Saturday, February 14, 2026
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Sai Baba Dhoop Aarti | साईबाबा धूप आरती : Evening Original Aarti 2026

By Dr. Hemlata | Reviewed by Vedic Scholar | Last Updated: January 2026 - This devotional text has been carefully verified against widely accepted traditional sources to preserve correct wording, pronunciation, and spiritual intent for daily recitation.
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साईं बाबा की पावन धूप आरती एक अत्यंत मंगलमय और भावपूर्ण अनुष्ठान है, जिसका समय शाम की संध्या बेला, विशेषकर सूर्यास्त के ठीक बाद का क्षण, माना जाता है। यह समय निर्धारण केवम एक परंपरा नहीं, बल्कि गहरे आध्यात्मिक और प्राकृतिक महत्व से जुड़ा है।

भावना प्रधान: सबसे महत्वपूर्ण है भावना। यदि किसी कारणवश सटीक समय पर आरती न कर पाएँ, तो भी सायंकाल के समय, श्रद्धा और एकाग्रता के साथ आरती करना ही मुख्य है। साईं बाबा भक्त के शुद्ध हृदय और समर्पित भाव को सर्वोपरि मानते हैं।

संध्या बेला का आध्यात्मिक महत्व: हिंदू धर्म में संध्या काल (सूर्योदय और सूर्यास्त का समय) को बेहद पवित्र माना गया है। यह वह सूक्ष्म क्षण है जब दिन और रात का संधिस्थल होता है, जिसे आत्मचिंतन, ईश्वर-स्मरण और आराधना के लिए सर्वोत्तम समय माना जाता। प्रकाश और अंधकार के इस संगम पर मन शांत और भावना ईश्वर की ओर अधिक आकर्षित होती है।

सूर्यास्त: प्रतीक और शुभारंभ: सूर्यास्त का क्षण दिन के कर्मों के समापन और शांति व विश्राम के आगमन का प्रतीक है। यह संकेत है कि गृहस्थ के दैनिक कर्तव्यों से विराम लेकर अब ईश्वर भक्ति में मन लगाने का समय आ गया है। धूप आरती इसी संक्रमण काल में साईं बाबा के प्रति कृतज्ञता, समर्पण और प्रार्थना व्यक्त करने का साधन है। सूर्यास्त के बाद की गई आरती अंधकार पर प्रकाश की विजय और बाबा की दिव्य ज्योति के स्मरण का भाव जगाती है।

स्थानीय सूर्यास्त समय का महत्व: यहाँ एक महत्वपूर्ण बात ध्यान देने योग्य है: सूर्यास्त का सटीक समय हर स्थान के लिए भिन्न होता है। यह भौगोलिक स्थिति (अक्षांश-देशांतर) और मौसम पर निर्भर करता है। जो समय मुंबई में सूर्यास्त होता है, वह दिल्ली, कोलकाता या चेन्नई में कुछ मिनट पहले या बाद में हो सकता है। इसलिए, यह कहना अधिक उचित है कि धूप आरती आपके स्थानीय सूर्यास्त के समय के आसपास या उसके तुरंत बाद की जानी चाहिए।

व्यावहारिक सुझाव:

स्थानीय समय जानें: अपने शहर या क्षेत्र का सटीक सूर्यास्त समय जानने के लिए मौसम विभाग के ऐप, कैलेंडर या विश्वसनीय ऑनलाइन स्रोतों का उपयोग करें।

समय का पालन: सूर्यास्त के समय से लगभग 10-15 मिनट बाद तक धूप आरती प्रारंभ करने का आदर्श समय माना जाता है। यह वह समय होता है जब प्राकृतिक प्रकाश मद्धिम होने लगता है और शाम की शांति छाने लगती है।


आरती साईबाबा । सौख्यदातार जीवा । चरणरजातली ।
द्यावादासा विसावा, भक्तां विसावा ।।
आरती साईबाबा ।।ध्रु०॥

जाळूनियां अनंग । स्वस्वरूपी राहे दंग ।
मुमुक्षुजनां दावी । निज डोळां श्रीरंग । डोळां श्रीरंग ।।
आरती साईबाबा ॥१॥

जया मनी जैसा भाव । तया तैसा अनुभव ।
दाविसी दयाघना । ऐसी तुझी ही माव ।।
आरती साईबाबा ।।२।।

तुमचे नाम ध्याता । हरे संसृती व्यथा ।
अगाध तव करणी मार्ग दाविसी अनाथा ।।
आरती साईबाबा ॥३॥

