Wednesday, January 28, 2026
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दुर्गा अमृतवाणी (Durga Amritwani PDF 2024-25)

By Dr. Hemlata | Reviewed by Vedic Scholar | Last Updated: January 2026 - This devotional text has been carefully verified against widely accepted traditional sources to preserve correct wording, pronunciation, and spiritual intent for daily recitation.
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दुर्गा अमृतवाणी (Durga Amritwani Pdf) एक पवित्र और महत्वपूर्ण धार्मिक पाठ है, जो देवी दुर्गा की महिमा का वर्णन करता है और भक्तों को आध्यात्मिक आनंद और शांति प्रदान करता है। यह पाठ विशेष रूप से नवरात्रि और दुर्गा पूजा के अवसर पर पढ़ा जाता है, लेकिन इसे किसी भी समय पढ़ा जा सकता है जब भक्त देवी दुर्गा की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं। आप हमारी वेबसाइट में बुद्ध अमृतवाणी और राम अमृतवाणी भी पढ़ सकते हैं।

दुर्गा अमृतवाणी का महत्व

दुर्गा अमृतवाणी का महत्व अनंत है। यह पाठ देवी दुर्गा की विभिन्न स्वरूपों, उनकी महिमा, शक्ति, और उनके दिव्य कार्यों का वर्णन करता है। यह पाठ न केवल भक्तों को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है, बल्कि उन्हें जीवन की कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति भी प्रदान करता है। दुर्गा अमृतवाणी के नियमित पाठ से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता और शांति का संचार होता है।

देवी दुर्गा की महिमा

देवी दुर्गा को शक्ति की देवी माना जाता है। वे दुर्गति नाशिनी, दुष्टों का संहार करने वाली, और भक्तों की रक्षक हैं। दुर्गा अमृतवाणी में देवी दुर्गा की महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है। यह बताया गया है कि कैसे उन्होंने विभिन्न राक्षसों का वध कर धर्म की स्थापना की। दुर्गा माँ के नौ रूपों का भी वर्णन इसमें किया गया है, जो भक्तों को अलग-अलग तरीके से आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

पाठ की विधि

दुर्गा अमृतवाणी का पाठ करने के लिए भक्तों को एक शांत और पवित्र स्थान का चयन करना चाहिए। पाठ की शुरुआत माँ दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक जलाकर और अगरबत्ती जलाकर की जाती है। इसके बाद भक्त ध्यान मुद्रा में बैठकर दुर्गा अमृतवाणी का पाठ करते हैं। इसे पढ़ते समय, भक्तों को अपने मन को केंद्रित करना चाहिए और पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ माँ दुर्गा की आराधना करनी चाहिए।

लाभ

दुर्गा अमृतवाणी का नियमित पाठ करने से व्यक्ति को कई लाभ प्राप्त होते हैं:
आध्यात्मिक उन्नति: यह पाठ व्यक्ति के आध्यात्मिक स्तर को ऊँचा उठाता है और उन्हें दिव्य ऊर्जा से भर देता है।
मानसिक शांति: दुर्गा अमृतवाणी का पाठ मानसिक शांति और सुकून प्रदान करता है।
सकारात्मक ऊर्जा: यह पाठ व्यक्ति के चारों ओर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और नकारात्मकता को दूर करता है।
कठिनाइयों का नाश: दुर्गा माँ की कृपा से जीवन की सभी कठिनाइयाँ और समस्याएँ दूर होती हैं।
स्वास्थ्य लाभ: यह पाठ व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को सुधारता है।



दुर्गा अमृतवाणी (Durga Amritwani PDF)3

दुर्गा माँ दुःख हरने वाली
मंगल मंगल करने वाली
भय के सर्प को मारने वाली
भवनिधि से जग्तारने वाली

अत्याचार पाखंड की दमिनी
वेद पुराणों की ये जननी
दैत्य भी अभिमान के मारे
दीन हीन के काज संवारे

सर्वकलाओं की ये मालिक
शरणागत धनहीन की पालक
इच्छित वर प्रदान है करती
हर मुश्किल आसान है करती

भ्रामरी हो हर भ्रम मिटावे
कण -कण भीतर कजा दिखावे
करे असम्भव को ये सम्भव
धन धन्य और देती वैभव

महासिद्धि महायोगिनी माता
महिषासुर की मर्दिनी माता
पूरी करे हर मन की आशा
जग है इसका खेल तमाशा 

