prāsya prāchīsarasvatyāṃ snātvā dhāma svamanvagāt ॥40॥

॥Srīśuka Uvācha॥
ya idaṃ śṛṇuyāt kālē yō dhārayati chādṛtaḥ।
taṃ namasyanti bhūtāni muchyatē sarvatō bhayāt ॥41॥

ētāṃ vidyāmadhigatō viśvarūpāchChatakratuḥ।
trailōkyalakṣmīṃ bubhujē vinirjitya’mṛdhēsurān ॥42॥

॥iti śrīnārāyaṇakavachaṃ sampūrṇam॥
( śrīmadbhāgavata skandha 6)



श्री नारायण कवच के पाठ से न केवल शत्रुओं से सुरक्षा मिलती है, बल्कि यह जीवन में आने वाली कठिनाइयों और चुनौतियों को भी सरलता से पार करने में मदद करता है। इसका पाठ व्यक्ति के चारों ओर एक दिव्य सुरक्षा कवच का निर्माण करता है, जिससे वह किसी भी प्रकार की नकारात्मकता, असफलता, और डर से बचा रहता है। इसके साथ ही, नारायण कवच का जाप मानसिक संतुलन और सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाता है, जिससे व्यक्ति तनाव और चिंता से मुक्त होकर अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकता है।

यह कवच परिवार की सुरक्षा और खुशहाली के लिए भी अत्यंत लाभकारी माना जाता है। इसका नियमित पाठ घर के माहौल को पवित्र और शांत बनाता है, जिससे पारिवारिक जीवन में समृद्धि, सुख, और शांति बनी रहती है। यह न केवल भौतिक रूप से लाभ प्रदान करता है, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति की ओर भी प्रेरित करता है, जिससे व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति की दिशा में मार्गदर्शन मिलता है। श्री नारायण कवच का पाठ भगवान विष्णु के असीम प्रेम और आशीर्वाद को प्राप्त करने का सशक्त माध्यम है, जो जीवन के हर क्षेत्र में सुरक्षा और सफलता प्रदान करता है।


नारायण कवच का पाठ कब करना चाहिए?

नारायण कवच का पाठ प्रातः काल या संध्या समय में करना सबसे शुभ माना जाता है। सुबह के समय इसका जाप करने से दिनभर सकारात्मक ऊर्जा और सुरक्षा का अनुभव होता है, जबकि शाम के समय यह दिनभर की नकारात्मकता और तनाव को दूर करता है। इसके अलावा, विशेष अवसरों, व्रत, या पूजा के दौरान इसका पाठ किया जा सकता है, जैसे श्रावण मास, एकादशी, या विष्णु से जुड़े अन्य विशेष पर्वों में। शुद्ध मन और शरीर के साथ नियमित रूप से इसका पाठ करने से जीवन में शांति और समृद्धि प्राप्त होती है।

नारायण कवच पढ़ने से क्या होता है?

नारायण कवच का पाठ व्यक्ति को सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जाओं और अदृश्य शत्रुओं से सुरक्षा प्रदान करता है। यह कवच भगवान विष्णु की कृपा को आकर्षित करता है, जिससे जीवन में समृद्धि, शांति और सुरक्षा मिलती है। इसका नियमित पाठ आत्मबल और आत्मविश्वास को बढ़ाता है, जिससे व्यक्ति जीवन की कठिनाइयों का सामना साहस और धैर्य के साथ कर सकता है। साथ ही, यह कवच मानसिक तनाव और चिंता को दूर करता है, जिससे मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन बना रहता है।

नारायण कवच कैसे सिद्ध करें?

नारायण कवच को सिद्ध करने के लिए इसका नियमित और विधिवत जाप करना आवश्यक है। प्रतिदिन शुद्ध मन और शरीर से इस कवच का पाठ करना चाहिए। पाठ से पहले “ॐ नमो नारायणाय” या “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का 12 बार जाप करना चाहिए। किसी विद्वान गुरु या पंडित से इसका सही विधि से पाठ करना सीखकर, ध्यान और समर्पण के साथ इसे पढ़ने से यह कवच सिद्ध हो जाता है और व्यक्ति को भगवान विष्णु का संरक्षण मिलता है।

नारायण का मूल मंत्र क्या है?

नारायण का मूल मंत्र “ॐ नमो नारायणाय” है। यह मंत्र अत्यंत शक्तिशाली और पवित्र माना जाता है। इस मंत्र का नियमित जाप करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है, जिससे जीवन में शांति, समृद्धि और सुरक्षा आती है। यह मंत्र व्यक्ति के जीवन से सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है और आत्मिक शांति प्रदान करता है।

विष्णु जी का प्रिय मंत्र कौन सा है?

विष्णु जी का प्रिय मंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” है। इस मंत्र का जप करने से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न होते हैं और साधक को आशीर्वाद प्रदान करते हैं। यह मंत्र विष्णु जी की कृपा पाने का एक सरल और प्रभावी माध्यम है, जो जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाता है।

नारायण बीज मंत्र कौन सा है?

नारायण बीज मंत्र “ॐ नमः” है। इस बीज मंत्र का जाप भगवान नारायण की शक्तियों को जागृत करने के लिए किया जाता है। यह मंत्र अत्यंत शक्तिशाली है और इसे नियमित रूप से जपने से साधक को मानसिक और आत्मिक शक्ति प्राप्त होती है। नारायण बीज मंत्र के प्रभाव से साधक को भगवान नारायण का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे उसे जीवन में सुरक्षा और उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।