कलियुगीं अवतार । सगुणब्रह्म साचार ।
अवतीर्ण झालासे ।स्वामी दत्त दिगंबर ।।
आरती साईबाबा ।।४।।

आठां दिवसां गुरूवारीं । भक्त करिती वारी ।
प्रभुपद पहावया । भवभय निवारी ।।
आरती साईबाबा ॥५॥

माझा निजद्रव्यठेवा । तव चरणरजसेवा
मागणें हेंचि आतां । तुम्हां देवाधिदेवा ॥
आरती साईबाबा ।।६।।

इच्छित दीन चातक । निर्मल तोय निजसुख ।
पाजावें माधवा या । सांभाळ आपुली भाक ।।
आरती साईबाबा ।।७।।

आरती साईबाबा । सौख्यदातार जीवा । चरणरजातली ।
द्यावादासा विसावा, भक्तां विसावा ।।
आरती साईबाबा ।।ध्रु०॥


शिरडी माझें पंढरपूर । साईबाबा रमावर । बाबा रमावर ॥१॥

शुद्ध भक्ती चंद्रभागा । भाव पुंडलिक जागा ||२||

या हो या हो अवघे जन । करा बाबांसी वंदन ।।३।।

गणू म्हणे बाबा साई। धांव पाव माझे आई ।।४।।


घालीन लोटांगन, वंदीन चरण,
डोळ्यांनी पाहिन रूप तुझें ।।

प्रेमें आलिंगिन, आनंदें पूजिन,
भावें ओवाळिन म्हणे नामा ।।१।।

त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥२॥

कायेन वाचा मनसेंद्रियैर्वा, बुध्दयात्मना वा प्रकृतीस्वभावात् ।
करोमी यद्यत्सकलं परस्मै, नारायणायेति समर्पयामि ।।३।।

अच्युतं केशवं रामनारायणं, कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम् ।
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं, जानकीनायकं रामचंद्र भजे ।। ४ ।।


हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हर हरे (इति त्रिवार)

अनंता तुला तें कसें रे स्तवावें।
अनंता तुला तें कसें रे नमावें।।
अनंत मुखांचा शिणे शेष गातां।
नमस्कार साष्टांग श्रीसाइनाथा ।।१।।

स्मरावें मनीं त्वत्पदा नित्य भावें।
उरावें तरी भक्तिसाठी स्वभावें॥
तरावें जगा तारूनी मायताता।
नमस्कार साष्टांग श्रीसाइनाथा ।।२।।

वसे जो सदा दावया संतलीला।
दिसे अज्ञ लोकापरी जो जनाला॥
परी अंतरी ज्ञान कैवल्यदाता ।
नमस्कार साष्टांग श्रीसाइनाथा ॥३॥

बरा लाधला जन्म हा मानवाचा।
नरा सार्थका साधनीभूत साचा।।
धरूं साइप्रेमा गळाया अहंता ।
नमस्कार साष्टांग श्रीसाइनाथा ॥४॥

धरावें करींसान अल्पज्ञ बाला।
करावें आम्हां धन्य चुंबोनि गाला।।
मुखीं घाल प्रेमें खरा ग्रास आतां।
नमस्कार साष्टांग श्रीसाइनाथा ।।५।।

सुरादिक ज्यांच्या पदा वंदिताती।
शुकादिक ज़्यातें समानत्व देती।।
प्रयागादि तीर्थेपदीं नम्र होतां ।
नमस्कार साष्टांग श्रीसाइनाथा ॥६॥

तुझ्या ज्या पदा पाहता गोपबाली।
सदा रंगली चित्स्वरूपी मिळाली।
करी रासक्रिडासवें । कृष्णनाथा ।
नमस्कार साष्टांग श्रीसाइनाथा ।।७।।

तुला मागतों मागणे एक द्यावें।
करा जोडितों दीन अत्यंत भावें॥
भवी मोहनीराज हा तारिं आतां।
नमस्कार साष्टांग श्रीसाइनाथा ||८||


प्रार्थना ऐसा येई बा| साई दिगंबरा| अक्षयरूप अवतारा।
सर्वहि व्यापकतूं। श्रुतिसारा। अनुसयाऽत्रिकुमारा।।६० ।।

काशी स्नान जप, प्रतिदिवशीं। कोल्हापुर भिक्षेसी।
निर्मल नदि तुंगा, जल प्राशी। निद्रा माहुर देशीं।। ऐ० ।।१।।

झोळी लोंबतसे वाम करीं। त्रिशूल डमरू-धारी।
भक्ता वरद सदा सुखकारी । देशील मुक्ती चारी।। ऐ० ।।२।।