जय दुर्गा जय-जय दमयंती
जीवन- दायिनी ये ही जयन्ती
ये ही सावित्री ये कौमारी
महाविद्या ये पर उपकारी

सिद्ध मनोरथ सबके करती
भक्त जनों के संकट हरती
विष को अमृत करती पल में
ये ही तारती पत्थर जल में

इसकी करुणा जब है होती
माटी का कण बनता मोती
पतझड़ में ये फूल खिलावे
अंधियारे में जोत जलावे

वेदों में वर्णित महिमा इसकी
ऐसी शोभा और है किसकी
ये नारायणी ये ही ज्वाला
जपिए इसके नाम की माला

ये है सुखेश्वरी माता
इसका वंदन करे विधाता
पग-पंकज की धूलि चंदन
इसका देव करे अभिनंदन

जगदम्बा जगदीश्वरी दुर्गा दयानिधान
इसकी करुणा से बने निर्धन भी धनवान

छिन्नमस्ता जब रंग दिखावे
भाग्यहीन के भाग्य जगावे
सिद्धि – दात्री – आदि भवानी
इसको सेवत है ब्रह्मज्ञानी

शैल-सुता माँ शक्तिशाला
इसका हर एक खेल निराला
जिस पर होवे अनुग्रह इसका
कभी अमंगल हो ना उसका

इसकी दया के पंख लगाकर
अम्बर छूते है कई जाकर
राय को ये ही पर्वत करती
गागर में है सागर भरती

इसके कब्जे जग का सब है
शक्ति के बिना शिव भी शव है
शक्ति ही है शिव की माया
शक्ति ने ब्रह्मांड रचाया

इस शक्ति का साधक बनना
निष्ठावान उपासक बनना
कुष्मांडा भी नाम इसका
कण – कण में है धाम इसका

दुर्गा माँ प्रकाश स्वरूपा
जप-तप ज्ञान तपस्या रूपा
मन में ज्योत जला लो इसकी
साची लगन लगा लो इसकी

कालरात्रि ये महामाया
श्रीधर के सिर इसकी छाया
इसकी ममता पावन झुला
इसको ध्यानु भक्त ना भुला

इसका चिंतन चिंता हरता
भक्तो के भंडार है भरता
साँसों का सुरमंडल छेड़ो
नवदुर्गा से मुंह न मोड़ो

चन्द्रघंटा कात्यानी
महादयालू महाशिवानी
इसकी भक्ति कष्ट निवारे
भवसिंधु से पार उतारे

अगम अनंत अगोचर मैया
शीतल मधुकर इसकी छैया
सृष्टि का है मूल भवानी
इसे कभी न भूलो प्राणी

दुर्गा की कर साधना, मन में रख विश्वास
जो मांगोगे पाओगे क्या नहीं मेरी माँ के पास

खड्ग – धारिणी हो जब आई
काल रूप महा-काली कहाई
शुम्भ निशुम्भ को मार गिराया
देवों को भय-मुक्त बनाया

अग्निशिखा से हुई सुशोभित
सूरज की भाँती प्रकाशित
युद्ध-भूमि में कला दिखाई
मानव बोले त्राहि-त्राहि

करे जो इसका जाप निरंतर
चले ना उस पर टोना मंत्र
शुभ-अशुभ सब इसकी माया
किसी ने इसका पार ना पाया

इसकी भक्ति जाए ना निष्फल
मुश्किल को ये डाले मुश्किल
कष्टों को हर लेने वाली
अभयदान वर देने वाली

धन लक्ष्मी हो जब आती
कंगाली है मुंह छुपाती
चारों और छाए खुशाहली
नजर ना आये फिर बदहाली

कल्पतरु है महिमा इसकी
कैसे करू मै उपमा इसकी
फल दायिनी है भक्ति जिसकी
सबसे न्यारी शक्ति उसकी

अन्नपूर्णा अन्न-धनं को देती
सुख के लाखों साधन देती
प्रजा-पालक इसे ध्याते
नर-नारायण भी गुण गाते

चम्पाकली सी छवि मनोहर
इसकी दया से धर्म धरोहर
त्रिभुवन की स्वामिनी ये है
योगमाया गजदामिनी ये है

रक्तदन्ता भी इसे है कहते
चोर निशाचर दानव डरते
जब ये अमृत-रस बरसावे
मृत्युलोक का भय ना आवे

काल के बंधन तोड़े पल में
सांस की डोरी जोड़े पल में
ये शाकम्भरी माँ सुखदायी
जहां पुकारू वहां सहाई