पायी पादुका। जपमाला कमंडलू मृगछाला।
धारण करिशी बा । नागजटा मुगुट शोभतो माथां।। ऐ० ॥३॥

तत्पर तुझ्या या जे ध्यानीं। अक्षय त्यांचे सदनीं।
लक्ष्मी वास करी दिनरजनीं। रक्षिसि संकट वारूनि।। ऐ० ॥४॥

या परिध्यान तुझें गुरूराया। दृश्य करी नयनां या।
पूर्णानंदसुखें ही काया। लाविसि हरिगुण गाया।। ऐ० ॥५॥


सदा सत्स्वरूपं चिदानंदकंद, जगत्संभवस्थानसंहार हे तुम् ।
स्वभक्तेच्छया मानुषं दर्शयंत, नमामीश्वरं सद्गुरुसाईनाथम् ॥१॥

भवध्वांतविध्वंस मार्तडमीड्यं, मनोवागतीतं मुनीर्ध्यानगम्यम् ।
जगद्व्यापकं निर्मलं निर्गुणं त्वा, नमामी० ॥२॥

भवांभोधि मग्नार्दितानां जनानां, स्वपादाश्रितानां स्वभक्तिप्रियाणाम् ।
समुद्धारणार्थ कलौ संभवन्तं, नमामी ॥३॥

सदा निंबवृक्षस्य मूलाधिवासात्सुधास्त्राविणं तिक्तमप्यप्रियं तम् ।
तरूं कल्पवृक्षाधिकं साधयंतं, नमामी ||४||

सदा कल्पवृक्षस्य तस्याधिमूले भवद्भावबुद्ध्या सपर्यादिसेवाम् ।
नृणां कुर्वतां भुक्तिमुक्तिप्रदं तं, नमामी० ॥५॥

अनेकाश्रृतातयलीला विलासैः समाविष्कृतेशानभास्वत्प्रभावम् ।
अहंभावहीनं प्रसन्नात्मभावं, नमामी ||६||

सतां विश्रमाराममेवाभिरामं सदा सज्जन: संस्तुतं सन्नमद्धिः।
जनामोदद भक्तभद्रप्रदं तं, नमामी० ॥७॥

अजन्माद्यमेकं परं ब्रम्ह साक्षात्स्वयंसंभवं-राममेवावतीर्णम् ।
भवद्दर्शनात्संपुनीतः प्रभोऽहं, नमामी० ॥८॥

श्रीसाईशकृपानिधेऽखिलनृणां सर्वार्थसिद्धप्रद ।
युष्मत्पादरजः प्रभावमतुलं धातापि वक्ताऽक्षमः ।
सद्भक्त्या शरणं कृतांजलिपुट: संप्रापितोऽस्मि प्रभो,
श्रीमत्साईपरेशपादकमलान्नान्यच्छरण्यं मम ।।९।।

साईरूपधरराघवोत्तम, भक्तकामविबुधदुमं प्रभुम् ।
माययोपहतचित्तशुद्धये, चिंतयाम्यहमहर्निश मुदा ।। १० ।।

शरत्सुधांशुप्रतिमप्रकाश, कृपातपात्रं तव साईनाथ ।
त्वदीयपादाब्जसमाश्रिताना स्वच्छायया तापमपाकरोतु ।।११।।

उपासनादैवतसाइनाथ, स्तवैर्मयो पासनिना स्तुतस्त्वम ।
रमेन्मनो मे तव पादयुग्मे, भृङ्गो, यथाब्जे मकरंदलुब्धः ।। १२ ।।

अनेकजन्मार्जितपापसंक्षयो, भवेद्भवत्पादसरोजदर्शनात् ।
क्षमस्व सर्वानपराध पुंजकान्प्रसीद साईश गुरो दयानिधे ।।१३।।

श्री साईनाथचरणामृतपूतचित्तास्तत्पादसेवनरताः सततं च भक्त्या |
संसारजन्यदुरितौधविनिर्गतास्ते कैवल्यधाम परमं समवाप्नुवन्ति ।।१४।।

स्तोत्रमेतत्पठेद्भक्त्या यो नरस्तन्मना: सदा ।
सद्गुरोः साइनाथस्य कृपापात्रं भवेद् ध्रुवम् ।।१५।।


रूसो मम प्रियांबिका, मजवरी पिताही रूसो ।
रूसो मम प्रियांगना, प्रियसुतात्मजाही रूसो ।।
रूसो भगिनी बंधुही, श्वशुर सासुबाई रूसो ।
न दत्तगुरू साई मा, मजवरी कधीहीं रूसो ।।१।।

पुसो न सुनबाई त्या, मज न भ्रातृजाया पुसो ।
पुसो न प्रिय सोयरे, प्रिय सगे न ज्ञाती पुसो ।।
पुसो सुहृद ना सखा, स्वजन नाप्तबंधू पुसो ।
परीन गुरू साई मा मजवरी,कधीहीं रूसो ।।२।।

पुसो न अबला मुले, तरूण वृद्धही ना पुसो ।
पुसो न गुरूं धाकुटें, मजन थोर साने पुसो ।।
पुसो नच भलेबुरे, सुजन साधुही ना पुसो ।
परी न गुरू साई मा, मजवरी कधीहीं रूसो ।।३।।

रूसो चतुर तत्ववित्, विबुध प्राज्ञे ज्ञानी रूसो ।
रूसोहि विदुषी स्त्रिया, कुशल पंडिताही रूसो ।।
रूसो महिपती यती, भजक तापसीही रूसो ।
न दत्तगुरू साई मा, मजवरी कधीही रूसो ।।४।।

रूसो कवि ऋषी मुनी, अनघ सिद्ध योगी रूसो ।
रूसो हि गृहदेवता, नि कुलग्रामदेवी रूसो ॥
रूसो खल पिशाच्चही, मलिन डाकिनींही रूसो ।
न दत्तगुरू साई मा, मजवरी कधीही रूसो ।।५।।

रूसो मृगखग कृमी, अखिल जीवजंतु रूसो ।
रूसो विटप प्रस्तरा, अचल आपगाब्धी रूसो ।
रूसो ख पवनाग्नि वार, अवनि पंचतत्वें रूसो ।
न दत्तगुरू साई मा, मजवरी कधीही रूसो ।।६।।

रूसो विमल किन्नरा, अमल यक्षिणीही रूसो ।
रूसो शशि खगादिही, गगनिं तारकाही रूसो ।।
रूसो अमरराजही, अदये धर्मराजा रूसो ।
न दत्तगुरू साई मा, मजवरी कधीही रूसो ।।७।।

रूसो मन सरस्वती, चपलचित्त तेंही रूसो ।
रूसो वपु दिशाखिला, कठिण काल तोही रूसो ।
रूसो सकल विश्वही, मयि तु ब्रह्मगोलं रूसो ।
न दत्तगुरू साई मा, मजवरी कधीही रूसो ।।८।।

विमूढ म्हणूनी हसो, मज न मत्सराही डसो ।
पदाभिरूचि उल्हासो, जननकर्दमीं ना फसो ।
न दुर्ग धृतिचा धसो, अशिवभाव मागें खसो ।
प्रपंचि मन हें रूसो, दृढ विरक्ति चित्तीं ठसो ॥९॥

कुणाचिही घृणा नसो, न च स्पृहा कशाची असो ।
सदैव हृदयीं वसो, मनसि ध्यानिं साई वसो ।
पदी प्रणय वोरसो, निखिल दृश्य बाबा दिसो ।
न दत्तगुरू साई मा, उपरि याचनेला रूसो ॥१०॥

ॐ यज्ञेन यज्ञमयजंत देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ।
ते ह नाकं महिमान: सचंत यत्र पूर्वे साध्या संति देवाः ।।
ॐ राजाधिराजाय प्रसह्यसाहिने नमो वयं वैश्रवणाय कूर्महे।
स मे कामान्कामकामाय मह्यं कामेश्वरो वैश्रवणो दधातु ।
कुबेराय वैश्रवणाय । महाराजाय नमः । ॐ स्वस्ति ।

साम्राज्यं भौंज्यं स्वाराज्यं वैराज्यं पारमेष्ठ्य राज्यं
माहाराज्यमाधिपत्यमयं समंतपर्यायी स्यात्सार्वभौम:
सार्वायुष आंतादापरार्धात् पृथिव्यैसमुद्रपर्यंताया एकराळिति ।
तदप्येष श्लोकोऽभिगीतो मरुत: परिवेष्टारो मरुत्तस्यावसन्गृहे ।
आविक्षितस्य कामप्रेर्विश्वेदेवाः सभासद इति ॥

श्री नारायण वासुदेव सच्चिदानंद सद्गुरु साईंनाथ महाराज की जय॥


करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा
श्रवणनयनजं वा मानसं वाऽपराधम् ।
विदितमविदितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व
जय जय करूणाब्धे श्रीप्रभो साईनाथ ।।१।

श्री सच्चिदानंद सद्गुरू साईनाथ महाराज की जय।
ॐ राजाधिराज योगिराज परब्रह्म साईनाथ महाराज।
श्री सच्चिदानंद सद्गुरू साईनाथ महाराज की जय।




शिर्डी साईं बाबा के बारे में क्या खास है?