विंध्यवासिनी नाम से,करे जो निशदिन याद
उसे ग्रह में गूंजता, हर्ष का सुरमय नाद


ये चामुण्डा चण्ड -मुण्ड घाती
निर्धन के सिर ताज सजाती
चरण-शरण में जो कोई जाए
विपदा उसके निकट ना आये

चिंतपूर्णी चिंता है हरती
अन्न-धनं के भंडारे भरती
आदि-अनादि विधि विधाना
इसकी मुट्ठी में है जमाना

रोली कुम -कुम चन्दन टीका
जिसके सम्मुख सूरज फीका
ऋतुराज भी इसका चाकर
करे आराधना पुष्प चढ़ाकर

इंद्र देवता भवन धुलावे
नारद वीणा यहाँ बजावे
तीन लोक में इसकी पूजा
माँ के सम न कोई भी दूजा

ये ही वैष्णो आद्कुमारी
भक्तन की पत राखनहारी
भैरव का वध करने वाली
खण्डा हाथ पकड़ने वाली

ये करुणा का न्यारा मोती
रूप अनेकों एक है ज्योति
माँ वज्रेश्वरी कांगड़ा वाली
खाली जाए न कोई सवाली

ये नरसिंही ये वाराही
नेहमत देती ये मनचाही
सुख समृद्धि दान है करती
सबका ये कल्याण है करती

मयूर कही है वाहन इसका
करते ऋषि आहवान इसका
मीठी है ये सुगंध पवन में
इसकी मूरत राखो मन में

नैना देवी रंग इसी का
पतितपावन अंग इसी का
भक्तो के दुःख लेती ये है
नैनो को सुख देती ये है

नैनन में जो इसे बसाते
बिन मांगे ही सब कुछ पाते
शक्ति का ये सागर गहरा
दे बजरंगी द्वार पे पहरा

इसके रूप अनूप की, समता करे ना कोय
पूजे चरण-सरोज जो, तन मन शीतल होय

काली स्वरूप में लीला करती
सभी बलाएं इससे डरती
कही पे है ये शांत स्वरूपा
अनुपम देवी अति अनूपा

अर्चना करना एकाग्र मन से
रोग हरे धनवंतरी बन के
चरणपादुका मस्तक धर लो
निष्ठा लगन से सेवा कर लो

मनन करे जो मनसा माँ का
गौरव उत्तम पाय जवाका
मन से मनसा-मनसा जपना
पूरा होगा हर इक सपना

ज्वाला -मुखी का दर्शन कीजो
भय से मुक्ति का वर लीजो
ज्योति यहाँ अखण्ड हो जलती
जो है अमावस पूनम करती

श्रद्धा -भाव को कम न करना
दुःख में हंसना गम न करना
घट – घट की माँ जाननहारी
हर लेती सब पीड़ा तुम्हारी

बगलामुखी के द्वारे जाना
मनवांछित ही वैभव पाना
उसी की माया हंसना रोना
उससे बेमुख कभी ना होना

शीतल – शीतल रस की धारा
कर देगी कल्याण तुम्हारा
धुनी वहां पे रमाये रखना
मन से अलख जगाये रखना

भजन करो कामाख्या जी का
धाम है जो माँ पार्वती का
सिद्ध माता सिद्धेश्वरी है
राजरानी राजेश्वरी है

धूप दीप से उसे मनाना
श्यामा गौरी रटते जाना
उकिनी देवी को जिसने आराधा
दूर हुई हर पथ की बाधा

नंदा देवी माँ जो जाओगे
सच्चा आनंद वही पाओगे
कौशिकी माता जी का द्वारा
देगा तुझको सदा सहारा

हरसिद्धि के ध्यान में, जाओंगे जब खो
सिद्ध मनोरथ सब तुम्हारे, पल में जायेंगे हो

महालक्ष्मी को पूजते रहियो
धन सम्पत्ति पाते ही रहिओ
घर में सच्चा सुख बरसेगा
भोजन को ना कोई तरसेगा

जिव्ह्दानी करते जो चिंतन
छुट जायेंगे यम के बंधन
महाविद्या की करना सेवा
ज्ञान ध्यान का पाओगे मेवा

अर्बुदा माँ का द्वार निराला
पल में खोले भाग्य का ताला
सुमिरन उसका फलदायक
कठिन समय में होए सहायक

त्रिपुर-मालिनी नाम है न्यारा
चमकाए तकदीर का तारा
देविकानाभ में जाकर देखो
स्वर्ग-धाम वो माँ का देखो

पाप सारे धोती पल में
काया कुंदन होती पल में
सिंह चढ़ी माँ अम्बा देखो
शारदा माँ जगदम्बा देखो

लक्ष्मी का वहां प्रिय वासा
पूरी होती सब की आशा
चंडी माँ की ज्योत जगाना
सच्चा सेवी समझ वहां जाना

दुर्गा भवानी के दर जाके
आस्था से एक चुनर चढ़ा के
जग की खुशियाँ पा जाओगे
शहंशाह बनकर आ जाओगे

वहां पे कोई फेर नहीं है
देर तो है अंधेर नहीं है
कैला देवी करौली वाली
जिसने सबकी चिंता टाली

लीला माँ की अपरम्पारा
करके ही विशवास तुम्हारा
करणी माँ की अदभुत करणी
महिमा उसकी जाए ना वरणी

भूलो ना कभी शची की माता
जहाँ पे कारज सिद्ध हो जाता
भूखो को जहाँ भोजन मिलता
हाल वो जाने सबके दिल का

सप्तश्रंगी मैया की, साधना कर दिन रैन
कोष भरेंगे रत्नों से, पुलकित होंगे नैन

मंगलमयी सुख धाम है दुर्गा
कष्ट निवारण नाम है दुर्गा
सुख्दरूप भव तारिणी मैया
हिंगलाज भयहारिणी मैया

रमा उमा माँ शक्तिशाला
दैत्य दलन को भई विकराला
अंत:करण में इसे बसालो
मन को मंदिर रूप बनालो

रोग शोक बाहर कर देती
आंच कभी ना आने देती
रत्न जड़ित ये भूषण धारी
सेव दरिद्र के सदा आभारी

धरती से ये अम्बर तक है
महिमा सात समंदर तक है
चींटी हाथी सबको पाले
चमत्कार है बड़े निराले

मृत संजीवनी विध्यावाली
महायोगिनी ये महाकाली
साधक की है साधना ये ही
जपयोगी आराधना ये ही

करुणा की जब नजर घुमावे
कीर्तिमान धनवान बनावे
तारा माँ जग तारने वाली
लाचारों की करे रखवाली

कही बनी ये आशापुरनी
आश्रय दाती माँ जगजननी
ये ही है विन्धेश्वारी मैया
है वो जगभुवनेश्वरी मैया

इसे ही कहते देवी स्वाहा
साधक को दे फल मनचाहा
कमलनयन सुरसुन्दरी माता
इसको करता नमन विधाता

वृषभ पर भी करे सवारी
रुद्राणी माँ महागुणकारी
सर्व संकटो को हर लेती
विजय का विजया वर है देती

‘योगक्षमा ‘ जप तप की दाती
परमपदों की माँ वरदाती
गंगा में है अमृत इसका
साधक मन है जातक इसका

अन्तर्मन में अम्बिके, रखे जो हर ठौर
उसको जग में देवता, भावे ना कोई और

पदमावती मुक्तेश्वरी मैया
शरण में ले शरनेश्वरी मैया
आपातकाल रटे जो अम्बा
माँ दे हाथ ना करत विलम्बा

मंगल मूर्ति महा सुखकारी
संत जनों की है रखवारी
धूमावती के पकड़े पग जो
वश में करले सारे जग को

दुर्गा भजन महा फलदायी
हृदय काज में होत सहाई
भक्ति कवच हो जिसने पहना
और पड़े ना दुःख का सहना

मोक्षदायिनी माँ जो सुमिरे
जन्म मरण के भव से उबरे
रक्षक हो जो क्षीर भवानी
रहे काल की ना मनमानी

जिस ग्रह माँ की ज्योति जागे
तिमार वहां से भय का भागे
दुखसागर में सुखी जो रहना
दुर्गा नाम जपो दिन रैना

अष्ट- सिद्धि नौ निधियों वाली
महादयालु भये कृपाली
सपने सब साकार करेगी
दुखियों का उद्धार करेगी

मंगला माँ का चिंतन कीजो
हरसिद्धि ते हर सुख लीजो
थामे रहो विश्वास की डोरी
पकड़ा देगी अम्बा गौरी

भक्तो के मन के अंदर
रहती है कण -कण के अंदर
सूरज चाँद करोड़ो तारे
जोत से जोत ये लेते सारे

वो ज्योति है प्राण स्वरूपा
तेज वही भगवान स्वरूपा
जिस ज्योति से आये ज्योति
अंत उसी में जाए ज्योति