शिर्डी साईं बाबा की सबसे बड़ी खासियत उनका सर्वधर्म समभाव का संदेश है। उन्होंने हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई सभी को समान दृष्टि से देखा और “सबका मालिक एक” का उपदेश दिया। उनका जीवन सादगी, निस्वार्थ प्रेम, अटूट श्रद्धा और सबूरी (धैर्य) का प्रतीक है। उनकी शिक्षाएँ सरल भाषा में गहन आध्यात्मिक सत्य बताती हैं।

साई शिर्डी में आरती कितने बजे है?

शिर्डी में साईं बाबा के मंदिर में प्रतिदिन चार आरतियाँ होती हैं:

काकड़ आरती (प्रातः): सुबह लगभग 5:00 बजे (निर्धारित समय मौसम और दिन के अनुसार बदल सकता है)।

मध्याह्न आरती (दोपहर): दोपहर लगभग 12:00 बजे।

धूप आरती (सायं): सूर्यास्त के तुरंत बाद (समय मौसम के अनुसार बदलता रहता है, आमतौर पर शाम लगभग 6:30 बजे से 7:30 बजे के बीच, गर्मियों में देर से और सर्दियों में जल्दी)।

शेज आरती (रात्रि): रात लगभग 10:00 बजे से 10:30 बजे के बीच।

साईं बाबा को कैसे प्रभावित करें?

साईं बाबा को “प्रभावित” करने की आवश्यकता नहीं है। वह सभी भक्तों के हृदय को देखते हैं। उनकी कृपा पाने का सर्वोत्तम तरीका है:
श्रद्धा और सबूरी: उनमें अटूट विश्वास (श्रद्धा) रखें और धैर्य (सबूरी) से प्रतीक्षा करें।
निस्वार्थ सेवा: बिना किसी अपेक्षा के दूसरों की मदद करें, खासकर जरूरतमंदों की।
सदाचार: ईमानदारी, दया और सत्यनिष्ठा से जीवन जिएँ।
नियमित स्मरण: उनका नाम जपें, उनके भजन गाएँ या सुनें, उनकी आरती में भाग लें।
समर्पण: अपनी सभी चिंताएँ और इच्छाएँ उनके चरणों में समर्पित कर दें (“यद्यपि तेल न्यारे” का भाव)।

साईं बाबा का चमत्कार क्या है?

साईं बाबा के असंख्य चमत्कारों के प्रमाण भक्तों के अनुभवों में मिलते हैं, जैसे:
दूर से ही भक्तों की पीड़ा जान लेना और समाधान करना।
असंभव लगने वाली समस्याओं का अचानक हल हो जाना।
शारीरिक और मानसिक रोगों का चमत्कारिक ढंग से ठीक होना।
भक्तों को सपनों में या साक्षात् दर्शन देना और मार्गदर्शन करना।
उडी (भभूति) से असाध्य रोगों का निवारण करना।

हालाँकि, बाबा स्वयं कहते थे कि उनका सबसे बड़ा चमत्कार है भक्त के हृदय को बदलना, अंधविश्वास दूर करना और सच्चे धर्म का मार्ग दिखाना।

क्या हम पीरियड्स के दौरान शिर्डी मंदिर जा सकते हैं?

हाँ, बिल्कुल जा सकते हैं। शिर्डी साईं मंदिर में मासिक धर्म (पीरियड्स) के दौरान महिलाओं के प्रवेश पर कोई प्रतिबंध नहीं है। साईं बाबा ने कभी भी किसी भी भक्त को लिंग, जाति या शारीरिक स्थिति के आधार पर भेदभाव नहीं किया। उनका दरबार सभी के लिए खुला है। श्रद्धा और भक्ति भाव से कोई भी भक्त किसी भी समय दर्शन कर सकता है।

यहाँ शिर्डी साईं बाबा मंदिर का पूरा पता हिंदी में दिया गया है:

श्री साईं बाबा समाधि मंदिर, शिर्डी
श्री साईबाबा संस्थान ट्रस्ट (शिर्डी)
समाधि मंदिर, शिर्डी,
तहसील: रहाटा,
जिला: अहमदनगर,
महाराष्ट्र – ४२३१०९,
भारत

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