ज्योति है निर्दोष निराली
ज्योति सर्वकलाओं वाली
ज्योति ही अन्धकार मिटाती
ज्योति साचा राह दिखाती

अम्बा माँ की ज्योति में, तू ब्रह्मांड को देख
ज्योति ही तो खींचती, हर मस्तक की रेख
जगदम्बा जगतारिणी जगदाती जगपाल
इसके चरणन जो हुए उन पर होए दयाल

माँ की शीतल छाँव में, स्वर्ग सा सुखहोये
जिसकी रक्षा माँ करे , मार सके ना कोय
करुणामयी कापालिनी , दुर्गा दयानिधान
जैसे जिसकी भावना, वैसे दे वरदान

माँ श्री महां – शारदे , ममता देत अपार
हानि बदले लाभ में, जब ये हिलावे तार
जै जै अंबे माँ जै जगदम्बे माँ

नश्वर हम खिलौनों की, चाबी माँ के हाथ
जैसे इशारा माँ करे नाचे हम दिन-रात
भाग्य लिखे भाग्येश्वरी लेकर कलम-दवात
कठपुतली के बस में क्या, सब कुछ माँ के हाथ

पतझड़ दे या दे हमें खुशियों का मधुमास
माँ की मर्जी है जो दे हर सुख उसके पास
माँ करुणा के नाव पर होंगे जो भी सवार
बाल भी बांका होए ना वैरी जो हो संसार
जै जै अम्बे माँ जै जगदम्बे माँ

मंगला माँ के भक्त के, ग्रह में मंगलाचार
कभी अमंगल हो नहीं, पवन चले सुखकार
शक्ति ही को लो शक्ति मिलती इसके धाम
कामधेनु के तुल्य है शिवशक्ति का नाम

जन-जन वृक्ष है एक भला बुरे है लाख बबूल
बदी के कांटे छोड़ के चुन नेकी के फूल
माँ के चरण-सरोज की, कलियों जैसे सुगंध
स्वर्ग में भी ना होगा जो है यहाँ आनंद
जै जै माँ जै जगदम्बे माँ

पाप के काले खेल में सुख ना पावे कोय
कोयले की तो खान में सब कुछ काला होय
निकट ना आने दो कभी दुष्कर मोह के लाग
मानव चोले पर नहीं लगने दे जो दाग
जै जै माँ जै जगदम्बे माँ

नवदुर्गा के नाम का मनन करो सुखकार
बिन मोल बिन दाम ही करेगी माँ उपकार
भव से पार लगाएगी माँ की एक आशीष
तभी तो माँ को खोजते श्री हरी जगदीश

जै जै अम्बे माँ जै जगदम्बे माँ
जै जै अम्बे माँ जै जगदम्बे माँ
जै जै अम्बे माँ जै जगदम्बे माँ
जै जै अम्बे माँ जै जगदम्बे माँ

विधि- पूर्वक ही जोत जलाकर
माँ-चरणन में ध्यान लगाकर
जो जन, मन से पूजा करेंगे
जीवन-सिन्धु सहज तरेंगे

कन्या रूप में जब दे दर्शन
श्रद्धा – सुमन कर दीजो अर्पण
सर्वशक्ति वो आदिकौमारी
जाइये चरणन पे बलिहारी

त्रिपुर रूपिणी ज्ञान महिमा
भगवती वो वरदान महिमा
चंड -मुंड नाशक दिव्या-स्वरूपा
त्रिशुलधारिणी शंकर रूपा

करे कामाक्षी कामना पूरी
देती सदा माँ सबरस पूरी
चंडिका देवी का करो अर्चन
साफ़ रहेगा मन का दर्पण

सर्व भूतमयी सर्वव्यापक
माँ की दया के देव याचक
स्वर्णमयी है जिसकी आभा
करती नहीं है कोई दिखावा

कही वो रोहिणी कही सुभद्रा
दूर कर्त अज्ञान की निंद्रा
छल कपट अभिमान की दमिनी
नरप सौ भाग्य हर्ष की जननी

आश्रय दाति माँ जगदम्बे
खप्पर वाली महाबली अम्बे
मुंडन की जब पहने माला
दानव -दल पर बरसे ज्वाला

जो जन उसकी महिमा गाते
दुर्गम काज सुगम हो जाते
जै विध्या अपराजिता माई
जिसकी तपस्या महाफलदाई

चेतना बुद्धि श्रधा माँ है
दया शान्ति लज्जा माँ है
साधन सिद्धि वर है माँ का
जहा बुद्धि वो घर है माँ का

सप्तशती में दुर्गा दर्शन
शतचंडी है उसका चिन्तन
पूजा ये सर्वार्थ- साधक
भवसिंधु की प्यारी नावक

देवी-कुण्ड के अमृत से, तन मन निर्मल होय
पावन ममता के रस में, पाप जन्म के धोय

अष्टभुजा जग मंगल करणी
योगमाया माँ धीरज धरनी
जब कोई इसकी स्तुति करता
कागा मन हंस बनता

महिष-मर्दिनी नाम है न्यारा
देवों को जिसने दिया सहारा
रक्तबीज को मारा जिसने
मधु-कैटभ को मारा जिसने

धूम्रलोचन का वध कीन्हा
अभय-दान देवन को दीन्हा
जग में कहाँ विश्राम इसको
बार-बार प्रणाम है इसको


यज्ञ हवन कर जो बुलाते
भ्रामरी माँ की शरण में जाते
उनकी रखती दुर्गा लाज
बन जाते है बिगड़े काज

सुख पदार्थ उनको है मिलते
पांचो चोर ना उनको छलते
शुद्ध भाव से गुण गाते
चक्रवर्ती है वो कहलाते

दुर्गा है हर जन की माता
कर्महीन निर्धन की माता
इसके लिए कोई गैर नहीं है
इसे किसी से बैर नहीं है

रक्षक सदा भलाई की मैया
शत्रु सिर्फ बुराई की मैया
अनहद ये स्नेहा का सागर
कोई नहीं है इसके बराबर

दधिमति भी नाम है इसका
पतित-पावन धाम है इसका
तारा माँ जब कला दिखाती
भाग्य के तारे है चमकाती


दुर्गा अमृतवाणी (Durga Amritwani PDF)2

दुर्गा अमृतवाणी क्या है?

दुर्गा अमृतवाणी एक पवित्र धार्मिक पाठ है जो देवी दुर्गा की महिमा और उनकी दिव्य शक्तियों का वर्णन करता है। इसे श्रद्धा और भक्ति के साथ पढ़ने से आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं।

दुर्गा अम्मा को कैसे खुश करें?

दुर्गा अम्मा को खुश करने के लिए नियमित रूप से उनकी पूजा, दुर्गा चालीसा और दुर्गा अमृतवाणी का पाठ करें। साथ ही, अपने कार्यों में सच्चाई, सदाचार और दूसरों की सहायता करें।

मां दुर्गा किस चीज से खुश होती है?

मां दुर्गा सच्ची भक्ति, श्रद्धा, और निस्वार्थ सेवा से खुश होती हैं। वे अपने भक्तों के सच्चे प्रेम और समर्पण को देख कर प्रसन्न होती हैं। नवरात्रि के दौरान उपवास और दुर्गा सप्तशती का पाठ भी उन्हें प्रसन्न करता है।

दुर्गा मां कैसी दिखती है?

दुर्गा मां का रूप अद्वितीय और दिव्य है। वे लाल या पीले वस्त्र धारण करती हैं, उनके कई हाथ होते हैं जिनमें वे शस्त्र और विभिन्न प्रतीक रखती हैं। उनके वाहन सिंह है, जो उनकी शक्ति और साहस का प्रतीक है। उनके चेहरे पर दिव्यता और करुणा की झलक होती है।

दुर्गा मां की प्रतिदिन कैसे पूजा करें?

प्रतिदिन मां दुर्गा की पूजा करने के लिए निम्नलिखित विधि अपनाएं:

– सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
– एक पवित्र स्थान पर मां दुर्गा की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।
– धूप, दीप, और अगरबत्ती जलाएं।
– मां दुर्गा को फूल, अक्षत (चावल), और प्रसाद चढ़ाएं।
दुर्गा चालीसा, दुर्गा अमृतवाणी या दुर्गा सप्तशती का पाठ करें।
– अंत में मां दुर्गा की आरती करें और प्रणाम करें।

दुर्गा के 32 नामों का जाप करने का क्या लाभ है?

दुर्गा के 32 नामों का जाप करने से कई आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं। यह जाप भक्तों को भय, रोग, शोक और दरिद्रता से मुक्त करता है। इससे जीवन में सुख, शांति, और समृद्धि का संचार होता है। साथ ही, यह जाप मां दुर्गा की कृपा प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।

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